गाँधी के पहले राजनीतिक शिकार-स्वामी श्रद्धानन्द
‘ज्ञानपीठ’ का महाप्रयाण की गौरवमयी यात्रा का पथिक

समरस संस्थान द्वारा लेखक डॉ. प्रभात सिंघल का सम्मान
बांग्लादेश में हिंदू युवक की निर्मम हत्या और हिंदू समाज पर लक्षित हिंसा अस्वीकार्य: आलोक कुमार
श्री आलोक कुमार ने कहा कि रिपोर्टों के अनुसार दीपु चंद्र दास ने यह लिखा था कि “सभी भगवान अलग-अलग नामों से एक ही हैं।” इसे ईशनिंदा करार दिया गया और इसी कारण उसे जिंदा जला दिया गया। उन्होंने कहा कि ऐसी सोच अत्यंत खतरनाक है, क्योंकि यह भारत में धर्मनिरपेक्षता की बुनियाद को ही चुनौती देती है। उन्होंने सवाल उठाया कि स्वयं को धर्मनिरपेक्ष बताने वाली शक्तियाँ, अंतरराष्ट्रीय मीडिया के कुछ वर्ग और विश्वभर के मानवाधिकार मंच इस मुद्दे पर पूरी तरह मौन क्यों हैं। उन्होंने आगे कहा कि निर्वासित बांग्लादेशी लेखिका एवं मानवाधिकार कार्यकर्ता तस्लिमा नसरीन ने सार्वजनिक रूप से बताया है कि दीपु चंद्र दास पर झूठा ईशनिंदा का आरोप लगाया गया था और पुलिस संरक्षण में होने के बावजूद उसे छोड़ दिया गया। श्री आलोक कुमार ने कहा कि यह बांग्लादेश में कानून के शासन के पूर्ण और जानबूझकर हुए पतन तथा राज्य की गंभीर जिम्मेदारी से पलायन को दर्शाता है।
श्री आलोक कुमार ने घोषणा की कि विश्व हिंदू परिषद बांग्लादेश में हिंदुओं के खिलाफ जारी हिंसा के विरोध में तथा न्याय, जवाबदेही और अंतरराष्ट्रीय हस्तक्षेप की मांग को लेकर भारत के प्रत्येक प्रांत और जिले में देशव्यापी आंदोलन करेगी।
श्रीराज नायर नरेंद्र मुजुमदार
राष्ट्रीय प्रवक्ता प्रचार प्रसार प्रमुख
भारत की पारंपरिक चिकित्सा की रोशनी में विश्व-स्वास्थ्य
आयुर्वेद शरीर के तीन दोषों (वात, पित्त, कफ) के संतुलन पर केंद्रित; आहार, जीवनशैली, जड़ी-बूटी और पंचकर्म (शुद्धिकरण) जैसी तकनीकों का उपयोग करती है। अष्टांग आयुर्वेद अर्थात कायचिकित्सा (आंतरिक चिकित्सा), शल्य (सर्जरी), कौमारभृत्य (बाल चिकित्सा), भूतविद्या (मनोविज्ञान), अगद तंत्र (विष विज्ञान), रसायन (जराचिकित्सा), वाजीकरण (प्रजनन) और शालक्य (नेत्र/कान/नाक) में विभाजित है। आयुर्वेद की ही भांति योग भी एक पारंपरिक चिकित्सा प्रणाली है जो शारीरिक आसन (आसन), प्राणायाम (सांस लेने के व्यायाम), ध्यान (मेडिटेशन) और नैतिक सिद्धांतों के माध्यम से मन-शरीर के समन्वय पर केंद्रित है। इसी तरह प्राकृतिक चिकित्सा में मिट्टी, पानी, धूप और आहार जैसी प्राकृतिक तरीकों से शरीर की स्व-उपचार क्षमता को बढ़ावा देती है।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भारत की इन पारंपरिक चिकित्सा को वैश्विक मंच पर प्रतिष्ठा दिलाने में निर्णायक भूमिका निभाई है। उन्होंने इसे केवल सांस्कृतिक धरोहर के रूप में नहीं, बल्कि भविष्य की एक प्रभावी, सुलभ और टिकाऊ स्वास्थ्य व्यवस्था के रूप में प्रस्तुत किया है। उनके नेतृत्व में आयुष मंत्रालय की स्थापना, अंतरराष्ट्रीय योग दिवस की शुरुआत, विश्व स्वास्थ्य संगठन के साथ पारंपरिक चिकित्सा को लेकर साझेदारी और वैश्विक सम्मेलनों का आयोजन इस दिशा में ठोस कदम हैं। हाल ही में नई दिल्ली में पारंपरिक चिकित्सा पर दूसरा वैश्विक शिखर सम्मेलन इस बात का प्रमाण है कि भारत अब इस क्षेत्र में केवल सहभागी नहीं, बल्कि मार्गदर्शक की भूमिका निभा रहा है। प्रधानमंत्री की ओमान यात्रा के दौरान आयुष और हर्बल उत्पादों के निर्यात में हुई वृद्धि इस परिवर्तनशील परिदृश्य को स्पष्ट रूप से दर्शाती है। 61.1 मिलियन डॉलर से बढ़कर 65.1 मिलियन डॉलर तक पहुँचना केवल आर्थिक आँकड़ा नहीं है, बल्कि यह वैश्विक विश्वास का संकेत है। दुनिया के अनेक देश यह समझने लगे हैं कि भारत की पारंपरिक चिकित्सा प्रणालियाँ न केवल सस्ती और सुलभ हैं, बल्कि दीर्घकालिक स्वास्थ्य लाभ भी प्रदान करती हैं।
पारंपरिक चिकित्सा के दूसरे वैश्विक शिखर सम्मेलन में भारत ने इस दृष्टिकोण को प्रभावी ढंग से दुनिया के सामने रखा। ब्राज़ील, संयुक्त अरब अमीरात, मलेशिया, मेक्सिको, नेपाल, श्रीलंका सहित 16 देशों के साथ द्विपक्षीय बैठकों ने यह स्पष्ट कर दिया कि पारंपरिक चिकित्सा अब कूटनीति और वैश्विक सहयोग का भी एक सशक्त माध्यम बन चुकी है। इस अवसर पर प्रधानमंत्री मोदी द्वारा जारी किया गया ‘आयुष मार्क’ एक ऐतिहासिक पहल है, जो आयुष उत्पादों और सेवाओं के लिए गुणवत्ता का वैश्विक मानक स्थापित करेगा। इससे न केवल उपभोक्ताओं का विश्वास बढ़ेगा, बल्कि भारतीय उत्पादों की अंतरराष्ट्रीय स्वीकार्यता भी मजबूत होगी। हालाँकि यह भी सत्य है कि पारंपरिक चिकित्सा के क्षेत्र में कुछ चुनौतियाँ मौजूद हैं। गुणवत्ता नियंत्रण, मानकीकरण, वैज्ञानिक शोध और प्रमाणिकता के प्रश्न लंबे समय से उठते रहे हैं।
(ललित गर्ग)
लेखक, पत्रकार, स्तंभकार
ई-253, सरस्वती कंुज अपार्टमेंट
25 आई. पी. एक्सटेंशन, पटपड़गंज, दिल्ली-92
फोनः 22727486, 9811051133
पत्थरों पर स्वर्णाक्षऱों से लिखा है हमारे अतीत का गौरव
क्या है विकसित भारत-जी राम जी कानून 2025
ग्रामीण रोज़गार लगभग दो दशकों से भारत की सामाजिक सुरक्षा संरचना की आधारशिला रही है। 2005 में कार्यान्वित होने के बाद से, महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम (मनरेगा) ने मज़दूरी वाला रोजगार प्रदान करने, ग्रामीण आय को स्थिर करने और मूलभूत अवसंरचना निर्माण में अहम भूमिका निभाई है। हालांकि, समय के साथ, ग्रामीण भारत की संरचना और लक्ष्य अत्यधिक बदल गए हैं। बढ़ती आय, बढ़ी हुई कनेक्टिविटी, व्यापक स्तर पर डिजिटल पहुंच और अलग-अलग तरह की आजीविका ने ग्रामीण रोज़गार की आवश्यकताओं की प्रकृति बदल दी है।
इस पृष्ठभूमि में, भारत के राष्ट्रपति द्वारा विकसित भारत–गारंटी फॉर रोज़गार एंड आजीविका मिशन (ग्रामीण) विधेयक, 2025 को स्वीकृति प्रदान की गई है। यह कानून मनरेगा में व्यापक वैधानिक बदलाव का प्रतिनिधित्व करता है, जो ग्रामीण रोज़गार को विकसित भारत 2047 के दीर्घकालिक विजन के साथ संयोजित करता है तथा जवाबदेही, बुनियादी ढांचे के परिणामों और आय सुरक्षा को सुदृढ़ करता है।
भारत में ग्रामीण रोजगार और विकास नीति की पृष्ठभूमि
स्वतंत्रता के बाद से, भारत में ग्रामीण विकास की नीतियों का केंद्रबिन्दु निर्धनता कम करने, खेती की पैदावार को बेहतर बनाने और अधिशेष तथा कम काम वाले ग्रामीण मज़दूरों के लिए रोजगार सृजन रहा है। मजदूरी वाले रोजगार कार्यक्रम धीरे-धीरे ग्रामीण रोजगार की सहायता करने के मुख्य माध्यम बन गए हैं, साथ ही इसने मूलभूत अवसंरचना को भी सुदृढ़ किया है। समय के साथ बदलते सामाजिक-आर्थिक स्थितियों के अनुरूप दृष्टिकोणों में भी बदलाव आया है।
ग्रामीण श्रमबल कार्यक्रम (1960 का दशक) और ग्रामीण रोजगार के लिए क्रैश स्कीम (1971) जैसे आरम्भिक कार्यक्रमों के साथभारत के मजदूरी रोजगार पहलों की विविध चरणों के माध्यम से प्रगति हुई। इनके बाद 1980 और 1990 के दशक में अधिक संरचित प्रयास किए गए, जिसमें राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार कार्यक्रम, ग्रामीण भूमिहीन रोजगार गारंटी कार्यक्रम शामिल था, जिसे बाद में जवाहर रोजगार योजना (1993) में विलय कर दिया गया। 1999 में यह सम्पूर्ण ग्रामीण रोजगार योजना में संघटित हो गई, जिसका उद्देश्य कवरेज और समन्वय में सुधार करना था। रोजगार आश्वासन योजना और काम के बदले अनाज कार्यक्रम जैसी पूरक योजनाओं ने मौसमी बेरोजगारी और खाद्य सुरक्षा पर ध्यान दिया। 1977 के महाराष्ट्र रोजगार गारंटी अधिनियम के साथ एक बड़ा बदलाव आया, जिसने काम करने के वैधानिक अधिकार की अवधारणा प्रस्तुत की। इन अनुभवों की परिणति 2005 में महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम (एमजीएनआरईजीए) के अधिनियमन में हुई।
महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम (मनरेगा) एक प्रमुख कार्यक्रम था जिसका लक्ष्य बिना कौशल वाले काम करने को तैयार गांव के परिवारों को प्रति वर्ष कम से कम 100 दिन की गारंटी वाला काम देकर रोजी-रोटी की सुरक्षा बढ़ाना था। पिछले कुछ वर्षों में, कई प्रशासनिक और प्राद्यौगिक सुधारों ने इसके कार्यान्वयन को सुदृढ़ किया, जिससे सहभागिता, पारदर्शिता और डिजिटल शासन में अत्यधिक सुधार हुआ। वित्त वर्ष 2013-14 और वित्त वर्ष 2025-26 के बीच महिलाओं की सहभागिता 48 प्रतिशत से धीरे-धीरे बढ़कर 58.15 प्रतिशत हो गई, आधार सीडिंग में तेज़ी से बढ़ोतरी हुई, आधार-बेस्ड पेमेंट सिस्टम को व्यापक स्तर पर अपनाया गया और इलेक्ट्रॉनिक वेतन पेमेंट लगभग हर जगह प्रचलित हो गया। कामों की निगरानी में भी सुधार हुआ, जियो-टैग्ड एसेट्स में व्यापक स्तर पर बढ़ोतरी हुई और घरेलू स्तर पर सृजित अलग-अलग परिसंपत्तियों का हिस्सा बढ़ा।
मनरेगा के तहत प्राप्त अनुभव ने प्रक्षेत्र-स्तरीय कर्मचारियों की अहम भूमिका को भी रेखांकित किया, जिन्होंने कम प्रशासनिक संसाधनों और कर्मचारियों के साथ काम करने के बावजूद निरंतरता और कर्यान्वयन का परिमाण सुनिश्चित किया। यद्पि, इन लाभों के साथ-साथ, गहरे संरचनागत मुद्दे भी बने ही रहे। कई राज्यों में निगरानी से पता चला कि जमीनी स्तर पर काम प्राप्त नहीं हो रहा था, व्यय वास्तविक प्रगति से मेल नहीं खा रहा था, श्रम केन्द्रित कार्यों में मशीनों का इस्तेमाल हो रहा था और डिजिटल उपस्थितिप्रणाली का बार-बार उल्लंघन किया जा रहा था। समय के साथ, गलत इस्तेमाल बढ़ता गया और महामारी के बाद के समय में केवल कुछ ही परिवार पूरे सौ दिन का काम पूरा कर पाए। इन रुझानों से पता चला कि डिलीवरी प्रणाली में तो सुधार हुआ, लेकिन मनरेगा का पूरा ढांचा लगभग चरमरा चुका था।
रोजगार के लिए विकसित भारत गारंटी और आजीविका मिशन ग्रामीण कानून ने एक व्यापक कानूनी बदलाव के जरिए इस अनुभव पर ध्यान दिया है। यह प्रशासनिक व्यय की सीमा को 6 प्रतिशत से बढ़ाकर 9 प्रतिशत करने के जरिए कार्यान्वयन संरचना को सुदृढ़ करता है, जिससे कर्मचारियों की भर्ती करने, पारिश्रमिक प्रदान करने, प्रशिक्षण और तकनीकी क्षमता के लिए पर्याप्त मदद मिलती है। यह बदलाव प्रोग्राम मैनेजमेंट के लिए एक व्यावहारिक और लोक-केंद्रित दृष्टिकोण प्रदर्शित करता है, जो अधिक पेशेवर और उपयुक्त सपोर्ट वाले सिस्टम की ओर बढ़ रहा है। मजबूत प्रशासनिक क्षमता से योजना निर्माण और काम करने में सुधार, सेवा वितरण में बढ़ोतरी और जवाबदेही में सुदृढ़ता आने की उम्मीद है, जिससे यह सुनिश्चित होगा कि नई संरचना के लक्ष्य ग्रामीण स्तर पर निरंतर पूरे होते रहें।
नए वैधानिक ढांचे का औचित्य
सुधार की आवश्यकता बड़े सामाजिक-आर्थिक बदलावों में भी निहित है। मनरेगा 2005 में कार्यान्वित किया गया था, लेकिन ग्रामीण भारत अब रूपांतरित हो रहा है। 2011-12 में निर्धनता का स्तर 27.1 प्रतिशत से घटकर 2022-23 में 5.3 प्रतिशत हो गया, जिसे बढ़ते उपभोग, बेहतर वित्तीय सुविधा और बढ़े हुए कल्याणकारी कवरेज से सहायता मिली। ग्रामीण आजीविका के अधिक विविधीकृत होने और डिजिटली तरीके से समेकित होने के साथ, मनरेगा की व्यापक और मांग आधारित संरचना अब आज के गांव की वास्तविकता से पूरी तरह मेल नहीं खाती।
विकसितभारत- जी राम जी कानून 2025, इस संदर्भ का प्रत्युत्तर ग्रामीण रोजगार गारंटी को आधुनिक बनाने, जवाबदेही को सुदृढ़ करने और रोजगार सृजन को दीर्घावधि अवसंरचना और जलवायु अनुकूलता लक्ष्यों के साथ जोड़कर देता है।
विकसित भारत-जी राम जी कानून, 2025 की मुख्य विशेषताएं
यह कानून प्रत्येक वित्तीय वर्ष में ऐसे ग्रामीण परिवारों को, जिनके वयस्क सदस्य स्वेच्छा से बिना कौशल वाले काम के लिए तैयार हैं, 125 दिन की मजदूरी वाले रोजगार की गारंटी देता है। इससे पहले के 100 दिन की पात्रता से अधिक दिनों की आय सुरक्षा में मदद मिलेगी। साथ ही, बुवाई और कटाई के व्यस्त सीज़न में खेती में काम करने वाले मजदूरों की उपस्थिति सुनिश्चित करने के लिए कुल 60 दिन का नो-वर्क पीरियड होगा। शेष 305 दिनों में भी मजदूरों को 125 दिन की गारंटी वाला रोजगार प्राप्त होता रहेगा, जिससे किसानों और मजदूरों दोनों लाभान्वित होंगे। दैनिक मज़दूरी हर सप्ताह या किसी भी स्थिति में, काम करने की तिथि के 15 दिन के भीतर ही वितरित कर दी जाएगी। रोजगार सृजन को चार प्राथमिकता वाले कार्य-क्षेत्रों के माध्यम से अवसंरचना विकास के साथ जोड़ा गया है:
जल-संबंधी कार्यों के माध्यम से जल सुरक्षा
मुख्य-ग्रामीण अवसंरचना
आजीविका से संबंधित बुनियादी ढांचा
मौसम में बदलाव के असर को कम करने के लिए विशेष कार्य
सृजित सभी परिसंपत्तियों को विकसित भारत राष्ट्रीय ग्रामीण अवसंरचना से जोड़ा गया है, जो एक एकीकृत और समन्वित राष्ट्रीय विकास रणनीति सुनिश्चित करता है। योजना को विकसित ग्राम पंचायत योजनाओं के जरिए विकेंद्रीकृत किया जाता है, जो स्थानीय रूप से तैयार की जाती हैं और स्थानीय रूप से पीएम गति शक्ति जैसी राष्ट्रीय प्रणालियों के साथ एकीकृत होती हैं।
नया कानून मनरेगा में एक बड़े सुधार का प्रतिनिधित्व करता है, जिसमें रोजगार, पारदर्शिता, योजना और जवाबदेही को बढ़ाते हुए संरचनात्मक कमियों को दुरूस्त किया गया है।
केंद्रीय क्षेत्र की योजना से केंद्र प्रायोजित ढांचे में बदलाव ग्रामीण रोजगार और परिसंपत्ति निर्माण की स्वाभाविक रूप से स्थानीय प्रकृति को दर्शाता है। नए बदलाव के तहत, राज्य एक मानक आवंटन ढांचे के माध्यम से लागत और जिम्मेदारी दोनों साझा करते हैं, प्रभावी कार्यान्वयन के लिए प्रोत्साहित करते हैं और दुरुपयोग को रोकते हैं। योजना को क्षेत्रीय जरूरतों के आधार पर तैयार किया जाता है जो ग्राम पंचायत योजनाओं के रूप में दिखता है। साथ ही, केंद्र मानक निर्धारित करता है, जबकि राज्य जवाबदेही के साथ कार्य निष्पादन करते हैं, जिसके परिणामस्वरूप एक सहकारी साझेदारी होती है जिससे दक्षता में सुधार होता है और ठोस परिणाम मिलते हैं।
मजदूरी, सामग्री और प्रशासनिक खर्चों पर निधियों की कुल अनुमानित वार्षिक आवश्यकता 1,51,282 करोड़ रुपये है, जिसमें राज्य का हिस्सा भी शामिल है। इसमें से केंद्र का अनुमानित हिस्सा 95,692.31 करोड़ रुपये है। इस बदलाव से राज्यों पर कोई अनुचित वित्तीय बोझ नहीं पड़ेगा। वित्त पोषण अवसंरचना को राज्य की क्षमता के अनुसार तैयार किया गया है। इसके तहत केंद्र और राज्यों के बीच 60:40 के मानक लागत-साझाकरण अनुपात, पूर्वोत्तर और हिमालयी राज्यों के लिए 90:10 की बढ़ी राशि और बिना विधायिका वाले केंद्र शासित प्रदेशों के लिए 100 प्रतिशत केंद्रीय वित्त पोषण का प्रावधान है। राज्य पहले के ढांचे के तहत, पहले से ही सामग्री और प्रशासनिक लागतों का एक हिस्सा वहन कर रहे थे और पूर्वानुमानित मानक आवंटन के लिए किए गए उपाय से बजट में मजबूती आई है। आपदाओं के दौरान राज्यों को अतिरिक्त सहायता के प्रावधान और मजबूत निगरानी तंत्र भी दुरुपयोग से उत्पन्न होने वाले दीर्घकालिक नुकसान को कम करने में मदद करते हैं और जवाबदेही के साथ-साथ राजकोषीय स्थिरता को मजबूत करते हैं।
विकसित भारत के लाभ- जी राम जी कानून
यह कानून रोजगार सृजन को उत्पादक परिसंपत्ति सृजन से जोड़कर ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूत करता है, जिससे घरेलू आय में वृद्धि होती है और अनुकूलन क्षमता में सुधार होता है। पानी से जुड़े कामों, कृषि और भूजल स्तर में सुधार को प्राथमिकता दी जाती है। सड़क और कनेक्टिविटी जैसे मुख्य ग्रामीण बुनियादी ढांचे में निवेश से बाजार तक पहुंच में आसानी होती है, जबकि भंडारण, बाजार और उत्पादन परिसंपत्तियों सहित आजीविका बुनियादी ढांचा आय विविधीकरण को सक्षम बनाता है। जल संचयन, बाढ़ जल निकासी और मृदा संरक्षण पर केंद्रित कार्यों के माध्यम से जलवायु अनुकूलता मजबूत होती है। 125 दिनों के रोजगार की गारंटी घरेलू आय को बढ़ाती है, ग्राम-स्तर की खपत को प्रोत्साहित करती है, और डिजिटल उपस्थिति, मजदूरी भुगतान और डेटा-संचालित योजना के माध्यम से प्रवासन को कम करने में मदद करती है।
किसानों को बुवाई और कटाई के मौसम के दौरान सार्वजनिक कार्यों में राज्य-अधिसूचित ठहराव, मजदूरी मुद्रास्फीति की रोकथाम और बेहतर सिंचाई, भंडारण और कनेक्टिविटी की वजह से सुनिश्चित श्रम उपलब्धता से लाभ होता है। श्रमिकों को उच्च संभावित कमाई, विकसित ग्राम पंचायत योजनाओं के माध्यम से अनुमानित काम, सुरक्षित डिजिटल मजदूरी भुगतान और उन परिसंपत्तियों से प्रत्यक्ष लाभ होता है जिन्हें सृजित करने में वे मदद करते हैं। इसके साथ ही उन्हें एक अनिवार्य बेरोजगारी भत्ता भी मिलता है। जब श्रमिकों को काम प्रदान नहीं किया जाता है तो उन्हें दैनिक बेरोजगारी भत्ता 15 दिनों के बाद मिल जाता है। इसकी जिम्मेदारी राज्यों को दी गई है। मजदूरी की दरों और शर्तों को नियमों के माध्यम से निर्धारित किया जाना है, जो यह सुनिश्चित करे कि इसमें लचीलापन हो और साथ ही श्रमिकों के अधिकारों की रक्षा तथा रोजगार के समयबद्ध प्रावधान को बढ़ावा मिले।
कार्यान्वयन और निगरानी प्राधिकरण
यह कानून राष्ट्रीय, राज्य, जिला, ब्लॉक और गांव के स्तर पर मिशन को समन्वित, जवाबदेह और पारदर्शी तरीके से लागू करने के लिए एक स्पष्ट संस्थागत ढांचा बनाता है।
• केन्द्रीय और राज्य ग्रामीण रोजगार गारंटी परिषदें नीतिगत मार्गदर्शन देती हैं, कार्यान्वयन की समीक्षा करती हैं और जवाबदेही को मजबूत करती हैं।
• राष्ट्रीय और राज्य संचालन समितियां रणनीतिक दिशा, तालमेल और निष्पादन समीक्षा का संचालन करती हैं।
• पंचायती राज संस्थाएं योजना निर्माण और कार्यान्वयन का नेतृत्व करती हैं, जिसमें ग्राम पंचायतें लागत के हिसाब से कम से कम आधा कार्यान्वयन करती हैं।
• जिला कार्यक्रम समन्वयक और कार्यक्रम अधिकारी योजना निर्माण, अनुपालन, भुगतान और सामाजिक लेखा-परीक्षा का प्रबंधन करते हैं।
• ग्राम सभाएं सामाजिक लेखा-परीक्षा करने और सभी रिकॉर्ड तक पहुंच के जरिए पारदर्शिता सुनिश्चित करने में एक मजबूत भूमिका निभाती हैं।
पारदर्शिता, जवाबदेही और सामाजिक सुरक्षा
यह कानून अनुपालन सुनिश्चित करने और सार्वजनिक धन की सुरक्षा के लिए केंद्र सरकार को स्पष्ट प्रवर्तन शक्तियों से लैस करता है। यह केंद्र को कार्यान्वयन से संबंधित शिकायतों की जांच करने, गंभीर अनियमितताओं का पता चलने वाली निधि जारी करने को निलंबित करने और कमियों को दूर करने के लिए सुधारात्मक या उपचारात्मक उपायों को निर्देशित करने के लिए अधिकृत करता है। ये प्रावधान पूरे सिस्टम में जवाबदेही को मजबूत करते हैं, वित्तीय अनुशासन बनाए रखते हैं और दुरुपयोग को रोकने के लिए समय पर हस्तक्षेप करने में सक्षम बनाते हैं।
निष्कर्ष
विकसित भारत- रोजगार गारंटी और आजीविका मिशन (ग्रामीण) कानून, 2025, भारत की ग्रामीण रोजगार नीति में एक निर्णायक बदलाव का प्रतिनिधित्व करता है। मनरेगा ने समय के साथ भागीदारी, डिजिटलीकरण और पारदर्शिता में महत्वपूर्ण लाभ हासिल किया, जबकि लगातार संरचनात्मक कमजोरियों ने इसकी प्रभावशीलता को सीमित कर दिया। नया कानून एक आधुनिक, जवाबदेह और अवसंरचना-केंद्रित ढांचे के माध्यम से उनकी कमियों को दूर करते हुए पिछले सुधारों पर आधारित है।
गारंटीकृत रोजगार का विस्तार करके, राष्ट्रीय विकास की प्राथमिकताओं और कार्यों के बीच ताल-मेल बिठाते हुए मजबूत डिजिटल शासन को शामिल करके, यह कानून ग्रामीण रोजगार को सतत विकास और यथोचित आजीविका के लिए एक कार्यनीतिक साधन के रूप में स्थापित करता है, जो पूरी तरह से विकसित भारत 2047 के विजन के साथ जुड़ा हुआ है।
भारतीय मानस को औपनिवेशिक गुलामी से मुक्त करने की आवश्यकता
एलोरा की गुफाओं के चित्रों में हजारों सालों से धड़क रही है भारतीय संस्कृति
एलोरा गुफाएँ भारत में यूनेस्को विश्व धरोहर स्थल हैं , जिनमें हिंदू, बौद्ध और जैन धर्म की चट्टानों को काटकर बनाई गई गुफाओं का समूह है। महाराष्ट्र के औरंगाबाद जिले में स्थित एलोरा गुफाएं शहर से 29 किलोमीटर दूर हैं। यह दुनिया के सबसे बड़े चट्टानों को काटकर बनाए गए गुफा मंदिर परिसरों में से एक है। प्राचीन समय में कई गुफाएं मंदिरों के रूप में उपयोग की जाती थीं, जबकि अन्य मठ और विश्राम स्थल थे। यह लगभग 100 गुफाओं का एक परिसर है जिनमें जटिल नक्काशी और मूर्तियां हैं। गुफाएँ प्राचीन भारतीय शिला- कट वास्तुकला के सबसे प्रभावशाली उदाहरणों में से एक हैं।खोजी गई 100 गुफाओं में से 34 गुफाएँ जनता के लिए खुली हैं। इनमें 12 बौद्ध गुफाएँ (1-12), 17 हिंदू गुफाएँ (13-29) और 5 जैन गुफाएँ (30-34) शामिल हैं। भारत के इतिहास और संस्कृति में रुचि रखने वाले किसी भी व्यक्ति के लिए ये गुफाएँ अवश्य देखने योग्य हैं।इन गुफाओं में सबसे प्रसिद्ध कैलाश मंदिर नामक एक स्मारक है। यह एक विशाल अखंड संरचना है जिसे एक ही चट्टान से तराशा गया है।
हिंदू बौद्ध और जैन धर्म के पवित्र कलाएं
गुफाएं हमेशा से ही पवित्र स्थल रही हैं, जिन्हें आमतौर पर वेरुल के नाम से जाना जाता है। सदियों से ये गुफाएं तीर्थयात्रियों को आकर्षित करती रही हैं और आज भी करती हैं। एलोरा गुफाओं में मौजूद शिलालेख और नक्काशी बौद्ध धर्म, हिंदू धर्म और जैन धर्म के विभिन्न पहलुओं को दर्शाती हैं।माना जाता है कि इन गुफाओं का निर्माण बौद्ध धर्म के पतन के समय हुआ था। इनकी नक्काशी का काम लगभग उसी समय शुरू हुआ जब पास की अजंता गुफाओं को छोड़ दिया गया था। उस दौरान हिंदू धर्म का प्रभाव बढ़ने लगा था। पूरे क्षेत्र में धार्मिक सद्भाव कायम था। गुफाओं का निर्माण एक-दूसरे के करीब किया गया था, जो इसी सद्भाव को दर्शाता है।

एलोरा गुफा का समय
गुफा स्मारकों की यह निरंतर श्रृंखला छठी से दसवीं शताब्दी के बीच की सभ्यता को जीवंत कर देती है। कुछ ग्रंथों से यह भी पता चलता है कि इसके बाद भी लंबे समय तक इन गुफाओं में लोग रहते रहे।
एलोरा गुफाओं का निर्माण 600 ईस्वी से 1000 ईस्वी के बीच,400 वर्षों की अवधि में हुआ था। जिसमें मुख्य रूप से कलचुरी, चालुक्य और राष्ट्रकूट राजवंशों का योगदान था; इनमें बौद्ध (6वीं-8वीं सदी), हिंदू (6वीं-10वीं सदी) और जैन (9वीं- 12वीं सदी) धर्मों से संबंधित मंदिर और मठ शामिल हैं, जो प्राचीन भारत की धार्मिक सहिष्णुता को दर्शाते हैं।
एलोरा गुफाओं में सहिष्णुता की भावना दिखती है
एलोरा गुफाएं बौद्ध, हिंदू और जैन गुफा मंदिरों का एक प्रभावशाली संगम हैं। इन गुफाओं में बौद्ध चैत्य और विहार, हिंदू मंदिर और जैन तीर्थस्थल शामिल हैं। इस प्रकार,एलोरा गुफाएं उस काल की धार्मिक सद्भाव, सामंजस्य और समकालिकता का प्रतीक हैं। एलोरा गुफा परिसर अपनी अनूठी कलात्मक कृतियों और तकनीकी बुद्धिमत्ता के लिए भी प्रसिद्ध है। इसी कारण एलोरा को 1983 में यूनेस्को द्वारा विश्व धरोहर स्थल घोषित किया गया था।

कैलाश मंदिर सबसे ज्यादा आकर्षक
एलोरा गुफाओं में स्थित कैलाश मंदिर यहाँ का सबसे प्रसिद्ध आकर्षण है। कैलाश मंदिर (गुफा 16), जो एक ही चट्टान को तराशकर बनाया गया है, शिव के निवास स्थान कैलाश पर्वत के समान दिखता है। प्रारंभिक हिंदू गुफाओं में से अधिकांश भगवान शिव को समर्पित थीं।
एलोरा गुफाओं की वास्तुकला
एलोरा गुफाओं की वास्तुकला में विभिन्न प्रकार की शैलियाँ और तकनीकें देखने को मिलती हैं। पश्चिमी दक्कन के विभिन्न स्थानों पर चट्टानों को काटकर की जाने वाली कलाकृतियों पर इसका महत्वपूर्ण प्रभाव है, साथ ही दक्षिण भारत में संरचनात्मक गतिविधियों पर भी इसका प्रभाव है।
सामान्य तौर पर, एलोरा की गुफाएँ चट्टानों को काटकर बनाई गई वास्तुकला शैली के अंतिम चरण से उभरती हुई स्वतंत्र संरचना वास्तुकला की ओर संक्रमण का प्रतीक हैं। ये भारतीय मंदिर वास्तुकला के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। सबसे पुराने मंदिरों की संरचना सरल होती है। इनमें मंदिर के सामने स्तंभों के बिना छोटे-छोटे गलियारे होते हैं। और दरवाजों के फ्रेम और स्तंभ आमतौर पर सादे होते हैं। इसमें कैलाश मंदिर, छोटा कैलाश और इंद्र सभा जैसी अखंड संरचनाएं निर्मित इमारतों की नकल करती हुई प्रतीत होती हैं। ये स्वतंत्र रूप से खड़े मंदिर थे जिनमें खुले बरामदे और बंद मंडप थे, साथ ही गर्भगृह भी थे। यहां एक हिंदू मंदिर की विशिष्ट विशेषताएं दिखाई देंगी: गर्भगृह जिसमें लिंगम स्थापित है, परिक्रमा करने के लिए एक स्थान, एक सभा कक्ष और एक प्रवेश द्वार।
15 मीटर ऊंची प्रतिमा बुद्ध की प्रतिमा
एलोरा में स्थित जैन गुफाएं हिंदू और बौद्ध गुफाओं से छोटी हैं। इन गुफाओं में मंडप और स्तंभों वाला बरामदा जैसी स्थापत्य विशेषताएं मौजूद हैं।परिसर में स्थित बौद्ध गुफाओं में मठ और मंदिर हैं। विश्वकर्मा गुफा (गुफा 10) सबसे उल्लेखनीय है।इस स्थल पर और भी कई गुफाएँ और मूर्तियाँ हैं। भगवान बुद्ध की 15 मीटर ऊंची प्रतिमा भी यहाँ की एक और खास विशेषता है। यह एक समर्पित प्रार्थना स्थल है, और इसके अंदर आपको उपदेश देने की मुद्रा में विश्राम करते हुए बुद्ध की 15 फुट ऊंची प्रतिमा मिलेगी।
कैलाश मंदिर की शैली में निर्मित छोटा कैलाश (गुफा 30) एलोरा गुफाओं में सबसे अधिक दर्शनीय जैन मंदिर है। इंद्र सभा (गुफा 32) भी प्रसिद्ध है। यह सभी गुफाओं में सबसे बड़ी और सबसे उत्तम है।
एलोरा गुफाओं का इतिहास
एलोरा गुफाओं का इतिहास चार शताब्दियों पुराना है। हालांकि गुफाओं की खुदाई की समयरेखा स्पष्ट नहीं है, लेकिन माना जाता है कि हिंदू और बौद्ध गुफाओं का कुछ हिस्सा राष्ट्रकूट राजवंश के दौरान बनाया गया था। जैन गुफाओं का निर्माण यादव शासनकाल में हुआ माना जाता है।
बौद्ध गुफाओं (1 से 12) की खुदाई छठी और आठवीं शताब्दी के बीच हुई मानी जाती है। और जैन गुफाओं (30 से 34) की खुदाई नौवीं और बारहवीं शताब्दी के बीच हुई थी। हिंदू गुफाओं की खुदाई दो चरणों में की गई थी। इनमें से कुछ गुफाओं की खुदाई बौद्ध या जैन गुफाओं से भी पहले की गई थी। नौ गुफाओं (17 से 25) की खुदाई छठी शताब्दी के आरंभ में की गई थी, जिसके बाद चार और गुफाओं (26 से 29) की खुदाई की गई। अन्य हिंदू गुफाओं (13 से 16) का निर्माण सातवीं और दसवीं शताब्दी के बीच हुआ था।
एलोरा गुफाओं की महत्वपूर्ण बातें
भारत में एलोरा गुफाओं में 100 से अधिक चट्टानों को काटकर बनाई गई गुफाएं हैं। हालांकि, इनमें से केवल 34 गुफाएं ही जनता के लिए खुली है।
1. हिंदू मंदिरों का भ्रमण – एलोरा गुफाओं की सूची में, गुफा संख्या 13 से 29 तक हिंदू गुफाएं हैं। इनमें सबसे प्रमुख हैं गुफा संख्या 15 (दशावतार), गुफा संख्या 16 (कैलासा मंदिर) और गुफा संख्या 21 (रामेश्वर)। कैलाश मंदिर अपनी भव्य नक्काशी के लिए प्रसिद्ध है, दशावतार गुफा में मुख्य रूप से भगवान शिव और भगवान विष्णु के विभिन्न रूपों को दर्शाया गया है, और रामेश्वर गुफा अपनी मूर्तिकला के लिए प्रसिद्ध है। गुफा संख्या 29 (दुमर लेना) भी लोकप्रिय है। यह सीता-की-नहानी के किनारे स्थित है, जो एलागंगा नदी के झरने से बना एक छोटा सा तालाब है।
2. बौद्ध मठों का भ्रमण – एलोरा गुफाएँ: गुफा संख्या 1 से 12 तक बौद्ध मठ स्थित हैं। इनमें से गुफा संख्या 10 (विश्वकर्मा), गुफा संख्या 11 (दो ताल) और गुफा संख्या 12 (तीन ताल) विशेष रूप से प्रभावशाली हैं। विश्वकर्मा गुफा में बुद्ध का एक विशाल स्तूप है, दो ताल दो मंजिला मठ है और तीन ताल तीन मंजिला मठ है। सभी बौद्ध गुफाओं में बुद्ध के चित्र और मूर्तियां तथा बौद्ध पौराणिक कथाओं के प्रतीक उकेरे गए हैं।
3. जैन तीर्थ स्थलों का भ्रमण – एलोरा में जैन गुफाएँ गुफा संख्या 30 से 34 तक हैं। इनमें से सबसे उल्लेखनीय हैं गुफा संख्या 30 (छोटा कैलाश), गुफा संख्या 32 (इंद्र सभा) और गुफा संख्या 33 (जगन्नाथ सभा)। छोटा कैलाश हिंदू कैलाश मंदिर की एक अधूरी प्रतिकृति जैसा है, इंद्र सभा जैन तीर्थ स्थलों की एक श्रृंखला है, और जगन्नाथ सभा में कुछ अच्छी तरह से संरक्षित मूर्तियाँ हैं। सभी जैन गुफाओं में सूक्ष्म और नाजुक नक्काशी की गई है और इनमें दिगंबर संप्रदाय को समर्पित चित्र हैं।
4. कैलाश मंदिर का भ्रमण – कैलाश मंदिर एक प्राचीन शिलाखंड काटकर निर्मित मंदिर परिसर है जिसमें भगवान शिव को समर्पित एक गर्भगृह है। इसमें एक विशाल अखंड शिवलिंग है। मंदिर में हिंदू महाकाव्यों रामायण और महाभारत की घटनाओं को दर्शाने वाली मूर्तियां हैं। पूरे मंदिर का आधार, दीवारें और छत सूक्ष्म और विस्तृत नक्काशी से सुशोभित हैं। और सभी शिव मंदिरों की तरह, केंद्रीय गर्भगृह के सामने बरामदे में नंदी की प्रतिमा स्थापित है। यह सारा काम छेनी और हथौड़े जैसे साधारण औजारों से किया गया था।यह मंडप द्रविड़ शैली के शिखर और 16 स्तंभों पर टिका हुआ है। मंदिर के सामने नंदी की प्रतिमा स्थापित है। ऐसा प्रतीत होता है कि भारत के विभिन्न क्षेत्रों के कारीगरों ने यहाँ काम किया है। कैलाश मंदिर भारतीय गुफा वास्तुकला का एक ज्ञानकोश है।
एलोरा-अजंता गुफाएं एक जैसी नहीं
अजंता पूरी तरह से बौद्ध हैं और अपने अद्भुत चित्रों (भित्तिचित्रों) के लिए प्रसिद्ध हैं, जबकि एलोरा में बौद्ध, हिंदू और जैन धर्मों का मिश्रण है और यह कैलास मंदिर जैसे विशाल रॉक-कट मंदिरों के लिए जाना जाता है, जो एक ही चट्टान को काटकर बनाए गए हैं, और एलोरा की गुफाएँ पास-पास हैं, जबकि अजंता की गुफाएँ थोड़ी दूर हैं। संक्षेप में, अजंता कला और चित्रों के लिए है, जबकि एलोरा विभिन्न धर्मों के अद्भुत वास्तुकला और धार्मिक सहिष्णुता का संगम है।
क्षति के कारक
एलोरा गुफाएँ पूरी तरह नष्ट नहीं हुईं, बल्कि दिल्ली सल्तनत और मुगल काल (15वीं-17वीं सदी) के दौरान मुस्लिम शासकों द्वारा मूर्तियों और चित्रों को नुकसान पहुँचाया गया, खासकर औरंगज़ेब ने कैलाश मंदिर को तोड़ने की कोशिश की, लेकिन यह असफल रहा; आज भी प्राकृतिक कारणों : पानी का रिसाव और मानवीय उपेक्षा से इन्हें खतरा है, पर ये यूनेस्को विश्व धरोहर स्थल के रूप में मौजूद हैं।
लेखक परिचय:-

(लेखक भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण, में सहायक पुस्तकालय एवं सूचनाधिकारी पद से सेवामुक्त हुए हैं। वर्तमान समय में उत्तर प्रदेश के बस्ती नगर में निवास करते हुए सम सामयिक विषयों,साहित्य, इतिहास, पुरातत्व, संस्कृति और अध्यात्म पर अपना विचार व्यक्त करते रहते हैं। वॉट्सप नं.+919412300183)