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किस्से अब्दुल रहीम खानजादा के …

आज 17 दिसंबर ब्रज के कवि, अकबर के नवरत्नों में से एक, बैरम खाँ के लाड़ले, हम मेवातियों के नंवासे और एक कुशल सेनापति, प्रशासक तथा अपनी दानशीलता के लिए प्रसिद्ध अब्दुर्रहीम ख़ानख़ानाँ का जन्मदिन है l उसी रहीम का जिसका जीवन शायद मुग़लकाल का सबसे जटिल, चुनौती भरा और उतार-चढ़ाव वाला रहा है l रहीम ने कई भाषाओं  जैसे फ़ारसी, अरबी, संस्कृत, ब्रज में निपुणता हासिल की हुई थी l जहाँगीर के शासनकाल में उन्हें आर्थिक संकटों और कैद का सामना करना पड़ा l 1627 में दिल्ली में उनका निधन हो गया और उन्हें पत्नी माहबानू के  मकबरे के पास दफनाया गया, जिसका निर्माण उन्होंने स्वयं करवाया था l
         रहीम के जन्मदिन के अवसर पर तुलसी और उनकी मित्रता को लेकर प्रस्तुत है उपन्यास ‘ख़ानज़ादा’ का एक अंश –
उम्र सिर्फ़ बीस बरस और ओहदा पहले गुजरात का सूबेदार और फिर मिर अर्ज़ l इतना ही नहीं बादशाह अकबर के नौ रत्नों में से एक रत्न का ख़िताब भी हासिल हो गया l अब्दुर्रहीम मिर्ज़ा खाँ का ज़्यादातर वक़्त अब दरबार की सियासत में बीतने लगा l घर आने के बाद शाम से लेकर इशा की नमाज़ तक का समय रहीम का माहबानू के आलिंगन में बीतता l बीच-बीच में वह हिंदी का ज्ञान अपनी माँ से, कुछ अपने शौक़ से और बाकी अरबी, फ़ारसी और तुर्की की तालीम अंदीजान के मौलवी मुल्ला मुहम्मद अमीन से हासिल करता रहता l इस सबके बीच जो समय मिलता उसमें वह नीतिपरक दोहे और चुटीले बरवै रच लेता l रहीम जब ये नीतिपरक दोहे और चुटीले बरवै दरबार में सुनाता, तब इन्हें सुन पूरा दरबार उसकी विदग्धता पर भौचक्क रह जाता l रहीम की यह प्रतिभा दरबार में टोडरमल, बीरबल और गंग जैसे कवियों के अलावा अनेक संस्कृत विद्वानों के साथ रह कर और निखरने लगी l इनकी संगत में रह कर हिंदू धर्म-शास्त्रों का ज़्यादा और गहन अध्ययन करने लगा l
  गुजरात में अब्दुर्रहीम जो अमन-चैन स्थापित कर आया था, अचानक एक दिन बादशाह अकबर के पास एक बेचैन करने वाली ख़बर आई l बादशाह ने गुजरात के सूबेदार और मीर अर्ज़ अर्थात अब्दुर्रहीम मिर्ज़ा खाँ को एक बार फिर बुलाया l
 “बादशाह सलामत, आपने याद फरमाया ?” रहीम ने कोर्निश करते हुए पूछा l
 “हाँ मिर्ज़ा खाँ, मुज़फ़्फ़र हुसैन मिर्ज़ा ने हमसे गुजरात फिर छीन लिया है l मैं चाहता हूँ कि आप फिर से गुजरात जाएँ और इस पाजी को सलीक़े से सबक़ सिखा कर आएँ l”
 “जैसा आपका हुक्म बादशाह सलामत l”
 “इस काम को जितना ज़ल्दी अंजाम दिया जाए, उतना बेहतर होगा l”
 अब्दुर्रहीम मिर्ज़ा खाँ तुरंत गुजरात के लिए रवाना हो गया और शीघ्र हि मुज़फ़्फ़र हुसैन मिर्ज़ा की कमर तोड़ कर लौट आया l इससे ख़ुश होकर अगले दिन बादशाह अकबर ने उसे न केवल ख़िलअत देकर सम्मानित किया, बल्कि रहीम के वालिद मरहूम बैरम खाँ की तरह उसे भी ख़ानेख़ानाँ जैसे सबसे बड़े शाही ख़िताब से नवाज़ा गया l
 रहीम एक बार फिर अपने दोहे, बरवै और सोरठा रचने में रम गया l
 एक बार शायर नज़ीरी निशापुरी ने अब्दुर्रहीम से कहा,”ख़ानेख़ानाँ साहब, मैंने ज़िंदगी में कभी एक लाख अशर्फ़ियाँ नहीं देखी हैं l”
 शायर नज़ीरी निशापुरी की बात सुन अब्दुर्रहीम ख़ानेख़ानाँ घर चला आया l घर आने के बाद भी उसे शायर नज़ीरी की यह बात परेशान करती रही l परेशान बेटे को देख शाम को माँ सलीमा बेगम उसके पास आई और सर पर हाथ फेरते हुए पूछा,”लगता है मेरा बेटा आज परेशान है ?”
 “अम्मी जान, ऐसा कुछ नहीं है l” रहीम ने माँ को टालना चाहा l
 “कुछ तो है l नहीं बताएगा तो किसी मुश्किल का ऐसे कैसे हल निकलेगा ?”
 रहीम ने सोचा कि माँ को बता देना चाहिए वरना उसके चक्कर में वह भी परेशान रहेगी l वैसे भी उसकी ज़्यादातर मुश्किलों का हल यही तो बताती है l
 “अम्मी जान, पता है आज शायर नज़ीरी निशापूरी साहब क्या बोले l”
 “क्या बोले ?” माँ ने बेटे के बालों में अपनी नाज़ुक अँगुलियाँ फेरते हुए पूछा l
 “बोले कि ख़ानेख़ानाँ साहब, मैंने ज़िंदगी में कभी एक लाख अशर्फ़ियाँ नहीं देखी हैं l अम्मी जान, जब से नज़ीरी साहब ने यह कहा है, मैं तब से यह सोच-सोच कर बेचैन हूँ कि यहाँ मेरे पास बेशुमार दौलत है, और एक शायर नज़ीरी निशापूरी साहब जैसे लोग हैं, जिन्होंने कभी एक लाख अशर्फ़ियाँ नहीं देखी हैं l”
 “बेटा, शायर-कवियों के पास कभी धन-दौलत जुड़ती देखी है ? इनका दौलत से क्या लेना-देना l ये तो फ़क़ीर होते हैं l इस दुनिया में नज़ीरी साहब जैसे न जाने कितने लोग हैं l ऐसे ही लोगों के बारे में हमारे मेवात में कहा गया है कि-
 बिरह बाण और बिरहड़ा, इन्ने मत सीखियो कोए l
 इनका सीखणहार को, झुर-झुर पिंजर होए ll”
“आप सही कहती हैं अम्मी जान, शायरी-कवित्त करने वाले पिंजर हो जाते हैं l”
“वैसे रहीम, आपके लिए यह कौन-सी बड़ी बात है l”
 माँ के इतना कहते ही रहीम की सारी बेचैनी और परेशानी जैसे चुटकी बजाते काफ़ूर हो गई l उसने माँ का हाथ यह कहते हुए चूम लिया,”अम्मी जान, आपने मेरी बहुत बड़ी मुश्किल दूर कर दी l”
 अगले रोज़ सुबह अब्दुर्रहीम ख़ानेख़ानाँ ने शायर नज़ीरी निशापूरी को बुलवाया, और उसके सामने अशर्फ़ियों का ढेर लगा दिया l
अपने सामने लगे अशर्फ़ियों के ढेर को देख शायर नज़ीरी निशापूरी बोला,”ख़ुदा का शुक्रिया ख़ानेख़ानाँ साहब, जो उसने इस नाचीज़ को एक लाख अशर्फ़ियों के दीदार करा दिए l”
“सिर्फ़ अशर्फ़ियों के दीदार के लिए ख़ुदा का क्या शुक्र अदा करना नज़ीरी साहब l”
“हम जैसों के लिए तो एक लाख अशर्फ़ियों को देखना ही किसी सपने का पूरा होने जैसी बात है l” अशर्फ़ियों को देखने के बाद शायर नज़ीरी निशापूरी अपनी जगह से उठा, और यह कह कर जाने लगा,” ख़ानेख़ानाँ साहब, आपका बहुत शुक्रिया l आपकी वजह से आज मेरा एक बहुत बड़ा सपना पूरा हो गया l ख़ुदा हाफ़िज़ l”
शायर नज़ीरी निशापूरी ने जिस नादीदेपन के साथ सपना पूरा होने की बात कही, अब्दुर्रहीम सोचने लगा कि जिस आदमी की ज़िंदगी का सपना सिर्फ़ एक लाख अशर्फ़ियों को देखने का रहा हो, अगर उसे ये मिल जाएँ तब इनसे उसके कितने सपने पूरे होंगे, उसके बारे में सोचा भी नहीं जा सकता l
“अगर ऐसा है नज़ीरी साहब तो एक बार इन्हें छू कर भी देख लो l कहीं ऐसा ना हो कि बाद में आप कहें कि मैंने ज़िंदगी में कभी सोने की अशर्फ़ियों को छू कर नहीं देखा l”
 शायर नज़ीरी निशापूरी को लगा कि अब्दुर्रहीम ख़ानेख़ानाँ बात तो ठीक कह रहा है l वह वापिस लौटा और अशर्फ़ियों के ढेर में उसने दोनों हाथों की अँगुलियों को ऐसे डाला, जैसे अनाज की ढेरी में किसान हाथ डाल कर उसके दानों को परखता है l जिस वक़्त शायर नज़ीरी निशापूरी की अँगुलियाँ सोने की अशर्फ़ियों की देह का स्पर्श कर रही थीं, अब्दुर्रहीम ने ध्यान दिया शायर नज़ीरी की अँगुलियों में एक ख़ास तरह की जुम्बिश हो रही थी l शायर नज़ीरी निशापूरी ने एक बार फिर अब्दुर्रहीम ख़ानेख़ानाँ का शुक्रिया अदा किया, और वापिस जाने के लिए मुड़ा ही था कि पीछे से अब्दुर्रहीम ने उसे टोका l
 “नज़ीरी साहब, कहाँ चल दिए ?
 शायर नज़ीरी निशापूरी जाते-जाते रुक गया और मुस्कराते हुए बोला,”मिर्ज़ा खाँ, अपनी एक अधूरी ग़ज़ल का शे’र याद आ गया l कई दिनों से उसे पूरी करने की सोच रहा था, मगर पूरी नहीं हो रही थी l आज आपके पास आया तो एक बहुत उम्दा शे’र बन पड़ा है l”
 “वो तो ठीक है मगर इन अशआर को भी तो उठाइए !” अब्दुर्रहीम ने अपने सामने पड़े अशर्फ़ियों के ढेर की तरफ़ इशारा करते हुए कहा l
नज़ीरी निशापूरी ने अब्दुर्रहीम को बोरे में भरा और यह सोच कर उठा लिया कि शायद अब्दुर्रहीम यह जतलाना चाहता है, कि वह सिर्फ़ इन्हें देख और छूए भर नहीं, उठा कर यह भी महसूस करे कि एक लाख अशर्फ़ियों में कितना वज़न होता है l
“नज़ीरी साहब, ख़ुदा का शुक्र अदा करना तब ठीक रहेगा, जब आप इन्हें साथ ले जाएँगे !”
 “ख़ानेख़ानाँ साहब, साथ ले जाएँगे ! क्या मतलब है आपका ?” शायर नज़ीरी निशापूरी के जैसे हाथ-पाँव ठंडे पड़ने लगे  l
 “आज से बल्कि इसी वक़्त से इन पर अब आपका हक़ है नज़ीरी साहब l अब इनके मालिक आप हैं l” अब्दुर्रहीम ख़ानेख़ानाँ ने मुस्कराते हुए कहा l
 अब्दुर्रहीम ख़ानेख़ानाँ की इस उदारता की चारों तरफ़ चर्चा होने लगी l कुछ रोज़ पहले उसने मुल्ला शिकेवी को उसके फ़ारसी के एक शे’र पर एक हज़ार अशर्फ़ियाँ भेंट कर दी, तो अरबी कवि रफ़ीउद्दीन हैदर को एक लाख रुपए दे दिए l आए दिन रहीम से अरबी, फ़ारसी शायर ही नहीं अन्य कवि भी ईनाम में भेंट ले जाने लगे l उस दिन इबादतख़ाने में लगने वाली मजलिस में अब्दुर्रहीम ख़ानेख़ानाँ ने कवि गंग को एक छंद, जो छप्पय था, उससे प्रसन्न होकर जब गंग को ईनाम के रूप में छत्तीस लाख रुपए दिए l
 अब्दुर्रहीम ख़ानेख़ानाँ की दानप्रियता के इन क़िस्सों ने जैसे किंवदंतियों का रूप ले लिया l घर-घर में रहीम के चर्चे होने लगे l माँ सलीमा जब-जब बेटे के इन क़िस्सों को सुनती, तब-तब उसका सीना गर्व से चौड़ा होता चला जाता l जबकि बीवी माहबानू वह तो मारे ख़ुशी के जैसे बौरा जाती l धन्य हो उठती ऐसे दानवीर पति को पाकर l अपनी सूबेदारी और जागीरों से मिले राजस्व को वह कवि और शायरों में दोनों हाथों से बाँटने लगा l
 और इस घटना ने तो मानो पूरे रहीम का ही नहीं बल्कि पूरे हिंदुस्तान का में मस्तक ऊँचा कर दिया l
 “ख़ानेख़ानाँ साहब, एक ग़रीब बेवा आपसे मिलने की ख़्वाहिश लेकर आई है l” एक सिपाही ने आकर रहीम को आकर बताया l
 “हमसे एक बेवा मिलने की ख़्वाहिश लेकर आई है ?” रहीम ने आश्चर्य से पूछा l
 “जी l कह रही है कि उसे गोस्वामीजी ने भेजा है l”
 “क्याsss ! गोस्वामी तुलसीदास जी ने भेजा है ? उन्हें इसी वक़्त बाइज़्ज़त लाया जाए !”
 अब्दुर्रहीम ख़ानेख़ानाँ के हुक्म के बाद वह निर्धन विधवा हाज़िर हो गई l उसके आने पर रहीम ने पहले उसे ऊपर से नीचे तक देखा l उसके कपड़ों को देख रहीम समझ गया कि विधवा होने के साथ-साथ सचमुच  यह  काफ़ी ग़रीब भी है l आते ही विधवा ने काग़ज़ का एक छोटा-सा पुर्ज़ा रहीम की तरफ़ यह कहते हुए बढ़ा दिया,”गोस्वामीजी ने कहा है कि मैं इसे आपको ले जाकर दे दूँ l”
 रहीम ने गोस्वामी तुलसीदास द्वारा भेजे गए काग़ज़ के इस छोटे-से टुकड़े को खोला और उसे पढ़ने लगा l पास में बैठे दूसरे कवियों और शायरों ने ध्यान दिया कि इस टुकड़े को पढ़ते हुए उसके आँखों के कोर भीग आए हैं l देर तक रहीम की नज़र काग़ज़ के इस छोटे-से टुकड़े पर टिकी रही l काफ़ी देर बाद रहीम ने धीरे-से नज़र उठाई l
“विवाह में कितना ख़र्चा आ जाएगा ?” रहीम ने निर्धन विधवा की तरफ़ देखते हुए पूछा l
“अन्नदाता, कैसे बताऊँ l कन्या का विवाह है l जितना आपको उचित लगे दे दीजिए l” विधवा ने हाथ जोड़ते हुए बड़ी विनम्रता से कहा l
रहीम ने प्रत्युत्तर में कुछ नहीं कहा l काग़ज़ के उसी टुकड़े पर उसने कुछ लिखा और यह कहते हुए उसे वापस निर्धन विधवा को दे दिया,”इसे गोस्वामीजी को जाकर दे देना !” फिर सामने बैठे ख़ज़ानची की तरफ़ उसने नज़र उठा कर देखा और उससे बोला,”इनसे जितनी अशर्फ़ियाँ ले जाई जाएँ, इनकी झोली में भर देना !”
निर्धन विधवा रहीम को दुआएँ देती हुई चली गई l
उसके जाने के बाद रहीम ने पहले अपने साथ बैठे तन्ना मिश्रा अर्थात मियाँ तानसेन, शेख़ फ़ैज़ी, शायर नज़ीरी निशापूरी, मुल्ला दो प्याजा, फ़क़ीर अज़ुद्दीन, गंग सहित बैठे दूसरे कवि-शायरों की तरफ़ देखा l फिर सबको सुनाते हुए कवि गंग से बोला,”गंग साहब, आप सब सोच रहे होंगे कि यह बेवा कौन थी…इसने गोस्वामीजी का जो काग़ज़ का छोटा-सा पुर्ज़ा दिया, उस पर क्या लिखा था?”
“आप सही कह रहे हैं ख़ानेख़ानाँ साहब कि तुलसीदासजी ने ऐसा क्या लिख दिया, जिसे पढ़ने के बाद आपने इस निर्धन बेवा की झोली अशर्फ़ियों से भर दी ?”
“गंग साहब, इस बेवा की पुत्री का विवाह है लेकिन इसके पास इतना धन नहीं है कि वह उसके हाथ पीले कर दे l मदद के लिए यह गोस्वामीजी के पास गई होगी और अपनी परेशानी के बारे में बताया होगा l उस गोस्वामीजी के पास जिसके पास सिवाय रामरतन के कुछ नहीं है l वे ठहरे निरे वैरागी l धन से उनका क्या वास्ता l समझ में नहीं आया कि यह क्या उम्मीद लेकर उनके पास गई l उन्होंने इस पंक्ति के साथ इसे मेरे पास भेज दिया कि – सुरतिय नरतिय नागतिय, अस चाहत सब होय l”
“ख़ानेख़ानाँ साहब, तुलसीदासजी ने कहा तो एकदम सही है कि धन-संपत्ति और आभूषण सभी नारियों को अच्छे लगते हैं l इनकी सभी को ज़रूरत होती है, फिर चाहे वे देवताओं की पत्नियाँ हों या असुरों की… नागवंश की हो और कोई l” कवि गंग मुस्कराते हुए बोला l
“आप सही कह रहे हैं गंग साहब l सब चाहते हैं कि उसकी पुत्री विवाह के बाद, भले ही उसका ससुराल कितना ही साधन-संपन्न हो, सुखी रहे l अब अपने मित्र गोस्वामीजी के मान और उनके कहे को मैं कैसे टाल सकता था l”
“मगर आपने काग़ज़ के उस पुर्ज़े पर क्या लिख कर वापस लौटा दिया ?” तन्ना मिश्रा अर्थात मियाँ तानसेन ने पूछा l
“मुझे लगा गोस्वामीजी ने आधी बात लिखी है l उसे मैंने यह लिख कर पूरा कर दिया कि- गोद लिए हुलसी फिरे, तुलसी सो सुत होए l”
“क्या बात कही है ख़ानेख़ानाँ साहब कि-
सुरतिय नरतिय नागतिय, सब चाहत अस होय l
गोद लिए हुलसी फिरे, तुलसी सो सुत होए l”
 “ख़ानेख़ानाँ साहब, इसे दोहे की शक्ल देकर आपने दोस्ती का असली हक़ सही मायने में आज अदा किया है l क्या बात कही है कि गोद लिए हुलसी फिरे, तुलसी सो सुत होए l” मुल्ला दो प्याजा ने हुमकते हुए कहा l
“मुल्ला साहब, आपने सही फ़रमाया l इससे पहले जो नहीं जानते थे कि गोस्वामी तुलसीदास की माँ का क्या नाम है, ख़ानेख़ानाँ साहब के इस दोहे से पता चल जाएगा कि उनकी माँ का नाम हुलसी है l” मियाँ तानसेन मुस्कराते हुए बोला l
रहीम मन-ही-मन मंद-मंद मुस्कराता रहा l
कवि गंग से इस बार रहा नहीं गया और मुस्कराते हुए बोला,”ख़ानेख़ानाँ साहब, बुरा न मानो तो एक बात पूछूँ ?”
“प्रिय गंग, आपको हमसे कब से इजाज़त लेने की ज़रूरत पड़ गई ?” प्रतिप्रश्न किया अब्दुर्रहीम ख़ानेख़ानाँ ने l
कवि गंग ने इसके बाद एक पल के लिए रहीम की आँखों में देखा और फिर बोला-
सीखी कहाँ नवाब जू, ऐसी दीने दैन l
ज्यों-ज्यों कर ऊँचौ करो, त्यों-त्यों नीचे नैन ll”
 कवि गंग का सवाल सुन अब्दुर्रहीम ख़ानेख़ानाँ पहले चुप रहा l फिर धीरे-से नज़र उठाई और कवि गंग की तरफ़ देख कर मुस्कराया,”गंग जी,
 देनदार कोऊ और है, भेजत सो दिन-रैन l
 लोग बहराम हम पै धरें, याते नीचे नैन ll”
 रहीम के इतना कहते ही सभा में जैसे ख़ामोशी छा गई l थोड़ी देर के लिए लगा जैसे पूस की बर्फ़-सी पिघलती रातों की तरह ठंडी-ठंडी फुहारें बरस रही हैं l बेजान दीवारें किसी राग की बंदिश से झंकृत हो उठी हैं l

जिसने देश की खातिर अपना पूरा जीवन पाकिस्तान की जेल मेें गुजार दिया

साल 1973।
#पाकिस्तान के पेशावर–रावलपिंडी रोड पर 22 नंबर माइलस्टोन के पास एक व्यक्ति बस से उतरा। नाम—इब्राहिम। पहनावे, हावभाव, भाषा—सब कुछ बिल्कुल एक पाकिस्तानी मुसलमान जैसा। होटल में ठहरना, पहचान-पत्र—सब कुछ पूरी तरह ठीक।
लेकिन पाकिस्तान की इंटेलिजेंस अधिकारियों की नज़र से वह बच न सका। शक के आधार पर उसे गिरफ्तार कर लिया गया। पूछताछ शुरू हुई। पहले सामान्य पूछताछ, फिर शुरू हुआ अमानवीय अत्याचार।
#इब्राहिम से कहा गया— “कबूल कर तू भारतीय जासूस है।”
लेकिन इब्राहिम ने मुंह नहीं खोला।
यह ‘इब्राहिम’ वास्तव में भारतीय सेना का पूर्व जवान काश्मीर सिंह (Kashmir Singh) था—जो मात्र 400 रुपए के मासिक कॉन्ट्रैक्ट पर अपना नाम, धर्म, पहचान सब बदलकर दुश्मन देश में घुस गया था।
35 वर्षों का नरक।
ग्रफ्तारी के बाद उस पर जो अत्याचार हुए, वह सुनकर रूह कांप जाती है।
पहले कुछ महीनों तक थर्ड डिग्री टॉर्चर—नाखून उखाड़ना, बिजली के झटके—कोई तरीका नहीं छोड़ा गया।
फिर भी उसके मुंह से देश का राज न निकल सका।
उसे मौत की सज़ा सुनाई गई, लेकिन उसे #फाँसी देने की बजाय उसे जेल की अंधेरी कालकोठरी में सड़ने के लिए छोड़ दिया गया।
अविश्वसनीय—लगातार 17 साल उसे एक अकेले सेल में जंजीरों से बांधकर रखा गया।
हाथ–पैर बेड़ियों में, हिलने–डुलने तक की जगह नहीं।
साढ़े तीन दशक तक उसने न आसमान देखा, न सूरज, न किसी इंसान का चेहरा।
जेलकर्मी उसे पागल समझते थे।
वह खुद भी #मानसिक संतुलन खोने लगा था।
लेकिन उसका मन—इस्पात जैसा मजबूत।
उसे पता था—एक शब्द भी बोल दिया तो देश का नुकसान होगा, परिवार की इज़्ज़त जाएगी।
घर पर इंतज़ार।
जब वह पकड़ा गया, उसकी #पत्नी परमजीत कौर की गोद में तीन छोटे बच्चे थे—सबकी उम्र 10 से कम।
पति लापता। सभी ने कहा—काश्मीर सिंह मर चुका है।
पर एक व्यक्ति ने यकीन नहीं खोया—परमजीत।
उन्होंने न सफेद साड़ी पहनी, न #चूड़ियाँ तोड़ीं।
उन्हें विश्वास था—पति जीवित है और एक दिन जरूर लौटेगा।
1986 में पाकिस्तान ने जब कुछ भारतीय बंदियों की सूची जारी की, तब पता चला कि काश्मीर सिंह ज़िंदा हैं—लेकिन फाँसी के कैदी के रूप में।
इसके बाद भी बीत गए 22 साल।
मुक्ति और सत्य : 2008
पाकिस्तान के #मानवाधिकार मंत्री अंसार बर्नी (Ansar Burney) लाहौर जेल का निरीक्षण करने गए। वहाँ उन्होंने एक कमजोर, जर्जर, लगभग मानसिक रूप से टूट चुके बूढ़े व्यक्ति को देखा।
पता लगाने पर मालूम हुआ—यह व्यक्ति बिना किसी न्याय प्रक्रिया के 35 वर्षों से जेल में है।
मानवीय आधार पर बर्नी ने #राष्ट्रपति परवेज़ मुशर्रफ़ से उसकी रिहाई की सिफारिश की।
मुशर्रफ़ ने मंज़ूरी दे दी।
4 मार्च 2008 : वाघा बॉर्डर।
35 वर्षों बाद एक कांपते कदमों वाला बुजुर्ग भारत की सीमा में प्रवेश करता है। उसे लेने खड़ी थी उसकी पत्नी और उसके बच्चे। सीमा पार करते ही काश्मीर सिंह ने वह बात कही, जिसे सुनकर सब स्तब्ध रह गए।  अब तक उन्होंने खुद को मानसिक रूप से अस्थिर या साधारण नागरिक बताया था।
लेकिन भारतीय धरती पर कदम रखते ही गर्व से बोले—”मैं भारतीय जासूस था। मैंने अपना #फ़र्ज़ निभाया है। उन्होंने मुझे 35 साल कैद में रखा, लेकिन मेरे मुंह से एक शब्द भी नहीं निकलवा पाए।”
एक ऐसा इंसान, जिसने मात्र 400 रुपए के बदले अपनी पूरी जवानी, जीवन के 35 साल, पाकिस्तान की अंधेरी कोठरी में कुर्बान कर दिए।
17 साल जंजीरों में रहा।
#काश्मीर सिंह साबित कर गए—देशभक्ति की कोई कीमत नहीं होती, यह खून में होती है।
 
साभार- https://www.facebook.com/piyushmohan1970 से 

इसरो के प्रमुख अंतरिक्ष मिशन

पिछले 5 वर्षों (दिसंबर 2020 से दिसंबर 2025) के दौरान इसरो द्वारा कुल 22 उपग्रह प्रक्षेपित किए गए हैं। इनमें से 7 पृथ्वी अवलोकन, 4 संचार, 2 नेविगेशन, 3 अंतरिक्ष विज्ञान तथा 6 प्रौद्योगिकी प्रदर्शन मिशन से संबंधित हैं। प्रक्षेपणों का विवरण अनुलग्नक-1 में संलग्न है।

चंद्रयान-3 और आदित्य-एल1 उपग्रह परियोजनाओं में किसी प्रकार की लागत वृद्धि नहीं हुई है। हालांकि, चंद्रयान-3 और आदित्य-एल1 उपग्रहों के लिए क्रमशः 28 माह और 46 माह की समय-वृद्धि हुई है, जिसका मुख्य कारण निम्नलिखित हैं:

आदित्य-एल1: परियोजना में समय-वृद्धि का कारण कार्यक्षेत्र में परिवर्तन, कक्षा को निम्न पृथ्वी कक्षा (LEO) से लैग्रेंजियन बिंदु (L1) में बदलना रहा, जिसके चलते उपग्रह के विन्यास में बदलाव करना पड़ा। इसके अलावा, पेलोड के विकास में अधिक समय लगना तथा दीर्घ-अवधि वाले उपकरणों/सामग्रियों की खरीद में लगने वाला अतिरिक्त समय भी समय-वृद्धि के प्रमुख कारण रहे।

चंद्रयान-3: परियोजना में समय-वृद्धि चंद्रयान-2 विफलता विश्लेषण समिति द्वारा सुझाए गए सुधारों को शामिल करने के लिए प्रणालियों के पुनः विन्यास, कोविड-19 महामारी, नए विशेष परीक्षणों के संचालन तथा नए सेंसर के विकास के कारण हुई।

गगनयान कार्यक्रम का उद्देश्य निम्न पृथ्वी कक्षा (LEO) तक स्वदेशी मानव अंतरिक्ष उड़ान क्षमता का प्रदर्शन करना है। इस कार्यक्रम को भारत सरकार द्वारा जनवरी 2019 में आधिकारिक स्वीकृति दी गई थी। इसके अंतर्गत समान विन्यास में दो मानव रहित मिशन और एक मानव सहित मिशन संचालित किए जाने का प्रावधान था। इस कार्यक्रम के लिए कुल ₹9,023 करोड़ के बजट को स्वीकृति दी गई थी तथा मानव सहित मिशन के प्रक्षेपण का लक्ष्य मई 2022 निर्धारित किया गया था।

हाल ही में अक्टूबर 2024 में गगनयान कार्यक्रम के दायरे में संशोधन किया गया, जिसके तहत मिशनों की संख्या तीन से बढ़ाकर आठ कर दी गई। इसमें एक अतिरिक्त मानव रहित मिशन (G1) तथा भारतीय अंतरिक्ष स्टेशन (BAS) के लिए चार अग्रदूत (प्रीकर्सर) मिशन शामिल किए गए हैं। संशोधित कार्यक्रम के लिए कुल बजट प्रावधान ₹20,193 करोड़ किया गया है। संशोधित स्वीकृति के अनुसार सभी गतिविधियां प्रगति पर हैं और पहले मानव सहित मिशन का लक्ष्य वर्ष 2027–28 रखा गया है।

गगनयान कार्यक्रम के अंतर्गत इसरो नियोजित मिशनों को सफलतापूर्वक पूरा करने के लिए विभिन्न प्रणालियों का विकास और निर्माण कर रहा है। मानव उड़ान के लिए निर्धारित कड़े ह्यूमन रेटिंग मानकों को ध्यान में रखते हुए, मानव-रेटेड प्रक्षेपण यान (HLVM3) की संरचनाओं, सर्विस मॉड्यूल प्रोपल्शन सिस्टम, क्रू मॉड्यूल प्रोपल्शन सिस्टम तथा पैराशूट आधारित अवरोह/धीमी गति प्रणाली के व्यापक परीक्षण पूरे कर लिए गए हैं। इसके अलावा, अत्यंत महत्वपूर्ण क्रू एस्केप सिस्टम के मोटरों का भी विकास कर लिया गया है और उनके स्थैतिक परीक्षण सफलतापूर्वक संपन्न हो चुके हैं। साथ ही, स्वदेशी पर्यावरण नियंत्रण एवं जीवन समर्थन प्रणाली के विकास का कार्य समानांतर रूप से प्रगति पर है।

प्रमुख अवसंरचनाएं जैसे ऑर्बिटल मॉड्यूल प्रिपरेशन फैसिलिटी, गगनयान कंट्रोल सेंटर तथा अंतरिक्ष यात्री प्रशिक्षण सुविधा स्थापित की जा चुकी हैं। दूसरे लॉन्च पैड में आवश्यक संशोधन भी कर दिए गए हैं। टीवी-डी1 (TV-D1) और आईएडीटी-01 (IADT-01) जैसे अग्रदूत (प्रीकर्सर) मिशन सफलतापूर्वक पूरे किए जा चुके हैं। ग्राउंड ट्रैकिंग नेटवर्क, स्थलीय संचार लिंक तथा आईडीआरएसएस-1 (IDRSS-1) फीडर स्टेशनों की स्थापना कर ली गई है। क्रू मॉड्यूल रिकवरी योजना तथा इसके लिए तैनात किए जाने वाले संसाधनों को अंतिम रूप दे दिया गया है। पहले मानव रहित मिशन (G1) के लिए HLVM3 के सभी चरण और क्रू एस्केप सिस्टम (CES) मोटर तैयार हैं। क्रू मॉड्यूल और सर्विस मॉड्यूल की प्रणालियाँ विकसित कर ली गई हैं तथा उनके संयोजन और एकीकरण (असेंबली एवं इंटीग्रेशन) का कार्य अंतिम चरण में है। पहला मानव सहित मिशन वर्ष 2027–28 में लक्षित है।

भारत ने वर्तमान में संचालित पीएसएलवी, जीएसएलवी और एलवीएम-3 प्रक्षेपण यानों के माध्यम से निम्न पृथ्वी कक्षा (LEO) में 10 टन तक तथा भू-समकालिक ट्रांसफर कक्षा (GTO) में 4.2 टन तक के उपग्रह प्रक्षेपित करने की क्षमता के साथ अंतरिक्ष परिवहन प्रणालियों में आत्मनिर्भरता हासिल कर ली है। इन प्रक्षेपण यानों ने पृथ्वी अवलोकन, संचार, नेविगेशन और अंतरिक्ष अन्वेषण से जुड़े उपग्रहों के लिए स्वतंत्र अंतरिक्ष पहुँच सुनिश्चित की है। विस्तारित अंतरिक्ष दृष्टि को पूरा करने हेतु प्रक्षेपण यान क्षमताओं को और सशक्त बनाने के लिए सरकार ने नेक्स्ट जेनरेशन लॉन्च व्हीकल (NGLV) के विकास को मंजूरी दी है, जो निम्न पृथ्वी कक्षा में 30 टन तक की अधिकतम पेलोड क्षमता प्रदान करेगा। अंतरिक्ष तक कम लागत में पहुँच सुनिश्चित करने के उद्देश्य से पुन: प्रयोज्य प्रक्षेपण यान प्रौद्योगिकियों का भी विकास किया जा रहा है, जिसमें आंशिक रूप से पुन: प्रयोज्य NGLV शामिल है, जिसकी LEO में 14 टन पेलोड क्षमता होगी। इसके अतिरिक्त, एक पंखयुक्त बॉडी अपर स्टेज का भी विकास किया जा रहा है, जो कक्षा से पृथ्वी पर वापस लौटेगा और स्वचालित रूप से रनवे पर उतरने में सक्षम होगा।

अधिक शक्तिशाली और अधिक दक्ष प्रोपल्शन प्रणालियों के विकास के संबंध में, इसरो ने एलवीएम-3 प्रक्षेपण यान में शामिल किए जाने हेतु उच्च-थ्रस्ट (2000 kN) अर्ध-क्रायोजेनिक इंजन के विकास का कार्य शुरू किया है। इसके साथ ही, नेक्स्ट जेनरेशन लॉन्च व्हीकल (NGLV) के लिए उच्च-थ्रस्ट इंजन हेतु एक पर्यावरण-अनुकूल मीथेन आधारित प्रोपल्शन प्रणाली की भी परिकल्पना की जा रही है, जिससे प्रस्तावित मानवयुक्त चंद्र मिशन के लिए प्रक्षेपण यान की प्रौद्योगिकीय तत्परता सुनिश्चित की जा सके। इनके अतिरिक्त, ड्यूल-फ्यूल स्क्रैमजेट इंजन की दिशा में एक एयर-ब्रीदिंग प्रोपल्शन प्रणाली का विकास भी प्रगति पर है।

सरकार ने अंतरिक्ष विभाग की महत्वपूर्ण अंतरिक्ष अवसंरचना तथा अनुसंधान एवं विकास (R&D) परियोजनाओं के लिए बजट आवंटन बढ़ाने का प्रस्ताव किया है। सरकार की स्पेस विज़न 2047 के अंतर्गत वर्ष 2035 तक भारतीय अंतरिक्ष स्टेशन की स्थापना तथा वर्ष 2040 तक एक भारतीय को चंद्रमा पर उतारने का लक्ष्य रखा गया है। इस दिशा में सरकार ने अनुसंधान एवं विकास पर आधारित पांच प्रमुख परियोजनाओं को स्वीकृति दी है। इनमें गगनयान का फॉलो-ऑन मिशन; चंद्रयान के फॉलो-ऑन मिशन, जिनमें चंद्रयान-4 (चंद्र नमूना वापसी मिशन) तथा चंद्रयान-5/लूपेक्स मिशन शामिल हैं; शुक्र कक्षीय मिशन (वीनस ऑर्बिटर मिशन); और नेक्स्ट जेनरेशन लॉन्च व्हीकल (NGLV) का विकास शामिल है। स्पेस विज़न को साकार करने के लिए जमीनी अवसंरचना के विस्तार के तहत सरकार ने दो नए लॉन्च पैड को भी मंजूरी दी है—एक तमिलनाडु के कुलसेकरपट्टिनम में तथा दूसरा अगली पीढ़ी के प्रक्षेपण यानों के लिए तीसरा लॉन्च पैड।

मप्र में नवाचार का 70वाँ ‘विधान’

मध्यप्रदेश की पहचान एक उत्सवी प्रदेश की रही है लेकिन वह नवाचार का प्रदेश भी रहा है. अनेक ऐसे मौके और प्रसंग आए हैं, जब मध्यप्रदेश का नवाचार देश के लिए आदर्श बना हुआ है. मध्यप्रदेश विधानसभा ने अपना 69वाँ स्थापना दिवस मनाकर अगले वर्ष में प्रवेश करने के अवसर पर आयोजित विशेष सत्र में यह देखने को मिला. मध्य प्रदेश विधानसभा में लगभग एक दशक बाद विशेष सत्र बुलाया जा रहा है। इससे पहले वर्ष 2015 में तत्कालीन मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान के कार्यकाल में विशेष सत्र आयोजित किया गया था। इसके अलावा वर्ष 2000 में छत्तीसगढ़ के गठन के समय और 1997 में आजादी की 50वीं वर्षगांठ पर भी विशेष सत्र बुलाया गया था। विधानसभा अध्यक्ष के नवाचार पहल के अंतर्गत यह आयोजन किया गया. हालाँकि इसके पूर्व हर वर्ष प्रदेश के दिवंगत मुख्यमंत्रियों और विधानसभा अध्यक्षों की जयंती पर उनका पुण्य स्मरण करने की परम्परा का श्रीगणेश भी किया गया।

इस अवसर पर मध्यप्रदेश की स्थापना के साथ ही पंडित रविशंकर शुक्ल से लेकर वर्तमान मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव के नेतृत्व की समीक्षा की गई. इस उत्सवी बैठक मेें खुले मन से सभी पूर्व मुख्यमंत्रियों के कार्यों की प्रशंसा करते हुए इस बात से परहेज करने के बजाय सर्वजन हिताय, सर्वजन सुखाय की चर्चा की गई. इसे आप प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के सूत्र वाक्य ‘सबका साथ, सबका विकास’ की दृष्टि से भी निरपेक्ष होकर देख सकते हैं. मध्यप्रदेेश की यही विशेषता मध्यप्रदेश को अलग और उसे देश का ह्दयप्रदेश कहा जाता है. सामान्य दिनों में विधानसभा में जिस तरह सत्ता पक्ष और प्रतिपक्ष आमने-सामने होते हैं तो लगता है कि ये प्रतिद्वंदी हैं लेकिन वास्तविकता है कि दोनों ही सत्तापक्ष और प्रतिपक्ष प्रदेश और जनता के हित में चर्चा करते हैं. एक सशक्त विपक्ष लालटेन की भाँति सरकार का पथ प्रदर्शक होता है लेकिन राजनीतिक सौम्यता हमारे अपने मध्यप्रदेश की धरोहर है और जो  विधानसभा में देखने को मिला.
सत्तर साल पहले मध्यप्रदेश विधानसभा का जब गठन हुआ था, तब प्रथम विधानसभा अध्यक्ष पंडित कुंजीलाल दुबे थे, जिन्होंने 1 नवंबर 1956 से 7 मार्च 1967 तक इस पद पर कार्य किया और मध्य प्रदेश के गठन के समय से लेकर शुरुआती तीन विधानसभाओं (1956-1957, 1957-1962, 1962-1967) के अध्यक्ष रहे। इनके पश्चात श्री काशीप्रसाद पाण्डे, श्री तेजलाल टेंभरे, श्री गुलशेर अहमद, श्री मुकुन्द सखाराम नेवालकर, श्री यज्ञदत्त शर्मा, श्री रामकिशोर शुक्ला, श्री राजेन्द्र प्रसाद शुक्ल, श्री बृजमोहन मिश्रा, श्रीयुत श्रीनिवास तिवारी, श्री ईश्वरदास रोहाणी, डॉ. सीतासरन शर्मा, श्री नर्मदा प्रसाद प्रजापति (एन. पी.), श्री गिरीश गौतम विधानसभा अध्यक्ष की आसंदी पर बने रहे. सभी ने अपने गुरुत्तर दायित्व का निर्वहन कर विधानसभा की मान्य परम्पराओं का पालन किया.

वर्तमान विधानसभा अध्यक्ष श्री नरेन्द्र सिंह तोमर अपने सौम्य स्वभाव के लिए परिचित हैं. अनेक बार राज्य में मंत्री एवं अन्य उच्च पदों पर रहने वाले श्री तोमर के स्वभाव में नवाचार है. विधानसभा अध्यक्ष के रूप में उनके नवाचार की स्वाभाविक अपेक्षा होती है और उन्होंने प्रदेश की अपेक्षा को पूर्ण करने की पहल की. विधानसभा अध्यक्ष पद पर निर्वाचित होने के तुरंत बाद श्री नरेंद्र सिंह तोमर ने कहा था कि ‘मेरी कोशिश होगी कि मेरी निगाह और नजर हर सदस्य पर रहे। उसका जो हक है उसे मिल सके। इसके साथ ही उन्होंने नए सदस्यों को सीखने और अध्ययन करने की सलाह दी, वहीं पुराने सदस्यों को नसीहत देते हुए कहा कि वे ये न सोचें की वे सब कुछ सीख गए हैं। वे विद्यार्थी का भाव हमेशा रखें। उन्होंने कहा कि मेरे से पूर्व सभी अध्यक्षों ने अनेक मानदंड स्थापित किए हैं। परंपरा स्थापित की है। अपने-अपने कार्यकाल में अपने-अपने ढंग से सदन का गौरव बढ़े, इस बात का प्रयत्न किया गया है। अध्यक्ष के रूप में आप सब की निश्चित रूप से मुझसे भी ऐसी अपेक्षा है। मेरी ईमानदार कोशिश होगी कि मैं आपकी अपेक्षा के अनुसार अपने दायित्व का निर्वहन कर सकूं।’
विधानसभा अध्यक्ष नरेंद्र सिंह तोमर की पहल पर प्रदेश के पहले मुख्यमंत्री पंडित रविशंकर शुक्ल की जयंती पर मध्यप्रदेश विधानसभा के सेंट्रल हॉल में पुष्पाजंलि का आयोजन के साथ विधानसभा में दिवंगत मुख्यमंत्रियों और विधानसभा अध्यक्षों की जयंती मनाने की परंपरा की शुरुआत हुई। विधानसभा अध्यक्ष नरेंद्र सिंह तोमर ने कहा था कि अब हर वर्ष प्रदेश के दिवंगत मुख्यमंत्रियों और विधानसभा अध्यक्षों की जयंती पर उनका पुण्य स्मरण किया जाएगा। पं. शुक्ल का जीवन हमें सेवा, समर्पण और विकास की प्रेरणा देता है। उन्होंने कहा कि 1 नवंबर 1956 को मध्यप्रदेश राज्य का गठन हुआ। प्रदेश के पहले मुख्यमंत्री पं. रविशंकर शुक्ल जी के जीवन और संघर्ष से हम सभी प्रेरणा लेते हैं। ईश्वर से यही प्रार्थना है कि हम सभी को उनके बताए मार्ग पर चलने की शक्ति और सामर्थ्य प्रदान करें। मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने कहा कि विधानसभा अध्यक्ष ने दलगत राजनीति से ऊपर उठकर यह नवाचार किया है।
करीब सात दशक के सफर में मध्यप्रदेश विधानसभा का लंबा अनुभव है. कई बार ऐतिहासिक अनुभवों से गुजरा तो कई बार खट्टे अनुभव भी हुए लेकिन मान्य परम्परा का हमेशा निर्वाह किया गया. 1956 में नए मध्यप्रदेश का गठन हुआ तो छत्तीसगढ़ अविभाज्य अंग था तो इसी विधानसभा में साल 2000 में मध्यप्रदेश का विभाजन हुआ और छत्तीसगढ़ राज्य बनाने की सहमति प्रदान की. तत्कालीन उप-नेता प्रतिपक्ष राकेश चतुर्वेदी 13वीं विधानसभा सत्र के दरम्यान ही कांग्रेस छोडक़र भाजपा के साथ हो लिए थे. उस समय उन्हें कांग्रेस की ओर से सत्तापक्ष को घेरने की जवाबदारी थी क्योंकि अविश्वास प्रस्ताव की ओर से चर्चा होनी थी. ऐसे कई प्रसंग है जिन्हें स्मरण किया जा सकता है.
विधानसभा अध्यक्ष श्री नरेन्द्र सिंह तोमर अपने कार्यकाल में नवाचार के लिए जाने जाएंगे. अभी तो विधानसभा में नवाचार का श्रीगणेश हुआ है. आगे भी अनेक प्रसंग पर चर्चा का अवसर मिलेगा. मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव एवं विधानसभा अध्यक्ष श्री नरेन्द्र सिंह तोमर की दलगत राजनीति से ऊपर उठकर उनकी कार्यशैली केवल मध्यप्रदेश के लिए नहीं अपितु समूचे देश के लिए नजीर बनेगा.
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार एवं मीडिया शिक्षा से संबद्ध हैं)

भारत ने पॉक्सो के लंबित मामलों का बोझ किया कम: पहली बार दर्ज मामलों से ज्यादा मामलों का हुआ निपटारा

•      भारत में पॉक्सो मामलों की निपटान दर अब 109 प्रतिशत हुई। यानी एक वर्ष में दर्ज होने वाले मामलों से अधिक मामलों का हुआ निपटारा
•      एक शोध के अनुसार 4 वर्षों में सभी लंबित मामलों को खत्म करने के लिए 600 अतिरिक्त ई-पॉक्सो अदालतों की जरूरत
•      यह अध्ययन इंडिया चाइल्ड प्रोटेक्शन की पहल पर सेंटर फॉर लीगल एक्शन एंड बिहेवियर चेंज फॉर चिल्ड्रेन ने तैयार किया

पहली बार भारत ने एक वर्ष में दर्ज होने वाले पॉक्सो मामलों से अधिक मामलों का निपटारा किया है। यह न्यायिक प्रणाली में वर्षों से चले आ रहे लंबित मामलों के खिलाफ एक ऐतिहासिक बदलाव है। सेंटर फॉर लीगल एक्शन एंड बिहेवियर चेंज (सी-लैब) फॉर चिल्ड्रन की रिपोर्ट ‘पेंडेंसी टू प्रोटेक्शन: अचीविंग द टिपिंग पॉइंट टू जस्टिस फॉर चाइल्ड विक्टिम्स ऑफ सेक्सुअल एब्यूज’ के अनुसार वर्ष 2025 में बच्चों के यौन शोषण से जुड़े 80,320 मामले दर्ज हुए, जबकि 87,754 मामलों का अदालती सुनवाई के बाद निपटारा किया गया। इससे निपटाने की दर 109 प्रतिशत तक पहुंच गई। खास बात यह है कि 24 राज्यों में भी पॉक्सो मामलों की निपटान दर 100 प्रतिशत से अधिक रही है। रिपोर्ट में प्रोटेक्शन ऑफ चिल्ड्रेन फ्रॉम सेक्सुअल ऑफेंसेस (पॉक्सो) के तहत सभी लंबित मामलों को चार वर्षों के भीतर खत्म करने के लिए 600 अतिरिक्त ई-पॉक्सो अदालतों की स्थापना करने की सिफारिश की गई है।

मुकदमों को लेकर अक्सर “तारीख पर तारीख” की छवि से बदनाम भारत में 2023 तक पॉक्सो के 2,62,089 मामले लंबित थे। लेकिन अब एक अहम बदलाव देखने को मिला है क्योंकि निपटाए गए मामलों की संख्या दर्ज किए गए मामलों से ज्यादा हो गई है। रिपोर्ट के अनुसार देश एक ऐसे मोड़ पर पहुंच गया है जहां न्यायिक व्यवस्था अब सिर्फ लंबित मामलों को संभालने के बजाय उन्हें सक्रिय रूप से कम करना शुरू कर रही है। साथ ही रिपोर्ट में सिफारिश की गई है कि लंबित पॉक्सो मामलों को पूरी तरह खत्म करने के लिए चार साल की अवधि में 600 अतिरिक्त ई-पॉक्सो अदालतें स्थापित की जाएं। इसके लिए लगभग 1,977 करोड़ रुपये का प्रावधान किया जाना चाहिए, जिसमें निर्भया फंड का भी उपयोग किया जा सकता है।

रिपोर्ट कुछ गंभीर चिंताओं की ओर भी ध्यान दिलाती है। लगभग आधे लंबित मामले दो साल से ज्यादा समय से लंबित हैं। दोषसिद्धि की दरों में भी लगातार उतार-चढ़ाव बना हुआ है और अलग-अलग राज्यों में मामलों की स्थिति में बड़ा अंतर दिखाई देता है। उदाहरण के तौर पर, पांच साल से ज्यादा समय से लंबित पॉक्सो के सभी मामलों में अकेले उत्तर प्रदेश की हिस्सेदारी 37 प्रतिशत के चलते सबसे बड़ी भागीदारी है। इसके बाद महाराष्ट्र (24 प्रतिशत) और पश्चिम बंगाल (11 प्रतिशत) का स्थान है। कुल मिलाकर देखा जाए तो पांच साल से अधिक समय से लंबित मामलों में लगभग तीन-चौथाई अकेले सिर्फ इन्हीं तीन राज्यों में है।

न्यायिक व्यवस्था के व्यापक संदर्भ में इन आंकड़ों के दूरगामी असर पर बात करते हुए इंडिया चाइल्ड प्रोटेक्शन के निदेशक (शोध) पुरुजीत प्रहराज ने कहा, “भारत आज बाल यौन शोषण के खिलाफ अपने संघर्ष में एक बेहद संवेदनशील और निर्णायक मोड़ पर खड़ा है। जब न्यायिक व्यवस्था दर्ज किए जाने वाले मामलों से अधिक पॉक्सो मामलों का निपटारा करने लगती है, तब यह सिर्फ आंकड़ों की उपलब्धि नहीं होती, बल्कि यह उस भरोसे की वापसी होती है, जो बच्चों ने व्यवस्था पर खो दिया था। हमारा शोध बार-बार यह दिखाता है कि न्याय में हर दिन की देरी, बच्चे के मानसिक आघात को और गहरा करती है। इसलिए इस गति को बनाए रखना केवल प्रशासनिक जरूरत नहीं, बल्कि नैतिक जिम्मेदारी है। ताकि हर बच्चे के लिए समय पर संवेदनशील और बाल-केंद्रित न्याय अपवाद नहीं, बल्कि हक़ीक़त बन सके।” इंडिया चाइल्ड प्रोटेक्शन, बाल अधिकारों की सुरक्षा व संरक्षण के लिए काम करने वाले नागरिक समाज संगठनों के देश के सबसे बड़े नेटवर्क जस्ट राइट्स फॉर चिल्ड्रेन (जेआरसी) का सहयोगी है। जेआरसी 250 से अधिक सहयोगी संगठनों के साथ देश के 451 जिलों में बाल अधिकारों के लिए काम कर रहा है।

राज्यों में देखें, तो सात राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में पॉक्सो के मामलों के निपटान की दर 150 प्रतिशत से अधिक रही है। वहीं, अन्य सात राज्यों में यह निपटान दर 121 से 150 प्रतिशत के बीच रही, जबकि 10 राज्यों ने 100 से 120 प्रतिशत तक की निपटान दर हासिल की। इन 24 राज्यों ने न सिर्फ 2025 में दर्ज हुए मामलों का निपटारा किया, बल्कि पिछले वर्षों से लंबित मामलों को भी काफी हद तक समाप्त करने में सफलता पाई। ये आंकड़े उन मामलों को दिखाते हैं जो कई साल पहले न्याय प्रणाली में दर्ज हुए थे, लेकिन अब तक उनमें कोई ठोस प्रगति नहीं हो पाई है। रिपोर्ट बताती है, “किसी मामले की प्रक्रिया के शुरुआती दौर से ही लंबित रहने की समस्या शुरू हो जाती है और व्यवस्था को तय समय सीमा के भीतर मामलों को आगे बढ़ाने में चुनौतियों का सामना करना पड़ता है।”

रिपोर्ट में यह भी सिफारिश की गई है कि पॉक्सो के लंबित मामलों को शीघ्र निपटाने के मकसद से प्रत्येक राज्य और केंद्र शासित प्रदेश हर साल मामलों के निपटान की दर 100 प्रतिशत से अधिक बनाए रखें। इसके साथ ही जो राज्य न्यायिक प्रक्रिया में पीछे हैं, उन्हें तकनीकी और प्रशासनिक सहयोग दिया जाए। साथ ही दोषसिद्धि और बरी होने की दरों की नियमित और बारीकी से निगरानी की जाए। रिपोर्ट में यह भी सुझाव दिया गया है कि मामलों के बेहतर विश्लेषण और दस्तावेजों की त्वरित उपलब्धता के लिए एआई आधारित कानूनी शोध उपकरणों और दस्तावेज प्रबंधन प्रणालियों का उपयोग किया जाए, ताकि न्याय प्रक्रिया और अदालती कार्यवाही अधिक तेज व प्रभावी हो सके।

यह रिपोर्ट 2 दिसंबर 2025 तक उपलब्ध आंकड़ों के विश्लेषण पर आधारित है, जिन्हें नेशनल ज्यूडिशियल डेटा ग्रिड (एनजेडीजी), नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) और लोकसभा में पूछे गए सवालों और उनके जवाबों से लिया गया है।

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जितेंद्र परमार
8595950825

रेल निबंध प्रतियोगिता के पुरस्कार वितरित

कोटा /  भारत सरकार,गृह मंत्रालय राजभाषा विभाग की मंडल रेल प्रबंधक पश्चिम मध्य रेल मंडल कोटा की नगर राजभाषा कार्यान्वयन समिति कोटा द्वारा आयोजित वार्षिक हिंदी निबंध प्रतियोगिता के विजेताओं को पुरस्कार वितरण बुधवार को एन.टी.पी.सी अंता के शगुन सभागार में किया गया। मंडल रेल प्रबंधक एवं समिति अध्यक्ष अनिल कालरा ने विजेताओं को प्रशस्ति पत्र और पुरस्कार राशि से पुरस्कृत किया। समिति के उपाध्यक्ष राजकुमार प्रजापत ने प्रतियोगिता का विवरण देते हुए बताया कि देशभर से 157 प्रतियोगियों ने भाग लिया है। हिंदी भाषा के विकास के लिए आयोजित प्रतियोगिता सफल रही है।
समारोह में राममोहन कौशिक, कोटा एवं छाया मालवीय, इंदौर (मध्य प्रदेश) संयुक्त रूप से प्रथम, लालचंद पाल, प्रयागराज (उत्तर प्रदेश) को द्वितीय, सुरेन्द्र कुमार विश्वकर्मा एवं  दिव्यांश तिवारी,कोटा को संयुक्त रूप से तृतीय, आकांशा शर्मा, कोटा को चतुर्थ एवं. डॉ. प्रभात कुमार सिंघल, कोटा को पंचम पुरस्कार प्रदान कर पुरस्कृत किया गया।  भावेश उपाध्याय,कोटा ,अनिल कुमार, गंगापुर सिटी, हेमराज सिंह, कोटा, रमेशचन्द, कोटा को प्रेरणा  (प्रशस्ति पत्र)  से सम्मानित किया गया।

विकसित देशों के सम्पन्न नागरिक भारत में बसना चाहते हैं

वैश्विक पटल पर अचानक परिस्थितियां बहुत तेजी के साथ बदलती हुई दिखाई दे रही हैं। अभी तक कुशल युवा भारतीय अपना सपना साकार करने के उद्देश्य से अमेरिका में रोजगार के अवसर तलाशने के लिए जाते रहे हैं। परंतु, अब कुछ अलग प्रकार का माहौल बनता हुआ दिखाई दे रहा है। अमेरिका सहित अन्य कई विकसित देशों में रहन सहन (जीवन निर्वहन) के खर्चे असहनीय स्तर पर पहुंच गए हैं क्योंकि मुद्रा स्फीति की समस्या इन देशों में लम्बे समय से चल रही है, और, इन देशों द्वारा इस संदर्भ में अथक प्रयास करने के बावजूद, इसका हल नहीं निकल पा रहा है। विशेष रूप से स्वास्थ्य सेवाओं की स्थिति बहुत ही भयावह स्थिति में पहुंच गई हैं। विकसित देशों में किसी भी नागरिक को स्वास्थय इंशोरेंस की सुविधा यदि उपलब्ध नहीं हैं तो उसके लिए इलाज करना असम्भव सा ही है। स्वास्थ्य सेवाओं की लागत इन देशों में इतनी बढ़ चुकी है कि आम नागरिक के लिए यहां अपना इलाज करना सम्भव ही नहीं हैं। अमेरिका से तो युवाओं के साथ साथ सेवानिवृत्त नागरिक भी अब भारत में बसने के बारे में गम्भीरता से विचार कर रहे हैं। अमेरिका के न्यूयॉर्क, टेकसास, वाशिंगटन, लासअंजेल्स, सिलिकन वेल्ली, आदि शहरों से इंजीनियर, सृजक (क्रीएटर), युवा उद्यम, बुजुर्ग नागरिक, आदि निकलकर भारत के मुंबई, पुणे, गोवा, हैदराबाद, बैंगलोर, केरल, पोंडिचेरी, उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश आदि शहरों/राज्यों में आकर भारत में बसने के बारे में गम्भीरता से विचार कर रहे हैं।

भारत की तेज गति से आगे बढ़ती अर्थव्यवस्था, भारत में तुलनात्मक रूप से सस्ती दरों पर विभिन्न उत्पादों की पर्याप्त उपलब्धता, अति सस्ती दरों पर सेवा भावना के साथ उच्च स्तर की स्वास्थ्य सेवाओं की उपलब्धता एवं भारत की महान संस्कृति के साथ साथ साकार अवसर अमेरिका सहित विकसित देशों के नागरिकों को भारत की ओर आकर्षित कर रहे हैं। आज भारत का फलता फूलता तकनीकी उद्योग उच्च स्तर की तकनीकी सुविधाएं उपलब्ध करा रहा है जो किसी भी तरह विकसित देशों में उपलब्ध कराई जा जा रही तकनीकी सुविधाओं से कम नहीं हैं। भारत में नागरिकों को मानसिक शांति उपलब्ध है क्योंकि भारतीय नागरिक, सनातन संस्कृति का अनुपालन करते हैं। जबकि विकसित देशों के नागरिकों में मानसिक शांति का पूर्णत: अभाव है।    विकसित देशों के नागरिक पश्चिमी सभ्यता का अनुसरण करते हैं जिसके चलते संयुक्त परिवारों का पूर्णत: अभाव है। इन देशों में पश्चिमी संस्कृति का अनुसरण करते हुए परिवारों में बच्चे  18 वर्ष की आयु प्राप्त करते ही वे अपना अलग घर बसा लेते हैं और माता पिता अकेले रह जाते हैं। जिससे, माता पिता अकेलेपन का शिकार हो जाते हैं और इनकी देखभाल के लिए सरकार को व्यवस्था करनी होती है। इसके ठीक विपरीत भारतीय संस्कृति नागरिकों को आपस में जोड़ती है एवं संयुक्त परिवार भारतीय समाज की विशेषता है। बुजुर्ग नागरिकों को अपने संयुक्त परिवार में ही रहना होता है। अतः भारत में बुजुर्गों की देखभाल के लिए सरकार को अलग से कोई व्यवस्था नहीं करनी होती है।

हाल ही के वर्षों में अमेरिकी नागरिकों द्वारा भारत के लिए वीजा प्राप्त करने वालों की संख्या वर्ष 2021 के बाद से दुगुनी हो गई है। अमेरिकी नागरिक अब भारत में शांति की तलाश में आ रहे हैं। अमेरिका सहित विकसित देशों में अधिकतम नागरिकों को मानसिक बीमारियों ने घेर रखा है। इन मानसिक बीमारियों से मुक्ति पाने के उद्देश्य से कई विदेशी नागरिक तो भारत के हिमाचल प्रदेश एवं उत्तराखंड जैसे राज्यों के हिमालय क्षेत्र में बस्ते जा रहे हैं। उन्हें वहां पर आध्यात्म का सुख प्राप्त हो रहा है। भारत की तेजी से बढ़ रही डिजिटल अर्थव्यवस्था से भी अमेरिका का पढ़ा लिखा वर्ग आकर्षित हो रहा है, क्योंकि उन्हें अमेरिका जैसी ही उच्चस्तरीय सुविधाएं भारत में भी उपलब्ध हो रही हैं। भारत का स्टार्टअप इको सिस्टम भी भारत में नित नए नवाचार उपलब्ध करा रहा है इससे अमेरिका में पूर्व से ही सूचना प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में कार्यरत कर्मचारियों को भी भारत में रोजगार के नए अवसर दिखाई दे रहे हैं।

साथ ही, भारत में प्रतिभावान इंजीनीयरों की पर्याप्त मात्रा में उपलब्धता है जिससे अमेरिका की कई कम्पनियां अब अपने तकनीकी कार्य को भारत में स्थानांतरित कर रही हैं। कई अमेरिकी कम्पनियां अब यह महसूस करने लगी हैं कि भारत में कम खर्चों में अधिक उत्पादकता मिल सकती है, क्योंकि भारत में उत्पादों की लागतें एवं कार्यबल की लागतें बहुत कम हैं, जिससे तुलनात्मक रूप से इन कम्पनियों की लाभप्रदता में सुधार दिखाई दे रहा है। अमेरिका में उत्पादों की लागतें बहुत ऊंचें स्तर पर पहुंच चुकी हैं, जो कम्पनियों की लाभप्रदता को विपरीत रूप से प्रभावित कर रही हैं। और फिर, भारतीय महानगरों में अमेरिकी महानगरों की तुलना में बेहतर एवं टक्कर की सुविधाएं उपलब्ध हैं। भारत में विश्व का सबसे बड़ा उपभोक्ता बाजार भी उपलब्ध है जिससे उपभोक्ता वस्तुओं के क्षेत्र में उत्पादन करने वाली विश्व की लगभग समस्त बड़ी कंपनियां अब भारत में अपनी विनिर्माण इकाईयों की स्थापना करने के बारे में गम्भीरता से विचार कर रही हैं। ये बहुराष्ट्रीय कम्पनियां भारत में सस्ती उत्पादन लागत पर उत्पादों का निर्माण कर भारत में ही इन उत्पादों को बेच सकती हैं क्योंकि स्थानीय स्तर पर ही इन उत्पादों के लिए विशाल बाजार उपलब्ध है। अन्य कई कम्पनियां तो भारत में स्थापित विनिर्माण इकाईयों में उत्पादों का निर्माण कर अन्य देशों को निर्यात भी करने लगी हैं।

भारत में आधुनिकतम तकनीकी उपलब्ध है, रहन सहन की लागतें बहुत कम हैं, युवा एवं प्रतिभावान कार्यबल सस्ती दरों पर उपलब्ध है, भारत में मुद्रा स्फीति की दर सबसे कम है, उत्पादों का बड़ा बाजार उपलब्ध है, इन उपलब्धियों की चलते अब विदेशी निवेशक भारत की ओर आकर्षित हो रहे हैं। अमेरिका सहित विकसित देशों में आज मुद्रा स्फीति की समस्या विकराल रूप धारण किए हुए है एवं इसका हल ये देश निकाल नहीं पा रहे हैं इससे इन देशों में पेंशन पाने वाले नागरिक इन देशों में रहन सहन की उच्च लागत को वहन नहीं कर पा रहे हैं। जबकि भारत में इन देशों के नागरिकों का गुजारा बहुत आसानी से हो सकता है। साथ ही, भारत में हाल ही के समय में स्वास्थ्य सुविधाओं की उपलब्धि में अकल्पनीय सुधार हुआ है। भारत में ही अब विश्व स्तरीय स्वास्थ्य सेवाएं तुलनात्मक रूप से बहुत ही सस्ती दरों पर उपलब्ध हैं। अन्य देशों की तुलना में केवल 25/30 प्रतिशत खर्च पर भारत में अत्याधुनिक तकनीकी आधारित स्वास्थ्य सुविधाएं उपलब्ध कराई जा रही हैं। अतः आज न केवल विकसित देशों बल्कि अरब देशों से भी नागरिक भारत में अपना इलाज कराने के लिए बहुत बड़ी संख्या में आने लगे हैं।

भारतीय संस्कृति भी विदेशी नागरिकों को अपनी ओर आकर्षित करती हुई दिखाई दे रही है। मन की शांति तो भारत के आध्यात्म में अंतर्निहित है। “वसुधैव कुटुम्बकम” की भावना, “सर्वजन हिताय सर्वजन सुखाय” एवं  “सर्वे भवंतु सुखिन:” जैसी भावना तो केवल और केवल भारत में ही पाई जाती है। भारत में योगा एवं आयुर्वेदिक जैसी सुविधाएं भी स्वास्थ्य को ठीक बनाए रखने में सहयोग करते हुए दिखाई दे रही हैं। पश्चिम के केवल “मैं” के भाव से भी नागरिक अब ऊब चुके हैं एवं वहां पर छिन्न-भिन्न हुए सामाजिक ताने-बाने से भी बहुत परेशान हैं अतः वे आत्मिक सुख की तलाश में भारत के सामाजिक ताने बाने में रचना बसना चाह रहे हैं। अमेरिका एवं अन्य देशों के नागरिक महाकुम्भ के समय लाखों की संख्या में भारत में प्रयागराज में पवित्र त्रिवेणी में आस्था की डुबकी लगाने के उद्देश्य से आए थे, यहां का धार्मिक माहौल देखकर ये लोग अब भारत में बसने के बारे में गम्भीरता से विचार कर रहे हैं। विकसित देशों की तुलना में भारत में उन्हें आत्मिक शांति प्राप्त होती हुई दिखाई दे रहे हैं। आज भारत पूरे मनोयोग एवं आत्म विश्वास के साथ अपने पैरों पर खड़ा है।

भारत में समाज बहुत लचीला है एवं अन्य देशों से भारत आ रहे नागरिकों का स्वागत करता हुआ दिखाई दे रहा हैं। अतः भारत में उनका हार्दिक स्वागत हो रहा है तथा भारत में इनकी स्वीकार्यता बढ़ रही है। इस प्रकार इन विदेशी नागरिकों को भारत में स्थापित होने में किसी भी प्रकार की परेशानी दिखाई नहीं दे रही है। भारतीय समाज उन्हें  न केवल स्वीकार रहा है बल्कि समस्त प्रकार की सुविधाएं एवं सहयोग भी उपलब्ध करा रहा है।

भारत में बुजुर्गों को दिए जाने वाले आदर सत्कार से भी अमेरिका का बुजुर्ग नागरिक अत्यधिक प्रभावित हैं। अमेरिका में इस प्रकार का माहौल उन्हें नहीं मिलता है। वहां तो बुजुर्गों को सामान्यतः उनके हाल पर छोड़ दिया जाता है तथा इन बुजुर्गों की देखरेख सरकार को करनी होती है। आज अमेरिका में लगभग 6 लाख बुजुर्ग खुले में, पार्कों में, अपना जीवन जीने को मजबूर हैं। संयुक्त परिवार तो केवल भारत में सम्भव है अमेरिका में तो संयुक्त परिवार दिखाई ही नहीं देते हैं। भारत के केरल, गोवा, पोंडिचेरी, हिमाचल प्रदेश एवं उत्तराखंड राज्य अमेरिका में सेवानिवृत्त हुए नागरिकों के लिए किसी स्वर्ग से कम सिद्ध नहीं हो रहे हैं।

प्रहलाद सबनानी
सेवानिवृत्त उपमहाप्रबंधक,
भारतीय स्टेट बैंक
के-8, चेतकपुरी कालोनी,
झांसी रोड, लश्कर,
ग्वालियर – 474 009
मोबाइल क्रमांक – 9987949940
ई-मेल – prahlad.sabnani@gmail.com

अंग्रेजों को चकमा देकर 300 साल तक गाँवों में छुपकर कैसे जीवित रही संस्कृत!

कैंब्रिज यूनिवर्सिटी ने खोला 400 साल पुराना राज़
ब्रिटिश साम्राज्य के सबसे खूंखार दौर में जब पूरा देश अंग्रेजी की चपेट में था, तब तमिलनाडु के छोटे-छोटे गाँवों में एक गुप्त मिशन चल रहा था। नाम था उस मिशन का – “संस्कृत को जिंदा रखो, किसी को कानो-कान खबर न हो।”
कैंब्रिज यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर डॉ. जोनाथन डूक्वेट ने पिछले साल तिरुविसैनल्लुर गाँव में एक घर की आलमारी खोली तो उनके हाथ काँप गए।
अंदर थीं हजारों ताड़-पत्र पांडुलिपियाँ – 1840 से 1890 तक की। और सबसे बड़ा झटका: अंग्रेजों के आने के 50-60 साल बाद भी यहाँ नई-नई संस्कृत किताबें लिखी जा रही थीं – प्रेम कविताएँ, दर्शन, कानूनी ग्रंथ, कविताएं, नाटक (यहां तक कि कामुक नाटक भी) और धर्मशास्त्र भी।
डॉक्टर डूक्वेट ने दावा किया: “हम सोचते थे कि 1799 में तंजावुर दरबार खत्म होते ही संस्कृत मर गई।
लेकिन सच ये है – वो मरी नहीं थी, वो छुप गई थी… गाँवों में।
और वहाँ वो और भी जोर-शोर से फल-फूल रही थी!”
शोध में पता चला:
तिरुविसैनल्लुर, तिरुवरूर, कुंभकोणम के आसपास कम से कम 25 गाँव ऐसे थे जहाँ अंग्रेजों का नाम तक नहीं पहुँचा था।
पंडित लोग दिन-रात नई किताबें लिख रहे थे।
आज भी उन परिवारों के घरों में एक स्थानीय बुजुर्ग ने हँसते हुए बताया, “अंग्रेज साहब शहर में बैठे थे, हम यहाँ बरगद के नीचे नाटक लिख रहे थे।
उन्हें पता ही नहीं चला कि संस्कृत यहाँ पार्टी कर रही है!” अलमारियाँ भरी पड़ी हैं – कोई लॉक नहीं, बस धूल की परत।
कैंब्रिज अब इन सारी पांडुलिपियों को स्कैन कर दुनिया के सामने ला रहा है। 2029 तक पूरी दुनिया देखेगी कि कैसे हमारे गाँवों ने अंग्रेजों को मात दे दी।
तो अगली बार कोई बोले “संस्कृत मर गई”,
उसे बोलना:
“भाई, वो मरी नहीं थी… वो तो कावेरी के किनारे छुपकर मजे ले रही थी!”
 
(स्रोत: कैंब्रिज यूनिवर्सिटी का आधिकारिक प्रोजेक्ट “Beyond the Court: Sanskrit Expert Knowledge in Brahmanical Communities of the Kaveri Delta, 1650-1800” डॉ. जोनाथन डूक्वेट के इंटरव्यू, सरस्वती महल लाइब्रेरी और तिरुविसैनल्लुर के स्थानीय परिवारों से सीधे संग्रह के आधार पर)


साभार- https://www.facebook.com/share/14QKLYRn23m/ से

अमीरी की जीवनशैली, प्रदूषण का बोझ और गरीब की त्रासदी

देश की राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली आज जिस घातक पर्यावरण संकट से गुजर रही है, वह केवल एक शहर की समस्या नहीं, बल्कि पूरे देश के लिये चेतावनी है। विडंबना यह है कि इस संकट के नाम पर जो तात्कालिक उपाय लागू किए जाते हैं, उनका सबसे बड़ा खामियाजा वही तबका भुगतता है, जिसकी इसमें सबसे कम भूमिका होती है-गरीब और श्रमिक वर्ग। इसी पीड़ा को शब्द देते हुए सुप्रीम कोर्ट को कहना पड़ा कि अमीरों की जीवनशैली से पैदा हुई मुश्किलों का सामना गरीबों को करना पड़ता है। यह टिप्पणी न केवल कानूनी दृष्टि से महत्वपूर्ण है, बल्कि सामाजिक और नैतिक चेतना को झकझोरने वाली भी है। दिल्ली-एनसीआर में बढ़ते प्रदूषण से जुड़ी याचिकाओं पर सुनवाई के दौरान मुख्य न्यायाधीश जस्टिस सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस विपुल एम. पंचोली की पीठ ने यह मर्मस्पर्शी टिप्पणी की।
वरिष्ठ अधिवक्ता और न्यायमित्र अपराजिता सिंह की दलीलों पर गौर करते हुए अदालत ने स्पष्ट कहा कि ग्रैप-4 जैसी सख्त पाबंदियों का सबसे ज्यादा असर गरीबों पर पड़ता है। निर्माण कार्य रुकते हैं, दिहाड़ी मजदूरों की रोजी-रोटी ठप हो जाती है, जबकि प्रदूषण पैदा करने वाली जीवनशैली में शामिल संपन्न तबके पर अपेक्षित प्रभाव नहीं पड़ता। मुख्य न्यायाधीश ने साफ शब्दों में कहा कि समस्या की जड़ अमीरों की जीवनशैली है और समाधान भी वहीं से शुरू होना चाहिए। उन्होंने भरोसा दिलाया कि अदालत ऐसे प्रभावी और लागू करने योग्य आदेश पारित करेगी, जिन्हें जरूरत पड़ने पर सख्ती से लागू भी किया जा सकेगा।
जस्टिस सूर्यकांत का कहना था कि महानगरों में लोगों की अपनी अलग जीवनशैली होती है, जिन्हें वे बदलना नहीं चाहते। यही वजह है कि समस्या अमीरी की वजह से होती है, लेकिन झेलना गरीब को पड़ता है। दरअसल, अदालत की सोच रही है कि हमारा परिवेश-पर्यावरण साफ-सुथरा रहे, इसके लिये हम सबको अपने कुछ सुखों का त्याग करना होगा, अपने जीवन को पर्यावरण के अनुकूल ढालना होगा एवं प्रकृति-एवं पर्यावरण के प्रति सकारात्मक रवैया अपना होगा। यह जानते हुए कि पर्यावरण पर आने वाले संकट व प्रदूषित हवा का अमीर-गरीब पर समान असर पड़ता है फिर भी अमीर लोग इससे बेपरवाह रहते हैं। निस्संदेह, शीर्ष अदालत ने समाज की दुखती रग पर हाथ रखा है। चौड़ी होती सड़कें, नए फ्लाईओवर और हाईवे बनने के बावजूद जाम और प्रदूषण कम नहीं हो रहे। कारण साफ है निजी वाहनों का बेहिसाब इस्तेमाल। एक व्यक्ति, एक कार का चलन न केवल सड़क की जगह घेरता है, बल्कि कार्बन उत्सर्जन को भी कई गुना बढ़ाता है। कभी ऑड-इवन जैसी योजनाओं पर चर्चा हुई, कार-पूलिंग की बात चली, लेकिन सार्वजनिक परिवहन को सस्ता, सुगम और भरोसेमंद बनाने की इच्छाशक्ति लगातार कमजोर रही।
आज एसी, कूलर और अन्य वातानुकूलन साधनों का बढ़ता उपयोग भी पर्यावरण संकट को गहराता जा रहा है। इससे बिजली की खपत बढ़ती है, तापमान में वृद्धि होती है और अप्रत्यक्ष रूप से प्रदूषण का दायरा फैलता है। उद्योगों में भी पर्यावरणीय नियमों का ईमानदार पालन नहीं होता। जल संकट इसका एक और क्रूर उदाहरण है-जहां झुग्गी-बस्तियों में पीने के पानी की किल्लत है, वहीं पॉश कॉलोनियों में लॉन सींचे जाते हैं, कारें धुलती हैं और स्विमिंग पूल भरे रहते हैं। कुदरत ने हवा, पानी और संसाधन सभी के लिये दिए हैं, लेकिन अमीरी के असमान दखल ने इनके वितरण को अन्यायपूर्ण बना दिया है। राजनीतिक दल एक-दूसरे पर आरोप-प्रत्यारोप तो करते हैं, लेकिन ठोस और दीर्घकालिक समाधान सामने नहीं आते।
अब समय आ गया है कि सरकार और जनता-दोनों अपनी भूमिका ईमानदारी से निभाएं। सरकार को सार्वजनिक परिवहन को मजबूत, सस्ता और आकर्षक बनाना होगा, उद्योगों पर पर्यावरणीय नियमों का कड़ाई से पालन कराना होगा और शहरी विकास की नीतियों को पर्यावरण-संवेदनशील बनाना होगा। वहीं जनता को भी अपनी जीवनशैली पर पुनर्विचार करना होगा-अनावश्यक वाहन उपयोग से बचना, ऊर्जा की खपत कम करना, एसी और अन्य सुविधाओं का संयमित इस्तेमाल करना और साझा संसाधनों के प्रति जिम्मेदार व्यवहार अपनाना होगा। विडंबना यह है कि सत्ताधीशों ने दिल्ली में सार्वजनिक ट्रांसपोर्ट को सशक्त करने को प्राथमिकता नहीं दी। यदि सार्वजनिक परिवहन सस्ता व सहज उपलब्ध होता तो शायद सड़कों पर कारों का दबाव कम होता। हाल के दिनों में संपन्न व मध्यम वर्ग में एसी व अन्य वातानुकूलन उपायों के उपयोग का प्रचलन तेजी से बढ़ा है। इससे जहां प्रदूषण बढ़ाने वाली बिजली की खपत बढ़ी है, वहीं बाहर का तापमान व कार्बन उत्सर्जन भी बढ़ा है। इसी तरह तमाम अमीरों द्वारा संचालित उद्योगों में उन उपायों का ईमानदारी से पालन नहीं किया गया जो पर्यावरण में प्रदूषण कम करने में सहायक होते हैं।
सरकारों की नीतिगत विफलता इस बढ़ते वायु प्रदूषण की त्रासदी का बड़ा कारण है। प्रदूषण पर नियंत्रण के लिए योजनाएं तो बनती हैं, पर उनमें न तो स्थायित्व होता है, न गंभीरता। प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड संसाधनों की कमी से जूझ रहे हैं, निगरानी तंत्र कमजोर है, और प्रदूषण फैलाने वाले उद्योगों पर कार्रवाई नगण्य है। केंद्र और राज्य सरकारों के बीच जिम्मेदारी का बंटवारा अस्पष्ट है। हर साल सर्दियों में दिल्ली और उत्तर भारत के अन्य शहरों की हवा जहरीली हो जाती है, तब कुछ दिन के लिए ‘आपात कदम’ उठाए जाते हैं, पर जैसे ही धुंध छंटती है, सब कुछ फिर पहले जैसा हो जाता है। नीतियों में पारदर्शिता का अभाव और उद्योगपतियों का दबाव भी एक गहरी समस्या है। कोयला आधारित उद्योगों, पेट्रोलियम कंपनियों और निर्माण व्यवसाय से जुड़ी लॉबी सरकारों पर ऐसा प्रभाव बनाए रखती हैं कि कठोर कदम उठाना राजनीतिक दृष्टि से असुविधाजनक बन जाता है। स्वच्छ ऊर्जा की ओर संक्रमण को हमेशा ‘महंगा विकल्प’ बताकर टाला जाता है, जबकि वास्तव में यह निवेश मानव जीवन और पर्यावरण की सुरक्षा में है।
वायु प्रदूषण का संकट केवल वातावरण में धूल और धुएं का मामला नहीं है, यह आर्थिक अन्याय, राजनीतिक असंवेदनशीलता और सामाजिक उदासीनता का प्रतीक बन चुका है। जो सरकारें जनजीवन सुधारने का वादा करती हैं, वे हवा की गुणवत्ता सुधारने में विफल रही हैं। आंकड़े बताते हैं कि वायु प्रदूषण से भारत की अर्थव्यवस्था को हर साल सकल घरेलू उत्पाद का लगभग दस प्रतिशत तक का नुकसान हो रहा है। यह नुकसान केवल पैसों में नहीं, बल्कि मानव संसाधन की हानि, स्वास्थ्य पर बोझ और जीवन की गुणवत्ता में गिरावट के रूप में भी दिखाई देता है। अब समय है कि इस संकट को केवल पर्यावरणीय मुद्दा न मानकर एक सामाजिक और नैतिक चुनौती के रूप में देखा जाए। हवा का अधिकार हर नागरिक का मौलिक अधिकार है, लेकिन यह अधिकार धीरे-धीरे छिनता जा रहा है। अमीरों को अपनी जीवनशैली पर संयम लाना होगा, अपने निवेशों को स्वच्छ ऊर्जा की ओर मोड़ना होगा, और प्रदूषण फैलाने वाले उद्योगों से दूरी बनानी होगी। सरकारों को सख्त नीति बनानी चाहिए, जो न केवल प्रदूषण फैलाने वालों को दंडित करे बल्कि स्वच्छ प्रौद्योगिकी अपनाने वालों को प्रोत्साहन दे।
वायु प्रदूषण एक सामूहिक अपराध बन गया है जिसमें अपराधी कम और पीड़ित अधिक हैं। अब यह वक्त है जब विकास की परिभाषा में स्वच्छ हवा और सुरक्षित वातावरण को सबसे ऊपर रखा जाए। सरकारें यदि सचमुच राष्ट्र की समृद्धि चाहती हैं, नया भारत-विकसित भारत बनाना चाहती है तो उन्हें सांसों की सुरक्षा को प्राथमिकता देनी होगी। अमीर तबके को भी यह समझना होगा कि जिस हवा को वे अपने निवेशों से दूषित कर रहे हैं, वह अंततः उन्हीं की अगली पीढ़ियों की सांसों को रोक देगी। वायु प्रदूषण और जल प्रदूषण को लेकर किसी किस्म की उदासीनता देश और मानवता के साथ अन्याय होगा। अमीरी होना कोई अपराध नहीं, लेकिन अमीरी की कीमत अगर गरीब चुकाए, तो वह सभ्य समाज की हार है। सुप्रीम कोर्ट की यह टिप्पणी और सोच हमें यही संदेश देती है कि स्वच्छ पर्यावरण के लिये कुछ सुखों का त्याग अनिवार्य है। यदि आज हमने अपनी आदतें नहीं बदलीं, तो आने वाली पीढ़ियों को हम केवल प्रदूषित हवा, सूखते जलस्रोत और असमानता की विरासत ही सौंप पाएंगे।प्रेषकः


(ललित गर्ग)
लेखक, पत्रकार, स्तंभकार
ई-253, सरस्वती कंुज अपार्टमेंट
25 आई. पी. एक्सटेंशन, पटपड़गंज, दिल्ली-92
फोनः 22727486, 9811051133

शताब्दी वर्ष पर मोहन राकेश को याद किया ‘बतरस’ ने

मुंबई के ‘केशव गोरे ट्रस्ट’ सभागार में शहर की सांस्कृतिक संस्था ‘बतरस’ के दूसरे दौर का २७वां मासिक आयोजन सम्पन्न हुआ। प्रमुख वक्तव्य देते हुए डॉ. दयानंद तिवारी ने मोहन राकेश को अपने समय का सशक्त रचनाकार कहा, जिन्होंने साठ के दशक में प्राध्यापक की सुरक्षित नौकरी को छोड़कर पूर्णकालिक लेखक बनने का फ़ैसला किया। डॉ तिवारी ने एक साक्षात्कार के हवाले से बताया कि अपनी तीसरी पत्नी अनिता के पूछने पर उन्हें बताया था कि उनके जीवन में पहला स्थान लेखन का, दूसरा स्थान मित्रों का और पत्नी कहीं तीसरे स्थान पर आती थीं। यह बात एक सच्चे लेखक के विशिष्ट और स्वतंत्र व्यक्तित्व को उजागर करती है। राकेशजी द्वारा साहित्य की लगभग सभी विधाओं में सशक्त लेखन का उल्लेख करते हुए तिवारीजी ने वर्तमान सामाजिक परिस्थितियों को देखते हुए ‘मलबे का मालिक’ जैसी प्रासंगिक कहानी के बार-बार लिखे जाने की आवश्यकता बतायी। इसी तरह नाट्य परंपरा की चर्चा करते हुए डॉ. तिवारी ने भारतेंदु हरिश्चंद्र एवं जयशंकर प्रसाद के बाद मोहन राकेश को आधुनिक हिंदी नाटक का तीसरा सशक्त पड़ाव बताया। उन्होंने निष्कर्ष रूप में कहा कि मोहन राकेश का साहित्य आज भी उतना ही प्रासंगिक है, जितना अपने रचना-काल में था।

वक्तव्यों के सिलसिले में कवि एवं विचारक डॉ. अनिल गौड़ ने ‘मोहन राकेश की रचनात्मकता के उत्स’ पर प्रकाश डालते हुए कहा कि राकेशजी थे तो सिंधी, लेकिन अमृतसर में जन्म होने से वे पंजाबी सांस्कृतिक परिवेश में पले-बढ़े॰॰॰। उस वक्त के संक्रमण क़ालीन दौर में, जब विभाजन की त्रासदी झेलता समाज बड़ी तेजी से बदल रहा था,  मोहन राकेश एक सशक्त रचनाकार के रूप में उभरते हैं। अनिल जी ने रेखांकित किया कि मोहन राकेश की किसी भी कहानी को पढ़ते समय पाठक को एक ऐसा रचनाकार स्पष्ट रूप से दिखाई देगा, जो बाह्य यथार्थ का सशक्त और सूक्ष्म चित्रण करता है, तो आंतरिक यथार्थ को भी उतनी ही गहनता से व्यक्त करता है। उनकी रचनाओं में करुणा का एक अथाह सागर लहराता है। यद्यपि उसकी अभिव्यक्ति की ध्वनियाँ और चिंताएँ अलग-अलग हो सकती हैं, किंतु उसका प्रभाव सदैव गहरा और दीर्घकालिक रहता है। इसे उन्होंने ‘गिरगिट का सपना’ कहानी के ज़रिए सिद्ध भी किया, जो एक ऐसी व्यंग्यात्मक कथा है, जिसमें ऊपर से करुणा कम दिखाई देती है, परंतु आंतरिक स्तर पर इसका पूरा ताना-बाना बेहद कारुणिक है।

‘सीमाएँ’, ‘उसकी रोटी’ और ‘मलबे का मालिक’ जैसी कहानियों का हवाला देते हुए वक्ता ने कहा कि मोहन राकेश ने जीवन की जिस बेचैनी को सीधे-सीधे पकड़ा है, वह आसान नहीं थी। प्रश्न यह है कि यह बेचैनी उनके भीतर आई कैसे? इस संदर्भ में अनिलजी ने मोहन राकेश के जीवन की एक मार्मिक घटना बतायी, जिसमें पिता के देहांत पर अंत्येष्टि के लिए घर में पैसे न थे। उनकी माता ने अपनी सोने की चूड़ियाँ बेचकर यह संस्कार पूरा कराया। तब मोहन राकेश की आयु लगभग पंद्रह वर्ष रही होगी। इस घटना ने उन्हें भीतर तक तोड़ दिया और ऐसे अनुभव उनके साहित्य की मूल संवेदना बन गये।

रचनाओं के साथ मोहन राकेश द्वारा अनूदित ग्रंथों—‘मृच्छकटिकम्’ और ‘शाकुन्तलम्’॰॰॰आदि- के  उल्लेख से गौड़जी ने कहा कि उनके उपजीव्य के तीन स्तर थे। एक ओर आधुनिक हिंदी साहित्य, दूसरी ओर ऊँचाई पर खड़ा अंग्रेज़ी साहित्य, और तीसरी ओर क्लासिक संस्कृत साहित्य। किन्तु वास्तविकता यह थी कि उनके पीछे खड़े थे भारतेंदु हरिश्चंद्र और एक प्रकार से प्रयोग-दूभर नाटक वाले जयशंकर प्रसाद। इन सभी सीमाओं को तोड़ते हुए मोहन राकेश के भीतर की बेचैनी ने उन्हें एक अनूठा और नायक रचनाकार बना दिया।

 डॉ. गौड़ ने यह प्रश्न भी उठाया कि कहानी लिखते-लिखते मोहन राकेश नाटक विधा की ओर क्यों मुड़ गये? और इसका उत्तर देते हुए आगे कहा कि क्लासिक साहित्य में कथा की अपेक्षा नाटक अधिक समग्र विधा है। नाटक में कहानी, कविता, संवाद, कथन और उपकथन—सब कुछ समाहित होता है। इसके माध्यम से रचनाकार अपनी बात अधिक व्यापक और प्रभावशाली ढंग से कह सकता है। डॉ. गौड़ ने कहा कि कुल मिलाकर मोहन राकेश एक विशिष्ट और चिरस्थायी रचनाकार हैं, जिनकी रचनाएँ चाँद की तरह प्रकाशमान होकर आज भी पाठकों को भीतर तक स्पर्श करती हैं।

कवि रासबिहारी पांडेय जी ने मोहन राकेश द्वारा रचित नाटक ‘लहरों के राजहंस’ के मर्म पर बात करते हुए कहा- महाकवि अश्वघोष के महाकाव्य ‘सौन्दरानंद’ पर आधारित इस नाटक में नाटककार ने मूल कथा के पात्रों और प्रसंगों को आधुनिक संदर्भों से जोड़ते हुए उनमें अपेक्षित परिवर्तन किये हैं, जिससे यह रचना केवल ऐतिहासिक या पौराणिक न रहकर समकालीन जीवन की संवेदनाओं से जुड़ जाती है। नाटक का ताना-बाना लौकिक सुखों और आध्यात्मिक शांति की खोज के बीच फँसे नंद और सुंदरी के संवादों के माध्यम से निर्मित होता है। दोनों पात्र अनिर्णय की स्थिति में हैं—नंद का मन वैराग्य और अध्यात्म की ओर आकृष्ट है, जबकि सुंदरी लौकिक जीवन और सांसारिक सुखों के पक्ष में तर्क प्रस्तुत करती है। किंतु यह द्वंद्व किसी स्पष्ट निर्णय तक नहीं पहुँच पाता, जिससे नाटक की वैचारिकी और गहराती है। मोहन राकेश अपनी रचनाओं के माध्यम से स्थापित मान्यताओं पर प्रश्न उठाते हैं। नंद और सुंदरी के संवादों के माध्यम से सांसारिक सुखों के पक्ष और विपक्ष में दिये गये तर्क यह स्पष्ट करते हैं कि भोगों से तृप्ति संभव नहीं है। अंततः ‘लहरों के राजहंस’ लौकिक सुखों और आध्यात्मिक शांति के बीच चलने वाले अंतर्द्वंद्व की कथा है, जो मन की शांति के लिए अध्यात्म-मार्ग को अपरिहार्य बताती है।

कलाविद एवं नाट्य समीक्षक प्रो॰ सत्यदेव त्रिपाठी ने ‘मोहन राकेश के नाटकों में स्त्री-पुरूष संबंध’ पर अपनी बात रखते हुए कहा – मोहन राकेश के तीनों नाटक मुख्यतः स्त्री केंद्रित हैं। सबके मूल में पुरुष के समक्ष उनमें द्वन्द्व व टकराहट है। पहले में दो स्त्री एक पुरुष, तो दूसरे में स्त्री-पुरुष के बीच दर्शन होता है, लेकिन दोनों में पुरुष चला जाता है घर छोड़कर…। बस, तीसरे में चार पुरुष हैं और सामने है सावित्री… जो नाम में सतीत्व का मिथक लिये हुए है, पर काम में उत्तर आधुनिक-सी है – चारों पुरुषों में अत्यधिक सुख की तलाश करती है। लेकिन अंत में इस तलाश की त्रासदी भी खूब स्पष्ट होती है, जो भोगवादी लिप्सा पर कड़ा तमाचा यूँ मारती है कि सबसे ठुकरायी जाकर सावित्री को लौटके उसी घर में आना पड़ता है, जिसे हरचंद छोड़ने को तत्पर है। त्रस्त होकर बाहर गये पति को भी बच्चा लेके आता है और इस तरह सिद्ध होता है कि ‘मजबूर हूँ मैं, मजबूर हो तुम, मजबूर ये दुनिया सारी है, तन का दुख मन पर भारी है’। याने सुख भौतिकता के पीछे भागने में नही है। क्या यही अंतिम हल है?

प्रकाशक एवं कवि रमन मिश्र जी ने ‘आषाढ़ का एक दिन’ पर १९७१ में मणि कौल द्वारा इसी नाम से बनायी फ़िल्म के प्रीमियर शो को देखने का हाल बताते हुए कहा कि यह आलोचकों द्वारा बेहद सराही गई और इसे ‘फ़िल्मफ़ेयर क्रिटिक्स अवॉर्ड’ भी मिला। यह अंग्रेज़ी में भी डब होकर वन डे बिफ़ोर द  रेनी सीजन’ नाम से प्रदर्शित हुई। रमनजी के मुताबिक़ इस फ़िल्म की सबसे बड़ी विशेषता रहा – भारतीय कला-सिनेमा के प्रतिष्ठित कैमरा-मैन के॰के॰ महाजन का छायांकन। फिल्म में पेंटरली मिनिमलिस्ट़ फ्रेम्स का उपयोग किया गया।

हर शॉट को बेहद सूक्ष्म, संतुलित और भाव-भरा निरूपित करने के लिए, जिसका  मकसद था – नाटकीय संघर्ष और पात्रों की भावनाओं की उथल-पुथल को दृश्य भाषा के ज़रिये स्पष्ट करना। अधिकांश दृश्यों को हिमालय के पर्वतीय इलाके में शूट किया गया, जिसमें पृष्ठभूमि को धवल  बनाकर दर्शाया गया। इसमें बाहरी वातावरण को धुंधला करने से पात्रों और उनके संवादों पर ध्यान केन्द्रित होता है। अधिकांश संवाद और भाव-भंगिमा एक झोपड़ी के भीतर होती है, जहाँ कैमरा स्थिर-संतुलित और धीरे चलने वाले शॉट्स का प्रयोग करता है।

यह परंपरागत नाट्य रूप से हटकर सिनेमाई प्रयोगशीलता को दर्शाता है। इस फ़िल्म के निर्माण में संवादों को पहले रिकॉर्ड कर लेने का भी एक विरल प्रयोग हुआ। फिर उनसे बनते दृश्यों को शूट किया गया— जिससे पात्रों के चेहरे, भावों और वातावरण पर अधिक स्वतंत्र रूप से कैमरा केंद्रित हो सके। यह फिल्म श्वेत-श्याम रूप  में बनाई गई थी, जिससे दृश्य रूप में एक क्लासिकल मौन और दार्शनिक अनुभव मिल सके और जो नाटकीय भावनाओं को प्रभावी ढंग से व्यक्त करता रहे।

‘बतरस’ की नियमित प्रतिभागी प्रज्ञा मिश्र, जो एक कवयित्री होने के साथ-साथ पॉडकास्ट से भी जुड़ी हैं, ने मोहन

राकेश की रचना ‘गिरगिट का सपना’ (बाल साहित्य) को ऐसे प्रभावशाली ढंग से प्रस्तुत किया कि इसकी संवेदनात्मक गहराई विशेष रूप से उभर कर असरकारक बन गयी। मोहन राकेश को कथाकार रवींद्र कालिया अपना कथा-गुरु मानते थे और दोनों के अत्यंत घनिष्ठ संबंध भी रहे। इनसे प्रभावित होकर ही कालियाजी ने साहित्यिक संसार में प्रवेश किया। समय-समय पर राकेश जी ने उनका मार्गदर्शन भी किया। ऐसे रवींद्र कालिया द्वारा लिखी हुई भूमिका को रंगकर्मी दिनेश कुमार ने मंच पर अत्यंत प्रभावी ढंग से प्रस्तुत किया। राजेंद्र यादव, कमलेश्वर और मोहन राकेश की मित्रता को साहित्यिक जगत में ‘तिगड़ी’ के नाम से जाना जाता है। राजेंद्र यादव के दूसरे उपन्यास को पढ़कर मोहन राकेश ने जो पत्र लिखा था राजेंद्र यादव को, उसे रंगकर्मी आलोक शुक्ला ने मंच पर अत्यंत संवेदनशील ढंग से प्रस्तुत किया। रंगकर्मी एवं सिने अभिनेता सौरभ बंसल ने मोहन राकेश पर लिखी अपनी कविता का सशक्त पाठ किया, जिसे श्रोताओं ने सराहा।

राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय से प्रशिक्षित निधि मिश्र एवं सुशील बौंठियाल ने वर्ष २००२ में रामगोपाल बजाज के निर्देशन में ‘आषाढ़ का एक दिन’ नाटक में क्रमशः मल्लिका और कालिदास की प्रमुख भूमिकाएँ निभाई थीं। दोनों ने भूमिकाओँ के लिए अपने चयन की मार्मिक प्रक्रिया के साथ ही उस दौरान हुए कठिन-सहज अनुभवों को भी साझा किया और नाटक के एक अंश का पाठ भी किया। रंगकर्मी विजयकुमार ने थोड़े ही दिनों पहले तैयार करके ढेरों शोज़ किये नाटक ‘आधे अधूरे’ से काले शूट वाले आदमी को बेहद प्रभावशाली ढंग से पेश किया। अनुभवी रंगकर्मी एवं अभिनेता प्रमोद सचान ने अपने कलाकार साथियों (प्रतिमा सिन्हा, मधुबाला शुक्ला और सौरभ बंसल) के साथ मिलकर ‘आषाढ़ का एक दिन’ के मातुल को बड़े लहक़दार अंदाज में जीवंत कर दिया, जो खूब सराहा भी गया।

कार्यक्रम के कुशल संचालन के दौरान विजयजी पंडित ने समय-समय पर मोहन राकेश से जुड़े महत्वपूर्ण संदर्भों का उल्लेख करते हुए कार्यक्रम को समृद्ध भी किया और रोचक भी बनाये रखा। उनकी टिप्पणयों का सार यूँ रहा कि राकेशजी ने आधुनिकता को भारतीय परिप्रेक्ष्य में समझा था। उन्होंने उस कालखंड में इसके लिए चुस्त मोहरी की पतलूनें नहीं पहनीं, व्यवस्था को गालियाँ नहीं दीं, परंपरा को वक़्त-बेवक़्त कोसने का काम नहीं किया, बल्कि चली आती हुई परंपरा को कहीं मोड़कर, कहीं तोड़कर और कहीं बदलकर उसे अपने और समय के अनुरूप बना लिया। उनके आदर्श विदेशी लेखक नहीं रहे। उन्होंने फैशन के तौर पर भी विदेशी मान्यताएँ नहीं ओढीं। उनकी अपनी मान्यताएँ सहज जीवन की आवश्यकताओं के अनुरूप थीं और उनके मामले में यह किसी किस्म की दखलंदाजी बरदाश्त नहीं करते थे॰॰॰।

कार्यक्रम का समापन राष्ट्रगीत के साथ हुआ।

(लेखिका हिंदी की प्राध्यापक हैं और साहित्यिक विषयों पर लेखन करती हैं)