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पाकिस्तान में जिस मोहता परिवार ने ये महल बनवाया, वो इसमें नहीं रह पाए

आपने कभी सोचा है कि आज आज़ाद भारत में अपने ख़ुद के मंदिर आदि को वापस लेने के लिए हिंदू समुदाय को इतना स्ट्रगल करना पड रहा है तो सरहद पार पाकिस्तान में हिंदू समुदाय की कितनी जायदाद मंदिर आदि लूटे और क़ब्ज़ाए गए होंगे। आपको जानकर ताज्जुब होगा कि महज़ दस वर्ष पूर्व पाकिस्तान के कराची शहर में बचेखुचे हिंदू समुदाय ने दो जायदाद वापस लेने हेतु एक लड़ाई लड़ी। लड़ाई उन्हें हारनी थी ही- दोनों जायदाद वापस नहीं मिली- बल्कि उन्हें चेतावनी दें जीने दिया गया।
आज आपको इतिहास में छिपे एक ऐसे हिंदू बदनसीब सेठ से रूबरू करवाते है जिनकी कहानी सुन आप चौंक जायेंगे- सोचने पर मजबूर हो जायेंगे कि समुदाय विशेष माल ए गनीमत क़ब्ज़ाने में किस कदर आमादा था और है।
उन्नीसवीं शताब्दी में बीकानेर राजस्थान से एक मारवाड़ी परिवार मोहता सेठ के सदस्य अखंड भारत के अलग अलग हिस्सों में व्यापार करने गए। कलकत्ता, मद्रास, आंध्र, कराची आदि अनेक शहरों में मोहता सेठ के मेम्बरन ने व्यापार में अपना झंडा गाड़ा। कराची में इस मोहता परिवार के लोगों ने अपार सफलता प्राप्त की। कराची में हिंदू जिमख़ाना की इमारत भी इसी मोहता परिवार के एक सेठ ने बनवाई। इसी इमारत को बंटवारे में समुदाय विशेष ने हथिया लिया- जो हिंदू सम्पत्ति थी। आज तक इस हथियाई जायदाद को वापस नहीं किया गया। यह थी जायदाद नंबर एक- जिसको वापस लेने की लड़ाई २०१३ तक लड़ी गई थी।
मोहता वंश के सेठ शिवरतन मोहता कराची के टॉप बिजनेसमैन थे- इनका काम था साबुन के कारखाने। इनके बनाये पाम आयल के साबुन की समूचे भारत में जबरदस्त मांग थी। सेठ शिव रतन ना केवल टॉप व्यापारी थे बल्कि अकूत दौलत के मालिक और अनेक दीनी राजनेताओं के मित्र भी थे।
१९२० में सेठ शिव रतन की पत्नी बहुत बीमार पड़ी- डॉक्टर ने सलाह दी यदि ये किसी ऐसे स्थान पर रहें जहाँ समुद्र की हवा इन्हें मिलती रहे तो इनका स्वस्थ होना मुमकिन है। सेठ शिव रतन ने कराची में समुद्र से लगे क्लिफ्टन एरिया में १८ हज़ार वर्गफ़ुट का एक महल बनवाया। तीन मंजिल का ये महल कराची का सबसे सुंदर विशाल और अद्भुत नगीना था। हर मंजिल का आर्किटेक्चर अपने आप में अनूठा रहा। आर्किटेक्चर और इस इमारत पे यदि लिखा तो पोस्ट सुरसा के मुख भांति बढ़ती जाएगी।
इस मोहता महल की छत पर सेठ जी ने एक विशाल शिव मंदिर का निर्माण करवाया- मंदिर के ठीक बाजू में बीमार सेठानी का शयन कक्ष था। छत से ना केवल समुद्र दिखाई देता बल्कि समुद्र की हवा भी खूब आती। सेठानी कुछ साल इस माहौल में और जी गई। सेठ को लोगों ने शाहजहाँ की उपाधि दी जिन्होंने अपनी पत्नी के लिए इतना शानदार महल जो बनवाया था।
फिर १९४७ का वर्ष आया- जहाँ समस्त हिंदू समुदाय हिन्दुस्थान जाने को बेताब था- वही सेठ शिवरतन ने कराची में रुकने का फ़ैसला किया। अपार जायदाद और इस महल को छोड़ कर जाना मुमकिन ना था। ऊपर से सेठ साहब जिन्ना के घनिष्ठ मित्र भी थे। तो सेठ साहब को किसी प्रकार का ख़तरा ना था। वो बंटवारे के कुछ महीने बाद तक अपने महल में आराम से रहते रहें।
फिर अचानक एक दिन पाकिस्तानी फौज ने उनके महल पर दस्तक दी- कहा- तुम्हारा ये घर सरकार अधिग्रहण कर रही है- इसे खाली कर निकल जाओ। अब यहाँ एक बड़ी हस्ती रहेगी। हक्के बक्के सेठ शिवरतन ने लाख दुहाई दी- रोये गिड़गिड़ाए । उसी दिन कराची में एक फंक्शन था जहाँ मंच पर जिन्ना के बगल में सेठ शिवरतन भी बैठे थे। सेठ साहब ने मंच से खुलेआम जिन्ना से गुहार लगाई- प्रार्थना की मेरा घर मुझ से ना छीनो। जिन्ना ने दो टूक जवाब दिया- ये मुल्क का मुआमला है।हम कुछ नहीं कर सकते।
अगले दिन मोहता महल सेठ जी से खाली करवा लिया गया। सेठ जी ने पूछा- ये तो बता दो, कौन हस्ती मेरे महल पे दाँत गड़ाए बैठी है। सेठ साहब को कोई उत्तर ना मिला। सेठ साहब इसके बाद वहाँ ना रुके- सीधे हिंदुस्थान आ गए। जीवित लौट आए थे- ये बहुत बात थी।
ये मोहता महल थी दूसरी जायदाद जिसको वापस लेने की लड़ाई कराची के हिंदू समुदाय ने २०१४ तक लड़ी। नाकामयाब हुए।
लेकिन मोहता महल की कहानी यही ख़त्म नहीं हुई।
मोहता महल का क़ब्ज़ा मिला जिन्ना परिवार को। जिन्ना की बहन फातिमा को ये महल पसंद आ गया था- तो जिन्ना परिवार ने इस माल ए गनीमत को क़ब्ज़ा लिया।
जिन्ना की मौत के बाद जब फ़ातिमा जिन्ना जनरल अयूब ख़ान से टक्कर ले रही थी- तो इसी मोहता महल में वो अकेली रहती थी। साठ के दशक में अकेली बुढ़िया जिन्ना जो अविवाहित थी- बिना बाल बच्चे वाली थी- इस विशाल इमारत में अकेली रहती थी। दूसरी मंजिल पे एक बेडरूम में सोना- सोने से पहले नीचे का मुख्य द्वार लॉक कर देती। सुबह उठ छज्जे से चाबी नीचे गिराती जिसे उठा ख़ादिम मुख्य द्वार खोलता – उसके लिए चाय नाश्ता आदि लेके अंदर जाता। ये फ़ातिमा का दैनिक क्रम था।
और फिर एक दिन- फ़ातिमा जिन्ना ने चाबी नीचे नहीं फेंकी। ख़ादिम ने भी ध्यान नहीं दिया। दोपहर धोबी आया- महल बंद था। फिर हल्ला मचा- फ़ातिमा बी दरवाज़ा क्यों नहीं खोल रही है। जैसे तैसे दरवाज़ा खोला गया- पाया फ़ातिमा अपने बेडरूम में बीस घंटे पहले मृत पड़ी था- चेहरे पे सूखे आँसू थे। ठीक वैसे ही आँसू जो सेठ शिवरतन के चेहरे पर थे- जब उन्हें मोहता महल से भगाया गया था।
फ़ातिमा की मौत के बाद इस महल को जिन्ना परिवार से पाकिस्तानी सरकार ने ख़रीद किया- इसे एक म्यूजियम में तब्दील कर दिया। आज भी मोहता महल कराची में ठीक वैसे ही खड़ा है जैसे सेठ जी ने बनवाया था। बस टॉप फ्लोर का मंदिर अब वहाँ नहीं है। शिव प्रतिमा नहीं है। घंटे नहीं है। शेष है तो बस माल ए गनीमत।
आप इधर मंदिरों के अस्तित्व के सबूत देते रहिए, टीवी पे डिबेट करते रहिए। फेसबुक पर सबूत के तौर पर किताबों के पन्ने लाइन नंबर आदि लिखते रहिए- स्क्रीन शॉट डालते रहिए। मोहता महल जैसी ना जाने कितनी इमारत है जिनका इतिहास सबूत आदि आज भी सीना ताने खड़ा है लेकिन कोई सुनवाई नहीं है।
साभार Mann Jee जी के फेसबुक वाल से

भारतीय डाक विभाग देश के सुदूरवर्ती क्षेत्रों तक सेवाएँ पहुँचाने में निभा रहा अग्रणी भूमिका

पोस्टमास्टर जनरल कृष्ण कुमार यादव ने उत्तर गुजरात परिक्षेत्र में डाक सेवाओं की की समीक्षा, लक्ष्यों की समयबद्ध प्राप्ति पर दिया जोर

अहमदाबाद। भारतीय डाक विभाग ‘डाक सेवा–जन सेवा’ के मूल मंत्र के अनुरूप कार्य करते हुए देश के ग्रामीण एवं सुदूरवर्ती क्षेत्रों तक विश्वसनीय सेवाएँ पहुँचाने में अग्रणी भूमिका निभा रहा है। नवीनतम तकनीकों और अभिनव पहलों के माध्यम से डाक विभाग समाज के सभी वर्गों तक अपनी व्यापक पहुँच सुनिश्चित कर रहा है। सुरक्षित निवेश विकल्पों और आकर्षक ब्याज दरों के कारण डाकघर की बचत योजनाएँ आज भी आमजन के बीच अत्यंत लोकप्रिय बनी हुई हैं। उक्त उद्गार उत्तर गुजरात परिक्षेत्र के पोस्टमास्टर जनरल श्री कृष्ण कुमार यादव ने 15 दिसंबर, 2025 को ‘मेघदूतम्’ सभाकक्ष, क्षेत्रीय कार्यालय, अहमदाबाद में मण्डलाध्यक्षों, के वित्तीय वर्ष 2025-26 के अब तक के कार्यों की समीक्षा बैठक की अध्यक्षता करते हुए व्यक्त किये। इस दौरान उत्तर गुजरात के विभिन्न मंडलों और डाकघरों में डाक व्यवसाय की श्रेणीवार समीक्षा की गई। इनमें मेल ऑपरेशंस, पार्सल, इंटरनेशनल मेल, बचत बैंक, डाक जीवन बीमा व ग्रामीण डाक जीवन बीमा, फिलेटली, नागरिक केन्द्रित सेवाएँ-आधार, पासपोर्ट इत्यादि शामिल रहीं। समीक्षा के दौरान पोस्टमास्टर जनरल श्री कृष्ण कुमार यादव ने इस वित्तीय वर्ष में निर्धारित लक्ष्यों की समयबद्ध प्राप्ति तथा व्यवसायिक वृद्धि सुनिश्चित करने हेतु निष्ठा, प्रेरणा और समर्पण के साथ कार्य करने हेतु प्रेरित किया।

समीक्षा बैठक के दौरान विभिन्न मंडलों के अधिकारियों द्वारा अपने-अपने क्षेत्रों में किए जा रहे कार्यों की प्रस्तुति पोस्टमास्टर जनरल श्री कृष्ण कुमार यादव के समक्ष की गई, जिन पर विस्तार से चर्चा एवं विश्लेषण किया गया। उत्तर गुजरात परिक्षेत्र के डाकघरों में वित्तीय समावेशन के तहत इस वित्तीय वर्ष में अब तक लगभग 5.83 लाख नए बचत खाते, 18,600 सुकन्या समृद्धि खाते और 75,000 इंडिया पोस्ट पेमेंट्स बैंक खाते खोले गए हैं। डाक जीवन बीमा में 160 करोड़ रूपये व ग्रामीण डाक जीवन बीमा में 34 करोड़ रुपये की कुल प्रीमियम राशि जमा हुई। पोस्टल ऑपरेशंस के तहत 65 करोड़ रूपये से अधिक का राजस्व प्राप्त हुआ। 1.97 लाख लोगों ने डाकघरों के माध्यम से आधार सेवाओं और 42,500 लोगों ने पोस्ट ऑफिस पासपोर्ट सेवा केंद्र के माध्यम से पासपोर्ट बनवाये। घर बैठे 27,024 पेंशनर्स का डिजिटल लाइफ सर्टिफिकेट बनाया गया। उत्तर गुजरात में अभी तक 1002 गांवों को ‘सम्पूर्ण सुकन्या समृद्धि ग्राम’ और 691 गांवों को ‘सम्पूर्ण बीमा ग्राम’ व 227 गाँवों को ‘सम्पूर्ण बचत ग्राम’ बनाया जा चुका है।

पोस्टमास्टर जनरल श्री कृष्ण कुमार यादव ने कहा कि डाक सेवाओं में निरंतर नवाचार हो रहा है। डाकघर आधुनिक सेवाओं तथा डिजिटल पहलों के माध्यम से नागरिकों को अधिक सुविधा लाभ प्रदान कर रहे हैं। केंद्रीय संचार मंत्री श्री ज्योतिरादित्य एम. सिंधिया जी के दृष्टिकोण से निर्देशित गुजरात का पहला जेन-Z डाकघर आईआईटी गांधीनगर में शुरू किया गया, जिसे युवाओं ने काफी सराहा है। डाकघरों में एडवांस्ड पोस्टल टेक्नोलॉजी आरम्भ होने के बाद डिजिटल भुगतान में बढ़ोत्तरी हुई है, जो ‘डिजिटल इंडिया’ व ‘कैशलेस इकोनॉमी’ की सोच को आगे बढ़ाती है। इसके अलावा, इंडिया पोस्ट और ओएनडीसी (ओपन नेटवर्क फॉर डिजिटल कॉमर्स) मायस्टोर ने पूरे भारत में पार्सल पैकेजिंग, बुकिंग और डिलीवरी सेवाओं में क्रांति लाने के लिए साझेदारी की है।

 इसके तहत अहमदाबाद जीपीओ में पायलट आधार पर छोटे निर्माताओं और सोशल सेलर्स के लिए निःशुल्क वेयरहाउसिंग की सुविधा दी जा रही है। डिजिटलीकरण के इस युग में स्पीड पोस्ट और पार्सल अब रीयल-टाइम ट्रैकिंग और ओटीपी आधारित डिलीवरी के साथ अधिक सुरक्षित, स्मार्ट व नागरिक-अनुकूल बन गया है। विद्यार्थियों की जरूरतों के मद्देनजर  किताबें और अध्ययन सामग्री कम लागत में भेजने हेतु ‘ज्ञान पोस्ट सेवा’ आरंभ हुई, वहीं उन्हें स्पीड पोस्ट पर 10% विशेष छूट भी उपलब्ध है। डाकघरों में पिकअप एंड इंडक्शन, पार्सल पैकेजिंग सेवा, डिजिटल पेमेंट जैसी कस्टमर फ्रेंडली सेवाएँ भी उपलब्ध कराई जा रही हैं। पोस्टमास्टर जनरल श्री कृष्ण कुमार यादव ने डाक सेवाओं में नवाचार के साथ इसकी दक्षता व आउटरीच बढ़ाने, वित्तीय समावेशन, डिजिटलीकरण, पार्सल, स्पीड पोस्ट, अंतरराष्ट्रीय मेल, नागरिक केन्द्रित सेवाएँ को बढ़ावा, प्रौद्योगिकी को एकीकृत करने और मार्केटिंग की रणनीति को सशक्त  करने पर उन्होंने जोर दिया।

बैठक में अहमदाबाद मंडल के प्रवर डाक अधीक्षक श्री चिराग मेहता, प्रवर अधीक्षक, रेल डाक सेवा श्री पियूष रजक, गांधीनगर मंडल के प्रवर डाक अधीक्षक श्री शिशिर कुमार, अहमदाबाद जीपीओ सीनियर पोस्टमास्टर श्री अल्पेश आर. शाह, साबरकांठा डाक अधीक्षक सुश्री मंजुलाबेन पटेल, पाटन डाक अधीक्षक श्री एच. सी. परमार, बनासकांठा डाक अधीक्षक श्री आर. ए. गोस्वामी, सहायक निदेशक श्री वारिस वहोरा, एम. एम. शेख, रितुल गाँधी, सहायक अधीक्षक श्री रमेश पटेल, श्री भाविन प्रजापति, डाक निरीक्षक सुश्री पायल पटेल, सहित तमाम अधिकारी उपस्थित रहे।

राजस्थान के राज्यपाल कोटा के रचनाकार डॉ. सिंघल को पुरस्कृत करेंगे

कोटा । राजस्थान के महामहिम  राज्यपाल श्री हरिभाऊ किसनराव बागडे आगामी 20 दिसंबर को लालसोट में आयोजित ” अनुराग साहित्य सम्मान – 25 में ” राजस्थान के साहित्य साधक ” कृति के लिए जीवनी विधा में कोटा के लेखक डॉ. प्रभात कुमार सिंघल को सम्मानित करेंगे। ज्ञात हो इस पुस्तक के लेखक राजस्थान में सूचना एवं जनसंपर्क विभाग से सेवा निवृत संयुक्त निदेशक हैं। समारोह का आयोजन अनुराग सेवा संस्थान लालसोट जिला दौसा की ओर से किया जा है।
 लेखक  डॉ. सिंघल ने बताया कि राजस्थान के साहित्य जगत की इस महत्वपूर्ण कृति में 11 प्रवासी  सहित कुल 62 साहित्यकारों का जीवन परिचय और उनकी साहित्यिक साधना को रेखांकित किया गया है। ओडिशा के साहित्यकार अनुवादक और आलोचक श्री दिनेश कुमार माली द्वारा इस कृति की समीक्षा अंतरराष्ट्रीय न्यूज पोर्टल पर प्रकाशित की गई है। कई और ख्यातनाम लेखक इस कृति पर समीक्षा लिख चुके हैं। सम्मानित करने के लिए अनुराग सेवा संस्थान लालसोट और उनके पदाधिकारियों का आभार।

जयपुर में प्रवासी राजस्थानी सम्मेलन के मंच पर एक साथ आए दुनिया भर के राजस्थानी उद्योगपति

राजस्थान सरकार द्वारा आयोजित प्रवासी राजस्थानी सम्मेलन में “चालो आपणो देस बुलावै” की थीम पर देश व दुनियाभर से राजस्थानी प्रवासी 10 दिसंबर को जयपुर पहुँचे। प्रवासी राजस्थानी दिवस-2025 पर बड़ा कार्यक्रम आयोजित हुआ।

मंच पर कई प्रमुख उद्योगपतियों और प्रवासी उद्यमियों को सम्मानित किया गया। इनमें अनिल अग्रवाल, कुमार मंगलम बिड़ला, विनीत मित्तल, अजय पीरामल, माधव सिंघानिया, नरसी कुलरिया सहित कई प्रमुख नाम शामिल रहे।

मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा ने कार्यक्रम में प्रवासी राजस्थानियों को संबोधित करते हुए कहा कि बीते दो वर्षों में राज्य में तेजी से बदलाव हुए हैं। सीएम बोले कि प्रवासियों के लिए हमने अलग विभाग बनाया है। आपको किसी तरह की परेशानी नहीं होने देंगे। उद्योगों को पूरी सुविधाएं, 24 घंटे बिजली और सरल प्रक्रियाएं उपलब्ध कराई जा रही हैं।

श्री भजनलाल ने बताया कि राज्य में उद्योगों को 24 घंटे बिजली देने की तैयारी पूरी हो चुकी है। वहीं, किसानों के लिए 22 जिलों में दिन में बिजली वितरण शुरू कर दिया गया है। उन्होंने कहा कि राम जल सेतु परियोजना और यमुना जल समझौते पर भी तेजी से कार्य हो रहा है।

युवाओं को लेकर उन्होंने जानकारी दी कि सरकार 92 हजार नौकरियां दे चुकी है तथा 1.56 लाख पदों पर भर्ती प्रक्रिया जारी है। इस महीने 20 हजार युवाओं को नियुक्ति पत्र सौंपे जाएंगे। इसके अलावा युवा उद्यमिता को बढ़ावा देने के लिए नई नीति का भी आज विमोचन होगा। वहीं, सीएम ने मंच से 14 नए प्रवासी राजस्थान चैप्टर की स्थापना का भी ऐलान किया।

राजस्थान में पर्यटन के लिए बहुत सारे विकल्प बताते हुए मुख्यमंत्री ने कहा,”राजस्थान से निराला कोई प्रदेश नहीं है, हमारे यहां डेजर्ट हैं, झीलें हैं, अभयारण्य, किले,महल, शेखावाटी की हवेलियां हैं. कोई अगर घूमने जाता है तो वह एक ही जगह जा पाता है और एक ही जगह देख पाता है, लेकिन अगर कोई व्यक्ति राजस्थान आएगा तो एक टिकट में 4 से 5 फिल्म देखकर जाएगा.”

मुख्यमंत्री भजनलाल ने प्रवासी राजस्थानियों से आह्वान किया कि वह अपने परिवार के साथ हर साल दो बार राजस्थान जरूर आएं. उन्होंने कहा,”मां बच्चों की कभी नहीं भूलती और बच्चे मां को कभी नहीं भूलते. मेरा आग्रह है कि आप साल में कम से कम दो बार अपने परिवार के साथ राजस्थान जरूर आएं ताकि आपके अपने बच्चे और नाती-पोते अपनी जड़ों, अपनी कहानियों और अपनी पहचान से जुड़े रहें. जब प्रवासी समुदाय जुड़ा रहता है तो विरासत जिंदा रहती है, और जब विरासत जिंदा रहती है तो भविष्य को और मजबूती मिलती है.”

‘हर प्रवासी बने राजस्थान का ब्रांड एंबेसडर’ कार्यक्रम में केंद्रीय वाणिज्य एवं उद्योग मंत्री पीयूष गोयल ने कहा कि दुनिया भर में 1 करोड़ से अधिक प्रवासी राजस्थानी रहते हैं। उन्होंने कहा कि अगर हर प्रवासी अपना योगदान दे, तो दुनिया की कोई ताकत राजस्थान को देश का नंबर-1 राज्य बनने से नहीं रोक सकती। आप राजस्थान के ब्रांड एंबेसडर बनकर निवेश और अवसरों को बढ़ावा दें।

राजस्थान के राज्यपाल हरिभाऊ बागडे ने कहा कि राजस्थान को ‘सूखा और भूखा’ समझने की गलतफहमी दूर करनी होगी। उन्होंने सीएम से कहा कि प्रवासियों से सिर्फ निवेश मत मांगिए, उन्हें अपने ही रूप में स्वीकार कीजिए। कहिए- कब तक प्रवासी रहेंगे? राजस्थान लौट आइए।

राजस्थान के मुख्य सचिव वी श्रीनिवास ने कहा कि  राजस्थान के लिए आज का दिन ऐतिहासिक रहा है।कई घोषणाएं राजस्थान को लेकर मुख्यमंत्री भजनल लाल ने की हैं। इसके अलावा नए विभाग खोले गए हैं। आज राइजिंग राजस्थान 2026 की भी घोषणा की गई है। आज के दिन के बाद  प्रवासियों के साथ राजस्थान सरकार के संबंध मजबूत होंगे।

आयोजन में  मुख्यमंत्री श्री भजनलाल शर्मा, पंजाब के राज्यपाल श्री गुलाबचंद कटारिया, केंद्रीय उद्योग एवं वाणिज्य मंत्री श्री पीयूष गोयल, विधानसभा अध्यक्ष श्री वासुदेव देवनानी, उप मुख्यमंत्री श्रीमती दियाकुमारी, श्री प्रेमचंद बैरवा, उद्योग मंत्री श्री राज्यवर्धन सिंह राठौड़ आदि की उपस्थिति में राज्यपाल श्री बागडे ने वाल्मीकि रामायण का प्रसंग सुनाते हुए कहा कि जब भगवान श्री राम ने लंका विजय की तो सोने की लंका की लक्ष्मण ने प्रशंसा की। इस पर श्री राम ने कहा कि सोने की लंका मुझे नहीं सुहाती। श्री राम ने कहा “जननी जन्म भूमि स्वर्गादपि गरीयसी”। जननी और जन्म भूमि स्वर्ग से भी महान होती है। उन्होंने मातृभूमि राजस्थान के विकास के लिए प्रवासियों को यहां हर क्षेत्र में सहयोग करने, उद्यमिता से युवाओं को रोजगार देने के प्रयासों में भागीदारी निभाने का आह्वान किया। उन्होंने राजस्थान की अपनत्व भरी “पधारो म्हारे देश” की संस्कृति की चर्चा करते हुए कहा कि प्रदेश तेजी से विकास की ओर आगे बढ़ रहा है। प्रवासी यहां पधारें। उनका स्वागत और अभिनंदन हैं।

राज्यपाल श्री बागडे ने इससे पहले मुख्यमंत्री श्री शर्मा और पंजाब के राज्यपाल श्री कटारिया के साथ राज्य में निवेश करने वाले विशिष्ट उद्यमियों को उनके योगदान के लिए सम्मानित भी किया। उन्होंने प्रवासी सम्मेलन पर प्रकाशित पुस्तक का लोकार्पण किया और राजस्थान के बारे में निर्मित फिल्म का भी बटन दबाकर शुभारम्भ किया। सम्मेलन में विभिन्न विभागों द्वारा राजस्थान के विकास को प्रदर्शित करती ऑडियो वीडियो कला दीर्घा का भी उन्होंने वहां पहुंचने पर अवलोकन किया।

वहीं, कार्यक्रम में मौजूद पंजाब के राज्यपाल गुलाबचंद कटारिया ने मज़ाकिया लहजे में कहा कि पीयूष गोयल ने उन्हें भी प्रवासी बता दिया, जबकि मैं तो पूरा जीवन राजस्थान में ही रहा हूं, बस फिलहाल टेंपरेरी प्रवासी हूं।

सूरत, लंदन, दुबई, सिंगापुर, कंपाला, टोक्यो, दोहा, म्यूनिख, न्यूयॉर्क, नैरोबी, भुवनेश्वर,कोलकाता, दिल्ली के उद्योगपतियों के साथ सीधा संवाद हुआ. प्रवासी राजस्थानी सम्मेलन से दुनियाभर में संदेश गया. उद्योगपतियों को मायड़ और माटी से जोड़ने की मुहिम की चहुंओर तारीफ हो रही है.

वेदांता ग्रुप के चेयरमैन अनिल अग्रवाल और टाटा पावर के सीईओ और एमडी प्रवीर सिन्हा सहित कई उद्योगपति भी शामिल  हुए। एक दिवसीय कार्यक्रम में प्रवासी राजस्थानी संवाद और उद्योग, ऊर्जा, जल, खान, शिक्षा, पर्यटन तथा स्वास्थ्य से जुड़े विभिन्न महत्वपूर्ण विषयों पर चर्चा सत्रों का आयोजन किया गया इनमें विविध विषयों पर विशेषज्ञ राजस्थान के बदलते औद्योगिक एवं निवेश परिवेश और जुड़ाव की संभावनाओं पर विचार किया गया। शाम को सांस्कृतिक कार्यक्रमों ने राजस्थानी संस्कृति की शानदार झलक पेश की।

आयोजन में  सभी 26 राजस्थान चैप्टर के पदाधिकारी शामिल हुए। इसमें 12 अंतरराष्ट्रीय चैप्टर हैं. इसमें म्यूनिख (जर्मनी), नैरोबी (केन्या), दुबई (यूएई), सिंगापुर (सिंगापुर), दोहा (कतर), टोक्यो (जापान), रियाद (सऊदी अरब), मेलबर्न (ऑस्ट्रेलिया), कंपाला (युगांडा), काठमांडू (नेपाल), लंदन (यूके), न्यूयॉर्क (यूएसए) शामिल हैं. साथ ही देश भर के विभिनन्न शहरों के 14 चैप्टरों दिल्ली, रांची, गुवाहाटी, पुणे, भुवनेश्वर, मुंबई, चेन्नई, अहमदाबाद, सूरत, बेंगलुरु, हैदराबाद, इंदौर, कोलकाता और कोयम्बटूर के अध्यक्ष व प्रतिनिधि भी शामिल हुए।


उद्घाटन सत्र में वेदांता ग्रुप के चेयरमैन अनिल अग्रवाल ने घोषणा की कि कंपनी राजस्थान में एक बड़ा इंडस्ट्रियल पार्क विकसित करेगी। इस पार्क में जिंकसिल्वरसल्फ्यूरिक एसिडफास्फोरिक एसिडएल्युमिनियम तथा कॉपर बेस्ड उद्योग स्थापित किए जाएंगे। उन्होंने कहा कि यहां करोड़ से 100 करोड़ तक की इंडस्ट्रीज लगाई जा सकती हैं। उन्होंने बताया कि मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा के कार्यकाल में राज्य में व्यापार करना पहले की तुलना में और आसान हुआ है। वेदांता समूह के अध्यक्ष अनिल अग्रवाल ने कहा कि अब तक वेदांता ने राजस्थान में तीन लाख करोड़ रुपये टैक्स के रूप में राजकीय कोष में जमा करवा दिए हैं।

श्री  अनिल अग्रवाल ने कहा कि उनका सपना है कि राजस्थान में हिंदुस्तान का सबसे बड़ा फ़र्टिलाइजर प्लांट स्थापित किया जाए। साथ ही उन्होंने आग्रह किया कि प्रदेश में चोप स्टेडियम का निर्माण कार्य जल्द से जल्द शुरू कराया जाए।

उन्होंने कहा कि आज दुनिया में यदि कोई निवेशक या उद्यमी भारत आता हैतो उसकी पहली पसंद राजस्थान बनती जा रही है। उन्होंने कहा कि पचास साल पहले किसी ने नहीं सोचा था कि राजस्थान की धरती के नीचे पूरी दुनिया के लिए खनिजों का विशाल भंडार छिपा है।

उन्होंने पंजाब का उदाहरण देते हुए कहा कि जैसे पंजाब पूरे देश को अनाज देता हैउसी तरह राजस्थान में पूरी दुनिया को खनिज उपलब्ध कराने की क्षमता है। अग्रवाल ने स्पष्ट कहा कि अब राज्य में माइनिंग गतिविधियों को बढ़ाने का समय आ गया हैक्योंकि यहाँ जिस प्रकार के खनन क्षेत्र (पैचेज़) मौजूद हैंवैसी संरचना दुनिया में कहीं और नहीं मिलती।

अनिल अग्रवाल ने कहा कि राजस्थान की धरती के नीचे मौजूद क्षमता इतनी विशाल है कि इस पर वह पूरी रात चर्चा कर सकते हैं। यहाँ खनिजों के 40 तरह के विशिष्ट पठार हैंजो दुनिया के किसी अन्य हिस्से में नहीं पाए जाते।

राइजिंग राजस्थान में कुल 35 लाख करोड़ रुपए के निवेश समझौते हुए. उनमें 7 लाख करोड़ के एमओयू धरातल पर उतर चुके. 10 दिसम्बर को एक लाख रुपए निवेश समझौतों की ग्राउंड ब्रेकिंग के साथ ही यह आंकड़ा 8 लाख करोड़ रुपए हो जाएगा. प्रदेश को बेहतर निवेश गंतव्य बनाने के लिए 10 से अधिक नई नीतियां लॉन्च की गई।श. इसमें प्रवासी राजस्थानी नीति शामिल है.

समारोह स्थल पर  प्रवासियों और उद्योगपतियों को राज्य के विकास से अवगत कराने को प्रगति पथ थीम आधारित प्रदर्शनी लगाई गई. इसमें सरकार की उपलब्धियों पर पैनल और वीडियो फिल्म प्रदर्शित किए गए। प्रवासी राजस्थानियों और सरकार के बीच बेहतर संवाद और सहयोग के लिए कई अहम निर्णय लिए. प्रवासियों को एक मंच पर लाने को राजस्थानी दिवस की घोषणा, हितों की रक्षा के लिए नए विभाग का गठन, नई प्रवासी नीति शामिल हैं. प्रवासी राजस्थानियों के परिजनों के लिए हर जिले में सिंगल प्वॉइंट कॉन्टेक्ट बनाया है. उनकी समस्याओं के समाधान के लिए हर जिले में एडीएम को नोडल अधिकारी बनाया है.

मुख्यमंत्री शर्मा ने बताया कि गए साल राइजिंग राजस्थान ग्लोबल इन्वेस्टमेंट समिट की प्रवासी राजस्थानी कॉन्क्लेव में 10 दिसम्बर को हर वर्ष प्रवासी राजस्थानी दिवस मनाने की घोषणा की थी. इस कड़ी में यह पहला आयोजन किया गया।

भजनलाल सरकार की ‘गुड गवर्नेंस’: 
-प्रवासी राजस्थानी सम्मेलन में जुटे देश दुनिया से प्रवासी
-प्रवासी राजस्थानी दिवस-2025 पर आयोजित हुआ बड़ा कार्यक्रम
-“चालो आपणो देस बुलावै” की थीम पर पहुंचे देश-दुनिया से अप्रवासी
-आज प्रवासी राजस्थानी दिवस में पहुंचे निवेशकों से वन-टू-वन संवाद
-सूरत, लंदन, दुबई, सिंगापुर, कंपाला, टोक्यो, दोहा, म्यूनिख, न्यूयॉर्क,
-नैरोबी, भुवनेश्वर,कोलकाता, दिल्ली के उद्योगपतियों से संवाद
प्रवासी राजस्थानी सम्मेलन से दुनियाभर में गया संदेश
-उद्योगपतियों को मायड़ और माटी से जोड़ने की मुहिम की चहुंओर तारीफ

इसका उद्देश्य:

विदेशों और भारत के अन्य राज्यों में बसे राजस्थानियों को एक मंच पर लाना
राजस्थान के विकास में उनके अनुभव, पूंजी और नेटवर्क का उपयोग
सामाजिक, सांस्कृतिक, औद्योगिक तथा निवेश सहयोग बढ़ाना
प्रवासी राजस्थानियों को सम्मान देना और रोडमैप तैयार करना
राज्य के निवेश अवसरों और विकास योजनाओं को साझा करना
राजस्थान की सांस्कृतिक धरोहर, व्यवसाय एवं नवाचार की पहचान प्रस्तुत करना

नई नीतियों का विमोचन
राजस्थान सरकार ने निवेश-अनुकूल 13 नई नीतियाँ जारी कीं जिनमें पर्यटन, एग्री-फूड प्रोसेसिंग, सेमीकंडक्टर, वैश्विक क्षमता केंद्र नीति आदि शामिल हैं।
राजस्थान सरकार ने प्रवासी राजस्थानियों के लिए विशेष विभाग/डायस्पोरा अफेयर्स डिपार्टमेंट (DORA) बना दिया है जो प्रवासी समुदाय के हितों, निवेशों और शिकायतों से जुड़े मामलों को देखेगा।
वैश्विक निवेश एवं नेटवर्किंगः राजस्थान सरकार के अनुसार इसका लक्ष्य है कि प्रवासी समुदाय राज्य के निवेश और विकास की रणनीतियों में सक्रिय भूमिका निभाए, जिससे राज्य का वैश्विक व्यापार और विकास गतिशील बने।

कार्यक्रम में देश-विदेश के प्रमुख प्रवासी उद्यमियों की मौजूदगी रही, जिनमें वेदांता ग्रुप के अनिल अग्रवाल, वेलस्पन ग्रुप की दीपाली गोयनका, अजय पीरामल सहित कई उद्योगपति शामिल हुए।

इस अवसर पर  MoU की ग्राउंड ब्रेकिंग और कॉफी टेबल बुक का विमोचन किया। मुख्यमंत्री ने रिमोट का बटन दबाकर 1 लाख करोड़ रुपये के MoU की ग्राउंड ब्रेकिंग की। साथ ही ‘कमिटमेंट इन एक्शन’ शीर्षक वाली कॉफी टेबल बुक का विमोचन भी किया गया।

उद्घाटन सत्र में वेदांता ग्रुप के चेयरमैन अनिल अग्रवाल ने घोषणा की कि कंपनी राजस्थान में एक बड़ा इंडस्ट्रियल पार्क विकसित करेगी। इस पार्क में जिंक, सिल्वर, सल्फ्यूरिक एसिड, फास्फोरिक एसिड, एल्युमिनियम तथा कॉपर बेस्ड उद्योग स्थापित किए जाएंगे। उन्होंने कहा कि यहां 2 करोड़ से 100 करोड़ तक की इंडस्ट्रीज लगाई जा सकती हैं।

प्रवासी राजस्थानी दिवस के अवसर पर राज्य सरकार 13 नई सेक्टोरल नीतियां भी लॉन्च कर रही है। इनमें इंडस्ट्रियल नीति,  पर्यटन नीति,  एनआरआर नीति, सेमीकंडक्टर नीति, एयरोस्पेस एंड डिफेंस नीति, एआई-एमएल नीति एग्री–फूड प्रोसेसिंग नीति, वाहन स्क्रैप नीति ,ग्लोबल कैपेबिलिटी सेंटर (GCC) नीति शामिल होंगी।

बाल रंगोत्सव में बच्चों की जीवंत प्रस्तुतियों से मिशन बाल मन तक हुआ साकार

कोटा। कोटा संभाग में बच्चों को कविता, कहानी लिखने की बारीकियां और तकनीक समझाने के लिए बाल साहित्य सृजन शिविर आयोजित किए जाएंगे। यह जानकारी संयोजक डॉ. प्रभात कुमार सिंघल ने सोमवार को बच्चों को साहित्य और संस्कृति से जोड़ने के लिए चलाये जा रहे मिशन बाल मन तक के समापन समारोह में दी।  बाल रंगोत्सव के साथ राजकीय उच्च माध्यमिक विद्यालय सिमलिया में सोमवार को आयोजित समारोह में बच्चों ने रंगारंग जीवंत  सांस्कृतिक प्रस्तुतियों से सभी का मन मोह लिया। विद्यालय प्रधानाचार्या डॉ. वैदेही गौतम ने सभी का स्वागत किया।
अतिथियों ने बच्चों द्वारा लिखित कहानियों की हस्तलिखित पुस्तकों का विमोचन कर विजेता बच्चों को पुरस्कार वितरित किए। रंगोली प्रतियोगिता में बनाई रंगोली, पुस्तक और हस्तशिल्प वस्तुओं की प्रदर्शनी का अवलोकन किया। बाल रचनाकारों के साथ – साथ महेश पंचोली, संजू शृंगी, रीता गुप्ता, मोहन सेन, रघुराज सिंह कर्मयोगी ने भी काव्य पाठ किया।
समरोह अध्यक्ष रामेश्वर शर्मा रामू भैया, मुख्य अतिथि जितेंद्र निर्मोही और मुख्य ब्लॉक शिक्षा अधिकारी कोटा शहर एवं रंगीतका संस्था की संस्थापक स्नेहलता शर्मा ने अपने विचार व्यक्त कर मिशन बाल मन तक को बच्चों में साहित्यिक रुझान पैदा करने का सार्थक प्रयास बताया।
बाल साहित्यिक गतिविधियों के प्रतिवेदन  में संस्कृति, साहित्य, मीडिया फोरम के संयोजक डॉ. सिंघल ने समस्त सहयोगी साहित्यकारों का आभार व्यक्त कर बताया कि मिशन बाल मन तक में 41 बाल साहित्य मेलों से 35 हजार से अधिक बच्चें जुड़े और 19 हजार से अधिक बच्चों ने विविध साहित्यिक गतिविधियों में भाग लिया। विजेता रहे 423 बच्चों को इस सामरोह के माध्यम से पुरस्कृत किया जा रहा है। समारोह में सहयोग के लिए समीप के छः विद्यालयों के प्रधानाध्यापकों एवं आयोजक विद्यालयों के स्टाफ को सम्मानित किया गया।
     समारोह में विशिष्ठ अतिथि के तौर पर सिमलिया के नरेंद्र शर्मा, कोटा के साहित्यकार विजय कुमार शर्मा, राम मोहन कौशिक, कालीचरण राजपूत, झालावाड़ के सुरेश कुमार निगम एवं मोहन सेन, सिमलिया के सरपंच जितेंद्र मेघवाल, नरेंद्र शर्मा एवं गणमान्य नागरिक उपस्थित रहें।

भुवनेश्वर में स्वामी व्यासानंदजी महाराज,ऋषिकेश द्वारा एक दिवसीय सत्संग ज्ञान-यज्ञ का आयोजन

भुवनेश्वर। नव वर्षः2026 की मंगल कामना हेतु स्थानीय,एन-2-218,सत्संगभवन.आईआरसी विलेज में 16 दिसंबर को सुबहः9.00 बजे स्वामी व्यासानंदजी महाराज,ऋषिकेश द्वारा एक दिवसीय सत्संग ज्ञान-यज्ञ आयोजित किया गया जिसमें अनेक सत्संगीगण उपस्थित होकर स्वामी जी का सारगर्भित व जीवनोपयोगी प्रवचन सुने।स्वामीजी का स्वागत आयोजन समिति की ओर से अशोक पाण्डेय ने किया। श्री पाण्डेय ने बताया कि स्वामी लगातार पांच वर्षों से दिसंबर महीने में भुवनेश्वर आते हैं और अपने एक दिवसीय प्रवचन में सत्संग महिमा को रेखांकित करते हैं।
व्यासपीठ पर स्वामीजी का स्वागत सीए अनिल अग्रवाल,उनकी पत्नी श्रीमती ऋतु अग्रवाल तथा गिरधारी हलान आदि ने किया। लगभग डेढ़ घण्डे के प्रवचन में स्वामी जी ने बताया कि मनुष्य जब अपनी मां के गर्व में आता है तो भगवान उसे श्रीराम नाम के भजन का मंत्र अंकुरित कर देते हैं जिसके परिणाम स्वरुप वह अपनी दिनचर्या में सत्संग में बैठकर श्रीराम नाम संकीर्तन को अपना लेता है। स्वामीजी ने यह भी बताया कि एक मनुष्य को पुनः मनुष्य की योनि में जन्म लेने के लिए लगभग पवने दो अरब साल बाद ही पुनः मौका भगवान देते हैं। उन्होंने यह भी बताया कि मनुष्य के पास एक ही धन है जो उसके साथ जाता है और वह है भगवान का भजन रूपी धन।यह धन भक्त को आजीवन साथ देता है।
उन्होंने  भारतीय सभ्यता पर पश्चिमी सभ्यता के प्रभाव का उल्लेख करते हुए यह बताया कि आदमी जब अस्सी साल का हो जाता है फिर भी उसको अपने बाल-बच्चे,उसके अपने बैंक खाते का नाम अवश्य याद रहता है लेकिन भगवान श्रीराम के नाम का स्मरण उसे बिल्कुल ही नहीं रहता है। गौरतलब है कि व्यासानंदजी ने अपने सद्गुरु महर्षि मेंहीं के नाम का स्मरण करते हुए भक्त-जीवन में सद्गुरु की महिमा को भी स्पष्ट किया।उन्होंने अपने सारगर्भित वक्तव्य की पुष्टि श्रीमद् भागवत महापुराण और गोस्वामी तुलसीकृत श्रीरामचरित मानस आदि प्रसंगों से की।आयोजित सत्संग में महिलाओं ने बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया।

केरल से आया भाजपा के लिए शुभ संकेत

भारतीय जनता पार्टी के लिए लम्बे संघर्ष के बाद  दक्षिणी राज्य केरल से एक सुखद समाचार आया है । केरल के नगर निकाय चुनावों में अपना अब तक का सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन करते हुए राजग गठबंधन तीसरी शक्ति के रूप प्रवेश कर चुका है। यह नया राजनीतिक समीकरण मात्र केरल में ही नही अपितु पूरे दक्षिण भारत में कांग्रेस तथा  वामपंथियो को सावधान होने को कह रहा है। केरल की राजधानी और कांग्रेस सांसद शशि थरूर के संसदीय क्षेत्र तिरुवनंतपुरम के नगर निगम चुनावों में राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन  (एनडीए) ने 101 में से 50 सीटों पर विजय प्राप्त कर इतिहास रच दिया और वाममोर्चे का 45 वर्ष पुराना किला ढहा दिया। माकपा के नेतृत्व वाला गठबंधन यहा 29 और कांग्रेस नेतृत्व वाला गठबंधन मात्र 19 सीटों पर ही सिमट गया। तिरुवनंतपुरम  ही नहीं केरल के त्रिशूर नगर निगम पर भी भाजपा गठबंधन का नियंत्रण हो गया है। इसके अतिरिक्त भाजपा ने लगातार तीसरी बार पलक्काड नगर पालिका पर भी अपना नियंत्रण बनाए रखा और त्रिपुनिथुरा नगरपालिका में सत्तारूढ़ गठबंधन के 20 वार्डों के मुकाबले 21 वार्ड जीतकर एडीएफ गठबंधन को एक और तगड़ा झटका देने में सफलता प्राप्त कर ली।

तिरुवनंतपुरम  के परिणाम  राजनैतिक गलियारे में चर्चा का विषय बन गए हैं क्योंकि यहां से शशि थरूर वर्ष 2009 से कांग्रेस के सांसद हैं और कांग्रेस आलाकमान से उनकी अनबन चल रही है। ऑपरेशन सिंदूर के बाद जो भारतीय प्रतिनिधिमंडल विदेशी दौरे पर भेजे गए थे उसमें शशि  थरूर भी शामिल थे। शशि थरूर समय समय पर  प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की किसी न किसी रूप में सराहना कर रहे हैं । मोदी की नीतियों  पर थरुर के  लेख भी चर्चा का विषय बने रहते हैं।

केरल नगर निकाय के चुनाव परिणामों के आंकड़ों  के अनुसार राजग गठबंधन ने राज्यभर में 1900 से अधिक वार्ड जीते हैं जो पिछली बार की तुलना में 300 से अधिक हैं। यद्यपि अब कहा जा सकता है कि अब केरल में  भाजपा की उपस्थिति नगण्य नहीं रह गई है, वह धीरे -धीरे बढ़त  पर निकल पड़ी है तथापि  केरल में भाजपा को  अभी बहुत काम करना है क्योंकि ग्रामीण क्षेत्रों में अभी भी उसकी पकड़ नही बनी है।

केरल नगर निकाय चुनाव परिणामों से संकेत मिल रहे हैं कि भाजपा ने  तिरुवनंतपुरम  में 45 वर्ष से चले आ रहे वामपंथी  गढ को ढहा दिया। कोझिकोड ओैर कन्नूर जैसे कट्टर  वामपंथी गढ़ों में भी अपनी उपस्थिति दिखाने में सफलता प्राप्त की जहां उसने 13 और 4 सीटें जीतकर सत्ता के समीकरण गड़बड़ा दिए। एनडीए  ने पहली बार 26 ग्राम पंचायतों में सफलता प्राप्त की है। स्पष्ट है कि अब भाजपा केरल में तीसरी ताकत बन रही है और वहां की राजनीति में मुकाबला त्रिकोणीय हो गया है। 2020 के नगर निकाय चुनावों में भाजपा गठबंधन को 15 प्रतिशत मत  प्राप्त हुए थे जो अब बढ़ कर 20 प्रतिशत हो गए हैं।

भाजपा के लिए सबसे चौंकाने  वाला परिणाम  कन्ननकुलंगरा वार्ड जिसे हिंदुओ का गढ़ कहा जाता है का रहा जहां पर भाजपा की मुस्लिम महिला उम्मीदवार मुमताज ने ऐतिहासिक सफलता प्राप्त की है। मुमताज विगत दो वर्षों से अल्पसंख्यक मोर्चा की जिम्मेदारी संभाल रही हैं। मुमताज एक राजनेता के अतिरिक्त उद्यमी भी हैं।

चुनाव परिणाम आने के बाद कांग्रेस सांसद शशि थरूर ने भाजपा को बधाई देते हुए इसे लोकतंत्र की खूबसूरती बताया। केरल की जीत से प्रधानमत्री नरेंद्र मोदी व भाजपा नेतृत्व गदगद है और इस विजय का उत्सव  भी मना रहा है। केरल विजय पर प्रधानमंत्री मोदी ने कहा कि यह केरल में कार्यकर्ताओं  की पीढ़ियों के कार्य और संघर्ष को याद करने का दिन है जिन्होंने जमीनी स्तर पर काम किया। हमारे कार्यकर्ता ही हमारी ताकत हैं हमें उन पर गर्व है।

भारतीय जनता पार्टी केरल में अपने पैर जमाने के लिए लगातार कड़ी मेहनत कर रही है और हर बार नये -नये चेहरों के साथ प्रयोग कर रही है। 2014 में केंद्र में भाजपा गठबंधन की पूर्ण बहुमत की सरकार बनने के बाद से केरल में भाजपा विशेष ध्यान दे रही है  जिसका प्रतिफल अब दिखाई दे रहा है। अब केरल में ईसाई समुदाय भी भाजपा की ओर आकर्षित हो रहा हैं और उस समुदाय मे बीजेपी की पैठ बढ़ी है। इन सब के पीछे केरल में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का बढ़ता प्रभाव भी है। स्वयंसेवकों ने अपने प्राणों तक की चिंता छोड़कर संघ का विस्तार किया है। अब युवा भी संघ की शाखाओं में आ रहे हैं। स्वाभाविक रूप से केरल में संघ के विस्तार का लाभ भाजपा  को मिलेगा।

प्रेषक – मृत्युंजय दीक्षित

फोन नं. – 9198571540

इच्छा मृत्युः संवेदना एवं संविधान के बीच फंसा मानवीय प्रश्न

इच्छा मृत्यु यानी व्यक्ति की अपनी इच्छा के अनुसार जीवन का अंत, भारत में लंबे समय से सामाजिक, नैतिक और कानूनी विमर्श का विषय रही है। यह प्रश्न केवल मृत्यु से जुड़ा नहीं है, बल्कि असहनीय पीड़ा, मानवीय गरिमा, करुणा और आत्मनिर्णय के अधिकार से गहराई से संबंधित है। इनदिनों एक 32 वर्षीय युवक, जो पिछले 13 वर्षों से कोमा जैसी स्थिति में है, इस त्रासदी का जीवंत उदाहरण है। न चेतना, न संवाद, न सुधार की कोई संभावना, फिर भी परिवार भावनात्मक, मानसिक और आर्थिक यातना झेलने को विवश है। इस मामले ने एक बार फिर इच्छा मृत्यु के प्रश्न पर विमर्श का वातावरण बना दिया है। ऐसे हजारों मामले देशभर में चुपचाप पीड़ा सह रहे हैं, जिनका न तो कोई समाधान है और न ही कोई स्पष्ट कानूनी रास्ता। यह स्थिति केवल चिकित्सा संकट नहीं, बल्कि मानवीय संवेदना और सामाजिक न्याय की गंभीर परीक्षा है।
आधुनिक चिकित्सा विज्ञान ने जीवन को कृत्रिम रूप से लंबे समय तक बनाए रखने की क्षमता तो विकसित कर ली है, लेकिन यह तय नहीं कर पाया है कि जब जीवन केवल पीड़ा, चेतनाहीनता और निरर्थक जैविक क्रिया बन जाए, तब उसे ढोते रहना ही मानवता है या उसे सम्मानपूर्वक विदा देना अधिक करुणामय विकल्प है। विडंबना यह है कि जो लोग असाध्य बीमारी, लंबे कोमा या पूर्णतः चेतनाशून्य अवस्था में नारकीय जीवन जीने को विवश हैं, उनके लिए भारतीय कानून आज भी स्पष्ट और मानवीय मार्ग तय नहीं कर पाया है। ऐसे लोग यह मानते हैं कि जब जीवन से गरिमा, चेतना और आशा समाप्त हो जाए, तब जीवन की तुलना में गरिमापूर्ण मृत्यु अधिक महत्वपूर्ण हो जाती है।
प्रश्न यह उठता है कि हमारा कानून ऐसी मृत्यु को आज भी संदेह, भय और अपराध की दृष्टि से क्यों देखता है? भारतीय दंड संहिता की धारा 309 और 306 लंबे समय तक इच्छा मृत्यु के मार्ग में कानूनी बाधा बनी रहीं। भले ही 2017 के मानसिक स्वास्थ्य देखभाल अधिनियम में आत्महत्या के प्रयास को मानसिक पीड़ा का परिणाम मानते हुए अपराध की श्रेणी से आंशिक रूप से बाहर किया गया हो, लेकिन इच्छा मृत्यु के प्रश्न पर आज भी कोई समग्र और स्पष्ट कानून मौजूद नहीं है। संविधान का अनुच्छेद 21 जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार की बात करता है, परंतु यह बहस आज भी जारी है कि क्या इसमें गरिमापूर्ण मृत्यु का अधिकार अंतर्निहित है या नहीं?
इच्छा मृत्यु को लेकर भारतीय न्यायपालिका का सबसे महत्वपूर्ण और ऐतिहासिक मोड़ वर्ष 2011 में अरुणा शानबाग मामले में देखने को मिला। अरुणा शानबाग, जो मुंबई के केईएम अस्पताल में नर्स थीं, 1973 में हुए एक अमानवीय हमले के बाद मस्तिष्क क्षति का शिकार हो गईं और 42 वर्षों तक परसिस्टेंट वेजिटेटिव स्टेट-यानी सतत् विकृतशील दशा में रहीं। उनकी ओर से दायर याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने सक्रिय इच्छा मृत्यु को अस्वीकार करते हुए यह स्वीकार किया कि निष्क्रिय इच्छा मृत्यु को सशर्त अनुमति दी जा सकती है। न्यायालय ने माना कि यदि रोगी की स्थिति असाध्य है, चेतना लौटने की कोई संभावना नहीं है और उपचार केवल जीवन को यांत्रिक रूप से खींच रहा है, तो विशेषज्ञों की राय और न्यायिक निगरानी में जीवन रक्षक उपचार हटाया जा सकता है। यह निर्णय भारतीय न्यायिक इतिहास में एक बड़ा कदम था, लेकिन यह भी स्पष्ट हो गया कि यह समाधान अपवाद था, स्थायी कानून नहीं।
इसके बाद 2018 में कॉमन कॉज बनाम भारत संघ मामले में सुप्रीम कोर्ट ने यह ऐतिहासिक टिप्पणी की कि जीवन का अधिकार केवल जीवित रहने का अधिकार नहीं, बल्कि गरिमापूर्ण जीवन और गरिमापूर्ण मृत्यु का अधिकार भी है। इसी फैसले में ‘लिविंग विल’ या ‘एडवांस मेडिकल डायरेक्टिव’ को वैध माना गया, जिसके माध्यम से कोई व्यक्ति पहले से यह दर्ज कर सकता है कि असाध्य अवस्था में उसे जीवन रक्षक उपचार न दिया जाए। किंतु इस प्रक्रिया को इतनी जटिल औपचारिकताओं से बाँध दिया गया कि व्यवहार में यह अधिकार आम नागरिक के लिए लगभग अप्राप्य बनकर रह गया। हाल के वर्षों में ऐसे अनेक मामले सामने आए हैं जो इस समस्या की भयावहता को उजागर करते हैं। इच्छा मृत्यु की आवश्यकता इसी यथार्थ से जन्म लेती है। असाध्य कैंसर, न्यूरोलॉजिकल रोगों और अंतिम अवस्था की बीमारियों में जीवन पीड़ा का पर्याय बन जाता है। चेतनाहीन शरीर को मशीनों के सहारे जीवित रखना जीवन कम और यातना अधिक प्रतीत होता है।
व्यक्ति को अपने जीवन के अंतिम निर्णय का अधिकार मिलना चाहिए, क्योंकि आत्मनिर्णय लोकतांत्रिक समाज का मूल मूल्य है। लंबे समय तक चलने वाला उपचार परिवार को आर्थिक और मानसिक रूप से तोड़ देता है और सीमित चिकित्सा संसाधनों का प्रश्न भी खड़ा करता है। इच्छा मृत्यु के विरोध में यह तर्क दिया जाता है कि इसका दुरुपयोग हो सकता है, बुजुर्गों या गरीबों पर दबाव बनाया जा सकता है और डॉक्टर जीवन-मृत्यु का निर्णयकर्ता बन जाएंगे। ये आशंकाएँ गंभीर हैं, किंतु इनका समाधान इच्छा मृत्यु को नकारने में नहीं, बल्कि स्पष्ट, सख्त और पारदर्शी कानून बनाने में है। अंतरराष्ट्रीय अनुभव बताते हैं कि जहां स्पष्ट कानून और बहुस्तरीय निगरानी व्यवस्था है, वहां दुरुपयोग की संभावना कम होती है। नीदरलैंड्स, बेल्जियम, कनाडा और स्विट्ज़रलैंड जैसे देशों ने यह सिद्ध किया है कि करुणा और नियंत्रण साथ-साथ चल सकते हैं। वैसे भारत में भी जैन धर्म का संथारा (सल्लेखना) और आधुनिक संदर्भ में इच्छा मृत्यु दोनों पहली दृष्टि में समान प्रतीत होते हैं, किंतु दर्शन, उद्देश्य, प्रक्रिया और संवैधानिक व्याख्या के स्तर पर इनके बीच मौलिक अंतर भी हैं और कुछ गहरी समानताएँ भी। इसी कारण एक ही देश में संथारा निर्वाध चलता रहा है और इच्छा मृत्यु आज भी बहस का विषय बनी हुई है।
जैन धर्म में संथारा या सल्लेखना को मृत्यु नहीं, बल्कि जीवन की अंतिम साधना यानी मृत्यु का महोत्सव माना गया है। यह न तो पीड़ा से पलायन है और न ही जीवन से पलायन, बल्कि आसक्ति, क्रोध, भय और मोह के क्षय की आध्यात्मिक प्रक्रिया है। संथारा तब लिया जाता है जब व्यक्ति यह अनुभव करता है कि उसका शरीर साधना के योग्य नहीं रहा, बीमारी असाध्य हो चुकी है, या वृद्धावस्था में देह शिथिल हो गई है। इसमें भोजन और जल का त्याग क्रमशः, संयमपूर्वक और गुरु की आज्ञा से किया जाता है। इसका उद्देश्य शरीर को नष्ट करना नहीं, बल्कि आत्मा को निर्मल करना होता है। जैन दर्शन में यह माना जाता है कि मृत्यु तो अनिवार्य है, प्रश्न केवल इतना है कि वह आसक्ति और व्याकुलता में हो या समता और सजगता में। इसके विपरीत इच्छा मृत्यु आधुनिक विधिक अवधारणा है, जिसका मूल उद्देश्य असहनीय शारीरिक या मानसिक पीड़ा से मुक्ति है। इसमें व्यक्ति यह चाहता है कि जीवन की यातना समाप्त हो जाए, क्योंकि चेतना, संवाद और सुधार की कोई संभावना नहीं बची है। यह निर्णय भावनात्मक, चिकित्सकीय और परिस्थितिजन्य होता है, न कि आध्यात्मिक साधना का अंग। इच्छा मृत्यु में दवा, इंजेक्शन या जीवन रक्षक प्रणाली हटाने जैसे भौतिक साधन जुड़े होते हैं, जबकि संथारा में हिंसा का कोई सक्रिय साधन नहीं होता।
अब समय आ गया है कि भारत भी इच्छा मृत्यु विषय पर संकोच छोड़कर स्पष्ट और मानवीय कानून बनाए। ऐसा कानून जो असाध्य और अपरिवर्तनीय स्थितियों की वैज्ञानिक पहचान करे, रोगी की इच्छा और गरिमा को सर्वाेपरि माने, परिजनों को अनावश्यक पीड़ा से बचाए और डॉक्टरों को नैतिक तथा कानूनी सुरक्षा प्रदान करे। इच्छा मृत्यु जीवन के विरुद्ध नहीं, बल्कि अर्थहीन पीड़ा के विरुद्ध एक करुणामय विकल्प है। जब जीवन केवल मशीनों पर टिका एक जैविक क्रम बन जाए और चेतना, सम्मान व आशा समाप्त हो जाए, तब मृत्यु को अपराध नहीं, बल्कि मानवीय अधिकार के रूप में देखना होगा। यदि हमारा संविधान जीवन को गरिमा देता है, तो उसी गरिमा के साथ मृत्यु चुनने का अधिकार भी देना होगा। इच्छा मृत्यु पर स्पष्ट कानून बनाना केवल कानूनी सुधार नहीं, बल्कि एक संवेदनशील, परिपक्व और करुणामय समाज की पहचान है। मानवीय करुणा की मांग है कि जीवन की पवित्रता और पीड़ा की क्रूरता के बीच संतुलन बनाया जाए। इच्छामृत्यु जब सहमति से होगी तो मानवता को कायम रखा जा सकता है। न्यायपालिका को ऐसा न्याय देना चाहिए, जो रोगी को पीड़ा से मुक्त करे और एक करुणामय भविष्य का मार्ग प्रशस्त करे।

प्रेषकः
(ललित गर्ग)
ई-253, सरस्वती कुंज अपार्टमेंट
25 आई. पी. एक्सटेंशन, पटपड़गंज,
दिल्ली-110092, मो. 9811051133

भारतीय सेना के सामाजिक माध्यमों पर अंग्रेजी का बोलबाला

प्रति,
राजभाषा विभाग,
गृह मंत्रालय, भारत सरकार,
नई दिल्ली।

विषय: भारतीय सेना के सामाजिक माध्यमों पर अंग्रेजी का बोलबाला, भर्ती अधिसूचनाएँ केवल अंग्रेज़ी में जारी किए जाने के संबंध में गंभीर शिकायत एवं भाषाई भेदभाव तथा राजभाषा अधिनियम के उल्लंघन के विरुद्ध अभ्यावेदन।

महोदय,

सविनय निवेदन है कि भारतीय सेना की आधिकारिक वेबसाइट (https://joinindianarmy.nic.in) पर उपलब्ध अिकांस भर्ती अधिसूचनाएँ, विशेष रूप से अधिकारी स्तर की भर्ती अधिसूचनाएँ, केवल अंग्रेज़ी भाषा में अथवा आधी-अधूरी हिन्दी में प्रकाशित की जा रही हैं अथवा हिन्दी संस्करण को केवल दिखावे के लिए 1-2 पेज में समेटा जा रहा है। यह स्थिति हिन्दी सहित अन्य भारतीय भाषाओं के बोलने वाले करोड़ों नागरिकों के लिए अत्यंत असुविधाजनक और अवसरों से वंचित करने वाली है। सेना जैसी राष्ट्रीय संस्था अपनी गतिविधियों को केवल अंग्रेज़ी में सीमित करके देश की कुल जनसंख्या के मात्र 9-10 प्रतिशत नागरिकों (जो अंग्रेज़ी में पूर्णतः पारंगत हैं) तक ही पहुँचा रही है, जो स्पष्ट रूप से भाषाई भेदभाव का उदाहरण है। 2011 की जनगणना तथा अन्य सर्वेक्षणों के अनुसार, भारत में अंग्रेज़ी समझने वालों की संख्या लगभग 10 प्रतिशत है, जिसका अर्थ है कि सेना की भर्ती प्रक्रिया बहुसंख्यक भारतीयों के लिए भाषिक बाधा के कारण अप्राप्य बनी हुई है। इससे युवाओं के समान अवसर छिन रहे हैं तथा सेना में क्षेत्रीय विविधता और समावेशिता कमजोर हो रही है।

वर्तमान में भी यह प्रथा जारी है। उदाहरणस्वरूप:
– अनेक नवीनतम प्रवेश संबंधी अधिसूचनाएँ केवल अंग्रेज़ी स्वरूप में उपलब्ध हैं।

यह स्थिति निम्नलिखित कानूनी प्रावधानों का घोर उल्लंघन है:

* राजभाषा अधिनियम, 1963 की धारा 3(3), जो महत्वपूर्ण दस्तावेज़ों (जैसे सामान्य आदेश, नियम, अधिसूचनाएँ, प्रशासनिक रिपोर्ट आदि) को हिन्दी और अंग्रेज़ी दोनों में एकसाथ (simultaneouly) जारी करने का स्पष्ट आदेश देती है। इस धारा में केवल अंग्रेज़ी में दस्तावेज़ जारी करने की कोई अनुमति या अपवाद प्रावधान नहीं है, अतः केवल अंग्रेज़ी में जारी भर्ती अधिसूचनाएँ विधिक रूप से अवैध एवं अमान्य हैं।

* राजभाषा नियम, 1976 के नियम 2, 5, 8(1), 9, 10  व  11 , जो संघीय कार्यालयों में हिन्दी के अनिवार्य प्रयोग को सुनिश्चित करते हैं,

* भारत सरकार की “जनसंपर्क” नीति के अंतर्गत राजभाषा प्रयोग हेतु जारी सभी निर्देश, जो जनता तक सूचना की समान एवं भाषिक रूप से न्यायसंगत पहुँच सुनिश्चित करने पर जोर देते हैं।

भारतीय सेना द्वारा केवल अंग्रेज़ी में सूचना प्रसारित करना न केवल बहुसंख्यक भारतीयों के संवैधानिक अधिकारों (अनुच्छेद 343-351 के तहत राजभाषा हिन्दी की गरिमा एवं समानता का अधिकार) का उल्लंघन है, बल्कि यह स्वतंत्र भारत में अस्वीकार्य भाषाई उपनिवेशवाद का प्रतीक है। इससे सेना की छवि एक अभिजात्य संस्था की बन रही है, जो अनुचित है, सेना में हर वर्ग के लोग हैं फिर अंग्रेजी को प्राथमिकता व प्रधानता क्यों दी जा रही है।

आपसे सविनय अनुरोध है कि इस भाषाई भेदभाव एवं राजभाषा उल्लंघन को तत्काल समाप्त करने हेतु निम्नलिखित कार्रवाई की जाए:

1.  वेबसाइट के होमपेज पर राजभाषा को प्राथमिकता दी जाए और  भारतीय सेना को निर्देश दिए जाएँ कि सभी भर्ती अधिसूचनाएँ, दिशा-निर्देश और सूचनाएँ हिन्दी व अंग्रेज़ी दोनों भाषाओं में अनिवार्य रूप से एकसाथ जारी की जाएँ, तथा अन्य प्रमुख क्षेत्रीय भाषाओं में भी अनुवाद उपलब्ध कराया जाए।

2. वेबसाइट पर उपलबध सभी आवेदन, फार्म आदि को पूर्ण रूप से नियम 11 के अनुसार द्विभाषिक बनाया जाए, जिसमें पंजीकरण फॉर्म, आवेदन प्रक्रिया, दिशा-निर्देश एवं सभी सूचनाएँ हिन्दी को आगे रखते हुए द्विभाषी(डिगलॉट) प्रारूप में उपलब्ध हों, ताकि भाषिक बाधा से कोई युवा वंचित न रहे।  

3. भविष्य की सभी अधिसूचनाओं को राजभाषा नियमों के पूर्ण अनुपालन में तैयार करना अनिवार्य किया जाए। पिछली केवल-अंग्रेज़ी अधिसूचनाओं को शीघ्र हिन्दी में अनुदित कर पुनः जारी करने का निर्देश दिया जाए।

4. व्हाट्सएप, फेसबुक आदि सामाजिक माध्यमों पर सभी नवीनतम जानकारियाँ हिन्दी को प्राथमिकता देते हुए द्विभाषी रूप में जारी करने का निर्देश दें और भाषाई भेदभाव पर रोक लगाएँ।

आपके द्वारा इस गंभीर राजभाषा उल्लंघन और भाषाई भेदभाव को तत्काल संज्ञान में लेते हुए शीघ्रतम एवं ठोस कार्रवाई की अपेक्षा करता हूँ। यदि इस पर समयबद्ध कदम नहीं उठाया गया, तो मुझे उच्च न्यायालय में जनहित याचिका या अन्य उपयुक्त कानूनी मंच पर जाने के लिए बाध्य होना पड़ेगा।

भवदीय,
अभिषेक कुमार
ग्राम सुल्तानगंज, तहसील बेगमगंज,
जिला रायसेन, मध्यप्रदेश – 464570

प्रतिलिपि:

1. माननीय केंद्रीय रक्षा मंत्री, भारत सरकार

2. माननीय केंद्रीय गृह मंत्री, भारत सरकार

3. सचिव, संसदीय राजभाषा समिति

4. मुख्य सचिव, रक्षा मंत्रालय, भारत सरकार (तत्काल कार्रवाई हेतु)

5. अध्यक्ष, संघ लोक सेवा आयोग (संबंधित भर्ती प्रक्रियाओं में राजभाषा अनुपालन हेतु)

पश्चिम रेलवे द्वारा मानव तस्करी विरोधी क्षमता निर्माण कार्यशाला का आयोजन

महिलाओं एवं बच्चों की सुरक्षा हेतु इंटर-एजेंसी कोऑर्डिनेशन को सुदृढ़ करने पर विशेष जोर

मुंबई। पश्चिम रेलवे द्वारा 15 दिसंबर, 2025 को मानव तस्करी विरोधी विषय पर एक क्षमता निर्माण कार्यशाला का आयोजन किया गया। यह कार्यशाला महिलाओं एवं बच्चों की सुरक्षाबचावपुनर्वास तथा उन्हें उनके परिवारों से पुनर्मिलन सुनिश्चित करने पर केंद्रित थी। यह पहल रेलवे परिसरों को अधिक सुरक्षितसंवेदनशील एवं मानवीय बनाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है।

पश्चिम रेलवे के मुख्य जनसंपर्क अधिकारी श्री विनीत अभिषेक द्वारा जारी एक प्रेस विज्ञप्ति के अनुसारइस क्षमता निर्माण कार्यशाला का आयोजन रेलवे सुरक्षा बल (RPF), पश्चिम रेलवे द्वारा राष्ट्रीय महिला आयोग (NCW) के सहयोग से संयुक्त रूप से किया गया।

इस कार्यशाला में राष्ट्रीय महिला आयोगनई दिल्ली की अध्यक्षा श्रीमती विजया किशोर रहाटकरपश्चिम रेलवे के महाप्रबंधक श्री विवेक कुमार गुप्तामुंबई पुलिस की उपायुक्त श्रीमती रागसुधा आर. (IPS); वरिष्ठ सलाहकार श्रीमती निशिता दुबेरेलवे सुरक्षा बल के महानिरीक्षक-सह-प्रमुख मुख्य सुरक्षा आयुक्त श्री अजय सदानीपश्चिम रेलवेमुंबई सेंट्रल मंडल के मंडल रेल प्रबंधक श्री पंकज सिंह सहित पश्चिम रेलवे के वरिष्ठ अधिकारीकर्मचारी तथा विशिष्ट संसाधन व्यक्ति उपस्थित थे।

कार्यशाला का उद्देश्य रेलवे स्टेशनों एवं ट्रेनों जैसे संवेदनशील स्थानों पर मानव तस्करी की रोकथाम के प्रति जागरूकता बढ़ानाविभिन्न एजेंसियों के बीच समन्वय को सुदृढ़ करना तथा त्वरित एवं संवेदनशील प्रतिक्रिया तंत्र विकसित करना था। कार्यशाला में दो तकनीकी सत्र आयोजित किए गए। सत्र-का विषय मानव तस्करी के आयामकानून एवं प्रवर्तन एजेंसियों की भूमिका” थाजबकि सत्र-2 “मानव तस्करी नेटवर्क को बाधित करने हेतु इंटर-सेक्टोरल कन्वर्जेंस को सुदृढ़ करना विषय पर केंद्रित था। दोनों सत्रों के उपरांत संबंधित विषयों पर विस्तृत चर्चा की गई।

राष्ट्रीय महिला आयोग की अध्यक्षा श्रीमती विजया किशोर रहाटकर ने अपने संबोधन में रेलवे परिसरों में मानव तस्करी की रोकथाम एवं महिलाओं की सुरक्षा व्यवस्था को सुदृढ़ करने हेतु पश्चिम रेलवे द्वारा किए जा रहे सतत प्रयासों की सराहना की। उन्होंने भारतीय रेलजिसमें पश्चिम रेलवे भी शामिल हैकी मेरी सहेली” पहल की विशेष रूप से प्रशंसा की। यह एक समर्पित सुरक्षा कार्यक्रम हैजिसके अंतर्गत महिला रेलवे सुरक्षा बल (RPF) टीमें अकेली यात्रा कर रही महिला यात्रियों को सुरक्षामार्गदर्शन एवं सहायता प्रदान करती हैं। उन्होंने कहा कि इस प्रकार की पहलें महिला यात्रियों में विश्वास एवं आत्मविश्वास को बढ़ाती हैं तथा रेल यात्रा को अधिक सुरक्षितसमावेशी एवं महिला-अनुकूल बनाती हैं।

श्रीमती रहाटकर ने आगे रेलवे स्टेशनों पर कार्यरत सहायकों (कुलियों)हाउसकीपिंग स्टाफ एवं अन्य फ्रंटलाइन ग्राउंड स्टाफ के नियमित प्रशिक्षण एवं संवेदनशीलता बढ़ाने की आवश्यकता पर भी बल दिया। उन्होंने कहा कि चौबीसों घंटे कार्यरत ये कर्मचारी प्रायः यात्रियों के प्रथम संपर्क बिंदु होते हैं और खोए हुएघर से भागे हुए अथवा सहायता की आवश्यकता वाले बच्चोंविशेषकर बालिकाओं की शीघ्र पहचान में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैंजिससे स्टेशनों पर सुरक्षा एवं प्रतिक्रिया तंत्र और अधिक मजबूत हो सकता है।

सभा को संबोधित करते हुए पश्चिम रेलवे के महाप्रबंधक श्री विवेक कुमार गुप्ता ने कहा कि रेलवे केवल परिवहन का माध्यम नहींबल्कि समाज से सीधे जुड़ा एक महत्वपूर्ण सार्वजनिक तंत्र है। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि महिलाओं एवं बच्चों की सुरक्षा सुनिश्चित करना रेलवे की सामाजिक जिम्मेदारी का अभिन्न अंग हैजिसके लिए सतर्कतासंवेदनशीलता तथा सशक्त मल्टी-एजेंसी कोऑर्डिनेशन आवश्यक है।

कार्यशाला के दौरान पश्चिम रेलवे द्वारा नन्हे फरिश्ते” एवं ऑपरेशन डिग्निटी” अभियानों के अंतर्गत किए गए प्रयासों की जानकारी भी साझा की गई। पिछले दो वर्षों में कुल 1,573 बच्चोंजिसमें वर्ष 2024 के दौरान 842 बच्चे तथा वर्ष 2025 (अब तक) 731 बच्चे शामिल हैंको असुरक्षित परिस्थितियों से बचाकर पुनर्वासित किया गया तथा उनके परिवारों से पुनर्मिलन सुनिश्चित किया गया है। इसके अतिरिक्तचाइल्ड हेल्प डेस्क स्थापित किए गए हैंजिनका संचालन संबंधित राज्य सरकारों एवं जिला बाल संरक्षण अधिकारियों के सहयोग से प्रभावी रूप से किया जा रहा है।

पश्चिम रेलवेरेलवे सुरक्षा बल एवं राष्ट्रीय महिला आयोग महिलाओं एवं बच्चों की सुरक्षा सुनिश्चित करनेमानव तस्करी की रोकथाम तथा मानवीय मूल्यों की रक्षा हेतु प्रशिक्षणजागरूकता एवं इंटर-एजेंसी कोऑर्डिनेशन को और अधिक सुदृढ़ करने के लिए प्रतिबद्ध हैं।