Home Blog Page 4

आधुनिक संदर्भों पिता-पुत्र संस्कृति को नया आयाम दे

राष्ट्रीय पुत्र दिवस: 4 मार्च, 2026

राष्ट्रीय पुत्र दिवस, जो प्रतिवर्ष 4 मार्च को मनाया जाता है, केवल एक पिता-पुत्र संस्कृति को जीवंतता देने का ही उत्सव नहीं है, बल्कि भारतीय परिवार व्यवस्था की आत्मा को स्पर्श करने वाला अवसर है। यह दिन हमें स्मरण कराता है कि पुत्र केवल परिवार की वंश परंपरा का वाहक नहीं, बल्कि संस्कारों, उत्तरदायित्वों और सांस्कृतिक चेतना का जीवंत प्रतिनिधि है। आधुनिक समय में जब संयुक्त परिवार बिखर रहे हैं, पीढ़ियों के बीच संवाद कम हो रहा है और विशेष रूप से पिता और पुत्र के बीच मानसिक दूरी बढ़ती जा रही है, तब यह दिवस एक गहन आत्ममंथन का अवसर बन जाता है। भारतीय चिंतन में पुत्र का अर्थ केवल जन्म से जुड़ा नहीं है। शास्त्रों में कहा गया है-“पुंनाम्नो नरकाद् यः त्रायते सः पुत्रः” अर्थात जो कुल और संस्कृति को पतन से बचाए वही सच्चा पुत्र है। इस परिभाषा में पुत्र को एक उत्तरदायी व्यक्तित्व के रूप में देखा गया है, जो अपने आचरण से परिवार की मर्यादा और मूल्यों की रक्षा करता है।

हमारे इतिहास और पुराणों में ऐसे अनेक उदाहरण मिलते हैं जिन्होंने पुत्र धर्म को सर्वोच्च आदर्श के रूप में स्थापित किया। भगवान श्रीराम का जीवन इसका सर्वोत्तम उदाहरण है। जब राजा दशरथ ने परिस्थितिवश उन्हें चौदह वर्ष का वनवास दिया, तब श्रीराम ने बिना किसी विरोध, बिना किसी आक्रोश के पिता की आज्ञा को धर्म मानकर स्वीकार किया। यह केवल आज्ञापालन नहीं था, बल्कि परिवार और वचन की मर्यादा को सर्वोपरि रखने का संदेश था। श्रीराम ने यह सिद्ध किया कि अधिकारों से पहले कर्तव्य आते हैं और व्यक्तिगत सुख से ऊपर परिवार की प्रतिष्ठा होती है। आज का युग अधिकारों की चर्चा करता है, परंतु कर्तव्यों का स्मरण कम होता है। यही कारण है कि पिता-पुत्र संबंधों में संवाद का अभाव दिखाई देता है। पिता अक्सर अपने उत्तरदायित्वों की दौड़ में व्यस्त है और पुत्र प्रतिस्पर्धा और अपेक्षाओं के दबाव में उलझा हुआ है। दोनों के बीच भावनाओं का पुल कमजोर होता जा रहा है। ऐसे में राष्ट्रीय पुत्र दिवस हमें यह अवसर देता है कि हम इस दूरी को कम करें। पुत्र को केवल आर्थिक साधन या भौतिक सुविधाएँ नहीं चाहिए, उसे चाहिए समय, स्नेह और समझ। जब पिता अपने पुत्र के साथ बैठकर उसके सपनों, उसके डर, उसकी असफलताओं और उसकी आकांक्षाओं पर खुलकर बात करता है, तब संबंधों में विश्वास का संचार होता है। यही विश्वास भविष्य की मजबूत नींव बनता है।

आधुनिक संदर्भ में पुत्र के सामने चुनौतियाँ भी नई हैं। करियर की अनिश्चितता, सोशल मीडिया का प्रभाव, मानसिक तनाव और मूल्य भ्रम उसे अक्सर द्वंद्व में डाल देते हैं। समाज ने लड़कों से अपेक्षा की है कि वे कठोर बनें, अपनी भावनाएँ न प्रकट करें, हर परिस्थिति में मजबूत दिखें। परिणामस्वरूप कई बार वे भीतर से अकेले और दबावग्रस्त हो जाते हैं। राष्ट्रीय पुत्र दिवस इस मानसिक स्वास्थ्य के विषय को भी छूता है। यह माता-पिता को प्रेरित करता है कि वे अपने पुत्र से पूछें-“तुम सच में कैसा महसूस कर रहे हो?” यह एक साधारण प्रश्न नहीं, बल्कि संवेदनशीलता की शुरुआत है। जब पुत्र को यह अनुभव होता है कि वह सुना जा रहा है, समझा जा रहा है, तब उसका आत्मविश्वास बढ़ता है। भारतीय संस्कृति में पिता केवल अनुशासन का प्रतीक नहीं, बल्कि आदर्श का आधार रहा है। पुत्र वही सीखता है जो वह अपने पिता के आचरण में देखता है। यदि पिता सत्यनिष्ठ है, तो पुत्र में भी सत्य के प्रति सम्मान विकसित होगा। यदि पिता संयमी और धैर्यवान है, तो पुत्र भी वही गुण आत्मसात करेगा। इसलिए पिता की भूमिका केवल निर्देश देने की नहीं, बल्कि उदाहरण प्रस्तुत करने की है। श्रीराम ने केवल दशरथ की आज्ञा का पालन नहीं किया, बल्कि रघुकुल की उस परंपरा को जीवित रखा जिसमें वचन और मर्यादा सर्वोपरि मानी जाती थी। यह परंपरा केवल अतीत की कहानी नहीं, बल्कि वर्तमान की आवश्यकता है।

भारतीय लोक-स्मृति में श्रवण कुमार पुत्र धर्म के सर्वाेच्च प्रतीक माने जाते हैं। उन्होंने अपने नेत्रहीन माता-पिता को कंधों पर बिठाकर तीर्थयात्रा कराते हुए यह सिद्ध किया कि सेवा केवल कर्तव्य नहीं, प्रेम का उत्कर्ष है। आधुनिक युग में यद्यपि परिस्थितियाँ बदल गई हैं, जीवन की गति तेज हो गई है और करियर की चुनौतियाँ अधिक जटिल हो गई हैं, फिर भी श्रवण का आदर्श अप्रासंगिक नहीं हुआ; बल्कि वह और अधिक आवश्यक हो गया है। आज के पुत्र का दायित्व है कि वह माता-पिता के साथ भावनात्मक रूप से जुड़ा रहे, उनसे संवाद बनाए रखे और उनकी आवश्यकताओं को समझे। सेवा का अर्थ अब केवल शारीरिक श्रम नहीं, बल्कि समय देना, उनकी बात सुनना, उनके एकाकीपन को समझना और उनके आत्मसम्मान की रक्षा करना है। भौतिक आकांक्षाओं की अंधी दौड़ में यदि माता-पिता उपेक्षित हो जाएँ, तो सफलता खोखली हो जाती है। त्याग का अर्थ यह नहीं कि करियर छोड़ दिया जाए, बल्कि यह है कि प्राथमिकताओं में परिवार को स्थान दिया जाए-व्यस्त दिनचर्या में भी नियमित संवाद, स्वास्थ्य का ध्यान, आवश्यक सहयोग और निर्णयों में उनकी भागीदारी सुनिश्चित की जाए। आधुनिक पुत्र अपने पेशेवर जीवन की चुनौतियों को स्वीकार करते हुए भी पारिवारिक जिम्मेदारियों का संतुलित निर्वाह कर सकता है, यदि वह अपने भीतर यह भाव जागृत रखे कि माता-पिता उसके अस्तित्व की जड़ हैं। जब करियर और कर्तव्य के बीच संतुलन स्थापित होता है, तब श्रवण की सेवा-भावना आधुनिक जीवन में जीवंत हो उठती है और पुत्र धर्म केवल कथा नहीं, व्यवहार बन जाता है।

पुत्र की भूमिका भी उतनी ही महत्वपूर्ण है। आधुनिक स्वतंत्रता का अर्थ यह नहीं कि वह परिवार से विमुख हो जाए। सच्ची स्वतंत्रता वही है जिसमें व्यक्ति अपनी जड़ों से जुड़ा रहे और अपने मूल्यों का सम्मान करे। पुत्र यदि अपने करियर में सफल होता है परंतु परिवार से दूर हो जाता है, तो वह सफलता अधूरी रह जाती है। परिवार की शक्ति केवल आर्थिक समृद्धि में नहीं, बल्कि भावनात्मक एकता में है। जब पुत्र अपने माता-पिता के त्याग और संघर्ष को समझता है, उनका सम्मान करता है और वृद्धावस्था में उनका सहारा बनता है, तब वह पुत्र धर्म का वास्तविक निर्वाह करता है। पुत्र केवल परिवार की आशा नहीं, राष्ट्र की संभावना भी है। इतिहास गवाह है कि जब-जब युवाओं ने अपने कर्तव्यों को पहचाना, तब-तब समाज में परिवर्तन आया। आज आवश्यकता है कि पुत्र संस्कृति को राष्ट्र निर्माण से जोड़ा जाए। एक संस्कारवान पुत्र ही आदर्श नागरिक बन सकता है। यदि परिवार में सत्य, सेवा और संयम के मूल्य विकसित होंगे, तो वही मूल्य समाज में भी प्रसारित होंगे। इस प्रकार पुत्र का निर्माण केवल निजी विषय नहीं, सामाजिक उत्तरदायित्व भी है।

आज जब वैश्वीकरण और भौतिकता का प्रभाव बढ़ रहा है, तब परंपरा और आधुनिकता के बीच संतुलन आवश्यक है। पुत्र को आधुनिक ज्ञान, तकनीकी दक्षता और वैश्विक दृष्टि मिलनी चाहिए, परंतु उसके भीतर भारतीयता की जड़ें भी गहरी हों। यदि वह विज्ञान में आगे बढ़े परंतु संस्कृति से कट जाए, तो विकास अधूरा रहेगा। यदि वह परंपरा में बंधा रहे और नवीनता को अस्वीकार करे, तो प्रगति रुक जाएगी। इसलिए संतुलन ही समाधान है। यही संतुलन पुत्र संस्कृति को नया आयाम दे सकता है। राष्ट्रीय पुत्र दिवस को संवाद और संकल्प का दिवस बनाएं। जब पिता का अनुभव और पुत्र का उत्साह मिलते हैं, तब परिवार सशक्त होता है। सशक्त परिवार ही सशक्त समाज और सशक्त राष्ट्र की आधारशिला है। हम अपने पुत्रों को केवल सफल नहीं, सार्थक बनाएं। उन्हें केवल ऊँचाई न दें, गहराई भी दें, केवल स्वतंत्रता न दें, उत्तरदायित्व भी दें, केवल संसाधन न दें, संस्कार भी दें। यदि हम श्रीराम की मर्यादा, श्रवण की सेवा भावना और आधुनिक युग की वैज्ञानिक दृष्टि को एक सूत्र में पिरो दें, तो ऐसा पुत्र तैयार होगा जो परंपरा का रक्षक और भविष्य का निर्माता दोनों होगा। यही पुत्र संस्कृति का नवोदय है, यही भारतीय परिवार व्यवस्था की शक्ति है और यही राष्ट्रीय पुत्र दिवस का सच्चा संदेश है।

(ललित गर्ग)


लेखक, पत्रकार, स्तंभकार
ई-253, सरस्वती कंुज अपार्टमेंट
25 आई॰ पी॰ एक्सटेंशन, पटपड़गंज, दिल्ली-110092
मो. 9811051133

ब्रिटिश महिला यात्री औॅर लेखिका फेनी पार्क्स की यात्रा-डायरी, 19 वीं सदी के भारत का एक जीवंत दस्तावेज है

फेनी पार्क्स की यात्रा-डायरी 19वीं सदी के भारत को समझने का एक महत्वपूर्ण स्रोत है। इसमें भारतीय समाज की विविधता, धार्मिक आस्था, सांस्कृतिक परंपराएँ, शाही जीवन और प्राकृतिक सौंदर्य का जीवंत चित्रण मिलता है। साथ ही उनकी टिप्पणियाँ यह भी दर्शाती हैं कि उस समय के यूरोपीय यात्रियों की दृष्टि से भारत को कैसे देखा और समझा गया। इस प्रकार फेनी पार्क्स का लेखन केवल यात्रा-वृत्तांत ही नहीं बल्कि भारत के सामाजिक और सांस्कृतिक इतिहास का एक महत्वपूर्ण दस्तावेज भी है।

Fanny Parkes (1794–1875) एक ब्रिटिश महिला यात्री और लेखिका थीं, जिन्होंने लगभग 1822 से 1846 तक भारत में रहकर यहाँ के समाज, संस्कृति, धर्म और प्रकृति को बहुत करीब से देखा। उन्होंने अपने अनुभवों को विस्तृत रूप से अपनी यात्रा-डायरी में लिखा, जो बाद में पुस्तकों के रूप में प्रकाशित हुईं। उनके लेखन का एक चर्चित संदर्भ Begums, Thugs and White Mughals जैसे संकलनों में भी मिलता है।

फेनी पार्क्स का लेखन इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि इसमें 19वीं सदी के भारत का प्रत्यक्ष चित्रण मिलता है। उन्होंने भारत की कई परंपराओं और सांस्कृतिक पहलुओं की प्रशंसा की, लेकिन कुछ सामाजिक परिस्थितियों की आलोचना भी की।

भारत पहुँचने के बाद फेनी पार्क्स को यहाँ की सांस्कृतिक विविधता ने सबसे अधिक प्रभावित किया। उन्होंने देखा कि हर प्रदेश की भाषा, पहनावा और परंपराएँ अलग हैं। उनके अनुसार भारत वास्तव में “आश्चर्यों की भूमि” है जहाँ हर क्षेत्र में नई संस्कृति देखने को मिलती है।

उन्होंने अपने यात्रा-वृत्तांत में कई प्रमुख शहरों का वर्णन किया—जैसे Kolkata, Kanpur, Lucknow, Varanasi और Agra। इन स्थानों पर उन्होंने भारतीय समाज के अलग-अलग रूपों को देखा और उनका विस्तार से वर्णन किया।

फेनी पार्क्स भारतीय त्योहारों की रंगीनता और उत्साह से बहुत प्रभावित थीं। उन्होंने विशेष रूप से Holi और Diwali का वर्णन किया। उनके अनुसार इन त्योहारों में पूरा समाज मिलकर आनंद मनाता है। रंगों, संगीत और दीपों से सजी हुई गलियों का दृश्य उन्हें अत्यंत आकर्षक लगा।

भारत की धार्मिक आस्था का सबसे प्रभावशाली उदाहरण उन्हें गंगा के किनारे देखने को मिला। उन्होंने लिखा कि हजारों लोग प्रतिदिन गंगा में स्नान करते हैं और इसे पवित्र मानते हैं। घाटों पर होने वाली पूजा और आरती ने उन्हें भारत की गहरी आध्यात्मिक परंपरा का अनुभव कराया।

भारत में रहते हुए फेनी पार्क्स को कई शाही दरबार देखने का अवसर मिला। विशेष रूप से लखनऊ के नवाबी दरबारों का वर्णन उन्होंने बड़े उत्साह से किया। उन्होंने लिखा कि महलों की सजावट, दरबार की शान और वहाँ होने वाले संगीत तथा नृत्य कार्यक्रम अत्यंत भव्य थे। इन दरबारों में कला और साहित्य को विशेष महत्व दिया जाता था।
महलों के अंदर रहने वाली बेगमों के जीवन और पर्दा प्रथा के बारे में भी उन्होंने अपने अनुभव लिखे।

भारत की यात्राओं में फेनी पार्क्स ने कई अनोखे अनुभव किए। उन्होंने हाथी और ऊँट की सवारी की, जंगलों की यात्रा की और भारतीय प्रकृति की विविधता को करीब से देखा। उन्होंने लिखा कि भारत के जंगल, नदियाँ और वन्य जीव अत्यंत सुंदर और अद्भुत हैं। हाथी, बाघ और अन्य पशुओं का वर्णन उन्होंने अपनी डायरी में उत्साह के साथ किया।

फेनी पार्क्स ने भारतीय विवाह समारोहों को भी बहुत रोचक बताया। उन्होंने लिखा कि विवाह केवल दो व्यक्तियों का नहीं बल्कि पूरे परिवार और समाज का उत्सव होता है। दूल्हे की बारात, रंगीन वस्त्र, संगीत और अग्नि के सामने होने वाले वैदिक मंत्र उनके लिए बिल्कुल नया अनुभव था।

हालाँकि फेनी पार्क्स भारत की संस्कृति से प्रभावित थीं, लेकिन उन्होंने कुछ आलोचनात्मक टिप्पणियाँ भी कीं।उन्होंने कुछ शहरों की स्वच्छता व्यवस्था को यूरोप की तुलना में कम व्यवस्थित बताया। इसके अलावा उन्होंने जाति व्यवस्था, महिलाओं की सीमित सामाजिक स्वतंत्रता और कुछ धार्मिक प्रथाओं को लेकर भी प्रश्न उठाए। उन्होंने यात्राओं के दौरान सुनी घटनाओं के आधार पर उस समय के कुख्यात गिरोह Thuggee का भी उल्लेख किया और यात्रियों की सुरक्षा को लेकर चिंता व्यक्त की।

फेनी पार्क्स का लेखन इतिहासकारों के लिए बहुत महत्वपूर्ण माना जाता है। उनके यात्रा-वृत्तांत से 19वीं सदी के भारत का सामाजिक और सांस्कृतिक जीवन समझने में मदद मिलती है।

हालाँकि यह भी ध्यान रखना आवश्यक है कि उनके विचार एक विदेशी यात्री के व्यक्तिगत अनुभव और ब्रिटिश औपनिवेशिक दृष्टिकोण से प्रभावित थे। इसलिए उनके लेखन को उस ऐतिहासिक संदर्भ में समझना चाहिए।

फेनी पार्क्स की डायरी भारत के इतिहास का एक रोचक दस्तावेज है। इसमें भारतीय संस्कृति, त्योहार, धार्मिक आस्था, शाही जीवन, प्रकृति और सामाजिक परंपराओं का जीवंत चित्रण मिलता है। साथ ही उनकी टिप्पणियाँ उस समय के ब्रिटिश दृष्टिकोण और भारतीय समाज की परिस्थितियों को समझने में भी सहायक हैं।

19वीं सदी का भारत राजनीतिक, सामाजिक और सांस्कृतिक परिवर्तन के दौर से गुजर रहा था। इस समय अनेक यूरोपीय यात्रियों, अधिकारियों और लेखकों ने भारत के बारे में अपने अनुभव लिखे। इन्हीं में से एक महत्वपूर्ण नाम है Fanny Parkes का। फेनी पार्क्स एक ब्रिटिश महिला यात्री और लेखिका थीं जिन्होंने लगभग 1822 से 1846 तक भारत में रहकर यहाँ के समाज, संस्कृति और जीवन को बहुत करीब से देखा।

उन्होंने अपने अनुभवों को विस्तार से अपनी यात्रा-डायरी में लिखा। उनकी डायरी के आधार पर बाद में कई पुस्तकें और लेख प्रकाशित हुए, जिनमें भारतीय समाज, परंपराओं और जीवन के अनेक पहलुओं का वर्णन मिलता है। उनके अनुभवों को समझने में Begums, Thugs and White Mughals जैसे ग्रंथों में भी संदर्भ मिलता है।

फेनी पार्क्स की यात्रा-वृत्तांत इसलिए महत्वपूर्ण माने जाते हैं क्योंकि वे 19वीं सदी के भारत का प्रत्यक्ष विवरण प्रस्तुत करते हैं। उनके लेखन में एक ओर भारत की संस्कृति और परंपराओं की प्रशंसा है, तो दूसरी ओर कुछ सामाजिक परिस्थितियों की आलोचना भी दिखाई देती है।

फेनी पार्क्स अपने पति के साथ भारत आई थीं, जो ईस्ट इंडिया कंपनी की सेवा में थे। भारत आने के बाद उन्होंने देश के विभिन्न क्षेत्रों की यात्राएँ कीं और अपने अनुभवों को विस्तार से दर्ज किया।

उनकी यात्राओं में प्रमुख रूप से Kolkata, Kanpur, Lucknow, Varanasi और Agra जैसे शहर शामिल थे।

इन यात्राओं के दौरान उन्होंने भारतीय समाज के विभिन्न पहलुओं—जैसे धार्मिक जीवन, शाही दरबार, ग्रामीण जीवन, व्यापारिक गतिविधियाँ और प्राकृतिक सौंदर्य—का विस्तृत वर्णन किया। उनके लेखन में भारत की भौगोलिक और सांस्कृतिक विविधता का जीवंत चित्रण मिलता है।

फेनी पार्क्स भारत की सांस्कृतिक विविधता से अत्यंत प्रभावित थीं। उन्होंने लिखा कि भारत में प्रत्येक प्रदेश की अपनी भाषा, पहनावा और सामाजिक परंपराएँ हैं। उनके अनुसार भारत वास्तव में “आश्चर्यों की भूमि” है, जहाँ हर क्षेत्र में नई संस्कृति देखने को मिलती है।

भारत के बाजार, हस्तशिल्प, वस्त्र और आभूषणों की विविधता ने भी उन्हें प्रभावित किया। उन्होंने भारतीय बाजारों को अत्यंत जीवंत और रंगीन बताया। मसालों की सुगंध, रंग-बिरंगे वस्त्र और हस्तनिर्मित वस्तुएँ उनके लिए आकर्षण का केंद्र थीं।

भारतीय धार्मिक जीवन का सबसे प्रभावशाली अनुभव उन्हें गंगा के किनारे देखने को मिला। उन्होंने वाराणसी के घाटों पर होने वाले धार्मिक अनुष्ठानों, पूजा-पाठ और तीर्थयात्रियों की भीड़ का विस्तृत वर्णन किया।

उनके अनुसार गंगा केवल एक नदी नहीं बल्कि भारतीयों की आस्था और आध्यात्मिकता का प्रतीक है। हजारों लोग प्रतिदिन गंगा में स्नान करते हैं और इसे पवित्र मानते हैं।

इसके अलावा उन्होंने भारतीय त्योहारों का भी उल्लेख किया। विशेष रूप से Holi और Diwali के उत्सव ने उन्हें बहुत प्रभावित किया। इन त्योहारों में रंग, संगीत और सामूहिक आनंद का वातावरण उन्हें अत्यंत आकर्षक लगा।

भारत में रहते हुए फेनी पार्क्स को कई शाही दरबारों को देखने का अवसर मिला। विशेष रूप से Lucknow के नवाबी दरबारों का वर्णन उन्होंने बड़े उत्साह से किया।
उन्होंने लिखा कि महलों की भव्यता, दरबार की शान और वहाँ होने वाले संगीत तथा नृत्य कार्यक्रम अत्यंत आकर्षक थे। दरबारों में कला, साहित्य और संगीत को विशेष महत्व दिया जाता था। महलों में रहने वाली बेगमों के जीवन, पर्दा प्रथा और शाही परंपराओं का भी उन्होंने अपने लेखन में उल्लेख किया।

भारत की प्राकृतिक सुंदरता ने फेनी पार्क्स को अत्यंत प्रभावित किया। उन्होंने जंगलों, नदियों और पहाड़ियों का विस्तृत वर्णन किया। उन्होंने कई बार हाथी और ऊँट की सवारी की और ग्रामीण क्षेत्रों की यात्राएँ कीं। उनके अनुसार भारत का प्राकृतिक वातावरण अत्यंत विविध और आकर्षक है। उन्होंने वन्य जीवों—जैसे हाथी और बाघ—का भी उल्लेख किया, जो उनके लिए रोमांचक अनुभव था।

हालाँकि फेनी पार्क्स भारत की संस्कृति और परंपराओं से प्रभावित थीं, लेकिन उन्होंने कुछ आलोचनात्मक टिप्पणियाँ भी कीं। उन्होंने कुछ शहरों की स्वच्छता व्यवस्था को यूरोप की तुलना में कम व्यवस्थित बताया। इसके अलावा उन्होंने जाति व्यवस्था, महिलाओं की सीमित सामाजिक स्वतंत्रता और कुछ धार्मिक प्रथाओं पर भी टिप्पणी की।

उन्होंने यात्राओं के दौरान सुनी घटनाओं के आधार पर उस समय के कुख्यात गिरोह ठगी का भी उल्लेख किया और यात्रियों की सुरक्षा को लेकर चिंता व्यक्त की।

फेनी पार्क्स के लेखन का ऐतिहासिक महत्व इसलिए है क्योंकि यह 19वीं सदी के भारत का एक प्रत्यक्ष और विस्तृत चित्र प्रस्तुत करता है। उनके यात्रा-वृत्तांत से उस समय के भारतीय समाज, संस्कृति, धार्मिक जीवन और शाही परंपराओं के बारे में महत्वपूर्ण जानकारी मिलती है।

हालाँकि इतिहासकार यह भी मानते हैं कि उनके विचार एक विदेशी यात्री के व्यक्तिगत अनुभवों और उस समय के ब्रिटिश औपनिवेशिक दृष्टिकोण से प्रभावित थे। इसलिए उनके लेखन को पढ़ते समय उस ऐतिहासिक संदर्भ को ध्यान में रखना आवश्यक है।

मारवाड़ी सोसायटी भुवनेश्वर के होली बंधुमिलन की मुख्य आकर्षण रही मरु कोकिला सीमा मिश्रा

भुवनेश्वर। मारवाड़ी सोसायटी भुवनेश्वर ने क्रमशः होलिका दहन तथा होली बंधुमिलन समारोह का सफलतापूर्वक और विराट आयोजन स्थानीय जनता मैदान,जयदेवविहार में किया। सुबह में रंग-गुलाल का कार्यक्रम था जबकि सायंकाल प्रीतिभोज संग रंगारंग कार्यक्रम का।सच कहा जाय तो आयोजन का मुख्य उद्देश्य मारवाड़ी सोसायटी के सभी घटक संगठनों के लोगों के बीच और अधिक मेल-मिलाप को बढ़ावा एकसाथ नाश्ता-पानी और खान-पान के द्वारा किया जाय तथा सभी का भरपूर मनोरंजन हो।होली बंधुमिलन की मुख्य आकर्षण रही मरु कोकिला सीमा मिश्रा। राजस्थानी गीत-संगीत गायिका सीमा मिश्रा ने अपने एकल गायन तथा अपने साथी गायक कलाकार के साथ मिलकर अनेक राजस्थानी होली के गीत गाकर सभी का भरपूर मनोरंजन कर दिया।

उल्लेखनीय है कि चार मार्च से ही हिन्दू पंचांग के अनुसार चैत्र महीना शुरु हुआ और मरु कोकिला सीमा मिश्रा ने चैत्र माह की महत्ता को प्रेमी-प्रेमिका,पति-पत्नी के साथ जोड़कर प्रकृति के सानिध्य में आनंदमय जीवन व्यतीत करने का संदेश अपनी गायकी के माध्यम से प्रस्तुत किया। वहीं सीमा मिश्रा टोली की नृत्यांगनाओं ने अपने पांवों की थिरकन तथा अपनी भाव-भंगिमाओं से लोगों को देर रात तक बांधे रखा।सोसायटी के अध्यक्ष संजय लाठ के अनुसार उन्हें इस विराट आयोजन को सफल बनाने में समाज के सभी पदाधिकारियों,सदस्यों तथा सोसायटी के घटक संगठनों का पूर्ण सहयोग मिला।वहीं होली आयोजन कमेटी के चेयरमैन चेतन टेकरीवाल के अनुसार इस आयोजन से समाज के सभी लोगों में आपसी सौहार्द देखने को मिला।सबसे बड़ी बात तो यह रही कि इतने विराट आयोजन में कोई औपचारिकता नहीं रखी गई थी।

कार्यक्रम के अंत में सोसायटी के सभी पदाधिकारियों की उपस्थिति में मरु गायिका सीमा मिश्रा को स्मृतिचिह्न भेंटकर उन्हें सम्मानित किया गया।सबसे बड़ी बात यह देखने को मिली की सभी मेहमानों का विधिवत स्वागत सोसायटी के संरक्षक सुरेश कुमार अग्रवाल ने राजस्थानी पगड़ी,अंगवस्त्र और बैज पहनाकर किया।अवसर पर सुभाष अग्रवाल,महेन्द्र कुमार गुप्ता,सुरेन्द्र डालमिया,अजय अग्रवाल,मनसुख लाल सेठिया,शिवकुमार अग्रवाल,जितेन्द्र मोहन गुप्ता,सीए सुरेन्द्र अग्रवाल,पवन गुप्ता,सज्जन सुरेखा,राजेश अग्रवाल,सुनिल अग्रवाल,रवि गोयल,रामावतार खेमका,सुशील अग्रवाल,सुभाष भुरा,उमेश खण्डेलवाल,गजानंद शर्मा,शिवकुमार शर्मा,सीए विपिन बंका,सीए विमल भूत,राजेश केजरीवाल,विजय टिबरीवाल तथा रमेश अग्रवाल आदि उपस्थित थे।सभी ने आयोजित स्वरुचि प्रीतिभोज में हिस्सा लिया।

गुजरात के माननीय मुख्यमंत्री श्री भूपेन्द्रभाई पटेल ने ‘कवांट गेर मेला’ पर जारी किया डाक टिकट एवं विशेष आवरण

अहमदाबाद। गुजरात के मुख्यमंत्री माननीय श्री भूपेन्द्रभाई पटेल ने “कवांट गेर मेला” की सांस्कृतिक महत्ता को सम्मानित करते हुए इस पर आधारित कस्टमाइज़्ड डाक टिकट एवं विशेष आवरण 05 मार्च, 2026 को मुख्यमंत्री आवास पर जारी किया। उत्तर गुजरात सह दक्षिण गुजरात परिक्षेत्र के पोस्टमास्टर जनरल श्री कृष्ण कुमार यादव ने इस डाक टिकट एवं विशेष आवरण की प्रथम प्रति मुख्यमंत्री श्री भूपेन्द्रभाई पटेल जी को भेंट की। यह पहल राज्य की समृद्ध जनजातीय परंपराओं एवं सांस्कृतिक विरासत को राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहचान दिलाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है। इस अवसर पर छोटाउदेपुर, लोकसभा सांसद श्री जशुभाई राठवा, विधायक श्री अभेसिंह तडवी, सुश्री गार्गी जैन, कलेक्टर, प्रवर डाकघर अधीक्षक श्री आर बी ठाकोर सहित राठवा आदिवासी समुदाय के तमाम प्रतिनिधि भी उपस्थित रहे।

मुख्यमंत्री श्री भूपेन्द्रभाई पटेल ने भारतीय डाक विभाग द्वारा ‘कवांट गेर मेला’, छोटाउदेपुर, गुजरात पर आधारित डाक टिकट और विशेष आवरण जारी किये जाने की पहल की सराहना करते हुए कहा कि, यह राज्य की जनजातीय संस्कृति, कला और परंपराओं को संरक्षण देने और उन्हें आने वाली पीढ़ियों तक पहुँचाने का महत्वपूर्ण प्रयास है। ‘कवांट गेर मेला’ मात्र एक उत्सव नहीं, बल्कि एक जीवंत परंपरा है, जो प्रकृति के साथ सामंजस्य, सामाजिक समरसता और पीढ़ियों से चले आ रहे रीति-रिवाजों की अक्षुण्ण परंपरा का प्रतीक है। यह भारत की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत और भारतीय जनजातीय जन-जीवन की उदात्त अभिव्यक्ति है। मुख्यमंत्री ने कहा कि, डाक टिकटों के माध्यम से न केवल संस्कृति का संवर्धन होता है, बल्कि यह युवाओं में सांस्कृतिक जागरूकता भी पैदा करता है। इसके जरिए आदिवासी कला, संगीत और नृत्य की परंपराएँ स्थायित्व पाती हैं और आने वाली पीढ़ियाँ इस समृद्ध विरासत से जुड़ी रहती हैं। मुख्यमंत्री ने कहा कि इस तरह के प्रयास राज्य की सांस्कृतिक पहचान को मजबूत करने, समाज में सामाजिक समरसता और एकता बढ़ाने, और आदिवासी जीवन शैली एवं कलाओं की प्राचीन परंपराओं को संरक्षित करने में अत्यंत महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।

उत्तर गुजरात सह दक्षिण गुजरात परिक्षेत्र के पोस्टमास्टर जनरल श्री कृष्ण कुमार यादव ने कहा कि डाक टिकटों के माध्यम से देश की संस्कृति, कला, विरासत, इतिहास, महान विभूतियों और प्रमुख घटनाओं, ज्ञान-विज्ञान व उपलब्धियों को दर्शाया जाता है, जो संचार के साथ-साथ राष्ट्रीय गौरव और विरासत को बढ़ावा देते हैं। पोस्टमास्टर जनरल ने कहा कि, ‘कवांट गेर मेला’ पर डाक विभाग के सौजन्य से माननीय मुख्यमंत्री द्वारा जारी डाक टिकट और विशेष आवरण इस जनजातीय पर्व की समृद्ध सांस्कृतिक महत्ता को राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहचान दिलाने का माध्यम बनेगा और गुजरात की समृद्ध आदिवासी विरासत को भी समृद्ध करेगा।

छोटा उदेपुर के सांसद श्री जशुभाई राठवा ने कहा कि ‘कवांट गेर मेला’ गुजरात के छोटाउदेपुर जिले के कवांट में प्रतिवर्ष आयोजित होने वाला एक प्रसिद्ध जनजातीय सांस्कृतिक उत्सव है। इस मेले में जनजातीय महिलाएं व पुरुष बड़ी संख्या में एकत्र होकर हर्षोल्लास, श्रद्धा भक्ति और आपसी सद्भाव का अविस्मरणीय दृश्य उपस्थित करते हैं। ऐसे में माननीय मुख्यमंत्री द्वारा डाक टिकट जारी कर इसे एक नई पहचान दी गई है। उन्होंने डाक विभाग का भी इस पहल के लिए आभार व्यक्त किया।

सुश्री गार्गी जैन, कलेक्टर, छोटाउदेपुर ने बताया कि होली पर्व के तुरंत बाद आयोजित किया जाने वाला ‘कवांट गेर मेला’ राठवा आदिवासी समुदाय के रीति-रिवाजों, मान्यताओं, सांस्कृतिक परंपराओं का प्रतिबिंब है। ढोल-नगाड़ों की लयबद्ध ध्वनि, गेर नृत्य की उर्जावान जनजातीय प्रस्तुतियाँ, पारंपरिक वाद्ययंत्र, रंग-बिरंगे पारंपरिक परिधान और शरीर पर उकेरी गई सुंदर कलाकृतियाँ इस उत्सव की प्रमुख विशेषताएँ हैं। माननीय मुख्यमंत्री जी के नेतृत्व में जिला प्रशासन द्वारा की गई पहल पर भारतीय डाक विभाग द्वारा इस पर जारी डाक टिकट और विशेष आवरण इसे और भी प्रतिष्ठित बनाते हैं।

श्री अमित शाह ने जनगणना-2027 के शुभंकर “प्रगति” (महिला) और “विकास” (पुरुष) का औपचारिक अनावरण किया

दो चरणों में होने वाली जनगणना-2027 दुनिया का सबसे बड़ा जनगणना कार्य

पहली बार डिजिटल माध्यम से होगी जनगणना, साथ ही पहली बार स्व-गणना (Self-Enumeration) का विकल्प

स्व-गणना एक सुरक्षित वेब-आधारित सुविधा के माध्यम से होगी, उत्तरदाता घर-घर सर्वेक्षण से पूर्व 16 भाषाओं में अपनी जानकारी ऑनलाइन दर्ज कर सकेंगे

जनगणना-2027 के शुभंकर “प्रगति” और “विकास” 2047 में भारत को एक विकसित राष्ट्र बनाने के संकल्प को पूरा करने में महिलाओं और पुरुषों की बराबर की भागीदारी के प्रतीक

देशभर में 30 लाख से अधिक प्रगणक, पर्यवेक्षक और अन्य अधिकारी जनगणना-2027 में शामिल होंगे

नई दिल्ली। केन्द्रीय गृह एवं सहकारिता मंत्री श्री अमित शाह ने नई दिल्ली में जनगणना-2027 के लिए चार digital tools का सॉफ्ट लॉन्च और शुभंकर- “प्रगति” (महिला) और “विकास” (पुरुष) – का औपचारिक अनावरण किया। देशभर में गणना कार्यों को सुगम बनाने के लिए सेंटर फॉर डेवलपमेंट ऑफ एडवांस्ड कंप्यूटिंग (सी-डैक) ने एडवांस डिजिटल प्लेटफॉर्म विकसित किए हैं। इस अवसर पर केन्द्रीय गृह सचिव और भारत के महारजिस्ट्रार एवं जनगणना आयुक्त सहित अनेक वरिष्ठ अधिकारी उपस्थित थे।

केन्द्र सरकार द्वारा 16 जून, 2025 को राजपत्र में जनगणना-2027 की अधिसूचना जारी की गई। इसके बाद जनगणना-2027 की प्रक्रिया औपचारिक रूप से प्रारंभ हुई। दो चरणों में होने वाली जनगणना-2027 दुनिया का सबसे बड़ा जनगणना कार्य है। पहली बार जनगणना डिजिटल माध्यम से की जाएगी और साथ ही पहली बार स्व-गणना (Self-Enumeration) का विकल्प भी दिया जा रहा है।

शुभंकर “प्रगति” और “विकास”
जनगणना-2027 के शुभंकर “प्रगति” (महिला प्रगणक) और “विकास” (पुरुष प्रगणक) को मैत्रीपूर्ण और सहज प्रतीक के रूप में प्रस्तुत किया गया है। साथ ही “प्रगति” और “विकास” 2047 में भारत को एक विकसित राष्ट्र बनाने के संकल्प को पूरा करने में महिलाओं और पुरुषों की बराबर की भागीदारी के भी प्रतीक हैं। इन शुभंकरों के माध्यम से जनगणना 2027 से संबंधित जानकारी, उद्देश्य एवं प्रमुख संदेश समाज के विभिन्न वर्गों तक प्रभावी और जन-सुलभ रूप में पहुँचाए जाएंगे।

जनगणना-2027 के डिजिटल टूल्स
जनगणना-2027 भारत की पहली तकनीकी (digital) उपकरणों द्वारा संचालित जनगणना होगी। केन्द्रीय गृह एवं सहकारिता मंत्री श्री अमित शाह द्वारा सॉफ्ट लॉन्च किए गए चार digital प्लेटफॉर्म हैं:

हाउस लिस्टिंग ब्लॉक क्रिएटर (HLBC) वेब एप्लिकेशन: यह वेब-मैप एप्लिकेशन चार्ज अधिकारियों को उपग्रह चित्रों की सहायता से तकनीकी रूप से मकान सूचीकरण ब्लॉक बनाने में सक्षम बनाता है, जिससे देशभर में भौगोलिक कवरेज का मानकीकरण सुनिश्चित होता है।
HLO मोबाइल एप्लिकेशन: यह एक सुरक्षित ऑफलाइन मोबाइल एप्लिकेशन है, जिसके माध्यम से प्रगणक मकान -सूचीकरण डेटा एकत्र एवं अपलोड कर सकते हैं। केवल CMMS पोर्टल पर पंजीकृत प्रगणक ही इसका उपयोग कर सकते हैं। यह एप्लिकेशन सीधे क्षेत्र से सर्वर तक डेटा प्रेषण की सुविधा प्रदान करता है, जिससे पारंपरिक कागजी कार्य समाप्त हो जाता है। यह एंड्रॉयड एवं iOS प्लेटफॉर्म पर उपलब्ध है तथा 16 भाषाओं में संचालित किया जा सकता है।
स्व-गणना (SE) पोर्टल: पहली बार स्व-गणना का विकल्प प्रदान किया जा रहा है। यह एक सुरक्षित वेब-आधारित सुविधा है, जिसके माध्यम से पात्र उत्तरदाता घर-घर सर्वेक्षण से पूर्व अपनी जानकारी ऑनलाइन दर्ज कर सकते हैं। सफल पंजीकरण के बाद एक विशिष्ट स्व-गणना आईडी (SE ID) जारी की जाएगी। इस स्व-गणना आईडी (SE ID) को प्रगणक के साथ साझा किया जायेगा जिसके आधार पर दर्ज की गयी सूचना की प्रगणक द्वारा पुष्टि की जा सकेगी।
जनगणना प्रबंधन एवं निगरानी प्रणाली (CMMS) पोर्टल: यह एक केंद्रीकृत वेब-आधारित डिजिटल प्लेटफॉर्म है, जिसके माध्यम से जनगणना से संबंधित गतिविधियों की योजना, प्रबंधन, क्रियान्वयन और निगरानी की जाएगी। राज्य , जिला एवं तहसील स्तर के अधिकारी एकीकृत डैशबोर्ड के माध्यम से वास्तविक समय में प्रगति और कार्य-स्थिति का अवलोकन कर सकेंगे।

जनगणना-2027 में घर – घर जाकर सुरक्षित मोबाइल एप्लिकेशन का इस्तेमाल कर डेटा एकत्रित किया जाएगा और पूरी कवरेज को सुनिश्चित किया जाएगा। इसके लिए देशभर में 30 लाख से ज़्यादा प्रगणक, पर्यवेक्षक और अन्य अधिकारी जनगणना-2027 में कार्य करेंगे ।

तकनीक को ध्यान में रखकर अपनाते हुए इनोवेशन और सबको साथ लेकर चलने से यह सुनिश्चित किया जा सकेगा कि जनगणना-2027 सही, सुरक्षित और कम्प्रेहेन्सिव हो।

जनगणना-2027 दो चरणों में संपन्न होगी:
प्रथम चरण : गृह-सूचीकरण एवं आवास जनगणना (HLO)

प्रथम चरण के दौरान आवास की स्थिति एवं घरेलू सुविधाओं से संबंधित जानकारी एकत्र की जाएगी, जबकि द्वितीय चरण में देश के प्रत्येक व्यक्ति से संबंधित जनसांख्यिकीय, सामाजिक एवं आर्थिक विवरण दर्ज किए जाएंगे।

प्रथम चरण के लिए अधिसूचना 7 जनवरी 2026 को जारी की गई। मकान-सूचीकरण एवं मकान गणना 1 अप्रैल 2026 से 30 सितंबर 2026 के बीच, प्रत्येक राज्य/संघ राज्यक्षेत्र द्वारा अधिसूचित 30 दिनों की सतत अवधि में संचालित की जाएगी। घर-घर सर्वेक्षण से पूर्व 15 दिनों की वैकल्पिक स्व-गणना अवधि भी होगी।

द्वितीय चरण: जनसंख्या गणना (PE)
जनसंख्या गणना फरवरी 2027 में पूरे भारत में की जाएगी। लद्दाख संघ राज्यक्षेत्र तथा जम्मू-कश्मीर, हिमाचल प्रदेश और उत्तराखंड के हिमाच्छादित गैर-समकालिक क्षेत्रों में गणना सितंबर 2026 में संपन्न होगी। जनगणना के द्वितीय चरण में जाति संबंधित प्रश्न भी शामिल किया जाएगा।

जनगणना 2027 की संदर्भ तिथि सभी राज्यों एवं संघ राज्यक्षेत्रों के लिए 1 मार्च 2027 की मध्यरात्रि (00:00 बजे) होगी। लद्दाख तथा हिमाच्छादित गैर-समकालिक क्षेत्रों (जम्मू-कश्मीर, हिमाचल प्रदेश और उत्तराखंड) के लिए संदर्भ तिथि 1 अक्टूबर 2026 की मध्यरात्रि (00:00 बजे) होगी।

उपराष्ट्रपति द्वारा तमिल विद्वानों, विरासत और संस्कृति को समर्पित 16 प्रकाशनों का विमोचन

नई दिल्ली। उपराष्ट्रपति श्री सी. पी. राधाकृष्णन ने आज उपराष्ट्रपति भवन में सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय के प्रकाशन विभाग की ओर से प्रकाशित 16 महत्वपूर्ण पुस्तकों का विमोचन किया। ये पुस्तकें तमिल के विख्यात विद्वानों, विरासत, वास्तुकला, साहित्य एवं संस्कृति को समर्पित हैं। विमोचित पुस्तकों में से 13 तमिल भाषा पर आधारित हैं।

तमिल शीर्षकों में रामेश्वरम्, रामानुजार, नादुकल, अरिकाइमेडु, बक्थी इलक्कियाम, इयारकई वेलनमई, पजंथामिजान इसई करुविगल, तमिझागा नत्तार देवंगल, पुधिया अरिवियाल थोझिलनुतपंगल, बंकिम चंद्र चटर्जी, मदुरै मीनाक्षी अम्मन मंदिर, तंजावुर पेरुवुदयार कोइल, मणिमेगलाई और महाविद्वान मीनाक्षी सुंदरम पिल्लई शामिल हैं।

कार्यक्रम में उपराष्ट्रपति श्री सी. पी. राधाकृष्णन ने कहा कि विमोचित पुस्तकें मंदिर परंपराओं, दर्शन, साहित्य, संगीत और विज्ञान के साथ तमिल धरोहर की गहराई, विविधता और सभ्यतागत निरंतरता को दर्शाती हैं। तमिल को विश्व की सबसे प्राचीन शास्त्रीय भाषाओं में से एक बताते हुए उन्होंने इस विषय पर जोर दिया कि भारत अनेक भाषाओं की भूमि है, लेकिन साथ ही साथ उसकी आत्मा एक है। उन्होंने वैश्विक मंच पर तमिल को हमेशा सम्मान देने के लिए प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की प्रशंसा की और युवाओं से प्रतिदिन कम से कम एक घंटा पढ़ने का आग्रह करते हुए आर्थिक प्रगति के साथ-साथ सांस्कृतिक शक्ति पर भी बल दिया।

पुस्तकों के विमोचन के मौके पर अश्विनी वैष्णव ने इस अवसर को ऐतिहासिक बताया और वैश्विक स्तर पर मान्यता प्राप्त समृद्ध और प्राचीन संस्कृति वाली शास्त्रीय भाषा के तौर पर तमिल की प्रशंसा की। उन्होंने कहा कि प्रकाशन विभाग की पुस्तकें इस गौरवशाली विरासत का उत्सव मनाती हैं।

इस कार्यक्रम में डॉ. एल. मुरुगन भी उपस्थित रहे। उन्होंने तमिल संगम साहित्य के महत्त्व के बारे में बात की और ‘एक भारत श्रेष्ठ भारत’ की भावना को उजागर किया।

इस कार्यक्रम का एक मुख्य आकर्षण श्री एस. के. बोस की ओर से लिखित बंकिम चंद्र चटर्जी की पुस्तक का अंग्रेजी, हिंदी और तमिल में विमोचन था। वंदे मातरम् की 150वीं वर्षगांठ के अवसर पर प्रकाशित इस समृद्ध संस्करण में इस प्रख्यात साहित्यकार के जीवन और काल तथा भारतीय साहित्यिक आंदोलन में उनके योगदान का गहन विश्लेषण किया गया है। अंग्रेजी संस्करण में एक नया आवरण, अतिरिक्त अभिलेखीय तस्वीरें और चित्र शामिल हैं। इस आवरण को विशेष रूप से आईआईटी दिल्ली के सहयोग से एक स्टार्टअप की मदद से डिजाइन किया गया है, जिसमें समकालीन सौंदर्यशास्त्र और शास्त्रीय भावना का अद्भुत मिश्रण है। हिंदी और तमिल अनुवादों के एक साथ विमोचन से वंदे मातरम के पूजनीय रचयिता की विरासत व्यापक पाठकों तक पहुंच गई है।

रामेश्वरम्‌ पर आधारित यह पुस्तक पुराणों और साहित्यिक स्रोतों से प्राप्त दस्तावेजी संदर्भों को प्रस्तुत करती है, जिसमें रामेश्वरम मंदिर परिसर के पवित्र स्थलों, स्थापत्य कला की भव्यता, मूर्तियों और देवी-देवताओं का विशेष वर्णन किया गया है। इस पुस्तक का उद्देश्य पाठकों को मंदिर के इतिहास और आध्यात्मिक महत्व की व्यापक समझ प्रदान करना है।

भारत के वो रोमांचक खेल जो लगभग लुप्त हो चुके हैं

अनादि काल से खेल हर संस्कृति का अभिन्न अंग रहे हैं । एक स्थिर सभ्यता के निर्माण में रुचि न रखते हुए, भारत के लोगों ने खेल खेलने के लिए अवकाश का समय निकालना आवश्यक समझा। प्राचीन भारतीय खेलों के प्रमाण दर्शाते हैं कि वे नवीन, मनोरंजक और पूर्ण भागीदारी की मांग करने वाले खेल थे।

सिंधु घाटी सभ्यता में, लोग तोरण (भाला), धनुष-बाण और चक्र जैसे हथियारों से प्रतिस्पर्धा करते थे। इन बाहरी खेलों के अलावा, हमें हमेशा से ही आंतरिक खेलों का भी शौक रहा है, और हमें यह कैसे पता चला? इतिहासकारों ने गुफाओं और मंदिरों की दीवारों पर खुदे हुए आदिम बोर्ड गेम के निशान पाए हैं और हड़प्पा जैसे स्थलों पर पासे और काउंटर खोजे हैं। प्राचीन भारतीय ग्रंथों में भी विभिन्न खेलों के संदर्भ मिलते हैं।

बीते वर्षों में हम अपनी गौरवशाली खेल संस्कृति से दूर होते चले गए हैं, और भले ही हम खेलों के उज्ज्वल भविष्य की ओर बढ़ रहे हैं, फिर भी कुछ खेल समय के साथ लुप्त हो गए हैं। यहाँ कुछ प्रमुख खेलों का उल्लेख है जिन्होंने हमारे इतिहास पर अपनी छाप छोड़ी है:

कलारिपयाट्टू

कलारीपयट्टू, जिसे कलारी के नाम से भी जाना जाता है, मार्शल आर्ट का एक प्राचीन रूप है जिसकी जड़ें केरल में हैं। कलारी शब्द विभिन्न हिंदू ग्रंथों में युद्धक्षेत्र और युद्ध क्षेत्र का वर्णन करने के लिए आता है। अपने लंबे इतिहास के कारण, यह मार्शल कलाकारों के लिए एक विशिष्ट स्थान रखता है। परंपरागत रूप से, इस खेल में दो रूप शामिल हैं: उत्तरी शैली या वडक्कन कलारी, और दक्षिणी शैली या थेक्कन कलारी। समय के साथ, एक नए पैटर्न को भी मान्यता मिली है, जिसे प्राथमिक विधि या मध्य कलारी कहा जाता है, जिसका उद्देश्य दोनों शैलियों के तत्वों को जोड़ना है।

कुश्ती

कुश्ती, जिसे पहलवानी भी कहा जाता है, प्राचीन भारत में लड़ी जाने वाली कुश्ती है। इसका विकास मुगल काल में फारसी कुश्ती पहलवानी और भारतीय मल्ल-युद्ध की तकनीकों के संयोजन से हुआ। इस खेल की उत्पत्ति ईसा पूर्व पांचवीं शताब्दी में हुई थी, जहाँ इसे मल्ल-युद्ध के नाम से जाना जाता था, जिसका अर्थ है युद्ध कुश्ती।

अतिया पात्या

अतिया पाट्या, जिसे अक्सर “चालबाज़ी का खेल” कहा जाता है, दो टीमों के बीच खेला जाता है, जिसमें प्रत्येक टीम में नौ सदस्य होते हैं। यह भारत में, विशेष रूप से महाराष्ट्र में, एक लोकप्रिय खेल है। 1982 में ‘अत्या पाट्या फेडरेशन ऑफ इंडिया’ के गठन के बाद इसे राष्ट्रीय महत्व प्राप्त हुआ। भारत सरकार ने 2013 में इस फेडरेशन को मान्यता प्राप्त संगठनों की सूची में शामिल किया।

युबी लकपी

युबी लापकी, जिसका अर्थ है नारियल छीनना, एक व्यक्तिगत संपर्क खेल है जिसमें नारियल की आवश्यकता होती है। यह एक प्राचीन भारतीय खेल है जिसकी उत्पत्ति मणिपुर में हुई थी। यह एक पारंपरिक फुटबॉल खेल है जो रग्बी टूर्नामेंट से काफी मिलता-जुलता है, लेकिन दोनों का आपस में कोई संबंध नहीं है।

प्रत्येक खेल से पहले, खिलाड़ी अपने शरीर पर तेल मलते हैं ताकि वह फिसलनदार हो जाए और राजा के सामने तेल में भीगी हुई गेंद रखी जाती है। गोल करने के लिए, खिलाड़ी को गोलपोस्ट के पास जाकर तेल लगे गोल से उसके सामने से रेखा पार करनी होती है।

कंबला

कंबाला कर्नाटक में आयोजित होने वाली एक वार्षिक भैंस दौड़ है, जो नवंबर से मार्च तक चलने वाले कंबाला ऋतु के दौरान होती है। इसकी शुरुआत ग्रामीण जनता के मनोरंजन के लिए एक पारंपरिक खेल के रूप में हुई थी, जिसमें कीचड़ भरे धान के खेतों में भैंसों को चाबुक से दौड़ाया जाता था। भैंसों को रंग-बिरंगे गहनों और पीतल और चांदी के सुंदर मुकुटों से सजाया जाता है।

जल्लीकट्टू

जल्लीकट्टू तमिलनाडु में प्रचलित एक लोककथात्मक बैल-पीछा खेल है, जिसका आयोजन पोंगल के फसल उत्सव के दौरान किया जाता है। यह लगभग दो सहस्राब्दी पुराना खेल है। प्राचीन काल में इसे येरु थझुवुथल के नाम से जाना जाता था। प्रतिभागी एक निश्चित समय तक बैल की पीठ पर कूबड़ को पकड़े रहते हैं और फिर उस पर नियंत्रण पाने के लिए उसके सींगों को पकड़ लेते हैं।

इंसुक्नॉर

इंसुकनाव्र मिजोरम का एक पारंपरिक खेल है जिसमें छड़ी से धक्का देकर खेलाया जाता है। मिजो समुदाय ने खेती के थका देने वाले नियमित जीवन से राहत पाने के लिए कई खेल विकसित किए; यह उनमें से एक था। इस खेल में दो खिलाड़ी होते हैं, जो छड़ी को अपनी बाहों के नीचे पकड़कर अपने प्रतिद्वंद्वी को रिंग से बाहर धकेलने की कोशिश करते हैं।

धोपखेल

धोपखेल का आयोजन असम राज्य के वार्षिक उत्सव रंगोली बिहू के दौरान किया जाता है। इस खेल में दो टीमें होती हैं, जिसमें खिलाड़ी धोप नामक गेंद को इस तरह उछालते हैं कि वह विरोधी टीम के पाले में गिरे। यह आधुनिक थ्रो बॉल से मिलता-जुलता है और कभी-कभी इसकी तुलना कबड्डी से भी की जाती है।

पचीसी

पचीसी, जिसका अर्थ पच्चीस होता है, मध्यकालीन भारत में उत्पन्न हुआ एक क्रॉस और सर्कल का खेल है। इसके लिए एक सममित क्रॉस के आकार का बोर्ड आवश्यक होता है। खिलाड़ी के मोहरे छह या सात कौड़ियों के फेंके जाने के अनुसार बोर्ड पर चलते हैं, और ऊपर की ओर गैप वाली कौड़ियों की संख्या ही आगे बढ़ने वाले खानों की संख्या निर्धारित करती है।

चौपाद

चौपड़ या चौसर भारत में पिछले दो सहस्राब्दियों से मौजूद है। इस खेल में एक क्रॉस के आकार का बोर्ड होता है, जहाँ चार खिलाड़ी दो टीमों में खेलते हैं और प्रत्येक खिलाड़ी के पास चार मोहरे होते हैं। यह पचीसी और आधुनिक लूडो से काफी मिलता-जुलता है।

चतुरंगा

चतुरंग, जिसे आधुनिक शतरंज का पूर्ववर्ती माना जाता है, एक रणनीति का खेल है जिसकी उत्पत्ति भारत में ईसा पूर्व चौथी शताब्दी में हुई थी। खेल के सटीक नियम अज्ञात हैं, लेकिन इतिहासकारों का मानना है कि यह अपने पूर्ववर्ती शतरंज के समान था। यह 8×8 खानों वाले बिना चेक वाले बॉक्स पर खेला जाता था, जिसमें मोहरे शतरंज के समान होते थे।

अचुग्वी फान सोहलाइमुंग

त्रिपुरा राज्य में दो पुरुषों के बीच उनकी ताकत का परीक्षण करने के लिए आयोजित होने वाली कुश्ती प्रतियोगिता है। इसे त्रिपुरी भाषा (कोकबोरोक) में थ्वंगमुंग के नाम से भी जाना जाता है। लेकिन, हाल के वर्षों में, आधुनिक खेल संस्कृति के प्रभाव के कारण लोग ऐसे खेलों को छोड़ रहे हैं।

इनबुआन

इनबुआन कुश्ती का एक अन्य रूप है जिसकी उत्पत्ति 1700 के दशक की शुरुआत में मिजोरम में हुई थी। इसमें सख्त नियम होते हैं जो लात मारने, घेरे से बाहर निकलने या घुटने मोड़ने पर भी रोक लगाते हैं।

बीते वर्षों में, आधुनिक संस्कृति ने हमारी सदियों पुरानी परंपराओं पर अपना प्रभाव जमा लिया है, न केवल खेलों के संदर्भ में, बल्कि हमारी जीवनशैली में भी। आइए एक कदम पीछे हटें और उन खेलों को पुनर्जीवित करें जिन्होंने सदियों से हमारे पूर्वजों का मनोरंजन किया है।

साभार – https://thesportsschool.com/ से 

 

“ईरान–इजरायल युद्ध (२८ फरवरी २०२६) की समाप्ति-तिथि का ज्योतिषिय आकलन

कालचक्र, लग्नगति, ग्रहदृष्टि तथा सर्वतोभद्र सिद्धान्तों पर आधारित शोध”
✓•१. प्रस्तावना:
राजकीय या अन्तर्राष्ट्रीय युद्धों की समाप्ति-तिथि का निर्धारण भारतीय ज्योतिष में अत्यन्त विशिष्ट विषय है। यह केवल सामान्य फलादेश नहीं है, बल्कि इसमें कालगणित, ग्रहगति, लग्नचक्र, नक्षत्र-चक्र तथा सर्वतोभद्र वेध का संयुक्त उपयोग किया जाता है।
वराहमिहिर ने युद्धफल के विषय में स्पष्ट कहा है —
“ग्रहैः सूचितकालस्य युद्धस्य परिणामकः।
लग्नदृष्टिवशादेव कालो निश्चीयते ध्रुवम्॥”
अर्थात् ग्रहस्थिति से युद्ध का प्रारम्भ सूचित होता है, और उसकी अवधि तथा समाप्ति लग्नगति तथा ग्रहदृष्टि से निर्धारित होती है।
∆ निर्दिष्ट युद्धारम्भ-काल —
२८ फरवरी २०२६
भारतीय मान समय — ११:४०
इसी क्षण को युद्धारम्भ कुण्डली मानकर गणितीय निर्धारण किया जा रहा है।
✓•२. युद्धकाल निर्धारण का शास्त्रीय सूत्र:
पाराशरी परम्परा में युद्धकाल निर्धारण के लिए तीन प्रमुख सूत्र दिए गए हैं —
✓•(१) लग्नस्वभाव सिद्धान्त:
लग्न प्रकार युद्ध अवधि
चर अल्पकाल
स्थिर दीर्घकाल
द्विस्वभाव मध्यम
•यदि लग्न चर हो तो युद्ध शीघ्र समाप्त होता है।
✓•(२) ग्रहबल सिद्धान्त:
•युद्ध तब तक चलता है जब तक
•मंगल या शनि का प्रभाव प्रमुख रहता है।
जब
•मंगल का बल घटता है
•चन्द्रमा शुभ ग्रह से युक्त होता है
तब युद्ध समाप्ति की दिशा में जाता है।
✓•(३) नक्षत्र चक्र सिद्धान्त:
युद्ध का परिणाम प्रायः
•९ नक्षत्र चक्र में बदलता है।
•यह सिद्धान्त इस सूत्र से प्राप्त होता है —
९ / १ नक्षत्र = ९ दिन
•अर्थात् युद्ध की दिशा लगभग ९, १८ या २७ दिन में बदलती है।
✓•३. युद्धारम्भ ग्रहस्थितियाँ
∆संलग्न कुण्डली के अनुसार
ग्रह राशि
सूर्य कुम्भ
मंगल कुम्भ
बुध कुम्भ
शुक्र कुम्भ
राहु कुम्भ
गुरु मिथुन
चन्द्र कर्क
शनि मीन
यहाँ अत्यन्त महत्वपूर्ण है —
•कुम्भ में पंचग्रह संयोग
यह अत्यन्त तीव्र युद्धयोग है।
✓•४. युद्ध अवधि का गणितीय सूत्र:
प्राचीन मुहूर्तशास्त्र में युद्ध अवधि निकालने का एक सूत्र दिया गया है —
T = L/V
∆जहाँ
•T = युद्ध अवधि
•L = लग्न का चक्र (३०°)
•V = लग्नगति
∆पृथ्वी पर औसतन लग्न परिवर्तन का समय: —
१ राशि = २ घण्टे
अतः
३०° = १२० मिनट
∆युद्धकाल गणना:
यदि युद्ध चर लग्न में प्रारम्भ हुआ है तो
T = १२०÷ १/३
T ≈ ४० दिन
यह अधिकतम सीमा है।
किन्तु ग्रहबल के कारण यह अवधि और घट सकती है।
✓•५. मंगल अस्त सिद्धान्त:
कुण्डली अनुसार उल्लेख किया है कि
•मंगल सूर्य से अस्त है।
∆ज्योतिष में नियम है —
“अस्ते भौमे युद्धशान्तिः शीघ्रं भवति।”
अर्थात् जब मंगल अस्त हो तो युद्ध अधिक समय नहीं चलता।
∆मंगल का अस्त काल लगभग
१५–२० दिन
तक प्रभावी रहता है।
✓•६. चन्द्र-गुरु योग का प्रभाव:
चन्द्र और गुरु का योग शान्ति का संकेत देता है।
∆ग्रह गति के अनुसार
चन्द्र लगभग २.२५ दिन में एक राशि पार करता है। जब चन्द्र गुरु से पुनः शुभ दृष्टि बनाता है, तब कूटनीतिक वार्ता प्रारम्भ होती है।यह स्थिति लगभग १२–१४ दिन बाद बनती है।
✓•७. नक्षत्र चक्र गणना: यदि युद्ध स्वाती या उसके समीप नक्षत्र क्षेत्र में प्रारम्भ हुआ है तो नक्षत्र चक्र —९ × १ = ९ दिन ∆१८ नक्षत्र चक्र —९ + ९ = १८ दिन ∆२७ नक्षत्र चक्र —२७ दिन- इस सिद्धान्त के अनुसार युद्ध का निर्णायक मोड़ •१८ से २७ दिन के बीच आता है।
✓•८. सर्वतोभद्र वेध गणना: कुण्डली अनुसार •मंगल का वेध- •ईरान, •इजरायल, •भारत पर है।
∆जब मंगल •कुम्भ से मीन की ओर गति करता है •तो वेध समाप्त होने लगता है।
∆मंगल की औसत गति — •०.५° / दिन- •यदि मंगल •लगभग १२° दूरी तय करे तो वेध प्रभाव समाप्त होने लगता है।
∆अतः १२° ÷ ०.५° = २४ दिन ✓•९. गणितीय समन्वय: अब तीनों गणनाएँ देखें — विधि अवधि •लग्नगति ४० दिन (अधिकतम) •नक्षत्र चक्र १८–२७ दिन •मंगल वेध २४ दिन ∆इन तीनों का औसत —४० + २७ + २४÷३ = ३०.३३ दिन, किन्तु चन्द्र-गुरु योग के कारण यह अवधि घट जाती है।
∆अतः वास्तविक अवधि —२२ – २६ दिन ✓•१०. समाप्ति-तिथि का निर्धारण: ∆यदि युद्ध प्रारम्भ —२८ फरवरी २०२६ तो ∆२२ दिन बाद —२२ मार्च २०२६ ∆२६ दिन बाद —
२६ मार्च २०२६ृ ✓•११. निर्णायक काल: ज्योतिषीय दृष्टि से सबसे महत्वपूर्ण काल होगा —२० मार्च – २४ मार्च २०२६
इस समय चन्द्र शुभ स्थिति में मंगल का प्रभाव घटता हुआ कूटनीतिक वार्ता सक्रिय ✓
•१२. संभावित परिणाम: इस युद्ध का अन्त —•१. पूर्ण विजय से नहीं •२. बल्कि राजनयिक समझौते से होने की सम्भावना अधिक है।
∆कारण —
चन्द्र-गुरु योग।
✓•१३. वैश्विक प्रभाव: •युद्ध समाप्ति के समय- •तेल बाजार अस्थिर- •चीन आर्थिक दबाव में- •रूस को अप्रत्यक्ष हानि
•यूरोप को रणनीतिक लाभ
✓•१४. निष्कर्ष:
समस्त ज्योतिषीय एवं गणितीय विश्लेषण से निम्न निष्कर्ष प्राप्त होते हैं —
•१. युद्ध चर लग्न में आरम्भ हुआ।
•२. मंगल अस्त होने से युद्ध दीर्घकालिक नहीं।
•३. नक्षत्र चक्र के अनुसार निर्णायक मोड़ १८–२७ दिन में।
•४. मंगल वेध समाप्ति लगभग २४ दिन में।
∆अतः युद्ध की सम्भावित समाप्ति —
•२२ मार्च २०२६ से २६ मार्च २०२६ के मध्य।

द केरल स्टोरी-2 फिल्म हर हिंदू माता-पिता को देखनी चाहिए

‘द केरल स्टोरी-2: गोस बियॉन्ड’ अब कोई साधारण फिल्म नहीं रह गई है। इस पर उठे सवालों ने ही इसे और अधिक देखने योग्य बना दिया है। फिल्म के निर्देशक कामाख्या नारायण सिंह हैं और निर्माता विपुल अमृतलाल शाह ने देश में फैल रही लव जिहाद की समस्या को सामाजिक और वैचारिक रूप से जिस तरह पर्दे पर उतारने का प्रयास किया है, वह वास्तव में उल्लेखनीय है।

फिल्म में देश के अलग-अलग कोनों से तीन लड़कियों की कहानियाँ दिखाई गई हैं। ये कहानियाँ बताती हैं कि किस प्रकार हिंदू पहचान के कारण उनके साथ भावनात्मक और सामाजिक स्तर पर छल किया जाता है, उन्हें उनकी पहचान के आधार पर चिह्नित कर अंधेरे गर्त में धकेल दिया जाता है।

फिल्म के रिलीज से पहले सामने आए प्रोमो वीडियोज में राजस्थान की दिव्या पालीवाल, केरल की सुरेखा नायर और मध्य प्रदेश की नेहा संत को पीड़िताओं के रूप में दिखाया गया था। इन तीनों किरदारों को उल्का गुप्ता, ऐश्वर्या ओझा और अदिति भाटिया ने निभाया है। इनमें से अदिति भाटिया का यह बड़े पर्दे पर पहला डेब्यू है।

सुरेखा की कहानी यह दर्शाती है कि ऐसे विधर्मियों से बचने के लिए केवल शिक्षा पर्याप्त नहीं होती। वहीं नेहा संत की कहानी बताती है कि यदि आपको अपने धर्म से प्रेम है, तब भी आपको झूठ बोलकर फँसाया जा सकता है। इसी प्रकार दिव्या पालीवाल की कहानी यह सिखाती है कि कम उम्र की बच्चियों का किस तरह ब्रेनवॉश कर उन्हें अपने जाल में फँसाया जाता है।

तीनों अभिनेत्रियों ने दिव्या, सुरेखा और नेहा के किरदार को प्रभावशाली ढंग से निभाया है। एक दर्शक के रूप में आप देख पाते हैं कि किस तरह एक लव जिहाद पीड़िता को जाल में फँसाया जाता है और किन-किन चरणों में उसका ब्रेनवॉश किया जाता है।

फिल्म की खासियत और समाचार में आती खबरें

‘द केरल स्टोरी’ के बाद पर्दे पर आ रही ‘द केरल स्टोरी-2: गोस बियॉन्ड’ की खास बात ये है कि इसकी कहानी किसी एक राज्य तक सीमित नहीं है, बल्कि देश के अलग-अलग हिस्सों से आती लव जिहाद की खबरों से जुड़ती है। उन पीड़िताओं की व्यथा भी इसमें दिखाई देती है, जो अब सामने आकर बताने लगी हैं कि कैसे उनकी जिंदगी बर्बाद की गई, उन्हें धर्म परिवर्तन के लिए प्रताड़ित किया गया या जबरन बीफ खिलाया गया।

बतौर अभिभावक कुछ दृश्य आपको विचलित कर सकते हैं, लेकिन यह बेचैनी उस पीड़ा से कम ही होगी, जो अपनी बेटियों को खो देने या उनके साथ हुई अमानवीय घटनाओं को देखकर किसी माता-पिता को होती है।

फिल्म के कई हृदयविदारक दृश्यों के बाद अंतिम दृश्य दर्शकों को संतोष का अनुभव करा सकते हैं। बैकग्राउंड में ‘हर-हर शंभू’ गीत सुनाई देता है, मनोज मुंतशिर की आवाज में चेतावनी के बोल गूँजते हैं, बुलडोजर का दृश्य दिखता है और पुलिस की कार्रवाई नजर आती है।

फिल्म का संगीत और बैकग्राउंड म्यूजिक पीड़िताओं के दर्द और फिल्म के हर सीन के प्रभाव और इमोशन को सशक्त बनाता हैं। संपादन की बात करें तो कुछ स्थानों पर एक दृश्य से दूसरे दृश्य में अचानक परिवर्तन दिखाई देता है, लेकिन यही बदलाव दर्शकों को फिल्म से जोड़े रखते हैं।

तीन अलग-अलग कहानियों को जोड़ने के लिए क्रॉस-कटिंग तकनीक का उपयोग किया गया है, जिससे पूरी फिल्म एक सहज प्रवाह में आगे बढ़ती है।

इसी प्रकार फिल्म में डॉयलॉग भी विशेष हैं, जो कई मुद्दों पर गहराई से सोचने पर मजबूर करते हैं। उन डॉयलॉग्स को आप अतिनाटकीय नहीं कह सकते, क्योंकि यही संवाद आजकल हो रही घटनाओं को परिभाषित करते हैं। जैसे-

‘ये काफिर हिंदू सेकुलर कहलाने को मरे जात हैं’
‘देश में हमारे लोग हर जगह मोहब्बत फैला रहे हैं’
हमारे में नास्तिक नहीं होते, तुम काफिर नास्तिक होते हो’
’16 साल के लाड-प्यार पे 6 महीने का प्यार’
‘कयामत के दिन शुक्रिया कहोगी’
‘भरोसा नहीं है के म्हारे पे बेबी।’

इस फिल्म का विरोध वह लोग कर रहे हैं जिन्हें लगता है कि समाज में लव जिहाद जैसा कुछ नहीं है। लेकिन, अगर आप उन खबरों में पीड़िताओं के दर्द को पढ़-सुनकर कभी कोई विचार मन में लाते हैं तो फिल्म जरूर देखी जानी चाहिए।

इसे देखिए ताकि आपकी वो समझ विकसित हो कि आप सोच सके कि आपको अपनी बच्चियों की परवरिश किस दिशा में करनी है। आप जान सकें कि विधर्मी तत्वों से लड़कियों को कैसे बचाना है। आप फैसला कर पाएँ कि आपको सेकुलर होने के भ्रम में जीना है या ये स्वीकारना कि आप हिंदू हैं।

गौरतलब है कि इस फिल्म के विरोध में केरल हाई कोर्ट में याचिका दायर की गई थी, जिसके बाद फिल्म की रिलीजिंग पर रोक लग गई थी। हालाँकि शुक्रवार (27 फरवरी 2026) को केरल हाई कोर्ट ने ये रोक हटा ली और अब ये फिल्म अपने तय समय पर पूरे देश में रिलीज हो रही है।

साभार-  https://hindi.opindia.com/ से

सेमीकंडक्टर: अनुसंधान और रणनीति में साथ-साथ

पर्ड्यू यूनिवर्सिटी और आईआईटी हैदराबाद की एक पहल अमेरिका और भारत के बीच रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण क्षेत्र में गहन होते सहयोग के साथ अनुसंधान, प्रतिभा विकास और उद्योग गठबंधन में तालमेल ला रही है।

 

स्मार्टफोन और चिकित्सा उपकरणों से लेकर डेटा सेंटर और रक्षा प्रणालियों तक, सेमीकंडक्टर आधुनिक अर्थव्यवस्थाओं की आधारशिला हैं। जैसे-जैसे वैश्विक मांग बढ़ रही है और आपूर्ति श्रृंखला की कमजोरियां बनी हुई हैं, अमेरिका और भारत दोनों इस बात का पुनर्मूल्यांकन कर रहे हैं कि वे उन्नत चिप का डिज़ाइन, निर्माण और सुरक्षा कैसे करते हैं।

इस साझा फोकस के परिणामस्वरूप पर्ड्यू विश्वविद्यालय और भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (आईआईटी) हैदराबाद ने संयुक्त रूप से यू.एस.–इंडिया सेंटर ऑफ एक्सीलेंस इन सेमीकंडक्टर्स की स्थापना की। यह पहल दोनों देशों में व्यापक राष्ट्रीय सेमीकंडक्टर प्राथमिकताओं के समर्थन में अनुसंधान और उद्योग सहभागिता को जोड़ती है।

पर्ड्यू विश्वविद्यालय में वाइस प्रेसिडेंट और भारत के लिए विश्वविद्यालय दूत प्रोफेसर विजय रघुनाथन कहते हैं, “अमेरिका उन्नत सेमीकंडक्टर अनुसंधान और नवाचार में नेतृत्व लाता है, जबकि भारत विनिर्माण में पैमाना, प्रतिभा और साहसिक महत्वाकांक्षाएं लाता है।”

केंद्र को इन पूरक शक्तियों को जोड़ने के लिए डिजाइन किया गया है। अमेरिकी संस्थानों के लिए, यह एक बड़े और बढ़ते प्रतिभा आधार के साथ अनुसंधान सहयोग और कार्यबल विकास का विस्तार करने का मंच प्रदान करता है। भारत के लिए, यह चिप डिज़ाइन से आगे बढ़कर विनिर्माण और उन्नत पैकेजिंग में गहरी भागीदारी के प्रयासों का समर्थन करता है।

दीर्घकालिक दृष्टि
रघुनाथन बताते हैं कि सेमीकंडक्टर लीडरशिप अब केवल ट्रांजिस्टर स्केलिंग पर नहीं, बल्कि इस बात पर भी निर्भर करती है कि एकीकृत प्रणालियों का डिज़ाइन और निर्माण कैसे किया जाता है। यह बदलाव डिज़ाइन, सामग्री, पैकेजिंग और सिस्टम एकीकरण के बीच समन्वय पर अधिक जोर देता है—ऐसे क्षेत्र जहां संस्थानों और सीमाओं के पार सहयोग महत्वपूर्ण हो जाता है।

आईआईटी हैदराबाद के निदेशक प्रोफेसर बी. एस. मूर्ति केंद्र के प्रतिभा आधार को सुदृढ़ करने में भूमिका पर जोर देते हैं। “सेंटर ऑफ एक्सीलेंस की परिकल्पना प्रतिभा विकास और भारतीय तथा अमेरिकी अकादमिक और उद्योग के बीच सहयोग के लिए एक एकल समाधान के रूप में की गई है,” वह कहते हैं।
वह जोड़ते हैं कि भारत विश्व की सेमीकंडक्टर डिज़ाइन कार्यबल का लगभग 20 प्रतिशत योगदान देता है, जबकि अमेरिका उन्नत सेमीकंडक्टर प्रौद्योगिकी में अग्रणी बना हुआ है। “केंद्र इन शक्तियों को एक संरचित तरीके से जोड़ता है,” वह कहते हैं। यह दोनों देशों में विश्वविद्यालयों, उद्योग भागीदारों और सरकारी हितधारकों को जोड़ने वाले एक संघ के रूप में कार्य करता है।

पिछले कुछ वर्षों में, आईआईटी हैदराबाद ने चिप डिज़ाइन, विनिर्माण, पैकेजिंग और सामग्री में विशेष कार्यक्रम विकसित किए हैं, जिनका उद्देश्य इंजीनियरों को सेमीकंडक्टर मूल्य श्रृंखला के विभिन्न भूमिकाओं के लिए तैयार करना है।

प्रभाव के लिए प्रशिक्षण
सेंटर ऑफ एक्सीलेंस की स्थापना से पहले, आईआईटी हैदराबाद ने भारत के शिक्षा मंत्रालय की एसपीएआरसी (शैक्षणिक और अनुसंधान सहयोग को बढ़ावा देने की योजना) पहल के अंतर्गत पर्ड्यू विश्वविद्यालय के सहयोग से एक अंतरराष्ट्रीय कार्यबल विकास कार्यक्रम संचालित किया।
तीन-चरणीय कार्यक्रम की शुरुआत एक आधारभूत कार्यशाला से हुई, इसके बाद आईआईटी हैदराबाद में व्यावहारिक प्रशिक्षण हुआ, और इसका समापन पर्ड्यू के बर्क नैनोटेक्नोलॉजी सेंटर में उन्नत सत्रों के साथ हुआ। दो चरणों में कुल 39 विद्यार्थियों ने कार्यक्रम पूरा किया। कई सेमीकंडक्टर उद्योग में शामिल हुए, जबकि अन्य ने उच्च शिक्षा जारी रखी।

रघुनाथन और मूर्ति दोनों इस पहल की सफलता को केंद्र के व्यापक मिशन की नींव के रूप में देखते हैं: प्रतिभा विकास का विस्तार करना और इसे अनुसंधान तथा उद्योग की आवश्यकताओं से और अधिक निकटता से जोड़ना। पर्ड्यू ने निर्यात नियंत्रण, बौद्धिक संपदा संरक्षण और जिम्मेदार प्रौद्योगिकी उपयोग जैसे नीति और शासन विषयों में भी अपने सेमीकंडक्टर कार्यबल पहलों का विस्तार किया है, जो केंद्र के मिशन के पूरक हैं।

“ये पाठ्यक्रम, जिन्हें अमेरिकी विदेश विभाग के अनुदान के समर्थन से विकसित किया गया है, सेमीकंडक्टर इंजीनियरों और उद्योग के लीडरों को वैश्विक परिप्रेक्ष्य में अनुपालन और जिम्मेदार प्रौद्योगिकी विकास को समझने में मदद करते हैं,” रघुनाथन कहते हैं।

उद्योग और नीति एकीकरण
उद्योग सहभागिता केंद्र के रणनीतिक लक्ष्य—अमेरिका-भारत सेमीकंडक्टर अनुसंधान और कार्यबल पहलों के तालमेल—का समर्थन करती है। प्रमुख अमेरिकी सेमीकंडक्टर और डिज़ाइन ऑटोमेशन कंपनियां, जिनमें इंटेल, क्वालकॉम, एनवीडिया, एएमडी और सिनॉप्सिस शामिल हैं, भारत में अनुसंधान एवं विकास संचालन करती हैं, जिनमें से कई हैदराबाद में स्थित हैं।

“केंद्र का उद्देश्य इन कंपनियों के साथ निकटता से काम करना है ताकि अनुसंधान, कार्यबल प्रशिक्षण और विचारों को व्यवहार में लाने के मार्गों को संरेखित किया जा सके,” रघुनाथन कहते हैं।

मूर्ति बताते हैं कि फेडरल दृष्टिकोण अनुसंधान से प्रोटोटाइपिंग और उत्पाद साकार तक एक निरंतर पाइपलाइन बनाने में मदद करता है, जिससे वैश्विक सेमीकंडक्टर पारिस्थितिकी तंत्र में भारत की भूमिका सुदृढ़ होती है।
“भारत सरकार के सेमीकंडक्टर मिशन के साथ पर्ड्यू की साझेदारी स्वाभाविक रूप से केंद्र के माध्यम से आगे बढ़ती है,” रघुनाथन जोड़ते हैं। “जब इस तरह के सहयोग प्रभावी ढंग से किए जाते हैं, तो वे समय के साथ सहयोग को बनाए रखना आसान बनाते हैं और व्यापक अमेरिका-भारत सेमीकंडक्टर साझेदारी की रीढ़ बनते हैं।”

आलेख साभार: स्पैन

फोटोग्राफ: साभार पर्ड्यू यूनिवर्सिटी