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एसआईआर का विरोधः चिन्ता लोकतंत्र की या वोट बैंक की?

भारत का लोकतंत्र आज जिस निर्णायक मोड़ पर खड़ा है, वहां उसकी विश्वसनीयता और मजबूती का सवाल पहले से कहीं अधिक गंभीर हो गया है। चुनावों की पारदर्शिता, मतदाता सूची की शुचिता और राष्ट्रीय सुरक्षा की दृष्टि से मतदाता पहचान की सत्यता को बनाए रखना केवल प्रशासनिक प्रक्रिया नहीं, बल्कि लोकतंत्र की आत्मा को सुरक्षित रखने का मूल तत्व है। विशेष गहन पुनरीक्षण अर्थात एसआईआर इसी उद्देश्य से प्रारंभ की गई वह अनिवार्य प्रक्रिया है, जिसके माध्यम से मतदाता सूची में मौजूद संदिग्ध, दोहरे या अवैध प्रविष्टियों की पहचान और सत्यापन किया जा सके। लेकिन दुर्भाग्यपूर्ण है कि जिस कार्य को लोकतंत्र की मजबूती के लिए आवश्यक कदम माना जाना चाहिए, उसे कुछ विपक्षी दल अपने राजनीतिक हितों के चश्मे से देख रहे हैं।
सुप्रीम कोर्ट में जिस प्रकार के उतावले, भावनात्मक और अक्सर तथ्यहीन तर्क प्रस्तुत किए गए, उससे यही प्रतीत होता है कि यह विरोध किसी तर्क या सिद्धांत का नहीं, बल्कि वोट-बैंक की चिंता का परिणाम है। सुप्रीम कोर्ट ने यह कहकर बेतूका राष्ट्र-विरोधही अड़ंगा लगाने वालों को आईना ही दिखाया कि बिहार में तो एक भी व्यक्ति यह शिकायत करने नहीं आया कि उसका नाम वोटर लिस्ट से हटा दिया गया है। यह भी उल्लेखनीय है कि बिहार में एसआईआर के समय कुछ खास लोगों के वोट काटे जाने का आरोप उछालने वाले भी ऐसे कथित पीड़ित लोगों के उदाहरण का साक्ष्य नहीं दे सके थे। हालांकि बिहार में एसआईआर पर विपक्षी दलों को मुंह की खानी पड़ी, लेकिन वे बाज नहीं आ रहे हैं और अब 12 राज्यों में जारी एसआईआर की प्रक्रिया को रोकने के लिए सुप्रीम कोर्ट के समक्ष खड़े हैं।
यह तब है, जब एसआईआर वाले राज्यों में करीब 65 प्रतिशत फार्म भरे जा चुके हैं। इसका मतलब है कि लोग इस प्रक्रिया में बढ़-चढ़ कर भाग ले रहे हैं। एसआईआर होना इसलिए आवश्यक है, क्योंकि मतदाता सूचियों में भारी त्रुटियां एवं विसंगतियां है, बड़ी संख्या में ऐसे लोगों के नाम दर्ज हैं, जिनकी मृत्यु हो गई है या फिर जो अन्यत्र चले गए हैं। इसके अलावा ऐसे भी लोग हैं, जिनके पास दोहरे मतदाता पहचान पत्र हैं। चुनाव आयोग एसआईआर के जरिये इन्हीं विसंगतियों को दूर कर रहा है, लेकिन विपक्षी दलों को पता नहीं क्यों यह रास नहीं आ रहा है। वे मतदाता सूचियों में गड़बड़ी की शिकायत भी कर रहे हैं और एसआईआर भी नहीं होने देना चाहते है। लोकतंत्र की जड़ों में सबसे बड़ा विष तब घुलता है जब मतदाता सूची अवैध हस्तक्षेपों, बाहरी घुसपैठियों और राजनीतिक संरक्षण के सहारे खड़ी प्रविष्टियों से दूषित होने लगती है। भारत लंबे समय से विदेशी घुसपैठ की समस्या से जूझ रहा है। राज्यों के बीच असंतुलित प्रवासन, सीमावर्ती क्षेत्रों में बेतरतीब आबादी का फैलाव, राजनीतिक शरण और संरक्षण के नाम पर अवैध बसेरों का निर्माण-ये सब ऐसी वास्तविकताएं हैं जिन्हें अनदेखा करना राष्ट्रहित से खिलवाड़ है।
एसआईआर की प्रक्रिया इसीलिए आरंभ की गई कि मतदाता सूची को अद्यतन, शुद्ध, विश्वसनीय, पारदर्शी और तथ्यों पर आधारित बनाया जा सके। यह प्रक्रिया किसी समुदाय, क्षेत्र या वर्ग के खिलाफ नहीं, बल्कि व्यक्तिगत पहचान के सत्यापन पर आधारित है। यह समान रूप से हर उस मतदाता की जांच करती है जो कानूनन इस प्रक्रिया का हिस्सा है। इसके बावजूद विपक्ष द्वारा इसे अधिकारों पर हमला, राजनीतिक भेदभाव या अविश्वास की राजनीति से जोड़ना केवल दुष्प्रचार एवं भोलेभाले लोगों को गुमराह करना  है। यह सवाल इसलिए उठता है कि जब प्रक्रिया सबके लिए समान है, सभी क्षेत्रों पर लागू है और सुप्रीम कोर्ट के निर्देशन में संचालित हो रही है, तो किस आधार पर इसे लोकतंत्र विरोधी कहा जा सकता है? वास्तव में विपक्ष इस प्रश्न का ठोस, तथ्यपूर्ण उत्तर देने में असफल रहा है। यह आशंका निराधार नहीं कि बंगाल जैसे राज्यों में बड़ी संख्या में बांग्लादेशी घुसपैठिए मतदाता बन बैठे हैं। उनके बांग्लादेश लौटने से इसकी पुष्टि भी होती है। यह ठीक है कि पहचान पत्र के रूप में आधार भी मान्य है, लेकिन उसे भी फर्जी तरीके से बनवाया गया हो सकता है। ऐसे में चुनाव आयोग को दस्तावेजों के सत्यापन का अधिकार मिलना ही चाहिए।
सुप्रीम कोर्ट में प्रस्तुत विपक्षी तर्कों का विश्लेषण करें, तो उनमें वास्तविक तथ्यों एवं आंकड़ों का अभाव है। भावनात्मक अपीलें, आशंकाओं का जानबूझकर सृजन, प्रशासनिक प्रक्रिया को अविश्वसनीय बताने का प्रयास, और तथ्यों से अधिक आरोपों का शोर-ये सब इस बात की ओर संकेत करते हैं कि उद्देश्य लोकतंत्र की रक्षा नहीं बल्कि अपनी राजनीतिक जमीन को बचाना है। यदि मतदाता सूची वास्तव में त्रुटिरहित है, यदि घुसपैठियों का प्रश्न बिना आधार का है, यदि किसी वर्ग की वैधता पर कोई प्रश्नचिन्ह नहीं, तो फिर सत्यापन से भय क्यों? सत्यापन तो वही व्यक्ति या समूह टालेगा, जो स्वयं को संदेह के घेरे में पाता हो। जो स्वच्छ, वैध और तथ्यपूर्ण हैं उन्हें कभी डर नहीं होता कि जांच उनके लिए समस्या बन जाएगी। इसलिए यह विरोध लोकतंत्र की चिंता नहीं बल्कि लोकतंत्र का उपयोग करके अपने हित साधने की कोशिश प्रतीत होता है। भारत की चुनाव प्रणाली में वर्षों से यह शिकायत उठती रही है कि मतदाता सूची में दोहरी प्रविष्टियां, मृत व्यक्तियों के नाम, काल्पनिक मतदाता और बाहरी लोगों की अवैध प्रविष्टियां बढ़ती जा रही हैं। इनमें से अधिकांश समस्याएं प्रशासनिक लापरवाही का परिणाम हैं, लेकिन एक बड़ा हिस्सा ऐसे राजनीतिक हितों का भी है जो ऐसी प्रविष्टियों को बनाए रखने में खुद को लाभान्वित देखते हैं।
यह तथ्य किसी से छिपा नहीं कि भारत के अनेक राज्यों में स्थानीय राजनीतिक तंत्र विदेशी घुसपैठियों के लिए न केवल छत्रछाया प्रदान करता रहा है, बल्कि उन्हें वोट-आधारित पहचान और सुविधाओं तक पहुंच भी दिलाता रहा है। इन परिस्थितियों में एसआईआर जैसी प्रक्रिया न केवल उचित है, बल्कि अत्यंत आवश्यक है। यह प्रक्रिया जितनी देर से लागू होगी, लोकतंत्र पर उतना ही खतरा बढ़ेगा। एसआईआर के विरोध का एक और पक्ष भी है, और वह है विपक्ष का यह डर कि यदि मतदाता सूची शुद्ध कर दी गई, तो उनका चुनावी गणित प्रभावित होगा। यह राजनीति का वह पक्ष है जिसमें आदर्शवाद के लिए बहुत कम जगह है। राजनीतिक दल अक्सर यह मानकर चलते हैं कि जहां संख्या उनके पक्ष में है, वहां सुधार का कोई हस्तक्षेप उनकी स्थिति को कमजोर कर सकता है। यह प्रवृत्ति लोकतंत्र की आत्मा के विरुद्ध है, क्योंकि लोकतंत्र केवल सत्ता प्राप्त करने का माध्यम नहीं बल्कि नागरिक विश्वास और संवैधानिक मूल्यों का संरक्षक है।
एसआईआर का उद्देश्य किसी को मताधिकार से वंचित करना नहीं, बल्कि यह सुनिश्चित करना है कि मताधिकार का उपयोग वही करे जो इसके योग्य है, जो देश का वैध नागरिक है, और जिसका नाम सही तरीके से मतदाता सूची में दर्ज है। भारत का भविष्य उन सुधारों पर निर्भर करता है जो चुनावों को अधिक पारदर्शी और विश्वसनीय बनाएं। जब तक मतदाता सूची शुद्ध नहीं होगी, तब तक चुनाव परिणामों पर संदेह रहेगा और लोकतंत्र की साख कमजोर होती जाएगी। एसआईआर इस दिशा में उठाया गया साहसिक कदम है, जिसे किसी भी प्रकार के राजनीतिक दबाव या भ्रम फैलाने वाले अभियानों से प्रभावित नहीं होना चाहिए। सुप्रीम कोर्ट की निगरानी में यह प्रक्रिया और अधिक निष्पक्ष और संरक्षित होती है, इसलिए विरोध के ये प्रयास और भी आधारहीन प्रतीत होते हैं।
लोकतंत्र की मरम्मत और मजबूती का यह अवसर खोना राष्ट्रहित के विरुद्ध होगा। जो दल इस प्रक्रिया को रोकने की कोशिश कर रहे हैं, वे भले ही इसे जनता के हित का मुद्दा बताने का प्रयास करें, परंतु वस्तुतः वे अपने संकीर्ण हितों की रक्षा कर रहे हैं। भारत को ऐसी राजनीति की नहीं, बल्कि ऐसी व्यवस्था की आवश्यकता है जो सत्य को प्राथमिकता दे, सत्ता से अधिक संविधान को महत्व दे, और मतदाता सूची को राजनीतिक हथियार नहीं बल्कि लोकतंत्र की पवित्र सूची माने। एसआईआर की गति और दायरा इसलिए न केवल बनाए रखना चाहिए, बल्कि उसे और भी तेज, निर्णायक और प्रभावी बनाना चाहिए, ताकि भारत का लोकतंत्र अवैध प्रभावों से मुक्त होकर एक मजबूत, पारदर्शी और विश्वसनीय भविष्य की ओर अग्रसर हो सके।

प्रेषकः
(ललित गर्ग)
लेखक, पत्रकार, स्तंभकार
ई-253, सरस्वती कंुज अपार्टमेंट
25 आई. पी. एक्सटेंशन, पटपड़गंज, दिल्ली-92
फोनः 22727486, 9811051133

संकल्प लें कि हम कम से कम देश के 25 ऐसे स्थानों का दर्शन करेंगे, जो हमारी विरासत से जुड़े हैंः श्री मोदी

उडुपी, कर्नाटक में श्री कृष्ण मठ में लक्ष कंठ गीता पारायण कार्यक्रम में प्रधानमंत्री 

उडुपी। भगवान श्री कृष्ण के दिव्य दर्शनों की संतुष्टि, श्रीमद् भगवद्गीता के मंत्रों की ये आध्यात्मिक अनुभूति, और इतने सारे पूज्य संतों, गुरुओं की ये उपस्थिति, मेरे लिए परम सौभाग्य है। मेरे लिए ये असंख्य पुण्यों को प्राप्त करने जैसा है। और जो मुझे सम्मान दिया गया, मेरे लिए जो भाव प्रकट किए गये, शायद मुझे इतने आशीर्वाद मिले कि मेरे लिए जो कहा जाता है, मैं उससे योग्य बनूं, और ज्यादा काम करूं, और मुझसे जो अपेक्षाएं हैं, उसे मैं पूर्ण करूं।

अभी तीन दिन पहले ही मैं गीता की धरती कुरुक्षेत्र में था। अब आज भगवान श्री कृष्ण के आशीर्वाद और जगदगुरु श्री मध्वाचार्य जी के यश की इस भूमि पर आना, मेरे लिए परम संतोष का अवसर है। आज के इस अवसर पर जब एक लाख लोगों ने, एक साथ भगवद्गीता के श्लोक पढ़े, तो पूरे विश्व के लोगों ने भारत की सहस्त्र वर्षों की दिव्यता का साक्षात दर्शन भी किया है। इस कार्यक्रम में हमें आशीर्वाद देने के लिए पधारे हुए श्री श्री सुगुणेंद्र तीर्थ स्वामी जी, श्री श्री सुश्रीन्द्र तीर्थ स्वामी जी, कर्नाटका के गवर्नर थावरचंद गहलोत जी, केंद्रीय मंत्रिमंडल के मेरे सहयोगीगण, राज्य सरकार के मंत्री, सांसद, विधायक, उडुपी के अष्ट मठों के सभी अनुयायी, उपस्थित अन्य संतगण, देवियों और सज्जनों !

कर्नाटका की इस भूमि पर, यहां के स्नेही जनों के बीच आना मेरे लिए सदा ही एक अलग अनुभूति होती है। और उडुपी की धरती पर आना तो हमेशा अद्भुत होता है। मेरा जन्म गुजरात में हुआ, और गुजरात और उडुपी के बीच एक गहरा और विशेष संबंध रहा है। मान्यता है कि यहां स्थापित भगवान श्री कृष्ण के विग्रह की पूजा पहले द्वारका में माता रुक्मिणी करती थीं। बाद में जगदगुरु श्री मध्वाचार्य जी ने इस प्रतिमा को यहां प्रतिष्ठापित किया। और आप तो जानते हैं, अभी पिछले ही वर्ष मैं समुद्र के भीतर श्री द्वारका जी का दर्शन करने गया था, वहां से भी आशीर्वाद ले आया। आप खुद समझ सकते हैं कि मुझे इस प्रतिमा के दर्शन करके क्या अनुभूति हुई होगी। इस दर्शन ने मुझे एक आत्मीय आध्यात्मिक आनंद दिया है।

उडुपी आना मेरे लिए एक और वजह से विशेष होता है। उडुपी जनसंघ और भारतीय जनता पार्टी के सुशासन की, मॉडल की कर्मभूमि रही है। 1968 में, उडुपी के लोगों ने जनसंघ के हमारे वीएस आचार्या जी को, यहां की नगर पालिका परिषद में विजयी बनाया था। और इसके साथ ही उडुपी ने एक नए गवर्नेंस मॉडल की नींव भी रखी थी। आज हम स्वच्छता के जिस अभियान को राष्ट्रीय रूप देख रहे हैं, उसे उडुपी ने 5 दशक पहले अपनाया था। जल आपूर्ति और ड्रेनेज सिस्टम का एक नया मॉडल देना हो, उडुपी ने ही 70 के दशक में इन कार्यक्रमों की शुरुआत की थी। आज ये अभियान देश के राष्ट्रीय विकास का, राष्ट्रीय प्राथमिकता का हिस्सा बनकर हमारा मार्गदर्शन कर रहा है।

राम चरित मानस में लिखा है- कलिजुग केवल हरि गुन गाहा। गावत नर पावहिं भव थाहा।। अर्थात, कलियुग में केवल भगवद् नाम और लीला का कीर्तन ही परम साधन है। उसके गायन कीर्तन से, भवसागर से मुक्ति हो जाती है। हमारे समाज में मंत्रों का, गीता के श्लोकों का पाठ तो शताब्दियों से हो रहा है, पर जब एक लाख कंठ, एक स्वर में इन श्लोकों का ऐसा उच्चारण करते हैं, जब इतने सारे लोग, गीता जैसे पुण्य ग्रंथ का पाठ करते हैं, जब ऐसे दैवीय शब्द एक स्थान पर, एक साथ गूंजते हैं, तो एक ऐसी ऊर्जा निकलती है, जो हमारे मन को, हमारे मस्तिष्क को एक नया स्पंदन, एक नई शक्ति देती है। यही ऊर्जा, आध्यात्म की शक्ति की है, यही ऊर्जा, सामाजिक एकता की शक्ति है। इसलिए आज लक्ष कंठ गीता का ये अवसर एक विशाल ऊर्जा-पिंड को अनुभव करने का अवसर बन गया है। ये विश्व को सामूहिक चेतना, Collective Consciousness की शक्ति भी दिखा रहा है।

आज के दिन, विशेष रूप से मैं परमपूज्य श्री श्री सुगुणेंद्र तीर्थ स्वामी जी को प्रणाम करता हूं।  उन्होंने लक्ष कंठ गीता के इस विचार को इतने दिव्य रूप में साकार किया है। पूरे विश्व में, लोगों को अपने हाथ से गीता लिखने का विचार देकर, उन्होंने जिस कोटि गीता लेखन यज्ञ की शुरुआत की है, वो अभियान सनातन परंपरा का एक वैश्विक जनांदोलन है। जिस तरह से हमारा युवा भगवद्गीता के भावों से, इसकी शिक्षाओं से जुड़ रहा है, वो अपने आप में बहुत बड़ी प्रेरणा है। सदियों से भारत में वेदों, उपनिषदों और शास्त्रों के ज्ञान को अगली पीढ़ी तक पहुंचाने की परंपरा रही है। और ये कार्यक्रम भी इसी परंपरा का भगवद्गीता से अगली पीढ़ी को जोड़ने का एक सार्थक प्रयास बन गया है।

यहां आने से तीन दिन पहले मैं अयोध्या में भी था। 25 नवंबर को विवाह पंचमी के पावन दिन अयोध्या के राम जन्मभूमि मंदिर में धर्म ध्वजा की स्थापना हुई है। अयोध्या से उडुपी तक असंख्य रामभक्त इस दिव्यतम और भव्यतम उत्सव के साक्षी बने हैं। राम मंदिर आंदोलन में उडुपी की भूमिका कितनी बड़ी है, सारा देश इसे जानता है। परमपूज्य स्वर्गीय विश्वेश तीर्थ स्वामी जी ने दशकों पहले राम मंदिर के पूरे आंदोलन को जो दिशा दी, ध्वजारोहण समारोह उसी योगदान की सिद्धि का पर्व बना है। उडुपी के लिए राम मंदिर का निर्माण एक और कारण से विशेष है। नए मंदिर में जगदगुरु मध्वाचार्य जी के नाम पर एक विशाल द्वार भी बनाया गया है। भगवान राम के अनन्य भक्त, जगदगुरु मध्यावार्य जी ने लिखा था- रामाय शाश्वत सुविस्तृत षड्गुणाय, सर्वेश्वराय बल-वीर्य महार्णवाय, अर्थात, भगवान श्री राम—छः दिव्य गुणों से विभूषित, सर्वेश्वर, और अपार शक्ति-साहस के सागर हैं। और इसीलिए राम मंदिर परिसर का एक द्वार उनके नाम पर होना उडुपी, कर्नाटका और पूरे देश के लोगों के लिए बहुत गौरव की बात है।

जगद्गुरु श्री मध्वाचार्य जी भारत के द्वैत दर्शन के प्रणेता और वेदांत के प्रकाश-स्तंभ हैं। उनके द्वारा बनाई गई उडुपी के अष्ट मठों की व्यवस्था, संस्थाओं और नव परंपराओं के निर्माण का मूर्त उदाहरण है। यहां भगवान श्री कृष्ण की भक्ति है, वेदांत का ज्ञान है, और हजारों लोगों की अन्न सेवा का संकल्प है। एक तरह से ये स्थान ज्ञान, भक्ति और सेवा का संगम तीर्थ है।

जिस काल में जगदगुरु मध्वाचार्य जी का जन्म हुआ, उस काल में भारत बहुत सी आंतरिक और बाहर की चुनौतियों से जूझ रहा था। उस काल में उन्होंने भक्ति का वो मार्ग दिखाया, जिससे समाज का हर वर्ग, हर मान्यता जुड़ सकते थे। और इसी मार्गदर्शन के कारण आज कई शताब्दियों के बाद भी उनके द्वारा स्थापित मठ प्रतिदिन लाखों लोगों की सेवा का कार्य कर रहे हैं। उनकी प्रेरणा के कारण द्वैत परंपरा में ऐसी कई विभूतियां जन्मी हैं, जिन्होंने सदा धर्म, सेवा और समाज निर्माण का काम आगे बढ़ाया है। और जनसेवा की ये शाश्वत परंपरा ही, उडुपी की सबसे बड़ी धरोहर है।

जगद्गुरु मध्वाचार्य की परंपरा ने ही, हरिदास परंपरा को ऊर्जा दी। पुरंदर दास, कनक दास जैसे महापुरुषों ने भक्ति को सरल, सरस और सुगम कन्नड़ा भाषा में जन-जन तक पहुंचाया। उनकी ये रचनाएं, हर मन तक, गरीब से गरीब वर्ग तक पहुंचीं, और उन्हें धर्म से, सनातन विचारों से जोड़ा। ये रचनाएं आज की पीढ़ी में भी वैसी की वैसी ही हैं। आज भी हमारे नौजवान सोशल मीडिया की रील्स में, श्री पुरंदरदास द्वारा रचित चंद्रचूड़ शिव शंकर पार्वती सुनकर एक अलग भाव में पहुंच जाते हैं। आज भी, जब उडुपी में मेरे जैसा कोई भक्त एक छोटी सी खिड़की से भगवान श्री कृष्ण का दर्शन करता है, तो उसे कनक दास जी की भक्ति से जुड़ने का अवसर मिलता है। और मैं तो बहुत सौभाग्यशाली हूं, मुझे इसके पहले भी, ये सौभाग्य प्राप्त होता रहा है। कनकदास जी को नमन करने का सौभाग्य मिला है।

भगवान श्री कृष्ण के उपदेश, उनकी शिक्षा, हर युग में व्यवहारिक हैं। गीता के शब्द सिर्फ व्यक्ति ही नहीं, राष्ट्र की नीति को भी दिशा देते हैं। भगवदगीता में, श्री कृष्ण ने सर्वभूतहिते रता: ये बात कही है। गीता में ही कहा गया है- लोक संग्रहम् एवापि, सम् पश्यन् कर्तुम् अर्हसि ! इन दोनों ही श्लोकों का अर्थ यही है कि हम लोक कल्याण के लिए काम करें। अपने पूरे जीवन में, जगदगुरु मध्वाचार्य जी ने इन्हीं भावों को लेकर भारत की एकता को सशक्त किया।

आज सबका साथ, सबका विकास, सर्वजन हिताय, सर्वजन सुखाय, ये हमारी नीतियों के पीछे भी भगवान श्री कृष्ण के इन्हीं श्लोकों की प्रेरणा है। भगवान श्री कृष्ण हमें गरीबों की सहायता का मंत्र देते हैं, और इसी मंत्र की प्रेरणा आयुष्मान भारत और पीएम आवास जैसी स्कीम का आधार बन जाती है। भगवान श्री कृष्ण हमें नारी सुरक्षा, नारी सशक्तिकरण का ज्ञान सिखाते हैं, और उसी ज्ञान की प्रेरणा से देश नारी शक्ति वंदन अधिनियम का ऐतिहासिक निर्णय करता है। श्रीकृष्ण हमें सबके कल्याण की बात सिखाते हैं, और यही बात वैक्सीन मैत्री, सोलर अलायंस और वसुधैव कुटुंबकम की हमारी नीतियों का आधार बनती है।

श्रीकृष्ण ने गीता का संदेश युद्ध की भूमि पर दिया था। और भगवद्गीता हमें ये सिखाती है कि शांति और सत्य की स्थापना के लिए अत्याचारियों का अंत भी आवश्यक है। राष्ट्र की सुरक्षा नीति का मूल भाव यही है, हम वसुधैव कुटुंबकम भी कहते हैं, और हम धर्मो रक्षति रक्षित: का मंत्र भी दोहराते हैं। हम लालकिले से श्री कृष्ण की करुणा का संदेश भी देते हैं, और उसी प्राचीर से मिशन सुदर्शन चक्र की उद्घोषणा भी करते हैं। मिशन सुदर्शन चक्र, यानि, देश के प्रमुख स्थानों की, देश के औद्योगिक और सार्वजनिक क्षेत्रों की सुरक्षा की ऐसी दीवार बनाना, जिसे दुश्मन भेद ना पाए, और अगर दुश्मन दुस्साहस दिखाए, तो फिर हमारा सुदर्शन चक्र उसे तबाह कर दे।

ऑपरेशन सिंदूर की कार्रवाई में भी देश ने हमारा ये संकल्प देखा है। पहलगाम के आतंकी हमले में कई देशवासियों ने अपना जीवन गंवाया। इन पीड़ितों में मेरे कर्नाटका के भाई-बहन भी थे। लेकिन पहले जब ऐसे आतंकी हमले होते थे, तो सरकारें हाथ पर हाथ रखकर बैठ जाती थीं। लेकिन ये नया भारत है, ये ना किसी के आगे झुकता है, और ना ही अपने नागरिकों की रक्षा के कर्तव्य से डिगता है। हम शांति की स्थापना भी जानते हैं, और शांति की रक्षा करना भी जानते हैं।

भगवद् गीता हमें कर्तव्यों का, हमारे जीवन संकल्पों का बोध कराती है। और इसी प्रेरणा से मैं आज आप सभी से कुछ संकल्पों का आग्रह भी करूंगा। ये आग्रह, 9 संकल्प की तरह हैं, जो हमारे वर्तमान और भविष्य के लिए बहुत आवश्यक है। संत समाज जब इन आग्रहों पर अपना आशीर्वाद दे देगा, तो इन्हें जन-जन तक पहुंचने से कोई रोक नहीं पाएगा।

हमारा पहला संकल्प होना चाहिए, कि हमें जल संरक्षण करना है, पानी बचाना है, नदियों को बचाना है। हमारा दूसरा संकल्प होना चाहिए, कि हम पेड़ लगाएंगे, देशभर में एक पेड़ मां के नाम अभियान को गति मिल रही है। इस अभियान के साथ अगर सभी मठों का सामर्थ्य जुड़ जाएगा, तो इसका प्रभाव और व्यापक होगा। तीसरा संकल्प कि हम देश के कम से कम एक ग़रीब का जीवन सुधारने का प्रयास करें, मैं ज्यादा नहीं कह रहा हूं। चौथा संकल्प स्वदेशी का विचार होना चाहिए। एक जिम्मेदार नागरिक के रूप में हम सब स्वदेशी को अपनाएं। आज भारत आत्मनिर्भर भारत और स्वदेशी के मंत्र पर आगे बढ़ रहा है। हमारी अर्थव्यवस्था, हमारे उद्योग, हमारी टेक्नोलॉजी, सब अपने पैरों पर मजबूती से खड़े हो रहे हैं। इसलिए हमें जोर-शोर से कहना है- Vocal for Local. Vocal for Local. Vocal for Local. Vocal for Local.

पाँचवे संकल्प के रूप में हमें नैचुरल फार्मिंग को बढ़ावा देना है। हमारा छठा संकल्प होना चाहिए, कि हम हेल्दी लाइफ स्टाइल को अपनाएंगे, मिलेट्स अपनाएंगे, और खाने में तेल की मात्रा कम करेंगे। हमारा सातवां संकल्प ये हो कि हम योग को अपनाएं, इसे जीवन का हिस्सा बनाए। आठवां संकल्प- मैन्युस्क्रिप्ट, पांडुलिपियों के संरक्षण में सहयोग करें। हमारे देश का बहुत सा पुरातन ज्ञान पांडुलीपियों में छिपा हुआ है। इस ज्ञान को संरक्षित करने के लिए केंद्र सरकार ज्ञान भारतम मिशन पर काम कर रही है। आपका सहयोग इस अमूल्य धरोहर को बचाने में मदद करेगा।

आप नौवां संकल्प लें कि हम कम से कम देश के 25 ऐसे स्थानों का दर्शन करेंगे, जो हमारी विरासत से जुड़े हैं। जैसे मैं आपको कुछ सुझाव देता हूं। 3-4 दिन पहले, कुरुक्षेत्र में महाभारत अनुभव केंद्र की शुरुआत हुई है। मेरा आग्रह है कि आप इस केंद्र में जाकर भगवान श्रीकृष्ण का जीवन दर्शन देखें। गुजरात में हर साल भगवान श्रीकृष्ण और मां रुक्मिणी के विवाह को समर्पित माधवपुर मेला भी लगता है। देश के कोने-कोने से और खासकर के नॉर्थ ईस्ट से बहुत से लोग इस मेले में खासतौर पर पहुंचते हैं। आप भी अगले साल इसमें जाने का प्रयास जरूर करिएगा।

भगवान श्री कृष्ण का पूरा जीवन, गीता का हर अध्याय, कर्म, कर्तव्य और कल्याण का संदेश देता है। हम भारतीयों के लिए 2047 का काल सिर्फ अमृत काल ही नहीं, विकसित भारत के निर्माण का एक कर्तव्य काल भी है। देश के हर नागरिक की, हर भारतवासी की अपनी एक जिम्मेदारी है। हर व्यक्ति का, हर संस्थान का अपना एक कर्तव्य है। और इन कर्तव्यों की पूर्णता में कर्नाटका के परिश्रमी लोगों की भूमिका बहुत बड़ी है। हमारा हर प्रयास देश के लिए होना चाहिए। कर्तव्य की इसी भावना पर चलते हुए विकसित कर्नाटका, विकसित भारत का स्वप्न भी साकार होगा। इसी कामना के साथ उडुपी की धरती से निकली ये ऊर्जा, विकसित भारत के इस संकल्प में हमारा मार्गदर्शन करती रहे। एक बार फिर इस पवित्र आयोजन से जुड़े हर सहभागी को मेरी ढेर सारी शुभकामनाएं। और सबको- जय श्री कृष्णा ! जय श्री कृष्णा ! जय श्री कृष्णा !

वंदेमातरम् राष्ट्रीय गीत प्रश्नोत्तरी प्रतियोगिता:13 हजार से अधिक बच्चे इतिहास, संस्कृति, साहित्य से जुड़े

कोटा / कोटा संभाग में बच्चों को साहित्य एवं संस्कृति से जोड़ने के लिए चलाए जा रहे मिशन बाल मन तक – 25 कार्यक्रम के अंतर्गत वंदेमातरम् राष्ट्रीय गीत के 150 वर्ष पूर्व होने के उपलक्ष्य में रंगीतिका संस्था और साहित्य,संस्कृति,मीडिया फोरम  के तत्वावधान में मुख्य ब्लॉक शिक्षा अधिकारी कार्यालय द्वारा हाल ही में स्कूली बालक – बालिकाओं की प्रश्न प्रश्नोत्तरी प्रतियोगिता का आयोजन किया गया।
रंगीतिका संस्था की संस्थापक अध्यक्ष स्नेहलता शर्मा ने बताया कि इस कार्यक्रम में कोटा शहर के 23 विद्यालयों के 13 से अधिक बच्चों ने भाग लेकर अपने देश के इतिहास, स्वतंत्रता संग्राम की घटनाओं, संस्कृति और साहित्य की जानकारी प्राप्त की। प्रतियोगिता में 124 छात्र – छात्राओं में प्रथम, द्वितीय, तृतीय स्थान प्राप्त किया।
उन्होंने बताया कि ऐसे ही संस्था द्वारा आयोजित राष्ट्रीय प्रश्नोत्तरी प्रतियोगिता में 13 राज्यों के 85 प्रतियोगियों ने भाग लिया था। विजेताओं को सम्मानित करने के लिए कार्यक्रम आयोजित किया जाएगा। इन कार्यक्रमों के लिए पूर्व संयुक्त निदेशक, सूचना एवं जन संपर्क विभाग, राजस्थान डॉ. प्रभात कुमार सिंघल को संयोजक नियुक्त किया गया था। रंगीतिका के सदस्यों ने विद्यालयों में संपर्क कर कार्यक्रम आयोजित करवा कर आयोजन को सफल बनाया।
संयोजक डॉ. सिंघल ने बताया कि मिशन बाल मन तक – 25 के अंतर्गत यह एक वृहद कार्यक्रम आयोजित किया गया। उन्होंने इसके लिए मुख्य ब्लॉक शिक्षा अधिकारी कोटा शहर स्नेहलता शर्मा, विद्यालयों संस्था प्रधानों और स्टाफ के साथ – साथ  रंगीतिका के अध्यक्ष रीता गुप्ता, सचिव महेश पंचोली, सदस्य डॉ. सुशीला जोशी, साधना शर्मा , वंदना शर्मा आदि का आभार व्यक्त किया है।

हिंदू कॉलेज में संविधान दिवस पर आयोजन

दिल्ली। उपनिवेशवाद से लड़ते हुए हमने अपना संविधान बनाया। हमारे देश और समाज के विभिन्न द्वंद्वों को इसमें जगह मिली है। संविधान बताता है कि हमने केवल अंग्रेजों से आजादी नहीं ली बल्कि देश के भीतर की गैर बराबरी से भी संघर्ष किया है। दिल्ली के बाबा साहब आंबेडकर विश्वविद्यालय में शिक्षा संकाय के आचार्य डॉ मनीष जैन ने संविधान के विभिन्न पक्षों पर विस्तार से चर्चा में कहा कि संविधान एक सपना भी है और हमारी बेहतरी का ताना बाना भी है। डॉ जैन ने हिंदू कालेज में राष्ट्रीय सेवा योजना द्वारा आयोजित कार्यक्रम में कहा कि वंचित समुदायों को अधिकार संपन्न बनाना और उन्हें बेहतर जीवन के लिए सशक्त बनाना भी हमारे संविधान को उदात्त और विशिष्ट बनाता है। उन्होंने कहा कि हमारा संविधान गरिमा और बंधुत्व के साथ सभी नागरिकों को अधिकारों से सम्पन्न करता है।

डॉ जैन ने अपने व्याख्यान के बाद संवाद सत्र में भी विद्यार्थियों और स्वयं सेवकों के सवालों के जवाब भी दिए। उन्होंने एक सवाल के जवाब में कहा कि राष्ट्रीय सेवा योजना के सेवा कार्य भारतीय संविधान की भावना के साथ युवाओं को विनम्र बनाते हैं और देशवासियों से जोड़ते हैं।
इससे पहले राष्ट्रीय सेवा योजना के कार्यक्रम अधिकारी डॉ पल्लव ने स्वागत किया। उन्होंने कहा कि हमारे देश ने लंबे संघर्ष के बाद स्वतंत्रता और लोकतंत्र का स्वाद चखा। डॉ पल्लव ने कहा कि युवा पीढ़ी के लिए यह चुनौती है कि स्वतंत्रता और लोकतंत्र को कायम रखें।

कार्यक्रम का संयोजन अर्चिता द्विवेदी और ईशान ने किया। कार्यक्रम में संविधान के निर्माण पर एक लघु फिल्म का प्रदर्शन भी किया गया गया। अंत में डॉ मनीष जैन को राष्ट्रीय सेवा योजना के छात्र अध्यक्ष निशांत सिंह ने शॉल ओढ़ाकर अभिनंदन किया।

अर्चिता द्विवेदी
जन संपर्क प्रमुख
राष्ट्रीय सेवा योजना
हिन्दू महाविद्यालय, दिल्ली
मो -9452536877

श्रीराम मन्दिर ध्वजारोहण पर पाकिस्तान की बौखलाहट

पाकिस्तान की भारत-निंदा की आदत कोई नई नहीं है; यह उसकी कूटनीति एवं संकीर्ण सोच का स्थायी चरित्र बन चुकी है। ऐसा शायद ही कोई अवसर हो जब भारत की बढ़ती शक्ति, बढ़ती साख और सांस्कृतिक उन्नयन का प्रभावी दृश्य उभरे और पाकिस्तान उसमें संकुचित मानसिकता से भरी त्रासद टिप्पणियां न करे, विरोध का वातावरण न बनाए या अंतरराष्ट्रीय मंचों पर अनर्गल आरोपों का पुलिंदा न खोले। हाल ही में अयोध्याजी में श्रीराम मंदिर पर हुए ध्वजारोहण समारोह को लेकर उसकी बौखलाहट इसी मानसिक दिवालियापन का ताज़ा उदाहरण है। भारतीयता के स्वाभाविक सद्भाव में सेंध लगाने का कोई अवसर पाकिस्तान हाथ से नहीं जाने देता।  यह केवल एक धार्मिक समारोह नहीं था, बल्कि भारत की सांस्कृतिक चेतना, सभ्यता-स्मृति और सांस्कृतिक स्वाभिमान का वह क्षण था जिसने पूरे विश्व का ध्यान आकर्षित किया। पाकिस्तान ने इस ऐतिहासिक घटना का विरोध ही नहीं किया बल्कि इसे संयुक्त राष्ट्र तक ले जाकर शिकायत की, जैसे उसे भारत के हर आंतरिक मामले में बाधा डालना ही अपनी कूटनीतिक जिम्मेदारी समझ में आता हो। इससे पहले भी उसने राम मंदिर निर्माण के अवसर पर अनर्गल विरोध दर्ज कराया था। यह उसका वह ढर्रा है जो भारत के सांस्कृतिक उत्थान एवं उन्नयन की किसी भी झलक को देखकर सहन नहीं कर पाता।
पूरे कुतर्क एवं कुचेष्टाओं के साथ अपने बयान में पाकिस्तान के विदेश कार्यालय ने आरोप लगाया है कि श्रीराम मन्दिर का ध्वजारोहण भारत में धार्मिक अल्पसंख्यकों पर दबाव बनाने की व्यापक प्रवृत्ति का परिणाम है। वैसे, दुनिया जानती है कि किस देश में अल्पसंख्यक ज्यादा दबाव में हैं। आज के समय में पाकिस्तान में बमुश्किल 50 लाख हिंदू बचे हैं, अन्य अल्पसंख्यक सिख और ईसाई तो न के बराबर हैं। पश्चिमी पाकिस्तान में बंटवारे से पहले करीब 15 प्रतिशत हिंदू रहा करते थे, पर बंटवारे के बाद हिंदुओं की संख्या 2 प्रतिशत के आसपास आ सिमटी। दूसरी ओर, भारत में 20 करोड़ से ज्यादा मुस्लिम हैं, इनकी संख्या अन्य अल्पसंख्यकों के साथ तेजी से बढ़ रही है। पाकिस्तान की ओर से यह फिजूल टिप्पणी ऐसे समय में आई है, जब पाकिस्तान खुद लंबे समय से हिंदुओं, ईसाइयों और अहमदिया मुसलमानों सहित दूसरे धार्मिक अल्पसंख्यकों के खिलाफ हिंसा का केंद्र बना हुआ है। संयुक्त राज्य अमेरिका के अंतरराष्ट्रीय धार्मिक स्वतंत्रता आयोग के अनुसार, 2025 की पहली छमाही में पूरे पाकिस्तान में ईसाइयों और हिंदुओं के खिलाफ हिंसा व उत्पीड़न जारी रहा है।
सौ चूहे खाकर बिल्ली हज को चली कहावत के अनुसार पाकिस्तान की यह दखलअंदाजी केवल अस्वीकार्य ही नहीं, बल्कि उसकी दोहरी मानसिकता और पाखंडी चरित्र को भी उजागर करती है। विडंबना यह है कि जो देश स्वयं अपने ही नागरिकों को सुरक्षित रखने में असमर्थ है, जो अपने ही अल्पसंख्यकों के मौलिक अधिकारों का हनन करता रहा है, वह भारत में मुसलमानों के अधिकारों की चिन्ता में रातभर जागने का अभिनय कर रहा है। वह देश, जहां हिंदुओं की आबादी 1947 से लेकर आज तक लगभग समाप्त होने की कगार पर पहुँच चुकी है, जहां सिखों पर अत्याचार के अनगिनत उदाहरण मौजूद हैं, जहां ईसाइयों की प्रार्थना सभाओं को अक्सर हिंसा का निशाना बनाया जाता है, वह भारत में अल्पसंख्यक अधिकारों पर प्रवचन देने का नैतिक अधिकार कैसे प्राप्त कर सकता है? पाकिस्तान की विश्वसनीयता इतनी क्षतिग्रस्त हो चुकी है कि उसकी हर शिकायत एक राजनीतिक नौटंकी से अधिक कुछ नहीं रह जाती।
पाकिस्तान के इस व्यवहार के पीछे भारत के बढ़ते आत्मविश्वास, उभरती वैश्विक प्रतिष्ठा और मजबूत होती राष्ट्र-चेतना का भय साफ दिखाई देता है। भारत आज जिस तेज़ी से विश्व राजनीति में प्रभावशाली भूमिका निभा रहा है, उसकी आर्थिक शक्ति जितनी तेज़ी से बढ़ रही है और जिसके सांस्कृतिक और सभ्यतागत विमर्शों को वैश्विक स्तर पर सम्मान मिल रहा है, वह पाकिस्तान की बेचैनी का मूल कारण है। पाकिस्तान यह समझ चुका है कि भारत केवल राजनीतिक या आर्थिक शक्ति के रूप में ही नहीं, बल्कि सांस्कृतिक महाशक्ति के रूप में भी उभर रहा है। अयोध्या में राम मंदिर का पुनर्निर्माण और इसके साथ जुड़ी सांस्कृतिक चेतना भारतीय समाज के भीतर एक नई एकता, नई ऊर्जा और एक नए आत्मसम्मान का निर्माण कर रही है। यही वह शक्ति है जिसे पाकिस्तान सबसे अधिक डरता है क्योंकि एक आत्मविश्वासी, एकजुट और संस्कृति-प्राण भारत उसकी कट्टरपंथी राजनीति और भारत-विरोधी साजिशों के लिए सबसे बड़ी चुनौती है।
पाकिस्तान की ओर से जो ‘बुकलेट्स’ और ‘शिकायतें’ अंतरराष्ट्रीय मंचों पर पेश की जाती हैं, वे वस्तुतः उसकी असफल विदेश नीति का प्रमाण-पत्र हैं। एक ऐसा देश, जो आज आर्थिक दिवालियापन, राजनीतिक अस्थिरता और आतंकवाद की जड़ों में स्वयं फंसा हुआ है, वह भारत के आंतरिक धार्मिक आयोजनों को राजनीतिक संकट बनाने का हास्यास्पद प्रयास करता है। उसका यह व्यवहार न केवल हस्तक्षेपकारी है, बल्कि उकसाने वाला भी है। भारत इन सब निराधार आरोपों को न केवल तथ्यात्मक रूप से खारिज करने में सक्षम है, बल्कि जरूरत पड़ने पर हर मंच पर सटीक जवाब देने की तैयारी भी रखता है। भारत की नीति स्पष्ट है, वह किसी भी देश के आंतरिक मामलों में दखल नहीं देता, परंतु अपने आंतरिक मामलों पर किसी की दखलंदाजी भी स्वीकार नहीं करता।
भारत की आंतरिक नीतियाँ संविधान और लोकतांत्रिक व्यवस्था से संचालित होती हैं। यहां का अल्पसंख्यक समुदाय किसी भी अन्य समुदाय की तरह समान अधिकारों का उपभोग करता है। भारत की भूमि पर हर धर्म, पंथ और विचारधारा को समान रूप से सम्मान मिलता है। यह विविधता और समभाव वाला देश है जहाँ मंदिर, मस्जिद, गुरुद्वारे और चर्च केवल स्थापत्य संरचनाएँ नहीं, बल्कि भारतीय संस्कृति के बहुरंगी फूल हैं। पाकिस्तान की एकरंगी धार्मिक नीति और कट्टरपंथी दबदबा इसे समझ नहीं पाता, इसलिए वह भारत के धार्मिक आयोजनों पर आपत्ति जताकर अपनी ही सीमित सोच को उजागर करता है।
भारत ने हर चुनौती, हर आरोप और हर उत्तेजक बयान का शांतिपूर्ण और तथ्याधारित उत्तर दिया है। यह संयम उसकी शक्ति भी है और संस्कृति भी। लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि भारत किसी उकसाने वाले कदम को नजरअंदाज करेगा। समय-समय पर भारत ने यह दिखाया है कि वह केवल सांस्कृतिक और आध्यात्मिक रूप से ही नहीं, बल्कि सामरिक, कूटनीतिक और आर्थिक स्तर पर भी पर्याप्त सक्षम है। पाकिस्तान यह भलीभांति जानता है कि भारत अब इक्कीसवीं सदी का भारत है-आत्मनिर्भर, जागृत, संगठित और विश्व-मान्य शक्ति। अयोध्या में राम मंदिर केवल एक धार्मिक स्थल का पुनर्निर्माण नहीं, बल्कि भारत की आत्मा से जुड़े सांस्कृतिक पुनर्जागरण की गूंज है। इसे कोई अंतरराष्ट्रीय मंच कमतर नहीं कर सकता। पाकिस्तान चाहे कितनी भी शिकायतें कर ले, कितने भी बयान जारी कर दे, या कितनी भी झूठी कहानियां गढ़ ले, भारत की सांस्कृतिक चेतना का उभार अविराम है और यह आगे भी नए आयाम स्थापित करता रहेगा।सच यह है कि पाकिस्तान की यह बौखलाहट उसकी पराजित मानसिकता का परिचायक है। भारत की बढ़ती शक्ति, बढ़ती प्रतिष्ठा और उभरती सांस्कृतिक पहचान उसके लिए सबसे बड़ा संकट है। लेकिन भारत का रास्ता स्पष्ट है-वह आगे बढ़ेगा, अपनी सभ्यता को सशक्त करेगा, अपनी संस्कृति को विश्व-पटल पर स्थापित करेगा और किसी भी अनर्गल हस्तक्षेप का दृढ़ता से सामना करेगा। पाकिस्तान चाहे कितने ही मोर्चों पर खतरा बने, भारत हर मोर्चे पर उत्तर देने में सक्षम है-साहस से भी, और संस्कार से भी।
प्रेषकः
(ललित गर्ग)
लेखक, पत्रकार, स्तंभकार
ई-253, सरस्वती कंुज अपार्टमेंट
25 आई. पी. एक्सटेंशन, पटपड़गंज, दिल्ली-92
फोनः 22727486, 9811051133

संस्कृति और शृंगार बोध को जीवंत कर देते हैं पारंपरिक परिधान

भारत विविध संस्कृतियों के फूलों का एक मनोहारी गुलदस्ता है। सिंधुघाटी, वैदिक, उत्तर वैदिक, हिन्दू, राजपूत, मुगल राजाओं के काल से लेकर वर्तमान समय तक आभूषण और परिधान शृंगार के प्रतीक रहे हैं।
भारत में कश्मीर, पंजाब, हिमाचल, उत्तर प्रदेश, राजस्थान, मध्य प्रदेश, गुजरात, महाराष्ट्र, तमिलनाडु, कर्नाटक, आंध्रप्रदेश, ओडिशा राज्यों के साथ – साथ पूर्वोत्तर भारत राज्यों में विविध प्रकार के आभूषणों के साथ – साथ विविध रंगों, डिजाइनों, आकर – प्रकार की वेशभूषा भी किसी शृंगार से कम नहीं है। कश्मीर और लद्दाख के हेमिस और गोम्पा नृत्यों, पंजाब के भांगड़ा और गिद्दा नृत्यों, हिमाचल के नृत्यों, उत्तर प्रदेश के कथक और शास्त्रीय नृत्यों, राजस्थान के घूमर, कालबेलिया, डांडिया, चिरमी, तेरहताली आदि नृत्यों, गुजरात के गरबा नृत्य, ओड़िशी नृत्य, दक्षिण भारत के कथकली, पूर्वोत्तर भारत के आदिवासियों का नागा नृत्य, बांस नृत्य, असम का  बिहू नृत्य आदि देश के प्रमुख नृत्यों में विशभूषा की शृंगारिता नयनाभिराम होती है। इनमें हमें देश की शृंगारित वेशभूषा के दर्शन होते हैं।
यही नहीं हमारे देवी देवताओं की पोषक भी किसी आकर्षण से कम नहीं है जो उनका शृंगार करती हैं। लक्ष्मी, दुर्गा, सरस्वती,पार्वती आदि देवियों, कृष्ण – राधा आदि को मंदिरों और चित्रकला में आकर्षक पोशाक के साथ शृंगारित रूप में देखा जाता है। आभूषणों के साथ – साथ शृंगारित पोशाक सौंदर्य का महत्वपूर्ण हिस्सा है। किसी भी रूप में हम वेशभूषा , परिधान और पोषक को शृंगार से पृथक कर नहीं देख सकते। वेशभूषा भी शृंगार का ही एक प्रबल और महत्वपूर्ण हिस्सा है। सोलह शृंगार की अवधारणा भी इसकी पुष्टि करती है।
निर्विवाद कह सकते हैं कि शृंगार में आभूषण पहनना अथवा विविध प्रकार सजने – संवारने के साथ – साथ परिधान की भूमिका भी अत्यंत महत्वपूर्ण है। साक्ष्यों से ज्ञात होता है कि सुंदर और आकर्षक दिखने के लिए राजाओं के काल में चाहे वह राजपूत काल हो या मुगल काल  अथवा देश के किसी अन्य राजाओं का काल अलंकृत परिधान न केवल राजाओं वरन कुलीन वर्ग, सामंतों की शोभा बढ़ाती थी। उनके वस्त्र कीमती कपड़े के होने के साथ – साथ जटिल कारीगरी युक्त स्वर्ण रजत से जड़े होते थे। महिलाओं की तरह पुरुष भी आभूषणों के शौकीन थे और आभूषण धारण करते थे।
रत्नजड़ित वस्त्र :
हमें जब भी किसी भी संग्रहालय को देखने का मौका मिलता है तो हम देखते हैं कि अमूमन हर संग्रहालय में पृथक से एक वस्त्र दीर्घा होती है। यह वस्त्र दीर्घा हमें प्राचीन समय में राजाओं और रानियों के वस्त्रों के बारे में उपयुक्त जानकारी देते हैं, जो उस काल खंड की कुलीन वेशभूषा के बारे में बताते हैं। खास कर राजपूत शासकों के समय के वस्त्र आकर्षक कशीदाकारी और रत्न जड़ित दिखाई देते हैं। यह इस ओर इंगित करते हैं कि राजा और रानी केवल आभूषणों से ही शृंगार नहीं करते थे वरन उनके परिधान भी किसी आभूषण से कम नहीं होते थे। इन रत्न जड़ित वस्त्रों का आकर्षण देखते ही बनता है।
राजपूत राज्य में शृंगार  :
 हमारे देश के इतिहास में 7वीं शताब्दी ई. से 12वीं शताब्दी ई. तक का 500 साल का काल राजपूत शासन काल कहा जाता है। इस काल खंड में हिंदू धर्म का नवीनीकरण हुआ, इस काल को शौर्य का युग भी कहा जाता है। राजपूतों के अनेक कुल हुए। खासकर इस काल में चौहानो और प्रतिहारों का प्रभुत्व बढ़ा। लगभग संपूर्ण उत्तर भारत उनके आधिपत्य में  था। त्रिपक्षीय संघर्ष में जीत ने उत्तर भारत में प्रतिहारों की प्रभुता स्थापित की। पृथ्वी राज चौहान प्रतापी शासक हुए। मुगल काल में भी राजा, रानी और दरबारियों की अलंकृत पोशाखें देखते ही बनती हैं।
 जयपुर के सिटी पैलेस संग्रहालय के  मुबारक महल के भूतल पर स्थित वस्त्र दीर्घा अत्यंत समृद्ध है। यहाँ विभिन्न प्रकार के वस्त्र और कपड़े प्रदर्शित हैं, जिनमें महाराजा सवाई माधो सिंह प्रथम का आत्मसुख , महाराजा सवाई प्रताप सिंह की शादी का जामा जो लाल सूती वस्त्र का 129 सेंटीमीटर लंबा है और 320 कली का विशाल घेर वाला है देखते ही बनता है। यही पर महाराजा सवाई राम सिंह द्वितीय के अंगरखी ,महारानियां द्वारा दीपावली पर पहने जाने वाली सूती पोशाक, कशीदाकारी के कश्मीरी शाल,बनारस और सूरत के खीमखाब, सांगानेर की ठप्पा छपाई के वस्त्र, जयपुर की बांधनी, बंधेज, गोटा के वस्त्र देखने को मिलते हैं। यहां प्रदर्शित पोशाखें अत्यंत जटिल कारीगरी लिए हुए आकर्ष हैं।
 राजपूत शासक शौर्य और वीरता की प्रतिमूर्ति होने से उनकी वेशभूषा में भी इस भाव का प्रदर्शन स्पष्ट देखने को मिलता हैं। इनकी पारंपरिक वेशभूषा की एक अलग शैली का प्रदर्शन करते हुए इनकी संस्कृति दिखाई देती हैं। शासक ही नहीं इस समुदाय के व्यक्ति भी अपने को विभिन्न आभूषणों और गहनों से सजाना पसंद करते थे। जो समृद्ध और शक्तिशाली होते थे वे जटिल डिजाइन  की सजावट वाले उच्च स्तर के कपड़े से बने वस्त्र धारण करते थे। कुलीन पोशाकें मुख्य रूप से राजपूत पुरुषों द्वारा पहनी जाती थीं जो काफी विस्तृत दरबारी पोशाक होती थी। शासकों की पोशाकें महंगी और बारीक होती थी। उनके  सिर पर रत्नजड़ित या गोटेदार पगड़ी, मालवेद या रत्नजड़ित पट्टी होती थी। वैष्णव परंपरा के मुताबिक, पुरुषों के लिए बारह कसों की अंगरखी का पहनावा महत्वपूर्ण माना जाता था। राज दरबार के मुखिया ही इस अंगरखी को पहन सकते थे।
कुलीन वर्ग :
 कुलीन वर्ग के परिधान में मुख्य तौर पर पगड़ी, अंग राखी, चूड़ीदार पायजामा और एक बेल्ट होती है जिसे “कमरबंध” कहा जाता है। अंगरखी एक लंबा ऊपरी वस्त्र है जिसे बिना आस्तीन के करीब-करीब सामने पहना जाता है। इसमें एक विषम सामने का योक होता है और यह बीच में खुला होता है और केंद्र-सामने कमर के कोने में बंधा होता है। जामा और शेरवानी  शाही लोगों द्वारा पहने जाने वाले अन्य ऊपरी वस्त्र हैं। निचले परिधान में पतलून शामिल है। ‘धोती’ भी पहनी जाती है,  तेवेटा शैली सबसे अधिक थार रेगिस्तान क्षेत्र में पहनी जाती है, जबकि अन्य क्षेत्र में तिलंगी शैली का उपयोग करते हैं।
पगड़ी :
16वीं सदी के बाद पहनावे में बदलाव आया।  महाराणा करण सिंह का मुग़ल बादशाह शाहजहाँ के पगड़ी बदल भाई बनने पर पगड़ी पर मुग़ल प्रभाव आने लगा था। जगतसिंह प्रथम, राजसिंह एवं जयसिंह के राज्यकाल में शाहजानी पगड़ी चलती रही। राणा अमरसिंह द्वितीय ने पगड़ियों की नई शैली अपनाई, जो आकार में छोटी थी। यह महाराणा राजसिंह द्वितीय तक चलती रही। इस प्रकार की पगड़ी को ‘अमरशाही पाग’ के रूप में जाना गया। महाराणा अरसी की पगड़ी बूँदी शैली के निकट है, जो महाराणा भीमसिंह एवं जवानसिंह के राज्यकाल तक चलती रही। जवानसिंह के बाद पगड़ी के रूपों में बहुत अधिक परिवर्तन आये। महाराणा स्वरूपसिंह ने जो पगड़ी में परिवर्तन किया, उसे ‘स्वरूशाही पगड़ी’ के नाम से जाना जाता था।
राजपूत महिला :
 राजपूत महिलाओं की पारंपरिक पोशाक में घाघरा, चोली, और ओढ़नी शामिल हैं।  घाघरा  लंबाई में कशीदाकारी वाली स्कर्ट होती है । घाघरा साटन, रेशम या ऑर्गेजा से बना एक बड़ा गोटेदार स्कर्ट होता है। घाघरा सोने या चांदी की कढ़ाई से सजा होता है जो पहनने वाले की संपन्नता को दर्शाता है। राजपूत महिलाएँ  कलीदार, चारपाई और कालीपट्टी किस्म के घाघरे पहनती हैं। ऊपरी शरीर का पहनावा चोली , अंगिया या कुर्ती,  होता है। ओढ़नी या चुनार, कपड़े का एक लंबा टुकड़ा होता है, जिसे घूंघट के रूप में पहना जाता है। महिलाओं की पोशाक का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा “ओढ़ना ” था जिसे ब्रोकेड में बुना जाता है और गुलाबी या बैंगनी जैसे चमकीले आधार पर रेशम के धागे से बनाया जाता है। राजपूत महिलाएँ अलग-अलग अवसरों के आधार पर अलग-अलग तरह के ‘ओढ़ना’ पहनती हैं, जो जो लाल, मैजेंटा, हरे या पीले रंग में साटन या महीन सूती कपड़े से बने होते हैं।
राजपूत महिलाओं के आभूषणों की शैली और डिज़ाइन देखते ही बनते हैं। युवा राजपूत लड़कियों के कपड़ों में ‘पुथिया’ नामक एक ऊपरी वस्त्र शामिल होता है जो पीले, गुलाबी और सफेद रंग के सूती कपड़े से बना होता है और यह सादा या मुद्रित हो सकता है। युवा लड़कियाँ ‘सुलहंकी’ नामक एक ढीला पायजामा पहनती हैं।
आभूषणों में रखड़ी सिर का आभूषण है; माची-सूलिया कानों में पहना जाता है। उनके हार तेवटा, पटिया और आड़ हैं। रखड़ी, नथ और चूड़ा महिला की वैवाहिक स्थिति के प्रतीक हैं। पैरों के आभूषणों में जोड़, रिमझोल और पगपन शामिल हैं। महिला और पुरुषों के जूतों पर आकर्षक कढ़ाई की हुई होती है, जिस से वे खूबसूरत प्रतीत होते हैं।
राजस्थान में विभिन्न जातियों बंजारा, सपेरा, गुर्जर, रेबारी आदि के पुरुष और महिलाओं खासकर इनके लोक कलाकारों की वेशभूषा और शृंगार उनकी जातीय परम्परा और राजस्थानी संस्कृति का सुंदरतम प्रतीक हैं।
आजकल सभी समुदाय की आधुनिक लड़कियां राजपूती पोशाक फैशन के रूप में धारण करती हैं। यह पोषक अत्यंत जटिल डिजाइन में सुंदर लगती हैं। कढ़ाई और अलंकरण युक्त राजपूती पोशाकों को पहन कर किसी भी लड़की की प्रबल इच्छा होती है कि वह  दुल्हन के रूप में शाही और सुंदर लगे।
इसी तरह विवाह के समय लड़के और लड़कियां जोधपुरी पोशाक पहना चाहती हैं। राजस्थानी पोशाक का सलमे सितारों और कशीदाकारी वाला कीमती से कीमती घाघरा दुल्हन की पहली पसंद होती है। यह धाधरा   कॉटन, साटन  क्रेप,  जार्जेट और शिफॉन आदि कपड़ों से बनाया जाता है। यह सुंदर, क्लासिक और फैशनेबल डिज़ाइन और कढ़ाई में लाल, मजेंटा, गुलाबी, नारंगी, नीला और हरे रंग में होती हैं। इन पर ज़रदोज़ी, गोटा पट्टी, ज़री और कुंदन आदि की कलात्मक सजावट की जाती है। बारात में राजस्थानी पगड़ी और साफ़ों का इंद्रधनुषी रंग देखते ही बनता है।
पंजाबी शृंगार :
पंजाब के प्रसिद्ध नृत्य भांगड़ा और गिद्दा नृत्यों के समय नर्तक पुरुषों और महिलाओं की रंडबरंगी पोशाक का आकर्षण देखते ही बनता है।  पुरुष परंपरागत रूप से  ‘कुरता-पजामा’ और पगड़ी तथा स्त्रियां ‘सलवार-कमीज़’ के साथ एक रंग-बिरंगा ‘दुपट्टा’  पहनते हैं। हरियाणा और हिमाचल प्रदेश के कुछ हिस्सों में महिलाएं ज्यादातर पंजाब के प्रसिद्ध लोक नृत्य ‘गिद्दा’ के दौरान पंजाबी घाघरा पहनती है जो अत्यंत आकर्षक होता है और उनके सौंदर्य में चार चांद लगता है। महिलाओं के परिधानों पर पारंपरिक पुष्प कला ” फुलकारी ” के वस्त्र शॉल, कुर्ते, दुपट्टे और लहंगे पर जटिल डिजाइन के आकर्षण के साथ बुना जाता है, विशेष अवसरों पर पहनती हैं। फूल शिल्प’ कला पंजाब की संस्कृति में 15वीं शताब्दी से चली आ रही है। वारिस शाह के प्रसिद्ध रोमांटिक उपन्यास ‘हीर-रांझा’ में इस रचनात्मक कढ़ाई का उल्लेख किया गया है। शॉल, दुपट्टे, लहंगे, कुर्ते और सलवार सूट पर जीवंत रंगीन बनाई में बुने गए उत्तम फूलों के पैटर्न इन परिधानों को वास्तव में आकर्षक बनाते हैं। खूबसूरत डिजाइन लिए पटियाला सलवार सूट अपनी शान और स्टाइल के लिए न केवल पंजाब में वरन पूरे उत्तरी भारत में लोकप्रिय है। जामा – कपड़े से लंबाई में बने जामा को  मुगल काल के दौरान पंजाब क्षेत्र के पुरुष सिर पर पगड़ी के साथ पहनते थे जो राजाओं की शाही और राजसी प्रकृति को दर्शाता है। यह मूल रूप से पुरुषों के लिए एक पोशाक थी, लेकिन महिलाएं भी इसे टाइट-फिटिंग पायजामा के साथ पहनती थी।
महिलाओं में सिर के बालों के साथ गुंथी आभूषणों और रंग-बिरंगे धागों से सजी परांडी या परांदा पंजाब की महिलाओं द्वारा उपयोग  की जाने वाली बालों का सहायक शृंगार है। यह प्यार का भी प्रतीक है जब दुल्हन इसे अपने पति से स्नेह के रूप में प्राप्त करती है। परांडी अलग-अलग आकार और रंगों में आती हैं और इन्हें हार, टीका, चूड़ियों और इसके सिरे पर सुनहरे रंग की चमक जैसे आभूषणों से सजाया जा सकता है। यह पंजाब की महिलाओं के उत्साह को दर्शाता है और पूरे भारत में महिलाओं द्वारा इसका बड़े पैमाने पर उपयोग किया जाता है। पंजाबी जूता या जूती  400 सालों से राजाओं की शाही परंपरा का हिस्सा रही है और पारंपरिक रूप से असली सोने या चांदी के धागों से चमड़े पर कढ़ाई की जाती है। पंजाब की पारंपरिक पोशाक सुंदरता और चमकीले रंगों का एक आकर्षक मिश्रण है।
गुजराती शृंगार
गुजरात संस्कृति में शृंगार और शृंगारित वेशभूषा जग जाहिर हैं। पारंपरिक वेशभूषा अपने जीवंत  और भड़कीले रंगों और जटिल शिल्प कौशल के लिए प्रसिद्ध है। मिरर वर्क और कशीदाकारी उनके परिधानों को चित्ताकर्षक बनती है। शृंगारित परंपरा हमें उनके प्रसिद्ध गरबा, डांडिया रास , तिप्पनी , पधार , सिदी और डांगी नृत्यों के समय  बखूबी देखने को मिलती है।  पुरुषों के लिए, विशिष्ट पोशाक में ‘कुर्ता’ या ‘केडिया’ और ‘धोती’ या ‘चूड़ीदार’ शामिल हैं, जिसके साथ  एक पारंपरिक पगड़ी भी होती है। महिलाएं आमतौर पर ‘चनिया चोली’ पहनती हैं, जो एक खूबसूरत पहनावा है जिसमें एक भड़कीली स्कर्ट (चनिया), एक फिट ब्लाउज (चोली) और एक दुपट्टा होता है। इन कपड़ों को अक्सर बेहतरीन कढ़ाई, शीशे के काम और मनके के काम से सजाया जाता है, जो गुजरात की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत को दर्शाता है। त्योहारों, शादियों और अन्य महत्वपूर्ण सामाजिक और पारिवारिक समारोहों और पारंपरिक नृत्यों के दौरान पहने जाने वाले ये कपड़े गुजरात के लोगों की शृंगार प्रियता और सौंदर्य बोध का प्रतीक है। पाटन में हथकरघा पर बुनी पटोला साड़ी पूरे विश्व में मशहूर है।
  यहीं शृंगार परिधान बोध हमें देश के अन्य राज्यों कश्मीर, ओडिशा, आदि में भी देखने को मिलता है। आभूषणों के शृंगार के साथ – साथ परिधान शृंगार मिल कर ही सम्पूर्ण रूप से शृंगार का बोध करता है।
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शिखा अग्रवाल, भीलवाड़ा, राजस्थान
चित्र : गूगल से साभार

भारत-कनाडा के रिश्तों में नई गर्माहट बड़े बदलाव का संकेत

भारत और कनाडा के रिश्तों पर पड़ी बर्फ धीरे-धीरे पिघल रही है और दोनों देशों के बीच एक नए विश्वास, सहयोग और साझेदारी का वातावरण आकार ले रहा है। वैश्विक राजनीति के बदलते स्वरूप, व्यापारिक हितों और तकनीकी साझेदारियों की बढ़ती जरूरतों ने दोनों देशों को पुनः संवाद और सहयोग की राह पर लौटने के लिए प्रेरित किया है। जून से शुरू हुआ यह सकारात्मक बदलाव अब व्यापक रूप में दिखाई देने लगा है, जिसका संकेत हाल ही में की गई द्विपक्षीय बैठकों, उच्चस्तरीय संपर्कों और आर्थिक सहयोग की घोषणाओं में स्पष्ट रूप से परिलक्षित होता है। भारत के केंद्रीय वाणिज्य एवं उद्योग मंत्री पीयूष गोयल द्वारा 2030 तक द्विपक्षीय व्यापार को 50 अरब डॉलर तक ले जाने के लक्ष्य एवं कनाड़ा द्वारा अब नागरिकता के बंद दरवाजे खोलने की घोषणा इस परिवर्तन की गहराई और व्यापकता को रेखांकित करती है। यह लक्ष्य केवल व्यापार बढ़ाने का संकल्प मात्र नहीं है बल्कि यह उस नये दौर की प्रतीकात्मक दस्तक है जिसकी ओर दोनों देश बढ़ रहे हैं और इससे दोनों देशों को फायदा होगा।
पिछले कुछ समय में भारत और कनाडा के रिश्तों में जिस तरह तनाव और अविश्वास ने जगह बनाई थी, वह दोनों देशों के लंबे ऐतिहासिक, सांस्कृतिक और जन-आधारित संबंधों के विपरीत था। खालिस्तान मुद्दे पर कनाडा में बढ़ती गतिविधियों, राजनीतिक आरोपों-प्रत्यारोपों और न्यायिक प्रक्रियाओं ने दोनों देशों के रिश्तों में गहरी खटास पैदा की थी। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और पूर्व कनाडाई प्रधानमंत्री जस्टिन ट्रूडो के बीच दूरी सार्वजनिक रूप से दिखाई देती थी और कूटनीतिक संवाद लगभग ठहर-सा गया था। जस्टिन ट्रूडो ने राजनीतिक दबाव एवं स्वार्थ के चलते भारत से ऐतिहासिक संबंधों को धुंधलाया, जिसका खामियाजा उन्होंने भुगता भी है। लेकिन अब नई सरकार के प्रधानमंत्री मार्क कार्नी ने नये जोश, आत्मीयता एवं संवेदनाओं के साथ भारत से दोस्ती का हाथ बढ़ाया है। बदलती वैश्विक परिस्थितियों, व्यापारिक अवसरों के विस्तार और नई आर्थिक-रणनीतिक जरूरतों ने दोनों पक्षों को यह अहसास कराया कि रिश्तों का ठहराव किसी भी तरह से फायदेमंद नहीं है। इसी समझ ने दोनों देशों को संवाद के नये पुल बनाने और पुराने अवरोधों को पीछे छोड़ने की दिशा में आगे बढ़ाया।
नरेंद्र मोदी और मार्क कार्नी की जी-20 शिखर सम्मेलन के दौरान हुई मुलाकात इस बदलाव का एक महत्वपूर्ण पड़ाव साबित हुई। यह मुलाकात भले ही मुख्य सत्रों के इतर हुई, लेकिन उसका संदेश अत्यंत गहरा और दूरगामी था। यहां दोनों नेताओं ने व्यापार, निवेश और टेक्नोलॉजी इनोवेशन जैसे महत्वपूर्ण क्षेत्रों में सहयोग बढ़ाने पर सहमति व्यक्त की। भारत और कनाड़ा के पास डिफेंस, स्पेस, क्रिटिकल मिनरल्स, एनर्जी और एजुकेशन समस्त कई क्षेत्रों में सहयोग एवं सहमति बढ़ाने के मौके हैं। यह सहमति केवल औपचारिकता नहीं बल्कि रिश्तों को एक नए मोड़ पर लाने का संकेत थी। कनाडा एक उभरती हुई टेक्नोलॉजी शक्ति है और भारत विश्व की सबसे बड़ी तकनीकी प्रतिभा का केंद्र बन चुका है। ऐसे में दोनों देशों के बीच टेक्नोलॉजी, इनोवेशन, स्टार्टअप्स, ऊर्जा और शिक्षा के क्षेत्र में अपार संभावनाएँ हैं जिनकी दिशा अब खोली जा रही है। वैसे भी भारत के स्टूूडेंट्स के लिये अब भी कनाड़ा  सबसे पसंदीदा जगहों में एक हैं। कनाडा अपने नागरिकता कानून में भी बदलाव करने जा रहा है, उससे भी भारतीयों को फायदा होने की व्यापक संभावनाएं है।
पीयूष गोयल के वक्तव्य में दिखती आर्थिक साझेदारी की दृष्टि इस बात का परिचायक है कि भारत और कनाडा अब केवल राजनीतिक संवाद से आगे बढ़कर व्यावहारिक सहयोग के नए आधार बना रहे हैं। 50 अरब डॉलर के द्विपक्षीय व्यापार का लक्ष्य बेहद महत्वाकांक्षी है, लेकिन यह उन आर्थिक संभावनाओं का वास्तविक अनुमान भी है जो दोनों देशों की नीतियों, संसाधनों और क्षमताओं में मौजूद है। भारत कनाडा के लिए एक विशाल बाजार है और कनाडा भारत के लिए एक महत्वपूर्ण ऊर्जा, खनिज, कृषि और तकनीकी साझेदार। इसी परस्पर निर्भरता और जरूरत ने दोनों देशों को फिर से एक-दूसरे की ओर कदम बढ़ाने के लिए प्रेरित किया है। अब जरूरी है कि विभिन्न स्तरों पर बातचीत जारी रखते हुए जल्द समझौते तक पहुंचा जाये।
हाल के वर्षों में दुनिया बहुधू्रवीय स्वरूप की ओर बढ़ रही है। अमेरिका, यूरोप, चीन, रूस और पश्चिम एशिया जैसे शक्ति केंद्रों के बीच उभर रही नई अनिश्चितताओं ने मध्यम और उभरती शक्तियों को नए साझेदार तलाशने के लिए विवश किया है। भारत और कनाडा इस वैश्विक संरचना में ऐसे दो देश हैं जिनके पास जनसांख्यिकीय शक्ति, आर्थिक संसाधन, शिक्षा-तकनीक की क्षमता और लोकतांत्रिक मूल्यों का साझा आधार मौजूद है। ऐसे में इन दोनों का साथ आना न केवल द्विपक्षीय संबंधों के लिए आवश्यक है बल्कि एक नई वैश्विक संरचना के निर्माण में भी उपयोगी हो सकता है। यह संरचना सहयोग, नवाचार, जलवायु न्याय, हरित तकनीकों और स्थायी विकास पर आधारित हो सकती है। कनाडा में भारतीय मूल की बड़ी आबादी दोनों देशों के रिश्तों को मानवीय और सामाजिक आधार भी देती है। जब भी रिश्तों में तनाव आया, प्रवासी भारतीय समुदाय उसके बीच पुल की तरह खड़ा दिखाई दिया है। यही समुदाय आर्थिक, शैक्षिक, सांस्कृतिक एवं व्यावसायिक रिश्तों को नई दिशा देने में निर्णायक भूमिका निभा सकता है। यह समुदाय न केवल कनाडा के आर्थिक विकास का हिस्सा है बल्कि भारत-कनाडा संबंधों की गहरी कड़ी भी है। यही कारण है कि दोनों सरकारों ने इस सामाजिक संबंध को और मजबूत करने का प्रयास शुरू किया है जिससे गलतफहमियाँ कम हों, लोगों के बीच भरोसा बढ़े और राजनीतिक विवादों का असर द्विपक्षीय रिश्तों पर सीमित रहे।
वर्तमान दौर में भारत की वैश्विक छवि एक निर्णायक, प्रभावशाली और विश्व-हितैषी शक्ति के रूप में उभर रही है। प्रधानमंत्री मोदी की कूटनीतिक शैली, वैश्विक मंचों पर सक्रियता और विकास-शांति आधारित विदेश नीति ने भारत की स्थिति को नई ऊंचाइयों पर पहुंचाया है। दूसरी ओर कनाडा भी एक स्थिर लोकतंत्र और बहुसांस्कृतिक देश के रूप में वैश्विक स्तर पर अपनी भूमिका को नए सिरे से परिभाषित कर रहा है। दोनों देशों की यह समान सोच और नई वैश्विक चुनौतियों के प्रति साझा दृष्टिकोण अब आपसी सहयोग के लिए अधिक अनुकूल अवसर पैदा कर रहा है। समीक्षा के इस चरण में यह स्पष्ट है कि भारत-कनाडा संबंधों में आया यह सकारात्मक मोड़ केवल कूटनीतिक औपचारिकता नहीं बल्कि गहरे आर्थिक, सामाजिक और रणनीतिक हितों पर आधारित है। मार्क कार्नी सरकार को भी यह समझ आ रही है कि भारत जैसे मजबूत साझेदार से दूरी कनाडा की आर्थिक और वैश्विक भूमिका के लिए सही नहीं। वहीं भारत भी उन देशों के साथ संबंधों का विस्तार चाहता है जो तकनीक, शिक्षा, कृषि, ऊर्जा और नवाचार के क्षेत्रों में मूल्यवान साझेदारी दे सकते हैं। यही वजह है कि दोनों देश अब नयी समझ विकसित करते हुए एक ऐसे दौर की ओर बढ़ रहे हैं जिसमें संवाद, सहयोग और परस्पर सम्मान केंद्रीय भूमिका निभाएंगे।

अंततः यह कहा जा सकता है कि भारत और कनाडा के रिश्तों में शुरू हुई यह नई गर्माहट एक बड़े बदलाव का संकेत है। यह बदलाव न केवल आर्थिक समृद्धि को बढ़ावा देगा बल्कि वैश्विक शांति, नई तकनीक, हरित विकास और सामाजिक सौहार्द की दिशा में भी नई संभावनाएँ खोलेगा। दोनों देश यदि इसी सकारात्मक दिशा में आगे बढ़ते रहे तो यह केवल द्विपक्षीय संबंधों को नई मजबूती नहीं देगा, बल्कि एक नई विश्व संरचना के निर्माण में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा।

प्रेषकः
(ललित गर्ग)
लेखक, पत्रकार, स्तंभकार
ई-253, सरस्वती कंुज अपार्टमेंट
25 आई. पी. एक्सटेंशन, पटपड़गंज, दिल्ली-92
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शीत ऋतु की शुरुआत में डॉ. अच्युत सामंता ने 40 हजार आदिवासी छात्र-छात्रों को प्रदान किए ऊनी वस्त्र

भुवनेश्वर। शीत ऋतु की शुरुआत में ही विश्व के सबसे बड़े आदिवासी आवासीय विद्यालय कीस ने अपने 40,000 आदिवासी छात्र-छात्रों को गर्म वस्त्र बांटे।कीस के संस्थापक महान् शिक्षाविद् प्रोफेसर अच्युत सामंत ने स्वयं बच्चों को अपने हाथों से गर्म कपड़े बड़ी ही आत्मीयता के साथ बांटे।उन्होंने बालिकाओं को शॉल और बालकों को स्वेटर प्रदान किए जिसे उन्होंने स्वयं खरीदकर पंजाब के लुधियाना से  मंगवाया था। 2025 की ठंड से बचने हेतु अपने पिता तुल्य संस्थापक प्रोफेसर अच्युत सामंत के हाथों से गर्म वस्त्र पाकर छात्र-छात्राओं में अत्यंत उत्साह और खुशी देखी गई।

उल्लेखनीय है कि ओड़िशा की राजधानी भुवनेश्वर में स्थित है कीस-कीट जिसके संस्थापक हैं महान् शिक्षाविद् प्रोफेसर अच्युत सामंत जिन्होंने 1992-93 में अपनी कुल जमा पूंजी पांच हजार रुपये से कीट-कीस का आरंभ किया था। वही कीट-कीस आज दो डीम्ड विश्वविद्यालय बन चुके हैःकीट डीम्ड विश्वविद्यालय,भुवनेश्वर तथा कीस डीम्ड विश्वविद्यालय,भुवनेश्वर। दोनों शैक्षिक संस्थाओं में चालीस-चालीस हजार बच्चे पढ़ते हैं।

आयोजित भव्य कार्यक्रम में कीट डीम्ड विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. सरनजीत सिंह, कीस के कुलसचिव डॉ. प्रशांत कुमार राउतरे तथा अतिरिक्त कुलसचिव प्रमोद पात्र आदि उपस्थित थे।

स्वतंत्रता आंदोलन, संस्कृति और साहित्य की जानकारी से एक हजार बच्चों का ज्ञान बढ़ाया

कोटा/ देश के स्वतंत्रता आंदोलन, संस्कृति और साहित्य से प्रश्नोत्तरी के माध्यम से एक हजार से अधिक स्कूली बच्चों का ज्ञानवर्धन किया गया। वंदेमातरम् गीत के 150 वर्ष पूर्ण होने पर मिशन बाल मन तक – 2025 के अंतर्गत कोटा जिले के राजकीय बालिका उच्च माध्यमिक सीमलिया, सुल्तानपुर की प्रधानाध्यापिका डॉ. वैदेही गौतम द्वारा उनके अधीन 4 सरकारी एवं 2 निजी विद्यालयों में
संस्कृति, साहित्य, मीडिया फोरम के सहयोग से यह आयोजन किया गया। बच्चों ने अपने देश के स्वतंत्रता आंदोलन के प्रसंगों, राष्ट्रीय गीत, राष्ट्रीय चिन्ह, संस्कृति के पहलुओं और साहित्य के बारे में ज्ञानवर्धन किया और जिज्ञासाओं का समाधान किया।
डॉ. वैदेही ने बताया कि राजकीय बालिका उच्च माध्यमिक सीमलिया सुल्तानपुर में  250 बालिकाओं ने भाग लिया। कनिष्ठ वर्ग  कक्षा 6 से 8 में प्रथम पूनम प्रजापत ,द्वितीय अंजलि और तृतीय भावना मीणा रही। वरिष्ठ वर्ग 10 से 12  में प्रथम अविका शर्मा, द्वितीय अंतिमा  मेरोठा और तृतीय रूपाली शर्मा रही।
राजकीय उच्च माध्यमिक विद्यालय सीमलिया में 200 बच्चों ने भाग लिया। कनिष्ठ वर्ग कक्षा 6 से 8 में प्रथम  दिलखुश मेराठा ,द्वितीय  नवीन , तृतीय  रियान अली और वरिष्ठ वर्ग में  कक्षा 9 से 12 मेंप्रथम   विशाल कुमार ,द्वितीय  दिलजीत मीणा एवं तृतीय ललित रहे।
राजकीय उच्च प्राथमिक विद्यालय, कराडिया में 55 बच्चों ने भाग लिया। प्रथम अमन बैरवा, द्वितीय मुस्कान बैरवा एवं  तृतीय महावीर मीना रहे। राजकीय उच्च प्राथमिक विद्यालय, कल्याणपुरा में 25 बच्चों ने भाग लिया। प्रथम  लवली मालव,द्वितीय  तनिशा बैरवा एवं तृतीय  राधे योगी रहे।
दो निजी विद्यालयों केशव बाल उच्च माध्यमिक विद्यालय , सीमलिया में 350 बच्चों ने भाग किया। कनिष्ठ वर्ग में कनिष्ठ वर्ग मेंप्रथम अक्षिता मीणा,द्वितीय- प्रीतम कुमार, तृतीय राधिका सुमन, वरिष्ठ वर्ग में  प्रथम मोहित गोस्वामी, द्वितीय-आरती प्रजापति एवं तृतीयअंजली मेघवाल रहे। तिलक सीनियर सेकेंडरी स्कूल, सीमलिया में 250 बच्चों ने भाग लिया। कनिष्ठ वर्ग में प्रथम पुनीत वैष्णव,
द्वितीय खुशी पांचाल, तृतीय-अरसीन खान,  वरिष्ठ वर्ग में प्रथम अंजली मेघवाल, द्वितीय- सुरेश पारेता एवं तृतीय अरसीन  खान रहें।

आत्मनिर्भर भारत व नारी सशक्तीकरण की दिशा में एक और चरण – चार श्रम संहिताएं

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली केंद्र सरकार श्रम सुधारों की दिशा में निरंतर प्रयासरत है। नयी श्रम संहिताएँ इन्हीं सुधारों का अगला चरण हैं जिनका श्रमिक संगठनों की ओर से व्यापक स्वागत किया जा रहा है। यह चार नए श्रम सुधार व्यापक और सर्वहितकारी हैं। श्रमेव जयते की भावना से कार्य करने वाली नरेंद्र मोदी सरकार आने के बाद से श्रमिक वर्ग का सम्मान और उनके लिए सुविधाएं दोनों ही लगातार बढ़ रहे हैं। प्रधानमंत्री स्वयं हर महत्वपूर्ण समारोह में श्रमिकों का सम्मान करते हैं फिर चाहे वो अयोध्या में दिव्य – भव्य राम मंदिर का उद्घाटन हो या नए संसद भवन या फिर  दिल्ली स्थित भारत मंडपम का उद्घाटन।

मोदी सरकार द्वारा लागू चार नई श्रम संहिताओें के माध्यम से श्रमिक वर्ग के लिए सामाजिक सुरक्षा , समय पर वेतन और सुरक्षित कार्यस्थल की व्यवस्था सुनिश्चित होगी। यह नई संहिताएं श्रमिक वर्ग के लिए बेहतर और लाभकारी अवसरो के लिए एक सशक्त नींव बनाएंगी। श्रमिकों के लिए पहली बार वेतन संहिता 2019,औद्योगिक संबंध संहिता 2020 व व्यावसायिक सुरक्षा स्वास्थ्य और  कार्य  स्थितियां संहिता 2020 लागू करने की महती घोषणा की गई  है।

महिला कर्मचारियो के लिए पहली बार व्यापक संहिता – चार नई श्रम संहिताओं में पहली बार महिलाओ के हितों का विशेष ध्यान रखा गया है।भारत के श्रम इतिहास में पहली बार महिला कर्मचारियों के लिए सुरक्षा के साथ सभी क्षेत्रों में रात्रि पाली में काम की छूट तथा परिवार की परिभाषा में उन्हें अपने सास -ससुर को भी जोड़ने का अवसर दिया  गया है। नई श्रम संहिता के अनुसार महिलाएं खनन सहित सभी उद्योगो में काम कर सकेंगी। इस कदम से महिलाओं के लिए रोजगार के नए अवसर उत्पन्न होंगे यद्यपि ऐसे कार्यों में उनकी नियुक्ति उनकी इच्छा से ही कि जाएगी। नए कानून में महिला श्रमिको को बराबरी का दर्जा दिया जा रहा है। सहमति से और अनिवार्यतः सुरक्षा के साथ वह रात की पाली में भी काम कर सकेगी।पहली बार समान काम समान वेतन सहित 26 सप्ताह का वेतन सहित मातृत्व लाभ तथा शिशु पालन संहिता के अंतर्गत घर से काम करने की सुविधा भी दी जा रही है

गिग वर्कर्स के लिए पहल – नई श्रम संहिता में गिग और प्लेटफार्म यानी रैपिडो, जोमैटो, स्विगी, ओला, उबर से जुड़े कामगारो को भी पारिभाषित किया गया है। चार श्रम संहिताओे में वर्तमान 29 कानून को भी समाहित कर लिया गया है।

नए श्रम कानूनों  में पहली बार  युवा श्रमिकों को अवकाश के दिनों  का भी वेतन मिलेगा तथा सभी श्रमिकों  के लिए न्यूनतम मजदूरी की गारंटी दी जा रही है। नियुक्त पत्र अनिवार्य करने से सामाजिक सुरक्षा रोजगार विवरण को बढ़ावा मिलेगा। नए श्रम कानूनों से अब नियोक्ता मजदूरों का शोषण नहीं कर सकेंगे। नए श्रम कानूनों में निश्चित अवधि वाले कर्मचारियों  को स्थायी जैसे लाभ जिसमें सामाजिक सुरक्षा कवर, चिकित्सा सवेतन अवकाश सहित समस्त लाभ मिलेंगे। इलेक्ट्रानिक मीडिया, डिजिटल कामगारों को भी इन कानूनों का लाभ मिलेगा। नई श्रम संहिताएं 45 दिनों के अंदर ही लागू हो जाएंगी।

नयी श्रम संहिता,  श्रम कानूनों के इतिहास का सबसे बड़ा सुधार होने के साथ साथ बदलती श्रम आवश्यकता को भी संबोधित करती है। श्रमिकों  को न्यूनतम वेतन, समाजिक सुरक्षा, महिला  श्रमिकों के लिए समान अवसर  और गिग व संगठित कामगारों के लिए कानूनी पहचान सुनिश्चित करने वाली ये चारो संहिताएं उनके जीवन स्तर में सुधार लाएंगी। यह आत्मनिर्भर  भारत की दिशा में महत्चपूर्ण कदम है । विशेषज्ञों का मत है कि यह कानून 2047 तक विकसित भारत के नए लक्ष्य को गति प्रदान करेंगे।

श्रम सुधारों  का उद्योग जगत ने व्यापक स्वागत किया है। इन सुधारों  से श्रमिकों की दशा बदलेगी और उनके जीवन में भी  व्यापक बदलाव आएगा। महिलाओं को रात की पाली मे काम करने की अनुमति मिलना सरकार का कानून व्यवस्था पर आत्मविश्वास दर्शाता है।नए सुधारों से अब औद्योगिक क्षेत्रों के साथ ही लघु उद्योगों में भी वृद्धि होगी। नए श्रम कानूनों के कारण अब पुराने के साथ ही नए उद्योगों का भी विकास होगा। नई श्रम संहिताएं श्रमिकों के जीवन में नया सूर्योदय लेकर आने वाली हैं।

प्रेषक – मृत्युंजय दीक्षित

फोन नं. – 9198571540