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राम मंदिर की कथा: अनुश्रुति से परंपरा तक, एक ढाँचा क्या टूटा, हमारा पुरातन सांस्कृतिक गौरव जी उठा

राम मंदिर पर 25 नवंबर, 2025 को भगवा ध्वज लहराने के साथ ही इस चिरस्मरणीय परिसर का निर्माण कार्य पूर्ण हो जायेगा। इसके साथ ही एक विवादित सपने से लेकर जीवंत विरासत तक की यह यात्रा भी अपने गन्तव्य पर पहुँच जाएगी। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में यह ध्वजारोहण न केवल मंदिर की वास्तुकला का बल्कि धर्म की चिरस्थायी भावना का भी उत्सव मनाएगा क्योंकि अयोध्या सद्भाव, परम्परा और विकास के केंद्र के रूप में फिर से उभर रहा है। राम मंदिर केवल पत्थरों से बनी एक संरचना नहीं है—यह समुत्थान, भक्ति और प्राचीन परंपरा और एक जुड़े हुए वैश्विक भविष्य के बीच सेतु का प्रतीक है।

‘‘यह भव्य राम मंदिर भारत के उत्कर्ष और उदय का साक्षी होगा। यह भव्य राम मंदिर भारत की समृद्धि और विकसित भारत का साक्षी होगा।’’

अयोध्या में प्रातः सूर्य की पहली किरणें सिर्फ पत्थर के स्तंभों और नक्काशीदार मीनारों को ही प्रकाशित नहीं करतीं। वे उस कथा पर भी प्रकाश डालती हैं जिसने शताब्दियों से भारत के सांस्कृतिक अंतस को गढ़ा है। अपनी पूरी भव्यता के साथ खड़ा राम मंदिर सिर्फ वास्तुशिल्प का अद्भुत नमूना ही नहीं, बल्कि आस्था और समुत्थान का संगम भी है।

दुनिया भर के लाखों व्यक्तियों ने हमेशा से अयोध्या को भगवान राम की जन्मस्थली माना है। इस पवित्र स्थान पर मंदिर बनाने का विचार भारत की सांस्कृतिक पहचान से गुंथा हुआ है। यह मंदिर इस स्थल को विश्व भर के आस्थावानों के लिए आध्यात्मिक संकेतक बनाता है।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी 25 नवंबर, 2025 को 22 फुट की धार्मिक ध्वजा फहरा कर ध्वज आरोहण का पवित्र हिंदू अनुष्ठान संपन्न करेंगे। शास्त्रीय परंपरा में ध्वज आरोहण को अधर्म पर धर्म की विजय का प्रतीक माना गया है। यह विश्व भर के उपासकों को इस समारोह में हिस्सा लेने का खुला निमंत्रण देता है।

इस उपलब्धि के पीछे गहन आस्था, सांस्कृतिक स्मृति की विजय और कानून के शासन के अंतर्गत ऐतिहासिक न्याय की बहाली की कथा है।

अयोध्या में राम जन्मभूमि मंदिर निर्माण की यात्रा भारत की लोकतांत्रिक संस्थाओं के माध्यम से एक लंबे कानूनी और सांस्कृतिक मामले को सुलझाए जाने का उदाहरण है। भारतीय सर्वोच्च न्यायालय ने 9 नवंबर, 2019 को समूची 2.77 एकड़ विवादित भूमि एक सर्वसम्मत और ऐतिहासिक निर्णय के अंतर्गत राम मंदिर के निर्माण के लिए दे दी। न्यायालय ने विश्व भर के आस्थावानों के लिए इस स्थल के महत्व को स्वीकार किया। इस निर्णय की न्याय, मेलजोल और सांवैधानिक सिद्धांतों की जीत के रूप में सराहना की गई। इससे श्री राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र न्यास की देखरेख में मंदिर निर्माण का मार्ग प्रशस्त हो गया। भारत सरकार ने 5 फरवरी, 2020 को इसके लिए स्वीकृति प्रदान कर दी।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 5 अगस्त, 2020 को भूमि पूजन और शिलान्यास किया जिसके साथ ही मंदिर निर्माण के संकल्प को मूर्त रूप मिल गया। प्रधानमंत्री ने जोर देकर कहा कि यह समारोह शताब्दियों की प्रतीक्षा के अंत का प्रतीक है। उन्होंने कहा कि यह मंदिर भविष्य की पीढ़ियों को प्रेरित करेगा तथा संयोजकता और आर्थिक अवसरों में वृद्धि के माध्यम से क्षेत्रीय विकास को बढ़ावा देगा।

भव्य श्री राम जन्मभूमि मंदिर पारंपरिक नागर स्थापत्य शैली में बना हुआ है। इसमें 392 स्तंभ और 44 प्रवेश द्वार हैं। इसके स्तंभों और दीवारों पर हिंदू देवताओं और देवियों की उत्कृष्ट नक्काशी की गई है। भूतल पर बने गर्भगृह में भगवान श्री रामलला को प्रतिष्ठापित किया गया है।

राम लल्ला की मूर्ति ग्राउंड फ़्लोर पर मुख्य गर्भगृह में रखी है, जहाँ पूर्वी दरवाज़े पर सिंह द्वार से 32 सीढ़ियों से पहुँचा जा सकता है। इस कॉम्प्लेक्स में भक्ति गतिविधियों के लिए पाँच मंडप (हॉल) हैं—नृत्य, रंग, सभा, प्रार्थना और कीर्तन मंडप, साथ ही कुबेर टीला पर पुराने शिव मंदिर और ऐतिहासिक सीता कूप कुएँ का जीर्णोद्धार भी किया गया है।

आज, श्री राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र भारत की सभ्यता की निरंतरता और कानून समर्थित आस्था की ताकत का साक्ष्य है। यह शानदार भवन न सिर्फ़ अयोध्या की आध्यात्मिक विरासत को फिर से जीवित करता है बल्कि समग्र विकास को भी बढ़ावा देता है, जिसमें महर्षि वाल्मीकि अंतराष्ट्रीय हवाई अड्डा और दोबारा से बनी नई सड़कें शामिल हैं। इन बुनियादी सुविधाओं से यहाँ के तीर्थ और आर्थिक विकास को बढ़ावा मिल रहा है।

अयोध्या में राम मंदिर उन शिल्पकारों की अटूट आस्था का सबूत है, जिन्होंने चिलचिलाती गर्मी में दिन-रात मेहनत की है। यह राम मंदिर के प्रति सामूहिक राष्ट्रीय भावनाओं को प्रदर्शित करता है।

इससे पहले भी, राम मंदिर के निर्माण के उत्साह की भावना भारत के बाहर दूर तक गूंजी थी। उदाहरण के लिए त्रिनिदाद और टोबैगो अपनी राजधानी पोर्ट ऑफ स्पेन में एक भव्य राम मंदिर के निर्माण की योजना को आगे बढ़ा रहा है। यह मई 2025 में पोर्ट ऑफ़ स्पेन में अयोध्या के राम लल्ला की मूर्ति की प्रतिकृति के अनावरण के बाद हुआ है। ऐसे कार्यक्रम आध्यात्मिक प्रयास और सांस्कृतिक भावना का महत्वपूर्ण मेल दिखाते हैं, साथ ही धार्मिक पर्यटन और तीर्थगमन के दरवाज़े भी खोलते हैं।

इस मंदिर को अहमदाबाद के श्री चंद्रकांत सोमपुरा ने डिज़ाइन किया है। इसके निर्माण का काम विश्व प्रसिद्ध कंपनी लार्सन एंड टुब्रो को सौंपा गया है और टाटा कंसल्टिंग इंजीनियर्स को सलाहकार के रूप में नियुक्त किया गया है।

“यह राम के रूप में राष्ट्रीय चेतना का मंदिर है। भगवान राम भारत की आस्था, नींव, विचार, विधि, चेतना, सोच, प्रतिष्ठा और गौरव हैं|”

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी (अयोध्या में रामलला की प्राण प्रतिष्ठा समारोह के अवसर पर, 22 जनवरी, 2024)

यह परियोजना प्राचीन शिल्प कौशल के अत्याधुनिक विज्ञान के साथ जुड़ने का एक उत्कृष्ट उदाहरण है। भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (आईआईटी) मद्रास, आईआईटी दिल्ली, आईआईटी बॉम्बे, और आईआईटी गुवाहाटी सहित देश के प्रमुख संस्थानों के इंजीनियर और बुद्धिजीवी इस पत्थर के मंदिर के निर्माण में शामिल हैं जो एक हज़ार साल तक कायम रहेगा।

मंदिर में सभी उम्र के भक्तों की आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए आधुनिक सुविधाएँ भी उपलब्ध हैं, जिसमें एक समर्पित तीर्थयात्रा सुविधा केंद्र, बुज़ुर्ग भक्तों के लिए रैंप और आपातकालीन चिकित्सा सहायता आदि शामिल हैं। अपने विशाल आकार के बावजूद, मंदिर परिसर में सौर ऊर्जा पैनल लगाए गए हैं जो शहर के संवहनीय स्थलों के व्यापक दृष्टिकोण के अनुरूप है।

नई दिल्ली में तीन दिवसीय “जीआई-टैग जनजातीय सांस्कृतिक उत्सव” का आयोजन

नई दिल्ली।जनजातीय कार्य मंत्रालय के अंतर्गत राष्ट्रीय जनजातीय छात्र शिक्षा समिति (नेस्ट्स) ने आज नई दिल्ली में तीन दिवसीय “जीआई-टैग जनजातीय कला कार्यशाला एवं प्रदर्शनी – सांस्कृतिक उत्सव” का उद्घाटन किया। 24-26 नवंबर, 2025 तक आयोजित होने वाले इस कार्यक्रम में देश भर के एकलव्य आदर्श आवासीय विद्यालयों (ईएमआरएस) के चयनित 139 छात्र, 34 कला एवं संगीत शिक्षक और 10 कुशल कारीगर भारत की भौगोलिक संकेत (जीआई) टैग जनजातीय कला परंपराओं का उत्सव मनाने और उन्हें बढ़ावा देने के लिए एक साथ आएंगे।

दीप प्रज्वलन के साथ उद्घाटन समारोह शुरू हुआ, जिसके बाद नेस्‍ट्स के संयुक्त आयुक्त (प्रशासन) श्री विपिन कुमार ने स्वागत भाषण दिया। आईजीएनसीए के जनपद संपदा विभाग के विभागाध्यक्ष प्रो. अनिल कुमार ने आदिवासी कला रूपों के अंतर्निहित सभ्यतागत संबंधों पर प्रकाश डालते हुए विशेष भाषण दिया। इसके बाद नेस्‍ट्स के
संयुक्त आयुक्त (सिविल) श्री बिपिन रतूड़ी, नेस्‍ट्स के अपर आयुक्त श्री प्रशांत मीणा और नेस्‍ट्स के आयुक्त श्री अजीत कुमार श्रीवास्तव ने अपने संबोधन में कार्यशाला के उद्घाटन की औपचारिक घोषणा की।

उद्घाटन सत्र में ईएमआरएस के छात्रों द्वारा जीवंत सांस्कृतिक प्रस्तुतियां दी गईं, जिनमें शामिल हैं:• धेम्सा नृत्य (ओडिशा)

• जौनसारी नृत्य (उत्तराखंड)

• मिजो लोक नृत्य (मिजोरम)

• लोक गायन एकल (दादरा और नगर हवेली)

• देशभक्ति गीत (मध्य प्रदेश)

इन प्रदर्शनों में आदिवासी युवाओं की कलात्मक प्रतिभा का प्रदर्शन हुआ और “एक भारत श्रेष्ठ भारत” की भावना प्रतिबिंबित हुई।

प्रसिद्ध जीआई विशेषज्ञ सुश्री श्वेता मेनन (ट्रूली ट्राइबल) ने जीआई-टैग कलाओं के महत्व पर एक लाइव सत्र आयोजित करते हुए तीन दिवसीय गहन कार्यशाला का नेतृत्व कर रही हैं। छात्र, कुशल कारीगरों के मार्गदर्शन में, गोंड, वारली, मधुबनी, पिथोरा, चेरियाल, रोगन, कलमकारी, पिचवाई, ऐपण, रंगवाली पिचोरा, कांगड़ा, बशोली, मैसूर चित्रकला, बस्तर ढोकरा और कच्छी कढ़ाई सहित पारंपरिक जीआई- मान्यता प्राप्त कला रूपों का व्यावहारिक प्रशिक्षण प्राप्त कर रहे हैं।

सांस्कृतिक रूप से आधारित आवासीय शिक्षा के माध्यम से, ईएमआरएस आदिवासी बच्चों में आकांक्षा, सशक्तिकरण और राष्ट्रीय एकीकरण को बढ़ावा देने वाले सशक्त संस्थानों के रूप में कार्य करते हैं। आधुनिक शिक्षा और पारंपरिक कला, दोनों से परिचित होने से छात्रों में पहचान और अपनेपन की गहरी भावना विकसित होती है, जिससे कुछ क्षेत्रों में अलगाव की ऐतिहासिक भावनाओं का प्रतिकार होता है। यह पहल अवसर, सम्मान और प्रगति की सकारात्मक भावना का संचार करती है।

इस कार्यक्रम में जीआई-टैग छात्र कला प्रदर्शनी-सह-बिक्री, इंटरैक्टिव आगंतुक संलग्नताएं और एक लाइव आर्ट वर्कशॉप शामिल है जो प्रतिदिन सुबह 9:30 बजे से शाम 4:00 बजे तक जनता के लिए खुला रहता है।

यह प्रदर्शनी 24 से 26 नवंबर 2025 तक आम जनता के लिए खुली रहेगी। कला प्रेमियों, छात्रों, शोधकर्ताओं और आगंतुकों को प्रामाणिक भारतीय आदिवासी कला को देखने और उसका समर्थन करने के लिए आमंत्रित किया जाता है।

गौरीशंकर कमलेश राजस्थानी भाषा पुरस्कार समारोह में कोटा के किशन लाल और जोधपुर की बसंती पंवार सम्मानित

कोटा । ज्ञान भारती संस्थान द्वारा स्व. गौरीशंकर कमलेश एवं श्रीमती कमलेश स्मृति राजस्थानी भाषा साहित्य का 32 वाँ पुरस्कार समारोह रविवार को कोटा में आयोजित किया गया। अतिथियों ने दीप प्रज्वलित कर कार्यक्रम का शुभारंभ किया।
इस वर्ष का  गौरीशंकर राजस्थानी भाषा का पुरस्कार कोटा के कवि और साहित्यकार किशन लाल वर्मा को उनकी कृति मीरा माई ( महाकाव्य ) के लिए ग्यारह हजार रुपए नकद शाल, श्रीफल, प्रशस्ति पत्र प्रदान कर सम्मानित किया गया। कमला कमलेश राजस्थानी भाषा का पुरस्कार जोधपुर की साहित्यकार बसन्ती पंवार को पांच हजार रुपए नगद,शाल, श्रीफल प्रशस्ति पत्र प्रदान कर सम्मानित किया गया।
प्रथम सत्र ने में वरिष्ठ साहित्यकार जितेंद्र निर्मोही के कहानी संग्रह “राजस्थानी वैग्यानिक कथावाँ” का विमोचन हुआ। मुख्य अतिथि के.बी.भारतीय ने कृति को साहित्य और विज्ञान का अद्भुत समन्वय बताते हुए  जितेंद्र निर्मोही के व्यक्तित्व एवं कृतित्व पर प्रकाश डालते हुए कहा कि इन्होंने साहित्य की है विद्या पर कार्य किया है। हाड़ौती अंचल में राजस्थानी भाषा के उन्नयन और विकास में इनकी महत्वपूर्ण भूमिका को रेखांकित किया।       अध्यक्षीय उद्बोधन में सुमन लता ने स्व. गौरी शंकर कमलेश के राजस्थानी भाषा में योगदान पर प्रकाश डाला। ओम सोनी मधुर ने पुस्तक की उपयोगिता पर प्रकाश डालते हुए पुस्तक को राजस्थानी भाषा की महत्वपूर्ण साहित्यिक कृति बताया। उन्होंने ने कहा साहित्यकार जो लिखता है उस पर पाठक ही व्याख्या करता है।  कवि प्रेम शास्त्री ने पुस्तक का विस्तृत परिचय दिया।
लेखक जितेंद्र निर्मोही ने किताब की कहानियों के संदर्भ में विषय वस्तु की जानकारी दी। उन्होंने बताया राष्ट्रीय स्तर का राजस्थानी गौरीशंकर कमलेश पुरस्कार अब तक राजस्थानी के लब्धप्रतिष्ठ साहित्यकारों पद्मश्री अर्जुन सिंह शेखावत, डॉ. तारा लक्ष्मण गहलोत, प्रोफेसर कुंदन माली, रामस्वरूप किसान, डॉ नीरज दईया आदि को दिया जा चुका है। कमला कमलेश  राजस्थानी पुरस्कार संतोष चौधरी जोधपुर, डॉ कृष्णा बीकानेर, मानसी शर्मा को दिया जा चुका है।
पुरस्कार और सम्मान सत्र की अध्यक्षता कवि  विश्वामित्र दाधीच ने की और कवि मुकुट राज मणिराज मुख्य अतिथि रहे। पत्रकार प्रवीण जैन ने साहित्य के समक्ष ए आई की चुनौतियों से सावचेत  करते हुए साहित्य में नई पीढ़ी को आगे आने पर जोर दिया। समारोह में  पत्रकार प्रवीण जैन, युवा साहित्यकार हेम सिंह हेम,रेखा शर्मा, रामनारायण मीणा एवं श्वेता शर्मा  को गौरी शंकर सम्मान से सम्मानित किया गया। संचालन कवि और साहित्यकार नहुष व्यास ने किया। समारोह में अनेक कवि और साहित्यकार उपस्थित रहे।
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डॉ. प्रभात कुमार सिंघल
पत्रकार, कोटा

कथाकार एवं समीक्षक विजय जोशी को स्व. जागेश्वर प्रसाद तिवारी सम्मान

कोटा / राष्ट्रीय स्तर पर सृजनात्मक चेतना को समर्पित संस्था कादम्बरी जबलपुर मध्य प्रदेश द्वारा सेठ गोविंददास प्रेक्षा ग्रह में आयोजित आखिल भारतीय साहित्यकार सम्मान समारोह – 2025 में कोटा राजस्थान के कथाकार एवं समीक्षक विजय जोशी को उनके समग्र लेखन के लिए स्व. जागेश्वर प्रसाद तिवारी सम्मान से अलंकृत करते हुए सम्मान – पत्र तथा पाँच हज़ार रुपए की सम्मान राशि भेंट कर शाल ओढ़ाकर सम्मानित किया गया।
कादम्बरी के अध्यक्ष आचार्य भगवत दुबे की सारस्वत उपस्थिति में डॉ. कैलाश गुप्ता के मुख्य आतिथ्य और डॉ. कृष्ण बिहारी पाण्डेय, पूर्व कुलपति, प्रयागराज की अध्यक्षता में डॉ० अनिल गह‌लोत महेश दिवाकर, श्री ओम नीरव जादूगर एस.के. निगम तथा श्री अमरेन्द्र नारायण के आतिथ्य में आरम्भ समारोह का संचालन कादम्बरी के महासचिव राजेश पाठक ‘प्रवीण’ ने किया।  समारोह में कोटा से डॉ. रघुराज सिंह कर्मयोगी को स्व. आशा देवी दुबे सम्मान,  विजय कुमार शर्मा को स्व. हनुमान प्रसाद शर्मा सम्मान और राममोहन कौशिक को  डॉ. कृष्णकांत चतुर्वेदी सम्मान से सम्मानित किया गया।
उल्लेखनीय है कि राष्ट्रीय एवं राज्य स्तर पर विभिन्न संस्थाओं द्वारा पुरस्कृत एवं सम्मानित कथाकार एवं समीक्षक  विजय जोशी के हिन्दी और राजस्थानी में अब तक दो हिन्दी उपन्यास – चीख़ते चौबारे, रिसते हुए रिश्ते, छह हिन्दी कहानी संग्रह – ख़ामोश गलियारे, केनवास के परे, कुहासे का सफ़र, बिंधे हुए रिश्ते, सुलगता मौन, वैकुण्ठगामी एवं अन्य कहानियाँ, एक हिन्दी बाल कहानी संग्रह – बदल गया मिंकू, और चार हिन्दी कथेतर ग्रन्थ – कहानीकार प्रहलाद सिंह राठौड़ : कथ्य एवँ शिल्प, समीक्षा के पथ पर, अपने समय की बानगी : निकष पर, अनुभूति के पथ पर : जीवन की बातें, दो सम्पादित ग्रन्थ स्वतंत्रता सेनानी श्यामनारायण विजयवर्गीय :  व्यक्तित्व, कृतित्व और विचार, पुरातत्वविद्  रमेश वारिद : चयनित आलेख – सांस्कृतिक एवं पुरातात्विक वैभव, दो राजस्थानी कहानी संग्रह- मंदर में एक दन, आसार, एक राजस्थानी अनुवाद- पुरवा की उडीक, दो राजस्थानी कथेतर ग्रन्थ – आखर निरख : पोथी परख , भावाँ की रामझोळ प्रकाशित हुए हैं। वहीं विभिन्न विश्वविद्यालयों द्वारा तीन शोधार्थियों को पीएच.डी. तथा तीन शोधार्थियों को एम. फिल. की उपाधि प्रदान की गई है एवं इनके साहित्य का मूल्यांकन करते हुए विद्वान् साहित्यकारों के सम्पादन में चार समीक्षा ग्रन्थ प्रकाशित हुए हैं।

जी-20 शिखर सम्मेलन में नरेंद्र मोदी के सुझावों की रोशनी

जी-20 शिखर सम्मेलन का उद्घाटन सत्र इस बार जिस गंभीर मुद्दे पर केन्द्रित रहा, वह दुनिया के सामने उभरते खतरों की बदलती प्रकृति को स्पष्ट करता है। भारतीय प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी ने आतंकवाद के साथ-साथ ड्रग तस्करी को भी वैश्विक शांति, सुरक्षा और मानव अस्तित्व के लिए उतना ही घातक बताया जितना किसी संगठित हिंसा को माना जाता है। उनकी यह चेतावनी केवल कूटनीतिक वक्तव्य नहीं बल्कि बढ़ती वैश्विक वास्तविकताओं का सटीक विश्लेषण है। यह तथ्य अब निर्विवाद है कि मादक पदार्थों की तस्करी आतंकवाद को ईंधन प्रदान करने वाला सबसे बड़ा स्त्रोत बन चुकी है। अरबों डॉलर का यह अवैध व्यापार केवल अपराध जगत को नहीं बल्कि राष्ट्रों की सुरक्षा, समाज की स्थिरता और युवाओं के भविष्य को भी चूर-चूर कर रहा है।
मोदी ने अपने संबोधन में साफ कहा कि दुनिया के बड़े राष्ट्रों को ड्रग-माफिया और उसके आतंकवाद से जुड़े वित्तीय नेटवर्क के खिलाफ एकजुट होकर निर्णायक लड़ाई लड़नी होगी। दुनिया आज जिस गति से नए-नए मादक पदार्थों के जाल में फंसती जा रही है, वह वैश्विक चिंता और भी बढ़ाता है। फेंटानाइल जैसे अत्यंत खतरनाक सिंथेटिक ड्रग्स ने अमेरिका में स्वास्थ्य-संकट की भयावह स्थिति पैदा कर दी है, जहां प्रतिदिन अनेक लोग इसके कारण जान गंवा रहे हैं। यह संकट किसी एक देश की समस्या नहीं, बल्कि मानव जीवन पर मंडरा रहा एक वैश्विक खतरा है। यह मानना भूल होगी कि ऐसे ड्रग्स केवल एक महाद्वीप तक सीमित रह सकते हैं; संगठित तस्करी के नेटवर्क इसकी पहुंच दुनिया के किसी भी कोने तक ले जा सकते हैं। यही कारण है कि मोदी ने चेताया कि यदि अभी निर्णायक कार्रवाई नहीं हुई, तो यह त्रासदी अन्य देशों में भी फैल सकती है।
ड्रग्स माफिया केवल एक आपराधिक व्यापार नहीं, बल्कि मानव समाज की जड़ों को खोखला करने वाला वैश्विक संकट है। नशे का कारोबार सीमाओं, कानूनों और नैतिक मूल्यों-तीनों को धत्ता बताकर फैल रहा है। यह न केवल युवाओं के भविष्य को निगल रहा है, बल्कि देशों की आंतरिक सुरक्षा, सामाजिक स्थिरता और आर्थिक व्यवस्था को भी कमजोर कर रहा है। इसलिए ड्रग्स माफिया का खतरा अब केवल कानून-व्यवस्था का विषय नहीं, बल्कि मानव सभ्यता के अस्तित्व का प्रश्न बन गया है। दुनिया भर में नशे का अवैध व्यापार एक विशाल संगठित नेटवर्क के रूप में विकसित हो चुका है, जिसमें माफिया, कार्टेल, हथियार गिरोह, आतंकवादी संगठन और भ्रष्ट तंत्र की गहरी सांठगांठ शामिल है। यह नेटवर्क इतना शक्तिशाली है कि कई देशों में यह समानान्तर सत्ता जैसा व्यवहार करता है। अफगानिस्तान, मैक्सिको, कोलंबिया, म्यांमार, नाइजीरिया, रूस और यूरोप तथा एशिया के अनेक हिस्सों में ड्रग्स कार्टेलों ने शासन प्रणालियों को चुनौती दी है। अनेक जगह तो स्थितियां ऐसी बन जाती हैं कि सरकारें या तो इस लड़ाई में कमजोर पड़ जाती हैं या फिर समझौते करने को मजबूर हो जाती हैं। मोदी ने इस पर नियंत्रण के लिये दुनिया को एकजुट होने की आवश्यकता व्यक्त की।
जी-20 देशों की यह जिम्मेदारी बनती है कि वे ड्रग्स के अवैध उत्पादन, वितरण, ऑनलाइन डार्क-नेट व्यापार, क्रिप्टोकरेंसी के माध्यम से होने वाले भुगतान और सीमा-पार तस्करी पर न केवल नियंत्रण करें बल्कि इसके खिलाफ साझा रणनीति भी अपनाएं। मोदी ने इस दिशा में कुछ महत्वपूर्ण सुझाव दिए-प्रत्येक देश में अवैध वित्तीय गतिविधियों पर कड़ा नियंत्रण, एआई के दुरुपयोग को रोकने के लिए सामूहिक प्रयास, डेटा साझाकरण को बढ़ावा, तकनीकी सहयोग को सुदृढ़ करना तथा डिजिटल और साइबर अपराधों के विरुद्ध नई वैश्विक नीति बनाना। एआई का दुरुपयोग आज केवल गलत सूचना फैलाने या साइबर अपराध तक सीमित नहीं रहा; उसके माध्यम से ड्रग्स की ऑनलाइन बिक्री, नकली पहचान, एन्क्रिप्टेड चैनल और तस्करों के गुप्त नेटवर्क को चलाने में भी व्यापक उपयोग होने लगा है। इस पर रोक अब सामूहिक प्रयासों के बिना संभव नहीं।
इस वर्ष का जी-20 शिखर सम्मेलन अमेरिका की अनुपस्थिति के बावजूद काफी सफल माना गया। यह सफलता केवल उपस्थिति की संख्या में नहीं बल्कि चर्चाओं की गुणवत्ता, मुद्दों की गंभीरता और लिए गए निर्णयों के ठोस स्वरूप में दिखाई दी। बड़े देशों का एक-दूसरे से समन्वय और वैश्विक चुनौतियों को लेकर स्पष्टता इस सम्मेलन की बड़ी उपलब्धि रही। दुनिया का बदलता भू-राजनीतिक वातावरण, यूक्रेन और मध्य-पूर्व जैसे संघर्ष, आर्थिक अनिश्चितताएं और ग्लोबल साउथ की महत्वाकांक्षाएं-इन सबके बीच भी यह सम्मेलन शांत, रचनात्मक और समाधान-उन्मुख रहा। यह संकेत है कि दुनिया के राष्ट्र अब प्रतिस्पर्धा से ज्यादा सहयोग को प्राथमिकता देने लगे हैं। ड्रग-तस्करी और आतंकवाद जैसे मुद्दे किसी भी देश की सीमाओं में बंधे नहीं रह सकते; इसलिए उनका समाधान भी सीमाओं के पार सहयोग से ही संभव है।
मोदी के सुझावों का विशेष महत्व इसलिए भी है क्योंकि भारत लंबे समय से सीमा-पार आतंकवाद का शिकार रहा है और दक्षिण एशिया में ड्रग-तस्करी का एक बड़ा ट्रांज़िट-पॉइंट भी बनता रहा है। भारत ने तकनीक, कानून और कूटनीति-तीनों स्तरों पर इस खतरे से मुकाबला करने के लिए महत्वपूर्ण कदम उठाए हैं, जिनसे दुनिया सीख सकती है। भारत का अनुभव बताता है कि ड्रग-नेटवर्क को समाप्त करने के लिए तीन मोर्चों पर काम करना अत्यंत आवश्यक है-कड़ी सीमा निगरानी, सोशल-मीडिया एवं एआई आधारित निगरानी तंत्र को मजबूत करना, और युवाओं में नशामुक्ति एवं जागरूकता को बढ़ाना। केवल कानून पर्याप्त नहीं; सामाजिक-मानसिक जागरूकता भी उतनी ही जरूरी है।
जी-20 सम्मेलन में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सक्रिय, प्रभावशाली और केंद्रीय उपस्थिति ने एक बार फिर सिद्ध किया कि वे आज वैश्विक परिदृश्य के सबसे सशक्त, निर्णायक और भरोसेमंद नेताओं में अग्रणी हैं। अमेरिका की अनुपस्थिति के बावजूद विश्व मंच पर नेतृत्व का जो शून्य बन सकता था, उसे मोदी ने अपने संयमित, दूरदर्शी और कूटनीतिक करिश्मे से भर दिया। ड्रग-तस्करी, आतंकवाद, एआई के दुरुपयोग, वैश्विक अर्थव्यवस्था, ग्लोबल साउथ और मानव-कल्याण जैसे विविध मुद्दों पर उनकी स्पष्ट दृष्टि और व्यावहारिक समाधान ने दुनिया को यह विश्वास दिलाया कि भारत न केवल उभरती शक्ति है बल्कि स्थिर और सकारात्मक दिशा दिखाने वाला पथ-प्रदर्शक भी है। उनकी उपस्थिति ने यह भी रेखांकित किया कि बदलती वैश्विक राजनीति में जहां कई राष्ट्र आंतरिक संघर्षों और नीतिगत अनिश्चितताओं से जूझ रहे हैं, वहीं भारत एक विश्वसनीय, स्थिर और दूरदर्शी नेतृत्व प्रस्तुत कर रहा है। मोदी का यह उभार केवल भारत की प्रतिष्ठा को ऊंचा नहीं उठाता बल्कि दुनिया को एक ऐसे नेतृत्व का विकल्प देता है जो विकास, शांति, सुरक्षा और वैश्विक सहयोग के नए मॉडल को आगे बढ़ा सकता है और यही आज की दुनिया के लिए सबसे बड़ी आवश्यकता है।
प्रधानमंत्री मोदी ने भारत की “एकात्म मानववाद” के दर्शनशास्त्र को वैश्विक विकास के भविष्य में महत्वपूर्ण बताते हुए दुनिया से इसे अपनाने की अपील की। मोदी ने पारंपरिक ज्ञान, स्वास्थ्य क्षेत्र, क्रिटिकल मिनरल्स, सैटेलाइट डेटा एक्सेस, अफ्रीका में क्षमता निर्माण और ड्रग-टेरर नेटवर्क के खिलाफ संयुक्त कार्रवाई जैसे क्षेत्रों में सहयोग बढ़ाने का प्रस्ताव रखा। उनका कहना था कि इससे दीर्घकालिक शांति, मज़बूती और सतत विकास सुनिश्चित होगा। उन्होंने दक्षिण अफ्रीका के अध्यक्षता की प्रशंसा की, जिसने कौशल आधारित प्रवासन, पर्यटन, खाद्य सुरक्षा, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, डिजिटल अर्थव्यवस्था, नवाचार और महिलाओं के सशक्तिकरण जैसे क्षेत्रों में महत्वपूर्ण प्रगति की है। उन्होंने यह भी बताया कि नई दिल्ली जी-20 शिखर सम्मेलन में लिए गए कई ऐतिहासिक निर्णयों पर आगे कार्य हो रहा है। जी-20 शिखर सम्मेलन का संकेत स्पष्ट हैः दुनिया अब नए खतरे पहचान रही है और उन पर सामूहिक कार्रवाई के लिए तैयार भी हो रही है।
 आतंकवाद और ड्रग-तस्करी के गहरे रिश्ते को तोड़ना वैश्विक शांति के लिए अनिवार्य है। यदि आर्थिक, स्वास्थ्य और सुरक्षा की दृष्टि से सुरक्षित समाज बनाना है, तो ड्रग-पर नियंत्रण करना ही होगा। दुनिया की बढ़ती असुरक्षा का मुकाबला केवल हथियारों से नहीं, बल्कि जागरूकता, संयम, शिक्षा और संवेदनशीलता से होगा। जब तक हम नशे के इस वैश्विक खतरे को एक सामूहिक लड़ाई न मानें, तब तक सुरक्षा केवल एक भ्रम बनी रहेगी। समाज को नशे के खिलाफ खड़ा करना आज समय की बड़ी मांग है-क्योंकि यह केवल एक अपराध के खिलाफ संघर्ष नहीं, बल्कि आने वाली पीढ़ियों को सुरक्षित और स्वस्थ भविष्य देने का संकल्प है।
प्रेषकः

(ललित गर्ग)
लेखक, पत्रकार, स्तंभकार
ई-253, सरस्वती कुंज अपार्टमेंट
25 आई. पी. एक्सटेंशन, पटपड़गंज, दिल्ली-92
फोनः 22727486, 9811051133

सिंधी समुदाय सांस्कृतिक गौरव, अखंडता एवं राष्ट्र निर्माण का आदर्श प्रस्तुत करता है: श्री बिरला

नई दिल्ली। लोकसभा अध्यक्ष श्री ओम बिरला ने आज सिंधी समुदाय की सेवा के प्रति अटूट प्रतिबद्धता एवं उसकी गहरी सांस्कृतिक विरासत पर प्रकाश डालते हुए कहा कि इन्हीं गुणों ने उन्हें भारत की सामाजिक, आर्थिक एवं सांस्कृतिक उन्नति में महत्वपूर्ण योगदानकर्ता बनाया है। सिंधी समुदाय की सामूहिक शक्ति एवं लचीलेपन की सराहना करते हुए श्री बिरला ने कहा कि यह समुदाय उन आदर्शों का प्रतीक है जो एक सशक्त भारत की नींव रखते हैं। लोकसभा अध्यक्ष ने ये टिप्पणी विश्व सिंधी हिंदू फाउंडेशन ऑफ एसोसिएशन (वीएसएचएफए) द्वारा नई दिल्ली के विज्ञान भवन में आयोजित “सशक्त समाज-समृद्ध भारत” कार्यक्रम के दौरान की।

उन्होंने कहा कि इस समुदाय ने व्यापार, उद्योग, बैंकिंग, सेवाओं एवं उभरती प्रौद्योगिकियों के क्षेत्र में निरंतर उत्कृष्टत प्रदर्शन किया है, जिससे लाखों लोगों के लिए आजीविका का सृजन हुआ है। उन्होंने आगे कहा कि उनकी सफलता केवल आर्थिक कुशाग्रता में ही नहीं, बल्कि विश्वास, सहयोग एवं नैतिक आचरण जैसे गहरे मूल्यों में निहित है जो राष्ट्र की प्रगति में महत्वपूर्ण योगदान देते हैं।

लोकसभा अध्यक्ष ने बल देकर कहा कि विभाजन के दौरान सिंधी समुदाय ने जिन कठिनाइयों का सामना किया उससे समुदाय और मज़बूत हुया। भौतिक संपत्ति को हुए अत्यंत नुकसान के बावजूद, सिंधी समुदाय ने अपने धर्म, परंपराओं, रीति-रिवाजों और सांस्कृतिक पहचान को पूरी दृढ़ता से कायम रखा। उन्होंने असाधारण दृढ़ संकल्प के साथ अपने जीवन का पुनर्निर्माण किया और आपदा को अवसर में बदल दिया। उन्होंने अंत में कहा कि उनकी यात्रा दृढ़ता एवं सांस्कृतिक गौरव का एक अद्भुत उदाहरण है।

लोकसभा अध्यक्ष ने जोर देकर कहा कि भारत की शक्ति इसकी विविधता में निहित है। उन्होंने कहा कि सभी समुदायों के बीच एकता, समन्वय एवं आपसी सम्मान प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के 2047 तक ‘विकसित भारत’ के सपने को साकार करने के लिए सर्वोपरि है। उन्होंने शिक्षा, स्वास्थ्य, सामाजिक सेवा एवं सामुदायिक कल्याण में सिंधी समुदाय के महत्वपूर्ण पर प्रकाश डाला।

श्री बिरला ने 2003 से सिंधी समुदाय के साथ अपने लंबे एवं मधुर संबंधों को याद करते हुए कहा कि उनका समर्थन एवं सद्भावना निरंतर बनी हुई है। उन्होंने विदेश में संसदीय प्रतिनिधिमंडलों का नेतृत्व करते हुए अपनी यात्राओं के अनुभव साझा करते हुए कहा कि बारबाडोस से लेकर सूरीनाम और मेक्सिको तक, उन्होंने ऐसे जीवंत सिंधी समुदायों को देखा है जो अपनी विरासत को संरक्षित करने में निपुण हैं, साथ ही स्थानीय अर्थव्यवस्थाओं एवं सामाजिक ताने-बाने का एक अभिन्न अंग भी बन चुके हैं।

उन्होंने सिंधी युवाओं की उद्यमशील उत्कृष्टता, नवाचार एवं दूरदर्शी मानसिकता को भारत के विकास, विशेष रूप से प्रौद्योगिकी और नए युग के क्षेत्रों में प्रमुख चालक कहा। उन्होंने कहा कि उनका योगदान अन्य समुदायों को प्रेरित करता है और राष्ट्रीय विकास प्रयासों को मज़बूत करता है। प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी बातों को दोहराते हुए, श्री बिरला ने कहा कि इस समुदाय ने वैश्विक स्तर पर यह सीख दी है कि कैसे लचीलापन, कड़ी मेहनत और सांस्कृतिक अखंडता सफलता एवं जीवन का पुनर्निर्माण करती है। श्री बिरला ने कहा कि घरेलू और विदेशी, दोनों ही स्तरों पर उनकी उपलब्धियां राष्ट्रीय गौरव का विषय हैं।

अंत में श्री बिरला ने समुदाय को एकजुट करने, विरासत को संरक्षित करने एवं राष्ट्र निर्माण की भावना को मज़बूत करने के लिए वीएसएचएफए की सराहना की। उन्होंने आशा व्यक्त किया कि इस कार्यक्रम में हुए विचार-विमर्श और चर्चा सामाजिक सशक्तिकरण, युवा नेतृत्व तथा एक मज़बूत, एकजुट भारत के लक्ष्यों को और आगे बढ़ाएंगे।

इस अवसर पर दिल्ली की मुख्यमंत्री श्रीमती रेखा गुप्ता और अन्य गणमान्य लोग उपस्थित थे।

भारत में जलवायु संकट-स्वास्थ्य एवं समृद्धि पर कहर

जलवायु परिवर्तन से उपजी पर्यावरणीय चुनौतियाँ आज मानव सभ्यता के अस्तित्व तक को प्रभावित कर रही हैं। जलवायु परिवर्तन अब कोई दूर का वैज्ञानिक विचार नहीं, बल्कि तत्काल अनुभव किया जाने वाला यथार्थ है, जिसकी भयावहता का प्रमाण सीएसई और डाउन टू अर्थ की क्लाइमेट इंडिया 2025 की रिपोर्ट में स्पष्ट दिखाई देता है। जनवरी से सितंबर 2025 तक भारत ने अपने 99 प्रतिशत दिनों में किसी न किसी चरम मौसमी घटना-बाढ़, सूखा, भारी बारिश, तूफान, ठंड-लहर, अथवा भीषण गर्मी का सामना किया। इसी अवधि में 4,064 लोगों की मौत, 9.47 मिलियन हेक्टेयर फसल का नष्ट होना, लगभग 58,982 जानवरों की मृत्यु और 99,533 घरों का ढहना इस संकट की गहराई को दर्शाते हैं।
कृषि क्षेत्र इन घटनाओं का सबसे बड़ा शिकार बना, क्योंकि जलवायु असंतुलन ने खेतों, मौसम चक्र और पैदावार को सीधे प्रभावित किया। बढ़ते तापमान और असामान्य वर्षा ने ग्रामीण अर्थव्यवस्था को गहरी चोट पहुंचाई है। दुनिया के सबसे बड़ी आबादी वाले देश के सामने ये मुश्किलें सबसे बड़ी हैं। हिमाचल प्रदेश में 257 दिनों का चरम मौसम, मध्य प्रदेश में 532 मौतें और महाराष्ट्र में 84 लाख हेक्टेयर फसल का नुकसान बताता है कि यह सिर्फ पर्यावरणीय विषय नहीं, बल्कि मानव जीवन, स्वास्थ्य और अर्थव्यवस्था का संकट है।
2025 में, कम से कम 18 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में 2022 के बाद से सबसे अधिक चरम मौसमी दिन दर्ज किए गए। फरवरी से सितंबर 2025 तक, लगातार आठ महीनों तक देश के 30 या उससे अधिक राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में चरम मौसम की घटनाएं रिकॉर्ड की गईं। भारत में जैसे हालात हैं, वही स्थिति पूरे विश्व में भी फैलती जा रही है। वर्ष 2023, 2024 और 2025 दुनिया के सबसे गर्म वर्षों में शामिल रहे। यूरोप की निरंतर हीटवेव, अफ्रीका के साहेल क्षेत्र का अकाल, अमेज़न और ऑस्ट्रेलिया के जंगलों में लगी आग, प्रशांत और अटलांटिक महासागरों में उग्र तूफान, और ग्लेशियरों के तेज़ी से पिघलने की घटनाएँ यह संकेत दे रही हैं कि पृथ्वी एक खतरनाक मोड़ की ओर बढ़ रही है। मौसम चक्रों का असंतुलन, समुद्र स्तर में वृद्धि, तापमान का अचानक बढ़ना और वर्षा का अनियमित होना, प्राकृतिक आपदाओं को न सिर्फ अधिक सघन बना रहा है बल्कि मानव जीवन को असुरक्षित भी। जलवायु परिवर्तन की सबसे बड़ी वजह मनुष्य की अनियंत्रित गतिविधियाँ हैं-जीवाश्म ईंधनों पर निर्भरता, वनों की कटाई, प्रदूषण, अनियोजित शहरीकरण और अत्यधिक उपभोग ने वातावरण में ग्रीनहाउस गैसों को खतरनाक स्तर तक बढ़ा दिया है, जिसका परिणाम है पृथ्वी का असामान्य रूप से गर्म होना।
इन परिस्थितियों का असर जीवन के हर क्षेत्र पर दिखाई दे रहा है। स्वास्थ्य पर प्रभाव बढ़ रहा है, हीटवेव के कारण मौतें बढ़ रही हैं, नए वायरस और प्रदूषण से उत्पन्न बीमारियों की आवृत्ति बढ़ी है। जल संसाधन खतरे में हैं और कई क्षेत्रों में नदियाँ व भूजल तेजी से सूख रहे हैं। खाद्य संकट गहराता जा रहा है क्योंकि फसलें असफल हो रही हैं, जिससे अनाज और सब्जियों की कीमतें बढ़ रही हैं। प्राकृतिक आपदाओं से आर्थिक ढाँचा भी डगमगा रहा है, लाखों लोग विस्थापित हो रहे हैं और असमानता तेज़ी से बढ़ रही है। यदि दुनिया ने तापमान को 1.5 डिग्री सेल्सियस से नीचे रखने का लक्ष्य पूरा नहीं किया, तो आने वाले तीन दशकों में हिमालयी नदियों का प्रवाह अनिश्चित हो जाएगा, तटीय शहर खतरे में पड़ेंगे और मानव जीवन मुश्किल होता चला जाएगा।
जलवायु परिवर्तन के दुष्प्रभाव को दर्शाती एक ओर रिपोर्ट पिछले दिनों ‘द लांसेट काउंटडाउन ऑन हेल्थ एंड क्लाइमेट चेंज 2025’ के अनुसार पिछले साल जलवायु परिर्वतन के कारकों से कृषि क्षेत्र में 66 फीसदी और निर्माण क्षेत्र में बीस फीसदी का नुकसान हुआ। यह रिपोर्ट इशारा करती है कि अत्यधिक गर्मी के कारण श्रम क्षमता में कमी के कारण 194 अरब डॉलर की संभावित आय का नुकसान हुआ। उल्लेखनीय है कि यह रिपोर्ट विश्व के 71 शैक्षणिक संस्थानों और संयुक्त राष्ट्र की एजेंसियों के 128 अंतर्राष्ट्रीय विशेषज्ञों ने तैयार की, जिसका कुशल नेतृत्व यूनिवर्सिटी कालेज लंदन ने किया। इस रिपोर्ट में जलवायु परिवर्तन और स्वास्थ्य के बीच संबंधों का अब तक सबसे व्यापक आकलन किया गया है। रिपोर्ट बताती है कि साल 2020 से 2024 के बीच भारत में औसतन हर साल दस हजार मौतें जंगल की आग से उत्पन्न पीएम 2.5 प्रदूषण से जुड़ी थीं। चिंता की बात यह है कि यह वृद्धि 2003 से 2012 की तुलना में 28 फीसदी अधिक है, जो हमारी गंभीर चिंता का विषय होना चाहिए।
विडंबना यह है कि ‘द लांसेट’ की रिपोर्ट में सामने आए गंभीर तथ्यों के बावजूद अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर इस संकट से मिलकर जूझने की ईमानदार कोशिश होती नजर नहीं आती। यह निर्विवाद तथ्य है कि दुनिया के विकसित देश अपनी जिम्मेदारी से लगातार बचने के प्रयास कर रहे हैं। खासकर हाल के वर्षों में अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने जलवायु परिवर्तन को लेकर जो गैरजिम्मेदाराना रवैया अख्तियार किया है, उससे नहीं लगता कि वैश्विक स्तर पर इस संकट से निपटने की कोई गंभीर साझा पहल निकट भविष्य में सिरे चढ़ेगी। विकसित देश इस दिशा में मानक पेरिस समझौते की संस्तुतियों को नजरअंदाज करते नजर आते हैं। सीएसई और डाउन टू अर्थ की क्लाइमेट इंडिया  और द लांसेट काउंटडाउन ऑन हेल्थ एंड क्लाइमेट चेंज 2025 रिपोर्टों में उजागर तथ्य हमारी आंख खोलने वाले व सचेतक हैं।
इन्हीं चिन्ताजनक रिपोर्टों पर सीएसई की महानिदेशक सुनिता नारायण ने कहा, देश को अब सिर्फ आपदाओं को गिनने की जरूरत नहीं है, बल्कि उस पैमाने को समझने की जरूरत है जिस पर जलवायु परिवर्तन हो रहा है। उन्होंने वैश्विक स्तर पर उत्सर्जन कटौती की तत्काल आवश्यकता पर जोर दिया, क्योंकि इतने बड़े पैमाने की आपदाओं के लिए कोई भी अनुकूलन संभव नहीं होगा। सीएसई के कार्यक्रम निदेशक किरन पांडे ने मानसून के दौरान बढ़ते तापमान को चिंताजनक बताया, जो अनियमित और चरम मौसमी घटनाओं को ट्रिगर कर सकता है। डाउन टू अर्थ के प्रबंध संपादक रिचर्ड महापात्रा ने कहा कि यह रिपोर्ट एक आवश्यक चेतावनी है और बिना निर्णायक शमन प्रयासों के आज की आपदाएं कल का नया सामान्य बन जाएंगी। ऐसे समय में सिर्फ सरकारों और अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं की जिम्मेदारी नहीं है, बल्कि हर आम नागरिक को भी पर्यावरण संरक्षण का सहभागी बनना होगा।
सबसे पहले जीवनशैली को प्रकृति के अनुकूल बनाना जरूरी है, ऊर्जा की बचत, जल का सीमित और विवेकपूर्ण उपयोग, प्लास्टिक का परित्याग, वृक्षारोपण, जैविक कचरे का पृथक्करण और पुनर्चक्रण जैसी छोटी गतिविधियाँ बड़े परिणाम ला सकती हैं। घरेलू स्तर पर सौर ऊर्जा, वर्षा जल संचयन, रसोई कचरे से खाद बनाना और अनावश्यक उपभोग कम करना पर्यावरण पर सकारात्मक असर डालते हैं। वाहन का कम उपयोग, सार्वजनिक परिवहन को प्राथमिकता, पैदल चलने और साइकिल जैसे पर्यावरण-मित्र विकल्प अपनाना जलवायु परिवर्तन से लड़ने की दिशा में शक्तिशाली कदम हैं।
पर्यावरणीय संवेदनशीलता भी उतनी ही आवश्यक है जितनी तकनीकी कोशिशें। प्रकृति के प्रति सम्मान की भावना, संसाधनों का संयमित उपयोग, और भविष्य की पीढ़ियों के लिए पृथ्वी को सुरक्षित रखने की दृष्टि, जलवायु संकट के खिलाफ हमारी सामूहिक ताकत बन सकती है। यदि समाज में यह चेतना विकसित हो कि प्रकृति का संरक्षण ही जीवन और प्रगति का आधार है, तो परिवर्तन स्वतः शुरू हो जाता है। शिक्षा, जागरूकता और जनभागीदारी इस लड़ाई के सबसे महत्वपूर्ण हथियार हैं। स्कूलों और घरों में बच्चों को पर्यावरणीय मूल्यों का प्रशिक्षण देना भविष्य के लिए अत्यंत उपयोगी होगा। जलवायु संकट अपने आप नहीं थमेगा; इसे रोकने के लिए संकल्प, संयुक्त प्रयास और सतत विकास को जीवन की प्राथमिकता बनाना आवश्यक है। पृथ्वी हमारे पास केवल एक है और उसका कोई विकल्प नहीं। समय का यही संदेश है कि यदि हम प्रकृति की चेतावनियों को गंभीरता से नहीं लेंगे, तो आने वाला समय मानवता के लिए और भी कठिन हो जाएगा। लेकिन यदि हर मनुष्य अपने हिस्से की जिम्मेदारी निभाए, तो जलवायु परिवर्तन की दिशा को बदला जा सकता है और धरती को संतुलन, शांति और स्थायित्व प्रदान किया जा सकता है।

प्रेषकः
(ललित गर्ग)
लेखक, पत्रकार, स्तंभकार
ई-253, सरस्वती कंुज अपार्टमेंट
25 आई. पी. एक्सटेंशन, पटपड़गंज, दिल्ली-92
फोनः 22727486, 9811051133

लोगनाथन मुरुगन ने आईएफएफआई 2025 के लिए मास्टरक्लास का उद्घाटन किया

गोआ।  केंद्रीय सूचना एवं प्रसारण तथा संसदीय कार्य राज्य मंत्री श्री लोगनाथन मुरुगन ने आज गोवा के कला अकादमी में आयोजित 56वें भारतीय अंतर्राष्ट्रीय फिल्म महोत्सव (आईएफएफआई 2025) में मास्टरक्लास श्रृंखला का उद्घाटन किया। इस अवसर पर सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय के सचिव श्री संजय जाजू, सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय के संयुक्त सचिव डॉ. अजय नागभूषण, प्रख्यात फिल्म निर्माता श्री मुजफ्फर अली, उद्योग जगत की जानी-मानी हस्तियां, राष्ट्रीय फिल्म विकास निगम के प्रबंध निदेशक श्री प्रकाश मगदुम और निर्माता श्री रवि कोट्टाराकारा सहित कई वरिष्ठ अधिकारी उपस्थित थे।

एक ऐतिहासिक उपलब्धि के रूप में इस वर्ष मास्टरक्लास का उद्घाटन पहली बार आम जनता की उपस्थिति में किया गया, जो सुगमता और व्यापक सहभागिता के प्रति महोत्सव की प्रतिबद्धता को दर्शाता है।

श्री लोगनाथन मुरुगन ने अपने उद्घाटन भाषण में इस बात पर प्रकाश डाला कि आईएफएफआई 2025 में 200 से ज़्यादा फ़िल्में दिखाई जाएंगी, जो दुनिया भर में भारत के बढ़ते सिनेमाई प्रभाव का प्रतिनिधित्व करती हैं। उन्होंने आगे कहा कि यह महोत्सव विकसित भारत की दिशा में देश की यात्रा से जुड़ा है और वैश्विक स्तर पर अपनी रचनात्मक उपस्थिति को बढ़ाने की भारत की महत्वाकांक्षा को दोहराता है। मंत्री महोदय ने महिला फ़िल्म निर्माताओं की भागीदारी और योगदान को भी रेखांकित किया और बताया कि इस वर्ष महिलाओं द्वारा निर्देशित 50 फ़िल्में प्रदर्शित की जाएंगी -जो प्रधानमत्री श्री नरेन्द्र मोदी के विजन से प्रेरित ‘नारी शक्ति’ और महिला सशक्तिकरण के प्रति भारत सरकार की प्रतिबद्धता को दर्शाती है।

आईएफएफआई 2025 के मास्टरक्लास खंड में ज्ञान-साझाकरण के व्यापक प्रारूप शामिल होंगे, जिनमें पैनल चर्चा, कार्यशालाएं, गोलमेज वार्ताएं, साक्षात्कार सत्र, फायरसाइड चैट और संवादात्मक कार्यशालाएं शामिल हैं। विधु विनोद चोपड़ा, अनुपम खेर, मुजफ्फर अली, शाद अली, शेखर कपूर, राजकुमार हिरानी, आमिर खान, विशाल भारद्वाज और सुहासिनी मणिरत्नम जैसी प्रतिष्ठित सिनेमा हस्तियाँ पूरे महोत्सव में विभिन्न सत्रों का संचालन करेंगी।

प्रसिद्ध फिल्म निर्माता श्री मुजफ्फर अली ने मास्टरक्लास श्रृंखला के पहले सत्र का नेतृत्व किया, जिसने आने वाले दिनों के लिए माहौल तैयार कर दिया है।

इस वर्ष की मास्टरक्लास में समकालीन और भविष्योन्मुखी विषयों पर भी चर्चा होगी, जिसमें आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, सततता पर विशेष सत्र और सिनेमैटोग्राफी, वीएफएक्स तथा एसएफएक्स पर केंद्रित तकनीकी कार्यशालाएं शामिल होंगी। इसके अतिरिक्त, शीर्ष उद्योग विशेषज्ञों द्वारा थिएटर अभिनय पर मास्टरक्लास सीखने के अनुभव को और गहरा बनाएंगे।

आईएफएफआई 2025 ने ऑस्ट्रेलिया, जापान, जर्मनी और कनाडा से प्रतिभागियों को आकर्षित किया है, जिससे सिनेमाई सहयोग और प्रतिभा विनिमय के लिए वैश्विक मंच के रूप में इसकी स्थिति और मजबूत हुई है।

आईएफएफआई की वार्षिक परंपरा के तहत भारत की स्वर कोकिला लता मंगेशकर और गुरु दत्त जैसे सिनेमाई दिग्गज कलाकारों सहित महान कलाकारों को भारतीय सिनेमा में उनके महत्वपूर्ण योगदान का सम्मान करते हुए श्रद्धांजलि दी जीएगी।

बायोमेडिकल और वियरेबल सेंसर के लिए फ्लेक्सिबल पीज़ोइलेक्ट्रिक नैनोकंपोजिट्स विकसित किए गए

लचीले, कुशल, ऊर्जा-संचयन और दबाव-संवेदी पहनने योग्‍य उपकरणों के लिए एक अभिनव पीजोइलेक्ट्रिक उपकरण को पॉलीविनिलिडीन फ्लोराइड (पीवीडीएफ) मैट्रिक्स में एम्बेडेड फूल के आकार के टंगस्टन ट्रायऑक्साइड (डब्ल्यूओ₃) नैनोमटेरियल के पॉलिमर नैनोकंपोजिट का उपयोग करके विकसित किया गया है।

यांत्रिक ऊर्जा का विद्युत ऊर्जा में रूपांतरण हमेशा से ही शोधकर्ताओं के लिए एक महत्वपूर्ण विषय है और शोधकर्ता इसके लिए नए तरीकों की खोज में रहते हैं।

बेंगलुरुमें विज्ञान और प्रौद्योगिकी विभाग (डीएसटी) के स्वायत्त संस्थानके सेंटर फॉर नैनो एंड सॉफ्ट मैटर साइंसेज (सीईएनएस) के शोधकर्ताओं ने पॉलिमर और नैनोमटेरियल्स के बीच अंतःक्रियाओं का पता लगाने के लिए एक व्यवस्थित प्रयोगात्मक दृष्टिकोण अपनाया है।

शोधकर्ताओं ने एक ही नैनोफिलर का उपयोग करके विभिन्न आकृति विज्ञान, क्रिस्टल संरचनाओं और सतह के आवेशों का पता लगाया। जांची गई चार भिन्न मॉर्फोलॉजी में से, असमान लंबाई और तीन असमान कोणों वाले तीन अक्षों और उच्चतम पृष्ठीय आवेश (ज़ीटा विभव: -58.4 mV) वाले क्रिस्टल तंत्र द्वारा अभिलक्षित नैनोफ्लावर ने पीवीडीएफ मैट्रिक्स के साथ सबसे प्रभावी अंतःक्रिया की, जिसके परिणामस्वरूप उच्चतम पीज़ोइलेक्ट्रिक प्रावस्था प्राप्त हुई। ऊर्जा उत्पादन को और बेहतर बनाने के लिए, पीवीडीएफ मैट्रिक्स के भीतर आदर्श नैनोफिलर सांद्रता निर्धारित करने हेतु एक अनुकूलन प्रक्रिया अपनाई गई। इसमें स्व-संचालित ऊर्जा-संचयन उपकरणों का निर्माण और परीक्षण शामिल था।

यह शोध जिसमें लचीले पीजोइलेक्ट्रिक पॉलिमर और नैनोकणों का मिश्रण और परिणामी यांत्रिक ऊर्जा रूपांतरण दक्षता का व्यवस्थित अध्ययन शामिल है, यह समझने/वर्गीकृत करने में एक अंतर्दृष्टि प्रदान करता है कि किस प्रकार का नैनोकण पीजोइलेक्ट्रिक पॉलिमर के पीजोइलेक्ट्रिक गुणों को बढ़ा सकता है।

एसीएस एप्लाइड इलेक्ट्रॉनिक मैटेरियल्स में प्रकाशित इस अध्ययन ने रियल-टाइम बायोमेडिकल अनुप्रयोगों, विशेष रूप से रोगी की निगरानी में, इस प्रोटोटाइप के उपयोग की संभावना को भी दर्शाया किया।

चित्र शोध कार्य के ग्राफिकल प्रतिनिधित्व को दर्शाता है

इस नैनो-इंजीनियरिंग प्रणाली की उच्च संवेदनशीलता और ऊर्जा दक्षता इसे जैव-चिकित्सा उपयोगों के लिए आदर्श बनाती है। विशेष रूप से, इसे पहनने योग्य स्वास्थ्य निगरानी प्रणालियों में शामिल किया जा सकता है जो हृदय गति, नाड़ी, श्वास, चलना आदि जैसी छोटी से लेकर बड़ी शारीरिक गतिविधियों से जैव-यांत्रिक ऊर्जा को ग्रहण कर उसे विद्युत संकेतों में परिवर्तित कर सकती हैं। इन संकेतों का उपयोग करके, बाहरी ऊर्जा स्रोतों की आवश्यकता के बिना, शारीरिक मापदंडों की वास्तविक समय में निगरानी की जा सकती है।

श्री अंकुर वर्मा , सुश्री प्रीता दत्ता, श्री निलय अवस्थी, डॉ. आशुतोष के. सिंह और डॉ. सी.के. सुभाष की टीम का यह शोधकार्य; सुगठित और टिकाऊ स्वास्थ्य सेवा तकनीकों की दिशा में एक महत्वपूर्ण उलपब्धि है और ऊर्जा संचयन तथा स्मार्ट टेक्सटाइल्स में इसके व्यापक उपयोग के द्वार खोलता है। सीईएनएस टीम का अनुमान है कि इस तरह के अत्याधुनिक नैनोकम्पोजिट-आधारित उपकरण अगली पीढ़ी के बायोमेडिकल वियरेबल्स की बढ़ती माँग में महत्वपूर्ण योगदान देंगे।

प्रकाशन विवरण: डीओआईः  https://doi.org/10.1021/acsaelm.5c00962

आतंकवाद पर विकृत राजनीति करते कांग्रेस तथा अन्य विरोधी दल

राजधानी दिल्ली में 10 नवंबर 2025 को हुए लाल किला कार बम धमाके की जांच, अत्याधुनिक वैज्ञानिक पद्धति  से की जा रही है। जांच से जो तथ्य सामने आ रहे हैं, वह बहुत ही भयावह है। ये आतंकवादी डॉक्टर्स रॉकेट और ड्रोन जैसी चीज़ें  बना रहे थे और  राजधानी दिल्ली पर  हमास की स्टाइल में हमले करने का षड्यंत्र रच रहे थे। इस आतंकवादी समूह ने 32 कार बम धमाके करने की योजना बनाई थी । ये लाखों हिन्दुओं को मारकर  बाबरी विध्वंस का बदला लेना चाहते थे । दिल्ली लाल किले धमाके की जांच अभी चल रही है और हर दिन नए खूंखार और सफेदपोश अपराधी पकड़े जा रहे हैं।

जहाँ एक ओर सभी सुरक्षा एजेंसियां मिलकर अपराधियों की  खोजबीन में लगी हैं वहीं विरोधी दल परोक्ष रूप से आतंकवादियों के बचाव में लगे हैं। धमाके के कुछ समय बाद ही विपक्षी पार्टियों ने सोशल मीडिया में यह  प्रोपेगेंडा चला दिया कि बम धमाका बिहार चुनाव के मद्देनजर हुआ है। आतंकवाद के विरोध में कांग्रेस सहित सभी विपक्षी दलों की प्रतिक्रिया बहुत ठंडी व सीमित रही। विरोधियों ने आतंकवादियों के स्थान पर अपनी सुरक्षा एजेंसियों को ही कठघरे में खड़ा  किया।

पूर्व गृहमंत्री पी चिदम्बरम जिन्होंने अपने कार्यकाल के दौरान  आतंकवाद के खिलाफ कोई ठोस कठम नहीं उठाया उनका एक बहुत लंबा चौड़ा डिजाइनर पोस्ट आता है जिसमें वह दो प्रकार के आतंकियों से देश को खतरा बताते हैं और परोक्ष रूप से हिन्दुओं को कोसते हैं। चिदंबरम वही पूर्व गृहमंत्री हैं जिन्होंने हिंदू आतंकवाद व भगवा आतंकवाद जैसे शब्द गढ़े थे, उनके कार्यकाल में ही इंडियन मुजाहिदीन जैसे आतंकी संगठन पनपे तब पी चिदम्बरम साहब ने उनको रोकने के लिए कुछ नहीं किया अपितु उनके कार्यकाल में हुए आतंकी धमाकों के अपराधियों के विरुद्ध कमज़ोर केस बनाए गए जिससे बाद में वो बरी हो जाएं।

कांग्रेस के एक पूर्व सांसद हुसैन दलवई ने दो हाथ आगे निकलते हुए कहा कि यह धमाका कश्मीर में हो रहे अन्याय का परिणाम भी हो सकता है और साथ ही उन्होंने इसमें राष्ट्रीय स्वयंसवेक संघ की भूमिका भी जांच की मांग कर डाली। कांग्रेस सांसद इमरान मसूद ने आतंकवाद की घटना में पकड़े जा रहे युवाओं को भटका हुआ युवा बता दिया। जम्मू कश्मीर में पीडीपी नेता महबूबा मुफ्ती तो सदा से ही आतंकवाद का समर्थन व सरंक्षण करने वाले बयान देती रहती हैं तो इस बार भी वही कर रही हैं यही हाल वहां के सत्तारूढ़ अब्दुला परिवार का है। समाजवादी नेता अबू आजमी को भी यह बात अच्छी नहीं लग रही कि दिल्ली बम धमाके में इतने सारे डाक्टर्स पकड़े जा रहे हैं।

कांग्रेस के नेतृत्व में मुस्लिम तुष्टिकरण  में लगा संपूर्ण विपक्ष कही न कहीं, किसी न किसी रूप में  आतंक की पैरवी करता नजर आ रहा है। यह वही विपक्ष है जिसके नेता सर्जिकल स्ट्राइक के सबूत मांगते फिरते हैं और ऑपरेशन सिंदूर के समय भारत सरकार का साथ देने की बजाए चीन और पाकिस्तान की भाषा बोलते नजर आ रहे थे। ये पाकिस्तान की मीडिया के नायक हैं । आज संपूर्ण विपक्ष आतंकवाद का प्रचारक बन गया है। यह दल और इनके नेता इस्लामिक आतंकवाद की निंदा नहीं करते अपितु जब  आतंकवााद के खिलाफ कार्यवाही प्रारंभ हो जाती है तब ऐसी -ऐसी बयानबाजी करते हैं कि जांच की दिशा और दशा प्रभावित हो जाए। कांग्रेस के दिग्विजय सिंह सरीखे लोग मुस्लिम तुष्टिकरण के लिए ओसामा जी और साहब जैसे संबोधन प्रयोग करते हैं। इनका राष्ट्रीय विचार कुछ नहीं है सिर्फ अपने वोट बैंक को साधना है।

दिल्ली बम धमाके के बाद कांग्रेस के नेताओं के बयानों से यह सिद्ध हो गया है कि कांग्रेस कट्टरपंथी मुस्लिम तुष्टिकरण में किसी भी सीमा तक जा सकती है। उसके नेताओं के बयान यह आभास भी दे रहे हैं  कि अगर इस समय गलती से भी उनके नेतृत्व वाली सरकार  होती तो कार बम धमाके को महज सीएनजी धमाका कहकर छोड दिया जाता या फिर इसके पीछे षड्यंत्र करके एक बार फिर हिंदू आतंकवाद के एंगल से जांच कर  संघ को बदनाम किया जाता। कांग्रेस अब लीगी औए माओवादी हो चुकी है।

सौभाग्य से वर्तमान में केंद्र में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में एक मजबूत सरकार है। गृहमंत्री अमित शाह स्पष्ट कर चुके हैं कि हम आतंकियो को पाताल से भी खोज कर लाएंगे और कठोरतम दंड देंगे। सुरक्षा एजेंसियां अपराधियों को ढूँढने में लगी हैं। दिल्ली कार बम धमाके की जांच की तह तक पहुंचना सरकार का पहला लक्ष्य है। षड्यंत्र की सभी परतें खुलने और सभी प्रमाण हाथ में आ जाने के बाद ही सरकार आगे की कार्यवाही करेगी।

प्रेषक – मृत्युंजय दीक्षित

फोन  नं. – 9198571540