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एकलव्य स्कूल के बच्चे देश की कठिनतम परीक्षाओं में सफल

भारत के दूरदराज आदिवासी गावों में अवस्थित एकलव्य आदर्श आवासीय विद्यालयों (ईएमआरएस) ने एक बड़ा कीर्तिमान स्थापित किया है। वर्ष 2024 -25 में इन स्कूलों के करीब 597 छात्रों ने देश की अत्यंत प्रतियोगी मानी जाने वाली जेईई मेन और जेईई एडवांस तथा नीट की परीक्षा में रिकार्ड सफलता हासिल की है। यह एक बड़ी उछाल है क्योंकि इन स्कूलों से उपरोक्त परीक्षाओं में सफल होने वाले छात्रों की संख्या वर्ष 2022-23 में केवल 2 हुआ करती थी । इन स्कूलों की यह उपलब्धि इस बात को दर्शाती है की कैसे लक्ष्य आधारित शिक्षा के प्रसार के जरिये भारत की अत्यंत उपेक्षित आदिवासी जनजातियों के जीवन में बदलाव और उन्हें बेहतर अवसर प्रदान किया जा सकता है। गौरतलब है की बारहवीं क्लास तक शिक्षा प्रदान करने वाले देश के कुल 230 एकलव्य आदर्श विद्यालयों मे 101 विद्यालयों के छात्रों ने उपरोक्त परीक्षाओं में यह सफलता हासिल की है।

इसमें एक उदाहरण हिमाचल प्रदेश की बसपा घाटी के सांगला गांव के जतिन नेगी का है। इस आदिवासी छात्र ने हिमालय इलाके के गांव की कपकपाती ठंड और बिजली आपूर्ति के अभाव के बावजूद जेईईएडवांस उत्तीर्ण कर आल इंडिया रैंकिंग में 421वा स्थान हासिल किया। अभी यह लड़का आईआईटी जोधपुर का छात्र है। इसी तरह दूसरा उदाहरण गुजरात के खपाटिया गांव की लड़की पदवी ऊर्जस्वी बेन अमृतभाई का है, इस लड़की ने प्रदेश के बरटांड़ स्थित एकलव्य विद्यालय में पढ़कर नीट की परीक्षा उत्त्तीर्ण की। यह लड़की जूनागढ़ स्थित जीएमईआरएस मेडिकल कॉलेज और हॉस्पिटल से एमबीबीएस कर रही है। यानी इसका डॉक्टर बनने का सपना जल्द ही साकार हो जायेगा।

एकलव्य आदर्श आवासीय विद्यालय (ईएमआरएस) भारत सरकार द्वारा अनुसूचित जनजाति (एसटी) के छात्रों को कक्षा 6 से 12 तक मुफ्त आवासीय शिक्षा प्रदान करने के लिए स्थापित एक पहल है। इसका उद्देश्य गुणवत्तापूर्ण शिक्षा प्रदान करना, शैक्षणिक अंतर को खत्म करना और छात्रों को उच्च और व्यावसायिक शिक्षा के लिए तैयार करना है। ईएमआरएस योजना के प्रबंधन के लिए जनजातीय छात्रों के लिए राष्ट्रीय शिक्षा सोसायटी (NESSTS) नामक एक स्वायत्त निकाय की स्थापना की गई है

ये सारी कहानी एकलव्य आदर्श आवासीय विद्यालयों से मिले जीवन बदलने वाले अवसरों की कहानी है जिसने सैकड़ो आदिवासी बच्चो की तक़दीर बदली।

लोरियों में छुपा है सम्मोहन का संगीतः डॉ. सिंघल

कोटा /  जन्म के बाद बच्चे के जीवन में माँ की लोरियां कविता और संगीत के रूप में जुड़ती हैं। बच्चा जब रोता है या उसे नींद नहीं आती तब माँ मीठी – मीठी लोरी गाती है और बच्चा नींद की गोद में चला जाता है। इस बात से डॉ. प्रभात कुमार सिंघल ने बुधवार को स्प्रिंग डेल्स स्कूल में बच्चों को कविता और उसका जीवन में महत्व के बारे में बताया । उन्होंने बच्चों से कहा तुमने भी लोरी के बारे में सुना होगा, क्या कोई बच्चा लोरी सुनाएगा। एक बच्चा उठ कर आया और उसने सबसे लोकप्रिय लोरी , लल्ला लल्ला लोरी दूध की कटोरी तथा दूसरे बच्चे ने चंदा मामा दूर के, पुए पकाएं गुड़ के,आप खाएं थाली में, मुन्ने को दें प्याली में सुना कर सभी को हंसने पर मजबूर कर दिया।
डॉ. सिंघल ने स्कूल में आयोजित बाल साहित्य मेले में विशिष्ट अतिथि के रूप में कहा कि पिछले दो वर्ष से कोटा संभाग में बच्चों में साहित्य की समझ और रुझान पैदा करने के लिए संस्कृति, साहित्य, मीडिया फोरम द्वारा विशेष अभियान चला रखा है। इस अभियान से अब तक करीब 8 हजार बच्चों को कहानी और कविताओं के बारे में समझ पैदा हुई है तथा  प्रश्नोत्तरी के द्वारा देश के साहित्य, संस्कृति और सामान्य जानकारियों से उनका ज्ञानवर्धन हुआ है।
मुख्य अतिथि साहित्यकार राम मोहन कौशिक ने लोरी प्रसंग को आगे बढ़ाया और बच्चों को मुहावरों की रोचक जानकारी दी। अध्यक्षता करते हुए साहित्यकार कालीचरण राजपूत ने बच्चों को भगवत गीता के ज्ञान की जानकारी दी। रंगीतिका संस्था के सचिव कवि महेश पंचोली की पहल पर आयोजित कार्यक्रम में संचालन करते हुए उन्होंने  वन्देमातरम् गीत सुनाया जिसमें बच्चों ने पूरे जोश के साथ अपने स्वर मिला कर वातावरण को देशभक्ति पूर्ण बना दिया और अपनी बाल कविता पुस्तक स्कूल को भेंट की।
कविता प्रतियोगिता में नन्हे नन्हे बच्चों ने देशभक्ति और स्वच्छता के संदेश वाली कविताएं सुनाई। एक बच्ची ने कबीर के दोहे सुनाए। प्रश्नोत्तरी प्रतियोगिता के विजेता बच्चों  पीयूष सुमन कक्षा 7, देवांशी शर्मा कक्षा 8,मोहित केवट कक्षा 6 में  तथा कविता प्रतियोगिता के प्रथम ; नवजोत कक्षा 7,द्वितीय आंचल सुमन कक्षा 8 ,तृतीय : देवांशी शर्मा कक्षा 8 की पुरस्कृत किया गया। कार्यक्रम में एक सौ से अधिक बच्चें उपस्थित रहें। बच्चों को टॉफियां बांट कर मुंह मीठा करवाया गया। स्कूल के 100 से अधिक बच्चें उपस्थित रहें।स्कूल के संचालक देवेंद्र आचार्य ने सभी का स्वागत किया। संचालिका स्नेह गौतम ने आभार  व्यक्त किया।  स्कूल परिवार के सदस्यों अविनाश भोला, सत्येंद्र गिरी और विधानी शर्मा ने आयोजन में सहयोग किया
बाल साहित्य मेले में शांति पाठ :
वन्देमातरम्  के 150वें वर्ष पूर्ण होने के उपलक्ष में  श्री महर्षि गौतम आश्रम एवं वेद विद्यालय , तालेड़ा में आयोजित बाल साहित्य मेले में बच्चों ने सस्वर शांति पाठ कर अचंभित कर दिया। कार्यक्रम में बच्चों को साहित्य, संस्कृति, वंदेमातरम् गीत की जानकारी दी गई तथा प्रश्नोत्तरी और कविता प्रतियोगिताएं की गई। विजेता बच्चों प्रश्नोत्तरी में  प्रथम रहे गोविंद शर्मा 11 वीं , द्वितीय  गौरव शर्मा 11 वीं एवं तृतीय  सुशील शर्मा 11वीं रहें। कविता प्रतियोगिता में प्रथम  गौरव गौतम 11 वीं द्वितीय  चैतन्य शर्मा 11वीं एवं तृतीय  गोविंद शर्मा 11 वीं को पुरस्कृत किया गया। आश्रम के अध्यक्ष श्री कृष्ण मुरारी शर्मा ने कार्यक्रम को बच्चों के लिए उपयोगी बताता। कार्यकारी अध्यक्ष श्री मनीष शर्मा एवं आचार्य श्री शुभम शर्मा उपस्थित रहे।
    साहित्यकार रीता गुप्ता की पहल पर सागर उच्च माध्यमिक विद्यालय के कक्षा 8 एवं 9 के विद्यार्थियों के मध्य प्रश्नोत्तरी प्रतियोगिता का आयोजन किया गया। इसमें 40 बच्चों ने भाग लिया। प्रतियोगिता में कक्षा 8 की अरीबा खान प्रथम, कक्षा 9 की लक्ष्मी गुर्जर द्वितीय एवं नवनीत गुर्जर कक्षा 9 तृतीय घोषित किए गए।
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प्रेषक
महेश पंचोली, कोटा
सचिव, रंगीतिका संस्था, कोटा

बिहार विधान सभा चुनाव से क्या संकेत मिलता है

हाल ही में सम्पन्न हुए बिहार राज्य की विधान सभा के चुनाव परिणाम आ गए हैं एवं भारतीय जनता पार्टी के नेतृत्व में एनडीए गठबंधन को अभूतपूर्व सफलता प्राप्त हुई है। कुल 243 विधायकों में से एनडीए गठबंधन के 202 प्रत्याशी चुनाव जीत कर विधायक बन गए हैं। विधान सभा स्तर के किसी भी चुनाव में सामान्यतः राज्य स्तर की स्थानीय समस्याओं को ध्यान में रखकर ही राज्य के नागरिक अपना वोट देते हैं। परंतु, हाल ही के समय में कई राज्यों के चुनावों में स्थानीय नागरिकों के बीच यह प्रवृत्ति घर करती जा रही है कि जो राष्ट्रीय अथवा स्थानीय दल उन्हें मुफ्त की आकर्षक योजनाएं प्रस्तुत कर रिझाने का प्रयास करता है, उस दल को उस राज्य में अधिक सफलता मिलती हुई दिखाई दे रही है।
इस प्रवृत्ति का स्पष्ट संकेत दिल्ली राज्य में वर्ष 2013 में सम्पन्न हुए राज्य विधानसभा के चुनावों में, केवल एक वर्ष पूर्व गठित नए दल, आम आदमी पार्टी के  इस विधान सभा चुनाव में 28 सीटों की जीत पर दिखाई दिया था। उस समय आम आदमी पार्टी ने कांग्रेस के समर्थन से अपनी सरकार बनाई थी। आम आदमी पार्टी ने दिल्ली निवासियों को मुफ्त बिजली उपलब्ध कराने का वायदा इन चुनावों के दौरान किया था, जिसे बाद में पूरा भी किया गया था। इसके बाद तो दिल्ली विधान सभा चुनाव में वर्ष 2025 तक आम आदमी पार्टी का ही लगभग पूर्ण कब्जा रहा, क्योंकि मुफ्त में प्रदान की जाने वाली इसी प्रकार की कुछ और घोषणाओं को भी आम आदमी पार्टी समय समय पर लागू करती रही और दिल्ली के पढ़े लिखे नागरिकों को अपनी ओर आकर्षित करने में सफल रही। हालांकि, इस बीच दिल्ली की आर्थिक स्थिति लगातार खराब होती रही और दिल्ली का “बचत का बजट” –  “घाटे के बजट” में परिवर्तित हो गया था।

इसके बाद तो लगभग प्रत्येक राज्य में इस प्रकार का दौर ही चल पड़ा। हिमाचल प्रदेश राज्य में कांग्रेस, सेवा निवृत्त कर्मचारियों के लिए पुरानी पेंशन योजना को लागू करने के वादा, राज्य की प्रत्येक वयस्क महिला को 1500 रुपए देने का वादा एवं प्रत्येक परिवार को 300 यूनिट बिजली मुफ्त देने का वादा कर वर्ष 2022 में सत्ता में आ गई। बाद में जब पुरानी पेंशन योजना को हिमाचल प्रदेश में लागू किया गया तो हिमाचल प्रदेश के पहिले से ही दबाव में चल रहे बजट पर अतिरिक्त बोझ पड़ा एवं राज्य की आर्थिक स्थिति लगभग पूर्णत: डावांडोल हो गई है एवं राज्य को अपने ऋण पर ब्याज का भुगतान करने एवं राज्य के सामान्य खर्चों को चलाने के लिए भी ऋण लेना पड़ रहा है।

इसी चलन को कायम रखते हुए हाल ही में सम्पन्न बिहार राज्य में भी विधान सभा चुनाव के समय श्री नीतीश कुमार की राज्य सरकार ने राज्य की 1.21 करोड़ महिलाओं के बैंक खातों में 10,000 रुपए की राशि सीधे जमा करवाई है। मुख्यमंत्री महिला रोजगार योजना की घोषणा 29 अगस्त 2025 को की गई थी एवं केवल एक माह के अंदर इस योजना को लागू कर दिया गया तथा राज्य की महिलाओं के बैंक खातों में राशि हस्तांतरित कर दी गई। हालांकि, राज्य में लागू की गई इस योजना को महिला सशक्तिकरण की सबसे बड़ी पहल के रूप में देखा गया क्योंकि राज्य सरकार द्वारा इस योजना को लागू करने का उद्देश्य महिलाओं को आर्थिक रूप से मजबूत बनाना एवं रोजगार के नए अवसर निर्मित करना था। ऐसा बताया गया है कि राज्य की कुछ महिलाओं ने इस राशि से अपनी छोटी छोटी उत्पादन इकाईयों को प्रारम्भ करने में सफलता पाई है।

राज्य के मुख्यमंत्री ने घोषणा की है कि बिहार सरकार उन महिलाओं को रुपए 2 लाख तक की सहायता राशि उपलब्ध कराएगी जिनका व्यवसाय सफल रहेगा, इस छोटे निवेश से पूरा परिवार लाभान्वित होगा। बिहार राज्य में लगभग 1.40 करोड़ जीविका दीदियां स्व सहायता समूहों के माध्यम से सक्रिय हैं। आज देश के सबसे बड़े राज्यों में बिहार राज्य में गरीब वर्ग के नागरिकों की संख्या सबसे अधिक है एवं बिहार राज्य के नागरिक रोजगार प्राप्त करने के उद्देश्य से सबसे अधिक पलायन करते हुए दिखाई देते हैं। पूर्व में उत्तर प्रदेश राज्य की भी लगभग यही स्थिति थी, परंतु, हाल ही के समय में उत्तर प्रदेश राज्य में रोजगार के पर्याप्त नए अवसर निर्मित हुए हैं जिससे इस राज्य में नागरिकों का रोजगार के लिए पलायन रुका है। यदि बिहार राज्य भी अपने नागरिकों का पलायन रोकने में सफल रहता है एवं अपने राज्य के नागरिकों के लिए पर्याप्त मात्रा में रोजगार के नए अवसर निर्मित करने में सफलता प्राप्त करता है तो यह देश के आर्थिक विकास को भी गति देने में सहायक होगा। परंतु, लाख टके का प्रश्न यह है कि क्या बिहार सरकार की आर्थिक स्थिति उक्त प्रकार की योजनाओं को चलाने की स्थिति में है?

इसी प्रकार, मध्य प्रदेश राज्य भी लाड़ली बहिना योजना को लागू कर चुका है एवं इसी तर्ज पर हरियाणा, महाराष्ट्र, कर्नाटक, तेलंगाना, आंध्रप्रदेश, आदि राज्यों में भी नागरिकों को मुफ्त सुविधाएं उपलब्ध कराने की योजनाएं प्रारम्भ की गई। तमिलनाडु में तो मुफ्त में सुविधाएं उपलब्ध कराने का पुराना इतिहास रहा है। कुछ राज्यों में तो टीवी, लैपटॉप, स्कूटी, साइकल, आदि जैसे महंगे उत्पाद भी चुनावों के समस्त राज्य के नागरिकों को मुफ्त में उपलब्ध कराए जाते रहे हैं। विभिन्न राज्यों द्वारा यदि चुनाव जीतने के लिए राज्य के नागरिकों को मुफ्त सुविधाएं उपलब्ध कराने का क्रम यदि जारी रहता है तो यह प्रचलन इन राज्यों एवं देश के लिए उचित नहीं कहा जा सकता है क्योंकि आज सब्सिडी, वेतन, पेन्शन एवं ब्याज जैसी मदों पर लगातार बढ़ रहे खर्चों के कारण 15 राज्यों का बजटीय घाटा कानूनी रूप से निर्धारित 3 प्रतिशत की सीमा से ऊपर हो गया है। हिमाचल प्रदेश में बजटीय घाटा बढ़कर 4.7 प्रतिशत, मध्य प्रदेश में 4.1 प्रतिशत, आंध्रप्रदेश में 4.2 प्रतिशत एवं पंजाब में 3.8 प्रतिशत के खतरनाक स्तर पर पहुंच गया है।

पिछले कुछ वर्षों के दौरान देश के कई राज्यों ने अपने पूंजीगत खर्च को घटाया है। वर्ष 2015-16 से वर्ष 2022-23 के बीच राज्यों ने अपने पूंजीगत खर्च में 51 प्रतिशत तक की कमी की है। दिल्ली में 38 प्रतिशत, पंजाब में 40 प्रतिशत, आंध्रप्रदेश में 41 प्रतिशत, पश्चिम बंगाल में 33 प्रतिशत से पूंजीगत खर्चों में कमी दर्ज हुई है। आज कई राज्य सरकारें सब्सिडी प्रदान करने की मद पर अपने खर्चों को लगातार बढ़ा रहीं हैं एवं पूंजीगत खर्चों को लगातार घटा रही हैं, जो उचित नीति नहीं कही जा सकती है। इस प्रकार तो इन राज्यों की अर्थव्यवस्थाएं शीघ्र ही डूबने के कगार पर पहुंच जाने वाली हैं।

अब यदि चुनाव जीतने के लिए विभिन्न राज्य सरकारें क्या इसी तरह की योजनाओं को लागू करती रहेंगी। यदि हां, तो इन राज्यों को अपने दिवालिया होने के लिए बहुत लम्बा इन्तजार नहीं करना होगा। क्योंकि, भारतीय रिजर्व बैंक द्वारा जारी एक प्रतिवेदन में बताया गया है कि विशेष रूप से पंजाब, केरल, पश्चिमी बंगाल, हिमाचल प्रदेश, राजस्थान, झारखंड, बिहार, दिल्ली आदि राज्यों की आर्थिक स्थिति ठीक नहीं है। यदि समय पर इन राज्यों के आर्थिक ढांचे को सुधारने के प्रयास नहीं किया गए तो यह राज्य दिवालिया होने की ओर तेजी से आगे बढ़ रहे हैं। हालांकि, समय समय पर केंद्र सरकार द्वारा सहायता की राशि उपलब्ध कराकर कई राज्यों की वित्तीय कठिनाईयों को हल करने का प्रयास किया जाता है परंतु, केंद्र सरकार भी लम्बे समय तक यह कार्य नहीं कर सकती है क्योंकि अंततः इससे केंद्र सरकार की वित्तीय स्थिति पर भी दबाव बनता है।

विभिन्न राज्यों के वित्तीय घाटे की स्थिति एवं प्रवृत्ति पर गम्भीरता पूर्वक विचार कर इस पर रोक लगने का समय अब आ गया है। उत्पादक कार्यों पर सब्सिडी दी जाय तो ठीक है परंतु यदि यह लोक लुभावन वायदों को पूरा करने पर दी जा रही है तो इन पर अब अंकुश लगाया जाना चाहिए। केंद्र सरकार द्वारा आगे बढ़कर इस सम्बंध में कुछ नियम जरूर बनाए जाने चाहिए। यदि इन राज्यों की वित्तीय स्थिति लोक लुभावन घोषणाओं को पूरा करने की नहीं है तो, इस प्रकार की घोषणाएं चिन्हित राज्यों द्वारा नहीं की जानी चाहिए, ऐसे नियम बनाए जाने चाहिए। सहायता की राशि केवल चिन्हित व्यक्तियों को ही प्रदान की जानी चाहिए न कि राज्य की पूरी जनता को उपलब्ध करायी जाय। जैसा कि बिजली माफी योजना के अंतर्गत किया जा रहा है। राज्य के समस्त परिवारों को 300/400 यूनिट बिजली मुफ़्त में उपलब्ध कराए जाने के प्रयास हो रहे हैं। यदि राज्य की आर्थिक हालत बिगड़ रही है तो इसका खामियाजा भी अंततः उस प्रदेश की जनता को ही भुगतना पड़ता है। यह राज्य शिक्षा, स्वास्थ्य सेवाओं, आदि मदों पर होने वाले खर्च में कटौती करते हैं, जो राज्य के आर्थिक विकास एवं भविष्य में आने वाली पीढ़ी के लिए ठीक नहीं है। राज्य में आर्थिक विकास की गति कम होने से इन राज्यों में रोजगार के अधिक अवसर भी निर्मित नहीं हो पा रहे है।

प्रहलाद सबनानी
सेवानिवृत्त उपमहाप्रबंधक,
भारतीय स्टेट बैंक
के-8, चेतकपुरी कालोनी,
झांसी रोड, लश्कर,
ग्वालियर – 474 009
मोबाइल क्रमांक – 9987949940
ई-मेल – prahlad.sabnani@gmail.com

मासूम शर्मा की धमाकेदार वापसी “काली काली गाड़ी” के साथ

हरियाणवी म्यूज़िक इंडस्ट्री की मज़बूत आवाज़ मासूम शर्मा एक बार फिर अपने नए धमाकेदार हरियाणवी ट्रैक “काली काली गाड़ी” के साथ वापस आ गए हैं। यह गाना उनकी विशिष्ट शैली और जबरदस्त एनर्जी को पूरी तरह दर्शाता है। इससे पहले वह “चाँद” और “बंदूक मा गोली” जैसे सुपरहिट गाने टाइम्स म्यूज़िक हरियाणवी के साथ दे चुके हैं, और अब एक बार फिर लेबल के साथ इस नए ज़ोरदार रिलीज़ के लिए जुड़े हैं। यह गाना आज टाइम्स म्यूज़िक हरियाणवी के तहत रिलीज़ किया गया है।

“काली काली गाड़ी” में मंजित मोर और रूबा खान मुख्य किरदारों में नज़र आ रहे हैं। इसके बोल एमपी करसोला ने लिखे हैं, संगीत पिन्ना म्यूज़िक ने दिया है और निर्देशन मीत गिल ने मोंटी फिल्म प्रोडक्शन के बैनर तले किया है।

गाने को लेकर मासूम शर्मा ने कहा, “मैं हमेशा अपनी म्यूज़िक में नई एनर्जी और सच्चे इमोशंस लाने की कोशिश करता हूँ। ‘काली काली गाड़ी’ मेरे दिल के बेहद करीब है और मुझे बेसब्री से इंतज़ार है कि श्रोता इसे सुने और इसका अनुभव करें।”

टाइम्स म्यूज़िक के सीईओ मंदार ठाकुर ने कहा, “मासूम शर्मा हरियाणवी संगीत की सबसे मज़बूत आवाज़ हैं। उनकी एनर्जी सीधे दर्शकों से जुड़ती है और हर वर्ग के लोगों तक पहुँचती है। हमें बेहद खुशी है कि हम ‘काली काली गाड़ी’ रिलीज़ कर रहे हैं, जो उनकी संगीत यात्रा में एक और मज़बूत कड़ी साबित होगी।”

“काली काली गाड़ी” सभी प्रमुख स्ट्रीमिंग प्लेटफॉर्म्स पर उपलब्ध है और इसे टाइम्स म्यूज़िक हरियाणवी के यूट्यूब चैनल पर भी देखा जा सकता है।

YouTube पर देखें: https://www.youtube.com/watch?v=iD2rJD9PTwY

भारतीय डाक विभाग द्वारा ‘सीमा सुरक्षा बल’ के हीरक जयंती पर विशेष आवरण जारी

‘सीमा सुरक्षा बल’ की हीरक जयंती पर 21 नवंबर, 2025 को भारतीय डाक विभाग ने एक विशेष आवरण और विरूपण जारी किया तथा केंद्रीय गृह एवं सहकारिता मंत्री मा. श्री अमितभाई शाह के कर कमलों द्वारा भुज में इसका विमोचन किया गया।

“सीमा सुरक्षा बल-गौरवपूर्ण सेवा के 60 वर्ष (1965-2025)” विषय पर जारी इस विशेष आवरण में सीमा सुरक्षा बल के थल-जल-नभ में प्रदर्शन को अंकित किया गया है।

1965 के भारत-पाक युद्ध के उपरांत पाकिस्तान से लगी सीमाओं की सुरक्षा के उद्देश्य से 1 दिसंबर 1965 को स्थापित, सीमा सुरक्षा बल ने राष्ट्र की “प्रथम रक्षा पंक्ति” के रूप में देश की सीमाओं की रक्षा तथा आंतरिक सुरक्षा में अद्वितीय योगदान दिया है।

1971 के भारत-पाक युद्ध में सेना के साथ मिलकर युद्ध करने के साथ ही बांग्लादेश मुक्ति संग्राम में सक्रिय भूमिका निभाने वाले सीमा सुरक्षा बल ने, राष्ट्रीय सुरक्षा के प्रति अपने समर्पण को सदा ही सिद्ध किया है। बल द्वारा पंजाब एवं जम्मू-कश्मीर में आतंकवाद विरोधी अभियानों में वीरता का परिचय दिया गया।

“ऑपरेशन सिंदूर” के दौरान अदम्य साहस प्रदर्शित करने के लिये बल के बहादुरों को 2 वीर चक्र और 16 वीरता पदकों से सम्मानित किया गया। छह दशकों की इस गौरवपूर्ण यात्रा में सीमा सुरक्षा बल सीमाओं का अडिग प्रहरी बन “जीवन पर्यन्त कर्तव्य” के मूलमंत्र को हर कदम पर सिद्ध करते हुए कर्तव्य पथ पर अग्रसर है।

इस विशेष आवरण में सीमा सुरक्षा बल की गौरवपूर्ण ऐतिहासिकता एवं बहु आयामी कार्य को अंकित किया गया है।

लैंड पूलिंग और ममलेश्वर लोक प्रस्ताव का मसला: यह बैकफुट नहीं, सरकार का बैकअप है

राज्य के विकास एवं जनता के लिए कल्याणकारी योजनाओं का निर्माण किया जाता है. यह संभव नहीं होता कि प्रत्येक योजना अथवा कार्यक्रम चाकचौबंद हो क्योंकि इन योजनाओं का निर्माण नौकरशाह करते हैं और राज्य के मुखिया को प्रस्तुत करते हैं. नौकरशाह से भी कई बार कमी रह जाती है और वे राज्य के मुखिया को भी वैसा ही प्रस्तुत कर देते हैं लेकिन जब राज्य के मुखिया अर्थात मुख्यमंत्री की नजर में आता है कि जनता के लिए बनायी गई कल्याणकारी योजनाओं में कोई कमी रह गई है अथवा इससे जनहित का नुकसान हो रहा है तो वह तत्काल ऐसी योजनाओं को वापस लेती है. हाल में ही लैंड पूलिंग और ओंकारेश्वर में ममलेश्वर लोक निर्माण के प्रस्ताव को डॉ. मोहन यादव सरकार ने वापस लिया है. डॉ. मोहन यादव सरकार के इस फैसले को इस तरह प्रचारित किया जा रहा है कि सरकार बैकफुट पर आ गई है. लैंड पूलिंग और ममलेश्वर के मसले को इसी नजर से देखा जाना चाहिए. किसी भी सरकार के समक्ष सबसे पहले होता है कि जनभावनाओं को और उनके हितों को ठेस ना पहुँचे. लैंड पूलिंग मामले में किसानों के हितों पर आँच आ रही थी तो एक्ट में संशोधन किया गया वहीं ममलेश्वर में जनभावनाओं को ध्यान में रखकर ममलेश्वर निर्माण की प्रस्तावित योजना को वापस लिया गया है.
लैंड पूलिंग का मामले को थोड़ा समझें तो मोहन सरकार ने किसानों के हक में फैसला लिया है. लैंड पूलिंग के मामले में भूमि अधिग्रहण कानून 2013 को लागू करने का फैसला किया है और इस संबंध में आदेश भी जारी कर दिया गया है. लैंड पूलिंग में सरकार जमीन का अधिग्रहण करेगी और उस पर पक्का निर्माण करेगी लेकिन संशोधन के पहले हितग्राही को मुआवजा देने का प्रावधान नहीं था किन्तु संशोधन के उपरांत अब आधी जमीन वापसी के साथ मुआवजा के हकदार भी होंगे. यहाँ यह भी जान लेना उचित होगा कि लैड पुलिंग क्या है तो यह लैंड पूलिंग एक शहरी विकास प्रक्रिया है जिसमें निजी भूमि को एक साथ मिलाकर सडक़, पार्क और पानी जैसी बुनियादी सुविधाओं के साथ विकसित किया जाता है। इसके बाद, विकसित भूमि का एक हिस्सा मूल मालिकों को वापस दे दिया जाता है, जिसका मूल्य पहले से अधिक होता है। यह सरकार को सीधे भूमि खरीदने के बजाय शहरी विकास की अनुमति देता है। अब सिंहस्थ 2028 के लिए किसी भी किसान की जमीन अधिग्रहित नहीं की जाएगी। पूर्व की तरह तय अवधि के लिए जमीन ली जाएगी। बदले में मालिकों को रुपए दिए जाएंगे। सिंहस्थ के सफल आयोजन और किसानों के सम्मान में सरकार ने निर्णय लिया है। सीएम डॉ. मोहन यादव ने कहा है कि पूरा विश्व सिंहस्थ का वैभव देखेगा।
सिंहस्थ 2028 की तैयारियों के बीच महत्वकांक्षी भूमि अधिग्रहण योजना को सरकार ने वापस ले लिया है। किसान लगातार लैंड पूलिंग एक्ट का विरोध कर रहे थे। इसके बाद सीएम ने किसानों के साथ मीटिंग कर यह फैसला लिया है। बीकेएस के वरिष्ठ नेता के. राघवेंद्र पटेल ने अखबारों से जैसा कहा और उनकी बात मानें तो  दिल्ली से वापसी की मंजूरी मिलने के बाद ही मुख्यमंत्री ने उनसे मिलकर योजना की बारीकियों पर दो घंटे तक चर्चा की। विरोध की पहली चिंगारी फरवरी में ही भडक़ उठी थी, जब बीकेएस ने मालवा क्षेत्र में आंदोलन शुरू किया। इस क्षेत्र में बीकेएस के 8 लाख से ज्यादा सदस्य और 4,000 से ज्यादा ग्राम समितियां हैं। बीकेएस का कहना है कि मुख्यमंत्री को बार-बार भेजे गए पत्रों का जवाब न मिलने के बाद ही मामला गंभीर हुआ। नौकरशाहों की मानें तो सरकार के इस फैसले का कारण नीतिगत खामियों से ज्यादा पारदर्शिता की कमी थी। मसौदा अधिसूचना जारी करने के बाद, अधिकारियों ने भूमि मानचित्र और लाभ मॉडल का खुलासा नहीं किया, जिससे छिपे हुए इरादों पर संदेह पैदा हुआ। एक वरिष्ठ अधिकारी ने कहा कि लोग ब्लूप्रिंट मांगते रहे, यह जानना चाहते थे कि कौन सी जमीन ली जाएगी, मुआवजा कैसे मिलेगा, लेकिन हमने हफ्तों तक देरी की। उस देरी की कीमत हमें चुकानी पड़ी। हालांकि इसे बड़े केनवास पर देखें तो मामला सुलझ गया है.
ममलेश्वर लोक : जनभावना के साथ सरकार
उज्जैन सिंहस्थ- 2028 के तहत 4.6 हेक्टेयर में 120 करोड़ रुपए की लागत से ममलेश्वर लोक प्रस्तावित किया गया। इसके लिए 3 हेक्टेयर से ज्यादा जमीन का अधिग्रहण होना था। इसकी डेडलाइन दिसंबर 2027 तक तय की गई। तीर्थनगरी ओंकारेश्वर में प्रस्तावित 120 करोड़ रुपए का ममलेश्वर लोक प्रोजेक्ट आखिरकार निरस्त कर दिया गया है. प्रशासन ने कहा कि भविष्य में किसी ‘लोक’ निर्माण पर स्थानीय सहमति को प्राथमिकता दी जाएगी. विधायक नारायण पटेल ने मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव और दिल्ली में मौजूद कलेक्टर ऋषभ गुप्ता से बात कर ओंकारेश्वर की गंभीर स्थिति से अवगत करवाया।
इसके बाद डिप्टी कलेक्टर ने लिखित में आदेश जारी किया कि ममलेश्वर लोक ब्रह्मपुरी क्षेत्र में नहीं बनेगा। इसे अन्यत्र स्थान पर बनाया जाएगा और निर्माण से पहले स्थानीय संत समाज व जनता की सहमति ली जाएगी।  सरकार के प्रतिनिधि के रूप में मांधाता विधानसभा क्षेत्र से भाजपा विधायक नारायण पटेल की विवाद के हल में अहम भूमिका रही। उन्होंने बीच का रास्ता निकाला और मुख्यमंत्री से चर्चा कर समस्या का समाधान निकाल लिया। पटेल ने कहा कि मैं विनाश पर विकास नहीं होने दूंगा, मैं हमेशा सनातनी हूं, संतों के चरणों में पहुंचा हूं। किसी भी संत की बद्दुआ से कैसे राजनीति कर सकता हूं। प्रस्तावित ममलेश्वर लोक का मामला भी मोहन यादव सरकार ने वापस लेकर जनभावना का आदर किया है. इसमें सबसे बड़ी बात यह  है कि सरकार की महत्वकांक्षी प्रोजेक्ट ममलेश्वर लोक का विरोध भाजपा के विधायक नारायण पटेल ने किया और मुख्यमंत्री से चर्चा के उपरांत इसे वापस लिए जाने का फैसला हुआ.
सबसे दुर्भाग्य की बात तो यह है कि जो अधिकारी जीवनभर सरकार की तरफदारी करते रहे, रिटायरमेंट के बाद वे लगातार सरकार के खिलाफ मोर्चा खोले हुए हैं. लैंड पूलिंग के मामले में वे लेग पुलिंग जैसी भाषा का उपयोग करने से परहेज नहीं कर रहे हैं. सच्चाई तो यह है कि यह लोग यह जानते हैं कि स्थिति और परिस्थितियों के मुताबिक फैसले लिए जाते हैं, उनमें संशोधन होता है और कई बार प्रस्तावित योजना पूरी तरह निरस्त कर दिया जाता है. जिम्मेदार लोगों का जनभावना को कई बार उद्धेलित करता है तो कई बार उनका मन बदल देता है. शांति के टापू मध्यप्रदेश में सरकार और शासन किसी का भी रहा हो, जनभावनाओंं को हमेशा ऊपर रखा गया. लैड पूलिंग और ममलेश्वर लोक के संबंध में निर्णय वापस लेने का यह पहला और इकलौता फैसला नहीं है. इसके पहले के सरकारों ने भी जनहित में अनेक फैसलों को बदला है, संशोधित किया और कई बार पूर्ण रूप से रद्द भी किया है.

यूनीसीआईआरएफ (USCIRF) की 2025 रिपोर्ट में भारत और हिंदुओं पर निशाना, मुस्लिमों को बताया ‘शांतिदूत’

हर साल यूनाइटेड स्टेट्स कमीशन ऑन इंटरनेशनल रिलिजियस फ्रीडम (USCIRF) एक रिपोर्ट जारी करता है, जिसे वह दुनिया में धार्मिक स्वतंत्रता का ‘स्वतंत्र आँकलन’ बताता है। लेकिन असल में यह रिपोर्ट अक्सर एक निष्पक्ष मूल्यांकन से ज्यादा एक राजनीतिक हथियार की तरह इस्तेमाल होती है।

इसका निशाना ज्यादातर वे देश बनते हैं, जो अमेरिका की रणनीतिक पसंद या उसके वैचारिक दबावों से पूरी तरह सहमत नहीं होते। भारत, जो 1.4 अरब लोगों का एक सभ्यतागत लोकतंत्र है, ऐसे निशानों में अक्सर शामिल रहा है।

इस साल भी USCIRF ने भारत को ‘Countries of Particular Concern (CPC)’ की सूची में डाल दिया और यहाँ तक कि अमेरिका को भारत के लिए अपने हथियार सौदों की समीक्षा करने की सलाह भी दी।

यूनीसीआईआरएफ  (USCIRF) की 2025 की रिपोर्ट कोई आकलन नहीं है; यह एक वैचारिक प्रहार है। 2019 में सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बावजूद, आयोग अभी भी राम मंदिर को विवादित बता रहा है और सदियों से चले आ रहे उस अपमान को नजरअंदाज कर रहा है जो हिंदुओं ने मुगलों द्वारा पहले से मौजूद मंदिर को हड़पकर उस पर मस्जिद खड़ी करने के बाद झेला था।इसके राजनीतिक इरादे साफ दिखते हैं। वॉशिंगटन भारत के रूस से तेल खरीदने से नाराज है। यह बात खुद में विडंबनापूर्ण है, क्योंकि अमेरिका खुद भी रूस के साथ व्यापार जारी रखता है। इसी माहौल में USCIRF की 2025 की रिपोर्ट सामने आती है, जो समझदारी या संतुलन से ज्यादा उसकी गलतियों और पक्षपात के लिए ध्यान आकर्षित करती है।

यूनीसीआईआरएफ  (USCIRF)   ने राम मंदिर के ऐतिहासिक तथ्यों को जानबूझकर मिटाया।

यूनीसीआईआरएफ  (USCIRF)  रिपोर्ट का सबसे चौंकाने वाला हिस्सा अयोध्या में हुए राम मंदिर प्राण-प्रतिष्ठा समारोह का जिक्र है। रिपोर्ट में दावा किया गया है कि प्रधानमंत्री मोदी ने उस मंदिर का उद्घाटन किया जो ‘बाबरी के खंडहरों पर बनाया गया है’, मानो यह किसी तरह का बहुसंख्यकवादी प्रदर्शन हो।

जबकि यह समारोह एक लंबे और जटिल विवाद के कानूनी समाधान का परिणाम था, जिसे भारत के सुप्रीम कोर्ट ने विस्तृत सुनवाई के बाद तय किया था। रिपोर्ट इस तथ्य को नजरअंदाज कर देती है कि पुरातात्त्विक और ऐतिहासिक सबूत साफ तौर पर दिखाते हैं कि बाबरी ढाँचा एक पुराने हिंदू मंदिर के अवशेषों पर बनाया गया था।

पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) की खुदाई, ब्रिटिश काल के रिकॉर्ड और राष्ट्रीय अभिलेखागार में मौजूद दस्तावेज सभी इस जगह को ‘मस्जिद-ए-जन्मस्थान’ के रूप में दर्ज करते हैं। मुगल काल के निर्माण के बाद भी हिंदू लगातार वहीं पूजा करते रहे, जिससे यह स्थान श्रीराम जन्मभूमि की पहचान बनाए रहा।

2019 के सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक फैसले में दशकों की सुनवाई और सभी साक्ष्यों को तौलने के बाद जमीन हिंदू पक्ष को दी गई। ऐसे में USCIRF का यह संकेत देना कि यह समारोह किसी तरह का गलत कार्य था, भारत की संवैधानिक संस्थाओं को हल्के में लेने जैसा है।

क्या संगठन यह मानता है कि भारत की लोकतांत्रिक सरकार और सुप्रीम कोर्ट अपने ही घरेलू मामलों को न्यायपूर्वक नहीं सुलझा सकते? या फिर USCIRF खुद को भारत के इतिहास और सभ्यता से अधिक जानकार समझता है?

दिल्ली हिंदू विरोधी दंगों को छुपाना: कट्टरपंथियों को शांतिपूर्ण प्रदर्शनकारियों में बदलना

यह रिपोर्ट 2020 के दिल्ली हिंदू विरोधी दंगों की घटनाओं को भी तोड़-मरोड़कर पेश करने की कोशिश करती है। इसमें कहा गया है कि उमर खालिद, शरजील इमाम और मीरन हैदर को सिर्फ इसलिए जेल में रखा गया है क्योंकि वे CAA के खिलाफ ‘शांतिपूर्ण प्रदर्शन’ कर रहे थे। यह दावा न सिर्फ गलत है, बल्कि भ्रामक भी है।

फरवरी 2020 में दिल्ली में हुई हिंसा, जिसमें 50 से ज्यादा लोगों की मौत हुई और कई सौ लोग घायल हुए, अचानक भड़की भीड़ का नतीजा नहीं थी। यह हिंसा एक सोच-समझकर रची गई साजिश का हिस्सा थी, जिसे एक महत्वपूर्ण विदेशी दौरे के दौरान अंजाम दिया गया ताकि भारत को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर शर्मिंदा किया जा सके।

आरोपपत्र में उमर खालिद की एक प्रमुख साजिशकर्ता के रूप में पहचान की गई है, जिसमें उनके कॉल रिकॉर्ड, बातचीत के ट्रांसक्रिप्ट, मीटिंगों के सबूत और गवाहियों के आधार पर बताया गया है कि हिंसा की योजना कैसे बनाई गई।

शरजील इमाम का वह रिकॉर्डेड भाषण, जिसमें वह भारत के संवेदनशील चिकन नेक सिलीगुड़ी कॉरिडोर को बंद करने की बात करता है, साफ दिखाता है कि उसका आंदोलन सिर्फ विरोध नहीं बल्कि अलगाववादी सोच से प्रेरित था।

ऐसे लोगों को ‘निरपराध शांतिपूर्ण प्रदर्शनकारी’ बताना न सिर्फ दंगों के पीड़ितों का अपमान है, बल्कि यह भी दिखाता है कि USCIRF किस हद तक जाकर ऐसे व्यक्तियों की छवि सुधारने की कोशिश कर रहा है, जिनकी गतिविधियाँ किसी भी तरह शांतिपूर्ण विरोध की सीमा में नहीं आतीं।

बुल्डोजर झूठ: कानून प्रवर्तन को सांप्रदायिक उत्पीड़न के रूप में विकृत करना

यूनीसीआईआरएफ  (USCIRF)  का यह दावा भी भ्रामक है कि भारत ने मुस्लिमों की संपत्तियाँ, जिनमें मस्जिदें भी शामिल हैं, इसलिए तोड़ीं क्योंकि वे मुस्लिम-मालिकाना थीं। हकीकत इससे बिल्कुल अलग है।

देश के कई राज्यों, दिल्ली, मध्य प्रदेश, उत्तराखंड आदि में हुई तोड़फोड़ कार्रवाई गैर-कानूनी कब्जों के खिलाफ थी, जैसे सरकारी जमीन, नदी के किनारे, फुटपाथ या अन्य सार्वजनिक स्थानों पर बनी अवैध इमारतें।

इन कार्रवाइयों का धर्म या पहचान से कोई लेना-देना नहीं था, उद्देश्य केवल जमीन उपयोग के नियमों का पालन करवाना और जन सुरक्षा सुनिश्चित करना था। कई मामलों में तो मस्जिद समितियों ने खुद स्वीकार किया कि कुछ हिस्से वाकई अतिक्रमण पर बने थे और वे उन्हें स्वयं हटाने के लिए भी तैयार थे।

लेकिन

 

यूनीसीआईआरएफ  (USCIRF) ने इन तथ्यों को नजरअंदाज करते हुए एक सामान्य प्रशासनिक कार्रवाई को साम्प्रदायिक साजिश की तरह दिखाने की कोशिश की। जबकि वास्तविकता यह है कि ऐसे नियम सभी पर समान रूप से लागू होते हैं, धर्म चाहे कोई भी हो।

धर्मांतरण विरोधी कानून: USCIRF का जमीनी हकीकत को स्वीकार करने से इनकार

यूनीसीआईआरएफ  (USCIRF)   की रिपोर्ट में किए गए आरोप भारत के धर्म-परिवर्तन विरोधी कानूनों को भी गलत तरीके से प्रस्तुत करते हैं। ये कानून देश के कई राज्यों ने बनाए हैं और ये सभी अलग-अलग राजनीतिक विचारधाराओं वाले राज्यों में लागू हैं।

इनका उद्देश्य किसी की धार्मिक स्वतंत्रता छीनना नहीं, बल्कि धोखे, दबाव, लालच या शोषण के जरिये होने वाले मजबूरन धर्म-परिवर्तनों को रोकना है। कई जगहों पर दर्ज FIR, शिकायतें और लोगों की गवाही इस तरह की गतिविधियों के बढ़ने की पुष्टि भी करती हैं।

भारत के ये कानून स्वैच्छिक धर्म-परिवर्तन पर कोई प्रतिबंध नहीं लगाते, बल्कि केवल जबरदस्ती और धोखाधड़ी पर रोक लगाते हैं। साथ ही, भारत की संघीय व्यवस्था राज्यों को यह अधिकार देती है कि वे अपने-अपने हालात के हिसाब से ऐसे कानून बना सकें ताकि स्थानीय समस्याओं को प्रभावी तरीके से नियंत्रित किया जा सके।

हाल के वर्षों में मिशनरी गतिविधियों में नई-नई छलपूर्ण रणनीतियों के इस्तेमाल से कमजोर और गरीब तबकों में जबरन या लालच देकर धर्म-परिवर्तन की शिकायतें काफी बढ़ी हैं। इसके बावजूद USCIRF इस पूरे मुद्दे को केवल ‘अल्पसंख्यकों के खिलाफ अभियान’ बताकर पेश करती है।

वह न तो पीड़ितों की गवाही पर ध्यान देती है और न ही उन समुदायों की चिंताओं पर, जो ऐसे धर्म-परिवर्तन रैकेट्स से सबसे ज्यादा प्रभावित हैं। यह दिखाता है कि USCIRF भारत की वास्तविक सामाजिक परिस्थिति और जमीनी सच्चाइयों को समझने की इच्छा ही नहीं रखती।

गौरक्षा: USCIRF की सांस्कृतिक संदर्भ के प्रति जानबूझकर की गई अनदेखी

यह रिपोर्ट गाय-संरक्षण कानूनों की आलोचना करते हुए भी वही बात दिखाती है, भारत की सांस्कृतिक पृष्ठभूमि को समझने की अनिच्छा। भारत में गाय सिर्फ धार्मिक नहीं, बल्कि सभ्यतागत और संवैधानिक रूप से भी महत्वपूर्ण है। संविधान के निदेशक सिद्धांतों में स्पष्ट रूप से गायों की सुरक्षा का उल्लेख है।

जिस तरह पश्चिमी देशों में कुछ जानवरों, जैसे घोड़े, कुत्ते या व्हेल, का सेवन सांस्कृतिक कारणों से नियंत्रित या प्रतिबंधित होता है, उसी तरह भारत में गाय-संरक्षण कानून समाज की गहरी परंपराओं और भावनाओं को दर्शाते हैं।

लेकिन USCIRF अपनी वैचारिक सोच के कारण इस सांस्कृतिक संदर्भ को समझने में असफल रहती है। वह इन कानूनों को सीधे-सीधे ‘बहुसंख्यकवाद’ का हथियार बताती है, जिससे उसके सांस्कृतिक भ्रम का पता चलता है, भारत की वास्तविकता का नहीं।

यह रिपोर्ट विचारधारा से प्रेरित है, साक्ष्य से नहीं

2025 की USCIRF रिपोर्ट की सबसे बड़ी कमजोरी सिर्फ उसकी गलतियों में नहीं, बल्कि उसके पीछे छिपी सोच में है। हर साल यह आयोग अमेरिका की विदेश-नीति वाली चिंताओं को ही दोहराता है, वह उन देशों की आलोचना करता है जो अपनी रणनीतिक स्वतंत्रता बनाए रखते हैं, लेकिन अमेरिका के पसंदीदा देशों में होने वाले उल्लंघनों को नजरअंदाज कर देता है।

भारत पर उसकी टिप्पणी किसी निष्पक्ष समीक्षा जैसी नहीं लगती, बल्कि ऐसे कार्यकर्ताओं की लिखी हुई लगती है जो भारत की बहुलतावादी सभ्यता को न समझते हैं और न सम्मान देते हैं। वह भारत से अमेरिकी तरह का सेक्युलरिज्म अपनाने की माँग करता है, जबकि भारत का असली सेक्युलरिज्म सभी धर्मों के समान सम्मान पर आधारित है, न कि बहुसंख्यक समाज को अदृश्य बनाने पर।

यह रिपोर्ट धार्मिक स्वतंत्रता का निष्पक्ष सर्वे नहीं, बल्कि एक राजनीतिक दस्तावेज जैसी लगती है। यह चुनिंदा आरोपों और पक्षपाती भाषा के जरिए भारत की अदालतों, चुनी हुई सरकारों और कानून व्यवस्था को कमजोर दिखाने की कोशिश करती है। धार्मिक आजादी के नाम पर USCIRF वास्तव में दुनिया के सबसे विविध लोकतंत्रों में से एक भारत की संप्रभुता और सांस्कृतिक अधिकारों में दखल देता दिखता है।

2024 और 2023 की रिपोर्टें USCIRF के बहु-वर्षीय दुष्प्रचार अभियान का खुलासा करती हैं

2025 की USCIRF रिपोर्ट कोई अलग घटना नहीं है। यह सिर्फ उसी रुझान का अगला हिस्सा है, जो 2023 और 2024 की USCIRF और अमेरिकी स्टेट डिपार्टमेंट की रिपोर्टों में भी साफ दिखाई देता है।

2024 की रिपोर्ट भी लगभग उसी पैटर्न पर बनी थी। उसमें कहा गया था कि भारत में धार्मिक स्वतंत्रता खराब हो रही है, चुनावों के दौरान नफरत भरे भाषणों के दावे दोहराए गए थे और फिर वही मुद्दे उठाए गए थे, बुलडोजर कार्रवाई, धर्मांतरण-निरोधक कानून और गौ-संरक्षण कानून।

रिपोर्ट ने यहाँ तक सुझाव दिया था कि भारत को ‘Country of Particular Concern (CPC)’ घोषित किया जाए और उस पर प्रतिबंध लगाने पर विचार हो ठीक वही बातें जिन्हें 2025 की रिपोर्ट और ज़ोर देकर दोहराती है। भारत ने उस रिपोर्ट को पूरी तरह खारिज कर दिया था और कहा था कि USCIRF मानवाधिकारों के नाम पर राजनीतिक एजेंडा चला रही है।

2023 की रिपोर्ट पर भारत का जवाब और भी कड़ा था। जून 2024 में विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने इस रिपोर्ट को ‘गहरी पूर्वाग्रही,’ ‘वोट-बैंक आधारित’ और ‘तथ्यों की चुनिंदा और गलत व्याख्या’ बताया था। उन्होंने कहा था कि रिपोर्ट ने भारत के संवैधानिक प्रावधानों, कानूनों और यहाँ तक कि सुप्रीम कोर्ट के फैसलों पर भी सवाल खड़े किए, जो किसी भी संप्रभु लोकतंत्र के लिए अस्वीकार्य है।

जायसवाल ने यह भी बताया था कि USCIRF भारत के FCRA और विदेशी फंडिंग नियमों की आलोचना करती है, जबकि अमेरिका में ऐसे नियम भारत से भी ज्यादा सख्त हैं। उन्होंने यह भी याद दिलाया था कि जबकि अमेरिका भारत पर नफरत-अपराध और धार्मिक स्वतंत्रता को लेकर आरोप लगाता है, भारत कई बार अमेरिकी जमीन पर भारतीय मूल के लोगों पर नस्लीय हमलों, मंदिरों पर हमलों, घृणा-अपराधों और पुलिस द्वारा की गई ज्यादतियों का रिकॉर्ड साझा कर चुका है, लेकिन USCIRF ने इन पर कभी गंभीरता से ध्यान नहीं दिया। यह चुप्पी बहुत कुछ कहती है।

कुल मिलाकर, 2023, 2024 और 2025 की रिपोर्टें एक ही प्रवृत्ति दिखाती हैं, USCIRF हर साल लगभग उन्हीं सीमांत कार्यकर्ताओं, दंगों के आरोपितों, अलगाववादी समर्थकों और माओवादी-संबंधित व्यक्तियों को ‘पीड़ितों’ के रूप में पेश करता है।

वही आरोप साल-दर-साल दोहराए जाते हैं, बस शब्द बदल जाते हैं। भारत के कानूनों, सामाजिक संरचना और सांस्कृतिक परंपराओं को अमेरिकी शैक्षणिक दुनिया के चश्मे से देखा जाता है और CPC टैग को एक राजनयिक हथियार की तरह इस्तेमाल किया जाता है, न कि भारत की स्थिति का संतुलित या तथ्य-आधारित आँकलन देने की कोशिश की जाती है।

भारत को बदनाम करने का वर्षों पुराना अभियान

2025 का USCIRF रिपोर्ट सिर्फ पक्षपाती नहीं है; यह भारत की छवि को लगातार खराब दिखाने की एक लंबी मुहिम का नतीजा है। कई सालों से यह संगठन बार-बार वही आरोप दोहरा रहा है, पुराने और अविश्वसनीय स्रोतों पर भरोसा कर रहा है, कोर्ट के फैसलों को नजरअंदाज कर रहा है और भारत के सांस्कृतिक संदर्भ को समझने की कोशिश ही नहीं करता।

ऐसी स्थिति में समस्या भारत में नहीं, बल्कि उस संस्था में है जो मूल्यांकन कर रही है। सच्चाई यह है कि USCIRF भारत में धार्मिक स्वतंत्रता का निष्पक्ष आँकलन नहीं कर रहा है, वह एक तयशुदा कहानी गढ़ रहा है। और इसी वजह से उसके निष्कर्षों की विश्वसनीयता अब बेहद संदिग्ध हो चुकी है।

यह रिपोर्ट मूल रुप से अंग्रेजी में जिनित जैन ने लिखी है। मूल रिपोर्ट पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें।

साभार- https://hindi.opindia.com/   से

यूनिसेफ और आईएफएफआई : पांच फिल्में, एक सार्वभौमिक कहानी

56वां आईएफएफआई  बचपन के साहस, रचनात्मकता और सपनों को दर्शाने वाली  विश्वभर की पांच फिल्में प्रदर्शित करेगा

भारतीय अंतर्राष्ट्रीय फिल्म महोत्सव (आईएफएफआई) एक बार फर संयुक्त राष्ट्र बाल कोष (यूनिसेफ) के साथ मिलकर बचपन की विविध भावनाओं – उसकी जिज्ञासा, संघर्ष और अटूट दृढ़ता – का उत्सव मना रहा है।  ऐसी कहानियों के माध्यम से जो हमें झंझोरती है, प्रेरित करती है और सोचने को मजबूर करती है!

यूनिसेफ और आईएफएफआई के बीच सहयोग की शुरूआत 2022 में हुई थी। अब अपने चौथे वर्ष में बच्चों के अधिकारों और फिल्म जगत के दो प्रसिद्ध ब्रांडों का ये संगम एक ऐसा मंच बना रहा है,  जहां सिनेमा और संवेदना का मिलन होता है। आईएफएफआई के 56 वें संस्करण में ऐसी फ़िल्में एक साथ लाई गई हैं जो विभिन्न संस्कृतियों में बच्चों के सामने आने वाली वास्तविकताओं को सामने लाती है और उनके साहस, रचनात्मकता और आशा का उत्सव मनाती हैं। यूनिसेफ की मानवीय दृष्टि और सिनेमा की अभिव्यक्ति शक्ति को जोड़कर यह साझेदारी इस विश्वास को पुन: स्थापित करती है कि सिनेमा में सहानुभूति जगाने और हर बच्चे के बेहतर भविष्य के लिए कार्रवाई को प्रेरित करने की क्षमता है।

पांच फ़िल्में, एक सार्वभौमिक कहानी

इस वर्ष चयनित पांच उत्कृष्ट फिल्मों में कोसोवोदक्षिण कोरियामिस्र और भारत की कहानियां शामिल हैं – जो बचपन की विभिन्न सच्चाईयों को उजागर करती है : अपनापन खोजने की चाह, गरिमा के लिए संघर्ष, प्यार की आवश्यकता और स्वतंत्रता का सपना। ये फिल्में मिलकर एक भावनात्मक और सिनेमाई ताना-बाना रचती है, जो यूनिसेफ और आईएफएफआई की साझा भावना को व्यक्त करती है – कहानियों के कहने की शक्ति पर विश्वास, जो दिलों को खोलती है और दुनिया को अधिक न्यायपूर्ण तथा संवेदनशील बनाने का मार्ग दिखाती हैं।

1. जन्मदिन मुबारक हो (मिस्र/ मिस्र की अरबी भाषा)

मिस्र की फ़िल्म निर्माता सारा गोहर की मार्मिक पहली फ़िल्म ” हैप्पी बर्थडे” का प्रीमियर ट्रिबेका फ़िल्म फेस्टिवल 2025 में हुआ और यह मिस्र की ओर से ऑस्कर के लिए आधिकारिक प्रविष्टि भी है। यह आठ साल की नौकरानी तोहा की कहानी है, जो अपनी सबसे अच्छी दोस्त नेली के लिए एक शानदार जन्मदिन की पार्टी देने पर अड़ी है, भले ही उसके आसपास की दुनिया न्यायपूर्ण न हो। आधुनिक काहिरा की पृष्ठभूमि पर आधारित यह फ़िल्म विशेषाधिकार और मासूमियत के बीच की गहरी खाई को उजागर करती है और दिखाती है कि कई बार बच्चे मानवता को वयस्कों से अधिक स्पष्टता से समझते हैं।

मित्रता और असमानता के अपने कोमल चित्रण के माध्यम से हैप्पी बर्थडे प्रत्येक बच्चे के लिए गरिमा, समानता और अवसर के प्रति यूनिसेफ की प्रतिबद्धता को दर्शाता है, चाहे वे कहीं भी पैदा हुए हों।

2. कदल कन्नी (भारत/तमिल भाषा)

तमिल फिल्म निर्माता दिनेश सेल्वराज की गीतात्मक फ़िल्म “कदल कन्नी” एक ऐसी दुनिया को चित्रित करती है जहां अनाथ बच्चे फ़रिश्तों और जलपरियों के सपने देखते हैं, जो देखभाल, आराम और अपनेपन के प्रतीक हैं। यथार्थवाद और कल्पना के संगम के माध्‍यम से यह फ़िल्म उस कल्पनाशक्ति का जश्न मनाती है जो बच्चों को कठिनाई में भी संबल प्रदान करती है और हमें याद दिलाती है कि सपने अक्सर उनके अस्तित्व का पहला रूप होते हैं। अपनी कविता और करुणा के साथ “कदल कन्नी” यूनिसेफ और आईएफएफआई शोकेस को खूबसूरती से पूरा करती है, जो हर बच्चे के सपने देखने, देखे जाने और प्यार किए जाने के अधिकार का जश्न मनाती है।

3. पुतुल (भारत/हिन्दी भाषा)

भारतीय फिल्म निर्माता राधेश्याम पिपलवा की “पुटुल” एक सात साल की बच्ची की कहानी है, जो अपने माता-पिता के तलाक के भावनात्मक तूफान में फंसी हुई है। आहत और उलझन में, वह अपने दोस्तों, “डैमेज्ड गैंग” नामक एक समूह और अपने प्यारे नाना में सांत्वना पाती है। जब वह गायब हो जाती है, तो उसके माता-पिता न केवल अपने डर का, बल्कि अपने दिलों के टूटने का भी सामना करने को मजबूर हो जाते हैं। मार्मिक और बेहद मानवीय, “पुटुल ” टूटे हुए परिवारों में बच्चों के मौन मजबूती की पड़ताल करती है। यह मानसिक स्वास्थ्य और हर बच्चे के प्यार, समझ और सुरक्षा में बड़े होने के अधिकार के लिए यूनिसेफ की वकालत को प्रतिध्वनित करती है।

हद मानवीय, “पुटुल ” टूटे हुए परिवारों में बच्चों के मौन लचीलेपन की पड़ताल करती है। यह मानसिक स्वास्थ्य और हर बच्चे के प्यार, समझ और सुरक्षा में बढ़ने के अधिकार के लिए यूनिसेफ की वकालत को प्रतिध्वनित करती है।

4. द बीटल प्रोजेक्ट (कोरिया/कोरियाई भाषा)

कोरियाई फिल्म निर्माता जिन क्वांग-क्यो की दिल को छू लेने वाली फिल्म “द बीटल प्रोजेक्ट” का शिकागो के एशियन पॉप अप में प्रीमियर हुआ। फिल्म की शुरुआत उत्तर कोरिया से आए एक बीटल से भरे प्लास्टिक बैग से होती है जो एक दक्षिण कोरियाई लड़की के हाथों में पहुंच जाता है। यह बीटल कोरियाई सीमा के दोनों ओर रहने वाले बच्चों के बीच जिज्ञासा और जुड़ाव जगाता है। यह विभाजन से परे साझा आश्चर्य का प्रतीक बन जाता है। गर्मजोशी और हास्य के साथ कही गई यह फिल्म जिज्ञासा, सहानुभूति और उस मासूम आशा का जश्न मनाती है। यह दर्शाता है कि सरल सी विस्मय भावना भी सीमाओं को पार कर दिलों को जोड़ सकती है।  अपनी मेल-मिलाप और करुणा की भावना के साथ “द बीटल प्रोजेक्ट” शांति और समझ को प्रेरित करने के लिए युवाओं की कल्पनाशीलता और सहानुभूति में यूनिसेफ के विश्वास का प्रतीक है।

5 . द ओडिसी ऑफ जॉय (ओडिसेजा ई गज़िमिट) (फ्रांस, कोसोवो/अल्बानियाई, अंग्रेजी, फ्रेंच, रोमानी भाषाएं)

कोसोवो के फिल्म निर्माता ज़गजिम तेरज़ीकी की बेहद प्रभावशाली पहली फीचर फिल्म “ओडिसी ऑफ जॉय” का प्रीमियर काहिरा अंतर्राष्ट्रीय फिल्म महोत्सव, 2025 में हुआ। कहानी नई सहस्राब्दी की शुरुआत में शुरू होती है, जहां 11 वर्षीय लिस, जिसका पिता युद्ध में लापता हो जाता है, खुद को दुःख और बड़े होने के बीच फंसा हुआ पाता है। जब वह स्थानीय बच्चों का मनोरंजन करने के लिए युद्धोत्तर कोसोवो में यात्रा कर रहे एक फ्रांसीसी जोकर मंडली में शामिल होता है, तो लिस उपचार की दिशा में एक शांत यात्रा शुरू करता है, यह खोज करता है कि आशा, एक बार खो जाने के बाद भी, फिर से प्राप्त की जा सकती है। कोमल किन्तु गहन, “ओडिसी ऑफ जॉय” संघर्ष के बीच बचपन को परिभाषित करने वाली मजबूती की भावना को दर्शाती है, जो हर बच्चे की खुशी, सुरक्षा और भविष्य के अधिकार में यूनिसेफ के स्थायी विश्वास को प्रतिध्वनित करती है।

ये पांचों फिल्में मिलकर यूनिसेफ और आईएफएफआई के सहयोग की सार्थकता को दर्शाती हैं, जो दुनिया भर के बच्चों की आशाओं, भय और सफलताओं को आवाज देने के लिए सिनेमा की परिवर्तनकारी शक्ति का उपयोग करती है।

दुनिया भर के बच्चों के जीवन को दर्शाती इन प्रभावशाली फिल्मों को देखने का मौका न चूकें।। यूनिसेफ और आईएफएफआई फिल्मों की स्क्रिनिंग समय-सारणी देखने के लिए यहां क्लिक करें।

आईएफएफआई के बारे में:

1952 में स्थापित भारतीय अंतर्राष्ट्रीय फिल्म महोत्सव (आईएफएफआई) दक्षिण एशिया का सबसे पुराना और प्रतिष्ठित सिनेमा उत्सव है। राष्ट्रीय फिल्म विकास निगम (एनएफडीसी), सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय, भारत सरकार और एंटरटेनमेंट सोसाइटी ऑफ गोवा (ईएसजी), गोवा सरकार द्वारा संयुक्त रूप से आयोजित यह महोत्सव एक वैश्विक सिनेमाई पॉवरहाउस के रूप में विकसित हुआ है—जहां पुनर्स्थापित क्लासिक फिल्मों से लेकर नए प्रयोग, महान दिग्गजों से लेकर नए निर्भीक फर्स्ट टाइमर्स तक, सभी एक साथ आते हैं। आईएफएफआई को वास्तव में जो चीजें शानदार बनाती हैं, वे हैं –  अंतर्राष्ट्रीय प्रतियोगिताएं, सांस्कृतिक प्रदर्शन, मास्टरक्लास, श्रद्धांजलि और ऊर्जावान वेव्स फिल्म बाजार, जहां विचार, सौदे और सहयोग उड़ान भरते हैं। गोवा की शानदार तटीय पृष्ठभूमि में 20 से 28 नवंबर तक आयोजित होने वाला आईएफएफआई का 56वां संस्करण भाषाओं, शैलियों, नवाचारों और नई आवाज़ों के एक जगमगाते स्पेक्ट्रम का वादा करता है—विश्व मंच पर भारत की रचनात्‍मक प्रतिभा का एक भव्य उत्सव।

अगले नौ दिनों तक एक बार फिर से गोवा ‘इफ्फी’ के रंग में रंगने को पुरी तरह से तैयार

ऐतिहासिक ग्रैंड परेड के साथ इफ्फी 2025 का उद्घाटन होगा

गोवा के वातावरण में आज ‘सिनेमा की गूँज’ अपने चरम पर है, क्योंकि 20 से 28 नवंबर 2025 तक चलने वाले 56वे भारतीय अंतरराष्ट्रीय फिल्म महोत्सव (इफ्फी) के उद्घाटन में अब केवल एक दिन शेष बचा है। बीते वर्षों में स्थापित विशिष्टता और समावेशन के अपने ही कीर्तिमानों को तोड़ने के दृष्टिकोण के साथ, इस वर्ष इफ्फी 2025 को एक अविस्मरणीय सिनेमाई उत्सव के रूप में एक यादगार सिनेमैटिक सेलिब्रेशन के तौर पर तैयार किया गया है। यह संस्करण आज के बेहतरीन मनोरंजक अनुभवों का वादा करता है—ऐसे कार्यक्रम जो आज के जमाने की बेमिसाल प्रतिभा, सांस्कृतिक समृद्धि और कहानी कहने की उस असीम भावना से रचे गए हैं जो भारतीय और वैश्विक सिनेमा की पहचान है।

 

कल, इफ्फी का आगाज एक मंत्रमुग्ध कर देने वाली उद्घाटन परेड के साथ होगा, जो गोवा की सड़कों को भारत की सिनेमाई आत्मा की जीवंत झाँकी में बदल देगी। इस भव्य परेड का नेतृत्व आंध्र प्रदेश, हरियाणा और गोवा की शानदार झाँकियाँ करेंगी। जिनके पीछे भारत के प्रतिष्ठित स्टूडियोज की साँसें थाम लेने वाली रचनाएँ होंगी और एनफडीसी की 50 साल पुरानी यादों को ताजा करने वाली प्रस्तुति भी शामिल होंगी। “भारत एक सूर” के तहत, सौ लोक कलाकार राष्ट्र के कोने-कोने के नृत्यों को एक ऊँची और गूँजती लय में पिरोएँगे। इस समारोह में चार चाँद लगाते हुए, बच्चों के चहेते पात्र—छोटा भीम, छुटकी, मोटू पतलू और बिट्टू बहानेबाज़—भी दर्शकों को पुरानी यादों और मनोरंजन से सराबोर करेंगे। कल, इफ्फी रंग और कल्पना की एक चलती-फिरती कविता के रूप में शुरू होगा।

जैसे-जैसे यह परेड गोवा की सड़कों से गुजरेगी, यह सिर्फ एक महोत्सव की शुरुआत नहीं होगी, बल्कि कलात्मक जागरण के एक महत्वपूर्ण क्षण की घोषणा होगी। हर झाँकी अपने क्षेत्र की धड़कन लिए होगी, हर प्रस्तुति अपने लोगों के दिल की धड़कन बनेगी और सिनेमा फ्रेम से प्रेरित हर रचना कहानी कहने की कला के साथ भारत के कालातीत प्रेम को प्रतिध्वनित करेगी। समुद्री हवा की तरह उठते संगीत और स्वप्नलोक की तरह खुलते रंगों के साथ, यह उद्घाटन परेड एक ऐसे इफ्फी संस्करण का वादा करती है, जहाँ भारत की रचनात्मकता पहले से कहीं अधिक तेजी से चमकेगी।

इस वर्ष के बुके यानी आयोजन सूची में 15 प्रतिस्पर्धी और क्यूरेटेड सेगमेंट शामिल हैं। इनमें अंतर्राष्ट्रीय प्रतिस्पर्धा, निर्देशक की सर्वश्रेष्ठ पहली फीचर फिल्म (डायरेक्टर की बेस्ट डेब्यू फीचर फिल्म), आईसीएफटी-यूनेस्को गांधी पदक जैसे प्रमुख खंड शामिल हैं। इसके अलावा, विशेष खंडों में मैकाब्रे ड्रीम्स, डॉक्यू-मोंटाज, एक्सपेरिमेंटल फिल्म्स, यूनिसेफ और रिस्टोर्ड क्लासिक्स भी शामिल किए गए हैं। 56वें इफ्फी आइटिनररी में क्रिएटिव माइंड्स ऑफ टुमॉरो (सीएमओटी), वेव्स फिल्म बाजार (19वां एडिशन), द नॉलेज सीरीज, सिनेमा-एआई हैकाथॉन, इफिएस्टा – कल्चरल शोकेस और मास्टरक्लास, पैनल्स और इंटरैक्टिव प्रोग्राम लिस्ट किए गए हैं।

क्रिएटिव माइंड्स ऑफ़ टुमॉरो (सीएमओटी): 56वें इफ्फी, गोवा के ‘क्रिएटिव माइंड्स ऑफ टुमॉरो’ (सीएमओटी) कार्यक्रम के लिए, कुल 799 प्रविष्टियों में से 124 युवा रचनाकारों का चयन किया गया है। ये युवा प्रतिभाएँ फिल्म निर्माण की 13 विभिन्न विधाओं से चुनी गई हैं, जिसमें वेव्स 2025 में हुए सीआईसी चैलेंज के 24 वाइल्डकार्ड विजेता भी शामिल हैं।

वेव्स फिल्म बाज़ार (19वां संस्करण): भारत का प्रमुख फिल्म बाजार वापस आ गया है:

§ स्क्रीनराइटर्स लैब, मार्केट स्क्रीनिंग, व्यूइंग रूम और को-प्रोडक्शन मार्केट में 300 से अधिक फिल्म प्रोजेक्ट्स

§ को-प्रोडक्शन मार्केट में 22 फीचर फिल्में और 5 डॉक्यूमेंट्री

§ कुल 20,000 अमेरिकी डॉलर का नकद अनुदान

§ वेव्स फिल्म बाज़ार रिकमेंड्स (डब्ल्यूएफबीआर): अलग-अलग फॉर्मेट में 22 चुनी हुई फिल्में

§ 7 से अधिक देशों के डेलीगेशन और 10 से अधिक भारतीय राज्यों से फिल्म इंसेंटिव शोकेस

§ एक डेडिकेटेड टेक पैवेलियन जिसमें लेटेस्ट वीएफएक्स, सीजीआई, एनिमेशन और डिजिटल प्रोडक्शन टेक्नोलॉजी दिखाई जाएंगी।

सिनेम-एआई हैकाथॉन : इफ्फी 2025 की एक नई पहल है, जिसका आयोजन LTIMindtree और वेव्स फिल्म बाज़ार के सहयोग से किया जाएगा। यह कार्यक्रम फिल्म निर्माण में एआई-चालित नवाचार पर केंद्रित है। यह पहल सिनेमाई प्रौद्योगिकी को आगे बढ़ाने, प्रमाणन प्रक्रियाओं को सरल बनाने और पायरेसी-विरोधी ढाँचों को मजबूत करने के लिए इफ्फी की प्रतिबद्धता को बल देती है।

इफिएस्टा – कल्चरल शोकेस: इफिएस्टा, जो कि संगीत, प्रदर्शन और रचनात्मक कलाओं का चार दिवसीय उत्सव है, 21 से 24 नवंबर तक, शाम 6 से 8 बजे के बीच श्यामा प्रसाद मुखर्जी ऑडिटोरियम में आयोजित किया जाएगा। यह कार्यक्रम कलाकारों और दर्शकों को लाइव सांस्कृतिक अनुभवों के माध्यम से एक साथ लाकर, भारत की वाइब्रेंट क्रिएटिव इकॉनमी को उजागर करता है।

इस संस्करण में इफ्फी कई महान फिल्म निर्माताओं और कलाकारों की जन्म शताब्दी पर उन्हें सम्मान अर्पित करेगा, जिनमें गुरु दत्तराज खोसलाऋत्विक घटकपी. भानुमतिभूपेन हज़ारिका और सलिल चौधरी शामिल हैं। इस अवसर पर, सलिल चौधरी की ‘मुसाफ़िर’ और ऋत्विक घटक की ‘सुवर्णरेखा’ फ़िल्में इफ्फी 2025 में प्रदर्शित की जाएँगी। इस वर्ष, सिनेमा में अपने 50 वर्ष पूरे करने पर महान अभिनेता रजनीकांत को समापन समारोह में सम्मानित किया जाएगा।

 

यह सुनिश्चित करने के लिए कि सभी कोशिशें और प्लानिंग ध्यान से हों और हर तरफ से चौबीसों घंटे की कोशिशें एक सुंदर तालमेल में हों, इसे ध्यान में रखते हुए सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय के सचिव श्री संजय जाजू ने मंत्रालय के दूसरे अधिकारियों के साथ आज पणजी, गोवा में इफ्फी के आयोजन स्थल का दौरा किया और और पूरी तैयारियों को रिव्यू किया।

गोवा अगले नौ दिनों के लिए एक बार फिर से भारतीय अंतरराष्ट्रीय फिल्म महोत्सव (इफ्फी)  के रंग में रंगने को तैयार है।

इफ्फी के बारे में

1952 में शुरू हुआ, भारतीय अंतरराष्ट्रीय फिल्म महोत्सव (इफ्फी) दक्षिण एशिया का सबसे पुराना और सबसे बड़ा सिनेमा सेलिब्रेशन है। भारत सरकार के सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय के नेशनल फिल्म डेवलपमेंट कॉर्पोरेशन (एनएफडीसी) और गोवा राज्य सरकार की एंटरटेनमेंट सोसाइटी ऑफ गोवा (ईएसजी) द्वारा संयुक्त रूप से आयोजित यह महोत्सव एक वैश्विक सिनेमाई शक्ति केंद्र के रूप में विकसित हुआ है—जहाँ रिस्टोर की गई क्लासिक फिल्में बोल्ड एक्सपेरिमेंट से मिलती हैं और लेजेंडरी निर्माता पहली बार फिल्म बनाने वालों के साथ मंच साझा करते हैं। इफ्फी को वास्तव में जो ख़ास बनाता है, वह है इसका इलेक्ट्रिक मिक्स—इंटरनेशनल कॉम्पिटिशन, कल्चरल शोकेस, मास्टरक्लास, ट्रिब्यूट और हाई-एनर्जी वेव्स फिल्म बाज़ार, जहाँ आइडिया, डील और कोलेबोरेशन एक नई उड़ान भरते हैं। 20 से 28 नवंबर तक गोवा के शानदार कोस्टल बैकग्राउंड पर आयोजित होने वाले 56वें संस्करण में, भाषाओं, शैलियों, नवाचारों और आवाज़ों का एक चकाचौंध भरा स्पेक्ट्रम प्रस्तुत करने का वादा करता है—यह विश्व मंच पर भारत की रचनात्मक प्रतिभा का एक विस्तृत और गहन उत्सव है।

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भारतीय अंतर्राष्‍ट्रीय फिल्‍म महोत्‍सव 2025 शानदार परेड और सांस्‍कृतिक प्रदर्शन के साथ शुभारंभ के लिए पूरी तरह तैयार

गोवा 20 से 28 नवंबर तक 56वें भारतीय अंतर्राष्‍ट्रीय फिल्‍म महोत्‍सव (इफ्फी) की मेजबानी के लिए तैयार है। नौ दिन तक चलने वाले इस महोत्‍सव में फिल्म स्क्रीनिंग, सांस्‍कृतिक और फिल्‍म उद्योग से जुड़े कार्यक्रम शामिल होंगे। इस महोत्‍सव का शुभारंभ कल एक शानदार परेड के साथ होगा जिसमें आंध्र प्रदेश, हरियाणा और गोवा की झांकियां होंगी। साथ ही फिल्म स्टूडियो का डिस्प्ले और राष्ट्रीय फिल्म विकास निगम (एनएफडीसी) द्वारा 50 वर्षों की उपलब्धियों पर आधारित झांकियां भी होंगी। देश के अलग-अलग हिस्सों से लोक कलाकार भी इस परेड में हिस्सा लेंगे।

नौ दिन तक चलने वाले इस महोत्‍सव में फिल्म स्क्रीनिंग, सांस्‍कृतिक और फिल्‍म उद्योग से जुड़े कार्यक्रम होंगे। इसके लिए पूरे गोवा में तैयारियां जोरों पर हैं। प्रतिनिधि, सहभागी और आगंतुकों को एक मजेदार अनुभव प्रदान करने के लिए कई तरह की तैयारियां की गई हैं।

इफ्फी के बारे में
1952 में शुरू हुआ भारतीय अंतर्राष्‍ट्रीय फिल्‍म महोत्‍सव (इफ्फी) दक्षिण एशिया का सबसे पुराना और भव्‍य फिल्‍म महोत्‍सव है। राष्ट्रीय फिल्म विकास निगम (एनएफडीसी), सूचना और प्रसारण मंत्रालय तथा एंटरटेनमेंट सोसाइटी ऑफ गोवा (ईएसजी) मिलकर इस महोत्‍सव का आयोजन करते हैं। यह महोत्‍सव वैश्विक सिनेमा का प्रमुख केन्‍द्र बन गया है—जहां साहसिक प्रयोगों से क्लासिक फिल्मों का पुनर्निर्माण होता है और महान हस्तियां नये कलाकारों के साथ मंच साझा करती हैं। इफ्फी को जो चीज वास्‍तव में शानदार बनाती है, वह है-अंतर्राष्‍ट्रीय प्रतिस्‍पर्धा, सांस्‍कृतिक प्रदर्शन, मास्टरक्लास, ट्रिब्यूट और हाई-एनर्जी वेब्‍स फिल्म बाज़ार, जहां विचार, सौदे और साझेदारियां उड़ान भरते हैं। 20 से 28 नवंबर तक गोवा के खूबसूरत तट पर होने वाला 56वां फिल्‍म महोत्‍सव कई भाषाओं, फिल्‍म विधाओं, नवाचार और आवाजों की एक शानदार श्रृंखला प्रस्‍तुत करता है। यानी वैश्विक मंच पर यह भारत की सृजनात्‍मक उत्‍कृष्‍टता का एक शानदार महोत्‍सव है।