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व्यापार मेले में भारतीय हस्तकला की विरासत को सैकड़ों सालों से बचाए रखने वाले कलाकार खास आकर्षण

भारत अंतर्राष्ट्रीय व्यापार मेला: ‘एक भारत श्रेष्ठ भारत’ का जीवंत प्रदर्शन

भारत मंडपम में आयोजित भारत अंतर्राष्ट्रीय व्यापार मेला (आईआईटीएफ), भारत की सबसे बड़ी और सांस्कृतिक रूप से सबसे स्थिर प्रदर्शनियों में से एक है। अपनी 44 साल की विरासत और इस वर्ष की थीम ‘एक भारत श्रेष्ठ भारत’ के साथ, मेला भागीदार राज्यों, फोकस राज्यों, मंत्रालयों, वैश्विक प्रतिभागियों, एमएसएमई, कारीगरों और स्टार्ट-अप को एक छत के नीचे एकजुट करता है, जो विविधता में भारत की एकता और इसके आर्थिक आत्मविश्वास को दर्शाता है। मेले की विस्तृत रूपरेखा – बहु-उत्पाद हॉल, राज्य मंडप, अंतर्राष्ट्रीय प्रतिनिधिमंडल और एक जीवंत सांस्कृतिक कैलेंडर की विशेषता – एक गतिशील इकोसिस्‍टम का निर्माण करती है जहां विरासत, नवाचार और उद्यम का संयोजन होता है।

एक आगंतुक के दृष्टिकोण से, भारत अंतर्राष्ट्रीय व्यापार मेला भारत की सांस्कृतिक और कारीगर विरासत में एक मनोरम यात्रा की तरह दृष्टिगोचर होता है। हम विभिन्‍न हॉल के बीच से आगे बढ़ते हुए, देश की भाषाई, कलात्मक और क्षेत्रीय विविधता का आनंद उठाते हैं जो रंग, बनावट और शिल्प में साकार होती है।

प्रत्येक मंडप, अपने राज्य – झारखंड में हथकरघा और जनजातीय कला से लेकर उत्तर प्रदेश द्वारा प्रदर्शित जटिल धातु कार्य और राजस्थान के जीवंत ब्लॉक-प्रिंट- की विशिष्ट पहचान तक रखता है। प्रदर्शनी की रोशनी में शीशे का काम चमकता है, टेराकोटा के सामान गलियारों में सजा है और जनजातीय आभूषण, बांस की कलाकृतियां, जूट का काम तथा हाथ से कढ़ाई वाले कपड़े पीढ़ियों से सहेजे गए हुनर को दिखाते हैं। आईआईटीएफ के मल्टी-प्रोडक्ट प्रोफ़ाइल में विशेष रूप से दिखाए गए ये हस्‍तशिल्‍प अपने मोटिफ़, तकनीक और माध्‍यमों की विविधता से आगंतुकों को मंत्रमुग्ध कर देते हैं।

पूरे मेले में, एक भारत श्रेष्ठ भारत की थीम शक्तिशाली रूप से गूंजती है। राज्य दिवस सांस्कृतिक प्रदर्शन, लोक संगीत, शास्त्रीय कला और कार्यशालाएं एक व्यापक वातावरण का सृजन करती हैं जहां आगंतुक शिल्प, संस्कृति और रचनात्मकता के माध्यम से व्यक्त विविधता में भारत की एकता को देख सकते हैं।

एक प्रदर्शक के दृष्टिकोण से, भारत अंतर्राष्ट्रीय व्यापार मेला केवल एक वार्षिक प्रदर्शन नहीं है- यह एक ऐसा स्थान है जहां वर्षों का अभ्यास, पारिवारिक परंपराएं और सामुदायिक पहचान विश्‍व के समक्ष दृष्टिगोचर होता है। हर स्टाल के पीछे एक गाथा है: सुबह-सुबह करघा का काम, सावधानी से पैक किए गए डिब्‍बे जो मीलों की यात्रा करते हैं और यह उम्‍मीद कि एक नया खरीदार दूसरी पीढ़ी के लिए एक कला रूप को बनाए रखने में मदद कर सकता है।

हॉल में बहुत सारे शिल्प समुदायों का ऐसा ही अनुभव रहा। झारखंड के पैटकर कलाकारों ने बताया कि कैसे मेला भारत की सबसे पुरानी स्क्रॉल-पेंटिंग परंपराओं में से एक को पुनर्जीवित करने में मदद करता है, जिससे वे अपने विस्तृत लाइनवर्क के माध्यम से गाथाएं व्‍यक्‍त करने में सक्षम बनते हैं। बिहार के मधुबनी चित्रकारों ने साझा किया कि आईआईटीएफ उन आगंतुकों के साथ सीधे जुड़ाव में सुविधा प्रदान करता है जो हाथ से पेंट किए गए काम में निहित सटीकता और प्रतीकवाद की सराहना करते हैं।

कच्छ के पारंपरिक काउबेल निर्माताओं ने बताया कि समय के साथ उनकी कला कैसे विकसित हुई है। मूल रूप से उन्‍हें मवेशियों के लिए केवल कार्यात्मक घंटियों के रूप में बनाया गया था, वह शिल्प आज संगीत वाद्ययंत्रों, विंड चाइम्स और सजावटी हैंगिंग तक फैला हुआ है जो एक ही हाथ से ट्यून की गई ध्वनि को बरकरार रखते हैं। उन्होंने कहा कि आईआईटीएफ उन्हें अंतरराष्ट्रीय प्रदर्शकों और आगंतुकों के साथ बातचीत करने की दुर्लभ पहुंच प्रदान करता है।

इसी तरह, राजस्थान के जूटी कारीगरों ने रेखांकित किया कि मेला उनके श्रम-गहन चमड़े के शिल्प को बनाए रखता है, खासकर ऐसे समय में जब मशीन से बने जूते बाजारों पर हावी हैं। देशभर के कई हथकरघा कलस्‍टरों ने कहा कि आईआईटीएफ उन कुछ प्लेटफार्मों में से एक है जहां जनजातीय बुनाई से लेकर विरासत रेशम तक विविध क्षेत्रीय बुनाई परंपराओं को व्यापक और सराहनीय दर्शकों के सामने प्रदर्शित किया जाता है।

कई प्रदर्शकों के लिए मेले में सहभागिता प्रत्‍यक्ष रूप से आजीविका सुरक्षा से जुड़ी हुई है। यह कार्यक्रम उन्‍हें उन खरीदारों से जोड़ता है, जिन तक उनका पहुंचना मुश्किल होता। निर्यातक, संस्‍थागत खरीदार और परिवार प्रमाणिक हस्‍त निर्मित वस्‍तुओं के आकांक्षी होते हैं। व्‍यवसाय दिवसों और सामान्‍य सार्वजनिक दिवसों का मिश्रण कारीगरों को ऑर्डर पर बातचीत करने, अपने नेटवर्क का विस्तार करने  और उन दर्शकों के साथ परस्‍पर मिलने सहायता करता है जो शिल्प कौशल को महत्व देते हैं।

कुल मिलाकर, आईआईटीएफ कारीगरों को पहचान दिलाता है। यह उन्हें अपनी कारीगरी के पीछे की प्रक्रियाओं, सामग्रियों और इतिहास के बारे में चर्चा करने में सक्षम बनाता है, जो देश के सांस्कृतिक और रचनात्मक परिदृश्य में उनकी जगह की पुष्टि करता है। जिन समुदायों ने पीढ़ियों से इन शिल्पों को संरक्षित किया है, उनके लिए यह मेला एक यादगार आयोजन है, जहां उनका कौशल आज भी प्रासंगिक है और उनका सम्‍मान किया जाता है।

देबकी परिदा – ढोकरा कला, ओडिशा
देबकी के लिए, ढोकरा एक जीवंत परंपरा है जो उनके जनजातीय   समुदाय की सांस्कृतिक पहचान को परिभाषित करती है। वह अपने गांव की महिलाओं के साथ मिलकर रोजमर्रा के जनजातीय जीवन से प्रेरित पीतल की मूर्तियों, गहनों और रूपांकनों को बनाने के लिए काम करती हैं।

देबकी कहती हैं कि हर डिजाइन दर्शाता है कि हम कहां से आए हैं। जब लोग हमारे काम को देखते हैं, तो वे हमारी संस्कृति को समझते  हैं। आईआईटीएफ में भाग लेने से उन्हें आगंतुकों के साथ सीधे बातचीत करने और प्रत्येक कलाकृति के पीछे की कहानी बताने का एक मंच मिलता है। वह कहती हैं कि यहां, मैं अपने उत्पादों के पास बैठी हूं और समझाती हूं कि हम उन्हें कैसे बनाते हैं। आईआईटीएफ हम जैसे छोटे कारीगरों को यह विश्वास दिलाता है कि हमारी विरासत को महत्व दिया जाता है।

मेले की अभिव्‍यक्तियां
डॉ. जी. दशरथ चारी- पारंपरिक लकड़ी की नक्काशी
सदियों से लकड़ी की नक्काशी का अभ्यास करने वाले परिवार से सम्‍बन्‍ध रखने वाले डॉ. जी. दशरथ मंदिर की परंपरा में गहराई से निहित शिल्प का प्रतिनिधित्व करते हैं। आज, वह और उनके क्षेत्र के कारीगर लाल चंदन, सफेद चंदन, शीशम और सागौन का उपयोग करके पारंपरिक पैनल और आधुनिक उपयोगी वस्तुओं दोनों का निर्माण करते हैं। उन्‍होंने कहा कि उनकी तकनीक पीढ़ियों से चली आ रही है। यहां तक कि जब हम समकालीन वस्तुएं बनाते हैं, तब भी कौशल वही रहता है। 25 से अधिक वर्षों से, वह आईआईटीएफ में अपने काम का प्रदर्शन कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि ऑनलाइन बाजारों के युग में, आईआईटीएफ एक वास्तविक मंच है। लोग कारीगरी को देख और महसूस कर सकते हैं, और प्रत्येक कलाकृति के पीछे के प्रयास को समझ सकते हैं।

माधुरी सिंह – पारंपरिक मिट्टी और जूट गुड़िया, बिहार
एक पूर्व स्कूली शिक्षक, माधुरी ने महामारी के दौरान पारंपरिक मिट्टी और जूट गुड़िया बनाना शुरू किया। उनकी गुड़िया भारतीय रीति-रिवाजों, त्योहारों और पोशाक को चित्रित करती हैं, जो रंगीन जूट के कपड़ों के साथ हाथ से गढ़ी गई मिट्टी के शरीर को जोड़ती हैं। वह बताती हैं कि वह ऐसी गुड़िया बनाना चाहती थी जो हमारे अपने लोगों और हमारी अपनी परंपराओं की तरह दिखें उनके काम ने उनके समुदाय की कई युवा लड़कियों और महिलाओं को शिल्प सीखने के लिए प्रेरित किया है। उन्‍होंने कहा, “अगर वे यह कौशल सीखती हैं, तो वे अपनी सहायता कर सकती हैं, इसलिए मैं उन्हें सिखाती हूं,”।

आईआईटीएफ में, उन्हें लगता है कि उनके काम को एक दर्शक वर्ग मिलता है जो इसकी सांस्कृतिक प्रासंगिकता को समझता है।

धीरज – बेंत और बांस शिल्प, असम
अपने परिवार की विरासत को जारी रखते हुए, धीरज कारीगरों की एक टीम के साथ बेंत और बांस के उत्पादों का उत्पादन करने के लिए काम करते हैं जो असम की लंबे समय से चली आ रही शिल्प परंपराओं को दर्शाता है। वह कहते हैं, ‘हमारे गांव में कई परिवार इस काम पर निर्भर हैं। हर वस्तु किसी न किसी की आजीविका में सहायता करती है।”  ऑनलाइन बिक्री के बावजूद, वह आईआईटीएफ को एक अद्वितीय अवसर के रूप में देखते हैं। वह बताते हैं कि लोग यहां आते हैं, उत्पाद का स्‍पर्श करते हैं और इसमें शामिल कौशल देखते हैं। यह सराहना हम कारीगरों के लिए महत्वपूर्ण है।भारत अंतर्राष्ट्रीय व्यापार मेले में, एक भारत श्रेष्ठ भारत का विचार बड़ी घोषणाओं में नहीं, बल्कि साझा शिल्प कौशल के शांत सामंजस्य में जीवंत होता है। यहां, मधुबनी के रंग ढोकरा की चमक से मिलते हैं, कच्छ की काउबेल की लय असम के बेंत की कोमलता के साथ मिश्रित होती है और तिरुपति की लकड़ी में उकेरी गई कहानियां बिहार की मिट्टी की परंपराओं से रूबरू होती हैं।

इन स्टालों और कोरिडोर में भारत की विविधता समग्र रूप से दृष्टिगोचर होती है। प्रत्येक कारीगर अपनी विरासत का एक अंश, अपनी याददाश्त, अपनी वंशावली लेकर लाता है और उसे एक ऐसे मंच पर रखता है जहां वह एक बड़े राष्ट्रीय मानचित्र का हिस्सा बन जाता है। आगंतुक आते हैं, उनकी आवाज सुनते हैं, सीखते हैं और इन कहानियों के साथ जुड़कर स्वयं उस मानचित्र से जुड़ जाते हैं।

जैसे-जैसे मेला अपनी समाप्ति की ओर बढ़ता है यह हमें सदैव याद दिलाता है कि भारत की शक्ति इस सहज संयोजन में निहित है – जहां कई संस्कृतियां, कई भाषाएं, कई हाथ, एक साझा पहचान बनाते हैं। आईआईटीएफ इस एकता को शांत शालीनता के साथ व्‍यक्‍त करता है, यह साबित करता है कि जब देश की परंपराएं साथ-साथ खड़ी होती हैं, तो भारत न केवल विविध बल्कि सुन्‍दरता और शक्ति से युक्‍त एक समग्र देश का स्‍वरूप ले लेता है।

हिंदू कॉलेज में नशा मुक्त भारत की जागरूकता रैली

दिल्ली। नशा मुक्त भारत अभियान के अंतर्गत रैली का आयोजन किया गया। रैली में एन एस एस स्वयं सेवकों, एन सी सी के कैडेट्स सहित बड़ी संख्या में महाविद्यालय के विद्यार्थियों ने भाग लिया। रैली में विद्यार्थी नशा छोड़ो भारत जोड़ो जैसे नारे लगाते हुए चले। राष्ट्रीय सेवा योजना के छात्र अध्यक्ष निशांत सिंह ने बुलंद स्वर में विद्यार्थियों से नारे लगवाए।
रैली को हरी झंडी दिखाकर रवाना करने से पहले प्राचार्य प्रो अंजू श्रीवास्तव ने संबोधित किया। प्रो श्रीवास्तव ने कहा कि विश्वविद्यालय तथा महाविद्यालय में नशा मुक्त वातावरण बनाने के लिए अनेक गतिविधियों का नियमित आयोजन किया जा रहा है जिनका उद्देश्य देश के युवाओं और सभी नागरिकों को नशे जैसी सामाजिक बुराई से बचाना है। प्रो श्रीवास्तव ने कहा कि हिंदू कालेज के युवाओं का दायित्व है कि वे न केवल स्वयं को अपितु समाज के सभी वर्गों को नशे से दूर रखने के लिए जागरूकता फैलाएं। उन्होंने अपने सभी विद्यार्थियों का आह्वान किया कि वे नशे से हमेशा दूर रहने का संकल्प लें।
उप प्राचार्य प्रो रीना जैन, एन सी सी अधिकारी डॉ मनोज चहल, प्रो सांताक्रुज सिंह, प्रशासनिक अधिकारी राजेश शर्मा सहित अन्य शिक्षकों ने भी विद्यार्थियों का उत्साहवर्धन किया।
रैली का संयोजन कर रहे राष्ट्रीय सेवा योजना के कार्यक्रम अधिकारी डॉ पल्लव ने रैली को संबोधित करते हुए कहा कि स्वयं को स्वस्थ रखकर ही हम अपने देश की सच्ची सेवा कर सकते हैं। महाविद्यालय के संपूर्ण परिसर की परिक्रमा कर रैली का समापन हुआ। हिंदू कालेज छात्र संसद के प्रधानमंत्री समीर उपाध्याय ने आभार व्यक्त किया।

अर्चिता द्विवेदी
जन संपर्क प्रमुख
राष्ट्रीय सेवा योजना
हिन्दू महाविद्यालय, दिल्ली
मो -9452536877

अब हाथी वाले देश एक साथ हाथियों की कुंडली बनाएँगे

भारतीय राष्ट्रीय कला एवं सांस्कृतिक विरासत न्यास को ‘गज-लोक: एशिया में हाथियों की जमीन और उनके कल्चरल सिंबॉलिज़्म’ लॉन्च करते हुए खुशी हो रही है। यह एक ऐसी पहल है जिसका मकसद एशियाई हाथियों के अंतरराष्ट्रीय संबंध का दस्‍तावेजीकरण करना व अन्वेषण करना है और एशिया में हाथी वाले देशों में आपस में जुड़े सांस्‍कृतिक, ऐतिहासिक, पारिस्थितिकीय और जलवायु लचीलापन को रेखांकित करना है।

गज-लोक प्रदर्शनी शिक्षाविदों, सांस्कृतिक विशेषज्ञों और संरक्षणवादियों को एक मंच पर लाकर और गोलमेज सम्मेलन एक बहु-देशीय संवाद की शुरुआत का प्रतीक है जो हाथी को सांस्कृतिक और पारिस्थितिक लचीलेपन के जीवित प्रतीक के रूप में स्थापित करता है।

यह प्रदर्शनी छह विषयगत पैनल प्रस्तुत करती है जो मानव-हाथी के स्थायी संबंधों को प्रदर्शित करती है। इसमें प्रागैतिहासिक कला और प्राचीन व्यापार मार्गों से लेकर हाथियों की कल्पना और पवित्र परंपराओं तक दिखाया गया है कि हाथियों ने पूरे एशिया में विश्वास, शक्ति और सांस्कृतिक आदान-प्रदान को कैसे आकार दिया है। यह केरल स्थित रोबोटिक मंदिर के हाथियों की ऐतिहासिक निरंतरता और आधुनिक नवाचारों दोनों पर प्रकाश डालती है। यह प्रदर्शनी दर्शकों को करुणा, विरासत और सह-अस्तित्व की संभावनाओं पर विचार करने के लिए प्रेरित करती है।

गज-लोक परियोजना और उससे जुड़ी प्रदर्शनी का उद्घाटन संस्कृति मंत्रालय के सचिव श्री विवेक अग्रवाल करेंगे। इस मौके पर भारतीय राष्ट्रीय कला एवं सांस्कृतिक विरासत न्यास के चेयरमैन श्री अशोक जयराज सिंह, भारतीय राष्ट्रीय कला एवं सांस्कृतिक विरासत न्यास के सदस्य सचिव श्री रवींद्र सिंह (रिटायर्ड) और भारतीय राष्ट्रीय कला एवं सांस्कृतिक विरासत न्यास के इनटैन्जिबल कल्चरल हेरिटेज डिवीजन की प्रधान निदेशक सुश्री नेरुपमा वाई. मोडवेल, भारतीय राष्ट्रीय कला एवं सांस्कृतिक विरासत न्यास के नेचुरल हेरिटेज डिवीजन के प्रधान निदेशक श्री मनु भटनागर और भारतीय राष्ट्रीय कला एवं सांस्कृतिक विरासत न्यास के अन्‍य अधिकारी और आमंत्रित अतिथि उपस्थित रहेंगे।

गज-लोक गोलमेज सम्मेलन में प्रतिष्ठित विद्वान और संरक्षणवादी शामिल हो रहे हैं। इनमें प्रमुख हैं-प्रोफेसर रमन सुकुमार, प्रोफेसर, पारिस्थितिकी विज्ञान केंद्र, भारतीय विज्ञान संस्थान, बेंगलुरु; श्री विवेक मेनन, अध्यक्ष, आईयूसीएन प्रजाति संरक्षण आयोग और संस्थापक और ईडी, वन्यजीव ट्रस्ट ऑफ इंडिया; डॉ विनोद माथुर, पूर्व अध्यक्ष, भारतीय राष्ट्रीय जैव विविधता प्राधिकरण और पूर्व निदेशक, भारतीय वन्यजीव संस्थान; डॉ खालिद पाशा, आईयूसीएन एशिया क्षेत्रीय समन्वयक, बैंकॉक; श्री रवि सिंह, महासचिव और सीईओ, डब्ल्यूडब्ल्यूएफ-इंडिया; डॉ. शशि बाला, डीन, सेंटर ऑफ इंडोलॉजी, भारतीय विद्या भवन; सुश्री सुजाता शंकर, वास्तुकार और संयोजक, भारतीय राष्ट्रीय कला एवं सांस्कृतिक विरासत न्यास चेन्नई चैप्टर; डॉ. नंदिता कृष्णा, अध्यक्ष, सी.पी. रामास्वामी अय्यर फाउंडेशन, चेन्नई; प्रो. अर्चना शास्त्री, पूर्व निदेशक, मेकांग गंगा कोऑपरेशन एशियन ट्रेडिशनल टेक्सटाइल म्यूज़ियम, सिएम रीप, कंबोडिया; डॉ. एन.वी.के. अशरफ, वाइल्डलाइफ़ ट्रस्ट ऑफ इंडिया; डॉ. अरुण वेंकटरमन, टेक्निकल कंसल्टिंग डायरेक्टर, ईआरएम; प्रो. महेश रंगराजन, इतिहासकार, अशोक विश्‍वविद्यालय; सुश्री इना पुरी, लेखिका, बायोग्राफर और आर्ट क्यूरेटर; प्रो. अली अनूशहर, इतिहासकार, यूनिवर्सिटी ऑफ़ कैलिफ़ोर्निया; और डॉ. सुमन जैन, इतिहासकार, बनारस हिंदू विश्‍वविद्यालय।

इन सत्रों में एशियाई हाथी के ऐतिहासिक, सांस्कृतिक, पारिस्थितिकीय और संरक्षण पर चर्चा की जाएगी। इन चर्चाओं से मिली जानकारी गज-लोक डॉसियर में मदद करेगी जो हाथी से जुड़ी विरासत को दुनिया भर में पहचान दिलाने में मदद करने वाला एक बहुविषयक अनुसंधान और दस्तावेजीकरण पहल है।

गज-लोक सिर्फ एक सांस्कृतिक कार्यक्रम नहीं है। यह इंसानों और हाथियों के बीच हमेशा रहने वाले रिश्ते की स्‍वीकृति है। कला, पर्यावरण, स्कॉलरशिप और अंतरराष्ट्रीय साझेदारी को जोड़कर, यह पहल पूरे एशिया में संरक्षण, सांस्कृतिक विरासत और पारिस्थितिकी के देखभाल के लिए एक साझा प्रतिबद्धता को प्रेरित करती है।

अमेरिका में नौकरी छोड़कर भारत में खड़ा किया ज्योतिष स्टार्टअप

पुनीत पांडे 21वीं सदी के जाने-माने और आधुनिक दृष्टिकोण रखने वाले ज्योतिषाचार्य हैं। आज के आधुनिक दौर में वे ज्योतिष विद्या के क्षेत्र में तकनीक का बखूबी इस्तेमाल करते हैं। यही वजह है कि ज्योतिषाचार्य पुनीत पांडेय  ज्योतिषीय गणनाओं के लिए ‘नासा’ (नेशनल एयरनॉटिक्स एंड स्पेस एडमिनिस्ट्रेशन, अमेरिका) द्वारा जारी खगोल विज्ञान के तकनीकी सूत्रों का इस्तेमाल करने से नहीं हिचकिचाते हैं, वहीं उन्हें पारंपारिक वैदिक ज्योतिष के प्राचीन सिद्धांतों पर भी पूर्ण विश्वास है।

एक अनुभवी ज्योतिषी होने के नाते वे ज्योतिष विद्या के बारे में पढ़ाते भी हैं और इस विषय पर कई लेख लिख चुके हैं। इनके अलावा पुनीत पांडेय ज्योतिष विद्या के क्षेत्र में युवा ज्योतिषियों की टीम के साथ लगातार शोध कार्य करते रहते हैं। पुनीत पांडे को हाईटेक और डिजिटल युग का एस्ट्रोलॉजर कहा जाता है। क्योंकि भारतीय ज्योतिष शास्त्र को उन्होंने तकनीक के साथ जोड़कर उसके व्यापक विस्तार में अहम भूमिका निभाई है। अन्य ज्योतिषाचार्यों की सोच के विपरीत उनकी धारणा है कि तकनीक के इस्तेमाल से ज्योतिष विद्या के क्षेत्र में बेहतर और सटीक कार्य किया जा सकता है।

उनकी अब तक की करियर यात्रा एक सफल सॉफ्टवेयर इंजीनियर से आधुनिक युग के ज्योतिषी के रूप में रही है। प्रोफेशन के लिहाज़ से वह एक सॉफ्टवेयर इंजीनियर हैं और इस क्षेत्र में उन्होंने 25 वर्षों से अधिक समय तक कार्य किया है। OJAS Softech Pvt Ltd की नींव रखने से पहले वे यूएस में आईटी क्षेत्र की मल्टी नेशनल कंपनी (एमएनसी) में सीनियर मैनेजमेंट स्तर पर कार्य कर चुके हैं। अपने कार्यकाल के दाैरान उन्होंने यूएस आर्मी, बोइंग, लॉकहीड मार्टिन, ई ए डी एस कंपनियों से संबंधित महत्वपूर्ण प्रोजेक्ट्स पर कार्य किया है। साल 2008-09 में उन्होंने भारत लौटने का फ़ैसला किया और OJAS Softech Pvt Ltd की स्थापना की।

वर्तमान में वह सन जावा एक्सपर्ट ग्रुप (विस्तृत प्रोफाइल: http://portlets.blogspot.com) से जुड़े हुए हैं। इसी जावा ग्रुप ने जावा टेक्नोलॉजी को बनाया है। उन्हें भारत के कुछ चुनिन्दा मशीन लर्निंग, डीप लर्निंग, आर्टिफीसियल इंटेलिजेंस, बिग डाटा, क्लाउड और मोबाइल के विशेषज्ञ के रूप में जाना जाता है।

ओजस सॉफ्टेक प्राइवेट लिमिटेड के सीईओ पुनीत पाण्डे कहते हैं- “क़रीब दो दशक पहले जब मैंने एक पुस्तक की दुकान से ज्योतिष की कुछ किताबें ख़रीदी थीं तभी से मेरा रुझान ज्योतिष की ओर बढ़ने लगा। उसके बाद मुझे यह अहसास हुआ कि ज्योतिष, आयुर्वेद और गूढ़ विज्ञान के प्रति मेरी रुचि स्वभाविक है। क्योंकि मैं ब्राह्मण हूँ और मेरे पूर्वज भी ज्योतिषी रहें हैं। मैंने ज्योतिष विद्या की विभिन्न पद्धतियों जैसे पाराशरी, जैमिनी, ताजिक, पाश्चात्य, कृष्णामूर्ति, नाड़ी और लाल किताब का गहराई से अध्ययन किया है। वास्तव में ज्योतिष की ये पद्धितियाँ बहुत अद्भुत हैं।” आज इंटरनेट के इस युग में वह एक जाने-माने ज्योतिषी हैं। ट्विटर पर उनके 10 हज़ार से भी अधिक फॉलोअर्स हैं और फीडबर्नर में भी उनके प्रशंसकों की संख्या 10 हज़ार से अधिक है। उन्हें ज्योतिष की विभिन्न पद्धतियों जैसे पाराशरी, लाल किताब, जैमिनी, ताजिक, केपी सिस्टम, नाड़ी और वेस्टर्न एस्ट्रोलॉजी आदि में महारत हासिल है। उनके ज्योतिषीय परामर्श विभिन्न पद्धतियों और उनकी तर्कशक्ति पर आधारित हैं।

उन्होंने न्यू जर्सी (अमेरिका) की एक मासिक पत्रिका “वैदिक एस्ट्रोलॉजी एंड स्प्रिचुएलिटी” में एसोसिएट एडिटर के रूप में भी कार्य किया है। अपने ज्योतिष ज्ञान के कारण उन्हें “ज्योतिष विशारद” की भी उपाधि प्राप्त है। परंतु व्यक्तिगत रूप से उन्होंने उपाधि की बजाय ज्ञान को अधिक महत्व दिया है। समय-समय पर उन्होंने ज्योतिष के विषय में विभिन्न पोर्टल्स, मैगज़ीन्स और अखबारों जैसे – कादम्बरी, दैनिक जागरण, प्रभात ख़बर आदि के लिए लेख भी लिखे हैं। ज्योतिष से जुड़े विषयों पर वे टीवी चैनलों पर अपने विचार भी रखते हैं। एस्ट्रोनॉमी और ज्योतिषीय गणना के क्षेत्र में उन्होंने कई एस्ट्रोलॉजी सॉफ्टवेयर तथा वेबसाइट्स में अपना योगदान दिया है।

उन्होंने न केवल AstroSage.com की शुरुआत की, बल्कि इस वेबसाइट को इस मुक़ाम तक पहुँचाया है कि आज यह दुनिया की सबसे पॉपुलर ज्योतिष वेबसाइट्स में से एक है। इंटरनेट की दुनिया में ज्योतिष, केपी सिस्टम और लाल किताब के प्रसार-प्रचार का श्रेय उन्हें दिया जाता है। ज्योतिषाचार्य पुनीत पाण्डेय देश-विदेश से जुड़े कई मामलों पर भविष्यवाणी कर चुके हैं। इनमें सोने के उच्च भाव, स्वाइन फ्लू, वाइएसआर रेड्डी का आकस्मिक निधन एवं पाकिस्तान और भारत के बीच शीत युद्ध जैसे हालातों आदि मामलों पर की गई भविष्यवाणियाँ सच साबित हुई हैं।

साभार- https://hindi.astrosage.com/ से

यमुना नौका पर्यटन और क्रूज सेवाओं की तैयारी में सरकार

केन्द्रीय पत्तन, पोत परिवहन और जलमार्ग मंत्री (एमओपीएसडब्ल्यू) सर्बानंद सोनोवाल, दिल्ली के उपराज्यपाल विनय कुमार सक्सेना और दिल्ली के पर्यटन मंत्री कपिल मिश्र ने यमुना नौका पर्यटन तथा फेरी अवसंरचना विकास परियोजना, जिसका उद्देश्य राष्ट्रीय राजधानी के निवासियों एवं आगंतुकों के लिए यमुना नदी में मनोरंजक बोट क्रूज और फेरी सेवाएं शुरू करना है, की प्रगति की समीक्षा की।

सोनिया विहार और जगतपुर के बीच वजीराबाद बैराज के ऊपर स्थित इस परियोजना से एक नया हरित पर्यटन का अनुभव प्रदान करने और पर्यावरण के अनुकूल नदी यात्रा के जरिए  कनेक्टिविटी बढ़ाने की उम्मीद है। इस पहल का विकास 20 करोड़ रुपये की अनुमानित लागत से किया जा रहा है।

यमुना नदी, जिसे राष्ट्रीय जलमार्ग 110 (एनडब्ल्यू-110) के रूप में अधिसूचित किया गया है, दिल्ली के जगतपुर से उत्तर प्रदेश के प्रयागराज तक 1,080 किलोमीटर तक फैली है। अंतर्देशीय जल परिवहन और कम दूरी के शहरी पर्यटन को बढ़ावा देने के प्रयासों के तहत, पत्तन, पोत परिवहन और जलमार्ग मंत्रालय (एमओपीएसडब्ल्यू) सोनिया विहार और जगतपुर के बीच 6-7 किलोमीटर के राउंड-ट्रिप कॉरिडोर में सुविधाएं विकसित कर रहा है।

जमीनी स्तर पर प्रगति की समीक्षा के बाद, श्री सोनोवाल ने कहा कि यह पहल टिकाऊ एवं  आधुनिक जलमार्गों के प्रति सरकार की प्रतिबद्धता को दर्शाती है।

श्री सर्बानंद सोनोवाल ने कहा, “प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के दूरदर्शी नेतृत्व मेंदशकों की उपेक्षा के बाद भारत के जलमार्गों का परिवर्तनकारी पुनरुत्थान हुआ है। यमुना नदी में पर्यावरण के अनुकूल क्रूज पर्यटन एक महत्वपूर्ण उपलब्धि हैजो स्वच्छहरित एवं अपेक्षाकृत अधिक कुशल जल परिवहन का मार्ग प्रशस्त करेगा और इससे दिल्ली के मध्य में कनेक्टिविटी और पर्यटन को बढ़ावा मिलेगा।”

इस परियोजना के कार्यान्वयन में सहयोग करने हेतु, भारतीय अंतर्देशीय जलमार्ग प्राधिकरण (आईडब्ल्यूएआई) ने जिनमें सिंचाई एवं बाढ़ नियंत्रण, दिल्ली विकास प्राधिकरण (डीडीए), दिल्ली जल बोर्ड (डीजेबी) और दिल्ली पर्यटन एवं परिवहन विकास निगम (डीटीटीडीसी) सहित दिल्ली सरकार के प्रमुख विभागों के साथ एक समझौता ज्ञापन पर हस्ताक्षर किए हैं। यह समझौता एनडब्ल्यू-110 के चार किलोमीटर के खंड पर क्रूज पर्यटन को विकसित करने पर केन्द्रित है।

यह गलियारा पर्यावरण के अनुकूल क्रूज संचालन के एक केन्द्र के रूप में कार्य करेगा, जो इलेक्ट्रिक-सोलर हाइब्रिड नौकाओं द्वारा संचालित होगा जिसमें 30 से 40 यात्री बैठ सकते हैं। जहाजों में लाइफ जैकेट और सार्वजनिक घोषणा प्रणाली सहित सुरक्षा उपकरण उपलब्ध होंगे। आईडब्ल्यूएआई ने सोनिया विहार में पहले ही 50 यात्रियों की क्षमता वाले दो फ्लोटिंग जेटी स्थापित किए हैं। पार्किंग, बुनियादी सुविधाएं और मनोरंजन के स्थल जैसी अतिरिक्त तटवर्ती सुविधाओं से संबंधित योजनाएं भी बनायी जा रही हैं।

इस परियोजना से मनोरंजक गतिविधियों को पुनर्जीवित किए जाने, हरित आवागमन को बढ़ाने और निवासियों एवं पर्यटकों को नदी-आधारित नए अनुभव प्रदान करके दिल्ली के पर्यटन परिदृश्य को नया आकार देने की उम्मीद है।

आवागमन को आसान बनाने और आर्थिक विकास की दिशा में यमुना को एक महत्वपूर्ण माध्यम बनाने की संभावनाओं के बारे में बोलते हुए, सर्बानंद सोनोवाल ने आगे कहा, “यमुना में अंतर्देशीय जल परिवहन का विकास दिल्ली के लिए एक रोमांचक नया अध्याय शुरू करेगा। यात्रा के स्वच्छ साधनों को सक्षम बनाने के अलावायह परियोजना राजधानी के पर्यटन परिदृश्य में रिवर-क्रूज का एक अनूठा आयाम जोड़कर निवासियों और पर्यटकोंदोनों के अनुभव को बेहतर बनाएगी। पर्यावरण के अनुकूल नौका सेवाओं और आधुनिक यात्री सुविधाओं के साथयमुना न केवल एक जीवंत मनोरंजक गलियारेबल्कि एक ऐसे गतिशील जल परिवहन संपर्क के रूप में भी उभरेगी जो शहर के मध्य में कनेक्टिविटी और आर्थिक अवसरों को मजबूत करेगी।”      

केन्द्रीय मंत्री और दिल्ली के उपराज्यपाल के साथ दिल्ली सरकार के लोक निर्माण विभाग, विधायी कार्य, सिंचाई एवं बाढ़ नियंत्रण, जल एवं गुरुद्वारा चुनाव मंत्री प्रवेश साहिब सिंह और दिल्ली सरकार के विधि एवं न्याय, श्रम, रोजगार, विकास, कला, संस्कृति एवं भाषा, पर्यटन मंत्री कपिल मिश्र भी शामिल हुए। समीक्षा दौरे के दौरान आईडब्ल्यूएआई के अध्यक्ष (स्वतंत्र प्रभार) सुनील कुमार सिंह सहित आईडब्ल्यूएआई के वरिष्ठ अधिकारी तथा दिल्ली सरकार के अन्य अधिकारी भी उपस्थित थे।

टर्मिनलों का विकास, फेयरवे में सुधार, रात्रि नौवहन सहायता की स्थापना और लॉक सिस्टम को उन्नत करके, आईडब्ल्यूएआई देश भर में राष्ट्रीय जलमार्गों को मजबूत कर रहा है। हरित नौका स्थिरता पहल के तहत, वाराणसी और अयोध्या में इलेक्ट्रिक कैटामरैन पहले ही शुरू  किए जा चुके हैं तथा पटना और गुवाहाटी के लिए अतिरिक्त तैनाती की योजना है। आईडब्ल्यूएआई ने हाल ही में भारत के पहले स्वदेश निर्मित हाइड्रोजन ईंधन-सेल चालित पोत का परीक्षण पूरा किया है, जिससे देश के हरित आवागमन के लक्ष्यों को आगे बढ़ाया जा सकेगा।

देश में अंतर्देशीय जलमार्गों के पुनरोद्धार के बारे में बोलते हुए, श्री सर्बानंद सोनोवाल ने कहा, “माननीय प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी जी के दूरदर्शी नेतृत्व में, अंतर्देशीय जलमार्ग क्षेत्र – जो लगभग छह दशकों तक उपेक्षित और अनदेखा रहा – में 2014 से एक व्यापक बदलाव आया है। जिसे लंबे समय तक एक कम-उपयोग वाली परिसंपत्ति माना जाता था, वह आज भारत में गति, स्थिरता और दक्षता के साथ लोगों एवं वस्तुओं की आवाजाही में क्रांति ला रही है। माल ढुलाई, बुनियादी ढांचे के विस्तार और हरित आवागमन के उपायों में उल्लेखनीय वृद्धि, राष्ट्रीय प्रगति में हमारी नदियों की विशाल क्षमता के दोहन को संभव बनाने के प्रधानमंत्री मोदी जी के संकल्प का प्रमाण है।”

पिछले एक दशक में अंतर्देशीय जल परिवहन क्षेत्र ने व्यापार और माल की आवाजाही में अभूतपूर्व वृद्धि दर्ज की है। जहां कार्यरत राष्ट्रीय जलमार्गों की संख्या में 767 प्रतिशत की वृद्धि हुई है, वहीं राष्ट्रीय जलमार्गों के रास्ते माल की ढुलाई की मात्रा में 635 प्रतिशत की वृद्धि हुई है। इस क्षेत्र में मल्टीमॉडल टर्मिनलों में 62 प्रतिशत की वृद्धि और राष्ट्रीय जलमार्गों में निवेश में 233 प्रतिशत की वृद्धि भी दर्ज की गई है।

प्रमुख सुधारों – राष्ट्रीय जलमार्ग अधिनियम, 2016, जिसने 111 राष्ट्रीय जलमार्ग घोषित किए और अंतर्देशीय पोत अधिनियम, 2021, जिसने सदियों पुराने कानून की जगह ली- ने विस्तार और आधुनिकीकरण को गति देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।

आज, देश के 111 राष्ट्रीय जलमार्ग 23 राज्यों और चार केन्द्र-शासित प्रदेशों में 20,187 किलोमीटर तक फैले हैं। वर्तमान में बत्तीस राष्ट्रीय जलमार्ग शिपिंग और नौवहन के लिए कार्यरत हैं। वर्ष 2027 तक कार्यरत जलमार्गों की संख्या 76 तक पहुंचाने का लक्ष्य रखा गया है। राष्ट्रीय जलमार्गों पर माल की आवाजाही अप्रैल 2024 और मार्च 2025 के बीच 146 मिलियन टन के सर्वकालिक उच्च स्तर पर पहुंच गई, जो अब तक का सबसे मजबूत प्रदर्शन है।

उपेक्षित संवेदनाओं और अनदेखें संघर्षों का सच

अंतर्राष्ट्रीय पुरुष दिवस- 19 नवम्बर, 2025

महिला दिवस की तर्ज पर ही पूरे विश्व में अंतर्राष्ट्रीय पुरुष दिवस भी मनाया जाने लगा है। पहला अंतरराष्ट्रीय पुरुष दिवस 1999 में 19 नवंबर को डॉ. जेरोम टीलकसिंह ने त्रिनिदाद और टोबैगो में मनाया था। दुनिया के 30 से अधिक देशों में यह दिवस मनाया जा रहा है। यह केवल पुरुषों का उत्सव नहीं, बल्कि बदलते सामाजिक परिदृश्य में उनकी स्थिति, संघर्षों और मनोभावों को समझने का मौक़ा है। जैसे स्त्रियाँ वर्षों से असमानता, उपेक्षा और अन्याय के बोझ से जूझती रही हैं, वैसे ही आज पुरुष भी कई स्तरों पर अपने शोषण एवं उत्पीडित होने की बात उठा रहे हैं। महिलाओं की ही भांति अब पुरुषों पर भी उपेक्षा, उत्पीड़न एवं अन्याय की घटनाएं पनपने की बात की जा रही है। वे भी दबाव, अवसाद और सामाजिक पूर्वाग्रहों का सामना कर रहे हैं। दुर्भाग्य यह है कि पुरुषों की पीड़ा, उनके संघर्ष और उनकी संवेदनाएँ उतनी चर्चा का विषय नहीं बनते, जितना कि वे बनना चाहिए। यह दिन हमें स्मरण कराता है कि समाज केवल स्त्रियों से ही नहीं, पुरुषों से भी बनता है और किसी एक की उपेक्षा पूरे संतुलन को बिगाड़ देती है। 2025 के लिए इस दिवस की थीम ‘पुरुषों और लड़कों का उत्सव’ है।
आज का पुरुष बदलते समय के साथ एक दोहरी चुनौती से जूझ रहा है-एक ओर उससे पारंपरिक भूमिकाओं को निभाने की अपेक्षा की जाती है, दूसरी ओर नये सामाजिक ढाँचों में भावनात्मक रूप से अधिक संवेदनशील, सहयोगी और सहचर होने का दबाव है। संघर्ष यह है कि इस परिवर्तन में उसकी पीड़ा, द्वंद्व और टूटन को गंभीरता से नहीं सुना जाता। उसे मजबूत, कठोर और समस्यारहित मान लेने का भ्रम उसकी वास्तविक जरूरतों को छिपा देता है। यही कारण है कि आधुनिक पुरुष स्वयं को कई बार दोयम दर्जे की स्थिति में पाता है-एक ऐसे व्यक्ति के रूप में जिसे समाज ज़िम्मेदारी तो देता है, पर अधिकार और संवेदना नहीं। पुरुषों पर हो रहे अत्याचारों की अनदेखी भी चिंताजनक है। घरेलू हिंसा, झूठे मुक़दमे, अभिभावकत्व के अधिकारों से वंचित होना, मानसिक प्रताड़ना, कार्यस्थलों पर उत्पीड़न-ये सब वास्तविक समस्याएँ हैं, जिन्हें अक्सर मज़ाक या अतिशयोक्ति कहकर टाल दिया जाता है। पुरुष के दर्द को ‘मर्द को दर्द नहीं होता’ जैसी रूढ़ि निगल जाती है। जबकि सच यह है कि भारत में पुरुष भी आत्महत्या, अवसाद और मानसिक दबाव के शिकार बन रहे हैं। कई रिपोर्टों में यह तथ्य सामने आया है कि अवसाद और आत्महत्या के मामलों में पुरुषों की संख्या महिलाओं की तुलना में अधिक है, पर इस पर चर्चा समाज की प्राथमिकता नहीं बनती। यह उपेक्षा न केवल अमानवीय है, बल्कि समाज के संतुलन को खतरे में डालने वाली भी है।
कुछ वर्ष पूर्व भारत में सक्रिय अखिल भारतीय पुरुष एशोसिएशन ने भारत सरकार से एक खास मांग की कि महिला विकास मंत्रालय की भांति पुरुष विकास मंत्रालय का भी गठन किया जाये। इसी तरह यूपी में भारतीय जनता पार्टी के कुछ सांसदों ने यह मांग उठाई थी कि राष्ट्रीय महिला आयोग की तर्ज पर राष्ट्रीय पुरुष आयोग जैसी भी एक संवैधानिक संस्था बननी चाहिए। इन सांसदों ने इस बारे में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को पत्र भी लिखा था। पत्र लिखने वाले एक सांसद हरिनारायण राजभर ने उस वक्त यह दावा किया था कि पत्नी प्रताड़ित कई पुरुष जेलों में बंद हैं, लेकिन कानून के एकतरफा रुख और समाज में हंसी के डर से वे खुद के ऊपर होने वाले घरेलू अत्याचारों के खिलाफ आवाज नहीं उठा रहे हैं। प्रश्न है कि आखिर पुरुष इस तरह की अपेक्षाएं क्यों महसूस कर रहे हैं? लगता है पुरुष अब अपने ऊपर आघातों एवं उपेक्षाओं से निजात चाहता है। तरह-तरह के कानूनों ने उसके अस्तित्व एवं अस्मिता को धुंधलाया है। जबकि आज बदलते वक्त के साथ पुरुष अब अधिक जिम्मेदार और संवेदनशील हो चुका है। कई युवा पुरुष समाज-निर्माण की बड़ी जिम्मेदारियों को उठा रहे हैं और अपनी काबिलीयत व जुनून से यह साबित भी कर रहे हैं।
समाज हमेशा पुरुष से अपेक्षा करता है कि वह परिवार की रीढ़ बने, आर्थिक व भावनात्मक उत्तरदायित्व निभाए, कठिनाई में ढाल की तरह खड़ा रहे। लेकिन जब वही पुरुष कमज़ोर पड़ता है, टूटता है, या न्याय चाहता है, तो वह उपेक्षित कर दिया जाता है। पुरुष को यह अधिकार मिलना ही चाहिए कि वह अपनी पीड़ा कह सके, अपने अधिकारों की रक्षा कर सके और गलत आरोपों से मुक्त हो सके। जैसे महिलाओं के लिए सुरक्षा और न्याय के तंत्र बनाए गए, वैसे ही पुरुषों के लिए भी कुछ संवेदनशील और न्यायपूर्ण व्यवस्था विकसित करने की आवश्यकता है। यह समझना आवश्यक है कि पुरुष समाज के निर्माण का अभिन्न हिस्सा है-वह पिता है, पति है, पुत्र है, भाई है, मित्र है। उसकी उपस्थिति के बिना किसी भी परिवार या समाज की कल्पना अधूरी है। वह जिम्मेदारियों से भरा हुआ व्यक्ति है, लेकिन इसी वजह से वह सबसे अधिक दबाव और अपेक्षाओं का भार उठाता है। यह भी सच है कि पुरुष ही समाज के विकास, विज्ञान, कला, परिश्रम और संरचना के बड़े हिस्से का वाहक रहा है। लेकिन इस योगदान के बावजूद, आज पुरुषों की समस्याओं के प्रति संवेदना बढ़ाने की आवश्यकता है।
अंतर्राष्ट्रीय पुरुष दिवस का संदेश यही है कि महिलाओं के समान ही पुरुषों की भी गरिमा, सुरक्षा, सम्मान और संवेदनाओं की रक्षा की जानी चाहिए। लैंगिक समानता का अर्थ केवल महिलाओं को सशक्त बनाना नहीं, बल्कि पुरुषों पर बने अनुचित पूर्वाग्रहों को भी तोड़ना है। एक स्वस्थ, संतुलित समाज वही है जिसमें दोनों लिंगों की समस्याओं को समान रूप से सुना और समझा जाए। पुरुषों को कठोरता की बेड़ियों से मुक्त कर, उनके भावनात्मक अस्तित्व को स्वीकार करना समय की मांग है। पुरुष दिवस हमें जागरूक करता है कि सह-अस्तित्व, सहयोग, संवाद और करुणा ही पुरुष-स्त्री के संबंधों का वास्तविक आधार हैं। पुरुष और स्त्री एक-दूसरे के विरोधी नहीं, पूरक हैं। इसलिए उनकी समस्याओं, अधिकारों और जिम्मेदारियों को भी पूरक दृष्टि से ही देखा जाना चाहिए। जब समाज पुरुष की पीड़ा को भी उतनी ही गंभीरता से सुनेगा, जितनी वह स्त्री के आर्तनाद पर देता है, तभी हम सच्चे अर्थों में संतुलित और मानवीय समाज का निर्माण कर पाएँगे।

महिलाओं के साथ होने वाली हिंसा को रोकने के लिए कठोर कानून भी बने हैं, लेकिन पुरुष भी घरेलू हिंसा का शिकार होते हैं। भारत में अभी तक ऐसा कोई सरकारी अध्ययन या सर्वेक्षण नहीं हुआ है जिससे इस बात का पता लग सके कि घरेलू हिंसा में शिकार पुरुषों की तादाद कितनी है लेकिन कुछ गैर सरकारी संस्थान इस दिशा में जरूर काम कर रहे हैं। ‘सेव इंडियन फैमिली फाउंडेशन‘ और ‘माई नेशन‘ नाम की गैर सरकारी संस्थाओं के एक अध्ययन में यह बात सामने आई है कि भारत में नब्बे फीसद से ज्यादा पति तीन साल की रिलेशनशिप में कम से कम एक बार घरेलू हिंसा का सामना कर चुके होते हैं। वे भी अपने अस्तित्व की सुरक्षा एवं सम्मान के लिये आवाज उठाना चाहते हैं।
अंतर्राष्ट्रीय पुरुष दिवस इसलिए महत्त्वपूर्ण है कि यह पुरुष को उसके वास्तविक स्वरूप में देखने, समझने और सम्मान देने का अवसर देता है-एक ऐसे मानव के रूप में, जो जिम्मेदार भी है, संवेदनशील भी; जो मजबूत भी है, पर टूट भी सकता है; जो देता ही नहीं, पाने की भी अपेक्षा रखता है। पुरुष की इस नई समझ के बिना मानवीय समाज की कल्पना संभव नहीं है। यह ऐसा एक वैश्विक उत्सव है जो पुरुषों के सकारात्मक योगदान और उपलब्धियों का जश्न मनाता है, साथ ही पुरुषों के स्वास्थ्य, कल्याण और लैंगिक समानता को प्रभावित करने वाले महत्वपूर्ण मुद्दों पर ध्यान केंद्रित करता है। यह दिन पुरुषों के शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य का समर्थन करने वाली चर्चाओं और कार्यों को बढ़ावा देने, सकारात्मक रोल मॉडल को प्रोत्साहित करने और अधिक समावेशी समाज की वकालत करने का अवसर प्रदान करता है।
प्रेषकः
(ललित गर्ग)
लेखक, पत्रकार, स्तंभकार
ई-253, सरस्वती कंुज अपार्टमेंट
25 आई. पी. एक्सटेंशन, पटपड़गंज, दिल्ली-92
फोनः 22727486, 9811051133

भारतीय वैज्ञानिकों ने 50 वर्ष पुराने जैविक नियम को नए सिरे से लिखने में मदद की

एक नए अध्ययन ने जीवाणु जीन विनियमन के एक केन्द्रीय पाठ्यपुस्तक मॉडल को उलट दिया है और जीवाणु जीन विनियमन एवं उसके विकास को समझने के नए रास्ते खोले हैं। इससे संक्रमण तंत्र को अवरुद्ध करने वाले बेहतर एंटीबायोटिक्स या नियामक अवरोधकों को डिजाइन करने में मदद मिल सकती है।

बैक्टीरिया अपने जीन को कैसे नियंत्रित करते हैं, इसकी समझ सूक्ष्मजीव द्वारा तनाव पर प्रतिक्रिया देने के तरीकों से लेकर हमारे द्वारा उन्हें रोकने हेतु एंटीबायोटिक्स को डिजाइन करने के तरीकों तक से संबंधित हमारी तमाम अवधारणाओं को प्रभावित करती है। यदि विभिन्न प्रजातियों में जीन विनियमन की मूल क्रियाविधि भिन्न होती है, तो इसका अर्थ संक्रमणों से लड़ने के लिए नई रणनीतियां या उपयोगी यौगिक बनाने के लिए बैक्टीरिया का उपयोग भी हो सकता है।

लगभग 50 वर्षों से, जीव विज्ञान इस कहानी को बताता आ रहा है कि कैसे बैक्टीरिया तथाकथित “σ (सिग्मा) चक्र” की सहायता से अपने जीन को सक्रिय करते हैं – ये वे कारक हैं जो आरएनए बहुलकों (पॉलीमरेज) को बांधकर प्रतिलेखन शुरू करते हैं और फिर विस्तार को संभव बनाने के लिए अलग हो जाते हैं। यह अवधारणा मुख्यतः बैक्टीरिया के स्ट्रेन ई. कोलाई σ70 के अवलोकनों पर आधारित है।

हालांकि, विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग (डीएसटी) के स्वायत्त संस्थान बोस इंस्टीट्यूट और रटगर्स विश्वविद्यालय के शोधकर्ताओं ने बताया है कि यह चक्र एक सार्वभौमिक घटना नहीं है।

प्रोसीडिंग्स ऑफ द नेशनल एकेडमी ऑफ साइंसेज (पीएनएएस) में प्रकाशित एक अध्ययन में उन्होंने बताया है कि, दशकों के वैज्ञानिक विश्वास के उलट, बैसिलस सबटिलिस – σए – में प्रमुख प्रतिलेखन आरंभ कारक और एस्चेरिचिया कोली σ70 कारक का एक संशोधित संस्करण, प्रतिलेखन के आरंभ होने के बाद अलग होने के बजाय, इस पूरी प्रक्रिया के दौरान आरएनए बहुलकों (पॉलीमरेज) से बंधा रहता है।

बोस संस्थान के लेखक डॉ. जयंत मुखोपाध्याय ने बताया, “हमारा शोध यह दर्शाता है कि बैसिलस सबटिलिस में, σA कारक प्रतिलेखन की प्रक्रिया के दौरान आरएनए बहुलकों (पॉलीमरेज) से जुड़ा रहता है।” उन्होंने आगे कहा, “इससे बैक्टीरिया प्रतिलेखन और जीन विनियमन के बारे में हमारी सोच में बुनियादी बदलाव आता है।”

जैव रासायनिक परख, क्रोमेटिन इम्यूनोप्रीसिपिटेशन और प्रतिदीप्ति-आधारित इमेजिंग जैसी आधुनिक तकनीकों के संयोजन का उपयोग करते हुए, शोधकर्ताओं ने सिग्मा कारक के व्यवहार को वास्तविक समय में देखा। उन्होंने पाया कि बैसिलस सबटिलिस σ ए  और ई. कोलाई σ70 का एक प्रकार, जिसमें 1.1 नामक भाग नहीं होता है, ट्रांसक्रिप्शन कॉम्प्लेक्स के साथ स्थिर रूप से जुड़े रहते हैं। यह पूर्ण लंबाई वाले ई. कोलाई σ70 के बिल्कुल विपरीत है, जो विस्तार के दौरान यादृच्छिक रूप से अलग हो जाता है।

बोस इंस्टीट्यूट के सह-लेखक अनिरुद्ध तिवारी ने कहा, “ये निष्कर्ष इस बात का ठोस प्रमाण देते हैं कि लंबे समय से स्वीकृत σ चक्र सभी बैक्टीरिया पर लागू नहीं होता। यह बैक्टीरिया के जीन नियमन और उसके विकास को समझने के नए रास्ते खोलता है।”

इस खोज के सूक्ष्म जीव विज्ञान पर व्यापक प्रभाव होंगे तथा यह संभावित रूप से शोधकर्ताओं के जीवाणु शरीरक्रिया विज्ञान, तनाव प्रतिक्रिया तथा प्रतिलेखन को लक्षित करने वाले एंटीबायोटिक्स के विकास के लिए कार्य करने के तौर-तरीकों को प्रभावित करेगा।

जीन विनियमन को नियंत्रित करके, वैज्ञानिक ऐसे सूक्ष्मजीवों को डिजाइन कर सकते हैं जो जैव ईंधन, जैविक रूप से अपघटित होने वाले प्लास्टिक या चिकित्सीय यौगिकों का कुशलतापूर्वक उत्पादन कर सकते हैं।

डॉ. तिवारी और डॉ. मुखोपाध्याय के अलावा, कोलकाता स्थित बोस इंस्टीट्यूट से श्रेया सेनगुप्ता, सौम्या मुखर्जी, नीलांजना हाजरा और संयुक्त राज्य अमेरिका के रटगर्स यूनिवर्सिटी से योन डब्ल्यू. एब्राइट, रिचर्ड एच. एब्राइट ने इस अध्ययन में योगदान दिया।

‘अहमदाबाद अंतरराष्ट्रीय पुस्तक महोत्सव – 2025’ में भारतीय डाक विभाग का स्टॉल बना आकर्षण का केंद्र

अहमदाबाद में 13 नवंबर से 23 नवंबर 2025 तक आयोजित ‘अंतरराष्ट्रीय पुस्तक महोत्सव’ ज्ञान, साहित्य और संस्कृति का अद्भुत संगम बन गया है। जहाँ एक ओर पुस्तकप्रेमी पुस्तकों के माध्यम से नई जानकारियाँ अर्जित कर रहे हैं, वहीं दूसरी ओर भारतीय डाक विभाग का स्टॉल लोगों को डाक टिकटों के माध्यम से भारत की कला, संस्कृति, इतिहास, शिक्षा और विरासत की विविधता से परिचित करा रहा है। भारत सरकार के शिक्षा मंत्रालय के अधीन नेशनल बुक ट्रस्ट एवं अहमदाबाद नगर निगम के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित इस भव्य महोत्सव में डाक विभाग का स्टॉल नंबर 95 विशेष आकर्षण का केंद्र बना हुआ है, जहाँ निरंतर आगंतुकों की भीड़ उमड़ रही है।

उत्तर गुजरात परिक्षेत्र के पोस्टमास्टर जनरल श्री कृष्ण कुमार यादव ने भी पुस्तक महोत्सव का दौरा किया और बताया कि भारतीय डाक स्टॉल पर पार्सल, स्पीड पोस्ट, ज्ञान पोस्ट, पार्सल पैकेजिंग सर्विस, फिलेटली, माई स्टैम्प, गंगा जल, इंडिया पोस्ट पेमेंट्स बैंक के माध्यम से डिजिटल बैंकिंग इत्यादि सुविधाएँ उपलब्ध कराई गई हैं। पुस्तक प्रेमी और प्रकाशक डाक स्टॉल के माध्यम से देश-विदेश में कहीं भी पुस्तकें भेज सकते हैं। इसके अलावा डाकघर बचत सेवाएँ, डाक जीवन बीमा की सुविधा भी उपलब्ध है।

 

पोस्टमास्टर जनरल श्री कृष्ण कुमार यादव ने कहा कि  पुस्तक महोत्सव पुस्तकों के प्रति रुचि बढ़ाने के साथ विभिन्न आयु वर्ग के पाठकों, लेखकों और प्रकाशकों को एक मंच पर जोड़कर साहित्यिक संवाद और सहयोग को नई दिशा प्रदान करता है। वहीं  फिलेटली प्रेमियों और संग्राहकों के लिए डाक स्टॉल एक अनोखा अवसर प्रदान कर रहा, जहाँ वे न केवल नई सामग्री का अवलोकन कर सकते हैं, बल्कि डाक टिकटों के माध्यम से भारत की विविध सांस्कृतिक परंपराओं और ऐतिहासिक धरोहर से भी परिचित हो सकेंगे। साहित्य, कला और संस्कृति से जोड़ने में पुस्तकों व डाक टिकटों की अहम भूमिका है। गुजरात  पर आधारित ‘माई स्टैम्प’ के प्रति लोगों में काफी उत्साह देखा जा रहा है, जिसमें गाँधी आश्रम, साबरमती स्थित महात्मा गाँधी, पतंग उत्सव और डांडिया नृत्य की डाक टिकट थीम शामिल है।  बच्चों व युवाओं के लिए यह अनुभव अत्यंत ज्ञानवर्धक और प्रेरणादायक सिद्ध हो रहा है, क्योंकि डाक टिकट राष्ट्र के इतिहास, संस्कृति और महत्वपूर्ण घटनाओं को सहज, रोचक और शिक्षाप्रद तरीके से प्रस्तुत करते हैं। यह स्टॉल पुस्तक महोत्सव के सांस्कृतिक माहौल को और भी समृद्ध और जीवंत बना रहा है।

 

अहमदाबाद मंडल के प्रवर अधीक्षक डाकघर श्री शिशिर कुमार ने बताया कि यहाँ लोग पुस्तक महोत्सव से ही अपनी पसंदीदा पुस्तकें अपने प्रियजनों तक पहुँचाने का आनंद उठा रहे हैं। यहाँ विभिन्न प्रकार के डाक टिकट, विशेष आवरण, रामायण डाक टिकट, श्री राम जन्मभूमि मंदिर पर आधारित खुशबूदार डाक टिकट सेट, खादी पोस्टकार्ड, सौराष्ट्र-कच्छ आधारित पिक्चर पोस्टकार्ड, ओलम्पिक आधारित डाक टिकट, वर्णमाला फिलेटली पुस्तकें, कॉफी मग, टी शर्ट सहित तमाम फिलेटलिक उत्पादों का प्रदर्शन किया गया है। मात्र ₹300 शुल्क में 12 डाक टिकटों की एक माई स्टैम्प शीट तैयार की जाती है, जो जन्मदिन, विवाह वर्षगाँठ, शुभ विवाह, रिटायरमेंट अथवा अन्य यादगार पलों के लिए एक अनोखा और विशेष स्मृति-उपहार बन जाती है। पुस्तक महोत्सव भ्रमण के बाद लेटर बॉक्स के माध्यम से बच्चों द्वारा अपने अनुभवों को सहेजते हुए पत्र भेजने की सुविधा भी यहाँ उपलब्ध है।

गणित के रहस्यमयी सूत्र जो शताब्दियों से रहस्य बने हुए हैं

गणित केवल सूत्र नहीं, बल्कि अन्वेषण की एक यात्रा है —जहाँ हर अनसुलझा प्रश्न नए विचारों, नई खोजों और नई सभ्यता को जन्म दे सकता है।  गणित को अक्सर “सटीक” विज्ञान कहा जाता है। ऐसा विषय जहाँ हर प्रश्न का एक निश्चित उत्तर होता है, हर समीकरण का एक समाधान होता है, और हर सिद्धांत कठोर प्रमाणों की कसौटी पर खरा उतरता है। लेकिन यही गणित जब अपनी गहराइयों में उतरता है, तो अनेक ऐसे रहस्य सामने आते हैं जिन्होंने दुनिया के महानतम गणितज्ञों को भी चुनौती दी है।  गणित में आज भी कई ऐसे गूढ़ रहस्य और समस्याएँ हैं जिनका समाधान दुनिया के श्रेष्ठ गणितज्ञ भी अभी तक नहीं खोज पाए हैं। इन्हें Unsolved Problems in Mathematics कहा जाता है। नीचे सबसे महत्वपूर्ण, प्रसिद्ध और रहस्यमय अभी तक न सुलझे गणितीय रहस्य दिए जा रहे हैं।  इन अनसुलझे रहस्यों का महत्व केवल “कठिन समस्याएँ” होने में नहीं है।
इनकी असली महत्ता इस बात में है कि —

1. रीमान प्रमेय (Riemann Hypothesis)

दुनिया की सबसे बड़ी अनसुलझी पहेली

1859 में रीमान ने प्राइम नंबरों (prime numbers) के वितरण के बारे में एक धारणा रखी।

इसका सही होना या गलत होना अभी तक सिद्ध नहीं हो पाया।

प्राइम नंबरों के रहस्य खोलने की चाबी इसी के पास है।

पुरस्कार: $1 मिलियन (Clay Millennium Prize)**

2. P vs NP समस्या

कंप्यूटर विज्ञान और गणित का सबसे बड़ा रहस्य

“क्या जो समस्या हम जल्दी जाँच सकते हैं, क्या उसे जल्दी हल भी कर सकते हैं?”

अगर P = NP साबित हो गया तो दुनिया के सभी पासवर्ड, एन्क्रिप्शन, सुरक्षा सिस्टम टूट जाएँगे।

कोई हल नहीं मिला — और यह सदी की सबसे कठिन समस्या मानी जाती है।

पुरस्कार: $1 मिलियन**

3. बिर्च और स्विनर्टन-डायर अनुमेय (BSD Conjecture)

यह एलिप्टिक कर्व (elliptic curves) नाम की ज्यामिति से जुड़ी बहुत कठिन समस्या है।

क्रिप्टोग्राफी, कोडिंग और आधुनिक कंप्यूटर सुरक्षा का आधार यही क्षेत्र है।

अब तक कोई पूरा प्रमाण नहीं।

पुरस्कार: $1 मिलियन**

4. हॉज अनुमेय (Hodge Conjecture)

यह टोपोलॉजी + बीजगणित + ज्यामिति के संगम पर स्थित बेहद कठिन समस्या है।

बताती है कि किसी आकृति के अंदर छिपे “बीजगणितीय आकार” (algebraic cycles) कैसे होते हैं।

इसे हल करने वाला आज तक कोई नहीं।

पुरस्कार: $1 मिलियन**

5. यांग–मिल्स थ्योरी और मास गैप समस्या

भौतिकी और गणित का साझा रहस्य।

यह समझना कि “दिखने में भारहीन पार्टिकल कैसे वास्तविक दुनिया में द्रव्यमान (mass) पाते हैं?”

क्वांटम फील्ड थ्योरी को आधारभूत बनाने के लिए इसका समाधान ज़रूरी है।

पुरस्कार: $1 मिलियन**

6. नवियर–स्टोक्स समीकरण समाधान (Navier–Stokes Smoothness & Existence)

यह समीकरण दुनिया की हर द्रव गति (fluid motion) को बताता है—हवा, पानी, मौसम, समुद्र।

लेकिन… गणित ने अभी तक यह सिद्ध नहीं किया कि

इन समीकरणों का समाधान हमेशा मौजूद होता है

या कभी फट भी सकता है (blow-up)

मौसम विज्ञान, एयरोस्पेस और इंजीनियरिंग सब इसी पर टिके हैं।

पुरस्कार: $1 मिलियन**

7. गोल्डबाख अनुमेय (Goldbach Conjecture)

हर सम संख्या (even number) को दो प्राइम नंबरों के योग से लिखा जा सकता है।
उदाहरण:
20 = 13 + 7
100 = 47 + 53

सभी संख्याओं के लिए सिद्ध नहीं हो पाया है।

280 साल से गणितज्ञ इसे हल नहीं कर पाए हैं।

8. ट्विन प्राइम अनुमेय (Twin Prime Conjecture)

क्या अनंत संख्या में “जुड़वाँ प्राइम” हैं?
उदाहरण: (3,5), (11,13), (17,19)…

बहुत प्रगति हुई है, पर अभी तक प्रमाण नहीं मिला।

9. कोलात्ज़ समस्या (Collatz Conjecture)

सबसे आसान दिखने वाली पर सबसे खतरनाक समस्या।
नियम:

संख्या सम है → 2 से भाग

विषम है → 3n + 1

जो भी आए, उसी पर यही प्रक्रिया दोहराएँ
कहते हैं हर संख्या अंत में 1 पर आती है — पर इसे सिद्ध नहीं कर पाए।

10. “Perfect Cuboid” का रहस्य

क्या ऐसा आयताकार डिब्बा हो सकता है जिसकी सभी 12 धाराएँ, 3 विकर्ण, और अंतर-विकर्ण सब के सब पूर्णांक (integers) हों?

300 साल बाद भी जवाब: पता नहीं।

11. Langlands Program

गणित की एक “ग्रैंड यूनिफाइड थ्योरी”

यह बीजगणित, विश्लेषण, संख्या सिद्धांत और ज्योमेट्री को एक ही ढाँचे में जोड़ने की कोशिश है।

इसे 21वीं सदी का “ब्रह्मसूत्र” कहा जाता है।

12. Sphere Packing (Dimension > 8)

3-D में गेंदों को सबसे सघन रूप में कैसे भरा जाए, इसका हल है।

8-D और 24-D में हल मिल चुका है।

लेकिन इससे ऊपर की dimensions में आज भी रहस्य है।

1. प्राइम संख्याओं का रहस्य — रीमान प्रमेय

प्राइम संख्याएँ गणित का हृदय हैं।
वे अनियमित भी हैं, रहस्यमय भी।
1859 में बर्नहार्ड रीमान नामक गणितज्ञ ने एक प्रमेय प्रस्तुत किया—
जिसके अनुसार प्राइम संख्याओं के वितरण में एक अद्भुत नियमितता छिपी हुई है।

200 से अधिक वर्ष बीत चुके हैं,
परन्तु यह प्रमेय अब भी सिद्ध नहीं हुआ।
इसका समाधान केवल गणित के लिए नहीं,
बल्कि आधुनिक क्रिप्टोग्राफी, इंटरनेट सुरक्षा और कंप्यूटर विज्ञान के लिए भी क्रांतिकारी माना जाएगा।
इसीलिए इसे दुनिया की सबसे कठिन समस्या कहा गया है।

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2. P बनाम NP समस्या — क्या कठिन समस्याएँ सचमुच कठिन हैं?

मान लीजिए आपको किसी Sudoku का सही उत्तर दिया गया।
आप जाँच सकते हैं कि वह सही है या नहीं — केवल कुछ क्षणों में।
परन्तु उसी Sudoku को हल करना कई बार घंटों लगता है।

प्रश्न यह है:
क्या हर समस्या जिसे “जाँचना” आसान है, उसे “हल करना” भी उतना ही आसान हो सकता है?

यदि इसका उत्तर ‘हाँ’ हुआ —
तो दुनिया के सारे पासवर्ड, बैंक सुरक्षा सिस्टम, एन्क्रिप्शन… सब खत्म हो जाएँगे।

यह सिर्फ गणित का नहीं, मानव सभ्यता की सुरक्षा का प्रश्न है।
और आज भी इसका उत्तर अंधकार में है।

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3. कोलात्ज़ समस्या — सरल नियम, भयावह रहस्य

यह समस्या बच्चों का खेल लगती है:

यदि संख्या सम है → 2 से भाग

यदि विषम है → 3n + 1

जो भी निकले, फिर उसी पर यही नियम लागू

कहते हैं कि चाहे आप किसी भी संख्या से शुरू करें,
अंत में आप 1 पर ही पहुँचते हैं।

परंतु इस सरल दिखने वाले खेल को सिद्ध करना आज तक असम्भव साबित हुआ है।
गणितज्ञ पॉल एर्डॉस ने कहा था:

“गणित केवल परमात्मा ही जानता है कि यह आग आखिर कहाँ छिपी है!”

यह समस्या हमें याद दिलाती है कि  गणित की सबसे कठिन चुनौतियाँ कभी-कभी सबसे सरल वाक्यों में छिपी होती हैं।

4. गोल्डबाख अनुमेय — हर सम संख्या का दो भागीदार

यह अनुमान कहता है—
हर सम संख्या दो प्राइम संख्याओं के योग के बराबर होती है।

शताब्दियों का कंप्यूटर परीक्षण, अरबों संख्याओं की जाँच
— सब इस अनुमान को “सही” सिद्ध करते दिखते हैं,
किन्तु गणित में सत्य तब तक सत्य नहीं,
जब तक वह कठोर प्रमाण से सिद्ध न हो।

आज भी यह अनुमान गणित का एक चमकता हुआ प्रश्नचिह्न है।

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5. ट्विन प्राइम — क्या जुड़वाँ प्राइम अनंत हैं?

जैसे: (3,5), (11,13), (17,19)…
ऐसी जोड़ी के प्राइम क्या अनंत हैं?

यह प्रश्न संख्या-सिद्धांत की आत्मा से जुड़ा है।
बहुत प्रगति हुई है, पर पूर्ण प्रमाण आज भी नहीं।

मेला एक, यात्राएँ अनेक: व्यापार मेले में प्रगति और अवसरों की कहानियाँ

नई दिल्ली । दशकों से  व्यापार मेलों ने दिखाया है कि जब लोग, उत्पाद और विचार मिलते हैं, तो बाजार किस तरह विकसित होते हैं। इस वर्ष का भारत अंतर्राष्ट्रीय व्यापार मेला “एक भारत श्रेष्ठ भारत” विषयवस्तु के अंतर्गत इसी परंपरा को आगे बढ़ा रहा है। इसके 44वें संस्करण में 31 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के 3,500 से अधिक प्रतिभागी प्रदर्शनी लगाने वाले एक साथ 11 देशों से आ रहे हैं, जो भारत मंडपम को संस्कृति और वाणिज्य के संगम में रूपांतरित रहा है। बिहार, महाराष्ट्र, राजस्थान और उत्तर प्रदेश जैसे सहयोगी राज्य, जिनमें झारखंड राज्य केंद्र बिंदु है, न केवल वस्तुएं, बल्कि अपने प्रदेशों की आर्थिक महत्वाकांक्षाओं को भी प्रस्तुत कर रहे हैं।

सरकारी विभागों, सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों, एमएसएमई, स्टार्ट-अप, अंतर्राष्ट्रीय प्रदर्शकों और कारीगर समूहों के एक ही छत के नीचे आने से यह मेला छोटे उत्पादकों, पारंपरिक शिल्पियों और नए युग के उद्यमियों के लिए भारत के सबसे मजबूत मंचों में से एक के तौर पर विकसित हुआ है।

एक गलियारे में, मिस्र से आए इस्लाम कमाल, अपने संगमरमर के हस्तशिल्प को निहारते आगंतुकों को घनिष्ठता के साथ देखते हैं। उनका परिवार 25 सालों से आ रहा है, जो मेले के बदलते स्वरूप के साथ उनके व्यावसायिक सफर को समझने के लिए काफी है।

वे कहते हैं, “इस क्षेत्र में लगातार प्रगति हुई है। हमें हमेशा अच्छी प्रतिक्रिया मिलती है और मांग भी बढ़ी है।” उनके लिए, भारत मंडपम “अब तक का सबसे बड़ा व्यापार मेला” है, एक ऐसी जगह, जहां सहयोग हमेशा बना रहता है और आगंतुकों की संख्या लगातार बढ़ती रहती है। उनका अनुभव कई अंतरराष्ट्रीय प्रतिभागियों के अनुभव से मेल खाता है, जो इसलिए नहीं लौटते, क्योंकि उन्हें आना ही पड़ता है, बल्कि इसलिए कि भारत अपने आप में एक भरोसेमंद बाजार बन गया है।

तुर्की से आने वाले उलास के लिए, यह रिश्ता और भी गहरा है। वे कहते हैं, “हम करीब 24-25 सालों से भारत आ रहे हैं। पहले हम दूसरे व्यापार मेलों में जाते थे, लेकिन अब हम सिर्फ भारत में ही प्रदर्शनी करते हैं।” वे और उनकी टीम साल का आधा वक्त यहीं बिताते हैं, और उन्होंने ऐसे रिश्ते बनाते हैं जो मेले से भी आगे तक चलते हैं।

वे मुस्कुराते हुए कहते हैं, “हमारे ग्राहक हर साल लौटते हैं। यही हमें प्रेरित करता है।”

एक जगह पर, कोल्हापुरी चप्पलों की दुकान गुलज़ार है। सचिन सातपुते के लिए, यह मेला सिर्फ एक बाजार नहीं है; यह एक सांस्कृतिक स्थल है, जहां विरासत को सराहने और खरीदने वाले खरीदार मिलते हैं।

“इस तरह के आयोजन हमें मार्केटिंग और ब्रांडिंग में बड़ी मदद करते हैं,” वे कहते हैं। 15 दिनों में छः महीने की कमाई: उनके बेचे जाने वाले चमड़े की तरह ही ये आंकड़े भी ठोस हैं।

महाराष्ट्र की शोभा, जो चटनी, अचार और घी का कारोबार करती हैं, कहती हैं, “व्यापार मेले में यह हमारा दूसरा मौका है।” वह अपने पिछले अनुभव को याद करते हुए कहती हैं: “हमने लगभग 2-3 क्विंटल के उत्पाद बेचे, और मेला खत्म होने से 2-3 दिन पहले ही हमारा स्टॉक खत्म हो गया।”

वह इस प्रतिक्रिया को “बहुत अच्छा” कहती हैं, जो छोटे उत्पादकों के लिए एक भरोसा है, जो अक्सर किसी भी चीज से अधिक पहुंच पर निर्भर करते हैं।

यहां आने वाला हर शख्स व्यापार के लिए नया नहीं होता; कुछ तो बस एक अलग बाजार में कदम रख रहे होते हैं। उत्तर प्रदेश के मुरादाबाद के मोहम्मद फाजिल आमतौर पर धातु के हस्तशिल्प और सजावटी सामान यूरोप और अमेरिका को निर्यात करते हैं। लेकिन इस बार, वह भारत मंडपम में एक नए उद्देश्य से आए हैं: “हम घरेलू बाजार में और अधिक पहुंच बनाने की कोशिश कर रहे हैं,” वे कहते हैं। उनके लिए यह मेला एक परीक्षण स्थल है, एक ऐसी जगह, जहां ब्रांडिंग होती है और लोग भी आते हैं और हॉल के किसी भी कोने से नए खरीदार निकल सकते हैं।

हालांकि, कुछ यात्राएं बदलाव से कम नहीं होतीं। राष्ट्रीय पुरस्कार विजेता, उत्तर प्रदेश के इकराम हुसैन कहते हैं, “यह मेरा व्यापार मेले में दूसरा मौका है, और यह मेरे लिए बहुत फायदेमंद रहा है।” तीन महीने की बिक्री सिर्फ 15 दिनों में: वे इस अवसर को अनोखा बताते हैं।

“यहां मिले मौके ने मुझे अपने व्यवसाय का काफी विस्तार करने में मदद की है,” वे आगे कहते हैं। उनकी कहानी बताती है कि कैसे ऐसे मंच उन कारीगरों के लिए एक प्रेरणा बन सकते हैं, जो अपनी वर्कशॉप से भी बड़ा सपना देखते हैं।

थाईलैंड की किम लगभग 12 सालों से इस मेले में आ रही हैं। वह कहती हैं, “यहां आने वाले ग्राहक आमतौर पर अगले साल दोबारा आते हैं।” मेले के बाद उन्हें थोक में ऑर्डर भी मिलते हैं, जिससे पता चलता है कि यहां बने रिश्ते मेले से भी दूर तक फैले हैं।

मेले में कुछ देर घूमिए और एक नया पैटर्न उभर कर आपके सामने आएगा। चाहे वह मिस्र का संगमरमर हो, थाईलैंड के जेवरात हों, महाराष्ट्र का चमड़ा हो या फिर उत्तर प्रदेश का धातुकर्म, हर प्रदर्शनी वाला प्रगति, दृश्यता, जुड़ाव और आय की बात करता है, जो 14 दिनों के आयोजन से कहीं आगे तक फैली हुई है।

इस तरह के व्यापार मेले बिक्री बढ़ाने से कहीं अधिक करते हैं। ये एक ऐसा माहौल बनाते हैं, जहां कारीगरों को पहचान मिलती है; निर्यातकों को घरेलू बाजार मिलता है, और छोटे उत्पादकों को ऐसे ग्राहक मिलते हैं, जो उनके भरोसेमंद बन जाते हैं।