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ये ‘सज्जन’ कौन थे, इसका निर्णय पाठक स्वयं करें

वे जब भारत में ब्रिटिश सरकार के श्रम मंत्री बने तब के उनके भाषण पढ़िये।मैं सिर्फ एक भाषण का उदाहरण देता हूँ। तत्कालीन कांग्रेस के भारत छोड़ो आंदोलन के बारे में ही नहीं, कांग्रेस के बारे में और गांधी व जयप्रकाश नारायण के बारे में उनके विचार इसमें जानिए । उनके द्वारा वायसराय और सेक्रेटरी ऑफ द स्टेट को वीटो की शक्ति प्रदान करने के पक्ष में तर्क पढ़िये। हिटलर और ब्रिटिश सरकार के बीच में फर्क करते हुए वे कहते हैं कि ऑटोक्रेसी में वीटो नहीं होता, उत्तरदायी शासन में वीटो होता है। उनके द्वारा विधायी सदन की जगह सेक्रेटरी ऑफ द स्टेट के पक्ष में वीटो रखने का औचित्यीकरण इसमें पढ़िये।
जिस विधायिका के सामने वे अपना मत रख रहे थे वे उसे वीटो अधिकार के लिए इसलिए अनर्ह मान रहे थे कि वह तीन वर्ष के लिए चुनी गई थी पर नौ वर्ष से चल रही थी पर वे सेक्रेटरी ऑफ द स्टेट और वॉयसरॉय को अनर्ह नहीं कह रहे थे जो आये तो भारत में व्यापार करने के लिए थे लेकिन यहाँ दो सौ साल से कब्जा किये बैठे थे। वे कांग्रेस को एक हिंसक संगठन बता रहे थे और गाँधी को कांग्रेस के संकल्प द्वारा डिक्टेटर और कमांडर इन चीफ बनाये जाने का तथ्य याद दिला रहे थे पर स्वयं एक औपनिवेशिक सत्ता की मूलभूत हिंसक प्रकृति का उल्लेख नहीं कर रहे थे।
वे कह रहे थे कि “यह केवल एक तथ्य नहीं है कि कांग्रेस कार्यसमिति के लगभग सभी सदस्य — या कम से कम उनमें से बहुत से — अहिंसा में अपना विश्वास खो चुके थे; उनमें से बहुत से लोग इस सिद्धांत के प्रति उदासीन हो गए थे, बल्कि पर्याप्त प्रमाण भी उपलब्ध हैं जो संकेत देते हैं कि कांग्रेस के भीतर योजनाबद्ध हिंसात्मक अभियान की कोशिशें की जा रही थीं… मैंने जिन बातों का उल्लेख किया है, वे यह विश्वास दिलाने के लिए पर्याप्त हैं कि कांग्रेस को उस औपचारिक अहिंसा-सिद्धांत के पालन पर भरोसा नहीं किया जा सकता था, जिसे वे लिप सर्विस ही देते हैं।”
क्या यह किसी के भी ध्यान में नहीं कौंधता कि यह आलोचना उस साम्राज्य के मंच से की जा रही थी जिसने दो सौ वर्षों से अधिक समय तक भारत को लूटा, विद्रोहों को कुचला, नीतियों के माध्यम से अकाल थोपे और बंदूक की नली से नियंत्रण बनाए रखा। 1857 का विद्रोह, 1919 का जलियांवाला बाग हत्याकांड और असंख्य शांतिपूर्ण सत्याग्रहियों पर लाठीचार्ज केवल ऐतिहासिक घटनाएँ नहीं थीं, बल्कि औपनिवेशिक राज्य की “मूलभूत हिंसक प्रकृति” को फाश कर देने वाली थीं।
यह स्पीच पीड़ित और अपराधी की भूमिकाओं को उलट देती थी: उपनिवेशित लोग प्रतिरोध के लिए आक्रामक ठहराए जा रहे थे, जबकि उपनिवेशक की संस्थागत हिंसा—भारतीय दंड संहिता के दमनकारी प्रावधानों और सैनिकों की स्थायी तैनाती में प्रकट—को “उत्तरदायी शासन” के रूप में पवित्र बनाया जा रहा था। गांधी के अहिंसक असहयोग की पुकार को राजद्रोह में बदल दिया गया था ताकि सामूहिक गिरफ़्तारियाँ और दमन उचित ठहराया जा सके। भाषणकर्ता सज्जन इस असमानता को स्वीकार न कर केवल भारतीय आकांक्षाओं को अवैध ठहरा रहे थे, बल्कि एक नैतिक दोहरा मापदंड भी कायम कर रहे थे, जहाँ दमनकर्ता दमित को नैतिकता का पाठ पढ़ाता था। जिस साम्राज्य के हाथ खून से लथपथ थे, उसके श्रम मंत्री के रूप में कार्य करते हुए ये सज्जन राष्ट्रीय आंदोलन से नैतिक शुद्धता की मांग कर रहे थे।
विधायी सभा सभा भले ही ब्रिटिश युद्ध-स्थगन के कारण विस्तारित हुई हो, इस स्पीच में वीटो अधिकार के अयोग्य ठहराई गई। यह नजरअंदाज करते हुए कि वीटो साम्राज्यवादी नियंत्रण का हथियार था, जो 1935 के भारत सरकार अधिनियम की कथित स्वायत्तता को नाममात्र का बना देता था। ऐतिहासिक रूप से, ऐसे तर्क 1930-40 के दशक की बहसों में प्रचलित थे, जहाँ ब्रिटिश वफ़ादार “उत्तरदायी सरकार” को द्वैध शासन की असफलताओं को छिपाने के लिए इस्तेमाल करते थे, जहाँ गवर्नर वित्त और कानून पर विधायिकाओं को नियमित रूप से ओवरराइड करते थे। पाखंड इस बात में था कि निर्वाचित वैधता का उपदेश देते हुए उन अ-निर्वाचित विदेशियों को सशक्त बनाने में ये सज्जन अपनी विद्वता का उपयोग कर रहे थे जिनकी “योग्यता” नस्लीय श्रेष्ठता से उपजी थी, न कि जनादेश से। पर इन सज्जन के हाथ पर वह औपनिवेशिक घड़ी सजी थी जो हमेशा साम्राज्य के घंटे पर सेट थी तभी लंदन से निगरानी वाले स्टेट सेक्रेटरी के वीटो को “उत्तरदायी” ठहराना संभव हो सकता था।
इस दोहरे मापदंड ने न केवल भारतीय विधायकों का अपमान किया था बल्कि स्वतंत्रता के बाद संसदीय लोकतंत्र में अविश्वास के बीज बोए। वैश्विक संदर्भ में, यह अन्य औपनिवेशिक पाखंडों के समानांतर ही था। फ्रांस का “सभ्यता मिशन” अल्जीरियाई मतों को वीटो करता था।
ये सज्जन लॉर्ड लिनलिथगो के द्वारा युद्धकालीन १००,००० की बिना मुकदमा कैद “शासन” के रूप में सामान्यीकृत कर सकते थे पर गाँधी या जयप्रकाश या स्वयं कांग्रेस की आंतरिक गतिशीलता—अहिंसा में विश्वास खोने—पर ध्यान देने का परिश्रम इनके श्रम मंत्री होने की भूमिका का निर्वहन था। विधायी निकाय को संबोधित करके उसकी अपनी शक्तिहीनता के लिए सहमति मांगना चरम पाखंड था। जब ब्रिटिश “नागरिक स्वतंत्रताएँ” बंदूकों और संगीनों से थोपी जा रहीं थीं तब ये श्रम मंत्री न्यूनतम मजदूरी या यूनियन अधिकार जैसे प्रगतिशील सुधारों को अवरुद्ध करने वाले वीटो का समर्थन कर रहे थे। साम्राज्यवादी “श्रम सुरक्षा” का अर्थ कुली कानून थे जो प्रवासियों को बागानों से बाँधते थे।
भाषणकर्ता सज्जन इस असमानता को स्वीकार न कर न केवल भारतीय आकांक्षाओं को अवैध ठहरा रहे थे, बल्कि एक नैतिक दोहरा मापदंड भी कायम कर रहे थे, जहाँ दमनकर्ता दमित को नैतिकता का पाठ पढ़ाता था। जिस साम्राज्य के हाथ खून से लथपथ थे, उसके श्रम मंत्री के रूप में कार्य करते हुए ये सज्जन राष्ट्रीय आंदोलन से नैतिक शुद्धता की मांग कर रहे थे।
पर नहीं, वे तो दमित दलित के पैरोकार मान लिए गए तो मान लिए गए।
अब इतने बरसों बाद ये बात क्यों उठा रहे हैं?
वो तो सिर्फ उन्हें ही हक था कि सहस्राब्दियों पुरानी किसी किताब का मुद्दा उठा सकें।
(लेखक सेवानिवृत्त आईएएस अधिकारी हैं और मध्यप्रदेश के मुख्य चुनाव आयुक्त हैं)

आत्मबोध से विश्व बोध की संस्कृति वाला हमारा देश

  ” अयम्  निज:परोवेति, गणना लघु चेतसाम्।
उदार चरितानाम् तु,वसुधैव कुटुम्बकम्।।” चाणक्य नीति 
 यह चिंतन भारतीय संस्कृति की रीढ़ है‌। जैसे  रीढ़ के बिना  शरीर पंगु है उसी  प्रकार उदारता, प्रेम, दया ,करुणा ,स्नेह ,परहित, समाज -सेवा जैसे भावों से रहित मनुष्य का जीवन भी व्यर्थ है ।भारतीय चिंतन में विश्व कल्याण की भावना सर्वोपरि है ।जब तक मनुष्य आत्म चिंतन नहीं करता, तब तक वह अपना परिष्कार नहीं कर सकता। और आत्म परिष्कार के बिना विश्व का कल्याण भला कैसे हो सकता है ?यह दैवीय गुण मनुष्य में तभी उत्पन्न होते हैं, जब वह सर्व हितकारी ,लोकोपकारी चिंतन करता है ।जब तक मनुष्य अपने उद्धार के विषय में विचार नहीं करता, तब तक वह विश्व के कल्याण के विषय में भी विचार नहीं कर सकता।
 क्योंकि आत्मानुभूति हुए बिना दूसरे के दुख की अनुभूति नहीं हो सकती ।
महाभारत, विदुर नीति,पद्म पुराण (19/3573-58)जैसे शास्त्रों में कहा गया है-
“आत्मन:प्रतिकूलानि  परेषां न समाचरेत्।”
 जो आप अपने साथ नहीं चाहते हैं, वैसा  व्यवहार दूसरों के साथ भी ना करें ।
श्रीमदभगवत गीता में भी यही कहा है-
 कि जो मनुष्य अपना आत्म कल्याण चाहता है वही विश्व कल्याण के मार्ग पर अग्रसर हो सकता है ।
“उद्धरेत् आत्मानं नात्मानं अवसादयेत्।
 आत्मैव हि आत्मनो बंधु:, आत्मैव रिपुरात्मन:।।”6/5
  मनुष्य जो समाज की प्रथम इकाई है; मनुष्य से परिवार; परिवार से समाज और समाज से राष्ट्र का निर्माण होता है।
राष्ट्रीय उत्थान के लिए मानवीय गुणों से दैवीय गुणों की ओर अग्रसर होना प्रत्येक प्राणी की प्राथमिकता होनी चाहिए। भारतीय संस्कृति में मनुष्य से लेकर के प्रत्येक प्राणी हित चिंतन की बात को ध्यान में रखकर भी सभी के कल्याण की प्रार्थना की गई है ।
बृहदारण्यक, तैत्तिरीय उपनिषद्, भविष्य पुराण, गरुड़ पुराण से लिया गया यह मंत्र सामूहिक कल्याण की भावना से ओतप्रोत है –
  “सर्वे भवंतु सुखिनः ,सर्वे संतु निरामया:।”
यह विचार वही कर सकता है जो संसार के प्रत्येक कण-कण में ईश्वर के स्वरूप को देखता हो।
हमारे यहां ऋषियों ने कहा -कि संपूर्ण सृष्टि जड़ और चेतन आपस में एक माला की तरह जुड़े हुए हैं ।जब  पंच महाभूत स्वस्थ और स्वच्छ रहेंगे ,तभी पंचमहाभूत से निर्मित यह सृष्टि भी स्वस्थ और स्वच्छ रह सकती है। यह तभी संभव है जब हम आत्म कल्याण से विश्व कल्याण का चिंतन करेंगे।
 इसलिए ऋषियों ने कहा-  आकाश में ,पृथ्वी में, जल में, अंतरिक्ष में, औषधियों में, वनस्पतियों में सर्वत्र शांति स्थापित हो। इतना गूढ़ गंभीर चिंतन वही समाज दे सकता है, जो बहुत संवेदनशील हो ।अन्यथा तो मनुष्य में हमेशा ही स्वार्थ भाव प्रबल रहता है ।तामसिक शक्तियां जागृत रहती हैं ।अपना हित ही प्रमुख रहता है ।संघ का कार्य स्तुत्य है।जो सदैव राष्ट्रीय चेतना को प्रत्येक मनुष्य में जागृत करने का पुनीत कार्य करता रहा है। जो राष्ट्र प्रेम से सराबोर असंख्य भारतीयों को मां भारती के चरणों में अपने आप को समर्पित करने का आह्वान करता रहा है ‌।
“भद्रम् कर्णेभि: श्रृणुयाम् देवा:”
यजुर्वेद 25/21
का उद्घोष असंख्य कण्ठों से निनादित हो हमारे चित्त को पवित्र और व्यवहार को राष्ट्रीयता से ओत- प्रोत कर सके ‌। राष्ट्र -आराधन कर सके।
हम अपने कानों से हमेशा भद्र सुनें ।अपने हाथों से संसार के लिए भद्र (कल्याण) का कार्य करें, यह तभी संभव है ,जब हम अपने चरित्र को मानवीयता से परिपूर्ण कर सकेंगे। ‌।
जैसे एक कड़ी से दूसरी कड़ी जुड़ती जाती है वैसे ही राष्ट्र को संगठित करने के लिए हमारा मन ,वचन और कर्म राष्ट्र हित में अग्रसर हो। यही ध्येय होना चाहिए
“संगच्छध्वं संवदध्वं सं वो मनांसि जानताम्।”
            ऋग्वेद 10/191वांसूक्त
यह वह मंत्र है जो  वैदिक काल से संपूर्ण भारत को एकता के सूत्र बांधता रहा है ।जहां हमारा चिंतन एक मार्ग पर अग्रसर होकर राष्ट्रहित के लिए प्रवाहित होता है ।प्राचीन समय में भी जब देश अलग-अलग खंडों में विभाजित था, तब भी  राष्ट्रीय एकता को सुदृढ करने के लिए हमारे ऋषियों ने ,आचार्यों ने छात्रों में राष्ट्रीयता का भाव  भरा ‌; ताकि देश बढ़ता रहे ।
  उन गुरुओं में आचार्य चाणक्य का नाम सर्वोपरि है ‌।
श्रीमद्भगवत गीता में भगवान कृष्ण कहते हैं-
“यो  माम् पश्यति सर्वत्र,सर्वम् च मयि पश्यति।
तस्याहं न प्रणश्यामि,स च मे न‌ प्रणश्यति।।6/30
वेदों में राष्ट्र को एक ब्रह्म के स्वरूप में देखा गया है ।और कहा है -राष्ट्रीय एकता बलवती हो ‌यहां के लोग तेजस्वी हों।यशस्वी हों। क्षत्रिय धर्म को धारण करें ।शत्रुओं का विनाश करें ‌यहां असीम समृद्धि व्याप्त हो। यहां के नागरिक बलवान ,योद्धा और राष्ट्रभक्त  हों।प्रकृति हमारे देश को धन और धान्य से परिपूर्ण करे ।
हम सत्य के मार्ग पर अग्रसर हों।तमस के मार्ग से प्रकाश के मार्ग पर अग्रसर हों ‌ और मृत्यु के मार्ग से अमृत के मार्ग  पर अग्रसर हों। संपूर्ण विश्व में ज्ञान ,प्रेम ,करुणा तेज का दीप  प्रज्ज्वलित करते रहे हैं और आने वाले समय में भी करते रहेंगे।
 हिंदी में भीअनेक कवियों नेराष्ट्रीय एकता का स्वर बुलंद किया और जनता में राष्ट्रीयता का भाव भरा। माखनलाल चतुर्वेदी , श्याम नारायण पांडे ,रामधारी सिंह “दिनकर”  मैथिली शरण गुप्त या जयशंकर प्रसाद हों इन सभी कवियों ने लिखने के माध्यम से राष्ट्रीय चेतना को ही प्रमुख रूप में प्रस्तुत किया ।
 जनता को देश के लिए संगठित होने का भाव दिया ।हमारे देश में जब-जब भी अन्याय ,अत्याचारों ,शोषण के मेघ आच्छादित हुए तब तब कवियों और लेखकों ने अपनी असिवत् प्रहार करने वाली लेखनी का प्रयोग कर आत्मबोध की भावना को भरने का महत्वपूर्ण कार्य किया।
 राष्ट्रकवि मैथिली शरण गुप्त के शब्दों में –
“हम कौन थे ,क्या हो गए और क्या होंगे अभी?
आओ! मिलकर के विचारें , ये समस्याएं सभी।।‌”
राष्ट्रीयता के भाव को प्रज्ज्वलित करते हुए राष्ट्र कवि रामधारी सिंह “दिनकर” लिखते हैं-
 “मही नहीं जीवित है मिट्टी से डरने वालों से, जीवित हैवह उसे फूंक सोना करने वालों से।”कुरूक्षेत्र
राष्ट्र प्रेम एक धारा, एक प्रवाह है ,जो अपने साथ बड़े से बड़े व्यवधानों को उखाड़ कर ले जाती है।जन आंदोलन के रूप में जब जब भी हिंसा का तांडव होता है ,तब कुछ ऐसे मानवतावादी साहित्यकार और लेखक उत्पन्न होते हैं जो समाज को मनुष्यता के पथ पर चलने का मार्ग प्रशस्त करते हैं। महाकवि तुलसीदास जी लिखते हैं –
“सब नर करहिं परस्पर प्रीति।
चलहिं स्वधर्म निरत श्रुतिनीति।।” रामचरितमानस
 ऐसा चिंतन केवल भारतीय साहित्यकार ही दे सकता है ‌जो आत्मबोध से विश्वबोध को जगाने का भाव  रखता हो ,ऐसा दैवीय आभा से ओतप्रोत मेरा देश सदैव विश्व के हित चिंतन में रत है।

भारत में राज्य सरकारों के ऋणों में भारी वृद्धि इन राज्यों की अर्थव्यवस्था को ले डूबेगी

किसी भी नागरिक, वाणिज्यिक संस्थान, राज्य सरकार अथवा केंद्र सरकार द्वारा उत्पादक कार्यों के लिए बाजार से ऋण लेना केवल तब तक ही सही हैं जब तक बाजार से लिए गए ऋण से कम से कम उस स्तर तक आय का अर्जन हो कि इस ऋण के ब्याज एवं किश्त का भुगतान इस आय से आसानी से किया जा सके। परंतु, किसी भी व्यक्ति अथवा संस्थान द्वारा बाजार से ऋण यदि अनुत्पादक कार्य के लिए लिया जा रहा है तो इस ऋण के ब्याज एवं किश्त का भुगतान करना निश्चित ही मुश्किल कार्य हो सकता है। आज भारत के कुछ राज्यों की बजटीय स्थिति पर भारी दबाव पड़ता हुआ दिखाई दे रहा है क्योंकि इन राज्यों ने बाजार से भारी मात्रा में ऋण लिया हैं एवं इस ऋण का उपयोग अनुत्पादक कार्यों यथा बिजली के बिल माफ करना, नागरिकों के खातों में सीधे राशि जमा करना, मुफ्त पानी उपलब्ध कराना, कुछ पदार्थों पर सब्सिडी उपलब्ध कराना, आदि के लिए किया जा रहा है। इन राज्यों की स्थिति इस कदर बिगड़ चुकी है कि इन्हें ऋणों पर अदा किए जाने वाले ब्याज एवं किश्तों के भुगतान हेतु भी ऋण लेना पड़ रहा हैं। यदि कुछ और वर्षों तक इन राज्यों की यही स्थिति बनी रही तो निश्चित ही यह राज्य दिवालिया होने की स्थिति में पहुंच जाने वाले हैं।

हाल ही के कुछ वर्षों में केंद्र सरकार द्वारा भी बाजार से ऋण लेने की राशि में वृद्धि देखी जा रही है। वर्ष 2019 में केंद्र सरकार पर 1.74 लाख करोड़ अमेरिकी डॉलर का ऋण बक़ाया था जो वर्ष 2025 में, लगभग दुगना होते हुए, बढ़कर 3.42 लाख करोड़ अमेरिकी डॉलर का हो गया है और वर्ष 2029 तक इसके 4.89 लाख करोड़ अमेरिकी डॉलर तक हो जाने की सम्भावना व्यक्त की जा रही है। भारत का सकल घरेलू उत्पाद आज 4.19 लाख करोड़ अमेरिकी डॉलर के स्तर पर पहुंच गया है। इस प्रकार, भारत सरकार का ऋण, भारत के सकल घरेलू उत्पाद के 80 प्रतिशत के स्तर को पार कर गया है। केंद्र सरकार एवं राज्य सरकारों की निर्भरता ऋण पर लगातार बढ़ती हुई दिखाई दे रही है जिसे देश की अर्थव्यवस्था के स्वास्थ्य की दृष्टि से उचित नहीं कहा जा सकता है। आज केंद्र सरकार पर 200 लाख करोड़ रुपए की राशि का ऋण बक़ाया है एवं समस्त राज्य सरकारों पर 82 लाख करोड़ रूपए का ऋण बकाया है, इस प्रकार केंद्र एवं राज्य सरकारों पर संयुक्त रूप से 282 लाख करोड़ रुपए का ऋण बक़ाया है जो देश के सकल घरेलू उत्पाद का 81 प्रतिशत है।

एक तरह से भारतीय अर्थव्यवस्था ऋण के ऊपर विकसित की जा रही है। जबकि, भारतीय आर्थिक दर्शन ऋण पर निर्भरता को प्रोत्साहन नहीं देता है। चाणक्य के अर्थशास्त्र में, राजा के पास कोष में आधिक्य होने का वर्णन मिलता है। राजा के पास यदि ऋण के स्थान पर कोष का आधिक्य होगा तब वह राज्य अपने नागरिकों के कल्याण पर अधिक राशि खर्च करने की स्थिति में रहेगा। अर्थात, प्राचीन भारत में राज्यों का आधिक्य का बजट रहता था, उसी स्थिति में वे राज्य अपने नागरिकों के कल्याण के कार्यों को तेज गति से चलाने की स्थिति में रहते थे। राज्य का खजाना ही यदि खाली हो तो वे किस प्रकार से राज्य के नागरिकों के लिए भलाई के कार्य कर सकते हैं। आज की स्थिति, बिलकुल विपरीत दिखाई देती है और आज कुछ राज्य बाजार से ऋण लेकर भी नागरिकों को मुफ्त में सुविधाएं उपलब्ध करा रहें हैं बगैर यह सोचे समझे कि आगे आने वाले समय में बाजार से लिए गए ऋण का भुगतान किस प्रकार किया जाएगा।

आज भारत में कुछ राज्यों की स्थिति यह है कि वे अपनी कुल आय का 55 प्रतिशत भाग कर्मचारियों को वेतन, पेन्शन एवं उधार ली गई राशि पर ब्याज के भुगतान करने जैसी मदों पर खर्च कर रहे हैं। जबकि, विभिन्न राज्य अपनी आय को बढ़ा सकने की स्थिति में नहीं है। कुछ राज्य तो वर्ष भर में जिस आय की राशि का आंकलन करते हैं उसे प्राप्त ही नहीं कर पाते हैं और बजटीय आय की राशि एवं वास्तविक आय की राशि में 11 प्रतिशत तक की कमी रहती है, जबकि इन राज्यों के खर्च नियमित रूप से बढ़ते जा रहे हैं और इस प्रकार इन राज्यों का बजटीय घाटा लगातार बढ़ता जा रहा है और अब यह असहनीय स्थिति में पहुंच गया है।

आज राज्यों की कुल आय का 84 प्रतिशत भाग स्थिर मदों पर खर्च हो रहा है। प्रदेश को आगे बढ़ाने एवं आर्थिक रूप से सम्पन्न बनाने के लिए कुछ राशि इन राज्यों के पास उपलब्ध ही नहीं हो पा रही है। पूंजीगत खर्चों में लगातार हो रही कमी के चलते इन राज्यों में नए अस्पतालों का निर्माण, नए रोड का निर्माण नए स्कूल हेतु भवनों का निर्माण नहीं हो पा रहा हैं, जिससे रोजगार के नए अवसर भी निर्मित नहीं हो पा रहे हैं।  पंजाब में कुल आय का 76 प्रतिशत भाग कर्मचारियों के वेतन, पेन्शन एवं ऋण पर ब्याज अदा करने जैसी मदों पर खर्च हो रहा है इसी प्रकार हिमाचल प्रदेश में 79 प्रतिशत एवं केरल में 71 प्रतिशत भाग उक्त मदों पर खर्च किया जा रहा है। साथ ही, कुछ राज्यों द्वारा अपनी कुल आय का भारी भरकम हिस्सा सब्सिडी जैसी मदों पर खर्च किया जा रहा है। जैसे, पंजाब द्वारा अपने बजटीय आय का 24 प्रतिशत भाग सब्सिडी पर खर्च किया जा रहा है। इसी प्रकार, हिमाचल प्रदेश द्वारा 5 प्रतिशत, आंध्रप्रदेश द्वारा 15 प्रतिशत, तमिलनाडु द्वारा 12 प्रतिशत एवं राजस्थान द्वारा 13 प्रतिशत राशि सब्सिडी पर खर्च की जा रही है। पंजाब द्वारा तो अपने बजट की 100 प्रतिशत राशि (24 प्रतिशत सब्सिडी पर एवं 76 प्रतिशत राशि वेतन, पेन्शन एवं ब्याज पर खर्च की जा रही है) सामान्य मदों पर खर्च की जा रही है और पूंजीगत खर्चों के लिए शून्य राशि बचती है।

विभिन्न राज्यों द्वारा पेन्शन की मद पर वर्ष 1980-81 में अपने राज्य की कुल आय का केवल 3.4 प्रतिशत की राशि का खर्च किया जा रहा था जो वर्ष 2021-22 में बढ़कर 24.3 प्रतिशत हो गया। इसी कारण से भारत सरकार ने पेन्शन अदा करने के नियमों में परिवर्तन किया था। आज यदि पेन्शन की नीति को नहीं बदला गया होता तो इस मद पर होने वाला खर्च बढ़कर 30 प्रतिशत के आसपास पहुंच जाता।

पिछले कुछ वर्षों के दौरान देश के कई राज्यों ने अपने पूंजीगत खर्च को घटाया है। वर्ष 2015-16 से वर्ष 2022-23 के बीच राज्यों ने अपने पूंजीगत खर्च में 51 प्रतिशत तक की कमी की है। दिल्ली में 38 प्रतिशत, पंजाब में 40 प्रतिशत, आंध्रप्रदेश में 41 प्रतिशत पश्चिम बंगाल में 33 प्रतिशत से पूंजीगत खर्चों में कमी दर्ज हुई है। आज कई राज्य सरकारें सब्सिडी प्रदान करने की मद पर अपने खर्चों को लगातार बढ़ा रहीं हैं एवं पूंजीगत खर्चों को लगातार घटा रही हैं, जो उचित नीति नहीं कही जा सकती है। इस प्रकार तो इन राज्यों की अर्थव्यवस्थाएं शीघ्र ही डूबने के कगार पर पहुंच जाने वाली हैं। इन राज्यों में हिमाचल प्रदेश, केरल, पश्चिमी बंगाल जैसे राज्य शामिल हैं।

सब्सिडी, वेतन, पेन्शन एवं ब्याज जैसी मदों पर लगातार बढ़ रहे खर्चों के कारण आज 15 राज्यों का बजटीय घाटा कानूनी रूप से निर्धारित 3 प्रतिशत की सीमा से ऊपर हो गया है। हिमाचल प्रदेश में बजटीय घाटा बढ़कर 4.7 प्रतिशत, मध्य प्रदेश में 4.1 प्रतिशत, आंध्रप्रदेश में 4.2 प्रतिशत एवं पंजाब में 3.8 प्रतिशत के खतरनाक स्तर पर पहुंच गया है।

इसी क्रम में ध्यान में आता है कि मध्य प्रदेश सरकार ने 5200 करोड़ रुपये का नया कर्ज लेने का निर्णय लिया है। यह फैसला इसलिए चर्चा में है क्योंकि भाईदूज के अवसर पर ‘लाड़ली बहना योजना’ के अंतर्गत 1.27 करोड़ महिलाओं के खातों में राशि समय पर नहीं पहुंच पाई थी। इसके बाद सरकार ने प्रदेश स्थापना दिवस पर भुगतान सुनिश्चित करने के लिए ऋण लेने का रास्ता चुना है। जब किसी राज्य को सामाजिक योजनाओं पर खर्च के लिए ऋण लेना पड़े तो यह स्थिति उस प्रदेश की अर्थव्यवस्था के लिए उचित नहीं कही जा सकती है। मध्यप्रदेश द्वारा ऋण लेने की रफ्तार पिछले कुछ वर्षों में कुछ तेज हुई है। मार्च 2024 तक मध्यप्रदेश राज्य पर 3.7 लाख करोड़ रुपये का कर्ज था, जो अब बढ़कर 4.8 लाख करोड़ रुपये तक पहुंच गया है। जबकि, मध्यप्रदेश की आय में इस रफ्तार से वृद्धि नहीं देखी जा रही है। वित्‍तीय अनुशासन की दृष्टि से यह स्थिति चिंताजनक है, क्योंकि ब्याज भुगतान का बोझ हर साल बढ़ता जा रहा है। हिमाचल प्रदेश, पंजाब, केरल एवं पश्चिम बंगाल की राह पर कहीं मध्यप्रदेश राज्य भी तो नहीं चल पड़ा है।

प्रहलाद सबनानी
सेवानिवृत्त उपमहाप्रबंधक,
भारतीय स्टेट बैंक
के-8, चेतकपुरी कालोनी,
झांसी रोड, लश्कर,
ग्वालियर – 474 009
मोबाइल क्रमांक – 9987949940
ई-मेल – prahlad.sabnani@gmail.com

अमीरी में अभिवृद्धि विद्रोह एवं संकट का बड़ा कारण

विश्व अर्थव्यवस्था पर किए गए हालिया अध्ययन विशेषकर जी-20 पैनल की रिपोर्ट ने एक बार फिर यह स्पष्ट कर दिया है कि धन और संपत्ति के वितरण में असमानता अब चरम पर पहुंच चुकी है। रिपोर्ट के अनुसार आज दुनिया की नई बनी संपत्तियों का लगभग तिरेसठ प्रतिशत हिस्सा मात्र एक प्रतिशत अमीर लोगों के पास है जबकि निचले पचास प्रतिशत गरीब लोगों के हिस्से में केवल एक प्रतिशत संपत्ति आई है। यह असमानता केवल आर्थिक नहीं बल्कि नैतिक, सामाजिक और मानवीय संकट का भी संकेत है। यह स्थिति एक आदर्श विश्व संरचना के लिये भी बड़ी बाधा है। यह ऐसी त्रासद, विद्रोहपूर्ण एवं विडम्बनापूर्ण स्थिति है जिसमें एक तरफ लोग मूलभूत सुविधाओं के अभाव में सड़कों पर उतर रहे हैं तो दूसरी ओर अमीर से और अमीर होते लोगों की विलासिता के किस्से तमाम हैं। उदारीकरण व वैश्वीकरण के दौर के बाद पूरी दुनिया में आर्थिक असमानता रूकने का नाम नहीं ले रही है, इससे एक बड़ी आबादी में विद्रोह एवं क्रांति के स्वर उभर रहे हैं।

सन् 2000 से 2024 के बीच विश्व अर्थव्यवस्था में अभूतपूर्व वृद्धि हुई, तकनीकी विकास हुआ, उत्पादन बढ़ा और वैश्वीकरण के नाम पर बाजारों का विस्तार हुआ, लेकिन इस विकास का लाभ समान रूप से नहीं बंटा। अमीर और अमीर होते गए, गरीब और गरीब। सन 2000 में जहां विश्व की कुल संपत्ति का पैंतालीस प्रतिशत हिस्सा शीर्ष एक प्रतिशत लोगों के पास था, वहीं 2024 तक यह बढ़कर तिरेसठ प्रतिशत से भी ऊपर पहुंच गया। इसी अवधि में आधी से अधिक आबादी के हिस्से की संपत्ति घटकर केवल एक प्रतिशत रह गई। यह आंकड़े केवल संख्या नहीं, मानवता की दिशा के संकेत हैं कि हम प्रगति के नाम पर असंतुलन का साम्राज्य खड़ा कर रहे हैं। जो विद्रोह का कारण बन रहा है, हिंसा एवं अलगाव का भी कारण बन रहा है।
जी-20 पैनल के अध्ययन के अनुसार, वर्तमान में वैश्विक स्तर पर असमानता भयावह स्तर तक जा पहुंची है। निस्संदेह, भारत भी इस स्थिति में अपवाद नहीं है। देश के सबसे अमीर एक फीसदी लोगों ने केवल दो दशक में अपनी संपत्ति में 62 फीसदी की वृद्धि की है। दुनिया की इस चौथी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था में अमीर लगातार अमीर होते जा रहे हैं। वहीं दूसरी ओर गरीब अभाव, तंगी एवं जहालत के दलदल से बाहर आने के लिए छटपटा रहे हैं। इस आर्थिक असमानता का ही नतीजा है कि अमीर व गरीब के बीच संसाधनों का असमान वितरण और बदतर स्थिति में पहुंच गया है। ऑक्सफैम इंडिया की रिपोर्ट बताती है कि देश के शीर्ष दस प्रतिशत लोगों के पास कुल संपत्ति का लगभग सतहत्तर प्रतिशत हिस्सा है जबकि निचले साठ प्रतिशत लोगों के हिस्से में मात्र 4.7 प्रतिशत संपत्ति आती है।
बीते दशक में अरबपतियों की संख्या दोगुनी हो गई लेकिन मजदूर, किसान और मध्यम वर्ग की आमदनी स्थिर रही या घटी। एक ओर महानगरों में गगनचुंबी इमारतें, विलासिता और अति उपभोग की चकाचौंध है, तो दूसरी ओर गाँवों और झुग्गियों में रोटी और दवा के लिए संघर्षरत लोग हैं। यही विरोधाभास हमारी विकास यात्रा का सबसे बड़ा प्रश्न बन गया है।
निस्संदेह, पैनल की हालिया रिपोर्ट नीति-निर्माताओं को असमानता के इस बढ़ते अंतर को पाटने के तरीके तलाशने और नये साधन खोजने के लिये प्रेरित करेगी। पिछले ही हफ्ते, केरल सरकार ने दावा किया था कि राज्य ने अत्यधिक गरीब तबके की गरीबी का उन्मूलन कर दिया है। हालांकि, कुछ विशेषज्ञों ने इन दावों को लेकर संदेह जताया है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के गरीबी मुक्त भारत के निर्माण का संकल्प भी आश्चर्यकारी सफलता के साथ आगे बढ़ रहा है। करीब 25 करोड़ लोगों को गरीब से बाहर लाया गया है। इस साल की शुरुआत में, विश्व बैंक ने भी बताया था कि भारत 2011-12 और 2022-23 के बीच 17 करोड़ लोगों को गरीबी की दलदल से बाहर निकालने में सफल रहा है। मोदी सरकार के जन-केंद्रित विकास और सामुदायिक भागीदारी के लाभों को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता है। निस्संदेह, इस पहल ने करोडों अत्यंत गरीब परिवारों को भोजन, स्वास्थ्य सेवा और आजीविका के बेहतर साधनों तक पहुंचने में मदद की है। फिर भी देश में धन-संपत्ति की असमानता केवल आर्थिक नहीं, बल्कि असंतोष और हिंसा की जड़ है। जब परिश्रमी व्यक्ति को उसका उचित मूल्य नहीं मिलता, जब समाज में अवसर और सम्मान का समान वितरण नहीं होता, तब भीतर आक्रोश और विद्रोह जन्म लेता है। प्रसिद्ध अर्थशास्त्री थॉमस पिकेटी ने कहा है कि जब पूंजी की आय दर आर्थिक वृद्धि दर से अधिक हो जाती है, तब समाज में असमानता बढ़ती है और लोकतंत्र की जड़ें हिल जाती हैं। आज यही हो रहा है। आर्थिक असंतुलन से सामाजिक असंतुलन उपज रहा है, अविश्वास और द्वेष का वातावरण बन रहा है।
कोरोना महामारी ने इस असमानता को और गहरा किया। जब करोड़ों लोग बेरोजगार और निर्धन हो गए, तब कुछ गिने-चुने उद्योगपतियों और कंपनियों की संपत्ति कई गुना बढ़ गई। इसका अर्थ यह है कि संकट भी अब वर्ग विशेष के लिए अवसर बन गया है। युद्धों, ऊर्जा संकट और बढ़ती महंगाई ने गरीब देशों की स्थिति को और भी कठिन बना दिया। अमीर देशों की बहुराष्ट्रीय कंपनियों ने इन संकटों से भी मुनाफा कमाया जबकि विकासशील देशों में भोजन, शिक्षा और स्वास्थ्य की उपलब्धता घटती गई। विकास का अर्थ हमने केवल सकल घरेलू उत्पाद की वृद्धि तक सीमित कर दिया है। समाज में नैतिकता, समानता, सहानुभूति और पर्यावरणीय न्याय जैसे तत्व विकास की परिभाषा से गायब हो गए हैं। अमीर देशों की कंपनियां गरीब देशों के संसाधनों का दोहन करती हैं, और गरीब देशों के श्रमिक उनके उत्पादन का आधार बन जाते हैं। यह एक नया आर्थिक उपनिवेशवाद है, जहां अब सत्ता नहीं, पूंजी शासन करती है।
गरीबी उन्मूलन की तस्वीर को केवल संख्याएं ही पूरी तरह नहीं उकेर सकती हैं। गरीबी कम करने के प्रयासों के दावों के मुताबिक जमीनी स्तर पर गुणात्मक बदलाव भी नजर आना चाहिए, आम जीवनस्तर उन्नत होता हुआ भी दिखना चाहिए। हालांकि, अर्थशास्त्री आमतौर पर संपत्ति कर लगाने के पक्षधर नहीं होते हैं, लेकिन सरकार को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि अति-धनी लोग सरकारी खजाने में अपना उचित योगदान दें। अब चाहे कोई अमीर हो या गरीब, सबका ध्यान विकास पर केंद्रित किया जाना चाहिए। तभी देश उत्पादकता के क्षेत्र में आगे बढ़कर गरीबी उन्मूलन की दिशा में सार्थक प्रगति कर सकता है। यह पहल ही नये भारत, विकसित भारत के सपने को साकार करने में मददगार साबित हो सकती है।
गरीबी-अमीरी के असंतुलन की स्थिति से निकलने का एक ही मार्ग है-धन का न्यायपूर्ण पुनर्वितरण, समान अवसर और समाजोपयोगी नीति। कर व्यवस्था ऐसी हो जो अमीरों से अधिक कर लेकर गरीबों की शिक्षा, स्वास्थ्य और जीवन स्तर को सुदृढ़ करे। अवसरों की समानता तभी संभव है जब शिक्षा और स्वास्थ्य सभी के लिए समान रूप से सुलभ हों। लोकतंत्र में पारदर्शिता और जवाबदेही आवश्यक है ताकि नीति पूंजी के लिए नहीं, नागरिक के लिए बने। परंतु केवल नीतियों से नहीं, दृष्टि से परिवर्तन आएगा। स्वामी विवेकानंद ने कहा था-“गरीब पापी नहीं, जीवित देवता हैं। उनकी सेवा ही ईश्वर की सेवा है।” दूसरी बड़ी बात है कि जब कुछ लोग सब कुछ पा लेते हैं, तो बाकी सब कुुछ खो देते हैं। इसलिये सरकारें वोट बैंक की राजनीति से इतर ईमानदारी से पहल करें तो गरीबी उन्मूलन की दिशा में सार्थक, समता एवं सतुलन के दृश्य स्थापित किये जा सकते हैं। चुनाव से पहले मुफ्त की रेवड़ियां बांटने की तेजी से बढ़ती प्रवृत्ति पर अंकुश लगाया जाना चाहिए। यह एक हकीकत है कि कोई भी सुविधा मुफ्त नहीं हो सकती। इस तरह की लोकलुभावनी कोशिशों से राज्यों का वित्तीय घाटा ही प्रभावित होता है। जिसकी कीमत लोगों को विकास योजनाओं से दूर रहकर ही चुकानी पड़ती है।
प्रेषकः

(ललित गर्ग)
लेखक, पत्रकार, स्तंभकार
ई-253, सरस्वती कंुज अपार्टमेंट
25 आई. पी. एक्सटेंशन, पटपड़गंज, दिल्ली-92
फोनः 22727486, 9811051133

बच्चों में साहित्य की समझ पैदा करने के लिए बाल साहित्य मेले आयोजित

झालावाड़ / बच्चों में साहित्य की समझ पैदा करने और उन्हें साहित्य से प्रेम उत्पन्न करने के किए मिशन बाल मन – 2025 के अंतर्गत
झालावाड़ के तीन विद्यालयों में बाल साहित्य मेलों का आयोजन किया गया। साहित्य परिषद राजस्थान इकाई झालावाड़ के अध्यक्ष सुरेश चंद्र निगम और पूर्व महामंत्री मोहनलाल वर्मा की पहल पर अन्य सदस्यों के साथ स्कूली बच्चों को साहित्य और संस्कृति की जानकारी दी गई और वस्तुनिष्ठ प्रश्नोत्तरी का आयोजन किया गया।
सुरेश चंद्र निगम ने बताया कि बच्चों को साहित्य से जोड़ने, लेखन अभिरुचि पैदा करने एवं विभिन्न साहित्यिक सृजनात्मक कार्य करने के लिए प्रेरित करने की दिशा में आयोजित इस कार्यक्रम में 240 छात्र – छात्राओं ने रूचिपूर्वक भाग लिया। उन्होंने बताया कि कोटा के लेखक डॉ. प्रभात कुमार सिंघल ने मिशन बाल मन तक – 25 के अंतर्गत बच्चों में साहित्य की समझ पैदा करने का व्यापक अभियान चला रखा है।
उन्होंने बताया कि सेंट मदर टेरेसा सीनियर सेकेंडरी स्कूल में साहित्य और संस्कृति प्रश्नोत्तरी प्रतियोगिता में कक्षा 6 से 9 तक के 40 बच्चों ने भाग लिया। ज़रीन खान कक्षा 9 प्रथम,  इमरान कक्षा 7 द्वितीय और  यामीन अली, कक्षा 7 तृतीय रहे। राजकीय उच्च माध्यमिक विद्यालय, तोपखाना झालावाड़ में  प्रधानाचार्य श्रीमती पूनम सेंगर के सहयोग से कनिष्ठ और वरिष्ठ वर्ग में सुलेख प्रतियोगिता का आयोजन किया गया, जिसमें 160 बच्चों ने भाग लिया । कनिष्ट वर्ग में सूरज कुमार कक्षा 8 प्रथम,   गुलशन  कक्षा 9 द्वितीय और
अजय कुमार कक्षा 6 तृतीय रहे। वरिष्ठ वर्ग में  प्रियांशु कक्षा 12 प्रथम,  गजपाल सिंह कक्षा 10 द्वितीय और  अंजलि कक्षा 11 तृतीय रहे। पी. एम. सीनियर सेकेंडरी स्कूल दुर्गपुरा जिला झालावाड़ में प्रधानाचार्य  हेमन्त शर्मा  के सहयोग से आयोजित प्रतियोगिता में 40 बच्चों ने भाग लिया।  नवीन मेघवाल कक्षा 12 प्रथम, कल्पना राज कक्षा 11 द्वितीय और बलराम कक्षा 10 तृतीय  रहे।

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प्रेषक : सुरेश चंद निगम
अध्यक्ष
साहित्य परिषद राजस्थान इकाई झालावाड़

स्टार्टअप एक्सेलेरेटर वेवएक्स ने 2 आईएफएफआई गोवा 2025 में वेव्स के लिए स्टार्टअप को आमंत्रित किया

आईएफएफआई गोवा 2025 में वेवएक्स के तहत वेव्स बाजार के लिए बूथ बुकिंग शुरू की। वेवएक्स बूथ वेव्स बाजार में उभरते एवीजीसी-एक्सआर और मीडिया-टेक स्टार्टअप को प्रदर्शित करेंगे, वैश्विक उपस्थिति और नेटवर्किंग के अवसर प्रदान करेंगे

सूचना और प्रसारण मंत्रालय ने भारतीय अंतरराष्ट्रीय फिल्म महोत्सव (आईएफएफआई), गोवा 2025 में वेवएक्स द्वारा संचालित वेव्स बाजार में विशेष स्टार्टअप शोकेस जोन, वेवएक्स बूथों के लिए बूथ बुकिंग शुरू करने की घोषणा की है।

इस पहल का उद्देश्य एवीजीसी-एक्‍सआर (एनीमेशन, विजुअल इफेक्ट, गेमिंग, कॉमिक और एक्सटेंडेड रियलिटी) और मनोरंजन क्षेत्र में उभरते स्टार्टअप को वैश्विक उद्योग के दिग्‍गजों, निवेशकों और प्रोडक्शन स्टूडियो से जुड़ने के लिए एक मंच प्रदान करना है।

20 से 24 नवंबर, 2025 तक आयोजित होने वाला वेव्स बाजार, फिल्म बाजार के निकट स्थित होगा, जो आईएफएफआई का प्रमुख नेटवर्किंग केंद्र है और दुनिया भर के फिल्म निर्माताओं, निर्माताओं तथा मीडिया पेशेवरों की प्रभावी भागीदारी के लिए जाना जाता है।

प्रत्येक बूथ 30,000 रुपये प्रति स्टॉल (शेयरिंग आधार पर) की मामूली लागत पर उपलब्ध होगा। भाग लेने वाले स्टार्टअप को निम्नलिखित सुविधाएं प्राप्त होंगी:

2 प्रतिनिधि पास
दोपहर का भोजन और जलपान
शाम का नेटवर्किंग अवसर
वैश्विक फिल्म, मीडिया और तकनीकी पेशेवरों के बीच प्रत्यक्ष उपस्थिति

इच्छुक स्टार्टअप wavex.wavesbazaar.com पर पंजीकरण करा सकते हैं। प्रश्न wavex-mib[at]gov[dot]in पर पूछे जा सकते हैं। सीमित स्टॉल उपलब्ध हैं और आवंटन ‘पहले आओ, पहले पाओ’ के आधार पर होगा।

आईएफएफआई, गोवा के बारे में
1952 में स्थापित, भारतीय अंतरराष्‍ट्रीय फिल्म महोत्सव (आईएफएफआई) एशिया के सबसे महत्वपूर्ण फिल्म समारोहों में से एक है, जो विश्व सिनेमा में उत्कृष्टता का उत्सव मनाता है और फिल्म निर्माताओं, कलाकारों तथा सिनेमा प्रेमियों के लिए एक मिलन स्थल के रूप में कार्य करता है। गोवा में प्रतिवर्ष आयोजित होने वाला आईएफएफआई, वैश्विक फिल्म जगत की भागीदारी को आकर्षित करता है और रचनात्मक सहयोग एवं अवसरों के लिए उत्प्रेरक का काम करता है। 56वां भारतीय अंतरराष्‍ट्रीय फिल्म महोत्सव (आईएफएफआई) 20 से 28 नवंबर, 2025 तक पणजी, गोवा में आयोजित किया जाएगा।

वेवएक्स के बारे में
वेवएक्स, भारत सरकार के सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय की एक राष्ट्रीय स्टार्टअप एक्सेलेरेटर और इनक्यूबेशन पहल है, जो एवीजीसी-एक्सआर और मीडिया-टेक इकोसिस्टम में नवाचार और उद्यमिता को बढ़ावा देने के लिए समर्पित है। अग्रणी शैक्षणिक, उद्योग और इनक्यूबेशन नेटवर्क के साथ सहयोग के माध्यम से, वेवएक्स क्रिएटर और स्टार्टअप को अपने उद्यमों को बढ़ाने में सक्षम बनाता है, जिससे भारत की बढ़ती रचनात्मक अर्थव्यवस्था में योगदान मिलता है।

भारतीय नौसेना अकादमी में भारतीय नौसेना क्विज – थिंक-25 का ग्रैंड फिनाले संपन्न

भारतीय नौसेना अकादमी (आईएनए), एझिमाला में भारतीय नौसेना क्विज थिंक-25 का ग्रैंड फिनाले 05 नवंबर, 2025 को बड़े उत्साह और जश्‍न के साथ संपन्न हुआ। नौसेना प्रमुख एडमिरल दिनेश के. त्रिपाठी ने इस अवसर पर मुख्य अतिथि थे। यह कार्यक्रम ज्ञान, नवाचार और भारत की समृद्ध समुद्री विरासत का जश्न मनाने वाली एक राष्ट्रव्यापी बौद्धिक यात्रा का समापन था।

“महासागर” थीम पर आधारित इस वर्ष के आयोजन में भारतीय नौसेना की अन्वेषण, उत्कृष्टता और युवाओं में समुद्र के प्रति जागरूकता को बढ़ावा देने की प्रतिबद्धता समाहित थी। देश भर के हजारों प्रतिभागियों में से, उत्तर, दक्षिण, पूर्व और पश्चिम क्षेत्रों का प्रतिनिधित्व करने वाले 16 स्कूलों ने सेमीफाइनल के लिए क्वालीफाई किया।

शीर्ष आठ टीमें ग्रैंड फिनाले में पहुंचीं। उन्होंने बुद्धि, टीमवर्क और जिज्ञासा की एक उत्साही प्रतियोगिता में प्रतिष्ठित थिंक-25 ट्रॉफी के लिए प्रतिस्पर्धा की।

जयश्री पेरीवाल हाई स्कूल, जयपुर; भारतीय विद्या भवन, कन्नूर; सुबोध पब्लिक स्कूल, जयपुर; शिक्षा निकेतन, जमशेदपुर; पद्म शेषाद्री बाला भवन सीनियर सेकेंडरी स्कूल, चेन्नई; कैम्ब्रिज कोर्ट हाई स्कूल, जयपुर; डॉ. वीरेंद्र स्वरूप एजुकेशन सेंटर, कानपुर; पीएम श्री जेएनवी, समस्तीपुर फाइनलिस्ट थे।

जयश्री पेरीवाल हाई स्कूल, जयपुर विजेता बना, जबकि पीएम श्री जवाहर नवोदय विद्यालय, समस्तीपुर ने उपविजेता स्थान प्राप्त किया, जिससे थिंक-25 का समापन एक उपयुक्त और प्रेरणादायक तरीके से हुआ।

इस अवसर पर अपने संबोधन में नौसेना प्रमुख ने युवा प्रतिभागियों के उत्साह, जागरूकता और भारत की समुद्री विरासत की गहरी समझ की सराहना की। उन्होंने युवाओं में जिज्ञासा पैदा करने और नवाचार को प्रोत्साहित करने के महत्व पर जोर देते हुए कहा कि ये ऐसे गुण हैं जो भविष्य में समुद्री क्षेत्र की अग्रणी हस्तियों और विचारकों को आकार देंगे।

ग्रैंड फिनाले का भारतीय नौसेना के आधिकारिक यूट्यूब और फेसबुक पेज पर सीधा प्रसारण किया गया। इसमें देशभर के स्कूलों, नौसेना प्रतिष्ठानों और समुद्री विषयों पर जिज्ञास रखने वाले लोगों ने बड़ी संख्‍या में उत्साहपूर्वक भाग लिया।

समय के साथ इस क्षेत्र में ज्ञान का निरंतर प्रसार हो रहा है। ऐसे में भारतीय नौसेना थिंक-26 की प्रतीक्षा कर रही है। इन प्रयासों से नवीन प्रतिभाओं को अन्वेषण, संलग्नता और उत्कृष्टता की दिशा में प्रेरणा मिलेगी तथा ज्ञान एवं अन्‍वेषण की यात्रा जारी रहेगी।

ओडिशा के राज्यपाल ने साहित्यकार दिनेश माली भाषा संरक्षक गौरव सम्मान से सम्मानित किया

कोटा / भुवनेश्वर । विश्व हिन्दी परिषद की ओडिशा शाखा द्वारा हाल ही में  ओडिशा के महामहिम राज्यपाल के निवास स्थान ‘राज भवन’ के अभिषेक हाल में आयोजित ‘सम्मान समारोह एवं कवि सम्मेलन’ के अवसर पर ओडिशा के राज्यपाल डॉ हरिबाबू कंभमपति के कर-कमलों से हिन्दी के प्रसिद्ध साहित्यकार सिरोही मूल के निवासी दिनेश कुमार माली को ‘भाषा संरक्षक गौरव सम्मान-2025’ से सम्मानित किया गया।
   इस अवसर पर विश्व हिन्दी परिषद के अध्यक्ष पद्मश्री,पद्मभूषण श्री यार्लगड्डा लक्ष्मी प्रसाद, महासचिव डॉ विपिन कुमार, उपाध्यक्ष देवी प्रसाद मिश्रा, राष्ट्रीय परामर्शदाता श्री प्रतीक प्रजापति, राज्यसभा सांसद सुश्री ममता मोहंता एवं ओडिशा प्रदेश अध्यकाश श्री विक्रमादित्य सिंह आदि उपस्थित थे। ज्ञात हो, राजस्थान के मूल निवासी दिनेश कुमार माली महानदी कोलफील्ड्स लिमिटेड के तालचेर के कनिहा क्षेत्र में महाप्रबंधक (संचालन) पर पर कार्यरत है।
         विशिष्ट संबलपुरी कवि पद्मश्री हलधर नाग पर ‘हलधर ग्रंथवाली’, महिमा धर्म के प्रवक्ता ओडिया संत कवि स्व॰ भीम भोई पर अपने उपन्यास ‘रश्मि-लोचन’, तालचेर प्रजामंडल के प्रथम गुमनाम शहीद बिका नाएक पर अपने उपन्यास ‘शहीद बिका नाएक की खोज’ जैसी अनेक कालजयी रचनाओं के माध्यम से राजस्थान साहित्य अकादमी एवं अन्य महत्वपूर्ण साहित्यिक संस्थाओं से सम्मानित लेखक दिनेश कुमार माली ओडिया और हिन्दी जगत में विख्यात हैं। उन्हें यह सम्मान मिलने से साहित्यिक जगत में खुशी का माहौल है।

वन्दे मातरम् की गूंज के 150 वर्ष

भारत का राष्ट्रीय गीत ‘वन्दे मातरम्’ इस वर्ष अपनी रचना के 150वें वर्ष में प्रवेश कर रहा है। 7 नवम्बर 2025 का यह दिन केवल एक गीत की वर्षगांठ नहीं, बल्कि उस राष्ट्रीय चेतना का उत्सव है जिसने सोए हुए भारत को जगाया था। यह गीत शब्दों से परे एक भावना है—भक्ति और स्वतंत्रता का संगम, जिसने पराधीन भारत में आशा का दीप प्रज्वलित किया। ‘वन्दे मातरम्’ वह अमर स्वर है जो साहित्य की सीमा लांघकर भारत की चेतना बन गया, जिसने जन-जन के हृदय में यह विश्वास जगाया कि मातृभूमि ही सर्वोच्च आराध्या है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इस अवसर पर अपने ‘मन की बात’ संबोधन में कहा—“वन्दे मातरम्… इसमें कितनी भावनाएँ, कितनी ऊर्जा समाई है। यह हमें माँ भारती के मातृत्व का अनुभव कराता है। यह हमारे हृदय की तरंगों का उद्गार है, एक ऐसा मंत्र जो 140 करोड़ भारतीयों को एकता की ऊर्जा से जोड़ता है।” उन्होंने देशवासियों से #VandeMataram150 अभियान के माध्यम से इसे जन-जन का उत्सव बनाने का आह्वान किया।

‘वन्दे मातरम्’ दो संस्कृत शब्दों से मिलकर बना है। ‘वन्दे’ शब्द संस्कृत धातु ‘वन्द्’ से निकला है, । यह धातु ऋग्वेद मंडल 10, सूक्त 151, मन्त्र 4 में मिलती है— “देवा वन्दे मनुष्याः।” अर्थात् मनुष्य देवताओं की वन्दना करते हैं। यहाँ “वन्दे” का अर्थ श्रद्धा और प्रणाम है, “मातरम्” का अर्थ माँ अर्थात भारत माता। अर्थात—“हे माँ, तुझे प्रणाम,” यह केवल व्याकरणिक नहीं, बल्कि एक गहरी भावनात्मक पुकार है।

1870 के दशक में बंगाल के महान साहित्यकार बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय ने ‘वन्दे मातरम्’ की रचना की और बाद में इसे अपने प्रसिद्ध उपन्यास ‘आनंदमठ’ (1882) में स्थान दिया। यह कृति संन्यासी विद्रोह की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि पर आधारित थी, जिसने 18वीं सदी में नवाब और ब्रिटिश सत्ता के विरुद्ध प्रतिरोध का स्वर उठाया था। बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय ने भारत को माँ के रूप में चित्रित किया—एक ऐसी देवी जो “सुजलाम् सुफलाम्” है, नदियों से सिंचित और फसलों से सम्पन्न। उस समय ब्रिटिश शासन ‘God Save Our Queen’ को राष्ट्रगान बनाना चाहता था, पर भारतीयों ने इसका तीव्र विरोध किया। आत्मसम्मान और राष्ट्रीय पहचान की तलाश में ‘वन्दे मातरम्’ भारतीय अस्मिता का प्रतीक बन गया।

 

इस गीत की पहली धुन जदुनाथ भट्टाचार्य ने तैयार की, जो भारतीय शास्त्रीय संगीत के राग ‘देश’ पर आधारित थी। बाद में इसके आधुनिक संगीत रूप का श्रेय पंडित विष्णु दिगंबर पलुस्कर को दिया गया, जो गंधर्व महाविद्यालय और अखिल भारतीय गंधर्व महाविद्यालय मंडल के संस्थापक थे। 1896 में रवीन्द्रनाथ ठाकुर ने भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के कलकत्ता अधिवेशन (बीटन स्क्वायर) में वन्दे मातरम्’ गाया, जहाँ यह राष्ट्रभावना का प्रतीक बन गया। तमिल कवि सुब्रमण्य भारती ने इसे तमिल में गाया, और पंतलु ने इसे तेलुगु में रूपांतरित किया। 1901 में दक्षिणा चरण सेन ने इसे पियानो की धुन पर प्रस्तुत किया, और 1905 में सरला देवी चौधरानी के गायन ने इसे भारत की स्वतंत्र आत्मा का अमर स्वर बना दिया।

लाला लाजपत राय ने लाहौर से ‘वन्दे मातरम्’ नामक पत्रिका निकाली, जो राष्ट्रवादी विचारधारा का प्रमुख माध्यम बनी। इसी समय भारतीय सिनेमा के अग्रदूत हीरालाल सेन ने 1905 में भारत की पहली राजनीतिक फिल्म बनाई, जो “वन्दे मातरम्” के उद्घोष के साथ समाप्त होती थी। बंगाल विभाजन के विरोध में जब आंदोलन प्रबल हुआ, तब यह गीत सड़कों, सभाओं और जेलों में प्रतिरोध का स्वर बन गया। 14 अप्रैल 1906 को बरिसाल कांग्रेस अधिवेशन में जब लॉर्ड कर्ज़न का पुतला जलाया गया, तो “वन्दे मातरम्” के नारों से आसमान गुंज उठा। अदालतों में भी जब क्रांतिकारियों पर मुकदमे चले, वे जजों के सामने यही नारा लगाते थे। ब्रिटिश सरकार ने इसे देशद्रोह घोषित किया। खुदीराम बोस और मातंगिनी हाजरा के अंतिम शब्द भी थे—“वन्दे मातरम्!” 1906 में अवनीन्द्रनाथ ठाकुर ने “भारत माता” का चित्र बनाया, जिसे देखकर सिस्टर निवेदिता ने कहा—“यह माँ भारती की आत्मा का साकार रूप है।” यह चित्र और ‘वन्दे मातरम्’ दोनों उस युग की एक ही भावना के दृश्य और श्रव्य रूप बन गए—माँ भारती का उदीपन-गीत, जिसने राष्ट्र की निद्रा तोड़ दी।

1907 में भीकाजी कामा ने जर्मनी के स्टटगार्ट में भारत का पहला तिरंगा ध्वज बनाया, जिसकी मध्य पट्टी पर “वन्दे मातरम्” अंकित था। यह ध्वज स्वतंत्रता का प्रतीक बनकर पहली बार अंतरराष्ट्रीय मंच पर लहराया। श्री अरविन्द घोष ने इसका अंग्रेज़ी अनुवाद “Mother, I bow to thee” शीर्षक से किया, जो 20 नवम्बर 1909 को उनके साप्ताहिक पत्र कर्मयोगिन में प्रकाशित हुआ। इसकी पहली रिकॉर्डिंग 1907 की मानी जाती है। 1952 की फिल्म ‘आनंदमठ’ में हेमंत कुमार ने इसका संगीत तैयार किया, जिसे लता मंगेशकर और के.एस. चित्रा ने स्वर दिया। पंडित रवि शंकर द्वारा ऑल इंडिया रेडियो के संस्करण की धुन रची गई। 2002 में बीबीसी वर्ल्ड सर्विस के वैश्विक मतदान में ‘वन्दे मातरम्’ को दुनिया के दस सर्वश्रेष्ठ गीतों में दूसरा स्थान मिला, जिससे यह भारत के गौरव और सांस्कृतिक आत्मा का प्रतीक बन गया।

‘वन्दे मातरम्’ की लोकप्रियता जितनी तेज़ी से बढ़ी, उतना ही विरोध भी उभरा। 1937 में कांग्रेस की समिति, जिसमें मौलाना अबुल कलाम आज़ाद और अन्य मुखय नेता थे, ने तय किया कि गीत के केवल पहले दो पदों को राष्ट्रीय गीत के रूप में अपनाया जाएगा। परंतु मुहम्मद अली जिन्ना ने इसका तीव्र विरोध किया। क़ायदे-आज़म पेपर्स (1938) के अनुसार, जिन्ना ने इसे “मूर्तिपूजक” बताया और कहा कि “भारत को देवी के रूप में चित्रित करने वाला यह गीत मुसलमानों के लिए अस्वीकार्य है।” इसके बावजूद, समिति ने साम्प्रदायिक सौहार्द हेतु दो पदों को ही मान्य किया।

24 जनवरी 1950 को डॉ. राजेन्द्र प्रसाद ने संविधान सभा में घोषणा की—“वन्दे मातरम् जिसने स्वतंत्रता संग्राम में ऐतिहासिक भूमिका निभाई, उसे ‘जन गण मन’ के समान सम्मान मिलेगा।” स्वतंत्रता के बाद भी इसकी प्रासंगिकता ही नहीं बनी रही, बल्कि और अधिक गहरी होती गई। आरिफ मोहम्मद ख़ान ने इसका उर्दू अनुवाद किया। 2019 में दिल्ली उच्च न्यायालय में याचिका दाखिल हुई जिसमें इसे ‘जन गण मन’ के समान कानूनी दर्जा देने की मांग की गई। 2022 में केंद्र ने दोहराया कि दोनों गीत समान रूप से पूजनीय हैं। 2017 में मद्रास उच्च न्यायालय ने इसके नियमित गायन का निर्देश दिया। सुप्रीम कोर्ट (2016) ने कहा—“राष्ट्रगीत और राष्ट्रगान का सम्मान केवल औपचारिक नहीं, आत्मिक श्रद्धा का प्रतीक होना चाहिए।”

राष्ट्रगीत ‘वन्दे मातरम्’ भारतीय चेतना के रूप में इस प्रकार रचा-बसा है कि इसके स्वर हर आंदोलन और हर संघर्ष में गूंज उठे। यह केवल इतिहास का पन्ना नहीं, बल्कि भारत की जीवित भावना है—एक ऐसा स्वर जिसने प्रतिरोध को एकता में, और भावों को जागरण में परिवर्तित किया। आज, जब भारत का युवा डिजिटल युग में नई पहचान गढ़ रहा है, यह गीत उसे अपनी जड़ों से जोड़ता है, यह स्मरण कराता है कि शब्दों की भी क्रांति होती है—और वह क्रांति है “वन्दे मातरम्।” यह भारत की आत्मा का अमर स्वर है—सुजलाम् सुफलाम्, मलयजशीतलाम्।

(लेखिका दिल्ली स्कूल ऑफ़ इकोनॉमिक्स से पीएच.डी. हैं और सामाजिक कार्यों में सक्रिय हैं)

आर्यसमाज द्वारा किये गये 150 ऐतिहासिक कार्य

  1. विधवा विवाह का प्रावधान किया और इसकी शुरुवात आर्यों ने अपने घर में विधवा बहुएँ ला करके उदाहरण उपस्थित किया।
  2. आर्यसमाज ने बहु विवाह को अवैदिक बताया और इसे स्त्री समाज के विरुद्ध सिद्ध किया।
  3. आर्यसमाज ने बाल विवाह का प्रतिरोध किया परिणाम स्वरूप अंग्रेजों को परतन्त्र भारत में विवाह की आयु का कानून बनाना पड़ा।
  4. आर्यसमाज ने परतन्त्र भारत में सर्वप्रथम कन्याओं के लिए विद्यालय खोले और विरोध होने पर अपनी बेटियों का प्रवेश करवाया।
  5. आर्यसमाज ने स्त्री शिक्षा को अनिवार्य बताया, समाज और राष्ट्र की उन्नति के लिए स्त्री शिक्षा की पुरजोर वकालत की।
  6. आर्यसमाज ने कन्याओं के लिए परतन्त्र भारत में गुरुकुल खुलवाए और विधर्मी होने से हिन्दू समाज की बेटियों को बचाया।
  7. आर्यसमाज ने सती प्रथा को अमानवीय बताया और विधवाओं को जीने का अधिकार दिलवाया।
  8. बाल विधवाओं के पुनरुद्धार के लिए आर्यसमाज ने सामाजिक लडाईयाँ लड़ी।
  9. बाल विधवाओं की शिक्षा, समाज में उनकी प्रतिष्ठा और उनके पुनर्विवाह के लिए न्यायिक प्रयास किए।
  10. स्त्रियों को पर्दा प्रथा से निकालकर, शिक्षा, राजनीति और सामाजिक कार्यों में उनकी भूमिका के लिए संघर्ष किया।
  11. स्त्रियों को नर्क का द्वार बताने वालों को सैद्धान्तिक रूप से पराजित किया। और उन्हें स्वर्ग पदात्री बताया।
  12. आर्यसमाज ने स्त्रियों को पैर की जूती बताने वालों के मुंह पर तमाचा मारा और बताया कि स्त्रियाँ तो सिर की ताज होती हैं।
  13. आर्यसमाज ने स्त्रियों को वेद पढ़ने का अधिकार दिलाया। उनके लिए गुरुकुल खोलकर वेद पढवाया और आज भी पढ़ा रहे हैं।
  14. आर्यसमाज ने स्त्रियों को गायत्री मंत्र बोलने, पढ़ने और जपने का अधिकार दिलाया।
  15. आर्यसमाज ने स्त्रियों को कर्मकांड करवाने का अधिकार दिलाया और उन्हें वेदों की विदुषी बनाकर यज्ञ में ब्रह्मत्व के आसन पर प्रतिष्ठित किया।
  16. आर्य समाज ने संतानों के निर्माण के लिए ‘माता निर्माता भवाति’ के उद्घोष के साथ माता को सबसे पहला शिक्षक बताया।
  17. आर्यसमाज ने परतन्त्रता के बाद सर्वप्रथम स्त्रियों को व्यासपीठ पर बैठाया और उनको उपदेश देने का अधिकार दिलाया।
  18. आर्यसमाज ने संसार को बताया की स्त्रियाँ भी ऋषिकायें और संन्यासिनी हो सकती हैं।
  19. आर्यसमाज ने “स्त्रियों में आधी आत्मा होती है या आत्मा नहीं होती है” इस बात का न केवल खण्डन किया अपितु समाज में पुरुषों के समानान्तर स्त्रियों की प्रतिष्ठा की।
  20. स्त्रियों को दान देने, बेचने और जडवस्तु मानने वालों को आर्यसमाज ने करारा जवाब दिया।
  21. आर्यसमाज ने दलित और पीछडे वर्ग की बेटियों के लिए निःशुल्क शिक्षा व्यवस्था की। उन्हें गुरुकुल में शिक्षित कर मुख्य धारा में जोड़ा।
  22. सदियों से चली आ रही मन्दिरों की देवदासी प्रथा का आर्यसमाज ने विरोध किया। नारी को दासी नहीं नेत्री बताया।
  23. आर्यसमाज ने नारियों के स्वाभिमान को जगाया उसको चौके से निकालकर विभिन्न क्षेत्रों में आगे बढाया।
  24. आर्यसमाज ने स्त्रियों को यज्ञोपवीत धारण करवाया।
  25. आर्यसमाज ने स्त्रियों के वेद पढने पर जिह्वा काटने और मन्त्र सुनने पर कान में सीसा पिघलाकर डालने जैसे अत्याचारों से मुक्त करवाया।
  26. आर्यसमाज ने परतन्त्र भारत में सर्वप्रथम शूद्रों के लिए विद्यालय खोले और सबके लिए समान पढने की व्यवस्था की।
  27. आर्यसमाज ने शूद्रों को वेद पढने का अधिकार दिलाया।
  28. आर्यसमाज ने शूद्रों को कर्मणा ब्राह्मण बनाना शुरु किया।
  29. आर्यसमाज ने कहा कि शूद्र कुल में उत्पन्न होकर भी कोई मनुष्य ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र भी हो सकता है।
  30. आर्यसमाज ने कथित रूप से शूद्र कुल में उत्पन्न हुए बच्चों को गुरुकुल में पढाना प्रारम्भ किया।
  31. आर्यसमाज ने कथित रूप से दलित शूद्र और नीचली जाति के कुल में उत्पन्न हुए बच्चों को वेद पढ़ाना प्रारम्भ किया।
  32. आर्यसमाज ने निर्धन बच्चों के लिए गुरुकुल में निशुल्क शिक्षा प्रारम्भ की।
  33. आर्यसमाज ने छुआछूत को मिटाने के लिए बहुत संघर्ष किया।
  34. आर्यसमाज ने अस्पृश्यता के कलंक धोने के लिए अनेक सामाजिक लडाई लडी।
  35. आर्यसमाज ने शूद्रों के अतिरिक्त गैर ब्राह्मण कुल में उत्पन्न हुए बच्चों को भी वेद न पढ़ने के अभिशप्त से मुक्त करवाया।
  36. आर्यसमाज ने दबे कुचले लोगों को शिक्षा के साथ सम्मान दिलवाया।
  37. आर्यसमाज ने वेद के बंद कपाटों को संपूर्ण मानव जाति के लिए खोल दिया।
  38. आर्य समाज ने दलित उत्थान के लिए उनको उत्पीड़न से बचाने के लिए बहुत सी योजनाएं चलाई।
  39. आर्यसमाज ने दलितों को मुख्य धारा में लाने के लिए उनको पढ़ाना शुरू किया।
  40. आर्यसमाज ने दलितों को ईसाइयों के कुचक्र से बचाया।
  41. आर्यसमाज ने दलितों एवं पिछड़ों को मुस्लिम धर्मान्तरण से बचाया।
  42. आर्यसमाज ने दलितों के लिए समान शिक्षा और समान कर्मकांड करने की व्यवस्था की।
  43. आर्य समाज ने दलितों को भारतीय समाज का अभिन्न अंग बताया।
  44. आर्यसमाज ने बताया कि मनु स्त्रियों और दलितों के विरोधी नहीं है।
  45. आर्यसमाज ने मनुस्मृति को वेदों के अनुकूल बताया।
  46. आर्यसमाज ने वर्ण व्यवस्था को कर्म पर आधारित बताया।
  47. आर्यसमाज में जन्मना वर्ण व्यवस्था को वेद विरुद्ध बताया।
  48. आर्यसमाज ने कर्मणा व्यवस्था को अपने गुरुकुलों पर और आर्य समाज पर लागू करके उसको वेद आधारित सिद्ध किया।
  49. आर्यसमाज ने जातिवाद का पुरजोर विरोध किया।
  50. आर्यसमाज ने विदेशियों द्वारा दिए गए ‘हिन्दू’ शब्द की जगह भारतीय मूल ‘आर्य’ शब्द की वकालत की।
  1. आर्य समाज ने जातिवाद को भारत के पतन का कारण माना और जातिवाद के मकड़जाल से भारतीय समाज को मुक्त करने के लिए अभी भी संघर्ष कर रहा है।
  2. आर्यसमाज ने भारतीयों को आर्ष शिक्षा और अनार्ष शिक्षा के भेद को बताया।
  3. आर्य समाज ने सर्वप्रथम वेदों पर आधारित आर्य शिक्षा के गुरुकुल चलाए।
  4. आर्यसमाज ने चारों वेदों को वैदिक संस्कृति का मूल माना।
  5. आर्यसमाज चारों वेदों को ईश्वर का अमृत ज्ञान मानता है उसमें किसी भी प्रकार का इतिहास नहीं मानता।
  6. आर्यसमाज ने वेदों को शंखचूड़ ले गया है इस भ्रांति का निवारण किया और वेद उपलब्ध कराए।
  7. आर्य समाज महर्षि पाणिनि द्वारा व्याकरण अनुसार किए गए भाष्य वेदों के सच्चे अर्थों को मानता है।
  8. आर्य समाज ने बताया कि वेद सृष्टि के आदि के हैं वेदों में सभी सत्य विद्याएं सूत्र रूप में विद्यमान है।
  9. आर्य समाज ने बताया कि पुराण व्यस्कृत नहीं है और वे वेदों के अनुकूल भी नहीं है।
  10. आर्य समाज वेद विरुद्ध ईश्वर के अवतारवाद को नहीं मानता।
  11. आर्य समाज मूर्ति में ईश्वर की पूजा का विधान नहीं मानता, वह ईश्वर को सरल व्यापक मानकर उसकी संध्या करने का विधान मानता है।
  12. आर्य समाज ने कर्म फल पर आधारित पुनर्जन्म व्यवस्था को बताया।
  13. आर्य समाज ने ईश्वर एक है और वह निराकार सर्वशक्तिमान और सर्वव्यापक है इसका बहुत प्रचार किया।
  14. आर्य समाज ने ईश्वर की प्राप्ति के लिए योग के आठ अंग को क्रियात्मक रूप से लोगों को सिखाया।
  15. आर्यसमाज ने नास्तिकता की आंधी के बीच पुनर्जन्म और मोक्ष के सिद्धांतों का व्यापक प्रचार किया।
  16. आर्य समाज ने यह बताया कि जीवात्मा कभी ईश्वर में विलीन नहीं होता।
  17. आर्य समाज ईश्वर और जीव के अलग-अलग अस्तित्व को मानता है।
  18. आर्य समाज ने बताया कि मुक्ति के पश्चात फिर जीवात्मा लौटता है, मध्यकाल में जीवात्मा को ब्रह्म में विलीन होना मान लिया जाता था।
  19. आर्यसमाज ने लाखों गृहस्थियों को पंच महायज्ञ सिखाया जो अब पीढियों से इसका पालन कर रहे हैं।
  20. आर्य समाज ने वेदों पर आधारित आश्रम व्यवस्था की सर्वोपयोगी व्याख्या संसार को बताई।
  21. आर्य समाज में शरीर की अवस्था के अनुसार ब्रह्मचर्य, गृहस्थ, वानप्रस्थ और संन्यास आश्रम को समाज के लिए उपयोगी माना है।
  22. आर्य समाज ने यज्ञ को मनुष्य के समाज और प्रकृति के लिए सर्वोदयोगी माना और सिद्ध किया।
  23. आर्यसमाज यज्ञ में हिंसा स्वीकार नहीं करता, आर्यसमाज ने यज्ञ के अंदर में पशु हिंसा का घोर विरोध किया है।
  24. आर्यसमाज ने यज्ञ के वैदिक स्वरूप को संसार के सामने में उपस्थित किया आज कराने के इच्छुक लोग आर्यसमाज में आते हैं।
  25. आर्यसमाज ने संसार के उपकार के लिए यज्ञ को विज्ञान के धरातल पर स्थापित किया और इसकी वैज्ञानिकता को सिद्ध किया।
  26. आर्यसमाज किसी भी प्रकार की बलि प्रथा का विरोध करता आ रहा है।
  27. आर्यसमाज ने मंदिरों में दिए जाने वाली बलि प्रथा के विरुद्ध बहुत से शास्त्रार्थ किये और विजय प्राप्त की है।
  28. आर्यसमाज पशु-पक्षियों को मार कर खाने को घोर पाप मानता है और छुडाने के लिए प्रयासरत है।
  29. आर्यसमाज ने सदैव शाकाहार का समर्थन किया है क्योंकि शाकाहार के द्वारा प्रकृति का सन्तुलन उत्तम होता है।
  30. आर्यसमाज मांसाहार को वेद विरुद्ध और मनुष्य की प्रकृति के प्रतिकूल मानता है।
  31. आर्यसमाज जीव हत्या को पाप और प्रकृति के विनाश का कारण मानता है।
  32. आर्यसमाज ने वेद पर आधारित कर्म फल सिद्धांत का प्रचार किया और इस पर मौलवियों और पादरियों से शास्त्रार्थ किए हैं।
  33. आर्यसमाज ने इस सिद्धांत का प्रचार किया कि प्रकृति अपने आप संसार का निर्माण नहीं करती इसका बनाने वाला ईश्वर है।
  34. आर्यसमाज ने अद्वैतवाद और विशिष्ट द्वैतवाद की आंधी में भारतीयों में इस सिद्धांत का भी प्रचार किया कि जीव और ईश्वर दोनों अलग-अलग हैं।
  35. आर्यसमाज ने बडे अन्तराल के बाद पूरे विश्व को त्रैतवाद के बारे में समझाया कि ईश्वर, जीव और प्रकृति तीन अनादि पदार्थ होते हैं।
  36. आर्यसमाज सदैव सत्य के प्रचार प्रसार में उद्यत रहता है।
  37. आर्यसमाज ने पाखंड और अंधविश्वास का विरोध करके समाज को बहुत बड़ी आपदा से रक्षा करता आया है।
  38. आर्यसमाज जादू, टोना, टोटका इत्यादि का खंडन करता है।
  39. आर्यसमाज ने गण्डे-ताबीज आदि के प्रपंचों से लाखों लोगों को मुक्त करवाया है।
  40. आर्यसमाज ने भूत-प्रेत, जादू-टोना, टोटके के भय से समाज की रक्षा की है।
  41. आर्यसमाज हाथ की रेखाओं में भविष्य को नहीं मानता, इसके लिए लोगों को जागरूक करता आया है।
  42. आर्यसमाज ने पानी के जहाज की यात्रा को पाप मानने का निवारण कराया, जिससे यात्रा और व्यापार करने में सुगमता हुई।
  43. आर्यसमाज ने बहुत बडे स्तर पर लोगों को समझाया कि आत्मा कभी नहीं भटकती और किसी को कोई नुकसान नहीं करती।
  44. आर्यसमाज ने वेद के प्रचार-प्रसार को अपना उद्देश्य माना और इस पर किए जाने वाली भ्रान्तियों का निवारण किया।
  45. आर्यसमाज ने परतंत्र भारत में आर्ष शिक्षा के पुनः गुरुकुल खोलें, आर्य समाज ने डीएवी स्कूल चलाकर शिक्षा के क्षेत्र में ऐतिहासिक कार्य किया।
  46. आर्यसमाज ने कन्याओं के लिए सबसे पहले पृथक पाठशाला खोली।
  47. आर्यसमाज ने सर्वप्रथम यह बताया कि वेद में केवल जादू, टोना, टोटका के मंत्र नहीं हैं, वेदों मे परा और अपरा दोनों विद्यायें हैं।
  48. आर्यसमाज ने देश को सपेरो का देश है इस अभिशाप से मुक्ति दिलायी।
  49. आर्य समाज ने यह बताया कि वेद सब सत्य विद्याओं का पुस्तक है वेद कोई गडरियों का गीत नहीं है।
  50. आर्यसमाज ने ये सिद्ध किया कि वेदों के मंत्र और विज्ञान के सूत्र एक समान हैं।
  1. आर्यसमाज ने जन्म पत्रिका का घोर विरोध किया और इसे मरण पत्रिका बताया क्योंकि यह वेद विरुद्ध है।
  2. आर्यसमाज अनेक अनेक ईश्वरवाद का खण्डन किया। एक ही ईश्वर की उपासना रीत सिखलाई जिससे लाखों लोगों का कल्याण हुआ।
  3. आर्यसमाज ने मनुष्य मात्र के लिए एक जैसी शिक्षा पद्धति और अनिवार्य शिक्षा का पुरजोर प्रचार किया।
  4. स्वतंत्रता आंदोलन में भाग लेने वाले अधिकतर क्रांतिकारी आर्य समाज से प्रेरित थे।
  5. महान स्वतंत्रता सेनानी लाला लाजपत राय आर्य समाज को अपनी मां बताते थे।
  6. पंडित राम प्रसाद बिस्मिल बचपन में आर्य समाज से जुड़ चुके थे, आर्यसमाज के लिए उन्होंने घर तक त्याग दिया था।
  7. अमर बलिदानी सरदार भगत सिंह का सारा परिवार आर्य समाज से प्रभावित था।
  8. आर्य समाज के विद्वान पंडित लोकनाथ तर्क वाचस्पति ने सरदार भगत सिंह का यज्ञोपवीत संस्कार करवाया था।
  9. भगत सिंह के दादाजी अर्जुन सिंह का महर्षि दयानंद सरस्वती ने यज्ञोपवीत कराया था।
  10. आर्य समाज कलकत्ता 19 विधान सरणी में अमर सरदार भगत सिंह, क्रांतिकारी दुर्गा भाभी के साथ दो बार आकर ठहरे थे।
  11. आर्य समाज वेद पर आधारित शासन व्यवस्था का अनुमोदन करता है।
  12. आर्य समाज रामकृष्ण आदि को दिव्य महापुरुष मानकर उनके चरित्र की पूजा करता है।
  13. आर्य समाज ने मूर्तिपूजा को भारत की अवनति का एक कारण माना और लोगों को समझाने में सफल हुआ है।
  14. आर्य समाज ने मनुष्य की उन्नति के लिए 16 संस्कारों पर अत्यधिक कार्य किया और इसको संपन्न कराने वाले हजारों पुरोहित तैयार किये।
  15. आर्य समाज ने हिंदुओं को मृतक श्राद्ध और उसके पाखंड से निकालने के बहुत से प्रयास किए हैं।
  16. आर्य समाज संस्कृत भाषा को सर्वोपरि मानता है।
  17. आर्य समाज संस्कृति के प्रचार-प्रसार में सदैव संलग्न रहता है।
  18. आर्य समाज महर्षि पाणिनि द्वारा रचित व्याकरण को सर्वोपरी मानता है।
  19. आर्य समाज चार वेद संहिताओं को ईश्वर कृत मानता है।
  20. आर्य समाज ने चारों वेदों का अनुसरण करने वाले ग्रन्थों का आर्ष ग्रंथों के रूप में प्रचार-प्रसार किया है।
  21. आर्यसमाज ने विधर्मियों के द्वारा किए जा रहे आक्रमणों का शास्त्रोक्त तरीके से शास्त्रार्थ में विजय प्राप्त करके सनातन की रक्षा की है।
  22. श्याम जी कृष्ण वर्मा महर्षि दयानंद के शिष्य थे जिन्होंने स्वतंत्रता आंदोलन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी।
  23. आर्यसमाज ने स्वतंत्रता से पहले भारतीयों के लिए पंजाब नेशनल बैंक खोलने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
  24. आर्यसमाज महर्षि दयानन्द द्वारा रचित सत्यार्थ प्रकाश को हिन्दू जाति के लिए सर्वोच्च उपयोगी ग्रंथ मानता है।
  25. आर्यसमाज अपने साप्ताहिक सत्संग में नित्य सत्यार्थ प्रकाश का स्वाध्याय एवं पठन-पाठन करता है।
  26. आर्यसमाज ने प्रारंभ काल से ही गौ रक्षा के लिए अनेक आन्दोलन किए और आज भी कर रहा है।
  27. आर्यसमाज के संस्थापक महर्षि दयानन्द सरस्वती ने रेवाड़ी में सर्व प्रथम गौशाला स्थापित की थी और गौ हत्या रोकने के लिये हस्ताक्षर अभियान चलाया था।
  28. आर्यसमाज ने प्रारंभ से ही भारतीय वेशभूषा और पहनावा को प्रधानता दी है।
  29. आर्यसमाज हिन्दी को पूरे भारत की जोड़ने की भाषा मानता है। आर्य समाज ने हिंदी के उत्थान के लिए बहुत से ऐतिहासिक कार्य किए हैं।
  30. आर्यसमाज ने ‘नमस्ते’ को वैश्विक और वैदिक अभिवादन बताया। जिसे आज सम्पूर्ण विश्व स्वीकार कर रहा है।
  31. आर्यसमाज ने विश्व पटल पर यह सिद्ध किया है कि ‘वैदिक-धर्म’ ही संसार का सबसे प्राचीन और एकमात्र धर्म है।
  32. आर्यसमाज ने ‘वेद’ को अपना और पूरे संसार का धर्म ग्रंथ मानने में अथक प्रयास किया बहुत कुछ सफलता प्राप्त की है।
  33. आर्यसमाज एक राष्ट्र, एक भाषा और एक ध्वज और एक संस्कृति की वकालत करता है।
  34. आर्यसमाज ने यह सर्वप्रथम भारतीयों को बताया कि आर्य कहीं बाहर से नही आए हैं।
  35. आर्यसमाज प्रत्येक भारतीय में अध्यात्म और देशभक्ति की भावना भरता है।
  36. आर्यसमाज सनातन का सबसे अच्छा प्रहरी है और यह कार्य उसने अनेकों बार सिद्ध किया है।
  37. आर्यसमाज से प्रभावित होकर वीर सावरकर ने कहा था कि “आर्य समाज के रहते हुए कोई भी विधर्मी अपनी शेखी नहीं बघार सकता।”
  38. आर्यसमाज से प्रभावित होकर हिंदुओं के बड़े नेता पं मदन मोहन मालवीय “सत्यार्थ प्रकाश” का वितरण किया करते थे। मालवीय ने कहा था कि “सनातन रूपी खेती की आर्य समाज बाड़ है।”
  39. आर्यसमाज के सर्वोच्च नेता स्वामी श्रद्धानंद जामा मस्जिद की मीनार से वेद मंत्र कर के द्वारा भाषण करने वाले पहले आर्य संन्यासी और एक मात्र भारतीय थे।
  40. आर्यसमाज के महापुरुष में पं लेखराम, पं गुरुदत्त विद्यार्थी, महात्मा हंसराज आदि सैंकड़ो अनमोल रत्न थे जो आर्यसमाज की भट्टी से तैयार हुए थे।
  41. आर्यसमाज ने भारतीय पर्वों को शुद्धता से मनाने की परम्परा को पुनर्जीवित किया।
  42. आर्यसमाज ने भारतीय महापुरुषों पर उछाले जा रहे कलंकों को धोने का कार्य किया और उनकी उज्ज्वल कीर्ति बनाए रखा है।
  43. आर्यसमाज ने हैदराबाद सत्याग्रह के विशेष आंदोलन अनेक बलिदान देकर जीता था। हिंदुओं की पूजा पद्धति एवं मंदिरों के लिए लड़ाइयां लड़ी थी।
  44. आर्यसमाज ने अब तक करोड़ों लोगों को शुद्ध करके उनकी घर वापसी कराई है।
  45. आर्यसमाज ने “सत्यार्थ प्रकाश” जैसे ग्रन्थ के द्वारा बहुत से लोगों का जीवन परिवर्तन किया है।
  46. आर्यसमाज जातिवाद, भाषावाद, प्रांतवाद, आपसी फूट को दूर करके एक मानवतावाद का सदैव प्रचारक रहा है।
  47. आर्यसमाज ने मनुस्मृति, गीता, रामायण, महाभारत आदि पर हो रहे आक्षेपों का सदैव वेदानुकूल उत्तर दिया है और इन ग्रंथो का शोध कार्य किया है।
  48. आर्यसमाज अपने साप्ताहिक सत्संग में नित्य सत्यार्थ प्रकाश का स्वाध्याय एवं पठन-पाठन करता है।
  49. आर्यसमाज ने प्रारंभ कल से ही गौ रक्षा के लिए अनेक आन्दोलन किए और आज भी कर रहा है।
  50. आर्यसमाज के संस्थापक महर्षि दयानन्द सरस्वती ने रेवाड़ी में सर्व प्रथम गौशाला स्थापित की थी और गौ हत्या रोकने के लिये हस्ताक्षर अभियान चलाया था।

[यह लेख आचार्य राहुलदेव जी द्वारा समस्त जन साधारण, आर्यजनों एवं सुधीपाठकों की जानकारी एवं ज्ञानवर्धन के लिए प्रस्तुत किया गया है। इस लेख में आर्यसमाज के 150 वर्षों के इतिहास में आर्यसमाज द्वारा किए गए 150 ऐतिहासिक कार्यों को उद्धृत किया गया है।]

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