Home Blog Page 6

उत्तर प्रदेश के नगर के गौतम राज्य का इतिहास

उत्तर प्रदेश के बस्ती जिले के अंतर्गत आने वाला नगर राज्य या नगर रियासत गौतम राजपूत राजाओं द्वारा शासित था। यह एक महत्वपूर्ण ऐतिहासिक रियासत रही है। राष्ट्रपति पुरस्कार प्राप्त पूर्वांचल के महान कवि साहित्यकार एवं इतिहासविद् डा. मुनिलाल उपाध्याय ‘‘सरस’’ ने अनुश्रुतियों को आधार लेकर लिखा है कि तेरहवीं शताव्दी के आरम्भ में अलाउद्दीन खिलजी (1296- 1316) के विजय अभियान के समय में अरगल राज्य के गौतम गोत्रीय नृपति घोलराव अपना पैतृक राज्य त्याग कर उत्तर कोशल के घाघरा  नदी के उत्तर कुवानों नदी पर्यन्त तक के इस भूभाग पर यहां आकर बस गए थे।

चौदहवीं शताब्दी के आरंभ में अलाउद्दीन खिलजी के उत्तर भारत में आक्रामक विजय अभियानों विशेषकर1301-1311 के दौरान के चलते, अरगल राज्य के गौतम गोत्री राजपूत नृपति घोलराव ने अपना राज्य छोड़ दिया था । वे अवध के बस्ती क्षेत्र में आकर बस गए और यहाँ अपनी शक्ति का पुनर्गठन किया। यह पलायन खिलजी के खौफ और राज्य विस्तार नीति का परिणाम स्वरूप बना हुआ था। धीरे धीरे यहां सरयू नदी से कुवानों नदी के बीच एक लघुराज्य की स्थापना किये थे। प्रतीत होता है पहले बैरागल (राम जानकी मार्ग) पर बाद में नगर खास/बाजार के राजकोट में अपनी राजधानी बनाये थे।

बैरागल (राम जानकी मार्ग) में हुई थी लड़ाई  –

नगर साम्राज्य पहले राहिला नामक डोम कटार राजाओं के अधीन रहा। यह क्षेत्र प्राचीन काल से ही समृद्ध और स्वतंत्र शासकों के अधीन रहा है। अर्गल के महाराजा ने राव जगदेव को बैरागल (अब का नगर) का राजा घोषित किया था। पठानों की बहुत बड़ी सेना नई राजधानी की तरफ आगे बढ़ी। राव जगदेव ने उनका मुकाबला करते हुए उनके कमानडर को मौत के घाट उतार कर बैरागल की लड़ाई जीत लिया।

17वीं-18वीं शताब्दी तक आते आते नगर के गौतम राजाओं का इस क्षेत्र पर काफी प्रभाव हो गया था और बाद में अंग्रेजी शासन के दौरान भी इनका उल्लेख मिलता है। राव जगदेव, अरगल का एक कमांडर, रिहालपारा के पुराने परगना में निरीक्षण अभियान पर थे। उस समय इस भूभाग पर राहिला नामक डोमकटार का अधिकार था। वह गौतम राजपूतों से पराजित हुआ। बैरागल का युद्ध अर्गल के महाराजा ने उनकी बहादुरी के लिए उन्हें (बैरागल) नगर के पड़ोसी क्षेत्र का राजा घोषित किया।

राजा जगदेव सिंह ने नगर राजधानी बनाई –

इस वंश के गौतमवंशी संस्थापक जगदेव को यहां आने पर दहेज में 12 गांव मिले हुए थे। इनकी पत्नी विसेन वंशी क्षत्रिय कन्या थी। राव जगदेव, अरगल के एक कमांडर, रिहालपारा के पुराने परगना में अभियान पर थे। उस समय नगर पर राहिला नामक डोमकटार का अधिकार था। ये लोग गौतम राजपूतों द्वारा पराजित कर भगा दिये गये थे।

खूबसूरत और आकर्षक चन्दो ताल-

प्राकृतिक सौंदर्य को खुद में समेटे बस्ती जनपद का चन्दो ताल देखने में बेहद ही खूबसूरत और आकर्षक है। बाद में इस ताल को पक्षी विहार का भी दर्जा प्राप्त हो गया है। यह बस्ती जिला मुख्यालय से 8 किमी दूर चंदों गांव में स्थित है। 5 किमी. लम्बी व 750 हेक्टेयर में फैला यह ताल 17 वीं शताब्दी का बना हुआ है।17 वीं शताब्दी में यह ताल राजभरो के चंद्रनगर राज्य का हिस्सा हुआ करता था। इनके अवशेष यहां पर तालाब की खुदाई के दौरान मिले भी थे। राव जग देव गौतम ने चन्दो तालाब के किनारे राजा का कोट नामक अपना किला बनवाया था। इसे राजा का कोट कहा जाता है। वर्तमान समय में यह अवशेष रूप में देखा जा सकता है।

बैरागल की लड़ाई के बाद राजा घोषित-

अर्गल के महाराजा ने राव जगदेव की बहादुरी के लिए उन्हें बैरागल (वर्तमान नगर) का राजा घोषित किया। उनके राज्याभिषेक के बाद, बड़े सैनिकों के साथ पठानों ने बैरागल के नए राज्य पर चढ़ाई कर दी थी। राव जगदेव ने वीरतापूर्वक युद्ध किया। पठानों के सेनापति को मार डाला और बैरागल की लड़ाई जीत ली। राजा भगवन्त राव –

जगदेव के पौत्र राजा भगवन्त राव ने एक अफगान गवर्नर की हत्या कर दी थी।  अफगानों के आक्रमण में अपना क्षेत्र खो दिया था।

राजा चंदे राव-

बाद में, भगवंत राव के बेटे राजा चंदे राव ने अफगानों के सूबेदार को हरा उसे मौत के घाट उतार दिया और अपना  नगर राज्य पुनः प्राप्त कर लिया।

डोंगरापुर युद्ध-

कई पीढ़ियों बाद राजा गजपति सिंह यहां के राजा हुए उनके उत्तराधिकारी उनके सबसे बड़े पुत्र, राजा हरबंस सिंह थे जो  नगर के राजा बने। एक युद्ध में राजा हरबंस सिंह वीरगति मिली जिसके परिणाम स्वरूप राजा गजपति को 60 गाँव गँवाने पड़े थे। उन्होंने डोंगरापुर युद्ध में अपनी विरासत का हिस्सा खोया था। डोंगरापुर संभवतः कलवारी के पास स्थित डींगरापुर मुस्तकम, डींगरापुर एहतमाली गांव हो सकता है। जिसके युद्ध में हरबंस सिंह  वीरगति को प्राप्त हुए और इस एवज़ में राजा गजपति को 60 गाँव गँवाने पड़े थे। इसके बाद उनके भाई राजा उदय प्रताप सिंह नगर राज्य के उत्तराधिकारी बने।

 राजा गजपति राव के भाइयों के उत्तराधिकारी अभी भी ग्राम पौंदा, भैंनसी तथा हर्रैया व बस्ती तहसील के कुछ गांवों में बसे हुए हैं।

गनेशपुर भी रहा मुख्यालय –

राजा गजपति राव ने अपना मुख्यालय गनेशपुर ले आये थे। उनके चार पुत्रों को गनेशपुर के 54 गांव प्राप्त हुये थे। ये नगर के गौतम वंशी राजाओं के हिस्से में आया था। इन लोगों ने यहां मिट्टी का एक किला बनवाया था जिसके किनारे -किनारे खाईयां लगवाई थी। इसके चारों ओर बॉस के बेड़े से सुरक्षित घेरा बनाया गया था ।

ब्रिटिश काल के शुरूवात में 1801 ई. में राजा राम प्रकाश सिंह नगर राज्य पर काविज हुए। उस समय उनके पास 114 गांव थे। इसके अलावा 62 अन्य गांवों का मालिकाना भी उन्हें प्राप्त हुआ था। उनके पौत्र राजा जय प्रताप सिंह डेंगरपुर के मिल्कियत के लिए हुए दंगे में मारे गये थे।

नगर के राजा गजपतिराव सिंह के वारिस उनके बड़े पुत्र हरवंश सिंह हुए जिन्होने अपने छोटे पुत्र को 60 गांव दिया। इसके पांच पीढ़ी के बाद  राजा अम्बर सिंह के समय 60 और गांव या तो निकल गये या तो वेंच दिये गये। जिससे लगान की भरपाई की गई थी । यद्यपि राजा ने अपने आदमियों से बराबर के गांवों को जप्त कर लिया था। अम्बर सिंह के पौत्र निःसंतान थे। सम्पत्ति पुनः पैतृक शाखा में वापस चली आयी।

1811-12 में राजस्व न दे पाने के कारण ब्रिटिश सरकार ने इस संपत्ति को पिंडारियो को बेच दिया गया।1818 में बीबी मोती खानम द्वारा राजस्व ना दे पाने के कारण इस सम्पत्ति को पुनः बेच दिया गया। सरकार को उस समय रु 8343/– मिले थे। इसे अमीर खान पिंडारी के सेनापति कादिर बक्स ने ले लिया था। जिसने मराठा युद्ध के समय अपने को यहां सुरक्षित किया था और उसे पारितोषिक के रूप में मिला था। (संदर्भ : बस्ती का गजेटियर 1983 पृष्ठ 254-55)

विश्वनाथ सिंह पिपरा राज्य के राजा –

इसी वंश परम्परा में विश्वनाथ सिंह शासक बने। उन्होंने नगर राज्य (पिपरा तालुक) का शासन संभाला था। राजा गजपति के छोटे पुत्रों को 60 गाँवों वाला पिपरा तालुक प्राप्त हुआ था । पिपरा के राव राम बक्श सिंह; उनके वंशजों ने इस तालुक पर शासन किया। इनके भाग के बारह गांव लगभग 7000 एकड़ वाला क्षेत्र ब्रिटिश अधिकारी मि. कुक को दिया गया। इसके बावजूद गौतमों ने उसे अपने नियंत्रण में ही ले रखा था। ये क्षेत्र पिपरा ,कलवारी, दुखरा और कनौला में लगभग 10,000 एकड़ में फैला हुआ था। इसमें सबसे ज्यादा प्रभावशाली व्यक्ति पिपरा के राम बक्श सिंह थे। (नेविल का 1907 का गजेटियर पृष्ठ 248 )

रुधौली का बझेरा राज्य –

राजा गजपति सिंह (गौतम राजपूत) उत्तर प्रदेश के बस्ती के रुधौली क्षेत्र के ऐतिहासिक “नगर” तालुके के भी प्रमुख शासक थे, जो अपनी वीरता और गौतम राजपूत वंश से संबंध के लिए जाने जाते हैं। यह यह रुधोली का प्रमुख गांव है जो बांसी के श्रीनेत्र राजा द्वारा स्वीकृत उत्तर वशी और रिश्तेदारों को मिला था। रुधौली के आसपास बझेरा एक प्रमुख भू भाग रहा है जो बरसात में पानी से भर जाता था । यह लगभग 1,792 एकड़ क्षेत्र में फैला हुआ है। जिसमें लगभग 1,000 एकड़ में खेती होती है। इसका राजस्व रुपया 1,505 बनता है। ज्यादातर भूमि 1,565 एकड़ भैया जय लाल सिंह आनरेरी मजिस्ट्रेट के कब्जे में रहा है। भैया माधो प्रसाद सिंह के कब्जे में 4,338 एकड़ भू भाग रहा है। (नेविल बस्ती गजेटियर पृष्ठ 260 )

अठदमा स्टेट –

अठदमा के भैया बद्री प्रसाद के पास इस परगना की लगभग 8,572 एकड़ भूमि रही है। जिनके साथ अच्छा नहीं हुआ। वे आपस के काश्तकारों में उलझे रहे।इस प्रकार यह जिले का सबसे खराब गांव के रूप में बन गया था। (नेविल बस्ती गजेटियर पृष्ठ  260 ) बाद में इस कुल ने अपनी स्थिति मजबूत की । ये अठदमा गांव के ‘विलास कुंज’ में अपना आशियाना बनाए। रुधौली के अंतर्गत अठदमा के राजा आदित्यविक्रम सिंह के पिता स्वर्गीय दिवाकर विक्रम सिंह यूपी सरकार में कई बार मंत्री और विधायक भी रह चुके हैं, उनकी इस विरासत को उनके बेटे आदित्य विक्रम सिंह ने भी संभाला और वे भी रुधौली सीट से विधायक बनते रहे। अब उनकी इस राजनीतिक विरासत को उनके बेटे पुष्कर विक्रम सिंह भी संभाल रहे हैं।

 

लेखक परिचय:-

(लेखक भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण, में सहायक पुस्तकालय एवं सूचनाधिकारी पद से सेवामुक्त हुए हैं। वर्तमान समय में उत्तर प्रदेश के बस्ती नगर में निवास करते हुए सम सामयिक विषयों,साहित्य, इतिहास, पुरातत्व, संस्कृति और अध्यात्म पर अपना विचार व्यक्त करते रहते हैं। वॉट्सप नं.+919412300183)

एआई सम्मेलन – भारत की अभूतपूर्व सफलता और व्यथित कांग्रेस

नई दिल्ली के भारत मंडपम में आयोजित एआई शिखर सम्मेलन में आए विश्व के बड़े बड़े नेता इस पहल से अचंभित थे और भारत की प्रगति की प्रशंसा करते नहीं थक रहे थे। बड़ी बड़ी एआई कंपनियां व निवेशक भारत के साथ समझौते कर रही थीं। जन सामान्य गर्वित हो रहा था क्योंकि यहाँ भारत की युवा प्रतिभाओं की सराहना हो रही थी। सदा से ही राष्ट्र विमुख रही कांग्रेस पार्टी से ये देखा नहीं गया और उनके कुछ चुनिंदा कार्यकर्ता वहां अर्धनग्न होकर प्रदर्शन करने पहुँच गए। वास्तव में अब कांग्रेस पार्टी अब प्रधानमंत्री मोदी व भाजपा का विरोध करते -करते पूरी तरह भारत विरोधी हो गई है।

कांग्रेस का यह विरोध ऐसा ही था जैसे जब प्राचीन काल में जब ऋषि गण अपने आश्रमो मे किसी अच्छे कार्य के लिए यज्ञादि करते थे तो कुछ राक्षस उस यज्ञ को अपवित्र करने के लिए यज्ञकुंड में हड्डियां डालकर उसे अपवित्र करने का प्रयास करते थे। कांग्रेस ने जो कृत्य विदेशी मेहमानों के समक्ष किया है उससे स्पष्ट है कि कांग्रेस घोर अराजकतावादी बन चुकी है जिसकी अब सारी उम्मीदें समाप्त होती जा रही हैं।

एआई समिट कांग्रेस द्वारा की गई इस दुर्भाग्यपूर्ण घटना से भारत का जेन- जी भी नाराज़ है जिसको भड़काकर कांग्रेस सड़क पर लाना चाहत है। भाजपा कांग्रेस द्वारा दिए गए इस अवसर को गंवाना नहीं चाहती । पार्टी की तरफ से संपूर्ण भारत में कांग्रेस कर्यालयों के बाहर धरना -प्रदर्शन आयोजित हो रहे हैं। मेरठ में आयोजित एक कार्यक्रम में प्रधानमंत्री मोदी भी कांग्रेस पर हमलावर हुए ओैर कहा कि कांग्रेस ने एआई समिट को अपनी नग्न राजनीति का अखाड़ा बना दिया है। उन्होंने कांग्रेस से पूछा कि देश तो जानता ही है कि आप पहले से ही नंगे हो फिर कपड़े उतारने की जरूरत क्यों पड़ी? यह दिखाता है कि देश की सबसे पुरानी पार्टी कांग्रेस अब वैचारिक रूप से कितनी दिवालिया और दरिद्र हो गई है। प्रधानमंत्री मोदी ने मीडिया से अपील करते हुए कहा कि जब मैं कांग्रेस की आलोचना करता हूं तो ऐसी सुर्खियां न चलाएं कि मोदी ने विपक्ष पर हमला बोला। कांग्रेस को बचाने की ये चालाकियां बंद करें।

इस पूरे घटनाक्रम में कांग्रेस को सपा बसपा सहित कई अन्य छोटे क्षेत्रीय दलो का समर्थन नहीं मिला है जिनको कांग्रेस इंडी ब्लॉक की पार्टियाँ कहती है। कांग्रेस के इस कृत्य का लालू यादव की पार्टी राजद ने भी कड़ा विरोध किया है। जम्मू कश्मीर के मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने भी विरोध किया है। कांग्रेस ने इस तरह का प्रदर्शन करके सहयोगी दलों के बीच भी अपनी फजीहत करवा ली है। आगामी समय में यह दल कांग्रेस से दूरी बनाने पर विचार भी कर सकते हैं यही कारण हे कि इन सभी दलों की प्रधानमंत्री मोदी ने सराहना की है।

कांग्रेस के नेता और प्रवक्ता जिस प्रकार टी वी चैनलों व सोशल मीडिया पर इस हरकत को सही ठहरा रहे हैं उससे स्पष्ट है कि यह कांग्रेस पार्टी के केंद्रीय नेतृत्व की ही योजना थी। उनका कहना है कि लोकतंत्र मे अपनी बात कहने और सरकार का विरोध करने का अधिकार सबको है, उन्होंने अपने संवैधानिक अधिकारों का प्रयोग किया है। कांग्रेसी कार्यकर्ताओं की इस हरकत से पुराने परंपरागत कांग्रेसी से भी खुश नहीं हैं और अपनी नाराजगी व्यक्त कर रहे है। पुराने कांग्रेस नेताओं को इस घटना से कोई हैरानी नहीं है अपितु उनका कहना है कि यह बदली हुई कांग्रेस की बदलती हुई संस्कृति की निशानी है। कांग्रेस नेता शशि थरूर भी एआई समिट को अत्यंत सफल आयोजन बता रहे हैं और कांग्रेस के अर्धनग्न प्रदर्शन की निंदा कर रहे हैं। दरअसल प्रधानमंत्री मोदी की छवि को नुकसान पहुंचाने के चक्कर में कांग्रेस ने भारत की छवि व भारतीय संस्कृति को नुकसान पहुंचाया और इस तरह होली के स्वागत में अपने मुंह पर ही कालिख मल ली।

कांग्रेस के नेताओं की दिली इच्छा रही है कि किसी न किसी प्रकार से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी व भारत की छवि को पूरी दुनिया में खराब किया जाए और भारत में बांग्लादेश व नेपाल जैसी अराजकता का वातावरण पैदा कर अपना स्वार्थ सिद्ध किया जाए किंतु उसका यह सपना पूरा नहीं हो पा रहा है और यही कारण है कि कांग्रेस हताश होकर नंगी राजनीति पर उतर आई है।

प्रेषक- मृत्युंजय दीक्षित

फोन नं. – 9198571540

उछालवाद के दौर में पीछे छूटते मूल मुद्दे

पूरे 39 चालीस पहले बनी फ़िल्म ‘इजाज़त’ फिर एक बार देखी। फ़िल्म के बनने से लेकर अब तक में लगभग 40 साल का फ़ासला है। इन 40 सालों में इस फ़िल्म को लेकर जब भी बात हुई होगी, उसकी कथा, पटकथा, लेखन-निर्देशन, अभिनय की चर्चा हुई होगी। कभी उन बातों को रेखांकित नहीं किया गया होगा जो उस कहानी में कहन का हिस्सा भर थे। यदि आज यह फ़िल्म बनती तो यक़ीनन चर्चा उन मुद्दों पर होती और इसकी कथा-पटकथा आदि सब दीगर हो जाता। इन दिनों चर्चा में उन मुद्दों को उछाला जाता है, जिन्हें उछालना कतई ज़रूरी नहीं होता। इस उछालवाद में मूल मुद्दे पीछे छूट जाते हैं। ‘अरे भई कहना क्या चाहते हो’, अब कोई नहीं पूछता। कोई नहीं देख रहा कि किसी कलाकृति, किसी आयोजन या किन्हीं नए नियमों को बनाने का उद्देश्य क्या है।

गुलज़ार द्वारा निर्देशित 1987 में बनी यह फ़िल्म सुबोध घोष की बंगाली कहानी ‘जातुगृह’ पर आधारित है। इसे तब दो राष्ट्रीय पुरस्कार भी मिले थे। घोष का नाम बंगाली साहित्य और पत्रकारिता जगत् में जाना-पहचाना है। मतलब मान लेते हैं कि उन्होंने जो लिखा वह काफ़ी सोच-समझकर ही लिखा होगा। फ़िल्म शुरू होने के 15 मिनट बाद ही महामृत्युजंय मंत्र बुदबुदाते दादू हैं, जो यह भी कहते हैं ‘स्नान कर लो’। नायक कहता है ‘मैं घर जाकर नहा लूँगा’, तो दादू कहते हैं ‘नहाती तो गाय-भैसें हैं’। आम बोलचाल में ‘नहाना’ ही कहा जाता है, ‘स्नान करना’ तो यह वाक् प्रचार तो ब्राह्मण परिवारों में होता है। यदि यह फ़िल्म आज बनी होती तो क्या इस पर ब्राह्मणवाद का ठीकरा नहीं फोड़ा गया होता? फिर फ़िल्म में दादू यह भी कहते हैं ‘क्यों जनेऊ नहीं पहना न…पहन ले बेटा, पहन ले’, लीजिए इसे भी आज ब्राह्मणवाद, मनुवाद, दक्षिणपंथी विचारधारा और न जाने किन-किन टैगों से देखा जाता, जबकि जो हमारे आस-पास के परिवेश की बहुत आम बातें रही हैं। फ़िल्म में इसका चित्रण करना किसी एक वर्ग के श्रेष्ठत्व को दिखाना, तब इस तरह के सवाल क्यों नहीं उठे?

फ़िल्म के 44वें मिनट में नायक अख़बार पढ़ रहा है और नायिका को बताता है, ‘सुनो इंदिराजी ने क्या छुट्टी कर दी है जनता की, रायबरेली की सीट तो जीती ही और साथ में….’ तब इंदिरा गांधी की फ़िल्म में हुई वाहवाही आपत्तिजनक नहीं लगी, किसी को ऐसा नहीं लगा कि सीधे-सीधे सत्ता की प्रशंसा हो रही है। जबकि अब हर बात, हर कोण को केवल इसी दृष्टि से देखा जा रहा है कि नरेटिव राहुल के साथ हैं या मोदी के? फ़िल्म में 45वें मिनट में नायिका मंदिर में पूजा करती है और नायक को जनेऊ पहनाती है। वह बताती है कि ‘दादू बद्रीनाथ जा रहे हैं’। तब सवाल क्यों नहीं उठा कि दादू बद्रीनाथ ही क्यों जा रहे हैं, वे कहीं और भी जा सकते थे? नायिका, नायक से गायत्री मंत्र का उच्चारण करवा रही है। इस फ़िल्म का नायक है नसीरुद्दीन शाह। हो सकता है तब उन्हें भी नहीं लगा हो कि यह तो हम हिंदुत्व को, जातिवाद को बढ़ावा दे रहे हैं। हो सकता है यह समझ उनकी उम्र के साथ अब बढ़ी हो। तब इस पर भी सवाल नहीं उठा कि महिलाओं को गायत्री मंत्र पढ़ना चाहिए या नहीं। मतलब दोनों ओर से कठमुल्लापन इन दिनों बढ़ा है।
याद है यूजीसी ऐक्ट पर कितना बवाल मच गया था। क्यों? ऐसा क्यों हुआ क्योंकि राजनेताओं ने लगातार एक पक्ष को कुछ अधिक सुविधाएँ देना शुरू कर दिया है और दूसरे पक्ष को सीधे-सीधे नकारना। वी.पी.सिंह की कुर्सी को मंडल आयोग ही ले डूबा था। यूजीसी ऐक्ट भी चर्चा में इसलिए आया क्योंकि उसे चर्चा में लाया गया। अजीब जुनून सबके सिर पर हावी हो गया है। चालीस साल में समाज प्रगति के पथ पर बढ़ते हुए खेमों में बँटता चला जा रहा है।
फिर लौटते हैं फ़िल्म पर। आज के दौर में बनने पर फ़िल्म क्या कहना चाह रही है उसे दरकिनार कर दिया जाता। पहले केवल सियासतदार लोग मतलबपरस्त होते थे, अब हर कोई अपने हित और अपने ख़ेमे के आईने से देखने में लगा रहता है। बताइए न पाँच दिनों तक चलने वाले एआई शिखर सम्मेलन या एआई समिट के बारे में कितने लोगों को 16 फ़रवरी से पहले तक पता था या कितनों को 20 फ़रवरी के बाद ही पता चलता। गलगोटिया प्रकरण हो गया और सबका ध्यान एआई समिट की ओर चला गया। जैसे इस समिट से क्या हासिल हुआ कि जगह वह किन वजहों से याद रखा जाए यह महत्वपूर्ण हो गया। गलगोटिया नाम ही जैसे एआई समिट हो गया। एआई संसाधनों के लोकतंत्रीकरण, उसे सुरक्षित और भरोसेमंद बनाने के उपायों के लिए 88 देशों और अंतरराष्ट्रीय संगठनों ने साझा ग्लोबल विजन का समर्थन किया वह सब एक तरफ रह गया। पाँच दिन, 20 देशों के प्रमुख और दुनिया की सबसे बड़ी टेक कंपनियों के शीर्ष अधिकारियों के बीच की बातचीत पर गलगोटिया विश्वविद्यालय से जुड़ा मामला हावी हो गया। यह सस्ती लोकप्रियता और नकारात्मक कथन शैली का इन दिनों का ताज़ा उदाहरण है।

आज ‘इजाज़त’ मूवी देखते हुए अपने-अपने चश्मे से देखिए, फिर न आप फ़िल्म के साथ रो पाएँगे, न बह पाएँगे आपका दिमाग तर्क-कुतर्क करता चला जाएगा कि फ़िल्म का नाम ‘इजाज़त’ क्यों रखा ‘अनुमति’ क्यों नहीं, अंतिम दृश्य में नायिका रेखा, नसीरुद्दीन के पैर क्यों छूती है? यह भी तो पितृसत्तात्मकता को ,पुरुषवाद को, पति के चरित्र को बढ़ावा देना है। पति शादी के बाद अपनी प्रेमिका से रिश्ता रखे, फिर प्रेमिका को घर भी ले आए, प्रेमिका की असमय मृत्यु हो जाने पर उसे फ़िल्म की त्रासदी समझें और नायक को भोला, बेचारा, कहकर क्लीन चिट भी दे दें…तब तो सबने इस फ़िल्म को क्लीन चिट ही दी थी। आज यह फ़िल्म बनती तो इसे क्लीन चिट मिलना इतना आसान नहीं होता, सेंसर बोर्ड से अलहदा एक सेंसर बोर्ड दर्शकों का, दर्शकों को एक ख़ास तरह से सोचने के लिए बाध्य करने वालों का भी होता।

लेखिका परिचयः (स्वरांगी साने एक स्वतंत्र यू-ट्यूबर, कलाविद, हिंदी अनुवादक, लेखिका और पत्रकार हैं, , उन्होंने विभिन्न भारतीय भाषाओं की फिल्मों, वैज्ञानिक दस्तावेजों और पुस्तकों का अंग्रेजी से हिंदी में अनुवाद किया है। वे समाचार पत्रों में संपादकीय जिम्मेदारी भी वहन कर चुकी हैं और वर्तमान में कला, साहित्य व संस्कृति पर स्वतंत्र लेखन कर रही हैं)

“जिहाद “का जवाब “जिहाद” से देने वाला पहला हिंदू योद्धा तक्षक

मुहम्मद बिन कासिम ने सन 712 में भारत पर आक्रमण किया।
वह बेहद क्रूर और अत्याचारी था।
उसने अपने आक्रमण में एक भी युवा को जीवित नहीं छोड़ा।
कासिम के इस नरसंहार को 8 वर्ष का बालक तक्षक
चुपचाप देख रहा था। वही इस कथा का मुख्य पात्र है।
तक्षक के पिता सिन्धु नरेश राजा दाहिर के सैनिक थे।
कासिम की सेना के साथ लड़ते हुए वह वीरगति को प्राप्त हुए थे।
राजा दाहिर के मरने के बाद लूट मार करते हुए अरबी सेना तक्षक के गांव में पहुंची, तो गांव में हाहाकार मच गया।
स्त्रियों को घरों से बाहर खींच-खींच कर सरे-आम इज्ज़त लूटी जाने लगी।
भय के कारण तक्षक के घर में सब चिल्ला उठे। तक्षक की दो बहनें डर से कांपने लगीं।
तक्षक की मां सब परिस्थिति भांप चुकी थी। उसने कुछ पल अपने तीनों बच्चों की तरफ देखा।
उन्हें गले लगा लियाऔर रो पड़ी।
अगले ही पल उस क्षत्राणी ने तलवार से दोनों बेटियों का सिर धड़ से अलग कर दिया।
उसकी मां ने तक्षक की ओर देखा और तलवार अपनी छाती में उतार ली।
यह सब घटना आठ वर्ष का अबोध बालक “तक्षक” देख रहा था।
वह अबोध बालक अपने घर के पिछले दरवाजे से बाहर निकल कर खेतों की तरफ भागा।
और समय के साथ बड़ा होता गया।
तक्षक भटकता हुआ कन्नौज के राजा “नागभट्ट” के पास पहुँचा। उस समय वह 25 वर्ष का हो चुका था।
वह नागभट्ट की सेना में भर्ती हो गया।
अपनी बुद्धि बल के कारण वह कुछ ही समय में राजा का अंगरक्षक बन गया।
तक्षक के चेहरे पर कभी न खुशी न गम दिखता था।
उसकी आंखें हमेशा क्रोध से लाल रहतीं थीं। उसके पराक्रम के किस्से सेना में सुनाए जाते थे।
तक्षक इतना बहादुर था कि तलवार के एक वार से हाथी का सिर कलम कर देता था।
सिन्धु पर शासन कर रही अरब सेना कई बार कन्नौज पर आक्रमण कर चुकी थी लेकिन हमेशा नागभट्ट की बहादुर सेना उन्हें युद्ध में हरा देती थी।और वे भाग जाते थे। युद्ध के सनातन नियमों का पालन करते हुए राजा नागभट्ट की सेना इन भागे हुए जेहादियों का पीछा नहीं करती थी।
इसी कारण वे मजबूत होकर बार बार कन्नौज पर आक्रमण करते रहते थे।
एक बार फिर अरब के खलीफा के आदेश से सिन्धु की विशाल सेना कन्नौज पर आक्रमण करने आयी।
यह खबर पता चली तो कन्नौज के राजा नागभट्ट ने अपने सेनापतियों की बैठक बुलाई।
सब अपने अपने विचार व्यक्त कर रहे थे।
इतने में महाराजा का अंग रक्षक तक्षक खड़ा हुआ।
उसने कहा महाराज हमें दुश्मन को उसी की भाषा में ज़बाब देना होगा।
एक पल नागभट् ने तक्षक की ओर देखा,
फिर कहा कि अपनी बात खुल कर कहो तक्षक क्या कहना चाहते हो।
तक्षक ने महाराजा नागभट्ट से कहा कि अरब सैनिक महा बरबर, जालिम, अत्याचारी, जेहादी मानसिकता के लोग हैं। उनके साथ सनातन नियमों के अनुसार युद्ध करना अपनी प्रजा के साथ अन्याय होगा।
उन्हें उन्हीं की भाषा में ज़बाब देना होगा।
महाराजा ने कहा किन्तु हम धर्म और मर्यादा को कैसे छोड़ सकते हैं “तक्षक”।
तक्षक ने कहा कि मर्यादा और धर्म का पालन उनके साथ किया जाता है जो मर्यादा और धर्म का मर्म समझें। इन राक्षसों का धर्म हत्या और बलात्कार है। इनके साथ वैसा ही व्यवहार करके युद्ध जीता जा सकता है ।
राजा का मात्र एक ही धर्म होता है – प्रजा की रक्षा। राजन: आप देवल और मुल्तान का युद्ध याद करें। मुहम्मद बिन कासिम ने युद्ध जीता, दाहिर को पराजित किया और उसके पश्चात प्रजा पर कितना अत्याचार किया।
यदि हम पराजित हुए तो हमारी स्त्रियों और बच्चों के साथ वे वैसा ही व्यवहार करेंगे।
महाराज: आप जानते ही हैं कि भारतीय नारियों को किस तरह खुले बाजार में राजा दाहिर के हारने के बाद बेचा गया । उनका एक वस्तु की तरह भोग किया गया।
महाराजा ने देखा कि तक्षक की बात से सभा में उपस्थित सारे सेनापति सहमत हैं।
महाराजा नागभट्ट गुप्त कक्ष की ओर तक्षक के साथ बढ़े और गुप्तचरों के साथ बैठक की।
तक्षक के नेतृत्व में युद्ध लड़ने का फैसला हुआ। अगले ही दिन कन्नौज की सीमा पर दोनों सेनाओं का पड़ाव हो चुका था। आशा थी कि अगला प्रभात एक भीषण युद्ध का साक्षी होगा।
आधी रात बीत चुकी थी। अरब की सेना अपने शिविर में सो रही थी।
अचानक ही तक्षक के नेतृत्व में एक चौथाई सेना अरब के सैनिकों पर टूट पड़ी।
जब तक अरब सैनिक संभलते तब तक मूली गाजर की तरह हजारों अरबी सैनिकों को तक्षक की सेना मार चुकी थी। किसी हिंदू शासक से रात्री युद्ध की आशा अरब सैनिकों को न थी। सुबह से पहले ही अरबी सैनिकों की एक चौथाई सेना मारी जा चुकी थी। बाकी सेना भाग खड़ी हुई।
जिस रास्ते से अरब की सेना भागी थी उधर राजा नागभट्ट अपनी बाकी सेना के साथ खड़े थे। सारे अरबी सैनिकों को मौत के घाट उतार दिया। एक भी सैनिक नहीं बचा। युद्ध समाप्त होने के बाद राजा नागभट्ट वीर तक्षक को ढूंढने लगे।
वीर तक्षक वीरगति को प्राप्त हो चुका था। उसने अकेले हजारों जेहादियों को मौत की नींद सुला दिया था।
राजा नागभट ने वीर तक्षक की भव्य प्रतिमा बनवायी।
कन्नौज में आज भी उस बहादुर तक्षक की प्रतिमा विद्यमान है।
यह युद्ध सन् 733 में हुआ था। उसके बाद लगभग 300 वर्ष तक अरब से दूसरे किसी आक्रमणकारी को आक्रमण करने की हिम्मत नहीं हुई।
यह इतिहास की घटना है जो सत्य पर आधारित है।
जागो हिन्दू जागो अपनी मातृभूमि की रक्षा करो।

साभार- https://www.facebook.com/arya.samaj से

महाभारत कालीन अस्त्र-शस्त्रों से जीवंत हुई हजारों साल पहले की महाभारत

महाभारत और रामायण के युद्ध में प्रमुख अंतर युग,उद्देश्य और युद्ध की प्रकृति का रहा है | रामायण त्रेता युग में आज से लगभग नौ लाख वर्ष पूर्व घटित हुई जबकि महाभारत द्वापरयुग में लगभग आज से पांच हजार वर्ष पूर्व हुआ | रामायण का युद्ध भगवान राम और पंडित रावण के बीच सीमित था तो महाभारत में देश के सभी राज्य सम्मिलित थे और यह विश्वयुद्ध ही था | रामायण में मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम मर्यादा ,त्याग और रिश्तों को महत्व देते हैं तो महाभारत में श्रीकृष्ण कूटनीति ,अधिकार और ज्ञान को प्रमुखता देते हैं | महाभारत में कुरुक्षेत्र में कौरव और पांडव आमने सामने हैं और दोनों के पक्ष में अपने अपने विश्वसनीय राज्यों के राजा और उनकी सेना हैं | अठारह दिन चले महाभारत के युद्ध में दोनों और कई महारथी हैं जिनसे हम सभी परिचित हैं | मगर इन महारथियों के शस्त्र और अस्त्र महारथियों के नाम की तरह ही अनुपम ,अनूठे , अलौकिक और विज्ञान सम्मत हैं और कईयों ने ये शस्त्र और अस्त्र अपने गुरुओं की सेवा कर उन्हें प्रसन्न कर या तपस्या कर महर्षि परशुराम , देवताओं के राजा इंद्र और सूर्यदेव आदि से प्राप्त किये थे | ऐसे ही शस्त्र और अस्त्र से परिचित कराती है उज्जयिनी में चल रहे विक्रमोत्सव के अंतर्गत , विक्रमादित्य शोध पीठ में लगी विशाल और भव्य प्रदर्शनी – महाभारत |

महाभारत प्रदर्शनी में महाभारत के युद्ध में दोनों और के सेनापतियों द्वारा ग्यारह विभिन्न जटिल व्यूह रचनाओं का उपयोग किया गया था और इन व्यूह रचनाओं को प्रतीकात्मकता से बहुत सुन्दरता से प्रदर्शित किया गया है | कौरवों की और से गुरु द्रोणाचार्य ने सबसे कठिन व्यूह रचना चक्रव्यूह निर्मित की थी जिसमें अन्दर जाने का रास्ता तो था मगर बाहर निकलने का नहीं और यह अर्जुन की अनुपस्थिति में उनके पुत्र ,अभिमन्यु को फंसाने के लिए थी और युद्ध के दिन अभिमन्यु इसमें फंसकर वीरगति को प्राप्त हुए थे | चक्रव्यूह से हम सभी भलीभांति परिचित हैं मगर युद्ध के अठारह दिनों में भीष्म ने गरुड़ व्यूह ,मंडल व्यूह और मकर व्यूह , अर्जुन द्वारा वज्र एवं अर्धचन्द्र व्यूह , पांडवों का क्रोंच व्यूह , गुरु द्रोण द्वारा चक्रशकट व्यूह , कच्छप व्यूह , श्रीन्गातका व्यूह , ओरमी व्यूह ,सर्वतोमुखी दंड व्यूह का प्रदर्शन हुबहू किया है क्योंकि ये व्यूह शत्रु की रणनीति को असफल करने के लिए निर्मित किये जाते थे और यह बताते हैं कि महाभारत काल में सेनापतियों का विवेक और चिंतन अत्यंत उन्नत और वैज्ञानिक था | उदहारण के लिए गरुड़ व्यूह , भगवान विष्णु के वाहन गरुड़ के अनुरूप था जिसमें सेना का अग्रभाग तेज , सुद्रढ़ पार्श्व और विस्तृत पृष्ठभाग | गरुढ व्यूह वेग ,प्रतीक और आक्रामक सैन्य कला का प्रतीक है और इन व्यूहों का आधार ज्यामिति भी है | प्रदर्शनी महाभारत में इन व्यूहों की रचना देखना रोमांचित करता है |

इस प्रदर्शनी में अर्जुन का प्रख्यात धनुष गांडीव [ जिसे अर्जुन को अग्निदेव द्वारा प्रदान किया गया था ], नकुल – सहदेव का आग्नेय धनुष , कर्ण का विजय धनुष , दुर्योधन का शरासन धनुष , युधिष्ठिर का रौद्र धनुष और वैजयंती धनुष , भीष्म का अजगव धनुष , अश्वथामा का कोदण्ड धनुष , घटोत्कच का पौलस्त्य धनुष , शिव जी का पिनाक धनुष , सुतसोम का आग्नेय धनुष . अर्जुन का अक्षय तुणीर [ कभी न समाप्त होने वाले बाणों का दिव्या तरकश ] आदि प्रतीकात्मकत रूप से प्रदर्शित किये गये हैं | भगवान श्रीकृष्ण का धर्म और न्याय का प्रतीक सुदर्शन चक्र भी दिव्यता के साथ यहाँ मौजूद है | भीम और दुर्योधन की गदाएँ , फरसे ,तलवार ,भाले और वज्र भी प्रदर्शनी में हैं और ऐसे करीब सौ से अधिक अस्त्र – शस्त्र यहाँ हैं | महाभारत में एक और अस्त्र ब्रह्मास्त्र का प्रयोग हुआ था | ब्रह्मास्त्र के अलावा ब्रह्मान्दास्त्र , ब्रह्म्शिरास्त्र , अन्जलिकास्त्र , नारायणास्त्र आदि भी दर्शाए गये हैं | चतुरंगिनी सेना के बारे में भी चित्रित और प्रदर्शित किया गया है |

असल में जितने भी युद्ध हुए हैं उनमें सामने वाले को किसी भी तरह मारना – काटना ही युद्ध का प्रमुख उद्देश्य रहा है मगर महाभारत का महायुद्ध सिर्फ दो सेनाओं का भीषण युद्ध नहीं बल्कि उस समय की उन्नत प्रोद्योगिकी , ऋषियों के ज्ञान और योद्धाओं को शस्त्र का वरदान देना , अस्त्र और शस्त्र का मन्त्र की शक्तियों से चलना , महारथियों की विज्ञानपरक समझ से उपजे अस्त्र और शस्त्र का उपयोग था जिसमें रणनीतिक कौशल के लिए शास्त्र सम्मत व्यूह रचना के कारण महाभारत सबको आकर्षित करता है | पांडवों की और से भगवान श्रीकृष्ण ने बिना शस्त्र उठाये , अपने ज्ञान और कूटनीति से पांडवों को विजयी दिलाई | महाभारत के अस्त्र ,शस्त्र ,शौर्य और विज्ञान का दिव्य संगम है यह प्रदर्शनी महाभारत | अस्त्र और शस्त्र के साथ उनकी महत्ता को प्रदर्शित करते आलेख दर्शकों को सहूलियत प्रदान करते हैं |

प्रदर्शनी में पोस्टरों के जरिये महाभारत के अठारह दिन के युद्ध का वर्णन पढ़ना रोमांचित करता है | प्रदर्शनी के शोधकर्ता और क्यूरेटर राज बेंद्रे बताते हैं कि महाभारत शौर्य ,विज्ञान और आध्यात्म का संगम था और महाभारत सिर्फ युद्ध नहीं ,सभ्यता का आईना भी है | राज बेंद्रे के अनुसार इस प्रदर्शनी के लिए काफी अनुसन्धान किया गया है और प्रदर्शनी का उद्देश्य महभारत को पौराणिक ग्रन्थ के साथ भारत की प्राचीन सैन्य , वैज्ञानिक ,और रणनीतिक चेतना का दस्तावेज भी सिद्ध करना है | प्रदेश के मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव की परिकल्पना है विक्रमोत्सव और उनके सांस्कृतिक सलाहकार डॉ. श्रीराम तिवारी के संयोजन में महाभारत प्रदर्शनी अनूठी और अनुपम ज्ञान का सागर है |

(लेखक डॉ. हरीश कुमार सिंह देश के जाने माने व्यंग्यकार एवँ स्तंभकार हैं और समसामयिक विषयों पर लेखन करते हैं। इनके व्यंग्य संग्रह भी प्रकाशित हो चुके हैं)

‘द केरल स्टोरी-2’ से तिलमिलाए एजेंडा धारी अनुराग कश्यप

सच्ची घटनाओं पर आधारित फिल्म ‘द केरल स्टोरी-2’ में लव जिहाद की हिंदू पीड़िता को जबरन गोमांस खिलाकर इस्लाम कबूलने वाला दृश्य दिखाया गया। इस पर फिल्म डायरेक्टर अनुराग कश्यप ने गोमांस की तुलना खिचड़ी से कर पीड़िताओं के दर्द को हल्का अनुभव करार दिया है।

सच्ची घटनाओं पर आधारित फिल्म ‘द केरल स्टोरी-2 गोज बीयॉन्ड‘ का ट्रेलर हाल ही में जारी किया गया है। फिल्म में लव जिहाद मामलों में पीड़ित हिंदू लड़कियों के साथ अत्याचार की सच्चाई को दर्शाया गया है, जो झकझोर देने वाले हैं। फिल्म मेकर्स ने इसे हकीकत का आईना बताया है। लेकिन इसी बीच फिल्म डायरेक्टर अनुराग कश्यप ने फिल्म में पीड़िता को जबरन ‘बीफ’ यानी गोमांस खिलाने वाले दृश्य की खिचड़ी से तुलना की है।

सोशल मीडिया पर एक वीडियो वायरल है, जिसमें रिपोर्टर ने अनुराग कश्यप से सवाल पूछा कि आपकी केरल स्टोरी-2 पर क्या राय है? इसका जवाब देते हुए अनुराग कश्यप कहते हैं, “फिल्म ‘बुलशिट’ है। ये प्रोपेगेंडा है। ऐसे कौन ‘बीफ’ खिलाता है, ऐसे कोई खिचड़ी भी नहीं खिलाता है।”

इसके बाद रिपोर्टर एक और सवाल पूछता है कि इस फिल्म को बनाने का उद्देश्य क्या है? इस पर अनुराग कश्यप ने कहा, “वो पैसा कमाना चाहते हैं। वो बस सबको खुश करना चाहते हैं, लोगों को बाँटना चाहते हैं। फिल्ममेकर एक लालची आदमी है।”

फिल्म पर अनुराग कश्यप की टिप्पणी का वीडियो वायरल होते ही विवाद शुरू हो गया। फिर ‘द केरल स्टोरी-2’ के फिल्म डायरेक्टर कामाख्य नारायण ने विवाद में उतरकर दिया। उन्होंने अनुराग कश्यप की टिप्पणी पर रिएक्ट करते हुए कहा कि समाज ने उन्हें गंभीरता से लेना छोड़ दिया है, वह मानसिक रूप से दुर्बल हो चुके हैं।

वीडियो में फिल्म के डायरेक्टर कामाख्य नारायण ने कहा, “ऑडियंस उन्हें गंभीरता (सीरियसली) से नहीं लेती है। पिछले कई सालों से उनकी सारी फिल्में फ्लॉप हो रही हैं। वो मानसिक रूप से दुर्बल हो चुके हैं। उनकों सच्चाई दिखती नहीं है। उनको ये नहीं दिख रहा कि हमारी बहनों को जबरन बीफ खिलाया जा रहा है, धर्म परिवर्तन करने के लिए। ये सत्य घटना है।”

नारायण आगे कहते हैं, उनको पूरी दुनिया से समस्या है। उनको नेटफ्लिक्स से समस्या है। उनको ब्राह्मणों से समस्या है। उनको फिल्म इंडस्ट्री से समस्या है। आजकल हमसे समस्या है उनको। उनको गंभीरता से लेने की जरूरत नहीं है। हमारी फिल्म सत्य घटनाओं पर आधारित है, “हमें ये पता है। हम अनुराग जी के घर रिसर्च मैटेरियल भेज देंगे। वो तो लोगों के घर जूते-चप्पल भेजते हैं। मैं तो ये नहीं भेज सकता हूँ।”

फिल्म की रिसर्च को लेकर कामाख्य नारायण कहते हैं, “मैनें 1500 आर्टिकल पढ़े हैं। 70-80 FIR पढ़ी हैं। पीड़िताओं से मिला हूँ और उनसे मिलकर मैं पिछले कई साल से सो नहीं पाया हूँ। कोर्ट जजमेंट पढ़े हैं। ये सभी सत्य घटनाएँ हैं। समाज में हो रहा है। हम अपनी आँखो को बंद कर सकते हैं, लेकिन उससे सत्य नहीं बदलेगा। समाज में ये बहुत बड़े पैमाने पर हो रहा है।”

हिंदू लड़कियों को ‘जबरन गोमांस’ खिलाने के असल मामले

फिल्म ‘द केरल स्टोरी-2’ ने हिंदू लड़कियों को लव जिहाद में फँसाकर गोमांस खिलाने और धर्मांतरण कराने की सच्ची घटनाओं को उजागर किया है, जो आए दिन सामने आती हैं। ऐसी कई घटनाएँ हैं, जिनमें हिंदू लड़कियों को पहले प्रेमजाल में फँसाया जाता है, फिर बहला-फुसलाकर रेप और फिर गोमांस खिलाकर जबरन इस्लाम कबूलने को मजबूर किया जाता है।

चाहे वह रायबरेली का एक बच्चे का अब्बू मोहम्मद मुकीम हो, जिसने निकाह का झाँसा देकर दो साल तक रेप किया। फिर धीरे-धीरे धर्म परिवर्तन का दबाव डालने लगा और घर ले जाकर जबरन गोमांस तक खिलाया।

या फिर उत्तर प्रदेश के बस्ती जिले का अहमद रजा हो, जिसने चाकू की नोक पर हिंदू लड़की से बलात्कार किया और निकाह का झाँसा देकर अम्मी-अब्बू से मिलवाया। फिर घर ले जाकर अम्मी-अब्बू के सामने गोमांस खाने और नमाज पढ़ने की धमकी दी। जब पीड़िता ने इनकार किया, तो बेरहमी से पीटा।

महाराष्ट्र के संभाजीनगर का ताहेर पठान ने भी हिंदू लड़की के साथ यही किया। समीर पटेल बनकर पीड़िता से मिला, फिर प्रेमजाल में फँसाकर रेप किया। और अंत में अपना मकसद पूरा करने के लिए पीड़िता को बुर्का पहनने और गोमांस खाने को मजबूर किया। इस काम में उसकी अम्मीजान, अब्बाजान के साथ-साथ उसकी पहली बेगम आयेशा पठान भी शामिल थी, जिसके साथ ताहेर के 4 बच्चे भी थे।

ये कुछ गिने चुने मामले हैं, लेकिन आँकड़ा सोच से कही परे है। कई मामलों में FIR होती हैं, जिसमें चौंकाने वाले खुलासे होते हैं। कैसे ‘अब्दुल’ अपने जाल में फँसाकर हिंदू लड़कियों का धर्म परिवर्तन करा देते हैं। इससे कई हिंदू लड़कियों की जिंदगियाँ बर्बाद हुई हैं। ‘द केरल स्टोरी पार्ट-1’ और ‘पार्ट-2’ जैसी फिल्मों में इन्हीं पीड़ित हिंदू लड़कियों का दर्द दिखाकर ऐसे ‘अब्दुलों’ की सच्चाई को उजागर किया गया है।

हिंदू पीड़िताओं के दर्द पर अनुराग कश्यप का ‘खिचड़ी’ ह्यूमर

अब वापस आते हैं अनुराग कश्यप की टिप्पणी पर, तो बात सीधी है। अगर किसी हिंदू लड़की को उसकी मर्जी के बगैर जबरन गोमांस खिलाया गया है, तो यह सिर्फ फिल्म का एक दृश्य नहीं है, यह उन लव जिहाद की पीड़िताओं के दर्द की असलियत है। जिन मामलों का जिक्र फिल्म में है, जिन पीड़िताओं ने यह दर्द झेला है, उनके लिए यह कोई हल्का अनुभव नहीं रहा। ऐसे जख्म लंबे समय तक याद रहते हैं, और इन्हें शब्दों की चतुराई से छोटा नहीं किया जा सकता।

ऐसे में अनुराग कश्यप का यह कहना कि ‘ऐसे तो लोग खिचड़ी भी नहीं खिलाते’ आखिर क्या संदेश देता है। क्या यह टिप्पणी उन घटनाओं की गंभीरता को कम करके दिखाने की कोशिश है या फिर दर्द को एक सामान्य मजाक में बदल देने का अंदाज है। क्या जिन लड़कियों ने यह सब सहा, उनके लिए यह सिर्फ एक हल्की टिप्पणी भर है। इसका जवाब तो अनुराग कश्यप ही दे सकते हैं, जिन्हें बीफ पराठा शायद बेहद पसंद भी है।

जाहिर है खिचड़ी और गोमांस की तुलना करना कोई ह्यूमर में नहीं आता। ये दोनों एक चीज नहीं है, न ही इन्हें जबरन खिलाने के मायने एक हैं। आस्था, दर्द और जबरन जैसे शब्दों का वजन समझे बिना की गई तुलना अपने आप बहुत कुछ कह जाती है।

(फोटो साभार: TheHindu/Youtube/ANI)  
 
साभार-https://hindi.opindia.com/ से 

विज्ञान और अध्यात्म : ज्ञान का भारतीय मॉडल

डॉ. सी. वी. रमन ने प्रकाश के प्रकीर्णन (scattering of light) पर शोध कर 1930 में नोबेल पुरस्कार प्राप्त किया। उनका कार्य यह दर्शाता है कि वैज्ञानिक अनुसंधान भारतीय परंपरा में निरंतर जीवित और सक्रिय रहा है। रमन का कथन था—“प्रकृति स्वयं हमें प्रेरित करती है।” यह वाक्य वैज्ञानिक अवलोकन (scientific observation) और आध्यात्मिक संवेदना (spiritual sensitivity) के सुंदर मेल को प्रकट करता है।

पश्चिमी आधुनिक सोच में विज्ञान और अध्यात्म को अक्सर दो अलग रास्तों की तरह देखा जाता है—एक experiment (प्रयोग) और evidence (प्रमाण) पर आधारित, दूसरा experience (अनुभव) और faith (आस्था) पर। लेकिन भारतीय ज्ञान परंपरा में यह दूरी इतनी स्पष्ट नहीं रही। यहाँ ज्ञान (knowledge) को एक समग्र यात्रा माना गया, जहाँ प्रकृति (nature) और चेतना (consciousness) दोनों की खोज समान रूप से महत्वपूर्ण थी। स्वामी विवेकानंद ने 1893 (Chicago) में कहा था कि विज्ञान और धर्म का लक्ष्य एक ही है—सत्य की खोज।

विज्ञान पूछता है—यह जगत कैसे काम करता है?
अध्यात्म पूछता है—मैं कौन हूँ और जीवन का अंतिम सत्य क्या है?
दोनों के प्रश्न अलग दिखते हैं, पर लक्ष्य एक है—सत्य।

भारत की scientific consciousness (विज्ञान चेतना) केवल तकनीकी प्रगति नहीं, बल्कि तर्क (logic), जिज्ञासा (curiosity) और जिम्मेदारी से सोचने की आदत है। इस दृष्टि से देखें तो भारतीय अध्यात्म ने वैज्ञानिक सोच को केवल प्रेरणा ही नहीं दी, बल्कि उसे एक गहरा दार्शनिक आधार (philosophical foundation) भी प्रदान किया।

वैदिक युग : प्रश्न से शुरू हुई खोज
भारतीय अध्यात्म का प्रारंभिक आधार ऋग्वेद है। इसमें नासदीय सूक्त ‘ नासदासीन्नो सदासात्तदानीं ‘ सृष्टि की उत्पत्ति पर प्रश्न उठाते हैं—“तब क्या था? किसने सृष्टि की?” यहाँ कोई अंतिम उत्तर थोपने की जल्दी नहीं है, बल्कि प्रश्न करने की स्वतंत्रता है। यही वैज्ञानिक दृष्टिकोण (scientific temper) की पहली सीढ़ी है – आश्चर्य और जिज्ञासा।

उपनिषदों में “नेति-नेति” (यह नहीं, वह नहीं) की पद्धति भी एक तरह की विश्लेषणात्मक विधि (analytical method) है—हर संभावना को परखकर सत्य तक पहुँचना। यह उसी प्रकार है जैसे विज्ञान में परिकल्पना (hypothesis) को जांचकर अंतिम निष्कर्ष निकाला जाता है।

इस प्रकार भारतीय अध्यात्म ने विज्ञान को विरोधी नहीं, बल्कि सहयोगी माना—बाहरी खोज (outer exploration) और आंतरिक अनुभूति (inner realization) की संयुक्त यात्रा के रूप में। यहाँ प्रकृति, ग्रहों या शरीर का अध्ययन आध्यात्म से अलग नहीं समझा गया। भारतीय दृष्टि के अनुसार केवल बाहरी ज्ञान से जीवन का पूर्ण अर्थ नहीं मिलता और केवल आंतरिक साधना से संसार की कार्यप्रणाली नहीं समझी जा सकती; दोनों का संतुलन आवश्यक है।

प्राचीन विज्ञान : अध्यात्म की भूमि पर विकसित

प्राचीन भारत में गणित, खगोलशास्त्र (astronomy) और आयुर्वेद का विकास केवल तकनीकी आवश्यकता से नहीं, बल्कि एक गहरे आध्यात्मिक वातावरण में हुआ। भारतीय गणितज्ञों ने decimal system (दशमलव पद्धति), zero (शून्य) और infinity (अनंत) जैसी क्रांतिकारी अवधारणाएँ दीं। ये खोजें केवल संख्याओं का विस्तार नहीं थीं, बल्कि ब्रह्मांडीय व्यवस्था (cosmic order – ऋत) को समझने का प्रयास भी थीं—एक ऐसा विश्वास कि यह सृष्टि व्यवस्थित और अर्थपूर्ण है।

खगोलशास्त्र में ग्रह-नक्षत्रों की गति को केवल गणना का विषय नहीं माना गया, बल्कि एक नियमबद्ध ब्रह्मांड (ordered universe) की अभिव्यक्ति के रूप में देखा गया। इसी प्रकार आयुर्वेद को “science of life” कहा गया। आयुर्वेद समग्र दृष्टि (holistic approach) अपनाता है—जहाँ शरीर, मन और आत्मा एक ही सूत्र में जुड़े माने जाते हैं। स्वास्थ्य को तीन दोष (वात, पित्त, कफ) के संतुलन के रूप में समझा गया। यह संतुलन हमें याद दिलाता है कि हम अलग-थलग अस्तित्व नहीं हैं, बल्कि प्रकृति का ही हिस्सा हैं। हमारे भीतर का सूक्ष्म जगत (microcosm) बाहर के विराट जगत (macrocosm) से जुड़ा है। जब प्रकृति में लय होती है, तब जीवन में भी लय आती है।

अध्यात्म ने विज्ञान को कैसे समृद्ध किया?

भारतीय अध्यात्म ने विज्ञान को तीन स्तरों पर दिशा दी—पहला, नैतिक दिशा (ethical direction), ताकि ज्ञान मानव कल्याण के लिए उपयोग हो। दूसरा, जिज्ञासा-प्रेरित खोज (curiosity-driven inquiry), जहाँ “मैं कौन हूँ?” और “यह जगत क्या है?” जैसे प्रश्न खोज की शुरुआत बने। तीसरा, समग्र दृष्टि (holistic vision), जिसमें मनुष्य, प्रकृति और ब्रह्मांड को परस्पर जुड़ी हुई व्यवस्था (interconnected reality) माना गया।

आधुनिक युग : क्वांटम फिजिक्स और वेदांत

आज के समय में भी विज्ञान और अध्यात्म के बीच संवाद जारी है। विशेषकर Quantum Physics (क्वांटम भौतिकी) और Cosmology (ब्रह्मांड विज्ञान) के क्षेत्र में। जिनेवा स्थित विश्वप्रसिद्ध प्रयोगशाला CERN में भगवान शिव ‘नटराज’ की प्रतिमा स्थापित है। यह “कॉस्मिक डांस” यानी ‘ब्रह्मांड का नृत्य’ की प्रतीक है—सृष्टि लगातार बनती और बदलती रहती है। जैसे शिव का नृत्य निर्माण और विनाश के चक्र को दिखाता है, वैसे ही विज्ञान बताता है कि बहुत छोटे कण (particles) आपस में टकराते हैं, टूटते हैं और ऊर्जा में बदल जाते हैं। वैज्ञानिक Fritjof Capra ने कहा कि जो दृश्य भारतीय कलाकारों ने शिव के नृत्य में दिखाया, आज के वैज्ञानिक उसे कणों (particles) और ऊर्जा (energy) की गतिविधि में देखते हैं। यानी अलग भाषा है, पर कहानी एक ही है—ब्रह्मांड हमेशा गतिशील है।

क्वांटम फिज़िक्स का एक रोचक सिद्धांत है wave-particle duality (तरंग-कण द्वैत)। बहुत छोटे कण (particles) कभी तरंग (wave) की तरह व्यवहार करते हैं और कभी कण (particle) की तरह। यानी जो चीज़ हमें एक रूप में दिखती है, वह असल में उससे कहीं अधिक जटिल हो सकती है। यह हमें सोचने पर मजबूर करता है कि वास्तविकता (reality) हमेशा वैसी नहीं होती जैसी हमारी आँखों को दिखाई देती है। यही बात वेदांत के माया (illusion) सिद्धांत में भी कही गई है—दिखने वाली दुनिया अंतिम सत्य नहीं, बल्कि एक परत है जिसके पीछे गहरा सत्य छिपा है। प्रसिद्ध वैज्ञानिक Erwin Schrödinger वेदांत से प्रभावित थे। उनका मानना था कि चेतना (consciousness) मूल रूप से एक ही है, अलग-अलग व्यक्तियों में बंटी हुई नहीं। यह विचार वेदांत के अद्वैत (non-duality) सिद्धांत से मिलता है, जहाँ सब कुछ एक ही सार्वभौमिक चेतना (universal consciousness) का हिस्सा माना जाता है।

इस प्रकार आधुनिक विज्ञान और वेदांत के बीच यह संवाद दिखाता है कि सत्य की खोज केवल प्रयोगशाला तक सीमित नहीं, बल्कि चेतना की गहराइयों तक फैली हुई है। जब विज्ञान और अध्यात्म साथ चलते हैं, तो हमारी समझ अधिक व्यापक, संतुलित और अर्थपूर्ण बनती है।

चेतना का प्रश्न : आज भी खुला संवाद

आज का आधुनिक विज्ञान ब्रह्मांड और मस्तिष्क का बहुत बारीक नक्शा बना सकता है। हम जान सकते हैं कि कौन-सा हिस्सा क्या काम करता है। लेकिन एक सवाल अब भी पूरी तरह सुलझा नहीं है—हम जो “अनुभव” करते हैं, जैसे खुशी, दुख, प्रेम या शांति, वह आखिर कैसे जन्म लेता है? यह व्यक्तिगत अनुभव (subjective experience) अभी भी विज्ञान के लिए एक रहस्य है। ऋषियों ने बहुत पहले कहा था कि भौतिक जगत को समझ लेना ही अंतिम ज्ञान नहीं है। उसके परे भी एक आयाम है— चेतना, जो केवल पदार्थ से परिभाषित नहीं होती क्योंकि वह हमारे अनुभव, सोच और आत्मबोध से जुड़ी है। आज ध्यान पर हो रहे वैज्ञानिक शोध दिखा रहे हैं कि यह तनाव कम कर सकता है और मस्तिष्क पर सकारात्मक प्रभाव डाल सकता है। इस तरह प्राचीन योग परंपरा और आधुनिक neuroscience के बीच एक रचनात्मक विमर्श विकसित हो रहा है—जहाँ बाहरी अध्ययन और आंतरिक अनुभव एक-दूसरे से सीख रहे हैं।

निष्कर्ष : एक समग्र समझ की ओर
इस पूरे विमर्श से स्पष्ट होता है कि भारतीय ज्ञान परंपरा में अध्यात्म और विज्ञान का संबंध विरोध का नहीं, बल्कि परस्पर सहयोग (complementarity) का रहा है। प्राचीन वैदिक चिंतन से लेकर आधुनिक प्रयोगशालाओं तक, दोनों ने अलग-अलग तरीकों से एक ही लक्ष्य—सत्य—की खोज की है। यह कहना उचित नहीं कि आधुनिक विज्ञान ने प्राचीन आध्यात्मिक सिद्धांतों को पूरी तरह प्रमाणित कर दिया है। किंतु यह अवश्य कहा जा सकता है कि जब विज्ञान और अध्यात्म के बीच सार्थक संवाद स्थापित होता है, तो ज्ञान अधिक व्यापक और गहरा बनता है।

(लेखिका, डेंटल सर्जन हैं तथा दिल्ली स्कूल ऑफ़ इकोनॉमिक्स से पीएचडी हैं। देश भर के प्रमुख पत्र-पत्रिकाओं में व वेबसाईटों पर स्वास्थ्य के साथ-साथ सामाजिक, राजनीतिक और सांस्कृतिक विषयों पर लेखन करती हैं)

शिक्षा को हिंसक नहीं, संवेदनशील बनाना होगा

देश में इन दिनों बोर्ड परीक्षाएं चल रही हैं और सामान्य परीक्षाएं भी शुरू होने वाली हैं। हर साल की तरह इस बार भी परीक्षा का मौसम केवल प्रश्नपत्रों और परिणामों का नहीं, बल्कि मानसिक दबाव, चिंता और असुरक्षा का मौसम बनता जा रहा है। छात्रों के चेहरों पर भविष्य की चिंता साफ पढ़ी जा सकती है। यह चिंता केवल अच्छे अंक लाने की नहीं, बल्कि अपेक्षाओं के बोझ को ढोने की है। दुर्भाग्य यह है कि यह दबाव कई बार इतना असहनीय हो जाता है कि वह आत्मघाती या हिंसक रूप ले लेता है। नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो के आंकड़े एक भयावह सच उजागर करते हैं। वर्ष 2013 से 2023 के बीच छात्रों की आत्महत्या की दर में लगभग 65 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई है। यह केवल आंकड़ा नहीं, बल्कि हजारों परिवारों के टूटने की कहानी है। इन आत्महत्याओं के पीछे पढ़ाई का दबाव, पारिवारिक अपेक्षाएं, सामाजिक तुलना और आर्थिक तनाव प्रमुख कारण बताए जाते हैं। लेकिन हाल में लखनऊ में जो घटना सामने आई, उसने इस संकट को एक और खतरनाक दिशा में मोड़ दिया है।

लखनऊ की घटना केवल परीक्षा दबाव की कहानी नहीं है, बल्कि परिवारों में बढ़ती संवेदनहीनता, संवादहीनता और मानसिक स्वास्थ्य की उपेक्षा का दर्पण है। पुलिस जांच के अनुसार एक पैथोलॉजी लैब संचालक पिता अपने बेटे को डॉक्टर बनाना चाहते थे और उस पर नीट जैसी परीक्षा पास करने का लगातार दबाव बना रहे थे। घटना वाले दिन भी दोनों के बीच बहस हुई और 21 वर्षीय युवक ने पिता की गोली मारकर हत्या कर दी। इसके बाद उसने अपराध छिपाने के लिए शव के टुकड़े किए, कुछ बाहर फेंके, कुछ घर में छिपाए, छोटी बहन को धमकाया और पुलिस को गुमराह करने के लिए पहले लापता होने और फिर आत्महत्या की कहानी गढ़ी। यह सब बताता है कि यह क्षणिक आवेश नहीं था, बल्कि भीतर लंबे समय से पल रही कुंठा, आक्रोश और मानसिक विघटन का परिणाम था। प्रश्न यह है कि एक बेटे के भीतर इतनी नफरत कैसे पनप सकती है? क्या ‘कुछ बनने’ का दबाव इतना भारी हो सकता है कि वह रिश्तों को भी तार-तार कर दे? हर माता-पिता चाहते हैं कि उनकी संतान सफल हो, प्रतिष्ठित करियर बनाए, समाज में सम्मान पाए। लेकिन जब यह चाहत संवाद और सहयोग की जगह नियंत्रण और दबाव का रूप ले लेती है, तब वह प्रेरणा नहीं, मानसिक उत्पीड़न बन जाती है। जब शिक्षा जीवन-निर्माण का माध्यम न होकर, विनाश का कारण बन जाती है।

भारत में नीट और जी जैसी प्रतियोगी परीक्षाएं लाखों युवाओं के लिए उम्मीद का प्रतीक हैं। नीट में पिछले वर्ष 23 लाख से अधिक छात्रों ने पंजीकरण कराया, जबकि ज्वाइंट एन्टरेंस एक्जामिनेशन (जेईई) के एक सत्र में 13 लाख से अधिक विद्यार्थियों ने आवेदन किया। इन लाखों विद्यार्थियों में से केवल कुछ हजार ही शीर्ष संस्थानों तक पहुंच पाते हैं। शेष विद्यार्थियों के हिस्से अक्सर निराशा, आत्मग्लानि और सामाजिक तुलना का दंश आता है। जब सफलता का पैमाना केवल रैंक और अंक बन जाए, तो असफलता जीवन का अंत प्रतीत होने लगती है। कोटा जैसे कोचिंग केंद्रों में हर वर्ष आत्महत्या की खबरें सामने आती हैं। कोटा देश की कोचिंग राजधानी कही जाती है, जहां हजारों छात्र सपने लेकर पहुंचते हैं। लेकिन उन्हीं सपनों का बोझ कई बार उनके जीवन से भारी पड़ जाता है। यह केवल व्यक्तिगत कमजोरी का मामला नहीं है, बल्कि एक ऐसी शिक्षा प्रणाली का परिणाम है जिसमें प्रतियोगिता सहयोग से अधिक महत्त्वपूर्ण हो गई है।

लखनऊ की घटना में एक और तथ्य उल्लेखनीय है-आरोपी छात्र की मां का निधन हो चुका था। घर में चाचा-चाची मौजूद थे, लेकिन क्या उस युवक की मनःस्थिति को समझने का प्रयास किया गया? क्या उसके भीतर के तनाव, अकेलेपन और भय को किसी ने सुना? यदि परिवार में नियमित संवाद होता, यदि मानसिक स्वास्थ्य को उतनी ही गंभीरता से लिया जाता जितनी अंकों को, तो शायद यह भयावह वारदात टाली जा सकती थी। आज समस्या केवल आत्महत्या तक सीमित नहीं है। बच्चे हिंसक भी हो रहे हैं। यह हिंसा बाहरी नहीं, भीतर से उपज रही है-कुंठा, अपमानबोध, तुलना और असफलता के भय से। जब बच्चे को यह महसूस होने लगे कि वह केवल एक ‘प्रोजेक्ट’ है, एक ‘इन्वेस्टमेंट’ है, जिसे किसी निश्चित पेशे में ढालना है, तब उसकी स्वतंत्र पहचान कुचल जाती है। वह या तो भीतर ही भीतर टूट जाता है या विस्फोट कर देता है।

शिक्षा का उद्देश्य जीवनदायिनी होना चाहिए-विवेक, संवेदना और आत्मविश्वास का विकास करना चाहिए। लेकिन जब शिक्षा केवल प्रतिस्पर्धा और रैंकिंग का माध्यम बन जाए, तो वह तनाव और हिंसा को जन्म देती है। हमें यह स्वीकार करना होगा कि हर बच्चा डॉक्टर या इंजीनियर नहीं बन सकता, और न ही बनना चाहिए। विविध प्रतिभाओं को सम्मान देने वाली सामाजिक मानसिकता विकसित किए बिना यह संकट कम नहीं होगा। इस संदर्भ में तीन स्तरों पर गंभीर चिंतन की आवश्यकता है। पहला, परिवार। माता-पिता को यह समझना होगा कि अपेक्षा और दबाव में अंतर है।

अपेक्षा प्रेरणा देती है, दबाव भय पैदा करता है। बच्चों के साथ खुला संवाद, उनकी रुचियों को समझना, असफलता को स्वीकार्य बनाना और मानसिक स्वास्थ्य पर ध्यान देना अत्यंत आवश्यक है। ‘तुम्हें डॉक्टर बनना ही है’ की जगह ‘तुम जो बनना चाहो, हम साथ हैं’ जैसी सोच विकसित करनी होगी। दूसरा, शिक्षा संस्थान। स्कूल और कोचिंग संस्थानों को केवल परिणाम देने वाली मशीन नहीं, बल्कि संवेदनशील संस्थान बनना होगा। नियमित काउंसलिंग, तनाव प्रबंधन कार्यशालाएं और परीक्षा को जीवन-मरण का प्रश्न न बनाने की संस्कृति विकसित करनी होगी। शिक्षकों को भी विद्यार्थियों की मानसिक दशा पहचानने का प्रशिक्षण दिया जाना चाहिए। तीसरा, सरकार और समाज। मानसिक स्वास्थ्य सेवाओं को सुलभ और कलंकमुक्त बनाना होगा। परीक्षा प्रणाली में सुधार, वैकल्पिक करियर मार्गों को बढ़ावा, और कौशल आधारित शिक्षा पर जोर देना समय की मांग है। मीडिया को भी सनसनी की बजाय संवेदनशील रिपोर्टिंग करनी चाहिए।

सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि हम इन घटनाओं को सामान्य न मानें। हर आत्महत्या और हर हिंसक घटना हमारे सामाजिक ताने-बाने में दरार का संकेत है। यदि हम इसे केवल ‘व्यक्तिगत मामला’ कहकर टाल देंगे, तो आने वाले समय में ऐसी घटनाएं और बढ़ेंगी। लखनऊ की घटना हमें झकझोरती है। यह बताती है कि शिक्षा का दबाव, पारिवारिक संवादहीनता और मानसिक स्वास्थ्य की उपेक्षा मिलकर कितनी भयावह परिणति ला सकती है। अब समय है कि हम सामूहिक आत्ममंथन करें। शिक्षा को जीवन का उत्सव बनाएं, न कि भय का कारण। बच्चों को लक्ष्य दें, लेकिन उनके पंख न काटें। सपने दिखाएं, पर उन्हें सांस लेने की जगह भी दें। जब तक हम सफलता की परिभाषा को व्यापक नहीं करेंगे और बच्चों को अंक से अधिक मनुष्य मानना नहीं सीखेंगे, तब तक यह संकट बना रहेगा। परीक्षा का मौसम हर साल आएगा, लेकिन यदि हम संवेदनशील समाज बन सके, तो शायद अगली पीढ़ी के लिए यह मौसम भय का नहीं, आत्मविश्वास का प्रतीक बन सकेगा।

प्रेषकः

(ललित गर्ग)
लेखक, पत्रकार, स्तंभकार
ई-253, सरस्वती कंुज अपार्टमेंट
25 आई॰ पी॰ एक्सटेंशन, पटपड़गंज, दिल्ली-110092
मो. 9811051133

कीट डीम्ड विश्वविद्यालय,भुवनेश्वर(ओड़िशा) भारत का 22वां स्थापना दिवस पर यादगार समारोह

भुवनेश्वर। कीट डीम्ड विश्वविद्यालय,भुवनेश्वर(ओड़िशा),भारत के 22वें विश्वविद्यालय स्थापना दिवस के अवसर पर चार विशिष्ट अंतर्राष्ट्रीय विभूतियों को कीट लाइफटाइम अचीवमेंट अवॉर्ड से सम्मानित किया गया।

कीट डीम्ड विश्वविद्यालय, भुवनेश्वर (ओड़िशा),भारत के 22वें स्थापना दिवस के अवसर पर विशेष व्याख्यानमाला का आयोजन किया जबकि अवसर पर चार विशिष्ट अंतर्राष्ट्रीय विभूतियों को कीट लाइफटाइम अचीवमेंट अवॉर्ड से सम्मानित भी किया गया।सम्मानित अतिथि थे, जॉन ओपेनहैमर, संस्थापक एवं अध्यक्ष, कोलंबिया हॉस्पिटलिटी (अमेरिका) किरिण्डे ओसाजी नायक थिरो, मुख्य अधिष्ठाता, हनुपिटिया गंगाराम मंदिर, कोलंबो, के.एन. शांता कुमार, निदेशक,दी प्रिंटर्स(मैसूर) प्राइवेट लिमिटेड तथा बोर्ड सदस्य, प्रेस ट्रस्ट आफ इण्डिया.
गिट्रुल जिग्मे रिनपोचे, तिब्बती बौद्ध धर्म के आचार्य एवं आध्यात्मिक निदेशक, रीपा इंटरनेश्नल सेंटर, स्विट्ज़रलैंड।

अपने वक्तव्य में जॉन ओपेनहाइमर ने संस्थान की उन्मुक्त कण्ठ से सराहना की। उन्होंने कहा कि कीट प्रांगण उनकी कल्पना से परे है और यह समाज पर स्थायी प्रभाव डाल रहा है। उन्होंने विद्यार्थियों को संबोधित करते हुए कहा, “आप समाज, अपने परिवार, अपने देश और पूरी दुनिया के लिए महत्वपूर्ण योगदान देने की क्षमता रखते हैं। अपने हृदय की आवाज़ का अनुसरण करें—तब निर्णय लेना आसान हो जाता है।”

मीडिया जगत के वरिष्ठ व्यक्तित्व के. एन. शांता कुमार ने कहा, “कीट केवल एक संस्थान की कहानी नहीं, बल्कि एक दूरदृष्टि की कहानी है।” उन्होंने कहा कि भले ही मीडिया का स्वरूप तेजी से बदल रहा है, परंतु सत्य, विश्वसनीयता, सत्यापन और नैतिक पत्रकारिता आज भी इसकी आधारशिला हैं। उन्होंने विद्यार्थियों से जिज्ञासु बने रहने, विश्वसनीयता को महत्व देने और जिम्मेदार नागरिक पत्रकारिता को अपनाने का आह्वान किया।

डॉ. किरिंदे अस्साजी नायक थेरो ने इस दिन को “इतिहास का आध्यात्मिक पुनर्मिलन” बताया। उन्होंने कहा कि उन्होंने अनेक देशों और संस्थानों का दौरा किया है, किंतु करुणा, अनुशासन, मानवता और दूरदृष्टि का ऐसा समन्वय विरले ही देखने को मिलता है।

ग्येत्रुल जिग्मे रिनपोछे ने विनम्रता और करुणा पर बल देते हुए कहा, “सफलता पाने वाले बहुत होते हैं, परंतु विनम्र बने रहना ही सच्ची सफलता है।” उन्होंने ‘व्यावहारिक करुणा’ की बात करते हुए कहा कि इसके लिए जटिल दार्शनिक ज्ञान की आवश्यकता नहीं, बल्कि दूसरों के प्रति संवेदनशील हृदय ही पर्याप्त है। उन्होंने अपनी दादी के शब्दों को स्मरण करते हुए कहा, “देने से कोई गरीब नहीं होता। जो नहीं देते, वही सदा गरीब रहते हैं। गरीबी मन में होती है।”

स्वागत भाषण में महान् शिक्षाविद् संस्थापक, प्रेफेसर अच्युत सामंत ने अपने आभार संबोधन में बताया कि कीट की कामयाबी का सफर एक साहसिक स्वप्न और दृढ़ संकल्प के साथ प्रारंभ हुई थी।

उन्होंने कहा, “अब तक की हमारी सारी उपलब्धियाँ कीट-कीस-कीम्स के विद्यार्थियों और कर्मचारियों की हैं। यह उनकी सफलता है।”

इस प्रकार कीट डीम्ड विश्वविद्यालय,भुवनेश्वर(ओड़िशा) भारत का 22वां स्थापना दिवस केवल उपलब्धियों का उत्सव नहीं, बल्कि करुणा, सत्यनिष्ठा, विनम्रता और दूरदर्शी नेतृत्व के मूल्यों का भी उत्सव सिद्ध हुआ।

संस्कृत भाषा के शिलालेख और पौराणिक वास्तुकला: भोजशाला में हिंदू मंदिर तोड़कर ही बना था कमाल मौला मस्जिद

मध्य प्रदेश के धार में 24 फरवरी 2026 को भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) ने भोजशाला परिसर में स्थित कमाल मौला मस्जिद को लेकर वैज्ञानिक रिपोर्ट इंदौर हाई कोर्ट में को सौंपी। ASI ने रिपोर्ट में कहा कि कमाल मौला मस्जिद को प्राचीन मंदिरों के अवशेषों, स्थापत्य, शिल्प और शिलालेखों के टुकड़ों का उपयोग करके बनाया गया था और यह मौजूदा ढाँचा कई सदियों बाद बिना संतुलन और एक समान डिजाइन के तैयार किया गया था।

रिपोर्ट के अनुसार, ASI की टीम ने कुल 94 मूर्तियाँ और मूर्तिकला के हिस्से खोजे हैं, जिनमें भगवान गणेश, ब्रह्मा, नरसिंह, भैरव और तमाम पशु आकृतियाँ भी शामिल हैं और कई हिस्सों पर संस्कृत भाषा के शिलालेख भी मिले हैं, जो 12वीं से 16वीं सदी के माने जा रहे हैं। इन खोजों से यह संकेत मिलता है कि मंदिर शैली की वास्तुकला और कला पहले से यहाँ मौजूद थी।

वहीं सोमवार (23 फरवरी 2026) को भोजशाला की कमाल मौला मस्जिद विवाद पर इंदौर हाई कोर्ट में सुनवाई हुई। इस सुनवाई में जस्टिस विजय कुमार शुक्ला और जस्टिस आलोक अवस्थी की डिवीजन बेंच ने मामला सुना और ASI की जाँच रिपोर्ट को आगे की प्रक्रिया का आधार बनाया।

कोर्ट ने देखा कि ASI की 98 दिनों में तैयार की गई 2100 पन्नों और 10 खंडों की वैज्ञानिक सर्वे रिपोर्ट पहले ही सीलबंद लिफाफे से खोली जा चुकी है और इसकी प्रति सभी पक्षों को पहले ही दी जा चुकी है। इसके बावजूद किसी पक्ष ने अभी तक इस रिपोर्ट पर कोर्ट में आपत्तियाँ, सुझाव या टिप्पणियाँ नहीं दी हैं।

अदालत ने कहा कि रिपोर्ट में जिन प्राचीन प्रमाणों, शिलालेखों , मूर्तियों, सिक्कों और शोध निष्कर्षों का उल्लेख है, उस पर सभी पक्षों को अपनी लिखित आपत्तियाँ और राय कोर्ट में दो हफ्तों के भीतर पेश करना आवश्यक है। इसीलिए सभी याचिकाकर्ताओं और प्रतिवादियों को 2 हफ्तों की मोहलत दी गई है।

कोर्ट ने यह भी साफ निर्देश दिया है कि यथास्थिति को बनाए रखा जाए, यानी वर्तमान में चल रही पूजा-नमाज की व्यवस्था में कोई बदलाव वहीं होगा, जब तक कोर्ट का अगला फैसला नहीं आता। अगली सुनवाई 16 मार्च 2026 को होगी, जब कोर्ट इन आपत्तियों और सुझावों पर फैसला सुनेगी।

क्या है भोजशाला विवाद?

बता दें कि भोजशाला विवाद सालों से धार्मिक और ऐतिहासिक रूप से संगीन मामला रहा है। हिंदू समुदय इसे वाग्देवी मंदिर के तौर पर पूजता है, जबकि मुस्लिम पक्ष इसे कमाल मौला मस्जिद बताता है। ASI की रिपोर्ट इसी आधर पर तैयार की गई थी और अब कोर्ट ने दोनों समुदायों से अपने दावे और आपत्तियाँ प्रस्तुत करने को कहा है, ताकि अंतिम निर्णय लिया जा सके।

 

धार भोजशाला मामले में भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई) की जिस रिपोर्ट को सुप्रीम कोर्ट सीलबंद मान रहा था, वह दो साल से पक्षकारों के पास है। यह खुलासा सोमवार को उस वक्त हुआ जब हाई कोर्ट ने मामले की सुनवाई करते हुए सर्वेक्षण रिपोर्ट के बारे में जानकारी मांगी।

महाधिवक्ता प्रशांत सिंह ने कोर्ट को बताया कि सर्वेक्षण रिपोर्ट पूर्व में ही पक्षकारों को सौंपी जा चुकी है, लेकिन यह जानकारी न शासन ने सुप्रीम कोर्ट को दी न पक्षकारों ने, हालांकि इसके पीछे किसी की कोई दुर्भावना नहीं थी।

इस पर कोर्ट ने कहा कि रिपोर्ट पक्षकारों के पास है, वे चाहें तो इसे लेकर अपने सुझाव, आपत्ति 16 मार्च से पहले लिखित में कोर्ट में दे सकते हैं। आपत्ति, सुझाव पर सुनवाई के बाद कोर्ट इस मामले को अंतिम सुनवाई के लिए नियत कर देगी।

बता दें कि भोजशाला मामले को लेकर हाई कोर्ट में चार याचिकाएं और एक अपील चल रही है। सोमवार को इन सभी की सुनवाई एक साथ हुई। हाई कोर्ट की युगलपीठ ने 11 मार्च 2024 को एएसआई को आदेश दिया था कि वह ज्ञानवापी की तरह भोजशाला का भी विज्ञानी सर्वे कर रिपोर्ट प्रस्तुत करे।

यह सर्वे 98 दिन चला जिसके बाद एएसआई ने 2189 पेज की सर्वे रिपोर्ट तैयार की थी। 4 जुलाई 2024 को हाई कोर्ट के आदेश पर इस रिपोर्ट की प्रतिलिपि सभी पक्षकारों को उपलब्ध करवाई गई थी। इस बीच यह मामला सुप्रीम कोर्ट चला गया जिसके बाद कोर्ट ने रिपोर्ट सीलबंद लिफाफे में रखने के आदेश दिए थे।

जिन पक्षकारों के पास एएसआई सर्वे रिपोर्ट की प्रति है उन्होंने बताया कि-एएसआई ने अपनी रिपोर्ट में कहा है कि सर्वे में पाए गए स्तंभों और स्तंभों की कला और वास्तुकला से यह कहा जा सकता है ये स्तंभ पहले मंदिर का हिस्सा थे, बाद में मस्जिद के स्तंभ बनाते समय उनका पुन: उपयोग किया गया था।

मौजूदा संरचना में चारों दिशाओं खड़े 106 और आड़े 82 इस तरह से कुल 188 स्तंभ मिले हैं। इन सभी की वास्तुकला से इस बात की पुष्टि होती है कि ये स्तंभ मूल रूप से मंदिरों का ही हिस्सा थे।

उन्हें वर्तमान संरचना के लिए पुनर्उपयोग में लाने के लिए उन पर उकेरी गई देवताओं और मनुष्यों की आकृतियों को विकृत कर दिया गया।

मानव और जानवरों की कई आकृतियां, जिन्हें मस्जिदों में रखने की अनुमति नहीं है, उन्हें छैनी जैसे किसी वस्तु का इस्तेमाल कर विकृत किया गया था।

एएसआई ने रिपोर्ट में यह दावा भी किया है कि मौजूदा संरचना में संस्कृत और प्राकृत भाषा में लिखे कई शिलालेख मिले हैं, जो भोजशाला के ऐतिहासिक, साहित्यिक और शैक्षिक महत्व को उजागर करते हैं।

एएसआई टीम को सर्वे में एक ऐसा शिलालेख मिला जिस पर परमार वंश के राजा नरवर्मन का उल्लेख है। नरवर्मन ने 1094-1133 इस्वी के बीच शासन किया था। सर्वे में यह बात भी सामने आई है कि पश्चिम क्षेत्र में लगाए गए कई स्तंभों पर उकेरे गए ”कीर्तिमुख”, मानव, पशु और मिश्रित चेहरों वाले सजावटी सामग्री को नष्ट नहीं किया गया था।