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पत्रकार बीआर चोपड़ा को आईएस जौहर ने फिल्म निर्माता बना दिया

आज बी.आर.चोपड़ा जी की पुण्यतिथि है। 5 नवंबर 2008 को बी.आर.चोपड़ा जी का देहांत हुआ था। बी.आर. चोपड़ा साहब के पिता चाहते थे कि ये पढ़-लिखकर कोई बड़े सरकारी अफसर बनें। वो खुद भी सरकारी अफसर थे। बीआर चोपड़ा पढ़ने-लिखने में बहुत अच्छे थे। और साथ ही साथ वो खेलकूद में भी खूब हिस्सा लेते थे। ये उन दिनों की बात है जब देश का विभाजन नहीं हुआ था। और बीआर चोपड़ा व इनका परिवार लाहौर में रहता था।

पिता की ख्वाहिश पूरी करने के इरादे से बीआर चोपड़ा ने आई.सी.एस (Indian Civil Service) की तैयारी करनी शुरू कर दी। लेकिन एग्ज़ाम से कुछ ही दिन पहले ये बीमार हो गए। नतीजा, ये उस परीक्षा में फेल हो गए। इनका दिल बहुत दुखा। हालांकि इनके पिता ने इन्हें लंदन जाकर आईसीएस की तैयारी करने का सुझाव दिया था। लेकिन इन्होंने मना कर दिया। ये कहकर कि अगर भगवान को मुझे आईसीएस अफसर ही बनाना होता तो वो यहीं बना देते। बीआर चोपड़ा तय कर चुके थे कि इन्हें अब सरकारी नौकरी करनी ही नहीं है।

एक अच्छी बात बीआर चोपड़ा जी के साथ ये रही कि जब ये बीए कर रहे थे तो इन्हें लिखने का शौक हो गया था। और चूंकि उस ज़माने में इनके आस-पास के लोग सिनेमा के बड़े फैन थे तो इन्हें भी सिनेमा में दिलचस्पी होने लगी थी। ये भी चाहते थे कि किसी दिन इन्हें भी अखबारों के लिए लिखने का मौका मिले। फिर एक दिन इन्होंने कलकत्ता के एक अखबार के लिए अंग्रेजी में एक आर्टिकल लिखा। उस अखबार का नाम था वैरायटीज़ (Varieties)। वो अखबार न्यू थिएटर्स नामक उस वक्त के कलकत्ता के एक बहुत बड़ी फिल्म प्रोडक्शन कंपनी के सहयोग से निकलता था।

बीआर चोपड़ा के उस आर्टिकल का टाइटल था “Round the Indian Screen”। अपने उस आर्टिकल में बीआर चोपड़ा ने कुछ फिल्मों को क्रिटिसाइज़ करते हुए लिखा कि अब फिल्मों में स्टोरी कुछ भी नहीं है। बस गाने डाले जाते हैं। वो भी बहुत खास नहीं होते। इन्हें यकीन था कि इनका आर्टिकल ज़रूर छपेगा। लेकिन नहीं छपा। इन्होंने फिर से एक नया आर्टिकल लिखकर कलकत्ता भेजा। मगर वो भी अखबार वालों ने नहीं छापा। तब इन्होंने फैसला किया कि अब ये बस एक आर्टिकल और लिखकर कलकत्ता भेजेंगे। अगर वो भी नहीं छपा तो फिर नहीं लिखेंगे।

तीसरा आर्टिकल लिखकर इन्होंने कलकत्ता भेज दिया। और फिर कुछ दिन बाद ये अपने कॉलेज जा रहे थे कि इन्हें एक पार्सल मिला। वो पार्सल उस अखबार के एडिटर की तरफ से आया था। एडिटर ने उसमें लिखा था कि हमें आपके तीनों आर्टिकल्स मिले। और हमें बहुत अच्छे लगे। लेकिन दुर्गा पूजा की छुट्टियों की वजह से हम उन आर्टिकल्स को छाप नहीं सके हैं। लेकिन अब हमने एक ही अंक में तीनों आर्टिकल्स को छाप दिया है। एडिटर ने बीआर चोपड़ा को उस अखबार का लाहौर कॉन्ट्रीब्यूटर बनने का ऑफर भी दे दिया। जिसे इन्होंने स्वीकार भी कर लिया। और देश का विभाजन होने तक ये उस अखबार के लिए लिखते रहे।

विभाजन के बाद जब बीआर चोपड़ा अपने परिवार संग लुधियाना स्थित अपने पुश्तैनी मकान में आकर रहने लगे तो वहां इनकी मुलाकात इनके पिता के कुछ दोस्तों से हुई। उनमें से एक ने इनसे कहा, “बलदेव, क्यों ना हम मिलकर फिल्में बनाएं?” उनकी इस बात के जवाब में बीआर चोपड़ा जी ने कहा कि मैं तो फिल्में बनाना जानता ही नहीं हूं। मैं कैसे फिल्में बना पाऊंगा। तो इनके पिता के वो दोस्त बोले, “करना क्या है। हमें एक कहानी लेनी है। एक्टर्स लेने हैं। डायरेक्टर लेना है और फिल्म बनने में जो पैसा खर्च होगा वो लगाना है। यही तो सब करते हैं।”

आखिरकार बीआर चोपड़ा उनके साथ बॉम्बे आ गए। कुल मिलाकर ये पांच पार्टनर थे। पैसा उन्होंने लगाया था। बीआर चोपड़ा की ज़िम्मेदारी थी कि फिल्म अच्छी बन रही है या बुरी, इसकी खबर रखना। लेकिन मुंबई आने के बाद बीआर चोपड़ा का अपने उन पाचों पार्टनर्स से मतभेद हो गया। इस बात पर कि उन्हें किस तरह की फिल्म बनानी चाहिए। बीआर चोपड़ा चाहते थे कि कोई नई और हटकर कहानी वाली फिल्म बनानी चाहिए। लेकिन अन्य लोगों का मानना था कि वो फिल्म बनानी चाहिए जो आजकल चल रही हैं। चूंकि पैसा वो लोग लगा रहे थे तो बीआर चोपड़ा को चुप होना पड़ा।

फिर बीआर चोपड़ा के उन पार्टनर्स ने जो फिल्म बनाई थी उसका नाम था “करवट”। उस फिल्म में जीवन साहब और लीला मिश्रा जी ने काम किया था। और वो फिल्म बुरी तरह फ्लॉप हो गई। फिल्म फ्लॉप हुई तो इनके सभी पार्टनर्स लुधियाना वापस लौट गए। लेकिन बीआर चोपड़ा मुंबई में ही रहे। उन्होंने सोचा कि वो यहीं रहकर किसी अखबार में नौकरी कर लेंगे। इत्तेफाक से हिंदुस्तान टाइम्स के उस वक्त के एडिटर इन चीफ दुर्गादास इनके रिश्तेदार थे। उन्होंने बीआर चोपड़ा को आश्वासन दे दिया कि वो इन्हें नौकरी दिला देंगे। साथ ही जब उन्हें पता चला कि बीआर चोपड़ा फिल्ममेकर बनना चाहते हैं तो उन्होंने भी इन्हें इसके लिए काफी प्रोत्साहित किया।

इसके बाद तो बीआर चोपड़ा जी ने नौकरी के साथ-साथ फिल्म बनाने के अपने ख्वाब को पूरा करने के लिए भी हाथ पैर मारने शुरू कर दिए। वो बॉम्बे के एक ऐसे रेस्टोरेंट में जाकर बैठने लगे जहां संघर्षरत फिल्म कलाकार व लेखक आते थे। और इत्तेफाक से वहां इनकी कई लोगों से जान-पहचान भी हो गई। ये फिल्ममेकर बनने के ख्वाब तो देखते थे, लेकिन इन्हें पता ही नहीं था कि इन्हें करना क्या है — कहानी कहां से लेनी है, फाइनेंसर कैसे ढूंढना है।

एक दिन वो उस रेस्टोरेंट में बैठे हुए थे कि एक आदमी इनके पास आया। उस आदमी से इनकी जान-पहचान पहले ही हो चुकी थी। उस आदमी ने इनसे पूछा कि क्या तुम्हारे पास कोई स्टोरी है जिस पर तुम फिल्म बनाना चाहते हो। इन्होंने इन्कार कर दिया। तब वो आदमी इन्हें अपने साथ एक जगह ले गया और उसने इन्हें अपनी लिखी एक कहानी सुनाई। वो कहानी चोपड़ा साहब को बहुत पसंद आई। इन्होंने तय कर लिया कि ये इसी कहानी पर फिल्म बनाएंगे। और उस आदमी को फिल्म में क्रेडिट भी देंगे। वो आदमी था ज़बरदस्त एक्टर और राइटर रहे आई.एस. जौहर साहब। और वो फिल्म जिसकी कहानी उस दिन आई.एस. जौहर ने बीआर चोपड़ा को सुनाई थी, वो थी फिल्म “अफसाना” की कहानी। बीआर चोपड़ा की पहली फिल्म की कहानी।

भले ही विकिपीडिया पर बीआर चोपड़ा की पहली फिल्म “करवट” बताई जाती हो, लेकिन वो फिल्म इन्होंने डायरेक्ट नहीं की थी। वो फिल्म एक दूसरे डायरेक्टर प्रकाश ने बनाई थी। पर चूंकि बीआर चोपड़ा उस फिल्म के साथ जुड़े थे तो अक्सर लोग करवट को इनकी पहली फिल्म मान लेते हैं। जो कि सही नहीं है। खैर, आई.एस. जौहर की कहानी तो बीआर चोपड़ा साहब को बहुत पसंद आ गई। लेकिन अब चुनौती थी फिल्म बनाने के लिए किसी ऐसे आदमी को तलाश करना, जो पैसे लगा सके — यानी फाइनेंसर ढूंढना। अब चूंकि बीआर चोपड़ा को तो भेजा ही इस धरती पर फिल्मकार बनने के लिए, तो किस्मत से इनका फिल्म इंडस्ट्री में आने का रास्ता अपने आप बनता चला गया।

उसी रेस्टोरेंट में बीआर चोपड़ा साहब से एक दिन इनका एक पुराना जानकार मिला। उसका नाम था गोवर्धन दास अग्रवालबीआर चोपड़ा इन्हें लाहौर से ही पहचानते थे। विभाजन के बाद ये भी मुंबई आ गए थे और अब ये भी फिल्मों में पैसा लगाना चाहते थे। गोवर्धन दास अग्रवाल को जब पता चला कि बीआर चोपड़ा फिल्म बनाना चाहते हैं तो उन्होंने इनसे पूछा कि क्या तुम्हारे पास कोई स्टोरी है। चोपड़ा साहब ने उन्हें आई.एस. जौहर वाली स्टोरी के बारे में बताया। उन्होंने स्टोरी सुनाने को कहा तो चोपड़ा साहब ने उन्हें स्टोरी भी सुना दी। गोवर्धन दास अग्रवाल को भी वो स्टोरी बहुत पसंद आई। उन्होंने वादा किया कि वो इस फिल्म पर पैसा लगाएंगे।

ये सुनकर बीआर चोपड़ा जी बहुत खुश हुए। उन्होंने गोवर्धन दास अग्रवाल से कहा कि चलिए तो कास्ट और डायरेक्टर फाइनल करते हैं। तब गोवर्धन दास अग्रवाल ने कहा कि डायरेक्टर तो तुम ही होगे। तभी मैं पैसा लगाऊंगा। ये मेरी शर्त है। बीआर चोपड़ा बड़े हैरान हुए। क्योंकि वो तो जानते ही नहीं थे कि फिल्म कैसे बनाई जाती है। उन्होंने गोवर्धन दास अग्रवाल को बताया भी कि मैं नहीं जानता फिल्म कैसे डायरेक्ट की जाती है। लेकिन वो अपनी ज़िद पर अड़े रहे। उन्होंने बीआर चोपड़ा साहब से कह दिया कि या तो तुम खुद इस फिल्म को डायरेक्ट करो, या फिर हम इस फिल्म को भूल जाते हैं।

अब बीआर चोपड़ा के पास कोई चारा ना था। उन्होंने तय किया कि वो जानकारी जुटाएंगे और खुद फिल्म डायरेक्ट करेंगे। फिल्म की कास्टिंग शुरू हुई और अशोक कुमार, वीना, जीवन, कुलदीप कौर, प्राण और कुक्कू मोरे जी को फाइनल किया गया। बात जब डायरेक्शन की आई तो बीआर चोपड़ा ने तय किया कि वो किसी कैमरामैन को लेंगे और उसे अपनी ज़रूरत के हिसाब से शॉट बता देंगे। और इस तरह फिल्म कंप्लीट कर ली जाएगी। किसी ने बीआर चोपड़ा से कहा कि कोई अच्छा कैमरामैन हायर कर लो ताकि फिल्म अच्छी बन जाए। लेकिन उन्होंने उस आईडिया को रिजेक्ट कर दिया। क्योंकि उनका मानना था कि अगर अच्छा कैमरामैन लिया गया तो वो फिर अपने हिसाब से काम करेगा। जबकि ये इस फिल्म को अपने मुताबिक बनाना चाहते हैं।

आखिरकार साल 1951 में बीआर चोपड़ा की पहली फिल्म “अफसाना” रिलीज़ हो गई। जिस दिन इस फिल्म का पहला शो था, बीआर चोपड़ा की पत्नी ने शो पर आने से इन्कार कर दिया था। क्योंकि उन्हें लग रहा था कि फिल्म फ्लॉप हो जाएगी। और फिल्म लोगों को इतनी बुरी लगेगी कि लोग अंडे और जूते स्क्रीन की तरफ फेंकने लगेंगे। लेकिन ऐसा कुछ भी नहीं हुआ। बल्कि लोगों ने इस फिल्म को बहुत ज़्यादा पसंद किया। और फिल्म सुपर-डूपर हिट हो गई। यूं इस तरह भारतीय सिनेमा को मिले बी.आर. चोपड़ा — जिन्होंने आगे चलकर एक ही रास्ता, नया दौर, साधना, कानून, गुमराह, हमराज़, दास्तान, धुंध, पति पत्नी और वो, इंसाफ का तराज़ू और निकाह जैसी फिल्में बनाई। कई फिल्में प्रोड्यूस कीं और महाभारत सहित कई नामी व चर्चित टीवी शोज़ भी बनाए।

साभार: https://www.facebook.com/share/p/17ViXpJGLD/

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वेदों के चार काण्ड

वेदों का मुख्य तात्पर्य परमेश्वर ही के प्राप्त कराने और प्रतिपादित करने में है (स. प्र. ८३, ऋ. भू. २१०)। इस लोक और परलोक के व्यवहारों के फलों की सिद्धि और यथावत् उपकार करने के लिए सब मनुष्यों को वेदों के विज्ञान, कर्म, उपासना और ज्ञान इन चार विषयों के अनुष्ठान में पुरुषार्थ करना (ऋ. भू. २६१) चाहिये। क्योंकि इससे धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष की सिद्धि होती है और यही मनुष्य-देह धारण करने का फल है (ऋ. भू. ९८-९९, १४३)। उ. उप. मं. ४- पृ. ३९, यहां तीन काण्ड लिखे हैं।

(१) विज्ञान काण्ड- उसको कहते हैं कि सब पदार्थों का यथार्थ जानना अर्थात् परमेश्वर से लेके तृणपर्यन्त पदार्थों का साक्षात् बोध होना और उनसे यथावत् उपयोग लेना व करना। यह विषय इन चारों में भी प्रधान है, क्योंकि इसी में वेदों का मुख्य तात्पर्य है। परिणामतः विज्ञान दो प्रकार का है-

(क) परमेश्वर का यथावत् ज्ञान और उसकी आज्ञा का बराबर पालन करना।
(ख) उसके रचे हुए सब पदार्थों (=प्राकृतिक वस्तुओं) के गुणों को यथावत् विचार करके उनसे कार्य सिद्ध करना अर्थात् कौन-कौन से पदार्थ किस-किस प्रयोजन के लिए रचे हैं, इसका जानना।

(२) कर्मकाण्ड- यह सब क्रिया प्रधान ही होता है। इसके बिना विद्याभ्यास और ज्ञान पूर्ण नहीं हो सकते। क्योंकि बाह्य व्यवहार तथा मानस व्यवहार का सम्बन्ध बाहर और भीतर दोनों के साथ होता है (ऋ. भू. १००-१०२, १४१)। वह अनेक प्रकार का है, किन्तु उसके दो मुख्य भेद हैं-

एक- परमार्थ भाग। इससे परमार्थ की सिद्धि करनी होती है। इसमें ईश्वर की स्तुति, प्रार्थना, उपासना, उसकी आज्ञा पालन करना, न्यायाचरण अर्थात् धर्म का ज्ञान और अनुष्ठान यथावत् करना। मनुष्य इसके द्वारा मोक्ष-प्राप्ति में प्रवृत्त होता है। जब मोक्ष अर्थात् केवल परमेश्वर की ही प्राप्ति के लिए धर्म से युक्त सब कर्मों का यथावत् पालन किया जाय तो यही निष्काम मार्ग है, क्योंकि इसमें संसार के भोगों की कामना नहीं की जाती। इसका फल सुखरूप और अक्षय होता है।

दूसरा मार्ग- लोकव्यवहार सिद्धि। इससे धर्म के द्वारा अर्थ, काम और उनकी सिद्धि करने वाले साधनों की प्राप्ति होती है। यह सकाम मार्ग है, क्योंकि इसमें संसार के भोगों की इच्छा से, धर्मानुसार अर्थ और काम का सम्पादन किया जाता है। इसलिए इसका फल नाशवान् होता है, जन्म-मरण का चक्र छूटता नहीं।
अग्निहोत्र से ले के अश्वमेध (राष्ट्रसेवा, राष्ट्रपालन, देश-रक्षण, राष्ट्र-समृद्धि, राष्ट्रविस्तार) पर्यन्त यज्ञ आदि इसके अन्तर्गत हैं।

विहित और निषिद्ध रूप में कर्म दो प्रकार के होते हैं। वेद में कर्त्तव्यरूप से प्रतिपादित ब्रह्मचर्य, सत्यभाषणादि विहित हैं, वेद में अकर्त्तव्यरूप से निर्दिष्ट व्यभिचार, हिंसा, मिथ्याभाषणादि निषिद्ध हैं। विहित का अनुष्ठान करना धर्म, उसका न करना अधर्म और निषिद्ध का करना अधर्म और न करना धर्म हैं (स. प्र. ४१७, ११ समु.)

(३) उपासना काण्ड- जैसे ईश्वर के गुण, कर्म, स्वभाव पवित्र हैं, उनको वैसा जान अपने को वैसा करना, योगाभ्यास द्वारा इनका साक्षात् करना, जिससे परमेश्वर के ही आनन्दस्वरूप में अपने आत्मा को मग्न करना होता है, उसको उपासना कहते हैं। यह कोई यान्त्रिक व ज्ञानरहित क्रिया नहीं, जैसे बिना समझे किसी शब्द का या वाक्य का बार-बार जप करना।

(४) ज्ञान काण्ड- वस्तुओं के साधारण परिचय को ज्ञान कहते हैं (स. प्र. ४४, २ समु.)
(क) उपासना-काण्ड, ज्ञान-काण्ड तथा कर्मकाण्ड के निष्काम भाग में भी परमेश्वर ही इष्टदेव, स्तुति, प्रार्थना, पूजा और उपासना करने के योग्य है। कर्मकाण्ड के निष्काम भाग में तो सीधे परमात्मा की प्राप्ति की ही प्रार्थना की जाती है परन्तु उसके सकाम भाग में अभीष्ट विषय के भोग की प्राप्ति के लिये परमात्मा की प्रार्थना की जाती है।

[स्त्रोत- परोपकारी : महर्षि दयानन्द सरस्वती की उत्तराधिकारिणी परोपकारिणी सभा का मुखपत्र का अप्रैल द्वितीय २०१९ का अंक]

पुस्तक मेले में भीड़ तो जुटती है, लौटते समय थैले में किताब के कैटेलॉग अधिक होते हैं…

साहित्य को पाठकों का टोटा आजादी के बाद भी था और आज भी है। साहित्यकार हैं, साहित्य भी है पर पाठक कहां हैं? चिंता जाहिर हैं, जन – जन तक साहित्य कैसे पहुंचे? साहित्य और पाठक के इस अंतर्संबंध को शिद्दत से रेखांकित किया वरिष्ठ पत्रकार अरविंद कुमार सिंह ने। अवसर था 2 नवंबर 25 को दिल्ली के पब्लिक पुस्तकालय में युवा उत्कर्ष साहित्यिक मंच न्यास के 12 वें अखिल भारतीय साहित्य समारोह का आयोजन। मुझे भी बतौर पुरस्कार प्राप्तकर्ता सम्मिलित होने का मौका मिला।

समारोह में विभिन्न साहित्यिक विषयों पर परिचर्चा में विशिष्ठ अतिथि पत्रकार अरविंद कुमार सिंह के विचार सुने। उन्होंने “समाचार पत्रों से विलुप्त होता साहित्य” विषय पर अपने विचार व्यक्त किए। पत्रकार होने के नाते उनकी साहित्य, समाचार पत्रों में प्रकाशित होने वाले साहित्य और पाठक को लेकर अनुभवजनित विचार मेरे मन को भी छू गए।

साहित्य को पाठक नहीं, की चिंता को उनके साथ – साथ मैंने भी महसूस किया और साहित्यिक पत्रकारिता के अंतर्गत पिछले दो वर्ष से कोटा में नई बढ़ती पौध बच्चों में साहित्य की समझ पैदा कर उनमें साहित्य अनुराग जीवित करने का अभियान चला रखा है। उद्देश्य यही है साहित्यकार भी बने और पाठक भी। इसमें कोटा के साथ हाड़ोती अंचल के कुछ साहित्यकार आगे आए हैं और मेरे साथ कंधे से कंधा मिला कर इस मुहिम में सक्रिय हैं।

जब मैं उनके विचार सुन रहा था मुझे वे अपने ही मन की बात नजर आ रही थी। मेरे मन की बात कह रहे थे अरविंद भाई। वे कह रहे थे आज़ादी के समय 1949 में जब करीब आठ हज़ार पत्र और पत्रिकाएं थी तब उनमें साहित्य का प्रकाशन भरपूर होता था। उस समय की पत्रकारिता की खूबी थी कि उस समय के समाचार पत्रों ने कई बड़े लेखकों को जन्म दिया। ज्यादातर साहित्यकार ही समाचार पत्र-पत्रिकाओं के संपादक हुआ करते थे। उन्होंने बताया अज्ञेय से लेकर रघुवीर सहाय तक जैसे अनेक मूर्धन्य साहित्यकारों ने अखबारों में साहित्य का भरपूर प्रकाशन किया। हर समाचार पत्र में एक साहित्य संपादक हुआ करता था, लंबे समय तक यह परम्परा चलती रही और आज साहित्य संपादक की संस्था डगमगा गई है तथा कुछ ही समाचार पत्रों में दिखाई देती हैं। समाचार पत्र से साहित्य का बहुत कम प्रकाशन होना साहित्य संपादक की कड़ी का विलुप्त हो जाना भी है।

उनके इस तथ्य को मैने भी महसूस किया और देखा 70 और 80 के दशकों में एक पूरा पृष्ठ, कभी-कभी दो पृष्ठ साहित्य के नाम होते थे। लेखकों को भरपूर स्थान मिलता था। अच्छे समाचार पत्र कुछ प्रोत्साहन राशि प्रदान कर लेखक के इस अहसास को बल प्रदान करते थे कि मेरी रचना किसी अखबार में छपी है। आज साहित्य का स्थान समाचार पत्रों में या तो विलुप्त हो गया या फिर बहुत सीमित रह गया है। इस सीमित स्थान में भी बड़ी जगह खुद उनके संपादक अथवा विशिष्ठ साहित्यकार के लिए रहती है, साहित्यिक रचनाएं गिनती की होती हैं। धर्म, दर्शन, स्वास्थ्य, फिल्म आदि पर एक पूरा पृष्ठ रहता है परन्तु साहित्य पृष्ठ हाशिए पर आ गया है।

अनुभव बताता है स्वयं साहित्यकारों का भी पाठक के रूप में साहित्य से संबंध निरंतर कम हो रहा है। पठन वृति कम हो रही है, लिखने, छपने, किसी समारोह में अतिथि बनने, सम्मानित होने पर ही जोर दिखाई देता है। जिस कृति को वे स्वयं लोकार्पित कर साथ ले आते हैं, अपवाद को छोड़ कर उसे भी देखते तक नहीं और वह अलमारी की शोभा बन जाती है।

इसी भाव को रेखांकित करते हुए अरविंद ने कहा दिल्ली के पुस्तक मेले में लोग की भीड़ तो बहुत जुटती है परन्तु लौटते समय उनके थैले में किताब के कैटेलॉग अधिक होते हैं। साहित्य के पाठक कम होना चिंता का विषय है और समस्या है की जन-जन तक साहित्य कैसे पहुंचे?

बच्चों को तो हम यह कह कर दोष मढ़ देते हैं कि वे हर समय मोबाइल से जुड़े रहते हैं, कविता, कहानी पढ़ते भी हैं तो इंटरनेट से, अब ऐसे साहित्यकारों को क्या कहें कि किस वजह से ये किताबें नहीं पढ़ते हैं, फिर आम जन से उम्मीद क्यों? बात रुचि की भी है, ऐसे – ऐसे लोग भी हैं जो साहित्यकार नहीं हो कर भी पुस्तकें पढ़ने का शौक रखते हैं। दिल्ली जाने से कुछ दिन की साहित्यकार डॉ. वैदेही गौतम जी के निवास पर जाना हुआ, वहां चर्चा के दौरान ज्ञात हुआ कि उनके पतिदेव संदीप जी जो एक व्यवसायिक हैं और पुस्तकें पढ़ने की जबरदस्त रुचि रखते हैं। कई क्षेत्रों में उनका ज्ञान उस क्षेत्र के ही व्यक्ति से कहीं ज्यादा और पुख्ता है।

प्रतिक्रियाओं को देखें तो साहित्यकार एवं पत्रकार रामकिशोर उपाध्याय इस पर कहते हैं लेखकों की इस शाश्वत चिंता के विकल्प खोजने होंगे। अरविन्द कुमार सिंह के स्वर में स्वर मिलाकर इस चिंता को रेखांकित किया गया है। कोटा के साहित्यकार डॉ. अतुल चतुर्वेदी का कहना है साहित्य और उसके पाठक दोनों कम हुए हैं। जितेंद्र निर्मोही का कहना है हर समारोह एक सीख देता है। झालावाड़ के कवि रूप जी रूप कहते है यदा कदा ऐसे विचार आँखें भी खोलते हैं। कोटा के कथाकार और समीक्षक विजय जोशी इस अभिव्यक्ति पर कहते है कि साहित्यिक सन्दर्भों का गहराई से विश्लेषण करती यह अभिव्यक्ति सप्रसंग सार्थक संवाद को उभारती है तथा साहित्य, साहित्यकार एवं पाठक के अन्तर्सम्बन्धों को विवेचित करती है।

यहां अब इस विमर्श को विराम देते हैं। समाचार पत्रों में साहित्य की कमजोर स्थिति और पाठकों की कमी के रहते हुए भी उम्मीद का दिया जलता रहेगा, नए विकल्प आयेंगे, राज्य सरकारें साहित्यकारों को और अधिक प्रोत्साहन देगी। सार्थक परिचर्चा के लिए मंच अध्यक्ष डॉ. रामकिशोर उपाध्याय जी को साधुवाद।

– डॉ. प्रभात कुमार सिंघल
लेखक एवं स्वतंत्र पत्रकार, कोटा

महिला क्रिकेट में एक नये युग का आरम्भ

दो नवंबर 2025 का दिन भारतीय महिला क्रिकेट के इतिहास में स्वर्णिम अक्षरों में लिखा जाएगा। इस दिन भारत की महिला क्रिकेट टीम ने कप्तान हरमनप्रीत कौर  के नेतृत्व में विश्व विजेता बनने का गौरव प्राप्त किया।कप्तान हरमनप्रीत का नाम भी अब उसी प्रकार स्वर्णिम अक्षरों में लिखा जाएगा जिस प्रकार से पुरुष क्रिकेट में कपिल देव का लिखा जाता है। एक समय यह दिवास्वप्न लग रहा था क्योंकि लगातार तीन लीग मैच हारने के बाद भारत के लिए सेमीफाइनल में भी पहुंचना बहुत कठिन था किन्तु  भारत की बेटियों ने धैर्य के साथ अपना सर्वश्रेष्ठ दिया और भारतीय महिला क्रिकेट को यह अभूतपूर्व सफलता मिली।

आज इस महान उपलिब्ध पर  घर  -घर चर्चा हो रही है। महिला विश्व कप में विजय का उत्सव  हर भारतीय ने उसी प्रकार मनाया जिस प्रकार 1983 का पुरुष विश्व कप जीतने के बाद मनाया था। बेटियों के अभूतपूर्व प्रदर्शन  पर हर तरफ आनंद ही आनंद बिखरा है, इसका उल्लेख प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने बिहार विधानसभा चुनावो की अपनी रैलियों मे भी किया है। विजयी टीम कि सभी बेटियों के संघर्ष की कहानियां मीडिया के माध्यम से समाज के समक्ष राखी जा रही हैं  जिससे भविष्य की उन बेटियों को प्रेरणा मिल सके जो क्रीड़ा जगत में कैरियर बनाना चाहती रही हैं। हमारी बेटियों ने महिला क्रिकेट में आस्ट्रैलिया व इंग्लैड जैसे देशों का वर्चस्व ध्वस्त करने मे सफलता प्राप्त की है।

भारत के महिला क्रिकेट को इन ऊचाइयों तक ले जाने में आईसीसी  के वर्तमान अध्यक्ष व भारतीय  क्रिकेट बोर्ड के पूर्व अध्यक्ष जय शाह कि दूरदर्शी सोच तथा भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण रही है। महिला क्रिकेट को सबसे अधिक बढ़ावा उनके कार्यकाल में ही मिला है। जय शाह के कार्यकाल में पहली बार महिला क्रिकेट खिलाडियों का वेतनमान पुरुष खिलाड़ियों के समकक्ष किया गया। स्मरणीय है कि 2005  में इन्हीं महिला खिलाड़ियों  को मैच फीस के रूप में मात्र  एक हजार रुपए मिला करते थे। जय शाह के कार्यकाल में महिलाओं  के लिए आईपीएल लीग का आरम्भ किया गया। महिला क्रिकेट टीम के लिए अधिक से अधिक खेल व अभ्यास के अवसर उपलब्ध कराने के उददेश्य से दूसरे देशों के साथ द्विपक्षीय श्रृखलाओं की संख्या लगातार बढ़ाई गई। जय शाह की अध्यक्षता में महिला क्रिकेट को बढ़ावा देने के लिए किए गए प्रयासों का परिणाम अब सामने है। वर्ष 2025 भारतीय महिला क्रिकेट के लिए स्वर्णिम है क्योकि इस वर्ष भारत ने दो विश्व कप जीतकर इतिहस रचा है पहले भारतीय टीम ने अंडर -19 का खिताब जीता और अब यह विश्व कप जीतने मे सफलता प्राप्त की है।

जिन महिला क्रिकेट खिलाडियों को कभी मैच फी भी उनके परिश्रम के अनुरूप नहीं मिलती थी आज उन्हीं पर  पुरस्कारों की बरसात हो रही है । बीसीसीआई सचिव देवजीत सैकिया ने बताया कि  महिला क्रिकेट टीम को बोर्ड सम्मान के तौर पर 51 करोड़  रुपए नकद इनाम देगा । हिमाचल प्रदेश  सरकार ने टीम सदस्य रेणुका सिंह ठाकुर को एक करोड़ रुपए और सरकारी नौकरी देने की घोषणा की है। मध्य प्रदेश सरकार तेज गेंदबाज क्रांति गौड़ को एक करोड़ का नगद पुरस्कार देगी। आईसीसी ने टीम को ट्राफी के साथ 40 करोड़ का पुरस्कार देने की घोषणाकी है। उत्तर प्रदेश सरकार ने विश्व कप में यादगार प्रदर्शन करने वाली दीति शर्मा का प्रमोशन तत्काल प्रभाव से कर दिया है। सूरत के उद्योगपति राज्यसभा सांसद गोविंद ढोलकिया ने भारतीय टीम की सभी सदस्यों को डायमंड ज्वैलरी और सोलर पैनल देने की घोषणा की है ।

ऐसा माना जा रहा है कि इस विजय आने वाले समय में एक बड़ा बदलाव यह भी दिखाई देगा कि भारतीय महिला क्रिकेट टीम के लिए बड़ी कंपनियों के निवेशक व विज्ञापनदाता उपलब्ध  हो सकेंगे। भविष्य में नई खेल प्रतिभाएं उभरकर कर सामने आयेंगी। यह विजय एक -एक ऐतिहासिक टर्निग प्वाइंट है तथा आाने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणा है।

विजय कि गाथा में यदि भारतीय महिला टीम के कोच अमोल मजूमदार की बात न की जाए तो यह बात अधूरी रह जाएगी।अमोल की भूमिका अभिनंदनीय है । अमोल का खेल कैरियर 1990 के दशक में उस समय प्रारंभ हुआ था जब राहुल द्रविड, सौरव गांगुली, वीवीएस लक्ष्मण जैसे दिग्गज मैदान पर थे जिस कारण उनका क्रिकेट कैरियर अधिक नहीं बढ़ पाया और वह केवल रणजी तक ही सीमित होकर रह गये। अमोल ने महिला क्रिकेट टीम के कोच के रूप में महिला खिलाड़ियों को लड़ने का साहस, सामर्थ्य और दृढ़ता दी। महिला क्रिकेट टीम ने भी उनको निराश नहीं किया और गुरुदक्षिणा में विश्व विजय की ट्राफी अर्पित कर दी।

विजयोत्सव के इस शोर में कुछ ध्यान रखना तो यह कि विजय के उत्सव कुछ समय बाद फीके पड़ जाते हैं उनका उत्साह और उल्लास बनाए रखने के लिए निरंतर जीत और जीत के प्रयास की आदत डालनी पड़ती है ।

प्रेषक- मृत्युंजय दीक्षित

फोनं. नं. – 9198571540

गुरु नानक देवः मानवता के पथप्रदर्शक विलक्षण संत

गुरु नानक जयन्ती – 5 नवम्बर, 2025

भारत की पवित्र भूमि सदैव से महापुरुषों, संतों और अवतारों की कर्मभूमि रही है। इसी भूमि पर तलवंडी (अब ननकाना साहिब, पाकिस्तान) में गुरु नानक देव का जन्म हुआ। वे केवल सिख धर्म के प्रवर्तक नहीं थे, बल्कि सम्पूर्ण मानवता के पथप्रदर्शक, समानता, प्रेम, शांति और सत्य के अमर उपासक थे। उन्होंने धर्म के बाहरी आडंबरों, जातिगत भेदभाव और संकीर्णता का विरोध करते हुए एक ऐसे समाज की कल्पना की जिसमें हर मनुष्य को समान अधिकार मिले और सबके हृदय में करुणा का प्रकाश जले। उनके जीवन की घटनाएं उनकी विलक्षण दृष्टि और दिव्य चेतना का परिचय देती हैं। उनके जन्म दिन को हम प्रकाश पर्व, गुरु पर्व, गुरु पूरब भी कहते हैं। वे अपने व्यक्तित्व में दार्शनिक, योगी, गृहस्थ, धर्म-सुधारक, समाज सुधारक, कवि, देशभक्त एवं विश्वबंधु – सभी गुणों को समेटे हैं। उनमें प्रखर बुद्धि के लक्षण बचपन से ही दिखाई देने लगे थे। वे किशोरावस्था में ही सांसारिक विषयों के प्रति उदासीन हो गये थे।

गुरुनानक देव एक महापुरुष व महान धर्म प्रवर्तक थे जिन्होंने विश्व से सांसारिक अज्ञानता को दूर कर आध्यात्मिक शक्ति को आत्मसात् करने हेतु प्रेरित किया। उनका कथन है- “रैन गवाई सोई कै, दिवसु गवाया खाय। हीरे जैसा जन्मु है, कौड़ी बदले जाय।” उनकी दृष्टि में ईश्वर सर्वव्यापी है और यह मनुष्य जीवन उसकी अनमोल देन है, इसे व्यर्थ नहीं गंवाना चाहिए। उन्हें हम धर्मक्रांति, व्यक्तिक्रांति एवं समाजक्रांति का प्रेरक कह सकते हैं। उन्होंने एक तरह से सनातन धर्म को ही अपने भीतरी अनुभवों से एक नये रूप में व्याख्यायित किया। गुरु नानकजी ने गुलामी, नस्लीय भेदभाव और लिंगभेद की निंदा की। वे कहते थे कि पैसे हमेशा जेब में होने चाहिए, हृदय में नहीं। मनुष्य को लोभ का त्याग करना चाहिए और सदैव परिश्रम से धन कमाना चाहिए। वे बचपन से ही कुशाग्र बुद्धि के थे। आपके स्वभाव में चिंतनशीलता थी तथा आप एकांतप्रिय थे। आपका मन स्कूली शिक्षा की अपेक्षा साधु-संतों व विद्वानों की संगति में अधिक रमता था। बालक नानक ने संस्कृत, अरबी व फारसी भाषा का ज्ञान घर पर रहकर ही अर्जित किया। इनके पिता ने जब पुत्र में सांसारिक विरक्ति का भाव देखा तो उन्हें पुनः भौतिकता की ओर आसक्त करने के उद्देश्य से पशुपालन का कार्य सौंपा। फिर भी नानकदेव का अधिकांश समय ईश्वर भक्ति और साधना में व्यतीत होता था।

गुरु नानकदेव ईश्वर के सच्चे प्रतिनिधि थे। सिख धर्म के दस गुरुओं की कड़ी में प्रथम हैं गुरु नानक। अणु को विराट के साथ एवं आत्मा को परमात्मा के साथ एवं आत्मज्ञान को प्राप्त करने के एक नए मार्ग की परंपरा का सूत्रपात गुरुनानक ने किया है, यह किसी धर्म की स्थापना नहीं थी। उन्होंने परम सत्ता या संपूर्ण चेतन सत्ता के साथ तादात्म्य स्थापित करने का मार्ग बताया। यही वह सार्वभौम तत्व है, जो मानव समुदाय को ही नहीं, समस्त प्राणी जगत् को एकता के सूत्र में बांधे हुए हैं। इसी सूत्र को अपने अनुयायियों में प्रभावी ढंग से सम्प्रेषित करते हुए ‘सिख’ समुदाय के प्रथम धर्मगुरु नानक देव ने मानवता एवं सर्वधर्म सद्भाव का पाठ पढ़ाया। उन्होंने समाज में आपसी प्रेम और भाईचारे को बढ़ाने के लिए लंगर परंपरा की शुरुआत की थी, जहां गरीब-राजा, ऊंच-नीच सभी लंगर खाते थे। उन्होंने निर्गुण उपासना पर जोर दिया और उसका ही प्रचार-प्रसार किया। वे मूर्ति पूजा नहीं करते थे और न ही मानते थे। ईश्वर एक है, वह सर्वशक्तिमान है, वही सत्य है — इसमें ही नानक देव का पूरा विश्वास था। उनका धर्म और अध्यात्म लौकिक तथा पारलौकिक सुख-समृद्धि के लिए श्रम, शक्ति, भक्ति एवं मनोयोग के सम्यक नियोजन की प्रेरणा देता है। गुरु नानक देव की शिक्षाएं आज अधिक प्रासंगिक हैं क्योंकि उन्होंने मानवता और सत्कर्म को सबसे बड़ा धर्म बताया था। उन्होंने समाज में कई बदलाव लाने का काम किया, उन्होंने स्त्रियों को पुरुषों के साथ बराबरी का दर्जा दिया और वैवाहिक जीवन को पवित्र माना। उन्होंने कहा कि विद्यालय में सभी धर्म, जाति, और सम्प्रदाय के लोगों को समान रूप से शिक्षा दी जानी चाहिए। उन्होंने आडंबर और अंधविश्वासों का खंडन किया और ईश्वर की प्रत्यक्ष भक्ति पर ज़ोर दिया। उन्होंने अंतर-धार्मिक सद्भाव को बढ़ावा देने के लिए संवादों का महत्व बताया और निस्वार्थ सेवा को बढ़ावा देते हुए करुणा, परोपकारिता और ज़िम्मेदारी की भावना को बढ़ावा दिया।

एक बार जब वे सुल्तानपुर में नवाब की नौकरी कर रहे थे, उन्हें अनाज की तौल का कार्य सौंपा गया। वे गिनती करते हुए “एक, दो, तीन” बोलते जा रहे थे, पर जब “तेरह” पर पहुँचे तो वे रुक गए और बार-बार “तेरह, तेरह” कहने लगे। लोग चकित हो उठे। उन्होंने कहा- “तेरा, सब कुछ तेरा” अर्थात इस संसार में कुछ भी मेरा नहीं, सब कुछ ईश्वर का है। यही गुरु नानक की आत्मदृष्टि थी, जहाँ उन्होंने अहंकार से मुक्त होकर ईश्वर की सर्वव्यापकता का अनुभव किया। यह घटना उनके आध्यात्मिक जीवन का निर्णायक क्षण बनी।

एक अन्य प्रसंग में वे अपने साथी भाई मरदाना के साथ मक्का पहुंचे। थकान से चूर होकर वे विश्राम हेतु लेट गए और उनके पैर काबा की दिशा में हो गए। एक व्यक्ति ने आक्रोश में कहा, “अपने पैर ईश्वर की ओर कैसे फैला दिए?”

गुरु नानक मुस्कराकर बोले, “भाई, मेरे पैर उस दिशा में कर दो जहाँ ईश्वर न हो।” वह व्यक्ति जैसे-जैसे पैर घुमाता गया, काबा उसी दिशा में घूमता प्रतीत हुआ। यह घटना उनके सर्वधर्मसमभाव और सर्वव्यापक ईश्वर की अनुभूति की प्रतीक बन गई। एक बार कुछ लोगों ने गुरुनानक देव से पूछा कि हमें यह बताइए कि आपके अनुसार हिंदू बड़ा है या मुसलमान तो गुरु साहिब ने उत्तर दिया, ‘अवल अल्लाह नूर उपाइया कुदरत के सब बंदे, एक नूर से सब जग उपजया कौन भले कौन मंदे।’ यानी सब इंसान ईश्वर के पैदा किए हुए हैं, न तो हिंदू कहलाने वाला भगवान की नजर में कबूल है, न मुसलमान कहलाने वाला। रब की निगाह में वही बंदा ऊंचा है जिसका अमल नेक हो, जिसका आचरण सच्चा हो। इस तरह गुरुनानक देव सच्चे गुरु एवं परमात्मा स्वरूप हैं।

गुरु नानक का जीवन सरलता, सच्चाई, करुणा और निस्वार्थ सेवा का आदर्श था। उन्होंने कहा- “ना कोई हिन्दू, ना मुसलमान; सब एक ही नूर से उपजे हैं।” वे धर्म को किसी संप्रदाय की सीमाओं में नहीं बाँधते थे, बल्कि मानवता को ही सच्चा धर्म मानते थे। उनके तीन सूत्र- नाम जपो, कीरत करो और वंड छको, मानव जीवन के नैतिक, आध्यात्मिक और सामाजिक आधार हैं। उनका कहना था कि ईश्वर का स्मरण करो, ईमानदारी से परिश्रम करो और जो कुछ कमाओ उसमें से दूसरों के साथ बाँटो। उनका जीवन इस सत्य का साक्षी है कि धर्म पूजा-पाठ या कर्मकांडों में नहीं, बल्कि आचरण और व्यवहार में बसता है। वे कहते थे, “वह धर्म नहीं जो दूसरों को दुख दे, वह भक्ति नहीं जो केवल पूजा में सीमित रहे।” गुरु नानक ने अहंकार, लोभ, क्रोध और हिंसा से मुक्त जीवन जीने की प्रेरणा दी और यह बताया कि ईश्वर प्रत्येक प्राणी में विद्यमान है। उन्होंने कहा- “सबना में जोत, जोत है सोई; तिस दा चानन सब में होई।” यानी हर प्राणी में उसी परमात्मा की ज्योति विद्यमान है, इसलिए किसी से भेदभाव मत करो।

आज जब मानवता पुनः संकीर्णता, हिंसा और विभाजन के दौर से गुजर रही है, तब गुरु नानक देव की शिक्षाएं हमारे लिए दिशा-सूचक दीपक हैं। उनका सन्देश हमें करुणा, एकता, सादगी और सच्चाई की ओर ले जाता है। उन्होंने जीवनभर यह बताया कि सच्चा धर्म वही है जो मानवता को जोड़े, प्रेम को बढ़ाए और सत्य के मार्ग पर चलने की प्रेरणा दे। “एक ओंकार सतनाम, करता पुरख, निरभउ, निरवैर”- यह उनके जीवन का सार था, जो आज भी विश्व को यह सिखाता है कि ईश्वर एक है, वह सबका है, सबमें है, और सबके लिए है। गुरु नानक देव सचमुच उस विराट चेतना के प्रतीक हैं जो समय, धर्म और सीमाओं से परे होकर मानवता के उजाले की दिशा दिखाती है।

प्रेषकः

(ललित गर्ग)
लेखक, पत्रकार, स्तंभकार
ई-253, सरस्वती कंुज अपार्टमेंट
25 आई. पी. एक्सटेंशन, पटपड़गंज, दिल्ली-92
फोनः 22727486, 9811051133

अत्याचारी औरंगजेब को नायक बनाने के षड़यंत्र

(यह लेख उन मतांधों के लिए है जो आज के दिन औरंगज़ेब की 407वीं जयंती गर्व से बनाने की मूर्खता कर रहे है)
मुगल खानदान में सबसे लम्बे समय तक राज औरंगज़ेब का रहा था। जितना लम्बा औरंगज़ेब का राज था उतनी ही लम्बी उसके अत्याचारों की सूची थी। भारत के 1947 में स्वतंत्रता प्राप्त करने के पश्चात पाठ्यक्रम में इतिहास के उन रक्तरंजित पृष्ठों को जिनमें मुसलमानों ने हिन्दुओं पर अथाह अत्याचार किये थे स्थान नहीं दिया गया। देश के नीति कारों का मानना था कि इससे हिन्दू -मुस्लिम वैमनस्य फैलेगा। मेरे विचार से यह सोच अपरिपक्वता की बोधक है। देशवासियों को सत्य के दिग्दर्शन करवाने से देश के नागरिकों विशेष रूप से मुसलमानों को जितना सत्य का बोध होगा, उतने वे अपने आपको भारतीयता के निकट समझेंगे। जब समस्त देशवासियों को चाहे हिन्दू हो या मुसलमान यह बोध होगा कि सभी के पूर्वज श्री राम और श्री कृष्ण जी को आराध्य रूप में मानते थे। इससे धर्म के नाम पर होने वाले विवाद अपने आप रुक जाते। सत्य की आवाज़ का गला दबाने के कारण रह रहकर यह उठती रही और इस समस्या का हल निकालने के स्थान पर उसे और अधिक विकट बनता रहा। कुछ अवसरवादी लोग अपने क्षणिक लाभों की पूर्ति के लिए उनका गलत फायदा उठाते रहते हैं। ऐसा ही अन्याय औरंगज़ेब को आलमगीर, जिन्दा पीर और महान शासक बताने वाले लोगों ने देशवासियों के साथ किया हैं।
औरंगजेब को न्यायप्रिय एवं शांति-दूत सिद्ध करने के लिए एक छोटी सी पुस्तक “इतिहास के साथ यह अन्याय: प्रो बी एन पाण्डेय” हाल ही में प्रकाशित हुई है । पुस्तक के लेखक दुनिया के सबसे अनभिज्ञ प्राणी के समान व्यवहार करते हुए लिखता है कि औरंगजेब ने अपने आदेशों में किसी भी हिन्दू मंदिर को कभी तोड़ने का हुकुम नहीं दिया। अपितु औरंगज़ेब द्वारा अनेक हिन्दू मंदिरों को दान देने का उल्लेख मिलता हैं। लेखक ने बनारस के विश्वनाथ मंदिर को दहाने के पीछे यह कारण बताया है कि औरंगजेब बंगाल जाते समय बनारस से गुजर रहा था। उसके काफिले के हिन्दू राजाओं ने उससे विनती की कि अगर बनारस में एक दिन का पड़ाव कर लिया जाये तो उनकी रानियाँ बनारस में गंगा स्नान और विश्वनाथ मंदिर में पूजा अर्चना करना चाहती हैं। औरंगजेब ने यह प्रस्ताव तुरंत स्वीकार कर लिया। सैनिकों की सुरक्षा में रानियां गंगा स्नान करने गई। उनकी रानियों ने गंगा स्नान भी किया और मंदिर में पूजा करने भी गई। लेकिन एक रानी मंदिर से वापिस नहीं लौटी। औरंगजेब ने अपने बड़े अधिकारियों को मंदिर की खोज में लगाया। उन्होंने देखा की दीवार में लगी हुई मूर्ति के पीछे एक खुफियाँ रास्ता है और मूर्ति हटाने पर यह रास्ता एक तहखाने में जाता है। उन्होंने तहखाने में जाकर देखा की यहाँ रानी मौजूद है। जिसकी इज्जत लूटी गई और वह चिल्ला रही थी।
यह तहखाना मूर्ति के ठीक नीचे बना हुआ था। राजाओं ने सख्त कार्यवाही की मांग की। औरंगजेब ने हुक्म दिया की चूंकि इस पावन स्थल की अवमानना की गयी है। इसलिए विश्वनाथ की मूर्ति यहाँ से हटाकर कही और रख दी जाये और मंदिर को तोड़कर दोषी महंत को सख्त से सख्त सजा दी जाये। यह थी विश्वनाथ मंदिर तोड़ने की पृष्ठभूमि जिसे डॉक्टर पट्टाभि सीतारमैया ने अपनी पुस्तक “Feather and the stones” में भी लिखा हैं। आइये लेखक के इस प्रमाण की परीक्षा करे –
1. सर्वप्रथम तो औरंगजेब के किसी भी जीवन चरित में ऐसा नहीं लिखा है कि वह अपने जीवन काल में युद्ध के लिए कभी बंगाल गया था।
2. औरंगजेब के व्यक्तित्व से स्पष्ट था कि वह हिन्दू राजाओं को अपने साथ रखना नापसंद करता था क्योंकि वह उन्हें “काफ़िर” समझता था।
3. युद्ध में लाव लश्कर को ले जाया जाता हैं ना कि सोने से लदी हुई रानियों की डोलियाँ लेकर जाई जाती हैं।
4. जब रानी गंगा स्नान और मंदिर में पूजा करने गयी तो उनके साथ सुरक्षा की दृष्टि से कोई सैनिक थे तो फिर एक रानी का अपहरण बिना कोलाहल के कैसे हो गया?
5. दोष विश्वनाथ की मूर्ति का था अथवा पाखंडी महंत का तो सजा केवल महंत को मिलनी चाहिए थी। हिन्दुओं के मंदिर को तोड़कर औरंगजेब क्या हिन्दुओं की आस्था से खिलवाड़ नहीं कर रहा था?
6. पट्टाभि जी की जिस पुस्तक का प्रमाण लेखक दे रहे है सर्वप्रथम तो वह पुस्तक अब अप्राप्य है। दूसरे उस पुस्तक में इस घटना के सन्दर्भ में लिखा है कि इस तथ्य का कोई लिखित प्रमाण आज तक नहीं मिला है। केवल लखनऊ में रहना वाले किसी मुस्लिम व्यक्ति को किसी दूसरे व्यक्ति ने इसका मौखिक वर्णन देने के बाद। इस का प्रमाण देने का वचन दिया था। परन्तु उसकी असमय मृत्यु से उसका प्रमाण प्राप्त न हो सका। इस व्यक्ति के मौखिक वर्णन को प्रमाण बताना इतिहास का मजाक बनाने के समान ही है। कूल मिला कर यह औरंगजेब को निष्पक्ष घोषित करने का एक असफल प्रयास के अतिरिक्त ओर कुछ नहीं है।
सत्य तो इतिहास है और इतिहास का आकलन अगर औरंगजेब के फरमानों से ही किया जाये तो निष्पक्षता उसे ही कहेंगे। फ्रेंच इतिहासकार फ्रैंकोइस गौटियर (Francois Gautier) ने औरंगजेब द्वारा फारसी भाषा में जारी किये गए फरमानों को पूरे विश्व के समक्ष प्रस्तुत कर सभी छद्म इतिहासकारों के मुंह पर ताला लगा दिया। जिसमें हिन्दुओं को इस्लाम में दीक्षित करने और हिन्दू मंदिरों को तोड़ने की स्पष्ट आज्ञा थी। ध्यान दीजिये औरंगजेब ने “आलमगीर” बनने की चाहत में अपनी सगे भाइयों की गर्दन पर छुरा चलाने से लेकर अपने बूढ़े बाप को जेल में डालकर प्यासा मारा था। तो उससे हिन्दू प्रजा की सलामती की इच्छा रखना बेईमानी होगी।
औरंगजेब द्वारा हिन्दू मंदिरों को तोड़ने के लिए जारी किये गए फरमानों का कच्चा चिट्ठा
1. 13 अक्तूबर,1666- औरंगजेब ने मथुरा के केशव राय मंदिर से नक्काशीदार जालियों को जोकि उसके बड़े भाई दारा शिकोह द्वारा भेंट की गयी थी को तोड़ने का हुक्म यह कहते हुए दिया कि किसी भी मुसलमान के लिए एक मंदिर की तरफ देखने तक की मनाही है। और दारा शिकोह ने जो किया वह एक मुसलमान के लिए नाजायज है।
2. 12 सितम्बर 1667- औरंगजेब के आदेश पर दिल्ली के प्रसिद्ध कालकाजी मंदिर को तोड़ दिया गया।
3. 9 अप्रैल 1669 को मिर्जा राजा जय सिंह अम्बेर की मौत के बाद औरंगजेब के हुक्म से उसके पूरे राज्य में जितने भी हिन्दू मंदिर थे, उनको तोड़ने का हुक्म दे दिया गया और किसी भी प्रकार की हिन्दू पूजा पर पाबन्दी लगा दी गयी। जिसके बाद केशव देव राय के मंदिर को तोड़ दिया गया और उसके स्थान पर मस्जिद बना दी गयी। मंदिर की मूर्तियों को तोड़ कर आगरा लेकर जाया गया और उन्हें मस्जिद की सीढ़ियों में गाड़ दिया गया और मथुरा का नाम बदल कर इस्लामाबाद कर दिया गया। इसके बाद औरंगजेब ने गुजरात में सोमनाथ मंदिर का भी विध्वंस कर दिया।
4. 5 दिसम्बर 1671 औरंगजेब के शरीया को लागु करने के फरमान से गोवर्धन स्थित श्री नाथ जी की मूर्ति को पंडित लोग मेवाड़ राजस्थान के सिहाद गाँव ले गए। जहाँ के राणा जी ने उन्हें आश्वासन दिया की औरंगजेब की इस मूर्ति तक पहुँचने से पहले एक लाख वीर राजपूत योद्धाओं को मरना पड़ेगा।
5. 25 मई 1679 को जोधपुर से लूटकर लाई गयी मूर्तियों के बारे में औरंगजेब ने हुकुम दिया कि सोने-चाँदी-हीरे से सज्जित मूर्तियों को जिलालखाना में सुसज्जित कर दिया जाये और बाकि मूर्तियों को जामा मस्जिद की सीढ़ियों में गाड़ दिया जाये।’
6. 23 दिसम्बर 1679 औरंगजेब के हुक्म से उदयपुर के महाराणा झील के किनारे बनाये गए मंदिरों को तोड़ा गया। महाराणा के महल के सामने बने जगन्नाथ के मंदिर को मुट्ठी भर वीर राजपूत सिपाहियों ने अपनी बहादुरी से बचा लिया।
7. 22 फरवरी 1680 को औरंगजेब ने चित्तोड पर आक्रमण कर महाराणा कुम्भा द्वारा बनाएँ गए 63 मंदिरों को तोड़ डाला।
8. 1 जून 1681 औरंगजेब ने प्रसिद्ध पूरी का जगन्नाथ मंदिर को तोड़ने का हुकुम दिया।
9. 13 अक्टूबर 1681 को बुरहानपुर में स्थित मंदिर को मस्जिद बनाने का हुकुम औरंगजेब द्वारा दिया गया।
10. 13 सितम्बर 1682 को मथुरा के नन्द माधव मंदिर को तोड़ने का हुकुम औरंगजेब द्वारा दिया गया। इस प्रकार अनेक फरमान औरंगजेब द्वारा हिन्दू मंदिरों को तोड़ने के लिए जारी किये गए।
हिन्दुओं पर औरंगजेब द्वारा अत्याचार करना
2 अप्रैल 1679 को औरंगजेब द्वारा हिन्दुओं पर जजिया कर लगाया गया जिसका हिन्दुओं ने दिल्ली में बड़े पैमाने पर शांतिपूर्वक विरोध किया परन्तु उसे बेरहमी से कुचल दिया गया। इसके साथ-साथ मुसलमानों को करों में छूट दे दी गयी जिससे हिन्दू अपनी निर्धनता और कर न चूका पाने की दशा में इस्लाम ग्रहण कर ले। 16 अप्रैल 1667 को औरंगजेब ने दीवाली के अवसर पर आतिशबाजी चलाने से और त्यौहार बनाने से मना कर दिया गया। इसके बाद सभी सरकारी नौकरियों से हिन्दू कर्मचारियों को निकाल कर उनके स्थान पर मुस्लिम कर्मचारियों की भरती का फरमान भी जारी कर दिया गया। हिन्दुओं को शीतला माता, पीर प्रभु आदि के मेलों में इकट्ठा न होने का हुकुम दिया गया। हिन्दुओं को पालकी, हाथी, घोड़े की सवारी की मनाई कर दी गयी। कोई हिन्दू अगर इस्लाम ग्रहण करता तो उसे कानूनगो बनाया जाता और हिन्दू पुरुष को इस्लाम ग्रहण करने पर 4 रुपये और हिन्दू स्त्री को 2 रुपये मुसलमान बनने के लिए दिए जाते थे। ऐसे न जाने कितने अत्याचार औरंगजेब ने हिन्दू जनता पर किये और आज उसी द्वारा जबरन मुस्लिम बनाये गए लोगों के वंशज उसका गुण गान करते नहीं थकते हैं।
एक मुहावरा है कि एक झूठ को छुपाने के लिए हज़ार जूठ बोलने पड़ते हैं। औरंगज़ेब को न्यायप्रिय घोषित करने वालों ने तो उसके अत्याचार और मतान्धता को छुपाने के लिए इतने कमजोर साक्ष्य प्रस्तुत किये जो एक ही परीक्षा में ताश के पत्तों के समान उड़ गए। यह भारत के मुसलमानों के समक्ष यक्ष प्रश्न है कि उनके लिए आदर्श कौन है?

राजनीतिक इस्लाम और इस्लाम की राजनीति कितनी खतरनाक

उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने राजनीतिक इस्लाम पर महत्वपूर्ण बात कही। हमारे कई आधुनिक मनीषियों ने भी इस पर अंगुली रखी थी। राजनीतिक इस्लाम यानी इस्लाम के अनुसार चलने वाली राजनीति के क्रियाकलाप और परिणाम पूरी दुनिया में मूलतः समान रहे हैं। भारत उसका सबसे महत्वपूर्ण क्षेत्र है, न केवल पिछले सैकड़ों वर्षों से, बल्कि आज भी।
इसी बिंदु को *योगी आदित्यनाथ* ने रेखांकित करते हुए कहा, *”देश में अंग्रेजों के वर्षों तक किए गए उपनिवेशवादी शासन की चर्चा होती है, पर राजनीतिक इस्लाम की कहीं चर्चा नहीं होती, जो आज भी राष्ट्र माता के टुकड़े-टुकड़े करने की मंशा के साथ कार्य कर रहा है।”*
भारत-विभाजन का बुनियादी कारण राजनीतिक इस्लाम था। मुस्लिम लीग के नेता मोहम्मद अली जिन्ना ने राजनीतिक इस्लाम का ही दावा रखा था। उनके शब्दों (22 मार्च, 1940) में, *‘हिंदू और मुसलमान दो भिन्न सभ्यताओं से जुड़े हैं, जिनके विचार और धारणाएं एक-दूसरे से विपरीत हैं। वे भिन्न-भिन्न स्रोतों से अपनी प्रेरणाएं लेते हैं। उनकी प्रेरक कथाएं, नायक और प्रसंग बिल्कुल अलग-अलग हैं। प्रायः एक के लिए जो नायक है, वह दूसरे लिए खलनायक।’*
यह देख सकते हैं कि इसमें इस्लामी अलगाव पर आधारित राजनीतिक जिद है, जिसका तोड़ वैचारिक और राजनीतिक दृढ़ता से ही किया जा सकता है, पर यह तभी होगा जब इसकी सही जानकारी हो। *राजनीतिक इस्लाम के प्रति गफलत के कारण ही गांधीजी और कांग्रेस ने 1919 में खलीफत आंदोलन को समर्थन देकर अनजाने में इस्लामी अलगाव और दबदबे की मानसिकता को हवा दी।*
इस्लामी राजनीति पर विचार-विमर्श के बदले उस पर पर्दा डाला गया, ताकि कांग्रेस के नेताओं की भूल छिपाई जाए। इस कारण देश-विभाजन की मांग भी मान ली गई। राजनीतिक इस्लाम पर विचार करने में संकोच के कारण ही उसे यहां वाक-ओवर मिलता रहा है।
योगी आदित्यनाथ के पहले नोबेल पुरस्कृत भारतीय मूल के लेखक वी. एस. नायपाल ने अपने लेख ‘द राइटर एंड इंडिया’ (1976) तथा अपनी पुस्तक ‘भारत-एक घायल सभ्यता’ (1977) में जिस घाव का वर्णन किया वह इस्लामी आक्रमणों का दिया घाव है। उनके अनुसार *भारत के सिवा कोई सभ्यता ऐसी नहीं जिसने अपनी बर्बादियों से इतना कम सबक सीखा।* जो बातें नायपाल या योगी ने कहीं, उसी को अपने अंदाज में खुद इस्लामी नेता भी कहते रहे हैं।
उनका व्यवहार और कार्ययोजनाएं स्थायी रूप से वही हैं। इस पर डा. भीमराव आंबेडकर ने अपनी पुस्तक ‘पाकिस्तान या भारत का विभाजन’ में लिखा है कि ‘मुस्लिम राजनीति अनिवार्यतः मुल्लाओं की राजनीति है और वह मात्र एक अंतर को मान्यता देती है – हिंदू और मुसलमानों के बीच मौजूद अंतर। जीवन के किसी भी पंथनिरपेक्ष तत्व का मुस्लिम समुदाय की राजनीति में कोई स्थान नहीं है और वे मुस्लिम राजनीतिक जमात के केवल एक ही निर्देशक सिद्धांत के सामने नतमस्तक होते हैं, जिसे मजहब कहा जाता है।’
यह मजहब इस्लाम है और इसीलिए राजनीतिक इस्लाम की कोई अलग किताब नहीं है। मूल इस्लामी पुस्तकों में ही विविध स्थितियों में राजनीतिक रणनीति, कार्यनीति और कूटनीति बताई गई है। *काफिर, जिहाद, शरीयत, जिम्मी, जजिया, हराम आदि तमाम मूल धारणाओं का अर्थ केवल कुरान और मोहम्मद साहब की जीवनी से ही समझा जा सकता है। जहां गैर-मुस्लिमों की बड़ी संख्या हो, वहां इसमें छल और दिखावे का प्रयोग मुख्य तत्व होता है।* इसमें मुख्य रणनीति शिकायतें करके सत्ता हथियाना होता है।
इस्लामी राजनीति निरंतर शिकायतें करते हुए कपटपूर्वक दबाव बनाती है, जो दिखावे के लिए निर्बल की आशंका का रूप बनाती है, किंतु वास्तव में वह ताकतवर की रणनीति है। अपनी ही परिभाषा से इस्लाम केवल मजहब नहीं, राजनीति भी है। इसके कायदे-कानून गैर-मुस्लिमों (काफिरों) समेत सब पर जबरन लागू करने के लिए बनाए गए हैं। गैर मुसलमानों के प्रति इस्लाम का व्यवहार ही राजनीतिक इस्लाम है।
*कुरान और हदीसों में काफिरों के बारे में बहुत कुछ कहा गया है। यह सब काफिरों को जानना चाहिए। वरना वे गफलत में मारे जाते रहेंगे।* गत सौ वर्षों से पंजाब, बंगाल, कश्मीर आदि अनेक क्षेत्रों में ऐसा हुआ। यह गंभीरता से समझना चाहिए कि *इस्लाम की असली ताकत गैर-मुस्लिमों में उसके प्रति गफलत है।* वरना वैज्ञानिक, आर्थिक, सैनिक आदि क्षेत्रों में पूरे विश्व में इस्लामी समाज लगभग शून्य है। राजनीतिक इस्लाम के प्रति दूसरों में आम अज्ञानता के कारण वह शिकायत, कपट और दबाव से हर कहीं सफल होता बढ़ रहा है। यही सौ साल से भारत में और पिछले पचास वर्षों से यूरोप में हो रहा है।
हाल में इंडियन हिस्ट्री कांग्रेस ने ‘भारत विभाजन की विभीषिका’ पर छपे एक शैक्षिक माड्यूल पर प्रस्ताव पास किया। इसमें ‘राजनीतिक इस्लाम’ शब्द पर आपत्ति की गई थी, मानो यह धारणा ही गलत हो, जबकि इस पर अंतरराष्ट्रीय विद्वानों की अनेक पुस्तकें हैं। *हमारे बौद्धिक और नेता राजनीतिक इस्लाम के अस्तित्व से ही इन्कार करते हैं, जो लगातार सदियों से उन पर हमलावर रहा है। कई बार उसके शिकार ही उसके बचाव में आगे खड़े दिखते हैं।*
इसी कारण उन्हें योगी आदित्यनाथ या वी.एस. नायपाल या डा. आंबेडकर की बातें अटपटी लगती हैं, जबकि *मुस्लिम नेताओं के आए दिन के बयान साफ दिखाते हैं कि वे गैर-मुसलमानों के साथ किसी भी स्थायी सहअस्तित्व या बराबरी को सिद्धांततः खारिज करते हैं। यही राजनीतिक इस्लाम है।* अनेकानेक मुस्लिम देशों में गैर-मुस्लिमों को निचले दर्जे के नागरिक बनने के लिए मजबूर होना पड़ता है।
पाकिस्तान या बांग्लादेश में हिंदुओं की स्थिति का यही कारण रहा। यदि राजनीतिक इस्लाम के प्रति स्पष्टता रहती तो अधिकांश विभीषिकाएं घटित न होतीं। *जैसे सावधानी बरतने से बहुत सी व्याधियों से बचा जाता है, वैसे ही राजनीतिक इस्लाम के प्रति सही जानकारी किसी भी समाज को उसका प्रतिकार करने में समर्थ बनाती है। राजनीतिक इस्लाम के विरुद्ध लड़ाई मुख्यतः वैचारिक-शैक्षिक है, पर काफिर जगत इससे कतराता है।*
साभार- https://www.jagran.com/ से

धर्म-स्थलों के हादसेःआखिर कब जागेगा तंत्र?

आंध्र प्रदेश के श्रीकाकुलम में वेंकटेश्वर स्वामी मंदिर में मची भगदड़ में हुई दर्दनाक मौतों ने एक बार फिर हमारे प्रशासनिक ढांचे, सरकारों की संवेदनशीलता और तंत्र की जवाबदेही पर गहरे सवाल खड़े कर दिए हैं। हर बार ऐसी त्रासदी होती है, कुछ जानें जाती हैं, कुछ परिवार उजड़ते हैं, कुछ आंसू बहते हैं- फिर वही रटंत बयान, “जांच के आदेश दे दिए गए हैं”, “दोषियों पर कार्रवाई होगी”, “पीड़ित परिवारों को मुआवजा दिया जाएगा” और फिर सब कुछ धूल में मिल जाता है। सवाल यह है कि आखिर हम कब तक इस लापरवाही, इस प्रशासनिक नींद, इस जानलेवा कोेताही और इस संवेदनहीन व्यवस्था का शिकार बने रहेंगे? किसी धार्मिक स्थल पर भगदड़ की यह पहली घटना नहीं, लेकिन अफसोस है कि पुरानी गलतियों से सबक नहीं लिया जा रहा। ऐसी त्रासद, विडम्बनापूर्ण एवं दुखद घटनाओं के लिये मन्दिर प्रशासन और सरकारी प्रशासन जिम्मेदार है, एक बार फिर भीड़ प्रबंधन की नाकामी श्रद्धालुओं के लिये मौत का मातम बनी, चीख, पुकार और दर्द का मंजर बना। इस घटना के बाद जिस तरह से बयान दिए जा रहे हैं, वह पीड़ितों के जले पर नमक छिड़कने जैसा है।
धार्मिक स्थल आस्था के केंद्र होते हैं, ऊर्जा के केन्द्र होते हैं, जहां लोग शांति और श्रद्धा पाने आते हैं, लेकिन यह कैसी विडंबना है कि इन पवित्र स्थलों पर भी लोगों को असमय मृत्यु का सामना करना पड़ता है। श्रीकाकुलम में जो कुछ हुआ, वह केवल एक दुर्घटना नहीं, बल्कि एक प्रणालीगत विफलता है। भीड़ प्रबंधन के नाम पर प्रशासन हर बार हाथ खड़े कर देता है। न पर्याप्त बैरिकेडिंग, न एंट्री-एग्जिट का संतुलन, न भीड़ को नियंत्रित करने के लिए पर्याप्त पुलिसबल या वॉलंटियर, न मेडिकल सहायता का इंतजाम। मन्दिरों, त्योहारों और विशेष अवसरों पर श्रद्धालुओं की बढ़ती भीड़ के बावजूद तैयारी का नामोनिशान नहीं होना दुर्भाग्यपूर्ण है। श्रीकाकुलम में वेंकटेश्वर स्वामी का यह मंदिर कुछ महीने पहले ही खोला गया था और राज्य सरकार की ओर से बताया गया कि जिले के अधिकारियों को इसके बारे में जानकारी नहीं थी। हालांकि इससे यह जवाबदेही खत्म नहीं हो जाती कि एक धार्मिक स्थल पर क्षमता से कई गुना ज्यादा लोग जुटते चले गए और फिर भी स्थानीय पुलिस-प्रशासन को भनक कैसे नहीं लगी।
सरकार और मंदिर प्रबंधन की बातों से लग रहा है कि दोनों पक्ष घटना से पल्ला झाड़ने की कोशिश कर रहे हैं। मंदिर का निर्माण ओडिशा के जिस शख्स हरि मुकुंद पांडा ने कराया है, उनका कहना है कि सीढ़ियों की रेलिंग टूटने से हादसा हुआ। लेकिन, यही वजह तो काफी नहीं। भगदड़ मचने के बाद श्रद्धालुओं को बाहर जाने का रास्ता नहीं मिल पाया, वह व्यवस्थापकों की लापरवाही का नतीजा है। मंदिर में आने-जाने का एक ही रास्ता था और जब भीड़ अनुमान से अधिक बढ़ती चली गई, तब भी पुलिस-प्रशासन को सूचित नहीं किया गया। इस पर पांडा का कहना कि इस घटना के लिए कोई जिम्मेदार नहीं, यह एक्ट ऑफ गॉड है- इक्कीसवीं सदी के वैज्ञानिक युग में इस तरह की सोच बेहद शर्मनाक है। यह उन लोगों की पीड़ा का मजाक उड़ाने जैसा है, जिन्होंने अपनों को खोया। यह घटना कोई अपवाद नहीं है, बल्कि हाल के वर्षों में दुनिया भर में सामने आई ऐसी घटनाओं की कड़ी का नया खौफनाक मामला है, जहां भीड़ नियंत्रण में चूक एवं प्रशासन एवं सत्ता का जनता के प्रति उदासीनता का गंभीर परिणाम एवं त्रासदी का ज्वलंत उदाहरण है।
श्रीकाकुलम के मातम, हाहाकार एवं दर्दनाक मंजर ने सुरक्षा व्यवस्था की पोल ही नहीं खोली बल्कि सत्ता एवं धार्मिक व्यवस्थाओं के अमानवीय चेहरे को भी बेनकाब किया है। हर बार जांच, कठोर कार्रवाई करने, सबक सीखने की बातें की जाती हैं, लेकिन नतीजा ढाक के तीन पात वाला है। न तो शासन-प्रशासन कोई सबक सीख रहा है और न ही आम जनता संयम एवं अनुशासन का परिचय देने की आवश्यकता समझ रही है। भगदड़ की घटनाओं का सिलसिला कायम रहने से अंतरराष्ट्रीय स्तर पर देश की बदनामी भी होती है, क्योंकि इन घटनाओं से यही संदेश जाता है कि भारत का शासन-प्रशासन भगदड़ रोकने में पूरी तरह नाकाम है। सार्वजनिक स्थलों पर भगदड़ की घटनाएं दुनिया के अन्य देशों में भी होती है, लेकिन उतनी नहीं जितनी अपने देश में होती ही रहती हैं।
यह कोई पहली घटना नहीं है। अतीत में प्रयागराज कुंभ, अयोध्या, हरिद्वार में प्रसिद्ध मनसा देवी मंदिर, सबरीमला, वैष्णो देवी, पुलकेश्वरम, देवरी मंदिर जैसे अनेक स्थलों पर भी ऐसी भगदड़ें हो चुकी हैं। चिंता की बात यह है कि पिछले हादसों से कोई सबक सीखने को तैयार नहीं है। केवल आंध्र में ही इस साल यह तीसरी बड़ी दुर्घटना है। जनवरी में तिरुपति और अप्रैल में विशाखापत्तनम के सिम्हाचलम में भगदड़ से कई मौतें हुई थीं। पूरे देश में इस साल अभी तक भगदड़ की विभिन्न घटनाओं में 114 लोग अपनी जान गंवा चुके हैं। हर बार सरकारें “सीख लेने” की बात करती हैं, लेकिन हकीकत यह है कि सीखने की क्षमता हमारे तंत्र से जैसे गायब हो चुकी है। धार्मिक आयोजनों की भीड़ का अनुमान लगाना मुश्किल नहीं होता। आज तकनीक का युग है सीसीटीवी, ड्रोन, डिजिटल टिकटिंग, भीड़-सेंसरिंग सिस्टम जैसी आधुनिक व्यवस्थाएं उपलब्ध हैं। परंतु इनका उपयोग नहीं किया जाता क्योंकि धर्म और आस्था के नाम पर “प्रबंधन” को हमेशा भाग्य पर छोड़ दिया जाता है।
जब तक कोई हादसा न हो, तब तक कोई अधिकारी मंदिर परिसर में झांकने तक नहीं आता। और जब हादसा हो जाता है, तब “प्रेस कॉन्फ्रेंस” और “मुआवजा” की राजनीति शुरू हो जाती है। यह भी एक सामाजिक प्रश्न है कि क्या हमारी आस्था इतनी अंधी हो चुकी है कि हम सुरक्षा नियमों की अनदेखी कर देते हैं? क्या धार्मिक आयोजनों में अनुशासन और व्यवस्था का पालन करना हमारी श्रद्धा को कम कर देगा? श्रद्धा के नाम पर अराजकता, प्रशासनिक ढिलाई और अव्यवस्था का यह घातक संगम अब रुकना चाहिए। सरकारों को चाहिए कि वे भीड़ प्रबंधन को एक राष्ट्रीय नीति का हिस्सा बनाएं। हर बड़े धार्मिक स्थल पर स्थायी भीड़ नियंत्रण तंत्र विकसित किया जाए, जिसमें प्रवेश और निकास मार्ग स्पष्ट हों, आपातकालीन निकास गेट हों, प्रशिक्षित स्वयंसेवक हों, मेडिकल टीम और एम्बुलेंस की व्यवस्था हो। स्थानीय प्रशासन को नियमित तौर पर सुरक्षा मॉक ड्रिल करनी चाहिए।
आखिर दुनिया के सर्वाधिक जनसंख्या वाले देश में हम भीड़ प्रबंधन को लेकर इतने उदासीन क्यों है? बड़े आयोजनों-भीड़ के आयोजनों में भीड़ बाधाओं को दूर करने के लिए, भीड़ प्रबंधन के लिए बुनियादी ढांचे में सुधार, सुरक्षाकर्मियों को पर्याप्त प्रशिक्षण प्रदान करना, जन जागरूकता बढ़ाना और आधुनिक तकनीकों का उपयोग करना अब नितान्त आवश्यक है। आज जरूरत है केवल मुआवजे और जांच की नहीं, बल्कि जवाबदेही तय करने की। कौन अधिकारी लापरवाह था, किस विभाग ने सुरक्षा प्रोटोकॉल की अनदेखी की, और क्यों भीड़ को अनियंत्रित छोड़ा गया- इन प्रश्नों का उत्तर दिए बिना जांच बेईमानी है। श्रीकाकुलम की यह त्रासदी एक और चेतावनी है।
अगर अब भी सरकारें नहीं जागीं, तो आने वाले दिनों में ऐसी घटनाएं और बढ़ेंगी, क्योंकि धार्मिक आस्था बढ़ रही है, पर प्रबंधन की मानसिकता वही पुरानी बनी हुई है। भीड़ केवल संख्या नहीं होती, वह जीवन है, वह परिवार है, वह उम्मीद है और जब वह कुचल जाती है, तो यह केवल एक हादसा नहीं, शासन की असफलता एवं सरकारी कोताही की द्योतक है। तमिलनाडु के करूर में तमिल सिनेमा के सुपरस्टार थलपति विजय की रैली में हुआ हादसा हो या फिर श्रीकाकुलम की घटना – कुछ गलतियां बार-बार दोहराई जा रही हैं। हादसों के बाद सबक लेने के बजाय जिम्मेदार लोग और संस्थाएं बचने का रास्ता तलाशने लगते हैं। सरकारों को समझना होगा कि भीड़ प्रबंधन भारत जैसे देश की जरूरत है। मुआवजे की घोषणा करके मामले को हल्का किया जा सकता है, लेकिन जवाबदेही तय हो और लापरवाही पर सजा मिले। क्या यह पुकार अब भी सत्ता के कानों तक नहीं पहुंचेगी?
प्रेषकः

(ललित गर्ग)
लेखक, पत्रकार, स्तंभकार
ई-253, सरस्वती कंुज अपार्टमेंट
25 आई. पी. एक्सटेंशन, पटपड़गंज, दिल्ली-92
फोनः 22727486, 9811051133

भारत में कृषि शिक्षा एवं प्रशिक्षण

कृषि भारत की करीब आधी आबादी की आजीविका का मुख्य साधन है और सकल घरेलू उत्पाद में इसका योगदान लगभग 18 प्रतिशत है। उच्च शिक्षा, अनुसंधान और व्यावहारिक प्रशिक्षण के जरिये मानव क्षमता निर्माण उत्पादकता बढ़ाने, लागत कम करने और राष्ट्रीय लक्ष्यों को हासिल करने के लिए बहुत महत्वपूर्ण है। कृषि शिक्षा, अनुसंधान और शिक्षा संबंधी विस्तार को इस क्षेत्र का प्रमुख स्तंभ माना जाता है जो 5 प्रतिशत कृषि विकास दर के लक्ष्य  को बनाए रखने और “विकसित कृषि और समृद्ध किसान” के राष्ट्रीय दृष्टिकोण को प्राप्त करने के लिए आवश्यक संस्थागत और वैज्ञानिक आधार तैयार करते हैं। यही “विकसित भारत” का मूल दर्शन है। इस दृष्टिकोण को हासिल करने के लिए, इन तीनों स्तंभों को “एक राष्ट्र – एक कृषि – एक टीम” के मार्गदर्शक सिद्धांत के तहत तालमेल से काम करना होगा।

भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (आईसीएआर)

कृषि अनुसंधान एवं शिक्षा के लिए सर्वोच्च निकाय: भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (आईसीएआर), जिसकी स्थापना 1929 में (कृषि अनुसंधान एवं शिक्षा विभाग, कृषि एवं किसान कल्याण मंत्रालय के अधीन) हुई थी। यह कृषि अनुसंधान और उच्च शिक्षा के समन्वय हेतु भारत का प्रमुख संगठन है। यह कृषि, बागवानी, मत्स्य पालन और पशु विज्ञान के क्षेत्र में अनुसंधान संस्थानों और विश्वविद्यालयों का मार्गदर्शन करने के लिए उत्तरदायी है।

राष्ट्रव्यापी नेटवर्क: आईसीएआर एक बड़े तंत्र को संभालता है जिसके अंतर्गत 113 राष्ट्रीय अनुसंधान संस्थान (विस्तृत सूची यहां https://icar.org.in/institutes पर देखी जा सकती है) और भारत भर के 74 कृषि विश्वविद्यालय आते हैं। इस वजह से ये दुनिया के सबसे बड़े कृषि अनुसंधान नेटवर्कों में से एक है। इसने हरित क्रांति का नेतृत्व किया और जलवायु-अनुकूल, उच्च उपज वाली किस्मों और कृषि प्रौद्योगिकियों के विकास में अग्रणी बना हुआ है।
शिक्षा संबंधी विस्तार और गुणवत्ता: आईसीएआर अपने प्रभागों के माध्यम से किसानों को तकनीक हस्तांतरित करने के लिए 731 कृषि विज्ञान केंद्रों (केवीके) का प्रबंधन करता है। यह ‘आईसीएआर मॉडल अधिनियम (संशोधित 2023)’ और ‘कृषि महाविद्यालयों की स्थापना के लिए न्यूनतम आवश्यकताएं’ जारी करके शैक्षणिक मानक भी निर्धारित करता है और राष्ट्रीय कृषि शिक्षा प्रत्यायन बोर्ड के माध्यम से संस्थानों को मान्यता प्रदान करता है।

सार्वजनिक और निजी संस्थान
सरकारी विश्वविद्यालय और संस्थान: भारत में 63 राज्य कृषि विश्वविद्यालय (एसएयू),तीन केंद्रीय कृषि विश्वविद्यालय (सीएयू) (पूसा, इम्फाल, झांसी), चार “मानद” विश्वविद्यालय (आईएआरआई-दिल्ली, एनडीआरआई-करनाल, आईवीआरआई-इज्जतनगर, सीआईएफई-मुंबई) और कृषि संकाय वाले चार केंद्रीय विश्वविद्यालय हैं। आईसीएआर नेटवर्क में 11 एटीएआरआई (कृषि प्रौद्योगिकी अनुप्रयोग अनुसंधान संस्थान) केंद्र भी शामिल हैं।

निजी क्षेत्र: कृषि शिक्षा राज्य सरकारों के अधिकार क्षेत्र में आती है। इन राज्यों की निजी संस्थानों की स्थापना और प्रोत्साहन के लिए अपनी नीतियां हैं। आईसीएआर की भूमिका अनुरोध पर मान्यता प्रदान करने तक सीमित है। पिछले पांच वर्षों में, आईसीएआर द्वारा मान्यता प्राप्त निजी कृषि महाविद्यालयों की संख्या 2020-21 में 5 से बढ़कर 2024-25 तक 22 हो गई है।

केंद्रीय कृषि विश्वविद्यालय
वर्तमान में, भारत में तीन केंद्रीय कृषि विश्वविद्यालय (सीएयू) संचालित हैं। प्रत्येक विश्वविद्यालय की स्थापना क्षेत्रीय आवश्यकताओं की पूर्ति हेतु संसद के एक अधिनियम द्वारा की गई थी:
डॉ. राजेंद्र प्रसाद सीएयू, पूसा (बिहार): अक्टूबर 2016 में पूर्व राजेंद्र कृषि विश्वविद्यालय (स्थापना 1970) से सीएयू में परिवर्तित। इसके 8 संबद्ध महाविद्यालय हैं:
तिरहुत कृषि महाविद्यालय
कृषि स्नातकोत्तर महाविद्यालय
कृषि अभियांत्रिकी एवं प्रौद्योगिकी महाविद्यालय
सामुदायिक विज्ञान महाविद्यालय
मूलभूत विज्ञान एवं मानविकी महाविद्यालय
मत्स्य पालन महाविद्यालय
पंडित दीन दयाल उपाध्याय बागवानी एवं वानिकी महाविद्यालय
कृषि व्यवसाय एवं ग्रामीण प्रबंधन विद्यालय

आरपीसीएयू 8 विषयों (कृषि, बागवानी, कृषि अभियांत्रिकी, सामुदायिक विज्ञान, मत्स्य पालन, जैव प्रौद्योगिकी, वानिकी और खाद्य प्रौद्योगिकी) में स्नातक कार्यक्रम संचालित करता है। इसके अतिरिक्त यह विश्वविद्यालय कई तरह के स्नातकोत्तर कार्यक्रम चलाने के साथ पीएच.डी. भी कराता है। यह विश्वविद्यालय बिहार के समस्तीपुर जिले के पूसा, मुजफ्फरपुर जिले के ढोली और पूर्वी चंपारण जिले के पिपराकोठी में स्थित कई परिसरों के माध्यम से संचालित होता है। यह बिहार में किसानों के साथ अनुसंधान के मामले में संपर्क स्थापित करते हुए 18 कृषि विज्ञान केंद्रों का प्रबंधन भी करता है। राष्ट्रीय शिक्षा नीति के अनुरूप, विश्वविद्यालय ने कई अल्पकालिक प्रमाणपत्र और डिप्लोमा कार्यक्रम शुरू किए हैं जिनका लक्ष्य जमीनी स्तर और मध्य-प्रबंधन स्तरों पर प्रतिभाओं को विकसित करना है जो सीधे उद्योग से जुड़ सकें।

केंद्रीय कृषि विश्वविद्यालय, इम्फाल (मणिपुर): केंद्रीय कृषि विश्वविद्यालय अधिनियम, 1992 के तहत जनवरी 1993 में स्थापित, यह विश्वविद्यालय पूर्वोत्तर के सात पहाड़ी राज्यों, अरुणाचल प्रदेश, मणिपुर, मेघालय, मिज़ोरम, सिक्किम, नागालैंड और त्रिपुरा को सेवाएं प्रदान करता है। सीएयू, इम्फाल, सात पहाड़ी राज्यों में स्थित अपने 13 संबद्ध महाविद्यालयों (पूरी सूची https://cau.ac.in/about-cau-imphal/ पर उपलब्ध है) में शिक्षण, अनुसंधान और शिक्षा संबंधी विस्तार को एकीकृत करके एक व्यापक दृष्टिकोण अपनाता है। इस समय यह कृषि और संबद्ध विषयों में 10 स्नातक, 48 स्नातकोत्तर और 34 पीएचडी कार्यक्रम चलाता है। इस विश्वविद्यालय में शैक्षणिक वर्ष 2024-25 में कुल 2982 छात्रों का नामांकन हुआ।

रानी लक्ष्मी बाई केंद्रीय कृषि विश्वविद्यालय, झांसी (उत्तर प्रदेश): इसकी स्थापना संसद के अधिनियम (2014 का अधिनियम संख्या 10) द्वारा कृषि अनुसंधान एवं शिक्षा विभाग (डीएआरई) के अंतर्गत राष्ट्रीय महत्व के एक संस्थान के रूप में हुई है। यह विश्वविद्यालय कृषि विज्ञान में उत्कृष्टता केंद्र के रूप में कार्य करता है, जो भारत में शिक्षा, अनुसंधान और शिक्षा संबंधी विस्तार सेवाओं को आगे बढ़ाने के लिए समर्पित है। आरएलबीसीएयू का पाठ्यक्रम स्नातक, स्नातकोत्तर और पीएचडी के विद्यार्थियों को कृषि विज्ञान, बागवानी, पशु चिकित्सा विज्ञान और कृषि अभियांत्रिकी आदि विषयों में नवीनतम ज्ञान और कौशल से युक्त करने के लिए तैयार किया गया है। इसके संबद्ध महाविद्यालयों में झांसी (उत्तर प्रदेश) स्थित कृषि महाविद्यालय और उद्यान एवं वानिकी महाविद्यालय, तथा दतिया (मध्य प्रदेश) स्थित मत्स्य पालन महाविद्यालय और पशु चिकित्सा एवं पशु विज्ञान महाविद्यालय शामिल हैं।

कृषि में इंटरनेट ऑफ थिंग्स (आईओटी) और कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई)
प्रौद्योगिकी अपनाना: सरकार खेती को आधुनिक बनाने के लिए इंटरनेट ऑफ थिंग्स (आईओटी) और कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई) को सक्रिय रूप से बढ़ावा दे रही है। इसके अनुप्रयोगों में सटीक खेती (सेंसर-चालित सिंचाई, स्वचालित मशीनरी), इमेजिंग और छिड़काव के लिए ड्रोन, पशुधन निगरानी, जलवायु-स्मार्ट ग्रीनहाउस, एआई-चालित कीट/फसल निगरानी और रिमोट सेंसिंग शामिल हैं।

नवाचार केंद्र: विज्ञान और प्रौद्योगिकी विभाग के अंतर्गत राष्ट्रीय अंतर्विषयी साइबर-भौतिक प्रणाली मिशन ( एनएम-आईसीपीएस) के तहत, दिसंबर 2022 तक देश भर में 25 प्रौद्योगिकी नवाचार केंद्र (टीआईएच) स्थापित किए गए जिनमें से तीन कृषि में आईओटी और कृत्रिम बुद्धिमत्ता के अनुप्रयोग पर केंद्रित हैं। उदाहरण के लिए, आईआईटी रोपड़ का कृषि/जल टीआईएच, पूरे भारत में केसर उत्पादन और आपूर्ति के लिए आओटी सेंसर पर काम कर रहा है। आईआईटी बॉम्बे “इंटरनेट ऑफ एवरीथिंग” पर एक टीआईएच से जुड़ा है और आईआईटी खड़गपुर कृत्रिम बुद्धमत्ता/मशीन लर्निंग समाधानों (फसल स्वास्थ्य पूर्वानुमान, उपज पूर्वानुमान) के लिए एक एआई4आईसीपीएस केंद्र चलाता है।

डिजिटल अवसंरचना: इलेक्ट्रॉनिक्स मंत्रालय ने बेंगलुरु, गुरुग्राम, गांधीनगर और विशाखापत्तनम जैसे शहरों में आईओटी पर उत्कृष्टता केंद्र स्थापित किए हैं। उदाहरण के लिए, विशाखापत्तनम आईओटी उत्कृष्टता केंद्र (सीओई) कृषि-तकनीक पर केंद्रित है और नवाचार को हर स्तर पर प्रभावी बनाने के लिए स्टार्टअप्स, उद्योग, निवेशकों और शिक्षा जगत को जोड़ता है। कृषि के लिए राष्ट्रीय ई-गवर्नेंस योजना के तहत, राज्यों को कृत्रिम बुद्धमत्ता, /मशीन लर्निंग, आईओटी, ब्लॉकचेन आदि का उपयोग करके डिजिटल-कृषि परियोजनाओं को लागू करने के लिए वित्तीय सहायता दी जाती  है।
स्टार्ट-अप इकोसिस्टम: 2018-19 से, राष्ट्रीय कृषि विकास योजना (आरकेवीवाई) के तहत “नवाचार और कृषि-उद्यमिता विकास” कार्यक्रम वित्तीय सहायता प्रदान करके और कृषि-ऊष्मायन पारिस्थितिकी तंत्र को मजबूत करके नवाचार और कृषि उद्यमिता को बढ़ावा दे रहा है। यह पहल कृषि और संबद्ध क्षेत्रों में स्टार्ट-अप का समर्थन करती है, जिसका दोहरा लाभ है। इससे नए अवसर पैदा होते हैं जिससे किसानों की आय बढ़ती है और ग्रामीण युवाओं के लिए रोजगार पैदा होता है। इस कार्यक्रम के तहत जिन स्टार्ट-अप को सहायता दी जाती है वे कृषि और संबद्ध क्षेत्रों के विविध क्षेत्रों में कार्यरत हैं, जिनमें कृषि प्रसंस्करण, खाद्य प्रौद्योगिकी और मूल्य संवर्धन, कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई), इंटरनेट ऑफ थिंग्स (आईओटी), सूचना और संचार प्रौद्योगिकी (आईसीटी), सटीक खेती, डिजिटल कृषि, ब्लॉकचेन प्रौद्योगिकी शामिल हैं।

किसानों का कौशल और प्रशिक्षण
किसानों का कौशल और प्रशिक्षण भारत के कृषि परिवर्तन का केंद्र बन गया है। सरकार ने आधुनिक कृषि आवश्यकताओं को ध्यान में रखते हुए, किसानों को तकनीकी नवाचारों, जलवायु और बाज़ार परिवर्तनों के अनुकूल बनाने में मदद करने के लिए क्षमता निर्माण को प्राथमिकता दी है। ग्रामीण युवाओं का कौशल प्रशिक्षण (एसटीआरवाई), कृषि यंत्रीकरण उप-मिशन (एसएमएएम), प्रधानमंत्री कौशल विकास योजना (पीएमकेवीवाई),और कृषि विज्ञान केंद्रों (केवीके) और कृषि प्रौद्योगिकी प्रबंधन एजेंसी (एटीएमए) के माध्यम से की जाने वाली पहल जैसे कार्यक्रम किसानों को स्थायी कृषि पद्धतियों के लिए व्यावहारिक ज्ञान और व्यावसायिक विशेषज्ञता की जानकारी दे रहे हैं।

कृषि विज्ञान केंद्र (केवीके): आईसीएआर द्वारा संचालित ये केंद्र किसानों के प्रशिक्षण में सबसे आगे हैं। 2021-22 और 2023-24 के बीच, केवीके ने 58.02 लाख किसानों को प्रशिक्षित किया और यह संख्या हर साल लगातार बढ़ रही है। 2024-25 के पहले दस महीनों में, 18.56 लाख अतिरिक्त किसानों को पहले ही प्रशिक्षित किया जा चुका है। केवीके के पाठ्यक्रमों में स्थानीय परिस्थितियों के अनुरूप उन्नत कृषि विज्ञान, पशुधन देखभाल, मृदा स्वास्थ्य, कटाई के बाद की तकनीक आदि शामिल हैं।

एटीएमए (शिक्षा संबधी विस्तार सुधार योजना): कृषि प्रौद्योगिकी प्रबंधन एजेंसी (एटीएमए) योजना विकेंद्रीकृत कृषि विस्तार को मजबूत करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। इस पहल के तहत, 2021-22 में 32.38 लाख किसानों को प्रशिक्षित किया गया, इसके बाद 2022-23 में 40.11 लाख और 2023-24 में 36.60 लाख किसानों को प्रशिक्षित किया गया। जनवरी 2025 तक लगभग 18.30 लाख किसानों को प्रशिक्षित किया जा चुका था। कुल मिलाकर, 2021-25 के दौरान एटीएमए के माध्यम से लगभग 1.27 करोड़ किसानों को प्रशिक्षित किया गया है।
ग्रामीण युवाओं का कौशल प्रशिक्षण (एसटीआरवाई): एसटीआरवाई कृषि/संबद्ध व्यवसायों (बागवानी, डेयरी, मत्स्य पालन, आदि) में लघु व्यावसायिक पाठ्यक्रम (लगभग सात दिन) संचालित करता है। इसने 2021-22 में 10,456 ग्रामीण युवाओं, 2022-23 में 11,634 और 2023-24 में 20,940 को प्रशिक्षित किया। 2021 से दिसंबर 2024 तक 51,000 से अधिक ग्रामीण युवाओं को प्रशिक्षित किया जा चुका है। इस कार्यक्रम का उद्देश्य स्वरोजगार को बढ़ावा देना और गांवों में कुशल कामगार तैयार करना है।
कृषि यंत्रीकरण (एसएमएएम): कृषि यंत्रीकरण उप-मिशन (एसएमएएम) कृषि मशीनरी के उपयोग पर प्रशिक्षण प्रदान करता है। 2021-25 के दौरान, एसएमएएम ने प्रदर्शनों और कस्टम हायरिंग जागरूकता के माध्यम से 57,139 किसानों को मशीनीकरण में सीधे प्रशिक्षित किया।
मृदा स्वास्थ्य कार्ड योजना: इस कार्यक्रम के तहत मृदा स्वास्थ्य कार्ड जारी किये जाते हैं और किसानों को संतुलित उर्वरक प्रयोग के बारे में शिक्षित किया जाता है। जुलाई 2025 तक, देश भर में 25.17 करोड़ से ज़्यादा कार्ड वितरित किए जा चुके थे। समानांतर प्रयासों में 93,000 से ज़्यादा मृदा स्वास्थ्य प्रशिक्षण आयोजित किये गये और पोषक तत्व प्रबंधन पद्धतियों को सिखाने के लिए 6.8 लाख से ज़्यादा फील्ड प्रदर्शनों का आयोजन हुआ।
किसान उत्पादक संगठन (एफपीओ): बाज़ार-उन्मुख क्षमता निर्माण के लिए, सरकार ने 10,000 से ज़्यादा एफपीओ पंजीकृत किए हैं। डिजिटल मॉड्यूल और वेबिनार के माध्यम से, एफपीओ के किसान कृषि-व्यवसाय प्रबंधन, मूल्य श्रृंखलाओं और विपणन पर प्रशिक्षण प्राप्त करते हैं। (छोटे किसानों को एकजुट करके, एफपीओ ग्रामीण क्षेत्रों में लक्षित कौशल विकास और विस्तार में मदद करते हैं)।

निष्कर्ष
भारत की कृषि शिक्षा और प्रशिक्षण प्रणाली आज शिक्षा, अनुसंधान, प्रौद्योगिकी और क्षेत्र-स्तरीय कौशल विकास को जोड़कर एक सुव्यवस्थित दृष्टिकोण को दर्शाती है। “एक राष्ट्र – एक कृषि – एक टीम” के दृष्टिकोण से प्रेरित होकर, आईसीएआर, केंद्रीय और राज्य कृषि विश्वविद्यालयों और कृषि विज्ञान केंद्रों जैसे संस्थानों ने खेती को अधिक उत्पादक, टिकाऊ और ज्ञान-आधारित बनाने के लिए एक मजबूत आधार तैयार किया है। गुणवत्तापूर्ण शिक्षा, मान्यता संबंधी सुधारों और किसान-केंद्रित प्रशिक्षण पर निरंतर जोर से वैज्ञानिक अनुसंधान और व्यावहारिक अनुप्रयोग के बीच की खाई को पाटने में मदद मिल रही है।

इंटरनेट ऑफ थिंग्स (आईओटी), कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई) और उपयुक्त कृषि उपकरणों जैसी तकनीकों का समावेश आधुनिक और डेटा-आधारित कृषि की ओर एक महत्वपूर्ण बदलाव का प्रतीक है। एटीएमए, एसटीआरवाई और एसएमएएम जैसी पहलों के माध्यम से, किसानों और ग्रामीण युवाओं को आवश्यक तकनीकी और उद्यमशीलता संबंधी कौशल से युक्त किया जा रहा है, जिससे गांवों में रोजगार और आत्मनिर्भरता को बढ़ावा मिल रहा है। ये प्रयास मिलकर उच्च उत्पादकता, बेहतर आय और संसाधनों के सतत उपयोग में योगदान दे रहे हैं। चूंकि भारत का लक्ष्य खाद्य उत्पादन में आत्मनिर्भरता और एक ग्रामीण अर्थव्यवस्था की मजबूती है ऐसे में राष्ट्र की कृषि संबंधी प्रगति के लिए शिक्षा नवाचार और कुशलता में तालमेल को बेहतर बनाना जरूरी है।

नई उड़ान, नया क्षितिज – छत्तीसगढ़ में महतारियों के सशक्तिकरण की कहानी

छत्तीसगढ़ अपने विकास-यात्रा के स्वर्णिम पड़ाव पर है। इस यात्रा का सबसे महत्वपूर्ण आधार बनी हैं – राज्य की महिलाएँ, जिन्हें स्नेह व सम्मान से “महतारी” कहा जाता है।

बीते वर्षों में छत्तीसगढ़ सरकार ने महिला सशक्तिकरण को केवल नीतिगत प्राथमिकता नहीं बनाया, बल्कि सामाजिक और आर्थिक परिवर्तन की धुरी के रूप में स्थापित किया है। मुख्यमंत्री श्री विष्णु देव साय के नेतृत्व में आज महिलाएँ योजनाओं की लाभार्थी मात्र नहीं, परिवर्तन की वाहक बनकर उभरी हैं। राज्य में महिलाओं को आर्थिक रूप से मजबूत करने के लिए सरकार ने विविध योजनाएँ शुरू की हैं।

सबसे उल्लेखनीय महतारी वंदन योजना है, जिसके तहत लगभग 70 लाख महिलाओं को अब तक 12,983 करोड़ रुपए की राशि वितरित की गई है। यह सहायता महिलाओं को आर्थिक सुरक्षा ही नहीं, बल्कि परिवार व समाज में निर्णायक भूमिका निभाने की क्षमता भी प्रदान करती है।

दीदी ई-रिक्शा योजना ने 12,000 महिलाओं को रोजगार के नए अवसर दिए। सक्षम योजना के तहत 32,000 महिलाओं को 3 प्रतिशत ब्याज पर 2 लाख रुपए तक व्यवसायिक ऋण दिया गया, जबकि महतारी शक्ति ऋण ने 50,000 महिलाओं को बिना जमानत ऋण प्रदान कर आत्मनिर्भरता का मार्ग प्रशस्त किया। मुख्यमंत्री सिलाई मशीन सहायता योजना से 1.15 लाख महिलाएँ घर-परिवार के साथ उत्पादन कार्य से जुड़कर सम्मानजनक आय अर्जित कर रही हैं।

कोंडागांव की रतो बाई का जीवन कभी नक्सली भय से घिरा था। प्रधानमंत्री आवास योजना (ग्रामीण) से उन्हें 1.20 रुपए लाख और मनरेगा से 90 दिन का रोजगार मिला। आज वे पक्के घर में सुरक्षित जीवन जीती हैं और सब्ज़ी विक्रय के माध्यम से जीवन यापन करती हैं। उज्ज्वला, नल-जल जैसी सुविधाएँ उनके जीवन में प्रकाश भर रही हैं। दंतेवाड़ा जिले की गंगादेवी SHG की महिलाएँ आज टाटा मैजिक वाहन का संचालन कर 26,000 रुपए मासिक आय अर्जित कर रही हैं। यह उदाहरण बताता है कि ग्रामीण महिलाएँ अवसर मिलने पर कैसे नए व्यवसायों का संचालन कर सकती हैं।

सरगुजा की श्रीमती श्यामा सिंह ने बिहान योजना के तहत 95,000 रुपए की सहायता से 30 सेंट्रिंग प्लेट से काम शुरू किया। आज उनके पास 152 प्लेट हैं तथा वे 50,000 रुपए प्रतिमाह कमाती हैं। कोरबा की श्रीमती मंझनीन बाई को DMF फंड से स्वास्थ्य केंद्र में नियुक्त होकर उन्हें 9,000 रुपए मासिक मानदेय मिलता है। यह न सिर्फ आर्थिक स्थिरता, बल्कि सामाजिक सम्मान भी देता है।

कभी नक्सली हिंसा से भयभीत बस्तर आज नए परिदृश्य के साथ उभर रहा है। यह इलाका आत्मनिर्भरता, सम्मान और अवसरों की नई पहचान बन गया है। मुख्यमंत्री श्री विष्णु देव साय कहते हैं कि “बस्तर का पुनर्निर्माण केवल सड़क या पुल बनाना नहीं, यह वहाँ के हर घर में विश्वास का दीप जलाने का संकल्प है।”

केंद्र सरकार ने प्रधानमंत्री आवास योजना के तहत 15,000 विशेष आवास स्वीकृत किए, जिनमें से 3,000 बस्तर, सुकमा, कांकेर, बीजापुर और दंतेवाड़ा में बन रहे हैं। अब तक 12,000 से अधिक लोग सुरक्षित आवास पा चुके हैं। छत्तीसगढ़ में महिला SHG की संख्या 2,80,362 है, जिनमें से लगभग 60,000 समूह बस्तर में सक्रिय हैं। वनोपज और हस्तशिल्प आधारित उद्यमों से करोड़ों का कारोबार हो रहा है। “लखपति महिला मिशन” के अंतर्गत 2,000 महिलाएँ सालाना 1 लाख रुपए से अधिक कमाती हैं। ‘जशप्योर’ और बस्तर बेंत उत्पाद राष्ट्रीय पहचान पा चुके हैं। महिलाएँ अब रोजगार पाने तक सीमित नहीं, बल्कि रोजगार-दाता भी बन रही हैं।

स्वास्थ्य और सुविधा को ध्यान में रखते हुए भारत सरकार की उज्ज्वला योजना के अंतर्गत स्वीकृत 25 लाख नए LPG कनेक्शन में से 1.59 लाख कनेक्शन छत्तीसगढ़ को मिले, जिससे नियद नेल्लानार ग्रामों की महिलाएं भी लाभान्वित हो रही है। मुख्यमंत्री श्री साय कहते हैं -“स्वच्छ रसोई, स्वस्थ परिवार और सशक्त महिला – यही उज्ज्वला का सार है।

छत्तीसगढ़ के 27 जिलों में सखी वन-स्टॉप सेंटर स्थापित हैं, महिला हेल्पलाइन – 181, डायल – 112, 24*7 कार्यरत हैं। नवाबिहान योजना से कानूनी व परामर्श सहायता दी जा रही है। शुचिता योजना से 3 लाख किशोरियाँ लाभान्वित हो रही हैं। 2,000 स्कूलों में नैपकिन वेंडिंग मशीन लगाई गई है। इन पहलों ने महिलाओं के मन में सुरक्षा और आत्मविश्वास की नई ऊर्जा भरी है।

योजनाएँ महिलाओं को तकनीक-आधारित सशक्तिकरण की ओर ले जा रही हैं। ड्रोन दीदी योजना से महिलाओं का प्रशिक्षण दिया जा रहा है। जशप्योर ब्रांड से लगभग 500 महिलाएँ, 10,000 रुपए प्रति माह कमा रही हैं। नवा रायपुर के यूनिटी मॉल में SHG उत्पादों को प्राथमिकता दी जा रही है। ये नारी शक्ति को स्थानीय से राष्ट्रीय बाज़ार तक पहुँचाने का मार्ग तैयार कर रही हैं।

महिला एवं बाल विकास मंत्री

श्रीमती लक्ष्मी राजवाड़े कहती हैं कि “नया छत्तीसगढ़ वह होगा जहाँ भय नहीं, विश्वास होगा, जहाँ महिलाएँ आश्रित नहीं, सशक्त होंगी। ”आज छत्तीसगढ़ का हर गाँव, हर घर, हर परिवार में बदलाव की अग्नि प्रज्वलित है। जहाँ पहले भय था – वहाँ आज आत्मनिर्भरता है। जहाँ मजबूरी थी- वहाँ आज सम्मान है। छत्तीसगढ़ की महतारियाँ अब परिवर्तन की राह नहीं देख रहीं- वे स्वयं परिवर्तन की दिशा रच रही हैं।

(लेखिका छत्तीसगढ़ सरकार में उप संचालक, जनसंपर्क विभाग है)