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शहर ऐसा हो, जहां सौन्दर्य, संभावनाएं एवं संवेदनाएं झलकती हो

विश्व शहर दिवस हर साल 31 अक्टूबर को मनाया जाता है। इसका उद्देश्य शहरीकरण में अंतर्राष्ट्रीय समुदाय की रुचि बढ़ाना, शहरीकरण की चुनौतियों का समाधान करने में देशों के बीच सहयोग को प्रोत्साहित करना और सतत विश्व नगर योजना को अधिक मानवीय, अपराधमुक्त एवं पर्यावरण संपोषक बनाना है। यह दिवस पहली बार 2014 में मनाया गया था। इसका उद्देश्य शहरीकरण के रुझानों, चुनौतियों और सतत शहरी विकास के दृष्टिकोण के बारे में अंतर्राष्ट्रीय जागरूकता बढ़ाना, अंतर्राष्ट्रीय सहयोग को बढ़ावा देना और समतामूलक, समृद्ध, टिकाऊ और समावेशी शहरों के निर्माण के वैश्विक प्रयासों में योगदान देना है जो अपने समुदायों को बेहतर रहने का वातावरण और जीवन की गुणवत्ता प्रदान करते हैं।
इस वर्ष विश्व शहर दिवस का वैश्विक आयोजन कोलंबिया के बोगोटा में ‘जन-केंद्रित स्मार्ट सिटीज़’ थीम पर आयोजित किया जाएगा। इस अवसर पर यह प्रदर्शित किया जाएगा कि डेटा-आधारित निर्णय लेने, तकनीक और कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई) का उपयोग शहरी जीवन को बेहतर बनाने और वर्तमान झटकों व संकटों से उबरने के लिए कैसे किया जा सकता है। इस अवसर पर जन-केंद्रित स्मार्ट सिटी पहलों को बढ़ावा देने पर भी ध्यान केंद्रित किया जाएगा। निश्चित ही शहर उस उम्मीद का माध्यम बने, जहां सौन्दर्य एवं संवेदनाएं अनेक रूपों में बिछी हो, जहां कुछ नया और कुछ पुराना, पर सब मनमोहक हो।
इस वर्ष का विषय इस बढ़ती मान्यता को दर्शाता है कि डिजिटल तकनीकों की परिवर्तनकारी शक्ति वैश्विक स्तर पर शहरी जीवन को नया रूप दे रही है और शहरों और मानव बस्तियों के डिज़ाइन, नियोजन, प्रबंधन और संचालन के तरीकों को बेहतर बनाने के लिए व्यापक अवसर प्रदान कर रही है। अभिनव विकास, जनोन्मुखी स्मार्ट शहर का निर्माण केन्द्रित थीम शहरी और डिजिटल दोनों तरह के बदलावों से चिह्नित इस युग में, शहर निवासियों को बेहतर सेवाएँ प्रदान करने और महत्वपूर्ण शहरी चुनौतियों और अवसरों का समाधान करने के लिए डिजिटल तकनीकी समाधानों और डेटा को तेज़ी से अपनाने पर बल देती हैं।
“सशक्त समुदाय, समृद्ध शहर” को बल देते हुए यह दिवस समुदायों को जागरूक, सहयोगी और आत्मनिर्भर करने की पहल है ताकि शहर वास्तव में विकसित, संस्कृतिमय और समृद्ध बन सके। आज जब पूरी दुनिया तीव्र गति से शहरीकरण की ओर बढ़ रही है, तब यह दिवस आत्ममंथन का अवसर बन गया है कि क्या हमारे शहर केवल कंक्रीट की इमारतों और चकाचौंध का विस्तार बन रहे हैं या उनमें मानवीय संवेदनाओं, संस्कृति, पर्यावरणीय संतुलन और सामाजिक समरसता का पोषण भी हो रहा है।
भारत में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में नया भारत, विकसित भारत को विकसित करते हुए शहरीकरण का एक नया मॉडल प्रस्तुत हुआ है, जिसने शहरों के विकास को केवल भौतिक संरचनाओं तक सीमित न रखकर जीवन मूल्यों और नागरिक सहभागिता से जोड़ा है। अमृत मिशन, प्रधानमंत्री आवास योजना, स्वस्थ भारत मिशन, स्मार्ट शहर योजना और स्वच्छ भारत अभियान जैसी योजनाओं ने शहरों के ढांचे में नई चेतना का संचार किया है। इन योजनाओं ने यह साबित किया है कि जब सरकार की नीतियों में जनता की भागीदारी और पारदर्शिता जुड़ती है तो विकास केवल आंकड़ों में नहीं, व्यवहार में भी दिखने लगता है। शहरीकरण का अर्थ केवल ऊंची इमारतें, चौड़ी सड़के और चमकदार बाजार नहीं है, बल्कि यह एक जीवंत सामाजिक प्रक्रिया है जिसमें जीवन स्तर, विचार और व्यवहार की गुणवत्ता निहित होती है। शहरों ने मनुष्य को रोजगार, शिक्षा, स्वास्थ्य और सुविधा दी है, लेकिन इसी के साथ प्रदूषण, भीड़, तनाव, अपराध, असमानता और मानवीय रिश्तों की दूरी भी दी है। हर बड़ा शहर आज सांस लेने के लिए हवा, पीने के लिए स्वच्छ पानी और जीने के लिए शांति तरस रहा है। विकास के नाम पर प्रकृति का ह्रास हो रहा है और भौतिक प्रगति के साथ मानसिक थकान बढ़ रही है।
भारत के प्राचीन नगर जैसे काशी, उज्जैन, पुष्कर, मथुरा और अयोध्या केवल व्यापारिक या राजनीतिक केंद्र नहीं थे, वे संस्कृति, अध्यात्म और सह-अस्तित्व की जीवंत प्रयोगशालाएं थे। वहां नगर का अर्थ केवल रहने की जगह नहीं, जीने की कला था। आज के नगर यदि इन मूल्यों को फिर से अपनाएं तो वे केवल आधुनिक ही नहीं, मानवीय भी बन सकते हैं। पश्चिम के देशों में शहरीकरण तकनीकी दक्षता और सुविधाओं की दृष्टि से आगे है, पर वहां मानवीय ऊष्मा और आत्मीयता का अभाव है। भारत यदि अपने शहरीकरण में मानवता, पर्यावरण और संस्कृति का संगम बनाए रखे तो वह पूरी दुनिया के लिए एक आदर्श प्रस्तुत कर सकता है। शहर तब सचमुच जीवंत बनेंगे जब उनमें रहने वाले लोग पर्यावरण के प्रति संवेदनशील, सामाजिक रूप से जागरूक और मानवीय दृष्टि से समर्पित होंगे। प्रदूषण को रोकना, हरियाली बढ़ाना, स्वच्छता को जीवनचर्या बनाना, झुग्गी बस्तियों को सम्मानजनक आवास देना, जनसहभागिता और नागरिक जिम्मेदारी की भावना को मजबूत करना ही वास्तविक शहरीकरण का मार्ग है।
भारत के शहर आज तेजी से बदल रहे हैं। मेट्रो, ऊँची इमारतें, चौड़ी सड़कों और चमकदार मॉलों ने इनका नया चेहरा गढ़ दिया है। यह परिवर्तन विकास की चमक दिखाता है, पर इसके भीतर एक गहरी पीड़ा भी छिपी है, कहीं न कहीं शहरों की आत्मा, उनकी पहचान, उनकी गर्माहट खोती जा रही है। जो गलियां कभी अपनत्व और रिश्तों की खुशबू से महकती थीं, वे अब भागदौड़, भीड़ और उदासीनता का प्रतीक बन गई हैं। स्वतंत्रता के बाद भारत ने आधुनिकता की दिशा में तेज़ी से कदम बढ़ाए, पर इस भौतिक विकास की दौड़ में मानवीय संवेदनाएं और सामाजिक संबंध पीछे छूट गए। शहरों का विस्तार अब मनुष्य की जरूरतों के बजाय बाज़ार की मांगों के अनुसार हो रहा है। नई कॉलोनियाँ और ऊँची इमारतें पुराने मोहल्लों की जगह ले रही हैं, पर उनके भीतर वह आत्मीयता एवं संवेदनशीलता नहीं जो कभी लोगों के दिलों को जोड़ती थी। शहर अब केवल रहने की जगह नहीं रहे, वे उपभोक्तावाद और प्रतिस्पर्धा के केंद्र बन गए हैं। आधुनिकता ने सुविधा तो दी है, पर उसने संस्कृति, इतिहास और परंपरा के रंग फीके कर दिए हैं। स्मृतियों के जिन चौकों पर कभी संवाद और संवेदना का संसार बसता था, वहाँ अब केवल मशीनों की आवाज़ें और जल्दबाज़ी का शोर है।
नई पीढ़ी के लिए शहर अब केवल रोजगार, ग्लैमर और अवसर का माध्यम हैं। उसमें अपने शहर की आत्मा को समझने का भाव कम होता जा रहा है। यह सवाल अब और गहराता जा रहा है कि क्या विकास का अर्थ केवल ऊँची इमारतें, चौड़ी सड़कें और मॉल हैं, या फिर उसमें मानवीय रिश्तों की ऊष्मा, संस्कृति और इतिहास का जीवंत अहसास भी शामिल होना चाहिए? आज के शहर चमकते तो हैं, पर भीतर से कहीं खाली हैं। उनमें सुविधाएँ हैं पर सुकून नहीं, रफ्तार है पर रूह की स्थिरता नहीं। यह समय हमें सोचने पर विवश करता है कि क्या हम ऐसे शहर बना रहे हैं जहाँ मनुष्य के लिए जगह बची रहे, जहाँ इतिहास और संवेदना साथ-साथ सांस ले सकें। असली विकास वही होगा जहाँ शहरों का विस्तार हो, पर इंसानियत की जड़ें भी उतनी ही गहरी बनी रहें।
विश्व शहर दिवस का संदेश यही है कि शहर केवल दीवारों और सड़कों का जाल नहीं, बल्कि जीवन की एक संस्कृति हैं। जब शहर में रहने वाला नागरिक अपने भीतर संवेदनशीलता, सादगी और सामाजिक उत्तरदायित्व को जाग्रत रखता है, तभी वह शहर वास्तव में सुंदर बनता है। शहर की सुंदरता उसकी इमारतों में नहीं, बल्कि वहां रहने वाले मनुष्यों के विचारों, व्यवहारों और संवेदनाओं में बसती है। जब समुदाय सशक्त होंगे, तब ही शहर समृद्ध होंगे, और जब शहर समृद्ध होंगे, तब ही मानवता सचमुच प्रगतिशील होगी।
(ललित गर्ग)
लेखक, पत्रकार, स्तंभकार
ई-253, सरस्वती कंुज अपार्टमेंट
25 आई. पी. एक्सटेंशन, पटपड़गंज, दिल्ली-92
फोनः 22727486, 9811051133

भारत की अर्थव्यवस्था पर ट्रम्प प्रशासन के 50% टैरिफ का कोई असर नहीं

अमेरिका के ट्रम्प प्रशासन द्वारा भारत से अमेरिका को होने वाले विभिन्न उत्पादों के निर्यात पर 50 प्रतिशत की दर से टैरिफ लगाया गया है। ट्रम्प ने वैसे तो लगभग सभी देशों से अमेरिका को होने विभिन्न उत्पादों पर अलग अलग दर से टैरिफ लगाया है परंतु भारत द्वारा विशेष रूप से रूस से सस्ते दामों पर कच्चे तेल की खरीद के चलते भारत से अमेरिका को होने वाले निर्यात पर 25 प्रतिशत का अतिरिक्त टैरिफ भी लगाया हुआ है। विभिन्न देशों से अमेरिका को होने वाले उत्पादों के निर्यात पर टैरिफ को लगाए हुए अब कुछ समय व्यतीत हो चुका है एवं अब इसका असर विभिन्न देशों की अर्थवस्थाओं एवं अमेरिकी अर्थव्यवस्था पर दिखाई देने लगा है। यह हर्ष का विषय है कि 27 अगस्त 2025 से लगाए गए 50 प्रतिशत टैरिफ का असर भारतीय अर्थव्यवस्था पर लगभग नगण्य सा ही रहा है। माह सितम्बर 2025 में भारत से अमेरिका को विभिन्न उत्पादों का निर्यात लगभग 12 प्रतिशत कम होकर केवल 550 करोड़ अमेरिकी डॉलर के स्तर पर नीचे आ गया है। परंतु, भारत का अन्य देशों को निर्यात लगभग 11 प्रतिशत से बढ़कर 3,638 करोड़ अमेरिकी डॉलर के स्तर पर पहुंच गया है जो पिछले वर्ष इसी अवधि में किए गए निर्यात से लगभग 7 प्रतिशत अधिक है। सितम्बर 2025 माह में भारत से 24 देशों को निर्यात की मात्रा बढ़ गई है। इस प्रकार, भारत द्वारा अमेरिका को कम हो रहे निर्यात की भरपाई अन्य देशों को निर्यात बढ़ाकर कर ली गई है।

सितम्बर 2025 माह में न केवल निर्यात में पर्याप्त वृद्धि दर्ज की गई है अपितु भारत में अक्टूबर 2025 माह में   प्रारम्भ हुए त्यौहारी मौसम, धनतेरस एवं दीपावली उत्सव के पावन पर्व पर, 6,800 करोड़ अमेरिकी डॉलर मूल्य के विभिन्न उत्पादों एवं सेवाओं की बिक्री भारत में हुई है, जो अपने आप में एक रिकार्ड है। हर्ष का विषय यह है कि इस कुल बिक्री में 87 प्रतिशत उत्पाद भारत में ही निर्मित उत्पाद रहे हैं। भारत में स्वदेशी उत्पादों की बिक्री का रिकार्ड कायम हुआ है।भारत में स्वदेशी उत्पादों को अपनाने के लिए राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ पिछले 100 वर्षों से लगातार प्रयास कर रहा है। इसके  साथ ही प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी जी ने भी भारतीय नागरिकों का स्वदेशी उत्पादों को अपनाने का हाल ही में आह्वान किया था। इस आग्रह का अब भारी संख्या में भारतीय नागरिक सकारात्मक उत्तर दे रहे हैं। भारत में लगातार बढ़ रहे उपभोक्ता खर्च के चलते वस्तु एवं सेवा कर के संग्रहण में भी लगातार वृद्धि दृष्टिगोचर है, जो अब लगभग 2 लाख करोड़ प्रति माह के स्तर पर पहुंच गया है।

भारतीय पूंजी बाजार भी सकारात्मक परिणाम देता हुआ दिखाई दे रहा है। सितम्बर 2025 के अंत में सेन्सेक्स 80,267 के स्तर पर था जो 21 अक्टोबर 2025 को बढ़कर 84,426 के स्तर पर पहुंच गया। इसी प्रकार निफ्टी इंडेक्स भी सितम्बर 2025 के अंत में 24,611 के स्तर से बढ़कर 21 अक्टोबर 2025 को 25,868 के स्तर पर पहुंच गया। दीपावली के पावन पर्व पर रिकार्ड तोड़ व्यापार होने एवं पूंजी बाजार के अपने पिछले 52 सप्ताह के लगभग उच्चत्तम स्तर पर पहुंचने के पीछे मुख्य रूप से तीन कारक जिम्मेदार माने जा रहे हैं। (1) भारतीय उपभोक्ताओं में भारतीय उत्पादों के प्रति विश्वास निर्मित हुआ है और वे अब भारत में निर्मित उत्पादों को चीन अथवा अन्य विकसित देशों में निर्मित उत्पादों की तुलना में गुणवत्ता के मामले में बेहतर मानने लगे हैं। (2) विभिन्न भारतीय कम्पनियों द्वारा हाल ही में सितम्बर 2025 को समाप्त तिमाही के घोषित परिणाम काफी उत्साहजनक रहे हैं। (3) साथ ही, अक्टूबर 2025 माह में विदेशी संस्थागत निवेशकों की भारतीय पूंजी बाजार में वपिसी हुई है। वर्ष 2025 में सितम्बर 2025 माह तक विदेशी संस्थागत निवेशकों ने भारतीय पूंजी बाजार से लगभग 2 लाख करोड़ रुपए से अधिक की राशि की निकासी की थी, जबकि अक्टूबर 2025 माह में विदेशी संस्थागत निवेशकों द्वारा अभी तक लगभग 7,300 करोड़ रुपए का नया निवेश किया गया है।

ट्रम्प प्रशासन द्वारा भारत से अमेरिका को होने वाले विभिन्न उत्पादों पर लगाए गए 50 प्रतिशत टैरिफ के पश्चात भी भारतीय अर्थव्यवस्था लगातार आगे बढ़ रही है जबकि अमेरिकी अर्थव्यवस्था पर लगातार संकट के बादल मंडराते हुए दिखाई दे रहे हैं। भारत में मुद्रा स्फीति की दर लगातार नीचे आ रही है एवं यह सितम्बर 2025 माह में 1.54 प्रतिशत तक नीचे आ चुकी है जो पिछले 8 वर्षों के दौरान अपने सबसे निचले स्तर पर है। जबकि ट्रम्प प्रशासन द्वारा विभिन्न देशों से अमेरिका को होने वाले विभिन्न उत्पादों के निर्यात पर लगाए गए टैरिफ के चलते अमेरिका में मुद्रा स्फीति की दर अब बढ़ती हुई दिखाई दे रही है और अगस्त 2025 माह में यह 2.9 प्रतिशत के स्तर पर रही है।

ट्रम्प प्रशासन द्वारा अपने वित्तीय घाटे को नियंत्रण में लाने एवं सरकारी ऋण को कम करने के उद्देश्य से विभिन्न देशों से अमेरिका को होने निर्यात पर टैरिफ की घोषणा की थी। परंतु, भारी मात्रा में टैरिफ बढ़ाने के बावजूद अमेरिका का वित्तीय घाटा कम होता हुआ दिखाई नहीं दे रहा है। आज अमेरिका में वित्तीय घाटा सकल घरेलू उत्पाद का 5.9 प्रतिशत के स्तर पर पहुंच गया है जबकि भारत में यह प्रतिवर्ष लगातार कम हो रहा है और इसके वित्तीय वर्ष 2025-26 में सकल घरेलू उत्पाद के 4.4 प्रतिशत के स्तर पर नीचे पहुंच जाने की सम्भावना है, यह वित्तीय वर्ष 2024-25 में 4.8 प्रतिशत का रहा था। इसी प्रकार, अमेरिका में सरकारी ऋण 37 लाख करोड़ अमेरिकी डॉलर के खतरनाक स्तर पर पहुंच गया है, जो लगातार बढ़ता जा रहा है और यह अमेरिका के सकल घरेलू उत्पाद का 120 प्रतिशत है। अर्थात, अमेरिका में आय की तुलना में अधिक मात्रा में व्यय किए जा रहे है। आज अमेरिका में सरकारी ऋण पर ब्याज अदा करने के लिए भी ऋण लिया जा रहा है। दूसरी ओर, भारत में सरकारी ऋण की मात्रा केवल 3.80 लाख करोड़ अमेरिकी डॉलर के स्तर पर है और यह भारत के सकल घरेलू उत्पाद का मात्र 80 प्रतिशत है, जो लगातार कम हो रहा है। अमेरिका में सकल बचत की दर 22 प्रतिशत है जबकि भारत में यह 32 प्रतिशत है।

भारत में सकल घरेलू उत्पाद में वित्तीय वर्ष 2024-25 में 6.5 प्रतिशत की वृद्धि दर रही है जबकि अमेरिका में यह वर्ष 2024 में केवल 2.8 प्रतिशत की रही है। ट्रम्प प्रशासन द्वारा भारत से अमेरिका को विभिन्न उत्पादों के निर्यात पर लगाए गए 50 प्रतिशत टैरिफ के बावजूद वित्तीय वर्ष 2025-26 में भारत के सकल घरेलू उत्पाद में 6.7 प्रतिशत की वृद्धि दर विश्व बैंक द्वारा अनुमानित है। जबकि अमेरिका द्वारा विभिन्न देशों के अमेरिका को निर्यात टैरिफ लगाए जाने के बावजूद अमेरिका में वर्ष 2025 में सकल घरेलू उत्पाद में वृद्धि दर के नीचे गिरकर 1.6 प्रतिशत रहने की सम्भावना व्यक्त की जा रही है। स्पष्टत: अमेरिका द्वारा टैरिफ लागू करने का भारतीय अर्थव्यवस्था पर तो कोई विपरीत प्रभाव पड़ता हुआ दिखाई नहीं दे रहा है बल्कि अमेरिकी अर्थव्यवस्था पर ही विपरीत प्रभाव पड़ता हुआ दिखाई दे रहा है। साथ ही, अमेरिका में बेरोजगारी की दर में भी  वृद्धि दृष्टिगोचर है जो अब बढ़कर 4.3 प्रतिशत के स्तर पर आ गई है, जबकि भारत में यह दर गिरकर 5.1 प्रतिशत के स्तर पर नीचे आ गई है।

अमेरिका में बैकों से लिए गए ऋण एवं क्रेडिट कार्ड पर ली गई उधारी की किश्तों के भुगतान में चूक की संख्या में वृद्धि दृष्टिगोचर है। इसके चलते हाल ही 3 वित्तीय संस्थानों को दिवालिया घोषित किया जा चुका है। अंतरराष्ट्रीय बाजार में स्वर्ण की कीमत में अपार वृद्धि (लगभग 4300 अमेरिकी डॉलर प्रति आउन्स के स्तर पर) दर्शाता है कि विभिन्न देशों का अब अमेरिकी डॉलर पर विश्वास कम हो रहा है और विभिन्न देशों के केंद्रीय बैंक अपने विदेशी मुद्रा के भंडार में स्वर्ण की मात्रा को लगातार बढ़ा रहे हैं।

प्रहलाद सबनानी
सेवानिवृत्त उपमहाप्रबंधक,
भारतीय स्टेट बैंक
के-8, चेतकपुरी कालोनी,
झांसी रोड, लश्कर,
ग्वालियर – 474 009
मोबाइल क्रमांक – 9987949940

ई-मेल – prahlad.sabnani@gmail.com

केरल भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष राजीव चंद्रशेखर ने ‘रिपोर्टर टीवी’को भेजा 100 करोड़ का मानहानि का नोटिस

केरल भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष राजीव चंद्रशेखर ने टीवी चैनल ‘रिपोर्टर टीवी’ के खिलाफ 100 करोड़ रुपये का मानहानि का नोटिस भेजा है। उनका आरोप है कि चैनल ने एक विवादास्पद भूमि सौदे से उनका नाम जोड़ते हुए झूठी और भ्रामक रिपोर्टें चलाईं।

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, मुंबई स्थित लॉ फर्म RHP पार्टनर्स के जरिए यह नोटिस नौ लोगों को भेजा गया है, जिनमें चैनल के मालिक एंटो ऑगस्टीन समेत कई वरिष्ठ पत्रकार शामिल हैं।

शिकायत के अनुसार, कोच्चि स्थित ‘रिपोर्टर टीवी’ ने बार-बार ऐसी खबरें दिखाईं जिनमें चंद्रशेखर का नाम बीपीएल नामक कंपनी के साथ भूमि सौदे में जोड़ा गया, जबकि उनका उस कंपनी से कोई संबंध नहीं है।

नोटिस में कहा गया है कि इन खबरों का उद्देश्य उनकी छवि को धूमिल करना और भाजपा प्रदेश अध्यक्ष के तौर पर उनके पद का गलत इस्तेमाल दिखाना था। भाजपा नेता ने कहा कि वे झूठी खबरों और भ्रामक प्रचार अभियानों के जरिये उनकी राजनीतिक या व्यक्तिगत साख को नुकसान नहीं पहुंचाने देंगे।

कानूनी नोटिस में चैनल से मांग की गई है कि वह इन झूठी खबरों को वापस ले और सात दिनों के भीतर सार्वजनिक माफीनामा जारी करे, अन्यथा आगे की कानूनी कार्रवाई की जाएगी।

इस बीच बीपीएल लिमिटेड ने भी एक स्पष्टीकरण जारी करते हुए इन आरोपों को पूरी तरह निराधार और तथ्यहीन बताया है। कंपनी ने कहा कि औद्योगिक भूमि के आवंटन में अनियमितता के आरोप पहले भी लगाए गए थे, लेकिन उन्हें साल 2003 में सुप्रीम कोर्ट ने खारिज कर दिया था। बीपीएल ने अपने बयान में कहा, ‘वर्तमान आरोप झूठे हैं और कानूनी रूप से इनका कोई आधार नहीं है।

भारत की शास्त्रीय भाषाएँ: भारत की भाषाई विरासत का संरक्षण

भारत सरकार ने 3 अक्टूबर 2024 को मराठी, पाली, प्राकृत, असमिया और बंगाली भाषाओं को ‘शास्त्रीय भाषा’ का दर्जा प्रदान किया।
अक्टूबर 2025 तक, कुल 11 भारतीय भाषाओं को शास्त्रीय भाषा का दर्जा प्राप्त है।
वर्ष 2004 से 2024 के बीच छह भारतीय भाषाओं, तमिल, संस्कृत, कन्नड़, तेलुगु, मलयालम और उड़िया शास्त्रीय भाषा का दर्जा दिया गया था।

भारत की भाषाई विरासत समृद्ध और विविध है और देश भर में अनेक भाषाएँ और बोलियाँ बोली जाती हैं। भारत सरकार विभिन्न नीतियों, कार्यक्रमों और पहलों के ज़रिए देश की भाषाई विरासत के संरक्षण और संवर्धन के लिए लगातार काम कर रही है। इन भाषाओं को मान्यता और संवर्धन देते हुए प्राचीन जड़ों वाली भाषाओं को “शास्त्रीय भाषा” का दर्जा प्रदान करना भी एक अहम कदम है, जो भाषाएं हज़ारों वर्षों की साहित्य, दर्शन और संस्कृति की समृद्ध विरासत भारत की सांस्कृतिक पहचान को आकार देती है। भारत सरकार कुछ विशिष्ट मानदंडों को पूरा करने वाली भाषाओं को “शास्त्रीय भाषा” का दर्जा प्रदान करती है और इन भाषाओं के संरक्षण और संवर्धन के लिए सहायता प्रदान करती है। 3 अक्टूबर 2024 को केंद्रीय मंत्रिमंडल ने मराठी, पाली, प्राकृत, असमिया और बंगाली को इस श्रेणी में जोड़ने को मंज़ूरी दी, जिससे देश में शास्त्रीय भाषाओं की कुल संख्या 11 हो गई।

 

शास्त्रीय भाषा का दर्जा क्यों महत्वपूर्ण है

किसी भाषा को शास्त्रीय भाषा के रूप में मान्यता देना, उसके ऐतिहासिक महत्व और भारत की सांस्कृतिक तथा बौद्धिक पहचान पर उसके गहन प्रभाव को सम्मान और मान्यता प्रदान करने का एक तरीका है, साथ ही हज़ारों सालों से चले आ रहे प्राचीन ज्ञान, दर्शन और मूल्यों को संरक्षित और प्रसारित करने का भी तरीका है। यह दर्जा न केवल उनकी प्रतिष्ठा को बढ़ाता है, बल्कि इन भाषाओं के संरक्षण, संवर्धन और आगे के अध्ययन के प्रयासों को भी बढ़ावा देता है, जिससे यह सुनिश्चित करने में मदद मिलती है कि वे आज की दुनिया में प्रासंगिक बनी रहें।

भाषा को “शास्त्रीय” बनाने का पैमाना

भारत सरकार ने संस्कृति मंत्रालय के ज़रिए और भाषाई तथा ऐतिहासिक विशेषज्ञों के परामर्श से, किसी भाषा को शास्त्रीय भाषा के रूप में नामित करने के लिए मानदंड स्थापित किए हैं।

किसी भाषा को शास्त्रीय भाषा के रूप में वर्गीकृत करने के मानदंडों में निम्नलिखित शामिल हैं:

  • उसके प्रारंभिक ग्रंथों या लिखित इतिहास की प्राचीनता, जो 1,500-2,000 वर्षों की अवधि तक फैली हो।
  • प्राचीन साहित्य या ग्रंथों का एक संग्रह, जिसे बोलने वालों की पीढ़ियों द्वारा विरासत माना जाता है।
  • ज्ञान ग्रंथ, विशेष रूप से गद्य ग्रंथ, काव्य, पुरालेखीय और शिलालेखीय साक्ष्य।
  • शास्त्रीय भाषा और उसका साहित्य अपने वर्तमान स्वरूप से भिन्न हो सकता है या मूल से प्राप्त बाद के रूपों से अलग हो सकता है।

भारत की भाषाई विरासत का विस्तार: 2024 में नई भाषाएँ

2004 और 2014 के बीच छह भाषाओं, तमिल, संस्कृत, तेलुगु, कन्नड़, मलयालम और उड़िया को शास्त्रीय भाषाओं के रूप में मान्यता दी गई थी। 3 अक्टूबर 2024 को केंद्रीय मंत्रिमंडल ने मराठी, पाली, प्राकृत, असमिया और बंगाली को इस श्रेणी में जोड़ने को मंज़ूरी दी, जिससे मान्यता प्राप्त शास्त्रीय भाषाओं की संख्या बढ़कर 11 हो गई।

मराठी

मराठी एक भारतीय-आर्यन भाषा है, जो मुख्यतः भारत के महाराष्ट्र में बोली जाती है। इसका एक हज़ार साल से भी ज़्यादा पुराना समृद्ध साहित्यिक इतिहास है। लगभग 11 करोड़ देशी वक्ताओं के साथ, मराठी दुनिया की शीर्ष 15 सबसे ज़्यादा बोली जाने वाली भाषाओं में से एक है।

इसकी जड़ें 2500 साल से भी ज़्यादा पुरानी हैं, और इसकी उत्पत्ति प्राचीन महारथी, मराठथी, महाराष्ट्री प्राकृत और अपभ्रंश मराठी जैसी भाषाओं से हुई है। इस भाषा में कई अहम बदलाव हुए हैं, लेकिन इसने विभिन्न ऐतिहासिक चरणों में अपनी निरंतरता बनाए रखी है।

  • आधुनिक मराठी इस क्षेत्र में बोली जाने वाली प्राचीन भाषाओं से विकसित हुई, जिसकी शुरुआत महाराष्ट्री प्राकृत से हुई, जो सातवाहन युग (दूसरी शताब्दी ईसा पूर्व से दूसरी शताब्दी ईसवी) के दौरान बोली जाने वाली प्राकृत भाषाओं की एक बोली थी।

मराठी साहित्य का योगदान

  • गाथासप्तशती, जो सबसे प्राचीन मराठी साहित्यिक कृति है, लगभग 2000 वर्ष पुरानी है और प्रारंभिक मराठी काव्य की उत्कृष्टता को उजागर करती है।
  • यह सातवाहन राजा हाला द्वारा रचित काव्य संग्रह है, जिसके बारे में माना जाता है कि इसे पहली शताब्दी ईसवी में संकलित किया गया था। इसके बाद, करीब आठ शताब्दियों पहले मराठी के परिपक्व भाषाई स्तर पर पहुँचने के बाद लीलाचरित्र और ज्ञानेश्वरी का उदय हुआ।
  • कई शिलालेख, ताम्रपत्र, पांडुलिपियाँ और प्राचीन धार्मिक ग्रंथ (पोथियाँ) मराठी की समृद्ध ऐतिहासिक जड़ों को खूबसूरती से दर्शाते हैं।
  • नाणेघाट शिलालेख एक असाधारण कलाकृति है, जो 2500 वर्ष पूर्व मराठी के प्रयोग को उजागर करती है।
  • इसके अलावा, मराठी का उल्लेख प्राचीन भारतीय लेखन, जैसे विनयपिटक, दीपवंश और महावंश, के साथ-साथ कालिदास और वररुचि जैसे प्रसिद्ध लेखकों की रचनाओं में भी मिलता है।
  • मराठी की साहित्यिक विरासत में संत ज्ञानेश्वर, नामदेव और तुकाराम जैसे कई अन्य संतों की रचनाएं शामिल हैं, जिनके योगदान को व्यापक रूप से सम्मान दिया जाता है।

पाली

प्राचीन भारत के इतिहास के पुनर्निर्माण के लिए पाली का अध्ययन बेहद ज़रुरी है, क्योंकि इसके साहित्य में अतीत पर प्रकाश डालने वाली बहुमूल्य सामग्रियाँ हैं। कई पाली ग्रंथ अभी भी पांडुलिपियों में छिपे हुए हैं, जिनकी पहुँच मुश्किल है। श्रीलंका, म्यांमार, थाईलैंड जैसे बौद्ध देशों और चटगाँव जैसे क्षेत्रों के साथ-साथ जापान, कोरिया, तिब्बत, चीन और मंगोलिया में भी पाली का अध्ययन जारी है, जहाँ अधिकांश बौद्ध रहते हैं।

• पाली के प्रारंभिक संदर्भ बौद्ध विद्वान बुद्धघोष की टीकाओं में मिलते हैं।

पाली भाषा का साहित्यिक योगदान

पाली विभिन्न बोलियों से बुनी एक समृद्ध लिपि है, जिसे प्राचीन भारत में बौद्ध और जैन संप्रदायों ने अपनी पवित्र भाषा के रूप में अपनाया था। लगभग 500 ईसा पूर्व भगवान बुद्ध ने अपने उपदेश देने के लिए पाली का उपयोग किया, जिससे यह उनकी शिक्षाओं के प्रसार का एक प्रमुख माध्यम बन गया। बौद्ध प्रामाणिक साहित्य का संपूर्ण संग्रह पाली में लिखा गया है, खासकर त्रिपिटक में, जिसका अर्थ है “त्रिकोणीय टोकरी”।

  • पहली टोकरी, विनय पिटक, बौद्ध भिक्षुओं के लिए मठवासी नियमों की रूपरेखा प्रस्तुत करती है, जो नैतिक आचरण और सामुदायिक जीवन के लिए एक खाका प्रदान करती है।
  • दूसरी टोकरी, सुत्त पिटक, बुद्ध के भाषणों और संवादों का खजाना है, जो उनके ज्ञान और दार्शनिक अंतर्दृष्टि को समेटे हुए है।
  • अंत में, अभिधम्म पिटक नैतिकता, मनोविज्ञान और ज्ञान के सिद्धांत से संबंधित विभिन्न विषयों पर गहराई से विचार करता है, और मन और वास्तविकता का गहन विश्लेषण प्रस्तुत करता है।

पाली साहित्य में जातक कथाएँ शामिल हैं, जो बोधिसत्व या भावी बुद्ध के रूप में बुद्ध के पूर्व जन्मों की गैर-प्रामाणिक कथाएँ हैं। ये कहानियाँ भारतीय साझी विरासत से जुड़ती हैं और साझा नैतिक मूल्यों और परंपराओं को दर्शाती हैं। साथ ही ये भारतीय विचार और आध्यात्मिकता के संरक्षण में भी पाली की भूमिका को उजागर करती हैं।

प्राकृत

प्राकृत, जो मध्यकालीन भारतीय-आर्य भाषाओं के एक समूह का प्रतिनिधित्व करती है, भारत की समृद्ध भाषाई और सांस्कृतिक विरासत को समझने का अभिन्न अंग है। यह प्राचीन भाषा न केवल कई आधुनिक भारतीय भाषाओं का आधार है, बल्कि उन विविध परंपराओं और दर्शनों को भी समाहित करती है, जिन्होंने इस उपमहाद्वीप के ऐतिहासिक आख्यान को आकार दिया है। आदि शंकराचार्य के अनुसार, “वाचः प्राकृत संस्कृतौ श्रुतिगिरो” – प्राकृत और संस्कृत भाषाएँ भारतीय ज्ञान की सच्ची संवाहक हैं।

प्राकृत भाषा का योगदान

भाषाविदों और विद्वानों के बीच प्राकृत भाषा को व्यापक मान्यता प्राप्त है। पाणिनि, चंद, वररुचि और समंतभद्र जैसे आचार्यों ने इसकी व्याकरण को आकार दिया। महात्मा बुद्ध और महावीर ने अपने उपदेशों को जन-जन तक पहुँचाने के लिए प्राकृत का प्रयोग किया। इसका प्रभाव क्षेत्रीय साहित्य में भी देखा जा सकता है, जहाँ ज्योतिष, गणित, भूविज्ञान, रसायन विज्ञान और वनस्पति विज्ञान जैसे क्षेत्रों में नाट्य, काव्य और दार्शनिक रचनाओं का योगदान है। प्राकृत भारतीय भाषाविज्ञान और बोलियों के लिए बेहद महत्वपूर्ण है और इसकी एक समृद्ध विरासत है। राष्ट्रभाषा हिंदी परंपरा प्राकृत-अपभ्रंश से विकसित हुई है। वैदिक भाषा में भी प्राकृत के महत्वपूर्ण तत्व विद्यमान हैं, जो भारत के भाषाई विकास को समझने के लिए इसके अध्ययन के महत्व को दर्शाते हैं। प्राकृत शिलालेख महत्वपूर्ण ऐतिहासिक अभिलेखों के रूप में कार्य करते हैं, जो भारत के इतिहास की जानकारी देते हैं। मौर्य-पूर्व काल के शिलालेख, साथ ही राजा अशोक और खारवेल के शिलालेख, मुख्यतः प्राकृत में लिखे गए हैं।

  • आचार्य भरतमुनि ने अपनी मौलिक कृति ‘नाट्यशास्त्र’ में प्राकृत को बहुसंख्यक भारतीयों की भाषा माना है, जो कलात्मक अभिव्यक्ति और सांस्कृतिक विविधता के लिहाज़ से काफी समृद्ध है।
  • यह मान्यता आम लोगों के बीच संचार के एक माध्यम के रूप में प्राकृत की सुगमता और महत्व पर ज़ोर देती है।

हिंदी, बंगाली और मराठी जैसी भाषाओं का विकास प्राकृत से हुआ है, जो आधुनिक भाषाओं की उत्पत्ति और विकास की व्यापक समझ के लिए प्राकृत साहित्य को समझने के महत्व पर प्रकाश डालता है।

असमिया

असम की आधिकारिक भाषा की जड़ें संस्कृत में हैं, जिसका विकास 7वीं शताब्दी ईसवी पूर्व में हुआ था। हालाँकि, इसका प्रत्यक्ष पूर्वज मगधी अपभ्रंश है, जो पूर्वी प्राकृत से नज़दीक से जुड़ी एक बोली है। भाषाविद् जी.ए. ग्रियर्सन ने उल्लेख किया है कि मगधी इस क्षेत्र की प्रमुख बोली थी, जबकि पूर्वी समकक्ष, प्राच्य अपभ्रंश, दक्षिण तथा दक्षिण-पूर्व में फैलीं और अंततः आधुनिक बंगाली में विकसित हुई। जैसे-जैसे प्राच्य अपभ्रंश का पूर्व में विस्तार हुआ, यह गंगा के उत्तर को पार करके असम घाटी में पहुँची, जहाँ यह असमिया में तब्दील हो गई।[4] असमिया का सबसे पहला उल्लेख कथा गुरुचरित में मिलता है। “अक्षोमिया” (असमिया) शब्द की उत्पत्ति विविध व्याख्याओं पर आधारित है। कुछ विद्वान इसे भौगोलिक विशेषताओं से जोड़ते हैं, जबकि अन्य इसे अहोम वंश से जोड़ते हैं, जिसने इस क्षेत्र पर छह शताब्दियों तक शासन किया। उत्तर बंगाल सहित ब्रह्मपुत्र घाटी को महाभारत में प्राग्ज्योतिषपुर और चौथी शताब्दी ईसवी के समुद्रगुप्त के स्तंभलेख में कामरूप कहा गया है। अंग्रेजीकृत शब्द “असम”, ब्रह्मपुत्र घाटी को दर्शाने वाले “अक्षोम” से उत्पन्न हुआ है, और इसी से “असमिया” विकसित हुआ, जो इस क्षेत्र में बोली जाने वाली भाषा को दर्शाता है। आठवीं शताब्दी ईस्वी तक, असमिया एक भाषा के रूप में पहले से ही फल-फूल रही थी। असमिया की उड़िया और बंगाली के साथ एक साझा भाषाई विरासत है, और ये सभी एक ही मूल बोली, मगधी अपभ्रंश से उत्पन्न हुई हैं।

असमिया भाषा का साहित्यिक योगदान

  • पूर्व-आधुनिक असमिया लिपि का सबसे पहला उदाहरण चर्यापदों में मिलता है, जो बौद्ध सिद्धाचार्यों द्वारा रचित प्राचीन बौद्ध तांत्रिक ग्रंथ हैं और 8वीं और 12वीं शताब्दी के बीच के हैं।
  • चर्यापदों का असमिया और अन्य मगध भाषाओं के साथ घनिष्ठ संबंध है, जो कई भारतीय भाषाओं के विकास के चरणों को दर्शाता है।
  • चर्यापदों की शब्दावली में ऐसे शब्द शामिल हैं, जो विशिष्ट रूप से असमिया हैं।
  • इसके अलावा, ध्वनि और रूपात्मकता की दृष्टि से, शब्दावली विशिष्ट असमिया शब्दों से काफी मिलती-जुलती है, जिनमें से कई आधुनिक भाषा में भी मौजूद हैं।

बंगाली

भारत की सबसे प्रमुख भाषाओं में से एक, बंगाली, उपमहाद्वीप के सांस्कृतिक और भाषाई इतिहास में एक अहम स्थान रखती है। बंगाली में ऐसे कवि, लेखक और विद्वान हुए हैं, जिन्होंने न केवल बंगाल की सांस्कृतिक पहचान को बल्कि भारत की राष्ट्रीय चेतना को भी आकार दिया है। बंगाली की प्रारंभिक रचनाएँ 10वीं और 12वीं शताब्दी ईसवी में देखी जा सकती हैं। संस्कृत महाकाव्यों के प्रारंभिक अनुवादों से लेकर 19वीं और 20वीं शताब्दी के क्रांतिकारी लेखन तक, बंगाली साहित्य ने सामाजिक, राजनीतिक और बौद्धिक आंदोलनों को गति देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।

  • बंगाली, असमिया और उड़िया, साथ ही मगधी, मैथिली और भोजपुरी, दक्षिण-पूर्व क्षेत्र में अन्य भाषाओं के साथ एक भाषाई समूह बनाती है। इसका तात्कालिक स्रोत मगधी प्राकृत, जिसे पूर्वी प्राकृत भी कहा जाता है, में पाया जा सकता है, जिसकी उत्पत्ति मगध (या बिहार) से हुई थी।
  • गौड़-बंग भाषा, अन्य पूर्वी भाषाओं के साथ, मगध अपभ्रंश से विकसित हुई।
  • आनुवंशिक रूप से, बंगाली इंडो-आर्यन (आईए) भाषाओं से ली गई है, जो इंडो-यूरोपीय परिवार की इंडो-ईरानी शाखा की इंडिक उप-शाखा से संबंधित हैं।

बंगाली भाषा का साहित्यिक योगदान

प्राचीन बांग्ला के सबसे पुराने उपलब्ध नमूने, बौद्ध भिक्षुओं द्वारा रचित 47 आध्यात्मिक भजन हैं, जिन्हें अब चर्यापद के नाम से जाना जाता है। चर्यापद भजनों का भाषाई और साहित्यिक दोनों ही महत्व है। चर्यापद भजनों के रचनाकारों, सिद्धाचार्यों में लुईपा, भुसुकुपा, कहनपा और सवर्पा शामिल हैं।

प्रारंभिक बंगाली साहित्यिक कृतियों का इतिहास 10वीं और 12वीं शताब्दी ईसवी में मिलता है, जिसकी शुरुआत महान संस्कृत महाकाव्यों के व्यापक अनुवादों से हुई थी। 16वीं शताब्दी चैतन्यानंद के नेतृत्व में धार्मिक सुधारों और रघुनाथ और रघुनंदन द्वारा पोषित पवित्र धर्म के साथ एक अहम मोड़ साबित हुई। बाद की शताब्दियों में मौलिक रचनाओं का उदय हुआ, जिनमें मुकुंद राम जैसे उल्लेखनीय व्यक्ति शामिल थे, जिन्हें अक्सर “बंगाल का चौसर” कहा जाता है, और बाद में भरत चंद्र और राम प्रसाद जैसे साहित्यिक गुरु हुए।

  • 19वीं शताब्दी बंगाली साहित्य के लिए एक स्वर्णिम युग थी, जिसमें राजा राम मोहन राय और ईश्वर चंद्र विद्यासागर जैसी प्रभावशाली हस्तियों ने महत्वपूर्ण योगदान दिया।
  • संवाद कौमुदी, सोम प्रकाश और बंदे मातरम जैसे समाचार पत्रों ने स्वतंत्रता संग्राम के दौरान अहम भूमिका निभाई और जनता को एकजुट करने में लिखित शब्दों की शक्ति को उजागर किया।
  • बंकिम चंद्र चटर्जी ने बंगाली कथा साहित्य का बीड़ा उठाया, जबकि रवींद्रनाथ टैगोर, माइकल मधुसूदन दत्ता, सुकांत भट्टाचार्य और काजी नज़रुल इस्लाम जैसे कवियों ने साहित्यिक क्रांति में महत्वपूर्ण योगदान दिया, जिसने स्वतंत्रता संग्राम को गति दी।
  • नेताजी सुभाष चंद्र बोस के ‘जय हिंद’ और बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय के ‘वंदे मातरम’ जैसे नारे पूरे देश में गूंजते रहे और पीढ़ियों को प्रेरित करते रहे।
  • रवींद्रनाथ टैगोर द्वारा रचित हमारा राष्ट्रगान ‘जन गण मन’ और बंकिम चंद्र द्वारा रचित हमारा राष्ट्रीय गीत ‘वंदे मातरम’, दोनों ही बंगाली कवियों की देन हैं।

शास्त्रीय भाषाओं को बढ़ावा देने के लिए उठाए गए कदम

शास्त्रीय भाषाओं सहित सभी भारतीय भाषाओं का संवर्धन, शिक्षा मंत्रालय के भाषा ब्यूरो के अंतर्गत आने वाले केंद्रीय भारतीय भाषा संस्थान (सीआईआईएल) के माध्यम से किया जाता है। इसके अतिरिक्त, शास्त्रीय भाषाओं के अध्ययन और संवर्धन के लिए स्वतंत्र रूप से या सीआईआईएल के अंतर्गत विशेष केंद्र स्थापित किए गए हैं।

2020 में, संस्कृत के अध्ययन को बढ़ावा देने के लिए संसद के एक अधिनियम के ज़रिए तीन केंद्रीय विश्वविद्यालयों की स्थापना की गई। ये हैं: नई दिल्ली स्थित केंद्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय और श्री लाल बहादुर शास्त्री राष्ट्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय तथा तिरुपति स्थित राष्ट्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय। इसके अलावा, आदर्श संस्कृत महाविद्यालयों और शोध संस्थानों को वित्तीय सहायता प्रदान की जाती है।

प्राचीन तमिल ग्रंथों के अनुवाद की सुविधा प्रदान करके, शोध को समर्थन देकर और विश्वविद्यालय के छात्रों और विद्वानों के लिए शास्त्रीय तमिल में पाठ्यक्रम प्रदान करके, शास्त्रीय तमिल साहित्य को बढ़ावा देने और संरक्षित करने के लिए केंद्रीय शास्त्रीय तमिल संस्थान की स्थापना की गई है।

शास्त्रीय भाषाओं के अध्ययन और संरक्षण को और अधिक बढ़ावा देने के लिए, मैसूरु में केंद्रीय भारतीय भाषा संस्थान (सीआईआईएल) के अंतर्गत शास्त्रीय कन्नड़, तेलुगु, मलयालम और ओडिया में उत्कृष्टता केंद्र भी स्थापित किए गए हैं।

शास्त्रीय भाषा केंद्रों की प्रमुख गतिविधियाँ और उद्देश्य

• भारत की शास्त्रीय भाषाओं और साहित्य का संवर्धन, प्रचार और संरक्षण।

• अनुसंधान और दस्तावेज़ीकरण।

• राज्य संग्रहालयों और अभिलेखागारों की मदद से पांडुलिपियों का डिजिटलीकरण।

• पुस्तकें, शोध रिपोर्ट और पांडुलिपि सूचीपत्र प्रकाशित करना।

• शास्त्रीय ग्रंथों का भारतीय और विदेशी भाषाओं में अनुवाद।

• दृश्य-श्रव्य दस्तावेज़ीकरण: प्रख्यात विद्वानों और शास्त्रीय ग्रंथों पर वृत्तचित्रों का निर्माण।

• शास्त्रीय भाषाओं को पुरालेखशास्त्र, पुरातत्व, नृविज्ञान, मुद्राशास्त्र और प्राचीन इतिहास से जोड़ने वाले अध्ययनों को बढ़ावा देना।

• शास्त्रीय विरासत को स्वदेशी ज्ञान प्रणालियों से जोड़ते हुए ज्ञानमीमांसीय अध्ययन करना।

  • चेन्नई स्थित केंद्रीय शास्त्रीय तमिल संस्थान, तमिल के शास्त्रीय चरण से संबंधित, प्रारंभिक काल से लेकर 600 ईसवी तक, व्यापक शोध कर रहा है। इसमें तोलकाप्पियम्-सबसे प्राचीन विद्यमान तमिल व्याकरण ग्रंथ, नत्रिणै, पूर्णानूरु, कार नारपतु जैसे 41 प्राचीन तमिल ग्रंथ आदि शामिल हैं। केंद्र तमिल की प्राचीनता का अध्ययन करने के लिए बहु-विषयक विद्वानों को नियुक्त कर रहा है, द्रविड़ तुलनात्मक व्याकरण और तमिल बोलियों के अध्ययन पर शोध कर रहा है, विश्व स्तरीय विश्वविद्यालयों में तमिल पीठों का निर्माण कर रहा है, संस्थानों और शोधकर्ताओं को अल्पकालिक शोध परियोजनाओं के लिए अनुदान सहायता प्रदान कर रहा है, और इसके कई कार्यकलापों में शामिल है।

यह केंद्र प्राचीन तमिल ग्रंथों का कई भारतीय और विदेशी भाषाओं में अनुवाद भी कर रहा है। इस परियोजना के तहत तिरुक्कुरल का 28 भारतीय और 30 से अधिक विश्व भाषाओं में और ब्रेल में भी अनुवाद किया गया है। केंद्र शास्त्रीय तमिल ग्रंथों को ब्रेल लिपि में प्रकाशित कर रहा है और एक शास्त्रीय तमिल शब्दकोश संकलित कर रहा है

  • शास्त्रीय तेलुगु अध्ययन उत्कृष्टता केंद्र (सीईएससीटी) सीआईआईएल के अंतर्गत स्थापित किया गया है और यह वेंकटचलम, एसपीएसआर नेल्लोर (आंध्र प्रदेश) स्थित परिसर से संचालित होता है। सीईएससीटी ने विस्तृत जानकारी के साथ करीब 10,000 शास्त्रीय महाकाव्यों का एक डेटाबेस संकलित किया है। इसमें नाटक, आंध्र और तेलंगाना के मंदिर, गाँव के अभिलेख आदि शामिल हैं। सभी तेलुगु शिलालेखों को संपादित करके “तेलुगु सासनालु” नामक एक पुस्तक में संकलित किया गया है। प्रथम तेलुगु व्याकरण, ‘आंध्र शब्द चिंतामणि’ और अग्रणी छंद रचना, ‘कविजनश्रमम’ का अंग्रेजी में अनुवाद किया गया है।
  • शास्त्रीय कन्नड़ अध्ययन उत्कृष्टता केंद्र (सीईएससीके) सीआईआईएल के तहत स्थापित किया गया है और यह मैसूर विश्वविद्यालय परिसर, मैसूर में एक समर्पित पुस्तकालय, सांस्कृतिक प्रयोगशाला और नई सम्मेलन सुविधाओं के साथ संचालित होता है। सीईएससीके ने अपने प्रशिक्षण कार्यक्रमों के माध्यम से रोडमैप मीटिंग और शास्त्रीय कन्नड़ के प्रसार जैसे विभिन्न कार्यक्रम शुरू किए हैं। केंद्र चार आधारभूत क्षेत्रों में कार्य करता है: अनुसंधान, शिक्षण, दस्तावेज़ीकरण और प्रसार। इसने 7 पुस्तकें प्रकाशित की हैं और 22 अन्य पुस्तकें प्रकाशन के लिए तैयार हैं। कवि-संत अन्नामाचार्य द्वारा रचित प्रथम संगीत स्वर रचना ‘संकीर्तन लक्षणम्’, जो मूल रूप से संस्कृत में लिखी गई थी, का कन्नड़ में अनुवाद किया गया है।
  • शास्त्रीय ओड़िया अध्ययन उत्कृष्टता केंद्र (सीईएससीओ) की स्थापना सीआईआईएल के अंतर्गत की गई है और यह भुवनेश्वर स्थित पूर्वी क्षेत्रीय भाषा केंद्र में स्थित है। यह केंद्र शास्त्रीय भाषाओं और साहित्य की विरासत को बढ़ावा देने, प्रचारित करने और संरक्षित करने के साथ-साथ अनुसंधान और दस्तावेज़ीकरण को प्रोत्साहित करने का कार्य करता है। इसने ओड़िया जैसी शास्त्रीय भाषाओं के स्रोतों पर आधारित परियोजनाएँ शुरू की हैं, जिनमें शिलालेखों का विश्लेषण, भित्ति चित्रों का भाषाई अध्ययन, पुरातात्विक अवशेष, पुराने ताड़ के पत्तों की पांडुलिपियाँ और विभिन्न प्राचीन ग्रंथों से संदर्भों का संकलन शामिल है।
  • शास्त्रीय मलयालम अध्ययन उत्कृष्टता केंद्र (सीईएससीएम) की स्थापना सीआईआईएल के तहत थुंचत एज़ुथचन मलयालम विश्वविद्यालय, तिरूर, मलप्पुरम, केरल में राज्य सरकार द्वारा प्रदान की गई है।

निष्कर्ष

“विरासत भी, विकास भी”—भारत के प्रधानमंत्री का यह प्रेरक मंत्र भारत की समृद्ध विरासत को प्रगतिशील विकास के साथ संतुलित करने का सार पेश करता है। देश की शास्त्रीय भाषाएँ, संस्कृत, तमिल, तेलुगु, कन्नड़, मलयालम और उड़िया इसी दृष्टिकोण के जीवंत प्रतीक हैं, जो हमारी सभ्यता के बौद्धिक और सांस्कृतिक खजाने को दुनिया के सामने पेश करती हैं। इसके अलावा, मराठी, पाली, प्राकृत, असमिया और बंगाली को शास्त्रीय भाषाओं का दर्जा देने का सरकार का फैसला भी भारत की बौद्धिक विरासत को आकार देने में इन भाषाओं की अमूल्य भूमिका की गहन मान्यता को दर्शाता है। सरकार के प्रयासों ने संस्थानों, विद्वानों और युवाओं को हमारी प्राचीन परंपराओं से जुड़ने में सक्षम बनाया है। भावी पीढ़ियों के लिए इन भाषाओं को सुरक्षित रखकर, प्रधानमंत्री मोदी आत्मनिर्भर भारत और सांस्कृतिक रूप से जड़ित भारत के उद्देश्यों के अनुरूप, सांस्कृतिक आत्मनिर्भरता और राष्ट्रीय एकता के एक व्यापक दृष्टिकोण को और मज़बूत कर रहे हैं। उनके समर्पण की वजह से ही भारत की ऐतिहासिक आवाज़ें एक आधुनिक, आत्मविश्वासी भारत में गुंजायमान हैं।

राष्ट्रीय एकता के प्रतीक – लौहपुरुष सरदार पटेल

(जन्म 31 अक्टूबर 1875 – निधन 15 दिसंबर 1950)

स्वतंत्रता के पश्चात भारत की राष्ट्रीय एकता के प्रतीक एक प्रखर देशभक्त जो ब्रिटिश राज के अंत के बाद 562 रियासतों को जोड़ने के लिए प्रतिबद्ध थे तथा एक महान प्रशासक जिन्होंने विभाजन कि विभीषिका से बिलखते और जलते भारत को स्थिर करने में महतवपूर्ण भूमिका निभायी ऐसे महान लौहपुरुष सरदार पटेल का जन्म 31 अक्टूबर 1875 को ग्राम करमसद में हुआ था। इनके पिता झबेरभाई पटेल थे जिन्होंने 1857 में रानी झांसी के समर्थन में युद्ध किया था। इनकी मां का नाम लाडोबाई था।

वल्लभ भाई की प्रारम्भिक शिक्षा  गांव के ही एक ऐसे विद्यालय में हुई जो कक्षा चार तक ही था। आगे की शिक्षा   के लिए पटेल  जिस विद्यालय में गए वह उनके मूल गांव से छह से सात किलोमीटर की दूरी पर था। वल्लभ भाई की विद्यालय की शिक्षा उनके ननिहाल में हुई। उनके जीवन का  वास्तविक विकास ननिहाल से ही प्रारम्भ हुआ था। उनमें बचपन से ही कुशल नेतृत्वकर्ता के गुण दिखाई देते थे । वे पढ़ने  में तो तेज थे ही, गीत- संगीत व खेलकूद में भी आगे थे। उनमें एक ऐसा सम्मोहन था कि वे अपने साथियों के बीच विद्यालय के दिनों में ही लोकप्रिय हो गये थे तथा उनका नेतृत्व करने लग गये थे। वल्लभभाई की उच्च शिक्षा बहुत ही कष्टों के साथ इंग्लैंड में जाकर पूरी हुई जहां से उन्होंने बैरिस्टरी की परीक्षा उत्तीर्ण की।

पटेल कुशाग्रबुद्धि के थे तथा उनमें सीखने की अद्भुत क्षमता थी। बचपन में एक बार वे विद्यालय से आते समय पीछे छूट गये। कुछ साथियों ने जाकर देखा तो ये धरती पर गड़े एक नुकीले पत्थर को उखाड़ रहे थे। पूछने पर बोले,” इसने मुझे चोट पहुंचायी है अब मैं इसे उखाड़कर ही मानूंगा” और वे उस पत्थर को उखाड़ करके ही घर आये। एक बार उनकी बगल में फोड़ा निकल आया। उन दिनों गांवो में इसके लिए लोहे की सलाख को लालकर उससे फोड़े को दाग दिया जाता था। नाई ने सलाख को भट्ठी में रखकर गरम तो कर लिया पर वल्लभ भाई जैसे छोटे बालक को दागने की हिम्मत नहीं पड़ी। इस पर वल्लभ भाई ने सलाख अपने हाथ में लेकर उसे फोड़े में घुसा दिया आसपास बैठे लोग चीख पड़े लेकिन उनके मुंह से उफ तक नहीं निकला।

1926 में उनकी भेंट गांधी जी से हुई और वे स्वाधीनता आंदोलन में कूद पड़े और स्वदेशी जीवन शैली में आ गये। बारडोली में किसान आंदोलन का सफल नेतृत्व करने के कारण उनका नाम सरदार पड़ा। सरदार पटेल स्पष्ट व निर्भीक वक्ता थे। यदि वे कभी गांधी जी से असहमत होते तो वे उसे भी साफ कह देते थे। वे कई बार जेल गये। 1942 में भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान उन्हें तीन साल की कैद हुई।

स्वतंत्रता के बाद उन्हें नेहरू मंत्रिपरिषद में गृहमंत्री बनाया गया। सरदार पटेल ने चार वर्ष तक गृह मंत्री के पद पर कार्य किया। यह चार वर्ष न केवल उनके वरन स्वाधीन भारत के भी ऐतिहासिक वर्ष हैं। उन्होने 542 रियासतों का  विलय करवाया जिसमें सबसे कठिन विलय जूनागढ़ और हैदराबाद का रहा। सरदार की प्रेरणा से ही जूनागढ़ में विद्रोह हुआ और वह भारत में मिल गया।हैदराबाद में बड़ी पुलिस कार्यवाही करनी पड़ी। जम्मू कश्मीर का मामला नेहरू जी ने अपने पास रख लिया जिसका आंशिक समाधान नरेन्द्र मोदी जी ने धारा 370 की समाप्ति के रूप में कर दिया है  जबकि पाकिस्तानी कब्जे वाला कश्मीर वापस लेना अभी शेष है। सरदार पटेल ने गृहमंत्री रहते हुए रेडियो एवं सूचना विभाग का कायाकल्प किया।

सरदार पटेल स्वभाव से बहुत कठोर भी थे तो बहुत ही सहज और उदार भी। समय के अनुसार  निर्णय लेने में वे समर्थ तथा सक्षम थे। वे तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू को उचित परामर्श देने में भी नहीं हिचकते थे। जब चीन तिब्बत पर अपना अधिकार जता रहा था और नेहरू ने चीन की विस्तारवादी नीति का विरोध नहीं किया था जिसके ही तिब्बत पर चीन नियंत्रण हो गया था  तब सरदार पटेल ने चीन के प्रति सर्वाधिक संदेह प्रकट करते हुए कहा था कि यदि चीन तिब्बत पर अधिकार कर लेता है तो यह भविष्य में भारत की सुरक्षा के लिए सबसे बड़ा खतरा होगा। कालांतर में दूरदर्शी  पटेल की चिंता सच सिद्ध हुई । मंत्री के रूप में भी वे हर व्यक्ति से मिलते थे और उसकी समस्या का समाधान खोजते थे।

इस वर्ष सरदार पटेल  की जयंती के 150 वर्ष पूर्ण हो रहे हैं। इस अवसर पर कई  भव्य आयोजन किए जा रहे हैं। हम सभी को सरदार पटेल की स्मृति में होने वाले कार्यक्रमों का हिस्सा बनकर उनका पुण्य स्मरण करते हुए, उनके बताए गए पथ पर चलने की प्रेरणा लेनी चाहिए।

प्रेषकः- मृत्युंजय दीक्षित

फोन नं.- 9198571540

प्राचीन श्वास तकनीक – 5000 साल पुराना रहस्य जिससे वैज्ञानिक भी हैरान हैं

कल्पना कीजिए, आप ऐसी प्राचीन, शक्तिशाली चीज की खोज करें जो आपके दिमाग के काम करने के तरीके को बदल दे, लेकिन बाहरी दुनिया को यह कभी पता न चले।
हिमालय के पर्वतों में छिपा एक रहस्य, 5000 सालों से मौन और अनुशासन से सुरक्षित। आज पहली बार विज्ञान ने समझा है जो भिक्षु पहले से जानते थे। एक ही सांस में मानव मस्तिष्क के पुनर्निर्माण, दर्द को मिटाने और विचार से कहीं बड़ी चीज को जगाने की शक्ति छिपी है।
2024 का चौंकाने वाला प्रयोगः टेनफोर्ड की प्रयोगशाला में तंत्रिका वैज्ञानिकों ने प्राचीन तिब्बती ग्रंथों से एक श्वास क्रम का अध्ययन किया। यह क्रम ध्यान जैसा कम, तंत्रिका तंत्र के लिए कोड जैसा ज्यादा लगता था। परिणाम? इस साधारण क्रम ने BDNF (मस्तिष्क विकास कारक) को सामान्य ध्यान से 300% ज्यादा बढ़ा दिया। न्यूरोप्लास्टिसिटी को विज्ञान द्वारा अब तक देखी किसी भी चीज से तेजी से बढ़ाता है।
वैज्ञानिकों की चिंताः कुछ तंत्रिका वैज्ञानिक सफेद झूठ बोलने लगे कि मानव मस्तिष्क इतने तेज पुनर्निर्माण के लिए तैयार नहीं। क्योंकि जब मस्तिष्क इतनी तेजी से बदलता है, आत्मबोध भी बदल जाता है। सांस लेना न केवल मस्तिष्क को बल्कि अपनी पहचान को नया आकार देने की क्षमता रखती है। भिक्षुओं ने सहस्त्राब्दियों तक इसे छिपाया, कभी लिखा नहीं, आम लोगों को नहीं दिया। शायद इसलिए क्योंकि सांस सिर्फ हवा नहीं, बुद्धि है।
मठों का पवित्र अनुष्ठानः मठों में इसे पवित्र माना जाता था। केवल दीक्षा लेने वाले, दशकों तक मन तैयार करने वाले करते थे। उनका मानना: गलत इस्तेमाल से ऐसे द्वार खुल सकते हैं जिनसे हर कोई गुजरने को तैयार न हो। सोचिए, सांस लेने जैसी सरल क्रिया वास्तविकता की धारणा बदल सकती है। आधुनिक दुनिया ने इसे भूल दिया, उथली तेज सांसें लीं जो बेचैन मन को प्रतिबिंबित करती हैं। हम लगातार हल्की घुटन में जी रहे हैं जो जागरूकता की कमी से।
विज्ञान vs प्राचीन ज्ञानः विज्ञान अब समझ रहा है जो भिक्षु जानते थे। सवाल ये क्या वे दुनिया को रहस्य से बचा रहे थे या रहस्य को दुनिया से?
प्रगति हमें वापस सरल मानवीय क्रिया पर ले आती है एक सचेत सांस यह विश्राम या तनाव राहत नहीं, सुप्त तंत्रिका को खोलना है। यह मस्तिष्क और अंगों का राजमार्ग है। सही लय पर सांस से संकेत भेजती है जो चिंता दूर करते, भावनात्मक आघात मरम्मत करते, कोशिकीय पुनर्जीवन देते। यह जीव विज्ञान है, मापने योग्य।
5-5-5 प्रोटोकॉल का रहस्यः यह 500 प्रोटोकॉल- 5 सेकंड अंदर, 5 सेकंड रोकें, 5 सेकंड बाहर। प्रत्येक चरण शरीर में विशिष्ट प्रवाह सक्रिय करता है। सांस अंदर जब जो ऑक्सीजन बढ़ता है, मस्तिष्क को ईंधन मिलता है।
रोकना अर्थ CO2 थोड़ा ऊपर, ऊतकों में ऑक्सीजन गहराई तक।
बाहर का अर्थ पैरासिम्पेथेटिक सिस्टम सक्रिय, सुरक्षा-शांति। यह चक्र आंतरिक स्थिति रीसेट करता है।
असली जादू: धारणा में जागृत करता। सांस रोकने पर समय खिंचता है ।मन शांत, विचार फीके हो जाते हैं।
मस्तिष्क पर प्रभावः प्रयोगों में- थेटा-गामा तरंगें बढ़ीं (गहन ध्यान जैसी)।सुप्त तंत्रिका जागी, हृदय परिवर्तनशीलता सुधरी। अभ्यासी दृश्य, भावनाएं बताते हैं ,शरीर पुरानी बुद्धिमत्ता याद करता है। चेतना शायद मस्तिष्क उत्पन्न नहीं करती, तब प्रकट होती है जब शोर शांत हो। भिक्षु व्यवधान दूर कर रहे थे, सृजन नहीं। प्राचीन सांस आधुनिक मन से मिलती तो क्या होता।
दैनिक जीवन में बदलाव।
रोज पहले गहरी सांस लें, फेफड़ों से नहीं, जागरूकता से हवा अंदर। कंधे झुकें, अराजकता कम। एक सांस शांत और संगठित करती है। मन सांस का अनुसरण करता है। भिक्षु का हर सांस ब्रह्मांड से संवाद है। विज्ञान सांस बदलने से मस्तिष्क, हृदय, भावनाएं बदलतीं।
शरीर की प्रतिक्रियाः पहले चक्र- सूक्ष्म। फिर झनझनाहट, हल्कापन। बीटा (तनाव) से थेटा (ज्ञान) तरंगें। सुप्त संदेश ठीक होने का समय। मिनटों में मस्तिष्क तरंगें बदलती है और साधुओं जैसी अवस्था हो जाती है। शारीरिक बदलाव ये मांसपेशियां ढीली, रक्तचाप कम हो जाता है। भावनात्मक रूप से बदलाव, पुरानी भावनाएं सतह पर, मुक्ति अग्रसर । इंसुला सक्रिय हो जाता है जागरूकता-करुणा बढ़ती है।
लंबे प्रभावः।सप्ताह में ही तनाव कम, स्पष्टता। 3 सप्ताह में ग्रे मैटर बढ़ा, रचनात्मकता। कहानियां भी बहुत लोगो की बताती है कि उनका बहुत पुराना सिरदर्द गायब, PTSD वाले को शांत नींद। कोर्टिसोल 40-65% कम 10 दिनों में। हृदय लचीला। सांस रिमोट कंट्रोल: चिंता से बाहर एक मिनट में। सांस मन-शरीर भ्रम तोड़ती।
भिक्षुओं एवं योगियों का दर्शन कहता हैः सांस पवित्र संवाद है यंत्रणा से। अमृत है भय मुक्ति से। हर सांस मरण-प्रमाण कि जीवन मौका देता है। गलत सांस तनाव पोषित होती है। सांस जागृत रखती है, जीवित नहीं।
प्राचीन: सांस पर नियंत्रण से दुनिया पर नियंत्रण । सच्चाई: सांस याद दिलाती है, आप कभी अलग न थे।
चुनौतियां और परिवर्तनः धीमा होना मुश्किल है, शोर में मौन भयावह होता है। लेकिन पवित्र शून्य होकर भीतर ही उपचार शुरू हो जाता है। न्यूरोप्लास्टिसिटी कहती है ये सांस नया कोड है।
महीने उपरांत लगेगा कि चुनी प्रतिक्रियाएं, सांस मार्गदर्शक है। जीवन लय में सांस संचालक है।
अभ्यास की शुरुआतः  7 दिन में सुबह-रात 5 मिनट 5-5-5। सोने से पहले। लॉग रखें। 21 दिन में ये आदत बना लीजिए। संदेह ना करें वापसी ही परिवर्तन है। सांस प्रार्थना आपको आपके भीतर जोड़ती।
अंतिम रहस्यः सांस तकनीक नहीं, इंसान होने की याद है। ज्ञान अभ्यास से आता है। पहली सचेत सांस से जागृति होती है। सांस लेते रहें, बाकी होने दें।
भारतीय ऋषि-मुनियों ने लोक-कल्याण के लिए अनेक चमत्कारिक शास्त्र रचे, जिनमें स्वर-शास्त्र प्रमुख है। यह विद्या सुख, सौभाग्य, सफलता, स्वास्थ्य और दीर्घायु प्रदान करती है।
स्वर + उदय = स्वरोदय, अर्थात नासिका से निकलने वाली वायु की गति से शुभ-अशुभ और भविष्य का ज्ञान प्राप्त करना। यह प्राचीन विज्ञान आज दुर्लभ है, पर इसके ज्ञाता सदैव सुखी और सफल रहते हैं। स्वर-विज्ञान न केवल भविष्य बताता है, बल्कि शरीर की आरोग्यता बनाए रखने में भी अत्यंत उपयोगी है।
स्वर-विज्ञान’ वह ज्ञान है जो नासिका से निकलने वाली वायु की दिशा, गति और उसके प्रभाव को समझने की विद्या सिखाता है।
स्वर अभ्यास के माध्यम से मनुष्य अपनी छिपी हुई शक्तियों को जाग्रत कर सकता है और प्रकृति के साथ सामंजस्य स्थापित कर सकता है। वास्तव में वही व्यक्ति जीवन में सफल होता है जो प्रकृति के अनुरूप चलता है, क्योंकि प्रकृति के विपरीत चलने पर असफलता निश्चित होती है। स्वर-विज्ञान मनुष्य को प्रकृति से जोड़ने का एक सहज और दिव्य मार्ग है।
साधक को चाहिए कि वह शांत मन से एकांत में बैठकर अपने गुरु और इष्ट देव का स्मरण करे, फिर नासिका से निकलने वाले स्वर का निरीक्षण करे। यदि वह शास्त्र में बताए अनुसार कार्य करे तो स्वर की अनुकूलता से उसे सफलता और शुभ फल प्राप्त होते हैं। यह विद्या अत्यंत पवित्र और कल्याणकारी है, जिससे जीवन और परलोक दोनों सुधरते हैं।
शास्त्रों में स्वर-विज्ञान की महिमा का वर्णन करते हुए कहा गया है कि स्वरों की अनुकूलता से भगवान राम ने रावण जैसे शक्तिशाली राक्षस का वध किया, और स्वरों की प्रतिकूलता के कारण रावण जैसे अपराजेय योद्धा का पतन हुआ। पांडवों ने स्वरों के अनुरूप कार्य कर विजय प्राप्त की, जबकि कौरव स्वरों की विपरीतता से पराजित हुए।
वास्तव में मानव शरीर में मेरुदंड के दोनों ओर दो प्रमुख नाड़ियाँ होती हैं बाईं ओर की इड़ा नाड़ी, जिसमें चंद्र ऊर्जा का वास है (शीतल स्वभाव), और दाहिनी ओर की पिंगला नाड़ी, जिसमें सूर्य ऊर्जा का वास है (उष्ण स्वभाव)।
इड़ा बाँई नासिका से और पिंगला दाहिनी नासिका से चलती है। ये नाड़ियाँ लगभग हर ढाई घड़ी (लगभग एक घंटे) में परिवर्तन करती रहती हैं। इन्हीं नाड़ियों के प्रभाव से स्वर बदलते हैं और उसी के अनुसार मनुष्य के कार्य शुभ या अशुभ होते हैं।
मानव शरीर की नाड़ियों में सुषुम्णा नाड़ी सबसे महत्वपूर्ण है। यही मोक्ष का मार्ग और ब्रह्मांड की आधार रेखा मानी गई है। यह गुदा के पीछे से शुरू होकर मेरुदंड के साथ ऊपर ब्रह्मरंध्र तक जाती है। इसके दाहिनी ओर पिंगला (सूर्य नाड़ी) और बाँई ओर इड़ा (चंद्र नाड़ी) होती हैं। जब सुषुम्णा जाग्रत होती है, तब योगी की साधना सफल होती है उसे समाधि लगने लगती है और वह सांसारिक मोह से मुक्त होता है।
इसी नाड़ी से कुण्डलिनी शक्ति ऊपर उठकर षट्चक्रों का भेदन करती है, जिससे अद्भुत शक्तियाँ और दिव्य आनंद की अनुभूति होती है।
सुषुम्णा को ब्रह्मनाड़ी भी कहा जाता है; इसमें प्राण प्रवाहित करने से योगी शीघ्र सिद्धि और मुक्ति प्राप्त करता है।

गुह्य स्थान से दो अंगुल ऊपर और लिंग मूल से नीचे चार अंगुल तक का भाग मूलाधार चक्र कहलाता है। यहीं ब्रह्मनाड़ी के मुख में स्वयम्भू लिंग स्थित है, जिसके चारों ओर साढ़े तीन फेरे में कुण्डलिनी शक्ति सर्पाकार रूप में कुण्डली मारे रहती है।
प्राणायाम दो प्रकार का होता है अगर्भ (बिना जप या ध्यान के) और सगर्भ (जप व ध्यान सहित)।
सगर्भ प्राणायाम फलदायी होता है और योगाभ्यास को सिद्धि तक पहुँचाता है। इसमें पूरक, कुम्भक और रेचक के दौरान इष्टदेव का नाम जप और ध्यान किया जाता है।
ध्यान करते समय दृष्टि नासिकाग्र या भृकुटि-मध्य पर स्थिर रखनी चाहिए। नियमित अभ्यास से मन एकाग्र होता है और साधक को इष्टदेव के दर्शन तक होने लगते हैं।
प्राकृतिक प्राणायाम हमें नींद की अवस्था में स्वयं प्राप्त होता है जब शरीर पूर्ण विश्रांति में होता है, तब प्रकृति स्वयं श्वास के माध्यम से शरीर को शुद्ध और स्वस्थ रखती है। यही प्राकृतिक श्वसन योग की सर्वोच्च अवस्था का आधार है।
यदि प्रश्नकर्ता उस व्यक्ति के चल रहे स्वर (साँस के सक्रिय नासिका पक्ष) की दिशा में बैठकर प्रश्न करे, तो रोगी के स्वस्थ होने की संभावना अधिक होती है।
यदि प्रश्नकर्ता बन्द स्वर (जहाँ साँस नहीं चल रही) की ओर से प्रश्न करे, तो रोगी को स्वास्थ्य-लाभ नहीं होगा।
यदि प्रश्नकर्ता पहले बन्द स्वर की ओर से प्रश्न करता हुआ बाद में चल रहे स्वर की ओर आकर बैठ जाए, तो मृतप्राय रोगी भी जीवित हो सकता है।
परंतु यदि प्रश्नकर्ता चल रहे स्वर की ओर से प्रश्न करता हुआ बन्द स्वर की ओर जाए, तो रोगी की स्थिति पुनः बिगड़ सकती है, चाहे वह पहले ठीक हो रहा हो।
जब निर्गुण स्वर (शून्य या मिश्र स्वर) चल रहा हो, तो रोग घातक समझना चाहिए। और जब सगुण स्वर (शुद्ध तत्त्व वाला स्वर) चल रहा हो, तो रोगी के जीवित रहने की संभावना होती है।

तत्त्व के अनुसार फलः  पृथ्वी या जल तत्त्व के उदय में प्रश्न-फल शुभ होता है।
अग्नि, वायु या आकाश तत्त्व के उदय में प्रश्न-फल अशुभ होता है।
यदि कोई पूछे कि “रोगी को क्या रोग है?”, तो दैवज्ञ को अपने स्वर में चल रहे तत्त्व के आधार पर उत्तर देना चाहिए।
यदि स्वर में स्वयं का तत्त्व चल रहा हो, तो समझना चाहिए कि रोगी को एक ही रोग है।
बाँएँ स्वर (इड़ा) में पृथ्वी तत्त्व हो तो कफज रोग है।
दाहिने स्वर (पिंगला) में अग्नि तत्त्व हो तो पित्तज रोग है।
दाहिने स्वर में वायु तत्त्व हो तो वातज रोग है।
यदि दूसरे स्वर में भिन्न तत्त्व चल रहा हो, तो कहना चाहिए कि रोग मिश्र प्रकृति का है जैसे यदि दाहिने स्वर में अग्नि तत्त्व हो, तो रोग कफ-पित्त मिश्रित, और बाँएँ स्वर में वायु तत्त्व हो, तो रोग कफ-वात मिश्रित माना जाएगा।
स्वर बदलने के लिए नाड़ी शोधन का महत्वः दिन में चार बार सुबह, दोपहर, शाम और रात ये अभ्यास करना चाहिए।
वाम (बाईं) नाक से गहरी सांस लें और बिना रोके दाईं नाक से धीरे-धीरे छोड़ें।
फिर दाईं नाक से गहरी सांस लें और बिना रुके बाईं नाक से छोड़ें।
ऐसे 80 बार करें।
लगातार 6 महीने तक करने से नाड़ियाँ (सांस की ऊर्जा-धाराएँ) शुद्ध हो जाती हैं,  शरीर हल्का और ऊर्जावान लगता है, भूख खुल जाती है, मन प्रसन्न रहता है, और चाहें तो इच्छा-शक्ति से सूर्य स्वर (दाईं नाक) या चंद्र स्वर (बाईं नाक) चला सकते हैं।
यह अभ्यास केवल स्वस्थ शरीर में करना चाहिए। बीमार होने पर या गर्भावस्था में यह नहीं करना चाहिए।
रोग दूर करने और शरीर को स्वस्थ रखने के उपाय।
सूक्ष्म-वायु परिवर्तन का यह विज्ञान “धारणा योग” का हिस्सा है।
यह योग का गहरा अभ्यास है जो यम, नियम, आसन, प्राणायाम और प्रत्याहार के बाद शुरू होता है।
बिना किसी योग्य गुरु के मार्गदर्शन के यह ठीक से नहीं हो पाता।
प्राणायाम की तीन अवस्थाएँ होती हैं
1. निकृष्ट अवस्था: शरीर में पसीना आने लगता है।
2. मध्यम अवस्था: शरीर हल्का होकर कांपता या हलचल महसूस करता है।
3. उत्तम अवस्था: साधक को ऐसा अनुभव होता है मानो शरीर भूमि से ऊपर उठ गया हो।
साधारण लोगों के लिए यह कठिन होता है, इसलिए भगवान पशुपति ने इसके सरल रूप का उपदेश दिया कि पहले मन में विश्वास, आस्था और निष्ठा लानी जरूरी है।

साभार- https://www.facebook.com/share/p/1BVXPGaUpf/ से

सुने अनसुने किस्से गीतकार अंजान के

“अंजान जी, आप पर एक जानलेवा हमला होने वाला है।” उस आदमी ने गीतकार अंजान से कहा। और अंजान जी को उस आदमी पर बहुत तेज़ गुस्सा आ गया। उन्होंने अपने दोस्त से उस आदमी के बारे में बात की और कहा कि ये किस आदमी को तुमने अपने घर पर बुलाया है? साथियों ये किस्सा उस घटना पर आधारित है जो आज से कई साल पहले गीतकार अंजान जी के साथ घटी थी। चलिए विस्तार से ये किस्सा जानते हैं।
लालजी पांडे। जो फ़िल्मी दुनिया में अंजान के नाम से जाने जाते थे। साल 1954 में आई फ़िल्म “प्रिज़नर्स ऑफ़ गोलकुंडा” से बतौर गीतकार अंजान जी का करियर शुरू हुआ था। इस फ़िल्म में प्रेमनाथ व बीना राय मुख्य भूमिकाओं में थे। और प्रेमनाथ जी ने ये फ़िल्म डायरेक्ट-प्रोड्यूस की थी। लेकिन अफ़सोस, ये फ़िल्म कभी रिलीज़ नहीं हो सकी थी। मगर अब ये यूट्यूब पर उपलब्ध है। प्रेमनाथ जी के पुत्र ने इसे अपने यूट्यूब चैनल मेजर मूड एंटरटेनमेंट पर अपलोड किया है।
खरै, हम अंजान जी की बात कर रहे थे। साल 1969 में आई बंधन फ़िल्म का गीत ‘बिना बदरा के बिजुरिया कैसे चमके’ अंजान जी के करियर का पहला लोकप्रिय गीत रहा था। इस गीत की लोकप्रियता ने अंजान जी को कल्याणजी-आनंदजी का पसंदीदा गीतकार बना दिया। कल्याणजी-आनंदजी ने अपनी एक टीम बनाई जिसमें दो गीतकार उन्होंने रखे। एक थे अंजान। दूसरे थे इंदीवर। इस टीम में रहते हुए अंजान जी ने नित नई सफ़लताएं अपने करियर में हासिल की थी।
1978 में आई अमिताभ बच्चन की सुपरहिट फ़िल्म डॉन का सुपरहिट गाना “खइके पान बनारस वाला” भी अंजान जी ने ही लिखा था। वैसे डॉन फ़िल्म में अंजान जी ने तीन और गीत भी लिखे थे। व एक गीत इंदीवर जी ने भी लिखा था, जिसके बोल थे ‘ये मेरा दिल प्यार का दीवाना।’ डॉन फ़िल्म के रिलीज़ और सुपरहिट होने के कुछ दिनों बाद की बात है। मुंबई के खार इलाके में अंजान जी का एक दोस्त रहा करता था। एक दिन उस दोस्त ने अंजान जी को खाने पर बुलाया।
अंजान जी अपने उस दोस्त के बुलावे पर उसके घर पहुंचे। वहां एक और आदमी पहले से मौजूद था। अंजान जी को देखते ही वो आदमी इनसे बोला,”अंजान जी, आप पर एक जानलेवा हमला होने वाला है।” अंजान इनते सीधे सादे इंसान थे कि उनके साथ किसी की दुश्मनी होगी, ये कोई सोच भी नहीं सकता था। इसलिए उस आदमी की वो जानलेवा हमला वाली बात सुनकर अंजान जी को बहुत गुस्सा आया। उन्हें बहुत बुरी लगी उस आदमी की वो बात।
अंजान जी ने गुस्से से अपने मेजबान से कहा,”ये किस आदमी को बुला लिया है तुमने। ये मेरे बारे में ऐसी-ऐसी बातें कर रहा है। डॉन इतनी बड़ी हिट हो गई है। सभी गाने भी हिट हुए हैं। और ये आदमी इस तरह की बातें कर रहा है।” अंजान जी की स्थिति समझकर इनके दोस्त ने उस आदमी को अपने घर से बाहर भेज दिया। फिर अंजान जी ने आराम से खाना खाया। और खाना खाने के बाद उनका मन केला खाने का हुआ। वैसे भी वो रोज़ खाने के बाद केला खाते थे। उनकी आदत थी वो।
मगर किसी दूसरे के घर केला मांगने में उन्हें झिझक हो रही थी। इसलिए अंजान जी अपने उस दोस्त से विदा लेकर उसके घर से निकल गए। सामने सड़क पर एक ठेले वाला व्यक्ति खड़ा था जो केले ही बेच रहा था। अंजान उससे केले खरीदने लगे। मगर तभी एक बेहद अजीब सी बात हुई। जिस जगह वो ठेला था वहां सामने की तरफ़ झोपड़पट्टी भी थी। वहां एक पागल सा दिखने वाला आदमी मौजूद थाी। वो पागल सा दिखने वाला आदमी कोई क़त्ल करके आया था।
उस पागल आदमी ने अंजान जी को ठेले से केले खरीदते हुए देखा। वो डर गया। उसे लगा कि ये आदमी(अंजान जी) पक्का पुलिस का जासूस है और उसकी तलाश में यहां तक आ गया है। फिर पता नहीं उस आदमी को क्या हुआ, उसने अंजान जी के पास आकर उन्हें चाकू मार दिया। अंजान जी बेहद घबरा गए। और बहुत हैरत में भी आ गए। क्योंकि कुछ ही देर पहले दोस्त के घर मिले एक आदमी ने उन्हें बताया था कि उन पर एक जानलेवा हमला होगा।
आस-पास मौजूद लोगों ने अंजान जी को अस्पताल पहुंचाया। और समय पर इलाज मिलने की वजह से अंजान जी की जान बच गई। उधर मीडिया में अंजान जी पर चाकू से हुए हमले की खबर आग की तरह फैल गई। अखबारों ने मोटे-मोटे शब्दों में लिखना शुरू कर दिया “खइके पान बनारस वाला” गीत लिखने वाले गीतकार पर जानलेवा हमला हुआ है। फ़िल्म इंडस्ट्री के लोग भी अंजान जी पर हुए उस हमले की खबर सुनकर बहुत हैरान और परेशान हो रह थे।
उसी वक्त कल्याणजी-आनंदजी वाले कल्याणजी भाई ने मज़ाक में गीतकार इंदीवर जी से कहा कि लोग कह रहे हैं कि अंजान जी पर जानलेवा हमला आपने कराया है। सब कह रहे हैं कि इंदीवर अंजान से दुश्मनी रखते हैं। जब से डॉन फ़िल्म के गीत इंदीवर की जगह अंजान से लिखाए गए हैं तब से इंदीवर अंजान से रंजिश रखते हैं। और उन्होंने ही अंजान पर चाकू से जानलेवा हमला कराया है। कल्याणजी भाई की ये बात सुनकर गीतकार इंदीवर बुरी तरह घबरा गए।
इंदीवर को लगा कि अगर अंजान जी ने पुलिस में उनका नाम ले दिया तो उन्हें तो बहुत परेशानी हो जाएगी। पुलिस शायद उन्हें बंद कर देगी। इसलिए वो अंजान जी से मिलने अस्पताल पहुंच गए। अंजान जी इस समय तक होश में आ चुके थे। उनकी जान भी खतरे से बाहर थी। इंदीवर जी ने अंजान जी को बताया कि बात फै़ल रही है कि मैंने आप पर हमला कराया है। लेकिन मैंने ऐसा कुछ नहीं किया है। तब अंजान जी ने उन्हें दिलासा दिया और कहा कि मुझे यकीन है आप ऐसा नहीं कर सकते। आप तो मेरे भाई हैं। तब जाकर इंदीवर जी की जान में जान आई।
साथियों ये किस्सा खुद अंजान जी के पुत्र और बहुत नामवर गीतकार समीर जी ने आर.जे. अनमोल के साथ बात करते हुए बताया था। तो हमारी फ़िल्म इंडस्ट्री के लोगों का एक पहलू ये भी है। बेहद गंभीर बातों पर भी यहां मज़ाक हो जाते हैं। आज अंजान जी का जन्मदिवस है साथियों। 28 अक्टूबर 1930 को बनारस में लालजी पांडे उर्फ़ अंजान जी का जन्म हुआ था। एक से एक गीत लिखे थे अंजान जी ने। अंजान जी को किस्सा टीवी का नमन। शत शत नमन।

चीन में नया कानून संवेदनशील मुद्दों पर बोलने के लिए डिग्री जरुरी

चीन में अब सोशल मीडिया पर कंटेंट बनाना पहले जैसा आसान नहीं रहेगा। 25 अक्टूबर से लागू हुए नए “इन्फ्लुएंसर कानून” के तहत अब जो लोग चिकित्सा, कानून, शिक्षा या वित्त जैसे संवेदनशील विषयों पर कंटेंट बनाएंगे, उन्हें इन क्षेत्रों में औपचारिक योग्यता या डिग्री दिखानी होगी।

यह नियम चीन की साइबरस्पेस एडमिनिस्ट्रेशन (CAC) ने जारी किया है। प्रशासन का कहना है कि इस कानून का मकसद गलत जानकारी (misinformation) को रोकना और आम लोगों को झूठे या हानिकारक सुझावों से बचाना है। लेकिन दूसरी तरफ, कई लोग इसे अभिव्यक्ति की आज़ादी और सेंसरशिप के लिए खतरा भी मान रहे हैं।

नए नियमों के अनुसार, जो इन्फ्लुएंसर रेगुलेटेड या संवेदनशील विषयों पर बात करेंगे, उन्हें अपनी विशेषज्ञता का प्रमाण देना होगा- जैसे डिग्री, लाइसेंस या प्रोफेशनल सर्टिफिकेट। प्लेटफॉर्म जैसे Douyin (चीन का TikTok), Bilibili और Weibo पर अब यह जिम्मेदारी होगी कि वे अपने क्रिएटर्स की डिटेल्स की जांच करें और सुनिश्चित करें कि उनका कंटेंट सही जानकारी और डिस्क्लेमर के साथ हो।

उदाहरण के लिए, अगर कोई वीडियो किसी शोध या अध्ययन पर आधारित है, तो क्रिएटर को यह बात साफ तौर पर बतानी होगी। साथ ही, अगर किसी वीडियो में AI-generated सामग्री है, तो उसे भी स्पष्ट रूप से उल्लेख करना होगा।

CAC ने एक और बड़ा कदम उठाते हुए मेडिकल प्रोडक्ट्स, सप्लीमेंट्स और हेल्थ फूड्स के विज्ञापनों पर रोक लगा दी है, ताकि लोग “शैक्षिक वीडियो” के नाम पर छिपे प्रचार से बच सकें।

हालांकि, आलोचकों का कहना है कि यह कानून रचनात्मकता और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को नुकसान पहुंचा सकता है। उनका तर्क है कि अगर सिर्फ “योग्य” लोगों को ही कुछ विषयों पर बोलने की इजाजत होगी, तो सरकार स्वतंत्र आवाजों और आलोचनात्मक विचारों को दबा सकती है।

कई लोगों को डर है कि “विशेषज्ञता” की परिभाषा इतनी सीमित बना दी जाएगी कि अधिकारी उन लोगों को भी चुप करा सकेंगे जो सरकारी नीतियों या विचारों पर सवाल उठाते हैं।

वहीं, कुछ लोग इस कानून का समर्थन भी कर रहे हैं। उनका मानना है कि यह कदम संवेदनशील विषयों पर सही और भरोसेमंद जानकारी फैलाने में मदद करेगा। उनका कहना है कि चिकित्सा या वित्त जैसे विषयों पर सिर्फ क्वालिफाइड प्रोफेशनल्स को ही बोलने का अधिकार होना चाहिए ताकि गलत सूचना से जनता को नुकसान न पहुंचे।

गौरतलब है कि इन्फ्लुएंसर कल्चर के बढ़ने के साथ अब लोग पारंपरिक विशेषज्ञों की बजाय सोशल मीडिया क्रिएटर्स पर भरोसा करने लगे हैं। लेकिन जब यही क्रिएटर गलत या अधूरी जानकारी फैलाते हैं, तो उसका असर गंभीर हो सकता है। ऐसे में चीन की सरकार का मानना है कि यह नया कानून ऑनलाइन जिम्मेदारी और पारदर्शिता बढ़ाने में मदद करेगा।

श्री पुनीत गोयनका ने कहा मीडिया और मनोरंजन उद्योग भारत की सांस्कृतिक शक्ति के रूप में बढ़ रहा है

जी एंटरटेनमेंट के एमडी और सीईओ पुनीत गोयनका ने 16 अक्टूबर 2025 को आयोजित कॉन्फ्रेंस कॉल में कंपनी के वित्तीय वर्ष की दूसरी तिमाही और पहले छमाही के प्रदर्शन पर विस्तार से जानकारी दी। उन्होंने सभी शेयरधारकों और कर्मचारियों को त्योहारों की हार्दिक शुभकामनाएं दीं और इस महीने को कई कारणों से विशेष बताया, जिसमें सैटेलाइट टीवी और जी की 33वीं वर्षगांठ भी शामिल है।

पुनीत गोयनका ने कहा कि मीडिया और एंटरटेनमेंट इंडस्ट्री भारत की सांस्कृतिक शक्ति के रूप में लगातार बढ़ रही है। इस बीच, जी कंपनी अपने भविष्य के विकास के लिए मजबूत नींव बनाने के लिए ठोस कदम उठा रही है। उन्होंने बताया कि भविष्य के लिए निवेश अक्सर कठिन निर्णय और निरंतर कार्य की मांग करता है।

उन्होंने कहा कि इस तिमाही में कंपनी के प्रदर्शन से यह स्पष्ट होता है कि रणनीतिक निवेश और फैसले व्यवसाय की नींव मजबूत करने और सभी शेयरधारकों के लिए स्थायी मूल्य निर्माण के लिए किए गए हैं। डिजिटल व्यवसाय, खासकर ZEE5 की प्रगति में लगातार सुधार हो रहा है। पिछले तिमाही में सात भाषाओं में पेश किए गए विशेष सब्सक्रिप्शन प्लान ने यूजर्स से सकारात्मक प्रतिक्रिया प्राप्त की है, जिससे सब्सक्रिप्शन रेवेन्यू में बढ़ोतरी हुई है।

पुनीत गोयनका ने कहा कि कंपनी इस हिस्से में आने वाली तिमाहियों में लाभप्रदता हासिल करने के लिए प्रतिबद्ध है। उन्होंने यह भी बताया कि लीनियर बिजनेस में कंटेंट को मजबूत करने के लिए उठाए गए कदमों का असर 18.2% बाजार हिस्सेदारी में देखा गया। जी मीडिया के सात चैनल्स ने अपनी-अपनी मार्केट में लीडरशिप हासिल की। नए शो और लोकप्रिय प्रॉपर्टीज ने व्युअरशिप में बढ़ोतरी की है।

उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि कंटेंट की लागत बढ़ी है, लेकिन यह व्युअरशिप और मार्केट शेयर में बढ़ोतरी के संतुलित दृष्टिकोण से देखी जानी चाहिए। नए शो लॉन्च और प्रमोशन खर्च में भी मामूली वृद्धि हुई है, लेकिन आने वाले समय में ये खर्च स्थिर होंगे और ऐडवर्टाइजिंग व सब्सक्रिप्शन रेवेन्यू बढ़ाने में मदद करेंगे।

ऐडवर्टाइजिंग रेवेन्यू की बात करते हुए पुनीत गोयनका ने कहा कि FMCG कंपनियों द्वारा खर्च बढ़ने के कारण इस तिमाही में ऐडवर्टाइजिंग रेवेन्यू में मामूली बढ़ोतरी देखी गई। जीएसटी सुधारों और त्योहारों के मौसम से सकारात्मक रुझान बन रहा है। कंपनी मध्यकाल में ऐडवर्टाइजिंग रेवेन्यू की वृद्धि के लिए आशावादी दृष्टिकोण रखती है।

भविष्य के विकास की रणनीति के तहत कंपनी ने शॉर्ट-फॉर्म कंटेंट जैसे नए क्षेत्रों में प्रवेश भी किया है। पुनीत गोयनका ने कहा कि इन व्यवसायों की क्षमता कंपनी के दर्शक आधार को बढ़ाने और मनोरंजन व तकनीक को जोड़ने के अनुभव देने में मदद करेगी। इसके लिए जी ने Ideabaaz Tech Private Limited के साथ साझेदारी की है और नया शो Ideabaaz लॉन्च किया गया है। यह शो देश के स्टार्ट-अप इकोसिस्टम को बढ़ावा देगा।

साभार- https://www.samachar4media.com/ से

श्रीमती राजश्री बिड़ला की ‘गुरुदक्षिणा’ ने दिया एक शानदार साहित्यिक अवदान

प्रदीप गुप्ता व देवमणि पाण्डेय

मुंबई ऐसा शहर है जहाँ प्रतिदिन सैकड़ों आयोजन पाँचसितारा होटलों से लेकर छोटे मोटे स्थानों पर होते है। लेकिन कुछ आयोजन ऐसे होते हैं जो यादगार होने के साथ ही अपनी एक अलग छाप छोड़ जाते है।

आज जब मुंबई के बड़े कॉर्पोरेट घराने विभिन्न आयोजनों के नाम पर पश्चिमी सभ्यता को पोसने वाले कार्यक्रम कर करोड़ो रुपये खर्च कर देते हैं वहीँ बिड़ला उद्योग समूह की श्रीमती राजश्री बिड़ला ने हिंदी कवियों और हिंदी पुस्तक को समर्पित एक ऐसा आयोजन किया जिसकी सुरभि हिंदी साहित्य जगत को बरसों तक महकाती करती रहेगी। सबसे बड़ी बात ये है कि इस कार्यक्रम में श्रीमती राजश्री बिड़ला, उनके पुत्र कुमार मंगलम बिड़ला और उनका परिवार पूरे समय मौजूद रहा। यह अपने आप में एक दुर्लभ दृश्य था कि हिंदी साहित्य के किसी कार्यक्रम में देश के इतने बड़े उद्योगपति का परिवार इतने सम्मान और भाव से पूरे समय उपस्थित रहे।

समारोह अध्यक्ष पद्मभूषण राजश्री बिरला ने अपने वक्तव्य के ज़रिए साबित किया कि उन्हें कला, साहित्य और संस्कृति से गहरा अनुराग है। 97 वर्ष के ग़ज़लकार नंदलाल पाठक ने पुरस्कार के औचित्य पर प्रकाश डाला। सभागार में नंदलाल पाठक के कई चुनिंदा शेरों को ख़ूबसूरत पेंटिंग की तरह पेश किया गया था।  कार्यक्रम की भव्यता किसी कॉर्पोरेट कंपनी के आयोजन जैसी थी मगर रचनात्मकता किसी साहित्य उत्सव जैसी थी।

इस कार्यक्रम के माध्यम से दो नए पुरस्कारों की शुरुआत के साथ मुंबई में एक नए रचनात्मक माहौल का आगाज़ हुआ। दीपावली अवकाश और छठ उत्सव की दस्तक के बावजूद जिस उमंग और उत्साह के साथ इस पुरस्कार समारोह में श्रोताओं ने अपनी मौजूदगी दर्ज कराई वह अविस्मरणीय है। इनमें कला, साहित्य और व्यवसाय से जुड़े प्रमुख लोग थे यानी हर श्रोता अपने आप में विशिष्ट था। बिड़ला उद्योग समूह की श्रीमती राजश्री बिड़ला की प्रेरणा से स्थापित  साहित्यायन फाउंडेशन मुंबई का यह प्रथम आयोजन था। हिंदी काव्य साहित्य में विशिष्ट योगदान के लिए वरिष्ठ ग़ज़लकार दीक्षित दनकौरी को नंदलाल पाठक साहित्य पुरस्कार (₹ पांच लाख) और युवा ग़ज़लकार अभिषेक कुमार सिंह को नंदलाल पाठक प्रतिभा पुरस्कार (₹ एक लाख) मुम्बई में आयोजित एक साहित्य समारोह में मुख्य अतिथि सुधांशु त्रिवेदी (सांसद) ने दोनों रचनाकारों को पुरस्कार प्रदान करके सम्मानित किया।

ग़ज़लकार दीक्षित दनकौरी ने “ग़ज़ल दुष्यंत के बाद” (चार खंड) संकलन का संपादन किया है जिसमें एक हज़ार से अधिक ग़ज़लकार शामिल हैं। यह एक महत्वपूर्ण कार्य है। दूसरी तरफ़ पिछले 16 सालों से लगातार ग़ज़ल कुंभ का आयोजन करके उन्होंने ग़ज़ल के पक्ष में अच्छा माहौल बनाया है। अपने वक्तव्य में उन्होंने कहा कि वे पुरस्कार राशि का उपयोग निजी हित के लिए नहीं बल्कि ग़ज़ल के हित के लिए करेंगे।

अपने दो ग़ज़ल संग्रहों के ज़रिए ग़ज़लकार अभिषेक ने बेहतर संभावनाओं का संकेत दिया है। फ़िलहाल हम जिन वैश्विक चुनौतियों, वैचारिक संक्रीणताओं, धार्मिक उन्माद और प्रकृति के प्रकोप का सामना कर रहे हैं उनका प्रतिबिंब अभिषेक की ग़ज़लों में दिखाई देता है। अभिषेक ने इस बात पर ज़ोर दिया कि ग़ज़ल के विकास के लिए सामूहिक प्रयास की ज़रूरत है।

इस अवसर पर पाठक जी का ग़ज़ल संग्रह “जीवन एक ग़ज़ल है” का भी लोकार्पण  हुआ जिसके लिए वाणी प्रकाशन के मुखिया अरुण माहेश्वरी भी मौजूद थे। कार्यक्रम के समपान के बाद पाठकजी की पुस्तक की खरीदी के लिए उमड़ी भीड़ से ऐहसास हुआ कि पाठकजी और उनका रचनाकर्म मुंबई के साहित्यप्रेमियों के लिए क्या महत्व रखता है।

 श्री नंदलाल पाठक ने कहा कि देश में बिड़ला परिवार ने साहित्य संस्कृति, धर्म और परोपकार की ऐसी मिसालें कायम की है जिसका लाभ कई  पीढ़ियों से लोगों को मिल रहा है। उन्होंने कहा कि बिड़ला परिवार जो मंदिर बनवाता है उसमें देवता की मूर्ति का पता तो तब चलता है जब कोई मंदिर तक पहुँचता है लेकिन दूर से देखने वाले उसे बिड़ला मंदिर ही कहते हैं, कोई समाज किसी उद्योगपति को ऐसा सम्मान दे तो समझा जा सकता है कि उस उद्योगपति का समाज के प्रति क्या भाव है।

वर्ली के फोर सीज़न्स होटल के बैंक्वेट हाल में आयोजित इस भव्य व गरिमामयी कार्यक्रम में हिंदी ग़ज़ल न सिर्फ़ दिखाई दी बल्कि सुनाई भी दी। इसे साहित्य की छोटी मोटी घटना मान कर अनदेखा नहीं किया जाना चाहिए।

बिड़ला परिवार शीर्ष व्यवसायी होने  के  साथ ही  स्वतन्त्रता   आंदोलन से लेकर धर्म, संस्कृति और शिक्षा के क्षेत्र में जो योगदान है उसी क्रम में श्रीमती राजश्री बिड़ला ने एक अध्याय साहित्य का भी जोड़ दिया है और अपने गुरू और हिंदी के जानेमाने ग़ज़लकार नंदलाल पाठक के नाम से सम्मान और पुरस्कार का सिलसिला शुरू किया है।

बीजेपी के फायरब्रांड प्रवक्ता  व कार्यक्रम के मुख्य अतिथि सांसद सुधांशु त्रिवेदी के रूप में उद्बोधन में एक अलग ही अंदाज़ में नज़र आए. सारगर्भित बात करके ताली बटोर कर ले गए। उन्होंने अपनी प्रत्युत्पन्नमति, संस्कृत श्लोकों, हिंदी कविताओं और गजलों से ऐसा समाँ बांधा कि उपस्थित श्रोता मंत्रमुग्ध होकर उन्हें सुनते रहे। अपने सुदीर्घ वक्तव्य में आचार्य मम्मट, वाल्मीकि, सुमित्रानंदन पंत, अटल बिहारी वाजपेई और नंदलाल पाठक की काव्य पंक्तियों को उद्धृत किया- “ज़हर पीता हुआ हर आदमी शंकर नहीं होता/ न जब तक आदमी इंसान हो शायर नहीं होता।”

सुधांशु जी को -” राष्ट्रीयता के आयाम” पर अपने विचार व्यक्त करना थे। अपने वक्तव्य को पूर्णता प्रदान करते हुए उन्होंने इस विचार को रेखांकित किया कि राष्ट्र जीवंत चेतना का प्रतीक होता है जिसे न काटा जा सकता है और न बांटा जा सकता है। उन्होंने ऐतिहासिक व आज के मौजूद प्रमाणों के साथ कहा कि पूरी दुनिया में चीन से लेकर कंबोडिया और इंडोनेशिया व जापान तक हिंदू संस्कृति के चिन्ह आज भी जीवित हैं और हम दावे से कह सकते हैं कि ये देश हमारी संस्कृति के अंग हैं।

 इस अवसर पर प्रो नंदलाल पाठक के ग़ज़ल संग्रह “जीवन एक ग़ज़ल है” का लोकार्पण किया गया।

बात संचालन की की जाए तो देवमणि पाण्डेय ने अपने अभिनव अंदाज व सटीक गजलों के माध्यम से पूरे कार्यक्रम को एक रसभरी शाम में बदल दिया।

इस अवसर पर आयोजित ग़ज़ल संध्या में सुश्री पूनम विश्वकर्मा, सुमन जैन, अभिषेक कुमार सिंह, देवमणि पांडेय, दीक्षित दनकौरी और नंदलाल पाठक ने अपनी ग़ज़लों का पाठ किया। प्रतिष्ठित गायिका वृषाली बियानी ने नंदलाल पाठक की दो ग़ज़लों की संगीतमय प्रस्तुति की। अंत में वाणी प्रकाशन के निदेशक अरुण माहेश्वरी ने आभार व्यक्त किया। इस ग़ज़ल पाठ के श्रोताओं में कई लेखकों, पत्रकारों और कलाकारों के साथ उद्योगपति कुमार मंगलम बिरला, उद्योगपति सुश्री किरण बजाज और सांसद सुधांशु त्रिवेदी भी मौजूद थे।