पीयूष पांडे संसार से चले गए, लेकिन संसार की सांसों में रहेंगे, आने वाली कई पीढ़ियों तक। क्योंकि जब भी कोई विज्ञापन दिल को छू जाएगा, वहां कहीं न कहीं पीयूष पांडे की आत्मा ज़रूर महसूस होगी। भारतीय विज्ञापन जगत का नाम लेते ही, जो चेहरा सबसे पहले सामने आता है, वह है पीयूष पांडे। वह शख्स जिसने विज्ञापन की दुनिया को महज़ प्रोडक्ट बेचने का ज़रिया नहीं, उसके प्रचार का साधन भी नहीं, बल्कि भावनाओं की भाषा बना दिया। उनके बनाए विज्ञापनों ने न सिर्फ़ ब्रांड्स को ऊंचाई दी, बल्कि लोगों के दिलों में भी सदा के लिए जगह बनाई। पीयूष पांडे की जिंदगी की कहानी सिर्फ़ एक सफल करियर की नहीं, बल्कि शब्दों से भावनाएं गढ़ने वाले कलाकार की है। उनकी बनाई दुनिया में हर विज्ञापन एक ख्वाब रचता रहा — जो मुस्कान देता है, यादें बनाता है और कहीं न कहीं हमें अपने भीतर झांकने पर मजबूर करता है। पंद्रह बरस पहले की बात है, जब उनके ऑफिस में मिलने जाना हुआ, तो वहां कोई कागज नहीं दिख रहा था और न ही पेन थी। पूछा कि लिखते कैसे हैं, तो बोले – शब्द जादू होते हैं, वे दिमाग में उपजते हैं, और दिल पर अंकित हो जाते हैं, बस…। वे ‘वन लाइनर’ के शहंशाह थे।
पीयूष पांडे के कई विज्ञापन यादगार के रूप में हर जुबान पर हैं। लूना मोपेड स्कूटर के ‘चल मेरी लूना’ के विज्ञापन से पीयूष ने पहली बार अपनी राष्ट्रीय पहचान बनाई, और विडंबना देखिए कि उन्होंने अपना यह पहला विज्ञापन पहली बार देखा भी तो, अपने पड़ोसी के घर में चल रहे ब्लैक एंड वाइट टीवी सेट पर, और वह भी गली में बाहर खड़े होकर खिड़की से। उनके एशियन पेंट्स के ‘हर घर कुछ कहता है’, विज्ञापन ने घर को सिर्फ दीवारों से नहीं, भावनाओं से जोड़ा। ‘फेविकोल का जोड़, ऐसा जो टूटे ना’ ने साधारण एडहेसिव के विज्ञापन को हास्य और संवेदना से उन्होंने इतना ताकतवर बना दिया कि ब्रांड अमर हो गया। केडबरी का ‘कुछ खास है जिंदगी में’, ने भारतीय उपभोक्ता के जीवन में मिठास और भावनाओं को एक नया अर्थ दिया। इसी तरह ‘मिले सुर मेरा तुम्हारा’ ने देश की एकता और विविधता को सुरों में पिरोकर सदा के लिए दिलों में बसा दिया। मोबाइल कंपनी ‘हच’ के लिए लिखा – जहां तुम, वहां हम’
फेवीक्वि के ‘तोड़ो नहीं, जोड़ो’ और पॉन्ड्स के लिए ‘गूगली वूगली वूश’ सहित बजाज स्कूटर के लिए ‘हमारा बजाज’ जैसे उनके हर कैंपेन में एक बात समान रही — ‘भारतीयता, सहजता और भावनात्मक जुड़ाव’।
राजस्थान की गुलाबी जयपुर में एक ब्राह्मण साधारण परिवार में 5 सितंबर 1955 को जन्मे पीयूष पांडे की परवरिश ऐसे माहौल में हुई, जहां भाषा, भावना और संवेदना का परस्पर गहरा असर था। ‘ये फेविकोल को जोड़ है, टूटेगा नहीं’, लिखने वाले पीयूष पांडे की सांसें 24 अक्टूबर की सुबह 5.50 बजे टूट गईं। परिवार का माहौल सांस्कृतिक था, सो बचपन से ही शब्दों के साथ उनका रिश्ता बड़ा गहरा था, शायद यही कारण है कि आगे चलकर उन्होंने शब्दों की जादूगरी का रहस्य जान लिया। पीयूष पांडे कहते थे कि उनका जन्म एक क्रिएटिव फैक्ट्री में हुआ था, जो कि सच भी था। जयपुर में पले – बढ़े पीयूष पांडे नौ भाई-बहनों वाले एक बड़े परिवार से थे, जिनमें कुल सात बहनें और दो भाई थे। छोटे भाई प्रसून पांडे फिल्म निर्माता हैं। बहन इला अरुण जानी मानी अभिनेत्री और गायिका, तृप्ति पांडे नामी लेखिका और रमा पांडे बीबीसी की चर्चित अनाउंसर हैं। सेंट स्टीफेंस कॉलेज, दिल्ली से उन्होंने पढ़ाई की और क्रिकेटर के रूप में वे राजस्थान रणजी टीम के कप्तान भी रहे।
पीयूष पांडे के शब्द कभी भारी-भरकम नहीं रहे, बल्कि सहज, सरल होने के बावजूद बेहद असरदार रहे। उनकी भाषा बोलचाल की, और शैली जीवंत है। वे जानते थे कि अच्छा विज्ञापन वही है, जो सीधे दिल में उतर जाए। उनका लेखन किसी कवि की तरह भावनात्मक और बाज़ार की तरह शुद्ध व्यावहारिक था, और यही संतुलन उन्हें अद्वितीय बनाती है। उनके शब्दों में ‘विक्रय’ नहीं, ‘संवाद’ था। उनके विज्ञापन इंसान की तरह सोचते थे, मशीन की तरह नहीं। उनकी इसी सोच ने उन्हें बाकी क्रिएटिव लोगों से सदा ऊपर रखा। चाहे ‘हर घर कुछ कहता है’ हो या कुछ खास है और या फिर भले ही हो गीत ‘मिले सुर मेरा तुम्हारा’, पांडे का हर कैंपेन भारतीयता की मिट्टी से सना हुआ लगता है। ‘अबकी बार मोदी सरकार’ का नारा उन्होंने लिखा तो सारा देश ‘मोदी – मोदी’ कर उठा।
पांडे ने अपने करियर की शुरुआत 1980 के दशक में ‘ओ एंड एम’ के नाम से मशहूर विज्ञापन कंपनी ‘ऑगिल्वी एड मैदर’ से की। उस दौर में भारतीय विज्ञापन उद्योग पश्चिमी प्रभावों से भरा हुआ था, लेकिन पीयूष पांडे ने उसे भारतीय भावनाओं की जमीन पर उतारा। जीवन के शुरुआती वर्षों में उन्होंने अर्थशास्त्र और मानव मन दोनों को गहराई से समझा, जिसने आगे उनके विज्ञापन लेखन को एक विशेष गहराई दी। उनका मानना था कि अगर भारतीयों से जुड़ना है, तो भारत के दिल की भाषा बोलनी होगी। उन्होंने सिखाया कि विज्ञापन सिर्फ़ सामान बिकवाने का नहीं, लोगों को उससे जोड़ने का माध्यम होते है। इसी सोच ने उन्हें विज्ञापन की दुनिया का ‘एड गुरू’ बना दिया। ‘ओगिल्वी’ ने उनके निधन पर श्रद्धांजलि स्वरूप जो विज्ञापन दिया, वह भी कमाल का है।
पीयूष पांडे को न केवल भारत में बल्कि अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भी सराहा गया। वे ‘ओगिल्वी वर्ल्डवाइड’ के चीफ क्रिएटिव ऑफिसर बने, यह पद पाने वाले वे पहले भारतीय थे। उन्होंने कई बार ‘कांस लॉयंस’ जैसे प्रतिष्ठित विज्ञापन पुरस्कार जीते। उन्हें ‘पद्मश्री’ से भी सम्मानित किया गया, जो इस क्षेत्र में उनके योगदान की आधिकारिक मान्यता रही। दुनिया पीयूष पांडे को केवल एक विज्ञापन विशेषज्ञ के रूप में नहीं, बल्कि उस व्यक्ति के रूप में याद रखेगी जिसने भारत की आत्मा को ब्रांड्स के ज़रिए दुनिया तक पहुंचाया। वे कहते थे कि ‘ब्रांड्स को इंसान की तरह पेश करो, तभी लोग उनसे जुड़ेंगे’। आज जब वे इस दुनिया में नहीं है, तो कह सकते हैं कि वे प्रेरणा बनकर उन तमाम युवाओं के दिलों में रहेंगे जो रचनात्मक सोच से समाज में बदलाव लाना चाहते हैं। आज और आने वाले कल में, जब भी कोई विज्ञापन दिल को छू जाएगा, वहां कहीं न कहीं पीयूष पांडे की आत्मा ज़रूर महसूस होगी।
नैनी / विश्व हिंदी साहित्य सेवा संस्थान द्वारा आयोजित तीन दिवसीय अंतर्राष्ट्रीय साहित्य अधिवेशन के दूसरे दिन सोमवार को संगोष्ठी एवं सम्मान समारोह का आयोजन किया गया। यह कार्यक्रम नैनी स्थित जगतपिता ब्रह्मदेव धर्मशाला देवरख में संपन्न हुआ, जिसमें देशभर के साहित्यकारों को शॉल और सम्मान पत्र प्रदान कर सम्मानित किया गया। मुख्य अतिथि मंडलायुक्त डॉ. सुरेन्द्र कुमार पांडेय ने कहा संस्कृत और हिंदी दो अलग भाषाएं नहीं बल्कि एक ही संस्कृति की धारा हैं। अंग्रेजी सीखना ठीक है, लेकिन हिंदी की कीमत पर नहीं।
विशिष्ट अतिथि डॉ. एनबी सिंह ‘हरियाली गुरु’ ने पर्यावरण संरक्षण पर चिंता जताते हुए कहा, जब पेड़ नहीं लगाए जाते थे तब भी पेड़ थे। लेकिन आज जब लाखों वृक्ष लगाए जा रहे हैं तब भी हरियाली नहीं दिखती। यह हमारी सोच और क्रियान्वयन के बीच अंतर को दर्शाता है। कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए ओम प्रकाश त्रिपाठी ने कहा कि हिंदी के विकास और संरक्षण के लिए जमीनी स्तर पर ठोस प्रयास आवश्यक हैं।
इस अवसर पर विख्यात अनुवादक और आलोचक दिनेश कुमार माली को उनकी शोध पुस्तक “सौंदर्य जल में नर्मदा : एक पर्यावरणीय आलोचना” पर साहित्य रत्न संस्थान की मानद उपाधि से सम्मानित किया गया। उनकी इस पुस्तक को पुरी के शंकराचार्य स्वामी निश्चलानंद सरस्वती जी का भी विशिष्ट आशीर्वाद प्राप्त है। इस पुस्तक का विमोचन विगत वर्ष केरल की महाराजा कॉलेज में देश की प्रख्यात पर्यावरणविद मेधा पाटकर के कर-कमलों से किया गया था। ज्ञात हो, इससे पूर्व भी दिनेश कुमार माली को उनके हिंदी साहित्य में उल्लेखनीय योगदान के लिए हिंदी साहित्य अकादमी, गांधीनगर एवं अखिल भारतीय हिंदी साहित्य संस्थान, गुजरात अहमदाबाद के संयुक्त अधिवेशन में “साहित्यालंकार” की उपाधि से सम्मानित किया गया था।
विश्व हिंदी साहित्य सेवा संस्थान के इस त्रिदिवसीय संगोष्ठी के मौके पर सम्मानित होने वालों में देश के कोने कोने से पधारे साहित्यकारों में डॉ. जुगुल किशोर सारंगी, डॉ. वंदना अग्निहोत्री, डॉ. विजयलक्ष्मी, डॉ. सुमा, डॉ. सीमा वर्मा, डॉ. गीता त्रिपाठी, संतोष कुमार झा, डॉ. कृष्णा मणि, अनिल कुमार त्रिपाठी, फरहत उन्नीसा, रणजीत सिंह अरोरा, डॉ. रश्मि चौबे, रजनी प्रभा, मुक्ता कौशिक, रतिराम गढ़वाल, संतोष शर्मा, लक्ष्मीकान्त वैष्णव, राणा प्रताप, अनीता सक्सेना, माधुरी त्रिपाठी, विजय कृष्ण त्रिपाठी प्रमुख हैं। डॉ. एनबी सिंह को विशेष रूप से “पर्यावरण श्री” सम्मान से नवाजा गया।
संस्थान के सचिव डॉ. गोकुलेश्वर कुमार द्विवेदी ने आभार ज्ञापन किया। संचालन डॉ. सीमा वर्मा, रश्मि चौबे और संयोजन पुष्पा श्रीवास्तव ने किया।
हमारा वैदिक साहित्य मात्र धर्म, संस्कृति और जीवन जीने का ज्ञान नहीं देता है बल्कि उसमें युध्द नीति से लेकर कूटनीति, राजनीति और शासन-प्रशासन चलाने से लेकर राष्ट्र धर्म, राजधर्म, लोकनीति, अर्थशास्त्र, व्यापार, विदेशी नीति के तमाम ऐसे सूत्र हैं जिनकी वजह से हमारा देश विश्व गुरु था और आज भी अगर हम हमारे वैदिक वांग्मय के 8 सूत्रों को अपना लें तो हम दुनिया भर में अपनी धाक जमा सकते हैं।
ये विचार हिंदू मैनिफेस्टो के लेखक वर्ल्ड हिंदू फाउंडेशन (WHF) के संस्थापक व अध्यक्ष तथा विश्व हिंदू परिषद (VHP) के संयुक्त महासचिव स्वामी विज्ञानानंदजी ने एनएसई के भव्य सभागार में आयोजित हिंदू मैनिफेस्टो के लोकार्पण कार्यक्रम में व्यक्त किए। कार्यक्रम की अध्यक्षता एनएसी के सीईओ श्री आशीेष चौहान ने की।
कार्यक्रम का संटालन श्रीमती दीपा सिंह ने किया व अंत में आभार श्री शैलेष त्रिवेदी ने माना।
पुस्तक का लोकार्पण स्वामी विज्ञानानंद जी व श्री आशीष चौहान के साथ हिंदू इकानामिक फोरम के श्री स्वदेश खेतावत व श्री रविकांत मिश्रा ने किया।
कार्यक्रम के प्रारंभ में श्रीमती सपना अमित द्वारा हिंदू मैनिफेस्टो पर व्यक्त किए गए विचारों की वीडिओ का प्रदर्शन भी किया गया। श्रीमती सपना अमित अपने यूट्यूब चैनल के माध्यम से भारतीय वैदिक साहित्य व संस्कृति को आधुनिक परिवेश के साथ प्रचारित करने का कार्य कर रही है।
स्वामी विज्ञानानंद जी ने कहा कि हिंदू मेनिफेस्टो (The Hindu Manifesto) हिंदू सभ्यता के पुनरुद्धार के लिए एक क्रांतिकारी ब्लूप्रिंट है, जो प्राचीन हिंदू शास्त्रों से प्रेरित होकर आधुनिक समाज, शासन और नैतिकता की चुनौतियों का समाधान प्रस्तुत करती है। यह पुस्तक केवल एक घोषणा-पत्र नहीं, बल्कि एक सक्रिय आह्वान है—जो व्यक्तियों, समुदायों और राष्ट्रों को हिंदू सिद्धांतों को अपनाने के लिए प्रेरित करती है, ताकि न्यायपूर्ण, समृद्ध और सामंजस्यपूर्ण विश्व का निर्माण हो सके।
यह पुस्तक वर्षों के गहन शोध का परिणाम है, जिसमें वेद, रामायण, महाभारत, अर्थशास्त्र, शुकनीतिसार और मनुस्मृति जैसे दर्जनों पवित्र ग्रंथों से उद्धरण लिए गए हैं। स्वामी जी ने इसे “सभ्यता पुनरुत्थान का ब्लूप्रिंट” बताते हुए कहा कि ये पुस्तक हिंदू परंपरा को पश्चिमी पूंजीवाद या समाजवाद से अलग एक संतुलित आर्थिक-सामाजिक मॉडल के रूप में प्रस्तुत करती है।
इस अवसर पर कार्यक्रम के मुख्य अतिथि नेशनल स्टॉक एक्स्चेंज (एएसई) के सीईओ श्री आशीष चौहान ने कहा कि हमारी भारतीय जीवन शैली में हमारी सफलता के सारे राज छुपे हैं। उन्होंने कहा कि अगर देश के सभी हिंदू चाहें तो पुरी दुनिया में अपनी हिंदी पहचान बना सकते है। यह पुस्तक इसी सोच को कई आयामों के साथ प्रस्तुत करती है। उन्होंने कहा कि विदेश यात्रा के दौरान हमें कई बार अपना शाकाहारी भोजन नहीं मिल पाता है, यदि हिंदू लोग चाहें और संकल्प लें तो पूरी दुनिया में हिंदी भोजन की मांग पैदा कर इसे एक पहचान दे सकते हैं।
उन्होंने कहा कि आज देश के सफल व दूरदर्शी नेतृत्व की वजह से पूरी दुनिया में भारत की एक सम्मानजनक पहचान बनी है। हिंदू मैनिफेस्टो जैसी पुस्तक हर घर में पहुँचना चाहिए और हर व्यक्ति को अपने मित्र या साथी को ये पुस्तक भेंट में देकर हिंदू समाज की शक्ति को घर-घर पहुँचना चाहिए।
स्वामी विज्ञानानंद जी ने अपनी बात को विस्तार देते हुए कहा कि यह पुस्तक हिंदू सिद्धांतों को आधुनिक संदर्भ में पुनर्व्याख्या करती है, ताकि वैश्विक चुनौतियों का सामना हो सके। स्वामी जी कहते हैं, “हिंदू विचार हमेशा वर्तमान की आवश्यकताओं को संबोधित करता है, लेकिन ऋषियों के सूत्रों में निहित शाश्वत सिद्धांतों पर दृढ़ रहता है।” स्वामी जी ने पुस्तक के महत्वपूर्ण सूत्रों को रेखांकित करते हुए कहा,“धर्म” को यहाँ सिर्फ धार्मिक कर्मकाण्ड तक सीमित नहीं माना गया। यह जीवन में कर्तव्य, नैतिकता, सामाजिक उत्तरदायित्व का भाव है।
शिक्षा केवल ज्ञान अर्जन नहीं बल्कि चरित्र निर्माण, राष्ट्रीय प्रेम, वैज्ञानिक दृष्टि और भारतीय संस्कृति-स्वाभिमान के बीच समन्वय होना चाहिए। India Today
रक्षा-सुरक्षा को सिर्फ सैन्य दृष्टिकोण से नहीं, बल्कि “सभ्याता-रक्षा”, “संस्कृति-रक्षा”, “मानव-साध्यता-रक्षा” के रूप में देखा गया है।
सामाजिक व्यवस्था में भेदभाव-विरोधी दृष्टिकोण है — जाति, वर्ण-विभाजन आदि मूल रूप से हिंदू परंपरा में भेदभाव नहीं बल्कि समान-मानवता थी।
पर्यावरण, मातृभूमि, प्रकृति को सिर्फ संसाधन नहीं बल्कि पवित्रता-का अनुभव देने वाला आयाम माना गया है।
इसमें आठ संस्कृत सूत्र (प्रमुख सिद्धांत) प्रस्तुत किए गए हैं, जो धर्म-केंद्रित राज्य की कल्पना करते हैं। ये सूत्र समृद्धि, न्याय, शासन, शिक्षा, राष्ट्रीय सुरक्षा और सामाजिक सद्भाव जैसे आधुनिक मुद्दों को हिंदू दर्शन से जोड़ते हैं।ये सूत्र राम राज्य की अवधारणा पर आधारित हैं, जहां शासन न्यायपूर्ण, समावेशी और धर्म-आधारित हो। ये सूत्र हिंदू समाज को पुनः संरक्षित करने का आह्वान करते हैं, जहां पर्यावरण संरक्षण, महिलाओं की गरिमा और सामाजिक सद्भाव प्राथमिक हैं।सामाजिक: जाति-आधारित भेदभाव की गलतफहमियों को दूर कर एकता बढ़ाती है।
हिंदू मैनिफेस्टो में भारतीय वांगमय के जिन आठ प्रमुख सूत्रों को आधार बनाया गया है वे हैं-
धर्मार्थकाममोक्षसिद्धये
आर्थिक समृद्धि (अर्थ),नैतिक जीवन (धर्म),इच्छापूर्ति (काम) और आध्यात्मिक मुक्ति (मोक्ष) को संतुलित करना। हिंदू सभ्यता में धन सृजन को पवित्र माना गया है।
समृद्धि के लिए सभी का विकास: आर्थिक समृद्धि (अर्थ), नैतिक जीवन (धर्म), इच्छापूर्ति (काम) और आध्यात्मिक मुक्ति (मोक्ष) को संतुलित करना। हिंदू सभ्यता में धन सृजन को पवित्र माना गया है।
2. राष्ट्ररक्षायां प्रथमं प्रयत्
राष्ट्र की रक्षा के लिए प्रथम प्रयास करें। शत्रु की पहचान और संरक्षण पर जोर। हिंदू इतिहास से उदाहरण देकर सैन्य शक्ति और रणनीति को मजबूत करने का आह्वान किया गया है।
3.विद्यया संस्कारयते जनः
शिक्षा से जन को संस्कारित किया जाए। गुणवत्ता वाली शिक्षा: ज्ञान-आधारित समाज का निर्माण, जहां शिक्षा बौद्धिक और आध्यात्मिक उत्कृष्टता प्रदान करे। पश्चिमी मॉडल से अलग, हिंदू ग्रंथों पर आधारित हो।
4.धर्मेन राज्यं प्रशासति
धर्म से राज्य का प्रशासन करें। जिम्मेदार लोकतंत्र: राम राज्य जैसा शासन, जहां नेता धर्म (नैतिकता) से निर्देशित हों। समावेशी और न्यायपूर्ण निर्णय प्रक्रिया हो।
5.स्त्रीषु सम्मानं विधीयते
स्त्रियों में सम्मान स्थापित हो। हिंदू ग्रंथों में स्त्री को देवी माना गया है।
6.सामाजिकं सद्भावना रक्षति
सामाजिक सद्भावना की रक्षा करें। सामाजिक सद्भाव: वर्ण और जाति के गलत अर्थों का खंडन किया गया है। गरिमा, समानता और एकता पर आधारित समाज, जहां कोई भेदभाव न हो।
8. प्रकृतिं पवित्रं मंथति
प्रकृति को पवित्र मानकर संरक्षित करें। प्रकृति की पवित्रता: पर्यावरण संरक्षण को धर्म का हिस्सा माना गया है। सतत और सामंजस्यपूर्ण जीवनशैली, वेदों से प्रेरित है।
स्वकीयं संस्कृतिं संनादति
अपनी संस्कृति का सम्मान करें। अपनी विरासत का सम्मान हो। हिंदू पहचान, वैश्विक हिंदू एकता और सांस्कृतिक कूटनीति से भारत को आध्यात्मिक शक्ति का केंद्र बनाना।
ये सूत्र न केवल आदर्श हैं, बल्कि कार्यान्वयन का आह्वान भी करते हैं। पुस्तक में इन्हें आधुनिक संदर्भों (जैसे अर्थव्यवस्था, पर्यावरण और वैश्विक हिंदू एकता) से जोड़ा गया है। स्वामी जी के अनुसार, ये सूत्र “धर्मिक राष्ट्र” की नींव रखते हैं, जहां हिंदू सिद्धांत सभी के लिए समृद्धि और न्याय सुनिश्चित करें।
स्वामी विज्ञानानंदजी के बारे में
स्वामी जी विश्व हिंदू फाउंडेशन (WHF) के संस्थापक एवं वैश्विक अध्यक्ष हैं, साथ ही विश्व हिंदू परिषद (VHP) के संयुक्त महासचिव हैं। एक आईआईटी स्नातक होने के बावजूद, उन्होंने आध्यात्मिक जीवन अपनाया और हिंदू धर्म के पुनरुत्थान के लिए वैश्विक मंच जैसे वर्ल्ड हिंदू कांग्रेस और वर्ल्ड हिंदू इकोनॉमिक फोरम की स्थापना की।
पुस्तकः द हिंदू मेनिफेस्टो (The Hindu Manifesto: A Blueprint for Civilizational Resurgence) लेखक: स्वामी विज्ञानानंद प्रकाशक: BluOne Ink पृष्ठ संख्या: 448 (पेपरबैक संस्करण) ISBN: 9789365474978 उपलब्धता: अमेज़न (भारत और अंतरराष्ट्रीय), हिंदू एशॉप आदि पर उपलब्ध।
श्री आशीष चौहान के बारे में श्री आशीष चौहान नेशनल स्टॉक एक्सचेंज (NSE) के प्रबंध निदेशक और मुख्य कार्यकारी अधिकारी (CEO) हैं। वह बीएसई के पूर्व एमडी और सीईओ भी रह चुके हैं और उन्हें भारत में आधुनिक वित्तीय डेरिवेटिव्स के जनक के रूप में जाना जाता है। चौहान को सूचना प्रौद्योगिकी, वित्त और बाजार संरचना में विशेषज्ञता हासिल है, और वह एनएसई के संस्थापक सदस्यों में से एक हैं। वह उस टीम का हिस्सा थे जिसने मूल रूप से एनएसई की स्थापना की थी और जिसे अब एनएसई माना जाता है। उन्होंने भारतीय स्टॉक मार्केट को आधुनिक बनाने में सबसे ज्यादा योगदान दिया है. वे भारतीय फाइनेंशियल डेरिवेटिव्स के जनक हैं. चौहान बीएसई की कमान संभाल चुके हैं और रिलायंस इंडस्ट्रीज में भी बड़े पद पर काम कर चुके हैं. उन्हीं के नेतृत्व में बीएसई दुनिया का सबसे तेज एक्सचेंज बना दिया।
कोटा / मनोचिकित्सक डॉ. एम. एल. अग्रवाल ने कहा कि जीवनशैली में आ रहे बदलाव तनाव और मानसिक रोग का बड़ा कारण है। रोटरी क्लब राउंड टाउन, होप सोसायटी के संयुक्त तत्वावधान में रविवार को इंडस्ट्रियल एरिया स्थित होटल में मानसिक स्वास्थ्य पर रविवार को आयोजित सेमिनार में मनोचिकित्सक डॉ. एम. एल. अग्रवाल ने यह बात कही। उन्होंने कहा मानसिक रोगियों को अंधविश्वासों से बचाकर उनका उपचार कराया जाना चाहिए। उन्होंने बताया कि अकारण ही उदासी, हताशा, एकांतवास, निद्रा का अभाव, रोने की इच्छा तथा याददाश्त में कमी के साथ आत्महत्या का विचार मन में आना आदि मानसिक रोगों के प्रमुख लक्षण हैं।
मनोचिकित्सक डॉ. इंद्रा शर्मा ने कहा कि सोशल मीडिया पर छाए रहने की सनक युवाओं को मनोरोगी बना रही है। नए जमाने की ये नई समस्या गंभीर बीमारी का रूप ले रही है। डॉ. कल्पना श्रीवास्तव ने कहा कि मेंटल डिसेबिलिटी से ग्रस्त व्यक्ति को स्पेशल अवेयरनेस की जरूरत होती है। उन्होंने कहा कि शरीर को तभी सेहतमंद और फिट रखा जा सकता है, जब आप मानसिक तौर पर पूरी तरह से स्वस्थ होंगे। रोटरी क्लब जिला 3056 की प्रांतपाल प्रज्ञा मेहता ने कहा कि मेंटल हेल्थ को लेकर बहुत भ्रांतियां हैं, इसे ब्रेन हेल्थ माना जाना चाहिए।
डॉ. गीता बंसल ने कहा कि मित्रों के बीच समय बिताना और परिवार के लिए समय निकालना जरूरी है। डॉ. अरुणा अग्रवाल ने कहा कि बच्चे या महिला के व्यवहार में बदलाव अधिक समय तक दिखे तो यह मानसिक स्वास्थ्य के लिए घातक हो सकता है। डॉ. वनिता मित्तल ने कहा कि मानसिक स्वास्थ्य आज वैश्विक समस्या बन चुका है। मानसिक अस्वस्थता से जूझ रहे 85 प्रतिशत लोग इलाज को आगे ही नहीं आते हैं।
इस अवसर पर संस्थाओं, प्रश्नोत्तरी में विजेताओं व सबसे ज्यादा उपस्थिति वाले रोटरी क्लब को भी सम्मानित किया गया। सेमिनार में सेकेट्री रामगोपाल अग्रवाल, रोटरी क्लब राउंड टाउन के अध्यक्ष अनिल अग्रवाल, डॉ. अविनाश बंसल, असिस्टेंट गवर्नर डॉ. रोशनी मिश्रा, सेकेट्री होस्ट क्लब डीसी जैन, जोन चेयरमैन सुरेन्द्र अग्रवाल, प्रिया अग्रवाल, रश्मि अग्रवाल, पुष्पा अग्रवाल, नीरा अग्रवाल आदि उपस्थित रहे।
ब्राह्मणों ने न केवल अंग्रेजों के विरुद्ध विद्रोह/ संग्राम का बार बार नेत्तृत्व किया था बल्कि उनका अंग्रेजों से विरोध इस हद तक था कि यदि वे डिप्टी कमिश्नर/ कलेक्टर भी हों तो भी रसोई के लिए पुरोहित के रूप में ब्राह्मण अपनी सेवाएँ देने राज़ी न हुए। दरिद्र से दरिद्र ब्राह्मण ने भी देश को गुलाम बनाने वालों को खाना खिलाने से स्पष्ट इन्कार कर दिया।
ब्राह्मणों के इस भीतरी विरोध पर ध्यान दिया ही नहीं गया है। बल्कि इसे यों प्रस्तुत किया गया कि उच्च जाति के हिंदू (ब्राह्मण, क्षत्रिय) गोमांस, सुअर का मांस, या शराब को छूने की उन वर्जनाओं के कारण यूरोपियनों के लिए खाना बनाने से बचते थे, जो ब्रिटिश आहार में आम थीं। यह कार्य “अपवित्र” और निम्न-स्थिति का माना जाता था। इसलिए, रसोइए आमतौर पर शूद्र (श्रमिक) या “अछूत” (दलित/परिया) समुदायों से, या गैर-हिंदू जैसे गोवा के कैथोलिक या मुस्लिम होते थे। शूद्र, हिंदू समाज में चौथा वर्ण, सेवा व्यवसायों से जुड़े थे और औपनिवेशिक भारत में घरेलू श्रम का मुख्य स्रोत थे।
मेमसाहिब्स एंड देयर सर्वेंट्स इन नाइनटीन्थ-सेंचुरी इंडिया (1994) पढ़िये तो पता चलेगा कि निम्न जाति के हिंदू” या “अछूत” रसोई के लिए पसंद किए जाते थे ताकि मिश्रित मांस और शराब को समायोजित किया जा सके। कास्ट, फूड एंड कोलोनियलिज्म (2024) में बताया गया है कि मद्रास प्रेसीडेंसी (तुलनीय प्रशासकीय क्षेत्र) में, परिया (अछूत) रसोइए “अंग्रेजी, फ्रांसीसी और इतालवी पुडिंग” बनाने की अपनी क्षमता का विज्ञापन करते थे। हू इज (नॉट) अ सर्वेंट, एनीवे? (2020) में यह बताया गया है कि ये रसोईये दो तीन तरह के और भी काम कर लेते थे।
अंग्रेजी शासन काल में एक हजार से ज्यादा डिप्टी कमिश्नर/ कलेक्टर हुए। सबने कथित शूद्र रसोइये रखे। ये अधिकारी, अक्सर 20–30 वर्ष की आयु के युवा आईसीएस अधिकारी, एकांत बंगलों में रहते थे और स्थानीय भारतीय घरेलू कर्मचारियों पर बहुत अधिक निर्भर रहते थे, जिसमें खाना पकाने जैसे कार्य भी शामिल थे, क्योंकि उष्णकटिबंधीय जलवायु और स्थानीय भोजन तैयार करने की अपरिचितता थी। कहा यह गया कि cultural friction से British comfort न प्रभावित हो जाये, इसलिए यह हुआ और यह सिर्फ कलेक्टर स्तर की बात न थी, हर ब्रिटिश अधिकारी का यही तौर तरीका था। After Five Years in India पुस्तक में Anne C. Wilson (1895) ने एक ब्रिटिश अधिकारी के घर के हाल बताए हैं। उससे भी इसकी पुष्टि होती है।
भारत में ब्रिटिश घरों, जिसमें डीसी के घर शामिल थे, में औसतन 10–20 नौकर काम करते थे, जो सस्ते श्रम और औपनिवेशिक जीवनशैली के “प्रतिष्ठा” पर जोर के कारण संभव था। रसोइए (बावर्ची या खानसामा) आवश्यक थे, क्योंकि ब्रिटिश अधिकारी करी जैसे भारतीय भोजन के साथ-साथ यूरोपीय शैली के व्यंजनों (जैसे रोस्ट, पुडिंग) को पसंद करते थे। मेमसाहिबों के गाइड (उदाहरण के लिए, फ्लोरा एनी स्टील की The Complete Indian Housekeeper and Cook (1888)) और संस्मरणों में रसोइए पुरुष गैर ब्राह्मण भारतीय थे। वे इस पुस्तक में इस बात पर दुख जताती हैं कि जातीय प्रतिबंधों (caste restrictions) ने servant versatility को सीमित कर दिया। अंग्रेजों ने इस आधार पर यह अवधारणा भी बनाई कि भारत के लोग lazy होते हैं और काम करने से मना करने के बहाने बनाते हैं।
Servants’ Pasts: Late-Eighteenth to Twentieth-Century South Asia (2019) में नितिन शर्मा और नितिन वर्मा भी अंग्रेजों के इस दृष्टिकोण से सहानुभूति रखते प्रतीत होते हैं : “The Europeans in India incessantly complained of being forced to hire innumerable servants because of the alleged caste taboos that defined work. Tied to this was the idea that servants were characteristically lazy, who often gave the excuse of caste prohibitions in order not to perform certain tasks. In this orientalising mix of caste and essentialised native character, where does the possibility of recovering agency on the part of servants lie?” (pp. 34–35).
उत्सा रॉय अपनी किताब Culture of Food in Colonial Bengal (2009) में भी इसका उल्लेख करती हैं कि ब्राह्मण कैसे इस कार्य को करने से इन्कार करते रहे। पंचकारी बंदोपाध्याय और महेंद्रनाथ दत्ता के विवरण भी यही बताते हैं कि “Brahmins never took up cooking at other people’s houses… [it was seen as] disrespectful.” तनिका सरकार Caste–ing Servants in Colonial Calcutta नामक अपने लेख में 19वीं सदी की सैनिटेशन रिपोर्ट्स का हवाला देकर इस तरह के caste avoidance की पुष्टि करती हैं।
ब्राह्मणों की इस अवज्ञा ने caste reinforcement में क्या भूमिका निभाई होगी? क्या अंग्रेज अधिकारी ब्राह्मणों के द्वारा किये जा रहे इस रिजेक्शन के वास्तविक अर्थ नहीं समझ रहे होंगे? क्या वे इससे अपमानित नहीं महसूस करते होंगे? क्या ब्राह्मणों को उन्होंने इसका सबक न सिखाना चाहा होगा? और इसलिए ब्राह्मिनिज्म के विरोध में उन्होंने अपना मानस दृढ़तर बना लिया?
क्या अस्पृश्यता के सवाल को कभी सामाजिक दमन की जगह शुद्धता और पवित्रता के इस आग्रह से कभी देखा गया? कि ब्राह्मण प्रभुता के निरंकुशत्व से सम्पन्न अंग्रेजों के साथ छुआछूत बरत रहे थे। और इसलिए ब्राह्मण इसकी कीमत चुकाते रहे और अंग्रेजों से ब्राह्मणों से अपनी घृणा का स्थानांतरण भारतीय समाज के दूसरे वर्गों में करने के लिए वे नैरेटिव्स बोने शुरू कर दिये जिसकी फसल आज भी काटी जा रही है।
(लेखक सेवानिवृत्त आईएएएस अधिकारी हैं और मध्य प्रदेश के मुख्य चुनाव आयुक्त हैं)
हाल ही में पाकिस्तान समेत संयुक्त अरब अमीरात, कतर और अज़रबैजान के बीच बन रहे सैन्य गठजोड़ की खबरें भारत के लिए गंभीर चिंता का विषय हैं। यह घटनाक्रम न केवल दक्षिण एशिया बल्कि मध्य एशिया और खाड़ी क्षेत्र के भू-राजनीतिक समीकरणों को भी प्रभावित कर रहा है। पाकिस्तान लगातार अपनी रक्षा और कूटनीतिक स्थिति को मज़बूत करने की दिशा में सक्रिय हुआ है और वह ऐसे देशों से निकटता बढ़ा रहा है जो भारत के रणनीतिक हितों के लिए चुनौती बन सकते हैं। भारत को इस नए उभरते गठजोड़ को केवल एक सामान्य रक्षा समझौते के रूप में नहीं देखना चाहिए, बल्कि इसे एक दीर्घकालिक रणनीतिक प्रयास के रूप में समझना चाहिए, जिसका उद्देश्य पाकिस्तान की अंतरराष्ट्रीय स्थिति को सुधारना और भारत पर अप्रत्यक्ष दबाव बनाना है। भारत की विदेश नीति और सुरक्षा के मद्देनजर इस तरह के गठबंधन बड़ी चुनौती के लिहाज देखे जाने चाहिए।
पिछले महीने पाकिस्तान और सऊदी अरब के बीच हुए ऐतिहासिक सैन्य समझौते, जिसके तहत एक देश पर हुआ हमला दूसरे देश पर भी माना जाएगा, की तर्ज पर ही इस सैन्य गठजोड़ का विचार सामने लाया गया है। हालांकि इन चार देशों के बीच अभी कोई औपचारिक समझौता नहीं हुआ है, लेकिन माना जा रहा है कि अगले कुछ महीनों में इसकी घोषणा हो जाएगी। गौरतलब है कि तुर्किये, पाकिस्तान और अजरबैजान का त्रिपक्षीय गठबंधन, जिसे थ्री ब्रदर्स के नाम से जाना जाता है, एक मजबूत सैन्य साझेदारी का रूप ले चुका है। इसके अतिरिक्त, इस्लामिक मिलिट्री काउंटर टेररिज्म कोएलिशन (आईएमसीटीसी) भी है, जिसका संस्थापक सऊदी अरब है और जिसमें चालीस से अधिक सदस्य देश शामिल हैं। इन देशों के बीच सैन्य अभ्यास, हथियार सौदे और कश्मीर जैसे मुद्दों पर इनका स्वाभाविक सामूहिक रुख भारत के लिए चिंता का विषय रहा है। इससे पाकिस्तान अपनी कुचालों का जायज ठहराने एवं अपनी रक्षा की गुहार लगाते हुए भारत पर दबाव बनाना चाहता है। नहीं भूलना चाहिए कि पहलगाम आतंकी हमले के बाद जब भारतीय सेना ने ऑपरेशन सिंदूर चलाया, तब ज्यादातर मुस्लिम देशों ने तटस्थ रुख अपनाया था, लेकिन तुर्किये और अजरबैजान दो ऐसे मुल्क थे, जो पूरी तरह से पाकिस्तान के समर्थन में खड़े थे। दरअसल, तुर्किये के राष्ट्रपति तैयब अर्दोआन की इस्लामिक दुनिया के मॉडर्न खलीफा बनने की सनक का पाकिस्तान समर्थन करता है, इसी वजह से तुर्किये ने संयुक्त राष्ट्र में भी कश्मीर पर पाकिस्तान के रुख का खुला समर्थन किया है।
सऊदी अरब और पाकिस्तान के बीच हुआ हालिया रक्षा समझौता इस बात का संकेत है कि पाकिस्तान अब अपनी सुरक्षा रणनीति को क्षेत्रीय स्तर पर फैलाने में सफल हो रहा है। यह समझौता इस सिद्धांत पर आधारित है कि अगर किसी एक देश पर हमला होता है तो दोनों की संयुक्त प्रतिक्रिया होगी। यह बात भारत के लिए सीधे तौर पर खतरे की घंटी है क्योंकि इससे पाकिस्तान को रक्षा सहायता, प्रशिक्षण, संसाधन और राजनीतिक समर्थन प्राप्त हो सकता है। इसी तरह पाकिस्तान अज़रबैजान, यूएई और कतर जैसे देशों के साथ भी अपने संबंधों को मजबूत करने में जुटा है।
इन देशों के साथ पाकिस्तान का यह बढ़ता सामरिक सहयोग उसके लिए आर्थिक और तकनीकी लाभ भी लेकर आ सकता है, जिससे भारत के लिए क्षेत्रीय संतुलन बनाए रखना कठिन हो सकता है। भारत को इन परिस्थितियों में अपनी विदेश नीति को अधिक सशक्त और लचीला बनाना होगा। अब वह समय बीत चुका है जब भारत केवल पारंपरिक प्रतिद्वंद्विता और सीमित क्षेत्रीय चिंताओं के आधार पर नीति बनाता था। आज की दुनिया में भू-राजनीति बहुस्तरीय हो चुकी है, जहां आर्थिक संबंध, तकनीकी साझेदारी और रक्षा सहयोग एक-दूसरे से गहराई से जुड़े हुए हैं। भारत को चाहिए कि वह अपने खाड़ी देशों से संबंधों को और सुदृढ़ करे।
यूएई और सऊदी अरब जैसे देशों के साथ भारत के आर्थिक और सांस्कृतिक संबंध पहले से ही मजबूत हैं, पर उन्हें रक्षा सहयोग के स्तर पर भी विस्तारित करने की जरूरत है। भारत यदि इन देशों के साथ रणनीतिक साझेदारी बढ़ाता है तो पाकिस्तान को क्षेत्रीय स्तर पर अलग-थलग करने में मदद मिल सकती है।
साथ ही भारत को यह भी समझना होगा कि पाकिस्तान केवल सैन्य ताकत पर नहीं, बल्कि कूटनीतिक चालों और मीडिया नैरेटिव के माध्यम से भी अपनी स्थिति को मजबूत करने का प्रयास कर रहा है। ऐसे में भारत को न केवल रक्षा मोर्चे पर बल्कि कूटनीतिक और सूचनात्मक मोर्चे पर भी सक्रिय रहना होगा। भारत की नीति प्रतिक्रियात्मक न होकर सक्रिय, दूरगामी और अग्रदर्शी होनी चाहिए। भारत को यह दिखाना होगा कि वह केवल अपनी सीमाओं की रक्षा तक सीमित नहीं है, बल्कि क्षेत्रीय स्थिरता और वैश्विक शांति का भी एक भरोसेमंद संरक्षक है। भारत ही दुनिया से आतंकवाद को समाप्त करने की मुहिम छेड़े हुए है। भारत के लिए यह भी जरूरी है कि वह अपने मित्र देशों के साथ सामूहिक सुरक्षा दृष्टिकोण विकसित करे। जिस तरह अमेरिका और यूरोपीय संघ सामूहिक रक्षा नीति पर चलते हैं, उसी तरह भारत को भी इंडो-पैसिफिक क्षेत्र, एसोसिएशन ऑफ साउथईस्ट एशियन नेशंस देशों और मध्य पूर्व में सहयोगी नेटवर्क को सुदृढ़ करना चाहिए। यह केवल सैन्य दृष्टि से नहीं बल्कि कूटनीतिक और आर्थिक दृष्टि से भी भारत की स्थिति को मजबूत करेगा।
पाकिस्तान की नई विदेश नीति की दिशा साफ है – वह भारत को घेरने की कोशिश कर रहा है, चाहे वह चीन के साथ सीपेक परियोजना के माध्यम से हो या अब मध्य-पूर्व के देशों के साथ रक्षा सहयोग के जरिए। भारत को इस घेराबंदी को तोड़ने के लिए तीन दिशा में एक साथ काम करना होगा – अपनी रक्षा क्षमता को आधुनिक बनाना, विदेश नीति में सक्रियता लाना, और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत की सकारात्मक छवि को और प्रखर बनाना। यह स्थिति भारत के लिए केवल एक चुनौती नहीं बल्कि अपनी सामरिक दूरदर्शिता को सिद्ध करने का अवसर भी है। भारत यदि समय रहते अपने पड़ोस में बढ़ते इस सैन्य गठजोड़ की गंभीरता को समझ लेता है और सक्रिय कदम उठाता है, तो वह न केवल पाकिस्तान की कूटनीतिक चालों को निष्प्रभावी बना सकता है, बल्कि दक्षिण एशिया को स्थिरता और सहयोग के नए मॉडल के रूप में प्रस्तुत कर सकता है।
इन चार राष्ट्रों का सैन्य गठबंधन भारत के लिए एक चेतावनी है कि भू-राजनीति में देशों के बीच धार्मिक एकजुटता नए रूप में सामने आ रही है, ऐसे में क्षेत्रीय शांति और सुरक्षा बनी रहे, इसके लिए भारत को अपनी रक्षा क्षमताओं को मजबूत करते हुए कूटनीतिक मोर्चे पर भी सक्रिय बने रहना होगा। भारत पिछले कई वर्षों से पाकिस्तान, तुर्की और अजरबैजान को काउंटर करने के लिए अलग-अलग रणनीतियों पर काम कर रहा है। इनमें इन तीनों देशों के दुश्मनों की मदद से लेकर इन्हें आर्थिक तरीके से चोट पहुंचाना भी शामिल है। पाकिस्तान के खिलाफ भारत के कदमों से हर कोई परिचित है। अब बात करते हैं तुर्की की। भारत ने तुर्की को काउंटर करने के लिए उसके सबसे बड़े दुश्मन ग्रीस के साथ रक्षा संबंधों को मजबूत किया है। इसके अलावा भारत ने साइप्रस के मुद्दे को भी अंतरराष्ट्रीय मंचों पर उठाना शुरू किया है, जिसकी जमीन पर तुर्की ने अवैध रूप पर कब्जा जमाया हुआ है। वहीं, भारत ने तुर्की को अपने बाजार में प्रवेश को लेकर भी सख्तियां बरती हैं।
इस सैन्य गठजोड़ के हकीकत बनने की सूरत में भारत के लिए जरूरी होगा कि वह आर्मेनिया, ग्रीस और साइप्रस के साथ अपने संबंध मजबूत करे और यूएई के साथ भी द्विपक्षीय रिश्तों को और प्रगाढ़ बनाए, जो भारत का बड़ा व्यापारिक भागीदार रहा है और आम तौर पर इस्लामिक मुद्दों पर तटस्थ रुख रखता है। आज भारत को यह मानना होगा कि “सुरक्षा” अब केवल हथियारों का मामला नहीं है, यह अर्थव्यवस्था, कूटनीति, और तकनीक का समन्वित प्रश्न बन चुका है। पाकिस्तान की नई चालें एवं कुचालें हमें केवल सतर्क रहने की नहीं, बल्कि सजग, सक्रिय और रणनीतिक रूप से एक कदम आगे रहने की प्रेरणा देती हैं। भारत यदि अपनी नीति में इस नए दृष्टिकोण को शामिल करता है, तो यह गठजोड़ उसके लिए खतरा नहीं बल्कि आत्मसुधार और आत्मसशक्तिकरण का अवसर साबित हो सकता है।
मुंबई। भारत के अग्रणी डिजिटल एसेट एक्सचेंज में से एक, ZebPay ने 21 अक्टूबर को अपनी 11वीं वर्षगांठ मनाई जो एक दशक से भी अधिक समय से डिजिटल इनोवेशन के माध्यम से वित्तीय समावेशन को बढ़ावा दे रहा है। 2014 में स्थापित ZebPay भारत की बिटकॉइन क्रांति में अग्रणी रहा है जो नियामक अनुपालन सुनिश्चित करते हुए इनोवेशन को बढ़ावा दे रहा है व राष्ट्र के डिजिटल एसेट परिदृश्य को साकार करने के लिए ग्राहकों में भरोसा बना रहा है।
ZebPay ने इनोवेशन के 11 साल पूरे करते हुए कंपनी ने एक नए लोगो और नई ब्रांड पहचान का अनावरण किया है। यह कदम उनके विकास और बिटकॉइन को सभी के लिए सुलभ, भरोसेमंद और सशक्त बनाने की उनकी प्रतिबद्धता को दर्शाता है। नवीनीकृत पहचान में “बिटकॉइन में प्रो” टैगलाइन प्रस्तुत की गई है, जो ZebPay की विचारधारा और विरासत को दर्शाती है जो अपने यूज़र्स को बिटकॉइन अर्थव्यवस्था में आत्मविश्वास से भाग लेने में सक्षम बनाती है, चाहे वे पहली बार निवेश करने वाले हों या अनुभवी ट्रेडर।
नवीनीकृत लोगो और टैगलाइन भारत में बिटकॉइन निवेश में ZebPay के नेतृत्व और डिजिटल एसेट्स की दुनिया को सरल बनाने के सतत मिशन का प्रतीक है। वैश्विक अर्थव्यवस्था को बदलने के लिए बिटकॉइन के 17 साल पूरे होने पर, ZebPay की 11 साल की यात्रा इस विकास को दर्शाती है जिसने लाखों भारतीयों को बिटकॉइन से परिचित कराने से लेकर नियामक अनुपालन, शिक्षा और इनोवेशन के माध्यम से विश्वास बनाने तक का काम किया है। इन वर्षों में, ZebPay ने न केवल एक निवेश मंच प्रदान किया है, बल्कि वित्तीय साक्षरता को भी बढ़ावा दिया है, सुरक्षित निवेश को प्रोत्साहित किया है और बिटकॉइन को भारत के प्रत्येक घर में एक जाना-पहचाना नाम बना दिया है।
अपनी 11वीं वर्षगांठ के उपलक्ष्य में ZebPay ने विशेष कम्युनिटी कैंपेन और ऑफर की एक श्रृंखला शुरू की है जैसे एक विशेष निशुल्क ज़ीरो-फीस दिवाली मुहूर्त ट्रेडिंग सेशन, उच्च-वॉल्यूम वाले स्पॉट ट्रेडर्स के लिए गोल्ड रिवार्ड्स, फ्यूचर्स पर उच्चतम ट्रेडिंग वॉल्यूम के लिए बिटकॉइन-आधारित पुरस्कार और एक विशेष ऑफर जो मौजूदा उपयोगकर्ताओं को नए क्रिप्टो डिपॉजिट करने पर पुरस्कृत करता है। ये सीमित अवधि के ऑफर ZebPay की 11 साल की यात्रा का जश्न मनाने के लिए पेश किए गए हैं, जो इसकी लॉयल कम्मयुनिटी को पुरस्कृत करते हैं व विभिन्न निवेश माध्यमों में सक्रिय भागीदारी को प्रोत्साहित करते हैं।
इसके अतिरिक्त ZebPay ने बिटकॉइन निवेश को सरल व अधिक सुलभ बनाने के लिए कई नई पहलें शुरू की हैं। इसका प्रमुख उत्पाद CryptoPacks विशेष तौर पर बनाए गए थीम-आधारित निवेश बंडल प्रदान करता है जो उपयोगकर्ताओं को आसानी से अपने पोर्टफोलियो को विविध बनाने में मदद करता है। इन-पर्सन सत्रों के माध्यम से आयोजित बिटकॉइन मास्टरक्लास पहल एक जिम्मेदार निवेश मानसिकता पर जोर देती है और प्रतिभागियों को बिटकॉइन, ब्लॉकचेन व समग्र रूप से क्रिप्टो एसेट्स की मूल बातें समझने में मदद करती है जिसका मुख्य उद्देश्य सोच-समझकर निवेश निर्णय लेना है। अब तक दो सफल सत्रों के साथ कार्यक्रम का उद्देश्य क्रिप्टो लर्निंग को सभी के लिए सुविधाजनक और व्यावहारिक बनाना रहा है एवं नए सत्रों की योजना भी तैयार की गई है। एक्सचेंज ने पूरे भारत में वित्तीय और फिनटेक इवेंट्स में भी सक्रिय रूप से भाग लिया है, जिससे कम्मयुनिटी के साथ जुड़कर बिटकॉइन के बारे में जागरूकता फैलाई जा सके, साक्षरता को बढ़ावा दिया जा सके और डिजिटल एसेट इकोसिस्टम में सूचित भागीदारी को प्रोत्साहित किया जा सके। यह बिटकॉइन अर्थव्यवस्था में ज्ञान और आत्मविश्वास के साथ उपयोगकर्ताओं को सशक्त बनाने के अपने मिशन को मजबूत करता है।
ZebPay के मुख्य कार्यकारी अधिकारी Rahul Pagidipati ने कहा, “भारत के बिटकॉइन और क्रिप्टो इकोसिस्टम में 11 साल पूरे करना एक गर्वित करनेवाली उपलब्धि है। मेरे लिए बिटकॉइन निवेश सिर्फ अल्पकालिक लाभ के बारे में नहीं है; यह अनुशासन, निरंतरता और दीर्घकालिक मानसिकता के बारे में है। हम निवेशकों को सूचित निर्णय लेने और Rupee-Cost Averaging (RCA) जैसी रणनीतियों का लाभ उठाते हुए नियमित निवेश करने में विश्वास रखते हैं जिससे धीरे-धीरेसंपत्ति का निर्माण हो और बाजार की अस्थिरता को कुशलता से नेविगेट किया जा सके। ZebPay की यात्रा हमेशा लाखों लोगों को जिम्मेदारी से बिटकॉइन मेंनिवेश करने, वित्तीय स्थिरता बनाने और व्यापक डिजिटल अर्थव्यवस्था में भाग लेने के लिए सशक्तबनाने के बारे में रही है। जैसे-जैसे हम आगे बढ़ते हैं, हमारा ध्यान दीर्घकालिक वित्तीय विकास का समर्थन करने, अनुशासित निवेश की आदतों को बढ़ावा देने, और बिटकॉइन को सभी के लिए सुलभ और लाभकारी बनाना जारी रखने पर केंद्रित है।”
ZebPay के मुख्य परिचालन अधिकारी Raj Karkara ने बताया, “यह उपलब्धि उस अविश्वसनीय विश्वास और संकल्प को दर्शाती है जोहमारे निवेशकों ने वर्षों से हम पर दिखाया है। ZebPay का विकास हमेशा हमारी कम्मयूनिटी को सुनने और हर तरह के निवेशक के लिए सुरक्षित, सहज और नियामक अनुपालन-युक्त समाधान प्रदान करने में निहित रहा है, जिसमें पहली बार के निवेशकों से लेकर अनुभवी ट्रेडर तक शामिल हैं।चूंकि हम 11 साल का जश्न मना रहे हैं, हमारा ध्यान मजबूती से भविष्य पर हैजिसमें मजबूत साझेदारी बनाना, वित्तीय शिक्षा को बढ़ावा देना और भारत के लिए बिटकॉइन निवेश कोसरल बनाना जारी रखना शामिल हैं।”
एक्सचेंज विभिन्न निवेश समाधानों के साथ एक विविध पोर्टफोलियो के माध्यम से खुद को अलग व बेहतर बनाना जारी रखता है जिसमें Spot और Perpetual Futures trading से लेकर CryptoPacks जैसे लक्ष्य-आधारित निवेश विकल्प शामिल हैं। ZebPay अपने मोबाइल ऐप, वेब प्लेटफॉर्म और APIs पर तत्काल fiat और crypto deposits और withdrawals की पेशकश करके एक सुगम उपयोगकर्ता अनुभव सुनिश्चित करता है। उपयोगकर्ता Quick Trade सुविधा के माध्यम से तुरंत crypto खरीद या बेच सकते हैं जिससे लेनदेन पहले से कहीं अधिक तेज और अधिक सुविधाजनक हो जाता है।
Financial Intelligence Unit – India (FIU-IND) के साथ एक पंजीकृत इकाई और Digital Economy Council of Australia के सदस्य के रूप में, ZebPay ने भारत के बिटकॉइन परिदृश्य को आकार देने में अपने स्थान को लगातार मजबूत किया है। इसकी यात्रा सुरक्षा, इनोवेशन और समावेशिता पर एक मजबूत ध्यान केंद्रित करती है जिसमें सभी को सशक्त बनाने के लिए डिज़ाइन की गई सुविधाएँ और पहलें सामने लाई गई हैं।
ZebPay के बारे में
ZebPay भारत के सबसे पुराने बिटकॉइन एक्सचेंजों में से एक है जिसके 6 मिलियन से अधिक रजिस्टर्ड उपयोगकर्ता हैं। 2014 में स्थापित इस प्लेटफार्म उद्देश्य एक प्रमुख blockchain asset solution provider और crypto space में भारतीयों के लिए नंबर-1 वित्तीय सलाहकार बनना है। कंपनी का मिशन अपने सदस्यों को Web3 इकोनॉमी में वित्तीय स्वतंत्रता प्राप्त करने में मदद करना है। ZebPay एक FIU-registered digital asset exchange है, जो zebpay.com के साथ-साथ एंड्राइड प्ले स्टोर व एप्पल एप स्टोर के माध्यम से भी उपलब्ध है। ग्राहक Bitcoin, Ethereum, BAT और 300+ अन्य crypto pairs में निवेश कर सकते हैं व crypto-fiat और crypto-crypto दोनों की ट्रेडिंग कर सकते हैं। ZebPay OTC, उच्च-वॉल्यूम वाले क्लाइंट्स के लिए एक bespoke ट्रेडिंग डेस्क है, जो व्यक्तियों और संस्थानों दोनों की आवश्यकताओं को पूरा करता है।
विज्ञापन जगत की जानी मानी हस्ती पीयूष पांडेय अब हमारे बीच नहीं रहे। वह 70 साल के थे। पीयूष पांडे एक महीने से कोमा में थे और गंभीर संक्रमण (इंफेक्शन) से जूझ रहे थे. पीयूष पांडे ने ‘हमारा बजाज’, ‘फेविकॉल का जोड़’, ‘कैडबरी का कुछ खास है’, ‘दो बूंद जिंदगी की’ पोलियो अभियान और ‘अबकी बार मोदी सरकार’ जैसे आइकॉनिक विज्ञापनों से भारतीय विज्ञापन को नई पहचान दी. उनकी आवाज, सोच और भारतीय अंदाज ने आधुनिक भारतीय विज्ञापन की दिशा तय की। पीयूष पांडेय, ओगिलवी के वर्ल्डवाइड चीफ क्रिएटिव ऑफिसर और इंडिया के एग्जिक्यूटिव चेयरमैन थे। ग्लोबल ऐडवर्टाइजिंग इंडस्ट्री में वह जाना-माना नाम थे। उन्हें एलआईए लेजेंड अवॉर्ड (2024) और पद्म श्री (2016) सहित कई सम्मान मिल चुके थे।
पीयूष पांडेय को भारतीय विज्ञापन जगत में एक अलग और खास आवाज देने के लिए जाना जाता था। उन्होंने इंडस्ट्री को पश्चिमी अंदाज से दूर कर देश की भाषा, संस्कृति और भावना से जोड़ने का काम किया।
5 अगस्त 1988 का दिन था. पूरा देश आजादी की वर्षगांठ हर्षोल्लास के साथ मना रहा था. ये वो दौर था जब मनोरंजन के साधन सीमित थे. दूरदर्शन ही वो जरिया था जहां से मनोरंजन की डोज हमें मिलती थी. उस पर आने वाली फिल्में, समाचार, गीत और यहां तक कि विज्ञापन भी कुछ खास मायने रखते थे. इस दिन प्रधानमंत्री का संबोधन खत्म होने के बाद दूरदर्शन पर राष्ट्रीय एकता के एक गीत ने दस्तक दी. इसके बोल, इसमें नजर आने वाली हस्तियां और पूरा माहौल बेमिसाल था. संगीत, खेल और सिनेमा जगत समेत कई क्षेत्रों की नामचीन हस्तियों को इस अंदाज में देखना नया अनुभव था. यह गीत कुछ इस तरह से जेहन में उतरा कि देश की धड़कन बन गया. इसके शब्द हर किसी की जुबां पर चढ़ गए. इस गीत के मायने इतने गहरे थे कि आज भी प्रासंगिक हैं. हम बात कर रहे हैं विविधता में एकता की मिसाल समेटे ‘मिले सुर मेरा तुम्हारा’ गीत की. इस मशहूर गीत को लिखा था पीयूष पांडे ने और इसका म्यूजिक कंपोज किया था पंडित भीमसेन जोशी और अशोक पटकी ने.
ये गीत आज भी लोगों के मन में भारतीयता के तार झनझना देता है…
‘मिले सुर मेरा तुम्हारा’ के बोल…
मिले सुर मेरा तुम्हारा तो सुर बने हमारा
सुर की नदियाँ हर दिशा से बहते सागर में मिलें
बादलों का रूप ले कर बरसे हल्के हल्के
मिले सुर मेरा तुम्हारा तो सुर बने हमारा
मिले सुर मेरा तुम्हारा …
मिले सुर मेरा तुम्हारा …
इस गीत को 14 भारतीय भाषाओं हिंदी, असमी, तमिल, तेलुगू, कश्मीरी, पंजाबी, सिन्धी, उर्दू, कन्नड़, मलयालम, बांग्ला, ओडिया, गुजराती और मराठी में गाया था. इसमें अमिताभ बच्चन, जितेंद्र, मिथुन चक्रवर्ती, हेमा मालिनी, तनूजा समेत कई सिनेमा जगत की कई हस्तियां इस गीत में नजर आईं. उनके अलावा खिलाड़ियों में सुनील गावस्कर, पीटी उषा, कपिल देव, प्रकाश पादुकोण और मिल्खा सिंह जैसे कई दिग्गज दिखे. पहली बार राष्ट्रीय एकता के संदेश को इस खूबसूरती के साथ पिरोया गया था.
राजस्थान के जयपुर में जन्मे पीयूष पांडे बचपन से ही रचनात्मक सोच के लिए जाने जाते थे. उनके घर का माहौल कलात्मक था उनके भाई प्रसून पांडे फिल्म निर्देशक बने और दोनों ने मिलकर रेडियो जिंगल्स में अपनी आवाज दी. ओगिल्वी इंडिया से 1982 में जुड़ने से पहले, पीयूष क्रिकेट खेलते थे लेकिन असली पहचान उन्हें विज्ञापन की दुनिया में मिली, जहां उन्होंने हर विज्ञापन में भारतीयता और भावनाओं को जगह दी. पीयूष पांडे का जन्म 1955 में जयपुर में हुआ था और उनके परिवार में नौ बच्चे थे – सात बेटियाँ और दो बेटे। उनके भाई-बहनों में फिल्म निर्देशक प्रसून पांडे और गायिका-अभिनेत्री इला अरुण शामिल हैं । उनके पिता राजस्थान राज्य सहकारी बैंक में काम करते थे। उन्होंने राजस्थान राज्य के लिए रणजी ट्रॉफी खेली। उन्होंने चाय चखने का काम भी किया। पीयुष पांडे ने जयपुर के सेंट जेवियर्स स्कूल से पढ़ाई की और दिल्ली के सेंट स्टीफंस कॉलेज से इतिहास में स्नातकोत्तर की उपाधि प्राप्त की । उनका विवाह नीता पांडे से हुआ था।
पीयूष पांडे कुल 9 भाई-बहन थे, 7 बहनें और 2 भाई।
जब उन्होंने करियर की शुरुआत की, तब विज्ञापन जगत में अंग्रेज़ी और पश्चिमी स्टाइल का बोलबाला था. लेकिन पीयूष पांडे ने इस ढर्रे को तोड़ दिया. उन्होंने ऐसे विज्ञापन बनाए जो आम भारतीय की ज़ुबान में बात करते थे. उनके यादगार प्रोजेक्ट्स में शामिल हैं एशियन पेंट्स का हर खुशी में रंग लाए, कैडबरी का कुछ ख़ास है, फेविकोल का मजेदार एग एड, और हच का प्यारा व्हेयरएवर यू गो, आवर नेटवर्क फॉलोज वाला पग विज्ञापन. ये सिर्फ विज्ञापन नहीं, लोगों की भावनाओं और यादों का हिस्सा बन गए.
विज्ञापन के क्षेत्र में उनका सफर वर्ष 1982 में शुरू हुआ, जब उन्होंने ओगिलवी में क्लाइंट सर्विसिंग एग्जिक्यूटिव के रूप में काम शुरू किया। उनके शुरुआती प्रोजेक्ट्स में से एक था डिटर्जेंट ब्रैंड सनलाइट। छह साल में ही वह क्रिएटिव डिपार्टमेंट में आ गए, जहां उनकी कहानी कहने की कला ने सभी को मंत्रमुग्ध किया। इसके बाद उन्होंने लुमो, फेविकोल, कैडबरी और एशियन पेंट्स जैसे ब्रैंड्स के लिए यादगार कैंपेन बनाए।
पीयूष पांडेय के विज्ञापन हमेशा सादगी, भावना और भारतीय संस्कृति का मिश्रण दिखाते थे।
उनके प्रसिद्ध कामों में शामिल हैं-
फेविक्विक और फेविकोल: ‘तोड़ो नहीं, जोड़ो’, फेविकोल सोफा, और ‘बस फंस गया फेविकोल में’ वाला विज्ञापन
पॉंड्स–’गूगली वूगली वूश!!’
कैडबरी डेयरी मिल्क–’कुछ खास है’
वोडाफोन–जूजू
एशियन पेंट्स–’हर घर कुछ कहता है’
बजाज–’हमारा बजाज’
एयरटेल–’हर एक फ्रेंड जरूरी होता है’
राजनीतिक विज्ञापन, जैसे बीजेपी का 2014 का अभियान ‘अबकी बार मोदी सरकार’
अमिताभ बच्चन के साथ पोलियो अभियान ।
पीयूष पांडे को केवल एक विज्ञापन विशेषज्ञ के रूप में ही नहीं बल्कि ऐसी शख्सियत के रूप में याद किया जाएगा, जिन्होंने भारतीय विज्ञापन को उसकी अपनी भाषा और आत्मा दी. भाजपा को ‘अबकी बार मोदी सरकार’ का नारा उन्होंने ही दिया था. इतना ही नहीं, मिले सुर मेरा तुम्हारा से भी वह जुड़े थे.भारतीय विज्ञापन जगत में उन्हें महान कहा जाता है. उन्हें पद्मश्री से नवाजा जा चुका था.
पीयूष पांडे का जन्म 1955 में जयपुर में हुआ था. उनके परिवार में नौ बच्चे थे, जिनमें सात बहनें और दो भाई शामिल थे. उनके भाई प्रसून पांडे फिल्म निर्देशक हैं, जबकि बहन ईला अरुण गायिका और अभिनेत्री थीं. उनके पिता राजस्थान राज्य सहकारी बैंक में कार्यरत थे. उन्होंने दिल्ली के सेंट स्टीफंस कॉलेज से इतिहास में स्नातकोत्तर की डिग्री हासिल की और 1982 में विज्ञापन जगत में कदम रखा और ओगिल्वी इंडिया में क्लाइंट सर्विसिंग एक्जीक्यूटिव के रूप में शामिल हुए.
उनका पहला प्रिंट विज्ञापन सनलाइट डिटर्जेंट के लिए लिखा गया. छह साल बाद वे क्रिएटिव विभाग में आए और लूना मोपेड, फेविकोल, कैडबरी और एशियन पेंट्स जैसे ब्रांड्स के लिए कई प्रसिद्ध विज्ञापन बनाए। इसके बाद उन्हें क्रिएटिव डायरेक्टर और फिर राष्ट्रीय क्रिएटिव डायरेक्टर बनाया गया. 1994 में उन्हें ओगिल्वी इंडिया के निदेशक मंडल में भी स्थान मिला. उनके नेतृत्व में ओगिल्वी इंडिया ने लगातार 12 वर्षों तक भारत की नंबर 1 एजेंसी का दर्जा हासिल किया.
पीयूष पांडे द्वारा बनाए गए विज्ञापन आज भी लोगों की यादों में बसे हुए हैं. उन्होंने एशियन पेंट्स के लिए ‘हर खुशी में रंग लाए,’ कैडबरी के लिए ‘कुछ खास है,’ फेविकोल के लिए आइकॉनिक ‘एग’ विज्ञापन और हच के पग वाले विज्ञापन जैसी रचनाएं तैयार कीं. इसके अलावा, उन्होंने 2014 में भारतीय जनता पार्टी के लिए चुनावी नारा ‘अबकी बार, मोदी सरकार’ दिया. उनका योगदान केवल व्यावसायिक विज्ञापन तक सीमित नहीं था. उन्होंने राष्ट्रीय एकता गीत ‘मिले सुर मेरा तुम्हारा’ लिखा और कई सामाजिक अभियान जैसे पोलियो जागरूकता और धूम्रपान विरोधी अभियानों में भी सक्रिय भूमिका निभाई.
पीयूष पांडे को उनके योगदान के लिए कई पुरस्कारों से सम्मानित किया गया. उन्हें 2016 में पद्म श्री से नवाजा गया और 2024 में एलआईए लीजेंड अवार्ड दिया गया. इसके अलावा, उन्हें क्लियो लाइफटाइम अचीवमेंट अवार्ड, मीडिया एशिया अवार्ड्स और कान्स लायंस में कई प्रतिष्ठित पुरस्कार भी मिल चुके हैं. उनके नेतृत्व में ओगिल्वी इंडिया को वैश्विक स्तर पर सबसे रचनात्मक कार्यालयों में से एक माना गया. उनकी रचनात्मकता, सहजता और भारतीय विज्ञापन को दी गई दिशा उन्हें हमेशा यादगार बनाएगी.
वर्ष 1975 में नई दिल्ली की एक व्यस्त सड़क पर, प्रद्युम्न कुमार महानंदिया, जिन्हें लोग प्यार से ‘पीके’ कहते थे, अपना जीवन यापन करने के लिए राहगीरों के चित्र बनाते थे। वह कोई साधारण कलाकार नहीं थे, बल्कि उनकी उंगलियों में एक जादू था और उनकी आँखों में एक ऐसे व्यक्ति की कहानी थी जो भारतीय समाज में उडीसा की एक पिछड़ी आदिवासी जनजाति से संबंध रखता था, फिर भी जीवन में पिछड़े रहने से इनकार करता था।
एक दिन वह प्रतिदिन की तरह किसी का चित्र बना रहे थे तभी उनके सामने सुनहरे बालों और नीली आँखों वाली एक विदेशी लड़की रुकी। वह चार्लोट वॉन शेडविन थीं, जो एक स्वीडन के एक कुलीन परिवार से थीं और भारत की आध्यात्मिक यात्रा पर आई हुईं थीं। उन्होंने एक ऐसे कलाकार के बारे में सुना था जो जीवित लोगों के चित्र बनाता था और इसलिए उन्होंने उनके सामने बैठने और अपना चित्र बनवाने का फैसला किया।
जैसे-जैसे पीके रेखाएँ बनाते गए, उनके बीच एक और प्रकार की रेखाएँ बनने लगीं। एक नज़र, फिर एक मुस्कान, फिर एक शर्माती हुई बातचीत, और एक ऐसा प्यार जो एक ड्राइंग शीट पर कोयले की राख से पैदा हुआ था। जो हुआ उसमें कोई तर्क नहीं था, लेकिन वह सच्चा था। कुछ ही हफ्तों में, उन्होंने खुले आसमान के नीचे और पेड़ों की पत्तियों के नीचे भारतीय परंपराओं के अनुसार शादी कर ली।
लेकिन यह खुशी स्थायी नहीं थी, क्योंकि चार्लोट के लिए अपनी शिक्षा पूरी करने के लिए स्वीडन लौटने का समय हो गया। उन्होंने पीके से साथ चलने का प्रस्ताव रखा और उन्हें एक हवाई टिकट खरीदने की पेशकश की। लेकिन पीके ने विनम्रता से इनकार कर दिया और कहा: “मैं अपने तरीके से तुम्हारे पास आऊँगा…तुम मेरा इंतज़ार करना।”
उसके बाद उन्होंने जो किया, वह सिर्फ एक वादा नहीं, बल्कि एक किंवदंती बनी जो इतिहास में दर्ज है।
1978 की शुरुआत में, पीके ने अपने परिवार और दोस्तों को अलविदा कहा, अपना सबकुछ बेचकर एक पुरानी साइकिल खरीदा, जिसपर एक छोटा बैग बाँधा और नई दिल्ली से स्वीडन तक की अपने जीवन की यात्रा पर निकल पड़े। जी हाँ, एक पुरानी साइकिल पर!
वह पाकिस्तान, अफगानिस्तान, ईरान, तुर्की, यूगोस्लाविया, जर्मनी, और फिर डेनमार्क से होते हुए खतरनाक रास्तों से गुज़रे… उनके पास कोई डिजिटल नक्शा नहीं था, कोई फोन नहीं था, बस, प्यार, विश्वास और कागज पर लिखे पते थे। वह कभी-कभी सड़कों पर सोते थे, कभी-कभी दान में मिले भोजन से खाते थे, और जारी रखने के लिए पर्याप्त पैसा कमाने के लिए राहगीरों के चित्र बनाते थे, लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी।
चार महीने और 7000 किलोमीटर की यात्रा के बाद वह आखिरकार अपनी मंजिल पर पहुँच गए… और जब उन्होंने चार्लोट के घर का दरवाज़ा खटखटाया, तो वहाँ कोई शब्द नहीं थे… सिर्फ आँसू थे।चार्लोट ने उनका स्वागत किया जैसा कि उन्होंने वादा किया था और उनके जीवन का एक नया अध्याय शुरू हुआ। आधिकारिक तौर पर शादी करके वह स्वीडन में रहने लगे, जहाँ उनके बच्चे हुए और उनका प्यार आज भी जारी है।
जहाँ तक पीके की बात है, वह एक सम्मानित कलाकार और स्वीडिश समाज के सदस्य बन गए और उनकी कहानी को अब आधुनिक इतिहास में सबसे महान प्रेम और चुनौती की कहानियों में से एक के रूप में बताया जाता है।
यह कोई काल्पनिक कहानी नहीं है। यह एक सच्ची कहानी है जो हमें एक बात बताती है: जब दिल सच्चा होता है और प्यार असली होता है… तो एक साइकिल महाद्वीपों को पार कर सकती है और एक सपना वफादारी से भरा रास्ता बन सकता है। पीके स्वीडिश सरकार के कला एवं संस्कृति विभाग के सलाहकार हैं।
सर्व धर्म समभाव वाली रही अयोध्या
अयोध्या सप्तपुरियों में एक है। हिंदू, , सिख, जैन, बौद्ध कौन इस पर नहीं रीझा। सिखों का पवित्र ब्रह्मकुंड यही पर है। जैन धर्म के छह तीर्थांकरों की जन्मभूमि भी यहीं है। बौद्ध दार्शनिक अश्वघोष यहीं पैदा हुए थे। महात्मा बुद्ध ने कई चतुर्मास यहां व्यतीत किए थे। पतित पावनी मां सरयू और उनके पावन घाट की छटा ही निराली है। यही पर रामजन्मभूमि है, हनुमानगढ़ी है, कनक भवन है, दशरथ महल है, अशर्फी भवन है। मणि पर्वत, कुबेर टीला, सुग्रीव किला और मत गयन्द का स्थान आदि प्रमुख स्थान हैं। अपने धार्मिक महत्व के अलावा, अयोध्या एक महत्वपूर्ण ऐतिहासिक और सांस्कृतिक मूल्य वाला शहर है। शहर ने विभिन्न सभ्यताओं को उभरते और गिरते देखा है, जो वास्तुकला और परंपराओं पर अपनी छाप छोड़ते हैं। गुप्त काल के प्राचीन खंडहरों से लेकर अवध के नवाबों द्वारा निर्मित सुंदर मंदिरों और अन्य धर्मस्थलों तक।अयोध्या भारत के समृद्ध और विविध अतीत का उदाहरण है। न जाने कितने ऐसे स्थल है जों अपने में सदियों का इतिहास समेटे हुए है। भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण की सूची में एक साथ तीन स्मारकों को दर्ज किया गया है जिसमें पहला मणि पर्वत, दूसरा कुबेर पर्वत व तीसरा सुग्रीव पर्वत है। तीनों को सरकारी नियंत्रण से मुक्त करने की प्रक्रिया चल रही है जिससे इन मंदिरों के आसपास समुचित पर्यटन का विकास हो सके और कोई वैधानिक अड़चन ना आने पाए।
बदल गया है मणि पर्वत का स्वरूप
अयोध्या धाम जंक्शन से 3 किमी की दूरी पर, मणि पर्वत अयोध्या के कामीगंज मोहल्ले में स्थित एक छोटी पहाड़ी है। इस टीले या पहाड़ी को मणि पर्वत के नाम से जाना जाता है। मणि पर्वत एक पौराणिक तीर्थ है। जो एडवर्ड तीर्थ विवेचनी सभा, जिसने 1902 में अयोध्या के 148 तीर्थ स्थलों को चिन्हित किया था, जिसकी सूची में क्रम संख्या 52 पर इसे दर्ज कर रखा है। मणि पर्वत सुग्रीव किला (पर्वत) नामक एक अन्य पहाड़ी के करीब ही स्थित है। जो एडवर्ड तीर्थ विवेचनी सभा, जिसने 1902 में अयोध्या के 148 तीर्थ स्थलों को चिन्हित किया था, जिसे सूची में क्रम संख्या 13 पर इसे दर्ज कर रखा है। उस समय कम आबादी के कारण ये दोनों स्थान बहुत दूर नहीं थे। गणेश कुंड, अयोध्या में मणि पर्वत के दक्षिण में स्थित एक पौराणिक तीर्थ है। एडवर्ड तीर्थ विवेचनी सभा, जिसने 1902 में अयोध्या के 148 तीर्थ स्थलों को चिन्हित किया था, की सूची में क्रम संख्या 59 पर इसे दर्ज कर रखा है। यहां भी अनेक नई संरचनाएं बनती देखी जा सकती हैं।
मणि पर्वत है एक एतिहासिक धरोहर
यह 80 फिट ऊंचा मणि पर्वत ऐतिहासिक धरोहर है। जिसकी सुरक्षा और संरक्षण भारत सरकार द्वारा संचालित पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग द्वारा किया जाता है। इस क्षेत्र के 100 मीटर के परिधि के आसपास खुदाई या निर्माण कार्य भारत सरकार के द्वारा प्रतिबंधित किया गया है। यहां लाखों श्रद्धालु दर्शन के लिए आते हैं लेकिन इस जर्जर टीले की मिट्टी बरसात के दिनों में धसकने और उसके कारण दुर्घटना की आशंका बनी रहती है। इस स्मारक का छत संरक्षण के अभाव में टूटा फूटा है और कटीले तार से प्रतिबंधित किया गया है। मन्दिर को और सुरक्षित बनाने के उद्देश्य से इस संरक्षित स्मारक को जिला प्रशासन की ओर से निर्माण वर्जित किया गया है। जिला प्रशासन ने भी मणि पर्वत को संरक्षित स्मारक की सूची से बाहर करने की अपनी संस्तुति भी पहले से दे रखी है।
मणिपर्वत का है पौराणिक महत्त्व
मणिपर्वत को भी त्रेतायुगीन माना जाता है। इसका इतिहास रुद्रयामल और सत्योपाख्यान में वर्णित है। उसके अनुसार भगवान राम जब शादी के लिए जनकपुर गए थे, तब कैैकेई मां ने कनक भवन बनवाने का हठ किया था। कैकेई ने कनक महल जानकी को उपहार में दे दिया था। उसने इंद्राणि से मिली मणि भगवान राम को दे दी। लेकिन राम या उनके अन्य किसी भाई ने इस मणि को धारण नहीं किया। बाद में यह मणि जानकी के चरणों में अर्पित कर दी गयी। मणि का जोड़ा न होने के कारण भगवान राम ने इसे ग्रहण नहीं किये थे। बाद में जानकी की इच्छा पूर्ति के लिए जनकपुर के राजा ने यहां मणियों का अंबार लगा दिया था । राजा जनक ने इसे पुत्री का धन मानते हुए अयोध्या भेज दिये थे । यही मणियां अयोध्या के रामकोट के दक्षिण दिशा में रख दी गईं। जो एक योजन ऊंचे पहाड़ जैसी बन गयीं। यही वर्तमान समय का मणिपर्वत कहलाता है। धीरे धीरे पहाड़ घिस कर छोटा होता गया।
जनक द्वारा दिया गया था
अकूत मात्रा में सोना
इस क्षेत्र में कई किंवदंतियाँ प्रचलित हैं जो मणि पर्वत की उत्पत्ति का वर्णन करती हैं।
इसका इतिहास त्रेतायुग के समय का है. वहां पर एक जनौरा नाम का गांव था जहां पर महाराज जनक ने निवास किया था. उस जगह को जनकौरा भी कहा जाता है क्योंकि महाराज जनक ने यहां पर कौर (भोजन) खाया था.उसी के उपहार स्वरूप महाराज जनक ने राजा दशरथ को बहुत सी मणियां भेंट की थीं. कुछ लोगों का यह भी मानना है कि देवी सीता के पिता राजा जनक ने भगवान राम से विवाह करने पर सीता को बहुत सारा सोना और जवाहरात उपहार में दिए थे। यद्यपि राजा दशरथ सीता के साथ मिले धन के लालची नहीं थे और उन्होंने आदेश दिया कि इसे रामकोट के दक्षिण दिशा में विद्या कुंड के पास रखवा दिया था. मणि इतनी ज्यादा थीं कि वहां मणियों का धीरे-धीरे पहाड़ बन गया. आज उसी प्राचीन धरोहर को लोग मणि पर्वत के नाम से जानते हैं. रत्नों की मात्रा इतनी अधिक थी कि वे एक पहाड़ी की शक्ल में बदल गए और इस पहाड़ी को मणि पर्वत के रूप में जाना जाने लगा। मणि एक ऐसी धातु है जो अपने आप में विलक्षण है अपने आप में प्रकाशमान है।
सावन महीने में होता है
मणिपर्वत पर भव्य आयोजन
एसी मान्यता है कि इसी मणि पर्वत पर भगवान राम ने माता सीता के साथ सावन महीने में तृतीया तिथि के दिन झूला झूलते थे। त्रेतायुग की यह परंपरा आज भी कलयुग मे चलती आ रही है। मणि पर्वत पर भगवान झूला झूलते हैं तो वहीं हजारों की संख्या में श्रद्धालु मंदिरों में झूला उत्सव का आनंद लेते हैं, पूजा अर्चन व दर्शन करते हैं। वे अपने जीवन को सफल बनाने के लिए कामना करते हैं।
यही से शुरू होता है सावन मेला
राम जन्मभूमि से एक किलो दूर मणि पर्वत पर सावन मेला आयोजित किया जाता है। रामनगरी का बहुप्रतीक्षित सावन झूला मेला का श्रीगणेश मणिपर्वत के झूलनोत्सव से ही होता है। इस अवसर पर यहां प्रतिष्ठित कनक भवन, दशरथ राज- महल, बड़ा स्थान, रंगमहल, रामवल्लभा- कुंज, मणिराम छावनी, राम हर्षण कुंज, जानकी महल, हनुमत निवास, सद्गुरु सदन, विहुति भवन व रामसखी मंदिर सहित दर्जनों मंदिरों में विराजमान भगवान को यहां शोभायात्रा के रूप में लाकर झूले पर झुलाया जाता है और सांस्कृतिक कार्यक्रम का आयोजन होता है। इस दौरान लाखों श्रद्धालु दर्शन के लिए आते हैं और मणि पर्वत पर स्थित मंदिर में दर्शन करते हैं। आज भी अयोध्या और आसपास के गाँवों में मणिपर्वत से जुड़े लोकगीत महिलाओं द्वारा गए जाते हैं। इन्हीं में से एक लोकगीत के बोल हैं –
“झलुआ पड़ा मणि पर्वत पय।
हम सखि झूलय जाबय ना।”
अर्थात ‘मणिपर्वत पर झूला पड़ा है और मैं अपनी सहेलियों के साथ वहाँ झूलने जाऊँगी।’ इसे इस लिंक से और आसानी से देखा जा सकता है –
त्रेता में था मणियों का पहाड़
धार्मिक ग्रंथों में मान्यता है कि भगवान राम जब विवाह के उपरांत माता सीता को अयोध्या लेकर आए थे, तब महाराज जनक ने महाराज दशरथ को उपहार स्वरूप मणियों की श्रृंखला उन्हें भेट की थी, जिसको राजा दशरथ ने विद्या कुंड के पास रखवा दिया था। मणि इतनी ज्यादा थीं कि वहां मणियों का धीरे-धीरे पहाड़ बन गया था। इसलिए इस टीले को आज भी मणि पर्वत के नाम से जाना जाता है।
पौराणिक मान्यताओं के अनुसार मणि पर्वत पर भगवान राम ने माता सीता के साथ श्रावण मास में तृतीया तिथि (हरियाली तीज) के दिन झूला झूले थे। त्रेतायुग की यह परंपरा कलयुग में भी चली आ रही है।
एक अन्य संदर्भ में कहा गया है कि माता सीता ने एक बार प्रभु श्री राम से आग्रह किया कि वे उन्हें एक ऐसी जगह प्रदान करें जहाँ वे अपनी सखियों (सहेलियों) के साथ घूम सकें। बदले में, श्री राम ने गरुड़ से वैकुंठ पर्वत से एक पहाड़ी का एक हिस्सा लाने के लिए कहा। अपने गुरु के आदेश के अनुसार, गरुड़ वैकुंठ पर्वत से एक छोटी पहाड़ी लाए और उसे अयोध्या में रख दिया। इस पहाड़ी का उपयोग तब राजा जनक द्वारा सीता को उपहार में दिए गए सभी रत्नों को रखने के लिए किया गया था और इसे मणि (गहने) पर्वत (पहाड़ी) के रूप में जाना जाने लगा। यह स्थान सीता देवी की रुचि की बताई जाती है।
मणिपर्वत सीता देवी का रत्नपर्वत है
मणि पर्वत (एडवर्ड तीर्थ विवेचनी सभा सूची क्रम संख्या 58 पर दर्ज) का निर्माण जनकपुर में सीता देवी के आशीर्वाद से प्राप्त मणियों से हुआ था। सीताकुंड (एडवर्ड तीर्थ विवेचनी सभा क्रम संख्या 52 पर दर्ज)मणि पर्वत के पास ही अवस्थित है। जहां सीता जी स्नान किया करती थी। यह भी कहा जाता है कि भगवान राम को सीता देवी से विवाह के बाद रानी कैकेयी ने कुछ मणियाँ भेंट की थीं, लेकिन वे भी अप्रत्यक्ष रूप से सीता देवी तक पहुँच गईं। भगवान राम की सनातन पत्नी होने के नाते, भगवान राम की पूजा में सीता देवी का आशीर्वाद महत्वपूर्ण है। मणि पर्वत हमें सदैव सीता देवी और सभी जीवों पर उनकी कृपा की याद दिलाता है।
स्कंद पुराण में मणि पर्वत को महा रत्न तीर्थ के रूप में महिमा पंडित किया गया है। इस स्थान पर स्नान करने से महान आध्यात्मिक लाभ मिलता है। पवित्र पौराणिक तिलोदकी नदी मणि पर्वत के पास से ही गुजराती है।तिलोदकी नदी, जिसे प्राचीन तिलोदकी गंगा, त्रिलोचना या तिलैया गंगा भी कहा जाता है, अयोध्या में स्थित एक पौराणिक नदी है। यह ऋषि रमणक की तपोभूमि से निकली है, इसका उद्गम स्थल सोहावल के पास पंडितपुर गांव में ऋषि रमणक की तपस्थली को माना जाता है। लोक मान्यता के अनुसार, ऋषि रमणक की तपस्या से इस नदी का आविर्भाव हुआ था। कुछ मान्यताओं के अनुसार, राजा राम ने सिंधु देश के घोड़ों के पानी पीने के लिए इसका निर्माण कराया था। यह नदी लगभग 25 किलोमीटर लंबी है, और सरयू नदी में मिलती है। नदी के कई हिस्से लुप्त हो गए थे, लेकिन वर्तमान में इसके पुनरुद्धार का काम तेजी से चल रहा है।
भगवान बुद्ध से भी जुड़ा हुआ है
ये स्थान
भगवान बुद्ध की प्रमुख उपासिका विशाखा ने बुद्ध के सानिध्य में अयोध्या में धम्म की दीक्षा यही पर ली थी। इसी के स्मृति स्वरूप में विशाखा ने अयोध्या में मणि पर्वत के समीप बौद्ध विहार की स्थापना करवाई थी। यह भी कहते हैं कि बुद्ध के महा परिनिर्वाण के बाद इसी विहार में बुद्ध के दांत रखे गए थे। पौराणिक कथाओं के अनुसार, भगवान बुद्ध ने अयोध्या में अपने छह साल के प्रवास के दौरान मणि पर्वत से धर्म के नियम के बारे में अपने उपदेश दिए थे। इस पहाड़ी पर सम्राट अशोक द्वारा निर्मित एक स्तूप और एक बौद्ध मठ भी है।
सनातन धर्म की महत्ता के कारण बुद्ध ने भी इस स्थान को महत्व दिया था और बाद में मुस्लिम आक्रांताओं ने भी अपने- अपने धर्म स्थल यहां बनाए हैं।
मणि पर्वत का सौंदर्यीकरण
सन् 1902 में अयोध्या धाम के ऐतिहासिक और पौराणिक स्थलों की सुरक्षा एवं संरक्षण के लिये एडवर्ड तीर्थ विवेचनी सभा का गठन किया गया था, जिसने अयोध्या के 148 जगहों को चिह्नित कर उन पर एडवर्ड तीर्थ विवेचनी के पत्थर लगाए थे, ताकि भविष्य में इन धरोहरों को संरक्षित किया जा सके।
उल्लेखनीय है कि वर्ष 1998-99 में उत्तर प्रदेश पर्यटन विभाग ने मणि पर्वत के सौंदर्यीकरण के लिये 88 लाख रुपए के प्रस्तावों को मंज़ूरी दी थी, जिसके अंतर्गत रामकथा पार्क के लोकार्पण के साथ मणि पर्वत की सौंदर्यीकरण योजना का शिलान्यास तत्कालीन मुख्यमंत्री कल्याण सिंह ने किया था, किंतु इस योजना पर काम नहीं हो सका और पर्यटन विभाग ने योजना की आवंटित धनराशि सरेंडर कर दिया।
मणि पर्वत की पौराणिकता को संरक्षित करने के लिये पुरातत्व विभाग द्वारा 45 लाख रुपए आंबटित किये गए हैं। जीर्णोद्धार के पहले चरण में मणि पर्वत के गर्भगृह तक पहुँचाने वाली सीढ़ियों का मिर्ज़ापुर के लाल पत्थरों से नवीनीकरण किया गया है। दूसरे चरण में मंदिर के मुख्य द्वार से लेकर अन्य परिसरों की मरम्मत कब की जाएगी या नहीं की जाएगी ? इसका कोई अनुमान नहीं है।
मणिपर्वत पर भयंकर
जेहादी अतिक्रमण :-
इस लिंक से इतने महत्वपूर्ण स्थल का भूगोल बदलने की पूरी तैयारी षडयंत्र के रूप में काफी दिनों से हो रही है –
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तीन तरफ दरगाहों से घिर चुका है
यह पौराणिक स्थल
मणि पर्वत की चोटी के तीन तरफ दरगाहें, मजारे, और मस्जिदें दिनोबदिन बनती जा रही हैं। प्रतीत होता है श्री राम जन्म भूमि मामले में मात खाने के भय की प्रतिपूर्ति के लिए ये समाज काफी समय पूर्व से ही प्रयासरत हो गया था। उन्हें लग रहा था की एक न एक दिन उनका कमजोर पक्ष उन्हें दूर खड़ा कर देगा और भी अयोध्या में अपनी पकड़ कमजोर कर देंगे। इसी की पूर्ति के लिए कई सौ साल पहले से ही यहां लैंड जेहाद के नाम पर धार्मिक संरचनाएं मनमाने तरीके से बनाई जाने लगी हैं। वहां एक वर्ग विशेष के धार्मिक कार्यक्रम किए जाने लगे और लोगों को मन्नते और दुआएं देने का सिलसिला शुरू कर दिया गया। आम लोग उनके कार्यक्रम से जुड़ते गए उन्हें तत्काल लाभ भी मिला होगा और वे किसी तरह का विरोध भी नहीं कर सके। सरकारी तंत्र भी अयोध्या नगरी के मुख्य राम जन्मभूमि तथा आस पास के कुछ खास स्थानों तक ही अपनी पहुंच बना पाया । मणि पर्वत क्षेत्र यह एकांत और निर्जन में होने के नाते प्रशासन की पहुंच से दूर हटता गया। यद्यपि वह कागज में एक राष्ट्रीय संरक्षित धरोहर है लेकिन मौके पर उसका कुछ और ही नजारा देखा जा सकता है।
मणि पर्वत दरगाहों के निर्माण और दीवारों पर पेंट को देखकर आसानी से अंदाजा लगाया जा सकता था कि ये इमारतें हाल ही में बनी हैं। इसके अलावा, हम देख सकते हैं कि कई नई कब्रों और दरगाहों का निर्माण भी चलता रहता है, जहां आस- पास की कई प्राचीन इमारतों पर कंक्रीट की कब्रें भी देखीं जा सकती हैं।
1.दक्षिण में हज़रत शीश अलैहिस्सलाम की दरगाह
हज़रत शीश अलैहिस्सलाम दरगाह मणि पर्वत में मंदिर के दक्षिणी किनारे पर स्थित है। हजरत आदम ने 1050 साल की लंबी उम्र पाई थी। करीब सौ वर्ष वहां गुजारने के बाद वे परिवार सहित अयोध्या की पवित्र धरती पर पहुंचे और यहां करीब नौ सौ साल तक रहे। आदमियत के प्रचार- प्रसार के सिलसिले में उनका अंतिम समय तो अरब देशों में गुजरा, पर उनके पुत्र और दूसरे पैगंबर अयोध्या के ही होकर रहे और यहीं वे पर्दानशीं भी हुए। मणिपर्वत के पृष्ठ में हजरत शीश की मजार आज भी है। यह मजार छह गज लंबी है। इस्लामिक आख्यानों के अनुसार हजरत शीश 70 गज के थे और उनकी मजार भी इतनी ही लंबी थी। इस स्थान को प्राचीन दर्शाने के लिए हजरत शीश का समीकरण श्रीराम के पूर्वज और अयोध्या के अनादिकालीन राजा इक्ष्वाकु से स्थापित किया जाता है।
यह दरगाह इस पवित्र स्थल से सरकार द्वारा प्रतिबंधित सौ मीटर से भी कम दूरी पर है।यह स्थान मणि पर्वत मंदिर की चारदीवारी से लगभग सटा हुआ है। इसके अलावा मुख्य सड़क पर दरगाह का नाम और दिशा- निर्देश वाला साइनबोर्ड भी देखा जा सकता है।
बाउंड्री में आधे दर्जन से अधिक मजार
इन कब्रों पर हजरत बाबा जलील नक्शबंदी, नजीरुद्दीन कादरी , बगदादी की मजार, ईरान की राज कुमारी हजरत बीवी सैयदा जाहिदा की मजार, हजरत शीश मजार, हजरत शीश की बेगम और उनके बच्चों आदि के नाम खुदे हुए हैं।
यह भी प्रतीत होता कि अरब देश का पैसा और मार्ग निर्देशन भी यहां के लोगों को मिल रहा है।
2.हज़रत शीश की दरगाह को
प्राचीन संरचना कहा जा रहा है :-
मध्यकालीन इस दरगाह को सृष्टि के निर्माण के समय से ही जोड़ा जा रहा है। हज़रत शीश अपने पैगम्बर हज़रत आदम के तीसरे बेटे और मानव जाति के पहले इंसान हैं। हज़रत शीश की ऊंचाई सत्तर गज (210 फीट) थी जो मणि पर्वत से भी ढाई गुना बड़ा कहा जा रहा है। हजरत शीश की कब्र मणि पर्वत जितनी पुरानी भी कही जा रही है। दरगाह परिसर में हजरत शीश की पत्नी बीबी हुरैमा, उनके पांच बेटों और हजरत शीश की मुरीद ईरान की शाहजादी बीबी जाहिदी की भी मजार है।
3.पूरब में कोतवाल बाबा की दरगाह
मणिपर्वत के पूर्वी इलाके में एक और दरगाह बनी है । यह दरगाह एक पेड़ को ढँककर बनाई गई थी। उन्होंने एक ऊँचा चबूतरा बनाया था और उस पर कंक्रीट की कब्र रखी थी। कोतवाल बाबा की दरगाह नाम दिया गया था। कोतवाल बाबा एक भूतपूर्व पुलिस अधिकारी थे, जो अयोध्या कोतवाली में तैनात थे। ये अयोध्या के बड़ी बुवा के आंखों के सौंदर्य पर मोहित हो गए थे। फलस्वरूप बुवा जी ने अपनी आँखें निकाल इन्हें दे दी थी। इससे कोतवाल हैरान रह गया। बड़ी बुआ ने सावधान करते हुए कहा, “याद रखो कि फैज़ाबाद में अब ना कोई आलिम रहेगा ना जालिम।” कहते हैं उसी के बाद फैजाबाद से उजड़ाना शुरू हुआ और नवाब आसफुद्दौला फैजाबाद की जगह नोएडा को अपनी राजधानी बना लिया था यह महसूस करते हुए कि बीबी कोई साधारण महिला नहीं हैं, बल्कि खुदा की सच्ची भक्त हैं, कोतवाल साहब ने बड़ी बीबी के चरणों में गिर गए और दया की भीख माँगी। अजीबो-गरीब सी खामोशी पसरी नजर आई थी। तभी से फैजाबाद को दुर्दिन झेलने को मजबूर होना पड़ा था।
सूफी संत खातून ‘बड़ी बुआ’ की कब्र एवं यतीमखाना और मदरसा बेनीगंज इलाके में आईटीआई के सामने स्थित है । यह आचार्य नरेंद्र नगर रीड गंज के पुराने रेलवे स्टेशन से लगभग 1.12 किलोमीटर दूर है। जो भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के द्वारा संरक्षित भी है।
4. सैयद शाह बाबा
कोतवाल बाबा की दरगाह के बगल में सैयद शाह बाबा नाम से एक और मजार भी बनाई गई है। इस नाम के और मिलते जुलते नाम के अनेक धार्मिक संरचनाएं पूरे देश में देखी जा सकती हैं। मणि पर्वत अयोध्या स्थित इस दरगाह की देखभाल एक मुस्लिम महिला करती है। जो उत्तर प्रदेश सरकार की विधवा पेंशन होल्डर भी है।
5.उत्तरी किनारे शमशुद्दीन शाह बाबा
मणि पर्वत के उत्तरी किनारे पर हज़रत अली सैयद शमशुद्दीन शाह बाबा नामक एक और दरगाह है। यह दरगाह भी एक पेड़ के चारों ओर बनी हुई है। यह दरगाह मणि पर्वत से उतरने वाली सीढ़ियों के नीचे स्थित है। यह एक ऊँचे सीमेंटेड प्लेटफ़ॉर्म पर बनी है और इसे हरे रंग से रंगा गया है। ऊँचे सीमेंटेड प्लेटफ़ॉर्म तक जाने के लिए सीढ़ियाँ हैं।
6.एक और अनाम दरगाह
एक ऊंचे ढांचे पर बने मकबरे को हरे रंग की चादर से ढका गया है। दरगाह हज़रत अली सैयद शमशुद्दीन शाह बाबा के बगल में खुली जगह में एक और दरगाह बनाई गई है। हालाँकि इस विशेष दरगाह का नाम बोर्ड दिखाई नहीं देता है, लेकिन यह अच्छी तरह से बनाए रखा हुआ दिखाई देता है।
7.सैकड़ों पक्की सामूहिक कब्रें
उपरोक्त तीनों दरगाह- शीष, शमशुद्दीन और कोतवाल बाबा के बीच में सैकड़ों कब्रें मौजूद हैं। इन कब्रों पर ऊपर हाल ही में पक्का निर्माण किया गया है। नीचे प्राचीन काल की ईंटें दिखाई देती हैं। पक्की कब्रों पर अरबी भाषा में कुछ लिखा गया है। नव निर्माणों को हरे रंग से कलर किया जा रहा है। पता चला है कि
आज भी वहाँ आसपास के मुस्लिमों को दफनाया जाता है। मणि पर्वत के पश्चिमी और दक्षिणी कोने के हिस्सों में सामूहिक कब्रों का अम्बार लगा हुआ है।
पीएसी से निगरानी भी नहीं हो पा रही
मणि पर्वत प्रवेश द्वार के पास पीएसी की एक टुकड़ी कैंपिंग कर रही है,लेकिन उसकी कोई रुचि इस स्मारक और धरोहर को संरक्षित करने के लिए नहीं है। वह अपना समय पास कर रही है क्योंकि उसे कोई ऊपरी तरह से सरकारी निर्देश नहीं हैं। इस प्रकार मणि पर्वत तीन तरफ से मुस्लिम संरचनाओं से घिरता चला जा रहा है और आज भी उसे पर नए-नए अतिक्रमण होते जा रहे हैं। झाड़ियों के अंदर अभी और भी कई मजार देखे गए हैं। इन मजारों के पास गणेश कुंड और विद्याकुंड जैसे पवित्र और पौराणिक धर्मस्थल भी मौजूद हैं, जिनका संबंध सीधे भगवान राम और उनकी अयोध्या नगरी से है। ये सभी अयोध्या मुख्य तीर्थ क्षेत्र अथवा धर्मनगरी इलाके में ही आते हैं। इन मजारों से एकदम सटकर उत्तर प्रदेश पुलिस की PAC विंग का बड़ा-सा कैम्प है। इस कैम्प में जवानों के आवास, वाहनों की पार्किंग के साथ-साथ उनके हथियारों को भी रखा जाता है। तीन तरफ मजारों से घिरा यह क्षेत्र न सिर्फ धार्मिक ही नहीं, बल्कि सुरक्षा के लिहाज से भी काफी संवेदनशील है।
लेखक परिचय:-
(लेखक भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण, में सहायक पुस्तकालय एवं सूचनाधिकारी पद से सेवामुक्त हुए हैं। वर्तमान समय में उत्तर प्रदेश के बस्ती नगर में निवास करते हुए सम सामयिक विषयों,साहित्य, इतिहास, पुरातत्व, संस्कृति और अध्यात्म पर अपना विचार व्यक्त करते रहते हैं।
(वॉट्सप नं.+919412300183)