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आज का युग अनिश्चितता और पूनर्मूल्यांकन का युग है

भारत के यशस्वी प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदीजी कहते हैं,संघ प्रमुख डॉ मोहन भागत कहते हैं और सबसे बड़ी बात विश्व पंचायत,यूएन की रिपोर्ट कहती है कि आज का युग युवाओं का युग है।आज पूरे विश्व का अस्तित्व युवाओं की सकारात्मक सोच और बहु आयामी हुनर पर टिका हुआ है।

हिन्दू धर्म,बौद्ध धर्म,जैन धर्म और सिख धर्म तथा इनके धर्मगुरुओं आदि का भी यह मानना है कि कालांतर में युग की अनिश्चितता और स्व पूनर्मूल्यांकन को अपनाकर ही भारत को विकसित मनाया जा सकता है।

अनिश्चितता तो पल-पल देखने को मिलती है। जिस प्रकार परिवर्तन प्रकृति का शाश्वत नियम है ठीक उसी प्रकार मनुष्य जीवन में प्रतिपल परिवर्तन होते ही रहते हैं।और अपने आचार-विचार,संस्कार और व्यवहार में बदलाव लाकर वर्तमान के साथ चलना ही सबसे बड़ी बुद्धिमानी है।

हाल ही में राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ ने विजयादशमीः2025 को अपना 100वां स्थापना दिवस  हर्षोल्लास के साथ मनाया। वह पवित्र दिवस संघ के लिए ही नहीं हमसभी के लिए संकल्प दिवस था।गौरतलब है कि मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम का त्यागी राजा का जीवन शाश्वत जीवन मूल्यों पर आधारित जीवन था जिन्होंने दुराचारी रावण का वधकर यह संदेश दिया है कि यह विजय न किसी एक व्यक्ति की दूसरे व्यक्ति पर और न ही किसी देश की दूसरे देश पर विजय थी परन्तु यह विजय धर्म की अधर्म पर, नीति की अनीति पर, सत्य की असत्य पर, प्रकाश की अंधकार पर और न्याय की अन्याय पर विजय थी जिसकी आवश्यकता आज भारतीय समाज को है।

विजयादशमी का दिवस आज हमारे लिए सतत स्फूर्ति का दिवस है।विजयादशमी का  दिवस सतत आत्मगौरव,नई ऊर्जा आत्ममूल्यांकन के साथ पूनर्मूल्यांकन का भी दिवस है।अगर भारतवर्ष की गौरवशाली परम्पराओं को देखें तो भारत एक आत्मनिर्भर समृद्धिशाली, शक्तिशाली और सभी राष्ट्रों के लिए हितकारी राष्ट्र रहा है।यह भारतराष्ट्र का समाज संस्कारी है,समरस है और आज के युग में शक्तिशाली भी है।

आज के भारतीय समाज में रामराज्य जैसा अमन-चैन अगर लाना है तो सबसे पहले अपने आपको चरित्रवान बनाना होगा,अनुशासित और शिष्टाचारी बनाना होगा।और इसके लिए सबसे पहले स्व की समीक्षा करनी होगी जिससे संस्कारी भारतीय परिवार बने और उससे  सशक्त भारतीय समाज तैयार हो सके।

अगर राष्ट्रपिता बापू के अमर संदेशा को भारत में पुनः प्रतिष्ठ करना है तो सबसे पहले आज के युग में हमसभी भारतवासी को  स्व के भाव के साथ-साथ स्व निरीक्षण-परीक्षण का समय बनाना होगा।स्वदेशी विचार अपनाना होगा, भारतीय संस्कृति,इसकी शाश्वत परंपरा और उसके गौरव को पुनः प्रतिष्ठित करना होगा और यह दायित्व आज सिर्फ और सिर्फ देश के युवाओं को परिवर्तन को अपनाकर स्व का पूनर्मूल्यांकन करके ही संभव है।उन्हें अपने व्यवहार और आचरण में भारतीयता को आत्मसात करना होगा।भारत के सौंदर्यबोध तथा शक्तिबोध को आज के परिपेक्ष्य में समझ-बुझकर अपनाना होगा।

स्वामी रामकृष्ण परमहंस जी का कहना है कि जब कमल खिलता है तो वहां पर भंवरे स्वतः आ जाते हैं। अगर आज के पश्चिमी सभ्यता के चकाचौंध तथा आणविक संकट के युग से भारत को बचाना है तो हम देश के युवाओं को स्व मूल्यांकनकर और उसी के अनुसार अपने आजार-विचार-संस्कार और संस्कृति को अपनाना होगा।

हमारे सप्त ऋषिगणःमहर्षि अगस्त्य,महर्षि अत्रि,महर्षि वसिष्ठ,महर्षि विश्वामित्र,महर्षि जमदग्नि-परशुराम,महर्षि भृगु और यहां तक कि महर्षि दुर्वासा आदि ने भी परिवर्तन के साथ स्व समीक्षा तथा स्व मूल्यांकन को अपनाने का संदेश दिया है।

शांतिदूत भगवान श्रीकृष्ण ने भी महाभारत युद्ध में महापराक्रमी अर्जुन को परिवर्तन के दौर को स्वीकार करते हुए स्व के पूनर्मूल्यांकन का अमर संदेश दिया है।

अपने बाल्यकाल में परम जिज्ञासु स्वामी विवेकानंद ने भी परिवर्तन के क्रम में स्व मूल्यांकनकर पूरे विश्व को जगतगुरु के रुप में स्व मूल्याकन तथा परिवर्तन को अपनाने का संदेश दिया है।

राष्ट्रकवि स्वर्गीय रामधारी सिंह दिनकर ने अपने पूरे  जीवन में भारतीय संस्कृति और भारतीय इतिहास का गुणगान किया परन्तु उनके जीवन का सच तो यह है कि उन्होंने भी अपने जीवन के आखिरी समय में परिवर्तन की वास्तविकता को स्वीकारकर तथा स्व समीक्षाकर -हारे को हरि नाम-लिख डाला।इसीलिए तो उनके अनुसार  संस्कृति की परिभाषा संसार भर में जो भी सर्वोत्तम बातें जानी या कही गईं हैं उनसे अपने आपको परिचित करना ही संस्कृति है।और यह हमेशा परिवर्तन के दौर को सहर्ष स्वीकार कर तथा स्व मूल्याकन से ही संभव है।

हाल ही में जैन धर्म के प्रचारक संतमुनि चन्द्र प्रभ जी का यह  संदेश है कि सम्पूर्ण मानवता के भगवान हैं-महावीर और उन्होंने भी  युग अनिश्चितता को स्वीकरने और पूनर्मूल्यांकन के युग में अपना मूल्यांकन स्वहित,परिवारहित,समाजहित और राष्ट्रहित के लिए अनिवार्य बताया है। राजयोगी ब्रह्मकुमार निकुंज का भी हाल ही में यह कहना है कि हमें परिवर्तन से डरना नहीं चाहिए अपितु उसे सहर्ष अपनाना चाहिए।सत्य तो यह है कि आज का युग अनिश्चितता और

पूनर्मूल्यांकन का युग है-विषय निश्चित रूप से शोध का विषय है जिसपर अनवरत शोध की आवश्यकता है और उसी के अनुसार भारतीय जीवन-शैली को अपनाने की आवश्यकता है।

(लेखक भुवनेश्वर में रहते हैं और ओड़िशा की साहित्यिक, सांस्कृतिक धार्मिक व अन्य गतिविधियों के साथ ही विविध विषयों पर स्वतंत्र लेखन करते हैं) 

एसपी तेजस्विनी गौतम की कोटा को नशामुक्त बनाने की पहल..

नशे की लत से न केवल नशा करने वाला स्वयं अपना जीवन बर्बाद करता है वरन उसके परिवार को भी इसका दंश झेलना पड़ता है। अनेक परवारों में नशे में धुत व्यक्ति घर आ कर अपनी पत्नी और बच्चों से गली गलोच और मारपीट करता है। खुद तो कुछ कमाता नहीं और पत्नी की कमाई छीन कर परिवार को भूखे रहने पर मजबूर कर देता है। ये तो गरीब और मजदूर परिवारों में आम है। इधर आज युवा पीढ़ी नशे की गिरफ्त में आ चुकी हैं। यही नहीं लड़कियां भी पीछे नहीं हैं। छोटे – छोटे बच्चें तक नशा कर रहे हैं। सिगरेट और शराब को फैशन मान लिया है। पहले चरस बड़ा नशा माना जाता था अब कई और खतरनाक नशे प्रचलन में है।

हाल में में कोटा शहर की एसपी तेजस्विनी गौतम ने एक प्रेसवार्ता में अपना मंतव्य स्पष्ट किया कि वे कोटा को नशा मुक्त बनाने के लिए दृढ़ संकल्पित है। उनका यह विचार स्वागत योग्य है। मैं कुन्हाड़ी में लैंड मार्क सीटी की तरफ निवास करता हूं, मैने सुना भी और देखा भी जब से ये कोटा आई हैं इस क्षेत्र में दुकानदारों का सिगरेट बेचना भारी हो गया है। अच्छा खास खौफ है कब पुलिस आ जाए। बड़ी कार्रवाई भी यहां हुई, नशे की सामग्री जब्त की गई, विक्रेताओं को पुलिस पकड़ कर भी ले गई। शराब माफियाओं के विरुद्ध भी कार्यवाही की गई है।

कोटा में बहुत लंबे समय बाद कोई पुलिस की ऐसी अधिकारी आई है जो मन से अपराधों पर अंकुश लगाने और कोटा शहर को नशा मुक्त बनाना चाहती है। कोटा सिटी एसपी तेजस्विनी गौतम ने कोटा शहर को नशा मुक्त बनाने के लिए ऑपरेशन गरुङव्यूह नाम से पूरे शहर में एक विशेष अभियान की शुरुआत की है। उन्होंने कोटा को नशा मुक्त करने के अभियान को यह कहकर शुरू किया है कि कोटा शहर पुलिस की इस लड़ाई में कोटा की जनता भी कोटा पुलिस के साथ आए ताकि जल्द कोटा शहर को नशा मुक्त बनाया जाए।

सिटी एसपी ने कोटा के नागरिकों से अपील की है कि कोटा शहर के किसी भी कोने में अवैध नशे की बिक्री हो रही है तो वह मोबाईल नंबर 9530443144 पर जानकारी दे, जानकारी देने वाले का नाम गुप्त रखा जाएगा। उन्होंने यह भी कहा कि कोई चाहता है कि ऐसे मामले पर पुलिस की स्पेशल टीम कार्यवाही करें तो यह भी दर्ज किया जाए।

ऐसा नहीं है कि इनके द्वारा की गई पहल कोई पहला प्रयास है। डॉ. आर. सी . साहनी ने अकेले अपने दम पर स्कूलों में जा – जा कर युवा संगोष्ठी और प्रदर्शनियों के माध्यम से लंबे समय तक प्रयास किया। कई समाजसेवियों और मीडिया ने पूर्ण समर्थन दिया। मनोरोग चिकित्सक डॉ. एम. एल. अग्रवाल ने भी नशा मुक्ति के लिए दीर्घकाल तक प्रयास किए। कोटा में संभागीय आयुक्त आए तपेंद्र कुमार, उन्होंने तो नशे के खिलाफ एक जंग छेड़ दी। समाजसेवी, धर्मगुरुओं, राजनीतिज्ञों, गैर सरकारी संगठनों, मीडिया आदि समस्त वर्गों को जोड़ कर पूरे शहर में व्यापक जागरूकता रैली निकाल कर न केवल शहर में, पूरे हाड़ौती में वातावरण बनाया जिसकी गूंज प्रदेश भर में पहुंची। लंबे समय तक जागरूकता गोविधियां और नशा मुक्ति शिविरों का आयोजन किया। हजारों लोगों ने नशा मुक्ति का संकल्प भी लिया। इस अभियान को स्मैक के विरुद्ध केंद्र में रख कर चलाया गया। पुलिस ने भी अभियान में प्रभावी कार्यवाही करते हुए बड़े पैमाने पर नशीले पदार्थ जब्त किए और विक्रेताओं के विरुद्ध भी कार्रवाई की। उनके जाने के बाद कुछ लोगों और संस्थाओं ने अपने स्तर पर कुछ प्रयास किए।

किसी भी सामाजिक बुराई – प्रथा को समाप्त करने के लिए लंबी लड़ाई लड़नी होती है। दीर्घकाल तक जागरूकता प्रयास करने होते हैं। छुआछूत, पर्दा प्रथा, बाल विवाह कुछ ऐसी सामाजिक कुरितियां हैं, जो आजादी के बाद से किए जा रहे जागरूकता प्रयास के बावजूद इनके बीज विद्यमान हैं।

नशा मानव वृति भी चिरकाल से चली आ रही है। अनेक फिल्मों नशा सामग्री बनाने और बेचने वालों के संगठित लोगों पर बनी है, जिनका उद्देश्य लोगों को जागरूक करना था। सवाल यह है हम जागरूकता अभियान तो खूब चलाते हैं पर असली जड़ मादक पदार्थ बनने से रोक नहीं लगाते। करोना बीमारी के लोक डाउन में छूट मिलते ही कोटा में ही पहले दिन ही करोड़ों रुपए की शराब की बिक्री का तथ्य समाचार पत्रों की सुर्खी बना। सरकार को नशे से बड़े पैमाने पर राजस्व प्राप्त होता है।

खैर नशे से कई कड़ियां जुड़ी हैं। इसके कारण हम नशा छोड़ने के लिए जागरूक करने के अपने दायित्व से मुंह नहीं मोड़ सकते हैं। इस तमाम परिवेश और संदर्भों के बीच कोटा की एसपी तेजस्विनी गौतम की हिम्मत, इच्छा शक्ति से शुरू किए गए प्रयासों का स्वागत करते हुए समाज के सभी लोगों और संगठनों को स्वयं आगे आकर उनके साथ कंधे से कंधा मिला कर नशे के विरुद्ध इस अभियान में सहयोग करना चाहिए। उन्हें भी विभिन्न संगठनों के साथ बैठक ले कर उनकी सहभागिता के लिए प्रयास करने होंगे। केवल अपील करना ही पर्याप्त नहीं है।

मैं मीडिया से जुड़ा होने से उनसे शीघ्र संपर्क करूंगा और उन्हें वांछित सहयोग प्रदान करूंगा। आप भी संकल्प और सेवा भावना के साथ आगे आएं………

डॉ. प्रभात कुमार सिंघल
लेखक और पत्रकार, कोटा

मारवाड़ी युवा मंच भुवनेश्वर ने मनाया गोवर्धन पूजा और अन्नकूट

स्थानीय बायोबाबा मठ में सायंकाल मारवाड़ी युवा मंच की अध्यक्ष गीतांजलि अग्रवाल के नेतृत्व में गत वर्ष की तरह इस वर्ष भी गोवर्धन पूजा और अन्नकूट महोत्सव मनाया। सबसे पहले विधिवत गोवर्धन पूजन हुआ। अन्नकूट प्रसाद निवेदित हुआ। गौरतलब है कि आयोजन को सफल बनाने में  गीतांजलि केजरीवाल,शीतल सिंघानिया, मुन्ना लाल अग्रवाल, अभिषेक राटेरिया,मनीष केजरीवाल, सपना जैन,राजेश केजरीवाल,अमित सिंघानिया, वर्षा मित्तल आदि ने योगदान दिया। अवसर पर आगत सभी ने अन्नकूट प्रसाद सेवन किया।

बिहार चुनावः मुद्दों एवं मूल्यों से दूर भागती राजनीति

बिहार में चुनावी रणभेरी बज चुकी है। हर दल अपने-अपने घोषणापत्र, नारों और वादों के साथ जनता को लुभाने में जुटा है। मंचों पर भाषणों की गरमी है, प्रचार रथ दौड़ रहे हैं, लेकिन इस शोर में सबसे बड़ी कमी है- जनता के असली मुद्दों की आवाज़। राजनीति का यह शोर विकास की असली जरूरतों को दबा रहा है। बिहार जैसे राज्य में जहां गरीबी, बेरोजगारी, अपराध, और सामाजिक पिछड़ापन अब भी विकराल रूप में मौजूद हैं, वहां चुनावी विमर्श का इनसे विमुख होना चिंताजनक है। यह लोकतंत्र के सबसे बड़े पर्व चुनाव का विरोधाभास ही नहीं, दुर्भाग्य है। सबसे बड़ा सवाल यही है कि आखिर क्यों बिहार चुनाव में कोई भी दल उन मुद्दों को ईमानदारी से नहीं उठा रहा जो सीधे-सीधे जनता के जीवन से जुड़े हैं? क्यों शराबबंदी, बेरोजगारी, महिला सुरक्षा, अपराध-माफिया शिक्षा और स्वास्थ्य जैसे वास्तविक सवाल राजनीतिक एजेंडे से गायब हैं?

बिहार में शराबबंदी एक बड़ा सामाजिक और राजनीतिक मुद्दा रहा है। यह मुद्दा केवल कानून का नहीं, बल्कि नैतिकता, सामाजिक सुधार और जनजीवन की स्थिरता से जुड़ा हुआ है। शराबबंदी की सफलता या विफलता को लेकर जनता के मन में अनेक प्रश्न हैं, क्योंकि इस नीति ने जहां कई परिवारों को विनाश से बचाया, वहीं भ्रष्टाचार, अवैध तस्करी और पुलिसिया मनमानी को भी जन्म दिया। दिलचस्प यह है कि इस बार के चुनाव में लगभग सभी प्रमुख दल इस मुद्दे से दूरी बनाए हुए हैं। एनडीए खेमे के नेता खुलकर इस पर बोलने से बच रहे हैं। केवल प्रशांत कुमार जैसे कुछ नेता हैं जो पूर्ण शराबबंदी की पुनः स्थापना का नारा उठा रहे हैं। यह सवाल उठता है, अगर शराबबंदी सचमुच जनता के हित में थी, तो सत्ता पक्ष इससे डर क्यों रहा है? क्या यह स्वीकारोक्ति है कि कानून तो बनाया गया, लेकिन उसका क्रियान्वयन असफल रहा? शराबबंदी क्यों जरूरी है, उस महिला से पूछिये, जिसकी बिछुए शराब पीने से लिये उसके पति ने बेच दी। ऐसी त्रासद घटनाएं बिहार के जन-जन में देखने को मिलती है।

वैसे तो हर एक का जीवन अनेकों विरोधाभासों एवं विसंगतियों से भरा रहता है। हमारा हर दिन भी कई विरोधाभासों के बीच बीतता है। आज तो हमारी सारी नीतियों में, हमारे सारे निर्णयों में, हमारे व्यवहार में, हमारे कथन में विरोधाभास स्पष्ट परिलक्षित है। लेकिन बिहार चुनाव ऐसे विरोधाभास के कारण कथनी करनी के अंतर का अखाड़ा ही बनते हुए प्रतीत होते हैं। यही कारण है कि हमारे जीवन में सत्य खोजने से भी नहीं मिलता। राजनेताओं एवं राजनीतिक दलों का व्यवहार दोगला हो गया है। उनके द्वारा दोहरे मापदण्ड अपनाने से हर नीति, हर निर्णय समाधानों से ज्यादा समस्याएं पैदा कर रहे हैं। चुनाव एवं चुनावी मुद्दें समस्याओं के समाधान का माध्यम बनने चाहिए, लेकिन वे समस्याओं को बढ़ाने का जरिये बनते रहे हैं। यही कारण है कि शिक्षा, स्वास्थ्य, बेरोजगारी, महिला-सुरक्षा, अपराध-नियंत्रण की प्राथमिकता के नारे हमारे लिए स्वप्न ही बने हुए हैं।

ये तो कुछ नमूने हैं जबकि स्वतंत्रता के 78 वर्ष बाद भी हमें अहसास नहीं हो रहा है कि हम स्वतंत्र हैं। राजनीतिक विरोधाभासों और विसंगतियों से उत्पन्न समस्याओं से हम आज़ाद नहीं हुए हैं। हमारे कर्णधारों के चुनावी भाषणों में आदर्शों का व्याख्यान होता है और कृत्यों में भुला दिया जाता है। सबसे बड़ा विरोधाभास यह है कि हम हर स्तर पर वैश्वीकरण व अपने को बाजार बना रहे हैं। अपने को, समय को पहचानने वाला साबित कर रहे हैं। पर हमने अपने आप को, अपने भारत को, अपने बिहार को, अपने पैरों के नीचे की जमीन को नहीं पहचाना। नियति भी एक विसंगति का खेल खेल रही है। पहले जेल जाने वालों को कुर्सी मिलती थी, अब कुर्सी पाने वाले जेल जा रहे हैं। यह नियति का व्यंग्य है या सबक? पहले नेता के लिए श्रद्धा से सिर झुकता था अब शर्म से सिर झुकता है। जिन्दा कौमें पांच वर्ष तक इन्तजार नहीं करतीं, हमने 15 गुना इंतजार कर लिया है। यह विरोधाभास नहीं, दुर्भाग्य है, या सहिष्णुता कहें? जिसकी भी एक सीमा होती है, जो पानी की तरह गर्म होती-होती 50 डिग्री सेल्सियस पर भाप की शक्ति बन जाती है। बिहार इस नियति से कब मुक्त होगा, यही इस चुनावों में विमर्श का सबसे बड़ा मुद्दा होना चाहिए।

बिहार की सबसे बड़ी त्रासदी बेरोजगारी है। लाखों युवाओं के पास न काम है, न अवसर। हर चुनाव में इस पर वादे किए जाते हैं, लेकिन परिणाम लगभग शून्य रहते हैं। प्रदेश के नौजवान पलायन को मजबूर हैं, मजदूरी के लिए दूसरे राज्यों का रुख करते हैं। चुनावी सभाओं में नौकरियों का झांसा तो मिलता है, लेकिन ठोस योजनाएं और नीतियां कहीं दिखाई नहीं देतीं। राजनीतिक दलों के पास न तो रोजगार सृजन की दीर्घकालिक योजना है, न शिक्षा और कौशल विकास को जोड़ने की कोई ठोस रणनीति। चुनावी भाषणों में ‘बिहार के विकास’ की बातें होती हैं, लेकिन युवा भविष्य की वास्तविक चिंता कहीं नहीं झलकती। बिहार में महिला सुरक्षा, अपराध और माफिया तंत्र का प्रश्न भी उतना ही ज्वलंत है। हाल के वर्षों में महिलाओं के खिलाफ अपराधों में लगातार वृद्धि हुई है। भूमि विवादों, रंगदारी और राजनीतिक संरक्षण प्राप्त अपराधियों की गतिविधियाँ अब भी जारी हैं। मगर किसी भी दल की ओर से इन पर कोई ठोस नीति या वचन नहीं दिखाई देता।

राजनीतिक दल जानते हैं कि इन विषयों पर बात करना असुविधाजनक है, क्योंकि यह सीधा शासन व्यवस्था की विफलता को उजागर करता है। इसलिए वे इन पर मौन साधे हुए हैं। अपराध और महिला सुरक्षा पर चुप्पी बताती है कि सत्ता प्राप्ति की होड़ में संवेदनशीलता की कोई जगह नहीं बची है। बिहार की राजनीति आज भी जातीय समीकरणों और तुष्टिकरण की जकड़ में फंसी हुई है। विकास और सुशासन की बातें केवल नारों तक सीमित हैं। उम्मीदवार चयन से लेकर प्रचार तक, हर जगह जातीय गणित प्राथमिकता में है। परिणाम यह है कि मुद्दे हाशिये पर चले जाते हैं और वोट बैंक की राजनीति सर्वोच्च स्थान पा लेती है। विकास के नाम पर किए गए बड़े-बड़े दावे चुनाव बीतते ही धुंधले पड़ जाते हैं। गांवों में आज भी सड़कें टूटी हैं, अस्पतालों में डॉक्टर नहीं हैं, स्कूलों में शिक्षक नहीं हैं, और प्रशासनिक तंत्र भ्रष्टाचार से ग्रस्त है। ऐसे में जब राजनीतिक दल मुद्दों पर संवाद करने के बजाय केवल आरोप-प्रत्यारोप में व्यस्त हों, तो जनता का विश्वास कमजोर पड़ना स्वाभाविक है।

आज बिहार को ऐसे नेतृत्व की आवश्यकता है जो चुनाव को जन-कल्याण के दृष्टिकोण से देखे, न कि केवल सत्ता प्राप्ति की दौड़ के रूप में। शराबबंदी, रोजगार, अपराध-मुक्ति, महिला सुरक्षा, शिक्षा और स्वास्थ्य जैसे मुद्दे बिहार राज्य की आत्मा हैं। इन्हें नज़रअंदाज़ करना, बिहार के भविष्य को अंधेरे में धकेलने जैसा है। विकास का अर्थ केवल सड़कें और पुल नहीं, बल्कि मानव विकास है, जहां हर व्यक्ति सुरक्षित, शिक्षित, रोजगारयुक्त और सम्मानजनक जीवन जी सके। राजनीतिक दलों को यह समझना होगा कि जनता अब केवल नारों से नहीं, परिणामों से प्रभावित होती है। बिहार चुनाव हमें यह सोचने पर विवश करता है कि क्या राजनीति अब केवल सत्ता का खेल बनकर रह गई है? क्या लोकतंत्र का मूल उद्देश्य जनसेवा अब खो गया है? जब जनता के असली मुद्दे, जैसे शिक्षा, स्वास्थ्य, बेरोजगारी, महिला सुरक्षा और सामाजिक न्याय, चुनावी भाषणों से गायब हो जाएं, तब यह लोकतंत्र के क्षरण का संकेत है।

जरूरत है कि राजनीतिक दल फिर से उन बुनियादी प्रश्नों पर लौटें, जिन पर बिहार का वर्तमान और भविष्य निर्भर करता है। यदि वे ऐसा नहीं करते, तो बिहार की जनता का यह चुनाव एक बार फिर केवल चेहरों और गठबंधनों का उत्सव बनकर रह जाएगा, जहाँ जनहित और जनसरोकार फिर से पीछे छूट जाएंगे। बिहार को नारों नहीं, नीतियों की राजनीति चाहिए और यह तभी संभव है, जब मुद्दों पर बात करने का साहस राजनीति में लौट आए।


(ललित गर्ग)
लेखक, पत्रकार, स्तंभकार
ई-253, सरस्वती कंुज अपार्टमेंट
25 आई. पी. एक्सटेंशन, पटपड़गंज, दिल्ली-92
फोनः 22727486, 9811051133

गोवर्ध्दन पूजा पशुधन, पर्यावरण, संस्कृति और समाज को बचाने का संदेश देती है

मुझे गोवर्द्धन पूजा का यह नाम बड़ा अच्छा लगता है। इसमें श्लेष अलंकार है। पर्वत की भी बात है और गौओं की भी। भारतीय प्रज्ञा पर्वत और गायों को एक दूसरे के विरोध में नहीं देखती, उनकी सहचारिता में देखती है। गो-वर्धन गायों का भी वर्धन है। भागवत में कृष्ण कहते हैं: ‘वार्ता चतु‌र्विधा तत्र वयं गोवृत्तयो’ कि आजीविका चार तरह की हैं:- कृषि, वाणिज्य, ब्याज और गोवृत्त। हमारी आजीविका गोवृत्त है- गाय के इर्द गिर्द घूमती है। कृष्ण कहते हैं कि हम तो ‘वनशैल निवासिनः’ हैं- वन और पर्वत ही हमारे घर हैं। फिर क्या होता है: गोधनानि पुरस्कृत्य गिरिं चक्रः प्रदक्षिणम् – गौओं को आगे करके गिरिराज की प्रदक्षिणा की जाती है।

गोवर्धन पर्वत भी भारत के उसी पवित्र भूगोल का हिस्सा है जिसमें गोचारण होता था। यह sacred geography हमारी संस्कृति की विशेषता है जिसमें नदियाँ पर्वत सब एक दिव्यत्व की आभा से जगमगाते हैं। एक पर्वत के रूप में गोवर्धन को गिरिराज कहा गया और हमारी संस्कृति हमें कभी गोवर्धन की तो कभी कामदगिरि की परिक्रमा सिखाती है। पर्वत हमारा पोषण करते हैं, इसीलिए गोवर्धन पूजा को अन्नकूट भी कहते हैं।

गोवर्धन पूजा की भागवत में आई कथा सिर्फ कृष्ण की चामत्कारिक शक्ति की कथा नहीं है। उस एलीगरी है जिसे आध्यात्मिक, नैतिक, पर्यावरणीय और आस्तिविक मनीषा की कितनी ही लेयर्स ने मिलकर बुना है। ईश्वर की एक उंगली अकेले ब्रज के लिए क्या, सारी दुनिया को बचाने के लिए पर्याप्त है। जब तक ईशानुकंपा का छत्र है, जीवन के सारे तूफानों और आपदाओं के विरुद्ध आपको एक शरण्य है। गोवर्धन उसी शरण्य का प्रतीक है, तब आप के अस्तित्व का भार, आपका योगक्षेम ईश्वर ही वहन करेगा। कृष्ण का यही अभिवचन है, हमारे कर्म- पर्वत को वही उठायेंगे।

यह प्रसंग यह भी संदेश देता है कि वर्षा आकाशीय कृपा से नहीं, अपनी पृथ्वी के पेड़-पर्वतों और पर्यावरण का सत्कार करने से होती है। आज जब हम देखते हैं कि हमारे पर्वतों का क्षरण हो रहा है, स्वयं गोवर्धन का क्षरण हो रहा है, लैंड स्लाइड्स हो रहे हैं, पर्वतों के पेड़ काट काट कर हमने उन्हें नंगा कर दिया है, क्लाउड बर्स्ट हो रहे हैं, तब हमें गोवर्धन पूजा के माध्यम से रेखांकित किये जा रहे संदेश की गंभीरता को समझना चाहिए। पर्वत पृथ्वी का गौरव हैं, वे सिर्फ geographical temenity नहीं हैं, वे पृथ्वी का स्वप्न हैं, पृथ्वी की महत्त्वाकांक्षा हैं।

राजेश जोशी जी की एक कविता है:
स्वप्न अगर आसमान में थे/ तो पहाड़ों के सबसे करीब थे / स्वप्न अगर लुककर बैठ गये थे / तो हमें विश्वास था/ वे पहाड़ों में कहीं छुपे होंगे/ हम स्वप्नों की खोज में गये थे/ पहाड़ों की ओर/ और हम जानते थे/ पहाड़ दोगले नहीं हुए हैं/ वे हमारी हिफाजत करते रहेंगे।

तो गोवर्धन ने ब्रजवासियों की रक्षा की थी। यह एक ग्रीन रिलेशनशिप है, हरित रिश्तेदारी। धर्मो रक्षति रक्षितः की तरह। आप पर्वतों की रक्षा करें, पर्वत आपकी करेंगे। कृष्ण ने इंद्र की पूजा की जगह गोवर्धन की पूजा की बात की – रिचुअलिज़्म की जगह नेचुरलिज़्म की। इंद्र अमूर्त हैं, intangible हैं, पर्वत प्रत्यक्ष हैं, पड़ोसी हैं।

विलियम ब्लेक की एक कविता थी:
Great things are done when men and mountains meet
This is not done by jostling in the street.

यह प्रसंग प्रकृति के साथ हार्मनी का प्रसंग है। यहां environmental stewardship को एक sacred duty माना गया। यह प्रसंग बताता है कि यूनिटी इन कम्युनिटी क्या होती है और कृष्ण की शरण्य से कैसे एक कलेक्टिव बांड पैदा होता है, तब जात-प्रतिष्ठा सब के भेद छोड़कर एक ईश्वर की छत्रछाया में सब जाते हैं। आज भारत की सामाजिक एकता का जो फ्रेग्मेंटेशन करने की कोशिश हो रही है, तब हमें कृष्ण की उस एक उँगली की शक्ति पर भरोसा करना है।

इस प्रसंग में कृष्ण भी हैं तो बाल गोपाल है, इसकी अबोधता ही, इसकी मासूमियत, इसकी निर्दोषता इन्द्र की cosmic forces पर भी भारी पड़ती है। बाल कृष्ण खेल खेल में गोवर्धन उठा लेते हैं, इसे ही जैसे बाल सीता ने खेल खेल में शिवजी का धनुष उठा लिया था। मतलब यह कि approach God as play, not puzzle.

अनिल कपूर की एक फिल्म भाई थी वे सात दिन। पर ब्रज के इन सात दिनों पर कोई फिल्म नहीं बनी है। कृष्ण लीला का यही तो आनंद है। एक उँगली minimal effort का प्रतीक है पर वह पहाड़ का भी बोझ उठा लेती है। जो असंभव था, ब्रजवासियों का प्यार और विश्वास उसे संभव बना देता है, उसे ईशकृपा संभव बना देती है, प्यार का प्रतिदान संभव बना देता है।

मैं गौ पूजक और कुकुर पूजक संस्कृति में लॉक और रूसो की सैद्धान्तिकी का द्वंद्व देखता हूँ। कुकुर पूजक संस्कृति में हर व्यक्ति के बारे में प्रारंभिक उपकल्पना एक चोर की, एक संदिग्ध व्यक्ति की है। कि वह inherently selfish, violent, competitive, nasty, brutish है जब तक कि अन्यथा नहीं प्रमाणित कर दिया जाता। प्रवेश करते ही कुत्ता सूँघ सूँघ कर बताता है कि आप निरापद हो। गौपूजक संस्कृति में अतिथि देवता है तो आप उसका स्वागत दूध और उससे बने द्रव्य या मिठाई से करते हो। यह रूसो की तरह है जो मनुष्य को inherently good, free, and compassionate मानता था।

आज का दिन गौपूजा का है।

(लेखक मप्र के चुनाव आयुक्त हैं और सेवानिवृत्त आईएएस अधिकारी हैं। वे धार्मिक विषयों पर वैज्ञानिक विवेचन के साथ कई पुस्तकें लिख चुके हैं)
 

भाई-बहन को समर्पित एक भावनात्मक त्यौहार

भ्रातृ द्वितीया (भाई दूज) कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की द्वितीया तिथि को मनाया जाने वाला हिन्दू धर्म का एक महत्वपूर्ण एवं ऐतिहासिक पर्व है जिसे यम द्वितीया भी कहते हैं। यह दीपावली के दो दिन बाद आने वाला ऐसा पर्व है, जो भाई के प्रति बहन के स्नेह को अभिव्यक्त करता है एवं बहनें अपने भाई की खुशहाली के लिए कामना करती हैं। आज जबकि समाज रिश्तों की गर्माहट से दूर होता जा रहा है, जब व्यक्तिगत स्वार्थों और भौतिक लिप्साओं ने मानवीय संबंधों को हाशिये पर पहुँचा दिया है, तब भाई दूज का पर्व हमें रिश्तों की आत्मीयता, समर्पण और सुरक्षा के शाश्वत मूल्यों की याद दिलाता है। यह पर्व केवल एक पारंपरिक रिवाज नहीं है, बल्कि भारतीय संस्कृति की उस भावना का प्रतीक है, जहाँ भाई और बहन का संबंध केवल रक्त का रिश्ता नहीं, बल्कि आत्मीयता, श्रद्धा और अटूट विश्वास का जीवंत स्वरूप है। इस दिन भाई का बहन के घर भोजन करने का विशेष महत्व एवं लाभ है, उसे उत्तम भोजन समेत धन, सुख एवं खुशहाल जीवन की प्राप्ति भी होती रहती है। क्योंकि इसी तिथि को यमुना ने यम को अपने घर भोजन कराया था। कोई बहन नहीं चाहती कि उसका भाई दीन-हीन एवं तुच्छ हो, सामान्य जीवन जीने वाला हो, ज्ञानरहित, प्रभावरहित हो।

हिन्दू धर्म एवं परम्परा में पारिवारिक सुदृढ़ता, सांस्कृतिक मूल्य एवं आपसी सौहार्द के लिये त्यौहारों का विशेष महत्व है। इस त्यौहार को मनाने के पीछे की ऐतिहासिक कथा भी निराली है। पौराणिक आख्यान के अनुसार भगवान सूर्य नारायण की पत्नी का नाम छाया था। उनकी कोख से यमराज तथा यमुना का जन्म हुआ था। यमुना यमराज से बड़ा स्नेह करती थी। यमुना ने अपने भाई यमराज को आमंत्रित किया कि वह उसके घर आकर भोजन ग्रहण करें, किन्तु व्यस्तता के कारण यमराज उनका आग्रह टाल जाते थे। यमराज ने सोचा कि मैं तो प्राणों को हरने वाला हूं। मुझे कोई भी अपने घर नहीं बुलाना चाहता। बहन जिस सद्भावना से मुझे बुला रही है, उसकी इच्छा को पूरा करना मेरा धर्म है। बहन के घर आते समय यमराज ने नरक निवास करने वाले जीवों को मुक्त कर दिया। यमराज को अपने घर आया देखकर यमुना की खुशी का ठिकाना नहीं रहा। उसने स्नान कर पूजन करके व्यंजन परोसकर उत्तम भोजन कराया। यमुना द्वारा किए गए आतिथ्य से यमराज ने प्रसन्न होकर बहन को वर दिया कि जो भी इस दिन यमुना में स्नान करके बहन के घर जाकर श्रद्धापूर्वक उसका सत्कार ग्रहण करेगा उसे व उसकी बहन को यम का भय नहीं होगा। तभी से लोक में यह पर्व यम द्वितीया के नाम से प्रसिद्ध हो गया। भाइयों को बहनों टीका लगाती है, इस कारण इसे भातृ द्वितीया या भाई दूज भी कहते हैं।

यह पर्व केवल यम और यमुनाजी की कथा तक सीमित नहीं है। भैया दूज भारत में कई जगह अलग-अलग नामों के साथ मनाई जाती है। बिहार में भिन्न रूप में मनाया जाता है, जहां बहनें भाईयों को खूब कोसती हैं फिर अपनी जबान पर कांटा चुभाती हैं और क्षमा मांगती हैं। भाई अपनी बहन को आशीष देते हैं और उनके मंगल के लिए प्रार्थना करते हैं। गुजरात में यह भाई बीज के रूप में तिलक और आरती की पारंपरिक रस्म के साथ मनाया जाता है। महाराष्ट्र और गोवा के मराठी भाषी समुदाय के लोग भी इसे भाई बीज के तौर पर मनाते हैं। यहां बहने फर्श पर एक चौकोर आकार बनाती हैं, जिसमें भाई करीथ नाम का कड़वा फल खाने के बाद बैठता है। आज जब रिश्ते औपचारिकता बनते जा रहे हैं, भाई दूज हमें यह स्मरण कराता है कि सगे संबंधों को जीवित और प्रगाढ़ बनाए रखने के लिए केवल व्हाट्सएप संदेश या उपहार काफी नहीं होते, बल्कि आत्मीय मिलन, संवाद और सम्मान जरूरी है।

इस पूजा में भाई की हथेली पर बहनें चावल का घोल लगाती हैं। उसके ऊपर सिन्दूर लगाकर कद्दू के फूल, पान, सुपारी मुद्रा आदि हाथों पर रखकर धीरे-धीरे पानी हाथों पर छोड़ते हुए मंत्र बोलती हैं कि ‘गंगा पूजे यमुना को यमी पूजे यमराज को, सुभद्रा पूजा कृष्ण को, गंगा यमुना नीर बहे, मेरे भाई की आयु बढ़े’। एक और मंत्र है- ‘सांप काटे, बाघ काटे, बिच्छू काटे जो काटे सो आज काटे’। इस तरह के मंत्र इसलिए कहे जाते हैं क्योंकि ऐसी मान्यता है कि आज के दिन अगर भयंकर पशु भी काट ले तो यमराज भाई के प्राण नहीं ले जाएंगे। संध्या के समय बहनें यमराज के नाम से चौमुख दीया जलाकर घर के बाहर रखती हैं। इस दिन एक विशेष समुदाय की औरतें अपने आराध्य देव चित्रगुप्त की पूजा करती हैं। स्वर्ग में धर्मराज का लेखा-जोखा रखने वाले चित्रगुप्त का पूजन सामूहिक रूप से तस्वीरों अथवा मूर्तियों के माध्यम किया जाता हैं। वे इस दिन कारोबारी बहीखातों की पूजा भी करते हैं। यदि कोई बहन न हो तो गाय, नदी आदि स्त्रीत्व का ध्यान करके अथवा उसके समीप बैठ कर भोजन कर लेना भी शुभ माना जाता है।

भाई दूज रक्षाबंधन से इस मायने में भिन्न है कि जहाँ राखी में बहन रक्षा की कामना करती है, वहीं भाई दूज में वह अपने घर बुलाकर भाई की सेवा करती है और उसे भोजन कराती है। यह सेवा-संस्कृति भारतीय परिवार व्यवस्था की आत्मा रही है। यह उस अहं को तोड़ता है जो अक्सर पुरुष प्रधान मानसिकता से जन्म लेता है। यह उस संबंध को पुनः प्रतिष्ठित करता है जो केवल रक्षात्मक नहीं, बल्कि संवेदनात्मक और परस्पर समर्पित है। भैया दूज के बारे में प्रचलित कथाएं सोचने पर विवश कर देती हैं कि कितने महान उसूलों और मानवीय संवेदनाओं वाले थे वे लोग, जिनकी देखादेखी एक संपूर्ण परंपरा ने जन्म ले लिया और आज तक बदस्तूर जारी है। आज परंपरा भले ही चली आ रही है लेकिन उसमें भावना और प्यार की वह गहराई नहीं दिखायी देती। अब भैया दूज में भाई-बहन के प्यार का वह ज्वार नहीं दिखायी देता जो शायद कभी रहा होगा। इसलिए आज बहुत जरूरत है दायित्वों से बंधे भैया दूज पर्व का सम्मान करने की।

भाईदूज की परम्परा बताती हैं कि पहले खतरों के बीच फंसे भाई की पुकार बहन तक पहुंचती तो बहन हर तरह से भाई की सुरक्षा के लिये तत्पर हो जाती। आज घर-घर में ही नहीं बल्कि सीमा पर भाई अपनी जान को खतरे में डालकर देश की रक्षा कर रहे हैं, उन भाइयों की सलामती के लिये बहनों को प्रार्थना करनी चाहिए तभी भैया दूज का यह पर्व सार्थक बन पड़ेगा और भाई-बहन का प्यार शाश्वत एवं व्यापक बन पायेगा। भाईदूज की परंपरा उन परिवारों में भी संबंधों को फिर से जोड़ने का अवसर देती है जहाँ समय, दूरी या विचारों के मतभेद से भाई-बहन के रिश्ते कमजोर पड़ गए हैं। भोजन केवल स्वाद या अनुष्ठान नहीं है, बल्कि एक ऐसा माध्यम है जो भाई-बहन के बीच संवाद को फिर से शुरू करता है, पुराने किस्सों की स्मृति को ताजा करता है, और दिलों को जोड़ता है।

आज की पीढ़ी को यह समझने की जरूरत है कि पर्व केवल कैलेंडर की तारीखें नहीं हैं, बल्कि वे भारतीय समाज की आत्मा हैं, जो रिश्तों को अर्थ देती हैं, संबंधों में संवाद पैदा करती हैं और संस्कृति को पीढ़ियों तक जीवित रखती हैं। भैया दूज यानी भाई-बहन के प्यार का पर्व। एक ऐसा पर्व जो घर-घर मानवीय रिश्तों में नवीन ऊर्जा का संचार करता है। भाई दूज केवल रस्म नहीं, रिश्तों का पुनर्जन्म है। आज जब समाज टूटन, तनाव और अलगाव से गुजर रहा है, भाई दूज जैसे पर्व रिश्तों के लिए एक सेतु बन सकते हैं — जो न केवल एक दिन का उत्सव हों, बल्कि जीवनभर के लिए संबंधों में स्थायित्व, मिठास और सुरक्षा भर दें।


(ललित गर्ग)
लेखक, पत्रकार, स्तंभकार
ई-253, सरस्वती कंुज अपार्टमेंट
25 आई. पी. एक्सटेंशन, पटपड़गंज, दिल्ली-92
फोनः 22727486, 9811051133

दीपावली के त्यौहारी मौसम में भारतीय अर्थव्यवस्था को लगे पंख

वैसे तो प्रतिवर्ष ही भारत में धनतेरस एवं दीपावली के शुभ अवसर पर भारतीय नागरिकों द्वारा विभिन्न उत्पादों विशेष रूप से स्वर्ण एवं चांदी के आभूषणों की खरीद को शुभ माना जाता है। अतः इस त्यौहारी मौसम में विभिन्न उत्पादों की भारत में बिक्री बहुत बढ़ जाती है। परंतु, इस वर्ष तो केंद्र सरकार द्वारा लिए गए कुछ निर्णयों के चलते भारतीय बाजार में सोने एवं चांदी सहित विभिन्न उत्पादों की बिक्री में बेतहाशा वृद्धि दर्ज हुई है।

 

केंद्र सरकार द्वारा आयकर योग्य राशि की सीमा को बढ़ाकर 12 लाख कर दिया गया है। यदि आज किसी नागरिक की आय 12 लाख रुपए तक प्रतिवर्ष है तो उसकी आय पर आयकर नहीं लगने वाला है। साथ ही, वस्तु एवं सेवा कर की दरों को भी तर्कसंगत बनाया गया है जिसे जीएसटी2.0 का नाम दिया जा रहा है। अब 95 प्रतिशत से अधिक उत्पादों पर केवल 5 प्रतिशत और 18 प्रतिशत की दर से ही वस्तु एवं सेवा कर लागू होगा। पूर्व में, 5 प्रतिशत, 12 प्रतिशत, 18 प्रतिशत एवं 28 प्रतिशत की दरें लागू होती थी। अब 12 प्रतिशत एवं 28 प्रतिशत की दरों को समाप्त कर दिया गया है। इससे उपभोक्ताओं को वस्तु एवं सेवा कर की दरों में लगभग 10 प्रतिशत तक का लाभ मिला है। चार पहिया वाहनों पर तो लगभग 60-70,000 रुपए प्रति वाहन तक  की बचत हुई है। इस तरह, इस वर्ष दीपावली के त्यौहारी मौसम में भारतीय अर्थव्यवस्था को बढ़े हुए उपभोग का सहारा मिला है।

भारतीय इतिहास में, दीपावली के त्यौहारी मौसम में, इस वर्ष सबसे अधिक रिकार्ड कारोबार सम्पन्न हुआ है। भारत में नागरिक अब बाजार में दुकानों पर आकर उत्पादों की पूछ परख कर ही उत्पादों की खरीद करते हुए दिखाई दे रहे हैं। इसी कारण से इस वर्ष के दीपावली त्यौहारी मौसम में भारतीय बाजारों में दुकानों पर बहुत अधिक भीड़ दिखाई दी है। कनफेडरेशन आफ आल इंडिया ट्रेडर्स (सीएआईटी) द्वारा सम्पन्न किए गए एक सर्वेक्षण के अनुसार, भारत के 35 नगरों के वितरण केंद्रों से प्राप्त जानकारी के अनुसार, इस वर्ष लगभग 5.4 लाख करोड़ रुपए का व्यापार दीपावली के त्यौहारी मौसम में सम्पन्न हुआ है। वर्ष 2021 में इसी त्यौहारी मौसम में 1.25 लाख करोड़ रुपए, वर्ष 2022 में 2.50 लाख करोड़ रुपए, वर्ष 2023 में 3.75 लाख करोड़ रुपए एवं वर्ष 2024 में 4.25 लाख करोड़ रुपए का व्यापार सम्पन्न हुआ था। इस वर्ष अभी आगे आने वाले समय में गोवर्धन पूजा, भाई दूज, छठ एवं तुलसी विवाह आदि त्यौहार भी उत्साह पूर्वक मनाए जाने हैं। ऐसा अनुमान किया जा रहा है कि इस वर्ष इस दौरान भी लगभग 80,000 करोड़ रुपए का व्यापार सम्पन्न होने की प्रबल सम्भावना है। इस प्रकार इस वर्ष भारत में त्यौहारी मौसम में कुल व्यापार का आंकड़ा 6 लाख करोड़ रुपए से अधिक होने की प्रबल सम्भावना है, जो पिछले वर्ष इसी अवधि में सम्पन्न हुए व्यापार के आंकडें की तुलना में 41 प्रतिशत अधिक है।

इस वर्ष भारत के नागरिकों में स्वदेशी उत्पाद खरीदने की होड़ सी रही हैं। इसी प्रकार, एक अनुमान के अनुसार, इस वर्ष धनतेरस त्यौहार के दौरान सोने चांदी के गहनों, सिक्कों एवं अन्य वस्तुओं के कारोबार का स्तर भी 60,000 करोड़ रुपए के आसपास रहा है। बाजार में हालांकि इस वर्ष सोने एवं चांदी के भाव आसमान छू रहे हैं। वर्ष 2024 की दीपावली पर सोने का भाव लगभग 80,000 रुपए प्रति 10 ग्राम था, जो इस वर्ष बढ़कर 130,000 रुपए प्रति 10 ग्राम पर पहुंच गया है, अर्थात लगभग 62 प्रतिशत अधिक। चांदी का भाव भी वर्ष 2024 में 98,000 रुपए प्रति किलोग्राम था जो इस वर्ष बढ़कर 180,000 रुपए प्रति किलोग्राम हो गया है, अर्थात लगभग 83 प्रतिशत अधिक। एक अन्य अनुमान के अनुसार, दीपावली के इस त्यौहारी मौसम में भारत में स्वर्ण एवं चांदी के आभूषणों की कुल मिलाकर 1.35 लाख करोड़ रुपए की बिक्री हुई है। भारतीय बाजारों में लगभग 46 टन सोने की बिक्री हुई है।

दीपावली के पावन पर्व पर इस वर्ष 600,000 वाहन एक दिन में बिके हैं। यह भारतीय अर्थव्यवस्था की मजबूती को दर्शा रहा है। इससे यह भी सिद्ध हो रहा है कि है कि भारतीय अर्थव्यवस्था बहुत ही तेज गति से आगे बढ़ रही है। अमेरिकी राष्ट्रपति श्री डॉनल्ड ट्रम्प कह रहे हैं कि भारतीय अर्थव्यवस्था डेड है, भारतीय अर्थव्यवस्था में लगातार तेज हो रही विकास दर अमेरिकी राष्ट्रपति के बयानों को झुठला रही है।

वित्तीय वर्ष 2025-26 की प्रथम तिमाही, अप्रेल-जून 2025, में भारतीय अर्थव्यवस्था ने 7.3 प्रतिशत की आर्थिक विकास दर हासिल की है। जबकि, द्वितीय तिमाही जुलाई-सितम्बर 2025 में एवं तृतीय तिमाही अक्टोबर-दिसम्बर 2025 में भी भारतीय अर्थव्यवस्था के रिकार्ड स्तर पर आर्थिक विकास दर हासिल करने की संभावनाएं प्रबल हो गई हैं। भारत में द्वितीय तिमाही में प्रारम्भ हुए त्यौहारी मौसम (दुर्गा उत्सव, दशहरा, धनतेरस एवं दीपावली, आदि) में विभिन्न उत्पादों की रिकार्ड वृद्धि दर्ज होती हुई दिखाई दी है। यह प्रवाह तीसरी तिमाही में भी जारी रहने की प्रबल सम्भावना दिखाई दे रही है क्योंकि त्यौहारी मौसम अभी इस अवधि  में भी जारी रहेगा जो 25 दिसम्बर (क्रिसमस) एवं 31 दिसम्बर (नव वर्ष) तक जारी रहेगा। साथ ही, शादियों का मौसम भी आने वाला है, इस मौसम में भारत में लाखों की संख्या में शादियां सम्पन्न होती हैं, और शादियों के इस मौसम में विभिन्न उत्पादों (स्वर्ण, चांदी, कार, टीवी, रेफ्रीजरेटर, एसी, आदि) की मांग में बेतहाशा वृद्धि दर्ज होती है। इस बीच भारत में धार्मिक पर्यटन भी अपने उच्चत्तम स्तर पर पहुंच गया है। अयोध्या, वाराणसी, चार धाम, वैष्णो देवी, महाकाल मंदिर, तिरुपति बालाजी, मीनाक्षी मंदिर आदि में लाखों की संख्या में श्रद्धालु पहुंच रहे हैं। भारत में लगातार बढ़ रहे धार्मिक पर्यटन से भी उत्पादों का उपभोग बढ़ रहा है, जो अर्थव्यवस्था को गति देने में सहायक हो रहा है एवं रोजगार के लाखों नए अवसर निर्मित कर रहा है।

भारत में अब देश में ही निर्मित उत्पादों को प्रोत्साहन दिया जा रहा है, इस कार्य में प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी द्वारा स्वदेशी अपनाने की अपील पर भारतीय नागरिक अपना भरपूर सहयोग कर रहे हैं। भारत में ही निर्मित उत्पादों के उपभोग का स्तर सकल घरेलू उत्पाद के 60-70 प्रतिशत तक पहुंच गया है। इसी कारण से भारत को देशीय उपभोग आधारित अर्थव्यवस्था कहा जा रहा है। भारत में आंतरिक उपभोग के लगातार मजबूत होने के चलते भारत अब दुनिया के कई देशों के निवेशकों के लिए निवेश के केंद्र के रूप में उभर रहा है, क्योंकि भारत की 140 करोड़ आबादी इन निवेशकों के लिए आकर्षण का केंद्र है। भारत में ही निर्मित किए जाने वाले उत्पादों के लिए भारत में ही बहुत बड़ा बाजार उन्हें उपलब्ध है। आगे आने वाले समय में भारत के वित्तीय एवं बैंकिंग क्षेत्र में 50,000 करोड़ रुपए से अधिक का विदेशी निवेश भारत में आने जा रहा है। अमेरिकी कम्पनी  ऐपल अपना पूरा उत्पादन सिस्टम भारत में ला रहा है एवं स्मार्ट मोबाइल फोन का भारत में उत्पादन कर उसे विश्व के अन्य देशों को भारत से निर्यात किया जाएगा।

भारत के विशाल बाजार को देखते हुए आज विश्व के कई देश भारत के साथ द्विपक्षीय मुक्त व्यापार समझौता सम्पन्न करने के लिए लालायित दिखाई दे रहे हैं। भारत का अभी हाल ही में ओमान, कतर, यूनाइटेड किंगडम और यूरोप के चार देशों के साथ द्विपक्षीय मुक्त व्यापार समझौता सम्पन्न हुआ है। यूरोपीयन यूनियन के साथ भी द्विपक्षीय व्यापार समझौता के सम्बंध में वार्ताएं सफलता पूर्वक आगे बढ़ रही हैं एवं इसके शीघ्र ही सम्पन्न होने की सम्भावना है। साथ ही, भारत और अमेरिका के बीच भी द्विपक्षीय मुक्त व्यापार समझौता नवम्बर 2025 तक सम्पन्न होने की सम्भावनाएं अब दिखाई देने लगी है। सम्भव है कि नवम्बर 2025 माह में अमेरिका के राष्ट्रपति डानल्ड ट्रम्प भारत आकार इस समझौते की घोषणा करें।

रूस के राष्ट्रपति श्री बलादिमिर पुतिन भी शीघ्र भारत आ रहे हैं और रूस के भारत के साथ व्यापार बढ़ाने पर जोर दिए जाने की प्रबल सम्भावना है। भारत अभी रूस से भारी मात्रा में कच्चे तेल का आयात कर रहा है एवं रूस को भारत से निर्यात होने वाले उत्पादों की मात्रा अभी बहुत कम है। इस तरह भारत का रूस के साथ व्यापार घाटा बहुत अधिक हो गया है। चीन के साथ भी भारत का व्यापार घाटा बहुत अधिक मात्रा में है, जिसे कम करने के लिए चीन के साथ भी भारत की बातचीत चल रही है।

कुल मिलाकर आगे आने वाले समय में भारत की आर्थिक विकास दर के तेज होने की प्रबल सम्भावना है, जो 10 प्रतिशत प्रतिवर्ष तक के आंकडें को भी छू सकती है।

 

प्रहलाद सबनानी

सेवानिवृत्त उपमहाप्रबंधक,

भारतीय स्टेट बैंक

के-8, चेतकपुरी कालोनी,

झांसी रोड, लश्कर,

ग्वालियर – 474 009

मोबाइल क्रमांक – 9987949940

ई-मेल – prahlad.sabnani@gmail.com

अभागा थारपारकर…

इस समय भारत की सीमा से सटा (कच्छ, बाड़मेर, जैसलमेर, जालौर जिले की सीमाओं को स्पर्श करने वाला), पाकिस्तान का ‘थारपारकर’ जिला, ‘दियारी’ (दिवाली) मना रहा हैं। आज भी वहां की 48% जनसंख्या हिंदू हैं। किंतु यह दियारी उत्सव खुलेपन से मनाने की स्थिति वह नहीं हैं। पिछले कुछ वर्षों में हिंदुओं पर आक्रमण बढ़े हैं। हिंदू लड़कियों को उठाकर ले जाना, उन्हें बलात् मुस्लिम धर्म में धर्मांतरित कर उनसे विवाह करना, बाद में उन्हें छोड़ देना यह आम बात हैं। हालांकि पाकिस्तान में थारपारकर जिले को सबसे ज्यादा सांप्रदायिक सौहार्द्र वाला जिला माना जाता हैं। किंतु जमिनी हकीकत कुछ और हैं।

थारपारकर पहले ऐसा नहीं था। 1947 में विभाजन के समय, थारपारकर में हिंदू जनसंख्या का अच्छा खासा प्रतिशत था। यह सारे सिंधी भाषिक थे। गरीबी अत्यधिक थी। भाग कर हिंदुस्तान में जाने के लिए भी पैसे नहीं थे। इसलिए, इनमें से अधिकतर वहीं रुक गए। विभाजन के बाद भी कुछ समय तक, इनका राजस्थान और गुजरात से अच्छा खासा संबंध और संपर्क बना रहा। किंतु बाद में हिंदू मंदिरों पर हमले बढ़ने लगे। कोयला खदान और अन्य परियोजनाओं के कारण, पाकिस्तान के अन्य क्षेत्रों से मुस्लिम यहां आकर बसने लगे। धीरे-धीरे जनसंख्या असंतुलन निर्माण होता गया। हिंदू दिनों दिन असुरक्षित होते गए।

विभाजन के समय थारपारकर के साथ धोखा हुआ। उन दिनों असम यह हिंदू बहुल (कांग्रेस शासित) प्रदेश था। उसमें सिलहट यह मुस्लिम बहुसंख्य (60% मुस्लिम) जिला था। इसी आधार पर, जवाहरलाल नेहरू ने सिलहट में जनमत संग्रह की बात मान ली। 6 जुलाई 1947 को जनमत संग्रह हुआ। 56% लोगों ने पाकिस्तान के पक्ष में मतदान किया, और 14 अगस्त 1947 को, सिलहट पूर्वी पाकिस्तान (वर्तमान में बांग्लादेश) का हिस्सा बन गया।

इस न्याय से थारपारकर में भी जनमत संग्रह कराना चाहिए था। यह सिंध प्रांत का हिस्सा था। सिंध में मुस्लिम लीग की सरकार थी। अतः सिंध का पाकिस्तान में जाना तय था। इस सिंध में, थारपारकर जिले में, हिंदुओं की जनसंख्या 70% से भी ज्यादा थी। किंतु हम सब का, थारपारकर के हिंदुओं का, और अपने देश का दुर्भाग्य रहा, की थारपारकर में जनमत संग्रह की कोई बात नेहरू जी ने नहीं रखी। इसलिए, हिंदू बहुल होते हुए भी थारपारकर, 14 अगस्त 1947 को पाकिस्तान का हिस्सा बन गया।

इस थारपारकर के दुर्भागी हिंदुओं के जीवन में एक और अवसर अवसर आया था, भारत में शामिल होने का…

1971 के दिसंबर में भारत और पाकिस्तान के बीच युद्ध छिड़ गया। यह युद्ध 3 दिसंबर से 16 दिसंबर तक, कुल 13 दिन चला।

इस युद्ध में भारतीय सेना की 10 पैरा कमांडो बटालियन ने 5 दिसंबर को, थारपारकर जिले के छाछरो (Chachro) में गोरिल्ला हमला करने की योजना पर काम प्रारंभ किया। यहां पाकिस्तान रेंजर्स के विंग का मुख्यालय था। इस मुख्यालय को ध्वस्त किया गया।

यह छापे बड़े जबरदस्त थे। सारी रात भारतीय सेना ने, दुश्मन के इलाके में चलकर, उनके ठिकानों को नष्ट किया। यह पूरा रेतीला क्षेत्र था। इसमें सेना ने तेज गतिशीलता दिखाई। हल्के हथियारों का और LMG माउंटेड वाहनों का उपयोग किया। लक्ष्य पर ‘हिट एंड एक्सफिल’ किया। इस पूरे अभियान में, भारतीय सेना से कोई भी हताहत नहीं हुआ। किंतु अनेक पाकिस्तानी सैनिक और सैन्य अधिकारी मारे गए।

सोमवार, 8 दिसंबर को भारतीय सेना ने वीरवाह और नगरपारकर पर कब्जा कर लिया। जिस दिन युद्ध विराम हुआ उसी दिन, अर्थात 16 दिसंबर को, भारतीय सेना का कब्जा इस्लामकोट तहसील पर भी हो गया था। इसी के साथ, युद्ध विराम के समय, भारतीय सेना ने पाकिस्तान का लगभग 13,000 वर्ग किलोमीटर का क्षेत्र, अपने नियंत्रण में ले लिया था।

थारपारकर की इस महत्वपूर्ण जीत के लिए इस अभियान का नेतृत्व करने वाले लेफ्टिनेंट कर्नल भवानी सिंह को ‘महावीर चक्र’ से सम्मानित किया गया, तो 10 पैरा बटालियन को ‘Battle Honour ‘Chachro 1971’ मिला।

अपने नियंत्रण में आने के बाद, इस क्षेत्र में, भारतीय सरकार ने नागरी प्रशासन व्यवस्था प्रारंभ की। अधिकारी नियुक्त हुए। मेजर जनरल आर डी हिम्मतसिंह जी (General Officer Commanding, 11 Infantry Division) उन दिनों भुज – नालियां – खावड़ा सेक्टर के प्रमुख थे। उन्हीके अधीन थारपारकर का नियंत्रण दिया गया। लेफ्टिनेंट कर्नल भवानी सिंह, प्रारंभिक दिनों में कमांडिंग अधिकारी थे।

20 राजपूत इन्फेंट्री बटालियन, नगरपारकर और विरावाह क्षेत्र में प्रशासनिक नियंत्रण की मुख्य इकाई बनी। गुजरात फ्रंटियर्स स्काउट्स और बॉर्डर सिक्योरिटी फोर्स (BSF) के कुछ अधिकारी कानून व्यवस्था, डाक, स्वास्थ्य, खाद्यान्न वितरण आदी कार्य देख रहे थे।

कर्नल एस सी भंडारी, प्रशासनिक दृष्टि से स्थानीय प्रमुख अधिकारी थे। इन्होंने वहां डाकघर खोले। इनके अतिरिक्त, कैप्टन के आर पटेल, लेफ्टिनेंट कर्नल एन बी कपूर आदि अधिकारी, लॉजिस्टिक्स और राशन वितरण से लेकर सभी व्यवस्थाएं देख रहे थे। भारतीय डाक विभाग ने छाछरो, नगरपारकर और मिठी में अस्थाई पोस्ट ऑफिस खोलें। भारतीय रुपये और भारतीय डाक टिकट, चलन मे आने लगे। स्थानीय हिंदू नेता, मिठी के ठाकुर जगदीश सिंह और छाछरो से लालजी महराज को, सेना की सलाहकार समिति में जोड़ा गया।

इस क्षेत्र का पहला पोस्ट ऑफिस 11 जनवरी 1972 को खुला। भारत सरकार ने इस क्षेत्र को पिन कोड भी दिया। इस क्षेत्र का PIN था – 344503 (वर्तमान मे यह पिन कोड, राजस्थान के बाडमेर जिले के सिवान को दिया गया हैं)।

कुल मिलाकर, वर्ष 1972 यह थारपारकर के लोगों के लिए बड़ा सुकून भरा, आश्वासक और विशेष था। इस वर्ष, शुक्रवार 29 सितंबर से रविवार 8 अक्टूबर तक, इस पूरे क्षेत्र में नवरात्रि बड़े धूमधाम से मनाई गई। 6 अक्टूबर की अष्टमी पूजा बड़ी विशेष रही। थारपारकर के हिंदुओं में गजब का उत्साह और आनंद था। वर्ष 1972 की दियारी (दिवाली), शुक्रवार 20 अक्टूबर को थी। शायद थारपारकर के हिंदुओं के लिए यह दिवाली सबसे अच्छी (और शायद स्वतंत्र भारत की अंतिम) रही..!

किंतु इसी बीच 2 जुलाई 1972 को शिमला में इंदिरा गांधी और जुल्फिकार अली भुट्टो के बीच समझौता हुआ। पाकिस्तान के 93,000 सैनिक हमारे कब्जे में थे। थारपारकर क्षेत्र का 13,000 वर्ग किलोमीटर का क्षेत्र हमारे नियंत्रण में था। तुरुप के सारे पत्ते हमारे पास थे।

किंतु इस बार भी हमारे थारपारकर के हिंदू, दुर्भागी ही रहे…

मजेदार बात यह थी, कि पाकिस्तान में, भारतीय सेना के थारपारकर क्षेत्र के नियंत्रण को लेकर कोई विशेष असंतोष या विरोध नहीं था। बांग्लादेश जाने से वह तो पहले से ही पराभूत मानसिकता में थे। पाकिस्तानी नागरिक यह मान कर चल रहे थे, कि हिंदू बहुल थारपारकर क्षेत्र से भारत अपना नियंत्रण कभी नहीं हटाएगा।

किंतु अपनी भलमानसता दिखाने के लिए, नेहरू जी की बेटी इंदिरा गांधी ने, पुनः थारपारकर के सिंधी भाषिक, हिंदू भाई-बहनों के साथ छल किया। उनको धोखा दिया..!

पाकिस्तान पर विजय के ठीक 1 वर्ष और 6 दिन के बाद, अर्थात 22 दिसंबर 1972 को, भारत ने थारपारकर क्षेत्र को पुन: पाकिस्तान को लौटा दिया..!

उन दिनों की स्थिति, पाकिस्तानी जनमानस की भावनाएं, इन सबको देखते हुए लगता हैं कि भारत, थारपारकर को अपने पास सहज रुप से रख सकता था। किंतु रखा नहीं।

इस एक वर्ष के नियंत्रण का परिणाम यह हुआ कि शिमला समझौते के बाद, थारपारकर के अनेक हिंदू समझ गए कि शायद हमें फिर से पाकिस्तान में लौटना होगा। इसलिए जिन हिंदुओं के पास पैसे थे, वह भारत के अन्य भागों में चले गए। इसके कारण हिंदू जनसंख्या कम हो गई।

आज थारपारकर क्षेत्र में फिर भी 48% हिंदू हैं। यह क्षेत्र पाकिस्तान का सबसे उपेक्षित और अविकसित क्षेत्र हैं। यहां भरपूर खनिज संपत्ती मिली हैं। कोयले की अनेक खदानें, कुछ वर्षों से से चल रही हैं। चीन की शंघाई इलेक्ट्रिकल ने 1,320 मेगावाट की परियोजना और 7.8 मिलियन टन प्रतिवर्ष कोयला खनन का ठेका लिया हैं। चाइना मशीनरी इंजीनियरिंग कॉरपोरेशन (CMEC) ने भी इसी प्रकार की परियोजना लगाई हैं।

इस समय थारपारकर के हिंदुओं की स्थिति ठीक नहीं हैं। जवान हिंदू लड़कियों को उठाकर ले जाना आम बात हैं। अधिकतर प्रकरण पुलिस के पास नहीं जाते। मंदिरों पर भी हमले हो रहे हैं…

थारपारकर के हिंदुओं के जीवन में दो अवसर आए थे, इन सब से बच निकलने के। किंतु दुर्भाग्य, जवाहरलाल जी, और बाद में उनकी बेटी इंदिरा जी के कारण, वह भी हाथ से जाते रहे..

आज थारपारकर का हिंदू वास्तव में अभागा हैं..!
(आगामी प्रकाशित होने वाले, ‘इंडिया से भारत – एक प्रवास’ इस पुस्तक के अंश)

(लेखक  प्रशांत पोळ ऐतिहासिक व राजनीतिक विषयों पर शोधपूर्ण पुस्तकें लिखते हैं, इनकी कई पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी है) 

श्रीधर वेलू ने निजी विमान नहीं खरीदा, वे अमरीका से चेन्नई आ गए

वैसे भी, किसी की कुल सम्पत्ति अगर 18 हज़ार करोड़ रूपए की हो, तो 300 करोड़ रूपए के प्राइवेट जेट विमान खरीदने पर ऑडिटर भी एतराज नहीं करेगा। और जब पैसा अथाह हो तो फिर मुश्किल ही क्या है?

यूँ भी, लक्ष्मी जब छप्पर फाड़कर धन बरसाती हैं, तो ऐसे फैसले किसी को खर्चीले नहीं लगते। शायद इसलिए एक खरबपति के लिए जेट विमान ख़रीदना ऐसा ही है जैसे किसी मैनजेर के लिए मारुती कार खरीदना।

लेकिन जोहो कारपोरेशन (Zoho Corporation) के चेयरमैन, श्रीधर वेम्बू पर लक्ष्मी के साथ साथ सरस्वती भी मेहरबान थीं। इसलिए उनके इरादे औरों से बिलकुल अलग थे।

प्राइवेट जेट खरीदना तो दूर, उन्होंने अपनी कम्पनी बोर्ड के निदेशकों से कहा कि वे अब कैलिफ़ोर्निया (अमेरिका) से जोहो कारपोरेशन का मुख्यालय कहीं और ले जाना चाहते हैं।

श्रीधर के इस विचार से कम्पनी के अधिकारी हतप्रभ थे… क्यूंकि सॉफ्टवेयर इंडस्ट्री के लिए कैलिफ़ोर्निया के बे-एरिया से मुफीद जगह दुनिया में और कोई है ही नहीं। गूगल, एप्पल, फेसबुक, ट्विटर या सिस्को — सब के सब इसी इलाके में रचे बसे, फले फूले।

पर श्रीधर तो और भी बड़ा अप्रत्याशित फैसला लेने जा रहे थे। वे कैलिफ़ोर्निया से शिफ्ट होकर सीएटल या हूस्टन नहीं जा रहे थे। वे अमेरिका से लगभग 13000 किलोमीटर दूर चेन्नई वापस आना चाहते थे।

उन्होंने बोर्ड मीटिंग में कहा कि अगर डैल, सिस्को, एप्पल या माइक्रोसॉफ्ट अपने दफ्तर और रिसर्च सेंटर भारत में स्थापित कर सकते हैं तो जोहो कारपोरेशन को स्वदेश लौटने पर परहेज़ क्यों है?

श्रीधर के तर्क और प्रश्नों के आगे बोर्ड में मौन छा गया। फैसला हो चुका था। आईआईटी मद्रास के इंजीनियर श्रीधर वापस मद्रास जाने का संकल्प ले चुके थे।

उन्होंने कम्पनी के नए मुख्यालय को तमिलनाडु के एक गाँव (जिला टेंकसी) में स्थापित करने के लिए 4 एकड़ जमीन पहले से खरीद ली थी। और एलान के मुताबिक, अक्टूबर 2019, यानि ठीक एक साल पहले श्रीधर ने टेंकसी जिले के मथलामपराई गाँव में जोहो कारपोरेशन का ग्लोबल हेडक्वार्टर शुरू कर दिया।

यही नहीं, 2.5 बिलियन डॉलर के जोहो कारपोरेशन ने पिछले ही वर्ष सॉफ्टवेयर डेवलपमेंट कारोबार में 3,410 करोड़ रूपए का रिकॉर्ड राजस्व प्राप्त करके टेक जगत में बहुतों को चौंका भी दिया।

स्वदेश क्यों लौटना चाहते थे श्रीधर?

श्रीधर, अमेरिका की किसी एजेंसी या बैंक या स्टॉक एक्सचेंज के दबाव के कारण स्वदेश नहीं लौटे। उनपर प्रतिस्पर्धा का दबाव भी नहीं था। वे कोई नया व्यवसाय भी नहीं शुरू कर रहे थे।

वे किसी नकारात्मक कारण से नहीं, एक सकारात्मक विचार लेकर वतन लौटे। उन्होंने कई वर्ष पहले संकल्प लिया था कि अगर जोहो ने बिज़नेस में कामयाबी पायी तो वे प्रॉफिट का बड़ा हिस्सा स्वदेश में निवेश करेंगे।

कम्पनी के मुनाफे को वे गाँव के बच्चों को आधुनिक शिक्षा देने पर भी खर्च करेंगे। इसी इरादे से उन्होंने सबसे पहले मथलामपराई गाँव में बच्चों के लिए निशुल्क आधुनिक स्कूल खोले।

कंप्यूटर टेक्नोलॉजी के जानकार श्रीधर गाँव में ही जोहो विश्वविद्यालय भी बना रहे हैं जहाँ भविष्य के सॉफ्टवेयर इंजीनियर तैयार होंगे।

फोर्ब्स मैगज़ीन में दिए एक इंटरव्यू में श्रीधर बताते हैं कि टेक्नोलॉजी को अगर ग्रामीण इलाकों से जोड़ा जाए तो गाँव से पलायन रोका जा सकता है।

“गाँव में प्रतिभा है, काम करने की इच्छा है… अगर आधुनिक शिक्षा से हम बच्चों को जोड़े तो एक बड़ा टैलेंट पूल हमे गाँव में ही मिल जायेगा। इसीलिए मैं भी बच्चों की क्लास में जाता हूँ, उन्हें पढ़ाता भी हूँ। मेरी कोशिश गाँव को सैटेलाइट से जोड़ने की है। हम न सिर्फ दूरियां मिटा रहे हैं, न सिर्फ पिछड़ापन दूर कर रहे हैं, बल्कि शहर से बेहतर डिलीवरी गाँव से देने जा रहे हैं… प्रोडक्ट चाहे सॉफ्टवेयर ही क्यों न हो,” श्रीधर बताते हैं।

तस्वीरें ज़ाहिर करती हैं कि श्रीधर बेहद सहज और सादगी पसंद इंसान हैं। वे लुंगी और बुशर्ट में ही अक्सर आपको दिखेंगे। गाँव और तहसील में आने जाने के लिए वे साईकिल पर ही चल निकलते हैं।

उनकी बातचीत से, हावभाव से, ये आभास नहीं होता कि श्रीधर एक खरबपति सॉफ्टवेयर उद्योगपति हैं जिन्होंने 9 हज़ार से ज्यादा लोगों को रोजगार दिया है जिसमें अधिकाँश इंजीनियर हैं।

उनकी कम्पनी के ऑपरेशन अमेरिका से लेकर जापान और सिंगापुर तक फैले हैं जहाँ 9,300 टेक कर्मियों को रोजगार मिला है। श्रीधर का कहना है कि आने वाले वर्षों में वे करीब 8 हज़ार टेक रोजगार भारत के गाँवों में उपलब्ध कराएंगे और ग्लोबल सर्विस को देश के नॉन-अर्बन इलाकों में शिफ़्ट करेंगे।

शिक्षा के साथ गाँवों में वे आधुनिक अस्पताल, सीवर सिस्टम, पेयजल, सिंचाई, बाजार और स्किल सेंटर स्थापित कर रहे हैं।

एक सवाल अब आपसे…

क्या कारण है कि देश में श्रीधर जैसे हीरों की परख जनता नहीं कर पाती? क्या कारण है कि हम असली नायकों को नज़रअंदाज़ करके छद्म नायकों को पूजते हैं?

श्रीधर चाहते तो आज कैलिफ़ोर्निया में निजी जेट विमान पर उड़ रहे होते, सेवन स्टार लक्ज़री विला में रहते, अपनी कमाई को विदेश में ही निवेश करते जाते… आखिर उन्हें स्वदेश लौटने की ज़रुरत ही क्या थी? फिर भी उनके त्याग का देश संज्ञान नहीं लेता?

क्या कीचड़ उछाल और घृणा-द्वेष से रंगे इस देश में अब श्रीधर जैसे लोग अप्रासंगिक हो रहे हैं?
या हम लोग इतने निकृष्ट और निर्लज होते जा रहे हैं कि नर में नारायण की जगह नालायक ढूंढने लगे हैं?

श्रीधर जैसे अनेक ध्रुव तारे आज देश को आलोकित कर रहे हैं पर इन तारों की चमक, समाज को चौंधियाती नहीं है। उनके कर्म, न्यूज़ चैनल की सुर्खियां को रौशन नहीं करते हैं।

और जिन्हे सुबह शाम रौशन किया जा रहा है वे अँधेरे के सिवा आपको कुछ दे नहीं सकते।

…अगर बच्चों का भविष्य बदलना है… तो कुछ देर के लिए न्यूज़ चैनल बंद कीजिये… और अपने आस पास अपने गाँव देस में श्रीधर ढूंढिए।

साभार — सोशल मीडिया से

सुग्रीव किला को श्री रामजन्मभूमि ने किया आत्मसात

सर्व धर्म समभाव वाली रही अयोध्या

अयोध्या सप्तपुरियों में एक है। हिंदू, मुस्लिम, सिख, जैन, बौद्ध कौन नहीं रींझा। सिखों का पवित्र ब्रह्मकुंड है। मस्लिमों के हजरत नूंह का रिश्ता यही से बताया जाता है। शीश पैगंबर की मजार है। जैन धर्म के छह तीर्थांकरों की जन्मभूमि है। बौद्ध दार्शनिक अश्वघोष यहीं पैदा हुए। महात्मा बुद्ध ने कई चतुर्मास यहां किए। रामजन्मभूमि है, हनुमानगढ़ी है, कनक भवन है, दशरथ महल है, अशर्फी भवन है। न जाने कितने ऐसे स्थल है जों अपने में सदियों का इतिहास समेटे हुए है। भारतीय पुरातत्व सूची में एक साथ तीन स्मारकों को दर्ज किया गया है जिसमें पहला मणि पर्वत, दूसरा कुबेर पर्वत व तीसरा सुग्रीव पर्वत है।

सुग्रीव किला :-

मान्यताओं के अनुसार, जब भगवान राम वानर सेना के साथ लंका पर विजय प्राप्त करके वापस अयोध्या पहुंचे तो महाराजा भरत ने एक किला बनवाया. यह किला श्रीराम और उनके साथ आने वालों के स्वागत के लिए बनाया गया था. बताया जाता है कि यहीं पर सबका भव्य स्वागत हुआ. बाद में श्रीराम ने यह किला अपने परम मित्र सुग्रीव को सौंप दिया. तभी से यह किला सुग्रीव किला के नाम से जाना जाता है. धार्मिक मान्यता है कि यहां पर दर्शन करने आने वालों के सभी शत्रु परास्त हो जाते हैं.।

हनुमानगढ़ी किले के बिलकुल पास

यह सुग्रीव किला हनुमानगढ़ी किले के बिलकुल पास है, लेकिन यह उसके मुकाबले कुछ ऊंचाई पर बना हुआ है. श्रीराम जन्मभूमि परिसर के निकट स्थित सुग्रीव किला अपने आप में एक ऐसा ऐतिहासिक और पौराणिक स्थल है, जिसके दर्शन मात्र से समस्त शत्रुओं का नाश हो जाता है। इस प्राचीन किले का निर्माण महाराजा भरत ने त्रेतायुग में भगवान श्रीराम के लंका विजय के पश्चात अयोध्या लौटने पर उनके स्वागत हेतु रत्नों से करवाया था। तत्पश्चात, अयोध्या नरेश भगवान श्रीराम ने यह स्थान महाराजा सुग्रीव को अयोध्या में रहने के लिए दिया था। तभी से यह प्रसिद्ध स्थान सुग्रीव किला के नाम से जाना जाता है। आज भी इस स्थान की पौराणिकता पुरातत्व विभाग में दर्ज है। अयोध्या में श्री राम जन्म भूमि परिसर के करीब स्थित सुग्रीव किले का जीर्णोद्धार महाराजा विक्रमादित्य ने कराया था. इस मंदिर में आज भी भगवान श्री राम, माता सीता तथा लक्ष्मण के साथ राजा सुग्रीव की भी पूजा होती है. धार्मिक मान्यता है कि जब प्रभु राम लंका पर विजय प्राप्त कर अयोध्या लौटे थे तो उनके साथ वानर राज सुग्रीव भी अयोध्या आए थे. श्री राम के स्वागत में महाराजा भरत ने माणियो से यह किला बनवाया था . जिसके बाद इस स्थान को महाराजा सुग्रीव को अयोध्या में रहने के लिए के लिए दे दिया था . तभी से यह प्रसिद्ध स्थान सुग्रीव किला के नाम से जाना जाता है।

भारतीय पुरातात्विक सर्वेक्षण विभाग (एएसआई) द्वारा संरक्षित स्मारकों की श्रेणी में सूचीबद्ध इस किले के संस्थापक आचार्य जगद्गुरु रामानुजाचार्य स्वामी पुरुषोत्तमाचार्य थे. वे देवरहा बाबा के शिष्य थे. जब राम मंदिर आंदोलन चला तो शुरुआती दिनों में यही सुग्रीव किला विश्व हिन्दू परिषद की गतिविधियों का केंद्र स्थान बना।

योगीजी ने किया था गोपुरम काअनावरण

उत्तर प्रदेश के मुख्य मंत्री आदित्यनाथ ने 20 नवंबर 2024 को अयोध्या का दौरा किया था. इस दौरान सीएम योगी ने सुग्रीव किला में गोपुरम का अनावरण किया था. गौरतलब है कि गोपुरम मंदिरों का मुख्य प्रवेश द्वार होता है. यह हिंदू मंदिरों के स्थापत्य का प्रमुख अंग भी होता है. गोपुरम को मंदिर की सुरक्षा और प्रवेश द्वार का भी प्रतीक माना गया है. कहा जाता है यह पृथ्वी और स्वर्ग के बीच की सीमा को भी दर्शाता है. गोपुरम को आध्यात्मिक ज्ञान और ईश्वर से जुड़ाव का द्वार भी माना जाता है.

 

आप हाल ही में, अयोध्या में श्रीराम जन्मभूमि मंदिर के लिए सुग्रीव परिसर के मार्ग का निर्माण पूरा हो चुका है. इस मार्ग में राजस्थान के गुलाबी पत्थर लगाए गए हैं और इसमें श्रद्धालुओं के लिए आवश्यक सुविधाएं शामिल हैं, जैसे कि लॉकर और व्हीलचेयर की सुविधा आदि को बढ़ाया गया है.

 

लेखक परिचय:-

(लेखक भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण, में सहायक पुस्तकालय एवं सूचनाधिकारी पद से सेवामुक्त हुए हैं। वर्तमान समय में उत्तर प्रदेश के बस्ती नगर में निवास करते हुए सम सामयिक विषयों,साहित्य, इतिहास, पुरातत्व, संस्कृति और अध्यात्म पर अपना विचार व्यक्त करते रहते हैं।

(वॉट्सप नं.+919412300183)