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दीपावली भौतिक ही नहीं, आत्मिक उजाले का महापर्व

दीपावली केवल दीपों का ही पर्व नहीं है बल्कि यह आत्मा के भीतर बसे अंधकार को मिटाने की साधना का अनुष्ठान है। यह भारतीय संस्कृति की आत्मा है, जो जन-जन के जीवन में सुख, समृद्धि और खुशहाली का उजास फैलाती है। पांच दिवसीय इस उत्सव की श्रृंखला धनतेरस से आरंभ होकर भाई दूज तक चलती है, पर इसका अर्थ केवल उत्सव नहीं, बल्कि एक गहन आध्यात्मिक यात्रा है। दीपावली केवल एक त्योहार नहीं, इसका धार्मिक, सामाजिक, सांस्कृतिक और आर्थिक महत्व भी है। दीपावली का संदेश है कि सच्चा उजाला बाह्य नहीं, बल्कि भीतर में होना चाहिए। हमारी आंतरिक ‘उज्ज्वलता’ ही सच्ची ‘धन्यता’ है, वही हमारे कर्म, करुणा और विवेक का उजाला है। यह पंच दिवसीय पर्वों की श्रृंखला भीतर बसे अहंकार, ईर्ष्या, द्वेष और लोभ जैसे नरकासुरों को समाप्त करने का दुर्लभ अवसर है। दीपावली का मूल भाव है अंधकार से प्रकाश की ओर, अज्ञान से ज्ञान की ओर, नकार से स्वीकार की ओर बढ़ना। जब लाखों दीप जलते हैं, तो वे केवल घरों को नहीं, हृदयों को भी प्रकाशित करते हैं। प्रत्येक दीप हमें यह संदेश देता है कि परिस्थितियाँ चाहे कैसी भी हों, जीवन में धर्म के दीप जलते रहना है, बुझना नहीं।

दीपावली का संबंध अनेक ऐतिहासिक, धार्मिक और दार्शनिक प्रसंगों से जुड़ा है। इसी दिन भगवान रामचंद्रजी चौदह वर्ष के वनवास और रावण पर विजय प्राप्त कर अयोध्या लौटे थे। यह धर्म, मर्यादा और सत्य की विजय का प्रतीक बना। प्राचीन हिन्दू महाकाव्य महाभारत अनुसार कुछ दीपावली को 12 वर्षों के वनवास व 1 वर्ष के अज्ञातवास के बाद पांडवों की वापसी के प्रतीक रूप में मानते हैं। जैन परंपरा में यह दिन अत्यंत पवित्र और ऐतिहासिक है, क्योंकि इसी दिन भगवान महावीर का निर्वाण हुआ और इसीलिए इसे महावीर निर्वाण दिवस कहा जाता है। महावीर का निर्वाण केवल देह का अंत नहीं था, बल्कि आत्मा की पूर्ण जागृति का क्षण था, जब उन्होंने संसार के अंधकार में मोक्ष का शाश्वत दीप प्रज्वलित किया। बौद्ध परंपरा में यह दिन बुद्धत्व की स्मृति का प्रतीक है, वहीं सिक्ख परंपरा में यह दिन गुरु हरगोविंदजी के कारावास से मुक्ति दिवस के रूप में मनाया जाता है, जब उन्होंने अन्य कैदियों को भी मुक्त कराया था। इन सभी प्रसंगों में एक अद्भुत एकता झलकती है-अंधकार से मुक्ति, ज्ञान से आलोक और अहंकार से आत्मा की ओर यात्रा। ‘तमसो मा ज्योतिर्गमय’ अर्थात अन्धकार की ओर नही, प्रकाश की ओर जाओ, यह उपनिषदों की आज्ञा है।

दीपावली अब केवल राष्ट्रीय ही नहीं, अन्तर्राष्ट्रीय पर्व बन गया है। दीपावली को विशेष रूप से हिंदू, जैन और सिख समुदाय के साथ विशेष रूप से दुनिया भर में मनाया जाता है- श्रीलंका, पाकिस्तान, म्यांमार, थाईलैंड, मलेशिया, सिंगापुर, इंडोनेशिया, ऑस्ट्रेलिया, न्यूजीलैंड, फिजी, मॉरीशस, केन्या, तंजानिया, दक्षिण अफ्रीका, गुयाना, सूरीनाम, त्रिनिदाद और टोबैगो, नीदरलैंड, कनाडा, ब्रिटेन शामिल संयुक्त अरब अमीरात, और संयुक्त राज्य अमेरिका। भारतीय संस्कृति की समझ और भारतीय मूल के लोगों के वैश्विक प्रवास के कारण दीपावली मनाने वाले देशों की संख्या धीरे-धीरे बढ़ रही है। कुछ देशों में यह भारतीय प्रवासियों द्वारा मुख्य रूप से मनाया जाता है, अन्य दूसरे स्थानों में यह सामान्य स्थानीय संस्कृति का हिस्सा बनता जा रहा है।

दीपावली का एक और महत्त्वपूर्ण पहलू है गोवर्धन पूजा, जो प्रकृति के प्रति आभार का प्रतीक है। यह हमें सिखाती है कि समृद्धि केवल मनुष्य की मेहनत से नहीं, बल्कि प्रकृति की कृपा से भी मिलती है। गाय, अन्न, जल, वृक्ष, मिट्टी-सबका सम्मान ही सच्ची पूजा है। भाई दूज इस श्रृंखला का अंतिम दिन है, जो स्नेह और पारस्परिक विश्वास का दीप जलाता है। यह पर्व केवल बहन-भाई के संबंधों का उत्सव नहीं, बल्कि जीवन में प्रेम, सहयोग और संरक्षण के भाव को पुष्ट करने का अवसर है। दीपावली का मूल भाव अंधकार दूर भगाना है। जीवन को सुख और समृद्धि की रोशनी से जगमग करना है। एक पौराणिक कथा के अनुसार विंष्णु ने नरसिंह रूप धारणकर हिरण्यकश्यप का वध किया था तथा इसी दिन समुद्रमंथन के पश्चात लक्ष्मी व धन्वंतरि प्रकट हुए। कई लोग दीपावली को भगवान विष्णु की पत्नी तथा उत्सव, धन और समृद्धि की देवी लक्ष्मी से जुड़ा हुआ मानते हैं। आज दीपावली का स्वरूप भले ही भव्य और चकाचौंध से भरा हो, पर इसका सच्चा अर्थ है भीतर के दीप को जलाना। जैसे हम घरों की सफाई करते हैं, वैसे ही अपने मन की सफाई भी आवश्यक है। ईर्ष्या, क्रोध, स्वार्थ और असत्य का अंधकार मिटे, और उसकी जगह सच्चाई, सहिष्णुता, करुणा और सेवा का उजास फैले-यही दीपावली का सार है। महात्मा गांधी ने कहा था, “सच्चा दीपक वही है जो अंधकार में राह दिखाए, न कि केवल सजावट बने।” यदि हम एक दीप अपने भीतर जलाएं-मानवता का, विनम्रता का, और सहअस्तित्व का तो यही सबसे बड़ा पूजन होगा।

दीपावली का पर्व ज्योति का पर्व है। दीपावली का पर्व पुरुषार्थ का पर्व है। यह आत्म साक्षात्कार का पर्व है। यह अपने भीतर सुषुप्त चेतना को जगाने का अनुपम पर्व है। यह हमारे आभामंडल को विशुद्ध और पर्यावरण की स्वच्छता के प्रति जागरूकता का संदेश देने का पर्व है। प्रत्येक व्यक्ति के अंदर एक अखंड ज्योति जल रही है। उसकी लौ कभी-कभार मद्धिम जरूर हो जाती है, लेकिन बुझती नहीं है। उसका प्रकाश शाश्वत प्रकाश है। वह स्वयं में बहुत अधिक देदीप्यमान एवं प्रभामय है। इसी संदर्भ में महात्मा कबीरदासजी ने कहा था-‘बाहर से तो कुछ न दीसे, भीतर जल रही जोत’। जो महापुरुष उस भीतरी ज्योति तक पहुँच गए, वे स्वयं ज्योतिर्मय बन गए। जो अपने भीतरी आलोक से आलोकित हो गए, वे सबके लिए आलोकमय बन गए।

ज्ञान दुनिया का सबसे बड़ा प्रकाश दीप है। जब ज्ञान का दीप जलता है तब भीतर और बाहर दोनों आलोकित हो जाते हैं। अंधकार का साम्राज्य स्वतः समाप्त हो जाता है। ज्ञान के प्रकाश की आवश्यकता केवल भीतर के अंधकार मोह-मूर्च्छा को मिटाने के लिए ही नहीं, अपितु लोभ और आसक्ति के परिणामस्वरूप खड़ी हुई पर्यावरण प्रदूषण और अनैतिकता जैसी बाहरी समस्याओं को सुलझाने के लिए भी जरूरी है। यह हमारे आभामंडल को विशुद्ध और पर्यावरण की स्वच्छता के प्रति जागरूकता का संदेश देने का पर्व है। प्रत्येक व्यक्ति के अंदर एक अखंड ज्योति जल रही है। उसकी लौ कभी-कभार मद्धिम जरूर हो जाती है, लेकिन बुझती नहीं है। उसका प्रकाश शाश्वत प्रकाश है। वह स्वयं में बहुत अधिक देदीप्यमान एवं प्रभामय है। इसी संदर्भ में महात्मा कबीरदासजी ने कहा था-‘बाहर से तो कुछ न दीसे, भीतर जल रही जोत’। जो महापुरुष उस भीतरी ज्योति तक पहुँच गए, वे स्वयं ज्योतिर्मय बन गए। युद्ध, आतंकवाद, भय, हिंसा, प्रदूषण, अनैतिकता, ओजोन का नष्ट होना आदि समस्याएँ इक्कीसवीं सदी के मनुष्य के सामने चुनौती बनकर खड़ी है। आखिर इन समस्याओं का जनक भी मनुष्य ही तो है। मनुष्य को मोह का अंधकार भगाने के लिए धर्म का दीप जलाना होगा। जहाँ धर्म का सूर्य उदित हो गया, वहाँ का अंधकार टिक नहीं सकता।

दीपावली का संदेश सीमित नहीं है; यह हमें समाज, संस्कृति और मानवता के स्तर पर नया दृष्टिकोण देता है। यह केवल दीपों की पंक्तियाँ नहीं, बल्कि जीवन की दिशा है। हम केवल अपने घर को नहीं, बल्कि किसी और के जीवन को भी रोशन करेंगे। यह पर्व हमें याद दिलाता है कि प्रकाश की सबसे बड़ी जीत तब होती है जब वह अंधकार के सबसे गहरे कोने में पहुँचता है। हरिवंश राय बच्चन के शब्दों में-“दीप जलाओ लेकिन ऐसे, जिसमें धुआँ न हो; उजाला हो, पर अहंकार न हो।” जब भीतर का दीप जलता है, तो बाहरी दीप स्वतः दीप्तिमान हो उठते हैं। दीपावली पर्व की सार्थकता के लिए जरूरी है, दीये बाहर के ही नहीं, दीये भीतर के भी जलने चाहिए। क्योंकि दीया कहीं भी जले उजाला देता है। दीए का संदेश है-हम जीवन से कभी पलायन न करें, जीवन को परिवर्तन दें, क्योंकि पलायन में मनुष्य के दामन पर बुजदिली का धब्बा लगता है, जबकि परिवर्तन में विकास की संभावनाएँ जीवन की सार्थक दिशाएँ खोज लेती हैं।

प्रेषकः

(ललित गर्ग)
लेखक, पत्रकार, स्तंभकार
ई-253, सरस्वती कंुज अपार्टमेंट
25 आई. पी. एक्सटेंशन, पटपड़गंज, दिल्ली-92
फोनः 22727486, 9811051133

माओवाद का खात्मा

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के मार्गदर्शन में गृहमंत्री अमित शाह ने देश की आंतरिक सुरक्षा के लिए सबसे बड़ा खतरा बने माओवाद को मार्च 2026 तक समाप्त करने का जो संकल्प लिया है वह अब सिद्धि की ओर अग्रसर है। देश का एक बहुत बड़ा भू भाग जो विकास की मुख्यधारा से अलग था अब शेष भारत के साथ कदम से कदम मिलाकर चलने को तत्पर है। माओवाद का अंत गृहंमत्री अमित शाह के संकल्प व प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के विकास मन्त्र से ही संभव हो सका है।

आज छत्तीसगढ़ के नक्सवलादी आतंकवाद के लिए कुख्यात बस्तर में तिरंगा फहरा रहा है और  नक्सलवादियों  के गढ़ में गृहमंत्री अमित शाह की जनसभाएं हो रही हैं। गृहमंत्री नक्सलवादियों को स्पष्ट संदेश देते हैं कि, “माओवादियों आपके पास अब दो ही विकल्प बचे हैं या तो समर्पण कर दें या फिर एनकाउंटर के लिए तैयार रहें”। इस सख्ती का ही असर है कि 17 अक्टूबर 2025 को छत्तीसगढ़ में एक साथ 210 माओवादियों ने  एक साथ समर्पण किया है ।

उधर महाराष्ट्र के गढ़चिरौली में मुख्यमंत्री देवेंद्र  फडणवीस के समक्ष छह करोड़ रुपए के इनामी माओवादी पोलित ब्यूरो सदस्य मल्लेजुला वेणुगोपाल राव उर्फ भूपति उर्फ सोनू उर्फ अभय  ने 60 साथियों सहित बंदूक छोड़कर विकास कि राह थाम ली है। इन माओेवादियों ने 54 हथियारों के साथ आत्मसमर्पण किया है जिनमें  सात एके 47 और  नौ इंसास राइफलें है। भूपति माओवादी संगठन में सबसे प्रभावशाली रणनीतिकारों में माना जाता था  और  उसने लंबे समय तक  महाराष्ट्र -छत्तीसगढ़ सीमा पर अभियानों का नेतृत्व किया। भूपति वही खतरनाक माओवादी आतंकवादी है जिसने छत्तीसगढ़ में सीआारपीएफ के 76 जवानों का नरसंहार किया था।

महाराष्ट्र का गढ़चिरौली जिला दशकों से माओवादी गतिविधियों का केंद्र रहा है। इस क्षेत्र के  शीर्ष माओवादी का समर्पण शेष बचे हुए नक्सलियों खासकर निचले स्तर के कैडर को सीधा संदेश दे रहा है कि अब जब उनका सबसे बड़ा और अनुभवी नेता हथियर डाल रहा है तो उनके पास भागने या छिपने का कोई रास्ता नहीं बचा है। इससे वे भी समर्पण करने के लिए मन बनायेंगे । यह समर्पण छत्तीसगढ़, महाराष्ट्र, तेलंगाना जैसे राज्यों के लिए शांति का बड़ा संकेत है। भूपति व उसके साथियों के समर्पण करने से  माओवादियों की सबसे मजबूत दीवार ढह गई है।

जनवरी 2023 में गृहमंत्री अमित शाह ने माओवाद के खिलाफ ऑपरेशन को हरी झंडी दी, उसके बाद से अब तक सुरक्षाबलों ने 312 माओवादियों को मार गिराया है। मारे गए माओवादियों में में सीपीआई माओवादी महासचिव वासव राजू समेत पोलित ब्यूरो और केंद्रीय समिति के आठ सदस्य भी शामिल हैं। 21 जनवरी 2024 से लेकर अब तक माओवाद के खिलाफ अनेक ऑपरेशन  सफलतापूर्वक चलाए जा चुके हैं,   जिनमें  836 माओवादी गिरफ्तार किये गए हैं और 1639 आत्मसमर्पण  कर चुके हैं। आत्मसमर्पण करने वालों में  पोलित ब्यूरो और एक केंद्रीय समिति सदस्य शामिल है।

वर्ष 2010 में पूर्व प्रधानमंत्री स्वर्गीय मनमोहन सिंह ने माओवाद को भारत की सबसे बड़ी चुनौती बताया था किंतु उस समय राजनैतिक कारणों से माओवाद के पूर्ण सफाए का कोई ब्लूप्रिंट नहीं बन पाया था। मनमोहन सरकार के कार्यकाल में माओवादी बहुत बड़ी चुनौती थे। उस समय ये  नेपाल के पशुपतिनाथ से आंघ्र प्रदेश के तिरुपति तक लाल कारिडोर बनाने का सपना देख रहे थे । ये  भारत, भारत के संविधान और भारत की सनातन संस्कृति से बैर रखते हैं। इनको सशक्त राष्ट्र नहीं चाहिए।

 

वर्ष 2013 में विभिन्न राज्यों के 126 जिलों के माओवादी हिंसा से ग्रस्त होने की रिपोर्ट केंद्र को भेजी गई थी। वर्ष 2014 में मोदी सरकार आने के बाद से मार्च 2025 तक यह संख्या 126 से घटकर केवल 18 जिलों तक सीमित रह गई है। वर्तमान में नक्सल प्रभावित  जिलों की संख्या 11 रह गई है। इनमें छत्तीसगढ़  के सात जिले, झारखंड का एक जिला पश्चिम सिंहभूम, मध्यप्रदेश का एक जिला बालाघाट, महाराष्ट्र का एक जिला गढ़ चिरौली  और ओडिशा का एक जिला कंधमाल शामिल है। इनमें भी अब छत्तीसगढ़ के तीन जिले बीजापुर, नाराणपुर और सुकमा ही अति माओवादी प्रभावित बचे हैं ।

वर्ष 2014 के पूर्व माओवाद प्रभावित क्षेत्रों में 15 अगस्त और  26 जनवरी जैसे राष्ट्रीय  पर्वों पर तिरंगा फहराना अपराध माना जाता था, गरीबों के लिए सरकारी सहायता नहीं पहुच पाती थी और दूर दराज के गांवो से किसी भी माध्यम से संपर्क नहीं  हो पाता था।

अब समय बदल चुका है,  छत्तीसगढ़ के माओवाद से मुक्त हुए क्षेत्रों में विकास की नई गंगा बह रही है। बस्तर जैसे कुख्यात जिले मे तिरंगा शान से फहरा रहा है। युवा बड़ी संख्या में खेलो इंडिया जैसे कार्यक्रमों में भागीदारी कर रहे है। माओवादियों से मुक्त हुए क्षेत्रों में बुनियादी ढांचे का तीव्र विकास किया जा रहा है। कल्याणकारी योजनाएं लागू की जा रही हैं जिससे वहां की जनता दोबारा माओवादियों के दुष्प्रचार में न फंसे। माओवाद के विरुद्ध अभियान के अंतर्गत उनकी  फंडिग को रोकने का काम भी किया जा है।

जैसे  – जैसे माओवाद  के सफाए का अभियान आगे बढ़ रहा है वैसे वैसे उसके समर्थक राजनैतिक तत्वों के पेट मे दर्द भी उठ रहा है। माओवाद के समर्थन से फल फूल रहे वामपंथी दलो ने केंद्र सरकार को पत्र लिखकर माओवादियों के खिलाफ चलाए जा रहे अभियान को बंद करने की अपील तक कर दी। तेलंगना के मुख्यमंत्री रेवंत रेड्डी  ने तो एक कार्यक्रम में कह दिया कि, “माओवाद एक विचारधारा है जो कभी समाप्त नहीं हो सकती। सोशल मीडिया पर भी माओवादी विचारधारा के समर्थकभी यही बात कह रहे हैं कि यह विचारधारा पूरी तरह समाप्त नहीं हो सकती।

माओवाद एक जहरीली, खतरनाक और नरसंहार का समर्थन करने वाली विचारधारा है जिसका अंत करने के लिए सरकार ने अपनी पूरी ताकत झोंक दी है। सुरक्षा बल आक्रामक भी हैं और समर्पण करने वालों का स्वागत भी कर रहे हैं। पुनर्वास और पुनर्जीवन का प्रयास कर रही है। विकास को हर द्वार तक ले जा रही है जिससे आम व्यक्ति नक्सल के लाल आतंक के भय को भूल कर आगे बढ़ सके।

प्रेषक – मृत्युंजय दीक्षित

फोन नं. – 9198571540

बटुकों के मंगलाचरण और शंखध्वनि के साथ हुआ नासिक के दैनिक भास्कर के नए संस्करण का आगमन

नासिक। ये एक अनोखा आयोजन था। नासिक के स्वामी नारायण मंदिर के भव्य सभाग्रह में नासिक के प्रमुख लोगों और संतों व महात्माओं की उपस्थिति में बटुकों के नंदीवाचन व शंखनाद की सामूहिक गूँज के साथ दैनिक भास्कर के नासिक संस्करण का शुभारंभ हुआ। महर्षि गौतम गोदावरी वेद विद्या प्रतिष्ठान के विद्यार्थियों ने मंत्रोच्चार किया। गुणगौरव न्यास संचालित अनंत विजय शंखनाद पथक ने वैदिक मंत्रों पर शंखनाद किया।

कार्यक्रम के मुख्य अतिथि महानिर्वाणी अखाड़ा के अध्यक्ष, श्री वैष्णोदेवी श्राईन बोर्ड के सदस्य  व मुंबई के विले पार्ले स्थित संन्यास आश्रम के पूज्य स्वामी महामंडलेश्वर विश्वेश्वरानंद जी थे। उन्होंने कहा कि संत समाज सभी को सुखी और निरोग देखना चाहता है। उन्होंने कहा सनातन धर्म का उद्देश्य पूरी दुनिया समभाव और सद्भावना को बढ़ाना है और यही संतों को भी वाणी है।

उन्होंने कहा कि नासिक में भास्कर का आगमन कुंभ से पहले हुआ है। उन्होंने समाचार माध्यमों की विश्वसनीयता पर कहा, ‘हमें कई माध्यमों से समाचार प्राप्त होते हैं लेकिन लोगों का विश्वास समाचार पत्र पर सबसे अधिक होता है। समाचार पत्र पहले भी सूचनाओं का सबसे विश्वसनीय स्रोत माने जाते थे और आज भी हैं। हम सभी जिज्ञासु हैं और जानना चाहते हैं। हमारे जानने की इच्छा के कारण ही महाभारत, श्रीमद्भागवत गीता जैसे महान ग्रंथों की रचना हुई है। उसी जिज्ञासा को पूरी सच्चाई के साथ दैनिक भास्कर शांत करता है।

उपस्थित सभी संतों ने समाज के प्रति दैनिक भास्कर के सरोकार का समाना करते हुए धार्मिक नगरी में उसके आगमन पर शुभकामनाएँ और आशीर्वाद दिया।

उल्लेखनीय है कि नासिक के  सिंहस्थ में  में 2027 में 2 अगस्त, 31 अगस्त और 11 सितंबर को अमृत स्नान और 42 पूर्व स्नान होंगे। इन तिथियों की सूचना दैनिक भास्कर को अपने प्रसार क्षेत्रों में देनी चाहिए।

इससे पहले संतों का स्वागत दैनिक भास्कर के चेयरमैन और प्रधान संपादक मनमोहन असवाल, प्रबंध संचालक कैलाश अग्रवाल, संचालक राकेश अग्रवाल, संचालक सुमित अग्रवाल, संचालक शिवा अग्रवाल, संचालक पलक आवाल, समूह संपादक प्रकाश दुबे, संचालक (पश्चिम) विल्फ्रेड परेरा और वाइस प्रेसिडेंट डॉ. विद्यापति उपाध्याय ने किया।

संत समागम का आरंभ दीप प्रज्जवलन से हुआ। कार्यक्रम की प्रस्तावना दैनिक भास्कर के समूह संपादक प्रकाश दुबे ने रखी। संत समागम का संचालन श्री पंचमुखी हनुमान मंदिर (श्री दिगंबर अखाड़ा) के महंत भक्तीचरण दास महाराज ने किया।

संत समागम में महंत डॉ. अनिकेत शास्त्री देशपांडे, श्री श्री 1008 महामंडलेश्वर शिवगिरी जी महाराज, अखिल भारतीय श्री पंच दिगंबर अखाड़ा और बड़ा लक्ष्मीनारायण मंदिर के महंत रामस्नेहीदास महाराज, श्री पंचमुखी हनुमान मंदिर (श्री दिगंबर अखाड़ा) के महंत भक्तिचरण दास महाराज, श्री पंचायती आनंद अखाड़ा के श्री महंत शंकरानंद सरस्वतीजी महाराज, अखिल भारतीय श्री पंच दिगंबर अखाड़ा के श्री महंत रामकिशोरदास शास्त्री महाराज, श्री पंच निर्मोही अखाड़ा के श्री श्री 1008 महामंडलेश्वर रघुनाथ महाराज देवबाप्पा (फर्शीवाले बाबा), श्री श्री 1008 महामंडलेश्वर सोमेश्वरानंद सरस्वती महाराज और रामकुंड पुरोहित संघ के पूर्व अध्यक्ष सतीश शुक्ल ने भी विचार व्यक्त किए।

संत समागम में श्री पंचदशनाम जूना अखाड़ा, श्री पंचायती आवाहन अखाड़ा, श्री पंचायती अखाड़ा, श्री पंचायती निरंजनी अखाड़ा, श्री पंचायती आनंद अखाड़ा, श्री महानिर्वाणी अखाड़ा, श्री पंचायती अटल अखाड़ा, श्री पंचायतो बड़ा उदासीन अखाड़ा, श्री पंचायती नया उदासीन अखाड़ा, श्री पंचायती निर्मल अखाड़ा, अखिल भारतीय श्री पंच दिगंबर अखाड़ा, अखिल भारतीय श्री पंच निर्वाणी अखाड़ा, अखिल भारतीय श्री पंच निर्मोही अखाड़ा और स्वामीनारायण मंदिर (बीएपीएस) के महामंडलेश्वर, साधु-महंत और महात्मा उपस्थित थे।

धनतेरस धन के भौतिक एवं आध्यात्मिक समन्वय का पर्व

धनतेरस – 18 अक्टूबर, 2025

धनतेरस का पर्व पंच दिवसीय दीपोत्सव की पवित्र श्रृंखला का आरंभिक द्वार है। यह केवल सोना-चांदी, वस्त्र या बर्तन खरीदने का शुभ दिन नहीं, बल्कि धन के प्रति हमारी सोच को पुनर्संतुलित करने का अवसर है। भारतीय संस्कृति में धन को सदैव देवी लक्ष्मी का प्रतीक माना गया है, परंतु यह पूजन केवल भौतिक संपदा का नहीं, बल्कि धन के नैतिक, सामाजिक और आध्यात्मिक उपयोग का भी प्रतीक है। ऋषि-मुनियों ने धन को केवल मुद्रा नहीं, बल्कि एक ऊर्जा माना है। उपनिषदों में कहा गया है – “धनं मूलं सर्वेषां साधनानाम्”, अर्थात धन सभी साधनों का मूल है, परंतु वही धन शुभ है जो धर्म-संयम से अर्जित और लोककल्याण में नियोजित हो।

धनतेरस हमें याद दिलाता है कि धन केवल संग्रह का नहीं, उपयोग का विषय है। धन का सही उपयोग ही उसे ‘लक्ष्मी’ बनाता है, अन्यथा वह ‘अलक्ष्मी’ – अशांति और विषमता का कारण बन जाता है। कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी तिथि को धनतेरस मनाया जाता है। इस तिथि को धनत्रयोदशी के नाम से भी जाना जाता है। इस दिन बर्तन, सोना-चांदी खरीदना शुभ माना जाता है। भगवान धन्वंतरि को आयुर्वेद का जनक माना जाता है। ऐसे में यह दिन धन्वंतरि को समर्पित किया गया है।

भारतीय संस्कृति में स्वास्थ्य को सबसे बड़ा धन कहा गया है। भगवान धन्वंतरि को भगवान विष्णु का अंश माना गया है, जिन्होंने मानव समाज को चिकित्सा विज्ञान (आयुर्वेद) का ज्ञान दिया। इसी कारण धनतेरस के दिन देशभर में वैद्य समाज भगवान धन्वंतरि जयंती के रूप में उनकी पूजा करता है। धनतेरस का ऐतिहासिक महत्व समुद्र मंथन की पौराणिक कथा से जुड़ा है, जब भगवान धन्वंतरि अमृत कलश लेकर प्रकट हुए थे, इसलिए इसे ‘धनत्रयोदशी’ भी कहते हैं। यह त्योहार भगवान धन्वंतरि को समर्पित है, जिन्हें आयुर्वेद और चिकित्सा का देवता माना जाता है, और धन एवं समृद्धि के देवता भगवान कुबेर की भी पूजा की जाती है। भारत सरकार ने धनतेरस को राष्ट्रीय आयुर्वेद दिवस के रूप में मनाने का निर्णय लिया है। इसी के साथ इस दिन यम दीपक जलाने का भी विधान है। जिसे दीपदान भी कहा जाता है। एक अन्य मान्यता के अनुसार, यमराज से अपनी रक्षा करने के लिए इस दिन यमदीपदान किया जाता है। एक कथा के अनुसार, एक राजा के पुत्र को साँप के काटने से मृत्यु होने की भविष्यवाणी थी, जिसे उसकी पत्नी ने दीप और सोने-चाँदी के ढेर लगाकर यमराज को दूर रखने में सफल हुई। जैन आगम में धनतेरस को ‘धन्य तेरस’ या ‘ध्यान तेरस’ भी कहते हैं।

प्राचीन भारत में धन का वितरण और उपयोग धर्म और नीति के साथ जुड़ा हुआ था। व्यापारी ‘लाभ’ में भी ‘लोक-लाभ’ देखते थे। राजा अपने धन को जनकल्याण, सिंचाई, शिक्षा और सुरक्षा में लगाते थे। किन्तु आधुनिक युग में, विशेषतः पूंजीवादी व्यवस्था के प्रसार के बाद, धन का स्वरूप विकृत हुआ है। धन साधन से लक्ष्य बन गया है। इसके परिणामस्वरूप समाज में अमीरी-गरीबी की खाई, शोषण, और भ्रष्टाचार बढ़ा है। आज एक ओर अरबपतियों की गिनती बढ़ रही है, वहीं दूसरी ओर करोड़ों लोग रोटी और दवा के अभाव में जीवन गुज़ार रहे हैं। धनतेरस का पर्व इस विडंबना पर आत्ममंथन का अवसर है। यह हमें पुकारता है कि हम धन को केवल अपनी तिजोरी का नहीं, बल्कि समाज की समृद्धि का माध्यम बनाएं। लोकमान्यता के अनुसार यह भी कहा जाता है कि इस दिन धन (वस्तु) खरीदने से उसमें तेरह गुणा वृद्धि होती है। इस अवसर पर लोग धनियाँ के बीज खरीद कर भी घर में रखते हैं। दीपावली के बाद इन बीजों को लोग अपने बाग-बगीचों में या खेतों में बोते हैं। धनतेरस के दिन चाँदी खरीदने की भी प्रथा है, चांदी शुद्धता की प्रतीक है यहीं शुद्धता इंसानी जीवन में आये, यही इस पर्व का उद्घोष है।

महात्मा गांधी ने कहा था – “पैसा अपने आप में बुरा नहीं है, परंतु जब वह मनुष्य का स्वामी बन जाता है, तब वह विनाश का कारण बनता है।” धनतेरस का सच्चा संदेश यही है – धन का स्वामी बनो, उसका दास नहीं। धन के प्रति सकारात्मक दृष्टि का अर्थ है उसे साधना, सेवा और संस्कार से जोड़ना। आज आवश्यकता है कि हम धन को साझा समृद्धि, सामाजिक उत्तरदायित्व और मानवीय करुणा के उपकरण के रूप में देखें। आज विश्व अर्थव्यवस्था की सबसे बड़ी चुनौती समान अवसरों का अभाव है। धनतेरस का यह अवसर सरकारों को भी यह संदेश देता है कि वे विकास के लिए धन का न्यायपूर्ण वितरण सुनिश्चित करें। राजकोषीय नीतियाँ केवल अमीर वर्ग के लाभ के लिए नहीं, बल्कि गरीबों के सशक्तिकरण एवं कल्याण के लिए हों। धन की प्रवाह प्रणाली में नैतिकता, पारदर्शिता और संवेदना का समावेश आवश्यक है।

आचार्य श्री महाप्रज्ञ ने भी धन के प्रति एक नया दृष्टिकोण प्रस्तुत किया था। उन्होंने भगवान महावीर के आर्थिक दर्शन को आधुनिक संदर्भों में व्याख्यायित करते हुए ‘महावीर का अर्थशास्त्र’ नामक एक महत्वपूर्ण पुस्तक लिखी। आचार्य महाप्रज्ञ ने स्पष्ट किया कि धन का अर्जन और उपयोग दोनों ही अहिंसक, नैतिक और संयमित होने चाहिए। उनके अनुसार धन तभी सार्थक है जब वह आत्मविकास, समाजकल्याण और न्यायपूर्ण व्यवस्था का साधन बने। उन्होंने महावीर के अर्थशास्त्र में बताया कि “धन की मर्यादा उसका त्याग नहीं, उसका संयम है।” यह विचार धनतेरस के मूल भाव को ही पुष्ट करता है कि धन को नकारा नहीं जाए, बल्कि उसे लोकमंगल में प्रवाहित किया जाए।

धनतेरस का अर्थ केवल भौतिक संपत्ति का नहीं, बल्कि स्वास्थ्य, सद्गुण और आत्मबल का भी प्रतीक है। आयुर्वेद में इसी दिन धन्वंतरि जयंती भी मनाई जाती है, जो चिकित्सा और स्वास्थ्य के देवता हैं। इस परंपरा में धन का अर्थ केवल पैसा नहीं, बल्कि आरोग्य, अन्न, शिक्षा और शांति भी है। आज की सबसे बड़ी आवश्यकता है कि धन और धर्म का संवाद पुनः स्थापित हो। धर्म के बिना धन अंधा है, और धन के बिना धर्म असहाय। धनतेरस हमें सिखाता है कि धन का अर्जन सत्य मार्ग से हो और उसका उपभोग सेवा मार्ग पर हो। आचार्य तुलसी ने अर्जन के साथ विसर्जन का सूत्र दिया, यानि अर्जन के साथ जनकल्याण के लिये विसर्जन का क्रम चले। मनुस्मृति में कहा गया है – “धनं धर्मेण संचिनुयात्”, अर्थात धन का संचय धर्म के मार्ग से ही किया जाना चाहिए।

धनतेरस केवल सोना-चांदी खरीदने का दिन नहीं, बल्कि धन की शुद्धता और सदुपयोग की तपश्चरण का पर्व है। इस तरह से धनतेरस का पर्व केवल धन प्राप्ति का नहीं बल्कि आरोग्य, आयु और समृद्धि की कामना का पर्व है। यह दिन हमें याद दिलाता है कि असली संपत्ति हमारा स्वास्थ्य है। इसलिए इस दिन की पूजा न केवल धार्मिक आस्था से जुड़ी है, बल्कि जीवन के संतुलन और सुख-शांति का भी प्रतीक है। आज जब समाज में धन के कारण विभाजन, भ्रष्टाचार और अन्याय बढ़ रहे हैं, तब धनतेरस हमें प्रेरित करता है – धन को ‘दिव्यता’ में रूपांतरित करने की। यह पर्व हमें पुकारता है कि हम धन के प्रति अपनी दृष्टि बदलें – धन को नकारें नहीं, बल्कि उसे साकार करें; धन से मोह न रखें, परंतु उसे लोकमंगल में प्रवाहित करें। जब धन का प्रवाह धर्म के संग बहता है, तभी सच्चा दीपोत्सव जगमगाता है – अंतर में भी, समाज में भी, और मानवता में भी।

(ललित गर्ग)
लेखक, पत्रकार, स्तंभकार
ई-253, सरस्वती कंुज अपार्टमेंट
25 आई. पी. एक्सटेंशन, पटपड़गंज, दिल्ली-92
फोनः 22727486, 9811051133

न्याय की भाषा पर पटना उच्च न्यायालय में विचार-गोष्ठी का आयोजन

पटना। राजेंद्र सभागार,पटना उच्च न्यायालय में वैश्विक हिंदी सम्मेलन द्वारा अखिल भारतीय भाषा संरक्षण संगठन के साथ आयोजित संगोष्ठी में अध्यक्ष पद से बोलते हुए ‘अखिल भारतीय अधिवक्ता कल्याण परिषद’ के अध्यक्ष धर्मनाथ प्रसाद यादव ने कहा कि महात्मा गांधी जी कहते थे कि भले ही अंग्रेज कुछ और दिन ठहर जाए लेकिन अंग्रेजियत को निकालना पहले जरूरी है। लेकिन इसके विपरीत हुआ यह है कि अंग्रेज तो चले गए लेकिन अंग्रेजी और अंग्रेजियत ने यहां अपने पांव जमा लिए हैं। हमें न्यायपालिका सहित देश की व्यवस्था में अपनी भाषाओं को स्थापित करने के लिए संघर्ष करना होगा।

विचार-गोष्ठी के मुख्य वक्ता और ‘वैश्विक हिंदी सम्मेलन’ के निदेशक डॉ मोतीलाल गुप्ता ‘आदित्य’ ने अपने संबोधन में कहा कि अंग्रेजों के शासन के समय जब अंग्रेज न्यायाधीश होते थे, तब भी यह बात उठी थी कि जनता न्यायाधीश की भाषा सीखे या न्यायाधीश जनता की भाषा सीखें? तब अंग्रेजी सरकार ने भी यह कहा था कि न्यायाधीशों को जनता की भाषा सीखनी चाहिए। लेकिन आजादी के 80 वर्ष बीत जाने पर भी हमें अपने देश में जनता की भाषा में न्याय के लिए संघर्ष करना पड़ रहा है, इसके पीछे अंग्रेज नहीं वे काले अंग्रेज हैं जो निहित स्वार्थ के कारण जनता की भाषा के बजाय अंग्रेजी का वर्चस्व बनाए रखना चाहते हैं।

अतिथि विशेष और ‘बिहार हिंदी साहित्य सम्मेलन’ के अध्यक्ष डॉ अनिल सुलभ ने कहा कि न्याय की याचना करने वाले पीड़ितों को उसकी भाषा में न सुना जाए और न्याय भी उसकी भाषा में न हो, तो इससे बड़ा अन्याय और क्या हो सकता है? क्या इससे देश के कर्णधारों और न्यायकर्ताओं को लज्जा नहीं आती? उन्होंने आगे कहा कि अरब अमीरात में, जहां की भाषा ‘अरबी’ है, वहाँ की न्यायपालिका में हिन्दी तीसरी भाषा के रूप में अपना स्थान बना चुकी है और भारत में ही ‘भारती’ की यह दशा, चिंताजनक है। विशिष्ट अतिथि एवं अपर महाधिवक्ता श्री खुर्शीद आलम ने कहा कि हिंदी एक महान भाषा है जिसका मूल स्रोत संस्कृत है।

पद्मश्री विमल कुमार जैन ने कहा कि भाषा की बात तो दूर की बात है, अंग्रेजियत का हाल यह है कि पिछले 50 साल से सुनते आ रहे हैं कि अदालत में यह काले कोट वाली वेशभूषा बदली जानी चाहिए और भारत के मौसम के अनुकूल वेशभूषा होनी चाहिए, लेकिन उसे भी हम आज तक नहीं बदल सके। हमें भारत के मौसम और भारत की जनता की आवश्यकताओं के अनुकूल न्याय व्यवस्था को बदलना होगा। वरिष्ठ अधिवक्ता उमाशंकर प्रसाद ने संविधान की भाषा संबंधी प्रावधानों पर प्रकाश डाला।

अधिवक्ता एसोसिएशन के संयुक्त सचिव और विधि-विमर्श पत्रिका के संपादक रणविजय सिंह ने कहा कि न्यायपालिका द्वारा जिस प्रकार भारतीय भाषाओ को नकारा जा रहा है उसके विरुद्ध हमें संघर्ष करना होगा और जो अधिवक्ता संघर्ष कर रहे हैं, उनके साथ देना होगा।

कार्यक्रम के संचालक-संयोजक अधिवक्ता इंद्रदेव प्रसाद ने न्यायपालिका में अपने हिंदी के संघर्ष के बारे में बताया और कहा कि जब स्वतंत्रता संग्राम के लिए इतने लोगों ने बलिदान दिए  तो न्यायपालिका में जनता की भाषा में न्याय के लिए हमें भी कुछ बलिदान तो देना ही पड़ेगा। अधिवक्ता श्री अरुण कुशवाहा ने भी इस विषय पर अपने विचार रखें।

कार्यक्रम के दौरान वैश्विक हिंदी सम्मेलन के निदेशक डॉ. मोतीलाल गुप्ता आदित्य द्वारा राष्ट्रीय ‘अधिवक्ता कल्याण परिषद’ के राष्ट्रीय अध्यक्ष धर्मनाथ सिंह यादव को तथा हिंदी सेवी मूरत दास को वैश्विक हिंदी सम्मान से विभूषित करने की घोषणा की गई ।

कार्यक्रम के अंत में डॉ गुप्ता द्वारा बड़ी संख्या में उपस्थित अधिवक्ताओं और अन्य महानुभावों को शपथ दिलवाई गई कि वे बिहार में न्यायपालिका के हर क्षेत्र में हिंदी की स्थापना के लिए हर संभव प्रयास करेंगे और इसके लिए संघर्ष करने वाले अधिवक्ताओं का तन, मन और धन से साथ देंगे।

साभार-vaishwikhindisammelan@gmail.com

धनतेरस व दीपावलीकी पूजा विधि व इसका महत्व

धनतेरस पूजा का शुभ मुहूर्त
धनतेरस 18 अक्टूबर को है. धनतेरस की शाम माता लक्ष्मी, गणेश जी और कुबेर की पूजा का विधान है। कारोबारी लोगों के लिए धनतेरस का दिन बहुत ही महत्वपूर्ण है। धनतेरस को शाम के समय में पूजा की जाती है।

धनतेरस पर पूजा का सबसे उत्तम समय प्रदोष काल को माना जाता है. ऐसे में धनतेरस पर पूजा का शुभ मुहूर्त शाम 06 बजकर 59 मिनट से लेकर रात 08 बजकर 56 मिनट तक है. इस समय में विधिपूर्वक धनतेरस की पूजा करें. वैसे सिंह लग्न में धनतेरस पूजा का शुभ मुहूर्त देर रात 1 बजकर 27 मिनट से तड़के 3 बजकर 41 मिनट तक है. धनतेरस पूजा के ये दो शुभ मुहूर्त है.

धनतेरस पूजा सामग्री की सूची
माता लक्ष्मी, गणेश जी और धनपति कुबेर की मूर्ति या फोटो
कुबेर यंत्र और श्री यंत्र
स्थापना के लिए लकड़ी की एक चौकी
नया बहीखाता और कलम
अक्षत्, रोली, हल्दी, सिंदूर, शक्कर
गंगाजल, गाय का शुद्ध घी
पान का पत्ता, सुपारी, लौंग, इलायची, फल
पीले और लाल रंग के नए वस्त्र, फूल, माला
कमल और लाल गुलाब, कमलगट्टा
इत्र, रक्षासूत्र, पंच पल्लव, दूर्वा, कुश, पंच मेवा
दूध, दही, शहद, यज्ञोपवीत, गुलाल
रुई की बत्ती, दीपक, कपूर, धूप, गंध
मिठाई, नैवेद्य, नारियल, साबुत धनिया
चांदी और सोने का सिक्का
सप्तमृत्तिका, सप्तधान्य, बैठने के लिए कुश या कंबल का आसन
धनतेरस कथा और आरती की पुस्तक

धनतेरस पूजा मंत्र
गणेश मंत्र: वक्रतुण्ड महाकाय सूर्यकोटि समप्रभ, निर्विघ्नं कुरु मे देव सर्वकार्येषु सर्वदा.
लक्ष्मी मंत्र: ऊँ श्रींह्रीं श्रीं कमले कमलालये प्रसीद प्रसीद श्रीं ह्रीं श्रीं ऊँ महालक्ष्मी नम:
कुबेर मंत्र: ॐ ह्रीं श्रीं क्रीं श्रीं कुबेराय अष्ट-लक्ष्मी मम गृहे धनं पुरय पुरय नमः

दीपावली पूजन व मुहुर्त

भारतीय पंचांग व धर्मशास्त्रानुसार दीपावली का पर्व प्रदोष काल एवं महानिशिथ काल व्यापनी अमावस्या में मनाया जाता है, जिसमें प्रदोष काल का महत्व गृहस्थों और व्यापारियों के लिए तथा महानिशिथ काल का उपयोग आगमशास्त्र (तांत्रिक) विधि से पूजन हेतु उपयुक्त होता है।

इस वर्ष दीपावली की तिथि को लेकर लोगों के बीच भ्रम बना हुआ है।  दीपावली का त्योहार कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की प्रदोष व्यापिनी अमावस्या को मनाया जाता है. श्री शुभ सम्वत् 2082 शाके 1947 कार्तिक कृष्ण अमावस्या (प्रदोष-कालीन) 20 अक्तूबर 2025 सोमवार को है। इस दिन चतुर्दशी तिथि सूर्योदय से लेकर दोपहर 03 बजकर 44 मिनट तक रहेगी, तत्पश्चात् अमावस्या तिथि प्रारम्भ हो जाएगी। दीपावली के पूजन हेतु धर्मशास्त्रोक्त प्रदोष काल एवं महानिशीथ काल मुख्य हैं।

प्रदोष काल
20 अक्तूबर 2025 को दीपावली के दिन धर्मशास्त्रोक्त प्रदोष काल शाम 05 बजकर 36 मिनट से लेकर रात 08 बजकर 07 मिनट तक रहेगा। इसमें स्थिर लग्न वृष का समावेश 06 बजकर 59 मिनट से लेकर 08 बजकर 56 मिनट तक रहेगा।

चौघड़िया मुहूर्त
चर चौघड़िया घं.05  मि.36 से घं.07  मि.10 तक, तत्पश्चात् लाभ चौघड़िया की वेला घं.10 मि.19 से घं.11 मि.53 तक रहेगी। तथा शुभ,अमृत, चर चौघड़िया की संयुक्त वेला रात्रि घं.01 मि.28 से घं.06 मि.11 तक रहेगी।

20 अक्तूबर को अमावस्या, प्रदोष काल, वृष लग्न और चर चौघड़िया का पूर्ण शुभ संयोग रहेगा।

अमावस्या और महानिशीथ काल का संयोग
इसके बाद महानिशीथ काल रात्रि रात्रि घं.11 मि.45 से घं.12 मि.39 तक रहेगा। इस समयावधि में अमावस्या और महानिशीथ काल का पूर्ण संयोग रहेगा। उल्लेखनीय है कि दीपावली में महानिशीथ काल अति महत्वपूर्ण माना जाता है। इसमें लाभ चौघड़िया की वेला रहेगी।

इसके बाद रात्रि घं.01  मि.18 से घं.03  मि.32 तक स्थिर लग्न सिंह रहेगी। इस समयावधि में अमावस्या और सिंह लग्न का पूर्ण संयोग रहेगा तथा इसमें भी शुभ चौघड़िया की वेला घं.01 मि.28 से घं.03  मि.02 तक रहेगी। इस प्रकार 20 अक्तूबर 2025 सोमवार को अमावस्या रात्रि पर्यन्त रहेगी। उसमें उपरोक्त शुभ योगों का समावेश भी रहेगा।

इस वर्ष  21 अक्तूबर 2025 दिन मंगलवार को सूर्योदय से शाम घं.05 मि.54 तक अमावस्या तिथि रहेगी, तत्पश्चात् कार्तिक शुक्ल प्रतिपदा प्रारम्भ हो जाएगी।

21 अक्तूबर 2025 मंगलवार को अमावस्या के दिन धर्मशास्त्रोक्त प्रदोष काल घं.05  मि.36 से लेकर घं.08 मि.07 तक रहेगा। इसमें स्थिर लग्न वृष का समावेश घं.06 मि.55 से लेकर घं.08  मि.52 तक रहेगा।  काल (अशुभ) चौघड़िया घं.05 मि.26 से घं.07 मि.00 तक, तत्पश्चात् लाभ चौघड़िया की वेला घं.07 मि.00 से घं.08 मि.34 तक रहेगी।

मंगलवार को अमावस्या तिथि सूर्यास्त के बाद कुल 24 मिनट रहेगी, उसके बाद शुक्ल प्रतिपदा लगेगी, उसमें भी स्थिर लग्न वृष घं.06 मि.55 से लगेगी, और इसके पूर्व घं.05 मि.54 पर अमावस्या समाप्त हो जाएगी, जिसके कारण पूजन का समय कुल 24 मिनट का प्राप्त होगा, उसमें भी वृष लग्न नहीं मिलेगी और उसमें काल की चौघड़िया का अशुभ योग विद्यमान रहेगा।

अमावस्या की तिथि में प्रदोष काल का विशेष महत्व
21 अक्तूबर 2025 मंगलवार को महानिशीथ काल के एवं स्थिर लग्न सिंह के समय अमावस्या तिथि का अभाव रहेगा। कार्तिक शुक्ल प्रतिपदा तत्कालीन तिथि हो जाएगी।
21 अक्तूबर मंगलवार को महानिशिथ काल एवं सिंह लग्न के समय अमावस्या तिथि का अभाव रहेगा।उस समय कार्तिक शुक्ल प्रतिपदा तिथि हो जायेगी।

दीपावली रात्रि का त्योहार है और इसका मुख्य पूजन रात्रि में अमावस्या के समय किया जाता है। अमावस्या की तिथि में प्रदोष काल का विशेष महत्व होता है।प्रदोष काल वह समय है जब सूर्यास्त के बाद लगभग 2 घंटे 24 मिनट तक की अवधि होती है. शास्त्रों के अनुसार, जिस दिन अमावस्या प्रदोष काल और महानिशिथ काल में व्याप्त होती है, उसी दिन दीपावली का पर्व मनाना चाहिए।

20 अक्तूबर को अमावस्या की शुरुआत दोपहर में हो रही है, जो पूरी रात तक रहेगी, वहीं, 21 अक्तूबर को सूर्यास्त के बाद अमावस्या समाप्त हो जाएगी। प्रदोष और अर्धरात्रि व्यापनी मुख्य है,इसलिए दीपावली 20 अक्तूबर को मनाई जाएगी।

मुस्लिम शायरों ने भी खूब कलम चलाई है दिवाली पर

सकारात्मक विचार, सार्थक पहल, सटीक अभिव्यक्ति, समुचित संवाद और सतत् प्रतिपुष्टि

विचार जहाँ आन्तरिक शक्ति को गतिशील करता है वहीं कार्यान्वयन के लिए जागरूक रहकर आगे का पथ निर्मित करता है। सकारात्मक विचार रचनात्मकता को ऐसा वितान प्रदान करते हैं कि उस वितान के भीतर सार्थक पहल करने वाले व्यक्तित्व की सटीक अभिव्यक्ति पर समुचित संवाद करते हुए लोग जुड़ते चले जाते हैं और वैचारिक सन्दर्भ के फलीभूत होने का उजास फैलने लगता है। इस उजास के प्रभाव को स्थायित्व प्रदान करने और सामाजिक स्तर पर सदुपयोगी बनाने में सार्थक और अनुकरणीय सन्दर्भ विकसित करने तथा अपनी अभिव्यक्ति और अभियान को सार्थकता के सोपान प्रदान करने के लिए ऐसे व्यक्ति सतत् रूप से प्रतिपुष्टि करते रहते है।

बानगी के तौर पिछले दिनों सोशल मीडिया पर  पर्यटन – संस्कृति जागरूकता अभियान कार्यक्रम के अंतर्गत आयोजित हुई प्रश्नोत्तरी प्रतियोगिता के सर्वेक्षण के लिए पूछे गए प्रश्नों के उत्तर कदाचित्  इसलिए पूछे गए कि प्रतिभागी एवं जो प्रतिभागी नहीं रहे ; किन्तु इसे देखा है ; वे भी अपने विचार प्रेषित करेंगे तो निश्चित रूप से आयोजन को और अधिक सफलता के सोपानों तक पहुँचाया जा सके।

मुझ (विजय जोशी) से भी यह विचार साझा किया तो पर्यटन – संस्कृति जागरूकता अभियान के अंतर्गत आयोजित प्रश्नोत्तरी प्रतियोगिता के सर्वेक्षण के लिए 08 अक्टूबर को 2025 को प्रातः सवा नौ बजे पूछे गए प्रश्नों के उत्तर मैंने (विजय जोशी) साँय पोने पाँच बजे इस प्रकार से प्रेषित किए –

“1. पूछे गए प्रश्नों को आप किस तरह देखते हैं।

  • ये सभी प्रश्न अपने क्षेत्र और भारतीय पर्यटक स्थलों के बारे में जानने, खोजने और उन्हें समझने का अवसर देते हैं।

2. क्या पर्यटन – संस्कृति के समग्र विषयों को छूने का प्रयास किया गया ? कौन कौन से विषय रहे ? क्या कोई विषय छूट गया ?

  • इन प्रश्नों में भारतीय संस्कृति और सभ्यता के साथ राष्ट्रीय धरोहर और कलात्मक सन्दर्भों जैसे विषय सम्मिलित रहे। साहित्यिक सन्दर्भों को और अधिक लिया जा सकता था।

3. जागरूकता उत्पन्न करने में ये आयोजन किस तरह सहायक बनते हैं?

  • इस प्रकार के आयोजन अपनी सांस्कृतिक, ऐतिहासिक और पुरातात्विक धरोहर के साथ वर्तमान के विकास क्रम को भी समझने और परखने का अवसर प्रदान करते हैं।

4. इस तरह की प्रतियोगिता के क्या लाभ हैं?

  • इस तरह की प्रतियोगिताएँ प्रतिभागी और सामान्य जन की जान अभिवृद्धि के साथ अपने स्वयं के कौशल को निखारने का अवसर देती है।

5. आपने अपने ज्ञान के अतिरिक्त उत्तर खोजने में किन माध्यमों का उपयोग किया?
गूगल, पुस्तकें, परिचितों से विमर्श आदि।

  • स्व अध्ययन

6. आप अपने लिए किस तरह इसे उपयोगी मानते हैं?

  • इससे कई स्थलों और सन्दर्भों को समझने के लिए स्वाध्याय के प्रति रझान हुआ।

7. अन्य कोई आपके विचार ?

  • पर्यटन – संस्कृति जागरूकता अभियान के अंतर्गत आयोजित प्रश्नोत्तरी प्रतियोगिता के साथ तत् स्थलीय सामूहिक प्रश्नोत्तरी कार्यक्रम और ऐतिहासिक पुरातत्विक महत्व के स्थलों की स्मृति पर आधारित चित्रकला प्रतियोगिता, स्थान विशेष पर आलेख – निबन्ध प्रतियोगिता तथा आशु व्याख्यान भी रख कर अधिक रुचिकर एवं संभागित्व बढ़ा सकते हैं।

इस प्रकार अपने आयोजन और सकारात्मक विचार को सार्थक रूप से साकार करने के लिए निरन्तर संवाद के द्वारा प्रतिपुष्ट करने वाले बहुआयामी व्यक्तित्व धनी ने जब अपनी सेवाकाल के दौरान बच्चों में संस्कृति के प्रति लगाव पैदा करने और बाल प्रतिभाओं को सामने लाने के लिए सूचना केंद्र द्वारा इनरव्हील क्लब कोटा के सहयोग से 10 वर्ष तक निरंतर बरसात के मौसम में तीन दिवसीय ” मल्हारोत्सव ” का आयोजन किया तो तत्कालीन जिला कलेक्टर आर. पी. जैन साहब को इतना पसंद आया कि उन्होंने इस आयोजन को 100 वें राष्ट्रीय  दशहरा मेले से जोड़ कर चिर स्मरणीय बना दिया जो मेले का लोकप्रिय कार्यक्रम बन गया और आज तक बीते कई वर्षों से निरन्तर आयोजित हो रहा है और लोकप्रिय बना हुआ है।

यही नहीं वे अपने सकारात्मक विचारों के साथ अपनी अभिव्यक्ति से बच्चों के साथ जुड़ाव रख कर उनमें रचनात्मकता के कौशल को संरक्षित करने में भी प्रयासरत हैं।
इसी कड़ी में विश्व पर्यटन दिवस के संदर्भ में उन्होंने संस्कृति – साहित्य- मीडिया फोरम, कोटा द्वारा  नागरिकों में जागरूकता उत्पन्न करने के उद्देश्य से दस दिवसीय “पर्यटन और संस्कृति जागरूकता अभियान” चलाया। जिसके अन्तर्गत सोशल मीडिया पर दस चरणों में 28 सितम्बर से  7 अक्टूबर  तक कला, संस्कृति, पर्यटन पर प्रश्नोत्तरी प्रतियोगिता का आयोजन किया गया। प्रतियोगिता में हाड़ौती, राजस्थान और देश के सन्दर्भ में कुल 160 प्रश्न पूछे गए। जिनमें 75 प्रश्न फोटो पहचान से सम्बन्धित थे। प्रतियोगिता में राजस्थान, बिहार, उत्तरप्रदेश राज्यों के 161 प्रतिभागियों ने रूचि पूर्वक भाग लिया। यह एक सकारात्मक सोच और सार्थक पहल का एक सोपान रहा।

इस सोपान को प्राप्त करने वाले यह व्यक्तित्व ” मिशन बाल मन तक ” को ही क्रियान्वित नहीं कर रहे अपितु अपनी सटीक अभिव्यक्ति से भी ऐसे रचनात्मक आयोजनों से जन सहभागिता और आयोजन विशेष से सम्बन्धित हर वय के लोगों को जोड़ने की पहल कर रहे हैं –

प्रतियोगिताएं : एक मनोरंजक खेल है –

प्रतियोगिताएं सामान्य ज्ञान में वृद्धि करती हैं, दिमाग की कसरत करती हैं, ज्ञान के स्तर को बताती हैं और स्वास्थ्य मनोरंजन करती हैं। अपने को बच्चा ही समझे। जिसके दिल और दिमाग में बचपन जिंदा रहता है उस से जिंदादिल इंसान कोई हो नहीं सकता। कितने भी बड़े हो जाए बचपन में जिएंगे तो कई समस्याएं भी स्वत: दूर हो जाएंगी। बाल साहित्य सृजन की सफलता के लिए तो कहा भी यही जाता है कि बच्चा बन कर सोचोगे तो सृजन अच्छा होगा। बचपन में जी कर देखो तो जीवन का आनंद ही कुछ और हो जाएगा।

साहित्य – संस्कृति की दो बूँद –

राजस्थान में कोटा में विगत दो वर्षों से साहित्य – संस्कृति के संरक्षण की दृष्टि से  बच्चों को इनसे जोड़ने और समझ पैदा करने के लिए अभियान चला रखा है। शिक्षक और साहित्यकार आगे आ कर इसे सफल बनाने में सहयोग कर रहे हैं।

इस अभियान की गूंज केंद्रीय मानव संसाधन मंत्रालय और साक्षरता विभाग तक भी पहुँची कि अंचल के बच्चों से कहानी , कविताएं और लोक गीत लिखने से जोड़ा जाएगा। अब बच्चों को साहित्य – संस्कृति की दो बूंद पिला कर आने वाले समय के लिए साहित्य और संस्कृति के संरक्षण के बीज पैदा किए जाएंगे।

इस सन्दर्भ ने सृजनशील ऊर्जावान व्यक्तित्व में एक नया जोश भरा जिस से वह आगे और भी ज्यादा ऊर्जा के साथ कार्य करने को उद्धत हुए।

ऐसे रचनात्मक सोच और समर्पित भावना जे धनी ने विगत वर्ष प्रारंभिक चरण में पाँच हजार बच्चों का प्रत्यक्ष रूप से साहित्य – संस्कृति से जोड़ा जो सबके सामने आया। इस वर्ष उन्होंने कहानी और कविता लेखन विधा को भी जोड़ा और अब तक तीन माह के अल्प समय में विभिन्न शिक्षण संस्थानों के ढाई हजार से अधिक बच्चे इस विधा से जुड़ कर पुरस्कृत हो चुके हैं।

अपने कार्य की प्रगति और सफलता के आयाम को जब उन्होंने  गूगल पर खोजा तो सामने आया कि -” कोटा और हाड़ौती अंचल में बच्चों को साहित्य और संस्कृति से जोड़ने के लिए कई अभियान चलाए जा रहे हैं, जिनमें “मिशन बाल मन तक”, विभिन्न साहित्य मेलों और प्रतियोगिताएं शामिल हैं। ये अभियान बच्चों में रचनात्मकता को बढ़ावा देने, साहित्यिक गतिविधियों में भाग लेने के लिए प्रोत्साहित करने और संस्कृति के प्रति जागरूकता बढ़ाने पर केन्द्रित हैं।” यह अभिव्यक्ति कार्य के सकारात्मक आयाम को उभारती है जो उनके कार्य एवं समर्पण की एक बानगी है।

ऐसे ऊर्जावान व्यक्तित्व के धनी तथा सकारात्मक विचार, सार्थक पहल, सटीक अभिव्यक्ति, समुचित संवाद और सतत् प्रतिपुष्टिकरण के साथ सहजता से अपने कार्य को सामाजिक चेतना के सोपान तक पहुँचाने वाले व्यक्ति हैं – “डॉ. प्रभात कुमार सिंघल” जिन्होंने अद्यतन साहित्यिक पत्रकारिता करते हुए अंचल के साहित्यिक परिदृश्य को समृद्ध ही नहीं किया वरन्  “जियो तो ऐसे जियो,” “नारी चेतना की साहित्यिक उड़ान” एवं  “राजस्थान के साहित्य साधक” जैसी कृतियों के साथ संस्मरण कृति नई बात निकल कर आती है को सृजित कर साहित्यिक परिदृश्य को अपने समीक्षात्मक तथा रचनात्मक कौशल से दिशाबोधित किया है।

अपने लेखन को समर्पित ऐसे सृजनशील व्यक्तित्व डॉ. प्रभात कुमार सिंघल का जन्म 15 अक्टूबर, 1953 को कोटा में हुआ। आप राजस्थान सरकार के सूचना एवं जन-संपर्क विभाग से अक्टूबर, 2013 में संयुक्त निदेशक पद से सेवा निवृत्त हुए। इतिहास, पुरातत्व, कला-संस्कृति, पर्यटन, पत्रकारिता और साहित्य पर आपकी 51 पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं। आपकी पर्यटन पर 10 पुस्तकें वीएसआरडी एकेडमिक पब्लिकेशन हाउस, मुंबई के प्लेटफार्म से 160 देशों में उपलब्ध कराई हैं। संस्कृति के अध्ययन के लिए निजी खर्च पर 18 राज्यों और नेपाल की यात्रा कर चुके हैं। देश की कई प्रतिष्ठित संस्थाओं द्वारा आपको ग्लोबल, राष्ट्रीय, राज्य और जिला स्तरीय पुरस्कारों से सम्मानित किया जा चुका है। आप सतत् रूप से लेखन एवं पत्रकारिता में सक्रिय और समर्पित हैं।

– विजय जोशी
कथाकार एवं समीक्षक, कोटा

श्री लाड़ली जी महाराज मन्दिर का चमत्कारिक इतिहास

मन्दिर श्री लाड़ली जी महाराज बरसाना, उत्तर प्रदेश के मथुरा शहर से 43 किमी. दूर भानुगढ़ ब्रह्मांचल पहाड़ी पर स्थित है। यह मंदिर न केवल एक आध्यात्मिक शरणस्थली है, बल्कि भगवान श्री कृष्ण और उनकी अल्हादिनी शक्ति श्री राधा रानी  के बीच शाश्वत प्रेम का भी प्रमाण है। इस मंदिर को बरसाना की लाडली मंदिर और श्री जी मंदिर के नाम से भी जाना जाता है। यह श्री राधा रानी  के भक्तों का सबसे प्रिय मंदिर है, जो इस स्थान पर आकर खुद को बहुत धन्य महसूस करते हैं।

प्राचीन नाम श्री वृषभानुपुर :-

श्रीवृषभानु जी की राजधानी होने के कारण बरसाने का प्राचीन नाम श्री वृषभानुपुर था। वाराहपुराण एवं प‌द्मपुराण में ऐसी कथा आती है कि ब्रहमाजी ने तपस्या के बल पर श्रीकृष्ण से लीला- दर्शन का वरदान प्राप्त किया था। फल स्वरूप लीला दर्शनार्थ वे ब्रहमांचल के रूप में यहां स्थापित इस पर्वत को वृहत्सानु पर्वत के नाम से हुए। ब्रहमाजी के चार्तुमुखी स्वरूप के समान यहां वृहत्सानु की चार चोटियां हैं- भानुगढ़, दानगढ़, विलासगढ़ तया मानगढ़।

श्रीकृष्ण आनंद का विग्रह

 राधा प्रेम की मूर्ति:-

जिस प्रकार श्रीकृष्ण आनंद का विग्रह हैं, उसी प्रकार राधा प्रेम की मूर्ति हैं। अत: जहां श्रीकृष्ण हैं, वहीं राधा हैं और जहां राधा हैं, वहीं श्रीकृष्ण हैं। कृष्ण के बिना राधा या राधा के बिना कृष्ण की कल्पना के संभव नहीं हैं। इसी से राधा ‘महाशक्ति’ कहलाती हैं। कृष्ण इनकी आराधना करते हैं, इसलिए ये राधा हैं और ये सदा कृष्ण की आराधना करती हैं, इसीलिए राधिका कहलाती हैं। ब्रज की गोपियां और द्वारका की रानियां इन्हीं श्री राधा की अंशरूपा हैं। ये राधा और ये आनंद सागर श्रीकृष्ण एक होते हुए भी क्रीडा के लिए दो हो गए हैं। राधिका कृष्ण की प्राण हैं। इन राधा रानी की अवहेलना करके जो कृष्ण की भक्ति करना चाहता है, वह उन्हें कभी पा नहीं सकता।’

 

निष्काम प्रेम और समर्पण:-

राधा का प्रेम निष्काम और नि:स्वार्थ है। वह श्रीकृष्ण को समर्पित हैं, राधा श्रीकृष्ण से कोई कामना की पूर्ति नहीं चाहतीं। वह सदैव श्रीकृष्ण के आनंद के लिए उद्यत रहती हैं। इसी प्रकार जब मनुष्य सर्वस्व समर्पण की भावना के साथ कृष्ण प्रेम में लीन होता है, तभी वह राधाभाव ग्रहण कर पाता है। कृष्ण प्रेम का शिखर राधा भाव है। तभी तो श्रीकृष्ण को पाने के लिए हर कोई राधारानी का आश्रय लेता है।

 

विविध लीलाएं:-

मन्दिर में श्री मानबिहारी लाल के दर्शन हैं। मोरकुटी पर श्री श्यामसुन्दर ने मोर बनकर नृत्य करते हुए अपनी श्यामा जू को रिझाया था। गहवर वन की सघन निकुंजें श्री राधा-माधव की सरस केलि की सहज नियोजिका है। इसके निचले भाग में रासमण्डल है, राधा सरोवर है, शंख का चिन्ह दर्शन है और महाप्रभु बल्लभ जी की बैठक है। वहां पर श्री गोपाल जी के दर्शन हैं। यह सम्पूर्ण ब्रजभूमि स्वयं श्रृंगाराख्य भवरूपा है। तत्स्वरूपा होने के साथ उस परमभाव की भांति उन्मादना उत्पन्न करने में भी पूरी तरह समर्थ है। तभी तो स्वयं रसराज यहां इस राधिका- केलि- महल की किंकरियों के समान महाभावस्था नन्दिनी की कृपा की अभिलाषा लिए सदा रहते हैं।

 

राजपूताना शैली का मन्दिर:-

मन्दिर श्री लाड़ली जी महाराज (राधा रानी मंदिर) की स्थापत्य कला राजपूताना शैली पर आधारित है और यह लाल बलुआ पत्थर से निर्मित है, जो मुगल वास्तुकला से प्रभावित लगता है। मंदिर का निर्माण मुख्य रूप से लाल और सफेद पत्थरों से हुआ है, जो राधा और कृष्ण के प्रेम का प्रतीक माने जाते हैं। इस मंदिर की मुख्य विशेषताएं इसमें मौजूद जटिल नक्काशी, मेहराब, गुंबद और उत्कृष्ट चित्र हैं। पहाड़ी पर बने इस भव्य मंदिर तक पहुँचने के लिए 200 से अधिक सीढ़ियाँ हैं।

 

वृषभानु महाराज का महल:-

सीढ़ियों के नीचे वृषभानु महाराज का महल है, जहाँ राधा, कीर्ति और श्रीदामा की मूर्तियाँ हैं। इसके अलावा पास में ब्रह्मा मंदिर और अष्टसखी मंदिर भी हैं।

राधा रानी का प्राकट्य :-

भाद्रपद माह में शुक्ल पक्ष की अष्टमी को यहाँ विशेष महोत्सव मनाया जाता  है क्योंकि इसी दिन श्री राधा रानी का प्राकट्य  हुआ था और इसी दिन राधाष्टमी का त्यौहार मनाया जाता है। मुख्यतः लठमार होली एवं राधाष्टमी यहाँ के सबसे बड़े त्यौहार हैं । बरसाना में ब्रह्मांचल पर्वत पर स्थित श्री लाडिली जी मंदिर और नंदगांव में नंदीश्वर पर्वत पर स्थित नन्द बाबा मंदिर दोनों की एक साझी परंपरा है जिसका निर्वहन साढ़े पांच सौ वर्ष से किया जा रहा है।

 

होली में समाज गायन की परंपरा :-

बसंत पंचमी से लेकर धुलेंडी तक यहाँ होली का उल्लास रहता है इसीलिए कहा जाता है कि ब्रज में फाल्गुन चालीस दिन का होता है। बसंत पंचमी के दिन से दोनों मंदिरों में आधिकारिक रूप से होली की शुरुआत होती है। होली के डांडे रोप दिए जाते हैं और समाज गायन का क्रम शुरू हो जाता है। इसी दिन से मंदिरों में गुलाल उड़ने लगता है, पखावज बजने लगती है और ढप पर थाप पड़ने लगती है। बसंत पंचमी के दिन आदि रसिक कवि जयदेव के पद ‘ललित लवंग लता परिसीलन, कोमल मलय शरीरे’ से समाज गायन शुरू होता है। इसी क्रम में हरि जीवन का पद ‘श्री पंचमि परम् मंगल दिन, मदन महोत्सव आज बसंत बनाय चलीं ब्रज सुन्दरि, लै लै पूजा कौ थार’ का गायन होता है।

 

चमत्कारी इतिहास:-

बरसाना स्थित लाड़ली जी मंदिर का इतिहास चमत्कारी कहानियों से भरा पड़ा है, जो स्थानीय लोगों की पीढ़ियों से चली आ रही हैं। मुगल आक्रमणकारियों के भागने की कहानियों से लेकर दैवीय हस्तक्षेप तक, यह मंदिर हमेशा मज़बूती से खड़ा रहा है। एक विशेष रूप से प्रसिद्ध कहानी एक चोर की है जो मंदिर को लूटने आया था, लेकिन अंधा होकर लौट गया।

ब्रह्मांचल पर्वत पर स्थित श्री राधा रानी के पवित्र महल को लूटने के कई प्रयास हुए हैं, लेकिन आक्रमण कारी और चोर, दोनों ही हमेशा खाली हाथ ही रहे हैं।

एक चोर लूटपाट के इरादे से मंदिर में घुसा। आते ही उसने चौकीदार को लाठियों से पीटना शुरू कर दिया। हमले के बावजूद, चौकीदार ने अपनी उंगली से मंदिर के दरवाजे बंद कर दिए और कुंडी लगा दी। चोर ने उस पर लगातार हमला किया, उसे लाठियों से मारा और यहाँ तक कि गोलियाँ भी चलाईं, लेकिन चौकीदार को कोई नुकसान नहीं पहुँचा।आखिरकार, चोर की आँखों की रोशनी चली गई और वह कुछ भी देख नहीं पा रहा था। इसी बीच, मंदिर में मौजूद अन्य लोगों नेआपात कालीन घंटी बजा दी, जिससे चोर भाग गया।

लगभग 200 साल पुरानी एक और घटना है – डाकुओं ने मंदिर में चोरी करने की कोशिश की थी। हालाँकि, लाड़ली सरकार (राधा रानी) ने उनकी योजना को विफल कर दिया। रात के लगभग 11 बजे, डाकू मंदिर के शिखर पर चढ़ गए, और सोने का शिखर चुराने की कोशिश करने लगे। मंदिर के रखवालों को कुछ गड़बड़ होने का आभास हुआ। लेकिन इससे पहले कि वे कुछ कर पाते, चोर अंधे हो गए।

 

लेखक परिचय:-

(लेखक भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण, में सहायक पुस्तकालय एवं सूचनाधिकारी पद से सेवामुक्त हुए हैं। वर्तमान समय में उत्तर प्रदेश के बस्ती नगर में निवास करते हुए सम सामयिक विषयों,साहित्य, इतिहास, पुरातत्व, संस्कृति और अध्यात्म पर अपने विचार व्यक्त करते रहते हैं।

(वॉट्सप नं.+919412300183)

भारतीय डाक विभाग द्वारा ‘एक पत्र अपने रोल मॉडल के नाम’

पत्र-लेखन प्रतियोगिता 

अहमदाबाद। भारतीय डाक विभाग द्वारा लोगों में पत्र लेखन को प्रोत्साहित करने हेतु राष्ट्रीय स्तर पत्र लेखन प्रतियोगिता ‘ढाई आखर’ का आयोजन किया जा रहा है। यह पहल न केवल लेखन कौशल को निखारने का अवसर प्रदान करती है, बल्कि लोगों को अपनी संवेदनाओं को सशक्त शब्दों में व्यक्त करने का भी मंच देती है। उत्तर गुजरात परिक्षेत्र, अहमदाबाद के पोस्टमास्टर जनरल श्री कृष्ण कुमार यादव ने बताया कि इस प्रतियोगिता में ‘एक पत्र अपने रोल मॉडल के नाम’ विषय पर प्रतिभागियों को अपने विचारों को व्यक्त करते हुए एक पत्र लिखना होगा, जिसे संबंधित राज्य या परिमंडल के चीफ पोस्टमास्टर जनरल को संबोधित करना है। इस प्रतियोगिता में पत्र चुने जाने पर पाँच हजार से पचास हजार रूपये तक का पुरस्कार भी मिलेगा। इसके लिए विभिन्न स्कूल-कॉलेज डाक विभाग के साथ मिलकर अपने यहाँ पर आयोजन कर सकते हैं। इसकी अंतिम तिथि 08 दिसम्बर, 2025 है।

 

पोस्टमास्टर जनरल श्री कृष्ण कुमार यादव ने कहा कि इस  ‘ढाई आखर’ पत्र लेखन प्रतियोगिता में किसी भी उम्र के लोग भाग ले सकते हैं। पहला वर्ग 18 वर्ष तक तथा दूसरा 18 वर्ष से अधिक आयु वर्ग का होगा। पत्र डाक विभाग द्वारा जारी अंतर्देशीय पत्र अथवा लिफाफे में ही स्वीकार्य होगा,  जिसमें क्रमशः 500 और 1,000 शब्दों में अंग्रेजी, हिन्दी अथवा स्थानीय भाषा में हाथ से पत्र लिखा जा सकता है। पत्र में अपना पूरा नाम, पता, जन्मतिथि, मोबाइल नंबर और विद्यालय के नाम सहित संबंधित परिमंडल के चीफ पोस्टमास्टर जनरल के पते पर 08 दिसम्बर, 2025 तक भेजना होगा।

 

पोस्टमास्टर जनरल श्री कृष्ण कुमार यादव ने बताया कि प्रतियोगिता के विजेताओं को राज्य और राष्ट्रीय स्तरों पर विभिन्न 4 श्रेणियों में तीन-तीन पुरस्कार प्रदान किए जाएंगे। इनमें परिमंडलीय (राज्य) स्तर पर चयनित श्रेष्ठ पत्रों को प्रथम, द्वितीय व तृतीय श्रेणी में क्रमश: 25 हजार, 10 हजार व  5 हजार रूपए का पुरस्कार दिया जायेगा। राष्ट्रीय  स्तर पर चयनित श्रेष्ठ पत्रों को प्रथम, द्वितीय व तृतीय श्रेणी में क्रमश: 50 हजार, 25 हजार व 10 हजार रूपए का पुरस्कार दिया जायेगा। कुल मिलाकर पूरे देश में 40 लाख 20 हजार रूपये के पुरस्कार विजेताओं को दिए जायेंगे। इस संबंध में ज्यादा जानकारी के लिए विभिन्न मंडलों के अधीक्षक और प्रधान डाकघर के पोस्टमास्टर से संपर्क किया जा सकता है।

 

पोस्टमास्टर जनरल श्री कृष्ण कुमार यादव ने कहा कि वर्तमान डिजिटल युग में जहाँ संवाद के साधन तेज़ और तात्कालिक हो गए हैं, वहीं पत्र लेखन की कला आज भी अपनी आत्मीयता और संवेदनशीलता के कारण प्रासंगिक बनी हुई है। पत्र केवल शब्दों का आदान-प्रदान नहीं, बल्कि भावनाओं, स्मृतियों और मानवीय संबंधों की गहराई को व्यक्त करने का माध्यम है। ‘ढाई आखर’ एक राष्ट्रीय स्तर की पहल है, जिसका उद्देश्य युवाओं में रचनात्मकता, मौलिकता व आत्म-अभिव्यक्ति को प्रोत्साहित करके उन्हें डाक और फिलेटली से पुनः परिचित कराना है। यह जन सामान्य के लिए उनके लेखन कौशल और प्रतिभा को प्रदर्शित करने का एक मंच भी है। ‘ढाई आखर’ अभियान शब्दों के माध्यम से दिलों को जोड़ने का एक प्रयास है — यह न केवल पत्र लेखन की कला का उत्सव है, बल्कि संवेदनाओं को सजीव करने और विचारों को साकार रूप देने का अवसर भी प्रदान करता है।

जलशक्ति मंत्रालय छात्रों को 15 हजार की राशि देगा

जल शक्ति मंत्रालय ने मंगलवार को एक इंटर्नशिप प्रोग्राम की घोषणा की, जिसके तहत चुने हुए उम्मीदवारों को मंत्रालय की मीडिया और सोशल मीडिया गतिविधियों में शामिल होने का अवसर मिलेगा। इस प्रोग्राम में चयनित छात्रों को महीने का 15,000 रुपये का मानदेय और सफलतापूर्वक इंटर्नशिप पूरी करने पर प्रमाणपत्र दिया जाएगा।

इस इंटर्नशिप प्रोग्राम के लिए डिपार्टमेंट ऑफ वॉटर रिसोर्सेज, रिवर डेवलपमेंट एंड गंगा रिजनरेशन (DoWR, RD & GR) ने स्नातक या स्नातकोत्तर स्तर के छात्र और शोधकर्ता जो मान्यता प्राप्त विश्वविद्यालय/संस्थान में मास कम्युनिकेशन के क्षेत्र में अध्ययन कर रहे हैं, को आवेदन करने के लिए आमंत्रित किया है।

इंटर्नशिप की अवधि 6 से 9 महीने होगी और आवेदन करने की अंतिम तिथि 24 नवंबर 2025 है। इच्छुक उम्मीदवार ऑनलाइन आवेदन कर सकते हैं: https://mowr.nic.in/internship

योग्यता के अनुसार, आवेदनकर्ता ने मास कम्युनिकेशन या पत्रकारिता में स्नातक पूरा किया हो, या पीजी/डिप्लोमा कर रहे हों (स्नातक पूरा होने के बाद) या MBA (Marketing) में अध्ययनरत हों। उम्मीदवार को मान्यता प्राप्त कॉलेज/विश्वविद्यालय से होना चाहिए और सभी शर्तें दिशा-निर्देशों के अनुसार पूरी करनी होंगी।

इसके अलावा, जल शक्ति मंत्रालय के पेयजल और स्वच्छता विभाग (DDWS) ने हाल ही में ग्रामीण पेयजल योजनाओं के डिजिटलीकरण में एक महत्वपूर्ण कदम उठाया। नए RPWSS (Rural Piped Water Supply Schemes) मॉड्यूल के जरिए ग्रामीण जल आपूर्ति योजनाओं में पारदर्शिता, जवाबदेही और दक्षता बढ़ाने का लक्ष्य रखा गया है।