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चित्रकारों ने कराया रंगों से छत्तीसगढ दर्शन

रायपुर /
संस्कार भारती छत्तीसगढ़ द्वारा छत्तीसगढ़ रजत जयंती महोत्सव के उपलक्ष्य में 51 चित्रों की एक चित्रमाला निर्माण कार्यशाला दिनांक 11 – 12 अक्टूबर को विप्र भवन, समता कॉलोनी, रायपुर में आयोजित की गई।

कार्यशाला में प्रदेश की राजधानी रायपुर के चित्रकारों के अलावा बिलासपुर, राजनांदगांव, खैरागढ़, जांजगीर-चांपा, दुर्ग, बालोद, महासमुंद, दंतेवाड़ा, रायगढ़, धमतरी, बलोदा बाजार, बस्तर आदि स्थानों से कलाकार पधारे एवं 51 चित्रों की रचना की।

इन चित्रों में कला संस्कृति एवं परम्परा, ऐतिहासिक घटना, सामाजिक जनजीवन और तीज-त्यौहार आदि विषय आधार रूप में हैं। इन विषयों का चयन साहित्य अकादमी के अध्यक्ष श्री शशांक शर्मा के द्वारा किया गया।

छत्तीसगढ़ रजत जयंती महोत्सव का संदर्भ

छत्तीसगढ़ को भारत के मानचित्र पर एक नए राज्य के रूप में 25 वर्ष हो गए। इसी अवसर पर छत्तीसगढ़ शासन के द्वारा छत्तीसगढ़ रजत जयंती महोत्सव का प्रारंभ 15 अगस्त 2025 से हुआ, जिसमें सभी विभागों के द्वारा फरवरी 2026 तक विभिन्न कार्यक्रमों का आयोजन शासन और गैर सरकारी संस्थाओं के द्वारा किया जा रहा है।

इसी तारतम्य में संस्कार भारती के द्वारा इस कार्यशाला के आयोजन की योजना बनी और कार्यशाला सफल रूप से संपन्न हुई।

प्रदर्शनी और स्मारिका

इस चित्रकला कार्यशाला को संस्कार भारती द्वारा प्रशासन को समर्पित कर आग्रह किया जाएगा कि इसकी भव्य प्रदर्शनी का उद्घाटन 1 नवंबर को राज्योत्सव के अवसर पर किया जाए।

संस्था द्वारा एक स्मारिका प्रकाशित की जाएगी, जिसमें इन सभी कलाकृतियों के छायाचित्र रहेंगे।

समापन समारोह

कार्यशाला के समापन समारोह में
प्रांतीय अध्यक्ष संस्कार भारती श्री रिखी क्षत्री,
डॉ. विकास चंद्रा, अध्यक्ष चित्रकला विभाग, संगीत विश्वविद्यालय खैरागढ़,
श्री शशांक शर्मा, साहित्य अकादमी छत्तीसगढ़ शासन
के द्वारा संपन्न हुआ।

इस अवसर पर संस्था के महामंत्री हेमंत माहुलिकर,
महानगर महामंत्री कबीर चंद्राकर,
पुरुषोत्तम चंद्राकर, डॉ. आनंद पांडे, किशोर वैभव, प्रांजल राजपूत, प्रीतेश पांडेय, लवकुश तिवारी, अपूर्वा, अंकित, रंजना गुरु, शैलदुलारी सारवा, सूर्यकांता कश्यप, पार्थ महावर, कला प्रेमी, कलाकार, नगरवासी आदि उपस्थित थे।

कलाकारों एवं कृतियों की सूची

  • नेहल वैष्णव, खैरागढ़ – कला संगीत विश्वविद्यालय (लैंडस्केप / कलात्मक चित्र कला संगीत से जुड़ी)

  • दिव्या चंद्रा – महानदी राजिम त्रिवेणी संगम, राजीव लोचन मंदिर, राजिम कुंभ (साधु संत स्नान, राजिम मंदिर दृश्य)

  • मनहरण देवांगन – छत्तीसगढ़ आदिवासी सौंदर्य वेशभूषा

  • सोनल शर्मा – छत्तीसगढ़ महतारी

  • निकिता साहू – रामनामी संप्रदाय, जांजगीर चांपा

  • खुशी चौधरी – राजा चक्रधर

  • शिवा साहू – ढोकरा कला, कलाकृति

  • अवध कंवर – बस्तर बाजार

  • तृप्ति साव – छत्तीसगढ़ का सौन्दर्य

  • सिद्धार्थ सोनी – मड़ई, राउत

  • सिरपुर बुद्ध विहार – (लैंडस्केप) लक्ष्मण मंदिर पुरातत्व

  • टिकेश्वर साहू – महादेव घाट

  • निलेश कश्यप – चित्रकोट जलप्रपात, लोक नृत्य

  • दिव्य प्रकाश – कर्मा नृत्य

  • सुमन महंत – वनभैंसा

  • अविरल कृष्ण साहू – भिलाई स्टील प्लांट

  • गिरीश दास – बस्तर दशहरा

  • प्रियांशु – बम्लेश्वरी मंदिर डोंगरगढ़

  • दीपक शर्मा – शिवरीनारायण, तुरतुरिया वाल्मिकी आश्रम, श्रीराम शबरी भेंट

  • अरविंद कुमार यदु – रायपुर नंबर 9

  • देवरी – सुआ नृत्य

  • दीपक प्रजापति – पोला पर्व, अक्ती पर्व, हरेली, लोक पर्व की झलक

  • सुरेंद्र मेहर – जंगल सत्याग्रह

  • सोमनाथ कँवर – भोरमदेव मंदिर समूह

  • दिव्यांशु देवांगन – छत्तीसगढ़ के ग्रामीण जन जीवन (परिवार का दृश्य, पीछे घर, खेत, बैल, बैल गाड़ी, ट्रेक्टर आदि दृश्य)

  • अभिजीत बंगानी – नवा रायपुर (लैंडस्केप)

  • राहुल दत्ता – छत्तीसगढ़ की मूर्तिकला

  • करण कुमार – गौर नृत्य, घोटूल

  • विक्रांत चंचल साहू – पंथी नृत्य, गिरौदपुरी, गुरु घासीदास

  • सुजल गुप्ता – सिंचाई, हसदेव बाँगो डैम (लैंडस्केप)

  • भावना – कृषि क्षेत्र, किसान धान लगाते आदि

  • कौशांक नाग – स्वास्थ्य एम्स लैंडस्केप

  • मितलेश बारीक – रायपुर अंतर्राष्ट्रीय स्टेडियम

  • मुकेश कुंजाम – गोंड आदिवासी महिला

  • मनीषा धुर्वे – सीता डोंगरा रामगढ़ की पहाड़ी, कालीदास मेघदूत की रचना

  • रचना मरकाम – कोसा वस्त्र बुनाई

  • कौशल सिन्हा – माधव राव सप्रे, पेन्ड्रा, छत्तीसगढ़ मित्र समाचार पत्र का प्रकाशन

  • घनश्याम मानिकपुरी – दामाखेड़ा, कबीरपंथ (लैंडस्केप / दामाखेड़ा मेला)

  • सलवम मनीष – वनभैसा राजकीय पशु, पहाड़ी मैंना, छत्तीसगढ के वन क्षेत्र परिप्रेक्ष्य

  • शुभम – वीर नारायण सिंह सोनाखान

  • सुमन भंडारी – शिक्षा (ग्रामीण बच्चियां साइकिल से स्कूल जाते हुए)

प्रेषक:
भोजराज धनगर
संस्कार भारती छत्तीसगढ़

संस्कृत का वो जादू जो दुनिया की किसी भी भाषा में नहीं है

अंग्रेजी में ‘THE QUICK BROWN FOX JUMPS OVER A LAZY DOG’ एक प्रसिद्ध वाक्य है। जिसमें अंग्रेजी वर्णमाला के सभी अक्षर समाहित कर लिए गए,

मज़ेदार बात यह है की अंग्रेज़ी वर्णमाला में कुल 26 अक्षर ही उप्लब्ध हैं जबकि इस वाक्य में 33 अक्षरों का प्रयोग किया गया जिसमे चार बार O और A, E, U तथा R अक्षर का प्रयोग क्रमशः 2 बार किया गया है।

इसके अलावा इस वाक्य में अक्षरों का क्रम भी सही नहीं है। जहां वाक्य T से शुरु होता है वहीं G से खत्म हो रहा है।

अब ज़रा संस्कृत के इस श्लोक को पढिये:
क:खगीघाङ्चिच्छौजाझाञ्ज्ञोSटौठीडढण:।
तथोदधीन पफर्बाभीर्मयोSरिल्वाशिषां सह।।
अर्थात: पक्षियों का प्रेम, शुद्ध बुद्धि का, दूसरे का बल अपहरण करने में पारंगत, शत्रु-संहारकों में अग्रणी, मन से निश्चल तथा निडर और महासागर का सर्जन करनार कौन? राजा मय! जिसको शत्रुओं के भी आशीर्वाद मिले हैं।

श्लोक को ध्यान से पढ़ने पर आप पाते हैं की संस्कृत वर्णमाला के सभी 33 व्यंजन इस श्लोक में दिखाये दे रहे हैं वो भी क्रमानुसार। यह खूबसूरती केवल और केवल संस्कृत जैसी समृद्ध भाषा में ही देखने को मिल सकती है!

पूरे विश्व में केवल एक संस्कृत ही ऐसी भाषा है जिसमें केवल एक अक्षर से ही पूरा वाक्य लिखा जा सकता है, किरातार्जुनीयम् काव्य संग्रह में केवल “न” व्यंजन से अद्भुत श्लोक बनाया है और गजब का कौशल्य प्रयोग करके भारवि नामक महाकवि ने थोडे में बहुत कहा है-

न नोननुन्नो नुन्नोनो नाना नानानना ननु।
नुन्नोऽनुन्नो ननुन्नेनो नानेना नुन्ननुन्ननुत्॥
अर्थात: जो मनुष्य युद्ध में अपने से दुर्बल मनुष्य के हाथों घायल हुआ है वह सच्चा मनुष्य नहीं है। ऐसे ही अपने से दुर्बल को घायल करता है वो भी मनुष्य नहीं है। घायल मनुष्य का स्वामी यदि घायल न हुआ हो तो ऐसे मनुष्य को घायल नहीं कहते और घायल मनुष्य को घायल करें वो भी मनुष्य नहीं है। वंदेसंस्कृतम्!

एक और उदहारण है:
दाददो दुद्द्दुद्दादि दादादो दुददीददोः
दुद्दादं दददे दुद्दे ददादददोऽददः
अर्थात: दान देने वाले, खलों को उपताप देने वाले, शुद्धि देने वाले, दुष्ट्मर्दक भुजाओं वाले, दानी तथा अदानी दोनों को दान देने वाले, राक्षसों का खण्डन करने वाले ने, शत्रु के विरुद्ध शस्त्र को उठाया।

है ना खूबसूरत? इतना ही नहीं, क्या किसी भाषा में केवल 2 अक्षर से पूरा वाक्य लिखा जा सकता है? संस्कृत भाषा के अलावा किसी और भाषा में ये करना असम्भव है। माघ कवि ने शिशुपालवधम् महाकाव्य में केवल “भ” और “र ” दो ही अक्षरों से एक श्लोक बनाया है। देखिये –

भूरिभिर्भारिभिर्भीराभूभारैरभिरेभिरे
भेरीरे भिभिरभ्राभैरभीरुभिरिभैरिभा:।
अर्थात- निर्भय हाथी जो की भूमि पर भार स्वरूप लगता है, अपने वजन के चलते, जिसकी आवाज नगाड़े की तरह है और जो काले बादलों सा है, वह दूसरे दुश्मन हाथी पर आक्रमण कर रहा है।

एक और उदाहरण:
क्रोरारिकारी कोरेककारक कारिकाकर।
कोरकाकारकरक: करीर कर्करोऽकर्रुक॥
अर्थात- क्रूर शत्रुओं को नष्ट करने वाला, भूमि का एक कर्ता, दुष्टों को यातना देने वाला, कमलमुकुलवत, रमणीय हाथ वाला, हाथियों को फेंकने वाला, रण में कर्कश, सूर्य के समान तेजस्वी [था]।

पुनः क्या किसी भाषा मे केवल तीन अक्षर से ही पूरा वाक्य लिखा जा सकता है? यह भी संस्कृत भाषा के अलावा किसी और भाषा में असंभव है!
उदहारण
देवानां नन्दनो देवो नोदनो वेदनिंदिनां
दिवं दुदाव नादेन दाने दानवनंदिनः।
अर्थात- वह परमात्मा [विष्णु] जो दूसरे देवों को सुख प्रदान करता है और जो वेदों को नहीं मानते उनको कष्ट प्रदान करता है। वह स्वर्ग को उस ध्वनि नाद से भर देता है, जिस तरह के नाद से उसने दानव [हिरण्यकशिपु] को मारा था।

अब इस छंद को ध्यान से देखें इसमें पहला चरण ही चारों चरणों में चार बार आवृत्त हुआ है, लेकिन अर्थ अलग-अलग हैं, जो यमक अलंकार का लक्षण है। इसीलिए ये महायमक संज्ञा का एक विशिष्ट उदाहरण है
विकाशमीयुर्जगतीशमार्गणा विकाशमीयुर्जतीशमार्गणा:।
विकाशमीयुर्जगतीशमार्गणा विकाशमीयुर्जगतीशमार्गणा:॥
अर्थात- पृथ्वीपति अर्जुन के बाण विस्तार को प्राप्त होने लगे, जबकि शिवजी के बाण भंग होने लगे। राक्षसों के हंता प्रथम गण विस्मित होने लगे तथा शिव का ध्यान करने वाले देवता एवं ऋषिगण (इसे देखने के लिए) पक्षियों के मार्गवाले आकाश-मंडल में एकत्र होने लगे।

जब हम कहते हैं की संस्कृत इस पूरी दुनिया की सभी प्राचीन भाषाओं की जननी है तो उसके पीछे इसी तरह के खूबसूरत तर्क होते हैं। यह विश्व की अकेली ऐसी भाषा है, जिसमें “अभिधान- सार्थकता” मिलती है अर्थात् अमुक वस्तु की अमुक संज्ञा या नाम क्यों है, यह प्रायः सभी शब्दों में मिलता है।

नीम बच जाएगा

हर साल पौधारोपण होता है और कुछ ही पौधे वृक्ष बन पाते है। ऐसे में हरे पेड़ को काट कर पर्यावरण को नुकसान पहुंचाने को लेकर रची गई संदेश परक कहानी है। शिक्षिका की तरह सभी नागरिक जागरूक बने और हरे पेड़ों को काटने से रोकथाम में अपना सहयोग करें यही कहानी का समाज को सार्थक संदेश है, पढ़िए कहानी……………
विद्यालय में बड़ी गहमागहमी है। समाजोपयोगी उत्पादक कार्य का शिविर चल रहा है। आज सफाई का दिन है। इंचार्ज महोदय परिसर के बीचों -बीच खड़े अपनी रोबीली आवाज में छात्रों को निर्देश दे रहे हैं। छात्र कागज और टहनियाँ चुन रहे हैं। इंचार्ज स्थानीय हैं और विद्यालय पर उनका पूरा प्रभुत्व है।
“चलो, आज इन पेड़ों की छंटाई भी कर देते हैं, बहुत फैल गए हैं।” उन्होंने कहा तो छात्र झटपट भण्डार से कुल्हाड़ियाँ ले आये। कुल मिलाकर विद्यालय के उदासीन वातावरण में नवीन ऊर्जा का संचार हो गया। बिना नख- दंत के वृद्ध सिंह की तरह अपने कक्ष में बैठे रहने वाले प्रधानाचार्य जी भी बाहर निकल आये और दीवारों पर पड़े पुताई के छींटों को साफ करवाने में जुट गये। वह भी छात्रों के साथ प्रयोगशाला की सफाई करने चली गयी। कुछ समय बाद जब वह बाहर आई तो वहां का दृश्य देखकर दंग रह गयी।
एक लड़का बरामदे से सटे एक तरुण पेड़ के तने पर कुल्हाड़ी से वार कर रहा था। उसके पैर स्वतः ही उस दिशा में दौड़ गये,
“अरे.. अरे..  यह क्या हो रहा है? क्यों इस पेड़ को काट रहे हो?” वह चिल्लाई तो लड़के के हाथ रुक गये।
“अरे काट, काट क्यों रुक गया। ” वे अपनी दबंग आवाज में बोले। लड़के ने सहम कर उसकी तरफ देखा तो उन्होंने उसके हाथ से कुल्हाड़ी छीन ली और स्वयं पूरी शक्ति से पेड़ के तने पर प्रहार करने लगे। वह पेड़ के आगे खड़ी हो गई।
“मैडम, पेड़ के आगे से हटो, नहीं तो यह आप पर गिरेगा।” वे धृष्टता से बोले और लगातार उनके प्रहार जारी रहे। वह बदहवास सी वहाँ खड़े अन्य शिक्षकों से याचना करती रही।
“यह बिलकुल हरा पेड़ है, इसको कटने से कोई तो रोको… ”
बिना एक शब्द बोले सब निर्लिप्त भाव से अपने कामों में लगे रहे। उसको कुछ नहीं सूझा तो उसने एक पत्रकार को सूचना दे दी। घंटे भर में तहसीलदार साहब की गाड़ी विद्यालय में आ गयी। सारा का सारा स्टाफ उनका स्वागत करने बढ़ा।
“क्या बात है भाई, कौन सा पेड़ काट दिया? हमें सूचना मिली है…”
“हे हे, देखिये यह पेड़ है। विद्यालय की दीवार को क्षति पहुंचा रहा था तो हमने काट दिया। वैसे भी यह सूखने ही वाला था।” चापलूसी हंसी के साथ इंचार्ज बोले।
“किसने दी पेड़ के काटने की सूचना?” तहसीलदार साहब ने पूछा।
“जी, मैंने।” वह धीमी आवाज में बोली।
“यह जंगली पेड़ शिरीष है। इसको काटने के लिए अनुमति की आवश्यकता नहीं होती।” वे उसको घूर कर बोले।  “जी, इतना जानती हूँ कि किसी भी हरे पेड़ को काटना अपराध है।” उसने विनम्रता से कहा।
“आपको ज्यादा पता है या मुझे?” वे दहाड़े।
“हम तो एक जरूरी मीटिंग में थे। ऊपर से फोन आया तो हमें कार्यवाही करने आना पड़ा।” वे तल्खी से बोले।
“जब्त कर लो पेड़ को।” वे साथ आये कर्मचारी की तरफ मुखातिब हुए। परिसर में कुर्सियां लग गयीं। चाय -नाश्ता आ गया।
“अब देखिये हम भी क्या करें, ऊपर से फोन आ गया तो आना ही पड़ा। लिखवाइए, क्या लिखवाना है…”
“हे हे लिखिए, पेड़ की टहनियाँ टूट -टूट कर गिरती थीं, बच्चों को नुकसान पहुँच सकता था। पेड़ में बीमारी लग गयी थी……”
“अब देखिये न सर, यह ग्राउंड में नीम का पेड़। परेड वाले दिन बहुत बुरा लगता है जब बीच में आता है। उस दिन एडीएम् साहब से कहा था मैंने, तो बोले- कटवाने की अनुमति तो नहीं दे सकता। धीरे दृधीरे काटकर खत्म दो..  हे हे हे।”
“नहीं, नहीं। नीम का पेड़ मत काटना। यदि ऊपर से कार्यवाही हुई तो हम भी कुछ नहीं कर पाएंगे। इस पेड़ की क्षतिपूर्ति के लिए भी आठ- दस नए पेड़ लगवा देना।”
“जी, बिलकुल सर।” गाड़ी लौट गयी।
विद्यालय का स्टाफ उससे कट गया था। स्टाफ सदस्य की शिकायत करने का गंभीर अपराध उससे हुआ था। एक सप्ताह में उसे व्यवस्थार्थ बालिका विद्यालय में भेज दिया गया। जाते -जाते उसने देखा कि बीच परिसर खड़ा वह नीम का कद्दावर पेड़ अपनी शाखाएं फैलाये उसे दुलार रहा था। भले ही अब शिरीष के पीले फूल उसकी गोद में नहीं झरेंगे। पर उम्मीद है कि नीम बच जायेगा।
लेखिका परिचयः सुप्रसिद्ध विज्ञान कथा लेखिका कोटा ( राज.)

दूरदर्शन पर शुरू होगा ‘दामिनी 2.0’

मराठी टेलीविजन के इतिहास में एक बार फिर ‘दामिनी’ की गूंज सुनाई देने वाली है। मराठी टीवी का पहला डेली सोप ओपेरा ‘दामिनी’ अब अपने सीक्वल ‘दामिनी 2.0’ के रूप में जल्द ही टेलीविजन पर प्रसारित किया जाएगा।

‘दामिनी’ का निर्माण गौतम अधिकारी (अब दिवंगत) और मार्कंड अधिकारी ने ‘श्री अधिकारी ब्रदर्स’ के बैनर तले किया था। इसका निर्देशन कांचन अधिकारी ने किया था। यह शो करीब 9 साल तक चला और 1500 से ज्यादा एपिसोड पूरे करते हुए दर्शकों के बीच बेहद लोकप्रिय हुआ था।

अब इसका सीक्वल ‘दामिनी 2.0’ दूरदर्शन सह्याद्री वाहिनी द्वारा तैयार किया जा रहा है। इसे भी स्वयं कांचन अधिकारी ने लिखा और निर्देशित किया है।

तीन दशक बाद इस प्रतिष्ठित शो की वापसी पर मीडिया जगत के दिग्गज मार्कंड अधिकारी ने खुशी जताई। उन्होंने कहा, ‘मुझे बहुत प्रसन्नता है कि दूरदर्शन केंद्र, मुंबई ने ‘दामिनी’ की विरासत को आगे बढ़ाने का निर्णय लिया है। ‘दामिनी 2.0’ का निर्माण किया जा रहा है और कांचन स्वयं इसे लिख और निर्देशित कर रही हैं।’

इसके साथ ही उन्होंने कहा, ‘श्री अधिकारी ब्रदर्स’ ने पिछले चार दशकों में भारतीय दर्शकों के लिए कई यादगार कार्यक्रम बनाए हैं और आज भी यह हर घर का जाना-पहचाना नाम है। हमारी अगली पीढ़ी रवि और कैलाश इस परंपरा को आगे बढ़ा रहे हैं और आज के दर्शकों की पसंद के मुताबिक कंटेंट तैयार कर रहे हैं। मैं ‘दामिनी 2.0’ को वही सफलता और लोकप्रियता मिलने की कामना करता हूं, जो मूल ‘दामिनी’ को मिली थी।’

डॉ.कृष्णा कुमारी की सद्य प्रकाशित पुस्तक “बात -बात ख़ुश्बूदार” का लोकार्पण सम्पन्न

अणुव्रत विश्व भारती, कोबा, अहमदाबाद मे आयोजित त्रिदिवसीय लेखक सम्मेलन में डॉ. कृष्णा कुमारी की निबन्ध-कृति “बात बात ख़ुश्बूदार” का लोकार्पण एक भव्य समारोह में सम्पन्न हुआ। कार्यक्रम के मुख्य अथिति श्रीमान पी. के. लहरी साहब (आई. ए. एस.), पूर्व मुख्य सचिव, गुजरात रहे। अध्यक्षता, अविनाश नाहर, निवर्तमान अध्यक्ष, अणुव्रत विश्व भारती ने अंजाम दी तथा विशिष्ट अतिथि जिनेन्द्र कुमार कोठारी (संयोजक, अणुव्रत लेखक मंच), सन्तोष सुराणा, सम्पादक, नूतन भाषा सेतु पत्रिका (अहमदाबाद) थे।

मुनि श्री डॉ मदन कुमार ने अपने अनौपचारिक वार्तालाप में कहा कि ‘बात-बात खुश्बूदार’ सुन्दर-पठनीय पुस्तक है जो संस्कार निर्माण, मानवता का सन्देश, नैतिक मूल्यों की सम्वाहक, स्वस्थ-सुन्दर समाज निर्माण में उल्लेखनीय भूमिका निभाने वाली है, ऐसी पुस्तकों वर्तमान परिस्थितियों में महती आवश्यकता है। डॉ. कुसुम लूनिया एवं कैलाश बोराणा उपाध्यक्ष, अणुव्रत विश्व भारती, मनोज सिंघवी महामन्त्री, अणुव्रत विश्व भारती की कार्यक्रम में गरिमामय उपस्थित रही।

अणुव्रत लेखक सम्मेलन के अंतर्गत आयोजित इस समारोह में संयोजक श्रीमान जिनेन्द्र कुमार कोठारी जी की अथक साधना, समर्पण विशेष उल्लेखनीय रहा। सभी साहित्यकारों ने प्रसन्नता व्यक्त करते हुए कृष्णा कुमारी को हार्दिक शुभकामनायें, एवं बधाई दी।

कार्यक्रम अणुव्रत अनुशास्ता आचार्यश्री महाश्रमण जी के सान्निध्य व मुनिश्री मनन कुमार जी के मार्गदर्शन में सुसम्पन्न हुआ। कार्यक्रम का संचालन श्री प्रकाश तातेड़ साहब, सह सम्पादक, ‘बच्चों का देश’ पत्रिका ने किया। उल्लेखनीय है कि कृष्णा कुमारी की चौदह पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं। अन्त में डॉ. कृष्णा कुमारी ने सभी उपस्थित विद्व जनों के प्रति आभार प्रकट किया।

मानवीय मूल्यों का विकास

आज के आधुनिक समाज को आईना दिखाती यह कहानी बच्चों में दान, दया, करुणा, उदारता जैसे मानवीय मूल्यों का विकास कर एक अच्छा इंसान बनने की प्रेरणा देती है। समाज को सोचना होगा बच्चों का भौतिक विकास ही पर्याप्त नहीं है वरन हमें उनमें मानवीय गुणों का भी विकास करना होगा। पढ़िए कहानी…………..

एक गांव में एक गरीब ब्राह्मण रहता था, नाम था तुलसीराम। उनके तीन बेटे थे सीताराम, राधेश्याम, रास बिहारी। ब्राह्मण बहुत मेहनती और ईमानदार था। दिनभर की मेहनत से जो कुछ मिल जाता था, उसी से उनके घर का ख़र्च चलता था। तीनों बेटे दिन भर इधर-उधर टाइम पास करते थे, पर कोई काम नहीं करते थे, इस बात से तुलसीराम बहुत दुःखी रहते थे।

एक बार उन्होंने अपने बेटों की परीक्षा लेने की बात सोची। उन्होंने बीमार होने का नाटक किया और तीनों को बुलाकर कहा – आज तुम लोग घर के लिए कुछ कमाकर लाओ।
तीनों ने एक स्वर में कहा – जी, पिताजी! और तीनों बेटे कुछ पैसे लेकर कमाने के लिए निकल गए।

बड़े बेटे ने अपने पास जमा पैसे से कुछ फल खरीदे, कि इन्हें बेच कर कुछ पैसे कमाऊंगा, पर शाम तक उसके फल नहीं बिके।

दूसरा लड़का मजदूरी की सोच कर गया, पर शाम तक उसको कोई काम नहीं मिला, जो पैसे घर से लेकर गया था, उतने ही पैसे लेकर लौटा।

तीसरा लड़का बाजार की ओर जा रहा था, कि उसे रास्ते में कुछ संन्यासी जाते हुए दिखे, जो कई दिन से भूखे थे। उसने सबको भोजन करवाया और ओढ़ने के लिए वस्त्र दिए। संन्यासियों ने उसे बहुत सारा आशीर्वाद दिया।

शाम को तीनों लड़के घर लौटकर आए और पिता को अपनी कमाई के बारे में बताया। बड़े बेटे ने बड़े दुःखी होकर बताया कि उसका एक भी फल नहीं बिका, जो पैसे लेकर गया था, वह और ख़र्च हो गए।

दूसरे लड़के ने भी दुःखी होकर कहा – मैं शाम तक मजदूरी के लिए इंतजार करता रहा पर, मुझे कोई काम नहीं मिला।

तीसरे पुत्र से पिता ने पूछा – तुम क्या कमाकर लाए हो? उसने कहा, मैं कुछ कमाकर तो नहीं लाया, पर मुझे कुछ संन्यासी भूखे मिले, मेरे पास जो पैसे थे उनसे मैंने उन्हें भोजन करवाया और ओढ़ने के लिए वस्त्र ख़रीद दिए, जिससे वे संन्यासी बहुत संतुष्ट हुए और उन्होंने मुझे बहुत सारा आशीर्वाद दिया। बस आज की मेरी यही कमाई है।

पिता ने गंभीरता से सबकी बात सुनी और बड़े पुत्र से कहा – बस मैं अपने पुत्रों को यही शिक्षा देना चाहता था। अगर तुम वाणी में मिठास और व्यवहार में सरलता लाओगे, तो तुम्हारे पत्थर भी बिक जाएंगे। पर अगर कठोरता से बात करोगे, तो आते हुए ग्राहक भी लौट जाएंगे।

दूसरे पुत्र से कहा – अगर तुम ये सोचोगे कि कोई घर आकर तुम्हें काम देगा, तो तुम्हें कभी काम नहीं मिलेगा। काम ढूंढने के लिए मेहनत करनी होगी, तब काम मिलेगा।

तीसरे पुत्र से कहा – तुम पैसा तो बहुत कमा सकते हो, पर दान, दया, करुणा, उदारता जैसे मानवीय मूल्यों का संरक्षण कैसे कर सकते हो, यह तुम्हारे व्यवहार से पता चलता है। यही मनुष्य होने की असली पहचान है।

वर्तमान समय में भी हमें यह सोचना है कि हम अपने बच्चों को डॉक्टर, इंजीनियरिंग, उद्योगपति, नेता, आई.ए.एस अफसर तो बना रहे हैं परंतु क्या अच्छा इंसान भी बना रहे हैं? संवेदनशील मनुष्य बना रहे हैं?

भौतिकता के इस युग में मानवीय मूल्यों का संरक्षण और विकास वर्तमान समय की महती आवश्यकता है।

विश्वास का वैश्विक सेतु और व्यापारिक समरसता का आधार

विश्व मानक दिवस- 14 अक्टूबर, 2025

विश्व मानक दिवस प्रत्येक वर्ष 14 अक्तूबर को मनाया जाता है। यह दिवस उस अदृश्य व्यवस्था का उत्सव है जो हमारे जीवन, उद्योग, व्यापार और सुरक्षा की गुणवत्ता को सुनिश्चित करती है। मानकीकरण केवल कोई तकनीकी प्रक्रिया नहीं है, बल्कि यह विश्वसनीयता, सुरक्षा, पारदर्शिता और आपसी सहयोग की ऐसी बुनियाद है जो मानव जीवन की सहजता और स्थिरता का आधार बनती है। इस दिवस का उद्देश्य यह स्मरण कराना है कि किसी भी उत्पाद, सेवा या व्यवस्था की उपयोगिता तभी टिकाऊ और भरोसेमंद हो सकती है जब उसमें निर्धारित मानक और गुणवत्ता की कसौटी कायम हो। विश्व मानक दिवस उन हजारों विशेषज्ञों और कर्मयोगियों को सम्मान देने का भी अवसर है जो अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं में बैठकर विश्व के हित में ऐसे मानक तय करते हैं और अंतर्राष्ट्रीय मानकों के निर्माण और कार्यान्वयन में सक्रिय भागीदारी निभाते हैं। इसका उद्देश्य अंतर्राष्ट्रीय व्यापार और सुरक्षा के साथ-साथ जीवन की गुणवत्ता को बेहतर बनाने में मानकीकरण की भूमिका पर ज़ोर देना है, जो सबके लिए समान हों, निष्पक्ष हों और मानवता की सुरक्षा और प्रगति के लिए हों।

यह दिवस 1946 में हुई पहली बैठक की याद में मनाया जाता है, जिसमें 25 देशों के प्रतिनिधि लंदन में एक अंतरराष्ट्रीय संगठन की स्थापना के लिए एकत्र हुए थे, जो मानकीकरण पर अपने प्रयासों को केंद्रित करेगा। हालाँकि अगले वर्ष अंतर्राष्ट्रीय मानकीकरण संगठन का गठन किया गया था, लेकिन पहला विश्व मानक दिवस 1970 में ही मनाया गया। विश्व मानक दिवस का उद्देश्य जनता को अंतर्राष्ट्रीय बाज़ार में मानकों की महत्वपूर्ण भूमिका के प्रति जागरूक करना है। अर्थात् स्वास्थ्य सेवा से लेकर तकनीक तक, लगभग हर क्षेत्र के उत्पादों और सेवाओं में सुरक्षा, विश्वसनीयता और गुणवत्ता। 2025 की थीम ‘सहयोग’ है, जो प्रगति को संभव बनाने के लिए साझेदारी के महत्व को दर्शाती है। यह सहयोग की शक्ति और इस विश्वास का प्रमाण है कि हम अपने-अपने हिस्सों के योग से भी अधिक शक्तिशाली हैं। साथ मिलकर काम करके, हम लोगों को स्थिरता की चुनौतियों का सीधा सामना करने के लिए वास्तविक समाधानों से सशक्त बना रहे हैं।

इसके अतिरिक्त, भारतीय मानक ब्यूरो ने इस वर्ष की थीम को ‘सतत विकास लक्ष्यः लक्ष्य प्राप्ति में सामूहिक साझेदारी’ के रूप रखा है। एक बेहतर विश्व निर्माण के लिए साझा दृष्टिकोण का विशेष महत्व है, इस दिवस को मनाने का लक्ष्य उद्योग, नवाचार और बुनियादी ढांचे पर विशेष ध्यान देना और उपभोक्ताओं, नियामकों और उद्योग के बीच मानकीकरण के महत्व के बारे में जागरूकता बढ़ाना है।

आज जब वैश्वीकरण, तकनीकी तीव्रता, जलवायु परिवर्तन, स्वास्थ्य संकट और आपूर्ति श्रृंखला जैसी जटिल चुनौतियाँ सामने हैं, तब मानकीकरण का महत्व पहले से कहीं अधिक बढ़ गया है। मानक ही वह भाषा हैं जिनसे विश्व के देश एक-दूसरे को समझ पाते हैं। जब कोई वस्तु या सेवा एक निश्चित मानक के अनुरूप होती है, तो उसे किसी भी देश में स्वीकार किया जा सकता है। इससे व्यापार सहज होता है, उपभोक्ता का भरोसा बढ़ता है और देशों के बीच परस्पर निर्भरता मजबूत होती है। यही कारण है कि मानकीकरण को विश्व व्यापार की आत्मा कहा जाता है। इससे केवल आर्थिक लाभ नहीं होता, बल्कि यह जीवन की गुणवत्ता, सुरक्षा और पर्यावरणीय संतुलन को भी सुनिश्चित करता है।

विश्व मानक दिवस के इस सन्देश के विपरीत आज की राजनीति में कई बार ऐसे कदम उठाए जा रहे हैं जो विश्व व्यापार और आपसी सहयोग की भावना को कमजोर करते हैं। अमेरिका के वर्तमान राष्ट्रपति ट्रम्प द्वारा अपनाई जा रही अतिशयोक्ति पूर्ण टैरिफ नीति इसका उदाहरण है। उन्होंने राष्ट्रीय सुरक्षा और प्रतिस्पर्धा के नाम पर आयातित वस्तुओं पर भारी शुल्क लगाकर एक प्रकार से व्यापार युद्ध का वातावरण बना दिया है। यह नीति केवल व्यापारिक हितों को नहीं बल्कि वैश्विक संतुलन को भी प्रभावित कर रही है। टैरिफ की यह दीवारें देशों के बीच अविश्वास बढ़ाती हैं, कीमतों में वृद्धि करती हैं और आपूर्ति श्रृंखला को असंतुलित करती हैं। आयातित वस्तुओं की लागत बढ़ने से उपभोक्ताओं को अधिक कीमत चुकानी पड़ती है, उद्योगों की उत्पादन लागत बढ़ती है और अंतरराष्ट्रीय व्यापार की गति धीमी पड़ जाती है।

विश्व व्यापार संगठन ने पहले ही चेताया है कि ऐसी टैरिफ नीतियाँ वैश्विक व्यापार वृद्धि को घटा रही हैं और निवेशकों में अस्थिरता पैदा कर रही हैं। टैरिफ केवल कर या शुल्क नहीं होते, वे राष्ट्रों के बीच विश्वास का संकेत भी होते हैं। जब कोई देश बार-बार अपने आर्थिक हितों की आड़ में ऊँचे शुल्क लगाता है, तो अन्य राष्ट्र प्रतिकार के रूप में अपने दरवाज़े बंद करने लगते हैं। परिणाम यह होता है कि जो विश्व पहले एक साझा बाज़ार की ओर बढ़ रहा था, वह फिर से सीमाओं और अविश्वास की जंजीरों में बँधने लगता है। ऐसे में विश्व मानक दिवस यह सन्देश देता है कि दुनिया को जोड़ने का वास्तविक माध्यम व्यापारिक शुल्क नहीं बल्कि मानकीकरण है।

मानक देशों को एक साझा धरातल प्रदान करते हैं, जहाँ उत्पादों की गुणवत्ता और सुरक्षा का विश्वास इतना मजबूत होता है कि किसी अतिरिक्त शुल्क या रोक की आवश्यकता ही नहीं पड़ती। मानकीकरण दरअसल विश्वास का पुल है जो सीमाओं के आर-पार लोगों, वस्तुओं और विचारों को जोड़ता है। जब एक देश दूसरे देश के मानकों को स्वीकार करता है, तो यह आपसी सम्मान और पारदर्शिता का प्रतीक होता है। इसी प्रक्रिया से अंतरराष्ट्रीय व्यापार में सरलता आती है, सुरक्षा और गुणवत्ता की गारंटी मिलती है और उपभोक्ता हित सुरक्षित रहते हैं। मानकीकरण की यह प्रक्रिया न केवल औद्योगिक या व्यापारिक है बल्कि यह मानवीय भी है। इसके मूल में समानता, निष्पक्षता और सहयोग की भावना निहित है। यह वह दर्शन है जो कहता है कि विश्व एक परिवार है और सबकी भलाई में ही अपनी भलाई है। अतः जब कोई राष्ट्र टैरिफ या प्रतिबंधों की दीवार खड़ी करता है, तो वह इस वैश्विक परिवार के बीच विभाजन की रेखा खींचता है। मानक उन रेखाओं को मिटाते हैं और संबंधों को जोड़ते हैं।

आज आवश्यकता इस बात की है कि मानकीकरण केवल औद्योगिक मंच तक सीमित न रहे, बल्कि यह अंतरराष्ट्रीय नीति का भी आधार बने। विश्व के सभी देश मानकों के निर्धारण में समान भागीदारी करें ताकि कोई भी राष्ट्र या कंपनी इस प्रक्रिया पर वर्चस्व न जमा सके। छोटे और विकासशील देशों को भी अंतरराष्ट्रीय मानक संस्थाओं में समान अवसर मिले ताकि वे अपने उत्पादों और सेवाओं के माध्यम से वैश्विक व्यापार में समान रूप से शामिल हो सकें। इसके साथ ही प्रमाणन प्रक्रिया को सरल और सुलभ बनाना आवश्यक है ताकि छोटे उद्योग भी मानक के अनुरूप अपने उत्पादों को विश्व स्तर पर प्रस्तुत कर सकें। विश्व मानक दिवस हमें यह स्मरण कराता है कि मानवता की प्रगति केवल आर्थिक शक्ति में नहीं बल्कि उस सहयोग और विश्वास में है जो मानकीकरण के माध्यम से संभव होता है। अतिशयोक्ति पूर्ण टैरिफ जैसी नीतियाँ क्षणिक राजनीतिक लाभ तो दे सकती हैं, पर वे विश्व के समन्वित विकास और आपसी विश्वास को नष्ट करती हैं।

इसलिए आवश्यक है कि सभी राष्ट्र मानकीकरण की भावना को अपनाएँ और विश्व व्यापार को किसी प्रतिस्पर्धा या प्रतिशोध का माध्यम न बनाकर साझेदारी और साझा उन्नति का माध्यम बनाएँ।
मानकीकरण ही वह अदृश्य तंतु एवं बुनियादी आधार है जो दुनिया को एकजुट रखता है। यह न केवल उत्पादन और व्यापार में गुणवत्ता लाता है बल्कि जीवन के हर क्षेत्र में विश्वसनीयता और सुरक्षा का भाव जगाता है। विश्व मानक दिवस इस विचार का प्रतीक है कि जब तक हम समान मानकों और साझा मूल्यों से नहीं जुड़ते, तब तक विश्व की एकता अधूरी है। इसलिए इस दिवस पर यह संकल्प लिया जाना चाहिए कि हम ऐसी नीतियों से दूर रहें जो विभाजन उत्पन्न करें, और मानकीकरण की उस साझा राह पर चलें जो सबके लिए विश्वास, सुरक्षा और समृद्धि का मार्ग प्रशस्त करती है। संपूर्ण मानक प्रणाली सहयोग पर आधारित है।

(ललित गर्ग)
लेखक, पत्रकार, स्तंभकार
ई-253, सरस्वती कंुज अपार्टमेंट
25 आई. पी. एक्सटेंशन, पटपड़गंज, दिल्ली-92
फोनः 22727486, 9811051133

वाल्मीकि जयंती के उपलक्ष्य में हिन्दी कविता-पाठ का आयोजन

भुवनेश्वर।  स्थानीय उत्कल अनुज हिन्दी पुस्तकालय सभागार में 11 अक्टूबर की शाम में पुस्तकालय के मुख्य संरक्षक सुभाष चन्द्र भुरा की अध्यक्षता में वाल्मीकि जयंती के उपलक्ष्य में हिन्दी कवितापाठ का आयोजन किया गया जिसमें आरंभिक जानकारी देते हुए अशोक पाण्डेय ने बताया कि ब्रह्माजी के निवेदन पर विद्या की देवी मां सरस्वती ने त्रेतायुग में तमसा नदी के चट पर तपस्या कर रहे वाल्मीकि के कण्ठ में प्रवेश किया और उसी वाल्मीकि ने संस्कृत में प्रथम महाकाव्य रामायण की रचना की और आदिकवि कहलाए।

श्री पाण्डेय ने कहा कि कार्तिक माह 07 अक्टूबर से आगामी 5 नवंबर तक चलेगा जो हर प्रकार की पवित्रता का पावन संदेशवाहक है। जैसेःअपनी व्यक्तिगत स्वच्छता,अपनी पाकशाला,घर-आंगन,आस-पड़ोस की सफाई तथा सबसे  बड़ी बात यह है कि हमें अपने विचारों की सफाई को संकल्पित भाव से करनी चाहिए। अवसर पर स्थानीय दूरदर्शन के कार्यक्रम प्रभारी आशीष खरे,एएनआई के तकनीकी प्रमुख नरेन्द्र जी,जयलुकाश,ज्वेलरी प्रमुख तथा कवि किशन खण्डेलवाल को सुभाष चन्द्र भुरा ने अंगवस्त्र तथा स्मृति चिह्न प्रदानकर सम्मानित किया। अवसर पर मुरारीलाल लढानिया,गोपालकृष्ण सिंह,रुणु रथ,विक्रमादित्य,मनीष पाण्डेय,रवीन्द्र दुबे,भारती परिडा,आशीष खरे,नरेन्द्र,स्मिता कानुनगो,शशि मेमानी,अमित रंजन,अविनाश दाश,राजेश तिवारी और किशन खण्डेलवाल ने अपनी-अपनी कविताओं का सस्वर पाठ किया।

मेरी नजरों में ‘राजस्थान के साहित्य साधक’

डॉ. प्रभात कुमार सिंघल की बहुचर्चित पुस्तक ‘राजस्थान के साहित्य साधक’ में राजस्थान के मूल और प्रवासी साहित्यकारों के अतिरिक्त अन्य स्थानों से प्रवास करते हुए राजस्थान में दीर्घ समय से रहे हो- उनके व्यक्तित्व एवं कृतित्व की जानकारी दी गई हैं। इस पुस्तक को पढ़कर पाठक न केवल समकालीन हिंदी और राजस्थानी साहित्य की गतिविधियों से परिचित हो सकते हैं, बल्कि उन साहित्यकारों के कृतित्व के साथ-साथ उनकी आंतरिक अथवा बाहरी दुनिया से भी कुछ हद तक अवगत हो सकते हैं।

निस्संदेह, डॉ. प्रभात कुमार सिंघल का नाम भारतीय साहित्य एवं पर्यटन पत्रकारिता के क्षेत्र में अपने परिचय का मोहताज नहीं है। उन्होंने हिन्दी और राजस्थानी साहित्य में ऐसे-ऐसे उल्लेखनीय एवं ऐतिहासिक कार्य किए हैं, जिसे बड़ी-से-बड़ी सरकारी अथवा गैर सरकारी साहित्यिक संस्थाएं भी अधिकतर हाथ लगाने से कतराती है। वे अधिकतर ऐसे प्रोजेक्टों का चयन करते है, जिसमें सुदीर्घ समय और विपुल धनराशि के साथ-साथ अथक परिश्रम की आवश्यकता होती है। ‘नारी चेतना की साहित्यक उड़ान’, ‘जियो तो ऐसे जियो’ ‘बाल मन तक’ ‘राजस्थान के साहित्य साधक’ आदि उनकी पुस्तकें इस श्रेणी में ली जा सकती हैं। आधुनिक युग में अधिकांश लोग पुराने मंदिरों के चमचमाते कंगूरे देखकर तत्कालीन समाज के ऐश्वर्य का आकलन करते हैं, मगर उनका ध्यान नींव की ईंट की तरफ नहीं जाता। इस आलेख का मेरा मुख्य उद्देश्य नींव की ऐसी ईंट के महत्व को आपके समक्ष रखना है, क्योंकि नींव की ईंट पर ही कंगूरों की भव्यता झलकती है।

इस पुस्तक में जोधपुर, जयपुर, अजमेर, उदयपुर, बीकानेर, कोटा, भरतपुर, सीकर संभागों के अतिरिक्त राजस्थान छोड़कर व्यापार या व्यवसाय की तलाश में देश के अन्य हिस्सों जैसे ओड़िशा, कोलकाता, मुंबई आदि जाने वाले और देश के अन्य प्रांतों जैसे उत्तरप्रदेश, मध्यप्रदेश आदि से राजस्थान में आकर बसने वाले प्रमुख लेखकों को शामिल किया गया है।

डॉ. प्रभात कुमार सिंघल राजस्थान के कोटा जिले के रहने वाले है, और यहां की धरती शिक्षा-साहित्य के क्षेत्र में अति उर्वरा होने के कारण शिक्षकों और साहित्यकारों की समृद्ध खेप पैदा करती है। इस धरा ने ओम थानवी, केसरी सिंह मंडियार, हेमंत शेष, जगजीत सिंह, निकिता ललवानी जैसे महत्वपूर्ण पत्रकारों और साहित्यकारों की पृष्ठभूमि तैयार की है। शिक्षा के क्षेत्र में तो कोटा का कहना ही क्या! देश का एक नंबर एजुकेशन हब है। खासकर आईआईटी और मेडिकल की तैयारी करने वाले बच्चों के लिए तो किसी ‘धर्मक्षेत्र कुरुक्षेत्र’ से कम नहीं है। इस दृष्टिकोण से कोटा को आधुनिक युग के ‘नालंदा’, ‘तक्षशिला’, ‘रत्नगिरी’ आदि के रूप में देखा जा सकता है। कभी पुरातन काल में देश-विदेश के कोने-कोने से विद्यार्थीगण वहाँ अध्ययन के लिए आते थे, वैसे ही कोटा में आधुनिक युग में देश के कोने-कोने बच्चे यहां पढ़ने आते हैं।  कोटा की धरती के माटी-पानी-पवन में लक्ष्मी की तुलना में सरस्वती का ज्यादा प्रभाव है।

यही वजह है कि कोटा का अंचल न केवल साहित्य, कला, संस्कृति, शिक्षा, संगीत, इतिहास, भूगोल, खेल, पुरातत्व, पर्यावरण सभी के क्षेत्रों में अपनी अमिट छाप छोड़ता है, बल्कि डॉ. प्रभात कुमार सिंघल जैसे साहित्यकार अपनी मेहनत, लगन और समर्पण की बदौलत संपूर्ण मानव समाज के प्रतिनिधि पुरूषों, महिलाओं, बच्चों, बूढ़ों-सभी को साहित्य के माध्यम से जोड़कर एक सुशृंखलित समाज के निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका अदा करते हैं। कभी वे राजस्थान सरकार के सूचना एवं जनसंपर्क विभाग के संयुक्त निदेशक पद को सुशोभित कर रहे थे और अपनी नौकरी से प्रभावित होकर  आज वे समाज के सर्वांगीण विकास हेतु हिंदी भाषा के द्विवेदी युग के प्रर्वतक महावीर प्रसाद द्विवेदी की तरह ज्ञान के हर विषय पर अपनी कलम चलाते है। चाहे पर्यटन  हो या इतिहास, साहित्य हो या पत्रकारिता। उन्होंने अर्द्ध शताधिक पुस्तकों की रचना कर पूरे देश में शिक्षा, साहित्य और पत्रकारिता के क्षेत्र में ऐसा वातावरण तैयार किया है, जिसे बिरले व्यक्ति ही उसे साकार कर सकते है। ढ़िबरी या लालटेन की सलिता की तरह जलकर वे दूसरों को उजाला प्रदान दे सकते है।

डॉ. प्रभात कुमार सिंघल का व्यक्तित्व बहुआयामी है और कृतित्व विपुल। उनके भीतर दो सत्ताएं मुझे साफ नजर आती है। पहली सत्ता,जो उन्हें खोजी पत्रकारिता की ओर ले जाती है और दूसरी, उन्हें साहित्य के सूक्ष्म पहलुओं पर विचार-विमर्श  के लिए प्रेरित करती है। यह पुस्तक उनकी दूसरी सत्ता की ज्यादा उपज है। इस पुस्तक के एक छोटे से हिस्से में अपनी उपस्थित दर्ज कराने के कारण मैं उनकी रचना-प्रक्रिया से अच्छी तरह अवगत हूँ, इसलिए आसानी से समझ सकता हूँ  कि इस पुस्तक में संकलित आलेखों के लिए उन्हें कितनी अधिक मेहनत करनी पड़ी होगी। वह भी पूरी तरह निःस्वार्थ भावना से।

जहाँ तक मेरा मानना है; ‘राजस्थान के साहित्य साधक’ शीर्षक किसी विश्व विद्यालय के लिए पीएच.डी. का विषय हो सकता है, या फिर साहित्य अकादमी अथवा उसके जैसी कोई गैर-सरकारी साहित्यिक अनुष्ठान ऐसे शोधपरक प्रोजेक्ट अपने हाथ में ले सकते है। उसके लिए तन-मन-धन तीनों की नितांत जरूरत होती है। यहाँ ‘तन’, साहित्यकारों के बारे में आंकड़े इकट्ठे करने तथा उन्हे प्रभावशाली ढंग से प्रस्तुत के लिए किया जाने वाला श्रम है; ‘मन’, उनकी साहित्यिक संवेदनाओं और उपादानों को टटोलने का और ‘धन’ लगभग चार सौ पृष्ठों वाली पुस्तक प्रकाशित करने के लिए अदा की जाने वाली  कीमत। सजिल्द, सुंदर फांट वाली, आकर्षक पृष्ठ और साहित्यकारों के फोटो, पता, मोबाइल नंबर समेत 62 साहित्यकारों को समेटने वाली पुस्तक की कम से कम 300 प्रतियां अवश्य छपी होगी, जिसकी लागत  अस्सी-नब्बे हजार रुपए के करीब आई होगी। इतना खर्च करना क्या किसी एक दशक से ऊर्ध्व अपनी सरकारी नौकरी से सेवानिवृत्त हुए लेखक के लिए संभव है ? ऐसे प्रोजेक्ट में ‘तन-मन-धन’ से सेवा वहीं साहित्यकार कर सकता है, जिसके भीतर प्रचंड साहित्य-क्षुधा हो और सकारात्मक प्रखर पत्रकारिता का उच्च ज्वार-भाटा, जोर-जोर से हिलोरें मार रहा हो। इसलिए उन्हें ‘लेखकों के लेखक’, ‘पत्रकारों के पत्रकार’, ‘साहित्यकारों के साहित्यकार’ कहने में कोई अतिश्योक्ति नहीं हैं।

अभी तक तो मैंने केवल इस पुस्तक की पृष्ठभूमि में डॉ. सिंघल के साहित्यिक अवदान और साधना को उजागर करने का क्षुद्र प्रयास किया है, मगर अब मैं इस पुस्तक की अंतर्वस्तु, राजस्थान के साहित्यकारों के व्यक्तित्व और कृत्तित्व पर प्रकाश डालते हुए उनके साहित्य पर हल्का-फुल्का विमर्श, चिंतन-मनन के समुद्र-मंथन से पैदा होने वाले सुधा रस के जलपान हेतु अग्रसर होंगे।

इस पुस्तक की भूमिका विख्यात आलोचक विजय जोशी ने लिखी है, जिसमें उन्होंने डॉ. प्रभात कुमार सिंघल को मानवीय संवेदनाओं की उजास और गंभीर चिंतन-मनन के अनुनाद को आत्मसात करने वाला साहित्यकार बताया है, जो रचनात्मक दृष्टिकोण से अपने लेखन कर्म के प्रति सजग और चेतन होकर लगातार साहित्य साधकों की सर्जन यात्रा में सहभागी बने हुए है। उनके इस कथन से सहमत होते हुए मैं, यह भी जोड़ना चाहूँगा कि वे केवल सहयात्री ही नहीं है, बल्कि उनके साहित्य को उर्ध्वगति देने में उत्प्रेरक (catalyst) का भी कार्य कर रहे हैं।

राजस्थान न केवल महाराणा प्रताप, पृथ्वीराज चौहान, दुर्गादास जैसे शूरवीरों की भूमि रही है, बल्कि ‘पृथ्वीराज रासों’ जैसे वीर रस वाले काव्य लिखने वाले कवि चंद्र बरदाई की धरती भी है। यहां गौरी शंकर, हीरालाल ओझा जैसे महान पुरातत्वविद् पैदा होते हैं तो ‘चाणक्य’ सीरियल बनाने वाले चंद्र प्रकाश द्विवेदी जैसे कलाकार , ‘नदीम-श्रवण’ की जुगल जोडी में विख्यात संगीतकार श्रवण, ‘तारक मेहता का उल्टा चश्मा’ टीवी धारावहिक में काम करने वाला मेरा सहपाठी शैलेश लोढ़ा भी इसी धरती की देन है। खैर, यह दूसरी बात है कि भारत के हर प्रांतों की अपनी-अपनी  विशेषता है, मगर राजस्थान की लोक-संस्कृति, कला, साहित्य, खान-पान, परिवेश, आत्मीयता, मनुहार आदि सर्वोत्कृष्ट है। इस वजह से यह पुस्तक नवोदित रचनाकारों के लिए समकालीन भारतीय साहित्य, संस्कृति और कला के राजस्थानी चैप्टर का प्रतिनिधि इन्साक्लोपीड़िया है; और वरिष्ठ साहित्यकारों को अपने अतीत में झाँकने और वर्तमान में पीढ़ी के लेखकों से परिचित होने का स्वर्णिम अवसर प्रदान करणे वाला दस्तावेज़।

 

व्यक्तिगत तौर पर मेरे लिए यह अत्यंत ही खुशी व गर्व का विषय है कि इस पुस्तक बासठ  साहित्यकारों में से दस-बारह साहित्यकारों से मेरा प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष रूप से जान-पहचान है। उनसे किसी-न-किसी संदर्भ में भेंट-मुलाकात भी हुई हैं, जिनमें रमाकांत शर्मा ‘उद्भ्रांत’, डॉ. रति सक्सेना, जय प्रकाश पांड्या ‘ज्योतिपुंज’, डॉ. अखिलेश पालरिया, नंद भारद्वाज, बी.एल. आछा, डॉ. विमला भंडारी आदि। कुछ ऐसे भी लेखक-लेखिकाएं हैं, जिनकी रचनाओं को मैंने हिन्दी की विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में पढ़कर बहुत कुछ सीखा है। उदाहरण के तौर पर फारूख आफरीदी, किरण खेरूका, कुसुम खेमानी, ओम नागर, विकास देव, इकराम राजस्थानी, वेद व्यास, नीरज दहूया, महेन्द्र भाणावत, मधु माहेश्वरी, अतुल कनक, जितेन्द्र कुमार शर्मा ‘निर्मोही’, बाल मुकुंद ओझा, दीनदयाल शर्मा आदि प्रमुख है। और सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण, जिन साहित्यकारों को मैं व्यक्तिगत तौर पर मिल नहीं पाया, उस कमी को  डॉ. प्रभात कुमार सिंघल की इस संग्रहनीय पुस्तक ने पूरा कर दिया। घर बैठे राजस्थान की समकालीन साहित्य-संस्कृति के पुरोधाओं और आने वाली पीढ़ी से परिचित होने का अवसर मिला, इसके लिए मैं उन्हें हार्दिक साधुवाद देता हूँ।

मेरे दीर्घ साहित्यक सफर के दौरान मैंने अपने जीवन में कई उतार-चढ़ाव देखे। कुछ घटनाओं को लिपिबद्ध कर पाया, कुछ मेरे स्मृतियों के कोषों में संचित हो गए। वे कब बाहर निकलेंगे, कह नहीं सकता। मेरा यह मानना है कि किसी भी लेखक के निर्माण में न केवल पुरानी पीढ़ी की साहित्य संपदा जरूरी है, बल्कि समकालीन लेखकों से संपर्क, बौद्धिक चर्चा, उनके साहित्य पर विमर्श भी उतना ही जरूरी है; बदलती हवा के रूख के बारे में जानने के लिए।

इस संदर्भ में कुछ उदाहरण, मैं अपने व्यक्तिगत जीवन से दूँगा।

सन् 2009 या 2010 की बात होगी, जब मैंने ओड़िया से हिन्दी में अनुवाद का काम शुरू किया था। ओड़िया भाषा के प्रतिष्ठित लेखक स्व. जगदीश मोहंती ने मेरे लिए ‘सरोजिनी साहू की श्रेष्ठ कहानियां’ शीर्षक से ब्लॉग बनाया था। उस पर पोस्ट की हुई मेरी कहानियों को पढ़कर विमला भंडारी जी ने फोन किया था और उन अनूदित कहानियाँ की, प्रशंसा की थी और फिर जब उनसे थोड़ा-थोड़ा परिचय हो गया तो मैंने उनसे अपने पहले अनूदित उपन्यास ‘पक्षीवास’ की भूमिका लिखने के लिए आग्रह किया था, जिसे उन्होंने सहर्ष स्वीकार कर लिया था।

यही कारण है, 1 फरवरी 1955 को राजसमंद के गांव राजनगर में जन्मी डॉ. विमला भंडारी का नाम सामने आते ही मेरी कलम श्रद्धा से झुक जाती है। यही नहीं, उन्होंने मुझे सलूंबर में अपनी ‘सलिला संस्था’ द्वारा आयोजित अखिल भारतीय बाल साहित्य सम्मेलनों में भी आमंत्रित किया, जहाँ मेरा अनेक ख्याति-लब्ध लेखकों में परिचय हुआ, जैसे प्रो. दिविक रमेश, प्रो. प्रभापंत, मधु माहेश्वरी, सुधा जौहरी, आशा पांडेय ‘ओझा’ आदि। कालांतर में उनका समग्र बाल साहित्य पढ़कर मैंने दो आलोचना पुस्तकें (भाग 1 एण्ड भाग 2) लिखी, जिसमें एक यश पब्लिकेशन्स, नई दिल्ली से ‘विमला भंडारी की रचना धर्मिता’ शीर्षक से प्रकाशित हुई और दूसरी प्रकाशनाधीन है।

एक बार वे अपने जेठ जी के बेटी की शादी के सिलसिले में भुवनेश्वर आई हुई तो ‘सारला पुरस्कार’ से पुरस्कृत ओड़िया लेखिका सरोजिनी साहू, हमारी कंपनी महानदी कोल्फ़िल्ड्स लिमिटेड के  राजाभाषा प्रबंधक, उदयनाथ बेहेरा, विमला भण्डारी और उनके पति जगदीश भण्डारी जी के साथ मैं भी पुरी और कोणार्क भ्रमण के लिए गया था। उस पर मैंने अपना संस्मरण ‘पूर्व और पश्चिम का सांस्कृतिक सेतु: जगन्नाथ पुरी’ लिखा था, जो अनेक पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हुआ। कनाडा के प्रकाशित वेब मैगजीन  ‘साहित्य कुंज’ ने उसे धारावाहिक प्रकाशित किया था। इस तरह एक लेखक दूसरे लेखक का सान्निध्य पाकर अपने साहित्यिक सफर पर तेजी से अग्रसर होता जाता है। उनकी बहुचर्चित पुस्तक ‘सलूंबर का इतिहास’ के कुछ सदंर्भ मैंने अपने संस्मरण ‘चीन में सात दिन’ में भी पिरोए है।

उन्हीं के एक आयोजन में उदयपुर की मधु माहेश्वरी से मुलाकात होती है। वे बाल साहित्यकार है। उसकी प्रसिद्ध कृतियों में ‘बेटी की अभिलाषा’, ‘बतख डाले डेरा’ और ‘मित्रता की मिसाल’ है।

डॉ. विमला भंडारी के बाद अगर मेरे जीवन में कोई विशिष्ट हिन्दी साहित्यकार संपर्क में आया और जिसने मेरी लेखन की कला और विधा दोनों को पूरी तरह से प्रभावित किया। वे मुझे अनुवाद से हटाकर आलोचना के क्षेत्र में खींचकर ले गए। विचारों और चिंतन-मनन की एक नई दुनिया में, तो वे है वह है हिंदी  के अन्यतम शीर्ष कवि रमाकांत शर्मा ‘उद्भ्रांत’।

27 अगस्त 2012 को लखनऊ के उमाबाली प्रेक्षागृह में उन्हें मंच पर मुख्य अतिथि के रूप में उद्बोधन देते हुए दूर से देखा और सुना था, मगर मुलाकात हुई चीन में सन् 2013 अगस्त को,  एक साल बाद। इस साहित्यिक विदेश यात्रा पर मैंने अपनी पुस्तक ‘चीन में सात दिन’ लिखी थी, जो मैंने उद्भ्रांत जी के अनवरत मार्गदर्शन के कारण उन्हें समर्पित की थी। बाद में, तो मेलजोल का सिलसिला शुरू हुआ, जो आज तक जारी है।

कालान्तर में, ज्यादा से ज्यादा निबिड़ होता गया है। अपने जीवन के 78 बसंत देखने वाले, हिन्दी में 150 से ज्यादा सार्थक साद्देश्यपरक कृतियों की रचना करने वाले उद्भ्रांत जी की मुख्य काव्य-कृतियों में ‘त्रेता’, ‘अनाद्य सूक्त’, ‘राधा माधव’, ‘रुद्रावतार’ पर मैंने चार आलोचनात्मक पुस्तकें- ‘त्रेताः’ एक सम्यक् मूल्यांकन (राजस्थान साहित्य अकादमी से पुरस्कृत), ‘अनाद्य सूक्तः विज्ञान काव्याध्यात्मिक दर्शन का अणुचिंतन (विद्योत्तमा पुरस्कार से पुरस्कृत)’, ‘राधा माधवः एक समग्र विवेचन’ (म.प्र. राष्ट्र भाषा समिति, भोपाल के डॉ. हजारीमल जैन वांडमय पुरस्कार प्राप्त), ‘मिथकीय सीमाओं से परे रुद्रावतार’ के साथ-साथ उनकी अन्य रचनाओं और गीतों पर आधारित दो ‘उद्भ्रांत साहित्य पर मेरे नोट्स’ एवं ‘उद्भ्रांत की गीत साधना’ पुस्तकें लिखी है। उद्भ्रांत जी हरिवंश राय बच्चन को अपना गुरू मानते हैं और उनकी प्रसिद्ध उक्ति अक्सर दोहराते है कि भगवान को पाना मुश्किल है, उसी तरह किसी एक इंसान को समझ पाना भगवान पाने से कमतर नहीं है। उद्भ्रांत जी की दूरदर्शन में उप महानिदेशक पद से सेवा निवृत्त हुए है और संप्रति नोएड़ा में रहते है, मगर जन्म तो उनका राजस्थान के नवलगढ़ हुआ था, 4 सितम्बर 1948 को। उनसे से जुड़ना मेरे लिए किसी दैविक अनुकंपा से कम नहीं है।

प्रवासी राजस्थानियों की शृंखला में एक और सुपरिचित नाम मेरे लिए है, डॉ. रति सक्सेना का । उनसे मेरी मुलाकात हुई थी मध्यप्रदेश के राजनांद गांव में, सन् 2012 में। रायपुर की साहित्यिक संस्था ‘सृजनगाथा’ द्वारा आयोजित दो दिवसीय लेखक शिविर के एक सत्र में मुख्य अतिथि के रूप में वे आमंत्रित की गई थी। सन् 1954 को उदयपुर में जन्मी रति सक्सेना केरल की राजधानी त्रिवेंद्रम में रहती है, अपने सेवानिवृत्त वैज्ञानिक पति के साथ। उन्हें केंद्र साहित्य अकादमी के अनुवाद पुरस्कार, राजस्थान साहित्य अकादमी के मीरा पुरस्कार, केरल साहित्य अकादमी के समग्र साहित्य पुरस्कार के साथ-साथ कई अंतरराष्ट्रीय पुरस्कार भी प्राप्त हुए है।

वह एक दशक से द्विभाषी पत्रिका ‘कृत्या’ का संपादन कर रही है और वैश्विक संगठन ‘वर्ल्ड पोइट्री मूवमेंट’ की फाउंडर भी है। उन्होंने 22 से अधिक विदेशी साहित्यिक समारोहों में भाग लेकर वैदिक कविताओं के माध्यम से विश्व में हिन्दी की विशिष्ट उपस्थिति दर्ज करवाई हैं। प्रसिद्ध ओड़िया कवि रमाकांत रथ की कविताओं को मेरे द्वारा किए गए अनुवाद को ‘कृत्या’ में प्रकाशित कर न केवल मेरा उत्साहवर्धन किया, बल्कि अनुवाद को भी मुख्यधारा की श्रेणी का साहित्य समझकर आगे के लेखन के लिए प्रेरणा दी। कैंसर की बीमारी से जूझते हुए भी वह ‘आईसीयू में ताओ’ जैसी पुस्तक लिखकर ‘चिकित्सा में कविता के उपयोग’ को तलाशते हुए अपनी अटूट जिजीविषा का परिचय देती है।

डॉ. रति सक्सेना के बाद प्रवासी राजस्थानी साहित्यकारों की श्रेणी में ऋतु भटनागर का नाम आदर के साथ लिया जाता है। यद्यपि उनसे कभी मेरी मुलाकात नहीं हुई, मगर ऑथर प्रेस, नई दिल्ली के प्रकाशक सुदर्शन केसरी ने मेरी रचनाओं का अंग्रेजी अनुवाद करने हेतु उनका नाम सुझाया था। यद्यपि उनका जन्म 1973 में लखनऊ में हुआ, मगर शादी हुई है जयपुर के सुमित भटनागर से। जो आईआरएस है और बैंगलुरू में नौकरी करते हैं। इस वजह से यह दंपती बेंगलुरू शिफ्ट हो गई। ऋतु भटनागर बहुत अच्छी पेंटर है। वह अंग्रेजी से हिंदी और हिंदी से अंग्रेजी के अनुवाद में भी सिद्ध हस्त है। इंफोसिस के संस्थापक नारायण मूर्ति की धर्मपत्नी, समाज-सेविका, लेखिका सुधा मूर्ति की अनेक अंग्रेजी पुस्तकों का उन्होंने हिंदी में अनुवाद किया है। मेरी आलोचना की तीन पुस्तकों का भी उन्होंने अंग्रेजी में अनुवाद किया है।

प्रो. अज़हर हाशमी ‘राजस्थान के साहित्य साधक’ पुस्तक लिखी जाने के समय इस दुनिया में थे, मगर इस पुस्तक पर मेरी समीक्षा लिखे जाने से पूर्व ही उनका देहांत हो गया। उन्हें अश्रुल श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए उनके व्यक्तित्व और कृतित्व पर प्रकाश डालना चाहूँगा। 13 जनवरी 1950 को झालावाड़ में जन्में प्रो. अजर हाशमी इंसानियत और सद्कर्म का संदेश देने वाले देश के प्रसिद्ध गीतकार थे। बाद में वे मध्यप्रदेश चले गए। उन्हें अपनी ‘माँ’ कविता के लिए उत्तरप्रदेश के तत्कालीन राज्यपाल तथा भारत के सेवानिवृत्त न्यायमूर्ति मार्कंडेय काटजू द्वारा ‘‘विशिष्ट काव्य पुरस्कार’’और मध्यप्रदेश के राज्यपाल द्वारा सम्मानित किया गया था। प्रो. हाशमी के गीतों पर, व्यंग्यों पर, गज़लों पर पीएचडी की गई है। मध्यप्रदेश बोर्ड की कक्षा 10वीं की हिन्दी पाठ्यपुस्तक में उनकी कविता ‘‘बेटियां पावन दुआएं है’’ शामिल की गई है।

राजस्थान पत्रिका व नवभारत के स्तंभकार थे। उनकी कविताएं दूरदर्शन एवं आकाशवाणी से प्रसारित होती रहती है। उनका कालजयी गीत ‘‘मुझको राम वाला हिंदुस्तान चाहिए’’ 1976 में लिखा गया था, जब देश के हालात ठीक नहीं थे। यह गीत 26 जनवरी 1991 को दूरदर्शन पर प्रसारित किया गया। जिससे उनकी लोकप्रियता शिखर चूमने लगी। वह गीत ‘यू-ट्यूब पर उपलब्ध है। गायक रूप कुमार राठौड़ ने आवाज की और संगीतकार सिद्धार्थ कश्यप ने संगीत दिया है।

रेडियो और दूरदर्शन में 33 साल कार्य करने वाले नंद भारद्वाज सर का नाम हिंदी साहित्य जगत में अपने की परिचय का मोहताज नहीं है। उनसे मेरी पहली मुलाकात हुई थी, राजनांद गांव में,सन् 2012 में। वहाँ गजानन माधव मुक्ति बोध पर एक संगोष्ठी आयोजित की गई थी, क्योंकि मुक्तिबोध राजनांद गांव की कॉलेज में अध्यापन कार्य करते थे। वहां के एक संग्रहालय में उनकी पांडुलिपियां व अन्य रचनाएं रखी हुई है। नंद भारद्वाज ने मुक्तिबोध की कविताओं पर पीएच.डी. की, इसलिए उन्हें मुख्य वक्ता के रूप में ‘सृजनगाथा’ वालों ने आमंत्रित किया था। वहां मुझे उनका बीज-वक्तव्य सुनने का स्वर्णिम अवसर प्राप्त हुआ। उनसे मुलाकात हुई। मैंने उन्हें मेरा पहला अनूदित उपन्यास ‘पक्षीवास’ भेंट किया। परवर्ती समय में, मुझे उनके जयपुर के मानसरोवर में स्थित आवास में जाने का अवसर मिला था। वहाँ उन्होंने मुझे अपना उपन्यास ‘आगे खुलता रास्ता’ अवलोकनार्थ भेंट किया था। मैंने उस पर संक्षिप्त समीक्षात्मक टिप्पणी की थी, तो उन्होंने फोन पर कहा था, ‘‘आपने भले ही छोटी समीक्षा की है, मगर सारगर्भित ओर हृदयस्पर्शी है।’’ उस उपन्यास के राजस्थानी अनुवाद पर उन्हें केंद्र साहित्य अकादमी पुरस्कार प्राप्त हुआ था। अगस्त 1978 को बाड़मेर के माड़पुरा गांव में जन्मे, राजस्थानी साहित्य पत्रिका ‘हरावल’ और राजस्थान साहित्य अकादमी से प्रकाशित राजस्थान के कवि शृंखला के तीसरे भाग ‘रेत पर नंगे पांव’ के संपादक के रूप में उन्होंने खूब कीर्ति अर्जित की थी। उनके पसंदीदा लेखकों में विक्टर हयूननो, हैमिंग्वे, चेखब, सार्त्र, मैक्सिम गोर्की, टालस्टॉय आदि है।

डुंगरपुर जिले के टामरिया गांव में 28 सिंतबर 1952 को स्वतंत्रता सेनानी के घर जन्मे श्री जय प्रकाश पांड्या ‘ज्योतिपुंज’ से मेरी अब तक तीन बार मुलाकात हो चुकी है। दो बार सलूंबर में, विमला भंडारी जी की ‘सलिला संस्था’ द्वारा आयोजित अखिल भारतीय बाल साहित्य सम्मेलनों में और एक बार राजस्थान साहित्य अकादमी, उदयपुर के प्रेक्षागृह में- जब मुझे राजस्थान साहित्य अकादमी का आलेचना पुरस्कार प्राप्त हुआ और उन्होंने दर्शक दीर्घा से खड़े होकर हाथ हिलाते हुए मुझे बधाई दी थी। फ्रेंच-कट दाढ़ी, हंसमुख चेहरे वाले पांड्या केंद्रीय साहित्य अकादमी और राजस्थान साहित्य अकादमी के सर्वोच्च ‘मीरा पुरस्कार’ के अतिरिक्त अनेक सम्मानों से सम्मानित है। उनकी प्रसिद्ध राजस्थानी कृतियों में ‘बोल डूंगरी टब टनुक’, ‘गोविंद गुरू नो चौपड़ो’ तथा हिन्दी कृतियों में ‘बोल मनु बोलते क्यों नहीं?’, ‘कसम भूखे भीन की’, ‘नई टापरी का नया दु:ख’’ के अतिरिक्त कन्नड़ साहित्यकार चंद्रशेखर के नाटक ‘सिरि सलिंग’ तथा रवींद्र नाथ ठाकुर के एक बांग्ला नाटक का राजस्थानी में अनुवाद किया है।

ऐसे ही, एक दो वर्ष पूर्व मध्यप्रदेश की राजधानी भोपाल में, डॉ. अखिलेश पालरिया से मिलने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। ‘पीएचडी’वाले डॉक्टर नहीं, बल्कि ‘एमबीबीएस’ वाले डॉक्टर। उनका जन्म 28 अगस्त 1956 को अजमेर में हुआ। मध्यप्रदेश राष्ट्र भाषा समिति, भोपाल द्वारा आयोजित सम्मान समारोह में उन्हें और मुझे मध्यप्रदेश के राज्यपाल श्री मंगुभाई पटेल के कर -कमलों से साहित्य के क्षेत्र में उल्लेखनीय योगदान के लिए पुरस्कृत किया गया था। पूछ-ताछ के दौरान पता चला कि वे हमारी एमबीएम इंजीनियरिंग कॉलेज, जोधपुर में खनन अभियांत्रिकी के प्रो. वी.एस. पालरिया के बड़े भाई है। उन्हें वह पुरस्कार 75 किताबों की समीक्षा पर तैयार की हुई, उनकी पुस्तक पर मिला था और मुझे उद्भ्रांत के महाकाव्य ‘राधामाधव’ पर अपनी आलोचना के लिए। व्यंजना पत्रिका में धारावाहिक प्रकाशित होने वाली उनकी आत्मकथा ‘जो भुला न सका’ का मैं नियमित पाठक हूं, जिसमें उन्होंने अपने 37 वर्षीय चिकित्सकीय सेवाकाल और दीर्घ साहित्यिक यात्रा लिपिबद्ध की है। उनके कहानी-संग्रह ‘मन के रिश्ते’, ‘सूर्योदय से सूर्यास्त तक’, ‘चाहत के रंग’, ‘आखिर मन ही तो है’, ‘ डस्टबिन तथा अन्य कहानियां’, ‘पुजारिन व अन्य कहानियां’, ‘कर्तव्य पथ’ और ‘मेरी प्रिय कहानियां’ पर अक्सर चर्चा होती रहती है।

इस तरह, मैं राजस्थान में साहित्य साधकों से अपने यायावरी जीवन के कारण संपर्क साधते हुए कर्तव्य पथ पर अग्रसर होता रहता हूं। सन 2022 में हिन्दी की हृदय-स्थली रायबरेली के फिरोज गांधी महाविद्यालय में महावीर प्रसाद द्विवेदी स्मृति संरक्षण अभियान के संयोजक हमारे देश के प्रसिद्ध पत्रकार गौरव अवस्थी द्वारा आयोजित रजत वर्षगांठ के उपलक्ष में पद्मश्री हलधर नाग को डॉ. राम मनोहर त्रिपाठी लोक सेवा सम्मान से सम्मानित किया गया था।

 मैं इस आयोजन में हलधर नाग के अनुवादक के रूप में शरीक हुआ था और वहां विशिष्ट वक्ताओं में आमंत्रित थे प्रसिद्ध आलोचक बी.एल. आछा। उनसे बातचीत के दौरान पता चला कि 5 फरवरी 1950 को राजसमंद के देवगढ़ मदरिया में जन्मे प्रोफेसर बी.एल. आछा ने मेरे जन्म स्थान सिरोही के पास पडोसी जिले जालोर के राजकीय महाविद्यालय में एक साल अध्यापन कार्य किया था। बाद में वे इंदौर चले गए, अपने आगे के अध्यापन कार्य के सिलसिले में। वे राजस्थान अकादमी से पुरस्कृत आलोचक है। उनकी रचनाएं ‘अक्षरा’, ‘वागर्थ’ जैसी प्रसिद्ध हिन्दी पत्रिकाओं में प्रकाशित होती रहती है। उनकी व्यंग्य कृतियां मुझे बहुत अच्छी लगती है, जिसमें ‘आस्था के बैंगन’, ‘पिताजी का डैडी संस्करण’, ‘मेघदूत का टी.ए.बिल’ प्रमुख है। उनकी मुख्य रचनाओं में ‘आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी के उपन्यास’, ‘सृजनात्मक भाषा और आलोचक ‘सृजन का अंतर्पाठ’, ‘रचनात्मक समीक्षा’ आदि है।

यद्यपि फारूख आफ़रीदी जी से मेरी कभी व्यक्तिग्त मुलाकात नहीं हुई, फिर भी उनके प्रति मेरे मन में अगाध श्रद्धा और स्नेहिल भाव है। सन् 1998 में मेरी पहली पुस्तक प्रकाशित हुई थी ‘न हन्यते’, मेरे दिवंगत पिताजी के श्रद्धांजलि-स्वरूप मैंने लिखी थी। यह पुस्तक मेरे संस्मरणात्मक छोटे-छोटे आलेख और कविताओं का संकलन है। मेरी पहली कृति ‘न हन्यते’ और उसके दस साल बाद, मेरे पहले अनूदित उपन्यास ‘पक्षीवास’ मैंने राजस्थान के तत्कालीन मुख्यमंत्री श्री अशोक गहलोत को अवलोकनार्थ भेजी थी। मैंने सपने में भी नहीं सोचा था कि मेरी उन किताबों पर मुख्यमंत्री का अभिमत प्राप्त होगा। मगर सपना साकार हुआ, मुझे उनके अभिमत प्राप्त हुए। उन अभिमत के साथ था एक फार्वडिंग लेटर;  जिस पर हस्ताक्षर थे फारूख आफ़रीदी साहब के। यह किस्सा मैं कभी भी लिख नहीं पाता, अगर डॉ. प्रभात कुमार सिंघल यह किताब नहीं लिखी होती। आज भी उस फावर्डिंग लेटर और अभिमत को बचाकर रखा हूँ, एक अनमोल अमानत के रूप में।

इस पुस्तक में उन पर लिखे आलेख को पढ़ने के बाद पता चला कि 24 दिसंबर 1952 को जोधपुर में जन्म, जोधपुर विश्वविद्यालय से स्नातकोत्तर, राजस्थान प्रगतिशील लेखक संघ के कार्यकारी अध्यक्ष और ‘काव्या’ इंटरनेशनल फाउंडेशन, राजस्थान चैप्टर के महासचिव आदि-आदि। परसाई परंपरा के व्यंग्यकार होने के कारण उनकी रचनाओं में तीक्ष्ण व्यंग्य देखने को मिलते है उदाहरण के तौर पर ‘अपनी छबि सुधारिए, ‘मामूलीराम की डायरी’, ‘बुद्धि का सफर स्टॉक’, ‘धन्य है आम आदमी’ आदि। उनकी पुस्तकों में ‘गांधी जी और आधी दुनिया’, ‘हम सब एक है’ (कहानी-संग्रह),‘शब्द कभी बांझ नहीं होते’ (काव्य-संग्रह) मुझे बहुत अच्छी लगती है। ‘कथा’ पत्रिका और राजस्थान पत्रिका में छपे  उनके आलेख भी मेरी नजरों से गुजरते रहते है। उद्भ्रांत जी के अनन्य मित्र होने के कारण उनसे बातचीत के दौरान उनके नाम का उल्लेख अवश्य आता है।

फारूख आफरीदी जी के बाद मैं नाम लेना चाहूंगा, चूरू के डॉ. नीरज दइया जी का। न कभी फोन पर बातचीत हुई और न ही कभी मेल-मुलाकात। वे मेरे हम उम्र है। मेरे मन में उनसे जुड़ने के पीछे एक खास कारण है, डॉ. सुधीर सक्सेना, मेरे प्रिय कवि। उनकी कविताओं का दइया जी ने राजस्थानी में अनुवाद किया है, जिसे सुधीर जी ने मुझे अवलोकनार्थ भेजी थी। उसे पढ़ने के बाद मेरे मन में नीरज दइया के प्रति सम्मान की भावना जाग उठी। मैंने सुधीर सक्सेना और ओड़िया भाषा के प्रख्यात कवि सीताकांत महापात्र के काव्यों का तुलनात्मक अध्ययन करते हुए ‘दो कविः एक दृष्टि’ आलोचना नामक पुस्तक लिखी थी।  प्रसिद्ध लेखक जितेंद्र ‘निर्मोही’ उनके साहित्य कर्म पर टिप्पणी करते हुए लिखते है कि उन्होंने राजस्थानी समालोचना क्षेत्र की परंपरा को बदल दिया है और ऐसे हर राजस्थानी साहित्यकार पर कलम चलाई है, जिनको प्रकाश में लाना जरूरी था। उनका ‘‘राजस्थानी उपन्यास आंगल-सीध’’ मील का पत्थर साबित हुआ है।

वेदव्यास जी के अनेक विचारोत्तेजक आलेखों को मैंने उदयपुर के हिम्मत सेठ जी द्वारा संपादित ‘महावीर समता संदेश’ में पढ़ा और यू-टयूब पर उनके अनेक साक्षात्कार भी देखें। साहित्य अकादमी के सर्वोच्च सम्मान ‘साहित्य मनीषी’ से सम्मानित शिक्षा, साहित्य, कला, संस्कृति और पत्रकारिता के क्षेत्र में अनवरत लेखन और जनशिक्षण के लिए समर्पित वेदव्यास जी का जन्म 1 जुलाई 1942 को अविभाजित भारत के सिंध प्रांत में हुआ था। पुश्तैनी गांव अलवर जिले के गढ़ी सवाई राम है। आप राजस्थान साहित्य अकादमी के तीन बार अध्यक्ष रहे। 1964 में आकाशवाणी  जयपुर में कार्यरत ओर जून 2002 में सेवा निवृत्त। राजस्थानी भाषा के प्रथम समाचार वाचक। आज भी कानों में गूंजता है यह स्वर- ‘अब आप वेद व्यास से राजस्थानी में सुना’, ‘ आपकी धरती हैलो मारे’, ‘राष्ट्रीय धरोहर’, ‘राजस्थान के लोकतीर्थ’, ‘अब नहीं तो कब बोलोगे?’, ‘आजादी रा भागीरथः गांधी’ आदि पुस्तकें बहुचर्चित रही है।उनकी प्रकाशित आठ पुस्तकों में ‘अपना ही गणतंत्र है बंधु’, ‘सुजन के सह-यात्री’, ‘मैं भी जाँऊ, तू भी इबा’, ‘संस्मरण का संदूक समीक्षा के सिक्के’, ‘मामला पानी का’ और ‘मुक्तक शतक’ प्रमुख है।

13 नवंबर 1937 को उदयपुर के कानोड़ कस्बे में जन्मे डॉ. महेंद्र भाणावत को मैंने बाल साहित्यकार राजकुमार की पुस्तक ‘कठपुतली’ पर उनकी लिखी हुई भूमिका पढ़कर अभिभूत हुआ था। आज इस पुस्तक के माध्यम से उनके कृतित्व और व्यक्तित्व के बारे में विस्तार से जानकर बहुत खुशी हुई। आंचलिक लोक-संस्कृति पर काम करने के लिए वे देश के विभिन्न प्रांतों जैसे राजस्थान, गुजरात, मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र, उत्तरप्रदेश, तमिलनाडु में घूम-घूमकर वहां की अलग-अलग जातियों, लोकानुरंजनकारी प्रवृतियों, जनजाति सरोकारों तथा कठपुतली, कावड़ जैसी विधाओं पर एक सौ से ज्यादा किताबें लिखकर देशव्यापी ही नहीं, अंतरराष्ट्रीय पहचान बनाई है। राजस्थान के लोक-नृत्य, गुजरात के लोक-नृत्य, महाराष्ट्र के लोक-नृत्य, उदयपुर के आदिवासी, ‘कुंवारे देश के आदिवासी’ जैसी पुस्तकों के अतिरिक्त राजस्थान के लोक देवताओं जैसे तेजाजी, पाबूजी, देवनारायण, काला-गोरा पर अनेक स्वतंत्र पुस्तकें लिखी है।

ऐसा ही एक और व्यक्तित्व है, चित्तौड़ के निनोर गांव में 3 मई 1969 को जन्मे विकास दवे जी का। विमला भंडारी जी के किसी यात्रा-संस्मर

ण की भूमिका लेखक के रूप में मैंने उन्हें पहली बार पढ़ा था। फिलहाल वे मध्यप्रदेश साहित्य अकादमी, इंदौर के निदेशक है। बाल-साहित्य में उल्लेखनीय योगदान के अतिरिक्त, वीणा-वादन में प्रवीण, जयदेव के गीत गोविंद पर टिप्पणी, चंडी शतक पर व्याख्या, संगीत पर आधारित ‘संगीत रास’, ‘संगीत मीमांसा’, ‘संगीत रत्नाकर’, ‘शुद्ध प्रबंध ‘ नामक अनेक ग्रंथों के रचियता है।

8 जुलाई 1946 को जयपुर के चौमूं जिले में जन्मे डॉ. इकराम राजस्थानी सुप्रसिद्ध कवि, लेखक, शायर, गीतकार अंतरराष्ट्रीय कमेंटेर व ब्रॉड कास्टर है, उनका एक सुप्रसिद्ध राजस्थानी गीत ‘‘इंजन की सीटी में, म्हारे मन डोले, चला चला रे ड्राइवर गाड़ी होले-होले’’ हम बचपन से सुनते आ रहे है। यह गीत हमारी स्कूल के वार्षिकोत्सव में गाया जाता था। कई बार उस पर नृत्य प्रस्तुति भी होती थी। इकराम राजस्थानी अनुवाद को Heart Transplant की तरह मानते है। वे आकाशवाणी के केंद्र निदेशक थे। सेवानिवृत्त होने के बाद इग्नू, ज्ञानवाणी कार्यक्रम में 31 जुलाई 2008 तक स्टेशन मैंनेजर रहे।

 एक और महत्वपूर्ण साहित्य साधिका है, डॉ. कुसुम खेमानी, जिनकी रचनाएं लगभग सभी हिंदी पत्रिकाओं के पढ़ने को मिलती है। 19 सितम्बर 1949 को चुरू के मंडवा जिले में जन्मी लेखिका, स्नात्तकोत्तर की पढ़ाई चुरू से और पी.एच.डी. कोलकाता के किसी यूनिवर्सिटी से पूरी करती है। भारतीय भाषा परिषद में 38 वर्षों तक मंत्री, दो दशकों से मासिक पत्रिका ‘वागार्थ’ का संपादन, हिन्दी साहित्य ज्ञानकोष की संयोजिका होने के साथ-साथ पर्यावरण-संरक्षण में भी योगदान देती रही है। वह भाषा को संवाद का माध्यम मानती है, इस वजह से संवाद जितना सीधा, सरल, पारदर्शी और आत्मीय हो- उतना अच्छा मानती है। उनके उपन्यास ‘लालबत्ती की अमृत कथाएं’, ‘सोनागाछी’, ‘विषकन्याएं’, ‘‘जड़िया बाई’’, ‘‘गाथा रामभतेरी’’, ‘‘लावण्यदेवी’’, बहुचर्चित रहे है। उनके कहानी-संग्रहों में ‘अनुगूंज जिंदगी की’, ‘सच कहती कहानियां’, ‘रश्मिरथी मां’ आदि संग्रहों की अनेक कहानियों के देश की भिन्न-भिन्न भाषाओं में अनुवाद हुआ हैऔर यहां तक कि कुछ कहानियों पर टेलीफिल्में भी बनी है।

जैसा कि मैंने पूर्व में कहा है कि राजस्थान से दूर रहने की वजह से मैं राजस्थान के युवा साहित्य साधकों के संपर्क में नहीं आ सका और न ही उनकी रचनाएं पढ़ने का कोई अवसर प्राप्त हुआ; इस कमी को सिंघल साहब की इस पुस्तक ने पूरा कर दिया। साहित्य के क्षेत्र में यह ज्यादा जरूरी है कि आने वाली पीढ़ी ज्यादा संवेदनशील और जागरूक हो। परंपराओं और पूर्वजों का खून इस पीढ़ी की धमनियों में प्रवाहित होता है, अतः वे अधिक से अधिक उदात्त एवं समाजोपयोगी साहित्य की रचना करें। डॉ. प्रभात कुमार सिंघल ने उन्हें वह मंच प्रदान किया है, जिससे दोनों पीढ़ियों के भीतर संवाद स्थापित हों और दोनों पीढ़ियाँ साहित्यिक दृष्टिकोण से अधिक से अधिक लाभान्वित हो। मैं अपने इस आलेख में राजस्थान के उन साहित्य साधकों की ओर ध्यानाकर्षित करना चाहूंगा; जिनमें मुझे हमारे साहित्य को समृद्ध करने की अपरिमित संभावनाएँ नजर आती है।

डॉ. ओम नागर युवा लेखक है राजस्थान के बारां जिले के अंटाना गांव में रहने वाले। जन्म 20 नवम्बर 1980। राजस्थानी मातृभाषा में लेखन के कारण उन्हें बड़े-बड़े पुरस्कारों से नवाजा गया है, साहित्य अकादमी, भारतीय ज्ञान पीठ, भारतीय भाषा परिषद आदि की तरफ से। वे राजस्थानी भाषा के मूर्धन्य कवि कन्हैया लाल सेठिया से ज्यादा प्रभावित है। वे कहते थे- ‘‘मायड़ भाषा बोलतां/जीननै आवे लाज/इस्या कपूता सै दुखी/आखो देश समाज।”

ऐसे ही दूसरे युवा आलोचक कवि है, 1974 में जन्मे, पाली के रहने वाले गजेसिंह राजपुरोहित- आप भी राजस्थानी भाषा को मान्यता दिलाने में संघर्षरत है। इसी श्रेणी में नंदू राजस्थानी के नाम भी उल्लेख किया जा सकता है। वे भी मानवीय संवेदनाओं के उभरते रचनाकार है। 23 अप्रेल 1988 को टोंक जिले के लक्ष्मीपुरा गांव में जन्मे। उनकी दो पुस्तकें प्रकाशित हुई है- ‘फिर से तम छंट जाएगा’ (काव्य-संग्रह) और दूसरी ‘राजस्थानी कुंडलियों का संग्रह’, ‘कैद मातसी चोर’ (मायड़ भाषा में)। इसी श्रेणी में कोटा के कवि उपन्यासकार किशन प्रणय (ज. 3 मार्च 1992) ने भी युवा रचनाकार के तौर पर अच्छी खासी पहचान बनाई है। सन् 1975 में मध्यप्रदेश के मुरैना जिले के सबलगढ़ में जन्मी, संप्रति कोटा में रहने वाली रश्मि गर्ग, जिनकी रचनाएं ‘पीली चूडियाँ’, ‘हाथ का बना स्वेटर’, कहानी-संग्रह ‘प्रतिबिंब’ ओर आलेख संग्रह ‘अंतररश्मियां’ बहुचर्चित रही है।

‘वैदेही गौतम (ज. 1975) गद्य और पद्य दोनों में लिखती है। आपने धर्मवीर भारती के साहित्य पर पीएचडी की उपाधि प्राप्त की है। उनका साहित्य तुलसीदास से प्रभावित है और मनोविज्ञान सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन अज्ञेय और धर्मवीर भारती से।

6 जुलाई 1983 को जन्मी मीनाक्षी पंवार ‘मीशांत’ उदयपुर की युवा कवयित्री है। उनके कविता-संग्रह ‘महकता पलाश’ को  उदयपुर के साहित्यकार तरूण कुमार दाधीच उनके सृजन को उच्च धरातल पर ले जाने का प्रयास मानते हैं। ये सभी हमारी नई पौध है जो राजस्थानी साहित्य, हिन्दी साहित्य या कहें भारतीय साहित्य को ; अपनी अनुभूतियों से लिपिबद्ध कर उन्हें समृद्ध कर हमारा सपना साकार करते हुए अपना कर्तव्य पूरा करेंगे और उनकी आने वाली नई पीढ़ी के नए-नए वातायन को खोलेंगे।

डॉ. प्रभात कुमार सिंघल की इस पुस्तक ने कई अनमोल रत्न दिए हैं, जैसे फतेहपुर शेखावटी में सन् 1941 में जन्मे साहित्यकार, राजेन्द्र केड़िया। उन्होंने 65 वर्ष की आयु में लिखना शुरू किया और फिर पीछे मुड़कर नहीं देखा। अथक अनवरत आगे बढ़ते चलते गए। लोक कहानीकार पद्यश्री विजयदान देथा में उनकी पहली पुस्तक ‘तीसरा नर’ पढ़कर उनकी कहानियों पर सविस्तार पुनर्लेखन की इच्छा जाहिर की थी। किसी भी साहित्यकार के लिए इससे बड़ा और क्या सम्मान हो सकता है! साहित्य-लेखन उम्र के किसी पडाव का इंतजार नहीं करता। केड़िया जी राजस्थान को दुनिया के सबसे खूबसूरत स्थान मानते हैं। उसके सामने न काश्मीर, न पेरिस, न वेनिस। उनके कहानी संग्रह ‘जाट रे जाट’, ‘वाह रे जाट!, ‘अमल कांटा’ और उपन्यास ‘मदन बावनिया’, ‘जोग-संजोग’ आदि बहु चर्चित रहे।

दूसरे रत्न है ‘राजेन्द्र राव’। जिनका जन्म 1944 में कोटा में हुआ, मगर कालांतर में वे कानपुर शिफ्ट हो गए। जब ‘साप्ताहिक हिंदुस्तान’ में उनकी कथा-शृंखला ‘सोमला भईन राख’ प्रकाशित होती थी तो पाठक बेसब्री से इंतजार करते थे। राजेन्द्र राव पेशे से इंजीनियर , मगर मन में साहित्य की धुन सवार। उनकी कहानियाँ ‘साप्ताहिक हिदुस्तान’, ‘धर्मयुग’, ‘सारिका’, ‘कहानी’, ‘रविवार’ आदि पत्र-पत्रिकाओं में छपकर लोकप्रिय हुई।

इसी कड़ी में 1964 को जयपुर में जन्मी मंचीय कवयित्री डॉ. मधु खंडेलवाल ‘मधुर’ ने देश-विदेश के अनेक मंचों से काव्य-पाठ करते हुए मानवता एवं प्रेम का संदेश देकर राजस्थान का नाम गौरवान्वित किया है।  1971 में जन्मे अजमेर में शिक्षाविद् मीडिया विशेषज्ञ, कवि कलाकार,नाट्यकार, वेदों पर कार्य करने वाले लेखक, आलोचक डॉ. संदीप अवस्थी की सर्जन-यात्रा भी हिंदी को विश्व दरबार में स्थापित करने में महती भूमिका अदा करती है।

पूत के पांव पालने में पहचाने जाते है। ‘जैसी मां, वैसी बेटी’, ‘जैसा पिता, वैसा पुत्र’, जैसी अनेक कहावतें और लोकोक्तियां हमें अक्सर सुनने को मिलती है; मगर ‘जैसा पिता, वैसी बेटी’ जैसी नई लोकोक्ति गढ़ने का कार्य कर रही है साहित्य साधिका शिखा अग्रवाल। इस पुस्तक के लेखक डॉ. प्रभात कुमार सिंघल जी की वह सुपुत्री है। बचपन से ही घर में मिले साहित्यिक परिवेश ने उन्हें समकालीन स्पंदनों को ध्वनित कर साहित्यिक रूप देने में महत्वपूर्ण भूमिका अदा की है। न केवल बाल कविताओं की रचना के माध्यम से, बल्कि दूसरी कविता-लेखक में भी सिद्ध हस्त शिखा अग्रवाल अंग्रेजी में भी अपने लेखन के माध्यम से विश्व स्तर पर अपनी उपस्थिति दर्ज करवाती है।

1946 में जन्मे अलवर के देवदत्त शर्मा हिंदी साहित्यक के गोल्ड मेडिलिस्ट है। आधुनिक हिन्दी महाकाव्यों में दार्शनिक अणुचिंतन विषय पर पीएचडी होल्डर भी। राजस्थान के प्रमुख मंदिर, किले, मेले, शहीदों, संतों, संग्रहालयों, लोक देवताओं, तीर्थों आदि विषयों पर कलम चलाने के साथ-साथ जैन दर्शन, अरविंद दर्शन पर भी उल्लेखनीय कार्य किया है।

यद्यपि डॉ. मंजुला सक्सेना का जन्म 4 अक्टूबर 1956 को उत्तर प्रदेश के बिजनौर जिले में हुआ, मगर उनके पिताजी मूलतः बारां के निवासी थे। वे हिंदी, संस्कृत और अंग्रेज साहित्य के प्रकांड पंडित थे और पुस्तकों को वे अपनी असली पूंजी मानते थे। मंजुला सक्सेना की चार पुस्तकें ‘बाल कहानियां’, ‘विलक्षण गणितज्ञ श्रीनिवास रामानुजन’, ‘मेहंदी’, ‘पौराणिक देववाद और तुलसीदास’ के अतिरिक्त भारतीय सेना में परम वीरचक्र, महावीर चक्र और वीर चक्र से सम्मानित सेनानियों के जीवन पर आधारित शौर्य-गाथाओं का संकलन ‘रण बांकुरे’ प्रकाशित हुई है।

बीकानेर में 5 मार्च 1959 को जन्मे प्रभात गोस्वामी व्यंग्य लेखन में सिद्ध हस्त है। ‘बहुमत की बकरी’, ‘चुगली की गुगली’, ‘ऐसा भी क्या सेल्फियाना’, ‘पुस्तक मेले में खोई भाषा’ और ‘प्रभात गोस्वामी के चयनित व्यंग्य’ प्रमुख प्रकाशित पुस्तकें है। देश के लोकप्रिय न्यूज चैनल ‘आज तक’ के ‘साहित्य तक’ में उनके विडीयो प्रसारित होते है ओर बॉक्स एफएम रेडियो, जयपुर पर हर बुधवार ‘व्यंग्य के रंगः प्रभात के संग’, में ‘व्यंग्यकारों से साक्षात्कार’। उन्हीं की तरह बीकानेर के एक और साहित्यकार है, राजेन्द्र जोशी जी, जो अपनी कलम के माध्यम से नई सोच और नए कलेक्टर से सृजन को नया आयाम दे रहे है।

राजस्थान साहित्य अकादमी से व्यंग्य लेखन के लिए पुरस्कृत डॉ. अतुल चतुर्वेदी का नाम व्यंग्यकार के रूप में पूरे देश में चिर-परिचित है। उनका जन्म 30 जुलाई 1965  को उत्तरप्रदेश से मैनपुरी में हुआ था, मगर उनके पिता जी नौकरी की तलाश में कोटा आ गए। वह विज्ञान पढ़ना चाहते थे, मगर नियति में हिंदी साहित्य लिखा हुआ था। संभागीय संयुक्त निदेशक शिक्षा कार्यालय, कोटा में सहायक निदेशक पद पर रहते हुए ‘व्यंग्य- लेखन’ में अपना योगदान देते रहे। प्रसिद्ध व्यंग्यकार परसाई से प्रभावित अतुल चतुर्वेदी जी के व्यंग्य-संग्रहों में ‘गणतंत्र बनाम चेंपा’, ‘लोकतंत्र के टेकर’, ‘सपनों के सहारे देश’ और कविता-संग्रहों में, ‘कितने खुशबू भरे दिन वे’, ‘स्मृतियों में पिता’, ‘घोषणाओं का बसंत’, आदि बहुचर्चित रहे है।

राजेन्द्र जोशी जी एक अच्छे कवि है, कथाकार है, संस्कृति कर्मी और साक्षरता के पैरोकार है। वे विगत तीन दशकों से हिंदी ओर राजस्थानी में लगातार अपनी कलम चला रहे हैं। उनका राजस्थानी कहानी-संग्रह, ‘जुम्मै की नमाज’ और खाप पंचायतों पर आधारित कहानी ‘पैला गुण’, बहुचर्चित रही है।

अब हम मिलते है अजमेर की हैं, डॉ. चंद्रकांता बसंल से। 1 अक्टूबर 1964 को जन्मी लेखिका वह अध्यात्म व संस्कृति में रची-बची है। उनकी दो पुस्तकें ‘सातवें दशक की हिन्दी कहानी’ और ‘स्वातंत्र्योत्तर हिन्दी कहानी में मानवीय संबंध’ प्रकाशित हुई।

इसी तरह, 17 नवम्बर 1951 को डॉ. इन्द्र प्रकाश श्रीमाली का जन्म राजसमंद में हुआ, उन्होंने ‘समकालीन हिंदी उपन्यासों में प्रेम’ विषय में पीएचडी उपाधि प्राप्त की है। ‘पखेरु नापै आकाश’ राजस्थानी कविता संकलन प्रकाशित हुआ है और उनकी ‘सामान्य हिन्दी ज्ञान’ UGC  द्वारा निर्देशित एवं मोहन लाल सुखाड़िया यूनिवर्सिटी, उदयपुर के त्रिवर्षीय, डिग्री कोर्स की संदर्भ पुस्तिका है। इसके अतिरिक्त, ‘आकाशवाणी एवं प्रसारण विद्याएं’, ‘संचार-जनसंचार, रेडियो, टेलीविजन एवं फिल्म’, ‘आवाज का जादू’, सामुदायिक रेडियो’, ‘आकाशवाणी की अनुभव यात्रा’ आदि अनेक पुस्तकें उनके खाते में शोभायमान है।

‘भारतीय विज्ञापन में नैतिकता’ विषय पर पीएचडी करने वाली डॉ. मधु अग्रवाल का उदयपुर में 1956 में जन्म हुआ था। वह प्रसिद्ध गजलकार एवं कवयित्री है। भारत सरकार के सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय के ‘भारतेंदु हरिशचंद्र पुरस्कार’ के सम्मानित है। उनके कविता-संग्रह ‘कस्तूरी बसे मन में’, ‘यहां सूरज डूबा नहीं’, ‘धूप का आंचल’ आदि चर्चा में रहे हैं और उनकी पीएचडी थीसिस ‘भारतीय विज्ञापन में नैतिकता’ एवं अन्य कृतियां ‘राजस्थान में सांस्कृतिक जबरन का संरक्षण एवं संवर्धन’ पाठकोपयोगी साबित हुई है, जबकि उनकी कृति ‘विपणन-प्रबंधन’ द्वितीय वाणिज्य में पढ़ाई जाती है।

27 मई 1958 को जन्मी उदयपुर की डॉ. मंजु चतुर्वेदी प्रतिष्ठित साहित्यकार है, अपने गुरू तुल्य पिता स्व. नंद चतुर्वेदी जी की तरह। वह भक्तिकालीन कवयित्री मीरा में बहुत प्रकाशित है। अपने ‘पृथ्वी गंधमयी’ काव्य की रचना की है। उनकी आलोचनात्मक कृतियां ‘मीराः व्यक्तित्व एवं कृतित्व’, ‘साठोतरी हिंदी कहानी में प्रेम’, ‘स्त्री-विमर्श और हिंदी कहानी’, ‘हिन्दी साहित्य विमर्श’, ‘हिंदी सहित्य का समग्र इतिहास’, ‘भक्तिकाल परिचय एवं प्रवृत्तियां’ एवं ‘रीतिकाल एवं आधुनिक काल’ महत्वपूर्ण है।

1960 में डूंगरपुर के पीढ गांव में जन्मी महिला सशक्तिकरण को आधार बनाकर हिन्दी भाषा के गद्य-पद्य दोनों विधाओं में लिखती है- रागिनी प्रसाद। जिनके सृजन में आधी आबादी का दुःख झलकता है।

डॉ. अर्पणा पांडेय का जन्म मैनपुरी, उत्तरप्रदेश में हुआ था, मगर 1988 में शादी के बाद कोटा आ गई। वे भारत के साथ-साथ ढाका में हिंदी सेवी शिक्षिका के रूप में काम करती है। उनका परिवार साहित्यिक सांस्कृतिक और आध्यात्मिक रूप से समृद्ध है। उन्होंने महाकवि कालिदास के मेघदूत का ‘काव्यानुवाद’ किया है, जिस पर आचार्य अग्निमित्र शास्त्री लिखते है कि इस अनुवाद में महाकवि जयशंकर प्रसाद, आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी की शास्त्रीय हिंदी की झलक प्रत्यक्ष रूप से दृष्टि गोचर होती है। उन्होंने कपिल मुनि के सांख्यदर्शन की 72 कारिकाओं का भी काव्यानुवाद किया है। उन्मेष, प्रवासी मन, काव्य-संग्रह में आध्यात्मिक सांस्कृतिक, राष्ट्रीय भाव, पर्यावरण संरक्षण विषयों वाली कविताएं है। बांग्ला भाषा के लेखक ‘बड़े अली मियां’ की पुस्तक ‘प्रिय गल्प’ का भी हिंदी अनुवाद किया है। ‘पुराणों में शुकदेव’ विषय पर शोध किया है। उनकी संस्मरण कृति ‘विदेशी प्रवास और हिंदी सेवा’ पर वरिष्ठ साहित्यकार जितेंद्र ‘निर्मोही’ लिखते है कि ‘‘अर्पणा पांडेय का अपना शिल्प है। उनके संस्मरणों के मूल में भारतीयता है और दृष्टिकोण में  ‘वसुधैव कुटुंबकम्’ का दर्शन। वह बांग्लादेश की मिट्टी में भारतीयता की खुशबू खोज निकालती है।’’

राजस्थान साहित्य अकादमी से सम्मानित अतुल कनक, प्रेम और अध्यात्म से ओत-प्रोत वाले असाधारण कवि है। उनकी सभी कविताएं सरल, सपाट, छंदमुक्त और गहरे अर्थ वाली होती है। किसी कवि-सम्मेलन में उनके मित्र ने उन पर व्यंग्य किया,- ‘‘हिंदी में चार कविताएं लिखकर गला फाड़कर चिल्लाने से तो कोई भी अखिल भारतीय कवि हो सकते है। राजस्थानी में कविता लिखकर दिखाओ तो जानूं?’’। इस व्यंग्योक्ति को उन्होंने गंभीरता से लिया और देखते-देखते राजस्थानी साहित्य लिखने वाले कवियों की अग्रपंक्ति में पहुंच गए। ‘अंतिम तीर्थंकर’ उपन्यास की मन में रूपरेखा तैयार होने के बावजूद कागज पर नहीं उतर पा रहा था, तो उन्होंने पूरे 550 दिन भोजन  त्यागकर अपना मनोरथ पूर्ण किया। ‘जूण जातरा’ और ‘छेक डलो राख’ नामक दो राजस्थानी उपन्यास, ‘चलो चूना लगाएं’ (हिन्दी व्यंग्य), और ‘अंतिम तीर्थंकर’ (हिन्दी उपन्यास) बहुत प्रसिद्ध हुए।

राजस्थान में कोटा एक ऐसी जगह है जो न केवल आईआईटी और मेडिकल स्टूडेंटों को अपनी ओर खींचती है, बल्कि उत्तरप्रदेश, मध्यप्रदेश आदि प्रदेशों के साहित्यकार भी इस अंचल की ओर खींचे चले आते है और यहां की संस्कृति में घुल-मिलकर यहीं के हो जाते है। इस श्रेणी में एक ऐसा ही नाम है- भगवंत सिंह जादौन ‘मयंक’ का, जिनका जन्म 1 सितंबर 1945 को मध्यप्रदेश में हुआ था। उन्होंने असंख्य मंचों का संचालन, कवि-सम्मेलनों और काव्य-गोष्ठियों में काव्य-पाठ किया।

इसी शृंखला के एक और शख्स है- सी.एल. सांखला। कोटा जिले के टाकर बाड़ा गांव के निवासी। राजस्थानी बाल-कहानियां, छंद विधा, पुस्तकों की समीक्षा और भूमिका लेखन में सिद्ध हस्त कवि है और विगत चार दशक से साहित्य सर्जन में लगे हुए है। हेमराज सिंह ‘हेम’ भी कोटा के कवि है, रामधारी सिंह ‘दिनकर’ की छाप लिए वीर रस वाले कवि। उनकी कविताओं में अध्यात्म और राष्ट्र प्रेम में सुगंध मिलती है। उन्होंने अनेक महाकाव्य, खंड काव्य और कहानियाँ लिखी है। ‘समरांगण’ उनका कृष्णार्जुन संवाद को केन्द्र में रखकर लिखा गया महाकाव्य है, तो राजस्थान के धीरोदात्त नायक- नायिकाओं पर आधारित ‘जयनाद’ खंड काव्य।

7 अप्रेल 1953 को जन्मे जितेंद्र कुमार शर्मा ‘निर्मोही’ झालावाड़ के निवासी है। हिंदी, उर्दू और ब्रज भाषा के अच्छे जानकार। उनका ‘द्रौपदी’ महाकाव्य ज्ञानपीठ से पुरस्कृत ओड़िया लेखिका प्रतिभा राय के उपन्यास ‘द्रौपदी’ (हिन्दी में) (याज्ञसेनी-मूल ओडिया में) की याद दिलाती है,  जिसमें नारी का अपमान, मूल्यहीनता, हत्या, भ्रष्टाचार, बलात्कार जैसे घृण्य कार्यों के अतिरिक्त नारी मनोविज्ञान और अंतर्मन में अंतर्द्वन्द्व को उकेरा गया है। उनकी कहानियाँ ‘हंस’, ‘कथा प्रवाह’, ‘कथा समय’ आदि में छपकर लोकप्रियता के तुंग को स्पर्श करती है। उनकी एक कहानी ‘एक नजर का प्यार’ बहुचर्चित रही। विज्ञान में स्नातक होने के बावजूद सेवानिवृत्ति के पश्चात् कोटा खुला विश्वविद्यालय से स्नातकोत्तर की डिग्री प्राप्त की।

वे गर्व से कहते है- ‘‘जीवन में कुछ कर सका या नहीं, मगर श्रीमती को साहित्यकार बना दिया।’’ उनकी पत्नी श्यामा शर्मा ने बाल रचनाकार के रूप में पहचान बनाई है। ‘निर्मोही’ जी के साहित्य सृजन का फलक व्यापक है। काव्य, निबंध, संस्मरण, समालोचना, उपन्यास, रेडियो नाटक, कहानी-गीत-नवगीत, समीक्षा, मोनोग्राफ आदि विधाओं में उन्होंने कार्य किया है। उनकी पत्नी श्यामा शर्मा ने प्रसिद्ध बाल साहित्यकार विमला भंडारी, भगवती प्रसाद गौतम, डॉ. तारा लक्ष्मण गहलोत और कमला कमलेश के मध्य अपनी पहचान बनाई है। वे जितेन्द्र ‘निर्मोही’ को अपना प्रेरणास्रोत मानती है। अपने पति की वन और वन्य विभाग में पोस्टिंग होने के कारण उनका प्रकृति की ओर ज्यादा झुकाव।

उस डॉ. प्रभात कुमार सिंघल के इस पुस्तक ने एक और साधक खोजा है- कालीचरण राजपूत। जन्म तारीख 10 नवंबर 1957। शिक्षाः बीएससी और इलैक्ट्रिकल इंजीनियरिंग में डिप्लोमा। रहने वाले उत्तर प्रदेश के एटा जिले में लोधीपुर के। सेवानिवृत्ति के बाद स्वाध्याय और साहित्य सर्जन में लगे हुए है। श्रीमद् भागवत गीता को अपने साहित्य का आधार बनाया है। ‘महारानी अवंती बाई का इतिहास’ उनकी बहुचर्चित पुस्तक है और ‘कुरूवंश पर संकट’ काव्य-संग्रह प्रकाशनाधीन है।

डॉ. कृष्णा कुमारी कोटा के चेचर गांव की हैं, जो सूरदास, सुमित्रानंदन पंत, सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’, तुलसीदास, रामचंद्र शुक्ल, बिहारी, रहीम, मैथिलीशरण गुप्त से प्रभावित रही है। उनकी पुस्तकों में ‘मैं पुजारिन हूँ’ (काव्य-संग्रह), ‘बहुत प्यार करते हैं शब्द’ (काव्य-संग्रह)  ‘भय बिन हो प्रीत’ (निबंध), ‘आओ नैनीताल चलें’ (यात्रा-वृत्तांत) बहुचर्चित रहे हैं।

मोहन वर्मा राष्ट्र प्रेम को समर्पित और विसंगतियों, विद्रूपताओं और सामाजिक समस्याओं के प्रति समाज में अलख जगाने वाले कवि, गीतकार और गजलकार की रचना ‘जगतमिथ्या ब्रह्मसत्य’ प्रसिद्ध रही हैं। प्रेम की भावनाओं और प्रकृति शृंगार पर सृजन करने वाली सवाई माधोपुर की मूल निवासी डॉ. प्रीति मीणा ने वृद्ध जनों की आर्थिक सामाजिक समस्याओं का समाज शास्त्रीय अध्ययन पर पीएचडी की उपाधि प्राप्त की है। महादेवी शर्मा से प्रभावित कवयित्री डॉ. प्रीति मीणा का कविता संग्रह ‘गीत केसर, कस्तूरी मन’ प्रकाशित हुआ है।

कोटा में रहने वाले, अध्यात्म की धरा से पुखर रचनाओं के सर्जक रघुनंदन हरीला ‘रघु’ का जन्म 10 दिसंबर 1949 को हरियाणा में हुआ। पश्चिम मध्य रेल्वे के संकेत एवं दूर संचार अभियंता पद से सेवानिवृत्त हुए है। सृजन से आध्यात्मिक धारा बहाने वाले रामेश्वर शर्मा ‘रामू भैया’ का जन्म 1 अक्टूबर 1950 को बूंदी जिले के लाखेरी गांव में हुआ। उनकी गीत पुस्तिका ‘हरिद्वार में द्वार-द्वार’ का लोकार्पण योग गुरू रामदेव जी ने किया, जिसका सीधा प्रसारण ‘आस्था चैनल’ द्वारा विश्व के 159 से भी अधिक राष्ट्रों में देखा गया।इसी प्रकार ‘वंदे मातरम्’ गीतों के हिन्दी काव्यानुवाद का पन्द्रह भाषाओं में पन्द्रह लाख प्रतियों में किया गया, जो कि एक विश्व रिकॉर्ड है। लोक सभा चुनाव के संदर्भ में चुनाव चालीसा को राष्ट्रीय ख्याति प्राप्त चैनलों में लोक हितार्थ दिखा गया।

1946 में जन्मे, बूंदी के रहने वाले रामस्वरूप मूंदड़ा ने अनेक विधाओं- गीत, गजल, हाइकु, मुक्तक, कविताएं, दोहे, आलेख और समीक्षा आदि को अपने लेखन का आधार बनाया हैं। वे हिंदी और हाड़ौती दोनों में समान अधिकार रखते है।

कवि विश्वामित्र ‘दाधीच’ साहित्य, संगीत और कला की त्रिवेणी है। 25 नवंबर 1954 में जन्म और कोटा कलेक्ट्रेट से 2024 में सेवानिवृत्ति। अच्छे गायक, वादक कलाकार है। ‘बोल्यों अण बोल्या’,‘मछलियां रा आंसू’ प्रसिद्ध काव्य-संग्रह है और नारी प्रधान उपन्यास ‘वेदवती’ तथा ‘मंच का मिजाज’ (संस्मरण) लोकप्रिय सिद्ध हुए।

1 जनवरी 1969 में जन्मे, कोटा में विजय जोशी विज्ञान के विद्यार्थी है, मगर साहित्याकरण ने उन्हें साहित्य, शिक्षा, पत्रकारिता और संचार, कला, संगीत, चित्रकारी, आलेख, समीक्षा की ओर ले गया। उनके उपन्यास ‘चीखते चौबारे’, ‘रिश्ते हुए रिश्ते’, कहानी संग्रह ‘खामोश गलियारे’, ‘कैनवास से परे’, ‘कुहासे का सफर’, बिंधे हुए रिश्ते’, ‘खिसकती वादियां’, ‘सुलगता मौन;’ बाल कहानी-संग्रह ‘बदल गया मिंकू’ राजस्थानी कहानी-संग्रह ‘मंदर में एक दिन’ के अतिरिक्त पांच समीक्षात्मक कृतियां ‘आखर निरख; पोथी परख’, ‘समीक्षा के पथ पर’, ‘अपने समय की बानगी; निकश पर’, ‘अनुभूति के पथ परः जीवन की बातें’, कहानीकार प्रहलाद सिंह राठौडः कथ्य एवं शिल्प’ प्रसिद्ध है। उन्होंने उर्दू कहानी-संग्रह ‘वादे सवा का इंतजार’ का ‘पुरवा की उड़ीक’ के नाम से राजस्थानी अनुवाद भी किया है। उनके साहित्य का मूल्यांकन भी बहुत सारे विद्वानों द्वारा किया गया है। पांच शोधार्थियों ने शोध भी किया है।

 

गद्य-पद्य विधा में प्रसिद्ध रचनाकार डॉ. इंदुशेखर ‘तत्पुरूष’ का जन्म 9 अक्टूबर 1962 को राजस्थान के गंगापुर सिटी में हुआ था। पेशे से आयुर्वेद चिकित्सक है और मन से साहित्यकार। उनकी पुस्तकों में ‘हिदुत्व एक विमर्श’ (आलेख-संग्रह), ‘खिली धूप में बारिश’, ‘पीठ पर आंच’ (कविता-संग्रह) के अतिरिक्त ‘अर्थायाम’, ‘जगद्गुरु शंकराचार्य’, ‘साहित्य परिक्रमा’ का संपादन कर रहे है।

डॉ. पुरूषोत्तम यकीन राजस्थान के करौली के प्रसिद्ध गजलकार है। अपने तीखे तेवर, अनूठी अभिव्यक्ति और अपने अंदाज के लिए प्रसिद्ध है। बाल मुकुंद ओझा बिना नागा किए प्रतिदिन आलेख लिखते है। उनकी दो पुस्तकें ‘लोकतंत्र का पोस्टमार्टम’ और ‘शिकायत झूठी है’ (लघुकथा) बहुचर्चित रही है। इसमें अतिरिक्त, ‘जब बाड को खेत खा जाए’ (कहानी) ‘खेत और खुशी’, ‘मेहनत की रोटी’, ‘बजट’, आदि लघु कथाएं पाठकों द्वारा आदृत हुई है। सन् 1953 में चुरू में जन्मे मानवीय संवेदनाओं के रचनाकार बालमुकुंद ओझा जन संपर्क अधिकार और संयुक्त निदेशक पद से सेवानिवृत्त हुए। सन् 1974 से 1979 तक दैनिक राजस्थान पत्रिका के संवाददाता बने। जे.पी. आंदोलन में सक्रिय भागीदारी के कारण गिरफ्तार हुए और जेल की यंत्रणा भी भोगनी पड़ी।

राजस्थान साहित्य अकादमी से पुरस्कृत लेखक दीनदयाल शर्मा को बाल साहित्य के क्षेत्र में देशभर में जाने जाते हैं। 15 जुलाई 1956 को हनुमानगढ़ जिले में जन्म हुआ। ‘दीनदयाल की चौपाल’ और अपने यू-टयूब चैनल के लिए लोकप्रिय है। सन् 1975 में हिन्दी में लिखना शुरू किया, मगर दस साल बाद सन् 1985 में राजस्थानी में मूल विद्या ‘बाल साहित्य’ है। 63 पुस्तकें प्रकाशित है, जिसमें ‘बालपणे री बातां’, ‘एक टाबर की डायरी’, ‘कुछ अनेक ही बातें’ (जिसके 101 साहित्यकारों ने उन पर लिखा हैं) और ‘टाबर टोली’ (पाक्षिक बाल समाचार पत्र ) के लिए प्रसिद्ध है।

7 अक्टूबर 1943 में रतनगर, चुरू में जन्मे श्याम महर्षि, बीकानेर जिले के डूंगरपुर के रचनाकार माने जाते है। उनके काव्य-संग्रह ‘उकलती ओकल’, ‘साच तो है’, ‘मेह सूं पैलया’, ‘कीं तो बोल’ आदि राजस्थानी पाठकों द्वारा पसंद किए गए है।

अंत में, मैं विजय जोशी की भूमिका के निष्कर्ष से मैं पूरी तरह सहमत हूँ, जिसमें उन्होंने लिखा है कि डॉ. प्रभात कुमार सिंघल की यह पुस्तक राजस्थान के साहित्यकारों की गहन संवेदना और उनके रचाव को उद्घाटित करती है। यह वह रचाव है, जो इन साहित्यकारों ने राजस्थान की धरापर ही नहीं उकेरा, वरन् अपने प्रवास की धरती के आंगन को भी स्पंदित किया है। यह स्पंदन वरिष्ठ लेखकों के साथ-साथ नवोदित सृजन कर्मियों के साथ ध्वनित होता हुआ रचनात्मक संस्कारों को अनुदित करता है और साहित्य के विविध आगामी संदर्भो में सृजनात्मक वैशिष्ट्य को प्रतिपादित तो करता ही है, उल्लेखित साहित्यकारों के योगदान को समझने और परखने का अवसर भी प्रदान करता है।’’

निस्संकोच, डॉ प्रभात कुमार सिंघल की ‘राजस्थान के साहित्य साधक’ अत्यंत सार्थक कृति बनती, अगर एकाध अध्याय में वे हमारे प्रसिद्ध पूर्वज साहित्यकारों जैसे चंद्रधर शर्मा गुलेरी (1883-1922),दादू दयाल (1544-1103),मीरा (1498-1546), संत पीपा (1359-1420), आईदान सिंह भाटी (1952), राघेय राघव (1923-1962), विजयदान देथा (1926-2013), नंद चतुर्वेदी (1923-2014), हनुमान प्रसाद पोद्दार (1872-1931),  हरीश भादानी (1933-2009), कन्हैयालाल सेठिया (1919-2005), मदनलाल डांगी (1935-1988) आदि का संक्षिप्त उल्लेख करते और समकालीन साहित्यकारों और पत्रकारों में नंद किशोर आचार्य, ओम थानवी,मनीषा कुलश्रेष्ठ,अंबिका दत्त, हरिराम मीणा, हिम्मत सेठ, पद्मजा शर्मा, ओमपुरोहित ‘कागद’ आदि के व्यक्तित्व और कृतित्व पर भी प्रकाश डालते।

अंत में,  इतना ही कहूँगा कि यह पुस्तक अनेक दैदीप्यमान साहित्यकारों का लेखा-जोखा है, जिसके लिए पृष्ठ भूमि तैयार की है, डॉ. प्रभात कुमार सिंघल ने। उन्होंने एक ऐसा मंच तैयार किया है, जिसके द्वारा न केवल पाठक वर्ग,  बल्कि नवोदित और स्थापित लेखक, साहित्यकार भी एक-दूसरे के कृतित्व और व्यक्तित्व से परिचित हो सकते हैं। कई बार ऐसा भी होता है कि हम साहित्यकारों के नाम जानते हो अवश्य हैं, लेकिन उनके समग्र व्यक्तित्व और कृतित्व से अपरिचित होते हैं।

भले ही, उनकी एक-दो रचनाओं से हम गुजरे भी होते हैं, मगर उनके वृत्तीय आकलन से वंचित रहते हैं। इस कमी को पूरा करते है, डॉ. प्रभात कुमार सिंघल जैसे संवेदनशील साहित्यकार, पेशे से खोजी पत्रकार। जो साहित्य के विशाल महासागर की अथाह गहरायों में गोते लगाते हैं और खोजकर ले आते हैं, अपने हाथों में बहुमूल्य मुक्ता-मोती-प्रवाल। बाद में, उसकी माला पिरोकर समाजोपयोगी  बनाकर पाठकों के समक्ष प्रस्तुत कर देते हैं, ताकि वे अपने मनपसंदीदा व्यक्तित्व और उनके कृतित्व से वाकिफ होकर इसकी माला आगे से आगे पिरोते चलेजाए। अथक, अनवरत और शृंखलाबद्ध मानो एक जले हुए दीए से दूसरे बुझे हुए दीए या मंद पड़ रहे दीए को जलाकर दीपों की एक दीर्घ अवली तैयार की जा रही हो। यह ही तो साहित्य की सच्ची दीपावली है। उनकी यह पुस्तक न केवल राजस्थान के साहित्यकारों को जोड़ती है, बल्कि देश के अन्य समकालीन साहित्यकारों को एक सूत्र में पिरोने के लिए भी प्रेरणा-स्रोत बनकर अतुलनीय उदाहरण प्रस्तुत करती है।


( समीक्षक दिनेश कुमार माली ओडिशा में राजस्थान मूल के सिरोही जिले के निवासी है। आप देश के जाने माने अनुवादक और आलोचक है। )

महाभारत का राष्ट्रीय टेलीविजन पर नवीन स्‍वरूप में प्रसारण

प्रसार भारती और कलेक्टिव मीडिया नेटवर्क ने आज की पीढ़ी के लिए महाभारत की पुनर्कल्पना करने के लिए साझेदारी की

कलेक्टिव मीडिया नेटवर्क ने भारत के सबसे प्रसिद्ध महाकाव्य ‘महाभारत’ के एक अभूतपूर्व एआई-आधारित पुनर्कल्पना के प्रसारण की घोषणा की है। इस श्रृंखला का विशेष डिजिटल प्रीमियर 25 अक्टूबर 2025 को वेव्स ओटीटी पर होगा। इसके बाद 2 नवंबर 2025 से हर रविवार सुबह 11:00 बजे दूरदर्शन पर इसका प्रसारण होगा। यह श्रृंखला भारत और दुनिया भर के डिजिटल दर्शकों के लिए वेव्स ओटीटी के माध्यम से एक साथ उपलब्ध होगी।

अपनी तरह का यह पहला सहयोग भारत के सार्वजनिक प्रसारक की विरासत और देशव्यापी पहुंच को अगली पीढ़ी के मीडिया नेटवर्क के रचनात्मक नवाचार के साथ जोड़ता है। उन्नत एआई उपकरणों का उपयोग करते हुए, इस श्रृंखला में महाभारत महाकाव्‍य के व्‍यापक स्‍वरूप, उसके पात्रों, युद्धक्षेत्रों, भावनाओं और नैतिक दुविधाओं को सिनेमा के पैमाने और अद्भुत यथार्थवाद के साथ फिर से तैयार किया गया है। यह परियोजना मेक इन इंडिया और डिजिटल इंडिया की भावना को मूर्त रूप देती है और यह दर्शाती है कि कैसे विरासत और नवाचार एक साथ आगे बढ़ सकते हैं।

प्रसार भारती के मुख्‍य कार्यकारी अधिकारी गौरव द्विवेदी इस सहयोग पर अपने विचार व्‍यक्‍त करते हुए कहा कि प्रसार भारती हमेशा से ही राष्ट्रीय और सांस्कृतिक महत्व की गाथाओं को हर भारतीय घर तक पहुंचाता रहा है। लॉकडाउन के दौरान मूल महाभारत के पुनः प्रसारण ने हमें याद दिलाया कि ये कथाएं परिवारों और पीढ़ियों को कितनी गहराई से एक साथ जोड़ती हैं। यह एआई-आधारित पुनर्कल्पना में भागीदारी दर्शकों को भारत के सबसे महान महाकाव्यों में से एक का नए सिरे से अनुभव करने का अवसर प्रदान करती है साथ ही इसमें परंपरा का सम्मान करते हुए कहानी बताने की अत्याधुनिक तकनीक को अपनाया गया है। यह आधुनिक प्रसारण में विकास और विरासत के एक साथ आने की अभिव्यक्ति है।

कलेक्टिव आर्टिस्ट्स नेटवर्क के संस्थापक और समूह सीईओ, विजय सुब्रमण्यम ने इस साझेदारी पर अपने विचार व्‍यक्‍त करते हुए कहा कि लाखों भारतीयों की तरह, वह भी हर रविवार को टेलीविजन पर क्लासिक महाभारत देखकर बड़े हुए हैं। यह एक ऐसा अनुभव था जिसने हमारी कल्पना और संस्कृति से हमारे जुड़ाव को आकार दिया। महाभारत के साथ, हमारी आशा है कि आज की पीढ़ी को इसके माध्‍यम से एक ऐसा भावपूर्ण अनुभव दिलाना है जो उनके लिए गहन और एकीकृत भाव से परिपूर्ण हो और इसे आज की तकनीक की संभावनाओं के माध्यम से दिखाया गया है। यह भक्ति और प्रगति के साथ मिलकर कुछ ऐसा तैयार करने के संदर्भ में है जो न सिर्फ गहराई से परंपरा में निहित हो अपितु साहसपूर्वक दूरदर्शी भी हो।

प्रसार भारती का आधिकारिक ओटीटी प्लेटफ़ॉर्म, वेव्स, भारत की संस्कृति, समाचार और मनोरंजन के समृद्ध ताने-बाने को एक डिजिटल मंच पर लाता है। वीडियो-ऑन-डिमांड, लाइव इवेंट और टीवी, रेडियो, ऑडियो और पत्रिका सामग्री के व्यापक संग्रह के साथ, वेव्स ने अपनी विश्वसनीय, परिवार-अनुकूल और बहुभाषी पेशकशों के साथ तेज़ी से लाखों उपयोगकर्ताओं को आकर्षित किया है। समावेशिता, नवाचार और विरासत के स्तंभों पर निर्मित, यह प्लेटफ़ॉर्म अत्याधुनिक कहानी कहने की कला के साथ भारत की कालातीत विरासत को जोड़ता है। कलेक्टिव एआई महाभारत के साथ इसका सहयोग इस बात का उदाहरण है कि कैसे तकनीक और परंपरा मिलकर शक्तिशाली, समकालीन आख्यान रच सकते हैं जो भारत और दुनिया भर के दर्शकों के साथ प्रतिध्वनित होते हैं।