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श्री लाड़ली जी महाराज मन्दिर का चमत्कारिक इतिहास

मन्दिर श्री लाड़ली जी महाराज बरसाना, उत्तर प्रदेश के मथुरा शहर से 43 किमी. दूर भानुगढ़ ब्रह्मांचल पहाड़ी पर स्थित है। यह मंदिर न केवल एक आध्यात्मिक शरणस्थली है, बल्कि भगवान श्री कृष्ण और उनकी अल्हादिनी शक्ति श्री राधा रानी  के बीच शाश्वत प्रेम का भी प्रमाण है। इस मंदिर को बरसाना की लाडली मंदिर और श्री जी मंदिर के नाम से भी जाना जाता है। यह श्री राधा रानी  के भक्तों का सबसे प्रिय मंदिर है, जो इस स्थान पर आकर खुद को बहुत धन्य महसूस करते हैं।

प्राचीन नाम श्री वृषभानुपुर :-

श्रीवृषभानु जी की राजधानी होने के कारण बरसाने का प्राचीन नाम श्री वृषभानुपुर था। वाराहपुराण एवं प‌द्मपुराण में ऐसी कथा आती है कि ब्रहमाजी ने तपस्या के बल पर श्रीकृष्ण से लीला- दर्शन का वरदान प्राप्त किया था। फल स्वरूप लीला दर्शनार्थ वे ब्रहमांचल के रूप में यहां स्थापित इस पर्वत को वृहत्सानु पर्वत के नाम से हुए। ब्रहमाजी के चार्तुमुखी स्वरूप के समान यहां वृहत्सानु की चार चोटियां हैं- भानुगढ़, दानगढ़, विलासगढ़ तया मानगढ़।

श्रीकृष्ण आनंद का विग्रह

 राधा प्रेम की मूर्ति:-

जिस प्रकार श्रीकृष्ण आनंद का विग्रह हैं, उसी प्रकार राधा प्रेम की मूर्ति हैं। अत: जहां श्रीकृष्ण हैं, वहीं राधा हैं और जहां राधा हैं, वहीं श्रीकृष्ण हैं। कृष्ण के बिना राधा या राधा के बिना कृष्ण की कल्पना के संभव नहीं हैं। इसी से राधा ‘महाशक्ति’ कहलाती हैं। कृष्ण इनकी आराधना करते हैं, इसलिए ये राधा हैं और ये सदा कृष्ण की आराधना करती हैं, इसीलिए राधिका कहलाती हैं। ब्रज की गोपियां और द्वारका की रानियां इन्हीं श्री राधा की अंशरूपा हैं। ये राधा और ये आनंद सागर श्रीकृष्ण एक होते हुए भी क्रीडा के लिए दो हो गए हैं। राधिका कृष्ण की प्राण हैं। इन राधा रानी की अवहेलना करके जो कृष्ण की भक्ति करना चाहता है, वह उन्हें कभी पा नहीं सकता।’

 

निष्काम प्रेम और समर्पण:-

राधा का प्रेम निष्काम और नि:स्वार्थ है। वह श्रीकृष्ण को समर्पित हैं, राधा श्रीकृष्ण से कोई कामना की पूर्ति नहीं चाहतीं। वह सदैव श्रीकृष्ण के आनंद के लिए उद्यत रहती हैं। इसी प्रकार जब मनुष्य सर्वस्व समर्पण की भावना के साथ कृष्ण प्रेम में लीन होता है, तभी वह राधाभाव ग्रहण कर पाता है। कृष्ण प्रेम का शिखर राधा भाव है। तभी तो श्रीकृष्ण को पाने के लिए हर कोई राधारानी का आश्रय लेता है।

 

विविध लीलाएं:-

मन्दिर में श्री मानबिहारी लाल के दर्शन हैं। मोरकुटी पर श्री श्यामसुन्दर ने मोर बनकर नृत्य करते हुए अपनी श्यामा जू को रिझाया था। गहवर वन की सघन निकुंजें श्री राधा-माधव की सरस केलि की सहज नियोजिका है। इसके निचले भाग में रासमण्डल है, राधा सरोवर है, शंख का चिन्ह दर्शन है और महाप्रभु बल्लभ जी की बैठक है। वहां पर श्री गोपाल जी के दर्शन हैं। यह सम्पूर्ण ब्रजभूमि स्वयं श्रृंगाराख्य भवरूपा है। तत्स्वरूपा होने के साथ उस परमभाव की भांति उन्मादना उत्पन्न करने में भी पूरी तरह समर्थ है। तभी तो स्वयं रसराज यहां इस राधिका- केलि- महल की किंकरियों के समान महाभावस्था नन्दिनी की कृपा की अभिलाषा लिए सदा रहते हैं।

 

राजपूताना शैली का मन्दिर:-

मन्दिर श्री लाड़ली जी महाराज (राधा रानी मंदिर) की स्थापत्य कला राजपूताना शैली पर आधारित है और यह लाल बलुआ पत्थर से निर्मित है, जो मुगल वास्तुकला से प्रभावित लगता है। मंदिर का निर्माण मुख्य रूप से लाल और सफेद पत्थरों से हुआ है, जो राधा और कृष्ण के प्रेम का प्रतीक माने जाते हैं। इस मंदिर की मुख्य विशेषताएं इसमें मौजूद जटिल नक्काशी, मेहराब, गुंबद और उत्कृष्ट चित्र हैं। पहाड़ी पर बने इस भव्य मंदिर तक पहुँचने के लिए 200 से अधिक सीढ़ियाँ हैं।

 

वृषभानु महाराज का महल:-

सीढ़ियों के नीचे वृषभानु महाराज का महल है, जहाँ राधा, कीर्ति और श्रीदामा की मूर्तियाँ हैं। इसके अलावा पास में ब्रह्मा मंदिर और अष्टसखी मंदिर भी हैं।

राधा रानी का प्राकट्य :-

भाद्रपद माह में शुक्ल पक्ष की अष्टमी को यहाँ विशेष महोत्सव मनाया जाता  है क्योंकि इसी दिन श्री राधा रानी का प्राकट्य  हुआ था और इसी दिन राधाष्टमी का त्यौहार मनाया जाता है। मुख्यतः लठमार होली एवं राधाष्टमी यहाँ के सबसे बड़े त्यौहार हैं । बरसाना में ब्रह्मांचल पर्वत पर स्थित श्री लाडिली जी मंदिर और नंदगांव में नंदीश्वर पर्वत पर स्थित नन्द बाबा मंदिर दोनों की एक साझी परंपरा है जिसका निर्वहन साढ़े पांच सौ वर्ष से किया जा रहा है।

 

होली में समाज गायन की परंपरा :-

बसंत पंचमी से लेकर धुलेंडी तक यहाँ होली का उल्लास रहता है इसीलिए कहा जाता है कि ब्रज में फाल्गुन चालीस दिन का होता है। बसंत पंचमी के दिन से दोनों मंदिरों में आधिकारिक रूप से होली की शुरुआत होती है। होली के डांडे रोप दिए जाते हैं और समाज गायन का क्रम शुरू हो जाता है। इसी दिन से मंदिरों में गुलाल उड़ने लगता है, पखावज बजने लगती है और ढप पर थाप पड़ने लगती है। बसंत पंचमी के दिन आदि रसिक कवि जयदेव के पद ‘ललित लवंग लता परिसीलन, कोमल मलय शरीरे’ से समाज गायन शुरू होता है। इसी क्रम में हरि जीवन का पद ‘श्री पंचमि परम् मंगल दिन, मदन महोत्सव आज बसंत बनाय चलीं ब्रज सुन्दरि, लै लै पूजा कौ थार’ का गायन होता है।

 

चमत्कारी इतिहास:-

बरसाना स्थित लाड़ली जी मंदिर का इतिहास चमत्कारी कहानियों से भरा पड़ा है, जो स्थानीय लोगों की पीढ़ियों से चली आ रही हैं। मुगल आक्रमणकारियों के भागने की कहानियों से लेकर दैवीय हस्तक्षेप तक, यह मंदिर हमेशा मज़बूती से खड़ा रहा है। एक विशेष रूप से प्रसिद्ध कहानी एक चोर की है जो मंदिर को लूटने आया था, लेकिन अंधा होकर लौट गया।

ब्रह्मांचल पर्वत पर स्थित श्री राधा रानी के पवित्र महल को लूटने के कई प्रयास हुए हैं, लेकिन आक्रमण कारी और चोर, दोनों ही हमेशा खाली हाथ ही रहे हैं।

एक चोर लूटपाट के इरादे से मंदिर में घुसा। आते ही उसने चौकीदार को लाठियों से पीटना शुरू कर दिया। हमले के बावजूद, चौकीदार ने अपनी उंगली से मंदिर के दरवाजे बंद कर दिए और कुंडी लगा दी। चोर ने उस पर लगातार हमला किया, उसे लाठियों से मारा और यहाँ तक कि गोलियाँ भी चलाईं, लेकिन चौकीदार को कोई नुकसान नहीं पहुँचा।आखिरकार, चोर की आँखों की रोशनी चली गई और वह कुछ भी देख नहीं पा रहा था। इसी बीच, मंदिर में मौजूद अन्य लोगों नेआपात कालीन घंटी बजा दी, जिससे चोर भाग गया।

लगभग 200 साल पुरानी एक और घटना है – डाकुओं ने मंदिर में चोरी करने की कोशिश की थी। हालाँकि, लाड़ली सरकार (राधा रानी) ने उनकी योजना को विफल कर दिया। रात के लगभग 11 बजे, डाकू मंदिर के शिखर पर चढ़ गए, और सोने का शिखर चुराने की कोशिश करने लगे। मंदिर के रखवालों को कुछ गड़बड़ होने का आभास हुआ। लेकिन इससे पहले कि वे कुछ कर पाते, चोर अंधे हो गए।

 

लेखक परिचय:-

(लेखक भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण, में सहायक पुस्तकालय एवं सूचनाधिकारी पद से सेवामुक्त हुए हैं। वर्तमान समय में उत्तर प्रदेश के बस्ती नगर में निवास करते हुए सम सामयिक विषयों,साहित्य, इतिहास, पुरातत्व, संस्कृति और अध्यात्म पर अपने विचार व्यक्त करते रहते हैं।

(वॉट्सप नं.+919412300183)

भारतीय डाक विभाग द्वारा ‘एक पत्र अपने रोल मॉडल के नाम’

पत्र-लेखन प्रतियोगिता 

अहमदाबाद। भारतीय डाक विभाग द्वारा लोगों में पत्र लेखन को प्रोत्साहित करने हेतु राष्ट्रीय स्तर पत्र लेखन प्रतियोगिता ‘ढाई आखर’ का आयोजन किया जा रहा है। यह पहल न केवल लेखन कौशल को निखारने का अवसर प्रदान करती है, बल्कि लोगों को अपनी संवेदनाओं को सशक्त शब्दों में व्यक्त करने का भी मंच देती है। उत्तर गुजरात परिक्षेत्र, अहमदाबाद के पोस्टमास्टर जनरल श्री कृष्ण कुमार यादव ने बताया कि इस प्रतियोगिता में ‘एक पत्र अपने रोल मॉडल के नाम’ विषय पर प्रतिभागियों को अपने विचारों को व्यक्त करते हुए एक पत्र लिखना होगा, जिसे संबंधित राज्य या परिमंडल के चीफ पोस्टमास्टर जनरल को संबोधित करना है। इस प्रतियोगिता में पत्र चुने जाने पर पाँच हजार से पचास हजार रूपये तक का पुरस्कार भी मिलेगा। इसके लिए विभिन्न स्कूल-कॉलेज डाक विभाग के साथ मिलकर अपने यहाँ पर आयोजन कर सकते हैं। इसकी अंतिम तिथि 08 दिसम्बर, 2025 है।

 

पोस्टमास्टर जनरल श्री कृष्ण कुमार यादव ने कहा कि इस  ‘ढाई आखर’ पत्र लेखन प्रतियोगिता में किसी भी उम्र के लोग भाग ले सकते हैं। पहला वर्ग 18 वर्ष तक तथा दूसरा 18 वर्ष से अधिक आयु वर्ग का होगा। पत्र डाक विभाग द्वारा जारी अंतर्देशीय पत्र अथवा लिफाफे में ही स्वीकार्य होगा,  जिसमें क्रमशः 500 और 1,000 शब्दों में अंग्रेजी, हिन्दी अथवा स्थानीय भाषा में हाथ से पत्र लिखा जा सकता है। पत्र में अपना पूरा नाम, पता, जन्मतिथि, मोबाइल नंबर और विद्यालय के नाम सहित संबंधित परिमंडल के चीफ पोस्टमास्टर जनरल के पते पर 08 दिसम्बर, 2025 तक भेजना होगा।

 

पोस्टमास्टर जनरल श्री कृष्ण कुमार यादव ने बताया कि प्रतियोगिता के विजेताओं को राज्य और राष्ट्रीय स्तरों पर विभिन्न 4 श्रेणियों में तीन-तीन पुरस्कार प्रदान किए जाएंगे। इनमें परिमंडलीय (राज्य) स्तर पर चयनित श्रेष्ठ पत्रों को प्रथम, द्वितीय व तृतीय श्रेणी में क्रमश: 25 हजार, 10 हजार व  5 हजार रूपए का पुरस्कार दिया जायेगा। राष्ट्रीय  स्तर पर चयनित श्रेष्ठ पत्रों को प्रथम, द्वितीय व तृतीय श्रेणी में क्रमश: 50 हजार, 25 हजार व 10 हजार रूपए का पुरस्कार दिया जायेगा। कुल मिलाकर पूरे देश में 40 लाख 20 हजार रूपये के पुरस्कार विजेताओं को दिए जायेंगे। इस संबंध में ज्यादा जानकारी के लिए विभिन्न मंडलों के अधीक्षक और प्रधान डाकघर के पोस्टमास्टर से संपर्क किया जा सकता है।

 

पोस्टमास्टर जनरल श्री कृष्ण कुमार यादव ने कहा कि वर्तमान डिजिटल युग में जहाँ संवाद के साधन तेज़ और तात्कालिक हो गए हैं, वहीं पत्र लेखन की कला आज भी अपनी आत्मीयता और संवेदनशीलता के कारण प्रासंगिक बनी हुई है। पत्र केवल शब्दों का आदान-प्रदान नहीं, बल्कि भावनाओं, स्मृतियों और मानवीय संबंधों की गहराई को व्यक्त करने का माध्यम है। ‘ढाई आखर’ एक राष्ट्रीय स्तर की पहल है, जिसका उद्देश्य युवाओं में रचनात्मकता, मौलिकता व आत्म-अभिव्यक्ति को प्रोत्साहित करके उन्हें डाक और फिलेटली से पुनः परिचित कराना है। यह जन सामान्य के लिए उनके लेखन कौशल और प्रतिभा को प्रदर्शित करने का एक मंच भी है। ‘ढाई आखर’ अभियान शब्दों के माध्यम से दिलों को जोड़ने का एक प्रयास है — यह न केवल पत्र लेखन की कला का उत्सव है, बल्कि संवेदनाओं को सजीव करने और विचारों को साकार रूप देने का अवसर भी प्रदान करता है।

जलशक्ति मंत्रालय छात्रों को 15 हजार की राशि देगा

जल शक्ति मंत्रालय ने मंगलवार को एक इंटर्नशिप प्रोग्राम की घोषणा की, जिसके तहत चुने हुए उम्मीदवारों को मंत्रालय की मीडिया और सोशल मीडिया गतिविधियों में शामिल होने का अवसर मिलेगा। इस प्रोग्राम में चयनित छात्रों को महीने का 15,000 रुपये का मानदेय और सफलतापूर्वक इंटर्नशिप पूरी करने पर प्रमाणपत्र दिया जाएगा।

इस इंटर्नशिप प्रोग्राम के लिए डिपार्टमेंट ऑफ वॉटर रिसोर्सेज, रिवर डेवलपमेंट एंड गंगा रिजनरेशन (DoWR, RD & GR) ने स्नातक या स्नातकोत्तर स्तर के छात्र और शोधकर्ता जो मान्यता प्राप्त विश्वविद्यालय/संस्थान में मास कम्युनिकेशन के क्षेत्र में अध्ययन कर रहे हैं, को आवेदन करने के लिए आमंत्रित किया है।

इंटर्नशिप की अवधि 6 से 9 महीने होगी और आवेदन करने की अंतिम तिथि 24 नवंबर 2025 है। इच्छुक उम्मीदवार ऑनलाइन आवेदन कर सकते हैं: https://mowr.nic.in/internship

योग्यता के अनुसार, आवेदनकर्ता ने मास कम्युनिकेशन या पत्रकारिता में स्नातक पूरा किया हो, या पीजी/डिप्लोमा कर रहे हों (स्नातक पूरा होने के बाद) या MBA (Marketing) में अध्ययनरत हों। उम्मीदवार को मान्यता प्राप्त कॉलेज/विश्वविद्यालय से होना चाहिए और सभी शर्तें दिशा-निर्देशों के अनुसार पूरी करनी होंगी।

इसके अलावा, जल शक्ति मंत्रालय के पेयजल और स्वच्छता विभाग (DDWS) ने हाल ही में ग्रामीण पेयजल योजनाओं के डिजिटलीकरण में एक महत्वपूर्ण कदम उठाया। नए RPWSS (Rural Piped Water Supply Schemes) मॉड्यूल के जरिए ग्रामीण जल आपूर्ति योजनाओं में पारदर्शिता, जवाबदेही और दक्षता बढ़ाने का लक्ष्य रखा गया है।

चित्रकारों ने कराया रंगों से छत्तीसगढ दर्शन

रायपुर /
संस्कार भारती छत्तीसगढ़ द्वारा छत्तीसगढ़ रजत जयंती महोत्सव के उपलक्ष्य में 51 चित्रों की एक चित्रमाला निर्माण कार्यशाला दिनांक 11 – 12 अक्टूबर को विप्र भवन, समता कॉलोनी, रायपुर में आयोजित की गई।

कार्यशाला में प्रदेश की राजधानी रायपुर के चित्रकारों के अलावा बिलासपुर, राजनांदगांव, खैरागढ़, जांजगीर-चांपा, दुर्ग, बालोद, महासमुंद, दंतेवाड़ा, रायगढ़, धमतरी, बलोदा बाजार, बस्तर आदि स्थानों से कलाकार पधारे एवं 51 चित्रों की रचना की।

इन चित्रों में कला संस्कृति एवं परम्परा, ऐतिहासिक घटना, सामाजिक जनजीवन और तीज-त्यौहार आदि विषय आधार रूप में हैं। इन विषयों का चयन साहित्य अकादमी के अध्यक्ष श्री शशांक शर्मा के द्वारा किया गया।

छत्तीसगढ़ रजत जयंती महोत्सव का संदर्भ

छत्तीसगढ़ को भारत के मानचित्र पर एक नए राज्य के रूप में 25 वर्ष हो गए। इसी अवसर पर छत्तीसगढ़ शासन के द्वारा छत्तीसगढ़ रजत जयंती महोत्सव का प्रारंभ 15 अगस्त 2025 से हुआ, जिसमें सभी विभागों के द्वारा फरवरी 2026 तक विभिन्न कार्यक्रमों का आयोजन शासन और गैर सरकारी संस्थाओं के द्वारा किया जा रहा है।

इसी तारतम्य में संस्कार भारती के द्वारा इस कार्यशाला के आयोजन की योजना बनी और कार्यशाला सफल रूप से संपन्न हुई।

प्रदर्शनी और स्मारिका

इस चित्रकला कार्यशाला को संस्कार भारती द्वारा प्रशासन को समर्पित कर आग्रह किया जाएगा कि इसकी भव्य प्रदर्शनी का उद्घाटन 1 नवंबर को राज्योत्सव के अवसर पर किया जाए।

संस्था द्वारा एक स्मारिका प्रकाशित की जाएगी, जिसमें इन सभी कलाकृतियों के छायाचित्र रहेंगे।

समापन समारोह

कार्यशाला के समापन समारोह में
प्रांतीय अध्यक्ष संस्कार भारती श्री रिखी क्षत्री,
डॉ. विकास चंद्रा, अध्यक्ष चित्रकला विभाग, संगीत विश्वविद्यालय खैरागढ़,
श्री शशांक शर्मा, साहित्य अकादमी छत्तीसगढ़ शासन
के द्वारा संपन्न हुआ।

इस अवसर पर संस्था के महामंत्री हेमंत माहुलिकर,
महानगर महामंत्री कबीर चंद्राकर,
पुरुषोत्तम चंद्राकर, डॉ. आनंद पांडे, किशोर वैभव, प्रांजल राजपूत, प्रीतेश पांडेय, लवकुश तिवारी, अपूर्वा, अंकित, रंजना गुरु, शैलदुलारी सारवा, सूर्यकांता कश्यप, पार्थ महावर, कला प्रेमी, कलाकार, नगरवासी आदि उपस्थित थे।

कलाकारों एवं कृतियों की सूची

  • नेहल वैष्णव, खैरागढ़ – कला संगीत विश्वविद्यालय (लैंडस्केप / कलात्मक चित्र कला संगीत से जुड़ी)

  • दिव्या चंद्रा – महानदी राजिम त्रिवेणी संगम, राजीव लोचन मंदिर, राजिम कुंभ (साधु संत स्नान, राजिम मंदिर दृश्य)

  • मनहरण देवांगन – छत्तीसगढ़ आदिवासी सौंदर्य वेशभूषा

  • सोनल शर्मा – छत्तीसगढ़ महतारी

  • निकिता साहू – रामनामी संप्रदाय, जांजगीर चांपा

  • खुशी चौधरी – राजा चक्रधर

  • शिवा साहू – ढोकरा कला, कलाकृति

  • अवध कंवर – बस्तर बाजार

  • तृप्ति साव – छत्तीसगढ़ का सौन्दर्य

  • सिद्धार्थ सोनी – मड़ई, राउत

  • सिरपुर बुद्ध विहार – (लैंडस्केप) लक्ष्मण मंदिर पुरातत्व

  • टिकेश्वर साहू – महादेव घाट

  • निलेश कश्यप – चित्रकोट जलप्रपात, लोक नृत्य

  • दिव्य प्रकाश – कर्मा नृत्य

  • सुमन महंत – वनभैंसा

  • अविरल कृष्ण साहू – भिलाई स्टील प्लांट

  • गिरीश दास – बस्तर दशहरा

  • प्रियांशु – बम्लेश्वरी मंदिर डोंगरगढ़

  • दीपक शर्मा – शिवरीनारायण, तुरतुरिया वाल्मिकी आश्रम, श्रीराम शबरी भेंट

  • अरविंद कुमार यदु – रायपुर नंबर 9

  • देवरी – सुआ नृत्य

  • दीपक प्रजापति – पोला पर्व, अक्ती पर्व, हरेली, लोक पर्व की झलक

  • सुरेंद्र मेहर – जंगल सत्याग्रह

  • सोमनाथ कँवर – भोरमदेव मंदिर समूह

  • दिव्यांशु देवांगन – छत्तीसगढ़ के ग्रामीण जन जीवन (परिवार का दृश्य, पीछे घर, खेत, बैल, बैल गाड़ी, ट्रेक्टर आदि दृश्य)

  • अभिजीत बंगानी – नवा रायपुर (लैंडस्केप)

  • राहुल दत्ता – छत्तीसगढ़ की मूर्तिकला

  • करण कुमार – गौर नृत्य, घोटूल

  • विक्रांत चंचल साहू – पंथी नृत्य, गिरौदपुरी, गुरु घासीदास

  • सुजल गुप्ता – सिंचाई, हसदेव बाँगो डैम (लैंडस्केप)

  • भावना – कृषि क्षेत्र, किसान धान लगाते आदि

  • कौशांक नाग – स्वास्थ्य एम्स लैंडस्केप

  • मितलेश बारीक – रायपुर अंतर्राष्ट्रीय स्टेडियम

  • मुकेश कुंजाम – गोंड आदिवासी महिला

  • मनीषा धुर्वे – सीता डोंगरा रामगढ़ की पहाड़ी, कालीदास मेघदूत की रचना

  • रचना मरकाम – कोसा वस्त्र बुनाई

  • कौशल सिन्हा – माधव राव सप्रे, पेन्ड्रा, छत्तीसगढ़ मित्र समाचार पत्र का प्रकाशन

  • घनश्याम मानिकपुरी – दामाखेड़ा, कबीरपंथ (लैंडस्केप / दामाखेड़ा मेला)

  • सलवम मनीष – वनभैसा राजकीय पशु, पहाड़ी मैंना, छत्तीसगढ के वन क्षेत्र परिप्रेक्ष्य

  • शुभम – वीर नारायण सिंह सोनाखान

  • सुमन भंडारी – शिक्षा (ग्रामीण बच्चियां साइकिल से स्कूल जाते हुए)

प्रेषक:
भोजराज धनगर
संस्कार भारती छत्तीसगढ़

संस्कृत का वो जादू जो दुनिया की किसी भी भाषा में नहीं है

अंग्रेजी में ‘THE QUICK BROWN FOX JUMPS OVER A LAZY DOG’ एक प्रसिद्ध वाक्य है। जिसमें अंग्रेजी वर्णमाला के सभी अक्षर समाहित कर लिए गए,

मज़ेदार बात यह है की अंग्रेज़ी वर्णमाला में कुल 26 अक्षर ही उप्लब्ध हैं जबकि इस वाक्य में 33 अक्षरों का प्रयोग किया गया जिसमे चार बार O और A, E, U तथा R अक्षर का प्रयोग क्रमशः 2 बार किया गया है।

इसके अलावा इस वाक्य में अक्षरों का क्रम भी सही नहीं है। जहां वाक्य T से शुरु होता है वहीं G से खत्म हो रहा है।

अब ज़रा संस्कृत के इस श्लोक को पढिये:
क:खगीघाङ्चिच्छौजाझाञ्ज्ञोSटौठीडढण:।
तथोदधीन पफर्बाभीर्मयोSरिल्वाशिषां सह।।
अर्थात: पक्षियों का प्रेम, शुद्ध बुद्धि का, दूसरे का बल अपहरण करने में पारंगत, शत्रु-संहारकों में अग्रणी, मन से निश्चल तथा निडर और महासागर का सर्जन करनार कौन? राजा मय! जिसको शत्रुओं के भी आशीर्वाद मिले हैं।

श्लोक को ध्यान से पढ़ने पर आप पाते हैं की संस्कृत वर्णमाला के सभी 33 व्यंजन इस श्लोक में दिखाये दे रहे हैं वो भी क्रमानुसार। यह खूबसूरती केवल और केवल संस्कृत जैसी समृद्ध भाषा में ही देखने को मिल सकती है!

पूरे विश्व में केवल एक संस्कृत ही ऐसी भाषा है जिसमें केवल एक अक्षर से ही पूरा वाक्य लिखा जा सकता है, किरातार्जुनीयम् काव्य संग्रह में केवल “न” व्यंजन से अद्भुत श्लोक बनाया है और गजब का कौशल्य प्रयोग करके भारवि नामक महाकवि ने थोडे में बहुत कहा है-

न नोननुन्नो नुन्नोनो नाना नानानना ननु।
नुन्नोऽनुन्नो ननुन्नेनो नानेना नुन्ननुन्ननुत्॥
अर्थात: जो मनुष्य युद्ध में अपने से दुर्बल मनुष्य के हाथों घायल हुआ है वह सच्चा मनुष्य नहीं है। ऐसे ही अपने से दुर्बल को घायल करता है वो भी मनुष्य नहीं है। घायल मनुष्य का स्वामी यदि घायल न हुआ हो तो ऐसे मनुष्य को घायल नहीं कहते और घायल मनुष्य को घायल करें वो भी मनुष्य नहीं है। वंदेसंस्कृतम्!

एक और उदहारण है:
दाददो दुद्द्दुद्दादि दादादो दुददीददोः
दुद्दादं दददे दुद्दे ददादददोऽददः
अर्थात: दान देने वाले, खलों को उपताप देने वाले, शुद्धि देने वाले, दुष्ट्मर्दक भुजाओं वाले, दानी तथा अदानी दोनों को दान देने वाले, राक्षसों का खण्डन करने वाले ने, शत्रु के विरुद्ध शस्त्र को उठाया।

है ना खूबसूरत? इतना ही नहीं, क्या किसी भाषा में केवल 2 अक्षर से पूरा वाक्य लिखा जा सकता है? संस्कृत भाषा के अलावा किसी और भाषा में ये करना असम्भव है। माघ कवि ने शिशुपालवधम् महाकाव्य में केवल “भ” और “र ” दो ही अक्षरों से एक श्लोक बनाया है। देखिये –

भूरिभिर्भारिभिर्भीराभूभारैरभिरेभिरे
भेरीरे भिभिरभ्राभैरभीरुभिरिभैरिभा:।
अर्थात- निर्भय हाथी जो की भूमि पर भार स्वरूप लगता है, अपने वजन के चलते, जिसकी आवाज नगाड़े की तरह है और जो काले बादलों सा है, वह दूसरे दुश्मन हाथी पर आक्रमण कर रहा है।

एक और उदाहरण:
क्रोरारिकारी कोरेककारक कारिकाकर।
कोरकाकारकरक: करीर कर्करोऽकर्रुक॥
अर्थात- क्रूर शत्रुओं को नष्ट करने वाला, भूमि का एक कर्ता, दुष्टों को यातना देने वाला, कमलमुकुलवत, रमणीय हाथ वाला, हाथियों को फेंकने वाला, रण में कर्कश, सूर्य के समान तेजस्वी [था]।

पुनः क्या किसी भाषा मे केवल तीन अक्षर से ही पूरा वाक्य लिखा जा सकता है? यह भी संस्कृत भाषा के अलावा किसी और भाषा में असंभव है!
उदहारण
देवानां नन्दनो देवो नोदनो वेदनिंदिनां
दिवं दुदाव नादेन दाने दानवनंदिनः।
अर्थात- वह परमात्मा [विष्णु] जो दूसरे देवों को सुख प्रदान करता है और जो वेदों को नहीं मानते उनको कष्ट प्रदान करता है। वह स्वर्ग को उस ध्वनि नाद से भर देता है, जिस तरह के नाद से उसने दानव [हिरण्यकशिपु] को मारा था।

अब इस छंद को ध्यान से देखें इसमें पहला चरण ही चारों चरणों में चार बार आवृत्त हुआ है, लेकिन अर्थ अलग-अलग हैं, जो यमक अलंकार का लक्षण है। इसीलिए ये महायमक संज्ञा का एक विशिष्ट उदाहरण है
विकाशमीयुर्जगतीशमार्गणा विकाशमीयुर्जतीशमार्गणा:।
विकाशमीयुर्जगतीशमार्गणा विकाशमीयुर्जगतीशमार्गणा:॥
अर्थात- पृथ्वीपति अर्जुन के बाण विस्तार को प्राप्त होने लगे, जबकि शिवजी के बाण भंग होने लगे। राक्षसों के हंता प्रथम गण विस्मित होने लगे तथा शिव का ध्यान करने वाले देवता एवं ऋषिगण (इसे देखने के लिए) पक्षियों के मार्गवाले आकाश-मंडल में एकत्र होने लगे।

जब हम कहते हैं की संस्कृत इस पूरी दुनिया की सभी प्राचीन भाषाओं की जननी है तो उसके पीछे इसी तरह के खूबसूरत तर्क होते हैं। यह विश्व की अकेली ऐसी भाषा है, जिसमें “अभिधान- सार्थकता” मिलती है अर्थात् अमुक वस्तु की अमुक संज्ञा या नाम क्यों है, यह प्रायः सभी शब्दों में मिलता है।

नीम बच जाएगा

हर साल पौधारोपण होता है और कुछ ही पौधे वृक्ष बन पाते है। ऐसे में हरे पेड़ को काट कर पर्यावरण को नुकसान पहुंचाने को लेकर रची गई संदेश परक कहानी है। शिक्षिका की तरह सभी नागरिक जागरूक बने और हरे पेड़ों को काटने से रोकथाम में अपना सहयोग करें यही कहानी का समाज को सार्थक संदेश है, पढ़िए कहानी……………
विद्यालय में बड़ी गहमागहमी है। समाजोपयोगी उत्पादक कार्य का शिविर चल रहा है। आज सफाई का दिन है। इंचार्ज महोदय परिसर के बीचों -बीच खड़े अपनी रोबीली आवाज में छात्रों को निर्देश दे रहे हैं। छात्र कागज और टहनियाँ चुन रहे हैं। इंचार्ज स्थानीय हैं और विद्यालय पर उनका पूरा प्रभुत्व है।
“चलो, आज इन पेड़ों की छंटाई भी कर देते हैं, बहुत फैल गए हैं।” उन्होंने कहा तो छात्र झटपट भण्डार से कुल्हाड़ियाँ ले आये। कुल मिलाकर विद्यालय के उदासीन वातावरण में नवीन ऊर्जा का संचार हो गया। बिना नख- दंत के वृद्ध सिंह की तरह अपने कक्ष में बैठे रहने वाले प्रधानाचार्य जी भी बाहर निकल आये और दीवारों पर पड़े पुताई के छींटों को साफ करवाने में जुट गये। वह भी छात्रों के साथ प्रयोगशाला की सफाई करने चली गयी। कुछ समय बाद जब वह बाहर आई तो वहां का दृश्य देखकर दंग रह गयी।
एक लड़का बरामदे से सटे एक तरुण पेड़ के तने पर कुल्हाड़ी से वार कर रहा था। उसके पैर स्वतः ही उस दिशा में दौड़ गये,
“अरे.. अरे..  यह क्या हो रहा है? क्यों इस पेड़ को काट रहे हो?” वह चिल्लाई तो लड़के के हाथ रुक गये।
“अरे काट, काट क्यों रुक गया। ” वे अपनी दबंग आवाज में बोले। लड़के ने सहम कर उसकी तरफ देखा तो उन्होंने उसके हाथ से कुल्हाड़ी छीन ली और स्वयं पूरी शक्ति से पेड़ के तने पर प्रहार करने लगे। वह पेड़ के आगे खड़ी हो गई।
“मैडम, पेड़ के आगे से हटो, नहीं तो यह आप पर गिरेगा।” वे धृष्टता से बोले और लगातार उनके प्रहार जारी रहे। वह बदहवास सी वहाँ खड़े अन्य शिक्षकों से याचना करती रही।
“यह बिलकुल हरा पेड़ है, इसको कटने से कोई तो रोको… ”
बिना एक शब्द बोले सब निर्लिप्त भाव से अपने कामों में लगे रहे। उसको कुछ नहीं सूझा तो उसने एक पत्रकार को सूचना दे दी। घंटे भर में तहसीलदार साहब की गाड़ी विद्यालय में आ गयी। सारा का सारा स्टाफ उनका स्वागत करने बढ़ा।
“क्या बात है भाई, कौन सा पेड़ काट दिया? हमें सूचना मिली है…”
“हे हे, देखिये यह पेड़ है। विद्यालय की दीवार को क्षति पहुंचा रहा था तो हमने काट दिया। वैसे भी यह सूखने ही वाला था।” चापलूसी हंसी के साथ इंचार्ज बोले।
“किसने दी पेड़ के काटने की सूचना?” तहसीलदार साहब ने पूछा।
“जी, मैंने।” वह धीमी आवाज में बोली।
“यह जंगली पेड़ शिरीष है। इसको काटने के लिए अनुमति की आवश्यकता नहीं होती।” वे उसको घूर कर बोले।  “जी, इतना जानती हूँ कि किसी भी हरे पेड़ को काटना अपराध है।” उसने विनम्रता से कहा।
“आपको ज्यादा पता है या मुझे?” वे दहाड़े।
“हम तो एक जरूरी मीटिंग में थे। ऊपर से फोन आया तो हमें कार्यवाही करने आना पड़ा।” वे तल्खी से बोले।
“जब्त कर लो पेड़ को।” वे साथ आये कर्मचारी की तरफ मुखातिब हुए। परिसर में कुर्सियां लग गयीं। चाय -नाश्ता आ गया।
“अब देखिये हम भी क्या करें, ऊपर से फोन आ गया तो आना ही पड़ा। लिखवाइए, क्या लिखवाना है…”
“हे हे लिखिए, पेड़ की टहनियाँ टूट -टूट कर गिरती थीं, बच्चों को नुकसान पहुँच सकता था। पेड़ में बीमारी लग गयी थी……”
“अब देखिये न सर, यह ग्राउंड में नीम का पेड़। परेड वाले दिन बहुत बुरा लगता है जब बीच में आता है। उस दिन एडीएम् साहब से कहा था मैंने, तो बोले- कटवाने की अनुमति तो नहीं दे सकता। धीरे दृधीरे काटकर खत्म दो..  हे हे हे।”
“नहीं, नहीं। नीम का पेड़ मत काटना। यदि ऊपर से कार्यवाही हुई तो हम भी कुछ नहीं कर पाएंगे। इस पेड़ की क्षतिपूर्ति के लिए भी आठ- दस नए पेड़ लगवा देना।”
“जी, बिलकुल सर।” गाड़ी लौट गयी।
विद्यालय का स्टाफ उससे कट गया था। स्टाफ सदस्य की शिकायत करने का गंभीर अपराध उससे हुआ था। एक सप्ताह में उसे व्यवस्थार्थ बालिका विद्यालय में भेज दिया गया। जाते -जाते उसने देखा कि बीच परिसर खड़ा वह नीम का कद्दावर पेड़ अपनी शाखाएं फैलाये उसे दुलार रहा था। भले ही अब शिरीष के पीले फूल उसकी गोद में नहीं झरेंगे। पर उम्मीद है कि नीम बच जायेगा।
लेखिका परिचयः सुप्रसिद्ध विज्ञान कथा लेखिका कोटा ( राज.)

दूरदर्शन पर शुरू होगा ‘दामिनी 2.0’

मराठी टेलीविजन के इतिहास में एक बार फिर ‘दामिनी’ की गूंज सुनाई देने वाली है। मराठी टीवी का पहला डेली सोप ओपेरा ‘दामिनी’ अब अपने सीक्वल ‘दामिनी 2.0’ के रूप में जल्द ही टेलीविजन पर प्रसारित किया जाएगा।

‘दामिनी’ का निर्माण गौतम अधिकारी (अब दिवंगत) और मार्कंड अधिकारी ने ‘श्री अधिकारी ब्रदर्स’ के बैनर तले किया था। इसका निर्देशन कांचन अधिकारी ने किया था। यह शो करीब 9 साल तक चला और 1500 से ज्यादा एपिसोड पूरे करते हुए दर्शकों के बीच बेहद लोकप्रिय हुआ था।

अब इसका सीक्वल ‘दामिनी 2.0’ दूरदर्शन सह्याद्री वाहिनी द्वारा तैयार किया जा रहा है। इसे भी स्वयं कांचन अधिकारी ने लिखा और निर्देशित किया है।

तीन दशक बाद इस प्रतिष्ठित शो की वापसी पर मीडिया जगत के दिग्गज मार्कंड अधिकारी ने खुशी जताई। उन्होंने कहा, ‘मुझे बहुत प्रसन्नता है कि दूरदर्शन केंद्र, मुंबई ने ‘दामिनी’ की विरासत को आगे बढ़ाने का निर्णय लिया है। ‘दामिनी 2.0’ का निर्माण किया जा रहा है और कांचन स्वयं इसे लिख और निर्देशित कर रही हैं।’

इसके साथ ही उन्होंने कहा, ‘श्री अधिकारी ब्रदर्स’ ने पिछले चार दशकों में भारतीय दर्शकों के लिए कई यादगार कार्यक्रम बनाए हैं और आज भी यह हर घर का जाना-पहचाना नाम है। हमारी अगली पीढ़ी रवि और कैलाश इस परंपरा को आगे बढ़ा रहे हैं और आज के दर्शकों की पसंद के मुताबिक कंटेंट तैयार कर रहे हैं। मैं ‘दामिनी 2.0’ को वही सफलता और लोकप्रियता मिलने की कामना करता हूं, जो मूल ‘दामिनी’ को मिली थी।’

डॉ.कृष्णा कुमारी की सद्य प्रकाशित पुस्तक “बात -बात ख़ुश्बूदार” का लोकार्पण सम्पन्न

अणुव्रत विश्व भारती, कोबा, अहमदाबाद मे आयोजित त्रिदिवसीय लेखक सम्मेलन में डॉ. कृष्णा कुमारी की निबन्ध-कृति “बात बात ख़ुश्बूदार” का लोकार्पण एक भव्य समारोह में सम्पन्न हुआ। कार्यक्रम के मुख्य अथिति श्रीमान पी. के. लहरी साहब (आई. ए. एस.), पूर्व मुख्य सचिव, गुजरात रहे। अध्यक्षता, अविनाश नाहर, निवर्तमान अध्यक्ष, अणुव्रत विश्व भारती ने अंजाम दी तथा विशिष्ट अतिथि जिनेन्द्र कुमार कोठारी (संयोजक, अणुव्रत लेखक मंच), सन्तोष सुराणा, सम्पादक, नूतन भाषा सेतु पत्रिका (अहमदाबाद) थे।

मुनि श्री डॉ मदन कुमार ने अपने अनौपचारिक वार्तालाप में कहा कि ‘बात-बात खुश्बूदार’ सुन्दर-पठनीय पुस्तक है जो संस्कार निर्माण, मानवता का सन्देश, नैतिक मूल्यों की सम्वाहक, स्वस्थ-सुन्दर समाज निर्माण में उल्लेखनीय भूमिका निभाने वाली है, ऐसी पुस्तकों वर्तमान परिस्थितियों में महती आवश्यकता है। डॉ. कुसुम लूनिया एवं कैलाश बोराणा उपाध्यक्ष, अणुव्रत विश्व भारती, मनोज सिंघवी महामन्त्री, अणुव्रत विश्व भारती की कार्यक्रम में गरिमामय उपस्थित रही।

अणुव्रत लेखक सम्मेलन के अंतर्गत आयोजित इस समारोह में संयोजक श्रीमान जिनेन्द्र कुमार कोठारी जी की अथक साधना, समर्पण विशेष उल्लेखनीय रहा। सभी साहित्यकारों ने प्रसन्नता व्यक्त करते हुए कृष्णा कुमारी को हार्दिक शुभकामनायें, एवं बधाई दी।

कार्यक्रम अणुव्रत अनुशास्ता आचार्यश्री महाश्रमण जी के सान्निध्य व मुनिश्री मनन कुमार जी के मार्गदर्शन में सुसम्पन्न हुआ। कार्यक्रम का संचालन श्री प्रकाश तातेड़ साहब, सह सम्पादक, ‘बच्चों का देश’ पत्रिका ने किया। उल्लेखनीय है कि कृष्णा कुमारी की चौदह पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं। अन्त में डॉ. कृष्णा कुमारी ने सभी उपस्थित विद्व जनों के प्रति आभार प्रकट किया।

मानवीय मूल्यों का विकास

आज के आधुनिक समाज को आईना दिखाती यह कहानी बच्चों में दान, दया, करुणा, उदारता जैसे मानवीय मूल्यों का विकास कर एक अच्छा इंसान बनने की प्रेरणा देती है। समाज को सोचना होगा बच्चों का भौतिक विकास ही पर्याप्त नहीं है वरन हमें उनमें मानवीय गुणों का भी विकास करना होगा। पढ़िए कहानी…………..

एक गांव में एक गरीब ब्राह्मण रहता था, नाम था तुलसीराम। उनके तीन बेटे थे सीताराम, राधेश्याम, रास बिहारी। ब्राह्मण बहुत मेहनती और ईमानदार था। दिनभर की मेहनत से जो कुछ मिल जाता था, उसी से उनके घर का ख़र्च चलता था। तीनों बेटे दिन भर इधर-उधर टाइम पास करते थे, पर कोई काम नहीं करते थे, इस बात से तुलसीराम बहुत दुःखी रहते थे।

एक बार उन्होंने अपने बेटों की परीक्षा लेने की बात सोची। उन्होंने बीमार होने का नाटक किया और तीनों को बुलाकर कहा – आज तुम लोग घर के लिए कुछ कमाकर लाओ।
तीनों ने एक स्वर में कहा – जी, पिताजी! और तीनों बेटे कुछ पैसे लेकर कमाने के लिए निकल गए।

बड़े बेटे ने अपने पास जमा पैसे से कुछ फल खरीदे, कि इन्हें बेच कर कुछ पैसे कमाऊंगा, पर शाम तक उसके फल नहीं बिके।

दूसरा लड़का मजदूरी की सोच कर गया, पर शाम तक उसको कोई काम नहीं मिला, जो पैसे घर से लेकर गया था, उतने ही पैसे लेकर लौटा।

तीसरा लड़का बाजार की ओर जा रहा था, कि उसे रास्ते में कुछ संन्यासी जाते हुए दिखे, जो कई दिन से भूखे थे। उसने सबको भोजन करवाया और ओढ़ने के लिए वस्त्र दिए। संन्यासियों ने उसे बहुत सारा आशीर्वाद दिया।

शाम को तीनों लड़के घर लौटकर आए और पिता को अपनी कमाई के बारे में बताया। बड़े बेटे ने बड़े दुःखी होकर बताया कि उसका एक भी फल नहीं बिका, जो पैसे लेकर गया था, वह और ख़र्च हो गए।

दूसरे लड़के ने भी दुःखी होकर कहा – मैं शाम तक मजदूरी के लिए इंतजार करता रहा पर, मुझे कोई काम नहीं मिला।

तीसरे पुत्र से पिता ने पूछा – तुम क्या कमाकर लाए हो? उसने कहा, मैं कुछ कमाकर तो नहीं लाया, पर मुझे कुछ संन्यासी भूखे मिले, मेरे पास जो पैसे थे उनसे मैंने उन्हें भोजन करवाया और ओढ़ने के लिए वस्त्र ख़रीद दिए, जिससे वे संन्यासी बहुत संतुष्ट हुए और उन्होंने मुझे बहुत सारा आशीर्वाद दिया। बस आज की मेरी यही कमाई है।

पिता ने गंभीरता से सबकी बात सुनी और बड़े पुत्र से कहा – बस मैं अपने पुत्रों को यही शिक्षा देना चाहता था। अगर तुम वाणी में मिठास और व्यवहार में सरलता लाओगे, तो तुम्हारे पत्थर भी बिक जाएंगे। पर अगर कठोरता से बात करोगे, तो आते हुए ग्राहक भी लौट जाएंगे।

दूसरे पुत्र से कहा – अगर तुम ये सोचोगे कि कोई घर आकर तुम्हें काम देगा, तो तुम्हें कभी काम नहीं मिलेगा। काम ढूंढने के लिए मेहनत करनी होगी, तब काम मिलेगा।

तीसरे पुत्र से कहा – तुम पैसा तो बहुत कमा सकते हो, पर दान, दया, करुणा, उदारता जैसे मानवीय मूल्यों का संरक्षण कैसे कर सकते हो, यह तुम्हारे व्यवहार से पता चलता है। यही मनुष्य होने की असली पहचान है।

वर्तमान समय में भी हमें यह सोचना है कि हम अपने बच्चों को डॉक्टर, इंजीनियरिंग, उद्योगपति, नेता, आई.ए.एस अफसर तो बना रहे हैं परंतु क्या अच्छा इंसान भी बना रहे हैं? संवेदनशील मनुष्य बना रहे हैं?

भौतिकता के इस युग में मानवीय मूल्यों का संरक्षण और विकास वर्तमान समय की महती आवश्यकता है।

विश्वास का वैश्विक सेतु और व्यापारिक समरसता का आधार

विश्व मानक दिवस- 14 अक्टूबर, 2025

विश्व मानक दिवस प्रत्येक वर्ष 14 अक्तूबर को मनाया जाता है। यह दिवस उस अदृश्य व्यवस्था का उत्सव है जो हमारे जीवन, उद्योग, व्यापार और सुरक्षा की गुणवत्ता को सुनिश्चित करती है। मानकीकरण केवल कोई तकनीकी प्रक्रिया नहीं है, बल्कि यह विश्वसनीयता, सुरक्षा, पारदर्शिता और आपसी सहयोग की ऐसी बुनियाद है जो मानव जीवन की सहजता और स्थिरता का आधार बनती है। इस दिवस का उद्देश्य यह स्मरण कराना है कि किसी भी उत्पाद, सेवा या व्यवस्था की उपयोगिता तभी टिकाऊ और भरोसेमंद हो सकती है जब उसमें निर्धारित मानक और गुणवत्ता की कसौटी कायम हो। विश्व मानक दिवस उन हजारों विशेषज्ञों और कर्मयोगियों को सम्मान देने का भी अवसर है जो अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं में बैठकर विश्व के हित में ऐसे मानक तय करते हैं और अंतर्राष्ट्रीय मानकों के निर्माण और कार्यान्वयन में सक्रिय भागीदारी निभाते हैं। इसका उद्देश्य अंतर्राष्ट्रीय व्यापार और सुरक्षा के साथ-साथ जीवन की गुणवत्ता को बेहतर बनाने में मानकीकरण की भूमिका पर ज़ोर देना है, जो सबके लिए समान हों, निष्पक्ष हों और मानवता की सुरक्षा और प्रगति के लिए हों।

यह दिवस 1946 में हुई पहली बैठक की याद में मनाया जाता है, जिसमें 25 देशों के प्रतिनिधि लंदन में एक अंतरराष्ट्रीय संगठन की स्थापना के लिए एकत्र हुए थे, जो मानकीकरण पर अपने प्रयासों को केंद्रित करेगा। हालाँकि अगले वर्ष अंतर्राष्ट्रीय मानकीकरण संगठन का गठन किया गया था, लेकिन पहला विश्व मानक दिवस 1970 में ही मनाया गया। विश्व मानक दिवस का उद्देश्य जनता को अंतर्राष्ट्रीय बाज़ार में मानकों की महत्वपूर्ण भूमिका के प्रति जागरूक करना है। अर्थात् स्वास्थ्य सेवा से लेकर तकनीक तक, लगभग हर क्षेत्र के उत्पादों और सेवाओं में सुरक्षा, विश्वसनीयता और गुणवत्ता। 2025 की थीम ‘सहयोग’ है, जो प्रगति को संभव बनाने के लिए साझेदारी के महत्व को दर्शाती है। यह सहयोग की शक्ति और इस विश्वास का प्रमाण है कि हम अपने-अपने हिस्सों के योग से भी अधिक शक्तिशाली हैं। साथ मिलकर काम करके, हम लोगों को स्थिरता की चुनौतियों का सीधा सामना करने के लिए वास्तविक समाधानों से सशक्त बना रहे हैं।

इसके अतिरिक्त, भारतीय मानक ब्यूरो ने इस वर्ष की थीम को ‘सतत विकास लक्ष्यः लक्ष्य प्राप्ति में सामूहिक साझेदारी’ के रूप रखा है। एक बेहतर विश्व निर्माण के लिए साझा दृष्टिकोण का विशेष महत्व है, इस दिवस को मनाने का लक्ष्य उद्योग, नवाचार और बुनियादी ढांचे पर विशेष ध्यान देना और उपभोक्ताओं, नियामकों और उद्योग के बीच मानकीकरण के महत्व के बारे में जागरूकता बढ़ाना है।

आज जब वैश्वीकरण, तकनीकी तीव्रता, जलवायु परिवर्तन, स्वास्थ्य संकट और आपूर्ति श्रृंखला जैसी जटिल चुनौतियाँ सामने हैं, तब मानकीकरण का महत्व पहले से कहीं अधिक बढ़ गया है। मानक ही वह भाषा हैं जिनसे विश्व के देश एक-दूसरे को समझ पाते हैं। जब कोई वस्तु या सेवा एक निश्चित मानक के अनुरूप होती है, तो उसे किसी भी देश में स्वीकार किया जा सकता है। इससे व्यापार सहज होता है, उपभोक्ता का भरोसा बढ़ता है और देशों के बीच परस्पर निर्भरता मजबूत होती है। यही कारण है कि मानकीकरण को विश्व व्यापार की आत्मा कहा जाता है। इससे केवल आर्थिक लाभ नहीं होता, बल्कि यह जीवन की गुणवत्ता, सुरक्षा और पर्यावरणीय संतुलन को भी सुनिश्चित करता है।

विश्व मानक दिवस के इस सन्देश के विपरीत आज की राजनीति में कई बार ऐसे कदम उठाए जा रहे हैं जो विश्व व्यापार और आपसी सहयोग की भावना को कमजोर करते हैं। अमेरिका के वर्तमान राष्ट्रपति ट्रम्प द्वारा अपनाई जा रही अतिशयोक्ति पूर्ण टैरिफ नीति इसका उदाहरण है। उन्होंने राष्ट्रीय सुरक्षा और प्रतिस्पर्धा के नाम पर आयातित वस्तुओं पर भारी शुल्क लगाकर एक प्रकार से व्यापार युद्ध का वातावरण बना दिया है। यह नीति केवल व्यापारिक हितों को नहीं बल्कि वैश्विक संतुलन को भी प्रभावित कर रही है। टैरिफ की यह दीवारें देशों के बीच अविश्वास बढ़ाती हैं, कीमतों में वृद्धि करती हैं और आपूर्ति श्रृंखला को असंतुलित करती हैं। आयातित वस्तुओं की लागत बढ़ने से उपभोक्ताओं को अधिक कीमत चुकानी पड़ती है, उद्योगों की उत्पादन लागत बढ़ती है और अंतरराष्ट्रीय व्यापार की गति धीमी पड़ जाती है।

विश्व व्यापार संगठन ने पहले ही चेताया है कि ऐसी टैरिफ नीतियाँ वैश्विक व्यापार वृद्धि को घटा रही हैं और निवेशकों में अस्थिरता पैदा कर रही हैं। टैरिफ केवल कर या शुल्क नहीं होते, वे राष्ट्रों के बीच विश्वास का संकेत भी होते हैं। जब कोई देश बार-बार अपने आर्थिक हितों की आड़ में ऊँचे शुल्क लगाता है, तो अन्य राष्ट्र प्रतिकार के रूप में अपने दरवाज़े बंद करने लगते हैं। परिणाम यह होता है कि जो विश्व पहले एक साझा बाज़ार की ओर बढ़ रहा था, वह फिर से सीमाओं और अविश्वास की जंजीरों में बँधने लगता है। ऐसे में विश्व मानक दिवस यह सन्देश देता है कि दुनिया को जोड़ने का वास्तविक माध्यम व्यापारिक शुल्क नहीं बल्कि मानकीकरण है।

मानक देशों को एक साझा धरातल प्रदान करते हैं, जहाँ उत्पादों की गुणवत्ता और सुरक्षा का विश्वास इतना मजबूत होता है कि किसी अतिरिक्त शुल्क या रोक की आवश्यकता ही नहीं पड़ती। मानकीकरण दरअसल विश्वास का पुल है जो सीमाओं के आर-पार लोगों, वस्तुओं और विचारों को जोड़ता है। जब एक देश दूसरे देश के मानकों को स्वीकार करता है, तो यह आपसी सम्मान और पारदर्शिता का प्रतीक होता है। इसी प्रक्रिया से अंतरराष्ट्रीय व्यापार में सरलता आती है, सुरक्षा और गुणवत्ता की गारंटी मिलती है और उपभोक्ता हित सुरक्षित रहते हैं। मानकीकरण की यह प्रक्रिया न केवल औद्योगिक या व्यापारिक है बल्कि यह मानवीय भी है। इसके मूल में समानता, निष्पक्षता और सहयोग की भावना निहित है। यह वह दर्शन है जो कहता है कि विश्व एक परिवार है और सबकी भलाई में ही अपनी भलाई है। अतः जब कोई राष्ट्र टैरिफ या प्रतिबंधों की दीवार खड़ी करता है, तो वह इस वैश्विक परिवार के बीच विभाजन की रेखा खींचता है। मानक उन रेखाओं को मिटाते हैं और संबंधों को जोड़ते हैं।

आज आवश्यकता इस बात की है कि मानकीकरण केवल औद्योगिक मंच तक सीमित न रहे, बल्कि यह अंतरराष्ट्रीय नीति का भी आधार बने। विश्व के सभी देश मानकों के निर्धारण में समान भागीदारी करें ताकि कोई भी राष्ट्र या कंपनी इस प्रक्रिया पर वर्चस्व न जमा सके। छोटे और विकासशील देशों को भी अंतरराष्ट्रीय मानक संस्थाओं में समान अवसर मिले ताकि वे अपने उत्पादों और सेवाओं के माध्यम से वैश्विक व्यापार में समान रूप से शामिल हो सकें। इसके साथ ही प्रमाणन प्रक्रिया को सरल और सुलभ बनाना आवश्यक है ताकि छोटे उद्योग भी मानक के अनुरूप अपने उत्पादों को विश्व स्तर पर प्रस्तुत कर सकें। विश्व मानक दिवस हमें यह स्मरण कराता है कि मानवता की प्रगति केवल आर्थिक शक्ति में नहीं बल्कि उस सहयोग और विश्वास में है जो मानकीकरण के माध्यम से संभव होता है। अतिशयोक्ति पूर्ण टैरिफ जैसी नीतियाँ क्षणिक राजनीतिक लाभ तो दे सकती हैं, पर वे विश्व के समन्वित विकास और आपसी विश्वास को नष्ट करती हैं।

इसलिए आवश्यक है कि सभी राष्ट्र मानकीकरण की भावना को अपनाएँ और विश्व व्यापार को किसी प्रतिस्पर्धा या प्रतिशोध का माध्यम न बनाकर साझेदारी और साझा उन्नति का माध्यम बनाएँ।
मानकीकरण ही वह अदृश्य तंतु एवं बुनियादी आधार है जो दुनिया को एकजुट रखता है। यह न केवल उत्पादन और व्यापार में गुणवत्ता लाता है बल्कि जीवन के हर क्षेत्र में विश्वसनीयता और सुरक्षा का भाव जगाता है। विश्व मानक दिवस इस विचार का प्रतीक है कि जब तक हम समान मानकों और साझा मूल्यों से नहीं जुड़ते, तब तक विश्व की एकता अधूरी है। इसलिए इस दिवस पर यह संकल्प लिया जाना चाहिए कि हम ऐसी नीतियों से दूर रहें जो विभाजन उत्पन्न करें, और मानकीकरण की उस साझा राह पर चलें जो सबके लिए विश्वास, सुरक्षा और समृद्धि का मार्ग प्रशस्त करती है। संपूर्ण मानक प्रणाली सहयोग पर आधारित है।

(ललित गर्ग)
लेखक, पत्रकार, स्तंभकार
ई-253, सरस्वती कंुज अपार्टमेंट
25 आई. पी. एक्सटेंशन, पटपड़गंज, दिल्ली-92
फोनः 22727486, 9811051133