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राष्ट्रवादी हिंदू विचारधारा नहीं, हमारी सोच राष्ट्रभक्ति की है

बहुत कम लोग भारत में यह जानते हैं इस समय, विशेष कर कुशिक्षा के प्रभाव से आधुनिक हिंदू इस विश्व विदित सत्य को बहुत कम जानते हैं कि राष्ट्रवाद यानी नेशनलिज्म नाम की वस्तु केवल पौने 200 वर्ष पहले पहली बार यूरोप में कल्पित हुई।

इसके पहले वहां नेशनलिजम जैसी कोई चीज उनके इतिहास में ही नहीं थी क्योंकि कोई नेशन स्टेट ही वहाँ कभी नही था। इलाके थे, छोटी छोटी रियासत थी और state थे। यूरोप का पहला नेशन स्टेट है Germany जो 1870 मे बिस्मार्क ने 300 रियासतों को बल पूर्वक मिला कर बनाया। इंग्लैंड भी उसके बाद ही नेशन स्टेट क्रमशः बना है। उसके पहले इंग्लैंड कोई नेशन स्टेट नहीं था। जो अंग्रेज यहां आते थे वह व्यक्तिगत हैसियत से आते थे।

1858 में भी जब वहां के क्राउन ने भारत क्षेत्र के एक अंश की भूमि पर अपना प्रभुत्व स्थापित करने का कार्य किया तो वह कोई इंग्लैंड नामक राष्ट्र का भारत नामक राष्ट्र पर आक्रमण नहीं था। हस्तक्षेप भी राष्ट्र का नहीं था। केवल राजा रानी और उनकी सेना की एक टुकड़ी का था। तब तक इंग्लैंड में कोई स्टैंडिंग आर्मी नहीं थी और कोई नेशनल आर्मी उनकी नहीं थी। 300 से अधिक हिंदू राजाओं से संधि करके संधि पत्र पर दोनों ओर से हस्ताक्षर करने के बाद वे यहां आए थे और इस बात की घोषणा विक्टोरिया की ओर से भारत में जगह-जगह 1 नवंबर 1858 को की गई थी। तब तक उनका मुख्यालय कोलकाता था। दिल्ली नहीं।

तो कोलकाता में और प्रयाग एवं मुंबई मद्रास में भी तथा कुछ अन्य शहरों में यह विक्टोरिया की घोषणा सार्वजनिक रूप से पढ़ी गई कि अपने मित्र राजाओं के साथ हुए करार के अनुसार ही हम रहेंगे। हम उनकी सीमा मे कोई हस्तक्षेप नहीं करेंगे, उनके उत्तराधिकार के नियमों में कोई हस्तक्षेप नहीं करेंगे और उनसे आशा है कि वह अपनी सेना भेज कर हमारी सीमा में कब्जा नहीं करेंगे यानी भारत में जिस हिस्से पर हमारा कब्जा है, उसमें बलपूर्वक प्रवेश नहीं करेंगे और उससे कुछ हमसे छीनेंगे नहीं।

इंग्लैंड की रानी की यह घोषणा थी और भारत के राजाओं ने इंग्लैंड की रानी को वचन दिया था कि भारत के जिस हिस्से पर आप कब्जा कर रहे हैं, उस हिस्से को हम आपसे छीनेंगे नहीं। हम अपने राज्य में रहेंगे। आप अपने इलाके में रहिये। आपको भगा रहे राजाओं की जागीरें आपकी हैं। उनको जीतने मे हमारी मदद रही है।

अंग्रेजों के मित्र हिंदू व मुस्लिम परिवारों में से कुछ बच्चे जब इंग्लैंड पढ़ने गए और यूरोप में नेशनलिज्म शब्द का अचानक बढ़ता प्रभाव और चारों ओर फैल रही चर्चा पढ़ी और सुनी, तब उन्होंने भारत में इस शब्द का प्रयोग शुरू किया।

उसके पूर्व कंपनी के ही कुछ लोगों से सुनकर और अंग्रेजी साहित्य पढ़कर उस समय बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय ने जगदंबा दुर्गा के एक रूप विशेष की तरह भारत माता की काव्यप्रतिमा और छवि प्रस्तुत की और बहुत ही सशक्त रचना वंदे मातरम में उनका भावना से भरा स्मरण और वर्णन एवं वंदन किया। उन दिनों संपूर्ण देश में राष्ट्रभक्ति की बात ही हो रही थी। भारत माता की भक्ति, राष्ट्र की भक्ति, यही शब्द प्रयुक्त होते थे। नेशनलिज्म शब्द को उसी राष्ट्र भक्ति का पर्याय मानकर श्री अरविंद आदि ने पहली बार प्रयोग किया लेकिन हिंदी में राष्ट्रभक्ति शब्द ही चलता रहा।

भारत में तो शास्त्रो में राष्ट्रवाद शब्द का कभी कोई प्रयोग हुआ ही नहीं है। यहां राष्ट्र की भक्ति, भारत माता की भक्ति की ही बात होती रही है।

वाद तो एक पंथ प्रवर्तन की प्रक्रिया हो सकती हैं। कोई वास्तविक आदर्श या लक्ष्य नहीं। भारत में जो भी व्यक्ति राष्ट्रवादी है वह तत्वतः अहिंदू है और इस अर्थ में वस्तुतः वह अभारतीय हैं यद्यपि वह निश्चित ही इंडियन है। यह जानना चाहिए।

(लेखक एतिहासिक व राष्ट्रवादी विचारों पर शोधपूर्ण लेख लिखते हैं)

‘वीणा’ पत्रिका के शताब्दी समारोह का शुभारंभ

इंदौर। भारतीय जन संचार संस्थान (आईआईएमसी) के पूर्व महानिदेशक प्रोफेसर संजय द्विवेदी का कहना है कि साहित्यिक पत्रकारिता ने समाज को विचारशील बनाकर मूल्य,विवेक और संस्कृति की रक्षा की है।

वे श्री मध्य भारत हिंदी साहित्य समिति, इंदौर में ‘वीणा’ पत्रिका के शताब्दी वर्ष समारोह का शुभारंभ कर रहे थे। इस मौके पर उन्होंने ‘वीणा’ के 99 वें वर्ष के पहले अंक का लोकार्पण भी किया। कार्यक्रम में प्रो.द्विवेदी को ‘वीणा सर्जना सम्मान’ से सम्मानित भी किया गया। मुख्य अतिथि की आसंदी से प्रो.द्विवेदी ने कहा कि जब हिंदी पत्रकारिता 200 वर्ष पूरे करने जा रही है, ऐसे में वीणा की सौ वर्ष की यात्रा बहुत महत्वपूर्ण हो जाती है। वीणा न सिर्फ गुजरे वक्त की गवाह है, वरन हमारी भाषा के विकास, साहित्य, संस्कृति और कलाओं का इतिहास इसने दर्ज किया है। उन्होंने कहा कि ‘वीणा’ की मधुर ध्वनि साहित्य के प्रांगण में अप्रतिम उपस्थिति है। इस पत्रिका ने बिना शोर-शराबे के जो किया है, उसका मूल्यांकन किया जाना शेष है। प्रोफेसर द्विवेदी ने कहा कि साहित्यिक पत्रकारिता हमारे समय के सच को बयान करती है और समाज को संबल देती है। उनके मुताबिक हिंदी के व्यापक प्रचार के मूल में साहित्यिक पत्रकारिता का ही योगदान है, जिसके कारण भाषा में हर विषय की अभिव्यक्ति का आत्मविश्वास आया। उन्होंने कहा कि साहित्यिक पत्रकारिता ने हिंदी भाषा को गंभीरता, गहराई और भरोसा दिया है। साथ ही जनांदोलनों से जुड़कर सामाजिक बदलाव का भी बड़ा काम किया है।

देश भर में होंगे आयोजन:
पत्रिका के संपादक डॉ.राकेश शर्मा ने वीणा के योगदान और इतिहास-विकास की चर्चा करते हुए बताया कि शताब्दी समारोह में देश भर में अनेक आयोजन किए जाने की योजना है। इसमें साहित्य, संस्कृति और कलाओं को समर्पित विभूतियों का सम्मान भी किया जाएगा।
कार्यक्रम में श्री मध्य भारत हिंदी साहित्य समिति के कार्यकारी प्रधानमंत्री घनश्याम यादव, साहित्यकार सूर्यकांत नागर, डा.वसुधा गाडगिल, अंतरा करवड़े, डा. पद्मा सिंह, ज्योति जैन, गरिमा संजय दुबे, योगेन्द्र नाथ शुक्ल, सदाशिव कौतुक, प्रभु त्रिवेदी, मुकेश तिवारी, अर्पण जैन, अरविंद ओझा, चंद्रभान भारद्वाज सहित इंदौर के साहित्य प्रेमी उपस्थित रहे।

छठ महापर्वः एक अवलोकन

प्रतिवर्ष कार्तिक शुक्लपक्ष की चतुर्थी से सप्तमी तक पवित्र नदी,तालाब,पोखर,जलाशय और जलकुण्ड के तट  पर छठ महापर्व मनाया जाता है।यह चार दिवसीय  कठोरतम महापर्व नहाय-खाय, खरना,अस्ताचलगामी सूर्यदेव को प्रथम सायंकालीन अर्घ्य अर्पण तथा चौथे दिवस भोर में उदीयमान सूर्यदेव को भोर के अंतिम अर्घ्य अर्पण के साथ संपन्न होता है।

2025 का छठ महापर्व आगामी 25-28 अक्टूबर को है।यह  चार दिवसीय कठोरतम व्रत  आरोग्यमुक्ति, मनोवांछित मनोकामना पूर्ति,जीवन में असाधारण कामयाबी तथा पारिवारिक सुख-शांति व समृद्धि प्रदान करता है।

इस चार दिवसीय महापर्व में प्रत्यक्ष देवता सूर्य भगवान,उनकी बहन छठ परमेश्वरी,जल और वायु की पूजा होती है।

प्राप्त पुष्ट जानकारी के अनुसार छठ महापर्व के मनाने का आरंभ बिहार प्रदेश से हुआ था जहां के पवित्र गंगातट पर पहली बार सामूहिक छठ महापर्व मनाया गया था।इसका प्रत्यक्ष प्रमाण है उलार्क सूर्य मंदिर,पटना,सूर्यमंदिर औरंगाबाद,सूर्यमंदिर गया ,सूर्यमंदिर नालंदा,सूर्यमंदिर बेलाउर,सूर्यमंदिर नवादा हंडिया और सूर्यमंदिर  कंदाहा जहां पर छठ महापर्व मनाया जाता है। अब तो बिहार के सभी जिलों में छठ महापर्व मनाया जाता है।

गौरतलब है कि औरंगाबाद के सूर्यमंदिर में तो चार दिवसीय महापर्व के आयोजन से संबंधित सभी संसाधन उपलब्ध हैं। जैसेः सूर्यमंदिर, पुष्करिणी,छठ का घाट,पूजा की सभी पूजनसामग्रि,चार दिनों तक ठहरे आदि की उत्तम व्यवस्था आदि।यही कारण है कि देश-विदेश के सैकड़ों छठव्रतधारी आकर उस मंदिर के प्रांगण में ठहरते हैं और पूरी आस्था और विश्वास के साथ चार दिवसीय छठ महापर्व मनाते हैं।

सूर्योपासन से पौराणिक आस्था भी जुड़ी हुई है। भगवान श्रीराम और माता सीता ने भी छठ पूजन किया था। महाभारत काल में कुंती ने भी संतान प्राप्ति के लिए छठ व्रत किया था। इसीलिए उनका पुत्र कर्ण सूर्यदेव का बहुत बड़ा भक्त था।द्रौपदी ने भी छठव्रत किया था। प्रियवंद नामक एक भक्त ने पुत्र प्राप्ति के लिए पहली बार छठ व्रत किया था।

मान्यतानुसार महर्षि दुर्वासा ने जब श्रीकृष्ण पुत्र साम्ब पर क्रोधित होकर उसे कुष्ठ होने का शाप दे दिया तब  श्रीकृष्ण ने अपने पुत्र साम्ब को यह सलाह दी कि वह ओड़िशा के कोणार्क सूर्यमंदिर में सूर्यपूजनकर वह शापमुक्त हो सकता है और साम्ब ने वही किया और सूर्योपासनाकर कुष्ठ रोग से मुक्त हुआ।

गौरतलब है कि भारत में सूर्यमंदिर गुजरात के मोढेरा में,उत्तराखण्ड के कटारमल में,कुमाऊं में,राजस्थान के रणकपुर में,असम के पहर में,उत्तरप्रदेश के प्रतापगढ़ में,कश्मीर के मार्तंड में,यूपी के महोबा में, मध्यप्रदेश के रहली,सागर में ,राजस्थान के झालावाड़ में,झारखण्ड के रांची के पहाडी पर और हिमाचलप्रदेश के  नीरथ में निर्मित हैं जहां पर सूर्योपासना होती है और कमोबेस चार दिवसीय छठ महापर्व भी मनाया जाता है।

ओड़िशा प्रदेश के राउरकेला, पारादीप, ताल्चर, कटक,जटनी,ब्रह्मपुर,संबलपुर,बरगढ़,बालेश्वर और भद्रक आदि शहरों में यह छठ महापर्व लगभग 1930 के दशक से ही पूरी लोक आस्था तथा विश्वास के साथ मनाया जा रहा है। भुवनेश्वर में पहले केदारगौरी, चिंतामणीश्वर मंदिर, सीआरपीएफ समूह केन्द्र में यह महापर्व मनाया जाता था लेकिन अब तो पिछले लगभग तीन दशकों से पवित्र कुआखाई नदी तट तथा पिछले चार वर्षों से स्थानीय मंचेश्वर,बालीयात्रा मैदान के समीप कुआखाई पवित्र नदी तट पर यह महापर्व बिस्वास नामक पंजीकृत संस्था द्वारा मनाया जाता है।

छठ महापर्व का प्रसाद ठेकुआ है जिसे छठ के घाट पर छठ व्रत के अंतिम दिवस भोर में छठव्रतियों वितरित किया जाता है। अब तो ओड़िशा की राजधानी भुवनेश्वर और व्यापारी नगरी कटक में छठ के ठेकुआ प्रसादग्रहण करने की लालसा यहां के लोगों में सबसे अधिक होती है।

चार दिवसीय छठ महापर्व भारतीय जनमानस को व्यक्तिगत स्वच्छता,पाकशाला की साफ-सफाई,घर-आंगन की साफ-सफाई,आस-पड़ोस की साफ-सफाई,स्वदेसी अन्न-फल जैसेः गेहूं,गन्ना,गाय का दूध-घी,केला,कन्दफल,बड़ा नींबू, शरीफा, अनानास,पूर्णफल नारियल,मूली और पानी सिंघाड़ा आदि ग्रहण करने का संदेश देता है।फलस्वरुप भारत के सभी मेट्रो सिटी में भी यह चार दिवसीय छठ महापर्व पूरी आस्था तथा विश्वास के साथ मनाया जाता है।

छठ की पौराणिक,आध्यात्मिक और लौकिक मान्यता  को स्वीकार करते हुए भारत के यशस्वी प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी ने यूएन से छठ को विश्व धरोहर के रुप में मान्यता प्रदान करने की सिफारिश की है।

(लेखक भुवनेश्वर में रहते हैं और ओड़िशा की सामाजिक, सांस्कृतिक, धार्मिक व साहित्यिक गतिविधियों पर नियमित लेखन करते हैं) 

प्रोफेसर पूरन चंद टंडन अनुवाद साहित्यश्री पुरस्कार’ से सम्मानित हुए दिनेश कुमार माली

कोटा  / निर्मला स्मृति साहित्यिक समिति चरखी दादरी हरियाणा द्वारा प्रेरणा साहित्य एवं शोध संस्थान कुरुक्षेत्र एवं हरियाणा साहित्य एवं संस्कृति अकादमी पंचकूला के सयुंक्त तत्वावधान में अंतरराष्ट्रीय हिंदी साहित्य उत्सव, सम्मान एवं पुरस्कार तथा पुस्तक लोकार्पण का आयोजन प्रेरणा साहित्य एवं शोध संस्थान सभागार में किया गया। निर्मला स्मृति साहित्यिक समिति द्वारा देश विदेश के 85 साहित्यकारों, अनुवादकों एवं चिंतकों को सम्मानित किया गया।

सरस्वती वंदना तथा मंचासीन गणमान्यों द्वारा दीप प्रज्ज्वलन के साथ कार्यक्रम का शुभारंभ हुआ। हरियाणा साहित्य एवं संस्कृति अकादमी के निदेशक डॉ धर्मदेव विद्यार्थी की अध्यक्षता में मुख्य अतिथि पद्मश्री प्रो. रवींद्र कुमार मेरठ, प्रो. नरेश मिश्र रोहतक, प्रो. पूरनचंद टण्डन, प्रो लालचंद गुप्त मंगल, प्रो. बाबूराम कुरुक्षेत्र, डॉ मधुकांत, डॉ जयभगवान सिंगला, प्रो पवन अग्रवाल, प्रो सुशील कुमार, डॉ. संजय अनंत दुबई की उपस्थिति में  साहित्यकारों, हिंदी सेवियों को सम्मानित किया गया। निर्मला समिति अध्यक्ष डॉ अशोक कुमार मंगलेश ने सभी अतिथियों, साहित्यकारों का अभिनंदन एवं स्वागत किया।

प्रो. नरेश मिश्र ने अपने बीज व्यक्तव्य में हिंदी पखवाडे की शुभकामना देते हुए कहा कि हिंदी के भाषावैज्ञानिक एवं वर्ण व्यवस्था पर प्रकाश डाला। प्रो. रवींद्र कुमार ने कहा हिंदी के विकास में अनुवाद की महत्ती भूमिका है तथा वर्तमान में पूरा विश्व हिंदी को लेकर जागरूक है और हिंदी एशिया महादेश में सबसे बड़ी भाषा है। प्रो. लालचंद मंगल ने ऐतिहासिक नगरी कुरुक्षेत्र की विशेषताओं को चरितार्थ करते हुए हिंदी साहित्य के इतिहास पर व्याख्यान दिया। प्रो पूरनचंद टण्डन ने हिंदी का मतलब भारत की संस्कृति तथा भारतीय चिंतन और आर्थिक विकास का सशक्त माध्यम अनुवाद को बताया। प्रो बाबूराम ने अनुवाद को साहित्य का मेरुदंड कहा तथा हिंदी भाषा को बाजार की सबसे बड़ी भाषा कहा। डॉ धर्मदेव विद्यार्थी ने हरियाणवी लोक साहित्य और हरियाणवी को भाषा बनाने पर बल देते हुए अकादमी की योजनाओं पर प्रकाश डाला। हिंदी और क्षेत्रीय भाषाओं के अनुवाद पर बोलते हुए डॉ अशोक कुमार मंगलेश ने कहा कि अनुवाद दो भाषाओं का ही नहीं, अपितु दो संस्कृतियों का होता है। नई शिक्षा नीति के तहत क्षेत्रीय भाषाओं के अनुवाद को बल मिला है। हमें भारतीय भाषाओं के प्रति निष्ठा एवं प्रेम को प्रदर्शित करना होगा जिसका सशक्त माध्यम अनुवाद है। वर्तमान में हरियाणवी और अन्य क्षेत्रीय बोलियों पर प्रचुर मात्रा में सृजन और अनुवाद कार्य हो रहा है। डॉ मधुकांत ने हिंदी और हरियाणवी साहित्य सृजन की श्रेष्ठता पर प्रकाश डाला, डॉ जयभगवान सिंगला ने बताया कि हिंदी पूरे विश्व को जोड़ने वाली श्रेष्ठ भाषा है, यह कार्यक्रम इसका प्रमाण है।

मंच से डॉ रवींद्र कुमार को निर्मला अंतरराष्ट्रीय हिंदी सेवा सम्मान, प्रो पूरनचंद टण्डन को अंतरराष्ट्रीय भारत भारती हिंदी साहित्य सम्मान, प्रो लालचंद गुप्त मंगल को  प्रो अमृतलाल मदान, प्रो बाबू राम एवं डॉ रमाकांता को आजीवन हिन्दी साहित्य साधना सम्मान के साअथ-साथ ‘प्रो पूरनचंद टण्डन अनुवाद साहित्यश्री सम्मान’ से हिन्दी के प्रसिद्ध आलोचक और ओडिया से हिन्दी के अनुवादक  दिनेश कुमार माली को सम्मानित किया गया। इस अवसर पर दिनेश कुमार माली की इंक पब्लिकेशन्स, प्रयागराज से प्रकाशित पुस्तक ‘दिग्गज साहित्यकारों से सारस्वत आलाप’ एवं नमन प्रकाशन, नई दिल्ली से प्रकाशित पुस्तक ‘शहीद बिका नाएक की खोज’ का भी विमोचन हुआ। कार्यक्रम का मंच संचालन मनोज गौतम का रहा तथा संयोजन समिति से आशा सिंगला, रेणु खुग्गर, सुशीला शर्मा, डॉ सविता शर्मा, सुरेखा, ममता गर्ग, ऋचा गौतम आदि का सहयोग रहा।

मानसिक स्वास्थ्य है रोगमुक्त जीवन की मुस्कान

विश्व मानसिक स्वास्थ्य दिवस- 10 अक्टूबर, 2025

विश्व मानसिक स्वास्थ्य दिवस हर वर्ष हमें यह सोचने का अवसर देता है कि मनुष्य का सबसे बड़ा धन उसका मन है, और जब मन अस्वस्थ होता है तो समूचा जीवन बिखर जाता है। इस वर्ष की थीम है संकट और आपात स्थितियों में मानसिक स्वास्थ्य सेवाओं की पहुँच सुनिश्चित करना। यह थीम प्राकृतिक आपदाओं या अन्य आपात स्थितियों के दौरान लोगों के मानसिक स्वास्थ्य की जरूरतों को पूरा करने और आवश्यक सेवाएं प्रदान करने पर केंद्रित है, जो मानसिक स्वास्थ्य समर्थन तक पहुंच की बाधाओं को दूर करने और संकटग्रस्त लोगों के लिए प्रभावी सहायता तंत्र स्थापित करने के महत्व को रेखांकित करती है। आज दुनिया ऐसी परिस्थितियों से गुजर रही है जहाँ महामारी, युद्ध, आर्थिक संकट, सामाजिक अस्थिरता, बेरोजगारी और जलवायु परिवर्तन जैसी घटनाएँ लगातार मनुष्य के मन पर चोट कर रही हैं। इन आपदाओं के बीच मानसिक स्वास्थ्य की समस्या एक मौन महामारी बन गई है। भारत में यह चुनौती और भी बड़ी है क्योंकि यहाँ मानसिक स्वास्थ्य को लेकर जागरूकता कम है और कलंक अधिक। मानसिक स्वास्थ्य दिवस सभी के लिए है-यह वर्ष के 365 दिन महत्वपूर्ण है, लेकिन 10 अक्टूबर दुनिया भर के सभी लोगों के लिए मानसिक स्वास्थ्य के मुद्दों पर शिक्षा और जागरूकता बढ़ाने हेतु एकजुट होने का एक अवसर है। यह सभी को अधिक समझ और सहानुभूति के माध्यम से अपने और दूसरों के मानसिक स्वास्थ्य की देखभाल करने के लिए प्रोत्साहित करता है।

आज का युग आभासी दुनिया का युग है। मोबाइल, इंटरनेट, सोशल मीडिया और डिजिटल साधनों ने हमारे जीवन को जितना आसान बनाया है, उतना ही जटिल भी। आभासी संबंधों ने संवाद के नए मार्ग खोले हैं, परंतु भावनाओं की सच्चाई को खोखला कर दिया है। हम हर समय आभासी दुनिया से जुड़े रहते हैं, लेकिन भीतर से अत्यंत अकेले हो गए हैं। दूसरों के सुख और सफलता के प्रदर्शन से तुलना और हीनता की भावना बढ़ती जा रही है। इस निरंतर प्रतिस्पर्धा और प्रदर्शन ने लोगों के मन में चिंता, अवसाद और असंतोष को गहरा कर दिया है। सोशल मीडिया का अति प्रयोग मनुष्य को कल्पना और भ्रम की दुनिया में धकेल रहा है, जहाँ असली जीवन की सादगी और आत्मीयता खोती जा रही है। युवा पीढ़ी सबसे अधिक मानसिक दबाव में है। प्रतिस्पर्धा, परीक्षा, करियर और परिवार की अपेक्षाएँ उन्हें उस स्तर तक पहुँचा रही हैं जहाँ असफलता आत्मघाती कदमों में बदलने लगी है। अनेक अध्ययन बताते हैं कि आत्महत्या करने वालों में सबसे बड़ी संख्या किशोरों और युवाओं की है। वे जीवन से नहीं, अपनी असफलता से भागना चाहते हैं, परंतु संवादहीनता, समझ की कमी और मानसिक परामर्श की अनुपलब्धता उन्हें अंधकार की ओर धकेल देती है। युवा जीवन में ऊर्जा और आशा के प्रतीक हैं, लेकिन जब उन पर अपेक्षाओं का बोझ हावी हो जाता है, तब वही ऊर्जा विनाशकारी रूप ले लेती है। परिवार और समाज को चाहिए कि वे उन्हें समझें, संवाद करें, उनके मन की सुनें, और उन्हें यह विश्वास दें कि असफलता अंत नहीं है, बल्कि आगे बढ़ने का अवसर है।

महिलाओं की स्थिति भी कम कठिन नहीं है। घर और बाहर की दोहरी जिम्मेदारियों, सामाजिक बंधनों और लैंगिक भेदभाव ने उनके मानसिक स्वास्थ्य को गहरे रूप से प्रभावित किया है। घरेलू हिंसा, उत्पीड़न और सामाजिक असमानता की स्थितियाँ उन्हें भीतर से तोड़ देती हैं। फिर भी वे समाज की धुरी बनी रहती हैं। उन्हें मानसिक रूप से सशक्त बनाना, उनके लिए सुरक्षित वातावरण और परामर्श की सुविधाएँ उपलब्ध कराना समय की सबसे बड़ी आवश्यकता है। जब महिलाएँ स्वस्थ और संतुलित मन से कार्य करेंगी, तभी समाज स्वस्थ दिशा में आगे बढ़ सकेगा। इसी तरह वृद्धों का जीवन भी मानसिक स्वास्थ्य के मामले में अधिक जटिल होता जा रहा है। आत्महत्या की बढ़ती घटनाएँ एक चेतावनी हैं कि हम किसी बड़ी भूल के शिकार हैं। यह केवल व्यक्ति की समस्या नहीं, बल्कि पूरे समाज का दर्पण है। जब कोई व्यक्ति यह मानने लगता है कि अब उसके जीवन का कोई अर्थ नहीं बचा, तब उसकी आत्मा में आशा का दीप बुझ जाता है। उसे बचाने के लिए आवश्यक है कि हम उसके पास जाएँ, उसकी बात सुनें, उसे यह एहसास दिलाएँ कि वह अकेला नहीं है। समाज, परिवार, शिक्षण संस्थान और सरकार सभी को मिलकर ऐसा वातावरण बनाना होगा जहाँ निराश व्यक्ति के लिए तुरंत सहायता उपलब्ध हो।

मानसिक स्वास्थ्य सेवाएँ गाँव-गाँव तक पहुँचें, स्कूलों और कार्यस्थलों में परामर्श केंद्र स्थापित हों, यह समय की पुकार है। नशा मानसिक अस्वास्थ्य का सबसे बड़ा सहचर बन चुका है। शराब, तंबाकू, मादक पदार्थ, यहाँ तक कि दवाओं के दुरुपयोग ने मनुष्य की चेतना को कुंद कर दिया है। नशा अस्थायी आनंद देता है, परंतु दीर्घकालिक विनाश का कारण बनता है। यह व्यक्ति की आत्मनियंत्रण शक्ति को नष्ट कर देता है, निर्णय क्षमता को कमजोर करता है और अवसाद तथा आत्महत्या की प्रवृत्ति को बढ़ाता है। नशे की लत से ग्रस्त व्यक्ति समाज से कट जाता है और उसकी आत्मा में एक गहरा शून्य भर जाता है। इस समस्या का समाधान केवल दंड से नहीं, बल्कि संवेदनशील पुनर्वास और मानसिक परामर्श से संभव है। समाज को नशे के दुष्प्रभावों के प्रति शिक्षित करना और युवाओं को इसके जाल से बचाना हर घर की जिम्मेदारी होनी चाहिए। मानसिक अस्वस्थता से जूझ रहे व्यक्ति को सबसे पहले आवश्यकता होती है आशा की। निराशा की अंधेरी सुरंग में यदि कोई हाथ थाम ले, यदि कोई मुस्कान दे दे, यदि कोई कह दे कि सब ठीक हो जाएगा, तो वही वाक्य जीवनदान बन सकता है। आत्महत्या की रोकथाम का आरंभ संवेदनशील संवाद से होता है। हमें अपने बच्चों, मित्रों, सहकर्मियों और परिवारजनों से यह रिश्ता बनाना होगा कि वे अपने मन की बात कह सकें, बिना किसी भय या लज्जा के।

आज का हर व्यक्ति तनावग्रस्त है। तनाव उनको होता है, जो निरंतर मन, वाणी और शरीर की प्रवृत्ति में लगे रहते हैं, विश्राम नहीं करते। यानी कि आज की भाषा में जो ‘बिजी’ रहते हैं। बिजी रहने की इस आदत ने जीवन में बहुत टेंशन पैदा किए हैं। जीवन में बिजी के साथ ईजी होना जरूरी है क्योंकि एक पहिए से रथ नहीं चलता। उसके लिए दोनों पहिए चाहिए। ज्ञान और ध्यान, काम और आराम- ये जीवन रूपी रथ के दो पहिए हैं। एक पहिए को निकाल देंगे तो रथ नहीं चलेगा। आज यही तो समस्या है और यही मानसिक अस्वास्थ्य की जड़ है। जीवन को एकांगी बनाया जा रहा है। इससे बहुत भारी समस्याएं पैदा हो रही हैं। मन की चंचलता का तो ज्यादा से ज्यादा इंतजाम किया जा रहा है, पर उसे स्थिर बनाने का कोई उपाय नहीं किया जा रहा है। समस्या स्थिरता में नहीं, चंचलता में होती है। बाहर का खोल जितना भी मजबूत हो, भीतर को साधे बिना चंचलता कम नहीं होती। ये भीतर की गांठें देर-सबेर उलझा ही देती हैं। आज आवश्यकता है कि हम मानसिक स्वास्थ्य को विलासिता नहीं, बल्कि आवश्यकता समझें। शरीर की बीमारी के लिए जैसे हम डॉक्टर के पास जाते हैं, वैसे ही मन की पीड़ा के लिए भी विशेषज्ञ सहायता लेना सामान्य बने। मानसिक स्वास्थ्य शिक्षा को विद्यालयों में जोड़ा जाए, परामर्श केंद्रों को सशक्त किया जाए, और हर नागरिक को यह संदेश दिया जाए कि सहायता लेना कमजोरी नहीं, बल्कि साहस का प्रतीक है।

विश्व मानसिक स्वास्थ्य दिवस केवल एक दिन का उत्सव नहीं, बल्कि चेतना का पर्व है। यह हमें याद दिलाता है कि स्वस्थ मन ही स्वस्थ समाज का आधार है। हमें निराशा से आशा की ओर, अकेलेपन से अपनत्व की ओर और अस्वस्थता से संतुलन की ओर बढ़ना है। मनुष्य की सबसे बड़ी ताकत उसका मन है, और जब मन शांत, स्थिर और प्रसन्न होगा, तभी जीवन भी सुंदर होगा। इसलिए आइए, हम सभी मिलकर यह संकल्प लें कि हम अपने और दूसरों के मन की सेहत का ध्यान रखेंगे, संवाद करेंगे, सहयोग करेंगे और हर उस व्यक्ति के लिए आशा का दीप जलाएँगे जो अंधेरे में भटक रहा है। यही इस दिवस का सच्चा संदेश और जीवन का शाश्वत सार है।

प्रेषकः
(ललित गर्ग)
लेखक, पत्रकार, स्तंभकार
ई-253, सरस्वती कंुज अपार्टमेंट
25 आई. पी. एक्सटेंशन, पटपड़गंज, दिल्ली-92
फोनः 22727486, 9811051133

पत्रकार-संपादक मामाजी माणिकचंद्र वाजपेयी के जयंती प्रसंग पर विश्व संवाद केंद्र में विशेष व्याख्यान का आयोजन

पत्रकारों को चरणबद्ध ढंग से गढ़ते थे मामाजी

भोपाल। मामाजी पत्रकारों को चरणबद्ध ढंग से गढ़ते थे।पत्रकारिता के साथ वे जीवन के संस्कार भी सिखाते थे। उन्होंने हमेशा अपने उदाहरण से पत्रकारिता और लोक आचरण सिखाया। यह विचार वरिष्ठ पत्रकार गिरीश उपाध्याय ने प्रख्यात संपादक मामाजी माणिकचंद्र वाजपेयी के जयंती प्रसंग पर विश्व संवाद केंद्र, मध्यप्रदेश की ओर से आयोजित विशेष व्याख्यान में व्यक्त किए। कार्यक्रम का आयोजन शिवाजी नगर स्थित माणिकचंद्र वाजपेयी सभागार, विश्व संवाद केंद्र में 7 अक्टूबर को किया गया। इस अवसर पर अतिथि के रूप में गिरीश जोशी उपस्थित रहे और अध्यक्षता लाजपत आहूजा ने की।

‘मामाजी माणिकचंद्र वाजपेयी और पत्रकारिता का वर्तमान परिदृश्य’ विषय पर अपने विचार व्यक्त करते हुए गिरीश उपाध्याय ने कहा कि एक पत्रकार को समाचार पत्र के प्रकाशन की सम्पूर्ण जानकारी हो, इसकी चिंता वे करते थे। उन्होंने मुझे सबसे पहले समाचार पत्र के तकनीकी कार्य सिखाये। उसके बाद उन्होंने इंदौर के सबसे बड़े सांस्कृतिक आयोजन अनंत चतुर्दशी के चल समारोह का कवरेज करने की जिम्मेदारी दी, जिसके माध्यम से एक शहर को, उसकी संस्कृति को, जनमानस के उल्लास और आनंद के स्रोत को जानने का अवसर मिला। श्री गिरीश उपाध्याय जी ने अपने अनुभव सुनाते हुए कहा कि मैं शिक्षक बनने के लिए भोपाल आया था लेकिन बाद में स्वदेश के साथ जुड़ गया। मुझे भोपाल से इंदौर में मामाजी के पास भेजा गया। उनके सान्निध्य में मैंने पत्रकारिता सीखी। मेरी पत्रकारिता पर उनकी गहरी छाप है।

इस अवसर पर माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय में सहायक कुलसचिव एवं लेखक गिरीश जोशी ने कहा कि भारत में पत्रकारिता को गढ़ने वाले महापुरुषों में मामाजी माणिकचंद्र वाजपेयी का प्रमुख नाम है। पत्रकारिता में उनका ध्येय राष्ट्रहित था। आज भी मामाजी को हम स्मरण करते हैं क्योंकि उन्होंने पत्रकारिता के मूल्यों से समझौता नहीं किया। इसके साथ ही उन्होंने मानवीय मूल्यों को भी बढ़ावा दिया। समाचार पत्र में प्रूफ रीडिंग और कम्पोजिंग से लेकर संपादन तक सारे कार्य मामाजी कर लेते थे। श्री जोशी ने कहा कि मामाजी दूरदर्शी पत्रकार थे उन्होंने आपातकाल लगने से पहले ही अपने एक संपादकीय में इसकी आशंका व्यक्त कर दी थी। वे बड़े से बड़े विषय को पाठकों के बीच पहुंचाने के लिए समसामयिक उदाहरण देते थे। श्री जोशी ने कहा कि मामाजी ने स्वदेशी के महत्व पर बहुत पहले लिखा। उन्होंने कहा कि स्वदेशी केवल वस्तु तक सीमित नहीं है अपितु यह एक विचार है।

अध्यक्षीय उद्बोधन में विश्व संवाद केंद्र, मध्यप्रदेश के अध्यक्ष लाजपत आहूजा ने कहा कि मामाजी भिंड में निजी महाविद्यालय में संचालन की जिम्मेदारी संभाल रहे थे लेकिन नियति उन्हें पत्रकारिता में ले आयी। मामाजी जमीनी आदमी थे इसलिए जीवन की बुनियादी बातों को समझते थे। उन्होंने बताया कि विश्व संवाद केंद्र ने मामाजी की जन्मशती पर दिल्ली में समारोह का आयोजन किया। मामाजी और पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी का निकट का संबंध था। एक ध्येयनिष्ठ संपादक के रूप में अटल जी मामाजी का बहुत सम्मान करते थे। मामाजी ने जो शब्द लिखे, उन्हें जिया भी। मामाजी ने पत्रकारिता में नैतिकता के मापदंड भी प्रस्तुत किए। उन्होंने सेक्स स्कैंडल में फंसे एक नेता के चित्र छापने से इनकार कर दिया था क्योंकि उनका मानना था कि समाचार पत्र परिवारों में पढ़ा जाता है। आप निस्पृह संपादक थे।

कार्यक्रम में वाल्मीकि जयंती के प्रसंग पर महर्षि वाल्मीकि जी के चित्र पर पुष्पांजलि अर्पित कर उन्हें स्मरण किया गया। इसके साथ ही विश्व संवाद केंद्र के विशेषांक ‘कन्वर्जन का खेल : निशाने पर जनजातीय’ का विमोचन भी किया गया। विशेषांक का संपादन युवा पत्रकार एवं लेखक सुदर्शन व्यास ने किया है। कार्यक्रम का संचालन युवा पत्रकार अदिति रावत ने किया और आभार ज्ञापन न्यास के सचिव लोकेन्द्र सिंह ने किया।


विश्व संवाद केंद्र, भोपाल 
डी- 100 /45, शिवाजी नगर, भोपाल दूरभाष /फैक्स  :
0755-2763768*

पूर्व जनसंपर्क अधिकारी डॉ. सिंघल ने चलाया पर्यटन – संस्कृति जागरूकता अभियान

कोटा / विश्व पर्यटन दिवस के संदर्भ में संस्कृति, साहित्य,मीडिया फोरम, कोटा द्वारा नागरिकों में जागरूकता उत्पन्न करने के उद्देश्य से 10 दिवसीय “पर्यटन और संस्कृति जागरूकता अभियान” चलाया गया। इसके अंतर्गत सोशल मीडिया पर दस चरणों में 28 सितंबर से 7 नवंबर तक कला, संस्कृति, पर्यटन पर प्रश्नोत्तरी प्रतियोगिता का आयोजन किया गया। प्रतियोगिता में हाड़ोती, राजस्थान और देश के संदर्भ में कुल 160 प्रश्न पूछे गए थे जिनमें 75 प्रश्न फोटो पहचान ने संबंधित थे।

जागरूकता अभियान के संयोजक पूर्व संयुक्त निदेशक, सूचना एवं जनसंपर्क विभाग, राजस्थान डॉ. प्रभात कुमार सिंघल ने यह जानकारी देते हुए बताया कि प्रतियोगिता में राजस्थान, बिहार, उत्तरप्रदेश राज्यों के 161 प्रतिभागियों ने रूचि पूर्वक भाग लिया।

उन्होंने बताया प्रतियोगिता के समस्त चरणों में नियमित रूप से भाग ले कर सर्वाधिक 98 प्रतिशत प्रश्नों के उत्तर देने पर पूर्व मुख्य प्रबंधक स्टेट बैंक विजय माहेश्वरी सर्वोत्तम पुरस्कार के लिए चयन किया गया है। चरणबद्ध परिणाम में 30 प्रतिभागी प्रथम और 7 प्रतिभागी द्वितीय स्थान पर रहे। प्रथम स्थान पर कोटा के शमा फिरोज़, विजय कुमार शर्मा, फिरोज़ अहमद, इतिहासकार, एकता शर्मा, डॉ. शशि जैन, अख्तर खान अकेला, एडवोकेट, रीता गुप्ता ‘रश्मि’, राम मोहन कौशिक, रश्मि वैभव गर्ग, रेखा देवी एडवोकेट, रीता गुप्ता ‘रश्मि’, प्रज्ञा गौतम, श्यामा शर्मा, रेणु सिंह राधे, डॉ. संगीता देव, अंजना मनोज गर्ग, डॉ. इंदुबाला शर्मा, डॉ. वैदेही गौतम, डॉ. अपर्णा पाण्डेय, अर्चना शर्मा, डॉ. युगल सिंह, उदयपुर की डॉ. प्रियंका भट्ट, मुजफ्फरनगर, उत्तर प्रदेश की मोनिका गोयल, बूंदी की सुलोचना शर्मा, दीगोद के गौरव राठौड़, तीरथ बूंदी के दिलराज केवट, जयपुर की शोभा गोयल और अजमेर की रंजना माथुर रहें। द्वितीय स्थान पर भीलवाड़ा के प्रेम सोनी, बृज सुंदर सोनी, कोटा के संजू श्रृंगी, रेखा पंचोली, डॉ. सुशीला जोशी और बूंदी के सुमन लता रहें।

देहदान या अंगदान : मोक्ष और सम्मान साथ-साथ

दो दिन पहले हमारे परिवार के एक बुर्जुग की मृत्यु हो गई. मृत्यु प्रकृति की नियति है, यह होना ही था लेकिन वे मर कर भी अमर हो गए. जीते जी उन्होंने देहदान या अंगदान का निर्णय ले लिया था. इस बारे में परिजनों को चेता दिया था कि उनकी देह को आग में भस्म करने के बजाय अस्पताल को दान कर दिया जाए ताकि उनका शरीर किसी जरूरतमंद के काम आ सके. वे अकेले नहीं हैं. समय-समय पर अनेक लोग इस प्रकार देहदान या अंगदान कर स्वयं को जीवित कर लेते हैं. हमारे समक्ष महर्षि दधीची का उदाहरण है. पौराणिक कथा हम सबने सुना है कि महर्षि दधीची किस तरह अपनी अस्थियों का दान कर असुर वृत्रासुर को मारकर शांति का मार्ग प्रशस्त किया था.
महर्षि दधीची पृथ्वीलोक के निवासी थे. असुर को मारने का समय नहीं रहा लेकिन देहदान या अंगदान कर ऐसे व्यक्तियों को जीवित रखने का प्रयास कर सकते हैं जिससे समाज एवं परिवार का हित जुड़ा होता है. वर्तमान समय में इसी पृथ्वीलोक के निवासियों को देह की जरूरत है. एक ऐसे देह की जो निर्जीव हो चुका है लेकिन इसके बाद भी वह अनेक प्राणियों को जीवनदान दे सकता है. महर्षि दधीची से प्रेरणा लेकर हम देहदान या अंगदान की ओर प्रवृत्त होते हैं तो मरकर भी जिंदा रह सकते हैं. देहदान या अंगदान के लिए समाज को जागरूक करने का प्रयास किया जा रहा है. अब शिक्षित समाज यह समझने लगा है कि मृृत्यु के पश्चात भी मनुष्य के आर्गन दूसरे बीमार या मौत की दहलीज पर खड़े लोगों को जीवनदान दे सकते हैं. देहदान या अंगदान को लेकर समाज में वह खुलापन नहीं आया है.
भारतीय समाज में मोक्ष की अवधारणा बहुत पुरानी है. मिथक है कि मृत्यु के बाद सभी संस्कार किए जाने से ही मोक्ष की प्राप्ति होती है. अब यहां पर दर्शन के एक विद्यार्थी की तरह आपको सोचना होगा कि आखिर मोक्ष है क्या? एक मोटामोटी मान लेते हैं कि एक व्यक्ति औसतन 70 वर्ष की आयु पूर्ण करता है. अपनी योग्यता और व्यवहार से वह जीवन जीता है लेकिन जब उसे आवश्यकता होती है तो उसके पास दो व्यक्ति भी नहीं होते हैं. इसे क्या माना जाए? सीधी सी बात है कि जब आप पर आपका परिवार, मित्र और समाज भरोसा नहीं करते हैं तो मृत्यु उपरांत देह को अग्रि के हवाले करने से कौन सा मोक्ष मिल जाएगा? साधारण शब्दों में समझें कि मोक्ष का सीधा अर्थ है जीवित रहते हुए आपका परिवार, मित्रगण एवं समाज आप पर भरोसा करे और यही भरोसा मोक्ष कहलाता है. मैं अल्पज्ञानी हूँ और मुझे नहीं मालूम कि मृत्यु के उपरांत किसे मोक्ष की प्राप्ति हुई और किसने इसे बताया. तेरह दिनों के संस्कार के पश्चात आमतौर पर दिवगंत व्यक्ति विस्मृत कर दिया जाता है. मोक्ष की चाह है तो इसे आप देहदान या अंगदान के रूप में प्राप्त कर सकते हैं. यह बात मैं इसलिए कह रहा हूँ कि आज से दस वर्ष पहलेे जब मैं पचास की आयु पूर्ण कर चुका था, तब देहदान का घोषणा पत्र भरकर स्वयं को उऋण कर लिया था.
देहदान या अंगदान को थोड़ा व्यापक संदर्भ में समझना होगा. आज से पाँच दशक पहले मृत्यु उपरांत संस्कार उस समय की जरूरत होता था. अग्रि संस्कार के लिए चंदन की लकड़ी के उपयोग की जानकारी मिलती थी. फिर समय बदला और चंदन की लकड़ी मिलना बंद हुआ, मंहगाई बढ़ी और साधारण लकड़ी से दाह संस्कार किया जाने लगा. आज के दौर में पर्यावरण संरक्षण की दृष्टि से लकड़ी मिलना दिन-ब-दिन दुर्लभ होता जा रहा है और दाह संस्कार अब इलेक्ट्रॉनिक माध्यम से हो रहा है. पाँच-सात पहले अपने एक करीबी मित्र के भाई के देहांत के बाद दाह संस्कार में पहुँचा तो ज्ञात हुआ कि उनका दाह संस्कार इलेक्ट्रॉनिक माध्यम से किया जाएगा. महानगरों की बात छोड़ दें तो भोपाल और मेरे लिए निपट पहला अनुभव था. मन में उठते-गिरते विचारों के साथ दाहसंस्कार स्थल पर पहुँचा. आवाक रह गया. देह को लगभग जला देने वाली इलेक्ट्रिक उष्मा से पास खड़े लोग झुलस जाने का अनुभव कर रहे थे. एक लम्बा ट्रेनुमा फ्रेम में उन्हें रखा गया और चंद सेकंड में एक तेज आवाज़ के साथ उनके दाह संस्कार की क्रिया पूर्ण हुई. एकाध घंटे में बिजली उष्मा शांत होने पर फूल चुनने की विधि भी उसी समय पूरी कर ली गई. यह दृश्य दिल दहलाने वाला था.
पारम्परिक दाह संस्कार के उलट यह आधुनिक दाह संस्कार केवल औपचारिक लग रहा था. मन में दाह संस्कार का अर्थ वही रचा-बसा था जो दशकों से देखता चला आ रहा था. तब मन मेंं खयाल आया कि आज हम महर्षि दधीची नहीं हो सकते हैं लेकिन उनके बताये रास्ते पर चलकर देहदान या अंगदान कर समाज का कल्याण तो किया ही जा सकता है. यह एक प्रैक्टिल कदम भी होगा. सोचिए कि आज 2025 में हम जिस स्थिति में हैं, वही स्थिति दस या बीस साल बाद क्या होगी? क्या हम सब एक वस्तु की तरह बिजली के हवाले कर दिए जाएंगे? तब हमारी मोक्ष की अवधारणा क्या फलीभूत होगी? शायद नहीं इसलिए आवश्यक है कि सभी आयु वर्ग (नाबालिब बच्चों को छोड़ दें) तो देह दान का संकल्प ले लेना चाहिए. यह बात भी समझना चाहिए कि जो देहदान या अंगदान कर रहे हैं, वह समाज का काम तो आएगा ही, आपके परिजनों के लिए भी काम आ सकता है. एक अनुभव शेयर करना चाहूँगा. एक साल पहले मैं लीवर सिरोसीस का पेशेंट हो गया था. लीवर ट्राँसप्लांट करना जरूरी था. ऐसे में लीवर डोनेट करने वाले की जरूरत थी. तब मेरी बिटिया ने पूरे हौसले के साथ खड़ी होकर अपना लीवर मुझे डोनेट किया. आज मैं उसकी वजह से जिंदा हँू. यह भी तो एक किस्म का देहदान या अंगदान ही है. समय की जरूरत के अनुरूप हम सबको देहदान या अंगदान का संकल्प लेना चाहिए और यह भी मान लेना चाहिए कि जिंदा रहते घर-परिवार, मित्र और समाज आप पर भरोसा करे, यही मोक्ष है.
देहदान या अंगदान की दिशा में प्रेरित और प्रोत्साहित करने के लिए मध्यप्रदेश में अभिनव प्रयास किया गया है. मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव की परिकल्पना के अनुरूप  देहदान या अंगदान करने वाले व्यक्ति की मृत्यु के बाद पार्थिव शरीर को ‘गार्ड ऑफ़ ऑनर’ देकर अंतिम विदाई दी जाएगी साथ ही दान करने वाले व्यक्ति के परिवार के सदस्यों को 26 जनवरी और 15 अगस्त को सार्वजनिक रूप से सम्मानित किया जाएगा. इसके अतिरिक्त प्रदेश के सभी मेडिकल कॉलेजों में अंगदान व अंग प्रत्यारोपण की सुविधाओं की व्यवस्था की जाएगी. मध्यप्रदेश में इस अनुकरणीय प्रयास से समाज में देहदान या अंगदान के प्रति लोगों में जागरूकता बढ़ेगी. मध्यप्रदेश के इन प्रयासों को देश के अन्य राज्यों में भी बढ़ाये जाने की उम्मीद की जा सकती है क्योंकि इससे सरकार नहीं, समाज के लाभ का ध्येय है. मोक्ष के साथ सम्मान देने का यह भाव मध्यप्रदेश में ही हो सकता है क्योंकि मध्यप्रदेश यूं ही देश का ह्दय प्रदेश नहीं कहलाता है.
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार एवं मीडिया शिक्षा से संबद्ध हैं)

संघ शताब्दी वर्ष – एक स्वर्णिम सौभाग्य

डाक्टर हेडगेवार जी ने वर्ष 1925 विजयादशमी के पावन अवसर पर जिस राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का शुभारंभ किया गया था आज वह अपने शताब्दी वर्ष का उत्सव मना रहा है। संघ की यात्रा कई अवरोधों का सामना करते हुए कठिन संघर्ष, समाज की सतत सेवा तथा मातृ भूमि के प्रति सम्पूर्ण समर्पण के साथ इस पड़ाव  पर पहुंची  है। अनेकानेक स्वयंसेवकों के, “इदं राष्ट्राय इदं न मम” के भाव के साथ नि:स्वार्थ जीवन खपाने से ही   संघ शतायु होकर 101 वें वर्ष में प्रविष्ट हुआ है। संघ ऐसे लाखों स्वयंसेवकों वाला वटवृक्ष है जो अपना निजी जीवन त्याग कर समाज व राष्ट्र की सेवा में अपने आपको समर्पित कर देते हैं। संघ के शताब्दी वर्ष उत्सवों के आरम्भ में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने संघ की विकास गाथा का स्मरण करते हुए एक 100 रुपए का सिक्का तथा  एक डाक टिकट जारी किया। इस सिक्के पर भारत माता और स्वयंसेवकों का चित्रण है।

सामान्यतः जब कोई  संगठन अथवा संस्था 100 वर्ष पूर्ण करती है तो वह भव्य आयोजनों के माध्यम से अपनी प्रशस्ति गाथा गाती है किंतु राष्ट्रीय स्वयसेवक संघ ने ऐसा बड़ा आयोजन न करने का निर्ण्रय लिया और छोटे- छोटे कार्यक्रमों के माध्यम से समाज के प्रत्येक क्षेत्र व हिन्दू समाज के प्रत्येक घर तक पहुंचने का संकल्प लिया। इस हेतु सामाजिक सद्भाव बैठकों का आयोजन, व्यापक गृह संपर्क अभियान, हिंदू सम्मेलन,  प्रबुद्धजन गोष्ठी व युवा केंद्रित कार्यक्रमों  का आयोजन किया जाएगा और इनके माध्यम से संघ के विचारों का विस्तार किया जाएगा। शताब्दी वर्ष में इन कार्यक्रमों के माध्यम से राष्ट्र निर्माण के भाव एक नया प्रवाह दृष्टिगोचर होगा।

संघ की स्थापना अत्यंत कठिन समय में हुई थी जब एक ओर देश अंग्रेजों से लड़ रहा था और दूसरी ओर हिंदू समाज लम्बे समय से भिन्न भिन्न प्रकार से अपनी संस्कृति, संस्कार, ज्ञान, जीवन पद्धति पर हुए आक्रमणों के कारन अपना आत्मबोध खो चुका था, उसका  आत्मबल कुंठित था। राष्ट्रीयत्व की दीक्षा  देने के लिए हेडगेवार जी ने  संघ की स्थापना की। हिन्दू समाज को संगठित करने, उनका स्वाभिमान जगाने के उद्देश्य से संघ की स्थापना की गई। संघ ने अपनी यात्रा में कई उतार चढ़ाव देखे। बार-बार प्रतिबन्ध लगे और आवश्यकता होने पर बार-बार देश सेवा के लिए बुलाया भी संघ को ही गया ।

परम पूजनीय डॉक्टर केशव बलिराम हेडगेवार जी के बाद प.पू.माधव सदाशिव गोलवलकर (श्री गुरु जी), प.पू.बालासाहेब देवरस, प.पू.राजेंद्र सिंह ( रज्जू भैय्या), प.पू.के. एस. सुदर्शन जी और अब वर्तमान समय में प.पू.डॉक्टर मोहन भागवत जी के नेतृत्व में संघ एक सदानीरा नदी की भांति आगे बढ़ता हुआ हिन्दू समाज का भाव सिंचन कर  रहा है। संघ के सभी सर संघचालकों  ने संघ को नया आयाम  व विचार दिया है जिसके कारण आज संघ भारत के  घर -घर तक पहुँच गया है । संघ के सभी संघचालक अत्यंत योग्य व विद्वान महापुरुष थे जिनके मार्ग दर्शन में संघ ने राष्ट्र  व समाज में व्यापक सकारात्मक बदलाव लाने के प्रयास किए । व्यक्ति निर्माण से आरम्भ हुआ यह कार्य शताब्दी वर्ष मे पंच परिवर्तन का महाअभियान हाथ में लेकर आगे बढ़ रहा है।

श्री गुरु जी का कार्यकाल संघ के लिए अत्यंत विषम रहा था किंतु वह कभी भी विचलित नहीं हुए और उन्होंने संघ कार्य जारी रखा। उनके ही कार्यकाल में स्वयंसेवकों ने समाज जीवन के विविध क्षेत्रों में हिन्दुत्व का विचार पहुंचाने के लिए अनेक संगठनों की स्थापना की। बालासाहब देवरस अत्यंत कर्मठ थे। वह बहुत ही क्रांतिकारी व खुले विचारों वाले थे। बालासाहब छुआछूत, जातिभेद, खान-पान में विभिन्न प्रकार के बंधनों एवं रूढ़ियों  के घोर  विरोधी थे। सामाजिक समानता और समरसता से जुड़े सार्वजानिक कार्यक्रम बालासाहब के कार्यकाल से आरम्भ हुए। रज्जू भैय्या तथा सुदर्शन जी दोनों के कार्यकाल में  संघ का व्यापक विस्तार हुआ और नये स्वयंसेवक जुड़ने के साथ साथ नये आयाम भी जुड़े।

शताब्दी वर्ष में लिए गए पंच परिवर्तन संकल्प सामाजिक समरसता, कुटुंब प्रबोधन, स्वदेशी, पर्यावरण संरक्षण व नागरिक कर्तव्य हैं। इन संकल्पों को व्यवहार में लाने से समाज में व्यापक परिवर्तन आएगा। संघ का यह वर्ष त्याग, तप और राष्ट्र आराधन के साथ ही उसकी स्वर्णिम विरासत का वर्ष है।

आज समाज जीवन का कोई भी ऐसा क्षेत्र नहीं है जहां संघ का कोई न कोई स्वयंसेवक कार्य न कर रहा हो । संघ का स्वयंसेवक जहां पर भी होता है  उसका एक ही मूल मंत्र होता है और वह है -राष्ट्रप्रथम का का मूलमंत्र। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली वर्तमान सरकार भी राष्ट्र  प्रथम की भावना से ही कार्य करती है । वर्तमान समय में जब पूरे विश्व में राजनीतिक व आर्थिक स्तर पर उथल पुथल मची हुई है प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने आत्मनिर्भरता व स्वदेशी का मूल मंत्र दिया है जो  संघ का ही मूल मंत्र है। इसका उत्तर स्वदेशी और आत्मनिर्भरता ही है।

संघ शाखाओं के माध्यम से व्यक्ति निर्माण एक सतत प्रक्रिया है। संघ के कारण ही आज हिन्दू समाज अपने आप को हिन्दू कहने में गर्व का अनुभव कर रहा है।संघ के ही कारण हिन्दी, हिन्दू और हिन्दुस्तान की गूंज चारों ओर सुनाई दे रही है।संघ के कारण ही आज गोपाल की अवधारणा मजबूत हुई है। संघ के कारण हिंदू समाज का मतांतरण कम हुआ है और नई जागृति आई है। संघ की शाखाओं में गाए जाने वाले गीत प्रेरक व व नई उमंग भरने  वाले होते हैं। संघ की प्रार्थना भारत माता को समर्पित है।

संघ का एक ही ध्येय है – परम वैभवं नेतुत्मेतत स्वराष्ट्रं …….

प्रेषक – मृत्युंजय दीक्षित

फोन नं. – 9198571540

बदलाव एवं विकास की राह ताकता बिहार चुनाव

बिहार में चुनावी रणभेरी बज चुकी है। मतदान की तिथियों की घोषणा के साथ ही लोकतंत्र का यह महायज्ञ आरंभ हो चुका है, जिसमें करोड़ों मतदाता दो चरणों में दिनंाक 6 और 11 नवंबर को अपने मत के माध्यम से राज्य की दिशा और दशा दोनों तय करेंगे। इस बार का चुनाव सिर्फ सत्ता परिवर्तन का नहीं, बल्कि विचार और व्यवस्था परिवर्तन का चुनाव है। बिहार लंबे समय से जिस पिछड़ेपन, बेरोजगारी, भ्रष्टाचार और अराजकता की बेड़ियों में जकड़ा रहा है, उससे मुक्ति का यह अवसर है। 14 नवंबर को मतगणना के साथ बिहार में नई सरकार की तस्वीर सामने होगी, लेकिन राज्य में सियासत जिस तरह आकार ले रही है, मतदान तक कई उतार-चढ़ाव देखने को मिल सकते हैं। बिहार के राजनीतिक इतिहास पर नजर डालें तो यह धरती कभी बुद्ध की करुणा और चाणक्य की नीति की जननी रही है, लेकिन आज वही बिहार कानून व्यवस्था की विफलताओं, जातिवाद की जंजीरों और विकासहीनता की विवशताओं से जूझ रहा है। सड़कें टूटी हैं, शिक्षा व्यवस्था जर्जर है, चिकित्सा तंत्र कमजोर है, और रोजगार की तलाश में हर साल लाखों युवा अपनी मातृभूमि छोड़ने को विवश हैं। ऐसे में यह चुनाव एक सामाजिक जागृति का अवसर भी है, जब मतदाता केवल चेहरे नहीं, चरित्र और चिंतन को वोट देंगे।
राजनीतिक दल अपनी-अपनी घोषणाओं, वादों और दृष्टि-पत्रों के साथ मैदान में हैं। कोई “नया बिहार” बनाने का नारा दे रहा है, तो कोई “विकसित बिहार” का। लेकिन सवाल यह है कि क्या घोषणाओं से बिहार का भाग्य बदलेगा, या फिर यह चुनाव भी परंपरागत नारों और जातीय समीकरणों के हवाले हो जाएगा? यह समय है कि जनता दलों से नहीं, दिशा से जुड़ाव करे; नारे से नहीं, नैतिकता से संवाद करे। पिछले दो दशकों से नीतीश कुमार बिहार का चेहरा बने हुए हैं और यह चुनाव भी अलग होता नहीं दिख रहा। मूल सवाल यही है कि क्या नीतीश को एक और मौका जनता देगी? राज्य में एनडीए ने उन्हें आगे कर रखा है और महागठबंधन से सीधी टक्कर मिल रही है। 2005 से नीतीश कुमार बीच केे कुछ समय को छोड़ कर सत्ता पर काबिज हैं। इस दौरान उन्होंने 9 बार शपथ ली और कई बार पाला बदला। गठबंधन के साथी बदलते रहने और कम सीटों के बावजूद मुख्यमंत्री वही बने। इसके पीछे उनकी अपनी ‘सुशासन बाबू’ की छवि भी है, लेकिन अब इसे चुनौती मिल रही है। पहली बार नीतीश सरकार को भ्रष्टाचार के आरोपों में घेरने की कोशिश हो रही है। वहीं, कानून-व्यवस्था का मामला भी चिंता बढ़ाने वाला है। हाल के महीनों में पटना में व्यवसायी गोपाल खेमका और हॉस्पिटल में घुसकर गैंगस्टर की हत्या ने सरकार की परेशानी बढ़ाई। नीतीश और भाजपा ने लालू-राबड़ी यादव के कार्यकाल को हर चुनाव में जंगलराज की तरह पेश किया, पर अब सवाल विपक्षी दल पूछ रहे हैं। यह चुनाव ऐसे अनेक सवालों के घेरे में हैं।
विकास पर जोर के बावजूद बिहार की राजनीति में जाति एक निर्णायक कारक है। हर पार्टी की चुनावी रणनीति समुदाय आधारित लामबंदी से गहराई से प्रभावित है। दोनों प्रमुख गठबंधन एनडीए ओर महागबंधन सीट बंटवारे की बातचीत में उलझे हैं।  243 विधानसभा सीटों में से गठबंधन में से किस पार्टी को कितनी सीटें मिलेंगी और किसे कोन-सी सीट मिलेगी, यह विवाद का विषय है। पिछले विधानसभा चुनाव में एनडीए और महागठबंधन के बीच सीधा मुकाबला हुआ था- इस बार समीकरण में प्रशांत किशोर की जन सुराज भी है, जो भ्रष्टाचार ओर पलायन का मुद्दा उठाए हुए हैं। कुछ और भी नये राजनीतिक दल मैंदान में हैं। बिहार की सबसे बड़ी चुनौती कानून व्यवस्था और प्रशासनिक सुदृढ़ता की है। आए दिन होने वाली अपराध घटनाएं और अराजकता ने राज्य की छवि को धूमिल किया है। एक ऐसा शासन चाहिए जो भयमुक्त समाज दे सके, जहां नागरिक सुरक्षित महसूस करें, जहां अपराध पर अंकुश हो और न्याय त्वरित मिले। विकास तभी संभव है जब विश्वास का माहौल बने।
बिहार की राजनीति में इस बार कई नए दल और कई पुराने चेहरे नए दल के साथ दिखाई देने वाले हैं। प्रशांत किशोर की पार्टी ‘जनसुराज’, तेजप्रताप यादव की पार्टी जनशक्ति जनता दल, उपेंद्र कुशवाहा की पार्टी राष्ट्रीय लोक मोर्चा और पशुपति पारस की राष्ट्रीय लोक जनशक्ति पार्टी पहली बार बिहार विधानसभा के चुनाव में नजर आने वाली है। ऐसे में सभी दल चुनावी जंग में ताल ठोकने को तैयार है। मगर देखने वाली बात ये होगी कि कौन सी पार्टी अपना कितना दम दिखा पाती है? क्या प्रशांत किशार की पार्टी उनके दावे के अनुसार प्रदर्शन करती है या फुस्स साबित होती है, वहीं, तेजप्रताप यादव अपनी पार्टी बनाकर तेजस्वी यादव को कितना झटका देते है। यह सब अब चुनाव के परिणाम पर तय होगा। साथ ही यह भी तय होगा कि कौन सी पार्टी अपना अस्तित्व बचा पाती है कौन नहीं? यह चुनाव बिहार की आत्मा को झकझोरने वाला क्षण है। यहां की जनता अब सिर्फ रोटी-कपड़ा-मकान नहीं, बल्कि शिक्षा, रोजगार, स्वास्थ्य, और सम्मानजनक जीवन चाहती है। यह चुनाव इस आकांक्षा का प्रतीक है। जो भी दल इस वास्तविकता को समझेगा, वही बिहार का भविष्य गढ़ पाएगा।
आज बिहार के मतदाता अधिक सजग एवं विवेकशील हैं। वे जानते हैं कि सत्ता परिवर्तन से अधिक जरूरी है संस्कृति परिवर्तन, राजनीतिक शुचिता और प्रशासनिक जवाबदेही। यह चुनाव केवल विधानसभा की सीटें तय नहीं करेगा, बल्कि यह तय करेगा कि क्या बिहार अपनी पुरानी परछाइयों से निकलकर प्रकाश की ओर बढ़ पाएगा। क्योंकि बिहार में पिछड़ेपन, भ्रष्टाचार, अराजकता की चर्चा होती रहती है, इसलिये यह स्वाभाविक है कि राज्य का विकास, कानून व्यवस्था एवं रोजगार का मुुद्दा भी पक्ष-विपक्ष के बीच एक प्रमुख चुनावी मुद्दा होगा। हालांकि  पिछली सरकारों केे दौर में बिहार बदहाली के दौर से काफी निकल चुका है और विगत दो दशक में यहां की स्थितियां काफी बदली है। इस बार बिहार चुनाव बदला-बदला होगा, इसकी आहट उन घोषणाओं से भी मिलती है, जो नीतीश सरकार ने की हैं। महिलाओं, दिव्यांगों और बुजुर्गों के लिए पहली बार इस पैमाने पर ऐलान किए गए हैं। वहीं आरजेडी और कांग्रेस ने पूछा है कि इसके लिए पैसा कहां से आएगा? जनता वादों पर भरोसा करती है या बदलाव संग जाती है, जवाब मिलने में ज्यादा वक्त नहीं लगेगा।
वैसे, बिहार चुनाव का इतना ज्यादा महत्व कोई नई बात नहीं है। विगत दो दशक से एक विशेष क्रम बना हुआ है। लोकसभा चुनाव के अगले साल बिहार विधानसभा के चुनाव होते हैं। केंद्र में जो पार्टी विपक्षी गठबंधन में रहती है, वह बिहार विधानसभा चुनाव में अपना पूरा जोर लगा देती है, जिससे चुनाव कुछ ज्यादा रोचक एवं उत्तेजक बन जाता है। सियासी स्थिति का आकलन करें, तो बिहार में लगभग बीस साल शासन के बावजूद जनता दल यूनाइटेड या नीतीश कुमार की ताकत को कोई भी खारिज नहीं कर रहा है।
भाजपा पूरी मजबूती से नीतीश कुमार के साथ खड़ी है, ताकि सत्ता बनी रहे। दूसरी ओर, राष्ट्रीय जनता दल के नेतृत्व वाला महागठबंधन अभी नहीं, तो कभी नहीं वाले अंदाज में जोर लगा रहा है। लोकतंत्र की इस परीक्षा में बिहार एक नई इबारत लिख सकता है-एक ऐसा बिहार जो शिक्षित हो, संगठित हो, और सजग हो। जहां राजनीति सेवा का माध्यम बने, संघर्ष का नहीं; जहां सत्ता संवेदना की भाषा बोले, स्वार्थ की नहीं। बिहार का यह जनादेश वास्तव में इतिहास रच सकता है-यदि जनता “जाति” नहीं, “न्याय” को चुने; “वादा” नहीं, “विश्वास” को चुने। यह चुनाव बिहार के भाग्य परिवर्तन की कुंजी बन सकता है-बशर्ते हम सब मिलकर कहें- “अब की बार, सुशासन और सुधार।”
(ललित गर्ग)
लेखक, पत्रकार, स्तंभकार
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