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शिक्षा युद्ध मानसिकता को बदलने का सशक्त माध्यम बने

विश्व शिक्षक दिवस- 5 अक्टूबर, 2025

विश्व शिक्षक दिवस 5 अक्टूबर को संयुक्त राष्ट्र के तत्वावधान में मनाया जाता है। इस दिन आध्यापकों को सामान्य रूप से और कतिपय कार्यरत एवं सेवानिवृत्त शिक्षकों को उनके विशेष योगदान के लिये सम्मानित किया जाता है। इसे संयुक्त राष्ट्र द्वारा साल 1966 में यूनेस्को और अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन की उस संयुक्त बैठक को याद करने के लिये मनाया जाता है, जिसमें शिक्षकों की स्थिति पर चर्चा हुई थी और इसके लिये सुझाव प्रस्तुत किये गये थे। इस दिवस को 1994 के बाद से प्रतिवर्ष लगभग 100 से अधिक देशों में मनाया जा रहा है और इस प्रकार वर्ष 2025 में यह 33वाँ विश्व शिक्षक दिवस होगा। इस साल की थीम है – ‘शिक्षण को सहयोगी पेशे के रूप में फिर से परिभाषित करना।’ इसका मतलब है कि पढ़ाई सिर्फ एक व्यक्ति का काम नहीं होना चाहिए।

शिक्षक आपस में मिलकर अनुभव शेयर करें, नई तकनीकें अपनाएं और मिलकर शिक्षा प्रणाली को और मजबूत बनाएं। इस तरह शिक्षक न सिर्फ अपने पेशे में संतुष्ट रहेंगे, बल्कि छात्रों को भी बेहतर शिक्षा मिल सकेगी। इस साल का संदेश यही है कि शिक्षा को सुधारने के लिए शिक्षण को व्यक्तिगत प्रयास से ऊपर उठाकर साझेदारी और सहयोग का पेशा बनाना होगा। जब शिक्षक मिलकर विचार साझा करेंगे और जिम्मेदारियां बांटेंगे, तभी शिक्षा अधिक प्रभावी और प्रेरक बन पाएगी। शिक्षक सिर्फ ज्ञान देने वाले नहीं होते, बल्कि वे समाज में नवाचार, समानता और परिवर्तन के बीज बोते हैं। वे बच्चों को सपने देखने और उन्हें पूरा करने का साहस सिखाते हैं, शिक्षक ही दुनिया में शांति एवं सह-जीवन का प्रभावी सन्देश दे सकते हैं। शिक्षक को पर्याप्त सम्मान, सहयोग और अवसर मिलें तो शिक्षा के माध्यम से एक आदर्श समाज-व्यवस्था एवं शांति की विश्व-संरचना स्थापित की जा सकती है। 2025 में विश्व शिक्षक दिवस की सबसे बड़ी सभा अदीस अबाबा, इथियोपिया में आयोजित हो रही है।

विश्व शिक्षक दिवस केवल एक औपचारिकता या शिक्षकों का अभिनंदन करने का अवसर भर नहीं है, बल्कि यह अवसर है शिक्षा की दिशा और दशा को लेकर गहन चिंतन करने का। यह अवसर है यह विचारने का कि आज शिक्षा क्या दे रही है और क्या उसे देना चाहिए। यह अवसर है यह पूछने का कि आज की शिक्षा व्यवस्था केवल नौकरी, व्यवसाय और उपभोग की भूख को बढ़ाने का साधन क्यों बन गई है, क्यों उसमें जीवनमूल्य, नैतिकता, शांति, सहअस्तित्व और अहिंसा जैसे आधारभूत तत्व लुप्त होते जा रहे हैं। यदि शिक्षा का ध्येय केवल ज्ञानार्जन या रोजगार प्राप्ति है तो वह अधूरी है। शिक्षा का परम ध्येय है – मनुष्य को मनुष्य बनाना, उसे सह-अस्तित्व, अमन और अयुद्ध की स्थितियों के प्रति उन्मुख करना।

आज दुनिया भय, हिंसा, युद्ध और तनाव के घेरे में है। तकनीक और विज्ञान ने सुविधाएं दी हैं, लेकिन उसके साथ शस्त्र-प्रतिस्पर्धा, परमाणु हथियारों का अंबार, और हिंसक प्रवृत्तियां भी दी हैं। इस भयावह परिदृश्य में शिक्षा का दायित्व केवल पाठ्यपुस्तकों तक सीमित नहीं रह सकता। शिक्षा को एक आंदोलन बनना होगा, एक वैश्विक अभियान बनना होगा, जो शांति, अहिंसा और अयुद्ध की भावना को संस्कार के रूप में हर हृदय में स्थापित करे। आज की शिक्षा व्यवस्था पश्चिमी उपभोक्तावादी संस्कृति से प्रभावित होकर स्पर्धा, लाभ और अहंकार की मानसिकता पैदा कर रही है। बच्चे स्कूल और कॉलेजों में डिग्री तो प्राप्त कर रहे हैं, लेकिन उनके भीतर करुणा, दया, सत्य, मैत्री और सहयोग जैसे गुणों का विकास नहीं हो रहा। समाज का ढांचा शिक्षा से निर्मित होता है, यदि शिक्षा अधूरी है तो समाज भी अधूरा रहेगा। अतः एक ऐसी नई शिक्षा व्यवस्था की आवश्यकता है, जिसमें विज्ञान और तकनीक के साथ-साथ अध्यात्म और नैतिकता का संगम हो, जिसमें ‘आत्मा की आवाज़’ सुनी जा सके, जिसमें शिक्षा केवल बुद्धि का पोषण न होकर हृदय और संवेदनशीलता का भी निर्माण करे।

मानवता का सबसे बड़ा संकट युद्ध और हिंसा है। युद्ध केवल सेनाओं के बीच नहीं होता, बल्कि वह हमारे विचारों में, हमारी इच्छाओं में और हमारी संस्कृति में पलता है। शिक्षा का कार्य है इस युद्ध-मानसिकता को बदलना। शिक्षा को बच्चों और युवाओं के मन में यह स्थापित करना होगा कि शक्ति का वास्तविक स्वरूप हिंसा में नहीं, बल्कि अहिंसा में है। युद्ध में नहीं, बल्कि शांति में है। महात्मा गांधी ने कहा था – “यदि हमें शांति चाहिए तो हमें बच्चों को शांति की शिक्षा देनी होगी।” यह शिक्षा केवल पाठ्यक्रम का हिस्सा न होकर व्यवहार का हिस्सा बने। शिक्षक स्वयं शांति के प्रतीक हों, वे अपने आचरण और जीवन से यह संदेश दें कि संघर्ष का समाधान हथियारों से नहीं, संवाद और सहमति से होता है।

शिक्षा को केवल सरकारी योजनाओं या संस्थागत ढांचे पर नहीं छोड़ देना चाहिए। इसे एक आंदोलन के रूप में चलाने की आवश्यकता है। यह आंदोलन अहिंसा का शिक्षण कराए, संवाद की संस्कृति विकसित करे, मानवता को जाति-धर्म और राष्ट्र की सीमाओं से परे प्राथमिकता दे, पर्यावरण और प्रकृति के प्रति संवेदनशीलता पैदा करे और सहयोग की भावना को प्रोत्साहित करे। यह आंदोलन तभी सफल होगा जब शिक्षक अपनी भूमिका को समझेंगे और केवल ज्ञान देने वाले नहीं, बल्कि जीवन की दिशा दिखाने वाले बनेंगे। वे दीपक की तरह स्वयं जलकर दूसरों को प्रकाश दें। उनके व्यक्तित्व में सत्यनिष्ठा, ईमानदारी, करुणा और सेवा का भाव झलके। शिक्षक केवल पाठ्यक्रम न पढ़ाए, बल्कि जीवन पढ़ाए। एक विचारक ने कहा है – “शिक्षक वह नहीं है जो तुम्हें तथ्यों का ज्ञान कराए, बल्कि वह है जो तुम्हें सोचने के लिए प्रेरित करे।” इसके लिये केवल शिक्षा-क्रांति ही नहीं, बल्कि शिक्षक-क्रांति अपेक्षित है।

आज आवश्यकता है कि शिक्षक बच्चों के हृदय को छूने वाले बने, वे केवल करियर बनाने की चिंता न करें, बल्कि चरित्र बनाने का प्रयास करें। शिक्षा रोजगारपरक ही नहीं, जीवनपरक हो। यदि दुनिया में शांति चाहिए, यदि आतंकवाद, हिंसा और युद्ध को समाप्त करना है तो हमें शिक्षा की दिशा बदलनी होगी। शांति और अहिंसा के बीज बचपन में बोने होंगे। अयुद्ध की स्थितियां केवल समझौते से नहीं, बल्कि संस्कार से पैदा होती हैं। शिक्षा को संस्कार की धारा बनना होगा। नए युग की शिक्षा व्यवस्था को यह संकल्प लेना होगा कि वह ऐसे मनुष्य तैयार करेगी जो भौतिक समृद्धि में ही नहीं, आध्यात्मिक ऊंचाई में भी आगे हों। जो हथियार न बनाएँ, बल्कि हाथों में करुणा और सहयोग का दीपक थामें। जो दूसरों के शोषण पर नहीं, बल्कि साझा सुख पर विश्वास करें।

विश्व शिक्षक दिवस हमें यह याद दिलाता है कि शिक्षा केवल शिक्षकों और छात्रों की बात नहीं है, यह समूची मानवता का प्रश्न है। शिक्षा को यदि हम सही दिशा देंगे तो यह दुनिया स्वर्ग बन सकती है। यदि गलत दिशा देंगे तो यह नर्क में बदल सकती है। आज आवश्यकता है एक वैश्विक शिक्षा-आंदोलन के साथ-साथ शिक्षक-आन्दोलन की, जिसमें हर राष्ट्र, हर समाज और हर व्यक्ति की भागीदारी हो। नई शिक्षा व्यवस्था वही होगी जो युद्ध की संस्कृति को बदलकर शांति की संस्कृति स्थापित करे, हिंसा की प्रवृत्तियों को बदलकर अहिंसा की चेतना जगाए, और स्वार्थ की जगह सहयोग को जीवन का मूल मंत्र बनाए। यही शिक्षा का सच्चा उत्सव होगा, यही शिक्षक दिवस का वास्तविक संदेश।

प्रेषकः
(ललित गर्ग)
लेखक, पत्रकार, स्तंभकार
ई-253, सरस्वती कुंज अपार्टमेंट
25 आई. पी. एक्सटेंशन, पटपड़गंज, दिल्ली-92
फोनः 22727486, 9811051133

भारत और नीदरलैंड की लोक-कथाओं का तुलनात्मक विवेचन

डॉ. ऋतु शर्मा ननंनपांडे द्वारा ‘नीदरलैंड की चर्चित कहानियां’ वहाँ की प्रसिद्ध लोककथाओं का संकलन है, जो सन् 2025 में आईसेक्ट पब्लिकेशन्स, भोपाल से प्रकाशित हुआ है। इस संकलन में नीदरलैंड की प्रसिद्ध 13 लोककथाएं हैं, जिससे वहाँ की संस्कृति, रहन-सहन, सामाजिक, आर्थिक, राजनैतिक व धार्मिक परिवेश से हम परिचित हो सकते हैं तथा अपने देश की लोक-कथाओं एवं लोक-संस्कृति से तुलना कर सकते हैं। इस दृष्टिकोण से, डॉ. ऋतु भारत और नीदरलैंड के बीच सांस्कृतिक समन्वय सेतु बनाने का कार्य कर रही हैं।

इससे पूर्व में, उन्होंने ज्यॉ पॉल सार्त्र के प्रसिद्ध अस्तित्ववादी नाटक ‘नो एग्जिट’ का ‘बंद रास्तों के बीच’ शीर्षक से हिन्दी जगत के प्रसिद्ध नाटककार विवेकानंद के साथ संयुक्त रूप से अनुवाद किया है, जिसका प्रथम संस्करण 2006 में, द्वितीय संस्करण 2023 में वाणी प्रकाशन से प्रकाशित हुआ है। यह नाटक राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय, दिल्ली के पाठ्यक्रम में है और कई बार इसका सफल मंचन भी हो चुका है। इसके अतिरिक्त, उन्होंने प्रसिद्ध डच बाल साहित्यकार के बाल-उपन्यास ‘Dieren Beul’ का ‘जानवरों का जानी दुश्मन’ के नाम से हिन्दी में  अनुवाद किया है।

मेरा मानना है कि लोककथाओं पर काम करना इतना सहज नहीं होता है, और अगर विदेश की धरती का मामला हो तो और ज्यादा मुश्किल कार्य है। कुछ वर्ष पूर्व मैंने भी उत्तराखंड की प्रोफेसर प्रभापंत की पुस्तक ‘कुमांऊ की लोककथाओं’ का ‘folklore of Kumayun’ शीर्षक से अँग्रेजी में अनुवाद किया था। इस वजह से लोक कथाओं की उत्पत्ति, भाषा-शैली, मान्यताएं, परपराएं, कल्पन-शक्ति और विषय-चयन की मुझे अच्छी जानकारी है। प्रो॰ प्रभापंत द्वारा संकलित लोककथाएं भारतभूमि की है, जबकि डॉ. ऋतु शर्मा द्वारा संकलित लोककथाएं नीदरलैंड के विभिन्न समुदायों, मान्यताओं, संस्कृति, परंपराओं और मूल्य को दर्शाती है। इस संदर्भ में तमिलनाडु के प्रसिद्ध लोककथाकार ए. के. रामानुजन की पुस्तक ‘फोकटेल्स फ्रॉम इंडिया’ का निम्न उद्धरण याद आता है कि “जहां भी लोग रहते हैं, लोककथाएं बनती हैं, नए चुटकुले, कहावतें, तुकबंदी, किस्से और गीत मौखिक परंपरा में प्रसारित होते हैं। मौखिक लोककथाएं, विशिष्ट शैलियों (जैसे कहावत, पहेली, लोरी, कहानी, गाथागीत, गद्य कथा, गीत), गैर-मौखिक विधा (जैसे नृत्य, खेल, फर्श या दीवार डिजाइन), खिलौनों से कलाकृतियों से लेकर गांवों में बाहरी मिट्टी के घोड़ों तक) और समग्र प्रदर्शन कला (जैसे कि सड़क-छाप  जादू, स्ट्रीट थिएटर की परिकल्पना, विभिन्न स्थानीय वस्तुएं, पोशाक आदि) के सभी अभिव्यंजक शहर, गांव के लोक जीवन के हर पहलू से बुने जाते हैं।”

जिस तरह कुमायूं गढ़वाल नृत्य और संगीत के मामले में अपनी विशिष्ट पहचान रखता है, ठीक उसी प्रकार नीदरलैंड की अपनी लोक-संस्कृति है, जहां लकड़ी के जूते पहनकर नृत्य किया जाता है (क्लोंपन नृत्य), चुड़ैलों के उत्सव मनाए जाते हैं (कार्निवल और हैक्स), बच्चों को पानी में डुबाने वाला राक्षस (बुलेबाक), बकरी सवार (बॉकेन राइडर्स), भटकाने वाली रोशनियां (ड्वालिच्ट), डच के लोक गीत. (हीर हेलेवाइन), खजाने की रक्षा करने वाली भूतिया आत्माएं (विट्टे वीवेन) आदि से पाठक परिचित हो सकते हैं। प्रसिद्ध आलोचक डॉ. परमानंद चौबे ने प्रभापन्त की लोककथाओं पर  अपनी टिप्पणी में लिखते है कि,  “जीवन उतार-चढ़ाव से भरा है। जीवन में निराशा का अंधेरा हमेशा छाया रहता है। इसके बावजूद, परेशानियों को दूर करने के लिए हमेशा आशा की किरण दिखाई देती है। न्याय और अन्याय के बीच युद्ध है। राजाओं को हमेशा विभिन्न परीक्षाओं से गुजरना पड़ता है। पशु और मनुष्य के बीच स्थायी संबंध है। स्थितियाँ पल-पल बदलती रहती हैं, समस्याएँ नए रूपों में फिर से प्रकट होती हैं। इन सभी चक्रों का सामना करते हुए जीवन की वास्तविकता, लोककथा का वाहन बनती है – जो मानव जीवन को उद्देश्यपूर्ण ढंग से बिताने के लिए बहुत उपयोगी है। यह डॉ. प्रभा पंत द्वारा लिखित ‘फोकटेल ऑफ कुमायूँ’ की सैद्धांतिक अवधारणा है।”

नीदरलैंड को अक्सर हालैंड भी कहा जाता है। जहां समतल भूमि, नदियां, नहरें, सागर भरे हुए हैं। यहां की लोककथाओं में वे जादुई प्राणी, चुडैल आत्माएं, देवतागण और नैतिकता पर आधारित कथानक ज्यादा हैं, जो ईसाईकरण के कारण धीरे-धीरे लोक कहानियों और किंवदतियों में बदल गई। नीदरलैंड में कभी प्राचीन जर्मनिक जनजातियां (जैसे. फ्रिसियन और बैटेवियन) रहा करती थी जो दक्षिणी स्कैंडिनेविया और उतरी जर्मन से आई। फिर शुरू हुई वहाँ, प्रकृति की पूजा, नदी-नालों की पूजा, पेडों की पूजा आदि। अक्सर हम ‘बेनेलेक्स’ शब्द सुनते हैं, जिसका अर्थ होता है – बेल्जियम, नीदरलैंड और लक्जमबर्ग। अतः नीदरलैंड की लोककथाओं में डच, फ़्लेमिश या क्षेत्रीय भाषा का भरपूर प्रयोग होता है। नीदरलैंड की लोककथाएं व्यावहारिक एवं प्रकृति-केंद्रित होती है- स्कैंडिनेवियाई या आयरिश मिथकों की तुलना में कम भव्य; मगर अधिक वास्तविक। इस वजह से नीदरलैंड की लोककथाएं विश्व में अपना वांछित स्थान नहीं बना पाई और उन्हें ‘फोकलोर ऑफ द लो कंट्रीज’ में गिना जाता है।

कुमायूं की लोककथाओं में भी पहाड़-पर्वत, साधु संत, जादूगर, भूत-प्रेत, तंत्र-टोटका आदि कथानक के रूप में उभरते है। उत्तराखंड में कई संस्कृतियों, परपंराओं, आस्थाओं, संवेदनाओं और मूल्यों का समावेश है, इस वजह से यहाँ की लोककथाओं में विविधता है। लोक-साहित्य, जैसे पंचतंत्र, हितोपदेश, कथासरित्सागर आदि शिक्षा का पुरातन तरीका माना जाता था। यह ज्ञान एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी में मौखिक रूप से अग्रसरित हुआ। लोक कथाओं को केवल समय बिताने की सामग्री न मानकर समाज को नई दिशा देने वाला माध्यम मानना चाहिए।

सभ्यता, संस्कृति, भाषा और ज्ञान-भंडार ही तो मानव विकास का मूलाधार है। अनगिनत अनाम लेखकों ने संस्कृति, सभ्यता और मानवता के विकास में अद्वितीय योगदीन दिया, अपने अर्जित अनुभवों, भावनाओं और विचारों के आधार पर लोककथाओं को जन्म देकर। लोक कथाओं की खासियत यह है कि लेखक अज्ञात रहता है और उन कथाओं पर किसी एक का विशेषाधिकार नहीं है, वह समग्र समाज की देन है। जिस तरह प्रो. प्रभापंत कुमायूं के गाँवों में घूम-घूमकर वहाँ के बड़े-बुजुर्गां से लोक कथाएं सुनकर या उनकी आवाज रिकॉर्ड कर अपने घर जाकर उन कथाओं को कागज पर उतारा है, उसी तरह डॉ ऋतु शर्मा ने नीदरलैंड की अधिकांश लोक-कथाओं को स्थानीय लोगों से सुनकर लिखा और कुछ वहाँ की प्रचलित लोककथाओं का विभिन्न डच पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित उन कथाओं इस संकलन के लिए अनुवाद किया हैं।

जहां प्रभापन्त कहती हैं – ‘लोक कथाएं संग्रह के दौरान कोई भी ऐसा व्यक्ति नहीं मिला जो यह कहता है कि उसने वह कहानी लिखी है। ये हमारे पूर्वजों की विरासत है, जिसे बचाए रखना हमारा परम कर्त्तव्य है।’ वहीं पर ऋतु शर्मा भी मानती है कि यदि हम अपनी वैश्विक परंपराओं को पूरी तरह से नहीं जानते हैं तो समग्र मानव-जीवन के भविष्य की प्रगति के बारे हमे नहीं जान पाएंगे।

‘बातों री फुलवारी’ के लेखक प्रसिद्ध राजस्थानी लोक-कथाकार विजयदान देथा लिखते हैं, “मैंने अपनी सभी कहानियों को अपने गांव बोरुंदा से ही इकट्ठा किया है। लोक-गीतों की तरह ही लोक कथाओं का यह खजाना भी मुझे यहाँ की महिलाओं के पास से मिला है। मैंने खुद सुनकर इन कहानियों को अपनी कला और कल्पना के आधार पर उनके पारंपरिक रूपों को फिर से सजाया है।”

पुरवाई पत्रिका, लंदन के संस्थापक-संपादक श्री तेजेन्द्र शर्मा डॉ ऋतु के इस संकलन के आमुख में लिखते हैं कि “ऐसे गिने-चुने प्रवासी भारतीय साहित्यकार हैं, जिन्होंने अपने अपनाए हुए देश की भाषा में लिखे गए साहित्य को हिन्दी में अनुवाद करके हिंदी जगत के पाठकों को उपलब्ध करवाया हो।”

रामानुजन मानते हैं कि दक्षिण भारत की लोक-कथाएँ संस्कृत-ग्रंथ जैसे पंचतंत्र, कथा सरित्सागर या पाली जातक, हिंदू और जैन पुराण से सीधे नहीं आई हैं। कभी ये कथाएं मौखिक परंपरा के रूप में थीं और विभिन्न संतों द्वारा दृष्टांतों में बताई गई थीं। रोमांटिक धारणाओं के विपरीत, सहजता या स्वाभाविकता ही लोककथाओं का परिचय हैं। कोई भी लोककथा अपने भीतर सांस्कृतिक संदर्भ समेटे रहती है; जिसका अलग-अलग समय और स्थानों पर कुछ बदलावों के साथ फिर से दोहराया जाता है।

इस आलोच्य-संकलन की सारी कहानियों की थीम अलग-अलग है। कहीं चुड़़ैल है तो कहीं भूत-प्रेत, जादूगरनियां। कहीं पशु-पक्षी, चुहिया, घोड़ा, गधे आदि है तो कहीं सिक्के, पत्थर, लकड़ी का संदूक, झाड़ू आदि को भी लोक कथा का आधार बनाया है। इस संकलन में 13 कहानियां है जैसे कि समझदार आनतुन, जादुई पत्थर, चुहिया की शादी, बिन बुलाए मेहमान, खिलड़न की आत्मकथा, भूतिया हवेली और यान के चीले, भूखड़ ओले-बोले, कुबड़ा, जादुई घोड़ा, बुद्धिमान गधा, लकड़ी का संदूक और समझदार किसान आदि।

डॉ, प्रभापंत की कुमायूं की लोक-कथाओं में हंसावली परी, सात भाइयों की एक बहिन, लिख्खू, भिटौली, पैटीकोट का पैच, राजा विक्रमादित्य, अमरू, सात अप्सराएं, कद्दू की शादी, राक्षस, कुत्री मूयाँ, चिड़िया और जानवरों की भाषा, कलविष्ट, सर्प राजकुमार, गरीब ब्राह्मण, ग्वालदेव, जादुई अंगूठी, खकरमून आदि।

‘समझदार आनतुन’ लोककथा नीदरलैंड के किसी गाँव के जमींदार के परिवार की है। जिसमें तीन बेटे हैं, दो अच्छे खासे पढ़े-लिखे और तीसरा कुछ भोला-भाला, जिसे व्यंग्य में वहाँ के लोग उसे ‘समझदार आनतुन’ कहते हैं। किसी राजा की बेटी के स्वयंवर में जमींदार के बेटे आमंत्रित किए जाते है। एक भाई लैटिन भाषा की डिक्शनरी, समाचार पत्र के सारे संस्करण याद रखने वाला तो दूसरा भाई कानून और राजनीति का अच्छा जानकार। तीसरा भाई इनसे कोसों दूर। दोनों भाई सज-धजकर घोड़े पर बैठकर राजकुमारी के स्वयंवर में जाते है। वे आनतुन को  छोड़कर चले जाते हैं। जब उसे पता चलता है तो वह बकरे पर सवार (बॉकेन राइडर) होकर  वहां पहुंचता है। रास्ते से उसे मरा हुआ कौआ, पुराने लकड़ी के जूते (क्लोंपन), गीली मिट्टी मिलती है, जिसे वह अपनी जेब में भरकर राजमहल जाता है।

स्वयंवर के दौरान राजमहल में अच्छी-खासी गर्मी होती है, इसके बारे में  राजकुमारी कहती है – “आज शाम के खाने के लिए मेरे पिताजी ने यहां मुर्गे भुनवाये हैं।”

किताबी ज्ञान रखने वाले दो बड़े भाई इसका न तो अर्थ समझ पाते हैं और न ही कुछ उत्तर दे पाते हैं। मगर तीसरा भाई हाजिर जबाव; तुरंत उत्तर देता है – ‘क्या मैं अपना कौआ भी भून सकता हूँ ?’ फिर भूनने के लिए बर्तन की बात आती है तो वह पुराने लकड़ी के जूते दिखा देता है और चटनी के बारे में राजकुमारी पूछती है तो दोनों जेब से गीली मिट्टी बाहर निकालता है। आखिरकार आनतुन की प्रत्युत्पन्नमति से राजकुमारी काफी प्रभावित हो जाती है और विवाह के लिए तैयार हो जाती है। यद्यपि यह नीदरलैंड की पृष्ठभूमि है, मगर भारतीय दंतकथाओं में कालिदास और विद्योतमा का विवाह-प्रसंग भी तो इस रूप से देखा जा सकता है। कालिदास द्वारा विद्योतमा एक अंगुली दिखाने से एक आंख फोड़ना समझकर वह दो अंगुली दिखाता है, राजकुमारी की दोनों आँखें फोड़ने के इरादे से। राजकुमारी द्वारा हाथ दिखाने से थपड्ड समझकर उसे मुक्का दिखाता है। गलत संकेतों के भी वांछित भावार्थ समझने से विद्योतमा की कालिदास के साथ शादी हो जाती है। यदि नीदरलैंड की इस लोककथाओं की तुलना करने पर ‘आनतुन’ कालिदास जैसा है और नीदरलैंड की राजकुमारी ‘विद्योतमा’ की तरह।

दूसरा प्रसंग, “हू विल किल द केट इन फर्स्ट नाइट?” कहानी में का है, जिसमें राजकुमारी के स्वयंवर की शर्त में टेबल पर दूध रखा हुआ होता है और उसके पास में पालतू बिल्ली छिपकर बैठी होती है। स्वयंवर में भाग लेने वाले राजकुमारों के लिए शर्त निर्धारित होती है – ‘जो टेबल पर रखा हुआ गिलास उठाकर दूध पीएगा। राजकुमारी उसके साथ शादी करेगी।’

जैसे ही स्वयंवर में भाग लेने वाले राजकुमार दूध का गिलास उठाकर पीने के लिए उद्यत होते है तो बिल्ली आकर दूध गिरा देती है। परिणामस्वरूप, राजकुमार स्वयंवर में विफल। मगर एक सिरफिरा बंदा आता है, उसके पास कटार होती है। जब वह स्वयंवर कक्ष में जाता है और एक हाथ से दूध के लिए गिलास उठाता है तो जैसे ही बिल्ली आक्रमण करने वाली होती है तो दूसरे हाथ से कटार निकालकर उसे मार देता है। ‘मेरी बिल्ली को क्यों मारी?’ राजकुमारी द्वारा पूछने पर वह उत्तर देता है – ‘हमारे बीच में अगर कोई तीसरा आएगा तो वह भी इसी बिल्ली की तरह मारा जाएगा।’

यह उत्तर सुनकर राजकुमारी प्रभावित हो जाती है और उससे शादी कर लेती है। डॉ. ऋतु शर्मा की इस लोककथा में भी आनतुन की स्पष्टवादिता और प्रत्युत्पन्नमति से प्रभावित होकर राजकुमारी शादी कर लेती है।

इस लोककथा में एक और कहानी याद आती है, पंचतंत्र के चार दोस्तों की। तीन दोस्त अच्छे-खासे पढ़े-लिखे, अलग-अलग विद्याओं के ज्ञाता और चौथा दोस्त मूर्ख। वे चारों एक जंगल से गुजर रहे होते हैं। रास्ते में हड्डियों का ढेर दिखाई देता है। पहला दोस्त हड्डियों के ढेर को मंत्र से जोड़ता है, दूसरा दोस्त मंत्र बल से उस पर त्वचा का आवरण पहना देता है, और तीसरा दोस्त उसमें प्राण फूंकने जा रहा होता है कि चौथा दोस्त उसे यह करने के लिए मना करता है क्योंकि वह जानता है की जुड़ी हुई हड्डियों का अस्थि-पंजर शेर की आकृति ले चुका होता है, उसमें जान फूंकने से वह उन सभी को जान से मारकर खा सकता है। लेकिन तीसरा दोस्त उसकी बात को नहीं मानते हैं तो चौथा दोस्त किसी पेड़ पर चढ़ जाता है। तीसरा दोस्त जैसे ही मंत्रबल से जान फूंकता है तो शेर जीवित हो उठता है और तीनों पर आक्रमण कर देता है और उन्हें मार देता है। कहने का अर्थ यह है कि किताबी ज्ञान की तुलना में व्यावहारिक ज्ञान ज्यादा प्रभावी व श्रेष्ठ होता है। ‘समझदार आनतुन’ में दो भाई अपने विषयों के अच्छे-खासे ज्ञाता हैं, मगर जरूरत पड़ने पर कुछ भी नहीं बोल पाते हैं, जबकि तीसरा भाई भोला होते हुए भी तुरंत जवाब दे देता है और राजकुमारी का दिल जीत लेता है। इससे यह निष्कर्ष निकाला जा सकता है, कि लोक कथाएं नीदरलैंड की हो या भारत की – सभी में सार्वभौमिक मूल्यों की उपस्थिति सहजता से देखी जा सकती है।

डॉ. ऋतु शर्मा के इस संकलन की दूसरी लोककथा ‘जादुई पत्थर’ में सैनिक मताईस तीन चमत्कारी पत्थरों से सबके लिए सूप तैयार करता है और ‘जादुई घोड़ा’ कहानी में खरौनिंगन शहर का लड़का जादुई घोड़े की वजह से अपनी क्रूर सौतेली माँ से जान बचाता है। इसी तरह डॉ. प्रभापंत की ‘जादुई अंगूठी’ में एक व्यापारी का निष्कासित बेटा विपत्तियों में उस अंगूठी से अपनी रक्षा करता है।

‘चूहिया की शादी’ नीदरलैंड के किसी गाँव के जमींदार परिवार की कहानी है, जिसमें पूर्व और पश्चिम में जाने वाले दो बेटों की शादी योग्य लड़की मिल जाती है, जबकि उत्तर दिशा में जाने वाले तीसरे बेटे डेनियल के लिए केवल रेंडियरों और भेड़ियों की बस्ती में कहां से कोई लड़की शादी योग्य मिल सकती है! उसे एक घर में चुहिया मिलती है। जो उसके लिए कुछ भी करने को तैयार हो जाती है। लोककथा में बाद में पता चलता है कि एक अभिशप्त राजकुमारी चुहिया की देह में अपना जीवन-यापन कर रही होती है। जब डैनियल उससे प्यार करने लगता है तो वह अपने असली रूप में आ जाती है। भारतीय लोक-कथाओं में एक ऋषि चुहिया को कन्या बना देता है फिर उसकी शादी के लिए बादल, पवन, पहाड़ आदि को प्रस्ताव भेजता है।

बादल कहता है, ‘पवन मुझसे ज्यादा ताकतवर है, इसलिए वह हमें छितर-बितर कर  देती है।’

पवन कहती है,’ पहाड़ हमसे ज्यादा ताकतवर है, जो हमें बहने से रोक देता है।’

पहाड़ कहता है, ‘चूहा हमसे ज्यादा ताकतवर है, वह हमारे भीतर छेद करता है, अपना बिल बनाने के लिए।’

अंत में, उस कन्या को ऋषि फिर से चूहिया बनाकर चूहे से शादी कर देता है। इस कथा का शीर्षक है – ‘पुनर्मूषक भवः’। चूहिया को कन्या और फिर कन्या को चूहिया। नीदरलैंड की कहानी में चुहिया से राजकुमारी बनती है।

प्रोफेसर प्रभापंत की लोककथा ‘सर्प राजकुमार’  में नागिन अपने पति ‘नाग’ के प्रति समर्पण और वफादारी को दिखा रही है, यहां तक कि वह अपना मिशन पूरा करने के बाद उसके पास लौटने का वादा भूल गया था। उसे राजकुमारी के साथ सोते हुए देखकर उसने बदला नहीं लिया। उनके द्वारा किया गया बलिदान अनुकरणीय है और भारत में स्त्री के गुणों को दर्शाता है।

‘नखरीली सुई’ और ‘खिलड़न की आत्मकथा’ लोक-कथाओं में कपड़ा सिलाई करते समय सुई के टूटने, फिर उस पर लाख लगाकर नखरीली सुई को जीवित रखने की कथा है, जिसके आधार पर नीदरलैंड में सिलाई की टोकरी रखने की प्रथा है। उसी तरह ‘खिलड़न की आत्मकथा’ में नीदरलैंड के सिक्के की जेब से निकलकर दूसरे देश की यात्रा के दौरान खोटे  सिक्के के नाम से अपमानित होने पर आधारित लोक कथा है, जबकि खिलडन पर नीदरलैंड के टकसाल की मोहर भी लगी होती है। दूसरे देश में खोटा सिक्का घोषित होने पर उसके बीच में छेदकर किसी बच्चे के गले में लॉकेट की तरह लटका दिया जाता है।

‘बिन बुलाई मेहमान’ कथा नीदरलैंड के अपिंगदाम शहर की कहानी है, जहां एक लेखक श्रीमान माईरमन रहते हैं। वह चुड़ैलों पर मनगंढ़त कहानी लिखने के कारण दो चुड़ैलें  जुलिया और जूटा उसके घर आकर कहती है कि हम चुड़ैलें कुछ भी गलत काम नहीं करते हैं। न तो मकड़ी जाल वाला पैन कैक खाती है, न भेड़ के बच्चों को। न बच्चों के सपनों में आकर डराती हैं, न खंडहरों में नाचती हैं। इसलिए उन पर गलत साहित्य लिखना बंद कर दिया जाए।

‘भूतिया हवेली और यॉन के चीलें’ नीदरलैंड की प्रोफेंसी फ्रिसलैंड के शहर में एक बहुत बड़ी तीन मंजिला हवेली, जो सुनसान है और वहां भूत रहते हैं – के कथानक वाली लोक कथा है। जो प्रसिद्ध अंग्रेजी लेखक अल्फ्रेड हिचकॉक के ‘हाउन्टेड हाउसफुल’ की याद दिलाती है। नीदरलैंड के भूत अच्छे हैं, भारतीय भूतों की तरह लोगों को परेशान नहीं करते हैं और न ही डराते हैं। हैं। यही वजह है कि प्रसिद्ध ओड़िया और अँग्रेजी के लेखक स्वर्गीय मनोज दास को ‘भूतनी की विदाई’ जैसी कहानी लिखने की जरूरत नहीं पड़ती। नीदरलैंड की भूटिया हवेली में यॉन को रूकने के कारण एक भूत धन के तीन घड़ों के बारे में बताता है और ले जाने के लिए कहता है की वह एक घड़ा गरीबों की सेवा, दूसरा घड़ा चर्च के लिए उपयोग में लें, और तीसरा उसके अपने उपयोग के लिए। जबकि भारत में भूत धन का स्थान नहीं बताते, बल्कि देवी-देवता धन की जगह दिखाते हैं, उदाहरण के तौर पर ओडिशा के सम्बलपुर की अधिष्ठात्री समलेई देवी एक आदिवासी महिला सँअरन को हीराकुंड के पास सात हीरों के ढेर को हीराकुड के रेत के टीले के नीचे दबे होने के बारे में बताती है। गरीबी के बुरे दिनों में भी मानवता के प्रति त्याग और सेवा की भावना को दर्शाने वाली प्रभापन्त की ऐसी ही एक लोक-कथा ‘कुत्री मुया’ जीवन के मुख्य पहलू को दर्शाती है।

नीदर लैंड की लोकसभा ‘भूक्खड़ ओले-बोले’ एक पेटू की कहानी है जो भूनी हुई पूरी भेड़, दस रोटियां और बैल भी खा लेता है। उसके बाद भी उसकी भूख खत्म नहीं होती है तो वह रास्ते में मिलने वाली किसी बुढ़िया के आडू और चीज खा जाता है। क्या आपको नहीं लगता हैं कि भारतीय मिथकों में भीम और दुर्वासा मुनि ऐसे ही पात्र है ? महाभारत में एक बार दुर्वासा नहा-धोकर द्रोपदी के पास भोजन की मांग करता है। जितना भी भोजन देने से उसकी भूख खत्म नहीं होती है, ठीक भुक्खड़ ओले-बोले की तरह। अंत में, कृष्ण भगवान द्रोपदी को तुलसी का पत्ता देते हैं, जिसे खाकर दुर्वासा मुनि की भूख शांत हो जाती है। इस तरह भारत और नीदरलैंड की लोक कथाओं में काफी समानता देखने को मिलती है।

‘कुबड़ा’ लिंबर्ग की कहानी है, नीदरलैंड से किसी हिस्से की। इस कहानी में कुबड़ा वायलिन  बजाने वाला कलाकार है। रात में किसी जंगल में वॉयलिन बजाता है तो अप्सराएं उसे सोने के सिक्के इनाम स्वरूप देती है। इस प्रकार कुबड़े की दुरावस्था समाप्त हो जाती है और अप्सराओं की मदद से उसका कुबड भी खत्म हो जाती है। नीदरलैंड की यह लोककथा शेक्सपियर के नाटक ‘मिडसमर नाइट’ज ड्रीम’ की याद दिलाती है। साथ ही साथ, कृष्ण द्वारा कुब्जा के कुबड़ को मिटाने वाली कहानी की भी। ऐसी की एक लोककथा प्रभापन्त ने संकलित की है, ‘कलबिष्ट’ शीर्षक से, जिसमें कल्याण सिंह बिष्ट नमक एक साधारण व्यक्ति के देवता में परिवर्तित होने के बारे में है। गुरु गोरखनाथ की कृपा से कालबिष्ट को दिव्य शक्ति मिलती है।

नीदरलैंड के किसान के बेटे के जीवन पर आधारित ‘बुद्धिमान गधा’ लोक कथा में माँ-बेटी दो चुड़ैलें है, जो झाड़ू पर बैठकर किसी अज्ञात स्थान पर जाती है, नृत्य करने तथा जीवन का आनंद लेने के लिए। मगर नीदरलैंड के ब्राबनद शहर में रहने वाला किसान के बेटे को चुड़ैल की बेटी से प्यार हो जाता है, इसलिए वह उसका पीछा करता है, झाड़ू पर बैठकर उसी की तरह मंत्रोच्चारण के बाद वह उस अज्ञात स्थान पर पहुँच जाता है। बेटी उस स्थान पर आया देखकर उसे गधा बना देती है, जो समय आने पर अपनी बुद्धि से फिर मनुष्य बन जाता है। झाड़ू पर बैठकर उड़ने वाला दृश्य विश्व में बहुचर्चित फिल्म ‘हैरी पोटर’ की याद दिलाती है। और चुड़ैलों द्वारा अपने प्रेमी को गधे में बदलने की प्रक्रिया मन में कहीं-न-कहीं कामाख्या देवी की याद तरोताजा करती है, जहां चुड़ैलें अपनी तंत्र-शक्ति से आदमियों को दिन में जानवर बना देती हैं और रात में फिर से आदमी बनाकर अपनी कामुक इच्छाओं की तृप्ति करती है। ऐसी ही ‘खकरमून’ कहानी प्रभापंत की है, जिसमें छोटी बकरी खकरमून अपनी  चतुराई से न केवल अपनी बल्कि पूरे परिवार की जान बचाती है, रणनीतिक रूप से बाघिन, को मार देती है।

‘लकड़ी का संदूक’ लोककथा में संदूक भानुमती के पिटारे की तरह है, जिसमें टोपी और बांसुरी रखी हुई होती है। पिता की मृत्यु के बाद दोनों बेटों में एक टोपी ले लेता है तो दूसरा बांसुरी। संदूक की ये दोनों चीजें अलाऊद्दीन के चिराग की तरह है, जिसे रगड़ने पर जिन्न पैदा होता है। इस लोक कथा में बांसुरी और टोपी से जिन्न निकलता है। एक भाई किसी राजकुमारी के छलावे में आकर ये दोनों चीजें खो देता है, तो वहां के नाशपाती के माध्यम से फिर से वह प्राप्त कर लेता है। बड़ी नाशपाती खाने से नाक बढ जाता है और छोटी खाने से फिर सामान्य हो जाता है। इसी ट्रिक का फायदा उठाकर वह राजकुमारी से अपनी हड़पी हुई चीजें हासिल कर लेता है। यह नीदरलैंड के जीलैंड की लोककथा है, जहां लोग आज भी नाशपाती खाने से डरते हैं कि कहीं उनकी नाक लंबी न हो जाए। ऐसी ही लोककथा प्रभापन्त की भी है, ‘सात अप्सराएं’, जिसमें उन्होने ब्राह्मण की सादगी और बूढ़ी औरत के डॉ ऋतु के ‘लकड़ी का सन्दूक’ की राजकुमारी की तरह धोखेबाज स्वभाव को दर्शाया है। जिस तरह नीदरलैंड का नवयुवक नाशपाती खाकर अपना जीवन बचाता है, उसी प्रकार करची (करछुल), जादुई चम्मच, जादुई रजाई, उड़ान खटोला और पिटने वाली छड़ी प्रभापन्त के ब्राह्मण को बचाती है। इस प्रकार, यह कहा जा सकता है कि डॉ. प्रभा पंत और डॉ ऋतु शर्मा की ये लोक-कथाएँ दैनिक जीवन की व्यावहारिक समस्याओं को हल करने के तरीके के बारे में ‘रेडी रेकनर’ की तरह काम करती है।

इन संकलन की अंतिम कहानी है – ‘समझदार किसान’। इस लोक कथा में किसान की पत्नी बहुत चालाक होती है, और उसके पेट में कोई बात नहीं रह पाती है। पंचतंत्र की कहानी ‘वाचालो लभते नाशम्’ की याद दिलाती है। किसान अपनी पत्नी की इस आदत के कारण खेत में मिले गुप्तधन को बचाने के लिए उसे तरह-तरह की बातें करता है जैसे राजा के बेटे की शादी, मछलियों की बरसात, मीठी रोटी के पेड़ होना आदि। ताकि गुप्त धन के बारे में लोगों को बोलने पर भी, यहां तक कि राजा के पास खबर जाने पर भी वह अपने गुप्तधन को बचा पाएगा, यह कहकर उसने शायद सपना देखा होगा, तभी तो उलटी-सीधी अनर्गल बातें करती है। इस प्रकार वह किसान अपनी समझदारी से गुप्तधन की रक्षा कर लेता है। इससे मिलती-जुलती प्रभपांत की लोक-कथा है ‘गरीब ब्राह्मण’।जिसमें ईश्वर पर अंधविश्वास किए बगैर हमारे जीवन की दरिद्रता को दूर करने के लिए कड़ी मेहनत में विश्वास और समझदारी की आवश्यकता को दर्शाया गया है।

अंत में, नीदरलैंड की लोक-कथाओं का भारतीय लोक-कथाओं के साथ तुलनात्मक विवेचन करने पर यह पता चलता है कि यद्यपि नीदरलैंड की लोक-कथाओं ने भारतीय लोक-कथाओं से समानता होने के बावजूद अभी तक भारत में अपना कोई विशिष्ट स्थान नहीं बनाया है, इस कमी को पूरा करने का सार्थक प्रयास किया है डॉ. ऋतु शर्मा ननंन पांडे ने, जिनका नाम प्रवासी साहित्यकार के रूप में वैश्विक स्तर पर बड़े आदर के साथ लिया जाता है। उन्होंने नीदरलैंड की लोक कथाओं को अनुवाद के माध्यम से हिंदी में लाकर दोनों देश के बीच न केवल सांस्कृतिक भाषायी समन्वय का कार्य किया है, बल्कि ‘वसुधैव कुटुंबकम्’ की भावना को प्रतिपादित करते हुए दोनों देशों की एकता को अटूट रखने का संदेश दिया है, जो राम मनोहर लोहिया के ‘विश्वभाषा’, ‘विश्व संविधान’ और ‘विश्व नागरिक’ के पथ को प्रशस्त करता है।

(लेखक ओड़िशा में रहते हैें और हिंदी के आलोचक व लेखक हैं)

इंडोनेशिया – बाली: कण में , रज में, रग में राम!

“राम तुम्हारा चरित स्वयं ही  काव्य है
कोई कवि बन जाए, सहज संभाव्य है!”

बाली की न  बातें खत्म होंगी,न यादें खत्म होंगी. अंतहीन स्मृतियों का कारू का खजाना बन गया है बाली…. आज राम नवमी है  और हाली ही के बरसों में “मंदिरों के महादेस बाली “में एक और अप्रतिम प्रतिमा स्थापित की गई है  ऐसे  पुरुषोत्तम की,जो  अपनी-  माया, मर्यादा और आदर्श के लिए विश्व भर में पूजित और प्रणम्य हैं.  कल देश दशहरा मनाएगा.. राम,  उसे,जो है अनाचारी भी…अहमी भी…दम्भी भी…  है घमंडी भी.. रावण का वध करेंगे!  विजयी होंगे राम..!भूलुंठित होगा रावण…!!

पर रावण की लंका तक का मार्ग था दुर्गम… अछोर सागर… जिसे पार करना भी मुश्किल…लाँघना भी मुश्किल… वहाँ तक पहुंचना  भी मुश्किल… वह असाध्य  भी …दुष्कर भी…राम ने वानर सेना का किया आव्हान…भारी पत्थर, विशाल पहाड़ के पहाड़, शिलाएं भी चट्टाने भी… वानर सेना ने  इन सब का उपयोग कर बनाया पुल…राम सेना पहुंची लंका… किया भीषण युद्ध.. मिली विजय…  राम की जय!

ठीक इसी कथ्य और भावभूमि पर आधारित जन- जन के आराध्य, अभिराम – राम की विशाल प्रतिमा को स्थापित किया है गया है बाली के ” नुसा दुआ ” इलाके के ” तोहफाती ” चौराहे पर.  जी 20.शिखर सम्मेलन की सत्रहवीं बैठक  हुई 15व 16  नवंबर 2022 को  और इसकी मेजमानी की इंडोनेशिया ने, बैठक हुई बाली में. इसी बैठक स्थल के समीप टीलों, पहाड़ियों और चट्टानों को चित्ताकर्षक बनाते हुए इसी पर स्थापित की गई राम की नयनाभिराम पराक्रमी और युयुत्सवा!
( रावण से युद्ध के लिए प्रबलाकांक्षी, पूरी तरह तैयार)
इसी मुख्य प्रतिमा के साथ राम के परम सेवक – हनुमान, सुग्रीव और   उत्साहित वानर सैना की यहाँ सुन्दर -सजीव – सी  मूर्तीयाँ बनाई गई है.  फकत तीन साल पहले बनाई  इन सनातन धर्मावलंबियों के पूजनीय प्रतीकों की यह प्रतिमाएं, इंडोनेशिया के बारे में, इस आशंका को भी मिटा देती है कि इस देश में खास कर बाली में जो हजारों की तादाद में मंदिर बने हैं, वे सदियों पुराने हैं, तब के, जब वहाँ हिन्दू और बुद्ध बहुतायत में रहते थे. अब, जबकि  मुस्लिम आबादी लगातार बढ़ते हुए तकरीबन नब्बे प्रतिशत से भी ज्यादा हो गई है, हिंदू देवी – देवताओं के मंदिर शायद अब न बने. पर इन कयासों  के कोहरे को काटते -छाँटते, आशंकाओं को निर्मूल करते  हुए
इंडोनेशिया की फिलवक्त राजधानी जकार्ता में सम्पूर्ण एशिया का सर्वाधिक बड़ा और भव्य मंदिर “सनातन  धर्म आलयम ”  का निर्माण इसी वर्ष पूरा हुआ है.
भगवान मुरुगन ( कार्तिकेय ) को समर्पित इस मंदिर का शिलान्यास सन 2020 में किया गया था. दो वर्षो से भी अधिक निर्माणावधि के बाद  इसी साल 2 फरवरी ’25 को मंदिर का भव्य उद्घाटन- आयोजन सम्पन्न हुआ. इंडोनेशिया में इस्लाम कितना भी क्यों बढ़ जाए, जन – जन की रग – रग में बसे राम  के प्रति इस देश की आस्था रहेगी अविरल – अविराम!
मैं पहले ही इस तथ्य को बता चुका हूँ कि रामायण, इंडोनेशिया ( बाली ) की आत्मा है.. अजर.. अमर..और सनातन…
यह जरूर है की  भारत की रामायण और इंडोनेशिया / बाली की रामायण में भाषा और घटनाओं में तनिक भिन्नता है. भारतीय रामायण के रचयिता वाल्मीकि हैं, जबकि इंडोनेशिया / बाली में प्रचलित रामायण के रचयिता कवि योगेश्वर थे.  भारतीय रामायण  में राम की नगरी अयोध्या है तो  वहाँ अयोध्या को ” योग्या ” कहा जाता है. हम भारतीय, लक्ष्मण को  शेषनाग का अवतार मानते हैं जबकि वहाँ नौ सेना अध्यक्ष को लक्ष्मण कहा जाता है.
दशरथ को वहाँ, ” विश्वरंजन ” के तौर उल्लेख किया है सीता को वहाँ  ” सिंता ” उच्चारित किया जाता है.
यह भी पूर्व में उल्लेख कर चुका हूँ कि 1973 में  दुनिया कि सबसे ज्यादा मुस्लिम आबादी वाले देश इंडोनेशिया ने ही ” अंतर्राष्ट्रीय रामायण सम्मेलन ”  आयोजित किया था. इंडोनेशियन रामायण में 26 अध्याय है और इसे ” काकावीन रामायण ” कहा जाता है. इंडोनेशिया के स्वतन्त्रता दिवस – 27 दिसम्बर को यहाँ के युवा,  हनुमान का वेश धारण कर  सरकारी परेड में शामिल होते हैं.  बाली के बारे में अधिकृत सूचनाएं देने वाली लक्ष्मी से जब मेने हाल ही बाली के “उबुद ” इलाके में रामायण  को पत्थरों पर उकेरने  के बारे में जानना चाहा, उसने बताया कि उबुद में  ” आयूंग ” नदी के किनारे पर लगभग एक किलोमीटर लम्बाई में पत्थरों पर  रामायण के प्रसंगों को उकेरा गया है. अनेक पत्थरों पर राम – वनवास, सीता हरण और राम – रावण युद्ध जैसे प्रसंगों को कमनीय और कालात्मक तरीके से उकेरा गया है. इस सम्पूर्ण कला  क्षेत्र का उद्घाटन
2023 में किया गया था.

लक्ष्मी अपनी आँखों को तनिक और चौड़ा बना लेती है जब वह बताती है की बाली में अनेक स्थानों पर रामकथा को कठपुतली-  प्रदर्शन के जरिए प्रस्तुत  किया जाता है. कठपुतली शो को बाली में – ” वेयांग कुलित ” कहा जाता है.   फादर काबिल बुल्के ने रामायण पर बहुत काम किया. उनके मुताबिक  दुनिया में 50 से ज्यादा भाषाओं में राम कथा लिखी गई है. रामायण ही ऐसा महाकाव्य है जिसे आधार बना सबसे ज्यादा लोक कथाएं लिखी गई हैं.
इंडोनेशिया में सबसे ज्यादा प्राचीन “जवानीस  रामायण ”  है. कहते हैं इसे 9वीं शताब्दी में  लिखी जा चुका थी. जावा में रामकथा- प्प्रस्तुति , ” रामायण बेले” के रूप में होती है. जिस मंच पर यह आयोजन होता है उसे – ” वेयांग वॉन्ग ”  कहा जाता है. जावा के ही “योग्यकर्ता ” शहर  के प्राम्बनन मंदिर में प्रतिदिन रामलीला की प्रस्तुतियाँ होती है.यह मंदिर यहाँ का सबसे बड़ा, सबसे भव्य और सर्वाधिक प्रतिष्ठित मंदिर है. इसे युनेसको ने विश्व धरोहर में शुमार किया है.

यूँ पूरा संसार ही राम के नाम और काम से  नित्य ही नतशीष होता है पर इंडोनेशिया / बाली  के बागों- बहारों में, नदियों – कछारों में, सागरों – पहाड़ों में…अँधेरे – उजाले में.. जवालमुखी – मुहानों में…
रज में.. रग में.. कण में.. मानव मात्र के मन में…रमे हैं  राम! …सियाराम मय  सब जग जानी
करहु प्रणाम जोरि जुग पाणी!

पुरुषोत्तम पंचोली
वरिष्ठ लेखक एवं पत्रकार, कोटा

हम गायों को संरक्षित करेंगे तो गाय हमारी संस्कृति, कृषि और सभ्यता को संरक्षण देगी

राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के अखिल भारतीय प्रचार प्रमुख श्री रामलाल ने कहा कि देश ने गाय को बचाने के लिए कई अंदोलन किए हैं जिसमें कूका विद्रोह प्रमुख है। अंग्रेजों के शासन के पहले पंजाब में गौहत्या पर पाबंदी थी, लेकिन जब वहां गौहत्या पर प्रतिबध हटा तो कूका विद्रोह के माध्यम सै इसका विरोध किया गया। इसमें कई अंग्रेज अधिकारीयों को गौसेवकों ने मार दिया। यह विद्रोह संत समाज द्वारा किया गया था।

इस्कान सभाग्रह में आयोजित एक भव्य समारोह में ईश्वर सृष्टि द्वारा प्रकाशित गौभारती ग्रंथ के विमोचन पर पर अपने विचार व्यक्त करते हुए उन्होंने कहा कि गायों को सरकार नहीं बचा सकती इसके लिए समाज को ही आगे आना होगा। हम जब अपने इतिहास में झांकते हैं तो पाते हैं कि हमारी सुदृढ़ अर्थ और कृषिव्यवस्था का मुख्य आधार हमारा गौवंश था।

गौशालाओं को संरक्षित करेंगे तो हम अपने आपको ही संरक्षित करेंगे। राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ ने गौसेवा संवर्ध्दन समिति बनाई है जो देश के गौवंश को बचाने व संरक्षित करने का का कार्य कर रही है।

उन्होंने कहा कि स्व. हस्तीमलजी संघ के ऐसे समर्पित कार्यकर्ता थे जो आजीवन गौसेवा करते रहे और गौवंश को बचाने में अपना तन-मन और धन लगा दिया।

इस अवसर पर इस्कॉन खारघर, मुंबई के अध्यक्ष स्वामी सूरदास जी ने तीखे शब्दों में सवाल उठाते हुए कहा कि हम अपनी संस्कृति और सांस्कृतिक मूल्यों से कट गए हैं इसलिए गौवंश को बचाने के लिए इस तरह के आयोजन करना पड़ रहे हैं। उन्होंने कहा कि जब कृष्ण मात्र 7 साल के थे तो गोपाष्टमी के दिन वे अपनी 7 लाख गायों को चराने के लिए जाने की जिद करने लगे तो उनके पिता ने कहा कि तुम पैर में जूते तो पहन लो, इस पर कृष्ण ने कहा कि जब मेरी सब गैयाँ बगेर जूते के जा रही है तो मैं जूते कैसे पहन लूँ, आप इन सब गायों के लिए जूतों की व्यवस्था कर दें।

उन्होंने कहा कि गाय की पूजा करने वाले इस देश में लोग कुत्ते पाल रहे हैं और कुत्ते सीधे बेडरुम तक पहुँच गए हैं। उन्होंने कहा कि हम ब्रह्म संहिता पढ़ेंगे तो अपने गौरवशाली इतिहास और पूर्वजों के बारे में जान सकेंगे। उन्होंने कहा कि मुंबई के वडाला के आईसीटी संस्थान में गौमूत् पर किए गए शोध में चौंकाने वाले नतीजे सामने आए हैं।

उन्होंने कहा कि गीता, गाय और श्रीमद् भागवत के माध्यम से हम पूरी दुनिया को अपनी बौध्दिक विरासत से अवगत करा सकते हैं। लेकिन हमको शरीर के तल पर जीने की बजाय आत्मा के तल पर जीना होगा।

उन्होंने कहा कि पूज्यप्रभुपाद जी ने गीता के माध्यम से इस्कॉन को 100 से ज्यादा देशों में स्थापित कर कृष्ण की महिमा को पहुँचाया है और दुनिया में 700 कृष्ण मंदिरों की स्थापना की है।

कार्यक्रम के प्रारंभ में च्वाईस कंपनी के श्री कमल पोद्दार ने कहा कि  तुलसीदास जी ने प्रभु श्री राम के जन्म के महत्व को विप्र, धेनु सुर संत हित लियो मनुज अवतार से रेखांकित किया. यानी श्री राम का जन्म विद्वानों, गाय, देवताओं और मनुष्य के कल्याण के लिए हुआ था इसमें भी गाय को दूसरे क्रम पर रखा गया था। इसीसे हम समझ सकते हैं कि भारतीय संस्कृति में गाय का क्या महत्व है।

उन्होंने गौभारती ग्रंथ के महत्व को रेखांकित करते हुए कहा कि आप जब इस ग्रंथ को देखेंगे तो पाएंगे कि इसमें गाय की उपयोगिता के कितने आयामों के बारे में बताया गया है। उन्होंने एक घटना का उल्लेख करते हुए कहा कि देश के पहले राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने तत्कालीन गृहमंत्री गोविंद वल्लब पंत को एक गोपनीय पत्र देकर गीता प्रेस गोरखपुर के संस्थापक हनुमान प्रसाद पोद्दार के पास भेजा। जब वो पत्र पोद्दार जी ने खोलकर देखा तो उन्होंने अपनी अस्वीकृति में सिर हिला दिया। तब पंतजी ने उनसे पूछा कि इस पत्र में क्या लिखा है तो पोद्दार जी ने कहा कि राष्ट्रपतिजी मुझे भारत रत्न का अलंकरण देना चाहते हैं जो मुझे स्वीकार्य नहीं। श्री पोद्दार ने कहा कि जो लोग रा,टर् के कार्य में लगे होते हैं उनको किसी तरह का पुरस्कार प्रभावित नहीं करता।

ईश्वरसृष्टि के संस्थापक श्री कमलेश पारीक का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि पारीक जी ने ईश्वर सृष्टि के माध्यम से भारतीय संस्कृति की एक ऐसी लौ जगाई है जो आने वाले कई वर्षों तक हमारी संस्कृति को आलोकित करती रहेगी।  कमलेश जी ने इस ग्रंथ के माध्यम से हमारे गौवंश को लेकर जो शोधपूर्ण लेख प्रकाशित किए हैं, उनको पढ़कर ही रोमांच और गर्व महसूस होता है।

इस अवसर पर श्री कमलेश पारीक ने बताया कि राजस्थान के सीकर में ईश्वर सृष्टि के माध्यम से एक ऐसा प्रकल्प तैयार किया गया है जिसमें ऋषि-कृषि तंत्र मंत्र और गौसंवर्धन संरक्षण का कार्य किया जाएगा। इसमें आयुर्वेद प्राकृतिक चिकित्सा और गौशाला का प्रारंभ हो चुका है, आने वाले समय में निःशुल्क गुरुकुल के माध्यम से वेदों और संस्कृत को संरक्षित करने का कार्य किया जाएगा।

उन्होंने कहा कि राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के निष्ठावान स्वयं सेवक ईश्वर सृष्टि की स्थापना से लेकर गौभारती ग्रंथ के प्रेरणास्त्रोत रहे हैं। उनकी स्मृति में पहला गौसेवक पुरस्कार मुंबई के समर्पित गौ सेवक श्री

गौ भारती ग्रंथ के संपादक श्री वीरेन्द्र याज्ञिक ने कहा कि यह ग्रंथ मात्र गाय की महिमा नहीं बताता है बल्कि गाय के माध्यम से हमारी प्राचीन संस्कृति, परंपरा और आने वाले भविष्य के प्रति जागरुक करता है।

इस पूरे आयोजन को सफल बनाने में च्वाईस समूह के श्री सुयश पाटोदिया का विशेष सहयोग रहा।

समारोह में जाने माने उद्योगपति श्री रामप्रकाश बूबना, सुधीर जी विद्वंस, एकल अभियान के श्री सत्यनारायण काबरा अतिथि के रूप में उपस्थित थे। इसके अतिरिक्त मुंबई शहर की कई संस्थाओं के प्रतिनिधि इस कार्यक्रम के साक्षी बने। कार्यक्रम में सीताराम पारीक, जयचंद शेट्टी, संजय पटेल जैसे समर्पित सेवाभावी लोगों की उपस्थिति उल्लेखनीय रही। जयपुर से पुष्कर उपाध्याय, अहमदाबाद से विजय परसाण, इन्दौर से श्री सुरेन्द्र त्रिपाठी, सीकर से महेश ठाकर इस कार्यक्रम के साक्षी बनने के लिए विशेष रूप से आए। कार्यक्रम का संचालन श्री विनोद मोरवाल ने किया।

ईश्वरसृष्टि के संस्थापक श्री कमलेश पारीक का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि पारीक जी ने ईश्वर सृष्टि के माध्यम से भारतीय संस्कृति की एक ऐसी लौ जगाई है जो आने वाले कई वर्षों तक हमारी संस्कृति को आलोकित करती रहेगी।  कमलेश जी ने इस ग्रंथ के माध्यम से हमारे गौवंश को लेकर जो शोधपूर्ण लेख प्रकाशित किए हैं, उनको पढ़कर ही रोमांच और गर्व महसूस होता है।

इस अवसर पर श्री कमलेश पारीक ने बताया कि राजस्थान के सीकर में ईश्वर सृष्टि के माध्यम से एक ऐसा प्रकल्प तैयार किया गया है जिसमें ऋषि-कृषि तंत्र मंत्र और गौसंवर्धन संरक्षण का कार्य किया जाएगा। इसमें आयुर्वेद प्राकृतिक चिकित्सा और गौशाला का प्रारंभ हो चुका है, आने वाले समय में निःशुल्क गुरुकुल के माध्यम से वेदों और संस्कृत को संरक्षित करने का कार्य किया जाएगा।

उन्होंने कहा कि राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के निष्ठावान स्वयं सेवक ईश्वर सृष्टि की स्थापना से लेकर गौभारती ग्रंथ के प्रेरणास्त्रोत रहे हैं। उनकी स्मृति में पहला गौसेवक पुरस्कार मुंबई के समर्पित गौ सेवक श्री लक्ष्मीनारायण चाण्डक को प्रदान किया गया ।

गौ भारती ग्रंथ के संपादक श्री वीरेन्द्र याज्ञिक ने कहा कि यह ग्रंथ मात्र गाय की महिमा नहीं बताता है बल्कि गाय के माध्यम से हमारी प्राचीन संस्कृति, परंपरा और आने वाले भविष्य के प्रति जागरुक करता है।

इस पूरे आयोजन को सफल बनाने में च्वाईस समूह के श्री सुयश पाटोदिया और श्री लक्ष्मीकांत सिंगड़ोदिया का विशेष सहयोग रहा।

समारोह में जाने माने उद्योगपति श्री रामप्रकाश बूबना, सुधीर जी विद्वंस, एकल अभियान के श्री सत्यनारायण काबरा अतिथि के रूप में उपस्थित थे। इसके अतिरिक्त मुंबई शहर की कई संस्थाओं के प्रतिनिधि इस कार्यक्रम के साक्षी बने। कार्यक्रम में सीताराम पारीक, जयचंद शेट्टी, संजय पटेल जैसे समर्पित सेवाभावी लोगों की उपस्थिति उल्लेखनीय रही। जयपुर से पुष्कर उपाध्याय, अहमदाबाद से विजय परसाण, इन्दौर से श्री सुरेन्द्र त्रिपाठी, सीकर से महेश ठाकर इस कार्यक्रम के साक्षी बनने के लिए विशेष रूप से आए। कार्यक्रम का संचालन श्री विनोद मोरवाल ने किया।

टोपी , रोटी और नींबू का अचार

यह अद्भुत संयोग है कि अपने समय का सर्वाधिक ख़ूंख़ार शासक औरंगज़ेब टोपियां सिलता था , अपनी आजीविका के लिए l आज के समय का एक औरंगज़ेब जेल में नींबू का अचार डाल कर , रोटी अचार खाने लगता है l इस भय से कि कहीं उस के भोजन में धीमा जहर न दे , दे सरकार l मसलन मुख़्तार अंसारी को जेल में ज़हर , धीमा ज़हर देने का इल्ज़ाम लगाता है , यह आज काऔरंगज़ेब l

इस क्रूर औरंगज़ेब को अगर धीमा ज़हर देना ही चाहे कोई सरकार तो रोटी वाले आटे में भी मिला सकती है l नींबू में भी l लेकिन विक्टिम कार्ड खेलने के लिए नींबू का अचार और रोटी का रोड मैप बनाना पड़ता है l सिर्फ़ नींबू अचार खा कर कोई पाँच साल तक स्वस्थ सानंद नहीं रह सकता l इतना कि विष बुझे संवाद बोल-बोल कर अपने गुनाहों की ढाल नींबू अचार को बनाना पड़ जाता है l

भारत माता को डायन बताने वाले , कभी पूरी अभद्रता से जया प्रदा की चड्ढी का रंग बताने वाले , कलक्टर से जूता साफ़ करवाने की हसरत रखने वाले इस क्रूर औरंगज़ेब को लोकतंत्र में नहीं , शरिया में यक़ीन है l समूचे उत्तर प्रदेश को बिना लाइसेंस के बूचड़खाने में तब्दील कर दिया था l मुलायम सिंह यादव को , अखिलेश यादव को बतौर मुख्य मंत्री , अपने इशारे पर नचाने वाले , रामपुर को जहन्नुम बनाने वाले इस आज के औरंगज़ेब को अभी क़ानून में ठीक से यक़ीन दिलाने के लिए अभी बहुत कुछ और करने की ज़रूरत है l इस औरंगज़ेब को नहीं मालूम कि जेल मैनुअल और क़ानून का राज है , देश और उत्तर प्रदेश में l

शुक्रिया है , इलेक्ट्रॉनिक मीडिया का कि इस औरंगज़ेब की कोर्निश बजाते हुए भी , इसे इस की बात में नंगा कर दिया है l इतना कि नींबू अचार पानी मांगे और टोपियां सिलने के लिए आईना मिल जाए l जब तक सज़ा का ऐलान नहीं होता , तब तक ज़मानत को इंजवाय करो , आज के औरंगज़ेब ! यह क्रूरता , हेकड़ी और अकड़ का जमजम तुम्हारे लिए ही है l

श्याम जी कृष्ण वर्मा: लंदन में अखबार निकाला , अंग्रेजों के विरुद्ध निंदा प्रस्ताव लाये

4 अक्टूबर 1857 : जन्म दिवस

श्यामकृष्ण जी वर्मा ऐसे स्वतंत्रता संग्राम सेनानी थे जिन्होंने न केवल देश विदेश में अंग्रेजों से मुक्ति का वातावरण बनाया अपितु क्राँतिकारियों की एक पूरी पीढ़ी का मार्ग दर्शन किया। इनमें जिसमें स्वातंत्र्यवीर विनायक सावरकर जी से लेकर मदनलाल ढींगरा तक एक लंबी सूची है । उनका निधन जिनेवा में हुआ था ।

ऐसे महान स्वतंत्रता संग्राम सेनानी और “क्राँति गुरू” कहे जाने वाले श्यामकृष्ण जी वर्मा का जन्म 4 अक्टूबर 1857 को गुजरात प्राँत के कच्छ जिला अंतर्गत ग्राम मांडवी में हुआ था । उनके पिता श्रीकृष्ण वर्मा संस्कृत के विद्वान थे और माता गोमती देवी भारतीय संस्कृति एवं परंपराओं के अनुरुप जीवनशैली में रची बसी थीं। श्यामजी की आरंभिक शिक्षा अपने गाँव में ही हुई । बालपन में ही उन्हें संस्कृत का अद्भुत ज्ञान हो गया था । उन्होंने घर में भारतीय वाड्मय के संस्कृत ग्रंथों का भी अध्ययन किया । जब वे ग्यारह वर्ष के थे तब माता का निधन हो गया था ।फिर उनकी देखभाल दादी ने की । महाविद्यालयीन शिक्षा के लिये मुम्बई गये ।

संस्कृत ज्ञान और कुशाग्र बुद्धि के कारण पूरे महाविद्यालय में चर्चित हो गये। जिन दिनों श्यामजी कृष्ण वर्मा बम्बई में रह रहे थे तब 1875 में उनकी भेंट स्वामी दयानन्द सरस्वती से हुई । स्वामीजी मुम्बई आये थे । श्यामजी ने प्रवचन सुने । इसी वर्ष मुम्बई में आर्य समाज की स्थापना हुई । श्यामजी आर्य समाज से जुड़ गये । और आर्यसमाज द्वारा किये जा रहे वेदों के भाष्यानुवाद से भी जुड़ गये । इसी वर्ष ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय लंदन के संस्कृत विभाग के प्रमुख मोनियर विलियम भारत आये थे । वे ऐसे संस्कृत विद्वानों से मिलना चाहते थे जो अंग्रेजी भी जानते हों। युवा श्याम जी की उनसे भेंट हुई ।

श्याम जी की विद्वता से प्रभावित मोनियर जी ने श्याम जी को ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय लंदन आमंत्रित किया । इसी बीच हुआ । उनकी पत्नि भानुमति एक सुप्रसिद्ध व्यापारी की बेटी थी । भानुमति के पिता ने उन्हें लंदन भेजने का प्रबंध किया । वे 1878 में इंग्लैड गये । कुछ दिन श्री मोनियर के सहायक के रूप में रहे फिर उनकी अनुशंसा पर 1879 में बी ए करने के लिये बैलियोज कॉलेज में प्रवेश ले लिया। इस महाविद्यालय से अपनी पढ़ाई के साथ निजी स्तर पर संस्कृत का अध्ययन भी निरंतर रहा । उन्होंने 1883 में बी ए किया और संस्कृत में डिग्री भी ।

लंदन में रहकर बी ए करने वाले पहले भारतीय थे । बी ए की डिग्री और संस्कृत ज्ञान के कारण ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय में अध्यापक पद नियुक्त हो गये । ऑक्सफोर्ड में संस्कृत के साथ वे भारतीय विद्यार्थियों को गुजराती और मराठी भी पढ़ाया करते थे।
प्राध्यापक के रूप में भी उन्होंने अपनी शिक्षा जारी रखी और वकालत में प्रवेश ले लिया । बैरिस्टरी की परीक्षा पास करके भारत लौट आये । उन्होंने बम्बई में वकालत शुरु की । पर मन न लगा। वकालत छोड़कर मध्यप्रदेश के रतलाम चले आये । इसका कारण यह था कि मुंबई में छात्र जीवनसे लंदन तक और लौटकर वकालत में भी उन्होंने अंग्रेजों द्वारा भारतीयों के साथ किया जाने वाला घोर अपमान देखा था । पर उनके सामने कुछ विकल्प न था। इसलिए पहले सब सहा और फिर मुम्बई छोड़कर छोटी जगह चल दिये ।

रतलाम आकर रियासत के दीवान हो गये । कुछ दिन रतलाम रहकर 1893 में राजस्थान के उदयपुर चले गये। वहाँ राज्य कौंसिल के सदस्य बने। उदयपुर में तीन वर्ष रहे। उसके बाद जूनागढ़ चले गये और वहाँ भी दीवान पद पर नियुक्ति मिल गई। किन्तु जूनागढ़ में तैनात अंग्रेज पोलिटिकल एजेंट से विवाद हो गया । तब उन्होंने मन ही मन कुछ संकल्प किया और दीवानी छोड़कर पुनः वकालत करने मुम्बई आ गये । श्यामजी एक संवेदनशील और स्वाभिमानी व्यक्ति थे । भारतीय सांस्कृतिक मूल्यों के प्रति समर्पण भी अटूट था। उन्होंने हर कदम पर भारतीयों का अपमान देखा था । इसलिए उन्होंने स्वाभिमान रक्षा के लिये समाज को जाग्रत करने का संकल्प किया । सबसे पहले अपने साथी वकीलों का एक समूह बनाया और ऐसे भारतीयों के समर्थन में मुक़दमें लड़ना आरंभ किया । जिनपर पुलिस अत्याचार करती थी । और बिना किसी अपराध के जेल में ठूंस देती थी ।

यह 1898 का वर्ष था । चापेकर बन्धुओं ने पूना में गवर्नर की हत्या कर दी थी। इस घटना की गूँज पूरे देश में हुई । चापेकर बन्धु गिरफ्तार हुये और उन्हें फांसी दे दी गई। उन्हीं दिनों तिलकजी भी गिरफ्तार किये गये । मुम्बई के वकीलों ने तिलक जी गिरफ्तारी का विरोध किया और चाफेकर बंधुओं पर मुकदमा चलाने के तरीके पर भी आपत्ति की । चाफेकर बंधुओं पर चला मुकदमा एक औपचारिकता था । श्यामजी और वकीलों के इस समूह ने महाराष्ट्र कांग्रेस से भी आपत्ति दर्ज कराने का आग्रह किया। काँग्रेस ने आवेदन तो दिया पर विरोध के लिये खुलकर आगे न आ सकी । उन्हीं दिनों स्वामी श्रृद्धानंद मुम्बई आये । श्याम जी की उनसे भेंट हुई और संघर्ष की योजना बनी । इस योजना के अनुसार श्याम जी ने देशभर के उन संघर्षशील नौजवानों को संगठित करने का निर्णय लिया जो अपने स्तर पर स्थानीय तौर पर अंग्रेजों के विरुद्ध सशस्त्र अभियान चला रहे थे ।

इस अभियान के बंगाल, पंजाब और महाराष्ट्र तीन प्रमुख केन्द्र थे।

श्याम जी ने पंजाब, बंगाल और पूना की यात्रा की उनके संपर्क साँझा किये । पंजाब के क्राँतिकारियों को जो संपर्क बंगाल और महाराष्ट्र से बना था उसमें श्यामजी की भूमिका महत्वपूर्ण थी । इतना करके वे पुनः लंदन रवाना हुये । वे लंदन मेंउन नौजवानों में स्वाभिमान संघर्ष की नींव रखना चाहते थे जिन्हें अंग्रेजों के अपमान जनक व्यवहार की आदत हो गई थी । उन्होनें लंदन में तीन काम आरंभ किये । एक लंदन में रहने वाले सभी भारतीयों को एक सूत्र पिरोने का, दूसरा लंदन में पढ़ाई करने वाले छात्रों के लिये छात्रावास का और तीसरा भारतीयों के मानवाधिकारों की रक्षा के लिये एक समाचारपत्र निकालने का । उन्होंने फरवरी 1905 को लंदन में “द इंडियन होम रूल सोसाइटी” नाम से एक संस्था का गठन किया । इसके गठन के लिये पहली बैठक उनके हाईगेट स्थित घर पर हुई । श्याम जी सोसायटी के संस्थापक अध्यक्ष बने । इस होमरूल सोसायटी का केन्द्र का नाम “इंडिया हाउस” रखा गया । जो 65, क्रॉमवेल एवेन्यू, हाईगेट में स्थित था । इसे एक छात्रावास का रूप दिया गया जिसमें । 25 छात्रों को रहने की व्यवस्था थी । इसका औपचारिक उद्घाटन 1 जुलाई को सोशल डेमोक्रेटिक फेडरेशन के हेनरी हाइंडमैन द्वारा हुआ । इस अवसर पर दादाभाई नौरोजी , लाला लाजपत राय , मैडम कामा, लंदन पॉज़िटिविस्ट सोसाइटी के श्री स्विनी और श्री हैरी, एसआर राणा , विनायक दामोदर सावरकर, वीरेंद्रनाथ चट्टोपाध्याय और लाला हरदयाल उपस्थित थे ये सभी रूप से जुड़ गये ।

इंडिया हाउस का सारा खर्च श्याम जी स्वयं उठाते थे । इंडिया हाउस भारतीयों की सभा संगोष्ठियों का केन्द्र बन गया था । इन सभाओं में भारत की स्वतंत्रता पर खुलकर बात होती । आगे चलकर भाई परमानन्द और बिट्ठलभाई पटेल भी इंडिया हाउस से जुड़ गये ।इसी वर्ष इंग्लैण्ड से उन्होंने एक मासिक समाचार-पत्र “द इण्डियन सोशियोलोजिस्ट” का प्रकाशन आरंभ किया, जिसे आगे चलकर जिनेवा से भी प्रकाशित किया गया। इंग्लैण्ड का यह इंडिया हाउस क्रान्तिकारी आँदोलन का प्रेरणा केन्द्र बन गया । अनेक क्राँतिकारी नौजवान उनके शिष्य बने इनमें क्रान्तिकारी मदनलाल ढींगरा और स्वातंत्र्यवीर सावरकर उनके प्रिय शिष्यों में थे। सावरकर जी ने श्यामजी के मार्गदर्शन में ही 1857 की क्रांति पर पुस्तक लेखन आरंभ किया था।

1906 में भारत में स्वदेशी आन्दोलन आरंभ हुआ । बंगाल में सुरेन्द्रनाथ बनर्जी सहित अनेक आँदोलनकारी बंदी बनाये गये । इस पर इंडिया हाउस में सभा हुई और अंग्रेजी सरकार के विरुद्ध निन्दा प्रस्ताव पारित किया गया । इसकी प्रतियाँ समाचार पत्रों को भी भेजीं गई। इसके साथ श्याम जी ने विभिन्न देशों और नगरों में जाकर संगोष्ठियों में भाग लेना आरंभ किया और अंग्रेज सरकार के विरुद्ध खुलकर बोलते । इसी कड़ी में होलबोर्न टाउन हॉल में आयोजित यूनाइटेड कांग्रेस ऑफ़ डेमोक्रेट्स की संगोष्ठी में पहुँचे । जिसमें वे भारतीय स्वाभिमान पर खुलकर बोले । इस पर उन्हें सराहना भी मिली। श्यामजी के आलेख न केवल उनके समाचार पत्र में अपितु आयरिश, जिनेवा और फ्रांस के कुछ समाचार पत्रों में भी छपने लगे । पर इंग्लैंड के समाचार पत्रों में उनकी गतिविधियों की आलोचना होने लगी । वे ब्रिटिश सरकार की नजर में चढ़े । उनकी गिरफ्तारी होती इससे पहले ही वे लंदन से निकल कर पेरिस पहुँचे । श्यामजी ने अपना मुख्यालय पेरिस बना लिया । इंडिया हाउस का प्रभार सावरकर जी ने संभाला ।

इंडिया हाउस की गतिविधियों में कोई अंतर न आया । श्यामजी 1914 तक पेरिस में रहे। और अपना क्रान्तिकारी अभियान चलाते रहे। ‘इंडियन सोशियोलॉजी’ के कुछ अंक पेरिस से प्रकाशित हुए।

उनकी सक्रियता और क्राँतिकारी गतिविधियों के कारण उनपर पेरिस में भी नजर रखी जाने लगी। पूछताछ भी हुई । तब वे पेरिस छोड़कर जिनेवा आ गये । और जिनेवा में ही उन्होंने 30 मार्च 1930 को अपने जीवन की अंतिम श्वाँस ली ।

जिनेवा में रहने वाले भारतीयों ने उननका दाह संस्कार करके अस्थियाँ जिनेवा की सेण्ट जॉर्ज सीमेट्री में सुरक्षित रख दीं । कुछ दिनों बाद में उनकी पत्नी भानुमती कृष्ण वर्मा का भी निधन हो गया । उनकी अस्थियाँ भी उसी सीमेट्री में रख दी गयीं। उनके निधन के बहत्तर वर्ष बाद 22 अगस्त 2003 को गुजरात के तत्कालीन मुख्यमन्त्री श्री नरेन्द्र मोदी के अनुरोध पर स्विस सरकार ने श्यामजी और उनकी पत्नी भानुमती जी की अस्थियों को भारत भेज दीं। जब ये अस्थियाँ मुम्बई पहुँची तब मुम्बई से लेकर माण्डवी तक राजकीय सम्मान के साथ भव्य जुलूस के रूप में अस्थि-कलश गुजरात लाये गये। श्याम जी के जन्म स्थान पर क्रान्ति-तीर्थ बनाया गया और इसी परिसर में श्यामजी कृष्ण वर्मा स्मृतिकक्ष बनाकर अस्थियाँ संरक्षित की गई ।

यह मेमोरियल 13 दिसम्बर 2010 को राष्ट्र को समर्पित किया गया। कच्छ जाने वाले सभी देशी विदेशी पर्यटकों के लिये माण्डवी का “क्रान्ति-तीर्थ” एक महत्वपूर्ण पर्यटन स्थल है।

Ramesh Sharma
(लेखक ऐतिहासिक व्यक्तियों व राष्ट्र के लि़ए समर्पित लोगों के लि़ए शोधपूर्ण लेख लिखते हैं)

स्वदेशी से ही समृध्दि संभव

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के स्थापना महोत्सव यानी प्रत्येक वर्ष विजयदशमी के अवसर पर संघ प्रमुख का उद्बोधन एक नए संदेश और नये दृष्टिकोण के साथ सामने आता है, इस उद्बोधन का पूरा राष्ट्र इंतजार करता है। इस बार संघ प्रमुख मोहन भागवत ने कई ऐसी बातें कहीं, जो सरकार के साथ समाज के लोगों का ध्यान खींचने वाली हैं। इस पर आश्चर्य नहीं कि उन्होंने अपने संबोधन में अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप की ओर से भारत पर थोपे गए टैरिफ की चर्चा की। 50 प्रतिशत अमेरिकी टैरिफ ने भारत के समक्ष जो कठिन चुनौती खड़ी कर दी है, उसका प्रभावी ढंग से सामना स्वदेशी और स्वावलंबन की राह पर चलकर ही किया जा सकता है। भागवत ने संबोधन में स्वदेशी और स्वावलंबन को नए भारत का आधार बताया है। उन्होंने कहा कि आज की वैश्विक अर्थव्यवस्था में परस्पर निर्भरता एक स्वाभाविक स्थिति है, लेकिन यह निर्भरता कभी भी बंधन या मजबूरी में परिवर्तित नहीं होनी चाहिए। भारत को आत्मनिर्भर बनने की दिशा में आगे बढ़ना होगा ताकि विदेशी निर्णयों और नीतियों पर हमारी नियंत्रण क्षमता सीमित न हो जाए। उनका कहना था कि स्वदेशी का अर्थ यह नहीं है कि हम दुनिया से कट जाएं, बल्कि यह है कि हम अपनी शर्तों पर और अपनी आवश्यकताओं के अनुसार संबंध बनाएं।

संघ की स्थापना का यह अवसर केवल एक उत्सव मात्र नहीं था, बल्कि यह आयोजन भारत की आत्मा और उसके भविष्य की एक गहन घोषणा थी। भागवत ने स्पष्टता और गंभीरता से अपने विचार रखे, भारत को विश्वगुरु बनाने की दिशा में एक नया क्षितिज भी उद्घाटित किया। यह आयोजन संघ के सौ वर्ष सम्पूर्णता की साधना का मूल्यांकन ही नहीं, बल्कि आने वाले सौ वर्षों की दिशा का भी उद्घोष था। नई इबारत लिखते हुए भागवत ने स्पष्ट कहा कि संघ की कार्यप्रणाली का सार है, नए मनुष्य एवं सशक्त-स्वावलम्बी भारत का निर्माण। यह विचार सुनने में सरल लग सकता है, किंतु इसके निहितार्थ अत्यंत गहरे हैं। समाज और राष्ट्र की सारी समस्याओं का मूल व्यक्ति के भीतर छिपा है। इसीलिये देश के सभी वर्गों को एकसूत्र में जोड़ने के संकल्प के साथ संघ आगे बढ़ेगा क्योंकि जब तक व्यक्ति का चरित्र, दृष्टि और आचरण नहीं बदलते, तब तक कोई भी व्यवस्था स्थायी रूप से परिवर्तित नहीं हो सकती। संघ व्यक्ति-निर्माण के माध्यम से समाज और राष्ट्र को बदलने की दीर्घकालिक साधना कर रहा है। यही कारण है कि संघ के कार्य का परिणाम केवल शाखाओं या कार्यक्रमों में नहीं मापा जा सकता, बल्कि उस अदृश्य लेकिन ठोस नैतिक शक्ति एवं सशक्त राष्ट्रीय भावना में देखा जा सकता है, जो धीरे-धीरे समाज की दिशा बदल रही है।

भागवत ने स्पष्ट किया कि आत्मनिर्भरता केवल आर्थिक दृष्टि तक सीमित नहीं है, बल्कि यह सामाजिक, सांस्कृतिक और जीवन मूल्यों से भी जुड़ी हुई है। उन्होंने विविधता को भारत की विशेषता बताया और समाज में विभाजनकारी प्रवृत्तियों पर चेताया। उन्होंने पंच परिवर्तन की संकल्पना भी प्रस्तुत की जिसमें आत्मजागरूकता, पारिवारिक मूल्य, नागरिक अनुशासन और पर्यावरण के प्रति संवेदनशीलता को जोड़ा गया है। इस संदेश के सकारात्मक पक्ष अनेक हैं। यदि इसे गंभीरता से अपनाया जाए तो यह देश की आर्थिक और सामाजिक स्थिति को नई दिशा दे सकता है। स्थानीय उद्योगों, हस्तशिल्प और कृषि को बढ़ावा देने से रोजगार का सृजन होगा और आर्थिक आत्मसम्मान मजबूत होगा। स्वदेशी पर बल देने से विदेशी निर्भरता घटेगी और देश की सुरक्षा व नीति संबंधी स्वतंत्रता बढ़ेगी। यदि समाज के स्तर पर भी इस सोच को अपनाया जाए तो उपभोक्तावाद के स्थान पर संवेदनशीलता और सेवा भाव विकसित होगा। विविधता के सम्मान और सामाजिक सद्भाव के आग्रह से राष्ट्र अधिक एकजुट और शक्तिशाली बन सकता है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी जिस आत्मनिर्भर भारत का आह्वान कर रहे हैं, उसका मूल उद्देश्य केवल आर्थिक स्वतंत्रता तक सीमित नहीं है। यह संदेश देश की घरेलू क्षमताओं को सशक्त बनाने, आयात पर निर्भरता घटाने और स्थानीय उद्योगों को प्रोत्साहन देने के साथ-साथ विकास की दिशा को व्यापक सामाजिक सरोकारों से भी जोड़ता है, जिसमें महात्मा गांधी की ‘स्वदेशी अपनाओ’ और पंडित दीनदयाल उपाध्याय की ‘अंत्योदय’ की परिकल्पना स्पष्ट तौर पर समाहित है।

स्वदेशी और स्वावलंबन की राह पर चलकर ही नया भारत-सशक्त भारत का निर्माण किया जा सकता है। इस बात को सरकार भी रेखांकित कर चुकी है और अब संघ प्रमुख ने भी दोहरा दिया। यह समय की मांग है कि स्वदेशी और स्वावलंबन पर तब तक बल दिया जाए, जब तक वांछित सफलता न मिल जाए। जहां सरकार को स्वदेशी की राह को आसान करना होगा, वहीं समाज को सहयोग देने के लिए तत्पर रहना होगा। इस उम्मीद में नहीं रहा जाना चाहिए कि अमेरिका के साथ शीघ्र ही आपसी व्यापार समझौता हो जाएगा। एक तो जब तक ऐसा हो न जाए तब तक चैन से नहीं बैठा जा सकता और दूसरे, यदि ऐसा हो जाए तो भी भारत को स्वदेशी और स्वावलंबन की राह पर चलना छोड़ना नहीं चाहिए। व्यापारिक साझेदारों पर निर्भरता लाचारी में नहीं बदलनी चाहिए। वास्तव में इस स्थिति से बचने का ही उपाय है स्वदेशी उत्पादन पर ध्यान केंद्रित करना। परंतु इस संदेश के साथ कई चुनौतियां और सीमाएं भी जुड़ी हुई हैं। आज की वैश्विक अर्थव्यवस्था इतनी आपस में गुँथी हुई है कि किसी भी देश का पूर्ण स्वावलंबन व्यावहारिक रूप से संभव नहीं है। अनेक तकनीकें और कच्चे माल अब भी हमें विदेशों से ही प्राप्त करने होते हैं। यदि स्वदेशी को बढ़ावा देने के नाम पर विदेशी व्यापार पर प्रतिबंध या अधिक शुल्क लगाए जाते हैं तो यह व्यापार युद्ध और आर्थिक तनाव को जन्म दे सकता है। इस संदेश की सफलता केवल भाषणों और भावनात्मक नारों तक सीमित नहीं रहनी चाहिए बल्कि ठोस नीतियों, बजट, शोध और योजनाओं के आधार पर इसे अमल में लाना होगा।

सामाजिक दृष्टि से भी यह आवश्यक है कि स्वदेशी और स्वावलंबन का नारा केवल एक सांस्कृतिक या राजनीतिक रंग में न ढल जाए। यह तभी कारगर होगा जब इसे हर वर्ग, हर धर्म और हर क्षेत्र का साझा लक्ष्य बनाया जाएगा। नागरिकों की आदतों और व्यवहार में बदलाव लाना आसान नहीं है, लेकिन यदि यह बदलाव शिक्षा, प्रोत्साहन और जनचेतना के माध्यम से लाया जाए तो यह नारा समाज में गहरी जड़ें जमा सकता है। संघ प्रमुख का यह संदेश नए भारत की दिशा में प्रेरणा का स्रोत है। यह हमें बताता है कि हमें अपनी सांस्कृतिक और आध्यात्मिक शक्ति पर गर्व करना चाहिए, वैज्ञानिक और तकनीकी दृष्टि से सशक्त होना चाहिए और विश्व के साथ संवाद स्थापित करते हुए भी अपनी स्वायत्तता को बनाए रखना चाहिए। किंतु इसके लिए आलोचनात्मक विवेक, व्यावहारिक सोच और निरंतर समीक्षा की आवश्यकता है। आज विभिन्न देशों की परस्पर मित्रता का आधार अपने-अपने आर्थिक-कूटनीतिक हित हैं। इन स्थितियों में सर्वोत्तम उपाय स्वदेशी को बल देते हुए देश को आत्मनिर्भर बनाना है।

आज की वैश्विक परिस्थितियों पर दृष्टि डालें तो भागवत के विचार और भी प्रासंगिक हो उठते हैं। दुनिया हिंसा, आतंकवाद, युद्ध और उपभोक्तावाद की अंधी दौड़ से त्रस्त है। पर्यावरण संकट दिन-प्रतिदिन गंभीर होता जा रहा है। मानसिक तनाव और आत्मकेंद्रित जीवन-शैली ने मानव को भीतर से खोखला कर दिया है। इन परिस्थितियों में भारत ही वह देश है, जो एक वैकल्पिक जीवन-दर्शन दे सकता है। भारत के पास भौतिक विकास के साथ-साथ आध्यात्मिक समृद्धि की धरोहर है। यही धरोहर भारत को विश्वगुरु बनने की पात्रता प्रदान करती है। संघ की शताब्दी वर्ष की सम्पूर्णता का उद्घोष केवल संघ के स्वयंसेवकों के लिए नहीं, बल्कि पूरे देश और विश्व के लिए एक संदेश है। यह संदेश है- स्वावलम्बी एवं स्वदेशी भावना को बदल देना, नए मनुष्य का निर्माण करना, गरीब को उठाना, धर्मों को जोड़ना, समाज में समरसता स्थापित करना और हिंदुत्व की व्यापक जीवन दृष्टि के आधार पर विश्व को दिशा देना। यह केवल भाषण नहीं, बल्कि एक संकल्प है।

प्रेषकः

(ललित गर्ग)
लेखक, पत्रकार, स्तंभकार
ई-253, सरस्वती कंुज अपार्टमेंट
25 आई. पी. एक्सटेंशन, पटपड़गंज, दिल्ली-92
फोनः 22727486, 9811051133

आरएसएस @100: विजयादशमी पर मैं भारत बोल रहा हूँ

विजयादशमी का दिन विजय के संकल्प का दिन है। यह विजय न किसी एक व्यक्ति की दूसरे व्यक्ति पर और न ही किसी देश की दूसरे देश पर विजय है। अपितु यह धर्म की अधर्म पर, नीति की अनीति पर, सत्य की असत्य पर, प्रकाश की अंधकार पर और न्याय की अन्याय पर विजय है। अपनी परंपरा में आज का दिन स्फूर्ति का दिवस है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ विजयादशमी केवल एक त्योहार नहीं, बल्कि एक आध्यात्मिक, सांस्कृतिक और संगठनात्मक प्रेरणा का दिन है। संघ से जुड़े प्रत्येक स्वयंसेवक के लिए आज का दिन गौरव व ऊर्जा भरा भी रहता है क्योंकि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की स्थापना डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार ने विजयादशमी के दिन ही 27 सितंबर 1925 (हिंदू पंचांग अनुसार आश्विन शुक्ल दशमी) को की थी। इसलिए यह दिन संघ के लिए संघ स्थापना दिवस के रूप में मनाया जाता है।

विजयदशमी उत्सव दैवीय शक्तियों का आसुरी शक्तियों पर, न्याय का अन्याय पर विजय स्वरूप मनाये जाने वाला उत्सव है। इसी के साथ नौ दिन तक देवी के विभिन्न रूपों की, शक्तियों और गुणों की पूजा व साधना शुरु होती है। इस साधना और तप द्वारा अपने अन्दर की शक्तियों और गुणों के विकास का सभी प्रयास करते हैं। त्रेता युग में भगवान श्रीराम ने रावण जैसे महापराक्रमी को परास्त कर धर्म राज्य की स्थापना की थी। उससे पहले शक्ति स्वरूपा माँ दुर्गा ने असुरों पर विजय प्राप्त की थी। इसलिए यह पर्व नारी शक्ति की उपासना का भी प्रतीक है। संघ भी पिछले सौ वर्षों से निरंतर इन्हीं गुणों का व्यक्ति और समाज में विकास करने के लिये भगवान राम के कार्य मे लगा हुआ है, ताकि कोई भी रावण जैसी आसुरी शक्ति समाज पर अत्याचार न कर पाये। संघ का उद्देश्य है भारत में ही नहीं बल्कि विश्व भर में रामराज्य की स्थापना हो। भारत एक समृद्धिशाली, शक्तिशाली व सभी के लिए हितकारी राष्ट्र के रूप में उभरे।

समाज केंद्रित अनवरत संघ यात्रा:

संघ की सौ वर्षों की यात्रा के तीन वैशिष्ट्य रहे है। अनवरत, अखंड एवं निरंतरता। संघ ने मूल को कभी नहीं छोड़ा, बल्कि कालसुसंगत नई बातों को जोड़ते गए। वर्ष 1925 से 1940 तक पहली पीढ़ी ने सारे देश में संघ कार्य का बीजारोपण किया। विचार, कार्य पद्धति, प्रशिक्षण, कार्यकर्ता निर्माण की प्रक्रिया पर अपना फोकस रखा। उसके बाद के कालखंड में हम देखते है कि 1940 से 1975 तक पूरे राष्ट्र में संघ कार्य का विस्तार, पाकिस्तान और चीन का हमला, आपातकाल में समाज में संघ के प्रति विश्वास, समाज में संघ कार्य के प्रति जुड़ाव व स्वयंसेवकों के समर्पण तथा देशभक्ति से संघ के प्रति विरोध भी धीरे-धीरे समाप्त होना प्रारंभ हुआ। वर्ष 1975 से 2000 में संघ के राष्ट्रव्यापी कार्य में समाज सहयोगी हो गया, संघ संस्थापक डॉक्टर हेडगेवार का शताब्दी वर्ष, श्री राम जन्मभूमि आदि के निमित्त संघ कार्य समाजव्यापी हुआ, समाजक्षेत्र के विभिन्न क्षेत्रों में संघ ने प्रवेश किया। वर्ष 2000 से अब तक श्रीगुरु जी जन्म शताब्दी, समाज की सज्जन शक्ति का जागरण, समाज को दिशा देने के निमित्त अनेक कार्यों में सक्रिय भूमिका के कारण समाज और संघ एक ही प्लेटफॉर्म पर आ गए, कोविड में समाज और संघ स्वयंसेवकों ने मिलकर कार्य किया, श्री रामजन्मभूमि हेतु निधि समर्पण अभियान में समाज का अद्भुत प्रतिसाद संघ कार्य के प्रति उनके अटूट विश्वास का परिचायक बना। संघ कुछ नहीं करेगा परंतु स्वयंसेवक कुछ नहीं छोड़ेगा। संघ के इसी विचार से प्रेरित होकर स्वयंसेवकों ने समाज के प्रत्येक क्षेत्र में अपनी सक्रिय भूमिका निभाकर सकारात्मक परिवर्तन किये।

पंच परिवर्तन से समाज परिवर्तन:

यह राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ द्वारा समाज निर्माण की दिशा में उठाया गया एक महत्त्वपूर्ण विचार है। इसका उद्देश्य भारतीय समाज को संस्कारयुक्त, संगठित, समरस और शक्तिशाली बनाना है, जिससे राष्ट्र की उन्नति हो सके। पांच ऐसे विषय जो स्वयं से प्रारम्भ होकर समाज को जोड़ते हैं यानि पंच परिवर्तन से समाज परिवर्तन। जिसमें सामाजिक समरसता, कुटुंब प्रबोधन, पर्यावरण, स्व के भाव का जागरण और नागरिक शिष्टाचार शामिल है। सामाजिक समरसता का उद्देश्य जाति, भाषा, क्षेत्र, धर्म आदि के भेद मिटाकर समाज में एकात्मता और बंधुत्व का विकास करना है। ताकि समाज में भेदभाव नहीं, समानता और सम्मान हो, यही समरसता है। कुटुंब प्रबोधन का उद्देश्य परिवार को केवल एक सामाजिक इकाई नहीं, बल्कि संस्कार, संवाद और संस्कृति का केंद्र मानना। क्योंकि संस्कारयुक्त परिवार ही सशक्त समाज की नींव है।

पर्यावरण संरक्षण का केंद्रबिंदु प्रकृति के साथ संतुलन बनाना, विकास के नाम पर विनाश को रोकना है। वृक्षारोपण, जल संरक्षण, प्लास्टिक मुक्त भारत, सौर ऊर्जा के प्रयोग का प्रचार जैसे अनेकों अभियान इस कार्य में सहयोगी हो सकते हैं। क्योंकि पर्यावरण की रक्षा, जीवन की रक्षा है। स्व के भाव का जागरण का उद्देश्य स्वदेशी विचार, संस्कृति, परंपरा और गौरव को पुनः जागृत करना है। ताकि शिक्षा, भाषा, इतिहास, नायकों, परंपराओं में स्व की प्रतिष्ठा बढ़े तथा अपने राष्ट्रीय आदर्शों, आस्थाओं और प्रतीकों के प्रति सम्मान के भाव का जागरण हो। इसके लिए हमें अपने व्यवहार में भारतीय भाषाओं का प्रयोग, भारतीय वस्त्र, योग, त्योहारों का पारंपरिक रूप से पालन, स्वदेशी अपनाओ, भारतीय ज्ञान प्रणाली का पुनरुत्थान जैसे प्रयोगों को लाना ही होगा। क्योंकि यह कटु सत्य है कि जब तक स्व नहीं जागेगा, तब तक समाज सशक्त नहीं होगा। नागरिक शिष्टाचार का फोकस व्यक्तिगत अनुशासन, सार्वजनिक आचरण, और समाज के प्रति उत्तरदायित्व को मजबूत करना है। क्योंकि देशभक्ति केवल नारों से नहीं, बल्कि रोज़मर्रा की जिम्मेदारियों के पालन से प्रकट होती है।

समाज जागरण से राष्ट्र वैभव तक:

पिछले सौ वर्षों से राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के लाखों-लाख स्वयंसेवकों द्वारा एक निरंतर महायज्ञ चल रहा है, एक यज्ञ जिसका उद्देश्य केवल कर्मकांड नहीं, बल्कि समाज को संगठित, जागरूक और सशक्त बनाना है। यह यज्ञ उन आगामी समस्याओं और चुनौतियों से जूझने की तैयारी है, जो समय-समय पर हमारे समक्ष आती हैं। आज आवश्यकता है कि सज्जन शक्ति, समाज की सकारात्मक और राष्ट्रनिष्ठ शक्तियाँ एक साथ आएँ। भारत जैसा विशाल देश, केवल किसी एक संगठन या समूह के प्रयासों से नहीं, बल्कि सभी के सामूहिक सहयोग और सक्रिय भागीदारी से ही आगे बढ़ सकता है। मतभेदों को भूलकर, हम सबको मातृभूमि के प्रति अपने कर्तव्यों का निर्वाह करना होगा। आज विजयादशमी के इस पावन दिन पर हम सबका संकल्प बनना चाहिए कि हम इस पवित्र भारत भूमि को फिर से विश्वगुरु के स्थान पर प्रतिष्ठित करें। इसलिए सभी माताओं, बहनों, बंधुओं और युवाओं को यह तय करना होगा कि वे देश की आवश्यकता के अनुरूप इस राष्ट्रकार्य में अपनी सक्रिय भूमिका निभाएँ। आज का यह कालखण्ड केवल एक युगांत नहीं, बल्कि अमृतकाल है। अब समय है कि हम सब मिलकर भगीरथ प्रयास करें और भारत माता को उसके परम वैभव, उसके गौरवपूर्ण स्थान तक पहुँचाएँ।

अब हमें अपने दायित्वबोध को ओर व्यापक करके देखना होगा। क्योंकि आज विश्व को भारत की नितान्त आवश्यकता है। भारत को अपनी प्रकृति, संस्कृति के सुदृढ़ नींव पर खड़ा होना ही पड़ेगा। इसलिये राष्ट्र के बारे में यह स्पष्ट कल्पना व उसका गौरव मन में लेकर समाज में सर्वत्र सद्भाव, सदाचार तथा समरसता की भावना सुदृढ़ करने की आवश्यकता है। परन्तु यह समय की आवश्यकता तभी समय रहते पूर्ण होगी जब इस कार्य का दायित्व किसी व्यक्ति या संगठन पर डालकर, स्वयं दूर से देखते रहने का स्वभाव हम छोड़ दें। राष्ट्र की उन्नति, समाज की समस्याओं का निदान तथा संकटों का मात करने का कार्य ठेके पर नहीं दिया जाता। समय-समय पर नेतृत्व करने का काम अवश्य कोई न कोई करेगा, परंतु जब तक जागृत जनता, स्पष्ट दृष्टि, निःस्वार्थ प्रामाणिक परिश्रम तथा अभेद्य एकता के साथ वज्रशक्ति बनकर ऐसे प्रयासों में स्वयं से नहीं लगती, तब तक संपूर्ण व शाश्वत सफलता मिलना संभव नहीं होगा। इसलिए अब प्रत्येक राष्ट्र उत्थान केंद्रित दृष्टि रखने वाले व्यक्ति को स्वयं से प्रारंभ कर, अपने आस-पास के लोगों को जागृत करते हुए आगे बढ़ना होगा। यही समय की मांग है और यही हमारी जिम्मेदारी भी है।

आज का समय पूरे विश्व को भारत की विजय गाथा बताने का समय है। जिसे सुनने के लिए व जिसका अनुसरण करने के लिए पूरी दुनिया तैयार है। अब वो दिन नहीं रहे, जब कोई भी हमारे देश को आँखें दिखा देता था। अब हम आँखें दिखाने वाले को घर में घुस कर मारते है। तो आईये, राष्ट्र की भक्ति के रुप में उत्तम कार्य करने का संकल्प करते हैं। क्योंकि वर्तमान परिस्तिथियों में हिंदू समाज की संगठित शक्ति ही सभी समस्याओं का एक अचूक निदान है।


(लेखक मीडिया विभाग, जे. सी. बोस विश्वविद्यालय, फरीदाबाद में प्रोफेसर एवं विभागाध्यक्ष है)

छात्रों ने समझा कूटनीति क्या होती है

नौ भारतीय विद्यार्थियों ने अमेरिकन सेंटर चेन्नई में व्यावहारिक कूटनीति का अनुभव प्राप्त किया, जहां उन्होंने भारत-अमेरिका सहयोग, सार्वजनिक कूटनीति और वैश्विक जुड़ाव को समझा।

कूटनीति की दुनिया में कदम रखने का अनुभव कैसा होता है? नौ भारतीय विश्वविद्यालय विद्यार्थियों के लिए, अमेरिकन सेंटर चेन्नई के प्रोफेशनल एन्हांसमेंट प्रोग्राम ने कूटनीति के काम करने के तरीके की प्रत्यक्ष झलक पेश की।

छह सप्ताह तक, विविध शैक्षणिक पृष्ठभूमियों से आए विद्यार्थियों ने प्रत्यक्ष परियोजनाओं, विशेषज्ञ-नेतृत्व वाले सत्रों और नियत कार्य के माध्यम से जन कूटनीति, अमेरिका-भारत सहयोग और वैश्विक भागीदारी जैसे प्रमुख विषयों का अध्ययन किया। कार्यक्रम ने उन्हें अंतरराष्ट्रीय मामलों के कौशल और जिम्मेदारियों से परिचित कराया, जिससे कि वे भविष्य में ऐसे नेता बन सकें जो साझा प्राथमिकताओं को आगे बढ़ाएं, द्विपक्षीय संबंधों को मजबूत करें और अमेरिकी रणनीतिक हितों का समर्थन करें।

कार्यक्रम के केंद्र में अमेरिकी राजनयिकों, कांसुलेट कर्मचारियों और अमेरिकी सरकारी एक्सचेंज कार्यक्रमों के तहत पहले से नियत कार्य द्वारा संचालित कक्षाएं थीं। इन सत्रों में प्रतिभागियों ने विशेषज्ञों के साथ बातचीत की कि अमेरिकी अनुदानों के लिए आवेदन कैसे करें, अमेरिकी वाणिज्यिक सेवाओं का लाभ कैसे लें और अमेरिका की इंडो-पैसिफिक नीतियों को कैसे समझें। इन सत्रों ने उन्हें यह समझने में मदद की कि जन कूटनीति दोनों देशों—अमेरिका और भारत—को अधिक मजबूत, सुरक्षित और समृद्ध बनाने के प्रयासों का कैसे समर्थन करती है।

एक सत्र में, इंटरनेशनल विजिटर लीडरशिप प्रोग्राम (आईवीएलपी) के पूर्व विद्यार्थी बर्नार्ड डी’सामी ने दिखाया कि अंतर्विषयी ज्ञान का उपयोग वैश्विक समझ को कैसे बढ़ावा दे सकता है। एक अन्य चर्चा में, रक्षा अध्ययन विशेषज्ञ उत्तम कुमार जमधग्नि ने उन्हें अमेरिका-भारत सामरिक संबंधों के इतिहास से अवगत कराया, जो स्वतंत्रता-पूर्व युग से लेकर इंडो-पैसिफिक में क्वाड की भूमिका तक फैला है।

“मैंने सीखा, पुरानी धारणाएं छोड़ीं और कूटनीति की अपनी समझ का विस्तार किया,” हंसिका नाविन साह कहती हैं। “कार्यक्रम ने अंतरराष्ट्रीय संबंधों में वह प्रभाव डालने की एक झलक दी, जिसकी मैं आशा करती हूं।”

प्रतिभागियों ने अमेरिकन स्पेसेज़ मॉडल का भी अध्ययन किया, जो नागरिक सहभागिता और नेतृत्व विकास को बढ़ावा देता है। इसमें महत्वपूर्ण प्रौद्योगिकियों, सुरक्षा मुद्दों, उद्यमिता और अन्य रणनीतिक पहलों पर कार्यक्रम शामिल हैं।

अनुभवजन्य शिक्षा कार्यक्रम का मुख्य हिस्सा रही। कक्षा में अनुभव के साथ-साथ विद्यार्थियों ने वास्तविक परियोजनाओं के माध्यम से अपने ज्ञान को लागू किया। उन्होंने कांसुलेट टीमों के साथ मीडिया विश्लेषण, डिजिटल आउटरीच और स्टेम कार्यक्रम जैसे नियत काम में सहयोग किया। उन्होंने दक्षिण भारत में अमेरिकी व्यवसायों का मानचित्रण किया और ई-लाइब्रेरी के लिए प्रचार सामग्री बनाई, इस दौरान अपने संचार और शोध कौशल को भी निखारा।

एक समापन कूटनीति सिमुलेशन में विद्यार्थियों को राजनयिक और वार्ताकार की भूमिकाएं निभाने की चुनौती दी गई। इससे उन्हें वास्तविक समय में निर्णय लेने के माध्यम से यह समझने का अवसर मिला कि सूचित रणनीतियां अमेरिकी सुरक्षा, आर्थिक और नीतिगत उद्देश्यों का समर्थन कैसे कर सकती हैं।

पूरे कार्यक्रम के दौरान प्रतिभागियों को कांसुलेट की पब्लिक एंगेजमेंट और ग्रांट टीम से मार्गदर्शन मिला। उनके समर्थन से, प्रतिभागियों ने प्रमुख अमेरिका-भारत पहलों जैसे इंडस-एक्स जो रक्षा प्रौद्योगिकी सहयोग पर केंद्रित है, के अनुरूप प्रस्ताव विकसित किए और प्रस्तुत किए।

प्रतिभागियों को कांसुलेट की सार्वजनिक सहभागिता और ग्रांट टीम से मार्गदर्शन मिला। (फोटोग्राफ: साभार ऋषि कुमार)

कार्यक्रम ने इंजीनियरिंग, इतिहास, राजनीति विज्ञान और अंग्रेजी साहित्य जैसे विविध क्षेत्रों के विद्यार्थियों का स्वागत किया। दृष्टिकोणों के इस मिश्रण ने टीम परियोजनाओं को अधिक रोचक बनाया और अंतर्विषयी सोच को प्रोत्साहित किया, क्योंकि विद्यार्थियों ने विभिन्न दृष्टिकोणों को एकीकृत करना सीखा।

“मैं अपने आराम क्षेत्र से बाहर निकला और विज्ञान और इंजीनियरिंग से परे विषयों का अन्वेषण किया,” वरुण चंदर कहते हैं। “इसने मेरी आंखें नई संभावनाओं और वैश्विक नागरिक होने के अर्थ के प्रति खोल दीं।”

विद्यार्थियों ने परियोजना निष्पादन और कार्यक्रम प्रबंधन के लिए कई डिजिटल टूल का उपयोग करना भी सीखा। उन्होंने कूटनीति, मीडिया और सार्वजनिक नीति में उपयोगी कौशल जैसे कार्यक्रम नियोजन, नीतिगत विश्लेषण और आउटरीच रणनीति का अभ्यास किया।

कार्यक्रम का समापन अमेरिकी कांसुलेट जनरल क्रिस हॉजेज के नेतृत्व में आयोजित समापन समारोह के साथ हुआ। प्रतिभागियों ने अपने समापन परियोजनाएं प्रस्तुत कीं और प्रमाण पत्र प्राप्त किए, जिससे वे अमेरिकन सेंटर के पूर्व विद्यार्थियों के बढ़ते नेटवर्क से जुड़ गए।

लक्ष्मी रामास्वामी के लिए यह अनुभव विशेष रूप से सार्थक रहा। वह कहती हैं, “साथियों और मार्गदर्शकों के साथ सीखने से मुझे अपने व्यावसायिक लक्ष्यों और व्यक्तिगत विकास दोनों को मजबूत करने में मदद मिली।”

विद्यार्थियों को वास्तविक दुनिया के अनुभवों से जोड़कर, प्रोफेशनल एन्हांसमेंट प्रोग्राम अगली पीढ़ी के लीडर और समस्या-समाधानकर्ताओं को तैयार करता है, जो इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में सुरक्षा और समृद्धि को बढ़ावा दे सकते हैं।

भागीदारों ने प्रोग्राम के दौरान अमेरिकी कांसुल जनरल से भी संवाद किया। (फोटोग्राफ: साभार जॉयसलिन नारायण)

साभार- https://spanmag.state.gov/hi से

डॉक्टर हेडगेवार जी का हिंदुत्व..!

किसी व्यक्ति के कार्य का मूल्यांकन करना है, या उस व्यक्ति ने किये हुए कार्य का यश – अपयश देखना हैं, तो उस व्यक्ति के पश्चात, उसके कार्य की स्थिती क्या है, यह देखना उचित रहता हैं। उदाहरण हैं – छत्रपती शिवाजी महाराज। मात्र पचास वर्ष का जीवन। लगभग तीस वर्ष उन्होंने राज- काज किया और हिंदवी साम्राज्य खडा किया। किंतु उनके मृत्यु के पश्चात उस हिंदवी स्वराज्य की परिस्थिती क्या थी? हिंदुस्थान का शहंशाह औरंगजेब तीन लाख की चतुरंग सेना लेकर महाराष्ट्र मे आया था, इसी हिंदवी स्वराज्य  को मसलने के लिए, सदा के लिए समाप्त करने के लिए।
परिणाम?
सारी जोड़-तोड़ करने के बाद, वह संभाजी महाराज से मात्र २ – ४ दुर्ग (किले) ही जीत सका। आखिरकार छल कपट कर के, ११ मार्च १६८९ को औरंगजेब ने संभाजी महाराज को तड़पा – तड़पा के, अत्यंत क्रूरता के साथ समाप्त किया। उसे लगा, अब तो हिंदुओं का राज्य, यूं मसल दूंगा। लेकिन मराठों ने, शिवाजी महाराज के दूसरे पुत्र – राजाराम महाराज के नेतृत्व में संघर्ष जारी रखा। आखिर ३ मार्च १७०० को राजाराम महाराज भी चल बसे। औरंगजेब ने सोचा, ‘चलो, अब तो कोई नेता भी नहीं बचा इन मराठों का। अब तो जीत अपनी हैं।’
किन्तु शिवाजी महाराज की प्रेरणा से सामान्य व्यक्ति, मावले, किसान… सभी सैनिक बन गए। मानो महाराष्ट्र में घास के तिनके भी भाले और बर्छी बन गई। आलमगीर औरंगजेब इस हिंदवी स्वराज्य को जीत न सका। पूरे २६ वर्ष वह महाराष्ट्र में, भारी भरकम सेना लेकर मराठों से लड़ता रहा। इन छब्बीस वर्षों में उसने आग्रा / दिल्ली का मुंह तक नहीं देखा। आखिरकार ८९ वर्ष की आयु में, ३ मार्च १७०७ को, उसकी महाराष्ट्र में, अहिल्यानगर के पास मौत हुई, और उसे औरंगाबाद के पास दफनाया गया। जो औरंगजेब हिंदवी स्वराज्य को मिटाने निकला था, उसकी कब्र उसी महाराष्ट्र में खुदी। मुगल वंश मानो समाप्त हुआ। मराठों का दबदबा दिल्ली पर चलने लगा। बाद मे तो हिंदूओंका भगवा ध्वज लाल किल्ले की प्राचीर पर फहरने लगा। मात्र तीन – चार जिलों तक  फैला हुआ हिंदवी स्वराज्य, छत्रपती शिवाजी महाराज की मृत्यु के पश्चात सारे भारत वर्ष मे फैल गया। अटक के भी उस पार तक गया।
इसी दृष्टिकोन से डॉक्टर केशव बळीराम हेडगेवार जी के कार्य को देखना चाहिए। 1889 से 1940, यह मात्र 51 वर्षों का जीवन प्रवास है। इस प्रवास के अंतिम 15 वर्ष राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की स्थापना के पश्चात के है। जिन दिनों लोग हिंदू हितों की रक्षा के लिए बोलने मे भी घबराते थे, हिंदू कहलाने सकुचाते थे, उन्ही दिनों डॉक्टर हेडगेवार जी अत्यंत आत्मविश्वाससे बोल रहे थे, “हां, मै कहता हूं, यह हिंदू राष्ट्र है।”
आज डॉक्टर हेडगेवार जी के कार्य का स्वरूप क्या है?
*डॉक्टर जी ने सन 1925 मे शुरू किया हुआ संघ आज भारत के कोने – कोने मे पहुंचा है। इसी के साथ विश्व के उन सभी देशों में, जहां हिंदू कम संख्या मे भी क्यूं ना रहते हो, उन सभी देशों में संघ के स्वयंसेवक है। और यह सज्जनशक्ती डॉक्टर हेडगेवार जी को अपेक्षित ऐसे हिंदू संस्कृती के मूलाधार राष्ट्र को वैभवशाली, समृद्ध और संपन्न बनाने मे जुटी है।*
यह डॉक्टर हेडगेवार जी का निर्विवाद यश है।
डॉक्टर हेडगेवार जी ने अपने जीवन का उत्तरार्ध यह हिंदू संघटन के लिए दिया। बाल्यकाल से ही डॉक्टर हेडगेवार प्रखर देशभक्त थे, साथ ही प्रत्यक्ष कार्य करने वाले कृतिशील कार्यकर्ता थे। उनके मन मे जो अंगार जल रही थी वह परतंत्रता को लेकर थी। इसीलिए विशाल भारत वर्ष पर राज करने वाली अंग्रेजी सत्ता को उखाडकर फेकना यह उनके जीवन का ध्येय (लक्ष्य) बना था। इसी ध्येय का अनुसरण करते हुए उन्होने अपने महाविद्यालयीन शिक्षा के लिए कलकत्ता (वर्तमान में कोलकाता) यह शहर चुना। वे बंगभंग आंदोलन के दिन थे। कलकत्ता यह क्रांतीकारियों का केंद्र बना था। हेडगेवार जी छह वर्ष कलकत्ता मे रहे। क्रांतिकारीयों की ‘अनुशीलन समिती’ के वे सदस्य बने। ‘कोकेन’ इस नाम से क्रांतिकारीयों मे जाने जाते थे। इस क्रांतिकारी आंदोलन को उन्होने अत्यंत निकट से देखा।
किंतु ‘इस रास्ते से स्वराज्य मिलेगा क्या?’ यह एक प्रश्न तथा साथ ही दुसरा महत्त्व का प्रश्न ‘स्वतंत्रता मिलने के बाद हमारे देश की रचना कैसी होनी चाहिये?’ यह भी उनको सताये जा रहा था। हमारा देश जिन कारणों से गुलाम हुआ, उन कारणोंको दूर करते हुए नया स्वतंत्र भारत कैसा होना चाहिये इस पर वह सतत चिंतन करते थे। किंतु उनके प्रश्नों के उत्तर उनको नही मिल रहे थे। उन्होने कांग्रेस मे रहकर काम किया। पहिले सदस्य बने फिर पदाधिकारी। अत्यंत सक्रियतासे उन्होने काँग्रेस के  आंदोलनों मे हिस्सा लिया। दो बार जेल गए। सश्रम कारावास की सजा हुई। किंतु उनको समझ मे आया की काँग्रेसमें, या अन्य सभी प्रवाहो में, इस देश का मूलाधार हिंदू यह उपेक्षित हो रहा है। *मुस्लिम तुष्टीकरण के नाम पर हिंदूओं पर जबरदस्त दबाव बनाया जा रहा है। इसका दोषी भी हिंदू समाज ही है। हिंदू अपने तेजस्वी इतिहास को, शौर्य को, साहस को तेज को, गौरवशाली परंपराओंको भुलते जा रहे है।*
स्वतंत्रता मिलने पर स्वतंत्र भारत मे हिन्दुओं की स्थिती, अर्थात देश की स्थिती कैसी रहेगी इसका भीषण और भयानक चित्र उनको सामने दिख रहा था। इसलिये वर्ष 1916 मे मेडिकल की परीक्षा उत्तीर्ण करके वे नागपूर आये। अविवाहित रहकर संपूर्ण जीवन राष्ट्र कार्य के लिए लगाने का उनका प्रण था। अगले नौ वर्ष, वे स्वतंत्रता प्राप्ति के विविध प्रवाहों मे शामिल होकर अपने प्रश्न का उत्तर खोज रहे थे। 1923 और 1924 मे नागपूर मे मुस्लिम आक्रमकता बढ रही थी। डॉक्टर हेडगेवार काँग्रेस के पदाधिकारी थे। अपने प्रश्न का उत्तर ढूंढने वे फरवरी 1924 मे वर्धा मे महात्मा गांधीजी से मिले। किंतु हिंदू – मुस्लिम समस्या के बारे मे उन्हे तर्कपूर्ण या समाधानकारक उत्तर नही मिले।
इन सभी प्रक्रियाओंसे निकलते हुए, अपने सहकारी कार्यकर्ताओं से, नेताओं से विचार विनिमय करते हुए, डॉक्टर जी के मन मस्तिष्क मे हिंदू संघटन की रूपरेखा तैयार हो रही थी। किसी का भी द्वेष न करते हुए, एक ऐसा हिंदू संघटन खडा करना, जिससे अनुशासन रहेगा, सैनिकी पद्धती का कामकाज रहेगा, और वैचारिक स्पष्टता होगी। इसी को आगे बढाते हुए वर्ष  1925 के विजयादशमी के दिन, अर्थात रविवार दिनांक 27 सितंबर को नागपूर मे डॉक्टर हेडगेवार जी के घर पर संघ प्रारंभ हुआ। यह संघटन मुस्लिम आक्रामकता के प्रतिक्रिया के स्वरूप बना था क्या? इसका स्पष्ट उत्तर है – नही। दिनांक 28 मार्च 1937 मे अकोला के इस्टर कॅम्प मे स्वयंसेवकोंके सामने बोलते हुए डॉक्टर जी ने कहा था, *”हिंदुस्तान की रक्षा के लिए एखादा स्वयंसेवक संघ बना होता, जिसमे मुसलमान, ख्रिश्चन, अंग्रेज अथवा अन्य देशीय, अन्य धर्मीय लोग रहते या नही रहते, तो भी अपने हिंदू समाज को ऐसे संघ का निर्माण करना क्रमप्राप्त (आवश्यक) था।”*
डॉक्टर साहब की सोच बहुत दूर की थी। यह राष्ट्र संपन्न होना चाहिये, समृद्ध होना चाहिये, शक्तिशाली बनना चाहिये और इसलिये इस देश की जो मूल अस्मिता है, पहचान है, जो हिंदू आचार, विचार और परंपरांओंपर आधारित है, वह सशक्त और बलशाली होना चाहिये। यह तभी संभव है जब हमारा देश स्वतंत्र होगा। इसीलिए संघ का प्रारंभिक ध्येय इस देश को स्वतंत्र करने का था।
संघ प्रारंभ होने के ढाई वर्ष बाद, अर्थात वर्ष १९२८ के मार्च महिने मे नागपूर – अमरावती रास्ते के ‘स्टार्की पॉईंट’ पर विशेष रूप से चुने हुए 99 स्वयंसेवकों को डॉक्टर जी ने स्वयं प्रतिज्ञा दी। इस प्रतिज्ञा मे भी स्वतंत्रता का यही भाव प्रकट होता है। प्रतिज्ञा मूल मराठी मे इस प्रकार है –
“मी सर्व शक्तिमान श्री परमेश्वराला व आपल्या पूर्वजांना स्मरून प्रतिज्ञा करतो की, मी आपला पवित्र हिंदू धर्म, हिंदू संस्कृती व हिंदू समाज यांचे संरक्षणाकरिता व हिंदू राष्ट्राला स्वतंत्र करण्याकरिता राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघाचा घटक झालो आहे। संघाचे कार्य मी प्रामाणिकपणे, नि:स्वार्थ बुद्धीने आणि तनमनधने करून करीन, व हे व्रत मी आजन्म पाळीन।”
“जय बजरंग बली। हनुमान जी की जय!”
_(मै सर्व शक्तिमान श्री परमेश्वर और मेरे पूर्वजों का स्मरण करते हुए प्रतिज्ञा लेता हूँ कि अपना पवित्र हिंदू धर्म, हिंदू संस्कृती व हिंदू समाज की रक्षा के लिए एवं हिंदू राष्ट्र को स्वतंत्र करने के लिए मै राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का घटक बना हूं। संघ का कार्य मैं प्रामाणिकता से, निस्वार्थ बुध्दि से व तन – मन – धन से करुंगा। इस व्रत का मै आजन्म पालन करूंगा।_
_जय बजरंग बली।  हनुमान जी की जय।)_
डॉक्टरजी ने जब संघ प्रारंभ किया, तब ‘हिंदुत्व’ यह शब्द प्रचलन मे नही था। स्वातंत्र्यवीर सावरकरजी ने 1927 से इस शब्द का प्रयोग करना प्रारंभ किया। इसके पहले स्वामी विवेकानंदजी ने हिंदुत्व के लिए ‘हिंदूइझम’ इस शब्द का प्रयोग किया था। ‘इझम’ याने वाद अर्थात ‘हिंदू वाद’। यह शब्द बादमे भी अनेकों बार प्रयोग किया गया। डॉक्टरजी ने ‘हिंदुत्व’ के समानार्थी शब्द के रूप मे ‘हिंदू हूड’ (Hindu hood) इस शब्द का प्रयोग किया हैं (brother hood जैसा)।
मद्रास के डॉक्टर नायडू ने तामिळनाडू मे हिंदू महासभा कॉफ्रेंस का आयोजन किया था। ‘इस कॉंफ्रेंस मे डॉक्टर जी ने उपस्थित रहना चाहिए’ ऐसा आग्रह करने वाला पत्र डॉक्टर नायडू ने डॉक्टर जी को लिखा। किंतु स्वास्थ्य ठीक न होने से डॉक्टर जी बिहार के राजगीर मे गये थे। अर्थात उनका मद्रास जाना संभव नही था। इस संदर्भ में अपनी मृत्यू से तीन महिने पहले, अर्थात 1940  के 17 मार्च को, डॉक्टर जी ने मद्रास के डॉक्टर नायडू को पत्र लिखा। ‘हिंदू समाज मे हिंदू जनजागरण के कार्य की आवश्यकता’ इस पत्र में डॉक्टर जी ने अधोरेखित की है। डॉक्टर जी लिखते है – ” To arouse the dormant spirit of Hinduhood among our brethren of the South।”
_(‘दक्षिण के बंधूओं मे हिंदुत्व की सुप्त भावनाओं को जगाने का यह कार्य है’)_
19 ऑक्टोबर 1929 को डॉक्टरजी ने नीलकंठ राव सदाफळ जी को एक पत्र भेजा है। इसमे डॉक्टर लिखते है, “स्वयंसेवकों के मन मे राष्ट्रीयत्व का पूर्णतः संचार करके, हिंदुत्व और राष्ट्रीयत्व में कोई भेद नही है, यह दोनो बाते एकही है, यह तर्कपूर्ण ढंग से समझाना, यह संघ शाखाओं का काम है।”
डॉक्टर जी ने एक जगह लिखा हैं –
_सामर्थ्य है हिंदुत्व का_
_प्रत्येक हिंदू राष्ट्रीय का I_
_किंतु उसे संगठन का.._
_अधिष्ठान चाहिये..!_
वे आगे लिखते है, ” हिंदुस्तान में आसेतू हिमाचल बसने वाले अखिल हिंदूओं का एकरूप और मजबूत संगठन खडा करना यही हमारा वर्तमान धर्म है। हम लोगों मे राष्ट्रीयत्व की भावना निर्माण करके,
हिंदू यह सब एक राष्ट्र के अंग है तथा हिंदू समाज के विभिन्न मत – पंथों के आचार – विचार एक ही प्रकार के है, यह वैज्ञानिक दृष्टीसे समझाकर, प्रत्यक्ष कार्य करना है।”
डॉक्टर जी का हिंदुत्व समझने के लिये अत्यंत सरल, सीधा और सुगम था। स्व. दादाराव परमार्थ, उनके ‘परमपूजनीय डॉक्टर हेडगेवार’ इस लेख मे लिखते है, “यह देश हिंदुओं का है, यह तो हम सब का विश्वास था। हिंदू बाहर से आये है यह कल्पना हमे मान्य नही थी। मूलतः हिंदू इसी देश के है तथा अपने त्याग, समर्पण और कर्तृत्व से यह राष्ट्र उन्होने खडा किया है। इस देश का राष्ट्रीयत्व यह हिंदुत्व है, इस पर डॉक्टर जी की अटूट श्रद्धा थी। इसलिये, इस देश पर पूर्ण समर्पित भाव से प्रेम करने वाला हिंदू हैं। इस देश की प्रगती के लिये अपने आपको झोंककर काम करने वाला हिंदू हैं। इस देश की सर्वांगीण उन्नती के लिए प्रयत्न की पराकाष्ठा करने वाला हिंदू हैं। और ऐसे सारे हिंदूओंका संगठन बांधना यह डॉक्टर जी का ध्येय था। इतने सीधे, सरल और स्वच्छ नजरों से देखने के कारण डॉक्टर जी को हिंदू समाज के भेद-विभेद, जाती-पाती कभी दिखी ही नही। हिंदूओंका संगठन करते समय यह विचार गलतीसे भी उनके मन मे नही आया।”
और इसलिये जाती-पाती के चष्मे से जो लोग हिंदू समाज को देखते थे, उनको बडा आश्चर्य लगता था। महात्मा गांधीजी को भी इसका आश्चर्य लगा था। वर्ष 1934 के दिसंबर मे वर्धा मे संघ का शितकालीन शिवीर लगा था। उन दिनों महात्मा गांधीजी का मुकाम वर्धा शहर मे था। महात्मा जी के बंगले के पास ही यह शिवीर स्थल था, इसलिए महात्माजी को संघ के डेढ़ हजार स्वयंसेवकों के इस अनुशासित शिबिर को देखने की इच्छा हुई। उनकी सुविधानुसार समय तय हुआ। 25 दिसंबर 1934 मंगलवार को प्रातः छह बजे महात्माजी शिबिर को भेट देंगे यह निश्चित हुआ।
महात्मा जी तय समय पर शिबिर मे आए। वे वहां लगभग डेढ़ – दो घंटे रुके। उन्होने शिविर की सारी जानकारी ली। सभी स्वयंसेवक एक साथ रहते हैं, एकही पंक्ती में भोजन करते है, यह सुनकर और देखकर उन्हे आश्चर्य लगा। जो दिख रहा है, उसमे कितना तथ्य है यह जानने के लिए कुछ स्वयंसेवकों से प्रश्न भी पूछे। तब, “ये महार, ये ब्राह्मण, ये मराठा, ये दर्जी ऐसा भेदभाव हम नही मानते। हमारे बगल मे किस जाति का स्वयंसेवक बैठा है इसकी कोई जानकारी हमे नही रहती और ना ही वैसी जानकारी लेने की हम में से किसी की भी इच्छा रहती है। हम सब हिंदू है और इसीलिए बंधू है। अतः आपसी व्यवहार में उंच-नीच सोच रखने की कल्पना भी हम नही करते।” इस प्रकार के उत्तर महात्माजी को स्वयंसेवकों से मिले।
*यह है डॉक्टर हेडगेवार जी का हिंदुत्व। बिलकुल सीधा और सरल। “हम सब हिंदू है, इसलिये बंधू है” इस एक वाक्य ने हिंदूओंका संगठन खडा किया, जो आज विश्व का सबसे बडा संगठन है।*
डॉक्टर जी के संपूर्ण कार्यकाल में वह तात्विक या बौद्धिक विवादोंमे बहुत ज्यादा नही उलझे। उनका जोर, प्रत्यक्ष कार्य पर था। संघ प्रारंभ होने से पहले उन्होने ऐसे सभी विचार प्रवाहों का विस्तृत अध्ययन किया था। हिंदू समाज की कमियां, मुस्लिम आक्रांताओं के कारण हिंदू समाज मे आई हुई कुरीतियां, कुछ प्राचीन, अप्रासंगिक परंपराएं… इन सबसे वे अच्छी तरह परिचित थे। किंतु इन सब बातों के विरोध में बोलते रहने की अपेक्षा प्रत्यक्ष कार्य कर, कृती रूप उत्तर देने मे उनका विश्वास था।
विभिन्न वैचारिक प्रवाहोंमें, संस्थाओंमें, राजनैतिक दल में कार्य करने के कारण उनके विचारों मे पारदर्शिता और स्पष्टता थी।  ‘क्या करना है’ यह उनको अवगत था। इसलिये, संघ स्थापना के बाद उनके 15 वर्षों के कालखंड में, और बाद में भी, संघ पर अनेक संकट आने के बावजूद संघ बढता ही रहा। संघ के प्रारंभिक काल से इस बात की स्पष्टता थी, की संघ का संगठन, हिंदूओंके संरक्षण के लिए बना हुआ कोई रक्षक दल नही है। इसका अर्थ ऐसा की हिंदू समाज ने अपने संरक्षण के लिये संघ को, आज की भाषा में, आऊटसोर्स किया हुआ नही है। संघ के स्वयंसेवक संकटोंका सामना करेंगे, संघर्ष करेंगे और बाकी हिंदू समाज इस संघर्ष की मजा देखता रहेगा, यह उन्हे अभिप्रेत नही था।
*संघ का उद्देश्य यह हिंदू समाज का संगठन कर संपूर्ण समाज को सक्षम बनाना यह था / है। इसलिये ‘समाजही सब कुछ करेगा’  यह भूमिका पहले से आज तक कायम है। यही संघ के यश का सूत्र भी रहा है। संघ ने सही अर्थों में हिंदू समाज का सक्षमीकरण (empowerment) करना यह डॉक्टर हेडगेवार जी को अभिप्रेत था। इसलिये 1925 के बाद इस देश पर आये हुए सभी संकटोंका सामना संघ ने पुरे समाज को साथ लेकर किया है। चार – पांच वर्ष पहले के करोना मे भी संघ स्वयंसेवकोने आगे बढकर अनेक काम किये। किंतु संघ ने कोरोना के इस संघर्ष में संपूर्ण समाज को साथ लेकर सक्रिय किया।*
और यही डॉक्टर हेडगेवार जी की दूरदृष्टी सामने आती है।  हिंदू संगठन की रचना बनाते समय उन्होंने अत्यंत स्पष्ट और साफ शब्दों मे कहा था, *”हमे पुरे हिंदू समाज का संगठन करना है, समाज में संगठन नही करना है”*। यह अत्यंत महत्वका सूत्र है। डॉक्टर जी के पहले भी हिंदू समाज मे हिंदू हितों के लिए काम करने वाली अनेक संस्थाये और संगठन तयार हुए थे। किंतु इन सबकी मर्यादाएं थी। समाज के एक प्रवाह जैसे यह संगठन / संस्थाये थी। किंतु प्रारंभसे ही डॉक्टरजीने संघ को हिंदू समाज का एक पंथ या प्रवाह न बनाते हुए, ‘संपूर्ण हिंदू समाज का संगठन’ इसी स्वरूप मे खडा किया।  इसलिये पहले जो संघ के विरोधक थे, वही बाद में संघ के सक्रिय स्वयंसेवक बने।
हिंदूओं का संगठन यह असंभव कल्पना है, ऐसा पहले बोला जाता था। किंतु डॉक्टर हेडगेवार जी ने इस बात को गलत सिद्ध करके बताया। संपूर्ण हिंदू समाज का संगठन करने के लिये उन्होने जो संघ की कार्यपद्धती बनायी, उसकी विश्व मे कोई तुलना ही नही है। इसके कारण एकरूप, एकसमान सोच के, अपनी भारत माता को वैभव के परम शिखर पर पहुंचाने के ध्येय से प्रेरित, ऐसे करोडो हिंदुओं का, विश्व का सबसे बडा संगठन खडा हुआ। यह संगठन, डॉक्टर जी की मृत्यु के पश्चात भी 85 वर्ष सतत वर्धिष्णू हो रहा है।
दूरदृष्टी के, भविष्य को देखने की क्षमता रखने वाले डॉक्टर हेडगेवार जी का यह निर्विवाद यश है..!
(लेखक ऐतिहासिक, राष्ट्रीय, राजनीतिक व सांस्कृतिक विषयों पर शोधपूर्ण लेखन करते हैं, इनकी कई पुस्तकें भी प्रकाशित हो चुकी है)