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भारत के ईशान्य कोण की अष्टलक्ष्मी आपको बुला रही है

राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ और इससे जुड़े तमाम संगठन विगत सौ वर्षों से किस ध्येय, संकल्प और समर्पण के साथ राष्ट्र के कार्य में लगे हैं इसका प्रत्यक्षनअनुभव तभी होता है जब संघ या विश्व हिंदू परिषद् के कार्यकर्ताओं से सीधा संवाद होता है।

मुंबई के बोनांजा पोर्टफोलियो के श्री एसपी गोयल की पहल पर श्री भागवत परिवार द्वारा आय़ोजित एक ऐसे ही संवाद में विगत कई वर्षों से पूर्वोत्तर भारत में सेवा कार्य कर रहे विश्व हिंदू परिषद् के श्री दीपक जोशी से सीधे संवाद में उनके द्वारा दी गई चौंकाने वाली  जानकारी ने श्रोताओं को सोचने पर मजबूर कर दिया। उन्होंने बताया कि यहाँ के लोगों की राष्ट्र व धर्म निष्ठा इतनी प्रबल रही है कि मिशनरियों को पहला इसाई बनाने में 63 साल लग गए।

कार्यक्रम में उपस्थित दिल्ली के चार्टर्ड एकाउंटेंट व पूर्वोत्तर क्षेत्र में बरसों से सेवा कार्य कर रहे श्री सत्य प्रकाश मंगल ने यादगार व रोचक प्रसंग बताकर सबको चौंका दिया।

उन्होंने बताया कि इटानगर क्षेत्र में हतानू नाम का एक इसाई व्यक्ति है, जिसकी 6 पत्नियाँ और 24 लड़के -लड़कियाँ हैं। उस व्यक्ति से लगातारा संपर्क में रहने के बावजूद से भारत माता की जय बोलने में 4 साल लगे। और फिर गौ माता की जय बोलने में दो साल लगे। जब उसने इसाई धर्म छोड़क हिंदू धर्म ग्रहण कर लिया तो उसकी चारों इसाई पत्नियों ने उसे अपने सपने की घटना सुनाते हुए कहा कि प्रभु इशु हमारे सपने में आए और कहा कि उन्होंने कहा है कि तुम्हारे हिंदू बनने से वो नाराज हो गए हैं। इस पर दो दिन बाद हतानू ने अपनी पत्नियों को कहा कि इशु मेरे भी सपने में आए ते और कह रहे थे कि मैं ही शिव हूँ, तुमने जो किया वो ठीक किया। आज उस व्यक्ति ने एक विशाल पहाड़ खरीदकर वहाँ शिव मंदिर बनाने का संकल्प लिया है और वो जी जान से इस काम में लगा है।

दूसरी घटना बताते हुए उन्होंने कहा कि एक दिन कुछ आतंकवादियों ने पूर्वोत्तर क्षेत्र में मेरा अपहरण कर लिया, और मुझे एक अंधेरी झोपड़ी में कैद कर दिया। वहाँ पूरे समय एक एके 56 लिए व्यक्ति मेरी निगरानी करता रहा। मैं जरा भी हिलूं तो वह मुझ पर एके 56 तान देता था। मैं कृष्ण भक्त हूँ और मैने कृष्ण जी को याद किया, अचानक उस व्यक्ति के पेट में ऐसा तेज दर्द शुरु हुआ कि उसने एके 57 रख दी और अपना पेट पकड़कर बैठ गया। मैने उससे कहा कि मैं तुम्हारा दर्द ठीक कर देता हूं और कृष्णजी का नाम लेकर उसकी हथेली पर एक्यूप्रेशर देने लगा, ये चमत्कार ही था कि थोड़ी ही देर में सका दर्द दूर हो गया तो उसने खुश होकर मुझसे कहा कि तुम भागकर सड़क पर चले जाओ। मैं भागकर सड़क के किनारे गया तो एक जीप वाले ने मुझे लिफ्ट दी और मैं सुरक्षित निकल आया।

एक अन्य किस्सा बताते हुए उन्होंने कहा कि नागालैंड के पर्यटन मंत्री और मैं एक होटल में साथ ही ठहरे थे, उन्होंने मुझसे मिलने की जिज्ञासा जताई उनसे मिलने के बाद मैंने उनको धोती पहनाने की पेशकश की तो उसने कहा कि मैं तो क्रिश्चियन हूँ, इस पर मैने कहा कि क्रिश्चियन में कृष्ण ही है ये धोती कृष्ण की निशानी है, वो प्रसन्न हो गए और धोती पहन ली। फिर उन्होंने मुझे नागालैंड के हॉर्नोबिल उत्सव में आमंत्रित किया तो मैने कहा कि इस उत्सव में तो आप गौमांस खाते हो, हम ऐसी जगह नहीं आसकते। बाद में उन्होंने मुझे सूचित किया कि इस बार इस उत्सव में केवल शाकाहारी खाना रहेगा।

श्री दीपक जोशी ने पूर्वोत्तर क्षेत्र के अरुणाचल प्रदेश, असम, मेघालय, मिजोरम, मणिपुर, नागालैंड, सिक्किम और त्रिपुरा जिसे प्रधान मंत्री श्री नरेंद्र मोदी ने अष्टलक्ष्मी नाम दिया है, की संस्कृति और जीवनशैली को लेकर कई रोचक, चौंकाने वाली और रोमांचित करने वाली जानकारियाँ साझा की। उन्होंने बताया कि हजारों सालों से ये सबी क्षेत्र भारत की संस्कृति और परंपारओं का अभिन्न हिस्सा रहे हैं। हमारे कई पौराणिक व वैदिक तीर्थ व मंदिर इन क्षेत्रों में हजारों सालों से हैं। लेकिन विगत तीन सौ वर्षों में हमारा ध्यान इन क्षेत्रों पर नहीं गया। उन्होंने बताया कि राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ ने पहली बार 1948 में मधुकर लिमये को वहाँ प्रचारक बनाकर भेजा और इसके बाद संघ के समर्पित प्रचारकों की एक लंबी श्रृंखला रही जो उस तक्षेत्र में सेवा कार्य करने जाते रहे जो आज तक अनवरत जारी है। संघ के कई प्रचारकों और कार्यकर्ताओं की वहाँ हत्या तक कर दी गई। लेकिन संघ ने अपने सेवा कार्य और वहाँ के लोगों को राष्ट्र से जोड़ने का काम जारी रखा।

उन्होंने बताया कि इसाई मिनशनरी अंग्रेजों के समय ये ही इन सात राज्यों को तोड़कर एक अलग देश बनाने का षड़यंत्र करती रही, लेकिन वहाँ के आदिवासी समुदाय की अपने समाज व राष्ट्र के प्रति निष्ठा से उनका ये षड़यंत्र सफल नहीं हो पाया। उन्होंने बताया कि राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ को छोड़कर वहाँ कोई ऐसी शक्ति नहीं थी जो लोगों में राष्ट्र प्रेम की धारा को जीवित बनाए रखती।

हमारे लिए ये अष्टलक्ष्मी प्रदेश प्रारंभ से ही आस्था व श्रध्दा के केंद्र रहे हैं। असम का कामख्या का मंदिर तंत्र का सबसे प्रसिध्द व जाग्रत शक्तिपीठ है। गोहाटी में नवग्रह मंदिर व वशिष्ठ जी का आश्रम है। मेघालय में जयंती भद्रकाली का जयंती मंदिर है, जहाँ के पुजारी देशमुख महाराष्ट्र से गए थे और आज उनकी 29वीं पीढ़ी इस मंदिर में पूजा अर्चन का कार्य देख रही है। त्रिपुरा में त्रिपुर सुंदरी का मंदिर है, जो एक प्रमुख शक्ति पीठ है। इंफाल में गोविंददेवजी का मंदिर है और हजारों प्राचीन मंदिर आज भी हैं। मिजोरम का संबंध राम से है। वहाँ पोलाशिव मंदिर है। नागालैंड में खाटू श्याम व हिडिंबा का मंदिर है, जो महाभारत कालीन है। यहाँ परशुराम का भी स्थान है।

उन्होंने कहा कि श्री नरेंद्र मोदीजी के आव्हान पर अष्टलक्ष्मी क्षेत्र के जागरण का जो कार्य प्रारंभ हुआ है उससे पूरे देश की चेतना इस क्षेत्र से जुड़ी है। राजनीतिक दृष्टि से वर्ष 2014 के बाद इस क्षेत्र पर सरकार का ध्यान गया। मोदी सरकार आने के बाद इस क्षेत्र में विकास को एक नई गति मिली।

उन्होंने बताया कि विश्व हिंदू परिषद् और राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के कई प्रकल्प अष्टलक्ष्मी क्षेत्र में सैकड़ों सेवा कार्य कर रहे हैं। एकल अभियान व विद्याभारती द्वारा 9 हजार स्कूल और 150 छात्रावास संचालित किए जा रहे हैं। इन स्कूलों से निकले हुए सैकड़ों बच्चे अच्छे संस्थानों में व सरकारी नौकरी कर रहे हैं। यहाँ सक्रिय सैकड़ों उग्रवादी संगठनों से जुड़े हजारों युवा उग्रवाद छोड़कर आज पुलिस व सेना से लेकर विभिन्न सरकारी व निजी संस्थानों में नौकरी कर रहे है। कई लोग खेती में भी लगे हैं।

श्री दीपक जोशी ने बताया कि मोदी सरकार के आने के बाद इस क्षेत्र में 18 एअरपोर्ट बने और 7  नए अएरपोर्ट और बन रहे हैं। सड़कों का जाल तेजी से बिछाया जा रहा है। असम के तिनसुखिया में ऐसी सड़क बनाई गई है जिस पर युध्दक विमान तक सफलतापूर्वक उतर चुके हैं। उन्होंने बताया कि देश के सीमावर्ती राज्य से पूर्वोत्त्र की दूरी मात्र 22 किलोमीटर है। उन्होंने बताया कि वहाँ दृश्य तेजी से बदल रहा है और देश के लोगों का भी पूर्वोत्तर क्षेत्र में पर्यटन व धार्मिक स्थलों पर जाने का आकर्षण बढ़ा है।

कार्यक्रम के आरंभ में श्री वीरेन्द्र याज्ञिक ने श्री दीपक जोशी को श्री भागवत परिवार द्वारा प्रकाशित ग्रंथ अप्रतिम भारत की एक प्रति भेंट की।

कार्यक्रम का विशेष आकर्षण श्री एसपी गोयल का पौत्र नंदन रहा जिसने अपने बाल सुलभ भाव से कहानी व कविता सुनाकर सबको रोमांचित कर दिया
कार्यक्रम में श्री भागवत परिवार के मार्गदर्शक श्री वीरेन्द्र याज्ञिक, श्री भागवत परिवार के अध्यक्ष श्री सुनील सिंघल, श्री सत्यनारायण पाराशर, श्री दिनेश गग्गड़. श्री पीसी श्रीमाली, श्री अनंत रूंगटा, श्री बीपी बिंदलिश, श्री सुशील शर्मा, श्री पंकज टिबड़ेवाल, श्रीमती शालू गोयल के अलावा लेखक पत्रकार श्री प्रदीप गुप्ता, श्री जयंत बागरेचा, श्री पंकज बागरेचा आदि उपस्थित थे।

खतरनाक ड्रग के नेटवर्क की पड़ताल

सिंथेटिक ड्रग्स की शुरुआत सड़कों पर नहीं होती। उनकी शुरुआत उससे कहीं पहले, कारखानों, गोदामों और उन शिपिंग कंटेनरों में होती है जो हर दिन रसायनों को सीमाओं के पार ले जाते हैं। इनमें से कई रसायन कानूनी हैं और फार्मास्यूटिकल तथा अन्य उद्योगों में व्यापक रूप से उपयोग किए जाते हैं। लेकिन जब तस्कर इन्हें दूसरे रास्ते ले जाते हैं, तो यही पदार्थ उन सिंथेटिक ड्रग्स के निर्माण की नींव बन जाते हैं जो समुदायों और सार्वजनिक स्वास्थ्य को नुकसान पहुँचाते हैं। ड्रग एनफोर्समेंट एडमिनिस्ट्रेशन (डीईए) में सहायक विशेष एजेंट-इन-चार्ज केटी डोराइस बताती हैं कि प्रीकर्सर रसायनों को नियंत्रित करना अमेरिकी सरकार की प्राथमिकता क्यों है। डीईए, एक फेडेरल कानून प्रवर्तन एजेंसी है जो तस्करों को इन रसायनों को हानिकारक नशीले पदार्थों में बदलने से रोकने के लिए काम करती है।

प्रीकर्सर क्या होते हैं? डोराइस कहती हैं, “प्रीकर्सर रसायन वे आवश्यक घटक होते हैं जिनका उपयोग मेथामफेटामीन और फेंटानिल जैसे नियंत्रित पदार्थों का अवैध रूप से निर्माण करने में किया जाता है,” और यह भी जोड़ती हैं कि इनमें से कई रसायनों के वैध उपयोग भी होते हैं।

समस्या का पैमाना अत्यंत विशाल है। वह कहती हैं, “2024 में, डीईए ने फेंटानिल -मिश्रित 6 करोड़ से अधिक नकली गोलियाँ और लगभग 8,000 पाउंड फेंटानिल पाउडर जब्त किया।” “ये जब्तियाँ फेंटानिल की 38 करोड़ से अधिक घातक खुराकों के बराबर हैं।” ये आँकड़े दर्शाते हैं कि अमेरिकी सरकार प्रीकर्सर नियंत्रण को केवल एक नियामक मुद्दा नहीं, बल्कि सार्वजनिक सुरक्षा का प्रश्न क्यों मानती है।

2025 के अंत में, डीईए ने फेंटानिल फ्री अमेरिका नामक एक अभियान शुरू किया, जिसका उद्देश्य फेंटानिल की आपूर्ति और मांग दोनों को कम करना है। डोराइस कहती हैं, “डीईए अमेरिकी जीवन और समुदायों को फेंटानिल के विनाशकारी प्रभावों से बचाने के लिए प्रतिबद्ध है। फेंटानिल फ्री अमेरिका का अर्थ रोकथाम, शिक्षा और साझेदारी है।”

शृंखला को तोड़ना
क्योंकि इन रसायनों के वैध उपयोग भी होते हैं, तस्कर अक्सर सबकी नजरों के सामने छिपे रहते हैं। डोराइस एक सामान्य तरीके की ओर इशारा करती हैं जिसे ट्रांसशिपमेंट कहा जाता है। वह कहती हैं, “इस प्रणाली में आयात/निर्यात से जुड़े ऐसे छिद्र हैं जिनसे निपटना कठिन है।” आपराधिक समूह कमज़ोर निगरानी वाले बंदरगाहों के माध्यम से रसायनों को स्थानांतरित करते हैं और फिर उन्हें आगे भेज देते हैं। वह जोड़ती हैं, “यह प्रक्रिया प्रारंभिक निर्यातक देश के लिए कागजी रिकॉर्ड को साफ-सुथरा दिखाती है।”

डीईए के लिए इस चरण पर दुरुपयोग को रोकना अत्यंत महत्वपूर्ण है। डोराइस कहती हैं, “डीईए प्रीकर्सर रसायनों के नियंत्रण को प्राथमिकता देता है, जिससे ड्रग तस्करों के लिए नशीले पदार्थ बनाने हेतु कच्चा माल प्राप्त करना कठिन हो जाता है।”

एक और सामान्य तरीका, गलत घोषणा (मिस-डिक्लेरेशन), किसी शिपमेंट की वास्तविक प्रकृति या गंतव्य को छिपाने से जुड़ा होता है। वह समझाती हैं, “प्रीकर्सर रसायन ऑनलाइन खरीदे जाते हैं और आयात/निर्यात के दौरान उनकी गलत घोषणा की जाती है।”

इस जोखिम से निपटने के लिए, डीईए कंपनियों के साथ नो योर कस्टमर (केवाईसी) प्रथाओं पर काम करता है। डोराइस बताती हैं, “केवाईसी का सिद्धांत यह है कि कोई रासायनिक या फार्मास्यूटिकल कंपनी ऐसी नीतियाँ लागू करे जिससे ज्ञात प्रीकर्सरों की बिक्री केवल उन ग्राहकों तक सीमित रहे जिन्हें वास्तविक माना जाता है।”

उभरते जोखिमों की पहचान में वैज्ञानिक विश्लेषण भी एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। डोराइस बताती हैं, “संयुक्त राज्य अमेरिका में डीईए की प्रयोगशाला प्रणाली सिंथेटिक ड्रग्स के खिलाफ लड़ाई में अग्रणी है।” “यह जब्त किए गए रसायनों—जैसे पाउडर, तरल और गोलियाँ—का विश्लेषण करती है। वर्षों में, डीईए ने प्रीकर्सर सिग्नेचर, संश्लेषण मार्गों, अशुद्धता प्रोफाइल और उभरते एनालॉग्स का एक विशाल डेटाबेस तैयार किया है।” तस्करों द्वारा रणनीतियाँ बदलने के साथ सरकारों को भी अनुकूलन करना पड़ता है। वह कहती हैं, “एआई और डेटा एनालिटिक्स दूसरे रास्ते भेजे गए हुए प्रीकर्सर रसायनों का पता लगाने में शक्तिशाली उपकरण हैं।” डेटा एनालिटिक्स किसी भी एजेंसी को रसायनों की खरीद की मात्रा, शिपिंग जानकारी, आयात और निर्यात डेटा जैसी विसंगतियों की पहचान करने में सक्षम बनाता है। ये उपकरण जांचकर्ताओं को उच्च-जोखिम वाले शिपमेंट पर रियल-टाइम अलर्ट लगाने या किसी कंपनी द्वारा असामान्य गंतव्य पर बड़ी मात्रा में प्रीकर्सर रसायन बेचने की पहचान करने में मदद कर सकते हैं।

भारत के साथ काम
डीईए भारत के साथ सहयोग के महत्व पर जोर देता है। डोराइस कहती हैं, “भारत वैध प्रीकर्सर रसायनों के दुनिया के सबसे बड़े उत्पादकों में से एक है, इसलिए साझेदारी आवश्यक है,” और बताती हैं कि डीईए भारत की सेंट्रल रेवेन्यूज़ कंट्रोल लेबोरेटरी (सीआरसीएल) के साथ प्रीकर्सर रसायनों और सिंथेटिक ओपिओइड्स की पहचान पर काम कर रहा है।

डीईए का नई दिल्ली कार्यालय भारत के नारकोटिक्स कंट्रोल ब्यूरो, डायरेक्टरेट ऑफ रेवेन्यू इंटेलिजेंस और सेंट्रल ब्यूरो ऑफ नारकोटिक्स के साथ भी जानकारी साझा करने और संयुक्त जांचों के समर्थन के लिए निकटता से काम करता है।

अगस्त 2025 में, डीईए ने वर्जीनिया के स्टर्लिंग स्थित स्पेशल टेस्टिंग एंड रिसर्च लेबोरेटरी से दो रसायनज्ञों को भारत में समकक्षों के साथ रासायनिक विश्लेषण और सर्वोत्तम प्रथाओं पर चर्चा करने के लिए भेजा। डीईए 2026 में सीआरसीएल के साथ अतिरिक्त कार्यक्रमों की उम्मीद करता है ताकि बदलते ड्रग रुझानों की निगरानी और सूचना साझा करना जारी रखा जा सके।

अमेरिकी सरकार के कार्यक्रमों और कूटनीतिक सहभागिता से समर्थित यह सहयोग, वैध व्यापार का समर्थन करते हुए निगरानी को मज़बूत करता है। रोकथाम, निगरानी और साझेदारियों पर ध्यान केंद्रित करके, डीईए का लक्ष्य खतरनाक ड्रग्स को अमेरिकी समुदायों तक पहुँचने से पहले ही रोकना है।

(lचित्र परिचयःअमेरिका में डीईए की प्रयोगशाला प्रणाली जब्त किए गए रसायनों—जैसे पाउडर, तरल पदार्थ और गोलियाँ—का विश्लेषण करती है। वर्षों के दौरान, इसने प्रीकर्सर संकेतों, संश्लेषण मार्गों, अशुद्धता प्रोफाइल और उभरते एनालॉग्स का एक विशाल डेटाबेस तैयार किया है। (फोटोग्राफ © मार्क शीफ़ेलबाइन / एपी))

साभार: स्पैन https://spanmag.state.gov/hi/ से

छत्रपति शिवाजी की अमर विरासत और आधुनिक भारत की दिशा

19 फरवरी भारत के इतिहास का वह गौरवपूर्ण दिवस है, जब हम छत्रपति शिवाजी महाराज की जयंती मनाते हैं। यह केवल एक जन्मतिथि का स्मरण नहीं, बल्कि भारतीय अस्मिता, स्वाभिमान और सांस्कृतिक पुनर्जागरण के उस अद्भुत अध्याय का उत्सव है, जिसने पराधीनता के अंधकार में स्वराज्य का दीप प्रज्वलित किया। सत्रहवीं शताब्दी में जब भारत का बड़ा भूभाग मुगल सत्ता, विशेषतः औरंगजेब के कठोर शासन के अधीन था, तब सह्याद्रि की पर्वतमालाओं से एक युवा योद्धा ने यह उद्घोष किया कि “हिंदवी स्वराज्य” केवल स्वप्न नहीं, बल्कि संकल्प है-और उस संकल्प को साकार कर दिखाया।

शिवाजी महाराज का जन्म 1630 में शिवनेरी दुर्ग पर हुआ। उनका नाम भगवान शिव पर नहीं, बल्कि देवी शिवई के नाम पर रखा गया-यह तथ्य ही बताता है कि उनके जीवन की प्रेरणा शक्ति और साहस की आराधना में निहित थी। उनकी माता जीजाबाई ने उन्हें रामायण, महाभारत और पुराणों की कथाओं के माध्यम से धर्म, नीति और राष्ट्रधर्म का संस्कार दिया। दादाजी कोंडदेव के मार्गदर्शन में उन्होंने शास्त्र और शस्त्र दोनों का संतुलित ज्ञान प्राप्त किया। यही संतुलन आगे चलकर उनके व्यक्तित्व की सबसे बड़ी विशेषता बना-वे केवल तलवार के धनी नहीं, बल्कि नीति और दूरदर्शिता के भी अद्वितीय उदाहरण थे।
शिवाजी महाराज का सबसे बड़ा योगदान हिंदू साम्राज्य की स्थापना है, जिसे उन्होंने “हिंदवी स्वराज्य” कहा। यह किसी एक संप्रदाय का राज्य नहीं था, बल्कि भारतीय जनमानस की स्वतंत्रता और सम्मान का प्रतीक था। उन्होंने छोटे-छोटे किलों से शुरुआत कर एक संगठित मराठा शक्ति का निर्माण किया। तोरणा, रायगढ़, प्रतापगढ़ जैसे दुर्ग केवल पत्थरों की संरचनाएँ नहीं थे, बल्कि स्वराज्य के प्रहरी थे। गुरिल्ला युद्धकला में उनकी दक्षता अद्भुत थी। मुगल सेनापति उन्हें “पहाड़ी चूहा” कहकर उपहास करना चाहते थे, परंतु वही रणनीति मुगलों की सबसे बड़ी कमजोरी बन गई। वे भूगोल को अपनी शक्ति में बदलने की कला जानते थे-तेजी से आक्रमण, अचानक प्रहार और सुरक्षित वापसी उनकी युद्धनीति का आधार था।

उनकी वीरता का शिखर तब दिखाई देता है जब उन्होंने औरंगजेब की विशाल साम्राज्यवादी शक्ति को खुली चुनौती दी। आगरा में बंदी बनाए जाने के बाद उनका साहसिक पलायन केवल एक व्यक्तिगत उपलब्धि नहीं, बल्कि मुगल सत्ता के अहंकार पर करारा प्रहार था। इसके पश्चात उन्होंने 1674 में रायगढ़ में विधिवत राज्याभिषेक कर स्वयं को “छत्रपति” घोषित किया। यह घटना केवल राजनीतिक नहीं, सांस्कृतिक पुनस्र्थापन का भी प्रतीक थी-सदियों बाद किसी हिंदू राजा का वैदिक विधि से राज्याभिषेक हुआ था।

शिवाजी महाराज की शासन व्यवस्था भी उतनी ही प्रभावशाली थी जितनी उनकी युद्धनीति। उन्होंने अष्टप्रधान मंडल की स्थापना की, जिसमें विभिन्न विभागों के मंत्री नियुक्त थे। प्रशासन में पारदर्शिता, न्याय और जनकल्याण को प्राथमिकता दी गई। भूमि राजस्व व्यवस्था को सुव्यवस्थित किया गया ताकि किसानों पर अत्याचार न हो। महिलाओं के सम्मान की रक्षा उनके शासन का मूल सिद्धांत था-युद्ध में पकड़ी गई महिलाओं को सम्मानपूर्वक उनके घर भेजने की परंपरा उन्होंने स्थापित की। धार्मिक सहिष्णुता उनके शासन की आधारशिला थी, उनकी सेना और प्रशासन में मुस्लिम अधिकारी भी महत्वपूर्ण पदों पर थे। उन्होंने किसी भी मस्जिद या पूजा स्थल को क्षति पहुँचाने की अनुमति नहीं दी। इस प्रकार उनका हिंदू स्वराज्य संकीर्ण नहीं, बल्कि उदार और समावेशी था।

शिवाजी महाराज भारत के उन शुरुआती शासकों में थे जिन्होंने समुद्री शक्ति के महत्व को समझा। उन्होंने एक सशक्त नौसेना का निर्माण किया और कोंकण तट की सुरक्षा सुनिश्चित की। विदेशी आक्रमणकारियों-विशेषतः पुर्तगालियों और सिद्धियोंकृके विरुद्ध यह रणनीति अत्यंत प्रभावी सिद्ध हुई। यह दूरदर्शिता दर्शाती है कि वे केवल तत्कालीन संघर्षों तक सीमित नहीं थे, बल्कि भविष्य की चुनौतियों को भी भांपने की क्षमता रखते थे।

भारतीय संस्कृति और अस्मिता के लिए उनका त्याग अतुलनीय है। उन्होंने विलासिता का जीवन त्यागकर कठिन संघर्ष का मार्ग चुना। निरंतर युद्ध, षड्यंत्र और चुनौतियों के बीच भी उन्होंने राष्ट्रधर्म को सर्वोपरि रखा। उनका जीवन इस सत्य का प्रमाण है कि स्वराज्य केवल राजनीतिक स्वतंत्रता नहीं, बल्कि सांस्कृतिक स्वाभिमान का भी प्रश्न है। उन्होंने जनमानस में यह विश्वास जगाया कि विदेशी सत्ता अजेय नहीं है और संगठित प्रयास से स्वतंत्रता प्राप्त की जा सकती है।
आधुनिक संदर्भ में यदि हम इस विरासत को देखें, तो यह प्रश्न स्वाभाविक है कि आज के भारत में शिवाजी के आदर्श कितने प्रासंगिक हैं। वर्तमान समय में जब भारत वैश्विक मंच पर अपनी भूमिका सुदृढ़ कर रहा है, तब राष्ट्रीय सुरक्षा, सांस्कृतिक पुनर्जागरण और सुशासन की अवधारणाएँ पुनः केंद्र में हैं। नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भारत ने आत्मनिर्भरता, सशक्त रक्षा नीति और सांस्कृतिक धरोहर के संरक्षण पर विशेष बल दिया है। यहाँ तुलनात्मक विवेचना की जा सकती है, यद्यपि दोनों युगों की परिस्थितियाँ भिन्न हैं।

शिवाजी महाराज ने स्वदेशी सैन्य शक्ति पर भरोसा किया और स्थानीय संसाधनों के माध्यम से साम्राज्य खड़ा किया। आधुनिक भारत में आत्मनिर्भर भारत अभियान उसी भावना का आधुनिक रूप प्रतीत होता है, जहाँ रक्षा उत्पादन और आर्थिक सशक्तिकरण पर बल दिया जा रहा है। शिवाजी ने किलों और नौसेना के माध्यम से सीमाओं की सुरक्षा सुनिश्चित की, आज भारत आधुनिक तकनीक और रणनीतिक साझेदारियों के माध्यम से अपनी सीमाओं को सुरक्षित रखने का प्रयास कर रहा है। शिवाजी का प्रशासन जनकल्याण और पारदर्शिता पर आधारित थाय समकालीन शासन में डिजिटल पारदर्शिता, प्रत्यक्ष लाभ अंतरण और भ्रष्टाचार-नियंत्रण की पहलें उसी आदर्श की झलक देती हैं।

सांस्कृतिक पुनर्जागरण की दृष्टि से भी समानता देखी जा सकती है। शिवाजी महाराज ने हिंदू परंपराओं और प्रतीकों को पुनस्र्थापित कर जनमानस में आत्मगौरव जगाया। आज भी भारत में सांस्कृतिक धरोहरों के संरक्षण, तीर्थस्थलों के विकास और ऐतिहासिक विरासत के पुनरोद्धार पर बल दिया जा रहा है। अंतर केवल इतना है कि शिवाजी का संघर्ष प्रत्यक्ष सैन्य टकराव का था, जबकि आधुनिक भारत का संघर्ष वैश्विक प्रतिस्पर्धा और कूटनीतिक संतुलन का है।

फिर भी, तुलनात्मक विवेचना करते समय यह स्मरण रखना चाहिए कि शिवाजी महाराज का युग पूर्णतः भिन्न राजनीतिक-सामाजिक परिस्थितियों में था। वे एक उभरते हुए स्वराज्य के संस्थापक थे, आज का भारत एक स्थापित लोकतांत्रिक गणराज्य है। अतः समानताओं को प्रेरणा के रूप में देखना चाहिए, न कि पूर्ण समानता के रूप में। शिवाजी की सबसे बड़ी सीख है-साहस, संगठन, दूरदर्शिता और राष्ट्रहित को सर्वोपरि रखना। यही मूल्य किसी भी युग में प्रासंगिक रहते हैं।
छत्रपति शिवाजी महाराज की जयंती हमें यह स्मरण कराती है कि राष्ट्र निर्माण केवल तलवार से नहीं, बल्कि नीति, नैतिकता और जनविश्वास से होता है। उन्होंने दिखाया कि सीमित संसाधनों के बावजूद यदि नेतृत्व दृढ़ हो तो असंभव भी संभव हो सकता है।

आज आवश्यकता है कि हम उनके आदर्शों को केवल उत्सव तक सीमित न रखें, बल्कि उन्हें अपने आचरण और राष्ट्रीय जीवन में उतारें। भारतीय अस्मिता का अर्थ किसी के प्रति द्वेष नहीं, बल्कि अपने स्वत्व का सम्मान है-और यही संदेश शिवाजी महाराज के जीवन से हमें मिलता है। उनकी 394वीं जयंती पर उन्हें नमन करते हुए हम संकल्प लें कि स्वराज्य की उस भावना को, जिसे उन्होंने सह्याद्रि की घाटियों से जगाया था, हम आधुनिक भारत की प्रगति और वैश्विक नेतृत्व में रूपांतरित करेंगे। यही उनके प्रति सच्ची श्रद्धांजलि होगी।

प्रेषकः

(ललित गर्ग)
ई-253, सरस्वती कुंज अपार्टमेंट
25 आई. पी. एक्सटेंशन, पटपड़गंज,
दिल्ली-110092, मो. 9811051133

डिजिटल युग में मातृभाषाओं को बचाना बड़ी चुनौती

अंतर्राष्ट्रीय मातृभाषा दिवस- 21 फरवरी, 2026

21 फरवरी को मनाया जाने वाला अंतर्राष्ट्रीय मातृभाषा दिवस केवल मातृभाषा संस्कृति को बचाने का अनुष्ठान ही नहीं, बल्कि मानवता की सांस्कृतिक आत्मा का उत्सव है। वर्ष 2026 में इसकी मुख्य थीम “बहुभाषी शिक्षा पर युवाओं की आवाज़” है, जो यह संकेत देती है कि भविष्य की भाषाई दिशा युवा पीढ़ी तय करेगी। यह वर्ष विशेष रूप से महत्वपूर्ण है क्योंकि यह इस दिवस की 25वीं वर्षगांठ-रजत जयंती का प्रतीक है। वर्ष 1999 में यूनेस्को द्वारा इसकी घोषणा की गई और 2000 से इसे वैश्विक स्तर पर मनाया जा रहा है।

इस वर्ष का फोकस 13 से 18 वर्ष के युवाओं को भाषाई विविधता के संरक्षण, मातृभाषा में शिक्षा के विस्तार और डिजिटल युग में भाषाओं की भूमिका पर सक्रिय संवाद के लिए प्रेरित करना है। मातृभाषा केवल शब्दों का संग्रह नहीं होती, वह मनुष्य के मन, मस्तिष्क और संवेदनाओं की प्रथम अभिव्यक्ति है। बच्चा जब जन्म लेता है तो वह किसी औपचारिक शिक्षा से पहले अपनी माँ की ध्वनियों, लोरियों और संवादों के माध्यम से भाषा का संस्कार ग्रहण करता है। यही भाषा उसकी सोच, उसकी रचनात्मकता और उसकी पहचान का आधार बनती है। शोधों से यह सिद्ध हो चुका है कि प्रारंभिक शिक्षा मातृभाषा में होने पर बच्चों की समझ, विश्लेषण क्षमता और आत्मविश्वास में उल्लेखनीय वृद्धि होती है। फिर भी वैश्विक स्तर पर लगभग 40 प्रतिशत बच्चों को उस भाषा में शिक्षा नहीं मिलती जिसे वे बोलते या समझते हैं।

इस दिवस का ऐतिहासिक संदर्भ हमें 21 फरवरी 1952 की उस त्रासदी की याद दिलाता है जब पूर्वी पाकिस्तान में अपनी मातृभाषा बांग्ला के सम्मान के लिए छात्रों ने आंदोलन किया और गोलीबारी में अनेक युवा शहीद हो गए। बाद में यही पूर्वी पाकिस्तान स्वतंत्र होकर बांग्लादेश बना। उन शहीदों की स्मृति में यह दिवस भाषाई अधिकारों और अस्मिता का प्रतीक बन गया। यह हमें सिखाता है कि भाषा केवल संवाद का माध्यम नहीं, बल्कि स्वाभिमान और स्वतंत्रता का आधार है। वर्ष 2026 की थीम युवाओं की भागीदारी को केंद्र में रखती है। आज का युवा डिजिटल संसार में जी रहा है। सोशल मीडिया, कृत्रिम बुद्धिमत्ता और ऑनलाइन शिक्षा उसके जीवन का अभिन्न हिस्सा बन चुके हैं। ऐसे में प्रश्न उठता है कि क्या डिजिटल प्लेटफॉर्म पर मातृभाषाओं के लिए पर्याप्त स्थान है? आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस एक ओर तो विलुप्तप्राय भाषाओं के शब्दकोश, ध्वनि-संग्रह और अनुवाद प्रणाली विकसित कर उन्हें पुनर्जीवित कर सकता है, वहीं दूसरी ओर यदि तकनीक कुछ सीमित भाषाओं तक सिमट जाए तो भाषाई असमानता और गहरी हो सकती है। इसलिए युवाओं को तकनीक का उपयोग मातृभाषा सशक्तिकरण के लिए करना होगा-ऐप, ब्लॉग, पॉडकास्ट, यूट्यूब चैनल और डिजिटल पुस्तकालयों के माध्यम से अपनी भाषाओं को वैश्विक मंच देना होगा।

यूनेस्को का मानना है कि स्थायी समाज के लिए सांस्कृतिक और भाषाई विविधता बहुत जरूरी है। शांति के लिए अपने जनादेश के तहत यह संस्कृतियों और भाषाओं में अंतर को बनाए रखने के लिए काम करता है जो दूसरों के लिए सहिष्णुता और सम्मान को बढ़ावा देते हैं। बहुभाषी और बहुसांस्कृतिक समाज अपनी भाषाओं के माध्यम से अस्तित्व में रहते हैं जो पारंपरिक ज्ञान और संस्कृतियों को स्थायी तरीके से प्रसारित और संरक्षित करते हैं। भाषाई विविधता लगातार खतरे में पड़ती जा रही है क्योंकि अधिकाधिक भाषाएं लुप्त होती जा रही हैं। मातृभाषा जीवन का आधार है, यह एक ऐसी भाषा होती है जिसे सीखने के लिए उसे किसी कक्षा की जरूरत नहीं पड़ती। जन्म लेने के बाद मानव जो प्रथम भाषा सीखता है उसे उसकी मातृभाषा कहते हैं, वही व्यक्ति की सामाजिक एवं भाषाई पहचान होती है। लेकिन मानव समाज में कई दफा हमें मानवाधिकारों के हनन के साथ-साथ मातृभाषा के उपयोग को गलत भी बताया जाता रहा है।

भारत जैसे बहुभाषी देश में यह चुनौती और अवसर दोनों है। पीपुल्स लिंग्विस्टिक सर्वे ऑफ इंडिया के अनुसार पिछले कुछ दशकों में सैकड़ों भाषाएँ लुप्त हो चुकी हैं। यह केवल शब्दों का खो जाना नहीं, बल्कि परंपराओं, लोककथाओं, लोकगीतों और जीवनदृष्टि का विलुप्त होना है। यदि नई पीढ़ी अपनी मातृभाषा से विमुख हो जाएगी तो सांस्कृतिक जड़ों से उसका संबंध कमजोर हो जाएगा। इसलिए आवश्यक है कि विद्यालयों और विश्वविद्यालयों में बहुभाषी शिक्षा को प्रोत्साहन मिले, स्थानीय साहित्य और लोकसंस्कृति को पाठ्यक्रम में स्थान दिया जाए, और युवाओं को अपनी भाषा में अभिव्यक्ति के अवसर प्रदान किए जाएँ। आज एक बड़ा भ्रम यह है कि केवल विदेशी भाषा ही विकास का मार्ग है। निस्संदेह वैश्विक संपर्क के लिए अन्य भाषाओं का ज्ञान आवश्यक है,

परंतु इसका अर्थ यह नहीं कि हम अपनी मातृभाषा की उपेक्षा करें। मातृभाषा में शिक्षा से ही मौलिक चिंतन और नवाचार संभव है। भारत की नई शिक्षा नीति 2020 ने भी प्रारंभिक शिक्षा मातृभाषा में देने पर बल दिया है। यह निर्णय वैज्ञानिक दृष्टि से भी उचित है, क्योंकि जब विद्यार्थी अपनी सहज भाषा में सीखता है तो वह केवल जानकारी ग्रहण नहीं करता, बल्कि उसे आत्मसात करता है।
हमारे देश में मातृभाषाओं के प्रति अनेक प्रकार के भ्रम फैले हैं, जिनमें एक भ्रम है कि अंग्रेजी विकास और ज्ञान की भाषा है। जबकि इस बात से यूनेस्को सहित अनेक संस्थानों के अनुसंधान यह सिद्ध कर चुके हैं कि अपनी भाषा में शिक्षा से ही बच्चे का सही एवं सर्वांगीण मायने में विकास हो पाता है। इस दृष्टि से मातृभाषा में शिक्षा पूर्ण रूप से वैज्ञानिक है।

युवाओं में मातृभाषा के प्रति आकर्षण कैसे बढ़ाया जाए? पहला उपाय है-भाषा को बोझ नहीं, गौरव के रूप में प्रस्तुत करना। जब हम अपने साहित्यकारों, वैज्ञानिकों और महापुरुषों की उपलब्धियों को मातृभाषा से जोड़कर बताते हैं, तो युवाओं में स्वाभिमान जागृत होता है। दूसरा उपाय है-रचनात्मक मंच उपलब्ध कराना। कविता-पाठ, नाटक, वाद-विवाद, ब्लॉग लेखन और डिजिटल कंटेंट निर्माण के माध्यम से युवा अपनी भाषा में सृजन करें। तीसरा उपाय है-परिवार की भूमिका। घर में यदि संवाद मातृभाषा में होगा तो बच्चे में स्वाभाविक अनुराग उत्पन्न होगा। भाषाई विविधता के प्रति संवेदनशीलता विकसित करना भी उतना ही आवश्यक है। भारत में सैकड़ों भाषाएँ और बोलियाँ हैं; प्रत्येक भाषा अपने साथ एक विशिष्ट जीवनदर्शन लेकर आती है। हमें यह समझाना होगा कि किसी भी भाषा को छोटा या बड़ा कहना अनुचित है। सभी भाषाएँ समान रूप से सम्माननीय हैं। हिन्दी राजभाषा है, परंतु अन्य भारतीय भाषाएँ भी उतनी ही महत्वपूर्ण हैं। संस्कृत हमारी प्राचीन ज्ञान-परंपरा की धरोहर है, तो तमिल, बांग्ला, मराठी, गुजराती, उड़िया, असमिया, कन्नड़, मलयालम, पंजाबी, कश्मीरी और अन्य भाषाएँ अपनी-अपनी सांस्कृतिक संपदा से राष्ट्र को समृद्ध करती हैं।

डिजिटल युग में युवाओं को यह संकल्प लेना चाहिए कि वे अपनी मातृभाषा में कम से कम एक रचनात्मक कार्य अवश्य करेंगे-चाहे वह एक ब्लॉग हो, एक कहानी, एक गीत या एक शैक्षिक वीडियो। कृत्रिम बुद्धिमत्ता आधारित अनुवाद उपकरणों और भाषा मॉडल्स का उपयोग करके वे अपनी भाषा की सामग्री को वैश्विक पाठकों तक पहुँचा सकते हैं। इससे न केवल भाषा का संरक्षण होगा, बल्कि आर्थिक अवसर भी बढ़ेंगे। स्थानीय भाषाओं में स्टार्टअप, ई-लर्निंग प्लेटफॉर्म और डिजिटल प्रकाशन नए रोजगार के द्वार खोल सकते हैं। अंतर्राष्ट्रीय मातृभाषा दिवस 2026 हमें यह संदेश देता है कि भाषाई विविधता ही मानवता की वास्तविक समृद्धि है। यदि हम सतत विकास का लक्ष्य प्राप्त करना चाहते हैं तो समावेशी शिक्षा आवश्यक है, और समावेशी शिक्षा का आधार मातृभाषा है। युवाओं की आवाज़ जब बहुभाषी शिक्षा के समर्थन में उठेगी, तभी समाज में व्यापक परिवर्तन संभव होगा। आज आवश्यकता है एक सामूहिक संकल्प की-हम अपनी मातृभाषा का सम्मान करेंगे, उसे डिजिटल मंचों पर प्रतिष्ठित करेंगे और आने वाली पीढ़ियों तक उसकी विरासत पहुँचाएँगे। भाषा हमारी आत्मा है; उसे जीवित रखना हमारा दायित्व है। अंतर्राष्ट्रीय मातृभाषा दिवस पर यही संदेश गूंजना चाहिए कि युवा ही भाषाई भविष्य के प्रहरी हैं। जब युवा अपनी जड़ों से जुड़ेंगे, तभी विश्व अधिक समावेशी, सहिष्णु और सांस्कृतिक रूप से समृद्ध बनेगा।

प्रेषकः
(ललित गर्ग)
लेखक, पत्रकार, स्तंभकार
ई-253, सरस्वती कंुज अपार्टमेंट
25 आई॰ पी॰ एक्सटेंशन, पटपड़गंज, दिल्ली-110092
मो. 9811051133

असमानताओं पर प्रहार, समानता का विस्तारः एक सार्थक पुकार

विश्व सामाजिक न्याय दिवस- 20 फरवरी, 2026

संयुक्त राष्ट्र द्वारा प्रतिवर्ष 20 फरवरी को मनाया जाने वाला विश्व सामाजिक न्याय दिवस आज के समय में केवल असमानताओं पर प्रहार एवं समानता के विस्तार की एक सार्थक पुकार का अंतरराष्ट्रीय आयोजन ही नहीं, बल्कि वैश्विक चेतना का आह्वान है। वर्ष 2026 में यह दिवस विशेष महत्व ग्रहण कर रहा है, क्योंकि विश्व तेजी से बदलती अर्थव्यवस्था, तकनीकी संक्रमण, जलवायु संकट, राजनीतिक ध्रूवीकरण और सामाजिक असमानताओं के बीच नई संतुलित व्यवस्था की तलाश में है। इस वर्ष की थीम “समावेश को सशक्त बनानाः सामाजिक न्याय के लिए अंतर को पाटना” हमें यह याद दिलाता है कि विकास तभी सार्थक है जब वह समावेशी हो और समावेशन तभी प्रभावी है जब वह न्यायपूर्ण हो।

सामाजिक न्याय का अर्थ केवल अवसरों की समानता तक सीमित नहीं है, बल्कि यह उस व्यापक व्यवस्था की स्थापना का आग्रह करता है जिसमें संसाधनों, अधिकारों और गरिमा का निष्पक्ष वितरण सुनिश्चित हो। जब तक समाज के अंतिम व्यक्ति को शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार और सुरक्षा की समान उपलब्धता नहीं मिलती, तब तक प्रगति अधूरी है। 2026 की थीम विशेष रूप से उन समुदायों की भागीदारी पर बल देती है जो ऐतिहासिक रूप से हाशिए पर रहे हैं-चाहे वे आर्थिक रूप से वंचित हों, सामाजिक रूप से उपेक्षित हों या राजनीतिक रूप से प्रतिनिधित्व से दूर हों। समावेशन का सशक्तिकरण केवल नीतिगत घोषणा नहीं, बल्कि निर्णय-प्रक्रिया में सक्रिय सहभागिता का अधिकार है।

आज वैश्विक स्तर पर असमानताओं की खाई कई रूपों में दिखाई देती है। एक ओर तकनीकी क्रांति और कृत्रिम बुद्धिमत्ता रोजगार के नए अवसर सृजित कर रही है, तो दूसरी ओर पारंपरिक श्रम-आधारित रोजगार असुरक्षित होते जा रहे हैं। डिजिटल विभाजन नई सामाजिक दूरी का कारण बन रहा है। ग्रामीण और शहरी, विकसित और विकासशील, पुरुष और महिला, सक्षम और दिव्यांग-इन सबके बीच संसाधनों की असमान पहुंच सामाजिक तनाव को जन्म देती है। ऐसे समय में सामाजिक न्याय का अर्थ है इन अंतरों को पहचानना और उन्हें पाटने के लिए लक्षित, संवेदनशील और पारदर्शी नीतियों का निर्माण करना। सम्मानजनक कार्य की अवधारणा भी सामाजिक न्याय के केंद्र में है। केवल रोजगार उपलब्ध कराना पर्याप्त नहीं, बल्कि ऐसा कार्य-संस्कृति बनाना आवश्यक है जिसमें उचित वेतन, सुरक्षित कार्य-परिस्थितियां और श्रमिकों के अधिकारों की रक्षा सुनिश्चित हो। आर्थिक विकास तभी टिकाऊ हो सकता है जब वह मानव गरिमा के साथ जुड़ा हो। यदि विकास केवल आंकड़ों में सीमित रह जाए और आम नागरिक के जीवन में राहत न ला सके, तो वह विकास नहीं, केवल विस्तार है।

मजबूत सामाजिक सुरक्षा तंत्र इस युग की अनिवार्यता बन चुका है। कोविड-19 महामारी ने यह स्पष्ट कर दिया कि संकट किसी भी समाज को अचानक अस्थिर कर सकता है। बेरोजगारी, स्वास्थ्य संकट और आर्थिक मंदी से निपटने के लिए सामाजिक सुरक्षा जाल का सुदृढ़ होना अत्यंत आवश्यक है। वृद्धजन, दिव्यांग, महिलाएं, बच्चे और असंगठित क्षेत्र के श्रमिक-इन सभी के लिए संरक्षित ढांचा ही न्यायपूर्ण समाज की नींव है। भारत जैसे विविधतापूर्ण लोकतंत्र में सामाजिक न्याय का विचार ऐतिहासिक और संवैधानिक दोनों दृष्टियों से महत्वपूर्ण है। भारतीय संविधान ने समानता, स्वतंत्रता और बंधुत्व के सिद्धांतों के माध्यम से एक ऐसे समाज की कल्पना की है जहां जाति, धर्म, लिंग या वर्ग के आधार पर भेदभाव न हो। आज भी सामाजिक न्याय का प्रश्न केवल आर्थिक असमानता तक सीमित नहीं है; यह सामाजिक पूर्वाग्रहों, लैंगिक भेदभाव, क्षेत्रीय असंतुलन और सांस्कृतिक असमानताओं से भी जुड़ा है।

समकालीन भारत में सामाजिक न्याय के संदर्भ में विभिन्न सरकारी योजनाओं और पहलों के माध्यम से वंचित वर्गों को मुख्यधारा में लाने का प्रयास किया जा रहा है। नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता मंत्रालय द्वारा अनुसूचित जाति, पिछड़ा वर्ग, दिव्यांगजन, वरिष्ठ नागरिक और नशा-पीड़ित व्यक्तियों के सशक्तिकरण हेतु अनेक योजनाएं संचालित की गई हैं। सरकार का दृष्टिकोण यह रहा है कि सामाजिक न्याय विभाजन की राजनीति नहीं, बल्कि समावेशन की नीति के माध्यम से स्थापित हो। “संतुष्टिकरण” बनाम “तुष्टिकरण” की अवधारणा इसी दिशा में एक वैचारिक संकेत है, जो समाज को जोड़ने की बात करती है। फिर भी चुनौतियां शेष हैं। महंगाई, बेरोजगारी, पर्यावरणीय संकट और बढ़ती जीवन-यापन लागत आम नागरिक के लिए वास्तविक कठिनाइयां उत्पन्न करती हैं। लोकतंत्र का उद्देश्य केवल चुनावी प्रक्रिया तक सीमित नहीं, बल्कि जनसंतोष और जनकल्याण सुनिश्चित करना है। यदि नागरिक स्वयं को असुरक्षित, असमान या उपेक्षित अनुभव करें, तो सामाजिक न्याय का आदर्श खोखला प्रतीत होने लगता है।

आज आवश्यकता है कि सामाजिक न्याय को केवल राजनीतिक नारे के रूप में नहीं, बल्कि नैतिक दायित्व के रूप में देखा जाए। हमने आचरण की पवित्रता एवं पारदर्शिता की बजाय कदाचरण एवं अनैतिकता की कालिमा का लोकतंत्र बना रखा है। ऐसा लगता है कि धनतंत्र एवं सत्तातंत्र ने जनतंत्र को बंदी बना रखा है। हमारी न्याय-व्यवस्था कितनी भी निष्पक्ष, भव्य और प्रभावी हो, फ्रांसिस बेकन ने ठीक कहा था कि ‘यह ऐसी न्याय-व्यवस्था है जिसमें एक व्यक्ति की यंत्रणा के लिये दस अपराधी दोषमुक्त और रिहा हो सकते हैं।’ रोमन दार्शनिक सिसरो ने कहा था कि ‘मनुष्य का कल्याण ही सबसे बड़ा कानून है।’ लेकिन हमारे देश के कानून एवं शासन व्यवस्था को देखते हुए ऐसा प्रतीत नहीं होता, आम आदमी सजा का जीवन जीने को विवश है। सामाजिक न्याय के लिए सामाजिक एकता भंग नहीं की जा सकती। शासन और प्रशासन की प्रत्येक नीति का अंतिम लक्ष्य मानव कल्याण होना चाहिए। यदि शक्ति के स्रोत जनहित में प्रयुक्त न हों, तो वे असंतोष और अविश्वास को जन्म देते हैं। विश्व सामाजिक न्याय दिवस हमें आत्ममंथन का अवसर देता है। क्या हमारा लोकतंत्र समानता का लोकतंत्र है या विभेद का? क्या हमारी स्वतंत्रता सबके लिए समान अवसर लेकर आई है या केवल कुछ वर्गों तक सीमित है? क्या हमारी नीतियां पारदर्शिता और नैतिकता पर आधारित हैं या वे जटिलता और असमानता को बढ़ा रही हैं? इन प्रश्नों का उत्तर ईमानदारी से खोजना ही इस दिवस की सार्थकता है।

सामाजिक न्याय केवल सरकारों की जिम्मेदारी नहीं, समाज की भी सामूहिक जिम्मेदारी है। जाति, धर्म, वर्ग और लिंग के भेद से ऊपर उठकर यदि नागरिक परस्पर सम्मान और सहयोग की भावना विकसित करें, तो सामाजिक ताने-बाने को सुदृढ़ किया जा सकता है। शिक्षा संस्थान, नागरिक संगठन, धार्मिक और सांस्कृतिक मंच-सभी को इस दिशा में सक्रिय भूमिका निभानी होगी। नई वैश्विक अर्थव्यवस्था में जहां कृत्रिम बुद्धिमत्ता, हरित ऊर्जा और डिजिटल नवाचार नए अवसर प्रदान कर रहे हैं, वहीं यह सुनिश्चित करना आवश्यक है कि इन अवसरों का लाभ समाज के प्रत्येक वर्ग तक पहुंचे। अन्यथा विकास की गाड़ी कुछ लोगों को आगे ले जाएगी और शेष को पीछे छोड़ देगी। समावेशन का सशक्तिकरण इसी असंतुलन को रोकने का प्रयास है। प्रतिदिन कोई न कोई कारण महंगाई को बढ़ाकर हम सबको और धक्का लगा जाता है और कोई न कोई टैक्स, अधिभार हमारी आय को और संकुचित कर जाता है। जानलेवा प्रदूषण ने लोगों की सांसों को बाधित कर दिया, लेकिन हम किसी सम्यक् समाधान की बजाय नये नियम एवं कानून थोप कर जीवन को अधिक जटिल बना रहे हैं। सामाजिक न्याय व्यवस्था तभी सार्थक है जब आम जनता निष्कंटक एवं समस्यामुक्त समानता का जीवन जी सके।

2026 का यह दिवस हमें यह संदेश देता है कि न्याय और विकास एक-दूसरे के पूरक हैं। शांति, स्थिरता और समृद्धि का मार्ग सामाजिक न्याय से होकर ही गुजरता है। यदि समाज का अंतिम व्यक्ति भी सम्मान, सुरक्षा और अवसर के साथ जीवन जी सके, तभी हम कह सकेंगे कि हमने सामाजिक न्याय के आदर्श को साकार किया है। इस तरह सामाजिक न्याय केवल नीति का प्रश्न नहीं, बल्कि चेतना का प्रश्न है। यह हमारे विचारों, व्यवहार और निर्णयों में परिलक्षित होना चाहिए। जब नागरिक और शासन दोनों मिलकर समानता, गरिमा और अवसर की संस्कृति का निर्माण करेंगे, तभी विश्व सामाजिक न्याय दिवस मनाने की वास्तविक सार्थकता सिद्ध होगी। समावेश को सशक्त बनाकर और असमानताओं की खाई को पाटकर ही हम एक ऐसे समाज की रचना कर सकते हैं जो अधिक न्यायपूर्ण, अधिक मानवीय और अधिक स्थायी हो।

प्रेषकः

(ललित गर्ग)
लेखक, पत्रकार, स्तंभकार
ई-253, सरस्वती कंुज अपार्टमेंट
25 आई॰ पी॰ एक्सटेंशन, पटपड़गंज, दिल्ली-110092
मो. 9811051133

आजादी के बाद अयोध्या की राजशाही

विमला देवी “बच्ची साहिबा”अयोध्या की राजमाता

राजा जगदम्बिका प्रताप नारायण सिंह को 12 फरवरी, 1909 को अयोध्या का राजा घोषित किया गया था, और उन्होंने 1955 में उन्मूलन अधिनियम लागू होने तक अयोध्या राज पर शासन किया था। उनका शासन काल 1909 से 1955 तक रहा। राजा जगदंबिका प्रताप की एक ही ही बेटी थीं विमला। उनके पुत्र नहीं था। विमला की शादी डॉ रमेंद्र मोहन मिश्र से हुई थी। बाद में जगदंबिका प्रताप सिंह ने विमला देवी बच्ची साहिबा को ही अपना उत्तराधिकारी बनाया।अपने दामाद डॉ रमेंद्र मोहन मिश्र बच्चा साहब को गोद लिया था। जिन्होंने स्वतंत्र भारत में अयोध्या राज की कमान संभाली और विधान परिषद के लिए चुने गए। दामाद जी का परिवार भी ब्राम्हण रहा। गोद लेने के बाद ही इस राजपरिवार के सदस्यों के नाम के आगे मिश्रा उपनाम जुड़ा।

 

विमलेंद्र मिश्र ‘पप्पू भइया’ राजसदन के मुखिया

महारानी विमला देवी बच्ची साहिबा के दो पुत्र विमलेंद्र मोहन प्रताप मिश्र राजा साहब और शैलेन्द्र मोहन प्रताप मिश्र हुए, जिसमें विमलेंद्र मोहन प्रताप मिश्र के बड़े होने के कारण उन्हें इस राजवंश का प्रतिनिधित्व करने का मौका मिला और उन्हें राजा अयोध्या के रूप में जाना जाने लगा। वे अयोध्या के राज परिवार के मुखिया के रूप में उभरे।

 

राजकुमारी विमला देवी एवं डॉ. रमेन्द्र मोहन मिश्र की तीसरी और चौथी संतान के बारे में जानकारी उपलब्ध नहीं है। पाँचवीं सन्तान के रूप में डॉ. अपर्णा मिश्र का 12 सितम्बर, 1970 को अयोध्या में जन्म हुआ। हिन्दी साहित्य में डॉ. राममनोहर लोहिया अवध विश्वविद्यालय से एम.ए. करने के उपरान्त उन्होंने इसी विश्वविद्यालय से ‘हिन्दी रीतिकाव्य का विकास और महाराजा मानसिंह ‘द्विजदेव’ की काव्य-साधना’ विषय पर शोध उपाधि प्राप्त की। आजकल कामता प्रसाद सुन्दरलाल साकेत स्नातकोत्तर महाविद्यालय, अयोध्या में असिस्टेंट प्रोफ़ेसर के पद पर कार्यरत हैं।

 

 

पूर्व उत्तराधिकारी राजा विमलेंद्र मोहन मिश्रा जी को श्री रामजन्म भूमि निर्माण ट्रस्ट का भारत सरकार द्वारा ट्रस्टी और रिसीवर नियुक्त किया गया है। इन्होने इसके लिए पूर्व में श्री रामजन्म भूमि निर्माण ट्रस्ट को दस एकड़ जमीन दान दी।

 

विमलेंद्र अयोध्या राजवंश में कई पीड़ियों के बाद जन्म लेने वाले पुरुष उत्तराधिकारी थे। उनसे पहले तक गोद लिए हुए बेटों को ही राजवंश की विरासत सौंपी जाती रही। यही कारण था कि विमलेंद्र का बचपन कड़ी सुरक्षा में गुजरा। महारानी विमला देवी ने उन्हें बाहर पढ़ाने नहीं भेजा, इसकी बजाए स्थानीय स्कूल में ही उनकी शिक्षा हुई। 14 वर्ष की उम्र तक उन्हें अपनी हम उम्र लड़के साथ खेलने तक की इजाजत नहीं थी।

 

शिक्षा के क्षेत्र में बड़ा योगदान

राजा विमलेंद्र मोहन प्रताप मिश्र ने अयोध्या में शिक्षा के क्षेत्र में उल्लेखनीय कार्य किए. उन्होंने कई डिग्री कॉलेज और इंटर कॉलेजों की अध्यक्षता की और शिक्षा कोबढ़ावा देने के लिए लगातार प्रयास किए. महाराजा इंटर कॉलेज, महाराजा पब्लिक स्कूल और साकेत महा विद्यालय जैसे प्रमुख शैक्षणिक संस्थानों में उनका विशेष योगदान रहा. उन्होंने अयोध्या में शिक्षा की अलख जगाई और विद्यार्थियों को बेहतर भविष्य देने के लिए महत्व पूर्ण पहल की।

 

चुनावी राजनीति में असफल रहे

वैसे राजा विमलेंद्र मोहन प्रताप मिश्र ने 2009 के लोकसभा चुनाव में फैजाबाद संसदीय सीट से बसपा के टिकट पर भाग्य आजमाया था। लेकिन वह यहां जीत हासिल नहीं कर सके। इसके बाद उन्होंने चुनावी राजनीति से दूरी बना ली। बताया जाता है कि महारानी विमला देवी विमलेंद्र के बसपा से चुनाव लड़ने के निर्णय के खिलाफ थीं।हालांकि उन्हें जीत नहीं मिली और कांग्रेस प्रत्याशी निर्मल खत्री ने हराया। इसके बाद उन्होंने धीरे-धीरे सक्रिय राजनीति से दूरी बना ली। प्राचीन दौर में अयोध्या का ये राजपरिवार कांग्रेस पार्टी का करीबी माना जाता था। विमलेंद्र प्रताप मिश्र डॉ. राम मनोहर लोहिया के विचारों से प्रभावित रहे हैं. वह उत्तर प्रदेश की हेरिटेज योजना की कार्यकारिणी के सदस्य चुने जा चुके थे।

 

राम मंदिर ट्रस्ट के अहम सदस्य

अयोध्या राजा विमल मोहन प्रताप मिश्रा आरंभ से ही राम मंदिर आंदोलन से जुड़े रहे। रामघाट स्थित न्यास कार्यशाला में राम मंदिर के लिए पत्थर की तराशी उन्हीं की जमीन पर हुई। जिसे बाद में उन्होंने राम मंदिर ट्रस्ट को दान में दे दिया है।

 

1992 में विवादित ढांचा टूटने के बाद उन्होंने रामलला के विराजमान होने के लिए चांदी का सिंहासन दिया। इसके बाद 5 फरवरी 2020 को सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर जब श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट का गठन हुआ तो राजा विमलेंद्र मोहन को इसका वरिष्ठ सदस्य बनाया गया। 5 फरवरी 2020 को भूमि पूजन के दौरान राम लला सहित चारों भाइयों के विराजमान होने के लिए उन्होंने पुनः भव्य चांदी का सिंहासन राम मंदिर ट्रस्ट को दान में दिया। इतना ही नहीं प्रधानमंत्री नरसिम्हा राव के समय उन्होंने अयोध्या के वरिष्ठ संतो के साथ अयोध्या की विवाद के समाधान का प्रयास किया।

 

राममंदिर आंदोलन में महत्वपूर्ण भूमिका

जब राम मंदिर को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने ऐतिहासिक फैसला सुनाया, उसके बाद ट्रस्ट के गठन की प्रक्रिया शुरू हुई। इस दौरान प्रधानमंत्री मोदी की ओर से सबसे पहले जिस वरिष्ठ सदस्य को चुना गया, वे थे राजा विमलेंद्र मोहन प्रताप मिश्र। तब तक श्रीराम जन्मभूमि परिसर के रिसीवर की जिम्मेदारी अयोध्या के कमिश्नर के पास थी, लेकिन जैसे ही ट्रस्ट अस्तित्व में आया, पहला चार्ज औपचारिक रूप से मिश्र को सौंपा गया। इससे पहले यह प्रभार अयोध्या केआयुक्त के पास था।

 

धार्मिक और सामाजिक कार्यों के लिए समर्पित जीवन

उनका जीवन धार्मिक और सामाजिक कार्यों को समर्पित रहा। राजा विमलेन्द्र प्रताप मोहन मिश्र को लोग प्यारसे ‘पप्पू भैया जी’ भी कहते थे। लोग उन्हें अयोध्या का राजा कहकर पुकारने लगे। वहअयोध्या रामायण मेला संरक्षक समिति के सदस्य भी थे। वैसे विमलेंद्र मोहन प्रताप मिश्र राम मंदिर ट्रस्ट के सदस्य अकेले ऐसे सदस्य रहे, जिन्हें पक्ष और विपक्ष सभी नेताओं से सम्मान मिलता था। परिवार भले ही राम जन्मभूमि के करीब था लेकिन वह तटस्थ ही रहते थे। यही कारण था कि राम जन्म भूमि और बाबरी मस्जिद विवाद में दोनों ही पक्षों से उन्हें सम्मान मिलता था। राम मंदिर आंदोलन के दौरान जब विवादित ढांचा गिरा तब विमलेंद्र प्रताप मिश्र के घर से ही रामलला की प्रतिमा स्थल पर पहुंचाई गई। ये प्रतिमा उनके घर में बने अस्थायी मंदिर में विराजमान थी।

 

जनता के बीच लोकप्रिय व्यक्तित्व

राजा विमलेंद्र मोहन प्रताप मिश्र हमेशा अयोध्या की जनता के सुख-दुख में शामिल रहते थे. राज परिवार के दरवाजे आम जनता के लिए हमेशा खुले रहते थे. जो भी व्यक्ति राजसदन आता, उसे सम्मानपूर्वक मुलाकात का अवसर दिया जाता है।

 

विमलेंद्र मोहन प्रताप मिश्र का निधन

अयोध्या के राजा 75 वर्षीय स्मृति शेष श्री विमलेंद्र मोहन प्रताप मिश्र ने अयोध्या में स्थित राज सदन में अपनी अंतिम सांस ली। हाल ही में उनके रेट की हड्डी का ऑपरेशन हुआ था और लखनऊ में इसे चेकअप भी कराया गया था जो सामान्य रहा फिर भी रात के 11:00 बजे उनका बीपी को हुआ और उन्हें श्री राम हॉस्पिटल अयोध्या दिखाया गया जहां उन्हें मृतक घोषित कर दिया गया। उनका निधन 23 अगस्त 2025 की देर रात हुआ था। उनका अंतिम संस्कार 24 अगस्त 2025 को सरयू तट पर स्थित बैकुंठ धाम में किया गया। उनके ज्येष्ठ पुत्र यतींद्र मिश्र ने उन्हें मुखाग्नि दी थी।

 

अयोध्या के राजा विमलेंद्र प्रताप की अंतिम यात्रा स्थानीय राज सदन से निकली थी। अयोध्या वासियों ने उन्हें गमगीन माहौल में अंतिम विदाई दी थी। अंतिम यात्रा में जिले के प्रभारी मंत्री सूर्य प्रताप शाही, पूर्व प्रदेश सचिव अवनीश अवस्थी, अयोध्या सांसद अवधेश प्रसाद , राम जन्मभूमि ट्रस्ट के महासचिव चंपत राय, जिलाधिकारी निखिल टीकाराम फुंडे समेत कई भाजपा नेता, संत-महंत व अयोध्यावासी सम्मिलित हुए। उनके निधन पर मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने दुख जताया था।

लेखक परिचय:-


(लेखक भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण, में सहायक पुस्तकालय एवं सूचनाधिकारी पद से सेवामुक्त हुए हैं। वर्तमान समय में उत्तर प्रदेश के बस्ती नगर में निवास करते हुए सम सामयिक विषयों,साहित्य, इतिहास, पुरातत्व, संस्कृति और अध्यात्म पर अपना विचार व्यक्त करते रहते हैं। वॉट्सप नं.+919412300183)

अमरीकी सामग्री से देसी भोजन का तड़का

खानपान के विकल्प केवल थाली में परोसे जाने वाले भोजन को ही नहीं गढ़ते। भारत में, वे तेजी से यह भी दर्शाते हैं कि शेफ और उपभोक्ता रसोई में विश्वसनीयता, स्रोत और प्रदर्शन के बारे में कैसे सोचते हैं। सामग्री कहाँ से आती है, पकने पर उनका व्यवहार कैसा होता है, और क्या वे भरोसेमंद परिणाम देती हैं—ये प्रश्न रोज़मर्रा के निर्णयों को आकार दे रहे हैं।

 

यह बदलाव भारतीय रसोईघरों में दिखाई देता है, जहाँ परिचित तकनीकों के साथ अब नए स्वाद जुड़ रहे हैं। लंबे समय से भारतीय बाज़ारों में मौजूद अमेरिकी सामग्री को अब नए नज़रिये से देखा जा रहा है। क्रैनबेरी संतरे के रस में पकती हैं। पेकान आसानी से पनीर में मिल जाते हैं। बतख अपनी ही चर्बी में धीरे-धीरे कुरकुरी होती है। मिलकर, ये संयोजन एक व्यापक कहानी की ओर इशारा करते हैं—ऐसी कहानी जिसमें खानपान विकल्प बाज़ारों और व्यापारिक संबंधों को भी आकार देते हैं।

 

दो खानपान पहलियों के माध्यम से—अमेरिकन कम्युनिटी सपोर्ट एसोसिएशन (अक्सा) में ‘टेस्ट ऑफ़ अमेरिका’ सामग्री प्रशिक्षण और नई दिल्ली के एक रिटेल आउटलेट ‘फ़ूड स्टोरीज़’ में आयोजित अमेरिकी खाद्य कुक-ऑफ़—अमेरिकी दूतावास ने दिखाया कि अमेरिकी कृषि उत्पाद भारतीय रसोईघरों में स्वाभाविक रूप से कैसे फिट होते हैं। अमेरिकी कृषि विभाग (यूएसडीए) के नेतृत्व में, इन पहलों का उद्देश्य केवल रेसिपी से प्रेरित करना नहीं था। उनका ध्यान बाज़ारों के विस्तार, पेशेवर आत्मविश्वास के निर्माण और अमेरिकी किसानों व निर्यातकों के लिए दीर्घकालिक आर्थिक विकास के समर्थन पर था।

 

उत्पादों का प्रशिक्षण
‘टेस्ट ऑफ़ अमेरिका’ सामग्री प्रशिक्षण ने अक्सा के सदस्यों, हॉस्पिटैलिटी विद्यार्थियों, और खाद्य एवं पेय पेशेवरों को एक साथ लाया, जहाँ सोर्सिंग, भंडारण और तैयारी पर मार्गदर्शन के साथ व्यावहारिक कुकिंग कराई गई। प्रशिक्षण का नेतृत्व करने वाली शेफ नेहा दीपक शाह कहती हैं कि सत्र को रेसिपी से आगे ले जाने के लिए डिज़ाइन किया गया था, जिसमें दिल्ली-एनसीआर में पहले से उपलब्ध अमेरिकी कृषि उत्पादों का उपयोग किया गया।

 

वह कहती हैं, “सत्र का ध्यान इन सामग्रियों, उनकी विशिष्ट विशेषताओं, और उन्हें रोज़मर्रा तथा पेशेवर रसोई अनुप्रयोगों में सोच-समझकर शामिल करने की गहरी समझ विकसित करने पर था।”

 

मेन्यू में परिचित भारतीय प्रारूपों को अमेरिकी उत्पादों के साथ जोड़ा गया। उदाहरण के लिए, पनीर टिक्का को अमेरिकी क्रैनबेरी और पेकान के साथ नए रूप में प्रस्तुत किया गया। समोसों में ओरेगन हेज़लनट शामिल थे। बतख और टर्की को भारतीय रसोईघरों में प्रचलित तकनीकों के साथ प्रस्तुत किया गया।

 

शाह जोड़ती हैं, “जो बात वास्तव में उभरकर सामने आई, वह हर सामग्री में गुणवत्ता की उल्लेखनीय स्थिरता और विश्वसनीयता थी। ये शेफ और घरेलू रसोइयों को प्रयोग और नवाचार का आत्मविश्वास देते हैं, साथ ही निरंतर उच्च-गुणवत्ता के परिणाम सुनिश्चित करते हैं।”

हॉस्पिटैलिटी के सायन डोवारी ने इस सत्र को “आँखें खोलने वाला” बताया। वह कहते हैं, “मुझे विभिन्न अमेरिकी स्वादों, मेवों और बेरीज़ के बारे में जानने को मिला। मैं उन बेरीज़ को इन्फ़्यूज़न के रूप में भी इस्तेमाल कर सकता हूँ।”

 

एक अन्य प्रतिभागी, मंसंजम सिंह भाटिया—जो बारटेंडर हैं और सीआईआई इंस्टीट्यूट ऑफ़ हॉस्पिटैलिटी में विद्यार्थी हैं—ने विश्वसनीयता पर ज़ोर दिया। वह बताते हैं, “मेरे लिए जो मायने रखता है वह है निरंतरता। अमेरिकी सामग्री का मतलब है कि हमें पूरे साल एक ही आकार, एक ही आकृति और एक ही स्वाद मिलता है। गुणवत्ता और निरंतरता हमारे काम को बहुत आसान बना देती है।”

 

उपभोक्ताओं के लिए पकाना
फ़ूड स्टोरीज़ में आयोजित रिटेल कुक-ऑफ़ में, चार प्रतिभागियों ने शेफ, ख़रीदारों और उपभोक्ताओं की मौजूदगी में अमेरिकी सामग्रियों का उपयोग करते हुए मौलिक व्यंजन तैयार किए। इस प्रारूप ने उन्हें यह परखने का अवसर दिया कि ये सामग्री भारतीय-प्रेरित पकवानों में कैसे प्रदर्शन करती हैं।

 

ओशीन बंसल ने अपने ‘नूर-ए-कश्मीर ज़ाफ़रानी पुलाव’ के लिए कश्मीरी स्वादों से प्रेरणा ली, जिसमें अमेरिकी क्रैनबेरी को केंद्रीय तत्व के रूप में इस्तेमाल किया गया। वह कहती हैं, “आज से पहले, मैं क्रैनबेरी से कुछ हद तक परिचित थी, लेकिन उन्हें ज़्यादातर मिठाइयों और पेयों में ही इस्तेमाल होते देखा था।”

 

मल्लिका बनाती की विजेता रचना—क्रैनबेरी-ग्लेज़्ड टर्की विद पेकान पुलाव एंड पिस्ता बटर—में अमेरिकी पेकान को पकवान के केंद्र में रखा गया। उनके लिए अमेरिकी पेकान की लचीलेपन की विशेषता सबसे अलग थी। वह कहती हैं, “वे कितने बहुपयोगी हैं—करी से लेकर पाई तक, मीठे और नमकीन दोनों प्रकार की तैयारियों में आसानी से ढल जाते हैं,” और जोड़ती हैं कि अमेरिकी क्रैनबेरी “वह प्रमुख सामग्री थीं जो उस अतिरिक्त जान को जोड़ती हैं।”

 

मेहक आसिफ़ के लिए, कुक-ऑफ़ में टर्की पकाने का यह उनका पहला अनुभव था। उनका व्यंजन—पेकान-वॉलनट सॉस और क्रैनबेरी के साथ भरी हुई टर्की रूलाड—अमेरिकी पोल्ट्री को मेवों और फलों के साथ जोड़ता है।

 

दीपशी सलूजा ने चना कबाब के साथ प्लांट फ़ारवर्ड दृष्टिकोण अपनाया, जिसमें अमेरिकी चनों के साथ पिस्ता, अखरोट, ब्लूबेरी और क्रैनबेरी का उपयोग किया गया। वह कहती हैं, “मुझे सबसे ज़्यादा हैरानी इस बात की हुई कि बेरीज़ कितनी बहुपयोगी हैं।” भारतीय मसालों के साथ जोड़े जाने पर, वह बताती हैं, वे “आम तौर पर मीठी मानी जाने वाली सामग्री से बदलकर तीखी, नमकीन और गहराई से स्वादिष्ट बन गईं।” सलूजा जोड़ती हैं कि बेरी जेल “इमली की चटनी के आधुनिक विकल्प के रूप में बेहद खूबसूरती से काम करता है।”

 

कुक-ऑफ़ का संचालन करने वाले शेफ अजय चोपड़ा बताते हैं कि अमेरिकी उत्पाद भारत में क्यों अच्छी तरह काम करते हैं। वह कहते हैं, “अमेरिकी सामग्रियों के साथ काम करने का रोमांचक पहलू उनकी बहुपयोगिता, काउंटर-सीज़नैलिटी और उच्च गुणवत्ता है।”

 

“अगर मैं एक क्लासिक लाल स्वादिष्ट सेब काटता हूँ, तो वह रसदार होता है, कुरकुरा होता है, और अपने वादे पर खरा उतरता है। अगर वह अमेरिकी पिस्ता है, तो उसकी ग्रेडिंग इतनी परफ़ेक्ट होती है कि हर पिस्ता लगभग एक ही आकार का होता है।”

 

मात्रा क्यों मायने रखती है
पर्दे के पीछे, मात्रा और सुरक्षा सोर्सिंग के निर्णयों को संचालित करते हैं। भारत में अमेरिकी खाद्य उत्पादों के लंबे समय से प्रचारक सुमित सरन बताते हैं कि शेफ अमेरिकी उत्पादों पर भरोसा क्यों करते हैं।

 

वह कहते हैं, “तीन बड़े स्तंभ हैं: गुणवत्ता, खाद्य सुरक्षा और आपूर्ति की निरंतरता। अमेरिकी उत्पाद यूएसडीए प्रमाणित होते हैं। अमेरिका में जो किसी ग्राहक के लिए उपलब्ध है, वही बिल्कुल भारत में ग्राहक तक पहुँचता है।”

 

यह एक बड़े बाज़ार में मायने रखता है। वह जोड़ते हैं, “हम छोटे स्तर से शुरुआत कर सकते हैं। लेकिन जैसे ही मांग बढ़ती है, अमेरिका के पास उस मांग को पूरा करने की क्षमता और निरंतरता होती है।”

ये आँकड़े पहले से ही दिखाई दे रहे हैं। सरन कहते हैं, “पाँच साल पहले क्रैनबेरी आयात लगभग 60 से 70 टन था। 2025 में, हम 5,000 टन तक पहुँच गए।” वह जोड़ते हैं, “वॉशिंगटन सेब स्वर्ण मानक हैं। आज आयात लगभग 5,00,000 टन के क़रीब है।”

रिटेल प्रमाण
उच्च-गुणवत्ता वाली उपज की इस मांग पर भारतीय ब्रांड भी प्रतिक्रिया दे रहे हैं। स्नैकिंग ब्रांड नटी ग्रिटीज़ की संस्थापक दिनिका भाटिया बताती हैं कि अमेरिकी सामग्री कैसे विकास को गति देती हैं। वह कहती हैं, “हम जो उपभोग करते हैं, उसमें से लगभग 35 से 40 टन प्रति माह अमेरिकी सामग्री होती है। अमेरिकी सामग्री की वृद्धि 40 प्रतिशत है।”

 

वह इसे सीधे मानकों से जोड़ती हैं, और “गुणवत्ता, निरंतरता, कुरकुरापन और स्वाद” की ओर इशारा करती हैं। अमेरिका में प्रोसेसिंग प्लांट का अध्ययन और दौरा करने का उनका अनुभव उस भरोसे को और मज़बूत करता है। भाटिया बताती हैं, “मानकीकरण, मशीनीकरण, गुणवत्ता नियंत्रण और स्वच्छता—ये सब मैंने सबसे बेहतरीन देखे हैं।”

 

यह भरोसा मांग में तब्दील हो रहा है। पेकान, जो कभी अपरिचित थे, अब उनके सबसे तेज़ी से बढ़ने वाले उत्पादों में शामिल हैं। वह कहती हैं, “पिछले महीने हमने पेकान में 100 प्रतिशत की वृद्धि देखी।”

 

जैसे-जैसे अधिक शेफ, रिटेलर और उपभोक्ता इन सामग्रियों के साथ काम कर रहे हैं, परिचय आत्मविश्वास में बदल रहा है। जो रसोईघरों में प्रयोग के रूप में शुरू होता है, वह स्थिर मांग, भरोसेमंद आपूर्ति शृंखलाओं और दीर्घकालिक व्यावसायिक संबंधों में तब्दील हो रहा है। इस अर्थ में, भारत में अमेरिकी सामग्रियों की कहानी केवल स्वाद या तकनीक की नहीं है, बल्कि इस बात की है कि रोज़मर्रा के खाद्य विकल्प कैसे चुपचाप व्यापार, विकास और साझा आर्थिक हितों का समर्थन करते हैं।

 

 

सामग्री के बारे में प्रशिक्षण से लेकर रिटेल शेल्फ़ तक, अमेरिकी कृषि उत्पाद भारतीय रसोईघरों और बाज़ारों में नई भूमिकाएँ निभा रहे हैं।

Photo: (फूड स्टोरीज के रिटेल कुक ऑफ़ में चार प्रतिभागियों ने अमेरिकी उत्पादों का इस्तेमाल करते हुए मौलिक डिश तैयार कीं और यह दिखाया कि किस तरह से अमेरिकी कृषि उत्पाद स्वाभाविक तौर पर भारतीय रसोईघरों का हिस्सा बन जाते हैं। (फोटोग्राफ: इम्तियाज़ इमाम))

 

साभार: https://spanmag.state.gov/hi/ से

भू-विज्ञान मंत्रालय ने इंडिया एआई इम्पैक्ट समिट 2026 में ‘एआई फॉर ओशन्स ऑफ टुमॉरो: डेटा, मॉडल्स एंड गवर्नेंस’ पर चर्चा की

भू-विज्ञान मंत्रालय ने 16 से 20 फरवरी 2026 तक नई दिल्ली में चल रहे इंडिया एआई इम्पैक्ट समिट 2026 के हिस्से के तौर पर “एआई फॉर अवर ओशन्स ऑफ टुमॉरो: डेटा, मॉडल्स एंड गवर्नेंस” विषय पर उच्च-स्तरीय पैनल चर्चा का आयोजन किया।

पैनल में शामिल विशेषज्ञों ने इस बात पर ज़ोर दिया कि आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) भारत के समुद्री प्रबंधन, आपदा प्रबंधन, समुद्री आजीविका और नीली अर्थव्यवस्था के विकास को मजबूत करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है। इस सत्र में वरिष्ठ सरकारी अधिकारी, अंतरराष्ट्रीय हस्तियां, वैज्ञानिक, उद्योगपति, स्टार्टअप और वित्तीय विशेषज्ञ समुद्री विज्ञान और नीति के साथ एआई के एकीकरण पर विचार-विमर्श करने के लिए एकत्रित हुए।

मौसम विभाग के महानिदेशक डॉ. एम. महपात्रा ने मुख्य भाषण देते हुए जलवायु नियंत्रण, आपदा जोखिम न्यूनीकरण, खाद्य सुरक्षा और आजीविका में महासागरों की महत्वपूर्ण भूमिका पर प्रकाश डाला। उन्होंने महासागर अवलोकन, चक्रवात पूर्वानुमान, समुद्री डेटा प्रणालियों और प्रारंभिक चेतावनी सेवाओं में भारत की मजबूत राष्ट्रीय क्षमताओं को रेखांकित करते हुए कहा कि तकनीकी प्रगति ने विपरीत मौसम के दौरान होने वाली जानमाल की हानि को काफी हद तक कम कर दिया है। उन्होंने अपने भाषण में विशेष रूप से महासागरों का गर्म होना, अम्लीकरण और समुद्र स्तर में वृद्धि जैसे जलवायु परिवर्तन के प्रभावों के संदर्भ में पारंपरिक भौतिक मॉडलों के पूरक के रूप में डेटा-आधारित और एआई-सक्षम मॉडलों के महत्व पर बल दिया। इसमें डीप ओशन मिशन को गहरे समुद्र की खोज, अपतटीय ऊर्जा, जैव विविधता संरक्षण और समुद्री संसाधनों के सतत उपयोग पर केंद्रित एक प्रमुख राष्ट्रीय पहल के रूप में प्रस्तुत किया गया।

इस सत्र को संबोधित करते हुए भारत में नॉर्वे की राजदूत सुश्री मे-एलिन स्टेनर ने महासागरों और नीली अर्थव्यवस्था में भारत-नॉर्वे के बढ़ते सहयोग पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि जब एआई को खुले, अंतरसंचालनीय और विश्वसनीय डिजिटल आधारों पर विकसित किया जाता है, तो यह मत्स्य प्रबंधन, जहाजरानी दक्षता, बंदरगाह संचालन और तटीय मजबूती को महत्वपूर्ण रूप से बढ़ा सकता है। सुश्री स्टेनर ने कहा कि डिजिटल सार्वजनिक अवसंरचना में भारत का अग्रणी होना इसे खुले डेटा, साझा मानकों और जिम्मेदार डिजिटल प्रबंधन पर आधारित एक वैश्विक डिजिटल महासागर ढांचा विकसित करने में सक्षम बनाएगा, जिससे न केवल भारत बल्कि वैश्विक समुदाय को भी लाभ होगा।

सत्र के उत्तरार्ध में सरकार, शिक्षा जगत, उद्योग और अंतर्राष्ट्रीय संस्थानों के प्रतिष्ठित विशेषज्ञों की एक पैनल चर्चा हुई। पैनल ने विचार-विमर्श किया कि भारत खुले डेटा, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) संचालित बुद्धिमत्ता और सुदृढ़ शासन ढांचे को एकीकृत करने वाले डिजिटल महासागर अवसंरचना विकसित करके वैश्विक दक्षिण का नेतृत्व करने के लिए विशिष्ट रूप से सक्षम है। समुद्री आजीविका को बढ़ावा देने, परिचालन लागत को कम करने और नीली अर्थव्यवस्था के सभी क्षेत्रों में समय पर डेटा-आधारित निर्णय लेने में सक्षम बनाने के लिए आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस आवश्यक होगी। बढ़ते डेटासेट के बावजूद, महासागर एक अत्यंत जटिल और डेटा-दुर्लभ क्षेत्र बना हुआ है, जिसके लिए भौतिकी-आधारित एआई और भौतिक इंटेलिजेंस के विकास की आवश्यकता है। महासागर एआई में प्रगति के लिए उन्नत अंतर्राष्ट्रीय सहयोग, खुले और अंतरसंचालनीय प्रणालियों और साझा डिजिटल सार्वजनिक वस्तुओं की आवश्यकता होगी जो महासागरों की सीमा-पार प्रकृति को दर्शाती हैं। सहायक नीतियों, डेटा तरलता, मिश्रित वित्त और जोखिम-साझाकरण तंत्रों के साथ, नीली अर्थव्यवस्था एक स्थायी दीर्घकालिक विकास इंजन के रूप में उभर सकती है, जो भारत और विकासशील देशों (वैश्विक दक्षिण) के लिए बड़े पैमाने पर रोजगार और निवेश के अवसर पैदा करेगी।

सत्र का समापन पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय के वैज्ञानिक जी और सलाहकार डॉ. (कमांडर) पी.के. श्रीवास्तव के संबोधन के साथ हुआ। उन्होंने महासागर से संबंधित कार्यक्रमों में एआई के एकीकरण के लिए एक संरचित मार्ग बनाने के प्रति मंत्रालय की प्रतिबद्धता को दोहराया।

सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद पीड़िता की मां ने कहा, न्याय में भरोसा बहाल हुआ

सुप्रीम कोर्ट के इलाहाबाद हाई कोर्ट के फैसले को खारिज करने के बाद खुशी व राहत की सांस लेते हुए नाबालिग पीड़िता की मां ने कहा कि इस आदेश से न्याय में उनका भरोसा बहाल हुआ है। इलाहाबाद हाई कोर्ट ने पिछले साल मार्च में दिए गए फैसले में कहा था कि नाबालिग पीड़िता के वक्ष पकड़ने व सलवार का नाड़ा खोलने को बलात्कार का “प्रयास” नहीं माना जा सकता और यह सिर्फ बलात्कार की “तैयारी” थी। बाल अधिकारों के संरक्षण के लिए नागरिक समाज संगठनों के नेटवर्क जस्ट राइट्स फॉर चिल्ड्रेन (जेआरसी) ने हाई कोर्ट के इस फैसले के खिलाफ तत्काल पीड़िता की तरफ से सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की थी।

याचिका पर सुनवाई करते हुए प्रधान न्यायाधीश न्यायमूर्ति सूर्य कांत, न्यायमूर्ति जोयमाल्या बागची और एन. वी. अंजारिया की खंडपीठ ने हाई कोर्ट के फैसले को स्पष्ट रूप से त्रुटिपूर्ण और आपराधिक दंड विधान के स्थापित सिद्धांतों के पूरी तरह खिलाफ करार देते हुए खारिज कर दिया। साथ ही, शीर्ष अदालत ने यौन अपराधों से बच्चों का संरक्षण (पॉक्सो) अधिनियम के तहत दोनों आरोपियों के खिलाफ पहले से लगे बलात्कार के प्रयास के आरोप को भी बहाल कर दिया।

पीड़िता, जो घटना के समय सिर्फ 11 वर्ष की थी, की मां ने कहा, “इस फैसले से मेरा यह विश्वास बहाल हुआ है कि कानून बच्चों व पीड़ितों की सुरक्षा कर सकता है। मुझे उम्मीद है कि अब किसी बच्चे को अपने साथ हुए अत्याचार का विश्वास दिलाने के लिए ठोकर नहीं खानी पड़ेगी और इस फैसले से उन बहुत सारे बच्चों को मदद मिलेगी जो आवाज नहीं उठा पा रहे हैं।” उन्होंने कहा कि जेआरसी तब उनके साथ खड़ा हुआ जब उन्हें लग रहा था कि वे असहाय हैं और कोई उनकी आवाज नहीं सुनेगा। उनके समर्थन से हम न्याय के लिए संघर्ष जारी रखने की हिम्मत जुटा पाए।

नवंबर 2021 में उत्तर प्रदेश के कासंगज में दो युवक 11 साल की नाबालिग बच्ची को जबरन घसीट कर एक पुलिया के नीचे ले गए और उसके कपड़े उतारने की कोशिश की। बच्ची की चीख पुकार सुन उधर से गुजर रहे दो राहगीर वहां पहुंचे जिसके बाद दोनों आरोपी मौके से भाग निकले। इस मामले में मार्च 2025 में इलाहाबाद हाई कोर्ट ने अपने फैसले में कहा, “यह कृत्य सिर्फ बलात्कार की ‘तैयारी’ है और यह स्थापित करने के लिए पर्याप्त नहीं है कि यह ‘बलात्कार का प्रयास’ या ‘बलात्कार’ है।” इस फैसले के नतीजे में आरोपों की गंभीरता काफी कम हो गई।

बाल अधिकारों की सुरक्षा व संरक्षण के लिए 250 से भी ज्यादा नागरिक समाज संगठनों के देश के सबसे नेटवर्क जस्ट राइट्स फॉर चिल्ड्रेन ने हाई कोर्ट के फैसले को चुनौती देते हुए पीड़िता की ओर से शीर्ष अदालत में विशेष अनुमति याचिका दायर की। याचिका में सुप्रीम कोर्ट से इस तरह के मामलों में और अधिक संवेदनशीलता सुनिश्चित करने के लिए दिशानिर्देश तय करने का अनुरोध भी किया गया।

हाई कोर्ट के आदेशों को रद्द करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने राष्ट्रीय न्यायिक अकादमी, भोपाल को निर्देश दिया कि वह यौन शोषण के संवेदनशील पीड़ितों से संबंधित मामलों की सुनवाई के दौरान न्यायाधीशों व न्यायिक प्रक्रियाओं में संवेदनशीलता विकसित करने के उद्देश्य से एक समग्र व व्यापक दिशानिर्देश तय करने के लिए एक समिति गठित करे। कमेटी से तीन महीने में यह रिपोर्ट तैयार करने व सुप्रीम कोर्ट को सौंपने का अनुरोध किया गया है।

जस्ट राइट्स फॉर चिल्ड्रेन की ओर से पीड़िता की पैरवी कर रहे वरिष्ठ अधिवक्ता एच. एस. फूलका ने इसे ऐतिहासिक करार देते हुए कहा, “यह बच्चों की सुरक्षा को सुदृढ़ करने की दिशा में एक दूरगामी फैसला है। यह एक स्पष्ट संदेश देता है कि न्यायिक विवेचना में पीड़ितों के खिलाफ किसी भी तरह के भेदभाव या पूर्वाग्रह की कोई जगह नहीं है। इस फैसले के लिए हम खंडपीठ के आभारी हैं।” शीर्ष अदालत ने दिशानिर्देश तय करने में नेटवर्क से सुझाव भी मांगे हैं।

इसी बीच, जस्ट राइट्स फॉर चिल्ड्रेन के राष्ट्रीय संयोजक रवि कांत ने कहा, “यह फैसला यौन हिंसा के पीड़ितों के लिए न्याय, गरिमा और संवेदनशीलता सुनिश्चित करने के हमारे लंबे और दृढ़ संघर्ष का नतीजा है। हम सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले का स्वागत करते हैं जिसने न्यायिक तंत्र में भरोसा बहाल किया है और इस विश्वास को मजबूत किया है कि बच्चों एवं कमजोर व संवेदनशील पृष्ठभूमि के लोगों के खिलाफ अपराधों को गंभीरता और अपेक्षित संवेदनशीलता के साथ देखा जाएगा।”

और जानकारी के लिए संपर्क करें
जितेंद्र परमार
8595950825

चाहे तो शॉर्टकट ले लो या लाँगकट

मराठी के शौकिया रंगमंच पर एकदम नया-नया नाटक आया है- ‘शॉर्टकट लाँंगकट’। नया इन अर्थों में कि उसका पुणे के ‘श्रीराम लागू रंग-अवकाश केंद्र’ पर हालिया प्रयोग पाँचवाँ ही था। पुणे की ‘व्यक्ति’ संस्था ने इसे प्रस्तुत किया, उसे बने भी एक दशक ही हुआ है और जहाँ हुआ वह केंद्र भी लगभग इतना ही पुराना है। सभागार में 150 लोग बैठ सकते हैं और लगभग सभागार पूरी तरह भरा था तो इसे युवा टीम के उत्साह का प्रतिफल कह सकते हैं कि उनकी सराहना करने इतने लोग टिकट खरीदकर आए थे। लेखक-निर्देशक भी अभी चार-पाँच साल पहले ही स्नातक हुए युवा हैं और काम करने वालों की टीम भी एकदम युवा। नए प्रयोग करते हुए नाटक की भाषा त्रिवेणी है मतलब हिंदी के कुछ मौलिक गीत, कुछ मराठी गीत, कुछ अंग्रेज़ी संवाद लेकिन मूलतः इसे मराठी नाटक ही कह सकते हैं क्योंकि बहुतायत में मराठी भाषा में नाटक चल रहा था। एक पंक्ति में इस नाटक को देखें तो कह सकते हैं कि इसका थीम था- कोई शॉर्टकट ले या लॉन्गकट सच्चा प्रेम ईश्वर तक ही पहुँचाता है।

 

मंच पर केवल दो कलाकार थे। मंच से परे पूरी टीम थी। संगीत भी लाइव था, जिसमें पखावज से लेकर कीबोर्ड तक सब था। इस नाटक की जान कह सकते हैं तो वह था इसकी प्रकाश योजना। निखिल मारणे और प्रथमेश जाधव की प्रकाश व्यवस्था उनके भावी कार्यक्षेत्र के उजास को दर्शाती है। पूरा खेल रोशनी का ही था। उस रोशनी के सहारे दो युवा सिंहगढ़ पहाड़ी चढ़ने निकलते हैं। लड़की को अपने प्रेमी के साथ उस पहाड़ी से सूर्योदय देखना है। प्रेमी उसे पहले गर्ल फ्रैंड कहता था लेकिन अब केवल फ्रैंड मतलब सहेली मानता है। पहाड़ी की लंबी चढ़ाई कई पथरीले रास्तों, ऊँचे-नीचे धरातल से गुज़रती है, जैसे उन दोनों का अब तक का जीवन रहा है। चढ़ाई के दौरान दोनों संवाद-विसंवाद, प्रेम-झगड़ा, मस्ती-मजाक करते हैं और अपने दुःखों-परेशानियों, अपनी हौसलों-लक्ष्यों को भी दर्शकों से साझा करते हैं। प्रकृति के चित्र बनाने वाले ख़्यात यूरोपियन लैंडस्केप चित्रकार कैस्पर फ्रेडरिक से लेकर महाराष्ट्र के आराध्य विठोबा (पांडुरंग) और रखुमाई (रुक्मिणी) तक के दर्शन इस यात्रा के दौरान होते हैं।

 

शार्दुल निंबालकर के लेखन और सुयश झुंजरके के नेपथ्य व निर्देशन में यह नाटक खड़ा था। लगभग दो घंटे के नाटक को थोड़ा संपादित किया जा सकता था तो और कसा हुआ प्रयोग होता। नेपथ्य में कुछ लकड़ी के बक्से, कुछ प्लास्टिक शीट्स, साइड विंग ड्रॉप, विंडचाइम का प्रयोग बड़ा अच्छा किया गया था। पूरी कहानी इन चीज़ों में समाहित हो रही थी। शार्दुल के साथ अस्मि देवकुले, हर्ष भोसले, अथर्व बर्दाडे, आदित्य अलोने, अक्षय कुलकर्णी और साईराज पतंगराय ने नेपथ्य को संभाला है, इन्हें वास्तव में परदे के पीछे के कलाकार कह सकते हैं।

 

इस नाटक को चित्रकला, कथा-कविता, संगीत और नाट्य का मेल कहा जा सकता है। साइड विंग ड्रॉप और लकड़ी के बक्से के साथ जिस तरह चित्रों को दिखाया गया वह निर्देशक की कल्पना की उड़ान को दर्शाता है। लक्ष्मण ठाकुर के रंगचित्र कथ्य के साथ एकदम सटीक बैठ रहे थे। इसका दूसरा दमदार पक्ष था यशराज आवेकर का संगीत निर्देशन। वाद्य वृंद में यशराज के साथ हृषिकेश आवेकर व रुतुजा थिटे थीं। गायन समूह में भी यशराज थे और साथ थे रेवा घुले, लक्ष्मण, संस्कृति काडादी।

 

बात करते हैं अभिनय की। साक्षी दिघे के लंबे संवाद, उसकी भूमिका के विभिन्न पहलू और उसे पूरी ताकत से पेश करने का उसका हुनर रेखांकित करने योग्य है। हृषिकेश म्हेत्रे ने भी अपने चरित्र की कशमकश और हताशा को उकेरा है। रेवा घुले और लक्ष्मण अंतिम कुछ दृश्यों में मंच पर आते और अपनी छाप छोड़ जाते हैं। निर्माता किरण ढमाले और महेंद्र मारणे हैं।

लेखिका परिचयः

(स्वरांगी साने एक स्वतंत्र हिंदी अनुवादक, लेखिका और पत्रकार हैं, , उन्होंने विभिन्न भारतीय भाषाओं की फिल्मों, वैज्ञानिक दस्तावेजों और पुस्तकों का अंग्रेजी से हिंदी में अनुवाद किया है। वह समाचार पत्रों में संपादकीय जिम्मेदारी भी वहन कर चुकी है और वर्तमान में कला, साहित्य व संस्कृति पर स्वतंत्र लेखन कर रही हैं)