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देबाशीष की हत्या के बाद क्या अभिषेक के कलेजे को पहुंची ठंडक?

इक्कीसवी सदी में पश्चिम बंगाल एक ऐसा राज्य बनता जा रहा है, जहां 2021 में भी कानून का राज नहीं चल रहा। वहां तृणमूल का राज चल रहा है। जो भी तृणमूल कांग्रेस की राजनीति से सहमत नहीं है, उसे मरना होगा। वह महिला है तो उसके साथ बलात्कार हो सकता है। उसे विपक्षी पार्टी को वोट करने के लिए नौकरी से निकाला जा सकता है। ऐसे किसी राज्य में इन घटनाओं की क्या कोई कल्पना भी कर सकता है, जहां कानून का राज चलत हो।

जो भी ममता के शासन की आलोचना करता है, किसी तानाशाह की तरह वह आलोचक को कुचलने की कोशिश करती हैं। या फिर वह उसकी आलोचना में लग जाती हैं। पश्चिम बंगाल चुनाव में सीएम ममता बनर्जी लगता है कि अब तक बीजेपी नेता सुवेंदु अधिकारी से नंदीग्राम सीट से अपनी हार को भूल नहीं पा रहीं हैं। अधिकारी की जीत को चुनौती देने के लिए सीएम ममता ने कलकत्ता हाई कोर्ट का रुख किया है। वहां भी जब जज कौशिक चंदा ने निर्देश दिया, ‘‘कोलकाता उच्च न्यायालय के रजिस्ट्रार इस अदालत के सामने एक रिपोर्ट पेश करेंगे कि क्या यह याचिका जनप्रतिनिधित्व कानून, 1951 के अनुरुप दाखिल की गयी है।’’ ममता ने जज पर ही सवाल उठा दिया। ममता बनर्जी एक तानाशाह की तरह पूरे बंगाल पर शासन करना चाहती हैं। उनकी तानाशाही का ही परिणाम है कि छह साल के बाद देवाशीष को एक बार फिर मरना पड़ा।

देवाशीष आचार्य की हत्या की खबर को पश्चिम बंगाल की सरकार सामान्य हत्या बताने की कोशिश में लगी है लेकिन वह किसी भी तरह से सामान्य हत्या नहीं है। देवाशीष की हत्या एक बार फिर तृणमूल कांग्रेस के शासन का माखौल उड़ा रही है।

मृतक देवाशीष आचार्य के संबंध में छह साल पुरानी एक खबर का हवाला सभी अखबार दे रहे हैं। 5 जनवरी 2015 की उस घटना में अभिषेक बनर्जी को पूर्वी मिदनापुर जिले के चांदीपुर में एक जनसभा को संबोधित करते वक्त देवाशीष ने थप्पड़ मारा था। थप्पड़ मारने के बाद देवाशीष की पीटाई को बहुत हल्के शब्दों में लिखा गया है। पीटाई लिख देने से पाठकों के सामने यह स्पष्ट नहीं होता कि एक—आधा थप्पड़ मार कर छोड़ दिया गया था या फिर तब तक मारा गया जब तक आंखो के आगे अंधेरा ना छा जाए या तब तक मारा गया जब तक मारने वालों को ही ना लग गया कि इससे अधिक मारा गया तो आईपीसी में हत्या की धारा 302 का मामला बन जाएगा।

वास्तव में हुआ कुछ ऐसा ही था, जिसका उल्लेख अभिषेक की हत्या के बाद किसी समाचार पत्र में नहीं मिला। तृणमूल के लोगों ने बयान दिया कि देवाशीष पर थप्पड़ उठा देने के बाद, वह जिन्दा है। यह उसके लिए ईश्वर के आशीर्वाद से कम नहीं है। तृणमूल के नेताओं ने यहां तक कह दिया कि यह सब बहुत ही अचानक हुआ और जहां अभिषेक बनर्जी पर उसने थप्पड़ चलाया, वहां तृणमूल के साथ खड़ी हुई जनता कोई भारत सेवाश्रम संघ या फिर रामकृष्ण मिशन से नहीं आई थी। जो अपने नेता इस तरह पीटता हुआ देख लेती। उस समय भी इतना पीटा गया था देवशीष को कि मानों वह मर ही गया था। एक तरह से उसे छह साल पहले एक नई जिन्दगी मिली थी, जिसे 2021 में कथित तौर पर तृणमूल के लोगों ने वापस छीन लिया।

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