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फिल्मो में गालियाँ परोसने वाले अनुराग कश्यप खुद को गाली पड़ी तो भाग गए

अनुराग कश्यप से जब भी ये सवाल किया जाता है कि उनकी फिल्मों में किरदार इतनी गाली क्यों देते हैं? तो उनका जवाब होता है कि मैं वही दिखा रहा हूं जो समाज में है, लेकिन वही अनुराग कश्यप अब ये कहकर ट्विटर छोड़कर चले गए हैं कि लोग उन्हें गालियां बहुत देते हैं!

सवाल ये है कि जिस तरह के गाली-गलौज वाले किरदार दिखाकर अब तक वे लोगों का मनोरंजन कर रहे थे, उसी तरह के किरदारों से असल जिंदगी में पाला पड़ने पर वो इतना बौखला क्यों गए हैं? अगर ड्रग एडिक्ट, सीरियल किलर, अंडरवर्ल्ड डॉन समाज का हिस्सा हैं तो असहमति पर गाली देने वाले लोग भी उसी समाज का हिस्सा हैं। लेकिन असल जिंदगी में ऐसे लोगों से डील करने के वक्त आप ‘पूरे माहौल’ को ही खराब बताकर वहां से भाग जाते हैं। कुछ समय पहले रवीश कुमार भी ऐसी ही दलील देकर ट्विटर से विदा ले गए थे।

अनुराग कश्यप हों या रवीश कुमार, इन लोगों के ट्विटर छोड़ने के पीछे कारण ये नहीं है कि लोग वहां गालियां देते हैं या कोई उनके परिवार को धमकी देता है। मैं पहले भी कह चुका हूं कि जब भी आप किसी विचार के साथ या उसके खिलाफ खुलकर खड़े होते हैं तो उस पर आने वाली प्रतिक्रिया भी एक्सट्रीम (Extreme) होगी।

जो लोग आपसे सहमत होंगे वो आपके भक्त बन जाएंगे और जो आपके खिलाफ होंगे वो आपका विरोध करेंगे। चूंकि समाज में हर तरह के लोग हैं, इसलिए आप ये तय नहीं कर सकते कि विरोध जताने वाले लोगों की भाषा कैसी होगी? आपको अगर किसी की भाषा पसंद नहीं आ रही तो आप उसे ब्लॉक भी कर सकते हैं। कोई धमकी दे रहा है तो पुलिस में उसकी शिकायत कर दें, लेकिन ऐसा न कर आप वहां से भाग जाते हैं।

दरअसल समस्या गाली या धमकी की नहीं है। रवीश कुमार और अनुराग कश्यप जैसे लोगों के साथ दिक्कत ये है कि जब आपको सारी जिंदगी अपने ही जैसे लोगों के साथ बंद कमरों में अपने ही विचार को सही मानते हुए उस पर चर्चा करने की आदत पड़ चुकी हो तो आप ट्वटिर पर सरेआम अपने विचार की धज्जियां उड़ते नहीं देख सकते।

अपनी जिस सोच को आप अपने दोस्तों में गाकर खुद को सही मानने का मुगालता पाले बैठे हों, ट्विटर पर आपके उसी विचार की जब कोई तथ्य के साथ धज्जियां उड़ा देता है तो आप बर्दाश्त नहीं कर पाते। हजारों लोगों के सामने अपने तर्क को परास्त होता देख आप बौखला जाते हैं। आपका चेहरा गुस्से से तमतमाने लगता है। विरोधियों के हाथों हुई फजीहत आपको सोने नहीं देती। एक से ज्यादा बार ऐसा होने पर आप परेशान हो जाते हैं।

और जब ये समझ आ जाता है कि सामने वाले के तर्क का कोई जवाब नहीं तो आप स्थिति से बचने का बहाना ढूंढ रहे होते हैं। और फिर एक रोज ‘परिवार या मुझे गाली दे रहे हैं’, ‘मैं और बर्दाश्त नहीं कर सकता’ जैसी बात करके वहां से रफूचक्कर हो जाते हैं।

बेशक परिवार को गालियां मिलना या आपको खुद को गालियां पड़ना बर्दाश्त से बाहर होता है, लेकिन ये सब किस के साथ नहीं होता। जिन पत्रकारों और विचारकों को आप बीजेपी का हमदर्द मानते हैं, क्या उनके परिवारों को गालियां नहीं पड़तीं? क्या उनके परिवार के लोगों को धमकियां नहीं दी गईं। आप गालियां की बात करते हैं। बंगाल और केरल जैसे राज्यों में तो एक विचार के साथ खड़े होने पर लोग (बीजेपी के कई कार्यकर्ता) कत्ल तक कर दिए गए। तो क्या उनके परिवार वहां से भाग गए? या बीजेपी ने वहां राजनीति करनी छोड़ दी?

गाली, दुष्प्रचार, हत्या ये सब तो विचार के साथ खड़े होने की कीमत है,जो हर वैचारिक इंसान को उठानी पड़ती है। अगर आपको अपना विचार प्रिय है तो इसे बर्दाश्त कीजिए। नहीं कर सकते तो गाली गलौच बहुत है, का ड्रामा बंद कीजिए। राजनीतिक विचारधारा की लड़ाई में अपने अधपके तर्कों के साथ मत कूदिए। जब आप समाज से अपने फिल्मों की गाली गलौच को समाज की हकीकत मानने की अपेक्षा रखते हैं तो उसी समाज में खुद को गाली पड़ने पर तड़प क्यों जाते हैं। क्या आपका हीरो भी ऐसे लोगों के आगे हार जाता है या उन लोगों से निपटते हुए अपने विचार के लिए लड़ता है?

फिर दोहराता हूं दिक्कत गाली नहीं। आपके विचार का खोखलापन है जो सोशल मीडिया पर उधेड़ दिया जाता है और गाली की बात करके आप और रवीश कुमार जैसे लोग खुद को वैसे ही बचाते हैं, जैसे सेक्रेड गेम्स का कोई सुस्त संवाद गाली की आड़ लेकर लेखन के खोखलेपन की लाज बचाता है।

(पत्रकार नीरज बधवार की फेसबुक वॉल से)

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