आप यहाँ है :

फिल्मी दुनिया जिनकी जुबान लिखिलिखाई स्क्रिप्ट पर ही खुलती है

वैसे तो हिंदुस्तान की परम्परा है कि बच्चे लड़ रहे हों तो बड़े बीच में नही पड़ते। बच्चे लड़-भिड़कर एक हो जाते हैं, लेकिन बड़ों के बीच में पड़ने से परिवार का सौहार्द खत्म हो जाता है। लेकिन जब से मोहल्ले में टीआरपी लोभी डायरेक्टरों के शातिर सीरियलों की एंट्री हुई है, परिवार के लोग ही बच्चों को प्यादों की तरह इस्तेमाल करने लगे हैं। उन्हें सिखाते हैं हिंदुस्तान किसी के बाप का नहीं है, लेकिन धीमे से उनके मन में बीज बो जाते हैं कि यूनिवर्सिटी तुम्हारे बाप की ही है। प्रेमचंद के हीरा-मोती को दुलत्ती मारकर फैज के लिए लड़ मरने की प्रेरणा देते हैं। अब नौजवान ‘हम देखेंगे’ कहकर ही पिटे जा रहा है। अबे देखोगे तो तब जब आंख-कान दोनों खुले रखोगे। विडियो में कोई दूसरा ऑडियो भरकर आंखों के सामने ठेल देगा तो देखकर भी का कर लोगे?

वीसीआर में रोज नए कैसेट भरे जा रहे हैं। आप बाएं कान से सुनते हो? लीजिए आप ये विडियो लीजिए। आप राइट मैन हो? तो आपके लिए ये दो विडियो! आज़ादी के बाद से ये क्रांति-व्रांति चतुर आदमी के चोंचले होते हैं। हमाई ना मानो तो अन्ना से पूछ लो। जेएनयू इस वक्त यूनिवर्सिटी नहीं है। किसी का कंधा है, किसी का मौका, किसी की प्रयोगशाला! और यहां आम आदमी इत्ता कन्फ्यूज कि यार असल में मसला क्या है, फीस या सीएए? क्यूंकि हो सकता है कि दोनों को लेकर लोग आपके पक्ष में ना हों, लेकिन किसी एक पर हो सकते हैं।

बॉलिवुड में कोई खास दिलचस्पी या किसी से दुश्मनी नहीं है, लेकिन बाय गॉड इंडस्ट्री में जिस वक्त जिसका सितारा बुलंद होता है, इतने निहायत प्रोफेशनल होते हैं कि निर्भया जैसे मौके पर भी बोलने से पहले सोचते हैं कि वक्त, छवि, पैसे का कोई नफा-नुकसान तो नहीं हो रहा? इसलिए जब जेएनयू में छपाक एंट्री होती है तो संशय होता है। इसमें रीढ़ दिखाने जैसा कुछ नहीं है। रीढ़ तब दिखती, जब मुंह से कुछ शब्द फूटते। लेकिन चूंकि वो स्क्रिप्ट में था नहीं और लिखा हुआ पढ़ने के आदी लोग इतने अबोध हैं कि वो जानते ही नहीं वो किसी मसले में कहां खड़े हैं!

कुछ पत्रकार दीपिका के समर्थन में लिख रहे हैं ब्रेव! लगे हाथों अपने प्रोग्राम की टाइमिंग भी बताए दे रहे हैं कि इत्ते बजे हमारा प्रोग्राम भी देख लीजिए, आज ही आएगा, दीपिका की पिक्चर आने में तो अभी टाइम है! वैसे, ‘हम देखेंगे’ का सही मजा तो चैनल वाले ले रहे हैं। जब-जब यूनिवर्सिटी से आवाज आएगी ‘हम देखेंगे’, चैनल दुहराएंगे ‘कीप वाचिंग’!

बाकी आईआईटी कानपुर अब नज्मों पर शोध करेगा तो जाहिर है पानी से चलने वाली कार अब जावेद अख्तर ही खोजेंगे। और कित्ती आजादी चाहिए बे, इत्ती आजादी लेकर जाओगे कहां?

(ये लेखिका के निजी विचार हैं।)

साभार https://www.samachar4media.com/ से

image_pdfimage_print


Leave a Reply
 

Your email address will not be published. Required fields are marked (*)

You may use these HTML tags and attributes: <a href="" title=""> <abbr title=""> <acronym title=""> <b> <blockquote cite=""> <cite> <code> <del datetime=""> <em> <i> <q cite=""> <s> <strike> <strong>

सम्बंधित लेख
 

Back to Top