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हार का डर

आज हमारी समाज के समक्ष बहुत सारी  समस्याएं  हैं, और ये समस्याएं ख़त्म होने की जगह,  दिन दूनी रात चौगिनी बढ़ रही है. और कहीं ऐसा न हो की इन समस्याओं के कारण आगे आने वाली पीढ़ियां इन सबके कारण कहीं खो जाएँ।  

उन्ही समस्याओं में से एक बहुत बड़ी समस्या है  " हार का डर " . यह समस्या इतनी बढ़ गई है की समाज में व्यवसाय कर सेवाएं देने वाली जैन समाज तक नौकरी और दुसरे रास्तों पर चल पढ़ी है।  

यह समस्या कुछ ऐसी है, जैसे की एक बालक हमेशा जीतने के लिए छोटा खेल का मैदान चुनता है, और हमेशा जीतता है। इस भ्रम में जीता है कि मैं जीत गया हूँ।  जबकि वह यह नहीं जानता  की वह खुद के मैदान का  विजेता है। अभी बड़ा  मैदान तो देखा तक नहीं। कहीं न कहीं हम अच्छा पढ़ने व होशियार छात्र हमेशा अपने विश्वविद्यालय के छोटे से मैदान में जीतते हैं और विजेता की उपाधि स्वयं को दे देते हैं। और जब वह असलियत के धरातल पर उतरते हैं तो या तो रास्ता बदल कर ,एक कौना पकड़ कर बैठ जाते हैं , और उसी छोटे से कौने  के जीवन को जीते हैं. या फिर जीवन से हार जाते हैं। 

 आज की पीढ़ी , जोखिम उठाने को तैयार ही नहीं है। और कहीं न कहीं आज की पीढ़ी की उच्च स्तरीय शिक्षा, उसे ऐसा करने से रोक देती है। की "कोई क्या कहेगा" ?
स्वयं अपने व्यावसायिक स्थान की साफ़ सफाई करने  में संकोच होता है, की हम पढ़े लिखे ये काम कैसे करें। फिर वही बात आ गई "कोई क्या कहेगा" ? 
और यही "कोई क्या कहेगा" है "हार का डर "। 

एक और कारण है , आज की पीढ़ी ने हारना सीखा ही नहीं है , हर बच्चा भौतिक सुख सुविधाओं में माँ और बाबा के आँचल में पढता है, बढ़ता है। उसके विद्यालय से लेकर हर कार्य में माँ बाबा हमेशा साथ खड़े होते हैं। और बच्चा माँ बाबा की मदद से जीतता जाता है, यह जीत बच्चे की नहीं माँ बाबा की होती है। हार का कभी मुहं न देखने के कारण वह बड़े होकर जोखिम उठाने से डरते हैं।  और कभी कुछ  नया कर ही नहीं पाते। 
 

पर, इस हार के डर  को जीत कर जीवन में गर किसी ने कुछ किया है तो वो हैं अब्राहम लिंकन, विलियम शेक्सपियर , अल्बर्ट आइंस्टाइन, और हमारे अपने डॉ ए पी जे अब्दुल कलम आजाद और अन्य कई हस्तियां ,जिन्होंने "फर्श से अर्श "तक का रास्ता तय किया। न ही ये लोग परिस्थितियों से डरे और न ही हारने से , क्योंकि बचपन में ही परिस्थिति वश ये कई बार हारे और फिर उठ खड़े हुए. और जीवन में विजेता  हुए। 
 
तो आइये आज से हम नया काम शुरू करें , कि  अपने बच्चों को हारना सिखाएं, उनके मन से हार का डर  निकालें और फिर देखें एक नया सकारात्मक परिवर्तन होगा।  
 

(लेखिका हिन्दी को विश्व पटल पर स्थापित करने के लिए समर्पित हैं और भारत सरकार के हर विभाग से हिन्दी में कामकाज को बढ़ावा देने व सरकारी वेबसाईटें हिन्दी में बनवाने के लिए संघर्ष कर रही है। चुनाव आय़ोग से लेकर वित्त मंत्रावय की वेबसाईटें हिन्दी में बनाए जाने में उनके संघर्ष की ही प्रमुख भूमिका है)

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