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मुलायम परिवार में रामायण महाभारत के किरदार

मैं मुलायम सिंह यादव को तब से जानता हूं जब वह कानपुर में किदवई नगर के चौराहे पर स्थित यादव मिष्ठान भंडार पर अपनी साइकिल से आते थे, उनके पैरो में एक क्लिप लगी होती थी ताकि पाजामा चेन कवर में फंस कर उसकी ग्रीस से गंदा न हो जाए। उन दिनों भी वहां ठग्गू के लड्डू बिकते थे जिसका यह नारा था कि “ऐसा कोई सगा नहीं जिसको हमने ठगा नहीं”। वह फिल्मों के जरिए राष्ट्रीय स्तर पर अपनी पहचान बनाने में कामयाब रहा।

मुलायमसिंह ने वे लड्डू खाए या नहीं अथवा कभी इस नारे पर ध्यान दिया या नहीं, यह तो नहीं पता पर उनको जानने वाले मानते हैं कि अपने जीवन में उन्होंने इस नारे पर अमल जरूर किया। राजनीति में शायद ही ऐसा कोई नेता या दल होगा जिसको उनके साथ रहते हुए इसका कटु अनुभव न हुआ हो। पहले उन्होंने सोनिया गांधी को प्रधानमंत्री बनने से रोका। फिर अपने वामपंथी मित्रों को परमाणु करार पर गच्चा दिया। उसके बाद ममता बनर्जी को राष्ट्रपति चुनाव में प्रणव मुखर्जी के नाम पर भटका दिया।

इससे भी मन नहीं भरा तो समाजवाद के इस पुरोधा ने राजनीति के गर्भ में पल रही जनता पार्टी का ही नवें महीने में गर्भपात करवा दिया। जिस पार्टी का उन्हें अध्यक्ष बनाया जा चुका था व जिसका सिर्फ संविधान बनना एवं झंडा तय होना बाकी रह गया था उसे वे छोड़ कर चल दिए। इतना ही नहीं उन्होंने बिहार विधानसभा में अपने दल के उम्मीदवार खड़े किए ताकि लालू यादव व नीतीश कुमार को नुकसान पहुंचा सकें। हालांकि कहते तो यह हैं कि उन्होंने यह कदम भाजपा व नरेंद्र मोदी को फायदा पहुंचाने के लिए उठाया था।

इससे पहले वे मुसलमानों में अयोध्या विध्वंस के खलनायक माने जाने वाले कल्याण सिंह के साथ चिल्ला कर अपने मुस्लिम वोट बैंक को भी ठेंगा दिखा चुके थे। इस सबके बावजूद मेरा मानना है कि उन्होंने कम से कम दो अच्छे काम किए। पहला काम डा. एपीजे अब्दुल कलाम को राष्ट्रपति बनवाना था हालांकि उनसे यह अपेक्षा की जाती थी कि वे कहीं आजम खान का नाम आगे न कर दें। दूसरा काम पिछले चुनाव में अखिलेश को मुख्यमंत्री बनाना था।

और जब उन्होंने अपने कलेजे के टुकड़े को हटाने का ऐलान किया है तो उनके दिल पर क्या गुजर रही होगी इसका सहज अनुमान लगाया जा सकता है। मेरा अपना मानना है कि आज उनकी हालत राजा दशरथ जैसी हो गई है। ऊपर से भले ही वे कार सेवकों पर गोली चलवाने के अपने फैसले को सही ठहराते हों या उन्होंने बाबरी मस्जिद को बचाने की हर संभव कोशिश की हो पर वे राम के अनन्य भक्तों में से हैं और उनके घर अक्सर अखंड रामायण सरीखे आयोजन होते रहते हैं।

दशरथ और मुलायम सिंह के बीच तमाम समानताएं नजर आती हैं। ऐसा लगता है कि सारी रामायण और महाभारत दोनों के ही तमाम पात्र उनकी जिंदगी व परिवार में आ गए हों। दशरथ के बारे में कहा जाता है कि जब वे एक बार शिकार खेलने गए थे तो उन्होंने एक बहेलिए को जानवर समझकर मार दिया था। इससे दुखी होकर उसके मां-बाप ने उन्हें शाप दिया था कि तुम्हे भी एक दिन पुत्र विभोग का सामना करना पड़ेगा। इसी शाप के चलते उन्होंने कैकेयी से विवाह किया। घर में हर तरह का सुख होते हुए भी ऐन मौके पर कैकेई ने उनसे राम को 14 साल के लिए बनवास भेजने का वर मांग लिया।

मुलायम सिंह यादव खुद भले ही दशरथ न हो पर उनके भी दो रानियां हैं। पहली रानी अब इस दुनिया में नहीं है जबकि दूसरी छोटी रानी के भी एक भरत है। अखबारों में इन आशय की खबरें आती रहती हैं कि उनकी दूसरी पत्नी साधना अपने बेटे प्रतीक के भविष्य को लेकर कितनी चिंतित है। जहां राज परिवार होगा वहां मंथराएं भी होंगी। यहां भी कान भरने वाली मंथराओं की कमी नहीं है। महाभारत व रामायण में गजब का घालमेल है। एक शकुनी मामा है जो कि दरबार में हाजिर होकर अपनी साजिशों को अंजाम देने से बाज नहीं आता है। यह मामा अपने भांजे के भविष्य को लेकर बहुत चिंतित है। उसे पता है कि अगर भांजे को कुछ मिला तभी उसे उसमें हिस्सा मिल सकेगा। शकुनि का तो यहां तक दावा रहा है कि उसने ही दूसरी शादी करवाई थी और वह उन्हें अपनी सगी बहन से भी ज्यादा चाहता है।

पिछले कुछ दिनों से उत्तर प्रदेश के इस यादव परिवार में जो कुछ चल रहा है उसे देखकर वह हालात याद आ जाते हैं जो कि यदुवंश की बरबादी के कारण बने। महाभारत के दौरान सबसे अहम भूमिका कृष्ण की ही रही थी। ययाति मुनि के बेटे यदु के पुत्र के नाम से यादव वंश चला था। महाभारत का युद्ध बेहद विनाशकारी साबित हुआ। इसमें सभी कौरव व उनके पुत्र मारे गए। यही स्थिति पांडवों की भी हुई। कृष्ण एवं पांचों पांडवों के अलावा इस गुट के भी बहुत कम लोग जीवित बचे।

जब युधिष्ठिर के राजतिलक के बाद श्रीकृष्ण गांधारी के पास शोक जातने के लिए गए तो वह उन्हें देखते ही भड़क उठीं और उसने उन्हें श्राप देते हुए कहा कि जैसे मेरे वंश का खात्मा हुआ है वैसे ही एक दिन तेरा वंश भी समाप्त हो जाएगा। कृष्ण को अहसास हो गया कि अब द्वारका नष्ट हो जाएगी। इसलिए वह अपने लोगों के साथ द्वारका छोड़कर चल दिए। एक बार कृष्ण के बेटे आपस में खेल रहे थे। उनमें से एक ने खुद को गर्भवती स्त्री जैसा बना लिया। वे दोनों तपस्या में बैठे दुर्वासा मुनि के पास गए और उनसे मजाक करते हुए पूछा कि इसके लड़का होगा या लड़की। यह सुनते ही वे बेहद नाराज हो गए। वैसे भी दुर्वासा मुनि अपने गुस्से के लिए जाने जाते थे। अगले ही दिन कृष्ण के पुत्र ने एक लोहे की छड़ को जन्म दिया। कृष्ण ने इस शाप को समाप्त करने के लिए उस छड़ को तोड़कर उसका चूरा बना डाला।

पाराशरजी के मुताबिक यह चूरा पास की नदी में बहा दिया गया। संयोग से लोहे का एक टुकड़ा बच गया उसे भी नदी में फेंक दिया गया। जहां यह चूरा फेंका गया था वहां नुकीले पत्तों वाली घास उग आई जिसे नागर मोथा कहते हैं। बचा हुआ टुकड़ा एक मछली निगल गई। उसे एक मुछुआरे ने पकड़ा। मछली खाकर वह टुकड़ा सड़क पर फेंक दिया। यह टुकड़ा एक शिकारी को नजर आया तो उसने उसे पीट कर धारदार बना कर अपने तीर में लगा दिया। कुछ समय बाद बचे हुए यादव उस नदी के किनारे खेलने आए। खेलते हुए उनके बीच झगड़ा हो गया। वे एक दूसरे पर टूट पड़े। उन्होंने हमला करने के लिए तेजधार वाली नागरमोथा घास उठा कर उससे अपने ही स्वजनों को मारना शुरू कर दिया। देखते ही देखते सारे यादव मारे गए। यह सब सुनकर कृष्ण बेहद दुखी हो गए और उकड़ू होकर बैठ गए।

उसी समय जंगल में एक बहेलिया आया। उसकी नजर दूर से उनके तलवे पर पड़ी तो उसे लगा कि वहां कोई जानवर है। उसने उन पर वही तीर चला दिया जो कि मछली के पेट से निकले लोहे के टुकड़े से बना था। कृष्ण की तत्काल मृत्यु हो गई। इतने महा पुरूष को बहेलिया ने एक झटके में हलाल कर दिया। इस तरह से यदुवंश का नाश हुआ। उसके बाद कलयुग की शुरुआत हो गई। बताते हैं कि यदु इतने पराक्रमी थे कि उन्हें किसी और से कोई खतरा ही नहीं था। वे तो खुद अपने विनाश का कारण बने और एक ने दूसरे को बरबाद कर दिया।

आज उत्तर प्रदेश के सबसे शक्तिशाली यादव परिवार में यही सब कुछ हो रहा है। बाप बेटा एक दूसरे के सामने तलवारे खींच चुके हैं। नागर मौथे की बयानबाजी के जरिए एक दूसरे पर प्रहार किए जा रहे हैं। पूरा दल आत्मघाती मोड़ में आ चुका है। महाभारत काल में तो फिर भी दो भाइयों के बीच टकराव हुआ था यहां तो बाप और बेटा आमने-सामने आ गए हैं। चंद माह बाद राज्य में चुनाव होने हैं। पहले जहां भाजपा सरीखी पार्टी यह दावा करने में गर्व महसूस कर रही थी कि उसका मुकाबला समाजवादी पार्टी से है वह भी सकते में आ चुकी है कि अब उसे यह बताना पड़ेगा कि उसका मुकाबला किस धड़े से है।

मुलायम सिंह यादव काफी वरिष्ठ हैं व उनके पास शिवपाल यादव व अमर सिंह जैसे सलाहकार हैं इसलिए मेरे लिए कुछ कहना तो छोटे मुंह बड़ी बात जैसा ही होगा। शास्त्रों में लिखा है कि हर हार दुखद नहीं होती है। कुछ हार बहुत अच्छी मानी गई हैं। जब पत्नी-पति से किसी क्षेत्र में हारती है या बाप कहीं बेटे से हारता है तो वह अवसर क्रोध और प्रतिरोध जताने का नहीं बल्कि गर्व करने का, खुशी मनाने का होता है। आपको अपनी इस हार को सेलीब्रेट करना चाहिए इस बात पर गर्व करना चाहिए कि आज आपका बेटा राजनीति के दंगल में आपको ही चित्त करने में सफल हो गया। बाप जीते या बेटा, अखाड़े पर कब्जा तो परिवार का ही फिर रहेगा, सो चिंता और दुख किस बात का!

साभार- http://www.nayaindia.com/ से

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