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आलोचनाओँ से नेताजी का कद छोटा नहीं हो जाता

कम्युनिस्टों ने नेताजी सुभाषचन्द्र बोस पर नीचतम आक्षेप किये थे। उन्हें तोजो का कुत्ता तथा फासिस्ट आदि घृणित विशेषणों से हजारों बार प्रस्तुत किया गया। परन्तु उनके नीचतम विरोधियों ने भी कभी उन पर सनातन धर्म और भारतीय चेतना या भारतीय संस्कृति के प्रति निष्ठाशून्य होने की बात नहीं कही। क्योंकि इसकी कल्पना ही नहीं हो सकती थी।

यह सही है कि गुरूदेव श्री रवीन्द्रनाथ टैगोर ने उनसे यह स्पष्ट प्रश्न किया था कि स्वाधीन भारत में भविष्य में मुस्लिमों की समस्या आयेगी तो उसका समाधान तुम कैसे करोगे। इस पर उन्होंने उत्तर दिया था – ‘मेरे संपर्क में तीस लाख मुसलमान हैं। वे सब मेरे प्रति निष्ठा रखते हैं और भारत के प्रति भी उनकी निष्ठा वैसी ही है। मुहम्मद अली जिन्ना और मुस्लिम लीग जिन मुसलमानों को अपने साथ जोड़ रहे हैं वे प्रतिगामी विचारों वाले लोग हैं परन्तु सभी मुसलमान हिन्दुओं से मजहबी आधार पर नफरत करते हों या दूरी रखते हों, ऐसा नहीं है। वे सब इसी देश के हैं और उनके मन में भी अपनी मातृभूमि से प्रेम है। मैं जिन्ना को और मुस्लिम लीग को भारतीय मुसलमानों का वैध प्रतिनिधि नहीं मानता। वे तो ब्रिटिश क्रिएशन हैं। अंग्रेजों ने आयरलैंड में भी आयरिश लोगों को विभाजित करने के लिये इसी तरह की फूट डाली थी। स्वतंत्र भारत में शासन केवल उनके आर्थिक और सामाजिक हितों की गारण्टी लेगा। उनकी अपनी संस्कृति या मजहब का पालन वे करते रहेंगे और मैं ऐसे बहुत से प्रमुख मुसलमानों को जानता हूँ, जिनमें देश के प्रति निष्ठा है।’

यहाँ यह कहा जा सकता है कि मजहब के नाम पर मुसलमानों के बड़े हिस्से को किस प्रकार बहा कर ले जाया जा सकता है और किस प्रकार शेष मुसलमान अगर उस बहाव से असहमत भी हुये तो चुप रहने को विवश होते हैं, इसका अनुमान लगाने में शायद नेताजी खरे नहीं उतरें। परंतु फिर यह बात तो राणा प्रताप, शिवाजी सहित हमारे सैकड़ों श्रेष्ठ और शूरवीर तथा प्रतापी राजाओं के लिये भी कही जा सकती है। जिन्होंने अपनी सेनाओं में कतिपय मुसलमानों को भी स्थान दिया और उन सब शूरवीर राजाओं के लिये तो कही ही जा सकती है जो राजनैतिक कारणों से मुगलों तथा अन्य मुसलमान नवाबों आदि के साथ रहकर प्रतिस्पर्धी हिन्दू राजाओं से लड़ते रहे। ऐसी स्थिति में फिर राजनैतिक विश्लेषक को यह बताना पड़ेगा कि उसकी दृष्टि में समस्त मुसलमानों को पूर्णतः अविश्वसनीय मानने वाला कौन सा बड़ा राजपुरूष या राजनेता भारत वर्ष में आज तक हुआ है। निश्चय ही वीर सावरकर इस विषय में स्पष्ट थे परन्तु उनके भी कतिपय मुसलमान व्यक्तियों से संबंध तो रहे हैं।

परन्तु इससे भी महत्वपूर्ण बात यह है कि किसी भी भारतीय राजनैतिक विश्लेषक को भारतीय तब तक कहा ही नहीं जा सकता जब तक वह भारतीय राजनीतिशास्त्र से परिचित न हो। उसके भारतीय राजनैतिक शास्त्र से अपरिचित रहने पर उसे यूरो-ईसाई राजनीति की भारतीय शाखा का ही विश्लेषक कहा जायेगा, भारतीय विश्लेषक नहीं कहा जायेगा।

राजनीति शास्त्र के हमारे सभी ग्रंथों में यह बारम्बार कहा है कि राजा और राजपुरूष का मुख्य कार्य है दण्डनीति में समर्थ होना। दण्ड को ही राजनीतिशास्त्र में बल कहा गया है। मन्त्रबल, उत्साहबल तथा प्रभुत्वबल। इसमें याज्ञवल्क्य और कौटिल्य दोनों के ही मत से राजा का सर्वोच्च गुण है महोत्साह। महाभारत में भी यही कहा गया है। शांतिपर्व के अध्याय 58 में कहा गया है:-
उत्थानं हि नरेन्द्राणां बृहस्पतिरभाषत।

राजधर्मस्य तन्मूलं श्लोकांश्चात्र निबोध में।।13।।
उत्थानेनामृतं लब्धमुत्थानेनासुरा हताः।
उत्थानेन महेन्द्रेण श्रैष्ठ्यं प्राप्तं दिवीह च।।14।।
अर्थात् आचार्य बृहस्पति ने राजाओं के लिये उत्साह को ही सर्वाधिक महत्वपूर्ण बताया है। उत्साह ही राजधर्म का मूल है। देवराज इन्द्र ने उत्साह से ही अमृत प्राप्त किया और उत्साह पूर्वक ही असुरों का संहार संभव हुआ।

आगे कहा गया है कि जो उत्थानवीर हैं यानी ऐसे वीर जिनमें अदम्य उत्साह होता है, वे वाग्वीरों पर प्रभुत्व प्राप्त करते हैं। उत्साहहीन राजा बुद्धिमान होने पर भी शत्रुओं के द्वारा उसी प्रकार परास्त होता है, जिस प्रकार विषहीन सर्प को लोग सरलता से मार देते हैं।

इस प्रकार उत्साहशक्ति ही सर्वोपरि है। कौटिल्य ने इसे ही विक्रम बल कहा है। अर्थशास्त्र का सूत्र है – ‘शक्तिस्त्रिविधा। ज्ञानबलं मन्त्रशक्तिः कोशबलं प्रभुशक्तिः विक्रमबलं उत्साहशक्तिः।’ इस प्रकार उत्साह ही विक्रम है। अतः सर्वोपरि तो अपने प्रिय राजाओं या राजपुरूषों के उत्साह को भंग करने वाला कोई भी विश्लेषण नहीं किया जाना चाहिये। क्योंकि ऐसा विश्लेषण शत्रु पक्ष की सहायता करता है।

दूसरी बात यह है कि साम, दाम, भेद और दण्ड – ये चार उपाय तो राजनीति में अत्यावश्यक हैं।

इसके साथ ही उपेक्षा और माया को भी राजनीति के उपाय ही कहा गया है। ऐसी स्थिति में जब भारत में अंग्रेज शासक सब प्रकार से छल और दुष्टता तथा जोड़ तोड़ के द्वारा प्रभावी हुये तो उन्हें भगाने के लिये राजनीति के विविध उपाय न अपनाकर किसी ‘आइडियालॉजी’ के भाषण मारने से इतने निकृष्ट और दुष्ट शत्रु को भारत से भगाना असंभव था। ‘आइडियालॉजी’ पर भाषण तो जवाहरलाल नेहरू ने दिया था और हम सब जानते हैं कि वे अंत में अंग्रेजों के विश्वस्त सहयोगी बनकर उनसे पावर को अपने पास ट्रांसफर कराने में ही सफल हुये तथा अंत में उनकी ही नीतियों के बहुत बड़े पुरस्कर्ता तथा प्रसारक एवं प्रचारक निकले। वह कोई सामान्य गतिशील समाज की अवधि नहीं थी और कोई भारतीयों का लोकतांत्रिक शासन नहीं था कि जिसमें अंग्रेज एकपक्ष हों और नेताजी सुभाष दूसरा पक्ष हों और दोनों में भारतीयों का समर्थन लेने की होड़ मची हो। वह तो शत्रु से युद्ध का समय था।

भारतीय राजनीति शास्त्र का मंडल सिद्धांत विश्वविख्यात है। संधि, विग्रह, यान, आसन, संश्रय और द्वैधीभाव इन छः नीतियों का आश्रय लेकर राजनीति की जाती है। इनके सही उपयोग से ही राज्य में शांति संभव होती है और उद्योग भी संभव होता है। मंडल सिद्धांत के अनुसार शत्रु का शत्रु मित्र होता है। शत्रु और मित्र दोनों के सहज, कृत्रिम और प्राकृत तीन-तीन प्रकार होते हैं। अरि-मित्र भी शत्रु ही होता है और अरि के मित्र का अमित्र अपना मित्र होता है। ऐसी स्थिति में अंग्रेजों से बदला लेने के इच्छुक कतिपय मुस्लिम नेताओं से उस समय व्यावहारिक राजनैतिक मैत्री करना अत्यावश्यक थी। राजनीतिशास्त्र के इन आधारों को न जानकर काल्पनिक बातों पर चर्चा करना व्यक्ति को हास्यास्पद बना देता है।

पहले शताब्दियों तक भारतीय राजपुरूषों ने हिन्दू से मुसलमान बने राजाओं, नवाबों आदि को मनुष्य के रूप में ही देखकर उनके गुण और दोष परखकर तथा अपने प्रयोजन का विचार कर सम्बन्ध बनाये। इसका एक कारण यह भी है कि हिन्दू, मुसलमान, ईसाई आदि के रूप में मनुष्यों का वर्णन किसी भी प्राचीन शास्त्र अथवा राजशास्त्र में नहीं है। वहां तो मानवधर्म का ही वर्णन है। मानवधर्म का पालन न करने वाला हिन्दू हो या मुसलमान या ईसाई या बौद्ध या कुछ भी, वह राजा द्वारा दण्डनीय है। इस कारण व्यावहारिक स्तर पर संपूर्ण सर्तकता बरतते हुये भी किसी के दुष्ट प्रयोजन को भांपकर उसे दुष्ट या नीच या राक्षस ही कहा जाता है, मुसलमान या ईसाई आदि नहीं। यह प्राचीन भारतीय परंपरा है। अतः नेताजी सुभाषचन्द्र बोस भी इन्हीं कसौटियों पर काम कर रहे थे, यह स्वाभाविक है। आज भी भारत के भीतर रहने वाले मनुष्यों को आत्यन्तिक रूप से मजहब या रिलीजन के आधार पर बांटकर व्यवहार निश्चित कर पाना संभव नहीं है। उस समय तो दुष्ट अंग्रेजों से युद्ध चल रहा था और जो मुस्लिम नेता अंग्रेजों को भगाने मंे भारत के प्रधान समाज के नेताओं से सहयोग की बात कर रहे थे अथवा सहयोग कर रहे थे, उनसे संबंध तो रखना अनिवार्य ही था।

इन सब बातों का ध्यान रखे बिना राष्ट्रभक्त भारतीयों के महानायक के रूप में लोकचित्त और लोकमानस में प्रतिष्ठित नेताजी सुभाषचन्द्र बोस जैसे महापुरूषों का प्रतिमाभंजन विवेक की भी कमी है और दूरगामी राष्ट्रीय दृष्टि की भी।

साभार https://www.facebook.com/Rameshwarmishrapankaj से

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