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हैदराबाद सत्याग्रह के शहीद ठाकुर मलखान सिंह

विश्व इतिहास में आर्य समाज एकमात्र ऐसी संस्था है, जिस ने अल्पकाल में ही इतने बलिदानी दिए कि इतने अल्पकाल में विश्व की कोई अन्य संस्था नहीं दे सकी| आज तो अवस्था यह बन गई है कि आर्य समाजियों के ब्वालिदानियों की गिनती कर पाना भी संभव नहीं है| आर्य समाज ने न केवाल्देश की स्वाधीनता के लिए हि अपने बलिदानियों को पंक्तिबद्ध किया अपितु धर्म व जाति की रक्षा के लिए भी अनगिनत बलिदान दिए| इन सब के अतिरिक्त हैदराबाद सत्याग्रह में बलिदान, सत्यार्थ प्रकाश सत्याग्रह में बलिदान तथा अन्य अनेक सामाजिक कार्यों तथा अनेक अवसरों पर आर्य समाजियों ने जो बलिदान दिए, उन सब का अपना अपना विशेष महत्व है| जनता पर सरकार के माध्यम से हो रहे अत्याचारों से नागरिकों की रक्षा करते हुए दिए गए बलिदान भी इन सब का भागा हैं| इस प्रकार आर्य समाजियों के बलिदानियों की लम्बी सूची को जब देखते हैं तो इस सूचि में हमें सितारे की भान्ति चमकता हुआ एक नाम दिखाई देता है, यह नाम है हमारी इस कथक के नायक ठाकुर मलखान सिंह जी|

उत्तर प्रदेश के सहारनपुर जिला मेन एक नगर आता है रुड़की\ इस नगर के निकत ही एक ग्राम है रामपुर, जिसमें ठाकुरों की एक बस्ती है| इसी बस्ती में ठाकुर दलबीर सिंह जी अपनी पत्नी नावली देवी के साथ निवास करते थे| इन दोनों के तीन पुत्र संतानें थीं| इन पुत्रों के नाम थे क्रमश: ठाकुर हंसराज, ठाकुर मलखान सिंह तथा ठाकुर स्वरूप सिंह| इनमें से मंझले भाई ठाकुर मलखान सिंह जी ही हमारी इस कथा के मुख्य नायक हैं| इन तीनों बच्छो को माता नवल्देवी मलखान सिंह जी कि पन्द्रह वर्ष की ही आयु मेन अपने पति अथवा बच्चों के पिता के हाथों सौंप कर इस संसार से सदा के लिए विदा हो गईं|

माता नवल देवी की गोदी में किलोलें भरने वाला यह बालक मलखान सिंह आरम्भ से ही अपने पूर्वजों के उष्ण रक्त को अपनी धमनियों में संजोये हुए था| हैदराबाद आन्दोलन से पूर्व ही यह बालक कांग्रेस द्वारा चलाये जा रहे भारत के स्वाधीनता आन्दोलन में सक्रिय रूप से भागा लेते हुए अंग्रेज की कारागार मेन जाकर स्वाधीनता की देवी का सच्चा भक्त बन चुका था| चाहे कृषि पर आधारित होने के कारण मलखान सिंह जी क परिवार साधारण सी ही स्थिति का ही था किन्तु वीर सपूतों, देश के दीवानों के सामने यह पारिवारिक स्थिति कभी बाधा नहीं बना करती, मलखान सिंह जी ने अपना बलिदान देकर इस बात को साकार कर दिखाया|
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ज्यों ही सार्वदेशिक आर्य प्रतिनिधि सभा ने हैदराबाद में सत्याग्रह आन्दोलन आरम्भ करने का जयघोष किया त्यों हि देश तथा धर्म के जिन दीवानों के खून में तरंगे उठीं, उनमें से ठाकुर मलखान सिंह जी भी एक थे| यह बालक भी अब हैदराबाद की जेल को अपना निवास बनाने के लिए तथा वहां जाकर धर्म रक्षा की उमंग ले कर डोलने लगा| एक तथ्य यह भी है कि संयुक्त प्रांत( वर्तमान उत्तर प्रदेश) का जिला सहारनपुर एक एसा जिला रहा है कि जिस ने हैदराबाद के इस सत्याग्रह आन्दोलन के लिए देश में सर्वाधिक सत्याग्रहियों के रूप मेन अपना योगदान देने का गौरव प्राप्त किया| इस जिले को यह गौरव दिलाने का कार्य करने वाले ठाकुर मलखान सिंह जी ही थे, जिनके अथक परिश्रम ने यह कार्य कार दिखाया| जो प्रथम जत्था सहारनपुर से हैदराबाद के लिए रवाना हुआ, उस जत्थे का मलखान सिंह जी भी एक अंग थे|

सत्याग्रह के समय मलखान सिंह जी की आयु मात्र २९-३० वर्ष की थी| इतना हि नहीं इस समय आपकी पत्नी भी मायके गई हुई थी| आप पत्नी को बिना देखे और बिना बताये ही ठीक उसी प्रकार सत्याग्रह के लिए रवाना हुए जिस प्रकार महात्मा बुद्ध सत्य की खोज के लिए अपनी पत्नी को बताये बिना ही घर त्याग कर निकले थे तथा उनके जाने के पश्चात बुद्ध कि पत्नी उन्हें यही उलाहने ही देती रह गई थी कि हम क्षत्रानियाँ तो अपने पतियों को हंस हंस कर युद्ध के मैदान में भेज दिया कराती हैं, फिर आप तो सिद्दियाँ प्राप्त करने के लिए जा रहे थे, यदि आप मुझे कहकर जाते तो मैं आपको ख़ुशी ख़ुशी भेज देती| मलखां जी ने श्री वेदव्रत जी के वानप्रस्थी जी के साथ हैदराबाद के पुसद केंद्र से सत्याग्रह किया तथा यहाँ की पुलिस ने आपको पकड़ कर जेल भेज दिया|

इस प्रकार आप हैदराबाद की मुस्लिम निजाम की जेलों में रहे| पकडे जाने के पश्चात सिक्खों के अंतिम अर्थात दशम गुरु गुरु गोविन्द सिंह जी की निर्वाण स्थली नांदेड के न्यायालय में आप पर मुकदमें का नाटक किया गया| इस नाटक के परिणाम स्वरूप आपको एक वर्ष के लिए सश्रम जेल का दंड घोषित किया गया| इस दंड की घोषणा के साथ ही आप को चंचलगुडा जेल में भेज दिया गया| मलखान जी अत्यंत कठोर शरीर के स्वामी थे किन्तु जेल में मिलाने वाली यातनाओं तथा गंदे तथा कंकडों मिले खाने ने कुछ हि दिनों में उनके शरीर को जर्र जर्र करते हए खोखला बना दिया| परिणाम स्वरूप दिनांक १ जुलाई सन १९३९ ईस्वी को मलखान जी ने अपने शरीर को छोड़ कर अनंत यात्रा के लिए रवाना हो गए| हैदराबाद के निजाम ने अपनी क्रूरता तथा बर्बरतापूर्ण कार्यों को छूपाने के लिए जेल अधिकारियों को इस मृत्यु के सामाचार को गुप्त रखने का आदेश दिया| जेल के अधिकारियों ने आदेश मानते हुए चुप चाप उनका दाह संस्कार जेल में ही बिना किसी को इसकी सूचना दिए कर दिया|

हम सब जानते हैं कि आग को चाहे जितना भी छुपाने का प्रयास कर लो, यह छुपाने वसे कभी छुपा नहीं करती| ठीक एसा ही हैदराबाद निजाम की इस जेल में भी हुआ| हैदराबाद की रुढ़िवादी मुस्लिम सरकार ने जितना अधिक अपनी क्रूरताओं पर पर्दा डालने का प्रयास किया, उतना ही अधिक उसकी क्रूरता का साक्षात्कार देश भर में कही अधिक हैदराबाद के महान वीर भाई शामलाल जी सरीखे आर्य वीरों के बलिदानों को छुपाने का प्रयास भी किया गया किन्तु निजाम इसमे भी विफल रहा| इसे चूपाया नहीं जा सका अपितु इन बलिदानियों के समाचारों से जन जन में एक नए रक्त का संचार किया तथा नई उमंगों के साथ बलिदानियों की पंक्ति मेन नित्य नए नाम जुड़ने से यह पंक्ति प्रतिदिन लम्बी ही होती चली गई, ठीक इस प्रकार लम्बी हो रही थी जिस प्रकार खींचने से रबड़ लंबा हो जाता है| इस प्रकार ही ठाकुर मलखान जी के बलिदान का समाचार भी अधिक समय तक छुपा नहीं रह सका| अंत में मलखान जी के देहावसान तथा अन्य हैदराबाद सत्याग्रह के बलिदानियों का बलिदान हैदराबाद के निजाम के कफ़न कि किल सिद्ध हुआ,निजाम को झूक कर आर्यों की सब शर्तों को मानते हुए सब सत्याग्रहियों को छोड़ने के लिए बाध्य होना पडा।

डॉ.अशोक आर्य
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