Friday, April 4, 2025
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Homeअध्यात्म गंगावैदिक मान्यता में ईश्वर एक ही है

वैदिक मान्यता में ईश्वर एक ही है

प्रश्न :- क्या वेदों में ऐसी कोई मंत्र है जहां लिखा है कि ईश्वर एक ही है?
उत्तर:-
।। इन्द्रं मित्रं वरुणमग्निमाहुरथो दिव्य: स सुपर्णो गरुत्मान् ।।
।। एकं सद् विप्रा बहुधा वदंत्यग्नि यमं मातरिश्वानमाहु: ।। -ऋग्वेद (1-164-46)
भावार्थ :जिसे लोग इन्द्र, मित्र, वरुण आदि कहते हैं, वह सत्ता केवल एक ही है; ऋषि लोग उसे भिन्न-भिन्न नामों से पुकारते हैं।
ॐ।। यो भूतं च भव्‍य च सर्व यश्‍चाधि‍ति‍ष्‍ठति‍।।
स्‍वर्यस्‍य च केवलं तस्‍मै ज्‍येष्‍ठाय ब्रह्मणे नम:।। -(अथर्ववेद 10-8-1)
भावार्थ :जो भूत, भवि‍ष्‍य और सब में व्‍यापक है, जो दि‍व्‍यलोक का भी अधि‍ष्‍ठाता है, उस ब्रह्म (परमेश्वर) को प्रणाम है।
सुपर्णं विप्राः कवयो वचोभिरेकं सन्तं बहुधा कल्पयन्ति । छन्दांसि च दधतो अध्वरेषु ग्रहान्त्सोमस्य मिमते द्वादश ॥-ऋग्वेद (10-114-5)
भावार्थ : अपना विशेषरूप से पूरण करनेवाले क्रान्तदर्शी ज्ञानी लोग उस उत्तम पालनात्मक व पूरणात्मक कर्मोंवाले प्रभु को एक होते हुए को भी वेदवाणियों से अनेक प्रकार से कल्पितम करते है। सृष्टि के उत्पादक के रूप में वे उसे ’ब्रह्मा’ कहते हैं, तो धारण करनेवाले को ’विष्णु’ तथा प्रलयकर्ता के रूप में वे उसे ’रूद्र व शिव’ कहते हैं। और प्रभु स्मरण के साथ हिंसारहित यज्ञात्मक कर्मों में वेद-मन्त्रों को धारण करते हुए ये लोग मन्त्रोच्चारण पूर्वक यज्ञों को करते हुए, इन मन्त्रों को अपना पाप से बचानेवाला बनाते हुए दस इन्द्रियों, मन व बुद्धि’ इन बारह को सोम का, वीर्यशक्ति का ग्रहण करनेवाला बनाते हैं। सोमयज्ञों में बारह सोमपात्रों की तरह ये ’इन्द्रियों, मन व बुद्धि’ भी बारह सोमपात्र कहते हैं।
तदेवाग्निस्तदादित्यस्तद्वायुस्तदु चन्द्रमा:।
तदेव शुक्रं तद् ब्रह्म ताऽआप: स प्रजापति:||—यजुर्वेद(32/1)
भावार्थ : “वह अग्नि (उपासनीय) है,वह आदित्य (नाश-रहित) है, वह वायु (अनन्त बल युक्त) है वह चंद्रमा (हर्ष का देने वाला) है, वह शुक्र (उत्पादक) है, वह ब्रह्म (महान्) है, वह आप: (सर्वव्यापक) है, वह प्रजापति (सव प्राणियों का स्वामी) है।”
वेदाहमेतं पुरुषं महान्तमादित्यवर्णं तमस: परस्तात्।
तमेव विदित्वाति मृत्युमेति नान्य: पन्था विद्यतेऽयनाय॥— यजुर्वेद(31/18)
भावार्थ : “यदि मनुष्य इस लोक-परलोक के सुखों की इच्छा करें तो सबसे अति बड़े स्वयंप्रकाश और आनन्दस्वरूप अज्ञान के लेश से पृथक् वर्त्तमान परमात्मा को जान के ही मरणादि अथाह दुःखसागर से पृथक् हो सकते हैं, यही सुखदायी मार्ग है, इससे भिन्न कोई भी मनुष्यों की मुक्ति का मार्ग नहीं है।”
परीत्य भूतानि परीत्य लोकान् परीत्य सर्वा: प्रदिशो दिशश्च।
उपस्थाय प्रथमजामृतस्यात्मनाऽऽत्मानमभि सं विवेश।।—यजुर्वेद(32/11)
भावार्थ : “हे मनुष्यो! तुम लोग धर्म के आचरण, वेद और योग के अभ्यास तथा सत्सङ्ग आदि कर्मों से शरीर की पुष्टि और आत्मा तथा अन्तःकरण की शुद्धि को संपादन कर सर्वत्र अभिव्या परमात्मा को प्रा हो के सुखी होओ।”
हिरण्यगर्भ: समवर्त्तताग्रे भूतस्य जात: पतिरेकऽ आसीत्।
स दाधार पृथिवीं द्यामुतेमां कस्मै देवाय हविषा विधेम॥—यजुर्वेद(13/4)
भावार्थ : “हे मनुष्यो! तुम को योग्य है कि इस प्रसिद्ध सृष्टि के रचने से प्रथम परमेश्वर ही विद्यमान था, जीव गाढ़ निद्रा सुषुप्ति में लीन और जगत् का कारण अत्यन्त सूक्ष्मावस्था में आकाश के समान एकरस स्थिर था, जिसने सब जगत् को रच के धारण किया और जो अन्त्य समय में प्रलय करता है, उसी परमात्मा को उपासना के योग्य मानो।”

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