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डीपफेक का धोखा और डिजिटल सख्त नियमों की अनिवार्यता

डिजिटल युग में सूचना की गति जितनी तीव्र हुई है, उतनी ही तेजी से भ्रम, छल और दुष्प्रचार की संभावनाएँ भी बढ़ी हैं। कृत्रिम बुद्धिमत्ता और डीपफेक तकनीक ने इस चुनौती को और जटिल बना दिया है। अब केवल शब्दों से नहीं, बल्कि चेहरों, आवाजों और भाव-भंगिमाओं से भी झूठ को सच की तरह प्रस्तुत किया जा सकता है। यही कारण है कि केंद्र सरकार ने डीपफेक और एआई जनित सामग्री के नियमन के लिए आईटी नियमों को सख्त करने का निर्णय लिया है। बीस फरवरी से लागू होने जा रहे नए प्रावधानों के अनुसार एआई द्वारा निर्मित सामग्री पर स्पष्ट लेबल लगाना अनिवार्य होगा और किसी भी अवैध या भ्रामक सामग्री को तीन घंटे के भीतर हटाना या ब्लॉक करना होगा। पहले यह समयसीमा 36 घंटे थी। यह बदलाव केवल तकनीकी संशोधन नहीं, बल्कि डिजिटल नैतिकता और लोकतांत्रिक जवाबदेही की दिशा में एक गंभीर हस्तक्षेप है।

पिछले कुछ वर्षों में डीपफेक तकनीक का दुरुपयोग भयावह रूप से सामने आया है। राजनीतिक नेताओं के फर्जी वीडियो, अभिनेत्रियों की अश्लील रूप से परिवर्तित तस्वीरें, सांप्रदायिक तनाव भड़काने वाले ऑडियो क्लिप और आर्थिक धोखाधड़ी के लिए बनाए गए कृत्रिम संदेश-ये सब इस बात के प्रमाण हैं कि तकनीक तटस्थ नहीं रहती, उसका उपयोग और दुरुपयोग दोनों संभव हैं। जब सत्य को जूता जा रहा हो और झूठ को परिष्कृत तकनीक के सहारे प्रमाणिकता का आवरण पहनाकर प्रस्तुत किया जा रहा हो, तब समाज में अविश्वास का वातावरण बनना स्वाभाविक है। ऐसी स्थिति में सरकार द्वारा नियंत्रण की पहल आवश्यक प्रतीत होती है, क्योंकि यह केवल अभिव्यक्ति का प्रश्न नहीं, बल्कि सामाजिक सौहार्द, राष्ट्रीय सुरक्षा और नागरिकों की प्रतिष्ठा से जुड़ा विषय है।
नए नियमों के तहत सोशल मीडिया प्लेटफॉर्मों की जिम्मेदारी स्पष्ट रूप से बढ़ाई गई है।

अब उन्हें यह सुनिश्चित करना होगा कि उपयोगकर्ता को यह जानकारी मिले कि साझा की जा रही सामग्री एआई से निर्मित है या नहीं। इससे पारदर्शिता का एक न्यूनतम मानक स्थापित होगा। साथ ही, तीन घंटे की समयसीमा यह संकेत देती है कि सरकार डिजिटल अपराधों की गंभीरता को समझ रही है। डीपफेक वीडियो के वायरल होने के बाद उसका खंडन अक्सर प्रभावहीन हो जाता है, इसलिए त्वरित कार्रवाई ही नुकसान को सीमित कर सकती है। परंतु यह भी सच है कि इतनी कम समय सीमा में सामग्री की सत्यता की जांच करना तकनीकी और प्रशासनिक दृष्टि से अत्यंत जटिल कार्य है। इससे प्लेटफॉर्मों पर निगरानी तंत्र को अत्यधिक सुदृढ़ करना पड़ेगा, जो लागत और संचालन दोनों के स्तर पर चुनौतीपूर्ण होगा।

यह प्रश्न भी महत्वपूर्ण है कि “आपत्तिजनक” या “भ्रामक” सामग्री की परिभाषा कौन और किस आधार पर तय करेगा। लोकतंत्र में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता एक मूलाधिकार है। यदि नियमन की प्रक्रिया पारदर्शी और न्यायसंगत नहीं होगी, तो इसके दुरुपयोग की आशंकाएँ जन्म लेंगी। अतीत में भी यह देखा गया है कि जब-जब सोशल मीडिया पर नियंत्रण के प्रयास हुए, तब कुछ वर्गों ने इसे सरकारी अतिक्रमण के रूप में प्रस्तुत किया। इसलिए नियमन और स्वतंत्रता के बीच संतुलन बनाना अत्यंत आवश्यक है। सरकार को यह सुनिश्चित करना होगा कि नियमों का प्रयोग असहमति को दबाने के लिए नहीं, बल्कि स्पष्ट रूप से दुष्प्रचार और अपराध को रोकने के लिए हो। इस दिशा में स्वतंत्र निगरानी तंत्र, न्यायिक समीक्षा और पारदर्शी शिकायत निवारण प्रणाली अनिवार्य घटक हो सकते हैं।

वैश्विक परिदृश्य भी इसी संकट की ओर संकेत करता है। ऑस्ट्रेलिया और फ्रांस जैसे देशों ने बच्चों के लिए सोशल मीडिया उपयोग की न्यूनतम आयु निर्धारित करने जैसे कदम उठाए हैं। अमेरिका में इंस्टाग्राम और यूट्यूब के मानसिक स्वास्थ्य पर प्रभावों की जांच के लिए ऐतिहासिक मुकदमे चल रहे हैं। वहाँ की बड़ी तकनीकी कंपनियों पर युवाओं को लत लगाने वाली संरचनाएँ विकसित करने के आरोप लगे हैं। विशेषज्ञों का मत है कि कई युवा जब अपने फोन से दूर किए जाते हैं तो वे मनोवैज्ञानिक ही नहीं, शारीरिक असहजता भी अनुभव करते हैं। यह स्थिति केवल विकसित देशों तक सीमित नहीं, भारत सहित विकासशील देशों में भी सोशल मीडिया का अनियंत्रित विस्तार सामाजिक और मानसिक संकट का कारण बन रहा है।

एआई उद्योग स्वयं भी एक नैतिक दुविधा के दौर से गुजर रहा है। अत्यधिक प्रतिस्पर्धी बाजार में कंपनियाँ तकनीकी श्रेष्ठता की दौड़ में लगी हैं। इस दौड़ में सुरक्षा और नैतिकता के प्रश्न अक्सर पीछे छूट जाते हैं। हाल ही में एक प्रमुख कंपनी के सुरक्षा शोधकर्ता द्वारा विवादास्पद परियोजनाओं की अनियंत्रित गति पर असहमति जताते हुए त्यागपत्र देना इस तनाव का संकेत है। तकनीक की प्रगति जितनी तेज होगी, नियामक ढाँचे उतनी ही तेजी से अप्रासंगिक होते जाएँगे, यदि उन्हें समयानुकूल अद्यतन न किया जाए। इसलिए नियमन को केवल दंडात्मक नहीं, बल्कि दूरदर्शी और सहभागी होना चाहिए।

भारत के संदर्भ में यह विषय और भी संवेदनशील है। यहाँ डिजिटल क्रांति ने अभूतपूर्व विस्तार पाया है। करोड़ों नए उपयोगकर्ता प्रतिवर्ष ऑनलाइन आ रहे हैं। ऐसे में यदि असली और नकली के बीच का फर्क स्पष्ट न रहे तो लोकतांत्रिक विमर्श ही संदिग्ध हो जाएगा। चुनावी प्रक्रिया, सामाजिक सद्भाव, आर्थिक लेन-देन और व्यक्तिगत प्रतिष्ठा-सभी पर डीपफेक का खतरा मंडरा सकता है। इसलिए एआई जनित सामग्री पर लेबलिंग का प्रावधान केवल औपचारिकता नहीं, बल्कि सूचना साक्षरता की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है। परंतु यह भी ध्यान रखना होगा कि लेबलिंग तभी प्रभावी होगी जब आम उपयोगकर्ता डिजिटल साक्षर हो। अन्यथा वह लेबल को समझे बिना ही सामग्री साझा करता रहेगा।

आगामी ई-समिट और भारत के ‘इंडिया एआई मिशन’ के संदर्भ में यह और भी प्रासंगिक हो जाता है कि तकनीक का विकास पारदर्शिता, शुद्धता और प्रमाणिकता के मूल्यों के साथ हो। यदि भारत वैश्विक एआई नेतृत्व का दावा करना चाहता है, तो उसे नैतिक मानकों की स्थापना में भी अग्रणी भूमिका निभानी होगी। केवल स्टार्टअप्स और नवाचार की संख्या बढ़ाना पर्याप्त नहीं, यह सुनिश्चित करना भी आवश्यक है कि एआई मानव गरिमा, गोपनीयता और लोकतांत्रिक संस्थाओं का सम्मान करे। नियमन का उद्देश्य तकनीकी प्रगति को रोकना नहीं, बल्कि उसे उत्तरदायी बनाना होना चाहिए।

अंततः यह समझना होगा कि डीपफेक और एआई का संकट केवल तकनीकी नहीं, बल्कि नैतिक और सामाजिक भी है। कानून आवश्यक है, परंतु पर्याप्त नहीं। डिजिटल कंपनियों की जवाबदेही, सरकार की पारदर्शिता, न्यायपालिका की सतर्कता और नागरिकों की जागरूकता-इन सबका समन्वय ही इस चुनौती का स्थायी समाधान दे सकता है। यदि नियमन संतुलित और निष्पक्ष होगा तो वह अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को कुचलने के बजाय उसे सुरक्षित करेगा, क्योंकि स्वतंत्रता तभी सार्थक है जब वह सत्य और जिम्मेदारी के साथ जुड़ी हो। झूठ को सच में बदलने की तकनीकी क्षमता जितनी बढ़ रही है, उतनी ही दृढ़ता से सत्य की रक्षा के लिए सामूहिक संकल्प भी आवश्यक है। यही डिजिटल युग की सबसे बड़ी नैतिक परीक्षा है, और यही लोकतांत्रिक समाज की अगली कसौटी भी।

प्रेषकः


(ललित गर्ग)
लेखक, पत्रकार, स्तंभकार
ई-253, सरस्वती कंुज अपार्टमेंट
25 आई॰ पी॰ एक्सटेंशन, पटपड़गंज, दिल्ली-110092
मो. 9811051133

शब्द साधकः डॉ. सूरज सिंह नेगी

ईजा (मां) और प्रकृति से प्रेरित एक प्रशासक की साहित्यिक यात्रा

” आज चिंता का विषय यही है कि जीवन में मानवीय मूल्यों की निरंतर कमी हो रही है। मानवीय संवेदना मर चुकी है, हमारे जीवन मूल्य खोखले हो रहे हैं। बच्चे परिवार के साथ में खिलखिलाना भूल गए हैं ,वृद्धजन के साथ परिवार में बतियाने को कोई नहीं है। ऐसे नाजुक दौर में उपजी स्थिति को हमारी कलम ही दूर कर सकती है ,ऐसा लिखा जाए जो हमारी आत्मा को झिझोंड़ दें। आज आपका लिखा कब मुखर हो कर सामने आ जाएगा कह नहीं सकते। नेगी ने एक उद्बोधन के दौरान अवगत कराया कि हिंदी की प्रख्यात लेखिका ऊषा प्रियंवदा जी ने सन साठ के आस पास वृद्धजन की पीड़ा को सामने रखकर वापसी शीर्षक से एक कहानी लिखी थी ,जो आज वृद्ध विमर्श की एक महत्वपूर्ण रचना के रूप में पहचान बना चुकी है। यह कलम की ही ताकत है। लेखक के शब्द कालजई बन जाते हैं। महिला रचनाकार परिवार में आई संवाद शून्यता, राष्ट्र एवं समाज को आईना दिखाने के लिए कलम उठाएं”” ये विचार पिछले दिनों कोटा में आयोजित संभागीय महिला रचनाकार सम्मेलन में जयपुर से आए वरिष्ठ साहित्यकार सूरज सिंह नेगी ने मुख्य अतिथि पद से संबोधित करते हुए व्यक्त किए। मुझे उनके विचारों ने प्रभावित किया। समारोह में ही समय निकाल कर उनके रचनाकर्म पर उनसे साक्षात्कार लिया जिसके अंश यहाँ प्रस्तुत कर रहा हूँ।

चर्चा उनके उद्बोधन की इस बात से शुरू हुई कि आपने परिवार में आ गई संवाद शून्यता को दूर करने में लेखन की तरफ इशारा किया है, क्या आपकी कृति में इस दृष्टि से लेखन किया है ? कहने लगे आपने मेरे लेखन के मर्म को पकड़ लिया है। पिछले दिनों ही मेरा नया उपन्यास “भावेश जो कह न सका ,…” आया है। यह परिवार में संवाद शून्यता , जन्म लेते ही माता-पिता के सपनों के भार से छिनता बचपन , बच्चे मन की बात नहीं कह पाते जैसे प्रश्नों की दशा,दिशा और संभावनाओं को उजागर करता है। इसका तानाबाना कुछ इस तरह से बुना गया है कि लगता है हर घर में भावेश है। आज परिवार व्यवस्था ऐसे दोराहे पर खड़ी है जहां माँ बाप बच्चों पर अपनी इच्छाएं थोप रहे हैं, बच्चें एवं बुजुर्ग कुछ कह नहीं पा रहे हैं। कुछ बच्चें संवेदनशील मन के होते हैं जो दौड़ में चल नहीं पाते और भावुकता में ऐसा कदम उठा लेते हैं कि परिवार और समाज को नासूर बन कर दर्द दे जाते हैं। ज्यादा तो क्या कहूं बस इतना ही , उपन्यास माँ बाप और युवा किशोरों के लिए चिंतन का धरातल देता है और आँखें खोलता है, समस्या का हल भी सुझाता है, जिसे पढ़ कर ही महसूस किया जा सकता है।

लेखन की प्रेरणा कैसे मिली और कैसे लिखना शुरू किया पूछने पर वे अपने बचपन के दिनों में खो से गए और यादें ताज़ा कर कहने लगे साहब क्या दिन थे। माँ को धार्मिक पुस्तकें पढ़ते हुए देखते थे तो मैं भी पढ़ने लगा। अल्मोड़ा जिले के गांव नैकाना में पढ़ने के लिए दो तीन किलोमीटर पैदल जाना होता था। वहां की पहाड़ियां, उतार चढ़ाव वाले रास्ते, झरने, पगडंडियां , पेड़ पौधे, पक्षी, जानवर आदि नैसर्गिक सौंदर्य ने प्रभावित किया और बड़ा सुकून भी मिलता था। धार्मिक किताबों को पढ़ने और प्राकृतिक सौंदर्य से नजदीकी से ही लिखने का शोक बचपन में ही हो गया। मन में उमड़ती भावनाएं और विचार शब्दों का रूप लेने लगे। यही कोई ग्यारह साल का था जब लिखना शुरू कर दिया था। बड़े हुए स्कूल में पहुंचे तो कहानी लिखने लगे। बड़ी कक्षा में गए तो सिलसिला नाटक लिखने तक पहुंच गया। स्कूल में नाटक खेलने भी लगे। कहने लगे ऐसे ही साहित्य की विधाओं से अनुराग उत्पन्न हो गया। लेखन को अपना शोक बना लिया जो आज तक प्रशासनिक और घरेलू व्यस्ताओं के बीच भी जारी हैं।

आपने सृजन में कुछ नवाचार भी किया होगा ? यह अच्छा प्रश्न किया आपने। मैं जब टोंक जिले के पीपलू उपखण्ड में एसडीएम था तो स्कूलों के निरीक्षण पर जाया करता था। मन में विचार आया कि शिक्षक बच्चों को पढ़ा कर अपने शिक्षण दायित्व का निर्वहन करते हैं। इसके इतर शिक्षक देश के एक जिम्मेदार नागरिक भी हैं। समाज और राष्ट्र के प्रति भी उनकी अपनी सोच भी होती है। क्यों न इस चिंतन को लेखन का आधार बनाया जाए। इस विचार के आते शिक्षकों से बच्चों के नाम पाती अर्थात चिट्ठी लिखवाने का नूतन प्रयोग किया। इसकी सफलता को देखते हुए कई प्रकार की पाती लिखवाई, लोग इनमें खूब रुचि लेने लगे, लोगों को उनकी भावना और विचार प्रस्तुत करने का एक मौका मिला। जैसे-जैसे नए विषय आते गए पत्र लेखन अभियान बन गया। बाकायदा एक व्हाट्सएप समूह पाती अपनों को बनाया गया। लुप्त होती पाती लेखन विधा को पुनर्जीवित करने में डॉ नेगी के साथ उनकी पत्नी डॉ मीना सिरोला भी कंधे से कंधा मिलाकर चल रही हैं। डॉ. मीना सिरोला बनस्थली विद्यापीठ के शिक्षा संकाय में प्रोफेसर के रूप में कार्य कर रही हैं। प्राप्त पत्रों में से चयनित पत्रों का संकलन कर पुस्तकों का प्रकाशन करवाया जिससे समाज को आईना दिखाने वाले विचारों से पाठक भी रूबरू और प्रेरित हो सकें।

आप आज राजस्थान प्रशासनिक सेवा के वरिष्ठ अधिकारी हैं काम की बहुत व्यस्तताएं रहती हैं लेखन के लिए कैसे समय निकाल पाते हैं ? कहने लगे अक्सर सुना होगा हमारे पास तो काम इतना है कि सांस लेने की भी फुर्सत नहीं है। इसके विपरीत मेरी सोच है अगर कुछ करने की इच्छाशक्ति हो तो आदमी हजारों व्यस्तताओं में भी समय निकाल सकता है। प्रशासनिक व्यस्तताओं में कई काम ऐसे होते हैं जिनके बीच के समय का पूरा उपयोग अपने लेखन के लिए कर सकते हैं। व्यवस्था और कार्य प्रबंधन के साथ समय प्रबंधन भी हो तो समय की कोई कमी नहीं है।

डॉ. नेगी मुख्य रूप से गद्य में कहानी, नाटक, उपन्यास ,संस्मरण ,आलेख और पत्र लेखन आधारित सृजन करते हैं । आपने कई पुस्तकें लिखी और कई पुस्तकों का संपादन किया है । आपकी पुस्तकों का अन्य भाषाओं में अनुवाद भी हुआ है। आपके साहित्य की समाज के लिए उपयोगिता इसी से आंकी जा सकती है कि इनके साहित्य पर दो शोधार्थियों ने पीएच.डी. की उपाधि प्राप्त की हैं ,पांच विद्यार्थी लघु शोध कर चुके हैं एवं वर्तमान में 10 शोधार्थी शोध कर रहे हैं। देश के विभिन्न पत्र -पत्रिकाओं में और साझा संकलनों में रचनाएं प्रकाशित होती हैं और आकाशवाणी से प्रसारित। जयपुर दूरदर्शन से भी समय समय पर कार्यक्रम, साक्षात्कार प्रसारित होते रहे हैं।आपने डेढ़ दर्जन से अधिक पुस्तकों की समीक्षाएं की हैं और दो दर्जन से अधिक साक्षात्कार लिखे हैं। देश की विभिन्न पत्र पत्रिकाओं में तीन दर्जन से अधिक कहानी,आलेख प्रकाशित हो चुके हैं।

साहित्य सृजन :
आपके साहित्य सृजन पर दृष्टिपात करें तो स्वलिखित पुस्तकों में पापा फिर कब आओगे (कहानी संग्रह) 2016, रिश्तों की आँच ( उपन्यास )2016, वसीयत (उपन्यास) 2018, नियति चक्र (उपन्यास) 2019 , ये कैसा रिश्ता (उपन्यास) 2020, सांध्य पथिक, (उपन्यास)2022 एवं मेरी ईजा (संस्मरण) 2023 और भावेश जो कह न सका,(उपन्यास) 2025 में प्रकाशित हुई हैं।
पत्र विधा पर आधारित 15 संपादित पुस्तकें माँ की पाती बेटी के नाम 2019, पत्र पिता के 2020 , बच्चों के पत्र 2020 , एक पाती मीत को 2021, प्रकृति की पुकार 2021, शिक्षक को पत्र 2021, बापू की चिट्ठी (मेरी जुबानी ) 2020,माटी की पुकार 2022, पाती स्मृतियों के झरोखों से ,पाती डाकिए को 2023, लिख दी पाती बाबुल को 2023, गौरैया की पुकार 2024, लिख दूँ पाती यादों के गलियारे से 2024, बच्चों की पाती मतदाताओं के नाम 2024, मैं बाबुल की परछाई (बेटियों के पत्र) 2024 प्रकाशित हुई हैं। कहानी विधा पर आधारित पुस्तक सांझ के दीप 2020 में तथा अन्य संपादित पुस्तकें जीवन एक संघर्ष, 2022 एवं भविष्य की उड़ान, 2023 में प्रकाशित हुई हैं। आपकी पुस्तक रिश्तों की आंच उपन्यास का उर्दू में ,नियति चक्र उपन्यास का बगत रो फेर शीर्षक से राजस्थानी में तथा ये कैसा रिश्ता’ (उपन्यास) का ‘या केवो संबंध’ शीर्षक से गुजराती भाषा में एवं इसी उपन्यास का मराठी भाषा में भी अनुवाद किया गया है। आपकी रचनाओं को केंद्र में रखकर गुजरात और हरियाणा के लेखकों ने दो पुस्तकें भी प्रकाशित की हैं। आपकी 5 अप्रकाशित मास्टर जी (नाटक), चन्द्र शेखर आजाद(नाटक), शहीद भगतसिंह (नाटक), दुर्योधन की प्रतिज्ञा (नाटक) एवं नील कुमारी (बाल उपन्यास) पुस्तकें भी हैं।

सम्मान :
साहित्यिक सेवाओं और उत्कृष्ट लेखन के लिए आपको विभिन्न प्रतिष्ठित साहित्यिक संस्थाओं द्वारा पुरस्कृत और सम्मानित भी किया गया है। फाकिर एजाजी अवार्ड , डॉ. दुर्गालाल सोमानी पुरस्कार, मनुस्मृति सम्मान, मुंशी प्रेमचन्द हिन्दी साहित्य सम्राट पुरस्कार, उपेन्द्र नाथ अश्क पुरस्कार, चन्द्रपाल शर्मा ‘रसिक हाथरसी’ स्मृति पुरस्कार, ‘हिन्दी भाषा विभूषण सम्मान, उपन्यास वसीयत पर गेापाल राम गहमरी पुस्तक सम्मान, सावित्री बाई फुले सामाजिक समरसता पुरस्कार, जयपुर साहित्य संगीति विशेष साहित्य सम्मान,साहित्य श्री सम्मान, उपन्यास ‘ये कैसा रिश्ता’ पर आचार्य विद्यानुग स्मृति सम्मान, मां. धनपति देवी स्मृति – कथा साहित्य सम्मान, जनक दुलारी मिश्रा साहित्य भूषण सम्मान, सलीला विशिष्ट साहित्यकार सम्मान से सम्मानित किया गया। उत्कृष्ट राजकीय सेवा निर्वहन के लिए आपको वर्ष 2023 में महामहिम राज्यपाल महोदय राजस्थान द्वारा राज्य स्तर पर सम्मानित करने के साथ – साथ गणतंत्र दिवस पर दो बार जिला स्तरीय सम्मान एवं उपखण्ड स्तरीय सम्मान से सम्मानित किया गया।

परिचय :
सामाजिक कुरीतियों , विद्रूपताओं और समस्याओं के प्रति सामाजिक जागृति उत्पन्न करने वाले दूरदृष्टा साहित्यकार डॉ. सूरज सिंह नेगी का जन्म 17 दिसंबर 1967 को उत्तराखंड में अल्मोड़ा जिले के नैकाना ग्राम में पिता स्व. इन्द्र सिंह नेगी एवं माता स्व. लक्ष्मी देवी के परिवार में हुआ। आपने प्रथम श्रेणी में एम.कॉम.एवं एम.फिल. कर ‘ए क्रिटिकल अप्रेजल ऑफ इण्डस्ट्रियल डवलपमेन्ट ऑफ राजस्थान‘ विषय पर वर्ष 1994 में राजस्थान विश्वविद्यालय से डॉक्टरेट की उपाधि प्राप्त की। आपका विवाह डॉ. मीना सिरोला से हुआ ये इनके लेखन में भी पूर्ण सहयोग करती हैं और पाती अपनों को मुहिम की सह संयोजिका भी हैं। इनकी रचनाओं की न केवल प्रथम पाठिका हैं,अपितु इन्हें रचनाकर्म के दौरान सुझाव भी देती हैं। पत्र आधारित पंद्रह प्रकाशित पुस्तकों के संपादन में भी इनकी महत्वपूर्ण भूमिका है। आपके दो पुत्र तन्मय और शिवांग अध्ययनरत हैं। आप वर्तमान में जयपुर में सहकारिता एवं नागरिक उड्डयन विभाग स्वतंत्र प्रभार राज्य मंत्री के विशिष्ठ सहायक के रूप में सेवा रत हैं और लेखन कर्म में सतत् क्रियाशील हैं।

संपर्क ; 09660119122

लेखक :

डॉ.प्रभात कुमार सिंघल
डॉ. प्रभात कुमार सिंघल
लेखक एवं पत्रकार, कोटा

प्राचीन मंदिरों के पत्थरों पर लिखा गया स्वर्णिम इतिहास

खजुराहो स्थित मंदिर परिसर, वाराणसी के सूर्य मंदिर, विजयनगर में पवित्रता और राजसी सत्ता

 

 

भारत में पुरातात्विक खगोलीय स्थलों की हमारी समझ न केवल समृद्ध पुरातात्विक अभिलेखों और हजारों वर्षों पुराने ग्रंथों पर आधारित है, बल्कि अतीत से जुड़ी एक जीवंत परंपरा पर भी आधारित है। दूसरी ओर, भारत में व्यापक सांस्कृतिक विविधता और पड़ोसी क्षेत्रों के साथ अंतर्संबंधों का जटिल इतिहास है, जो इस कहानी को और भी पेचीदा बना देता है। ये ग्रंथ हमें ऐतिहासिक काल में खगोलीय स्थलों के पीछे छिपे ब्रह्मांडीय विचारों से अवगत कराते हैं और यह सर्वविदित है कि यही विचार ईसा पूर्व तीसरी सहस्राब्दी के हड़प्पा युग तक भी लागू होते हैं।

ऐतिहासिक काल में, खगोलीय वेधशालाएँ मंदिर परिसरों का हिस्सा थीं जहाँ राजा का अभिषेक किया जाता था। यह अभिषेक राजा को चुने हुए देवता का सर्वोत्कृष्ट भक्त होने की पुष्टि करता था, जिन्हें समय और ब्रह्मांड का साक्षात स्वरूप माना जाता था। उदाहरण के लिए, मध्य भारत में विदिशा से कुछ किलोमीटर दूर स्थित उदयगिरि, गुप्त वंश (320-500 ईस्वी) के शास्त्रीय युग से जुड़ा एक खगोलीय स्थल है। गुप्त साम्राज्य ने इस प्राचीन पहाड़ी वेधशाला स्थल का विस्तार किया, जो कम से कम दूसरी शताब्दी ईसा पूर्व से मौजूद थी और जहाँ पहाड़ी की भौगोलिक विशेषताओं के कारण अवलोकन सुगम होते थे। उन्होंने इसे शाही सत्ता का प्रतीक बनाने के लिए एक पवित्र स्थल में परिवर्तित किया।

भारतीय खगोल विज्ञान में क्रमिक रूप से लंबी अवधियों के युगों की अवधारणा प्रमुख है, जो स्वयं स्थान, पैमाने और समय में प्रतिरूपों की पुनरावृत्ति के व्यापक सामान्य विचार का एक उदाहरण है। इसका एक उदाहरण क्रांतिवृत्त का 27 नक्षत्रों में विभाजन है , जिनके साथ चंद्रमा अपने मासिक चक्र में जुड़ा होता है; इनमें से प्रत्येक नक्षत्र को आगे 27 उप-नक्षत्रों में विभाजित किया गया है , और दिन को 30 इकाइयों के छोटे मापों में विभाजित किया गया है। पुनरावृत्ति का विचार पवित्र भूदृश्य की अवधारणा का आधार है और यह भारतीय कला में सन्निहित है, जो पवित्र और स्मारकीय वास्तुकला पर एक पुरातात्विक खगोलीय परिप्रेक्ष्य प्रदान करता है।

 

कालानुक्रमिक अवलोकन

भारत के उत्तर-पश्चिम में पुरातात्विक अभिलेख मेहरगढ़ में लगभग 7500 ईसा पूर्व तक फैली परंपरा की निरंतरता को दर्शाते हैं, और इस क्षेत्र की प्रचुर मात्रा में मौजूद शैल कला का कुछ भाग ऊपरी पुरापाषाण काल तक का हो सकता है।

सिंधु-सरस्वती परंपरा के पुरातात्विक चरणों को चार युगों में विभाजित किया गया है: प्रारंभिक खाद्य उत्पादन युग (लगभग 6500-5000 ईसा पूर्व), क्षेत्रीयकरण युग (5000-2600 ईसा पूर्व), एकीकरण युग (2600-1900 ईसा पूर्व) और स्थानीयकरण युग (1900-1300 ईसा पूर्व)। प्रारंभिक खाद्य उत्पादन युग में जटिल मिट्टी के बर्तनों की तकनीक का अभाव था। क्षेत्रीयकरण युग में मिट्टी के बर्तनों, रत्न कला, चमकीले मिट्टी के बर्तनों और मुहर बनाने की शैलियाँ विभिन्न क्षेत्रों में भिन्न थीं। एकीकरण युग में, एक बड़े भौगोलिक क्षेत्र में भौतिक संस्कृति में महत्वपूर्ण एकरूपता पाई जाती है और तथाकथित सिंधु लिपि का उपयोग होता है, जिसे अभी तक समझा नहीं जा सका है। स्थानीयकरण युग में, एकीकरण युग के पैटर्न क्षेत्रीय मिट्टी के बर्तनों की शैलियों के साथ मिश्रित हैं, जो विकेंद्रीकरण और अंतःक्रिया के नेटवर्क के पुनर्गठन को दर्शाते हैं।

तीसरी सहस्राब्दी ईसा पूर्व में सांस्कृतिक पच्चीकारी को उत्तर-पश्चिम भारत की हड़प्पा सभ्यता, मध्य और उत्तरी भारत की तांबे और तांबे-कांस्य युग की संस्कृतियों और दक्षिण और पूर्वी भारत की नवपाषाण संस्कृतियों के एकीकरण की विशेषता है। एकीकरण चरण के पांच बड़े शहर मोहनजो-दारो, हड़प्पा, गनवेरीवाला, राखीगढ़ी और धोलावीरा हैं। इस काल के अन्य महत्वपूर्ण स्थल कालीबंगन, रहमान ढेरी नौशारो, कोट दीजी और लोथल हैं।

हड़प्पा काल के अधिकांश शहर और बस्तियाँ सरस्वती घाटी क्षेत्र में स्थित थीं। जलवैज्ञानिक परिवर्तनों, लंबे समय तक सूखे और 1900 ईसा पूर्व में आए भूकंप के बाद सरस्वती नदी के सूखने के कारण इस क्षेत्र के बड़े हिस्से को छोड़ दिया गया, और दूसरी सहस्राब्दी ईसा पूर्व के दौरान हड़प्पा युग में कई चरणों में गिरावट आई। लगभग 900 ईसा पूर्व गंगा और यमुना घाटियों में दूसरा शहरीकरण शुरू हुआ। इस संस्कृति के सबसे पुराने जीवित अभिलेख ब्राह्मी लिपि में मिलते हैं। विशिष्ट मिट्टी के बर्तनों के संग्रह में देखे जा सकने वाले सांस्कृतिक विकास की एक निरंतर श्रृंखला भारत के दो प्रारंभिक शहरीकरणों को जोड़ती है। हड़प्पा काल और बाद के ऐतिहासिक काल के बीच वजन और लंबाई की प्रणाली में भी निरंतरता पाई जाती है।

भारत के सबसे प्राचीन साहित्यिक ग्रंथ ऋग्वेद के भजनों का मुख्य परिवेश सप्त सैंधव क्षेत्र है, जो उत्तर भारत का वह क्षेत्र है जो सिंध और गंगा नदियों से घिरा है। ऋग्वेद में सरस्वती नदी को सबसे महान नदी बताया गया है, जो पहाड़ों से समुद्र की ओर बहती है। पुरातात्विक साक्ष्य बताते हैं कि यह नदी 1900 ईसा पूर्व तक सूख चुकी थी, जिससे संकेत मिलता है कि ऋग्वेद इस युग से पहले का है। ऋग्वेद और अन्य प्रारंभिक वैदिक साहित्य में खगोलीय संदर्भ मिलते हैं जो चौथी और तीसरी सहस्राब्दी ईसा पूर्व के युगों की ओर इशारा करते हैं, जो जलवैज्ञानिक साक्ष्यों से मेल खाता है।

वैदिक ब्रह्मांड विज्ञान का आधार बंधु (बाह्य और आंतरिक के बीच समरूपता या बंधन) की अवधारणा है । उदाहरण के लिए, वेदों से संबंधित चिकित्सा प्रणाली आयुर्वेद में, वर्ष के 360 दिनों को विकासशील भ्रूण की 360 हड्डियों से जोड़ा गया था।

वैदिक ग्रंथों में मौजूद कुछ खगोलीय जानकारियों के आधार पर इनकी अनुमानित तिथि का पता लगाया जा सकता है। कई वेदों में 27 नक्षत्रों की सूचियाँ हैं, जो या तो सीधे तौर पर सूचीबद्ध हैं या उनके अधिष्ठाता देवताओं के अंतर्गत दी गई हैं, और इससे यह निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि उनके नाम अपरिवर्तित रहे हैं। बारह ‘सौर माह’ भी सूचीबद्ध हैं, जिससे यह संकेत मिलता है कि वैदिक खगोल विज्ञान में चंद्र-सौर पंचांग का उपयोग किया जाता था, जिसमें सौर वर्ष के साथ तालमेल बनाए रखने के लिए एक अतिरिक्त माह का प्रयोग होता था। नक्षत्र खंड और ‘सौर माह’ के बीच सहसंबंध तिथि को निर्धारित करने में सहायक होते हैं। इस प्रकार, उत्तर वैदिक काल की नक्षत्र सूचियाँ कृत्तिका (प्लीएड्स) से शुरू होती हैं, जबकि 200 ईस्वी के बाद के खगोल विज्ञान ग्रंथों की सूचियाँ अश्विनी (α और β एरिएटिस) से शुरू होती हैं, जो 2 नक्षत्रों के संक्रमण, या लगभग 2000 वर्षों की समयावधि को दर्शाती हैं। उदाहरण के लिए, वेदांग ज्योतिष में उल्लेख है कि शीतकालीन संक्रांति श्रावष्टि के प्रारंभ में और ग्रीष्मकालीन संक्रांति आश्लेषा के मध्य में होती थी, जिसका अर्थ है कि यह विशेष ग्रंथ 1300 ईसा पूर्व का है।

वैदिक और उसके बाद के कालखंडों के ग्रंथ पूरे भारत में उस ऐतिहासिक काल के खगोल विज्ञान की महत्वपूर्ण समझ प्रदान करते हैं। पुरातात्विक खगोलीय साक्ष्य इस समझ को पूरक और मजबूत बनाते हैं।

वास्तु शास्त्र , जो वास्तुकला की पारंपरिक हिंदू प्रणाली है, के अनुसार , किसी भवन की संरचना माप की प्रक्रिया के माध्यम से आदिम अराजकता से ब्रह्मांडीय व्यवस्था के उद्भव को दर्शाती है। ब्रह्मांड को प्रतीकात्मक रूप से एक वर्ग, वास्तु-मंडल पर चित्रित किया जाता है , जो चारों मुख्य दिशाओं पर बल देता है। इस वर्ग के मूल आकार का उपयोग घर और शहर की मूल योजना के रूप में किया जाता है। इस योजना के और भी विस्तृत रूप मौजूद हैं, जिनमें से कुछ आयताकार हैं।

मध्ययुग तीर्थयात्रा केंद्रों की विशेषता थी जिन्होंने ब्रह्मांड की अवधारणाओं को प्रतिबिंबित करने वाले पवित्र स्थान बनाए। लंबे समय तक, पवित्र मंदिर वास्तुकला ने धार्मिक और राजनीतिक दोनों उद्देश्यों की पूर्ति की।

भारतीय खगोल विज्ञान में प्रयुक्त यंत्रों में घटी यंत्र , शंकु , यष्टि यंत्र, गोला यंत्र , सूर्य की ऊँचाई से समय निर्धारित करने वाला यंत्र, कपाल यंत्र और खगोलीय प्रयोगशाला शामिल हैं। यंत्र निर्माण की भारतीय परंपरा का चरमोत्कर्ष 1724 और 1734 के बीच हुआ, जब जयपुर के शासक महाराजा सवाई जय सिंह द्वितीय ने जयपुर , दिल्ली , उज्जैन, वाराणसी और मथुरा में जंतर-मंतर नामक पाँच वेधशालाओं का निर्माण कराया। प्रत्येक वेधशाला में कई बड़े स्थिर यंत्र थे, और मथुरा को छोड़कर, बाकी सभी वेधशालाएँ अपने यंत्रों के साथ काफी अच्छी स्थिति में संरक्षित हैं। इन यंत्रों में राम यंत्र (सूर्य की ऊँचाई मापने के लिए ऊपर से खुला और बीच में एक स्तंभ वाला बेलनाकार ढांचा), राशिवालय यंत्र (आकाशीय अक्षांश और देशांतर निर्धारित करने के लिए बारह यंत्रों का समूह), जय प्रकाश (अवतल गोलार्ध), लघु सम्राट यंत्र (छोटा सूर्यघड़ी), सम्राट यंत्र (विशाल विषुवतीय घड़ी), चक्र यंत्र (किसी ग्रह का सही आरोहण और अवतलन ज्ञात करने के लिए सीधे धातु के वृत्त), दिगंश यंत्र (दो वृत्ताकार दीवारों से घिरा एक स्तंभ), कपालि यंत्र (ग्रहों और राशिचक्र के सापेक्ष सूर्य की स्थिति निर्धारित करने के लिए दो धँसे हुए गोलार्ध), और नरिवलय यंत्र (बेलनाकार घड़ी) शामिल हैं।

जय सिंह द्वितीय की रचनाएँ इसलिए इतनी महत्वपूर्ण हैं क्योंकि इनमें एक दीर्घकालिक इस्लामी-फ़ारसी परंपरा का स्थानीय परंपराओं और व्यक्तिगत नवाचारों के साथ समामेलन हुआ है। यह परंपरा कम से कम 13वीं शताब्दी के मध्य में मराघा वेधशाला से शुरू होकर 15वीं शताब्दी के मध्य में समरकंद वेधशाला तक पहुँची ( इस्लामी खगोल विज्ञान देखें )। हालाँकि जय सिंह द्वितीय 1727 में जेसुइट विद्वानों के एक समूह के साथ अपने संबंधों के माध्यम से समकालीन यूरोपीय खगोलीय ज्ञान से परिचित हुए—वे उनके दरबार में एक पुर्तगाली खगोलशास्त्री और ला हायर की खगोलीय सारणियाँ लेकर आए थे—फिर भी उनकी वेधशालाओं की अंतिम रचनाएँ विशाल उपकरणों और नग्न नेत्र अवलोकन की इस्लामी-फ़ारसी परंपरा पर ही आधारित रहीं। जंतर-मंतर वेधशालाओं ने, जो अवलोकन स्थलों का एक विशाल नेटवर्क बनाती हैं, शास्त्रीय खगोल विज्ञान की अंतिम व्यापक खगोलीय सारणियों में से एक, ज़िज-ए-मुहम्मद शाह के निर्माण में सहायक भूमिका निभाई।

 

प्रागैतिहासिक और हड़प्पा काल

मोहनजो-दारो शहर (2500 ईसा पूर्व) एक सांस्कृतिक और प्रशासनिक केंद्र था, जिसकी नींव 400 मीटर × 200 मीटर के 12 मीटर ऊंचे चबूतरे पर रखी गई थी। निचले शहर में सड़कें मुख्य दिशाओं के अनुसार बनी थीं और उनमें ढकी हुई नालियों का जाल बिछा हुआ था। घरों में स्नानघर थे। शहर के कुएँ नुकीली ईंटों से इतने सुदृढ़ रूप से निर्मित थे कि वे 5000 वर्षों में भी नहीं ढहे हैं। महलों और मंदिरों जैसी भव्य इमारतों की अनुपस्थिति हड़प्पा शहर को मेसोपोटामिया और मिस्र के अन्य शहरों से बिल्कुल अलग बनाती है, जिससे पता चलता है कि हड़प्पा राज्य की शासन व्यवस्था विकेंद्रीकृत थी और राजनीतिक, व्यापारिक और धार्मिक अभिजात वर्ग के बीच संतुलन पर आधारित थी।

मोहनजो-दारो और अन्य स्थलों पर अक्षों का मुख्य दिशाओं से 1 से 2 डिग्री दक्षिणावर्त हल्का विचलन दिखाई देता है। ऐसा माना जाता है कि यह विचलन वसंत विषुव के समय 3000 ईसा पूर्व और 2000 ईसा पूर्व के बीच पूर्व में उदय होने वाले अल्देबारन ( संस्कृत में रोहिन ) और प्लीएड्स ( संस्कृत में कृतिका ) के अभिविन्यास के कारण हो सकता है; ‘रोहिन’ शब्द का शाब्दिक अर्थ उदय होना है। मोहनजो-दारो के खगोल विज्ञान में चंद्रमा और सूर्य दोनों की गतियों का उपयोग किया जाता था। इसका प्रमाण वलय के आकार के बड़े-बड़े कैलेंडर पत्थरों के उपयोग से मिलता है, जिनका उपयोग सौर वर्ष के आरंभ और अंत को चिह्नित करने के लिए किया जाता था।

रहमान धेरी से मिली तीसरी सहस्राब्दी की एक मुहर , जिसके एक तरफ बिच्छुओं का जोड़ा और दूसरी तरफ दो हिरण बने हैं, वैदिक विषयों के ज्ञान का संकेत देती है। ऐसा माना जाता है कि यह मुहर ओरियन (मृगशिरा, या हिरण का सिर) और वृश्चिक (दक्षिणी गोलार्ध की रोहिणी) नक्षत्रों के विरोध को दर्शाती है। एक हिरण के सिर के पास बना तीर ओरियन के सिर कलम किए जाने का प्रतीक हो सकता है। यह आम तौर पर माना जाता है कि रुद्र द्वारा प्रजापति के वध की कथा वर्ष के आरंभ को ओरियन से दूर स्थानांतरित करने का प्रतीक है और यह खगोलीय घटना को चौथी सहस्राब्दी ईसा पूर्व में स्थापित करती है।

 

नवपाषाण और महापाषाण स्थल

बुरज़ाहोम, कश्मीर

यह नवपाषाणकालीन स्थल श्रीनगर से लगभग 10 किलोमीटर उत्तर-पूर्व में कश्मीर घाटी में, उत्तर प्लीस्टोसीन-होलोसीन काल की परतों के चबूतरे पर स्थित है। लगभग 3000-1500 ईसा पूर्व के इस स्थल पर बनी गहरी गड्ढों वाली बस्तियों से पत्थर की कुल्हाड़ियाँ, हड्डियों के औजार और धूसर रंग के चमकीले मिट्टी के बर्तन मिले हैं। 2125 ईसा पूर्व के एक चरण से प्राप्त 48 सेमी × 27 सेमी की एक पत्थर की पटिया पर आकाश में दो चमकीली वस्तुएँ दिखाई देती हैं, जिनके अग्रभाग में शिकार का दृश्य है। इन्हें दोहरे तारामंडल का चित्रण माना जाता है।

हनमसागर, कर्नाटक

यह एक महापाषाण स्थल है जहाँ पत्थरों की पंक्तियाँ मुख्य दिशाओं की ओर इंगित करती हैं। यह कृष्णा नदी से लगभग 6 किमी उत्तर में पहाड़ियों के बीच एक समतल क्षेत्र में स्थित है, जिसका अक्षांश 16° 19′ 18″ और देशांतर 76° 27′ 10″ है। चिकने ग्रेनाइट के ये पत्थर लगभग 600 मीटर भुजा वाले एक वर्ग में 50 पंक्तियों और 50 स्तंभों (कुल 2500 पत्थर) के साथ व्यवस्थित हैं, और पत्थरों के बीच की दूरी लगभग 12 मीटर है। पत्थरों की ऊँचाई 1 से 2.5 मीटर के बीच है और अधिकतम व्यास 2-3 मीटर है। पंक्तियाँ मुख्य दिशाओं की ओर उन्मुख हैं। यहाँ एक लगभग वर्गाकार केंद्रीय संरचना है जिसे चक्री कट्टी के नाम से जाना जाता है ।

यह तर्क दिया गया है कि ग्रीष्म और शीत संक्रांति की दिशाएँ बाहरी और भीतरी वर्गों के संबंध में निर्धारित की जा सकती थीं। इस स्थल का उपयोग कई अन्य प्रकार के खगोलीय प्रेक्षणों के लिए भी किया जा सकता था, जैसे कि दिन का समय बताने के लिए छाया का उपयोग करना, और महीनों, ऋतुओं और वर्ष के बीतने की भविष्यवाणी करना।

 

मंदिर की योजना

वैदिक अनुष्ठानों का पवित्र स्थल मंदिर का पूर्ववर्ती है। वैदिक अनुष्ठान सूर्य और चंद्रमा की परिक्रमाओं से जुड़े थे। वेदी अनुष्ठान पूर्व-पश्चिम अक्ष से संबंधित था और इसकी उत्पत्ति उन पुरोहितों से मानी जा सकती है जो संक्रांति और विषुव के अनुसार दिनों की गणना करते थे। विशिष्ट दिनों को अनुष्ठानिक अनुष्ठानों द्वारा चिह्नित किया जाता था जो दिन के अलग-अलग समय पर किए जाते थे।

घर में अनुष्ठानिक उद्देश्यों के लिए, गृहस्थ तीन वेदियों का उपयोग करता था: वृत्ताकार (पृथ्वी), अर्धचंद्राकार (वायुमंडल) और वर्गाकार (आकाश), जो ब्रह्मांडीय पुरुष ( पुरुष ) के सिर, हृदय और शरीर के समान होती हैं। अग्निचयन, वैदिक काल का महान अनुष्ठान, जो यजुर्वेद के वृत्तांत का एक प्रमुख भाग है, में पूर्व दिशा में एक भव्य समारोह में वायुमंडल और आकाश की वेदियों का नए सिरे से निर्माण किया जाता है। यह अनुष्ठान ब्रह्मांड के वैदिक विभाजन पर आधारित है, जिसमें पृथ्वी, वायुमंडल और आकाश को तीन भागों में विभाजित किया गया है, जिन्हें क्रमशः 21, 78 और 261 संख्याएँ दी गई हैं। संख्यात्मक मानचित्रण को पृथ्वी वेदी के चारों ओर 21 कंकड़, 6 मध्यवर्ती (13 × 6 = 78) वेदियों में से प्रत्येक के चारों ओर 13 कंकड़ों के समूह और उत्तरवेदी नामक महान नई आकाश वेदी के चारों ओर 261 कंकड़ों की व्यवस्था द्वारा बनाए रखा जाता है, जिसका निर्माण बाज के आकार में किया जाता है। इन संख्याओं का योग 360 होता है, जो वर्ष का प्रतीकात्मक प्रतिनिधित्व है।

 

मंदिर की योजना

खजुराहो शहर मध्य प्रदेश के छतरपुर जिले में 79° 54′ 30″ और 79° 56′ 30″ पूर्व तथा 24° 50′ 20″ और 24° 51′ 40″ उत्तर अक्षांशों के बीच स्थित है। खजुराहो के मंदिरों का निर्माण चंदेल राजाओं द्वारा 9वीं से 12वीं शताब्दी ईस्वी के बीच करवाया गया था। मूल रूप से यहाँ 84 मंदिर थे, जिनमें से 23 आज भी मौजूद हैं। इन बचे हुए मंदिरों में से 6 शिव से, 8 विष्णु से और 5 देवी से संबंधित हैं।

मंदिर परिसर के पूर्वी छोर पर दंतला पहाड़ियाँ हैं, जिनकी 390 मीटर ऊँची चोटी पर शिव का एक मंदिर स्थित है, जो मंदिर के प्रवेश द्वारों के लिए एक संदर्भ बिंदु है। चतुर्भुजा मंदिर को छोड़कर सभी मंदिर पूर्व दिशा की ओर मुख किए हुए हैं। दक्षिण-पूर्वी छोर पर लावण्या पहाड़ी है, जो पूर्व की ओर बहने वाली खुदार नदी द्वारा दंतला पहाड़ियों से अलग होती है। लावण्या पहाड़ी की तलहटी में 244 मीटर की ऊँचाई पर महिषासुरमर्दिनी के रूप में देवी दुर्गा का मंदिर स्थित है।

दंतला और लावण्या पहाड़ियों पर स्थित शिव और दुर्गा के मंदिर, पुरुष और प्रकृति के ध्रुवों को दर्शाते हैं , जिन्हें पहाड़ियों के बीच बहने वाली नदी जोड़ती है। खजुराहो के मंदिर वसंत ऋतु के दो त्योहारों के दौरान लोकप्रिय तीर्थस्थल हैं: फाल्गुन (फरवरी/मार्च) की अमावस्या को पड़ने वाली शिवरात्रि और चैत्र (मार्च/अप्रैल) की पूर्णिमा को पड़ने वाली होली। परिसर के सबसे पुराने मंदिरों में से एक लक्ष्मण मंदिर को इस स्थल का केंद्र माना जाता है । इसका निर्माण राजा यशोवर्मन (925-950) ने प्रतिहारों पर चंदेल विजय के प्रतीक और उनकी सर्वोच्च शक्ति के प्रमाण के रूप में करवाया था। होली के दिन यह मंदिर सूर्योदय की दिशा में उन्मुख होता है।

मंदिरों के ये समूह तीन परस्पर जुड़े मंडलों का निर्माण करते हैं, जिनके केंद्र लक्ष्मण (विष्णु), जावेरी (शिव) और दुलदेव (शिव) मंदिर हैं। ऐसा माना जाता है कि इनकी वास्तविक दिशा से विचलन, अभिषेक के दिन सूर्योदय की दिशा के कारण होता है। यह मंदिर, ब्रह्मांड और उसकी व्यवस्था के प्रतीक के रूप में, असुरों (राक्षसों) और देवताओं (देवताओं) के बीच संतुलन स्थापित करता है, साथ ही अस्तित्व के अन्य ध्रुवों को भी अपने भीतर समाहित करता है। गर्भगृह की अवधारणा एक मंडल के रूप में है।

ग्रहीय देवता मंदिर को घेरे हुए हैं। मंदिर की कल्पना मेरु पर्वत के समान की गई है, जो ब्रह्मांड का अक्ष है, और ग्रह इसके चारों ओर घूमते हैं।

 

उदयगिरि वेधशाला

उदयगिरि (‘सूर्योदय की पहाड़ी’) भारत की प्रमुख प्राचीन खगोलीय वेधशालाओं में से एक है। यह मध्य प्रदेश में कर्क रेखा पर 23° 31′ उत्तरी अक्षांश पर, भोपाल से लगभग 50 किमी दूर, विदिशा, बेसनगर और सांची के निकट स्थित है। यह प्राचीन स्थल कम से कम दूसरी शताब्दी ईसा पूर्व का है, जिसका गुप्त सम्राट चंद्रगुप्त द्वितीय विक्रमादित्य (शासनकाल 375-414) के शासनकाल में काफी विस्तार किया गया था। यह स्थल चट्टानों को काटकर बनाए गए 20 गुफा मंदिरों से जुड़ा है; इनमें से 19 मंदिर चंद्रगुप्त के शासनकाल के हैं।

चित्र 1. उदयगिरि का लेआउट। आर. बालासुब्रमण्यम, करंट साइंस 95 (2008), 766-770 के अनुसार।

ऐसा प्रतीत होता है कि उदयगिरि का प्राचीन नाम विष्णुपादगिरि था, जिसका अर्थ है ‘विष्णु के पदचिह्नों की पहाड़ी’, और उदयगिरि नाम परमार शासक उदयदित्य (लगभग 1070-1093) के नाम पर रखा गया है। यह पहाड़ी पैर के आकार की है। उत्तरी और दक्षिणी पहाड़ियों को जोड़ने वाला एक संकरा मार्ग है, और उत्तरी पहाड़ी के संकरे मार्ग से मिलने वाले स्थान पर एक मार्ग स्थित है। उदयगिरि में गुप्त काल के दौरान किए गए निर्माण और अलंकरण इसी मार्ग के आसपास केंद्रित थे। अधिकांश गुफा मंदिर इसी मार्ग के आसपास स्थित हैं।

ग्रीष्म संक्रांति के दिन, सूर्य की गति मार्ग के साथ संरेखित थी। गुफा 6 में स्थित चंद्रगुप्त द्वितीय विक्रमादित्य काल के शिलालेख में उल्लिखित यह दिन, 402 ईस्वी की ग्रीष्म संक्रांति के बहुत निकट माना जाता है। इस दिन, दिल्ली के लौह स्तंभ की छाया, जो मूल रूप से मार्ग के प्रवेश द्वार पर स्थित था, लेटे हुए विष्णु के चित्र की दिशा में पड़ी।

उत्तरी पहाड़ी की चोटी पर एक समतल चबूतरा है, जहाँ से आकाश का भव्य दृश्य दिखाई देता है। इस चबूतरे पर कई खगोलीय चिह्न पाए गए हैं, जो यह दर्शाते हैं कि यह प्राचीन खगोलीय वेधशाला का स्थल था।

 

मध्यकालीन तीर्थ परिसर

मध्यकालीन तीर्थ केंद्रों ने व्यापार और व्यवसाय सहित कई कार्यों की पूर्ति की। ये केंद्र ज्योतिषियों के लिए महत्वपूर्ण थे , जो तीर्थयात्रियों की कुंडली बनाते और पढ़ते थे। कुशल ज्योतिषी खगोल विज्ञान में भी रुचि रखते थे और यह ज्ञान मंदिरों और महलों के संरेखण के लिए आवश्यक था।

भारत के प्रत्येक क्षेत्र में महत्वपूर्ण तीर्थस्थल हैं, जिनमें से कुछ क्षेत्रीय हैं और कुछ अखिल भारतीय। अखिल भारतीय तीर्थस्थलों में सबसे प्रसिद्ध शिव (वाराणसी), कृष्ण (मथुरा, द्वारका), राम (अयोध्या), विष्णु (तिरुपति) और प्रयाग, हरिद्वार, उज्जैन और नासिक में हर बारह वर्षों में आयोजित होने वाले कुंभ मेले से संबंधित हैं। चित्रकूट, गया, मदुरै, वाराणसी, विंध्याचल और खजुराहो जैसे तीर्थस्थलों पर विद्वानों ने प्रमुख त्योहारों के दौरान मंदिरों के दिशा-निर्देश या सूर्य की दिशा के अनुरूप होने के प्रश्न का अध्ययन किया है।

 

मध्यकालीन तीर्थ परिसर

वाराणसी ईसा पूर्व पहली सहस्राब्दी के प्रारंभ से अस्तित्व में आया एक प्राचीन शहर है, जिसका वैदिक नाम काशी (संस्कृत में ‘तेज’) है, जो आज भी बनारस के साथ प्रयुक्त होता है। इसके अनेक मंदिरों में सबसे महत्वपूर्ण काशी विश्वनाथ मंदिर है, जिसे ‘स्वर्ण मंदिर’ भी कहा जाता है, जो शहर के अधिष्ठाता देवता भगवान शिव को समर्पित है। सुल्तानों और बाद में औरंगजेब द्वारा बार-बार किए गए विनाश के कारण, वर्तमान विश्वनाथ मंदिर अपेक्षाकृत आधुनिक इमारत है। इसका निर्माण 1777 में इंदौर की महारानी अहिल्याबाई द्वारा करवाया गया था, और इसके शिखर और छतों पर 1839 में सोने की परत चढ़ाई गई थी, जो महाराजा रणजीत सिंह का उपहार था।

शिव ब्रह्मांड के केंद्र बिंदु के साथ-साथ व्यक्ति के अंतर्मन के केंद्र बिंदु का भी प्रतिनिधित्व करते हैं। वाराणसी में मनाए जाने वाले प्रमुख त्योहारों में से एक शिवरात्रि है, जो फाल्गुन महीने (फरवरी-मार्च) के कृष्ण पक्ष के तेरहवें दिन मनाया जाता है। उस दिन, सूर्य पूर्व दिशा में उदय होता हुआ दिखाई देता है और उसके ठीक ऊपर अमावस्या होती है, जिसे प्रतिमा में शिव (सूर्य के रूप में) द्वारा सिर पर चंद्रमा धारण किए हुए दर्शाया गया है।

वाराणसी में परिक्रमा करने के लिए कई तीर्थयात्रा मार्ग हैं। पंचक्रोशी मार्ग में 108 मंदिर हैं, और चार आंतरिक मार्गों में कुल 324 मंदिर हैं। यह शहर आदित्य मंदिरों के मार्ग के लिए भी प्रसिद्ध है। आदित्य 7 या 8 दिव्य देवता हैं, हालांकि बाद के ग्रंथों में उनकी संख्या 12 बताई गई है। पुराणों के अनुसार, उन्हें बारह सौर महीनों के देवता माना जाता है। मुस्लिम शासन के दौरान आदित्य मंदिरों को ध्वस्त कर दिया गया था, लेकिन उन्हें उन्हीं स्थानों पर पुनः स्थापित किया गया है और अब वे सक्रिय धार्मिक स्थलों का हिस्सा हैं।

काशी खंड और तीर्थयात्रा मार्गदर्शिकाओं में दिए गए विवरणों की सहायता से कई आदित्य मंदिरों का पता लगाया गया है (सिंह और मालविल, 1995; सिंह, 2009a और 2009b)। इनमें से छह मंदिर 2.5 किमी के आधार वाले एक समद्विबाहु त्रिभुज की एक भुजा पर स्थित हैं। यह त्रिभुज मध्यमेश्वर मंदिर को घेरे हुए है, जो मूल रूप से काशी का केंद्र था। त्रिभुज के साथ चलने वाले तीर्थयात्री प्रतीकात्मक रूप से ब्रह्मांड की परिक्रमा कर रहे होते हैं।

 

पवित्र नगर

भारतीय उपमहाद्वीप में अनेक पवित्र नगर हैं, जिनका निर्माण या तो किसी पूर्व निर्धारित योजना के अनुसार हुआ था या फिर किसी विशिष्ट दिव्य देवता से संबंध होने के कारण उनका विकास स्वाभाविक रूप से हुआ। इनमें से कुछ महत्वपूर्ण पवित्र नगर वाराणसी, विजयनगर, अयोध्या, मथुरा, भक्तपुर, तिरुपति, कांचीपुरम, द्वारका और उज्जैन हैं।

रॉबर्ट लेवी ने भारतीय पवित्र नगर को एक संरचित ‘मेसोकोस्म’ के रूप में देखा, जो व्यक्ति के सूक्ष्म जगत और सांस्कृतिक रूप से परिकल्पित व्यापक ब्रह्मांड के वृहद जगत के बीच स्थित है। ऐसा नगर स्थानिक रूप से जुड़े मंडलों से निर्मित होता है, जिनमें से प्रत्येक अपनी संस्कृति और प्रदर्शन द्वारा पोषित होता है। उत्सव वर्ष की गतिविधियाँ और जीवन के महत्वपूर्ण पड़ावों से संबंधित अनुष्ठान एक ‘नागरिक नृत्य’ का निर्माण करते हैं, जो इसके नागरिकों के अनुभव को परिभाषित करता है।

जीवन चक्र से जुड़े अनुष्ठान और देवताओं को समर्पित त्यौहार गृहस्थों के नैतिक मूल्यों, पहचान और रिश्तों को सुदृढ़ करते हैं। लेकिन कुछ अन्य देवता भी हैं, जिन्हें सामान्यतः देवियों द्वारा दर्शाया जाता है, जो नैतिक व्यवस्था से परे प्रकृति की शक्तियों की ओर इशारा करती हैं। इन्हें तांत्रिक प्रार्थनाओं और अनैतिक अनुष्ठानों के माध्यम से व्यापक व्यवस्था में शामिल किया जाता है। देवी का आह्वान करने वाले अनुष्ठान राजा और व्यापारियों की जिम्मेदारी होती है।

 

पवित्र नगर

विजयनगर (जिसे हम्पी के नाम से भी जाना जाता है) की स्थापना 14वीं शताब्दी में हुई थी और 1565 में इसे लूटा गया था। विजयनगर से जुड़े सबसे प्रसिद्ध राजाओं में हरिहर प्रथम और द्वितीय, बुक्का राय प्रथम (लगभग 1336-1404), और कृष्णदेवराय और उनके सौतेले भाई अच्युतदेवराय (1509-1542) शामिल हैं। 14वीं शताब्दी के मध्य से 1565 तक, यह शहर विजयनगर साम्राज्य की राजधानी था। फारसी राजदूत अब्दुर रजाक (1442) के अनुसार: ‘विजयनगर शहर ऐसा है कि आँख की पुतली ने कभी ऐसा स्थान नहीं देखा, और बुद्धि के कान ने कभी यह नहीं सुना कि दुनिया में इसके समान कोई और स्थान है।’

हम्पी सदियों से एक महत्वपूर्ण तीर्थस्थल रहा है, क्योंकि इसका पौराणिक संबंध नदी देवी पम्पा और उनके पति विरुपाक्ष या पम्पापति से है। सन् 1163 के एक शिलालेख में कलाचुरी राजा बिज्जल द्वारा हम्पी के भगवान विरुपाक्ष को महादान (धार्मिक अर्पण) अर्पित करने का उल्लेख है। यह क्षेत्र 1326 तक कामपिलदेव साम्राज्य का हिस्सा था, जब मोहम्मद बिन तुगलक की सेनाओं ने राजा को पराजित किया और संगम वंश के दो पुत्रों, हुक्का और बुक्का को बंदी बना लिया। कुछ वर्षों बाद, सुल्तान ने दोनों को प्रांत का राज्यपाल नियुक्त किया। 1336 में उन्होंने तुगलक वंश से अलग होकर विजयनगर को राजधानी बनाकर संगम वंश की स्थापना की।

1565 में विजयनगर का विनाश पूर्ण और क्रूर था: कुछ ही दिनों में एक भव्य और समृद्ध शहर खंडहर में तब्दील हो गया, उसकी आबादी का नरसंहार कर दिया गया।

हम्पी का रामायण से गहरा संबंध है और इस क्षेत्र के कई स्थलों के नाम महाकाव्य में वर्णित नामों से मिलते जुलते हैं। इनमें ऋषिमुख, माल्यवंता पहाड़ी और मतंगा पहाड़ी के साथ-साथ वह गुफा भी शामिल है जहां कहा जाता है कि सुग्रीव ने सीता के रत्न रखे थे। अनेगुंडी स्थल का संबंध वाली के पुत्र अंगद के राज्य से है। अनेगुंडी के पश्चिम में स्थित अंजनेय पर्वत को हनुमान का जन्मस्थान माना जाता है।

प्रत्येक वर्ष, चैत्र (मार्च-अप्रैल) के महीने में, हम्पी और भगवान विरुपाक्ष (या शिव) के विवाह का पुनर्मंचन किया जाता है, जिसमें विरुपाक्ष मंदिर के पुजारी मंदिर में फलपूजा (सगाई) से लेकर कल्याणोत्सव (विवाह) तक हर अनुष्ठान को श्रद्धापूर्वक संपन्न करते हैं।

शहर का पवित्र केंद्र तुंगभद्रा नदी के दक्षिण में स्थित है, और यहाँ विरुपाक्षा, कृष्ण, तिरुवेंगलनाथ (अच्युतराया) और विट्ठल मंदिरों के चार विशाल परिसर प्रमुखता से स्थित हैं। प्रमुख मंदिर या तो लगभग एक ही दिशा में हैं, औसतन 10 फीट की दूरी पर, या पवित्र भूभाग की प्रमुख विशेषताओं की ओर उन्मुख हैं।

पवित्र केंद्र से दक्षिण की ओर राजसी केंद्र स्थित है, जो सार्वजनिक और निजी क्षेत्रों में विभाजित है। विभाजन रेखा उत्तर-दक्षिण दिशा में चलती है और पूर्व में राजा के सौ स्तंभों वाले दरबार कक्ष और पश्चिम में रानी के विशाल महल के ठीक बीच से होकर गुजरती है। रामचंद्र मंदिर इस रेखा को भेदता है और निजी एवं सार्वजनिक क्षेत्रों को जोड़ता है। राजा और देवता की समरूपता में, राम की राजसीता और दिव्यता अविभाज्य हैं।

वीरभद्र मंदिर मतंगा पहाड़ी की चोटी पर स्थित है, जो वास्तु-मंडल का केंद्र है और सुरक्षा का प्रतीकात्मक स्रोत है, जिसका विस्तार त्रिज्या रेखाओं के साथ बाहर की ओर होता है। सभा भवन और रानी के महल के बीच स्थित किसी बिंदु से देखने पर, वीरभद्र मंदिर का शिखर उत्तर दिशा से मात्र 4 फीट की दूरी पर स्थित है। रामचंद्र मंदिर के पश्चिम में गलियारे में स्थित औपचारिक प्रवेश द्वार से, मतंगा पहाड़ी की चोटी उत्तर दिशा से मात्र 0.6 फीट की दूरी पर है।

शहरी केंद्र में स्थित छोटे मंदिरों, तीर्थस्थलों और महलों की प्रमुख अक्षों की दिशाएँ इनसे बिल्कुल भिन्न हैं। छोटी संरचनाएँ दिशा से 17 डिग्री तक विचलित होती हैं, जिससे पता चलता है कि वे सूर्योदय के समय सूर्य की स्थिति से प्रभावित थीं, जब सूर्य सूर्य के शीर्ष पर पहुँचता है।

 

भविष्य की संभावनाएं
भारत में समृद्धि बढ़ने के साथ-साथ मंदिरों और प्राचीन स्मारकों से जुड़े पुरातत्व-खगोल विज्ञान और कला में रुचि भी बढ़ी है। इस नई रुचि का श्रेय पिछले कुछ दशकों में हुई महत्वपूर्ण पुरातात्विक खोजों और मंदिर पर्यटन के महत्व को भी जाता है। खगोलीय विरासत में भारतीय अधिकारियों की रुचि स्पष्ट रूप से 2009 में जयपुर के जंतर-मंतर को विश्व धरोहर सूची में नामांकित किए जाने से प्रकट होती है, जिसके परिणामस्वरूप 2010 में इस स्थल को सफलतापूर्वक सूचीबद्ध किया गया । मूल योजना उत्तरी भारत के अन्य जंतर-मंतरों के साथ क्रमबद्ध नामांकन करने की थी।

महत्वपूर्ण स्थलों का मुख्य प्राधिकारी भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई) और राज्य स्तर पर पुरातत्व और संग्रहालय विभागों के रूप में कार्य करने वाली इसकी सहयोगी संस्थाएं हैं। 1976 में, भारत सरकार ने तीन महान मध्यकालीन शहरों – उत्तर प्रदेश में फतेहपुर सिकरी , गुजरात में चंपानेर और कर्नाटक में विजयनगर – के उत्खनन की परियोजनाएं शुरू कीं , ये सभी यूनेस्को विश्व धरोहर स्थल हैं। इन शहरों में हुई खोजों की प्रचुरता देश के अन्य स्थलों को उजागर करने और संरक्षित करने के आंदोलन को बल दे रही है। उत्खनन, संरक्षण और अनुसंधान कार्य में वृद्धि की ही उम्मीद है। विशेष रूप से, स्मारकों के पुरातात्विक खगोलीय पहलुओं पर अधिक ध्यान दिया जाएगा।

आलेख साभार –https://web.astronomicalheritage.net/ से 
चित्र- बनारस के सूर्य मंदिर का स-भार- https://www.picxy.com/photo से 

राजा मानसिंह पर मनमानी का आरोप और विरासत की अस्थिरता का दौर

यह कहानी शाहगंज अयोध्या के वर्तमान राजा लाल अम्बिका प्रताप सिंह के सोशल साइट पर डाले गए एक विवरण के आधार पर आधारित है।

दर्शन सिंह की संतानें: अयोध्या के राजा दर्शनसिंह के तीन बेटे थे –

1.राजा रामाधीन सिंह
2.राजा रघुबर दयाल सिंह और
3. राजा मान सिंह

राजा रामाधीन सिंह सबसे बड़े होने के नाते राजा बने। उनकी राजकाज में इच्छा कम थी। वे शिव जी परम के भक्त थे । शाहगंज के पास रमपुरवा में में जो पारिवारिक शिव मंदिर है उसी में दोनों समय पूजा पाठ और संध्या आरती किया करते थे । मझले भाई मानसिंह को फौज की जिम्मेदारी मिली हुई थी वह लड़ाई लड़कर जो धन को इकट्ठा करते थे। इससे उनके मन में यह इर्ष्या जग गई कि मेहनत मैं करूं और इसका भोग राजा रामादीन सिंह करें । बड़े होने के कारण राजा रामांधीन सिंह खजाने के मालिक थे और राजा भी थे। मान सिंह इनसे खुश नहीं थे क्योंकि युद्ध जीतकर खजाने को वे भरते और बड़े होने के कारण वह रामाधीन के नियंत्रण में चला जाता था।

मान सिंह अपने भाई रामाधीन सिंह से खुश नहीं रहते थे । वह उनकी हत्या कराना चाहते थे । उन्होंने किले के मुख्य गेट के सामने तोप लगवा दिया था। अपने नौकरों को आदेश दिया था कि जब राजा साहब मंदिर से निकले तो उन पर तोप की बौछार कर दी जाए।

जब तत्कालीन रानी साहिबा को इस बात का पता चला तो रानी साहिबा ने राजा साहब से कहा कि आप पीछे के रास्ते से घर जाइए । आपकी हत्या करने का खड्यंत्र रचा जा रहा है। पर राजा साहब नहीं माने और मुख्य गेट से प्रवेश करते हुए तोप के आगे आकर खड़े हो गए। उनमें बड़ा तेज था। वह किसी से डरते नहीं थे। उन्होंने नौकरों से कहा कि तोप में आग लगाओ । सारे नौकर डर के मारे भाग गए। फिर वहीं से उन्होंने मानसिंह को बुलवाया और कहा, राजा मैं हूं, मैं तुम्हें आदेश देता हूं की तुम तोप में आग लगाओ । मानसिंह थरथर कांपने लगे। वे उन्हें औलाद न होने का शाप भी दिए। घर का माहौल बिगड़ चुका था और एक छत के नीचे रहना मुश्किल हो गया था। इससे बचने के लिए राजा रामाधीन सिंह अयोध्या जिले में स्थित शाहगंज की हवेली छोड़कर महारानी और अपने बड़े बेटे विश्वनाथ सिंह के साथ वाराणसी चले गए। उन्होंने कहा था कि गद्दी सदा निर्माण से चलेगी। यह एक तरह का शाप था।

वाराणसी में रामाधीन सिंह शिव भक्ति में खूब रम गए और शिव आराधना में खूब प्रसन्न भी रहने लगे थे। मान सिंह ने दो शादियां की थीं दोनों से मानसिंह को कोई औलाद नहीं हुई। उन्होंने ज्योतिषी की सलाह लिया तो पता चला कि बड़े राजा साहब रामाधीन सिंह का उन्हें शाप लगा हुआ है। जब तक वे वापस हवेली नहीं आएंगे वंश नहीं चलेगा। मान सिंह अपने कुछ और परिजनों के साथ वाराणसी गए । राजा साहब को वापस लेने के लिए उनसे बहुत बिनती की। राजा साहब वापस लौटने से मना कर दिया। तब मान सिंह ने कहा हम आपको वापस लिए बिना नहीं लौटेंगे और ना ही अन्न जल ग्रहण करेंगे। इसी तरह कई दिन बीत गए।

रानी साहिबा ने कहा आप अपना फर्ज और भाई परिवार की बात को अपने न्याय के तराजू में तौलिए और जो पलड़ा भारी लगे वैसा निर्णय कीजिए। तीन दिन बाद राजा साहब शाहगंज लौटने को राजी हो गए पर वह यहां का अन्न जल ग्रहण ना करने की प्रतिज्ञा कर लिए थे। उनके साथ ऊंट से प्रयाग जी से पानी आ जाता और वे अपने साथ लाए अन्न को ही ग्रहण किए। शासकीय जीवन में 1253 फसली अर्थात 1843 ई में राजा रामाधीन सिंह के ऊपर रुपया 51,921 की देनदारी थी । उसे भी मानसिंह ने खजाने में जमा करके रामाधीन सिंह का हिस्सा अपने नाम करा लिया था। इस प्रकार सम्पूर्ण सम्पत्ति या जागीर के मालिक मान सिंह बन गए थे।

राजा रामादीन सिंह के पुत्र का नाम विश्वनाथ सिंह, काशीनाथ सिंह और शंकर नाथ सिंह रहा। विश्व नाथ सिंह ने जहर देकर छोटे भाई शंकर नाथ की हत्या करा दी थी । तो शंकर नाथ ने विश्वनाथ को बेअवलाद होने का शाप दे दिया था। जो खुद बरम बाबा बनकर हवेली में अभी भी रहते हैं। काशी नाथ के वंशज लाल धर्मेंद्र नाथ सिंह थे और उनके पुत्र लाल अम्बिका प्रताप सिंह वर्तमान में राजा हैं।जो शाहगंज अयोध्या के महल के एक हिस्से में में रहते हैं।

दर्शन सिंह के सबसे छोटे बेटे का नाम रघुबर दयाल था । राजा रघुबर दयाल सिंह को बस्ती जिले का धनगवां जागीर मिली हुई थी।वह बहराइच के नाज़िम और राजा बहादुर (राय बहादुर से उच्च कोटि की उपाधि) की उपाधि पाए थे। वह भी 1253 फ़सली अर्थात 1843 ई . में गोंडा और बहराइच के नाज़िम हुये और उनको राजा रघुबर सिंह बहादुर की उपाधि मिली थी।

उनके इस कृत्य से बाद में मान सिंह को कन्या रत्न प्राप्त हुई जिसका नाम उन्होंने जगदम्बा देवी रखा।जिसका विवाह मरवया नगर में बाल मुकुंद के पौत्र नृसिंह नारायण के साथ हुआ था, जिनसे महाराजा प्रतापनारायण सिंह ‘ददुआ साहब’ का जन्म हुआ। इन्हीं ददुआ साहब को महाराज मानसिंह की रानी ने गोद ले लिया था।

सन 1870 में राजा मानसिंह की मृत्यु के बाद मेहदौना अयोध्या का राज विभिन्न रूपों में अस्थिर रहा जो 1987 को लाल प्रताप नारायण सिंह को राजा के रूप में प्रिवी कौंसिल से उनको डिग्री मिलने पर स्थिर हो सका था। इस बीच महाराज मानसिंह की विधवा महारानी सुभाव कुँवरि वास्तविक रूप में शासिका रही और प्रतीक रूप में दत्तक पुत्र लाल त्रिलोकी नाथ सिंह भी शासक रहे।

संवत 1927 वि /11 अक्टूबर 1870 ई में मृत्यु हो जाने के पूर्व ही स्वर्गवासी महाराज मान सिंह ने एक वसीयतनामा लिखकर एक सन्दूक़चे में बन्द कर दिया था। वह सन्दूक़चा फैज़ाबाद के हाकिमों ने खोला तो उसमें लिखा था कि हमारे मरने पर हमारी विधवा महारानी सुभाव कुँवरि उत्तराधिकारिणी होगी।

राजा मानसिंह की महारानी सुभाव कुँवरि सहिबा ने उसी वसियतनामे के अधिकार से राजा रघुवीर सिंह के कनिष्ठ पुत्र लाल त्रिलोकी नाथ सिंह को गोद ले लिया था। जिससे यह सुनिश्चित हुआ कि सत्ता उत्तराधिकार और गोद लेने की प्रक्रिया से आगे बढ़े। गोद लेने की इसी कानूनी और पारंपरिक प्रक्रिया के तहत,लाल त्रिलोकीनाथ सिंह को गोद लिया और उन्हें मेहदौना (अयोध्या) का उत्तराधिकारी बनाया था। यह निर्णय फैजाबाद के अधिकारियों द्वारा वसीयतनामा खोलने के बाद लिया गया था, जिसमें वे उत्तराधिकारिणी बनीं थीं। राजा त्रिलोकी नाथ सिंह नाम मात्र के राजा बन सके थे।

महाराजा मानसिंह के केवल एक बेटी श्रीमती ब्रजविलास कुँवरि उर्फ बच्ची साहिबा थीं। उसमें अपने पिता की वीरता और बुद्धिमत्ता की झलक लिए हुई थी। वह बाल्यकाल से ही युद्ध और प्रशासन में रुचि रखती थी। अक्सर वह अपने पिता के साथ दरबार में बैठकर मामलों को सुनती और सुझाव देती।उनका विवाह आरा के रईस बाबू नरसिंह नारायण जी के साथ हुआ था। उन्हीं के पुत्र लाल प्रताप नारायण सिंह हुये जो ददुआ साहब के नाम से प्रसिद्ध थे। ददुवा साहब नाबालिक थे । अंग्रेजों के कानून के हिसाब से उन्हें वारिस नहीं घोषित किया जा सकता और प्रॉपर्टी की असली मालिक महारानी सुभाव कुंवर बनी रही।

लाल प्रतापनारायण सिंह ने अदालत में दावा कर दिया कि महाराजा मानसिंह के असली उत्तराधिकारी हम हैं। इस पर कई वर्ष तक मुकदमा चला। अन्त के सन् 1887 में प्रिवी कौंसिल से उनको डिग्री मिल गई और वे मेहदौना राज के मालिक हो गये। अभी तक इनकी राजधानी शाहगंज ही रहा।


(लेखक परिचय: लेखक भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण, में सहायक पुस्तकालय एवं सूचनाधिकारी पद से सेवामुक्त हुए हैं। वर्तमान समय में उत्तर प्रदेश के बस्ती नगर में निवास करते हुए सम सामयिक विषयों,साहित्य, इतिहास, पुरातत्व, संस्कृति और अध्यात्म पर अपना विचार व्यक्त करते रहते हैं। वॉट्सप नं.+919412300183)

बंगाल का भविष्यः धर्म की लहर या प्रगति की राह?

पश्चिम बंगाल में विधानसभा चुनाव की औपचारिक घोषणा भले अभी बाकी हो, पर राजनीतिक रणभेरी बज चुकी है। इस बार संकेत साफ हैं-चुनाव विकास बनाम विकास के दावे पर नहीं, बल्कि पहचान, अस्मिता और धर्म की ध्वजा के इर्द-गिर्द घूम सकता है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सौ वर्ष पूरे होने के अवसर पर राज्य भर में प्रस्तावित हिंदू सम्मेलनों को भारतीय जनता पार्टी एक वैचारिक उत्सव भर नहीं, बल्कि चुनावी अवसर में बदलने की रणनीति पर आगे बढ़ती दिख रही है। दूसरी ओर ममता बनर्जी ने भी यह समझ लिया है कि यदि चुनाव की जमीन धार्मिक विमर्श पर खिसकती है तो उसे खाली नहीं छोड़ा जा सकता। कोलकाता के न्यू टाउन में ‘दुर्गा आंगन’ का शिलान्यास और उसे बंगाली अस्मिता से जोड़ने का प्रयास इसी रणनीतिक सजगता का हिस्सा है।
बंगाल की राजनीति लंबे समय तक वर्ग-संघर्ष, वाम वैचारिकी और सामाजिक न्याय के नारों के इर्द-गिर्द घूमती रही।

लगभग तीन दशक तक भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी) के नेतृत्व में वाम मोर्चा सत्ता में रहा। उससे पहले भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का प्रभुत्व था। किंतु 2011 में सत्ता परिवर्तन के साथ एक नई धुरी बनी-तृणमूल बनाम भाजपा। आज स्थिति यह है कि वाम और कांग्रेस हाशिए पर हैं और मुकाबला दो धू्रवों के बीच सिमट चुका है। यही द्विधू्रवीयता चुनाव को अधिक तीखा और अधिक पहचान-केन्द्रित बना रही है। भाजपा का अभियान चार प्रमुख सूत्रों पर टिका है-बंगाल में हिंदू खतरे में है, बांग्लादेशी घुसपैठ, महिलाओं की असुरक्षा और भ्रष्टाचार। सीमावर्ती जिलों का उदाहरण देकर यह संदेश गढ़ा जा रहा है कि जनसांख्यिकीय संतुलन बदल रहा है। अवैध घुसपैठ का प्रश्न नया नहीं है, पर उसे इस समय राजनीतिक ऊर्जा के साथ जोड़ा जा रहा है। आर.जी. कर मेडिकल कॉलेज की घटना, शिक्षक भर्ती घोटाले, हिन्दुओं पर बढ़ते अत्याचार एवं भ्रष्टाचार जैसे प्रसंगों को शासन की विफलता के प्रतीक के रूप में प्रस्तुत किया जा रहा है। भाजपा का लक्ष्य स्पष्ट है-70 प्रतिशत हिंदू मतदाताओं में एक साझा असुरक्षा-बोध निर्मित करना, हिन्दुओं को जागृत करना और उसे मतदान व्यवहार में रूपांतरित करना। आज बंगाल में विकास की सबसे बड़ी बाधा घुसपैठियों का बढ़ना है। घुसपैठियों पर विराम लगाना चाहिए न कि इस मुद्दे पर राजनीति हो।

ममता बनर्जी की चुनौती दोहरी है। एक ओर उन्हें यह संदेश देना है कि वे अल्पसंख्यकों की संरक्षक हैं, दूसरी ओर हिंदू मतदाताओं को यह विश्वास भी दिलाना है कि उनकी आस्था और अस्मिता सुरक्षित है। 2021 के चुनाव में जब भाजपा ने ‘जय श्रीराम’ के नारे को आक्रामक रूप से उछाला, तब ममता ने ‘जय मां दुर्गा’ और ‘चंडी पाठ’ के माध्यम से एक सांस्कृतिक प्रत्युत्तर दिया था। इस बार वे दुर्गा आंगन जैसे प्रतीकों के जरिए यह संकेत दे रही हैं कि बंगाली हिंदू पहचान भाजपा की बपौती नहीं है। वे धर्म को राष्ट्रवाद की बजाय क्षेत्रीय अस्मिता के साथ जोड़ती हैं-“बंगाल अपनी संस्कृति से हिंदू है, पर उसकी राजनीति बहुलतावादी है”-यह उनका अंतर्निहित संदेश है। इसी बीच मुर्शिदाबाद में पूर्व तृणमूल नेता हुमायूं कबीर द्वारा ‘बाबरी मस्जिद’ के शिलान्यास की पहल ने नई जटिलता जोड़ दी है। इससे मुस्लिम मतदाताओं के भीतर एक अलग धू्रवीकरण की संभावना पैदा हुई है। यदि मुस्लिम वोटों का बंटवारा होता है, तो तृणमूल का गणित प्रभावित हो सकती है। 2021 में उसे लगभग 48 प्रतिशत वोट और 223 सीटें मिली थीं-जिसमें मुस्लिम मतों का एकमुश्त समर्थन निर्णायक था। भाजपा 38 प्रतिशत वोट के साथ 65 सीटें जीतकर मुख्य विपक्ष बनी। ऐसे में यदि मुस्लिम मत 5-10 प्रतिशत भी इधर-उधर खिसकते हैं, तो कई सीटों का परिणाम बदल सकता है और भाजपा पूर्ण बहुमत से सत्ता में आ सकती है।

यहां प्रश्न केवल गणित का नहीं, राजनीति के चरित्र का भी है। क्या बंगाल का चुनाव धार्मिक पहचान के उभार का प्रयोगशाला बनेगा? या यह प्रयोग अंततः विकास, रोजगार और बुनियादी ढांचे के प्रश्नों पर लौटेगा? विडंबना यह है कि जिस बंगाल को कभी देश की आर्थिक राजधानी कहा जाता था-जहां से उद्योग, शिक्षा और सांस्कृतिक नवजागरण की रोशनी फैलती थी, वह आज अधूरे प्रोजेक्ट्स, धीमी औद्योगिक गति और रोजगार के पलायन से जूझ रहा है। कोलकाता की सड़कों पर अधूरी मेट्रो लाइनें और बंद कारखानों की चुप्पी विकास की उस कहानी को बयान करती हैं, जो राजनीतिक नारों के शोर में दब जाती है। 2011 में टाटा के नैनो प्रोजेक्ट का राज्य से बाहर जाना एक प्रतीकात्मक मोड़ था। भूमि अधिग्रहण के प्रश्न पर जनसमर्थन पाने वाली राजनीति ने उद्योग के प्रति संशय का वातावरण भी बनाया। पंद्रह वर्षों बाद भी बंगाल बड़े निवेश की प्रतीक्षा में है। युवा रोजगार के लिए बाहर जा रहे हैं, और कई राज्यों में उन्हें ‘बांग्लादेशी’ कहकर अपमानित किए जाने की खबरें आती हैं। यह स्थिति केवल आर्थिक नहीं, आत्मसम्मान का प्रश्न भी है। किंतु चुनावी विमर्श में यह पीड़ा गौण हो जाती है, और केंद्र में आ जाता है-धर्म, पहचान और भय।

ममता बनर्जी केंद्र सरकार पर वित्तीय भेदभाव का आरोप लगाती हैं; भाजपा राज्य सरकार पर भ्रष्टाचार और तुष्टीकरण का। सी.बी.आई. और ई.डी. की कार्रवाइयों को ममता राजनीतिक प्रतिशोध बताती हैं, जबकि भाजपा उन्हें कानून का पालन। इस टकराव ने प्रशासनिक संवाद को भी राजनीतिक संघर्ष में बदल दिया है। परिणाम यह है कि विकास का एजेंडा आरोप-प्रत्यारोप की भेंट चढ़ जाता है। सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि क्या धर्म-आधारित ध्रूवीकरण स्थायी राजनीतिक समाधान दे सकता है? इतिहास बताता है कि धार्मिक उभार अल्पकालिक ऊर्जा तो देता है, पर दीर्घकालिक शासन-क्षमता की कसौटी पर उसे विकास, शिक्षा, स्वास्थ्य और रोजगार के प्रश्नों से जूझना ही पड़ता है। यदि चुनाव केवल “कौन किसका प्रतिनिधि है” तक सीमित रह गया, तो “कौन क्या करेगा” का प्रश्न अनुत्तरित रह जाएगा।

बंगाल की आत्मा बहुलतावाद में रही है-रामकृष्ण परमहंस से लेकर रवींद्रनाथ तक, यह भूमि विविध आस्थाओं और विचारों का संगम रही है। यहां दुर्गा पूजा और मुहर्रम दोनों सामाजिक उत्सव का रूप लेते रहे हैं। यदि राजनीति इस सामाजिक ताने-बाने को चुनावी अंकगणित में बदल देगी, तो समाज की संवेदनशीलता पर चोट पहुंचेगी। दूसरी ओर, यदि धार्मिक प्रतीकों का उपयोग सांस्कृतिक आत्मगौरव के साथ विकास-प्रतिबद्धता को जोड़ने में किया जाए, तो वह सकारात्मक भी हो सकता है। इस चुनाव में भाजपा की रणनीति हिंदू मतों का अधिकतम ध्रूवीकरण है; ममता की रणनीति हिंदू पहचान को बंगाली अस्मिता के साथ समाहित कर अल्पसंख्यकों के विश्वास को बनाए रखना है। मुस्लिम दलों की सक्रियता तृणमूल के लिए चुनौती है, पर वह भाजपा के लिए अवसर भी है। यह त्रिकोणीय-संभावना चुनाव को जटिल बनाती है। परंतु अंततः लोकतंत्र की परिपक्वता मतदाता तय करता है। यदि बंगाल का मतदाता विकास, रोजगार और सुशासन को प्राथमिकता देता है, तो राजनीतिक दलों को अपना विमर्श बदलना होगा। यदि वह पहचान की राजनीति को स्वीकार करता है, तो वही भविष्य की दिशा बनेगी। प्रश्न केवल यह नहीं कि कौन जीतेगा; प्रश्न यह है कि जीत का एजेंडा क्या होगा?

क्या धर्म के आधार पर लड़ा गया चुनाव सार्थक मूल्य स्थापित कर पाएगा? या यह राज्य को और अधिक वैचारिक खाइयों में धकेल देगा? बंगाल की धरती ने अनेक बार भारत को नई वैचारिक दिशा दी है। आज फिर अवसर है-या तो वह धर्म बनाम धर्म की बहस में उलझे, या धर्म को नैतिकता और विकास की प्रेरणा बनाकर नई राजनीति की राह खोले। चुनाव परिणाम चाहे जो हो, असली कसौटी यही होगी कि क्या बंगाल अपनी आर्थिक ऊर्जा, सांस्कृतिक उदारता और सामाजिक समरसता को पुनः प्राप्त कर पाता है। यदि नहीं, तो धर्म की ध्वजा चाहे जितनी ऊंची फहराई जाए, विकास का शून्य अंततः सबको दिखाई देगा।

(ललित गर्ग)
लेखक, पत्रकार, स्तंभकार
ई-253, सरस्वती कंुज अपार्टमेंट
25 आई॰ पी॰ एक्सटेंशन, पटपड़गंज, दिल्ली-110092
मो. 9811051133

आम लोगों की मेहनत से जी उठी तमसा नदी

पूर्वी उत्तर प्रदेश के दिल से बहने वाली तमसा नदी, जो गंगा नदी की एक प्राचीन और महत्वपूर्ण सहायक नदी है, ने आजमगढ़ जिले में विशेष बदलाव देखा है। कभी जमाव, कचरा इकट्ठा होने और अतिक्रमण जैसी चुनौतियों का सामना करने वाली यह नदी आज नमामि गंगा कार्यक्रम के अंतर्गत एक साथ मिलकर किए गए प्रशासनिक प्रयासों और मजबूत सामुदायिक भागीदारी के माध्यम से दोबारा जीवित हो चुकी है।

तमसा नदी अंबेडकर नगर, अयोध्या और आजमगढ़ जिलों से होकर बहती है और गंगा नदी में मिल जाती है। इसके पारिस्थितिक और सांस्कृतिक महत्व को देखते हुए, जिला गंगा समिति और स्थानीय समुदायों के सक्रिय सहयोग से आजमगढ़ में एक विशेष संरक्षण और स्वच्छता अभियान शुरू किया गया है।

आजमगढ़ जिले में लगभग 89-किलोमीटर क्षेत्र में फैली और 111 ग्राम पंचायतों से होकर गुजरने वाली तमसा नदी के पुनरुद्धार के लिए जमीनी स्तर पर सुनियोजित योजना की जरूरत थी।

आजमगढ़ के जिलाधिकारी श्री रविंद्र कुमार ने बताया कि नदी की स्वच्छता और इसके दीर्घकालिक पर्यावरणीय और आर्थिक लाभों के बारे में सभी ग्राम प्रधानों को जागरूक करने के लिए जिला स्तर पर बैठकें आयोजित की गईं।

 

एक स्पष्ट कार्य योजना बनाई गई, जिसमें निम्नलिखित बिंदुओं पर ध्यान केंद्रित किया गया:
नदी के उथले हिस्सों से गाद निकालना
नदी के किनारों से कूड़ा-करकट और मलबा हटाना
नदी के किनारे की खाली जमीन को मापना और अवैध अतिक्रमण हटाना
बाकी भूमि पर फलदार वृक्षारोपण करना

वृक्षारोपण अभियान न केवल पारिस्थितिक सुधार में योगदान देता है, साथ ही आर्थिक मूल्य भी प्रदान करता है, क्योंकि फल देने वाले पेड़ों से प्राप्त उत्पादों का इस्तेमाल संबंधित ग्राम पंचायतों के माध्यम से किया जा सकता है।

श्रमदान और जन जागरूकता से हुआ बदलाव
नमामि गंगा के अंतर्गत, लगातार काम करने के लिए स्वच्छ गंगा राज्य मिशन और जिला गंगा समिति के साथ मिलकर प्रयास किए गए। स्वच्छता अभियान और जागरूकता अभियानों के जरिए स्कूली बच्चों, युवाओं, महिला स्वयं सहायता समूहों, ग्राम पंचायतों, स्वयंसेवी संगठनों और स्थानीय निवासियों को शामिल किया गया।

श्रमदान के माध्यम से नदी तटों और घाटों से प्लास्टिक, पॉलीथीन और अन्य ठोस कचरे को हटाया गया। सफाई कर्मचारियों को तैनात किया गया, प्रमुख स्थानों पर कूड़ेदान लगाए गए और गीले व सूखे कचरे को अलग करने और नदी में फेंकने से रोकने के लिए जागरूकता अभियान चलाए गए।

इस पहल का नदी तटों पर होने वाली धार्मिक और सांस्कृतिक गतिविधियों पर भी सकारात्मक असर पड़ा है, जिससे अनुष्ठानों और पवित्र स्नान के लिए आने वाले श्रद्धालुओं को स्वच्छ और व्यवस्थित वातावरण प्राप्त हुआ है।

अधिकारियों ने बताया कि गंगा नदी की सहायक नदी होने के नाते, तमसा नदी की स्वच्छता बनाए रखना गंगा नदी की शुद्धता और निर्बाध प्रवाह सुनिश्चित करने के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है। निरंतर प्रयासों से पानी की गुणवत्ता में सुधार, जैव विविधता का पुनर्जीवन और आस-पास के कृषि क्षेत्रों में मिट्टी की उर्वरता और सिंचाई क्षमता में बढ़ोतरी हुई है।

आजमगढ़ के उप आयुक्त (श्रम एवं रोजगार) श्री राम उद्रेज यादव ने ग्राम पंचायतों की महत्वपूर्ण भूमिका और एमजीएनआरईजीए के साथ उनके साथ मिलकर काम करने पर प्रकाश डाला। चुने गए प्रतिनिधियों, एमजीएनआरईजीए कार्यकर्ताओं और सामुदायिक स्वयंसेवकों ने सामूहिक रूप से गाद निकालने, सफाई करने और वृक्षारोपण गतिविधियों में योगदान दिया, जिससे नदी जीर्णोद्धार के सहभागी मॉडल को मजबूती मिली।

तमसा नदी का पुनरुद्धार इस बात का प्रमाण है कि लगातार प्रशासनिक प्रतिबद्धता और सक्रिय जनभागीदारी के संयोजन से नदी के इकोसिस्टम को सफलतापूर्वक बहाल किया जा सकता है। यह पहल गंगा बेसिन में सहायक नदियों और छोटी नदियों के संरक्षण के लिए एक अनुकरणीय उदाहरण है।

गंगा की अन्य सहायक नदियों के साथ-साथ तमसा नदी के संरक्षण और नियमित सफाई के प्रयास नमामि गंगा अभियान के अंतर्गत मिशन मोड में जारी रहेंगे, जिससे स्वच्छ, स्वस्थ और संपोषित नदी प्रणाली की परिकल्पना को मजबूती मिलेगी।

डाक विभाग ने ‘भारत की कठपुतलियां’ विषय पर आठ स्मारक डाक टिकटों का एक सेट जारी किया

डाक विभाग ने नई दिल्ली स्थित इंडियन हैबिटेट सेंटर में “भारत की कठपुतलियां” विषय पर आठ स्मारक डाक टिकटों का एक सेट जारी किया। विशिष्ट अतिथियों, कलाकारों और सांस्कृतिक जगत के सदस्यों की उपस्थिति में डाक सचिव सुश्री वंदिता कौल ने औपचारिक रूप से इन टिकटों का विमोचन किया।

(श्रीमती वंदिता कौल, सचिव (डाक), भारत की जीवंत कठपुतली परंपराओं और सांस्कृतिक विरासत का प्रचार करते हुए भारत की कठपुतलियों पर स्मारक डाक टिकट जारी कर रही हैं।)

इस अवसर पर डाक सचिव ने कहा “डाक टिकट हमारे राष्ट्र की विरासत के लघु दूत हैं। भारत की समृद्ध और विविध कठपुतली परंपराओं की विशेषता को दर्शाने वाले इस विशेष अंक के माध्यम से हम उन अमर कहानीकारों को सम्मानित करते हैं जिन्होंने पीढ़ियों से हमारी लोककथाओं, मूल्यों और सामूहिक स्मृति को संरक्षित रखा है। आशा है कि ये टिकट भारत की जीवंत सांस्कृतिक विरासत के प्रति लोगों को जागरूक करेंगे और आने वाली पीढ़ियों को इन जीवंत परंपराओं को संजोने तथा बनाए रखने के लिए प्रोत्साहित करेंगे।”

भारत में कठपुतली कला देश की सबसे पुरानी और जीवंत कथा परंपराओं में से एक है जो इसकी समृद्ध सांस्कृतिक विविधता और कलात्मक प्रतिभा का प्रतीक है। सदियों से कुशल कठपुतली कलाकार संगीत, कथा और दृश्य कला के मिश्रण से भरपूर मनमोहक प्रदर्शनों के माध्यम से महाकाव्यों, लोककथाओं, नैतिक शिक्षाओं और सामाजिक कथाओं को जीवंत करते आए हैं।

भारत की पारंपरिक कठपुतली कला को मोटे तौर पर चार रूपों में वर्गीकृत किया गया है – धागे वाली कठपुतली, दस्ताने वाली कठपुतली, छड़ी वाली कठपुतली और छाया कठपुतली – जिनमें से प्रत्येक की अपनी विशिष्ट शैली और क्षेत्रीय विशेषता है। यह अनमोल कला रूप पारिवारिक परंपरा के माध्यम से कायम है, जिसमें कौशल और कहानियां एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक हस्तांतरित होती हैं और बच्चे अपने बड़ों को देखकर और उनकी सहायता करके सीखते हैं।

इस स्मारक डाक टिकट में आठ डाक टिकट शामिल हैं, जिनमें से प्रत्येक भारत के विभिन्न क्षेत्रों की विशिष्ट पारंपरिक कठपुतली कला को दर्शाता है, जैसे कठपुतली (राजस्थान), यक्षगान सूत्रदा गोम्बेयट्टा (कर्नाटक), डांगर पुतुल (पश्चिम बंगाल), काठी कुंडई (ओडिशा), बेनीर पुतुल (पश्चिम बंगाल), पावकथकली (केरल), रावणछाया (ओडिशा) और टोलू बोम्मलट्टा (आंध्र प्रदेश)। प्रत्येक डाक टिकट संबंधित परंपरा की विशिष्ट वेशभूषा, रूप और प्रदर्शन शैली को दर्शाता है, जो भारत की विविध कठपुतली कलाओं से जुड़ी कलात्मक शिल्प कौशल और सांस्कृतिक विरासत को प्रदर्शित करता है।

डाक टिकट, प्रथम दिवस कवर, ब्रोशर, लघु पत्रक, पत्रक और विशेष डाक डिकट का डिज़ाइन श्री शंखा सामंता ने तैयार किया है। इस अंक के लिए कलात्मक संदर्भ और पाठ संगीत नाटक अकादमी, इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र, दारिचा फाउंडेशन और इशारा कठपुतली थिएटर ट्रस्ट के संस्थापक श्री दादी पुदुमजी द्वारा प्रदान किए गए हैं।

डाक टिकट का मूल्यवर्ग: 500 पैसा (आठ डाक टिकटों का सेट)

डाक टिकट और अन्य डाक संबंधी उत्पाद देश भर के डाक टिकट ब्यूरो में और ऑनलाइन www.epostoffice.gov.in पर उपलब्ध हैं।

काव्य गौरव अलंकरण के लिए पाँच कवि चयनित

इंदौर। हिन्दी भाषा की वाचिक परम्परा से मातृभाषा उन्नयन संस्थान द्वारा पाँच कवियों को प्रतिवर्ष काव्य गौरव अलंकरण प्रदान किया जाता है। वर्ष 2026 में माण्डव से डॉ. पंकज प्रसून चौधरी, उज्जैन से निशा पंडित, नागदा से कमलेश दवे, बड़नगर से पुष्पेंद्र जोशी पुष्प और भोपाल से शिवांगी प्रेरणा का चयन किया गया है। यह अलंकरण संस्थान के प्रतिष्ठा प्रसंग हिन्दी गौरव अलंकरण समारोह में प्रदान किया जाएगा। इंदौर में यह समारोह शनिवार 22 फ़रवरी 2026 को आयोजित किया जा रहा है।

मातृभाषा उन्नयन संस्थान के राष्ट्रीय अध्यक्ष डॉ. अर्पण जैन ‘अविचल’ ने बताया कि ‘संस्थान विगत छह वर्ष से वाचिक परम्परा के पाँच युवा कवियों को काव्य गौरव अलंकरण से सम्मानित करता है, जिसमें वर्ष 2026 के लिए चयन समिति ने देशभर से प्राप्त अनुशंसाओं के आधार पर कवियों का चयन किया है।’

ज्ञात हो कि कवियों का चयन देश के विभिन्न प्रान्तों से होता है, विगत पाँच वर्षों में पच्चीस कवि काव्य गौरव अलंकरण से सम्मानित हो चुके हैं।

काव्य गौरव से अलंकृत होने वाले कवियों को मातृभाषा उन्नयन संस्थान राष्ट्रीय कार्यकारिणी ने शुभकामनाएँ प्रेषित करते हुए आमंत्रित किया।

सरकार ने सड़क दुर्घटना पीड़ितों के लिए कैशलेस उपचार योजना- “पीएम राहत” का शुभारंभ किया

प्रधानमंत्री ने सेवा तीर्थ शिफ्ट होने के तुरंत बाद लिए अपने प्रथम निर्णय में पीएम राहत (सड़क दुर्घटना पीड़ितों का कैशलेस उपचार) योजना के शुभारंभ को स्वीकृति प्रदान की। यह निर्णय—सेवा, करुणा और कमजोर नागरिकों की सुरक्षा पर आधारित शासन के दृष्टिकोण को प्रतिबिम्बित करता है। यह कदम सरकार की इस प्रतिबद्धता को रेखांकित करता है कि सड़क दुर्घटना के बाद तत्काल चिकित्सीय सहायता के अभाव में किसी भी व्यक्ति को जान नहीं गंवानी पड़े।

भारत में प्रतिवर्ष सड़क दुर्घटनाओं में बहुत अधिक संख्या में मौतें होती हैं, जिनमें से अनेक को समय पर चिकित्सीय सहायता प्रदान कर टाला जा सकता है। अध्ययनों से संकेत मिलता है कि यदि दुर्घटना पीड़ितों को पहले एक घंटे के भीतर अस्पताल में भर्ती करा दिया जाए, तो लगभग 50% मौतों को टाला जा सकता है। सेवा तीर्थ से पीएम राहत को स्वीकृति देकर प्रधानमंत्री ने जीवनरक्षक हस्तक्षेप, अस्पतालों के लिए वित्तीय सुनिश्चितता और दुर्घटना पीड़ितों के लिए सुव्यवस्थित आपातकालीन प्रतिक्रिया तंत्र स्थापित करने को प्राथमिकता दी है।

आपातकालीन प्रतिक्रिया सहायता प्रणाली (ईआरएसएस) 112 हेल्पलाइन के साथ एकीकरण सड़क दुर्घटना पीड़ितों को गोल्डन आवर के भीतर अस्पताल पहुँचाया जाना सुनिश्चित करता है। सड़क दुर्घटना पीड़ित, राह-वीर या दुर्घटना स्थल पर उपस्थित कोई भी व्यक्ति 112 डायल करके निकटतम नामित अस्पताल की जानकारी प्राप्त कर सकता है और एम्बुलेंस सहायता का अनुरोध कर सकता है। इससे आपातकालीन सेवाओं, पुलिस प्राधिकरणों और अस्पतालों के बीच त्वरित तालमेल संभव हो सकेगा।

योजना के अंतर्गत, किसी भी श्रेणी की सड़क पर हुई दुर्घटना के प्रत्येक पात्र पीड़ित को दुर्घटना की तिथि से 7 दिनों की अवधि तक प्रति व्यक्ति 1.5 लाख रुपये तक का कैशलेस उपचार प्रदान किया जाएगा। जीवन को खतरे में नहीं डालने वाले मामलों में अधिकतम 24 घंटे तक तथा जीवन के लिए घातक मामलों में अधिकतम 48 घंटे तक स्टेबलाइजेशन उपचार उपलब्ध कराया जाएगा। यह सुविधा एकीकृत डिजिटल प्रणाली पर पुलिस प्रमाणीकरण के अधीन होगी।

पीएम राहत को एक सुदृढ़, प्रौद्योगिकी-आधारित ढाँचे के माध्यम से लागू किया जा रहा है, जिसमें सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्रालय के इलेक्ट्रॉनिक डिटेल्ड एक्सीडेंट रिपोर्ट (ईडीएआर) प्लेटफ़ॉर्म को राष्ट्रीय स्वास्थ्य प्राधिकरण के ट्रांजैक्शन मैनेजमेंट सिस्टम (टीएमएस 2.0) के साथ एकीकृत किया गया है। यह एकीकरण दुर्घटना की जानकारी देने से अस्पताल में भर्ती, पुलिस प्रमाणीकरण, उपचार प्रदान करने, दावे की प्रक्रिया और अंतिम भुगतान तक निर्बाध डिजिटल संपर्क सुनिश्चित करता है।

अस्पतालों को प्रतिपूर्ति मोटर वाहन दुर्घटना कोष (एमवीएएफ) के माध्यम से की जाएगी। जिन मामलों में दोषी वाहन बीमित होगा, उनमें भुगतान सामान्य बीमा कंपनियों द्वारा किए गए अंशदान से किया जाएगा। जबकि बिना बीमा वाले तथा हिट एंड रन मामलों में भुगतान भारत सरकार द्वारा बजटीय आवंटन के माध्यम से किया जाएगा। राज्य स्वास्थ्य एजेंसी द्वारा स्वीकृत दावों का भुगतान 10 दिनों के भीतर किया जाएगा, जिससे अस्पतालों को वित्तीय सुनिश्चितता प्राप्त होगी और निर्बाध उपचार को प्रोत्साहन मिलेगा।

सड़क दुर्घटना पीड़ितों की शिकायतों का निवारण जिला स्तर पर जवाबदेही सुनिश्चित करते हुए, जिला कलेक्टर / जिला मजिस्ट्रेट / उपायुक्त की अध्यक्षता वाली जिला सड़क सुरक्षा समिति द्वारा नामित एक शिकायत निवारण अधिकारी के माध्यम से किया जाएगा।

सेवा तीर्थ से पीएम राहत की स्वीकृति और शुभारंभ नागरिक-प्रथम दृष्टिकोण का प्रतीक है — जहाँ सुशासन का अर्थ समयबद्ध कार्रवाई, करुणामय प्रतिक्रिया और जीवन की रक्षा से है। पीएम राहत किसी भी दुर्घटना पीड़ित को वित्तीय अड़चनों के कारण जीवनरक्षक उपचार से वंचित न रहना सुनिश्चित करते हुए सड़क दुर्घटना पीड़ित का जीवन बचाने तथा भारत की आपातकालीन स्वास्थ्य सेवा प्रणाली को सुदृढ़ करने की दिशा में एक निर्णायक कदम है।

नॉर्थ ब्लॉक और साउथ ब्लॉक अब बनेंगे ‘युगे युगेन भारत’ राष्ट्रीय संग्रहालय

“आज विक्रम संवत दो हजार बयासी…फाल्गुन कृष्ण पक्ष..विजया एकादशी के दिन…माघ चौबीस, शक संवत् उन्नीस सौ सैंतालीस के पुण्य अवसर पर…

13 फरवरी, 2026 को माननीय प्रधानमंत्री जी द्वारा नया प्रधानमंत्री कार्यालय जिसे अब ‘सेवातीर्थ’ के नाम से जाना जाएगा, राष्ट्र को समर्पित किया गया है। साउथ और नॉर्थ ब्लॉक का निर्माण अंग्रेजों द्वारा भारत को गुलामी की बेड़ियों में जकड़े रहने के लिए हुआ था। 1947 में भारत को गुलामी से तो मुक्ति मिली लेकिन इन भवनों को तत्कालीन सरकार द्वारा अपने कार्यों के निष्पादन हेतु बनाए रखा गया। स्वतंत्रता के बाद से ही प्रधानमंत्री कार्यालय साउथ ब्लॉक के इस भवन से कार्य करता रहा है।

आज हमें हर्ष है कि साउथ ब्लॉक के इस कक्ष में अंतिम बार केंद्रीय मंत्रिमंडल की बैठक हो रही है। ये केवल स्थान परिवर्तन का क्षण नहीं है, यह इतिहास और भविष्य के संगम के भी पल हैं। इस परिसर ने गुलामी से आज़ादी और फिर स्वतंत्र भारत की अनेक ऐतिहासिक घटनाओं को देखा है, गढ़ा है। इस परिसर ने देश के 16 प्रधानमंत्रियों के नेतृत्व में बनी कैबिनेट के महत्वपूर्ण फैसले होते देखे हैं। इसकी सीढ़ियों पर नेहरू जी से लेकर प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी जी तक के पदचिन्ह हैं। इस भवन की सीढ़ियों पर चढ़ते कदमों ने देश को नई ऊंचाई पर पहुंचाने में अहम योगदान दिया है।

बीते दशकों में यहां कैबिनेट की बैठकों में, संविधान के आदर्शों, जनता से मिले जनादेश और राष्ट्र की आकांक्षाओं से प्रेरित होकर अनेक महत्वपूर्ण निर्णय लिए हैं। यहां भारत की सफलताओं का उत्सव भी मनाया गया, असफलताओं का आंकलन भी हुआ और साथ ही संकटों और चुनौतियों से निपटने के लिए कड़े और बड़े फैसले भी लिए गए।

साउथ ब्लॉक के इन कमरों ने विभाजन की विभीषिका भी देखी, युद्ध और आपातकाल की चुनौतियों को भी देखा और शांतिकाल की नीतियों पर भी चिंतन और मनन किया। इन्होंने टाइपराइटर से लेकर डिजिटल गवर्नेंस तक, तकनीक की लंबी छलांग को महसूस किया है।

यहाँ बैठकर अधिकारियों की कई पीढ़ियों ने ऐसे फैसले लिए, जिन्होंने भारत को आज़ादी के तुरंत बाद की अनिश्चितता से निकालकर स्थिरता की राह पर आगे बढ़ाया। सबके प्रयासों का परिणाम है कि आर्थिक चुनौतियों और संकटों से निकलकर, आज भारत एक आत्मविश्वासी राष्ट्र बनकर खड़ा हुआ है।

आज का भारत दुनिया की अग्रणी अर्थव्यवस्थाओं में से एक है। भारत आज एक सुरक्षित और सक्षम राष्ट्र के रूप में उभरकर सामने आया है और वैश्विक मंचों पर अपनी स्पष्ट और प्रभावशाली आवाज़ रख रहा है।

बीते एक दशक में, प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी जी के नेतृत्व में साउथ ब्लॉक राष्ट्र के अनेक ऐतिहासिक निर्णयों का केंद्र रहा। ये स्थान मिनिमम गवर्नमेंट, मैक्सिमम गवर्नेंस की प्रेरणा स्थली बना। यहां से रिफॉर्म एक्सप्रेस को पूरे देश में प्रोत्साहन मिला है। यहीं से डीबीटी, स्वच्छ भारत अभियान, गरीब कल्याण से जुड़े अभियान, डिजिटल इंडिया, GST जैसे व्यापक सुधारों को आकार मिला। यहां से ही आर्टिकल-370 की दीवार गिराने और तीन तलाक के खिलाफ कानून बनाने जैसे सामाजिक न्याय के साहसिक और संवेदनशील निर्णय लिए गए। यहीं लिए गए सर्जिकल स्ट्राइक, एयर स्ट्राइक और ऑपरेशन सिंदूर के निर्णयों के माध्यम से भारत ने अपनी दृढ़ और आत्मविश्वासी सुरक्षा नीति का स्पष्ट संदेश विश्व को दिया।

आज देश विकसित भविष्य के संकल्प के साथ आगे बढ़ रहा है। इसके लिए एक आधुनिक, तकनीकी और पर्यावरण के प्रति अनुकूल कार्यालय की आवश्यकता थी। एक ऐसा कार्यक्षेत्र, जो यहां काम करने वाले हर कर्मयोगी की उत्पादकता को बढ़ाए, सेवाभाव के उसके संकल्प को प्रोत्साहित करे।

इसी भाव के साथ साउथ ब्लॉक के उ‌द्घाटन के करीब 95 वर्षों के बाद, आज 13 फरवरी 2026 को भारत सरकार इन भवनों को खाली कर रही है और ‘सेवातीर्थ’ तथा ‘कर्तव्य भवनों’ में स्थानांतरित हो रही है। यह प्रतीकात्मक रूप से गुलामी के अतीत से ‘विकसित भारत’ के भविष्य की ओर बढ़ने की ओर देश का एक और कदम है। बीते वर्षों में देश में ‘सत्ता भाव’ के बजाय ‘सेवा भाव’ की संस्कृति सशक्त हुई है। आज का ये स्थानांतरण, इन संस्कारों को और मजबूती देगा।

आज कैबिनेट यह संकल्प भी लेती है कि नॉर्थ और साउथ ब्लॉक को “युगे युगीन भारत राष्ट्रीय संग्रहालय” का हिस्सा बनाया जाए, जो हमारी हजारों वर्ष पुरानी सभ्यता से पीढ़ियों को प्रेरित करता रहेगा। ये संग्रहालय, हमारी कालातीत और शाश्वत सांस्कृतिक विरासत का उत्सव मनाएगा और हमारे गौरवशाली अतीत को समृद्ध भविष्य से जोड़ेगा।