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ज्योतिष, खगोल और काल गणना से जुड़े हैं महाकाल और विक्रमादित्य

भारतीय कथा-साहित्य में उज्जैन का राजा विक्रमादित्य बड़ा लोकप्रिय रहा है। उसके प्रसंग को लेकर हजारों कहानियाँ देश की विविध भाषाओं में प्रचलित हैं। उसके नवरत्नों की कथा भी सर्वविदित है, परंतु आश्चर्य की बात है कि ऐसे लोक प्रसिद्ध राजा के विषय में कथा कहानियों के अतिरिक्त कोई जानकारी नहीं मिल पायी है। विदेशी इतिहासकार उसे केवल कल्पित राजा मानते हैं। भारतीय इतिहासकारों के मनमें अवश्य उसे ऐतिहासिक महापुरुष मानने का मोह बना हुआ है। उन्होंने इसकी वास्तविकता को सिद्ध करने के लिए अनेक प्रकार के अन्वेषण अनुसंधान भी किए, फिर भी निश्चित रूप से उसके अस्तित्व को सिद्ध नहीं कर पाए हैं।

विक्रम की नगरी उज्जैन में महाकाल का सुप्रसिद्ध मन्दिर है। देश के अन्य किसी भाग में महाकाल का कोई मंदिर नहीं है। अतः निश्चय ही यह प्रश्न उपस्थित होता है कि यह ‘महाकाल’ कौन देवता हैं, जिसका केवल देशभर में एक मंदिर है। सामान्यतया ‘महाकाल’ शिव का पर्याय मान लिया गया है और उज्जैन के ‘महाकाल’ के मंदिर को शिव का मंदिर माना जाता है। परंतु प्रश्न यह है कि शिव के अन्य मंदिर ‘महाकाल’ के मंदिर क्यों नहीं कहलाते ? हमारे विचार से विक्रमादित्य, उज्जयिनी, नव-रत्न और महाकाल इन चारों शब्दों के निर्वचन से इसके वास्तविक अर्थ पर कुछ प्रकाश पड़ सकता है और सुप्रसिद्ध कथा की गुत्थी सुलझ सकती है।

भारतीय ज्योतिष के विद्वान यह जानते हैं कि उज्जैन का सूर्योदय काल देश भर के पंचांगों के लिए प्रामाणिक उदयकाल माना जाता रहा है। भारतीय ज्योतिषियों के अनुसार दक्षिण में लंका, भारत के मध्य में उज्जैन और (संभवतः वर्तमान) रोहतक नगरों के मध्य से जाने वाली देशांतर रेखा का सूर्योदय काल प्रामाणिक सूर्योदयकाल हैं परिवर्तित ज्योतिष ग्रंथों में उसका नाम ‘लंकोदय’ काल रहा है। लंकोदय की देशांतर रेखा से पूर्व में तथा पिश्चम में स्थित स्थानों के सूर्योदय का काल ज्ञात करने की विधियाँ निर्धारित की हुई हैं। इस प्रकार उज्जयिनी का सूर्योदय काल देशभर के लिए प्रामाणिक सूर्योदय काल था और आधुनिक भाषा में उसे भारत का ‘स्टैण्डर्ड टाइम’ कहा जा सकता है। ईसा पूर्व के ज्योतिषी संभवतया इसी को महाकाल कहते थे। विविध शास्त्रीय तथ्यों को देव रूप में स्वीकार करने की हमारे यहां परम्परा रही है। इसी परम्परा के अंतर्गत महाकाल (स्टैण्डर्ड टाइम) को देव रूप में दिया गया और उसके मंदिर की स्थापना उज्जयिनी में की गयी। उज्जयिनी को क्यों चुना गया, यह भी एक ज्वलंत प्रश्न है। जब एक ही देशांतर रेखा देश के इतने लंबे-चौड़े भाग से निकलती है, तो उज्जैन ही को क्यों महत्त्व दिया जाए, उत्तर यह है कि उज्जैन कर्क रेखा पर स्थित है, जहां तक उत्तरायण सूर्य आता है और पुनः लौटकर मकर रेखा तक दक्षिणगामी होता है। कर्क रेखा पर स्थित होने के कारण भारतीय ज्योतिर्विदों ने उज्जयिनी को महाकाल की नगरी माना।

विक्रमादित्य शब्द में दो खंड हैं विक्रम-आदित्य। आजकल विक्रम का अर्थ सामान्यतया ‘पराक्रम’ समझा जाता है ओर आदित्य का ‘सूर्य’। इस प्रकार विक्रमादित्य का अर्थ शक्ति का सूर्य किया जाता है। परंतु विक्रम शब्द में क्रम धातु है, जिसका अर्थ है चलना। इसी से बना हुआ दूसरा शब्द ‘संक्रम’ है, जो सूर्य की गति के विषय में सर्वविदित है। सूर्य का संक्रम, संक्रमण और संस्कृति आधुनिक ज्योतिषियों के लिए अपरिचित शब्द नहीं है।

उज्जैन की व्युत्पत्ति इस समय उज्जयिनी में मानी जाती है। उज्जैन के प्राकृत नाम ‘उज्जैणी’ या ‘उज्जैन नगरी’ थे, जो स्पष्टतः संस्कृत ‘उदयिनी’ एवं ‘उदयन नगरी’ से व्युत्पन्न प्रतीत होते हैं। पुनः संस्कृतिकरण की यह प्रक्रिया ‘कथा कथा सरित्सागर’ आदि में बहुत अधिक पायी जाती है। उज्जैन वास्तव में विक्रमादित्य के उदय की नगरी थी। भारतीय कथा साहित्य का सुप्रसिद्ध उदयन भी सूर्य का ही अन्य नाम है, जिसका विवेचन आगे किया जायेगा।

इस प्रकार विक्रमादित्य महाकाल तथा उज्जयिनी की व्युत्पत्ति पर विचार करने से यही ज्ञात होता है कि विक्रमादित्य नाम का वास्तविक राजा नहीं था। वह दक्षिणगामी सूर्य का ही कल्पित नाम है और उसे राजा का स्वरूप दे दिया गया है। उसे राजा मानने पर उसकी राजधानी उयिनी अथवा उजैणी (बाद में उज्जयिनी) कल्पित की गयी और उसी नगरी का समय संपूर्ण देश के लिए प्रमाणिक समय होने के कारण ‘महाकाल’ कहलाया। इतने विवेचन के बाद नवरत्नों की कल्पना भी स्पष्ट हो जाती है जो निःसंदेह नव ग्रह हैं।

एक नियम स्थान तक आगे बढ़कर वापस मूल स्थान तक पहुंचना सिंह विक्रांत कहलाता है। सिंह का स्वभाव शिकार करने के लिए कुछ दूर तक वन में आगे बढ़कर पुनः लौटने की क्रिया के लिये ‘सिंह विक्रांत’ या ‘सिंह विक्रमण’ शब्द प्रसिद्ध हुआ। कर्क राशि तक उत्तर दिशा में चलकर पुनः दक्षिण की ओर विक्रमण करने वाला सूर्य ‘सिंह विक्रमी’ हुआ। यही ‘सिंह’ राशि व्युत्पत्ति है। सूर्य 31 दिन तक कर्क राशि पर रहकर 32 वें दिन सिंह राशि पर पहुंचता है। यही सिंहासन बत्तीसी का रहस्य है। सूर्य सिंह राशि का स्वामी माना जाता है। कर्क तक आगे बढ़कर वह वापस लौटता है और अपने घर की राशि तक आकर वहां आसीन होता है। सूर्य की उत्तर दक्षिण यात्राएं नीचे. स्पष्ट की जा रही हैं:-

सिंह के बाद सूर्य कन्या राशि में प्रवेश करता है (संभवतः प्राचीन भारतीय राशि विभाजन खगोल का नहीं भूमंडल का था। भूमि के जिस भाग पर सूर्य राशियाँ सीधी पड़ती थीं, वही राशि विशेष खंड का था। ‘राशि’ शुद्ध संभवतः ‘रश्मि’ के प्राकृत रूप ‘रस्सियां’, ‘रश्शि’ का पुनः संस्कृत रूप है। सतरंगी किरणों के कारण ‘सप्ताश्व’ सूर्य का रूपक भी इस ‘रश्मि’ शब्द से स्पष्ट होता है।)

उत्तर भारत के ईसा पूर्व कालीन आयों की दृष्टि से वह प्रदेश कुमारी कन्याओं का प्रदेश था। भारत का यह दक्षिण भू-भाग (अर्थात 16 अक्षांश से 8 अक्षांश का भू-भाग) कुमारी कन्याओं का प्रदेश माना जाता था। उस प्रदेश पर सीधी किरणें फेंकने वाला सूर्य कन्यार्क कहलाता था। कन्याओं के उस देश की स्मृति के रूप में आज भी कुमारी अन्नीप का दर्शनीय कन्याकुमारी का मन्दिर जगत् प्रसिद्ध है।

वहां से दक्षिण की ओर बढ़ता हुआ सूर्य जब विषुवत् रेखा पर पहुंच जाता है और वहां उसकी किरणें सीधी पड़ती हैं, वह तुला राशि पर पहुंचा हुआ माना जाता है। ‘तुला’ नाम बहुत सार्थक है। विषुवत् रेखा पर जब सूर्य पहुंच जाता है और तो भूमंडल का उत्तर और दक्षिण का भाग बिल्कुल बराबर तुला हुआ होता है। यही तुला शब्द की सार्थकता है, उसके बाद आगे बढ़कर सूर्य जब वृश्चिक राशि पर पहुंचता है, तो उज्जयिनी पर पड़ने वाली सूर्य की किरणें उतनी ही वक्र होती हैं, जितना बिच्छू का डंक होता है। उससे आगे बढ़ने पर उज्जैन पर पड़ने वाली किरणें और भी अधिक वक्र हो जाती हैं और धनुष के समान दिखायी पड़ती हैं। यह ‘धनु’ का अर्थ है। उसके बाद समुद्र के मध्यगत मकर राशि तक पहुंचकर सूर्य का पुनः उत्तरायण प्रारंभ होता है। मकर का स्वभाव अगाध जल में पहुंचकर पुनः स्थल की और लौटने का है, यही ‘मकर’ राशि की सार्थकता है। वहां से संक्रमण करता हुआ सूर्व सर्वप्रथम जिस स्थल भाग के निकट आता है, वह स्थल भाग किसी समय सम्भवतः घड़े को घोण जैसा था और इसलिए ‘कुम्भघोण’ नाम से प्रसिद्ध है, जहां का स्थल भाग घड़े के घोण जैसा है। कुम्भ राशि का ‘कुम्भघोण’ संभवतः कोई द्वीप था, जो अगाध समुद्र में लुप्त हो गया है।

उससे उत्तर में बढ़ने पर अगाध समुद्र है, जिसमें प्राणी के नाम पर केवल मीनों का निवास है। अतः वह मीन राशि का प्रदेश कहलाया। वहां से आगे संक्रमण करके सूर्य लंकोदय की प्रसिद्ध नगरी लंका तक पहुंचता है और उससे वह ‘वृशस्थ’ कहलाया। वहीं भारतीय कथाओं में ‘वत्सराज (वृष) उदय’ नाम से चित्रित हुआ है। वत्सराज ने नागवन में अपनी प्रेयसी को प्राप्त किया था। यह नागवन वर्तमान मैसूर के पास का प्रदेश है, जहां के वनों में हाथियों की बहुलता है। यही सूर्य मिथुन राशि का स्वामी बनता है। उदय के नागवन में पत्नी से मिलन (मिथुन) की कथा सूर्य के मिथुन राशि पर आने की प्रतीकात्मक अभिव्यक्ति है। मिथुन के बाद सूर्य उदयिनी पति बन जाता है और अपनी प्रेयसी के नगर उज्ययिनी पहुचं कर ‘कर्कस्थ’ होता है। कर्क का स्वभाव स्थल से जल की ओर जाने का होने के कारण वह वापस जल की ओर दक्षिणगामी होता है।

सूर्य के अयन से संबंधित ज्योतिष शास्त्र की यह घटना भारतीय साहित्य में एक रोचक कथा का रूप धारण कर चुकी थी और वृद्धजनों के मुख से यत्र-तत्र सुनी जाती थी, जिसका संकेत कालिदास ने किया हैः- ‘प्राप्यावन्तीमुदुयन कथा को विदग्रामवृान।’ विदेशी दूत मेगस्थनीज ने भी सूर्य की इस कथा का श्रवण भारत के वृद्ध नागरिकों से किया था और उसका वर्णन उद्धरण इस प्रकार है :-

‘हरकुले (स) सौरसेन लोगों का इष्टदेव है। उसके दो प्रसिद्ध नगर हैं, एक मथुरा और दूसरा क्लिसबुरा जिसके पास ऐबोन्नी नदी बहती है। हरकुले (स) की पुत्री पांड्या का राज्य दक्षिण में पाण्डय प्रदेश में है। हरकुले दायोनीस (स) से 15 पीढ़ी बाद हुआ। शिव (शिवी) लोग अपने को हरकुल का वंशज मानते हैं। ‘एज ऑफ नन्दाज एण्ड मौर्याज’ ग्रंथ के पृष्ठ 101 पर श्री नीलकण्ठ शास्त्री ने

इस उद्धारण की व्याख्या करने की कोशिश की है और मदुरा को मथुरा तथा ऐबोत्री को ‘यमुना’ माना है।

यह व्याख्या भ्रामक है। ‘मथुरा ‘ वास्तव में दक्षिण की ‘मदुरा’ नगरी है: जहां कन्याओं के प्रदेश के पाण्डय राज्य की इतिहास प्रसिद्ध राजधानी रही है। क्लिसबुरा और ऐबोनी की व्याख्या में ग्रीक के अनुवादक भूल कर बैठे हैं। क्लिसबुरा वास्तव में क्षिप्रा का ग्रीक रूप है और ऐबोन्नी ‘अवन्ती’ का शुद्ध अर्थ यह है कि दूसरी राजधानी ऐबोत्री है, जिसके पास बिलसबा नदी बहती है। हरकुले (स) ‘हरिकुल’ (सूर्यवंश) का ग्रीक रूप है और दायोनीस (स) ‘दिनेश’ का। हरकुले और दद्योनीस से ध्वनि साम्य होने के कारण मेगस्थनीज ने ये रूप स्वीकृत किये। सिकन्दर से लोहा लेने वाले ‘शिवि’ लोग सूर्यवंशी थे। यह कथा सरित्सागर से स्पष्ट है। अतः शैववाद की कल्पना व्यर्थ है। सौरसेन भी ‘शूरसेन’ से संबद्ध नहीं, सूर्योपासक (सौरसेन) हैं। इस प्रकार मेगस्थनीज के उद्धरण का स्पष्ट अर्थ यह है कि हरिकुलों की दो राजधानियाँ हैं। एक मदुरा और दूसरी क्षिप्रा के किनारे अवन्ती में। मदुरा में पांडय रानी का राज्य है। वह दिनेश से पन्द्रह पीढ़ी बाद हुई। शिविलोग भी हरिकुल के ही हैं।

मेगस्थनीज ने जिस कथा को सुना था, उसकी घटना इतिहास सम्मत भी है और प्रतीकात्मक भी। सूर्य उज्जयिनी में कर्कस्थ होता है और मदुरा में कन्या राशि पर।

परन्तु अब यह प्रश्न उपस्थित होता है कि विक्रमादित्य की इस कहानी के माध्यम से ज्योतिष के विषय स्पष्ट करने का प्रयास भारत के कवि वर्ग ने क्यों किया। पातंजलि के ‘महाभाग्य’ और सोमदेव के ‘कथा-कथा सरित्सागर’ आदि ग्रंथों को देखने से इस विषय पर कुछ प्रकाश पड़ता है। भारतीय शिक्षा शास्त्रियों में किसी समय बहुत बड़ा विवाद रहा है। एक वर्ग वैयाकरणों का था जो यह मानते थे कि विद्यार्थी को सर्वप्रथम व्याकरण का अध्यापन कराया जाये तथा ज्ञान-विज्ञान की भाषा को नियन्त्रित रखा जाये और उसमें अन्तर न होने दिया जाए, इस प्रकार के व्याकरणों के प्रयत्न के फलस्वरूप ‘संस्कृत नामक’ अमरवाणी का जन्म हुआ जो लगभग अढ़ाई हजार वर्षों तक भारत के ज्ञान-विज्ञान की भाषा रही है और जिसमें विविध शास्त्रों का प्रणयन होता रहा। पातंजलि के अनुसार परिवर्तनशील भाषा की गड़बड़ से घबरा कर देवताओं के इन्द्र से प्रार्थना की कि भाषा को नियन्त्रित किया जाये और इन्द्र ने सर्वप्रथम व्याकरण बनाकर उसका अनुशासन कर दिया।

दूसरा वर्ग ऐसे लोगों का था जो भाषा को नियमों से बांधने के पक्ष में नहीं थे, उनका कहना था कि रूक्ष भाषा और नीरस गद्य खंडों में व्याकरण बनाने की आवश्यकता नहीं है। विषय का प्रतिपादन मन्य और मनाइर स्थात्मक पद्यवद्ध गति में किया जाना चाहिय जिससे पाठक का विषय का ज्ञान भी हो जाये तथा अध्ययन में उसकी रूचि भी बनी रहे।

परन्तु खेद की बात है कि इनमें नौरंजकतावादी शिक्षा शास्त्रियों ने इस बात पर ध्यान नहीं दिया कि कथा का मनोरंजक अंश पढ़ते समय पाठकों का मन केवल उसके रंजक अंश में ही लीन रहता है और वह अन्योक्ति के रूप में व्यक्त किये हुए ज्ञान को समझ ही नहीं पाता था। ‘बृहत्कथा’ में संभवतः ज्योतिष, भूगोल, इतिहास आदि अनेक विषयों का मनोहर कथाओं का समावेश किया गया था, परन्तु परवर्ती पाठकों के लिये वह मनोहर कथा मात्र रह गई। वत्सराज उदयन, विक्रमादित्य आदि की कथा सर्वप्रथम बृहत्कथा में लिखी गयी थी और उनके द्वारा ज्योतिष के तथ्यों का प्रतिपादन किया गया था।

ऐसा लगता है कि बृहत्कथा के काल का ज्योतिष शास्त्र बहुत बढ़ा-चढ़ा था। उसके बाद एक बहुत लम्बा समय भारतीय ज्योतिष के पतन का आया, जिस काल का कोई ग्रंथ इस समय विद्यमान नहीं है। इसीलिए ‘स्टैण्डर्ड टाइम’ के अर्थों में किसी प्रयुक्त होने वाले ‘महाकाल’ शब्द का प्रयोग वर्तमान युग में प्राप्त किसी ज्योतिष शास्त्र के ग्रंथ में नहीं मिलता। यद्यपि उज्जैन का उदयकाल ही उन सब में भी प्रमुख उदयकाल माना गया है। ‘स्टॅण्डर्ड टाइम’ के अर्थों में जिस समय महाकाल शब्द का प्रयोग होता था, उस समय के ज्योतिषशास्त्र के विषय में बहुत अधिक अन्वेषण की आवश्यकता है। ‘कथा सरित्सागर’ और ‘बृहत्कथा मंजरी’ आदि की कहानियों के आधार पर ज्योतिष शास्त्र, भूगोल, इतिहास आदि के अनेक तथ्यों का शोध किया जा सकता है।

आशा है विद्वान लोग इस दिशा में कार्य करेंगे और भारतीय ज्योतिष के उस विस्मृत ‘महाकाल’ को पुनः प्रकाश में लायेंगे। इस प्रकार के अन्वेषण से यह भी सिद्ध हो पायेगा कि संस्कृत राशि-नामावली शुद्ध भारतीय है, ग्रीक शब्दावली का अनुवाद नहीं। वास्तव में ग्रीक नामावली ही अनुवाद है। यह भी विदित होगा कि भारतीय कथाओं की बहुत सी नामावलियां वास्तव में परिभाषित शब्दों की बोधक हैं। इससे हमारे सांस्कृतिक समृद्धि का उद्घघाटन भी होगा।

टिप्पणी : पूज्य पिता विख्यात ज्यतिषाचार्य रहे  स्व. सूर्यनारायण व्यास  की तमाम शोध के खिलाफ जाती मेरी इसी शोध को आधार बनाकर वर्ष 2000-2001 में हिन्दी -अंग्रेजी में भारतीय दूरदर्शन ने अपने अन्तर्राष्टीय प्रसारण हेतु ‘काल’ (हिन्दी) और ‘ द टाइम (अंग्रेजी में) श्री राजशेखर व्यास के निर्माण , निर्देशन, लेखन में दो  वृतचित्रो का प्रसारण किया, जिसे संसार के लगभग चौवन देशों से अनेक राष्ट्रीय राजनेता, विद्वानों से, महापुरूषों में असाधारण प्रशंसा व सराहना मिली। इन फिल्यों का अब तक भारतीय दूरदर्शन पर अनेकों बार प्रसारण भी हो चुका है।

पहली बार कादम्बिनी (मार्च 1989) नवनीत (जनवरी 1999) और उसके बाद लगभग 150 अखबार और पत्र-पत्रिकाओं में विभिन्न भाषा में प्रकाशित चर्चित यह शोध गुजराती में प्रख्यात विद्वान- श्री बन्द्रकांत ठक्कर एवं डॉ. किशोर काबरा ने श्री राजशेखर व्यास की इस विलक्षण शोध की न सिर्फ मुक्त कंठ से प्रशंसा की अपितु ‘जन्मभूमि’ एवं ‘गुजरात-समाचार’ के बत्तीस रविवासरीय में इस लेख पर आधारित रंगीन धारावाहिक लेखमाला भी प्रकाशित की है!

इस फिल्म और लेख के प्रशंसकों में मा. भारतेन्दु प्रकाश सिंहल, मा. अशोक सिंहल से लेकर श्रीमंत राजमाता सिन्धिया, श्रीमंत माधवराव सिन्धिया, वसुन्धरा राजे सिन्धिया, नोबेल पुरस्कार विजेता प्रो. अमर्त्य सेन, मनोहर श्याम जोशी, कमलेश्वर, राजीवरत्नशाह से लेकर हमारे आ. प्रधानमंत्री एवं राष्ट्रपति महोदय जैसे महनीय नाम हैं।
( लेखक के बारे मेंः चर्चित लेखक, संपादक, निर्माता-निर्दे शक,  59 से अधिक क्रांतिकारी ग्रंथों के लेखक, 4000 से ज्यादा लेख देश-विदेश के सभी अखबारों में प्रकाशित, 200 से ज्यादा वृत्तचित्र, कार्यक्रम, रूपक, फीचर, रिपोर्ताज टी. वी. पर प्रसारित )

अंग्रेजी राज में मुंबई की शान थे नाना शंकर शेठ

मुंबई में कुछ नाम ऐसे हैं जो हर रोज़ हमारी ज़िंदगी में शामिल हैं, लेकिन हम यह नहीं जानते कि उनके पीछे कितनी बड़ी कहानी छिपी है। सड़कों पर चलते हुए, स्टेशनों से गुज़रते हुए, चौकों पर रुकते हुए हम जिन नामों को पढ़ते हैं, उनमें नाना शंकरशेठ भी शामिल हैं। उनकी मूर्ति है, स्कूल है, सड़क है, चौक है। अब एक स्मारक भी है। लेकिन सवाल यह है कि क्या यह सब उनके कद के बराबर है। और उससे भी बड़ा सवाल यह कि क्या मुंबई ने सच में उन्हें वह जगह दी, जिसके वे हकदार थे।

नाना शंकरशेठ, जिन्हें लोग प्यार से नाना कहते थे, दक्षिण मुंबई में रहते थे, वहीं काम करते थे, और वहीं उन्होंने अपने जीवन की सबसे बड़ी पूंजी इस शहर को सौंप दी। गिरगांव से लेकर मरीन लाइंस और बॉम्बे सेंट्रल तक का इलाका उनकी कर्मभूमि था। इसके बावजूद उनका स्मारक एंटॉप हिल जैसे इलाके में बनाया जाना कई सवाल खड़े करता है। क्या यह सिर्फ़ एक प्रशासनिक फैसला था या फिर इतिहास को हाशिये पर धकेलने की एक और मिसाल।

स्मारक और स्मृति के बीच का फर्क
अक्सर स्मारक राजनीतिक शक्ति प्रदर्शन बनकर रह जाते हैं। पत्थर और कांसे की संरचनाएँ खड़ी कर दी जाती हैं, लेकिन उनके पीछे की आत्मा कहीं खो जाती है। नाना शंकरशेठ के लिए यदि दक्षिण मुंबई में एक स्मारक बनता, तो वह किसी राजनीतिक एजेंडे का हिस्सा नहीं होता, बल्कि एक कृतज्ञ शहर की ओर से सच्ची श्रद्धांजलि होता। लेकिन शायद शहर के निर्णयकर्ताओं को लगा कि यह स्थान किसी और के लिए ज़्यादा ज़रूरी है।
यह विडंबना ही है कि जिन लोगों ने मुंबई की नींव रखी, वही आज सबसे कम याद किए जाते हैं। नाना शंकरशेठ शिक्षा सुधारक थे, समाज सुधारक थे, दानवीर थे, और ब्रिटिश भारत में भारतीयों की आवाज़ भी। इसके बावजूद उनका नाम आज की सार्वजनिक चर्चा में शायद ही आता है।
पारसी योगदान और एक भूली हुई समानांतर कहानी
उन्नीसवीं सदी की मुंबई को आकार देने में पारसी समुदाय का योगदान सर्वमान्य है। जमशेदजी जीजीभॉय, कावसजी जहांगीर, दादाभाई नौरोजी और फिरोज़शाह मेहता जैसे नाम आज भी सम्मान के साथ लिए जाते हैं। डेविड ससून जैसे यहूदी उद्योगपति भी इस सूची में शामिल हैं। लेकिन इसी दौर में नाना शंकरशेठ भी इन्हीं क़दमों से क़दम मिलाकर चल रहे थे।

जीजीभॉय के साथ मिलकर उन्होंने शहर के पहले बड़े शहरी परिवर्तन की नींव रखी। फर्क सिर्फ़ इतना रहा कि पारसी योगदान को समय के साथ याद रखा गया, जबकि नाना शंकरशेठ का नाम धीरे-धीरे समकालीन स्मृति से फिसलता चला गया।
एक बरसी, जो बिना शोर के गुज़र गई
31 जुलाई 2025 को नाना शंकरशेठ की 150वीं पुण्यतिथि आई और चली गई। उस शहर में, जिसे उन्होंने दिल खोलकर दिया, कोई बड़ी हलचल नहीं हुई। कुछ अख़बारों में महाराष्ट्र के राज्यपाल द्वारा उनके स्मारक स्थल पर प्रतिमा का अनावरण करते हुए तस्वीरें छपीं। साथ में शिवसेना प्रमुख उद्धव ठाकरे भी मौजूद थे, लेकिन स्मारक के स्थान पर शायद किसी ने सवाल उठाना ज़रूरी नहीं समझा।
कभी शिवाजी पार्क के पास इंदु मिल की ज़मीन पर उनके स्मारक की बात चली थी। फिर अचानक वह चर्चा ख़ामोश हो गई। जैसे शहर ने तय कर लिया हो कि नाना को बस नामों तक सीमित रखना है, उनकी कहानी को नहीं।

दौलत, भरोसा और गिरगांव का वाड़ा
1803 में जन्मे नाना शंकरशेठ मुरकुटे परिवार से थे, जो सोने-चाँदी और आभूषणों के व्यापार में प्रसिद्ध था। उनका कारोबार इतना भरोसेमंद था कि अरब और अफ़ग़ान व्यापारी अपने धन और कीमती सामान बैंकों के बजाय नाना के पास रखवाना ज़्यादा सुरक्षित समझते थे। गिरगांव में उनका विशाल वाड़ा था, जो हाल के वर्षों में एक ऊँची इमारत के लिए ढहा दिया गया। एक और निशानी, जो समय के साथ मिट गई।

शिक्षा, समाज और भविष्य की नींव
नाना शंकरशेठ ने अपनी ज़मीन और धन को निजी सुख के लिए नहीं, बल्कि सार्वजनिक हित के लिए दिया। उन्होंने ऐसे संस्थानों की स्थापना की, जिनकी सूची मीलों लंबी हो सकती है। बॉम्बे का नेटिव स्कूल, जो आगे चलकर बोर्ड ऑफ़ एजुकेशन बना और फिर एल्फ़िंस्टन कॉलेज के रूप में पहचाना गया। अंग्रेज़ी स्कूल, बालिका विद्यालय, संस्कृत पुस्तकालय, विश्वविद्यालय की स्थापना में सहयोग—यह सब उस दौर में हुआ जब शिक्षा को अब भी एक सीमित वर्ग का अधिकार माना जाता था।
उन्होंने व्यापारियों और उद्योगपतियों की आवाज़ को संगठित करने के लिए बॉम्बे एसोसिएशन की सह-स्थापना की। संग्रहालयों और बाग़ों के निर्माण में दान दिया। जीजीभॉय के साथ मिलकर इंडियन रेलवे एसोसिएशन बनाई, जो आगे चलकर ग्रेट इंडियन पेनिनसुला रेलवे बनी—आज की सेंट्रल रेलवे।

रेलवे और इतिहास की पहली सवारी
भारतीय रेल के इतिहास में नाना शंकरशेठ का नाम एक मील का पत्थर है। 16 अप्रैल 1853 को बॉम्बे से ठाणे के बीच चली पहली यात्री ट्रेन में वे स्वयं मौजूद थे। उस समय ग्रेट इंडियन पेनिनसुला रेलवे के दस निदेशकों में सिर्फ़ दो भारतीय थे—सर जमशेदजी जीजीभॉय और नाना शंकरशेठ। यही वजह है कि मुंबई सेंट्रल स्टेशन का नाम उनके नाम पर रखने की मांग आज फिर उठ रही है।

समाज सुधार और राजनीतिक भूमिका
नाना केवल दानवीर नहीं थे। वे समाज सुधारक भी थे। सती प्रथा के उन्मूलन में ब्रिटिश सरकार ने उनके प्रभाव का सहारा लिया। वे बॉम्बे लेजिस्लेटिव काउंसिल के पहले भारतीय सदस्य बने। एशियाटिक सोसाइटी के सदस्य बने, जब भारतीयों का वहाँ प्रवेश भी आसान नहीं था। डॉ. भाऊ दाजी लाड और सर जॉर्ज बर्डवुड के साथ मिलकर उन्होंने मुंबई को तंग गलियों वाले कस्बे से खुली सड़कों और पेड़ों से सजे शहर में बदलने की योजना पर काम किया।

क्यों नहीं बने वे ‘आइकन’
शायद इसलिए कि नाना शंकरशेठ ने कभी खुद को राजनीतिक प्रतीक नहीं बनाया। उन्होंने सत्ता के बजाय सेवा को चुना। और शायद यही वजह है कि आज उन्हें सिर्फ़ नामों और मूर्तियों में समेट दिया गया है। लेकिन अगर महाराष्ट्र को एक आदर्श नागरिक का उदाहरण देना हो, तो नाना शंकरशेठ से बेहतर नाम शायद ही कोई हो।
मुंबई आज भी उनके योगदान को पूरी तरह स्वीकार नहीं कर पाई है। लेकिन अगर आप ध्यान से देखें, तो शहर के हर कोने में उनकी छाया मौजूद है—स्टेशन में, कॉलेज में, सड़कों में और उस सोच में, जिसने मुंबई को सिर्फ़ एक शहर नहीं, बल्कि एक विचार बनाया।

साभार- https://www.facebook.com/share/p/1Dj56LfKgS/ से

Nana Shankar Sheth, Jagannath Shankarseth, Architect of Mumbai, Mumbai History, Indian Railways History, Great Indian Peninsula Railway, Elphinstone College, Bombay Association, 19th Century Bombay, Philanthropist of India

भारत में दवा प्रतिरोधी तपेदिक के लिए कम अवधि के सभी तरह के मौखिक उपचार किफायती हैं: आईसीएमआर अध्ययन

इंडियन जर्नल ऑफ मेडिकल रिसर्च में प्रकाशित एक आर्थिक मूल्यांकन ने यह प्रदर्शित किया है कि भारत में वर्तमान में उपयोग किए जा रहे दीर्घकालिक उपचारों की तुलना में बहु-दवा प्रतिरोधी और रिफैम्पिसिन-प्रतिरोधी तपेदिक (एमडीआर/आरआर-तपेदिक) के लिए छह महीने की न्‍यूनावधि, पूरी तरह से मौखिक उपचार कम लागत के साथ उपलब्‍ध हैं और यह बेहतर स्वास्थ्य परिणाम प्रदान करती है।

यह अध्ययन आईसीएमआर-राष्ट्रीय तपेदिक अनुसंधान संस्थान (आईसीएमआर-एनआईआरटी) द्वारा किया गया। इसमें राष्ट्रीय तपेदिक उन्मूलन कार्यक्रम (एनटीईपी) के अंतर्गत उपयोग किए जा रहे बेडाक्विलाइन युक्त वर्तमान कम अवधि (9-11 महीने) और लंबी अवधि (18-20 महीने) के उपचार रेजिमेन की तुलना में बेडाक्विलाइन-आधारित उपचार रेजिमेन—बीपीएएल (बेडाक्विलाइन, प्रेटोमैनिड और लाइनज़ोलिड) और बीपीएएलएम (मोक्सीफ्लोक्सासिन के साथ)—की लागत-प्रभावशीलता का आकलन किया गया।

विश्लेषण के अनुसार बीपीएएल उपचार पद्धति अधिक प्रभावी और लागत-बचत वाली है। प्रत्येक अतिरिक्त गुणवत्ता समायोजित जीवन वर्ष (क्यूएएलवाई) के लिए, स्वास्थ्य प्रणाली मानक उपचार पद्धति की तुलना में प्रति रोगी 379 रुपये कम खर्च करती है, जो कम लागत पर बेहतर स्वास्थ्य परिणामों को दर्शाता है। बीपीएएलएम उपचार पद्धति भी अत्यधिक लागत-प्रभावी पाई गई, जिसमें मानक उपचार पद्धति की तुलना में प्रति अतिरिक्त क्यूएएलवाई प्राप्त करने पर प्रति रोगी केवल 37 रुपये का अतिरिक्त व्यय होता है। दोनों उपचार पद्धतियों में दवाओं, अस्पताल जाना और अनुवर्ती देखभाल सहित समग्र स्वास्थ्य देखभाल लागत कम या तुलनीय पाई गई।

बहु-दवा प्रतिरोधी/रिड्यूस्ड तपेदिक (एमडीआर/आरआर तपेदिक) के इलाज में लंबी अवधि, प्रतिकूल प्रभाव और अधिक लागत जैसी महत्वपूर्ण चुनौतियां हैं। कम अवधि की मौखिक दवाइयों से उपचार के प्रति रोगियों की प्रतिबद्धता में सुधार हो सकता है, रुग्णता कम हो सकती है और वे सामान्य जीवन में जल्दी लौट सकते हैं, साथ ही स्वास्थ्य प्रणाली पर बोझ भी कम हो सकता है। ये निष्कर्ष भारत में एमडीआर/आरआर तपेदिक के प्रबंधन के लिए कम अवधि की मौखिक दवाइयों के उपयोग का समर्थन करने वाले महत्वपूर्ण आर्थिक प्रमाण प्रदान करते हैं। उपचार की अवधि को 9-18 महीने या उससे अधिक से घटाकर छह महीने करने से, ये दवाइयां संसाधनों के अधिकतम उपयोग और तपेदिक उन्मूलन की दिशा में प्रगति को गति देने की राष्ट्रीय प्राथमिकताओं के अनुरूप हैं।

अध्ययन से यह निष्कर्ष निकलता है कि बीपीएएल-आधारित उपचार पद्धतियां लागत-बचत करने वाली या अत्यधिक लागत-प्रभावी हो सकती हैं और भारत में दवा-प्रतिरोधी तपेदिक के के लिए प्रतिक्रिया को मजबूत करने के लिए एनटीईपी के अंतर्गत कार्यक्रमगत रूप से अपनाने पर विचार किया जा सकता है।

पूरा अध्ययन इस लिंक पर उपलब्ध है: https://ijmr.org.in/cost-effectiveness.pdf

बहराईच के राजा मानसिंह की शौर्य गाथाएँ

महाराजा मानसिंह का जन्म मार्ग शीर्ष शुक्ल 5, सं. 1877 तदनुसार 10 दिसंबर 1820 ई को बहराइच, उत्तर प्रदेश में हुआ था। इनके पिता जी बहराइच के तत्कालीन राजा रहे। हनुमत पाठक उर्फ मान सिंह का शासकीय समय 1830-1870 तक लिखा मिलता है। उन्हीं के समय 1842 ई. से अयोध्या राज सदन कचहरी के लिए प्रयोग में लाया जाने लगा था। पिता दर्शन सिंह का इंतकाल 1844 ई में हो गया था। 1846 में इनके बड़े पिता बख्तावर सिंह का भी इंतकाल हो गया और पूर्ण सत्ता 1844 से ही मानसिंह के हाथ में आ गई थी। 1857 के गदर में अंग्रेजों का साथ देने के कारण उन्हें अंग्रेजों द्वारा इनाम में बड़ी जागीरें मिली थी। इन्होंने ‘अवध की संधि’ में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी, जिससे सन् 1869 में इन्हें ‘नाइट कमांडर आफ दी स्टार आफ इंडिया’ की उपाधि से विभूषित किया है।

बाद में देश के विरुद्ध अंग्रेजों का साथ देने के कारण उनमें आत्म श्लाघा उत्पन्न हुआ होगा। दरबारी कवियों उनकी देश विरोधी छवि उन्हें बताई होगी।आम जन में उनकी छवि धूमिल हुई होगी और प्रायश्चित स्वरुप उनमें वैराग्य भाव आ गया होगा। सारा ऐश्वर्य त्याग कर वे वृंदावन चले गए और राधा माधव के प्रेम में निमग्न हो गए । उनकी कविता में राधा- माधव प्रेम का चित्रण, प्रांजल भाषा और कवित्त/सवैया छंदों का प्रयोग प्रमुख था। 11 अक्टूबर सन् 1870 ई० को मान सिंह का स्वर्गवास हो गया था।

मानसिंह महाराज को,
छायो प्रबल प्रताप।
सुहृद सुमन सीतल करन,
अरि घन-वन-तन ताप।।
जाकौ जस लखि भुअन में,

चंद चंद अनुरूप।
कबिगन कौ सुरतरु सुभग,
सागर सील स्सरूप

x x x

मानसिंह महाराज को,
सुभा सितारा हिंद
कायमगंज बहादुरी,
के.सी.एस. कल इंद।।

बड़े पिता बख्तावर सिंह और पिता दर्शन सिंह द्वारा अर्जित मेहदौना की जागीर को संभालने और अयोध्या क्षेत्र में शांति और व्यवस्था बनाए रखना महाराजा मानसिंह के लिए चुनौतीपूर्ण कार्य बन गया था। विद्रोही और डाकू लगातार राज्य की सीमाओं को असुरक्षित बनाने की कोशिश कर रहे थे। महाराजा के साहस और दूरदर्शिता ने उन्हें कभी पीछे नहीं हटने दिया। वे सब बाधाओं को पार करते हुए आगे बढ़ते रहे। उनके कुछ प्रमुख बीरोचित कार्य निम्न लिखित हैं –

1.तीन डाकुओं को बंदी बनाना

तीन डाकुओं को बंदी बनाने पर इन्हें 11 तोपों की सलामी, ईरान के बादशाह की तलवार, झालरदार शामला, ताज के आकार की टोपी तथा पालकी उपहार में दी गयी थी।

 

2.बखतावरसिंह को छुड़वाना

उस समय किसी कारण से राजा बखतावरसिंह बादशाही में नजरबन्द थे। महाजन से 3 लाख रुपये लेकर उन्हें भी छुड़ाया और राजा बख्तावरसिंह फिर दरबार में पहुँच गये। महाराजा मानसिंह के सुप्रबन्ध

3.सूरजपूर की गढ़ी फतह करना
किला सूरजपुर रियासत – बहरेलिया क्षत्रिय (सिसोदिया की शाखा) का जिला बाराबंकी में स्थित है। यह महाराजा ब्रह्म सिंह सिसोदिया द्वारा स्थापित रियासत है। उस समय सूरजपूर का तालुक़द़ार बड़ा अत्याचारी था। बादशाह को यह समाचार मिला कि उसने अपनी गढ़ी में 400 बन्दी बन्द रखे हैं जिनको वह लकड़ी इकट्ठा करके जीते जी भस्म करना चाहता है। बादशाह ने राजा बख्तावर सिंह से कहा कि अपने भतीजे को इस दुष्ट को दण्ड देने के लिये आज्ञा दो। राजा साहब बड़ी चिन्ता में पड़ गये क्यों कि मानसिंह की उस समय उमर कम थी परन्तु बादशाह की आज्ञा कैसे टल सकती थी।

महाराजा मानसिंह ने गुप्तचर भेजे तो विदित हुआ कि सूरजपूर के राजा की गढ़ी में 3 हाते हैं। तीन हजार सिपाही हथियारबन्द उपस्थित हैं और ग्यारह तोपें गढ़ी के बुर्ज़ों पर चढ़ी हैं। यह भी निश्चित रूप से विदित हुआ कि परसों सब बन्दी भस्म कर दिये जायँगे। महाराजा साहब ने सोचा कि सेना लेकर चलें तो गढ़ी घिर जायगी परन्तु बन्दी न बचेंगे। इस कारण तीन सौ वीर योद्धा लेकर कुछ रात रहे गढ़ी के पास पहुंचे और चर भेज कर यह जान लिया कि गढ़ी के एक कोने के पहरे वाले किसी काम से गये हुये हैं। महाराजा मानसिंह ने तुरन्त सीढ़ियाँ लगा कर बिना लड़े-भिड़े तीन सौ वीरों के साथ गढ़ी में प्रवेश किया और बन्दियों को और तोपों को अपने अधिकार में कर लिया। गढ़ी वाले चौंके तो चारों ओर से गोलियां चलाने लगे। महाराज मानसिंह ने उन्हीं की तोपें उन पर दागी और दो घण्टे में गढ़ी टूट गई, और अत्याचारी जीता पकड़ लिया गया। गढ़ी के अन्दर एक जगह लकड़ी का ढेर लगा हुआ था। उस दिन जय की दुन्दुभी न बजती तो सारे बन्दी भस्म कर दिये जाते। बन्दी छोड़ दिये गये । उस राजा की एक गढ़ी और थी जिसमें दो हजार सिपाही थे और बहुत सा गोला बारूद और खाने-पीने की सामग्री रक्खी हुई थी। वहाँ ईश्वर की लीला यह हुई कि गढ़ी के रक्षक डर के मारे गढ़ी छोड़ कर भाग गये। बादशाह ने मानसिंह की वीरता से प्रसन्न हो कर उनको राजा मानसिंह बहादुर की उपाधि दी।

4.सीहीपूर के राजा का दमन
सीहीपूर परगना पश्चिम राठ तहसील बीकापुर जिला अयोध्या में स्थित है। वीरता का काम जो बादशाह की आज्ञा से किया गया सीहीपूर के राजा का दमन था। इसपर महाराजा मानसिंह को क़ायमजंग का पद मिला और एक विलायती तलवार जो ईरान के बादशाह ने बादशाह नसीरउद्दीन हैदर को उपहार में भेजी थी उनको दी गई। उनके पीछे कर्नल स्लीमन साहब के कहने से उन्होंने भूरे खाँ डाकू को पकड़ा जो काले पानी भेजा गया। इसके उपहार में बादशाह ने महाराजा मानसिंह को ग्यारह फैर तोप की सलामी दी। यह पद किसी को प्राप्त न था।नाज़िमों की सलामी हुआ करती थी परन्तु महाराजा मानसिंह को इस अधिकार के बिना विचारे सलामी मिली।

5.अजब सिंह डाकू को मारना
अजब सिंह डाकू के मारने पर झालरदार शमला ताज आकार की टोपी मिली। इसके बाद जब वाजिदअली शाह बादशाह हुये तो अजब सिंह डाकू के मारने पर महाराजा मानसिंह को झालरदार शमला और ताज के आकार की टोपी मिली।

6.जगन्नाथ चपरासी डाकू को पकड़ना
जगन्नाथ चपरासी भी बड़ा प्रबल डाकू था। उसके साथ छः सात सौ डाकू रहा करते थे। गाँवों को लूट लेता था और इस पर भी सन्तोष न करके सैकड़ों स्त्री पुरुषों को पकड़ ले जाता और बन्दूक के गज़ लाल करा के उनको दगवाता और उनके इष्ट बन्धुओं से बहुत सा धन लेकर उन्हें छोड़ता था। इसी अवसर पर महाराजा साहेब को एक हवादार भी मिला। तब से हवादार पर सवार हो कर बादशाही ड्योढ़ी तक जाते थे। इस डाकू के पकड़ने में महाराज मानसिंह ने बड़ी वीरता दिखाई थी। अकेले उसको पकड़ने के लिये पहुँचे। उसने कड़ाबीन सर की। वीर महाराज ने लपक कर उसका हाथ उठा दिया। गोलियाँ उनके ऊपर से निकल गई और डाकू पकड़ लिया गया।

7.शाहगंज के विद्रोहियों का दमन
सीहीपुर की भांति शाहगंज की गढ़ी पर विद्रोहियों को परास्त करना भी महाराजा के साहस और चतुराई का प्रतीक बना। इसी समय बागियों ने शाहगंज की गढ़ी घेर ली और महाराजा साहब के लाखों रुपये के मकान खोद डाले और जला दिये और बहुत सा धन लूट ले गये। परन्तु डेढ़ महीने के घेरे पर बड़ी वीरता से महाराजा साहब ने विद्रोहियों को मार भगाया । इसी अवसर पर राजा रघुवीर सिंह के घर का बहुत सा सामान जो अयोध्या में लाला ठाकुर प्रसाद के घर पर धनवावाँ से भेज दिया गया था विद्रोहो लूट ले गये। इसके कुछ दिन पीछे नानपारे के मैदान में पन्दरह हज़ार बागी इकट्ठा हुये। महाराजा साहब बरगदिया के मैदान में बड़ी वीरता से उनसे भिड़ गये। उस समय गोरों की पल्टन भी आ गई थी परन्तु वह हट गई। केवल तीन तोपखाने महाराजा मानसिंह के साथ रहे। एक ही घण्टे के युद्ध में बागी भाग गये। उन्होंने न केवल तलवार और सेना का उपयोग किया, बल्कि कूटनीति और प्रशासनिक उपायों का भी सहारा लिया।

8.हनुमान गढ़ी विवाद का निपटारा
इसके लिए उन्हें राजे-राजगान का पद मिला हुआ था। कई वर्ष पीछे जब हनुमान गढ़ी का झगड़ा उठा तो वादशाह ने महाराजा मानसिंह से कहा कि यहाँ तुम हिन्दुओं के सरदार हो। जैसे तुमसे बने इस झगड़े को निपटा दो।

अन्तिम बादशाह वाजिदअली के समय में एक दुर्घटना हुई। “गुलाम हुसेन नाम का एक सुन्नी फ़क़ीर हनूमानगढ़ी के महन्तों के यहाँ से पलता था। वह एक दिन बिगड़ बैठा और सुन्नियों को यह कह कर भड़काया कि औरङ्गजेब ने गढ़ी में एक मसजिद बनवा दी थी उसे बैरागियों ने गिरा दिया। इस पर मुसलमानों ने जिहाद की घोषणा कर दी और गढ़ी पर धावा बोल दिया। परन्तु हिन्दुओं ने उन्हें मार भगाया और वे जन्मस्थान की मसजिद में छिप गये। कप्तान आर, मिस्टर हरसे और कोतवाल मिरजा मुनीम बेग ने झगड़ा निपटाने का बड़ा उद्योग किया। बादशाही सेना खड़ी थी परन्तु उसको आज्ञा थी कि बीच में न पड़े। हिन्दुओं ने फाटक रेल दिया और युद्ध में 11 हिन्दू और 75 मुसलमान मारे गये। दूसरे दिन नासिरहुसेन नायब कोतवाल ने मुसलमानों को एक बड़ी क़बर में गाड़ दिया जिसे गंजशहीदाँ कहते हैं।

इसके पीछे मुसलमानों ने वाजिदअली शाह को अर्ज़ी दी कि हिन्दुओं ने मसजिद गिरा दी। इसके प्रतिकूल भी कुछ मुसलमानों ने अर्ज़ी भेजी। बादशाह के एक अर्ज़ी पर यह लिखा।

हम इश्क़ के बन्दे हैं
मज़हब से नहीं वाक़िफ़।
गर काबा हुआ तो क्या,
बुतखाना हुआ तो क्या ?

बादशाह ने एक कमीशन बैठाया जिसने महन्तों को जिता दिया। इस न्याय से संतुष्ट होकर लार्ड डलहौज़ी ने बादशाह को मुबारक- बादी दी। परन्तु मुसलमान सन्तुष्ट नहीं हुए और लखनऊ जिले की अमेठी के मोलवी अमीर अली ने हनूमान गढ़ी पर दूसरा धावा मारने का प्रबन्ध किया। बादशाह ने मना किया परन्तु उसने न माना और रुदौली के पास शुजागञ्ज में मारा गया। इसके पीछे बादशाह तख्त से उतार दिये गये और नवाबी का अन्त हो गया।

इस मामले की जाँच में मुसलमानों ने एक फ़रमान पेश किया था जिसमें लिखा था कि हनुमान गढ़ी के भीतर एक मसजिद है। महाराजा साहब को एक चर से यह समाचार मिला कि यह फ़रमान अवध के काजी का बनाया हुआ है और उसके पास दिल्ली के बादशाह नव्वाब शुजाउद्दौला आदि की मुहरें हैं। महराजा साहब ने काजी के, घर की तलाशी ली तो दिल्ली के बादशाहों, नव्वाब शुजाउद्दौला, नव्वाब आसफउद्दौला, नव्वाब सआदतअली खाँ और कई नाज़िमों, की मुहरें निकलीं ।

उन मुहरों को महाराज मानसिंह ने प्रार् साहब को सौंप दिया। प्रार् साहब ने उन मुहरों को देखा तो बनावटी फरमान पर उन्हीं में की कुछ मुहरें लगी थीं। पार् साहब ने उन मुहरों को बादशाही दरबार में भेज दिया। इस कारगुजारी के बदले बादशाह ने राजा मानसिंह को राजे-राजगान का पद दिया। इसके कुछ दिन पीछे लखनऊ की बादशाही का अन्त हो गया और अंगरेजी राज स्थापित हुआ।

9.तीस अंग्रेजों मेमों बच्चों को शाहगंज के किले में सुरक्षित रखा
गदर हो जाने पर फैजाबाद में दो पल्टनें, एक रिसाला और दो तोप- खाने बागियों के हाथ में रहे और सुल्तानपूर की पल्टन भी उनसे मिलने पा रही थी। महाराजा मानसिंह के पास कोई सामान न था तो भी उन्होंने अपना धन और अपना प्राण अंग्रेजों को निछावर करके फैजाबाद के तीस अंग्रेजों मेमों और बच्चों समेत अपने शाहगंज के किले में सुरक्षित रक्खा और आप विद्रोहियों का सामना करने के के लिये डटे रहे । फिर उनको अपने सिपाहियों की रक्षा में गोला गोपालपूर पहुंचा दिया। इसी अवसर में चार मेमें और आठ अंग्रेजी बच्चे घाघरे के मांझा में बिना अन्न-जल मारे-मारे फिरते थे। महाराजा साहब ने सवारियाँ भेज कर उन्हें बुला लिया और पन्द्रह दिन तक अपने घर में रक्खा और फिर उनके कहने पर सौ कहार और 36 पालकी कर के उनको प्रासबर्न साहब के पास बस्ती भेज दिया। इस पर लारेन्स साहब बहादुर ने उनको दो लाख रुपया और जागीर देकर महाराजा का पद दिया और यह भी कहा कि महाराज के वकील को अवध में जमीदारी दी जायगी।

10.खैरख्वाही की प्रशंसा
महाराजा मानसिंह को अंग्रेज़ी सरकार की खैरख्वाही करने पर भी अपने देश की भलाई का विचार रहा जिसका प्रमाण एक परवाना हमारे पास है जो उन्होंने लाला ठाकुरप्रसाद को लिखा था। उसका सारांश यह है:—

“मित्रवर लाला ठाकुरप्रसाद जी,
प्रकट है कि आज-कल लखनऊ खास में सरकारी अमलदारी हो गई है और विद्रोह के कारण हज़ारों आदमी मारे जा रहे हैं। लखनऊ का झगड़ा हमको विदित है इस लिये तुमको लिखा जाता है कि पत्र के पाते हज़ार काम छोड़ कर इस काम को प्रधान मानकर हाकिमों के पास जाकर विनती करके हमको सूचना दो .⁠.⁠. सफलता होने पर तुम्हारी सन्तान का पालन पीढ़ी दर पीढ़ी होगा।”

11’अवध की संधि’ में महत्वपूर्ण भूमिका
इन्होंने ‘अवध की संधि’ में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। 7 फरवरी 1856 को, लॉर्ड डलहौजी ने कथित आंतरिक कुशासन के आधार पर वाजिद अली शाह को पदच्युत करने का आदेश दिया। यह डलहौजी के व्यपगत सिद्धांत के अनुरूप था , जिसके अनुसार यदि किसी राज्य में कुशासन होता तो अंग्रेज उस पर कब्जा कर लेते थे। अवध राज्य को फरवरी 1856 में मिला लिया गया था।

1858 में अवध ने दूसरों भारतीय रियासतें से मिलकर ब्रिटिश राज के ख़िलाफ़ विद्रोह में हिस्सा लिया, प्रथम भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के आख़िरी सैनिक अभियान में। इस विद्रोह को बंबई के ब्रिटिश सेना ने हरा दिया शीघ्र अभियान में। 1859 तक विद्रोहियों छापेमार लड़ाई लड़ते रहे। इस बग़ावत को “अवध अभियान” भी कहलाया जाता है।व्यपगत का सिद्धान्त के ज़रिए अवध के राज्य-हरण करने के बाद ब्रिटिश ने अवध क्षेत्र को उत्तर-पश्चिमी प्रान्त का हिस्सा बना दिया। अवध का उत्तर- पश्चिमी प्रांतों में विलय 1859 में हुआ था।

जिससे सन् 1869 में राजा मानसिंह को ‘नाइट कमांडर आफ दी स्टार आफ इंडिया’ की उपाधि से विभूषित किया गया था।

12.विशम्भरपूर उपहार में मिला
महाराजा मानसिंह को इन खैरख्वाहियों के बदले गोंडा ज़िले का तालुक़ा विशम्भरपूर उपहार में दिया गया और सात हजार रुपये की खिलत मिली और महाराजा की पदवी दी गई। उस सनद की प्रतिलिपि हमारे पास अब तक रक्खी है।

महाराजा मानसिंह का 11 अक्टूबर सन् 1870 ई० को स्वर्गवास हो गया। महाराजा साहब वीर होने के अतिरिक्त बड़े राजनीतिज्ञ और बड़े विद्वान और गुणग्राहक थे। उनके दरबार में पंडित प्रवीन आदि अनेक अच्छे कवि थे और आप द्विजदेव उपनाम से कविता करते थे। उनकी रची शृङ्गारलतिका नायिकाभेद का उत्तम ग्रन्थ है।

लेखक परिचय:

(लेखक भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण, में सहायक पुस्तकालय एवं सूचनाधिकारी पद से सेवामुक्त हुए हैं। वर्तमान समय में उत्तर प्रदेश के बस्ती नगर में निवास करते हुए सम सामयिक विषयों,साहित्य, इतिहास, पुरातत्व, संस्कृति और अध्यात्म पर अपना विचार व्यक्त करते रहते हैं। वॉट्सप नं.+919412300183)

खेत-खलिहान से लेकर गाँव की चौपाल और रईसों की शान था रेडियो

(विश्व रेडियो दिवसः 13 फरवरी)

सडक़ से सरकार तक संचार के माध्यमों में अपने जन्म से लेकर अब तक भरोसेमंद साथी रेडियो रहा है. भारत की आजादी की ख़बर हो या दैनंदिनी गतिविधियों की पुख्ता और सही जानकारी रेडियो से ही मिल पाती है. एक समय हुआ करता था जब रेडियो का मतलब आकाशवाणी हुआ करता था लेकिन अब शहरी इलाकों में एफएम और गाँव-खेड़े के लिए सामुदायिक रेडियो प्रचलन में है. रेडियो एक नए अनुभव की तरह हमारे साथ-साथ चल रहा है. किसी समय रेडियो के लिए लायसेंस लेना होता था तो आज टेक्रालॉजी ने सारे मायने बदल दिए हैं और हथेलियों पर बंद मोबाइल फोन में आप अपना पसंदीदा रेडियो प्रोग्राम, गीत-संगीत सुन सकते हैं. हर साल 13 फरवरी को विश्व रेडियो दिवस सेलिब्रेट किया जाता है तो इसके पीछे भी ठोस कारण है और वह है कि इस दिन 13 फरवरी, 1946 में संयुक्त राष्ट्र रेडियो की स्थापना हुई थी. संयुक्त राष्ट्र के रेडियो लोकतांत्रिक संवाद का सर्वोत्कृष्ट मंच मानता है.

पहली रेडियो सेवा 23 फरवरी 1920 को और पहली खेल रेडियो रिपोर्ट 11 अप्रैल 1921 को प्रसारित हुई थी तब से रेडियो युवा और गतिशील बना हुआ है। भारत में ऑल इंडिया रेडियो का नाम एकजाई कर आकाशवाणी कर दिया गया है.

अमीन सयानी और रेडियो सीलोन एक-दूसरे के पर्याय माने जाते हैं. दुनिया के सबसे पुराने रेडियो प्रसारकों में से एक, रेडियो सीलोन ने अपने 100 वर्ष पूरे कर लिए. ऐसे समय में जब रेडियो एक नई चीज थी और टीवी द्वारा दक्षिण एशिया के मीडिया परिदृश्य को बदलने से दशकों पहले, रेडियो सीलोन ने आधिकारिक तौर पर 16 दिसंबर, 1925 से प्रसारण शुरू किया. यह एशिया का पहला रेडियो प्रसारक था. भारत में निजी रेडियो प्रसारण 1927 में शुरू हुआ, जबकि ऑल इंडिया रेडियो ने 1936 में परिचालन शुरू किया. नीदरलैंड 1919 में सार्वजनिक प्रसारण शुरू करने वाला पहला देश था, जिसके बाद 1920 में अमेरिका ने इसका अनुसरण किया.

आमतौर पर बोलचाल में हम एक संबोधन रेडियो कह देते हैं लेकिन रेडियो और ट्रांजिस्टर में बुनियादी फर्क है. रेडियो एक स्थूल उपकरण है जबकि ट्रांजिस्टर मोबाइल की तरह चलायमान. 1947 में डब्ल्यू. शॉकली के नेतृत्व में बेल लेबोरेटरीज (यूएसए) में ट्रांजिस्टर के आविष्कार ने वाल्व वाले रेडियो का अंत कर दिया।. 1954 में, अमेरिकी कंपनी रीजेंसी ने पहला पूरी तरह से ट्रांजिस्टर वाला रेडियो बनाया और बेचा. हालाँकि अब इसे पीसी या स्मार्टफोन से भी सुना जा सकता है, लेकिन फर्नीचर के रूप में रेडियो का आकर्षण आज भी बरकरार है और समय के साथ इसमें ऐसी तकनीक और कार्यक्षमता जुड़ती गई है जो पहले मौजूद नहीं थी.

रेडियो तकनीक की चर्चा करें तो अब हम विजुअल रेडियो की दुनिया में पहुँच गए हैं. कानों सुनी के साथ अब आँखों देखी रेडियो का जमाना भी आ गया है, इसे विजुअल रेडियो का नाम दिया गया है. विजुअल रेडियो में एक आधुनिक प्रसारण तकनीक है जो पारंपरिक रेडियो की ऑडियो सामग्री को दृश्य तत्वों (विजुअल्स) के साथ जोड़ती है. इसमें रेडियो प्रसारण के साथ-साथ चित्र, वीडियो, ग्राफिक्स, टेक्स्ट, और अन्य मल्टीमीडिया सामग्री को एकीकृत किया जाता है, जिसे श्रोता रेडियो सेट, मोबाइल ऐप, या इंटरनेट के माध्यम से सुनने के साथ साथ रेडियो प्रसारण को देख भी सकते हैं. इसे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के कार्यक्रम मन की बात से भी समझ सकते हैं. मन की बात मूलत: रेडियो पर प्रसारित एक ऑडियो कार्यक्रम है लेकिन रेडियो प्लस यानि रेडियो सेट से इतर जब इसे सोशल मीडिया प्लेटफॉम्र्स पर प्रस्तुत किया जाता है तो उसमें दृश्य भी जोड़ दिए जाते हैं.

सडक़ से सरकार तक रेडियो की उपयोगिता बनी हुई है. खेत में जाता किसान, मजदूरी के लिए जाता मजदूर अपने कंधे पर ट्रांजिस्टर सेट लटका कर सुनते हुए चलता हुआ कहीं भी दिख जाता है. अब नए जमाने में कार में रेडियो ट्यून कर लेते हैं या मोबाइल पर भी ट्यून कर पसंदीदा गीत सुन सकते हैं. इस दौर में सामुदायिक रेडियो का आगमन हुआ और यह दूर-दराज इलाके जहाँ संचार की सुविधा नहीं है, उनके लिए वरदान साबित हुआ. औसतन पंद्रह किलोमीटर रेंज में प्रसारित होने वाले सामुदायिक रेडियो समुदाय विशेष के लिए होता है. खास बात यह है कि इस रेडियो का संचालन भी समुदाय विशेष के लिए किया जाता है. महात्मा गांधी से लेकर इंदिरा गांधी और वर्तमान में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने रेडियो के प्रभाव को समझा और लोगों से सीधा संवाद करने के लिए उसे चुना. ‘मन की बात’ कार्यक्रम से ना केवल आकाशवाणी को आर्थिक लाभ हुआ अपितु देश भर की छिपी प्रतिभाओं को सामने आने का अवसर मिला. कम खर्च, सीमित संसाधन लेकिन एक सौ तीस करोड़ लोगों से संवाद का यह अनूठा प्रयास प्रभावकारी हुआ है.

मध्यप्रदेश के संदर्भ में रेडियो की बात करना सुखद लगता है. जनजातीय विभाग ने आदिवासी बहुल इलाकों में रेडियो प्रसारण के जरिए जनजातीय समुदाय में जागृति लाने एवं मुख्यधारा से जोडऩे का अथक प्रयास किया. वर्ष 2010 में कम्युनिटी रेडियो स्थापना की कार्यवाही आरंभ की गई और 2012 आते-आते आठ कम्युनिटी रेडियो आदिवासी अंचलों में बजने लगे थे. नाम दिया गया ‘रेडियो वन्या’. ‘रेडियो वन्या’ के स्टेट कॉडिनेटर के नाते अनुभव का एक नया संसार रचने का अवसर मिला. ये सभी रेडियो स्टेशन आदिवासी बोलियों में प्रसारित हो रहे थे. चुनौती थी कि बोलियों में प्रामाणिकता एवं शुद्वता की थी सो आदिवासी बोलियों के विशेषज्ञों को आमंत्रित कर हिन्दी में मेरे बनायी गई स्क्रिप्ट को वे बोलियों में बदल देते थे. इस तरह सरकार की अनेक जनकल्याणकारी योजनाओं का लाभ जनजातीय समुदाय को मिलने लगा. इसके साथ ही तब के संस्कृति संचालक श्रीराम तिवारी के प्रयासों से देश का एकमात्र स्वाधीनता संग्राम पर एकाग्र कम्युनिटी रेडियो ‘रेडियो आजाद हिन्द’ का प्रसारण होने लगा.

इस अनुभव के साथ मुझे माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय में कम्युनिटी रेडियो स्थापना के लिए पहले सलाहकार के रूप में जिम्मेदारी दी गई. तत्कालीन कुलपति प्रो. के.जी. सुरेश के साथ ‘रेडियो कर्मवीर’ का प्रसारण आरंभ हो गया. इस वर्ष पद्यश्री से सम्मानित डॉ. रामामूर्ति भी ‘रेडियो कर्मवीर’ की सलाह ली गई थी. इन अनुभवों को एकाग्र कर कम्युनिटी रेडियो पर हिन्दी में पहली किताब कही जा सकती है. कहा जा सकता है कि कम्युनिटी रेडियो के क्षेत्र में मध्यप्रदेश की अलग ही पहचान है. आदिवासी बोलियों में रेडियो प्रसारण वाला मध्यप्रदेश संभवत: अपनी तरह का इकलौता प्रदेश है.

रेडियो का असीमित और स्थायी प्रभाव आज भी बना हुआ है या यों कह सकते हैं कि समय के साथ रेडियो की उपयोगिता में श्रीवृद्धि हुई है. रजतपट और रेडियो का चोली-दामन का साथ रहा है. अनेक नई-पुरानी फिल्मों में रेडियो को प्रभावी माध्यम के रूप में देखा और समझा गया है. हालिया फिल्म ‘मेरी सुलु’ ने जता दिया कि रेडियो जॉकी के लिए खांटी प्रोफेशनल्स होना जरूरी नहीं, बस इस मीडिया के लिए जुनून और जज्बा चाहिए. कहना पड़ेगा मन का रेडियो बजने दे जरा…

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार एवं मीडिया शिक्षा से संबद्ध हैं)

नारी सशक्तिकरण की नई उड़ान: महिला उद्यमिता को अंतरराष्ट्रीय कलाकार देंगे वैश्विक पहचान

इंदौर। लुनिया विनायक ग्रुप ऑफ कंपनीज़ द्वारा संचालित महिला सशक्तिकरण कार्यक्रम के तहत महिलाओं को आत्मनिर्भर बनाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल शुरू की जा रही है। इस विशेष वुमन एम्पावरमेंट प्रोग्राम के अंतर्गत महिला गृह उद्योगों द्वारा निर्मित उत्पादों को राष्ट्रीय ही नहीं बल्कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहचान दिलाने की तैयारी की जा रही है।

ग्रुप ऑफ कंपनीज़ के चेयरपर्सन विनायक लुनिया ने मीडिया से चर्चा करते हुए बताया कि महिला उद्यमियों द्वारा तैयार किए जा रहे उत्पादों की ब्रांडिंग और प्रचार-प्रसार के लिए अंतरराष्ट्रीय कलाकारों और संगीतकारों का सहयोग लिया जाएगा। ये कलाकार इन उत्पादों के ब्रांड एंबेसडर के रूप में कार्य करेंगे और वैश्विक मंच पर भारतीय महिला उद्यमिता की पहचान मजबूत करेंगे।

उन्होंने बताया कि इस योजना के तहत महिलाओं द्वारा निर्मित घरेलू और हस्तनिर्मित उत्पादों को एक संगठित ब्रांड के रूप में बाजार में उतारने की व्यापक तैयारी चल रही है। इससे महिला उद्यमियों को आर्थिक मजबूती मिलने के साथ-साथ उनके उत्पादों को राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय बाजार में बेहतर अवसर प्राप्त होंगे।

लुनिया विनायक ग्रुप ऑफ कंपनीज़ का उद्देश्य इस पहल के माध्यम से महिलाओं को रोजगार, आत्मनिर्भरता और सम्मानजनक पहचान दिलाना है, जिससे वे न केवल अपने परिवार बल्कि समाज और देश की आर्थिक प्रगति में भी महत्वपूर्ण योगदान दे सकें।

भारतीय परिवारों को विभाजित करने का खेल ऐसे हो रहा है

अपने पुरुषों के बिना एक महिला को नियंत्रित करना आसान होता है।
जो पिता होता है,वो अपनी बेटी की सुरक्षा और देखभाल चाहता है।
जो पति होता है वो अपनी पत्नी की सुरक्षा और देखभाल करना चाहता है।
एक बेटा भी अपनी माँ की रक्षा और देखभाल करना चाहता है।
ये तीनों ही पुरुष,एक महिला के जीवन में भावनात्मक रूप से सबसे अधिक जुड़े हुए लोग हैं। उन्हें उस महिला के नुकसान से कुछ भी फायदा नहीं होता, बल्कि उस महिला की भलाई से सब कुछ लाभ होता है।

इसलिए स्वाभाविक है कि उन्हें हटाना आवश्यक बन जाता है ।

सबसे पहले, पिता।
अपनी बेटी के लिए उसकी चिंता को नियंत्रण के रूप में देखा जाता है।
उसका अनुशासन,दमन बन जाता है।
दुनिया के पुरुषों के साथ उसका अनुभव… अचानक अप्रासंगिक हो जाता है।
अगर वो जानना चाहता है कि उसकी बेटी किससे शादी करती है तो उसे अत्याचारी कहा जाता है । वो यह जानना इसलिए नहीं चाहता कि वह अपनी बेटी की स्वतंत्रता से नफरत करता है… बल्कि इसलिए कि वह अच्छी तरह जानता है कि पुरुष एक महिला का जीवन कैसे बर्बाद कर सकते हैं।
पिता के इन पहलुओं पर कभी चर्चा नहीं होती।
केवल एक ही शब्द की अनुमति है: पितृसत्ता।

अब बारी है पति की।
अगर वह परिवार को महत्व देता है, तो वह नियंत्रणकारी है।
अगर वह तुम्हारे मातृत्व को महत्व देता है, तो वह तुम्हें केवल एक गर्भ मानता है जो उसके बच्चे पैदा करेगा।
अगर वह घर के कामों में तुम्हारे योगदान की उम्मीद करता है, तो वह तुम्हारा शोषण कर रहा है।
अगर वह तुम्हारी सुरक्षा को लेकर चिंतित है, तो वह तुम्हारी स्वतंत्रता पर शिकंजे कस रहा है।

याने,सभी निष्कर्ष पहले से ही तय है:
पति को एक अत्याचारी माना जाना चाहिए।
डाइवोर्स को प्रोत्साहित किया जाना चाहिए।
परिवार को कमजोर किया जाना चाहिए।

चलिये,दो महत्व के पुरुष याने पिता और पति तो निपटा दिये।
अब सिर्फ बेटा बचा है। लेकिन वह भी तो एक समस्या ही है।
तो तुम्हें बताया जाता है कि कम बच्चे होना प्रगति है।
तुम्हें बताया जाता है कि अगर बेटा न हो कर बेटी ही हो तो उसे गर्व होना चाहिए।
अगर बेटा हो भी जाये तो तो… वह भविष्य में एक तानाशाह बन सकता है।
इसलिए उसकी मर्दानगी को बेअसर किया जाना चाहिए। यह उसको सुधारना है। ऐसा करोगी तो तुम समाज को बेहतर बनाओगी।
उसे उस तरह का पुरुष नहीं बनना चाहिए जो रक्षा करता हो।

और बस ऐसे ही… पिता हाशिए पर। पति त्याग दिया गया। बेटे का व्यवहार बदल दिया गया।

वे तीन पुरुष जो तुम्हारी भलाई के लिए अपनी जान दे सकते थे, अब तुम्हारी जिंदगी से बाहर हो गए हैं।
तो बचा क्या और कौन :
राज्य।
कोरपोरेट्स ।
एनजीओज ।
और एलिट याने अभिजात वर्ग।
ये सभी वही हैं जिनका तुम्हारे जीवन से कोई भावनात्मक जुड़ाव नहीं है… लेकिन तुम्हारे जीवन पर पूर्ण कंट्रोल है।

असल में जिंदगी एक बड़ी सच्चाई है जिसे वे बोलना नहीं चाहते:
प्रेम के बिना कोई वास्तविक सुरक्षा नहीं है।
भावनात्मक जुड़ाव के बिना किसी को किसी की कोई सच्ची चिंता नहीं है।

और जो महिला अपने सबसे प्रिय लोगों से अलग-थलग पड़ जाती है, उसे नियंत्रित करना कहीं अधिक आसान हो जाता है।
और ऐसी महिलाओं को इसे मुक्ति कहना सिखाया जाता है। यह मुक्ति नहीं है।
यह परित्याग है… जिसे नारीवाद का नाम दे कर सजा कर बेचा जा रहा है।

कविराज लछिराम की जीवन की प्रशस्तियां

लछिराम की वंशावलि

ललकराम हरि भक्त लछि के परदादा रहे मंगलराम दादा राजाओं से सम्मानित थे। पलटनराम रामभक्त पिता ब्रह्मभट्ट रहे लछिराम कविराज राजाओं के आश्रित थे।

जानकीशरण पुत्र रहे अकेले अपने वश में जगदीश, राज, श्याम,चंद्रभाल पौत्रदि थे।।

– डॉ राधेश्याम द्विवेदी ‘नवीन

जीवन परिचय :-

हिंदी में लछिराम नाम के सात कवियों का उल्लेख मिलता है जिनमें सबसे अधिक प्रख्यात हैं 19वीं शती के अमोढ़ा या अयोध्या वाले लछिराम(1841-1904 ई.) हैं। इनका जन्म पौष शुक्ल दशमी, संवत् 1898 (तदनुसार 1841 ई ) में अमोढ़ा परगना के गांव शेखपुरा (जि. बस्ती) में हुआ था। पिता पलटन ब्रह्मभट्ट ब्राह्मण थे।

इसकी पुष्टि इस दोहे से होती है –

वंदीजन लछिराम को नगर अमोढ़ा वास सूर्यवंश उपरोहिती शेखपुरा पुर खास ।।

 

 

राजा अमोढ़ा इनके पूर्वजों को अयोध्या से अमोढ़ा लाए थे। ये कुछ दिन अयोध्या नरेश महाराज मानसिंह (प्रसिद्ध कवि द्विजदेव) के यहाँ राज दरबार में रहे। इस कुल में कवियों की परंपरा विद्यमान थी। जीवन के प्रारंभिक चरण में ही यह रीतिकालीन कवियों से अधिक प्रभावित हुए। ब्रह्मभट्ट कवि प्रायः आश्रय दाताओं की तलाश में अपने काव्य क्षेत्र का विस्तार करने के लिए प्रयत्नशील रहते थे। सं.1904 वि./ 1847 ई. में लछिराम लामाचकनुनरा ग्रामवासी जिला सुल्तानपुर के साहित्य शास्त्री कवि “ईश” के पास अध्ययनार्थ चले गए थे । 5 वर्ष वहाँ अध्ययन करने के बाद अपने घर शेखपुरा चले आए। फिर 16 वर्ष की अवस्था में संवत 1914 वि./1857ई .में इनकी भेंट अयेध्याधिपति राजा मानसिंह “द्विजदेव” से हुई। उन्होंने अपनी पद्धति से लछिराम जी को शिक्षा देकर काव्य रचना में निगुण बनाया। यहीं पर इन्हें “कविराज” की उपाधि दी और अपना आश्रय भी प्रदान किया। मानसिंह के प्रति उन्होंने ‘मानसिंह’ जंगाष्टक’ नामक ग्रन्थ लिख रखी थी। मानसिंह जब तक जीवित रहे तब तक लछिराम को अयोध्या दरबार से 1200 रूपया मासिक पेंशन मिलती रही। उस दरबार में लछिराम के अतिरिक्त जगन्नाथ अवस्थी, बलदेव तथा पं० प्रवीन आदि अन्य कवि भी राजाश्रम में पल रहे थे।

– (डा मुनि लाल उपाध्याय ‘सरस’ कृत – “बस्ती जनपद के छंदकारों का साहित्यिक योगदान” भाग 1 पृष्ठ 41 से उद्धृत )

 

 

राजा मानसिंह द्विजदेव का निधन कार्तिक कृष्णा द्वितीया, सं.1927वि. तदनुसार 10 अक्तूबर 1870 को हुआ था। कहीं-कहीं उनको 1871ई .में मृत्यु दिखाकर त्रुटि दिखाई जाती है। महाराज मानसिंह द्विजदेव जी का जब देहावसान हुआ तो उनके राजकवि शोक सन्तप्त लछिराम जी ने निम्न छन्द पढ़ा था –

कलित कुशासन पै आसनी कमल करि कामधेनु विविध विवुध वर दै गयौ । वेद रीति भेदन सो सुरपुर कीनो गौन । सुमन विमान पै सुरेश आनिलैगयो । कवि लछिराम राम जानकी सनेह रचि । अवध सरजू के तीर भारी जस कै गयो। महाराज राजन को सूबे सिरताजन को । मानो मानसिंह एक सूरज अथै गयो ।

– (डा. मुनि लाल उपाध्याय ‘सरस’ कृत – “बस्ती जनपद के छंदकारों का साहित्यिक योगदान” भाग 1 पृष्ठ 41 से उद्धृत )

 

 

“द्विजदेव” के माध्यम से लछिराम का संपर्क अनेक काव्य रसिक और गुणज्ञ राजाओं से हुआ । उनको आगरा और अवध प्रांत के लगभग सभी राजा और महाराजा जानने और पहचानने लगे थे। जब कभी वह महाराज जी के साथ राज्य कार्य के रूप में अंग्रेजी शान शौकत भरे अवध राज दरबार में जाते थे , जहां कई अपने मंद – मंद स्वरों से छंदों का अजश्र निर्झर प्रवाहित कर हजारों लोगों के अंतर्मन को रसानुभूति प्रदान करता था।

 

महाराजा मानसिंह के संरक्षण में रहने के कारण लछिरामजी कवि रूप में बहुचर्चित हुए और अपने समय के बड़े-बड़े समारोहों के अतिरिक्त साहित्यिक पत्र पत्रिकाओं में भी स्थान पाने लगे।मिश्र बंधुओ ने लछि- राम जी के प्रति अपनी साहित्यिक दृष्टि डाली । आचार्य राम चन्द्र शुक्ल ने इन्हें अपने हिंदी साहित्य के इतिहास में परवर्ती रीतिकाल का सर्वश्रेष्ठ और अंतिम छंदकार माना है। पंडित रामनरेश त्रिपाठी ने इनका साहित्यिक मूल्यांकन किया है। पंडित नक्छेद तिवारी ने उनकी जीवनी लिखी है। उनके प्रिय शिष्य यक्षराज ने इनका साहित्यिक गौरव गान किया है। पंडित राम भरोसे ने लछिराम जी के बारे में पर्याप्त सामग्री जुटाई है। उनके शिष्य बृजेश कवि ने लछिराम को अपना गुरु बनाया है। बिहारी कवि ने लछिराम जी का शिष्यत्व ग्रहण किया है।

 

सम्बद्ध राजघराने :-

लछिराम ने अनेक राज घरानों से जुड़े रहे।

उन्होंने प्रत्येक के नाम पर एक- एक रचना लिखी है। इन प्रमुख राजाओं का नाम इस प्रकार है –

1. महाराज मानसिंह ‘द्विजदेवसी अयोध्या

2. प्रताप नारायण सिंह ‘वीरेश’ अयोध्या

3. राजा शीतला बख्श सिंह ‘महेश’ बस्ती

4. लक्ष्मीश्वर सिंह

5. रावणेश्वर प्रसाद सिंह

6. मुनेश्वर बख्श सिंह

7. मटेश्वर बख्श सिंह

8. महेन्द्र प्रताप सिंह

9. कमला नन्द सिंह ‘सरोज’

 

 

घर और जमीन उपहार में मिला था :-

राजा महेश शीतला बख्श सिंह बस्ती के राजा थे। लछिराम जी जिस समय उनके दरबार में पहुंचे उस समय उनके यहां पुत्र उत्सव का कार्य चल रहा था । लछिराम जी राजा साहब के दरबार में पहुंचकर जो छंद प्रस्तुत किया वह इस प्रकार है –

मंगल मनोहर सकल अंग कोहर से, आनंद मगन पै छट्टान अधिकाती है।

हेरानि हंसिनि कर पद की चलनि , सुर मांग ठूंनकनि पै पियूष सरसाती है।

लछिराम शीतलाबख्श बाललाल जाके, भाल की ललई पै उकती अधिकाती है।

मेष राशि प्रथम मुहूर्त प्रभात उड़यो, कुज लै दिनेश उदयाचल कैराती है।।

 

बस्ती के राजा शीतला बख्श सिंह ने उनके घर के शेखुपुरा के पास इन्हें 50 बीघे का “चरथी” गाँव (वर्तमान दुबौलिया ब्लॉक में स्थित) उपहार में दिया और निवासार्थ मकान भी बनवा दिया था। आज भी इनके वंशज यहाँ पर रहते हैं। अपने आश्रयदाता राजाओं से कवि को अधिकाधिक द्रव्य, वस्त्राभूषण तथा हाथी, घोड़े आदि पुरस्कार में प्राप्त होते रहे हैं।

 

लछिराम और राजा प्रताप नारायण सिंह ‘ददुवा साहब’ :-

महाराज प्रताप नारायण सिंह उर्फ ददुआ साहब महाराज मानसिंह के दौहित्र थे। मानसिंह द्विजदेव के दिवंगत होने पर जब राजा प्रताप सिंह ‘वीरेश’ ददुआ साहब अयोध्या नरेश बने तो कविराज लछिराम के आश्रय दाता भी बने। एक बार राजा साहब ने लछिराम जी से कविता लिखने को कहा तो उन्होनें निम्नलिखित छंद सुनाया था –

वन धन बीच रातो सिंह सो फिरै है फूलि, सागर में बाड़वा अनल गुन जानो मैं।

मंदर दरीन मैं मशाल महाज्योति ज्वाल, मंडलीक मंगल सिसिर सनमानो मैं।

कवि लछिराम महि मंडल अखंडल मैं, वारहो कला को मार्तण्ड अनुमानो मैं।

महाराज वीर प्रताप नारायण सिंह, कौन रूप सबरो प्रताप को बखानो मैं।

 

अयोध्या दरबार में लछिराम जी का आदर होता रहा। इन्होंने प्रताप रत्नाकर’ नामक ग्रन्थ की रचना किया।

 

 

अयोध्या धाम में वास रहा :-

लछिराम जी अयोध्या में रहते थे। वहीं उन्होंने एक राम मंदिर बनवाया; कई कुएँ खुदवाए; और कई बाग़ भी लगवाए थे। अपनी जाति के बहुत से लड़कों के पढ़ने का उन्होंने प्रबंध कर रखा था । सुनते हैं, दो-एक पंडित भी उन्होंने पढ़ाने के लिए रखते थे, और एक पाठशाला भी खोल रखी थी। उनका पुत्र जानकी शरण आठ-नौ वर्ष का रहा है। जो और अपनी माँ और पिता के साथ अयोध्या में रह रहा था। लछीरामजी के शिष्य, यशराज कवि, ने अपने गुरु, कविवरजी की मृत्यु उपरान्त उनके शोक में एक लम्बी कविता लिखी , जिसके कुछ अंश आगे दिया जा रहा है। कविवर जी के विषय में हमने जो कुछ लिखा है, वह उसी कविता के आधार पर है। लछीराम जी के छायाचित्र से मालूम होता है कि वे पुराने ढंग के कवि थे, और पुराने ढंग की पगड़ी पहनते और लाठी बाँधते थे, तथापि पुरानी चाल के जूतों की जगह वे बूट पहनते थे।

 

रीतिबद्ध परंपरा के आचार्य:-

लछिराम रीतिबद्ध परंपरा के आचार्य कवि हैं। उनकी कृतियों में रस, अलंकार, शब्दशक्ति, गुण और वृत्ति आदि रीतितत्वों का लक्षण, उदाहरण सहित, सांगोपांग निरूपण हुआ है। अपनी शास्त्रीय दृष्टि के लिए वह संस्कृत में “काव्यप्रकाश”, भानुदत्त की “रसमंजरी”, अप्पयदीक्षित के “कुवलयानंद” आदि और हिंदी में भिखारी दास तथा केशवदास आदि के ऋणी कहे जा सकते हैं। ढाँचा पुराना होने पर भी उनकी सहज काव्य प्रतिभा रमणीय भाव दृश्य का चित्रण करती है। बस्ती के राजा शीतला बख्श सिंह से, जो एक अच्छे कवि थे, से 50 बीघे भूमि पाई थी । दरभंगा, पुरनिया आदि अनेक राजधानियों में इनका सम्मान हुआ। प्रत्येक सम्मान करने वाले राजा के नाम पर इन्होंने कुछ न कुछ रचना की है, जैसे, मानसिंहाष्टक, प्रताप रत्नाकर, प्रेम रत्नाकर (राजा बस्ती के नाम पर), लक्ष्मीश्वर रत्नाकर, (दरभंगा नरेश के नाम पर), रावणेश्वर कल्पतरु (गिध्दौर नरेश के नाम पर), कमलानंद कल्पतरु (पुरनिया के राजा के नाम पर जो हिन्दी के अच्छे कवि और लेखक थे ) इत्यादि। इन्होंने अनेक रसों पर कविता की है। समस्यापूर्तियाँ बहुत जल्दी करते थे। वर्तमान काल में ब्रजभाषा की पुरानी परिपाटी पर कविता करनेवालों में ये बहुत प्रसिद्ध हुए हैं।

 

रचनाएँ :-

लछिराम की प्रसादगुण युक्त ब्रजभाषा में रचनाएँ है। कुछ के नाम ये हैं – मुनीश्वर कल्पतरु, महेंद्र प्रतापरस भूषण, रघुबीर विलास,लक्ष्मीश्वर रत्नाकर, प्रताप रत्नाकर, रामचंद्र भूषण, हनुमंत शतक, सरयू लहरी, कमलानंद कल्पतरु, मानसिंह जंगाष्टक, , सियाराम चरण चंद्रिका, श्रीकृष्ण भक्ति पर आधारित करुणाभरण नाटक सं०1761वि., प्रेम रत्नाकर, राम रत्नाकर, लक्ष्मीश्वर रत्नाकर, रावणेश्वर कल्पतरु ,महेश्वर विलास ,नायिका भेद, देवकाली शतक, राम कल्पतरु, गंगा लहरी और नखशिख परम्परा आदि उनकी उत्कृष्ट रचनाएँ है।

 

 

लच्छीराम जी के प्रति भावनात्मक उद्‌गार :-

लछिराम जी कारयित्री प्रतिभा के कवि थे। यह अपने साहित्यिक, आकर्षक, भावपूर्ण आकृति से जहाँ भी जाते थे लोग उनको आदर-सत्कार देते थे। काव्यपाठ में इनकी वाणी इतनी बुलन्द रहती थी कि इनके छन्दों को सुनकर अन्य कवि दंग रह जाते थे। बड़े-बड़े राजाओं और महाराजाओं के यहाँ इन्हें सम्मान मिलता था। उनके सम्पर्क में रहकर दर्जनों कवि अच्छी ख्याति पायें। ब्रहृमभट्ट परिवार में उत्पन्न होने के कारण यह चारण परिवार के अवश्य थे किन्तु सम्मान को ही सब कुछ समझते थे। जिस राज दरबार में इन्हें कीमती दुशाला नहीं मिलता था, उस दरबार में पुनः नहीं जाते थे। यही कारण था कि आश्रयदाता राजा लोग इन्हें घोड़े हाथी की सवारी ही नहीं अपितु धन-धान्य देकर विदा करते थे। रीवा के ब्रजेश कवि और कविराज यशराज उनके योग्य शिष्यों में से थे। पंडित बलदेव अवस्थी, द्विजबल देव ,बाबू जगन्नाथ दास रत्नाकर,कविवर भगवंत आदि इनके अत्यंत सन्नीकट के कवि और छंदकार थे। महाराज मानसिंह ‘द्विजदेव’ का साहित्यिक प्यार इन्हें किशोर अवस्था से ही मिला हुआ था।

लछिराम की रचनाओं के कुछ उदाहरण

1.सौंदर्यशृंगार का सवैया

पेंजनी कंकन की झनकार सों,
नासिका मोरि मरोरति भौंहैं।

ठाढी रहै पग द्वैक चलै,

सने स्वेद कपोल कछू उघरौहैं।

यों लछिराम सनेह के संगन,

साँकरे मे पर प्यारी लजौहैं।

छाकी रह्यो रस-रंग अभी,

मनमोहन ताकि रह्यो तिरछौहैं॥

– रीति श्रृंगार (पृष्ठ 238)

 

2.कृष्णअभिसार का सवैया-

मौज में आई इतै लछिराम,
लग्यौ मन साँवरो आनंद-कंद में।

सूनौ संकेत निहारत ही पर्यौ,

साँवरौ आनन घूँघट बंद में।

बोलिबे कौ अभिलाख रचै पै न,

बोल कछू दुख-रासि दुचंद में।

ह्वै रही रैन-सरोज-सी प्यारी,

परी मनों लाज मनोज के फंद में॥

– रीति श्रृंगार (पृष्ठ 239)

3.शिव धनुष भंजन –

रावन बान महाबली और

अदेव और देवनहू दृग जोर्यो।

तीनहू लोकन के भट भूप

उठाय थके सबको बल छोर्यो॥

घोर कठोर चितै सहजै

लछिराम अमी जस दीपन घोर्यो।

राजकुमार सरोज-से हाथन

सो गहि शंभु-सरासन तोर्यो॥

– कविता-कौमुदी, पहला भाग (पृष्ठ 496)

सोलह श्रृंगार परक कवित :-

 

1.

सत सिंगार साजि, कीन्हौ अभिसार जाइ,

जोबन बहार रोम-रोम सरसत जात।

लछिराम तैसी झनकार पैजनी की कर,

कंकन खनक चूरी चारु परसत जात।

झरत प्रस्वेद, मुख चूनर सुरंग बीच,

विहँसत मन सारदा कौ तरसत जात।

दामिनी अमंद सौहें बस रस फंद चंद,

मानों लाल बादर में मोती बरसत जात॥

– रीति श्रृंगार (पृष्ठ 238)

 

2.

चटपटी चाह अंग उपटे अनंग के री,

रंग रावटी ते काम नट की कुमारी-सी।

कबि लछिराम राज-हंसनि सों मंद-मंद,

परम प्रकासमान चाँदनी सँवारी-सी॥

नागरि निकुंज में न हेर्यौ ब्रजचंद मुख,

रुख पै सहेली भई आँखे रतनारी-सी।

भौंहन मरोरति, बिथोरति मुकुत हार,

छोरति छरा के बद, रोष-मद ढारी-सी॥

– रीति श्रृंगार (पृष्ठ 239)

 

3.

सामुहै सुमन बरसाइ सुघराई संग,

लछिराम रंग सारदा हू कौ रितै रहै।

छाती में लगाइ सूम थाती-सौ कमल कर,

सुकुमारताई कों सराहि दुचितै रहै॥

अलक लंबाई, चारु चख चपलाई,

अधरान की ललाई पर हरष हितै रहै।

भाई! मनमोहन,

राई मुख-मंडल पै,

राई नौन बारि घरी चारि लौ चितै रहै॥

– रीति श्रृंगार (पृष्ठ 238)

 

4.

सजल रहत आप औरन को देत ताप,

बदलत रूप और बसन बरेजे में।

ता पर मयूरन के झुंड मतबारे साले,

मदन मरोरै महा झरनि मरेजे में॥

कवि लछिराम रंग साँवरो सनेही पाय,

अरजि न मानै हिय हरषि हरेजे में।

गरजि-गरजि विरहीन के बिदारे उर,

दरद न आवै, धरै दामिनी करेजे में॥

– रीति श्रृंगार (पृष्ठ 240)

 

5.

वार लकवारहिं लपेटि गुण बंधन में,

मन्मथ चक्र लौं सवारि मगरूरी है।

मंजु मपि बलित बहार जा वसन भलो,

राहु रवि-संग मो विलास ब्रजरूरो है॥

लछिराम राधे अंग चंपक बरन पर,

सौहैं करै सौतिन गरब चक चूरो है।

समय सुमन स्याम सुंदर सरूरो फल्यौ,

जूरो सुभ सिखर सुहाग फल पूरो है॥

– साहित्य प्रभाकर (पृष्ठ 434)

 

6.

मरम न खोलैं खरी भरम न बोलैं कछु,

अजब अतोलैं पीर हीयरै धरी रहै।

खान-पान सौरभ सिंगारहु सँवारे कौन,

स्वास में सहेलिन की मति भरमी रहै।

लछिराम कीरति कुमारी छाम तन-मन,

ज्वाला मुखी विरह लपट लहरी रहै।

सौंरि कर साँवरे विहार परमानंद को,

पौरि पर पोखराज माला सी परी रहै॥

– साहित्य प्रभाकर (पृष्ठ 436)

7.

कसनिभुजानि की सुजानिकीकहीन जाति,

उमदानि अंगन अनंग की घनी रहै।

छूटि-छूटि जाते बार विथुरे सुकंधन पें,

लिपिगे सिंगारन बनावति जनी रहै॥

कवि लछिराम जाहि निशान पुरति के हू,

निसापूरि करिबे के ब्यौंत हि ठनी रहै।

रैनि सब जागी अनुरागी दिन हू में बाल,

लाल उर लागिबे की लालसा बनी रहै॥

– साहित्य प्रभाकर (पृष्ठ 435)

 

8. श्रीराम

भानुवश भूषण महीप रामचंद्र वीर,

रावरो सुजस फैल्यो आगर उमंग में।

कवि लछिराम अभिराम दूनो शेषहू सो,

चौगुनो चमकदार हिमगिरि गंग में॥

जाको भट धेरे तासो अधिक परे है ओर,

पंचगुनो हीराहार चमक प्रसंग में।

चंद मिलि नौगुनो नछत्रन सो सौगुनो ह्वै,

सहस गुनो भो छीरसागर तरंग में॥

– कविता-कौमुदी, पहला भाग (पृष्ठ 496)

 

9. शृंगार

प्रीति रावरे सो करी, परम सुजानि जानि,

अब तौ अजान बनि मिलत सबेरे पै।

लछिराम ताहू पै सुरंग ओढनी लै सीस,

पीत-पट देत गुजरैटिन के खेरे पै।

सराबोर छलकै प्रस्वेद कन, लाल भाल,

मदन मसाल वारौ वदन उजेरे पै।

आपुने कलंक सों कलंकिनी बनी हौ लूटि,

और हू को घरत कलंक सिर मेरे पौ॥

– रीति श्रृंगार (पृष्ठ 240)

 

10. श्रीकृष्ण

भीरते अहीरन की बिछलि पर्यो धों कहा,

जितै जलकेलि तू सदा बिहारियत है।

लछिराम औचक उलटि परी अंजन ते,

रुख तिरछोहैं यो पुरुष कारियत है॥

सुमन सिरीष सुकुमार मन मोहन पै,

कहर कटाछन वजर पारियत है।

अजब अधीर वीर वारो जमुना के वीर,

तीरथ के तीर काहू तीर मारियत है॥

– साहित्य प्रभाकर (पृष्ठ 435)

 

11. शृंगार

मोतिन के चौक पुंज पाँवरे पसारि पौंरि,

पूजि पग नखन महावर थरति है।

भूखन वसन पीरे कंकन जंजीरे कर,

मौरी माल वंदन प्रभावर धरति है॥

लछिराम अरविंद स्याम अंजली से राखि,

नवल किसोरी भोरी भाँवरि भरति है।

थारन में छलकै रतन सुवरन भार,

भोर ही सों गौरी की निछावरि करति है॥

– साहित्य प्रभाकर (पृष्ठ 436)

 

12. भ्रांति

उरज महेश उदै बदन सुधाकर कौं,

बेनी बंक लोचन त्रिबेनी रंग आला है।

बेंदी भाल बेसरि बुलाक विहँसनि सीरी,

मदन मरोरही के कतरै कसाला है॥

तीरथ अरत प्रतिबिंबित पराग-पग,

लछिराम खोलें तीनों तापन दिवाला है।

साला सी रतन रतनाकर विसाला ब्रज,

जालापापकाटिबे को बालाहै कि माला है॥

— साहित्य प्रभाकर (पृष्ठ 435)

 

13. शृंगार

आए कहूँ अनंत विहार करि मंदिर में,

सामुहै झमकि छवि दामिनी की छौरै है।

आरस-बलित बागौ मगरजी ढीली पाग,

बदन चंद्र भाल भौहन के कोरै हैं॥

भरम खुल्यौ न अंग परसत मोहिनी कौ,

लछिराम सान सँग मोहन मरोरै हैं।

लोचन सुरंग हेरि बाल के सरोष मानी,

रंगसाज मदन मजीठ रंग-बोरै हैं॥

– रीति श्रृंगार (पृष्ठ 239)

 

 

14.श्री रामजी

भरम गवावै झरबेरी संग नीचन ते,

कंटकित बेल केतकीन पै गिरत है।

परिहरि मालती सु माधवी सभासदनि,

अधम अरूसन के अंग अभिरत है॥

लछिराम सोभा सरवर में विलास हेरि,

मूरख मलिंद मन पल ना थिरत है।

रामचंद्र चारु चरनांबुज बिसारि देश,

बन-बन बेलिन बबूर में फिरत है॥

– कविता-कौमुदी, पहला भाग (पृष्ठ 496)

 

15. श्रृंगार

बदल्यो बसन सो जगत बदलोई करै,

आरस में होत ऐसो या में कहा छल है।

छापहै हरा की कै छपाए हौ हरा को छाती,

भीतर झगा के छाई छबि झलझल है।

लछिराम हौं हूँ धाय रचिहौ बनक ऐसो,

आँखिन खबाये पान जात क्यों अमल है।

परम सुजान मनरंजन हमारे कहा,

अँजन अधर में लगाए कौन फल है॥

– रीति श्रृंगार (पृष्ठ 239)

 

16.कृष्ण प्रेम

स्याम घन रंग तेज तरल त्रिभंग सौहै,

लोचन सनेही सीख मानि रहिबो करो।

लछिराम चौचंद चवायन परोसिनी तैं,

बंद करि कान सानमान सहिबो करो॥

त्रिभुवन वारि नट नागर मुकुट पर,

साखन दै गौरि मन कह गहिबो करो।

अभिलाख लाखन धरौंगी पौरि ताखन पै,

माख न करौंगी ब्रज लाख कहिबो करो॥

– साहित्य प्रभाकर (पृष्ठ 435)

यज्ञराज की ‘शोकप्रकाश’में दी गई श्रद्धांजलि:-

अब हम कविराज लछिराम के परम शिष्य यज्ञराज कवि की ‘शोकप्रकाश’ नामक कविता का कुछ अंश यहाँ प्रस्तुत करते हैं-

श्रीकविवर लछिराम हाय! बैकुंठ सिधारे;

यज्ञराज तब शिष्य सुनत दुख लह्योअपारे।

बैठि गयो करि हाय, कहूँ कछु सूझतनाहीं;

किधों साँच कै झूठ,हायबूझौं क्यहि पाहीं?

मुख ते कढ़े न बैन, नयनआँसू बह झरझर;

आवन लगी उसाँस, गातकाँपै सबथर-थर।

होय नहीं मन धीरु पीर उर असहन बाढ़ी;

भाँत-भाँति की उठै चित्त में चिंता गाढ़ी।

जीवनजानि अनिस्य लह्यो धीरज मन माहीं

लछीराम को मरन सोचिवे लायक नाहीं।

मरन सोचिबे जोग जाहि मारै भुजंग डसि;

पावकजरि,जलडूब,मरैविषखाय,मारिअसि

सुजस नाम विख्यात नहींजाको जग माहीं;

मानुष-तन जो पाय सुकृतकीन्हींकछुनाहीं।

यहि बिधि के सब जीव मरेपरजमपुरजाहीं;

इनसबकोसुनिमरनसाधुजनअतिपछिताहीं।

सरस सकल साहित्यईस-कविताहिपढ़ायो;

रचना रुचिर कबित्त माहिं बहु प्रेम बढ़ायो।

मानसिंहद्विजदेवजगत-बिख्यातअबधपति,

सुनि कबित्त है दानेरीझिसम्मानकियोअति।

श्रीयुत सब गुनधाम श्रीनगर को सिरताजा;

कमलानन्द ‘सरोज’सराहतसुकवि-समाजा।

बूढ़ेपन में मिल्यो आय इनसों कविराजा;

करत बारतालापदुहुन को दोउसुख साजा।

भूपति कमलानन्द दान दीन्हों बहुतेरो;

अंकमालिका भेंटि कियो सनमान घनेरो।

एक-एक रचि ग्रन्थ इते भूपन को दीन्हों;

दै कवित्त लै बित्त चित्त सबको हरि लीन्हों।

गरजनि सिंह-समान सभा मैंश्रीकविबरकी;

सुनतससंकितसहमिकौनकीमतिनहिथरकी

रचना रुचिर कवित्त जुक्ति साँचे में ढार्यो;

जनु रसिकन के हेतु मैन को बान सँवार्यो।

मानसिंह द्विजदेवजगतबिख्यातअबधपति,

सुनिकबित्तहै दाने रीझिसम्मानकियो अति।

श्रीयुत सब गुनधाम श्रीनगर को सिरताजा;

कमलानन्द ‘सरोज’सराहतसुकवि समाजा।

बूढ़ेपन में मिल्यो आय इनसों कविराजा;

करत बारतालाप दुहुनकोदोउ सुख साजा।

भूपति कमलानन्द दान दीन्हों बहुतेरो;

अंकमालिका भेंटि कियो सनमान घनेरो।

एक-एक रचि ग्रन्थ इते भूपन को दीन्हों;

दै कवित्त लै बित्त चित्त सबको हरि लीन्हों।

गरजनि सिंह-समानसभा मैंश्रीकविबर की;

सुनतससंकितसहमिकौनकीमतिनहिथरकी

रचना रुचिर कवित्त जुक्ति साँचे में ढार्यो;

जनु रसिकन के हेतु मैन को बान सँवार्यो।

अचल अवध के बीच राम मन्दिर बनवायो;

वन-प्रमोद जहँ सीय राम अतिसै सुपायो।

सदा औधपुर बास सुखद सरजू-जल-सेवा;

लषन-राम-सिय छोड़ि औरदूसर नहि देवा।

भगवंत कवि की काव्यांजलि :-

प्रतापगढ़ (अवध) के भगवंत कवि ने लछि रामजी की मृत्यु पर एक पद्य कहा है। उसे भी हम नीचे देते हैं-

अंस निज सुत मैं प्रसंस जगती के तल

रचना-सकति राखे सिष्यनि के हृद मैं;

सूझ भगवन्त मैं सु बूझ कबि ज्ञानिन में

रीझ राखी नृपनि औ’ खीझ बैरी सद मैं।

कवि लछिराम कीनी चातुरी चलत एती

बानी बरवानी ज्ञान राखे बेद-नद मैं;

घन राखे भौन मैं सुख सब सामुहे मैं

तन राखे चौखट औ’ मन राम-पद मैं।

– महावीरप्रसाद द्विवेदी रचनावली खंड-5 (पृष्ठ 175)

बिहारी कवि की शोकांजलि :-

लछिराम जी का निधन पर इनके योग्य शिष्य बिहारी कवि ने जो शोकांजलि प्रस्तुत की निम्नलिखित है।यह शोकांजलि आचार्य कवि लछिराम भट्ट प्रबन्ध में भी है।

भूषन के रस के रसांग ध्वनि लक्षना के, काव्य सुधा सिन्धु के बिहारी वेसआशा के।

आन, बान, शान से बिताये दिन जीवन के, पूर्ण काम कीन्हे सवै निज अभिलाषा के ।

आदर महान सम्मान करते थे सभी,

राजे महाराजे बिज्ञ सुघर अवासा के ।

पुनः

संभवत्रिकाल में नअब है न हो सकेंगे ऐसे, लछिराम जैसे महाकवि ब्रजभाषा के।

XXX

छन्दन में धारै शब्द रस अनुकूल वृत्ति, भाव भरते थे भव्य भूरि बरवानी के ।

X X X

उक्तिमुक्तिकल्पनाअनोखीचोखीबोलिबोलि,

मन्त्र-मुग्ध करते रहे वे प्रान प्रानी के ।

X। X। X

काव्य रत्नाकर को मथि के अमोल रत्न, विश्व में बिहारी बगराये सुखदानी के ।

X। X X। X।

काबिन में रवि महाकवि लछिराम भये, लाडले सपूत वर भारती भवानी के ।

मूल्यांकन:-

लछिराम एक प्रसिद्ध तथा व्यापक प्रचार प्रसार वाले राज कवि थे। उस समय भारत के प्रत्येक कोनो में इनको अच्छी ख्याति मिल चुकी थी। आचार्य कवि लछिराम भट्ट नामक विषय पर डा. राम फेर त्रिपाठी ने शोध प्रवन्ध प्रस्तुत किया है। इसको , अन्य तत्कालीन साहित्य तथा परिवारी जनों से व्यक्तिगत सम्पर्क कर डा. सरसजी ने भी इनका बहुत उच्चकोटि का मूल्यांकन बस्ती जनपद के छन्दकारों का साहित्यिक योगदान भाग एक के पृष्ठ 57 पर किया है-“आचार्य कवि लछिराम भट्ट बस्ती जनपद के छन्द परम्परा के विकास के वर्चस्वी छन्दकार थे। पीताम्बर से लेकर लछिराम तक जो छन्द परम्परा का विकास बस्ती जनपद के काव्य भूमि पर सतत रुप से हुआ उसमें छन्द परम्परा के आदि चरण के स्थाई स्तम्भ के रुप में लछिरामजी ने परवर्ती छन्दकारों को मानक छन्द विधान प्रस्तुत किया और भविष्य के लिए एक एसी छन्द परम्परा का मार्ग दर्शन दिया है, जिसमें छन्दों के आचार्य रंगपाल जी, बलराम मिश्र द्विजेश, जनार्दन नाथ त्रिपाठी गोपाल, राम चरित पाण्डेय पावन आदि के मध्य चरण को सुविकसित और पल्लवित किया है। संक्षिप्त में जनपदीय छन्द परम्परा को विकसित, पुष्पित और पल्लवित करने में लछिरामजी का योगदान गौरवशाली और स्तुत्य रहा है।”

 

लेखक परिचय:-

(लेखक भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण, में सहायक पुस्तकालय एवं सूचनाधिकारी पद से सेवामुक्त हुए हैं। वर्तमान समय में उत्तर प्रदेश के बस्ती नगर में निवास करते हुए सम सामयिक विषयों,साहित्य, इतिहास, पुरातत्व, संस्कृति और अध्यात्म पर अपना विचार व्यक्त करते रहते हैं। वॉट्सप नं.+919412300183)

बस मनुस्मृति का विरोध करना है क्यों करना है किसी को पता नहीं

पितृसत्ता दिल्ली के कुछ शैक्षणिक परिसरों का प्रिय शब्द है। जैक डार्सी को भारत बुलाकर स्मैश ब्राह्मिनिकल पैट्रिआर्की का नारा लगाने वाले हमने देखे हैं। वह कुछ ऐसा था कि पितृसत्ता यदि ब्राह्मणिक हो तो ही आपत्ति है, किन्तु यदि वह शूद्रवादी हो या क्षत्रियवादी हो या वैश्यवादी हो तो उसे स्मैश नहीं करना है। कि यदि वह पितृसत्ता क्रिश्चियन हो या यहूदी हो या इस्लामी हो तो पाली पोसी जायेगी पर यदि वह ब्राह्मणिक है तो स्मैश करेंगे।
इस बुद्धि के लिए ऐसे परिसरों में शिक्षा सब्सिडाइज होती है। पर चलिए अब इसी बात को मनुस्मृति के दंडविधान की सापेक्ष तुलनाओं से समझें।
बाइबल यह कहती है कि Anyone who curses his father or mother must surely be put to death (Exodus 21:17; Leviticus 20:9). कि जो भी अपने पिता या माता को गाली देता है या कटु वचन कहता है, उसे मार ही डालना चाहिए। ध्यान दीजिए must शब्द पर। ध्यान दीजिए surely शब्द पर। बाद में जीसस भी एक प्रसंग में इस कमांड की पुष्टि करते हैं। तब प्रसंग ऐसे लोगों का है जो अपने पैरेंट्स का पोषण न करने के लिए रिलीजस परंपराओं का हवाला दे रहे थे।
आप देखिए अपराध और दंड के इस अनुपात को। पैरेंट्स को दुर्वचन कहे कि मरे।
इसकी तुलना में मनुस्मृति क्या कहती है? उसके अनुसार :
पिताऽचार्यः सुहृत्माता भार्या पुत्रः पुरोहितः ।
नादण्ड्यो नाम राज्ञोऽस्ति यः स्वधर्मे न तिष्ठति ॥
न तो पिता न आचार्य न मित्र न माता न पत्नी न पुरोहित राजा के लिए अदंड्य हैं जो स्वधर्म का पालन नहीं करते। पिता या माता यदि बच्चे के प्रति अपने कर्त्तव्य निर्वहन में लापरवाह है तो भी और आचार्य या पुरोहित यदि अपने कर्त्तव्य के प्रति असावधान है तो भी।
और यदि संतति गड़बड़ करे तो मनु कहते हैं कि
मातरं पितरं जायां भ्रातरं तनयं गुरुम् ।
आक्षारयंशतं दाप्यः पन्थानं चाददद् गुरोः॥
कि जो माता, पिता, पुत्री, भाई, पुत्र या गुरु में बिगाड़ पैदा करता है, उनके बीच दरार डालता है, उस पर सौ (पण) का दंड लगायें, उस पर भी जो गुरु की राह रोकता है। यानी एक तरह का आर्थिक दंड।
आक्षारयं का अर्थ मेधातिथि ने बदनाम करने या बिगाड़ पैदा करने से लिया है। गोविंदराज, कुल्लूक और राघवनंद ने किसी अपराध से लिया है और नंदन ने उन्हें क्रुद्ध करने से लिया है।

अब आप ही फ़ैसला करें कि किस व्यवस्था में पितृसत्ता रचने की ज्यादा संभावना है? पैट्रिआर्की का शब्दशः अर्थ होता है- द रूल ऑफ द फादर। अत: पिता को curse करने पर यदि मार ही डाला जाये तो कोई विद्रोह की गुंजाइश ही नहीं रहेगी।

वैसे दोनों के प्रति फेयर हों तो यह स्मरण करना जरूरी है कि बाइबिल ने सिर्फ पिता की बात नहीं, माता की बात भी की।उधर मनु सिर्फ माता पिता की बात नहीं करते, वे भार्या, आचार्य, पुरोहित, पुत्र, पुत्री, गुरु, पुरोहित, मित्र सबकी बात करते हैं। उधर मनु का कहना यह है कि : ब्राह्यस्य जन्मनः कर्त्ता स्वधर्मस्य च शासिता। बालोऽपि विप्रो वृद्धस्य पिता भवति धर्मतः॥ यानी यह कि विद्वान बालक वृद्ध का पिता होता है। यानी वर्ड्सवर्थ का वह Child is the father of man की बात मनु के यहाँ सिद्ध होती है पर मनु मनु हैं। वे जेनेरिक बात कहने की जगह क्वालिफ़ाइड बात करते हैं। ज्ञान उनके यहाँ आत्यन्तिक मूल्य है। वे अंगिरा वंश के ‘शिशु’ नामक मंत्रदृष्टा विद्वान् का उदाहरण देते हैं जिसने अपने पिता के समान चाचा आदि को पढ़ाया और उन्हें पुत्र कहकर सम्बोधित किया जिससे उन चाचा आदि पितरों ने गुस्से में उसके औचित्य के सम्बन्ध में अन्यों को पूछा तब सभी विद्वानों ने एकमत होकर उनसे कहा कि तत्त्वदर्शी शिशु ने न्यायोचित सम्बोधन किया है। मनु के यहाँ जन्म नहीं, ज्ञान तय करता है कि कौन पिता है कौन बालक।

अज्ञो भवति वै बालः पिता भवति मन्त्रदः ।
अज्ञं हि बालमित्याहुः पितेत्येव तु मन्त्रदम् ॥
न हायनैर्न पलितैर्न वित्तेन न च बन्धुभिः । ऋषयश्चक्रिरे धर्म योऽनूचानः स नो महान् ॥
क्योंकि जो विद्या- विज्ञान से रहित है वह बालक और जो विद्या-विज्ञान का दाता है उस बालक को भी पिता मानना चाहिए क्योंकि सब शास्त्रों और आप्त विद्वानों ने अज्ञानी को ‘बालक’ और ज्ञानदाता को ‘पिता’ कहा है ॥
न अधिक वर्षों का होने से, न श्वेत बाल के होने से, न अधिक धन से, न बड़े कुटुम्ब के होने से मनुष्य बड़ा होता है, किन्तु ऋषि-महात्माओं का यही नियम है कि जो हमारे बीच में वेद और विद्या-विज्ञान में अधिक है, वही बड़ा अर्थात् वृद्ध पुरुष है।
ब्राह्मणिक पैट्रिआर्की की ज्ञानमूलक प्रकृति मूर्खों को समझ कभी न आएगी। वे तो बिब्लिकल ट्रीटमेंट को ही डिजर्व करते हैं।

(लेखक मध्य प्रदेश के सेवा निवृत्त आईएएस अधिकारी हैं और मध्य प्रदेश के चुनाव आयुक्त हैं)

हजारों साल पुरानी हिंदू पहचान और हिंदू गौरव को लांछित करने का खेल

प्राचीन काल से हिंदू समाज की मुख्य विशेषता जो संसार भर के पर्यटक भी मानते थे और विद्वान तो मानते ही थे, वह यह थी कि यहां समाज की सभी इकाइयां कुल, वर्ण,और आश्रम, श्रेणि, संप्रदाय, आदि बहुत ही व्यवस्थित और बहुत स्पष्ट रूप से प्रतिपादित थे और उनका पालन सुनिश्चित करना स्थानीय पंचायत से लेकर राज्य तक का कर्तव्य सुनिश्चित था। प्रश्न यह नहीं है कि यह अच्छा था या बुरा। उस पर चर्चा अलग से करते रहेंगे। परंतु यह था, इस पर तो सर्वानुमति है। विश्व में सर्वमान्य है।

इसी प्रकार यह भी विश्व में इस समय सर्व ज्ञात है कि यह जो भारत का बचा हुआ क्षेत्र है इसमें एक राज्य नाम की इकाई है वह सुपरिभाषित है। उसकी इकाइयां, उसकी गतिशीलता, उसकी कार्य पद्धति सब कुछ  परिभाषित है और विधिक रूप से केवल यह राज्य ही मान्य है। राज्य की तीनों इकाइयां विधायिका कार्यपालिका और न्यायपालिका अधिकार संपन्न भी है प्रभुता संपन्न है और विधिक रूप से मान्य है।  परंतु इसके अतिरिक्त और कुछ भी स्वतंत्र रूप से विधिक मान्य नहीं है, राज्य के द्वारा जो कुछ मान्य हो वही विधिक रूप से मान्य है इस समय भारत में। जोकि पहले कभी नहीं था। यह बताने का भी उद्देश्य कोई निंदा या प्रशंसा नहीं।

 

मुख्य बात यह है कि ऐसा है। तब ऐसी स्थिति में जो चीज राज्य के स्तर पर और विधि के स्तर पर मान्य ही नहीं है उसको लेकर जो भी संगठन बात करते हैं वह या तो यह घोषणा करें कि शासन उनके अनुकूल होने पर वे उसे मान्यता दिलाएंगे या फिर यह मान लिया जाए कि वह कुछ निरर्थक हवाई बातें करते हैं और उनके जीवन का उस विषय में कोई लक्ष्य नहीं है, कोई प्रयोजन नहीं। ऐसे दो अत्यंत महत्वपूर्ण शब्द इस समय जो चल रहे हैं, वह हैं राष्ट्र और समाज। विधिक स्तर पर ना तो राष्ट्र की कोई परिभाषा है केवल नेशन स्टेट की ही परिभाषा विधि के स्तर पर है, इसके अतिरिक्त राष्ट्र क्या है यह कोई नहीं जानता और कोई जानता भी हो तो कोई अन्य उसे मानता नहीं है। इसी प्रकार समाज। समाज के विषय में कैसी भीषण अस्पष्टता है,  इस पर हम आगे चर्चा करेंगे।

समाज यानी क्या?
यहां मैं भाषा शास्त्र या धातु मूल या शास्त्रीय पद के रूप में इसकी विवेचना नहीं करूंगा। वह अलग से करेंगे ।वह स्वतंत्र विषय है। अभी हम व्यावहारिक राजनीतिक विषय पर चर्चा कर रहे हैं। इन दिनों कोई भी राजनेता जो भाषण आदि में “हिंदू समाज“ शब्द बोलते हैं, वह हिंदू समाज नाम की किसी सत्ता को बिल्कुल नहीं मानते वह हिंदू समाज के विषय में कोई धारणा ही नहीं रखते। जब जैसे लोग हुए, जहां लगता है कि हिंदू समाज शब्द बोल देना चाहिए वहां बोल देते है। यह सब प्रकार से परीक्षण के बाद मैं लिख रहा हूं।

भारत के सभी समकालीन महत्वपूर्ण और गंभीर राजनेता जब समाज शब्द बोलते हैं या संबोधित करते हैं तो वह भारतीय समाज नामक एक काम चलाऊ या काल्पनिक या मनमानी अवधारणा बोलते हैं। वह हर बात भारतीय समाज के लिए बोलते हैं। जिसमें उनके अनुसार हिंदू मुस्लिम ईसाई तथा अन्य लोग हिंदुओं के अन्य अंग जैन बौद्ध सिख आदि तथा जो नवबौद्ध भीमवादी आदि और अन्य अनेक समूह इसी प्रकार के शामिल हैं, उनको ही भारतीय समाज बोलते हैं और संपूर्ण भारतीय समाज के हित या कल्याण का दावा करते हैं। इस प्रकार वे एक ही स्ट्रोक में भारत के इतिहास को शून्य कर देते हैं।

कोई एक हिंदू समाज था जिस पर या तो बाहर से कोई आक्रमण हुआ या भीतर के लोग बदल गए और उसके नाश के लिए प्रयास करने लगे या विदेश से प्रभावित होकर मुसलमान ईसाई आदि बन गए और अपनी एक अलग पहचान बनाने लगे और अपने को एक अलग समाज या कौम कहने लगे और इस कौम को हिंदुओं का प्रतिस्पर्धी घोषित करने लगे और हिंदू पूजा पद्धति जीवन शैली विचार दर्शन सबको अज्ञान या गवाँर पन कहने लगे। इस सब बात को वह सब नेता पचा जाते हैं। केवल यही तक बात रहे तो कोई समस्या नहीं। परंतु फिर ऐसे नेताओं को भारत के इतिहास के विषय में कभी कुछ नहीं बोलना चाहिए। उन्हें बोलने का अधिकार ही नहीं है।

ऐसी स्थिति में जब यह नेता शताब्दियों की गुलामी की बात करते हैं तो वे भाषा के स्तर पर बहुत बड़ा घपला करते हैं और समाज में अंधेरा फैलाते हैं क्योंकि कभी यह बताते नहीं कि कौन गुलाम था? क्या भारत के सब मुसलमान गुलाम थे या भारत के सभी ईसाई गुलाम थे?  कौन गुलाम थे?

यह तो वह कभी बताते ही नहीं कि गुलामी से उनका आशय क्या है? क्या कहीं से सेना आकर जीती थी पूरे समाज को या कहीं छलबल से फैल गए थे? गुलामी का क्या अर्थ होता है?  संसार भर में गुलामी किसे कहते हैं?  कुछ नहीं बताते।

क्या आपकी प्रभुता का हरण करना या आपकी प्रभुता में हिस्सा बटा लेना या आपकी प्रभुता को कुछ कम कर देना गुलामी कहलाता है?  यह संसार की किस परिभाषा में गुलामी कहा जाता है?
अभी अधिक महत्वपूर्ण प्रश्नों पर विमर्श करते है।

हिन्दू समाज की संरचना का प्रश्न
इस विषय में सबसे महत्वपूर्ण प्रश्नह है, हिन्दू समाज की संरचना का। हिन्दू समाज की संरचना क्या रही है?  इसे जानने के क्या-क्या उपाय हैं? एक तो धर्म शास्त्र हैं। जिनमें मुख्य हैं – मानव धर्म शास्त्र, याज्ञवल्क्य स्मृति, कौटिल्य का अर्थशास्त्र, महाभारत और वाल्मीकीय रामायण आदि। इनके ज्ञाताओं का परम्परा से एक निश्चित वर्ग रहा है जिसे ब्राह्मण वर्ण कहते है। सभी ब्राह्मण इनके ज्ञाता होते हो, ऐसा कभी रहा नहीं। क्योंकि अन्य सैकड़ो विषय है, जिनके ज्ञाता विद्वान विविध प्रकार के होते रहे है। धर्म विषयों में 15 अगस्त, 1947 तक मुख्य भारतीय क्षेत्र में वेदज्ञ और शास्त्रज्ञ ब्राह्मण ही प्रमाण माने जाते रहे है।

उन्हें प्रमाण कौन मानता था?  ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्ये और शूद्र चारों ही वर्ण अर्थात सम्पूर्ण हिन्दू समाज। यही परम्परा रही है। कुल, ग्राम, खाप, आदि की पंचायतों में जो भी निर्णय होते थे, वे धर्म शास्त्रों और परम्पराओं के अनुरूप ही होते थे और इनमें अलग से विद्वानों को बुलाने की आवष्यकता सामान्यतः नहीं होती थी, क्योंकि पठन और श्रवण के द्वारा, उपदेश तथा कथा प्रसंगों के द्वारा, कथाओं आख्यानों, गीतों, नाटकों आदि के द्वारा, भागवत पुराण जैसे विराट आयोजनों के द्वारा, मेलों और तीर्थों तथा मठों और मंदिरों में चलने वाले निरंतर सत्संगों और व्याख्यानों एवं कक्षाओं के द्वारा तथा हर गांवों में दो चार विद्वान पंडितों की उपस्थिति और सक्रियता के द्वारा आधारभूत बातें सर्व ज्ञात थी। उनमें कुल, क्षेत्र आदि के स्तर पर बहुत विविधता थी और अद्भूत गतिशीलता थी। यह स्थिति निरंतर चलती रही। ऐसे में शासक द्वारा अलग से कोई समाज संबंधी विधान बनाने का कहीं कोई अवसर ही नहीं था। शासन, गांव और खाप पंचायतों के स्तर पर न सुलझने वाले विवादों पर शास्त्र और परम्पराओं के अनुसार निर्णय देने का ही अधिकारी था।

विक्षेप और आघात
इस्लाम का मध्य एशिया में यानी प्राचीन भारतीय क्षेत्र में कुछ प्रभाव फैलने लगा और भारत के तुरूष्क क्षत्रियों ने बगदाद में खलीफा की गद्दी स्थापित की। मनमानी लूट और मनमाने भोग का प्रचण्ड आकर्षण उस क्षेत्र में प्रभावशाली लोगों में फैला और उसका प्रभाव पारसीक क्षेत्र तक गया। प्रारंभ में खलीफाओं ने संस्कृत साहित्य, गणित, विज्ञान आदि के विद्वान बुलाकर स्थानीय भाषा में अनुवाद कराया। गणित का ज्ञान वहीं से सटे हुए यूरोपीय क्षेत्र में भी फैला। बाद में पारसीक क्षेत्र के सम्पर्क में आने के कारण जहां इस्लाम के उन्माद से उन्मत लोगों ने भयंकर क्रूरताएं की और विनाश किया, जिनसे डरकर प्राण रक्षा करने के लिए बहुत सनातनी विद्वान सूफी बन गये और समर्पण कर दिया। वहीं पहली बार हदीस के नाम पर हजा़रों नियम उपनियम बनाये गये। क्योंकि मूल इस्लाम में न तो आहार विहार संबंधी व्यापक निर्देश है, न परिवार और सम्पत्ति संबंधी और न ही शासन तथा प्रशासन संबंधी। भाषा और व्याकरण की सूक्ष्मताओं का ज्ञान भी पारसीक क्षेत्र में ही था। इसीलिए कुरान के प्रसिद्ध पाठकर्ता आज भी अरब लोग नहीं है। पारसीक और तुर्क लोग ही है। इसी प्रकार कुरान के पाठकर्ताओं में महिला के रूप में इंडोनेशिया की एक महिला ही प्रसिद्ध है, जिसके पूर्वज लगभग 500 वर्ष पूर्व हिन्दू से मुसलमान बने थे।

यहां यह भी स्मरण करने योग्य है कि 11वीं शताब्दी ईस्वी तक पारसीक क्षेत्र में इस्लाम का प्रभाव बहुत ही कम था। यद्यपि पारसीकों का वध 7वीं शताब्दी ईस्वी से ही मुसलमानों ने शुरू कर दिया था यथाशक्ति। तब भी 11वीं शताब्दी के आरंभ तक पारस और खुरासान क्षेत्र हिन्दू और बौद्ध ही था। पारसीक क्षेत्र में ही पहली बार मुसलमानों ने ढल्ले हुए सिक्के देखे। उसके पहले उन्होंने कभी सिक्के देखें हीं नहीं थे। उन सिक्कों को छीन कर मुस्लिम गुडें उन पर बिस्मिल्लाह टंकित करने लगे। तुर्कों और अरबों में पहले भीषण युद्ध था और बाद में तुर्कों और पारसीकों में युद्ध हुआ। जब तुर्कों ने अरबों को गुलाम बना लिया तब से खलीफत बगदाद में स्थापित हो गई। जिसे 20वीं शताब्दी ईस्वी में अग्रंजों ने तोड़ा। उन्होंने ही उसमान साम्राज्य को खण्ड-खण्ड करके दर्जनों मुस्लिम राज्य बना दिये और सऊद घराने के जागीरदार को अरब क्षेत्र का मालिक बना दिया तथा उसका नाम उसके घराने के नाम पर सऊदी अरब रख दिया।

 

तुर्कों और पारसीकों की लड़ाई में तुर्क जीते और पारसीक सभ्यता को नष्ट कर दिया, परन्तु उनके अनेक महत्वपूर्ण प्रत्यय तुर्कों ने अपना लिया – शाह, बादशाह, पातिशाह आदि पारसीक शब्द ही है जो मुख्यतः भारतीय उपधियां है। इसी प्रकार नमाज भी नमन और नमस्कार के पर्याय के रूप में पारसीक शब्द है। मूल अरबी शब्द है – सलात। खुदा भी पारसीक शब्द है, जिसका अर्थ है हृदय में विराजे परमेश्वार। यह अल्लाह से नितांत भिन्न है।

इस प्रकार पारसीक क्षेत्र में प्रभावी होने के बाद मुसलमानों के प्रभाव में अनेक भारतीय क्षेत्रों में कतिपय लोग आने लगे और वे मनमानी लूटपाट तथा भोग विलास को मजहब कहने लगे। भारत में इस्लाम की आड़ में इसी प्रकार के लोग फैले है। अतः भारत में जो इस्लाम है वह उसमान के साम्राज्य के इस्लाम से बिल्कुल अलग है। वह सनातन धर्म से घृणा करने वाले विद्रोहियों का मजहब है। अंग्रेजों ने और उसे अधिक उन्मत्त बनाकर हिन्दुओं के समूल विनाष की घोषणा करने वाला एक पंथ बना दिया। गांधी जी ने ऐसे मुसलमानों को बढ़ावा देने का काम अंग्रेजों की नीति के अनुसार ही किया।

अंग्रेजों ने याचक बनकर भारत के राजाओं और जागीरदारों से दया दृष्टि की विनती की और धीरे-धीरे हिन्दू समाज तथा भारतीय क्षेत्र की जानकारी एकत्र कर छल-बल से यहां ईसाइयत फैलाने लगे। जिसका गांधीजी तक ने प्रचण्ड विरोध किया है और कहा है कि स्वतंत्र भारत में सनातन धर्म की छिनैती करने (कन्बर्जन) का अधिकार मिशनरियों को नहीं होगा। क्योंकि प्रबुद्ध अंग्रेज भी यह नहीं चाहते थे। इसका प्रमाण यह भी है कि स्वयं इंग्लैण्ड में आज ‘‘बिलीविंग क्रिश्चियन’’ 20 प्रतिशत ही है।

जवाहरलाल नेहरू अंग्रेजों के और ईसाइयत के परम प्रशंसक थे इसलिए सत्ता हस्तांतरण की शर्तों में उन्होंने बहुत ही गलत बातें मंजूर की। तब से आज तक ईसाई मिशनरियों को भारत की हर पार्टी सनातन धर्म की छिनैती की सभी सुविधाएं देती आयी है।

ऐसे में भारतीय समाज के नाम से यदि आप सनातन धर्म के पूर्ण विरोधी समुदायों को भी भारतीय समाज का ही समान अंग घोषित करते है तो आप की भारतीय समाज के विषय में धारणा बिना कोई घोषणा किये हिन्दू धर्म की विरोधी हो जाती है। क्योंकि हिन्दू धर्म के विनाष के लिए सार्वजनिक रूप से उद्घोष करने वाले समुदायों को आप सम्मान दे रहे है।

 

हिन्दू समाज के भीतरी मामले
हिन्दू समाज की रक्षा का कोई भी आश्वासन भारत की कोई बड़ी राजनैतिक पार्टी नहीं देती। परन्तु हिन्दू समाज को सुधारने की ललक हर पार्टी के भीतर है। इस सुधार का क्या अर्थ है, इस पर भी कोई स्पष्ट प्रकाश आज तक नहीं डाला गया है। कुछ लोगों के अनुसार जाति व्यवस्था का सम्पूर्ण नाश हिन्दू समाज का सुधार है, तो कुछ के अनुसार कतिपय जातियों को जिन्हें वे अनुसूचित जाति, जनजाति और ओ.बी.सी. कहते है, विशेष संरक्षण देकर शेष हिन्दुओं का दमन करना हिन्दू समाज का सुधार है। परन्तु ऐसी कोई भी बात अंग्रेजों से लड़ते समय किसी ने नहीं कही थी। ऐसी कोई भी बात 1947 ईस्वी तक किसी भी परम्परागत हिन्दू राजाओं और हिन्दू धर्माचार्यों ने नहीं कही थी।

अब प्रश्न यह है कि जो हिन्दू जाति को एक सामान्य सहज और मर्यादित व्यवहार संस्था माने, उसे नष्ट करना राज्य का कर्तव्य किस आधार पर हो गया। तो इसके लिए शासक लोग इन नेताओं का नाम लेते है – डॉ. भीमराव राम जी अम्बेड़कर, जवाहरलाल नेहरू, राममनोहर लोहिया और जयप्रकाश नारायण। इस प्रकार इन चार प्रमुख नेताओं को हिन्दू समाज के विषय में सर्वाधिकार प्राप्त है, इसकी अनुमति परम्परागत हिन्दू समाज से किसी शासन ने कभी नहीं ली है। हिन्दू समाज की मुख्य धारा के लिए ये चारों सर्वमान्य नेता भी नहीं है। जवाहरलाल नेहरू अवश्य  लोकप्रिय हुए, परन्तु पहले एक धनी परिवार के देशभक्त युवक के रूप में लोकप्रिय हुए और फिर प्रधानमंत्री के रूप में शासन के बल से प्रचारित और विज्ञापित किये गये। लोहिया और जे.पी. बहुत थोड़े समय लोकप्रिय रहे और उन्हें हिन्दू समाज ने अपना कोई धर्म त्राता कभी नहीं माना। उन्हें एक नैतिक व्यक्ति ही मानते रहे जो राजनीति में कुछ सुधार करना चाहते है। समाज सुधारक इनको कभी नहीं माना गया। अम्बेड़कर को मुश्किल से दो से तीन प्रतिशत लोग अपना धर्म त्राता मानते रहे है और उनकी संख्या बढ़ रही है। इन सब से अधिक मान्यता गांधीजी की थी परन्तु गांधीजी ने कभी भी जाति नाश या वर्ण नाश की बात एक बार भी नहीं कहीं।

इस प्रकार राजनेताओं द्वारा हिन्दू समाज के सुधार की जिम्मेदारी अपनी मान लेना एक जबरिया काम है। इसके लिए उन्हें चुनाव के समय सबसे अधिक यही मुद्दा उठाना चाहिए कि हम हिन्दू समाज की परम्परागत व्यवस्था के नाश के लिए चुनाव लड़ कर विधायिका में जाना चाहते है। परन्तु यह कहने का साहस आज तक किसी ने नहीं दिखाया है। नरेन्द्र मोदी जी ने भी नहीं।

हिन्दू समाज के लिए अथवा हिन्दू संगठन के लिए कार्यरत किसी भी संगठन ने खुलकर अपना यह एजेंडा आज तक घोषित नहीं किया है कि वे हिन्दू समाज की परम्परागत संरचना का समूल नाश करने के लिए समर्पित है और इसे ही हिन्दू संगठन का प्रमुख कार्य मानते है। उन्हें अपने स्वयंसेवकों को यह तथ्य बताना चाहिए और यह प्रतिज्ञा करानी चाहिए कि ‘‘मैं प्रतिज्ञा करता हूँ कि हिन्दू समाज की परम्परागत संरचना को तोड़-फोड कर नष्ट भ्रष्ट कर डालने के लिए तन-मन-धन से जीवन भर सक्रिय रहूँगा। यहीं मेरा व्रत है।’’  जब तक सत्य निष्ठा से ऐसी घोषणा नहीं की जाती और इसी दिशा में काम होता रहता है, तब तक उसे छल माना जायेगा। उसे न तो हिन्दू संगठन का कार्य कहा जायेगा और न ही हिन्दू समाज की सेवा।

विशेष बात यह है कि एक ओर ये लोग भारत के सभी समुदायों को भारतीय समाज कहते है। दूसरी ओर इस्लाम के अनुयायी समाज की परम्परागत संरचना अथवा ईसाइयों की परम्परागत संरचना में आधारभूत परिवर्तन के लिए कार्य करते नहीं देखे जाते और न ही ऐसे कार्य को अपना लक्ष्य बताते। तो क्या हिन्दू समाज को पूरी तरह से पलट कर बदल देना ही उनके जीवन का लक्ष्य है। अगर है तो इसे खुल कर कहने का साहस दिखाना चाहिए। यह नैतिक आवश्यकता है। ऐसी विचित्र क्रियाओं को हिन्दू समाज की सेवा या हिन्दू संगठन का कार्य बताते हुए सक्रिय रहना व्यक्ति की नैतिकता पर प्रश्‍न उपस्थित करता है।

(लेखक प्रखर राष्ट्रवादी विषयों पर लिखते हैं और आपकी कई पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी है)