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ब्राह्मणों ने अपनी पहचान जाति से नहीं गौत्र से रखी है

ब्राह्मणों को जातिवाद के लपेटे में जबरन लिया जाता है। यदि जाति ब्राह्मण को पसंद होती तो स्वयं ब्राह्मणों के भीतर ही वैसी ही जातियाँ नहीं होतीं जैसी आरक्षितों में मिलती हैं?

ब्राह्मण जाति से नहीं गोत्र से चला। जाति और गोत्र में फर्क है। जाति सामाजिक ( social) है, गोत्र पैतृक( patrilineal)। भारद्वाज, कश्यप, अत्रि, विश्वामित्र, वशिष्ठ , गौतम, जमदग्नि सबके गोत्र हैं। गोत्र व्यवस्था सगोत्र विवाह का निषेध करती थी। जाति व्यवस्था अपनी जाति में विवाह को प्रोत्साहित करती है।

ब्राह्मणों की श्रेणियाँ अवश्य हैं। पर वे स्थानिकता के आधार पर हैं। कोंकणस्थ हैं, देशस्थ हैं, कान्यकुब्ज हैं, सरयूपारीण हैं, गौड़ हैं, कश्मीरी हैं, सारस्वत हैं, मैथिल हैं, उत्कल हैं, द्रविड़ हैं। जाति जैसी चीज उनके यहाँ नहीं है। ये सब एक ही वर्ण — ब्राह्मण — के अलग-अलग भौगोलिक समूह हैं। पर इनमें से कोई भी एक दूसरे की जाति नहीं है। मतलब, कोंकणस्थ और कान्यकुब्ज के बीच वह दीवार नहीं है जो दो अलग जातियों के बीच होती है। ये स्थानिक भेद हैं, जैसे कि एक देश में अलग-अलग क्षेत्रों के लोग होते हैं।और सबसे ज़रूरी बात — इनमें से कोई भी दूसरे को “नीचा” नहीं मानता। जाति व्यवस्था में ऊँचा-नीचा होता है। पर ब्राह्मणों के इन स्थानिक समूहों में वह पदानुक्रम (hierarchy) नहीं है जो जाति व्यवस्था बनाती है। वहाँ फर्क था भी तो वेद पाठ के आधार पर था। द्विवेदी थे, त्रिवेदी थे, चतुर्वेदी थे। दो तीन चार – जितने वेद पढ़े हों। फर्क का आधार ज्ञान था।

यह समझिये कि तब ‘ब्राह्मणों’ की बात करनी कुछ लोगों की मजबूरी क्यों हो जाती है।इसलिए कि ब्राह्मण एक जाति है ही नहीं, वह वर्ण है।

यानी ब्राह्मण इस बात के सर्वश्रेष्ठ उदाहरण हैं कि practice before you preach.
तब आरक्षित और अनुसूचित जातियां भी वैसी ही जातिमुक्तता क़ायम करें जैसी ब्राह्मण वर्ण ने करके दिखाई। खुद जाति के मोह में रहें, टोह में रहें और दूसरों पर दोषारोपण करते रहें- यह हमारा पाखंड है। पहले हम स्वयं खंड खंड में बँटे न रहें, फिर आगे बढ़ें।

कम ऑन, फ्रेंड्स लेट्’स डू इट। चैरिटी बिगिन्स एट होम।

साभार- https://www.facebook.com/share/1HYQK5EoCH/ से
(लेखक मध्य प्रदेश के चुनाव आयुक्त हैं और सेवानिवृ्त्त आईएएस अधिकारी हैं)

राजा दर्शन सिंह की शौर्य गाथा

अयोध्या के शाकद्वीपीय राजाओं ने कई स्थानों में भी अपना राज्य स्थापित कर लिये थे ।लगभग दो-ढाई सौ साल पहले तत्कालीन मुगल और नवाबी शासन प्रशासन की अनुमति से यह शाकद्वीपीय ब्राह्मण पाठक और मिश्र परिवार अपना विशिष्ट स्थान बना लिए थे । इस वंश के ज्ञात राजा के पूर्वज पिता पुत्र सदासुख पाठक और गोपाल राम पाठक का विवरण कम ही मिलता है। इनके अगले उत्तराधिकारी पुरन्दरराम पाठक से वंश का बिस्तार ही वर्तमान समय में अनेक रूप में दिखाई दे रहा है।

अयोध्या के पलिया में हुआ था इनका पहला पड़ाव :- गोपाल राम पाठक ने अपने बेटे पुरन्दरराम पाठक का विवाह अयोध्या जिले के पलिया गाँव के गङ्गाराम मिश्र की बेटी के साथ किया था और पलिया में आकर बस गये थे। इस समय तक ये कोई विशिष्ट जन ना होकर आमजन के रूप में जाने जाते रहे हैं । पलिया के पहुना पुरन्दर राम पाठक के पांच संताने हुई थीं । जिनका नाम 1.ओरी उर्फ बख्तावर सिंह, 2.शिवदीन सिंह, 3 .दर्शन सिंह, 4.इच्छा सिंह और 5.देवी प्रसाद सिंह है। इनमें से तीन ओरी सिंह दर्शन सिंह और इच्छा सिंह ने अपने पुरुषार्थ और हुक़्मरानों के हुकुम से अवध अंचल के विभिन्न क्षेत्रों के राजा बन अपने अपने राज्य का विस्तार कर लिए थे। शेष दो शिव दीन और देवी प्रसाद के बारे में कोई उल्लेख नहीं मिलता है। प्रतीत होता है कि ये किसी देवी करणों या अपने विस्तारवादी भाइयों की उपेक्षा का शिकार हो अपना अस्तित्व संभाल ना सके होंगे और इतिहास के पन्ने से सदा सदा के लिए गायब हो गए होंगे।

1798 ई.मे अयोध्या के शाकवंशीय राजवंश का उदय ओरी पाठक प्रथम शासक :-

अवध के नवाब शुजाउद्दौला के बेटे आसिफुद्दौला ने 1775 ई. में अपनी राजधानी वापस लखनऊ स्थानांतरित कर लिया था ।इसके बाद सआदत अली खां द्वितीय 1798 ई.में में नवाब हुआ। इन्हीं के शासनकाल में अयोध्या में शाक द्वीपीय ब्राह्मण राज वंश का उदय हुआ था। ओरी पाठक उर्फ राजा बख़तावर सिंह का समय 1780-1846 ई के आसपास का रहा। उन्होंने लगभग 1795 के आसपास 14 वर्ष की अवस्था में ईस्ट इंडिया कंपनी की सेना में प्रवेश किया था । फिर ईस्ट इंडिया कंपनी से सेवामुक्त कराकर नव्वाब साहब ने पहले ओरी को 8 सवारों का दफादार बनाकर अपनी अर्दली बनाया फिर नबाब की जान की सुरक्षा के परितोष में उन्हे पलिया की जागीर और सौ सवारों का अफसर बनाया। फिर अश्व सेनापति (रिसालेदार), फिर 1821 ई में राजा की उपाधि और बख्तावर सिंह टाइटिल दिया । उनकी खैरख्वाही के कारण दरबार में उनकी प्रतिष्ठा और उनका अधिकार बढ़ता गया और अपने अन्य भाइयों को भी शासन- प्रशासन में उचित प्रतिनिधित्व दिलवाया।इनकी मृत्यु 1846 ई में हुई थी।

इच्छासिंह :-

राजा दर्शनसिंह के भाई इच्छासिंह भी सुल्तानपूर, गोंडा और बहराइच के नाजिम= प्रबंधकर्ता ( सैन्य राज्यपाल)रहे। सरकारी

कोष का धन हडपने के जुर्म में उन्हें भी एक ही वर्ष निजामत नसीब रही। 1841 में वे हटा दिए गए थे।

मेहदौना की जागीर

राजा बख्तावर सिंह को जागीर पाने का सम्मान 1837 से 1842 के बीच प्राप्त हुआ था। जब बादशाह नसीरउद्दीन हैदर का देहान्त जुलाई 1837 में हुआ और मेजर लो रेजिडेण्ट मुहम्मद अली शाह 1837 से 1842 को तख्त पर बैठाने के लिये अपने साथ दरे-दौलत पर लाये, उस समय बादशाह बेगम और मुन्नाजान एक हज़ार हथियारबन्द सिपाहियों को लेकर महल में घुस आये। मुन्नाजान ने कहा कि सलतनत हमारी है। तख्त पर बैठ कर यह हुक्म दिया कि मुहम्मद अली शाह उसका बेटा अजमदअली शाह और उसके पोते वाजिदअली का बध कर दिया जाय। राजा बख़तावर सिंह ने बड़ी बुद्धिमानी से मुहम्मदअली शाह के परिवार को छिपाया था। इतने में मड़िआवँ की छावनी लखनऊ से सेना आ गई थी । मुन्नाजान और बादशाह बेगम पकड़ लिये गये और मुहम्मद अली शाह तख्त पर बैठाये गये। मुहम्मदअली शाह ने बड़ी कृतज्ञता प्रकट की और नानकार, गाँव माफ़ी और जागीर देकर उन्हें मेहदौना के राजा की पदवी दी। इसी समय बख़तावर सिंह को वह तलवार दी गई जिसे कि ईरान के बादशाह नादिरशाह ने दिल्ली के बादशाह मुहम्मदअली शाह को उपहार में दिया था और मुहम्मदशाह से नव्वाब सफ़दरजंग ने पाया था।

दोनों भाइयों ने 1500 गांवों की जमींदारी खरीदी :-

राजा बख्तावर सिंह ने राजा दर्शन सिंह दोनों भाई जब ऊंचे ऊंचे पद हासिल कर लिए तब उनकी इच्छा हुई कि अब जमींदारी बढ़ानी चाहिए। दोनों ने 1500 गांव मोल लेकर महादौना की जमींदारी विस्तारित कर इस क्षेत्र को ऐतिहासिक रूप से महत्वपूर्ण बना लिया। उन्होंने इस दौरान अपने कुशल प्रबंधन से प्रजा को खुश रखा था।

मेहदौना खास एक रियासत बनी :-
यह अयोध्या जिले में एक गाँव रहा है, जो ऐतिहासिक रूप से अवध के नवाबों और अयोध्या के शाकद्वीपी राजाओं से जुड़ा है, जहाँ राजा बख्तावर सिंह और राजा दर्शनसिंह जैसे शासकों ने इलाका खरीदा और बाद में महाराजा मानसिंह जैसे प्रमुख हस्तियां इस क्षेत्र से जुड़ी रहीं, जो फैजाबाद के इतिहास और अयोध्या राजपरिवार के संदर्भ को दर्शाते हैं।

यह फैजाबाद जिले के मिल्कीपुर ब्लॉक का एक छोटा सा गांव है। यह मेहदौना खास पंचायत में आते हैं। यह जिला मुख्यालय से 17 किमी दक्षिण और मिल्कीपुर से 16 किमी की दूरी अवस्थित है । वर्तमान समय में यह दो राजस्व गांव के रूप में जानी जाती है।

मेहदौना खास रियासत मेहदौना एक गांव भी है। यह बारुण बाजार, अयोध्या के पास एक स्थानीय बाजार है, मेहदौना मिल्कीपुर ब्लॉक के बारुन बाजार शाहगंज मार्ग पर स्थित है। यह क्षेत्र स्थानीय जन जीवन ,व्यापार, इतिहास और सांस्कृति का महत्वपूर्ण केन्द्र है।

मेहदौना बारुन बाजार, अयोध्या के पास एक स्थानीय बाजार या क्षेत्र है, यह बारुण बाजार शाहगंज मार्ग पर मिल्कीपुर ब्लॉक में पड़ता है। जो अयोध्या के विकास के साथ फैजाबाद के पुराने नाम से जुड़ा है; यह क्षेत्र स्थानीय जनजीवन और व्यापार का केंद्र है, जो ऐतिहासिक और सांस्कृतिक रूप से महत्वपूर्ण अयोध्या के निकट है।

शाहगंज में राजवंश की आवासीय हवेली बनी :-

शाहगंज में बनवाई गई हवेली राजा की शानो- शौकत और प्रशासनिक शक्ति का प्रतीक बनी। समय के साथ यह खंडहर में बदल गई, पर लोगों के मन में राजा की धरोहर आज भी जीवित है। हवेली की दीवारों पर उकेरे गए नक्काशी और चित्र, राजा के गौरव और वीरता की गवाही देते हैं। राजा दर्शनसिंह ने मेहदौना के अंतर्गत शाहगंज में सुदृढ़ कोट, बाजार और महल बनवाये हैं। यह खजुराहट रेलवे स्टेशन के पास स्थित है। शाहगंज मुकीमपुर उर्फ पहाड़ पर ग्राम पंचायत में आता है। यह जिला मुख्यालय से 30 किमी दक्षिण स्थित है।

हिंदू राजाओं के रियासत में अयोध्या के राजा मानसिंह की रियासत शाहगंज का इतिहास के पन्नों में अपनी एक खास जगह और पहचान रही है। अयोध्या के बारुन बाजार के पास शाहगंज में ‘राजा की हवेली’ एक प्रसिद्ध ऐतिहासिक स्थल है, जो कभी अयोध्या के राजाओं के वंशजों का निवास स्थान होता रहा। इस रियासत को शाहगंज के नाम से जाना जाता है । शाहगंज में पहले पलिया और बाद में महादौना के राजाओं द्वारा 70 बीघे में विशाल हवेली बनवाई थी जो अब जीर्ण – शीर्ण अवस्था में हो गया है। यहां इस बंश परम्परा से जुड़े लाल अम्बिका प्रताप सिंह और कई अन्य शाही परिवार आज भी अपनी परम्परा का प्रतिनिधित्व कर रहे हैं। ये मूलतः पाठक लोगों का गांव है। जबकि अयोध्या घराने में आरा से आए मिश्र परिवार इस वंश परम्परा की यश वृद्धि कर रहे हैं।

दर्शन सिंह सुल्तानपुर और बहराइच के क्षेत्र का प्रमुख बने :-
ओरी पाठक के छोटे भाई दरसन सिंह समय लगभग (1800-1844 के दशक) में था ।अपनी कुशल प्रशासनिक क्षमता और रसूख के बल पर राजा बख्तियार सिंह ने कुछ दिनों बाद अपने भाई दर्शन सिंह को भी अवध दरबार में प्रवेश दिलवाया। उन्हे सुल्तानपुर और बहराइच के क्षेत्र का प्रमुख नियुक्त किया गया और उन्हें “बहादुर ” के नाम से जाना जाने लगा। वे गोण्डा क्षेत्र के अधिकारी भी बन गए और राजा (राजा) की उपाधि प्राप्त कर ली । 1825 में वे बाराबंकी के नाज़िम भी रहे। उन्होंने अपने इलाके का बहुत अच्छा प्रबन्ध किया था उन्हें राजा की पदवी भी मिल गई थी।

शिवदीन डाकू का दमन :-
उन्हीं दिनों शिवदीन एक बड़ा डाकू था। वादशाह की आज्ञा से दर्शन सिंह ने उसका दमन किया गया और राजा को बहादुर का पद मिला। इसी तरह दोनों भाइयों की बादशाह नसीरुद्दीन के समय में उन्नति होती रही। उनकी वीरता, उनका दान, उनका न्याय और राज- विद्रोहियों (सर्कशों) का दमन संसार में प्रसिद्ध हुआ। इस अन्तिम काम के लिये उनको बादशाही से “सरकोबे सरकशां सलतनत बहादुर ” की उपाधि मिली थी।

वैसवाड़े के नाज़िम :-
राजा दर्शनसिंह की वीरता बखान में इतिहास का यह अंश बहुत बढ़ गया। वे 5 वर्ष तक वैसवाड़े के नाज़िम रहे । वैसवाड़े के तालुकदार क्या बड़े क्या छोटे सरकारी जमा देना जानते ही न थे। उनका बल बहुत बढ़ा हुआ था और उनकी गढ़ियों पर तोपें चढ़ी रहती थीं।दर्शन सिंह ने कुछ बड़े-बड़े ताल्लुकेदारों के नाम परवाने जारी किये जिनमें यह लिखा था कि अपनी भलाई चाहते हो तो तुरन्त उपस्थित होकर सरकारी जमा दाखिल करो। ताल्लुकदारों ने परवाने पाकर युद्ध करने का निश्चय कर दिया। राजा दर्शनसिंह ने जब पहिले धावा मारकर मुरारमऊ की गढ़ी तोड़ी तो गढ़ी के रक्षक एक पगडण्डी के रास्ते निकल भागे। इस गढ़ी के टूटने से और ताल्लुकदारों के छक्के छूट गये। सब दर्शन सिंह के नियंत्रण में आ गया। पांच वर्षों तक वैसवाड़े के नाज़िम रहते हुए, राजा दर्शन सिंह ने अपने साहस और प्रशासनिक कुशलता का लोहा मनवाया।

बलरामपूर को नियंत्रित किया:-
वैसवाड़े की सफलता मिलने के बाद एक दिन राजा ने अपने सेनापतियों से कहा, “बलरामपुर की गढ़ियों पर हमला की योजना बनाओ। हमें यह साबित करना होगा कि अयोध्या की शक्ति केवल नाम की नहीं, बल्कि वास्तविक है।” सेनापति ने डरते हुए उत्तर दिया, “साहब, वहां तीन हजार सिपाही हैं। यदि वे हमें घेर लें, तो…।”

राजा ने गंभीरता से देखा और कहा, “डर और संदेह की कोई जगह नहीं है। वीरता और बुद्धिमत्ता से हर मुश्किल का समाधान है। हमारे पास धर्म और न्याय का आशीर्वाद है।”

बलरामपुर की गढ़ी पर चढ़ाई के समय, राजा ने अपनी सेना को दिशा दी, एक-एक सिपाही की तरकीब और चालाकी से गढ़ी पर कब्ज़ा कर लिया। प्रतिद्वंदी भाग खड़े हुए या प्रशासनिक शक्ति से वश में कर लिए गए।

बलरामपुर के ताल्लुकेदार राजा दिग्विजय सिंह जी सरकारी जमा नहीं देते थे। राजा दर्शनसिंह ने सेना समेत बलरामपुर की गढ़ी पर चढ़ाई कर दी। वहां के राजा गोरखपूर को भाग गये । जो दूसरे साल नेपाल की तराई होकर अपने देश को लौटना चाहते थे कि राजा दर्शनसिंह ने समाचार पाकर एक लम्बी दौड़ लगाई और राजा के डेरे पर धावा मार दिया। राजा अपना प्राण बचा कर भागे। उस दिन आने जाने में 45 कोस की दौड़ हुई। नैपाल के हाकिम गोसाई जयकृष्ण पुरी ने सीमा पार करके नेपाल राज में प्रवेश करने के लिये दर्शनसिंह की शिकायत नैपाल- दरबार मे की। नैपाल के रेज़िडेण्ट ने लखनऊ के रेजीडेण्ट को दर्शन सिंह के इस कृत्य की शिकायत लिख भेजी। बादशाही दरबार से जवाब लिया गया और यह निर्णय हुआ कि लूट पाट में नेपाल की प्रजा की जो हानि हुई है वह राजा दर्शन सिंह से दिलवा दिया जाय। राजा साहब ने हानि का रुपया 1453/-तुरन्त अदा कर दिया और फिर अपने काम पर बहाल हो गये। बादशाह अमजद अली शाह के अली शाह (शासन : 1842-1847) अवध के पांचवें नवाब थे, जब तक नव्वाब मुनव्वरउद्दौला वज़ीर रहे सारी सलतनत का प्रबन्ध राजा दर्शनसिंह को सौंपा गया था।इस प्रकार 1842 में दर्शन सिंह बहुत प्रभाव शाली राजा हो गए थे। राजा साहब ने यहाँ तक इकरार नामा लिख दिया कि सरकारी जमा में जो कुछ बाक़ी रहेगा उसे हम दे देंगे।

अयोध्या-राज प्रासाद 1842 में :-
इसी समय में उनको कचहरी करने के लिये अयोध्या धाम का लालबाग़ क्षेत्र दे दिया गया जहाँ अयोध्या-राज का प्रासाद लगभग 20 एकड़ बिस्तार में अब तक विद्यमान है। इसी समय बीमार होकर वे अयोध्या चले आये और श्रावण सुदी सत्तमी को अयोध्यावास लिया था। धर्म नगरी अयोध्या में राजा दर्शन सिंह का आलिशान महल आज भी है। राजा बहादुर दर्शन सिंह का इंतकाल 1844 में हो गया।

1846 में बख्तावर सिंह का भी इंतकाल हो गया और सत्ता मानसिंह के हाथ में आ गई थी।

दर्शन सिंह के कुछ प्रमुख कार्य:-
उन्होंने हवेलियों, कुओं और सार्वजनिक बागानों घाटों और कुछ प्रमुख मन्दिरों का निर्माण और जीर्णोद्धार भी करवाया था।

दर्शनेश्वर नाथ महादेव का शिवाला:-
धर्म नगरी अयोध्या में राजा दर्शन सिंह का आलिशान महल आज भी है। श्री दर्शनेश्वर नाथ महादेव राजसदन अयोध्या में शिवाला मन्दिर का निर्माण कराया। मंदिर की भव्य मीनारें, नक्काशीदार दरवाजे, और शिलालेख राजा की दूरदर्शिता और धर्मपरायण दृष्टि के प्रतीक बने।

दर्शन नगर बाजार और चार प्रवेश द्वार वाला प्राचीर का निर्माण:-

दर्शन नगर बाजार में अयोध्या के राजा दर्शन सिंह ने चारों दिशाओं में लखौरी ईंटों द्वारा निर्मित चार गेट व किलानुमा बाउंड्रीवॉल बनवाई थी। राजा दर्शन सिंह के नाम पर ही इस बाजार का नाम दर्शन नगर पड़ा था।

दर्शननगर सूर्य कुंड व मंदिर का निर्माण:-दर्शननगर बाजार के पास राजा दर्शन सिंह का बनाया हुआ सूर्य भगवान का सुन्दर सरोवर और मंदिर दर्शनीय है। वर्तमान काल में अयोध्या के प्राचीन सूर्य कुंड मंदिर स्थान पर मेले की ब्यवस्था की देख भाल राजा दर्शन सिंह के बंशजों के द्वारा किया जाता है।

जबकि सूर्य मंदिर तथा सूर्य कुंड के रख रखाव की जिम्मेवारी अयोध्या के हनुमान गढ़ी के प्रबंधन के पास है। राज्य सरकार ने इसे भव्यता प्रदान कर रखी है।

सरयू नदी के तट पर चारों ओर सीमेंट घाट और नागेश्वर नाथ मन्दिर का जीर्णोद्धार

राजा दर्शन सिंह ने सरयू के तट वर्तमान में राम की पैड़ी वाले जगह पर के पुराने घाटों का निर्माण कराया था। नागेश्वर नाथ मंदिर का भी जीर्णोद्धार कराया था। इसके अलावा अपने क्षेत्र में अनेक प्राचीन मंदिरों तालाबों सरायों का निर्माण करा कर लोक उपकार के लिए अच्छा प्रयास किया था।

 

लेखक परिचय:-

(लेखक भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण, में सहायक पुस्तकालय एवं सूचनाधिकारी पद से सेवामुक्त हुए हैं। वर्तमान समय में उत्तर प्रदेश के बस्ती नगर में निवास करते हुए सम सामयिक विषयों,साहित्य, इतिहास, पुरातत्व, संस्कृति और अध्यात्म पर अपना विचार व्यक्त करते रहते हैं। वॉट्सप नं.+919412300183)

काव्य गोष्ठी में बही देशभक्ति की धारा

ओ सरहद के प्रहरी ओ खेतों के राजा,
अब भूल न जाना तुम, ये वतन तुम्हीं से है

कोटा। कोटा में शनिवार को श्री करनी नगर विकास समिति कर आश्रय भवन में शनिवार को मासिक काव्य गोष्ठी में देश भक्ति की धारा में श्रोताओं में गोते लगाए। गोष्ठी गणतंत्र दिवस और शहीद दिवस को समर्पित रही। मुख्य अतिथि भगवती प्रसाद गौतम ने ” ओ सरहद के प्रहरी ओ खेतों के राजा,अब भूल न जाना तुम, ये वतन तुम्हीं से है कविता से माहौल को देशभक्ति पूर्ण बना दिया।

संचालन करते हुए रामेश्वर शर्मा रामू भैया ने अपने काव्य पाठ मौन है गांधी में ” चल रही हैं आंधियां बेचैन गांधी मौन है, पूछता भी तो नहीं इसकी तह में कौन है, किसको फुर्सत है जो देखे, देश की बिगड़ी फिजा,सबके सर पर हावी, तेल लकड़ी नोन है” प्रस्तुत कर गांधी को याद किया।

महेश पंचोली की देशभक्ति के भावों से भरी राजस्थानी कविता “नमन करुं छूंँ वांनै जांनै आजादी दिलाई छै, आजादी के खातर जांने अपनी जान गवांई छै,छोड्या छै परिवार जांनै छोड्या बाप अर माई छै,देश के खातर जांनै भाया हँस कै फांसी खाई छै, झुक्या कोईने दुसमण सूं वांनै पाछी धूल चटाई छै, नमन करुं छूंँ वांनै जांनै आजादी दिलाई छै” पर श्रोता झूम उठे।

नंद किशोर ने शहीदों का बसंत कविता “रहती है दिल में भारत माँ सांसों में गंगा बहती है,जिनके स्वर में गर्जन होती सीने में ज्वाला होती है” से मन मोह लिया।

विष्णु शर्मा हरिहर ने सरस्वती वंदना के साथ “आज दिखता हूं झांकी अपने देश महान की” एवं “देश की खातिर मारने वाले जांबाजों को नमन करें,भारत माँ को नमन करें”
से सभी का दिल जीत लिया।

श्रीमती ओम राणावत की कविता” सीमा पर खड़े रह कर अपना घर नहीं देखा, माँ की ममता याद आई तो आसमान ताक दिया,,बहन की राखी याद आई तो फ़र्ज़ में बांध दिया” पर खूब दाद मिली।

विशिष्ठ अतिथि डॉ. प्रभात कुमार सिंघल में मखान लाल चतुर्वेदी की रचना पुष्प की अभिलाषा और हवामहल पर स्वरचित कविता सुनाई। संस्था प्रभारी प्रवीण भंडारी ने अपनी कविता प्रस्तुत कर कहा कि प्रयास हो इस गोष्ठी के माध्यम से अधिक से अधिक साहित्यकारों को अवसर मिले और स्वरचित काव्य पाठ हो। कुसुम लता जैन, दिनेश गुप्ता, तुलसीराम, आर. बी. गुप्ता, निरंजन महबूबानी एवं मोहन कोटवानी ने भी काव्यपाठ किया। गोष्ठी की अध्यक्षता चन्द्र सिंह ने की।

लेखिकाएं लेखन को राष्ट्र सेवा और समाज सुधार की दृष्टि से जन आंदोलन बनाए

कोटा। कोटा में रंगीतिका संस्था द्वारा राजस्थान साहित्य अकादमी के सहयोग से रविवार को मदर टेरेसा स्कूल में कोटा संभागीय महिला रचनाकार सम्मेलन आयोजित किया गया। वक्ताओं ने कहा कि लेखिकाएं वर्तमान समय और समाज के अनुरूप राष्ट्र सेवा को प्रेरित करने और समाज सुधार के लिए लिख कर जन आंदोलन बनाएं।वक्ताओं से खुशी जाहिर की कि हाड़ौती में महिलाएं सभी विधाओं में मुखर हो कर लिख रही है।

उदघाटन सत्र में मुख्य अतिथि सहकारिता विभाग के विधिष्ठ सहायक डॉ. सूरज सिंह नेगी ने जीवन मूल्यों में आ रही कमी और परिवार में संवाद शून्यता जैसे विषयों को लेखन का माध्यम बनाने पर बल दिया। उन्होंने कहा राष्ट्र और समाज को आईना दिखाने का काम साहित्यकार ही कर सकते हैं।

अध्यक्षता करते हुए राजस्थान साहित्य अकादमी के सचिव बसंत सिंह सोलंकी ने कहा कि कहा महिलाएं पठन की वृत्ति बढ़ाएं और सार्थक साहित्य लिखेंगी तो पाठक भी मिलेंगे और पहचान भी अपने आप मिलेगी। ऐसे आयोजनों के अवसर पर साहित्यिक पुस्तकों की प्रदर्शनी लगाने और पुस्तक चर्चाओं के आयोजन करने का सुझाव दिया। अकादमी के नवाचार के बारे में बताया कि पहली बार जेल के बंदियों के पढ़ने के लिए साहित्य की पुस्तकें भेजी गई है।

साहित्यकार जितेंद्र निर्मोही ने कहा हाड़ोती में जिस तेजी से महिलाएं लेखन में आगे आई हैं वह किसी आश्चर्य से कम नहीं है। महिला लेखन की भविष्य में अच्छी संभावनाएं है और अंचल की महिला रचनाकार राष्ट्रीय स्तर तक पहुंचेंगी इसमें संदेह नहीं है। कथाकार और समीक्षक विजय जोशी ने कहा हाड़ौती अंचल की महिला रचनाकारों ने गद्य साहित्य की विविध विधाओं में लेखन कर अपने समय को उभारा ही नहीं वरन् परिवर्तित होते जा रहे सामाजिक सन्दर्भों का संवेदनापरक चित्रण भी किया है।

शकुंतला रेणु को समर्पित सत्र में श्वेता शर्मा ने हाड़ोती अंचल का समकालीन महिला काव्य, गरिमा राकेश गर्विता ने महिला गीतिका काव्य तथा डॉ सरला अग्रवाल को समर्पित सत्र में डॉ वैदेही गौतम ने हाड़ोती अंचल में महिला कथा साहित्य तथा सुमन लता शर्मा ने महिलाकथेतर साहित्य में महिला रचनाकारों के सृजनके संदर्भ में महिला रचनाकारों और उनके साहित्यिक अवदान की विस्तार से चर्चा कर दशा,दिशा और संभावनाओं पर कहा वर्तमान लेखन में बदलाव और सावचेत दृष्टि लिए दिखाई देता है।

सत्रों के अतिथि डॉ.सरिता जैन,.श्यामा शर्मा, वीणा अग्रवाल, प्रकाश चंद सोनी ,डॉ. अशोक तंवर, शिवांगी सिंह सिकरवार , डॉ. शील कौशिक, डॉ. कांचना सक्सेना, श्रद्धा शर्मा, अक्षयताला शर्मा, सुलोचना शर्मा, डॉ. शशि जैन, विजय जोशी, भगवती प्रसाद गौतम, रामेश्वर शर्मा रामू भैया, शमा फिरोज़, डॉ. युगल सिंह ने अपने विचार रखें। स्नेहलता शर्मा ने सभी का स्वागत किया। डॉ. सुशीला जोशी ने संस्था परिचय दिया। रीता गुप्ता ने सभी का आभार व्यक्त किया। संचालन महेश पंचोली, प्रीतिमा पुलक, डॉ. इंदु बाला शर्मा एवं अनुराधा शर्मा ने संयुक्त रूप से किया। अतिथियों ने दीप प्रज्वलित कर शुभारंभ किया। अदिति शर्मा ने सरस्वती वंदना प्रस्तुत की। साहित्यकार विजय शर्मा,साधना शर्मा, अर्चना शर्मा, रेनू सिंह राधे ने सक्रिय सहयोग किया। कार्यक्रम में कोटा,बूंदी,झालावाड़ और बारां से बड़ी संख्या में रचनाकार उपस्थित रहे।

हाड़ौती अंचल का महिला कथा साहित्य एक विवेचना

हाड़ौती अंचल में कथा जगत की साहित्यिक यात्रा बूंदी के लज्जाराम मेहता की आदर्शवादी कहानियों से प्रारंभ होकर सन् 1941 में राजेन्द्र सक्सेना की “पगडण्डियां” तक एक सृजनात्मक पहल थी। डॉ. नरेन्द्र चतुर्वेदी की कृति के अनुसार “पगडण्डियां” चर्चित कहानी संग्रह कोटा में ही प्रकाशित हुआ। झालावाड़ से निकलने वाली “सौरभ” पत्रिका में कमलकान्त त्रिवेदी की कहानियां उपदेश का प्रभाव और प्रेम प्रकाशित हुई। इसी दौर में इसे हम इस अंचल में सर्वप्रथम कहानियों का प्रकाशन मान सकते है। चन्द्रधर गुलेरी की “उसनें कहा था” चर्चित कहानी “सरस्वती” पत्रिका में प्रकाशित हुई।

प्रथम महिला कहानीकार बंग महिला राजेन्द्र बाला घोष की कहानी “दुलाई वाला” सरस्वती पत्रिका में प्रकाशित हुई। उस समय इनके आक्रामक लेखन ने पुरूषों के वर्चस्व को चुनौती दी। इसमें घूंघट में छिपी महिला के रोचक प्रसंग है। इसी श्रृंखला में महिला कथाकारों में महादेवी वर्मा, सरोजनी नायडू, सुभद्रा कु. चौहान प्रमुख थी। महादेवी जी की “श्रृंखला की कड़ियां” संकलन नें स्त्री विमर्श पर गम्भीरता से विचार दिया।

हाड़ौती अंचल में आधुनिक कथा साहित्य में नारी का परिवर्तन रूप समाज के समक्ष आया जिसमें डॉ. क्षमा चतुर्वेदी, डॉ. सरला अग्रवाल, डॉ. गीता सक्सैना, डॉ. कंचना सक्सैना, डॉ. कृष्णा कुमारी, डॉ. सुषमा अग्रवाल, श्याम शर्मा, रीता गुप्ता, अर्चना शर्मा, रेखा पंचौली प्रमुख है। हाड़ौती में लगभग विगत तीस वर्षों से कथा लेखन में निरन्तर सृजनरत क्षमा चतुर्वेदी की कहानियों ने अपनी विशिष्ट पहचान बनाई है। उनके कहानी संग्रह सूरज डूबनें से पहले, मुट्ठी भर धूप, चुनौती, स्वयंसिद्धा, अनाम रिश्ते प्रमुख है।

अनाम रिश्ते में नारी पात्र सौम्या का उदाहरण देखिये “मैडम ! सौम्या आगे बड़ी थी……मैडम ! क्या एक विधवा भी ब्यूटीपार्लर जाकर अपना श्रृंगार करा सकती है? माहौल में सन्नाटों सा छा गया था…..हां बेटी, क्यों नहीं, अच्छा दिखना कोई गुनाह थोडे ही है।” यहां क्षमा जी का नारी मन एक विधवा की पहचान, अस्मिता और स्वाभिमान को जीवंत करता है। डॉ. क्षमा चतुर्वेदी की कहानियों में भाषा और शिल्प की दृष्टि से सरल, सहज भाषा पात्रों के मध्य रोचक व आकर्षक संवाद, छोटे-छोटे संवाद कहानी को बोझिल नहीं होने देते साथ ही उन्होने लोप सूचक चिह्न योजक चिह्न जैसे भीड़-भाड़, साफ-सुथरा, बदला-बदला आदि शब्दों का अधिक प्रयोग किया है। यही शिल्प सौन्दर्य सुमन शर्मा की ‘घर वापसी, डॉ. सुशीला जोशी की “आखिर क्यूं”, डॉ. शशि जैन की “गाँव की रोशनी” में भी दृष्ट्य है।

हाड़ौती की दूसरी सशक्त कथाकार डॉ. सरला अग्रवाल की नारी समझदार है जो अपनी बुद्धि व विवेक से बुद्धिहीन पुरुष को सुधार देती है। इनकी “अनुमेहा” में आशाओं, अपेक्षओं के साथ-साथ हादसों के उतार-चढाव को दर्शाया है। यहां कहानी की विकास यात्रा में कथ्य का नयापन धीरे-धीरे कहानी को प्रौढता की ओर ले जाता है। ज्ञातव्य है कि यह सत्र हमनें महीयसी सरला अग्रवाल को समर्पित किया है। वरिष्ठ साहित्यकार जितेन्द्र निर्मोही के अनुसार हाड़ौती अंचल में प्रथम स्थापित कथाकार के रूप में डॉ. क्षमा चतुर्वेदी नजर आती है उसके बाद डॉ. सरला अग्रवाल। दोनों ने समाज के हर पहलू को अनुभूत कर कलम चलाई है।” इसी प्रकार हाडौती में कोटा की श्यामा शर्मा जी बाल साहित्य और सामाजिक चेतना पर केन्द्रित लेखन के लिए जानी जाती है। श्यामा जी ने “राजस्थानी लोक कथावां” और हाड़ौती अंचल की दस लोक कथाओं के संग्रह के माध्यम से प्रेरणादायी दिशा बोध लोककथाओं के संरक्षण का महत्वपूर्ण कार्य किया है। इनका किट्टी पार्टी उपन्यास प्रक्रियाधीन है।

गीता सक्सैना की “अद्भुत अहसास” स्त्री विमर्श को दर्शाता है। गीता जी काव्यत्व के माध्यम से भाषा में लोच लानें का प्रयास करती है। कृष्णा कुमारी की “स्वप्निल कहानियां” नारी जीवन के प्रश्नों को ज्ञानात्मक संवेदना से उलझे हुए सवालों के उत्तर तलाशती है। वहीं रीता गुप्ता की “वामिका” सामाजिक समस्या के साथ-साथ देश भक्ति प्रेम व नारी आत्मविश्वास को सुदृढ करती है। रेखा पंचौली की “हिमशिखर और चांदनी” में समाज के प्रत्येक पक्ष को उजागर कर कल्पना व यथार्थ के समन्वित स्वर को प्रस्तुत किया है। वो स्थापित कथाकार है। डॉ. कंचना सक्सैना के “अन्तराल” में नर-नारी के नाजुक अहसास की सुखद अनुभूति, दैहिक लिप्सा, महानगरीय जीवन की त्रासदी का चित्रण मिलता है। पार्वती जोशी के कहानी संग्रह “वह गुलाब”, “स्पर्श” आदर्शवादी समाज की परिकल्पना है। शिल्प की दृष्टि से वर्णनात्मक शैली का प्रयोग है। अर्चना शर्मा की “मुझे मां चाहिए” में “कोशिश” कहानी भावनात्मक शैली की व्यंजना का उदाहरण देखिये, “पति के जुराबों की दुर्गन्ध शहीद होने के पश्चात् प्यारी लगने लगती है। वही दुर्गन्ध जीनें का सहारा बनती है।” सुषमा अग्रवाल की “विदाई” आत्मविश्चास के साथ अन्याय का प्रतिकार सिखाती है इसमें रोचकता के साथ-साथ यथार्थवादी शैली का चित्रण है।

डॉ. प्रभात कुमार सिंघल व डॉ. वैदेही गौतम द्वारा सम्पादित “कथा वल्लरी” कथा संकलन में हाड़ौती की अड़तीस विदुषियों की कहानियों का संकलन हैं जिसमें प्रमुख है अल्पना गर्ग, डॉ. अपर्णा पाण्डे, प्रार्थना भारती, डॉ. युगल सिंह की कहानियां समाज की ज्वलंत समस्याओं को उजागर करती है।

प्राचीन कथाएँ समाज को भरोसा दिलाती थी किन्तु वर्तमान कहानियां समाज को सचेत करती है। वर्तमान कहानियां पढ़कर लगता है कि इनका भाषा और शिल्प सबसे अलग है। प्रीतिमा पुलक, रेखा शर्मा, संजू श्रृंगी, रेणू राधे, गरिमा राकेश, रश्मि वैभव की कहानियों में चारित्रिक गुणों से युक्त नायिका नें प्रभावशाली पात्र बनकर समाज को नवीन संदेश दिया है।

कथा साहित्य जगत के लिए कोटा में सबसे बड़ी उपलब्धी विगत वर्ष यह रही कि जितेन्द्र निर्मोही जी के आग्रह पर कथा पुरोधा “राजेन्द्र राव” जी से संवाद व परिचर्चा का आयोजन रखा गया उसमें मुझे भी संवाद करने का सुअवसर मिला। उनका वक्तव्य “नितान्त एकांत वास में कथाकार भावों को लेखनी से उदृत करके पूर्ण सामाजिक हो जाता है” यह वक्तव्य अनुभव मुझे रोमांचित कर देता है। राजेन्द्र राव जैसे नामचीन कथाकारों से हाड़ौती अंचल की लेखिकाओं की संवाद की आवश्यकता महसूस करती हूँ। विचारों के आदान प्रदान से भावों की अभिव्यक्ति पूर्ण होती है।

आज हाड़ौती की महिला कथाकाराओं ने चूल्हे चौके के इर्द-गिर्द घूमती नारी को जीवन के हर पहलू से स्पर्श कराया है। उन्हे विस्तृत केनवास पर उकेरा है। क्षमा चतुर्वेदी व सरला अग्रवाल की कहानियों में आदर्श व यथार्थ के धरातल पर पुरानी परम्परा को देखा जा सकता है कथा वल्लरी की लेखिकाओं में जन चेतना, जागरूकता आत्मविश्वास, देह के भीतर बसे मन और बुद्धि में स्वतंत्रता और आत्मबोध को दर्शाया है। ये कहानियाँ नयी भाषा व नये शिल्प के साथ समाज के समक्ष नवाचार प्रस्तुत करती है।

डॉ. नरेन्द्र चतुर्वेदी की चर्चित कृति “हाड़ौती अंचल का गद्य साहित्य परम्परा और विकास तथा निर्मोही जी के आलेख और टिप्पणियों के आधार पर तत्कालीन समय तक दस से बारह महिला कथाकार सामने आयी थी। विगत वर्षों में निर्मोही जी की प्रेरणा से कथा संदर्भों को लेकर जो प्रमुख कार्य डॉ.प्रभात कुमार सिंघल ने किए हैं, उससे वर्तमान में महिला कथाकारों की संख्या अड़तीस हो गयी है। इसे हाड़ौती अंचल की महिला कथाकारों के क्षेत्र में महनीय सफलता माना जा सकता है, यह सुखद सूचना है। यह यात्रा सतत जारी रहे। इसके लिए प्रभात जी को असीम बधाई।

अभी हाड़ौती अंचल में श्रेष्ठ कार्य कथा क्षेत्र को लेकर किये जाने हैं। यह स्वप्न वरिष्ठ साहित्यकारों की प्रेरणा से ही पूर्ण होंगे। उनके मार्ग दर्शन और आशीष से हाड़ौती अंचल साहित्यिक क्षेत्र में प्रगति करेगा।

( लेखिका प्राचार्य, रा.बा.उ.मा.वि. सीमलियासुल्तानपुर, कोटा (राजस्थान में प्राचार्य के पद पर हैं)

पश्चिम रेलवे के महाप्रबंधक की चर्चगेट पर मीडिया से चर्चा

मुंबई। पश्चिम रेलवे के महाप्रबंधक (प्रभारी) श्री प्रदीप कुमार ने वरिष्ठ अधिकारियों के साथ मिलकर 1 फरवरी 2026 को चर्चगेट रेलवे स्टेशन पर चल रहे जन-जागरूकता अभियान “मेरा टिकट, मेरी शान – विकसित भारत के लिए मेरा योगदान” के संबंध में एक प्रेस वार्ता का आयोजन किया। इस दौरान यात्रियों को वैध टिकट लेकर यात्रा करने तथा जिम्मेदार रेल यात्रा के महत्व के बारे में जागरूक किया गया।

पश्चिम रेलवे के मुख्य जनसंपर्क अधिकारी श्री विनीत अभिषेक द्वारा जारी प्रेस विज्ञप्ति के अनुसार, इस अवसर पर श्री प्रदीप कुमार ने आम जनता से वैध टिकट खरीदकर जिम्मेदारीपूर्वक यात्रा करने की अपील की। उन्होंने कहा कि प्रत्येक खरीदा गया टिकट सीधे तौर पर रेलवे के बुनियादी ढांचे के विकास, यात्री सुविधाओं के उन्नयन तथा सुरक्षा प्रणालियों के सुदृढ़ीकरण में योगदान देता है। उन्होंने यह भी रेखांकित किया कि टिकट से प्राप्त राजस्व रेलवे के सुचारु संचालन, क्षमता विस्तार एवं सेवा सुधार से जुड़ी परियोजनाओं के लिए अत्यंत आवश्यक है।

 

महाप्रबंधक श्री प्रदीप कुमार ने कहा कि नैतिक टिकटिंग एवं स्वैच्छिक अनुपालन रेलवे की वित्तीय स्थिरता सुनिश्चित करने तथा नागरिक जिम्मेदारी की भावना को बढ़ावा देने के लिए अनिवार्य है। उन्होंने जोर दिया कि यात्रियों का जिम्मेदार व्यवहार भारतीय रेलवे के आधुनिकीकरण प्रयासों को सशक्त बनाता है और विकसित भारत की राष्ट्रीय परिकल्पना के अनुरूप है, जिसमें प्रत्येक नागरिक राष्ट्र निर्माण में सक्रिय भूमिका निभाता है।

 

पश्चिम रेलवे ने यात्रियों के साथ निरंतर संवाद, जागरूकता एवं जनसंपर्क अभियानों के प्रति अपनी प्रतिबद्धता दोहराई तथा सभी यात्रियों से वैध टिकट के साथ यात्रा कर इस अभियान को सफल बनाने और अन्य लोगों को भी इसके लिए प्रेरित करने का आग्रह किया। सामूहिक जिम्मेदारी, अनुशासन और सहयोग के माध्यम से पश्चिम रेलवे यात्री विश्वास, परिचालन दक्षता और सेवा उत्कृष्टता को और सुदृढ़ करने का लक्ष्य रखता है, जिससे विकसित भारत के व्यापक उद्देश्य में योगदान दिया जा सके।

 

अयोध्या शाकद्वीपी प्रथम ब्राह्मण राजा ओरी पाठक बख्तावर सिंह की दास्तान

अयोध्या के शाकद्वीपीय राजाओं ने कई स्थानों में भी अपना राज्य स्थापित कर लिये थे । आज से लगभग दो- ढाई सौ साल पहले तत्कालीन मुगल और नवाबी शासन प्रशासन की अनुमति से यह शाकद्वीपीय ब्राह्मण पाठक और मिश्र परिवार यहां के दफ़ादार, चौधरी , चकलेदार , रिसलदार, राजा और महाराजा की उपाधि से विभूषित किए गए हैं। इस राज परिवार का आदि स्थान बक्सर बिहार के मझवारी, बिनसैया मिश्र (बिलासू) गाजीपुर, नरहरपुर – गोरखपुर, नन्दनगर – अमोढा -बस्ती, पलिया माफी – शाहगंज अयोध्या और राजसदन अयोध्या धाम हुआ करता है।

 

बिलासू से जुड़ाव :-

चेदि नरेश धृष्टकेतु ने बिलासू गांव को दान में दिया था। यहाँ गर्गगोत्र के बिलसिया ब्राह्मण रहते हैं और उनसे इस गोत्र के वंशजों का आना जाना अब तक चला आ रहा है।अयोध्या के शाकवंशी राजा साहब का गर्ग गोत्र – विलासियाँपुर और द्वादश आदित्य शाखा से सम्बद्ध है।अयोध्या के शाकद्वीपीय राजा मानसिंह के प्रपितामह सदासुख पाठक को मझवारी का प्रथम चौधरी का उल्लेख मिलता है। उनके पूर्वज पिता पुत्र सदासुख पाठक और गोपाल राम पाठक का विवरण कम ही मिलता है। इनके अगले उत्तराधिकारी पुरन्दर राम पाठक वंश का बिस्तार ही वर्तमान समय में अनेक रूप में दिखाई दे रहा है।

 

मझवारीऔर नरहर से जुड़ाव :-

मझवारी के किसी आतताई ने पूरे गांव को समाप्त कर दिया था और जमींदार की एक गर्भवती महिला बचकर अपने मायके आकर मधुसूदन और टिकमन दो बालकों को जन्म दिया था जो बाद में गोरखपुर के नरहरपुर या नरहर गांव में आकर बस गए थे। यहीं से अपने वंश को आगे बढ़ाए थे।

 

नंद नगर बस्ती से जुड़ाव :-

शाकद्वीपीय राजाओं की वंशावली के कुछ लोग बस्ती जिले के अमोढा राज्य की नंद नगर में बसने का भी उल्लेख मिलता है। बाद में यह परिवार शादी के माध्यम से फैजाबाद वर्तमान अयोध्या जिले के पलिया माफी में बस गया।

 

अयोध्या के पलिया में हुआ था पड़ाव :-

सदासुख पाठक के बेटे गोपाल राम पाठक ने अपने बेटे पुरन्दर राम पाठक का विवाह पलिया गाँव के गङ्गाराम मिश्र की बेटी के साथ कर दिया और पलिया में आकर बस गये। इस समय तक ये कोई विशिष्ट जन ना होकर आमजन के रूप में जाने जाते थे। पलिया माफी ग्राम पंचायत के अंतर्गत बासावन, चकनाथा, पलिया माफ़ी और रामपुरवा नामक गाँव/मजरे आते हैं। पलिया माफी, फैजाबाद (अब अयोध्या) जिले के मिल्कीपुर तहसील और ब्लॉक में स्थित एक गाँव है, जो फैजाबाद रायबरेली रोड पर इनायत नगर से पहले कुचेरा बाजार से बाएं पूरब की तरफ मुड़कर जाना पड़ता है।अयोध्या के प्रभात नगर तिराहा से रेवती साहबगंज रोड से भी यहां पहुंचा जा सकता है। भरत कुंड भदरसा राजापुर माफी होकर भी यहां पहुंचा जा सकता है। पलिया माफी अपनी सांस्कृतिक पहचान रखता है । इसे राजा का पलिया गांव भी कहा जाता है। यह ग्राम सभा फैजाबाद (अयोध्या) के समृद्ध इतिहास का एक हिस्सा है, जो स्थानीय शासकों और अयोध्या के प्राचीन राजपरिवार के इतिहास से जुड़ा हुआ है। यह गांव फ़ैज़ाबाद (अयोध्या) के शाकद्वीपी राजाओं से जुड़ा है, और यहाँ महाराजा मानसिंह के पूर्वज आए थे। पलिया माफी गांव में माफी शब्द जुड़ा है जो शासकीय रूप में कर माफी की अभिव्यंजना व्यक्त करता है। यह जिला मुख्यालय से 18 – 20 किमी. दक्षिण की ओर तथा मिल्कीपुर से 17 किमी. उत्तर बसा हुआ है। 2011 की जनगणना में यहां 236 घर तथा 1297 जनसंख्या रही।

 

1798 ई.मे अयोध्या के शाकवंशीय राजवंश का उदय :-

मुगल सम्राट मुहम्मद शाह के समय 1722 में सहादत अली खां प्रथम (1722 से 1739 ईस्वी ) को अवध का नवाब ए वजीर नियुक्त किया गया था। इसी समय से अवध एक स्वायत्त राज्य बन गया था। अवध के नवाब शुजाउद्दौला (5 अक्टूबर 1754 से 26 जनवरी 1775) ने फैजाबाद को अपनी राजधानी बनाई थी । उस समय फैजाबाद व्यापार कला व संस्कृति का केंद्र बन गया था। उनके बेटे आसिफुद्दौला ने 1775 ई. में यह राजधानी वापस लखनऊ स्थानांतरित कर दिया था ।इसके बाद सआदत अली खां द्वितीय 1798 ई.में में नवाब हुए। इन्हीं के शासनकाल में अयोध्या में शाक द्वीपीय ब्राह्मण राज वंश का उदय हुआ था ।

 

गर्ग गोत्र विलासियाँ पुर और द्वादश आदित्य शाखा रहा:-

इस राजवंश के महाराजा ओरी पाठक राजा बख़तावर सिंह हुये। महाराजा साहब गर्ग गोत्र के थे और इनके पूर्व पुरुष गाजीपुर के बिलासू गाँव में रहते थे। यह गाँव गङ्गा तट पर अब तक बसा हुआ है और राजा धृष्टकेतु से मिला था। यहाँ गर्ग गोत्र के बिलसिया ब्राह्मण रहते हैं और उनसे बिरादरी का आना जाना अब तक चला जाता है। इसी कारण महाराजा साहब का गर्ग गोत्र विलासियाँ पुर और द्वादश आदित्य शाखा है।

 

पूरा परिवार शासन में:-

पलिया के पहुना पुरन्दर राम पाठक के पांच संताने हुई थीं । जिनका नाम ओरी पाठक उर्फ बख्तावर सिंह, शिवदीन सिंह, दर्शन सिंह, इच्छा सिंह और देवी प्रसाद सिंह था। ये सभी अपने अपने पुरुषार्थ और हुक़्मरानों के हुकुम से अवध अंचल के विभिन्न क्षेत्रों के राजा बने थे।

 

पूर्व में ईस्ट इण्डिया कम्पनी का पुलिस सुरक्षाधिकारी

ओरी पाठक उर्फ राजा बख़तावर सिंह का समय 1798-1846 के आसपास का रहा। उन्होंने 14 वर्ष की अवस्था में ईस्ट इंडिया कंपनी की सेना में प्रवेश किया था । वे ईस्ट इण्डिया कम्पनी के रिसाले (अश्व सेना)में नौकरी करने लगे थे और लार्ड कार्नवलिस के साथ कई लड़ाइयों में वीरता दिखाई थी। एक बार छुट्टी लेकर लखनऊ की सैर को आये हुए थे। जब वे बेलीगारद के सामने अपने एक मित्र से बात-चीत कर रहे थे कि उधर से अवध के नव्वाब सआदत अली खाँ (जन्म 1752, शासनकाल 21 जनवरी 1798 से 11 जुलाई 1814 ) की सवारी निकली हुई थी।ओरी बहुत अच्छे डील डौल के वीर पुरुष थे। नव्वाब साहब ने उनको बहुत पसन्द किया और चोबदार से बोले कि इस जवान से कहो कि हमारी सरकार में नौकरी करे।

 

ओरी ने उत्तर दिया कि हम आपकी सेवा करने में अपनी प्रतिष्ठा समझते हैं परन्तु हम अंग्रेजी सरकार के नौकर हैं। नव्वाब साहब ने तुरन्त लखनऊ के रेजिडेण्ट डेली साहब को लिखा और ओरी को 8 सवारों का दफादार बना कर अपनी अर्दली में रक्खा। दफादार का अर्थ सेना या पुलिस में एक छोटा अधिकारी होता है, जो सिपाहियों के एक समूह का नेतृत्व करता है; यह जमादार या कॉर्पोरल/सार्जेंट के बराबर का पद है, जो “समूह का धारक” या “दफा (समूह/भाग) का प्रमुख” होता है, और यह पद भारतीय सेना में एक ऐतिहासिक रैंक को दर्शाता है।

 

पलिया जागीर और सौ अश्वारोहियों का अश्वपति :-

एक दिन नव्वाब साहब हवादार पर बाहर निकले थे। रास्ते में उन पर किसी ने तलवार चलाई। वह हवादार को तान में लगी। दूसरा वार फिर करना चाहता था कि वीर ओरी ने झपट कर उसको एक ऐसा हाथ मारा कि वह वहीं मर गया। इस पर नव्वाब साहब बहुत प्रसन्न हुये और ख़िलअत देकर पलिया उनकी जागीर कर दी और जमादारी का ओहदा देकर उनका सौ सवारों का अफसर बनाया।

 

 

घुड़सवार सेना का कमांडर :-

इसके कुछ ही दिन पीछे रिसालदार बना दिये गये।रिसालदार भारतीय और पाकिस्तानी सेना की घुड़सवार और बख्तरबंद इकाइयों में एक मध्य-स्तरीय कनिष्ठ कमीशंड अधिकारी (JCO) का पद है। यह फारसी मूल का शब्द है, जिसका अर्थ “रिसाला” (घुड़सवार सेना के दल या रेजिमेंट) का कमांडर या नेता होता है। उनका नाम ओरी से बदल कर बख्तावर सिंह कर दिया गया। बख्तावर का अर्थ है सौभाग्य लाने वाला, सौभाग्यशाली होता है।

 

राजा की उपाधि:-

नव्वाब सआदत अली खाँ के मरने पर जब ग़ाज़ीउद्दीन हैदर बादशाह हुये तो बख्तावर सिंह को राजा की उपाधि मिली। उनकी खैरख्वाही के कारण दरबार में उनकी प्रतिष्ठा और उनका अधिकार बढ़ता गया जो किसी दूसरे को प्राप्त न था।

 

बख्तावर सिंह की उपाधि :-

इसी उपाधि के बाद उन्हें राजा बख्तावर सिंह कहा जाने लगा। बख्तावर का मतलब सौभाग्य शाली होता है। इस प्रकार उनको अच्छे भविष्य की कामना पूर्ण नाम की सौगात शासन प्रशासन से मिली।बताया गया कि राजा बख्तावर सिंह कुशल सूझबूझ के एक अच्छे प्रबंधक और वीरता से परिपूर्ण सेना नायक थे।

 

पलिया के प्रथम शासक :-

इस कुल के प्रथम महाराजा ओरी पाठक उर्फ बख्तियार सिंह को भी यह राजा पद आसीन होने का उल्लेख मिलता है। अयोध्या के वर्तमान राजघराने से जुड़े श्री यतीन्द्र मिश्र के ‘शहरनामा फैजाबाद’ के अनुसार अवध के नवाब सहादत अली खां द्वितीय ने अपने ‘रिसाले’ के वीर हिन्दू ब्राह्मण ‘ओरी’ पाठक की बहादुरी से प्रसन्न होकर उन्हें ‘खिलअत’ देकर ‘पलिया’ की जागीर सौंपी और समय समय पर उनके कार्यों में उच्चता को देखते हुए उनके ओहदे बढ़ाते गए । वर्तमान में इस गांव को ‘राजा का पलिया’ भी कहा जाता है। इसका दूसरा नाम पलिया माफी भी है जो ब्लाक और तहसील मिल्कीपुर,जनपद अयोध्या में स्थित है।

 

 

पलिया माफी ग्राम पंचायत के अंतर्गत बासावन, चकनाथा, पलिया माफ़ी और रामपुरवा नामक गाँव/मजरे आते हैं। पलिया माफी मिल्कीपुर ब्लॉक और तहसील में स्थित एक गाँव है, जो फैजाबाद रायबरेली रोड पर इनायत नगर से पहले कुचेरा बाजार से बाएं पूरब की तरफ मुड़कर जाना पड़ता है।अयोध्या के प्रभात नगर तिराहा से रेवती साहब गंज रोड से भी यहां पहुंचा जा सकता है। भरत कुंड भदरसा राजापुर माफी होकर भी यहां पहुंचा जा सकता है। पलिया माफी अपनी सांस्कृतिक पहचान रखता है । यह ग्राम सभा फैजाबाद (अयोध्या) के समृद्ध इतिहास का एक हिस्सा है, जो स्थानीय शासकों और अयोध्या के प्राचीन राजपरिवार के इतिहास और शाकद्वीपी राजाओं से जुड़ा है। यहाँ महाराजा मानसिंह के पूर्वज आए थे। पलिया माफी गांव में माफी शब्द जुड़ा है जो शासकीय रूप में कर माफी को व्यक्त करता है। यह जिला मुख्यालय से 18 – 20 किमी. दक्षिण और मिल्की पुर से 17 किमी. दूर बसा हुआ है। 2011 की जनगणना में यहां 236 घर तथा 1297 जनसंख्या रही।

 

शाहगंज में राजवंश की आवासीय हवेली बनी :-

हिंदू राजाओं के रियासत में अयोध्या के राजा मानसिंह की रियासत शाहगंज का इतिहास के पन्नों में अपनी एक खास जगह और पहचान रही है। अयोध्या के बारुन बाजार के पास शाहगंज में ‘राजा की हवेली’ एक प्रसिद्ध ऐतिहासिक स्थल है, जो कभी अयोध्या के राजाओं के वंशजों का निवास स्थान होता रहा। इस रियासत को शाहगंज के नाम से जाना जाता है । शाहगंज में पहले पलिया और बाद में महादौना के राजाओं द्वारा 70 बीघे में विशाल हवेली बनवाई थी जो अब जीर्ण – शीर्ण अवस्था में हो गया है। यहां इस बंश परम्परा से जुड़े लाल अम्बिका प्रताप सिंह आज भी अपनी परम्परा का प्रतिनिधित्व कर रहे हैं। ये मूलतः पाठक लोगों का गांव है। जबकि अयोध्या घराने में आरा से आए मिश्र परिवार इस वंश परम्परा की यश वृद्धि कर रहे हैं।

 

यहाँ पर कई पुराने हिन्दू मन्दिर तथा एक मस्जिद है। यहाँ स्थित महल तथा किला को अयोध्या के राजाओं ते सम्बन्धित किया जाता है। राजा दर्शन सिंह के कब्जे में आने के बाद इस स्थान का महत्त्व और बढ़ गया। 1857 ई० के विद्रोह के समय राजा मान सिंह ने यहाँ यूरोपियों का स्वागत किया था। उस समय पह जिला अजेय माना जाता था । और उसके चारों ओर मिट्टी की सुदृढ़ रक्षा प्राचीर थीं। उसके ऊपर 14 तोपों का निर्माण हुआ था। इस स्थल का पुरातात्विक सर्वेक्षण करते समय इस स्थल से मिट्टी के अनेक पात्र प्राप्त हुए हैं। एक मृदभांड पर पोस्ट फायरिंग स्क्रैच डिजाइन बना हुआ है। कुछ पत्ते फैब्रिक वाले धूसर पात्र- परम्परा के वर्तन हैं। इन्हें एन.बी.पी.डब्लू . (उत्तरी काले चमकीले पात्र) कहा जाता है। इस संस्कृति को प्रारम्भिक ऐतिहासिक काल से जोड़ा जा सकता है। इस स्थान पर अन्य पात्र मध्य काल तक की आबादी के प्रमाण मिले हैं।

(सन्दर्भ: फैजाबाद जनपद का पुरातत्व:विजय प्रकाश वर्मा; डी. फिल. शोध प्रबन्ध,1993 ;

पृष्ठ 104-105)

 

यह विशेष रूप से राजा बख्तियार सिंह और राजा दर्शन सिंह और उनके परिवार से जुड़ा स्थल है, जहाँ आज भी उनके वंशज रहते हैं। राजा दर्शनसिंह ने पलिया – मेहदौना के अंतर्गत शाहगंज में सुदृढ़ कोट, बाजार और महल बनवाये हैं।यह खजुराहट रेलवे स्टेशन के पास स्थित है। शाहगंज मुकीमपुर उर्फ पहाड़ पर ग्राम पंचायत में आता है। यह फैजाबाद जिला मुख्यालय से 20 किमी दक्षिण फैजाबाद रायबरेली रोड पर दक्षिण पूर्व दिशा में स्थित है। गांव के चारों तरफ हरे-भरे बाग बगीचे हैं और तालाब से घिरे हुए प्राकृतिक स्थल हैं।प्राकृतिक वातावरण से आच्छादित ग्राम सभा चारों तरफ से कि तालाब और बाग-बगीचे है। प्राकृतिक वातावरण से आच्छादित ऐतिहासिक शिव मंदिर तथा कि ग्रामसभा के प्रवेश द्वार मां विंध्यवासिनी का मंदिर अपने अद्भुत और वैभवशाली झलक प्रस्तुत कर रहा है।

 

यहां वर्तमान में एक पुरानी गिरी पड़ी हवेली मात्र बचा हुआ है जो अपना ऐतिहासिक महत्त्व रखती है और दर्शनीय है। यह अयोध्या के शाही इतिहास और संस्कृति से जुड़ा एक महत्वपूर्ण स्थान है, जो पुराने समय की वास्तुकला को दर्शाता है।

 

शाहगंज किला आपने आप में एक अद्भुत रहस्य समेटे हुए है। इसकी मुख्य गद्दी अयोध्या से 20 किलोमीटर दूर शाहगंज मानी जाती है । वर्तमान में शाहगंज की हवेली 70 बीघे में बनी हुई है जो दर्शन पाठक सिंह जी द्वारा बनवाई गई थी । उसमें रह रहे वंशजों वर्तमान राजा लाल अंबिका पाठक सिंह जी के परिवार निवास कर रहा है।

 

भाई दर्शन सिंह को भी आगे बढ़ाया:-

अपनी कुशल प्रशासनिक क्षमता और रसूख के बल पर राजा बख्तियार सिंह ने कुछ दिनों बाद अपने भाई दर्शन सिंह को भी अवध दरबार में प्रवेश दिलवाया। दर्शनसिंह ने भी अपने कुशल सैन्य क्षमता व प्रबंधन के चलते अवध दरबार में बहादुर का पद हासिल कर लिया। नवाब नसीरउद्दीन हैदर के काल 1827 से 1837 में दोनों ही भाइयों की उन्नति होती रही।

 

पलिया अयोध्या के राजा बख्तावर सिंह को अवध के नवाब मुहम्मद अली शाह के शासनकाल के दौरान, लगभग 1837 से 1842 ईस्वी के बीच महदौना (मेहंदौना) की जागीर और ‘राजा’ की पदवी मिली थी। उन्होंने अपनी वीरता और प्रशासनिक क्षमता से इस रियासत को स्थापित किया और बाद में इसे अपने उत्तराधिकारी के रूप में राजा मान सिंह को सौंप दिया।

 

उस समय किसी कारण से राजा बख्तावर सिंह बादशाही में नजरबन्द हो गए थे। महाजन से 3 लाख रुपये लेकर मान सिंह ने उन्हें भी छुड़ाया था और राजा बख्तावरसिंह फिर दरबार में पहुँच गये थे। राजा बहादुर दर्शन सिंह का इंतकाल 1844 में राजा बख्तावर सिंह के जीवन काल में ही हो गया था। इधर राजा बख्तावर सिंह भी नि:संतान रहते हुए बूढ़े हो गये तो उन्होंने महाराजा मानसिंह को लखनऊ बुलाया और अपना पद, अपना राजा, उनके नाम लिख कर बादशाही सरकार में अर्ज़ी दे अपने भाई दर्शन सिंह के पुत्र राजा मान सिंह के हक में वसीयत नामा कर दिया था।उनकी अर्ज़ी मंजूर हो गई। वसीयत नामा के अनुसार उनकी मृत्यु के बाद मानसिंह को राजा के रूप में प्रतिष्ठित होना था। जब राजा बख्तावर सिंह की 1846 में मृत्यु हुई , तो मान सिंह अयोध्या सहित पूरे क्षेत्र के शासक बन राज्य का प्रबन्ध संभाल लिए थे।

लेखक परिचय:-

(लेखक भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण, में सहायक पुस्तकालय एवं सूचनाधिकारी पद से सेवामुक्त हुए हैं। वर्तमान समय में उत्तर प्रदेश के बस्ती नगर में निवास करते हुए सम सामयिक विषयों,साहित्य, इतिहास, पुरातत्व, संस्कृति और अध्यात्म पर अपना विचार व्यक्त करते रहते हैं। वॉट्सप नं.+919412300183)

ब्राह्मणों ने अपने अत्याचारों को महिमाा मंडित नहीं किया, इसलिए वे आज भी आसान शिकार हैं

ज्ञान के प्रति एक द्वेष रहता ही रहता है। लोग दूसरे के धन प्राचुर्य को सह लेते हैं पर ज्ञान प्राखर्य नहीं सहा जाता। किसी भी सभ्यता को नष्ट करना हो तो सबसे पहले उसके ज्ञान-ग्रिड पर आक्रमण करना होता है।
राक्षस क्यों ब्राह्मणों और यज्ञों पर आक्रमण करते थे? द्विजभोजन मख होम सराधा/ सब कै जाइ करहु तुम्ह बाधा। यज्ञ होम हवन में ही बाधा नहीं, श्रद्धा में भी बाधा। देखत जग्य निसाचर धावहिं/ करहिं उपद्रव मुनि दुख पावहिं। यह अत्याचार जो ब्राह्मणों पर हुए, उनके विवरणों से हमारी पुस्तकें भरी हुई हैं। जेहिं जेहिं देस धेनु द्विज पावहिं/ नगर गाऊँ पुर आगि लगावहिं।
इसलिए ब्रह्महत्या के विरुद्ध इतने कड़े नियम बनाने पड़े थे। तपस्वियों, ऋषियों मुनियों की हिंसा राक्षसों का प्रिय शगल बन गया था। अरण्यकांड में राम को ज्ञात होता हैः “इस वन में रहने वाला वानप्रस्थ महात्माओं का यह महान समुदाय जिसमें ब्राह्मणों की ही संख्या अधिक है तथा जिसके रक्षक आप ही हैं, राक्षसों के द्वारा अनाथ की तरह मारा जा रहा है इस मुनि समुदाय का बहुत अधिक मात्रा में संहार हो रहा है। (श्लोक 15, सर्ग 6, अरण्यकांड)।’ आइये, देखिये, ये भयंकर राक्षसों द्वारा बार- बार अनेक प्रकार से मारे गये बहुसंख्यक पवित्रात्मा मुनियों के शरीर शव-कंकाल दिखायी देते हैं। “(अगला श्लोक)” पंपा सरोवर और उसके निकट बहने वाली तुंगभद्रा नदी के तट पर जिनका निवास है, जो मंदाकिनी के किनारे रहते हैं तथा जिन्होंने चित्रकूट पर्वत के किनारे अपना निवास स्थान बना लिया है, उन सभी ऋषि-महर्षियों का राक्षसों द्वारा महान संहार किया जा रहा है। ” (अगला)” इन भयानक कर्म करने वाले राक्षसों ने इस वन में तपस्वी मुनियों का जो ऐसा भयंकर विनाशकांड मचा रखा है, वह हम लोगों से सहा नहीं जाता है। “(अगला)

तो जिन लोगों ने लगातार अत्याचार सहे, उन लोगों की गलती यह रही कि उन्होंने अपने विक्टिमहुड का नैरेटिव तैयार नहीं किया। बार बार उनका ईश्वर उनकी रक्षा के लिए अवतार लेता रहा पर बार बार उसका आना ही इस कारण होता रहा कि वे ही बार बार अतिचार के शिकार होते रहे। सिर्फ पौराणिक इतिहास ही नहीं बाद का इतिहास भी ब्राह्मणों के उत्पीड़न का साक्षी रहा।
जो विप्र परंपरा यह कहती थी कि ‘यो हि यस्यान्न मश्नाति स तस्याश्नाति किल्विषम्” कि जो जिसका अन्न खाता है, वह उसका पाप भी खाता है’; उस परंपरा को दूसरे के मुंह का निवाला छीन लेने का आरोपी बनाया गया।
जिस परंपरा में विप्र को अकिंचन होना सिखाया गया हो- ‘अनन्तसुखमाप्नोति तद् विद्वान यस्त्वाकिंचनः’ कि जो अकिंचन है, वह विद्वान अनन्त सुख पाता है- उस परंपरा को इस बात के लिए जिम्मेदार ठहराया गया कि जो पददलित हैं, जो पीड़ित है, उनकी दुर्दशा का दायित्व इन्हीं लालची पेटू ब्राह्मणों का है।
ऐसे में भारत में एक दल का खुलेआम ( खुलेआम इसलिए कि यह उनकी वेबसाइट पर उपलब्ध है) यह दावाः-कि Brahmanism is an ideology of graded inequality and oppression. Its origins lie in the Vedic period, thousands of years ago. A class that has emerged and established its rule, “ब्राह्मणवाद श्रेणीकृत असमानता और दमन की विचारधारा है। इसकी उत्पत्ति वैदिक काल में हजारों साल पहले हुई। एक वर्ग उभरा और उसने अपनी सत्ता स्थापित की” :-हास्यास्पद और अनपढ़ लगता है।
ध्यान दीजिए कि स्वयं अंबेडकर भी बहुत परिश्रम के बावजूद वेदों में जाति व्यवस्था नहीं ढूँढ पाये थे पर इस दल को वैदिक काल को बदनाम करने में कोई संकोच नहीं है।
देखें कि इस एक बिन्दु पर साम्राज्यवादी और मार्क्सवादी, दलित चिंतक, मिशनरी और अल्पसंख्यकवादी सब एक हो जाते है।
गेल ओम्वेद मिल्ली गजट में ‘हावी’ ब्राह्मणवाद के विरुद्ध मुस्लिम दलित एकता की वकालत इस आधार पर करते हैं कि बौद्ध धर्म की पराजय के बाद इस्लाम ने ही भारत में शताब्दियों तक समानता (egalitarianism) और बंधुत्व (ब्रदरहुड) के मूल्यों को जिंदा रखा।
सैय्यद शहाबुद्ददीन भी मिल्ली गजट में दलित-मुस्लिम गठजोड़ की संभावनाओं की चर्चा करते हैं और इस बात पर दुःख जताते हैं कि ‘शूद्र ब्राह्मनिकल व्यवस्था में ही एकोमोडेशन चाहते हैं।
समानता के मूल्य इन भले मानुसों के लिए उस वेद में नहीं है जो यह कहता हैः “असंबाधं मध्यतो मानवानां यस्या उदवतः /ऊंचनीच की असमानता नहीं है। समता बहुत है।), प्रवतः समंबेहु.” (हमारी मातृभूमि में रहने वालों में उन्हें शंकराचार्य के उस उद्‌घोष में ‘मूल्य’ नहीं दिखता कि It has been established that every one has the right to the knowledge and that the supreme goal is achieved by that knowledge alone. कि “यह स्थापित सत्य है कि प्रत्येक को ज्ञान का अधिकार है और महत्तम लक्ष्य ज्ञान मात्र से ही प्राप्त किया जाता है।” (भाष्य, तैत्तिरीय उपनिषद् 2.2)। वह सर्वहाराओं के उन स्वनामधन्य शुभ ‘चिंतको’ में नहीं था जो व्यवस्था के उच्छिष्ट पर पलते हैं।
वह सच्चा ब्राह्मण था जो ‘भिक्षां देहि’ का जीवन किसी बाहरी निर्देश से नहीं जिया, बल्कि अपने हालात और हकीकतों के कारण जिया। जिस तरह से ये सभी ‘बंधु’ एक हुए हैं, उससे इतना तो स्पष्ट है कि ब्राह्मणवाद की बोगी से इनके जरूर कुछ हित सधते हैं। अन्यथा क्रूसेड, विच ट्रायल्स इनक्वीजीशन, जेनोसाइड, उपनिवेशवाद, एटम-बम, स्लेवरी, नव-साम्राज्यवाद, जजिया, ईजियन द्वीप में इस्लामी आक्रामकों द्वारा 27,000 ईसाइयों का नरसंहार, कांस्टिनटिनोपल से लेकर दिल्ली तक मध्यकालीन मुस्लिम आक्रामकों के सामूहिक हत्याकांड, 1840-1860 के बीच खलीफाओं के हत्याकांड , 1847 में 30,000 असीरियन क्रिश्चियनों को मार डालना, लेबनान, दैर- अल- कमार, जाजिन, हस्बैया, राशय्या, जाला दामस्कस के भयावह नरसंहार जहां पहले ईसाइयों को शस्त्र जमा करने को कहा गया और बाद में सामूहिक किलिंग में ‘रस’ लिया गया, 1870 के दशक के बाल्कन हत्याकांड (जहां कभी 12,000 ईसाई एक साथ मार डाले गए, तो कभी 9000), 1890 के दशक के नरसंहार (जहां कभी इंस्तंबूल में 6000 आर्मीनियन ईसाइयों को) ‘बूचर’ किया गया तो कभी 3 लाख असीरियन ईसाइयों का 24 अप्रैल 1915 से शुरू हत्याकांडों की श्रृंखला (जब आटोमन मुस्लिम शासकों द्वारा 15 लाख आर्मीनियनों और 2.50 लाख असीरियनों की हत्या की गई); हिरोशिमा, नागासाकी लेनिन-स्टालिन के रूस, माओ के चीन, कम्पूचिया में ‘ड्राप इयर’, नक्सली नरसंहार ये सब समानता (egalitarianism) और बंधुत्व (brotherhood) के वाकई ऐसे उदाहरण हैं जिन्हें वैदिक समय से लेकर अभी तक ब्राह्मणवाद कभी जिंदा नहीं रख पाया लेकिन इन ‘बंधुओं’ ने कभी खत्म नहीं होने दिया।
इस परिप्रेक्ष्य में पुनः उस दल के कथन के अगले हिस्से को पढ़िए Its outlook of graded superiority and inferiority has infected, to a greater or lesser degree, each and every caste and religious community. कि ‘इसके श्रेणीकृत श्रेष्ठता और हीनता के दृष्टिकोण ने ज्यादातर और कमतर रूप में मगर हर जाति और धार्मिक समुदाय को संक्रमित किया।’ यहां “Its” का अर्थ ब्राह्मणवाद से है। लेकिन ‘ईच’ एवं ‘एवरी’ पर ध्यान दें और ध्यान दें ‘रिलीजस कम्युनिटी’ शब्द पर।
माने यह कि ऊपर गिनाए गए इन सारे शुभकामों के लिए भी ब्राह्मणवाद ही जिम्मेदार रहा होगा- यदि इनकी मानें तो। बुद्धि के ये जमींदार आगे कहते हैं: Marx has spoken about this advance as a process involving the elimination of all classes and class distinctions generally, all the relation of production on which they rest, all the social relations corresponding to them, and all the ideas that result from these social relations. This understanding was further deepend by Mao Tse Tung, especially through the Great Proletariat Cultural Revolution. In India, the task of continuing the revolution, all the way up till communism, is crucially dependent on advancing and deepening the struggle against Brahmanism and its concrete manifestations.
अर्थात, “मार्क्स ने इस प्रगति को एक ऐसी प्रक्रिया के रूप में बताया जो सभी वर्गों और वर्ग विशिष्टताओं को सामान्य तौर पर समाप्त करती है. सभी उत्पादन-संबंध जिन पर वे निर्भर हैं, उससे मिलते सभी सामाजिक रिश्ते, और सभी विचार जो इन सामाजिक रिश्तों का फल हैं। यह समझ आगे माओ-त्से-तुंग द्वारा गहरी की गई, खासकर महान सर्वहारा सांस्कृतिक क्रांति के जरिए। भारत में क्रांति को जारी रखने का काम- साम्यवाद के लक्ष्य तक- ब्राह्मणवाद और इसके ठोस स्वरूपों के विरुद्ध संघर्ष को बढ़ाने और गहरा करने पर अत्यंत महत्वपूर्ण रूप से निर्भर है।”
तो यह स्पष्ट है कि ब्राह्मनिज्म रावण के समय से ही एक ऐसी सत्ता रहा है जिससे और जिसके मूर्त प्रतीकों से संघर्ष किए बिना न तो उनकी प्रगति (advancing) होती है, न ‘खुदाई’ (deepening)। उनकी यानी शेष सभी “समानता” और “भाईचारे” की विचारधाराओं की। उस सांस्कृतिक क्रांति की जिसमें करोड़ों लोग मारे गये, बुद्धिजीवी विशेष रूप से टारगेट किये गये – वह सांस्कृतिक क्रांति भारत में नहीं आ पा रही तो इस नामुराद ब्राह्मणवाद के कारण।
सोचिए तो कहां उनके पास स्टालिन, किम-इल-सुंग, माओत्सेतुंग, होचीमिन्ह, पोल पोट जैसे लोग हैं और ये ‘ब्राह्मनिकल व्यवस्था’ जिसमें कभी वशिष्ठ, कभी विश्वामित्र, कभी शंकराचार्य, कभी कणाद, कभी कपिल, कभी जैमिनी, कभी चाणक्य हुए !

साभार- https://www.facebook.com/share/1HiiYwdjzs/
(लेखक मध्य प्रदेश के चुनाव आयुक्त हैं)

यूपीआई से ठगी के जाल में फँस रहे हैं पढ़े -लिखे भी और सीधी सादे ग्रामीण भी

मोबाइल और यूपीआई गाँवों तक पहुँच गए हैं लेकिन समझ की कमी से लोग साइबर ठगी का शिकार हो रहे हैं. जानें कैसे कम डिजिटल साक्षरता, भाषा की बाधाएँ और कमज़ोर पुलिस ढांचा ग्रामीण साइबर अपराध को बढ़ावा दे रहे हैं.

हाल के वर्षों में भारत का डिजिटल परिवर्तन अभूतपूर्व रहा है. देश में 90 करोड़ से अधिक इंटरनेट उपयोगकर्ता हैं और 40 करोड़ से ज़्यादा सक्रिय यूपीआई खाते हैं. डिजिटल समावेशन का सपना अब देश के सबसे दूर-दराज़ इलाकों तक पहुंच चुका है लेकिन इस बड़ी उपलब्धि के साथ एक विरोधाभास भी सामने आया है- जो तकनीकें ग्रामीण और अर्ध-शहरी भारत को सशक्त बना रही हैं, वही लाखों लोगों को जटिल डिजिटल धोखाधड़ी के लिए असुरक्षित भी बना रही हैं.

प्रेस सूचना ब्यूरो (PIB) के अनुसार, भारत में साइबर अपराध के मामलों में तेज़ी से बढ़ोतरी हुई है. वर्ष 2025 में लगभग 25 लाख साइबर मामले दर्ज हुए जो 2024 में 22.68 लाख थे. राष्ट्रीय साइबर अपराध रिपोर्टिंग पोर्टल के अनुसार, 2025 में साइबर अपराध से देश को लगभग ₹9,812.96 करोड़ का नुकसान हुआ. इनमें ज़्यादातर मामले ऑनलाइन सट्टेबाज़ी, गेमिंग घोटालों और वित्तीय धोखाधड़ी से जुड़े थे.

डिजिटल समावेशन का सपना अब देश के सबसे दूर-दराज़ इलाकों तक पहुंच चुका है लेकिन इस बड़ी उपलब्धि के साथ एक विरोधाभास भी सामने आया है- जो तकनीकें ग्रामीण और अर्ध-शहरी भारत को सशक्त बना रही हैं.

गृह मंत्रालय (MHA) के अनुसार, 2021 के बाद से भारत में साइबर अपराध 400 प्रतिशत तक बढ़ गया है और अब ग्रामीण तथा अर्ध-शहरी क्षेत्र डिजिटल ठगी के नए केंद्र बनते जा रहे हैं. टियर-2 और टियर-3 शहरों में साइबर सुरक्षा व्यवस्था कमज़ोर होने के कारण वहाँ अपराध तेजी से बढ़े हैं. जो क्षेत्र पहले डिजिटल अर्थव्यवस्था से लगभग बाहर थे, वे अब साइबर अपराध के मुख्य केंद्र बन रहे हैं.

ग्रामीण साइबर अपराध
ग्रामीण इलाकों में साइबर अपराध का बढ़ना कोई संयोग नहीं है बल्कि यह सामाजिक और तकनीकी बदलाव का नतीजा है. बिहार, उत्तर प्रदेश और महाराष्ट्र जैसे राज्यों में सस्ते स्मार्टफोन और सस्ते इंटरनेट ने डिजिटल पहुँच तो बढ़ा दी है लेकिन डिजिटल समझ नहीं बढ़ी है. सट्टेबाजी और गेमिंग ऐप, जो मनोरंजन के रूप में पेश किए जाते हैं, साइबर ठगी के आसान ज़रिया बन गए हैं.

2025 में प्रकाशित एक शोध के अनुसार, कम डिजिटल साक्षरता, भाषा की सीमाएँ और टू-फैक्टर ऑथेंटिकेशन की जानकारी की कमी साइबर अपराधियों के लिए सबसे बड़ी कमजोरी हैं. एक मामले में एक ऑटो चालक ने नकली क्रिकेट फैंटेसी ऐप के ज़रिये ₹20 लाख गंवा दिए जबकि दूसरे व्यक्ति को ऑनलाइन सट्टेबाज़ी में ₹75 लाख का नुकसान हुआ. ऐसी घटनाएँ हज़ारों गाँवों में दोहराई जा रही हैं.

ग्रामीण और अर्ध-शहरी इलाकों में 2021 से 2024 के बीच साइबर अपराध 400 प्रतिशत तक बढ़ा है, जबकि महानगरों में यह बढ़ोतरी अपेक्षाकृत कम रही. इससे साफ है कि डिजिटल दूरी भले कम हो रही हो लेकिन कम जागरूक आबादी ज़्यादा असुरक्षित है. कुल मामलों में 70 प्रतिशत से अधिक वित्तीय धोखाधड़ी के हैं जिनमें फिशिंग, ओटीपी चोरी, यूपीआई फ्रॉड और नकली निवेश योजनाएं शामिल हैं.

एक शोध के अनुसार, कम डिजिटल साक्षरता, भाषा की सीमाएँ और टू-फैक्टर ऑथेंटिकेशन की जानकारी की कमी साइबर अपराधियों के लिए सबसे बड़ी कमजोरी हैं. एक मामले में एक ऑटो चालक ने नकली क्रिकेट फैंटेसी ऐप के ज़रिये ₹20 लाख गंवा दिए जबकि दूसरे व्यक्ति को ऑनलाइन सट्टेबाज़ी में ₹75 लाख का नुकसान हुआ.

ठग अक्सर केवाईसी अपडेट या लोन दिलाने के नाम पर नए डिजिटल उपयोगकर्ताओं को फँसाते हैं. बिहार, झारखंड, उत्तर प्रदेश और ओडिशा जैसे राज्यों में ग्रामीण साइबर ठगी के मामले सबसे तेज़ी से बढ़े हैं जिसका सीधा संबंध मोबाइल इंटरनेट की तेज़ पहुँच से है.

अपराध की जड़ें और जोखिम

ग्रामीण भारत की साइबर असुरक्षा की जड़ें गहरी और आपस में जुड़ी हुई हैं. सबसे बड़ा कारण डिजिटल ढांचे और डिजिटल साक्षरता के बीच असंतुलन है. डिजिटल इंडिया और भारतनेट जैसी योजनाओं से 2.5 लाख से अधिक ग्राम पंचायतों तक इंटरनेट पहुँचा है लेकिन साइबर सुरक्षा जागरूकता अभी पीछे है. ग्रामीण इलाकों में पहली बार डिजिटल सेवाओं का उपयोग करने वाले लोग-जैसे छोटे व्यापारी, किसान और स्वयं सहायता समूहों के सदस्य-जल्दी मुनाफे के लालच में फर्जी योजनाओं का शिकार बन जाते हैं.

इसके अलावा, अंग्रेज़ी आधारित साइबर इंटरफेस और स्थानीय भाषाओं के बीच की दूरी जोखिम को और बढ़ाती है. ठग स्थानीय बोली और सामाजिक संदर्भों का इस्तेमाल कर भरोसा जीत लेते हैं. झारखंड के जामताड़ा और हरियाणा के मेवात जैसे इलाकों में संगठित साइबर गिरोह सक्रिय हैं जिन्होंने धोखाधड़ी को एक तरह की ग्रामीण ‘अर्थव्यवस्था’ बना दिया है.

ग्रामीण पुलिस ढांचे की कमज़ोरी भी एक बड़ी समस्या है. कई थानों में न तो साइबर सेल हैं और न ही फॉरेंसिक सॉफ़्टवेयर. तकनीकी रूप से प्रशिक्षित पुलिसकर्मियों की भारी कमी है, जिससे ऐसे मामलों की जाँच और न्याय प्रक्रिया दोनों प्रभावित होती हैं.

ग्रामीण साइबर सुरक्षा के लिए नई योजनाएं

खतरे की गंभीरता को देखते हुए भारत सरकार ने नीति, तकनीक और सामुदायिक भागीदारी को जोड़ते हुए कई पहल शुरू की हैं. गृह मंत्रालय के तहत भारतीय साइबर अपराध समन्वय केंद्र (I4C) अब एक राष्ट्रीय केंद्र के रूप में काम कर रहा है, जो राज्यों को डिजिटल फॉरेंसिक, डेटा विश्लेषण और जागरूकता अभियानों में मदद करता है.

झारखंड के जामताड़ा और हरियाणा के मेवात जैसे इलाकों में संगठित साइबर गिरोह सक्रिय हैं जिन्होंने धोखाधड़ी को एक तरह की ग्रामीण ‘अर्थव्यवस्था’ बना दिया है.

दिसंबर 2025 में शुरू की गई महाराष्ट्र पुलिस–माइक्रोसॉफ्ट को-पायलट पहल भारत की साइबर सुरक्षा रणनीति में एक अहम कदम है. MahaCrimeOS एआई पुलिस को मामलों को तेज़ी से सुलझाने में मदद करता है. 2024 में शुरू हुआ साइबर सुरक्षित भारत 2.0 कार्यक्रम राज्यों और ज़िलों में साइबर क्षमता निर्माण पर ज़ोर देता है. इसके साथ ही, भारतीय रिज़र्व बैंक ने MuleHunter.AI लॉन्च किया है, जो खासतौर पर ग्रामीण इलाकों से होने वाले संदिग्ध लेनदेन की पहचान करता है.

हालाँकि साइबर सेल बनाए गए हैं, लेकिन अब भी प्रशिक्षित कर्मियों, एआई आधारित टूल्स और I4C व CERT-In के साथ डेटा साझा करने की व्यवस्था की कमी बनी हुई है. MeitY के सहयोग से Kyndryl द्वारा शुरू किया गया ‘Cyber Rakshak’ कार्यक्रम ग्रामीण महिलाओं को साइबर सुरक्षा कौशल सिखा रहा है. वहीं, “Protecting Our Villages” जैसी पहलें एआई को ज़मीनी पुलिसिंग से जोड़ रही हैं. इससे जांच की जगह पहले से सतर्क रहने की संस्कृति विकसित हो रही है.

महत्वाकांक्षा और ज़मीनी हकीकत के बीच सेतु

अब तक हुई प्रगति को आगे बढ़ाने के लिए भारत को केवल घटनाओं के बाद कार्रवाई करने वाली रणनीतियों से आगे बढ़कर पहले से सतर्क शासन व्यवस्था अपनानी होगी. इसके लिए तीन प्रमुख नीतिगत प्राथमिकताएँ स्पष्ट रूप से सामने आती हैं.

पहला, साइबर साक्षरता को नागरिक अधिकार के रूप में स्थापित करना होगा. इसे स्कूलों के पाठ्यक्रम और वयस्क शिक्षा कार्यक्रमों में शामिल किया जाना चाहिए. स्थानीय भाषाओं में तैयार डिजिटल सुरक्षा मॉड्यूल, जो सामुदायिक सेवा केंद्रों और स्वयं सहायता समूहों के माध्यम से पहुँचाए जाएं, आम लोगों के लिए साइबर सुरक्षा को सरल और समझने योग्य बना सकते हैं.

जब साइबर अपराधी एल्गोरिद्म और सामाजिक मनोविज्ञान का इस्तेमाल हथियार के रूप में कर रहे हैं, तो भारत की जवाबी रणनीतियाँ भी उतनी ही स्मार्ट और समावेशी होनी चाहिए.

दूसरा, कानून प्रवर्तन संस्थाओं की क्षमता बढ़ाना बेहद आवश्यक है. हालांकि भारत ने केंद्र, राज्य और ज़िला स्तर पर साइबर सेल स्थापित करने में उल्लेखनीय सफलता हासिल की है, फिर भी इन इकाइयों को प्रशिक्षित मानव संसाधन और बुनियादी साइबर फॉरेंसिक क्षमताओं की कमी का सामना करना पड़ रहा है. इसमें एआई आधारित विश्लेषण उपकरण, मानकीकृत प्रशिक्षण मॉड्यूल और I4C तथा CERT-In के साथ पारदर्शी डेटा साझा करने की व्यवस्था शामिल है.

तीसरा, जन जवाबदेही और निजता की सुरक्षा को तकनीकी प्रगति के साथ-साथ मजबूत करना होगा. भारत का डिजिटल व्यक्तिगत डेटा संरक्षण अधिनियम (2023) एक ठोस आधार देता है, लेकिन ग्रामीण क्षेत्रों में इसका प्रभावी क्रियान्वयन अभी भी असमान है.

एआई से मजबूत डिजिटल गाँव

ग्रामीण भारत अपनी डिजिटल यात्रा के एक निर्णायक मोड़ पर खड़ा है. तकनीक के लोकतंत्रीकरण ने शिक्षा, वित्त और शासन के नए रास्ते खोले हैं, लेकिन इसके साथ ही शोषण के नए खतरे भी पैदा हुए हैं. जब साइबर अपराधी एल्गोरिद्म और सामाजिक मनोविज्ञान का इस्तेमाल हथियार के रूप में कर रहे हैं, तो भारत की जवाबी रणनीतियाँ भी उतनी ही स्मार्ट और समावेशी होनी चाहिए.

नैतिक एआई डिज़ाइन, सामुदायिक भागीदारी और सतत सार्वजनिक–निजी सहयोग के ज़रिये भारत साइबर सुरक्षा को डिजिटल नागरिकता का एक मूल स्तंभ बना सकता है.

महाराष्ट्र पुलिस–माइक्रोसॉफ्ट को-पायलट पहल और इससे जुड़ी एआई आधारित योजनाएं केवल तकनीकी उपलब्धियाँ नहीं हैं, बल्कि ये डिजिटल क्षेत्र को असुरक्षा के स्थान से सतर्कता और सुरक्षा के क्षेत्र में बदलने का प्रयास हैं. आखिरकार, ग्रामीण साइबर अपराध के खिलाफ़ लड़ाई केवल डेटा की सुरक्षा तक सीमित नहीं है, बल्कि यह विश्वास को बचाने की लड़ाई है-और तेज़ी से डिजिटल होती लोकतांत्रिक व्यवस्था में भरोसा ही सबसे मूल्यवान पूंजी है.


सौम्या अवस्थी ऑब्जर्वर रिसर्च फाउंडेशन के सेंटर फॉर सिक्योरिटी, स्ट्रेटेजी एंड टेक्नोलॉजी में फेलो हैं।
साभार- https://www.orfonline.org/ से 

चाबहार टकराव: भारत बनाम चीन

ट्रंप के ईरान-विरोधी टैरिफ ने चाबहार बंदरगाह को भारत के लिए रणनीतिक चुनौती बना दिया है- यह लेख इसी बदलती भू-राजनीति की पड़ताल करता है. भारत के लिए संतुलन साधना ज़रूरी है, क्योंकि पीछे हटने पर चाबहार में चीन की एंट्री का जोखिम साफ़ दिखता है.

ट्रंप प्रशासन के दूसरी बार सत्ता में आने के बाद से ही भारत को कूटनीतिक और आर्थिक मुश्किलें झेलनी पड़ रही हैं. भारत को अपनी भू-राजनीतिक और भू-आर्थिक प्राथमिकताओं में संतुलन बनाए रखने को लेकर नए सिरे से तनाव का सामना करना पड़ रहा है. इसका ताज़ा उदाहरण राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा ईरान के साथ व्यापार करने वाले किसी भी देश पर 25 प्रतिशत टैरिफ लगाने की घोषणा है. हालांकि, ये फैसला सभी देशों पर लागू होता है, लेकिन ट्रंप के इस कदम ईरान के साथ भारत के संबंधों को जटिल बना दिया है, विशेष रूप से ईरान के चाबहार बंदरगाह का मामला चुनौतीपूर्ण हो गया है.

ये टैरिफ चाबहार बंदरगाह पर भारत के संचालन के लिए अक्टूबर 2025 में वाशिंगटन से मिली छह महीने की छूट के तुरंत बाद आए हैं. नए टैरिफ के ख़तरे ने उस रियायत को चुनौती दी है और पहले से ही नाजुक क्षेत्रीय वातावरण में नई अनिश्चितता पैदा कर दी है. व्यापक रूप से, इससे ईरान और मध्य पूर्व के बीच तनाव बढ़ने का ख़तरा बढ़ गया है.

चाबहार पर ट्रंप ने भारत को ‘धोखा’ दिया?
ईरान के प्रति ट्रंप का कठोर दृष्टिकोण अब एक पैटर्न बन गया है. ट्रंप के पहले कार्यकाल के दौरान भी अमेरिका 2018 में संयुक्त व्यापक कार्य योजना (जेसीपीओए) से हट गया था. अमेरिका ने तेल निर्यात, बैंकिंग, जहाजरानी और तीसरे पक्ष के व्यापार पर व्यापक प्रतिबंधों के माध्यम से तेहरान को आर्थिक रूप से अलग-थलग करने के उद्देश्य से अधिकतम दबाव अभियान शुरू किया. हालांकि बाइडेन प्रशासन ने कूटनीति के प्रति कुछ वायदे किए लेकिन ज़्यादार प्रतिबंध बरकरार रहे. पाबंदियां लागू करने के तरीकों में उतार-चढ़ाव तो आया लेकिन इनमें कभी भी मौलिक रूप से कोई बदलाव नहीं किया गया. ईरान लंबे समय से भारत-अमेरिका संबंधों में एक अहम मुद्दा रहा है. 2008 में अमेरिका-भारत के बीच हुए नागरिक परमाणु समझौते के समय भी ये देखा गया था. तब भारत पर अपनी ईरान नीति को पश्चिमी देशों के परमाणु अप्रसार उद्देश्यों के अनुरूप करने का दबाव बढ़ा.

ताज़ा उदाहरण राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा ईरान के साथ व्यापार करने वाले किसी भी देश पर 25 प्रतिशत टैरिफ लगाने की घोषणा है. हालांकि, ये फैसला सभी देशों पर लागू होता है, लेकिन ट्रंप के इस कदम ईरान के साथ भारत के संबंधों को जटिल बना दिया है, विशेष रूप से ईरान के चाबहार बंदरगाह का मामला चुनौतीपूर्ण हो गया है.

ट्रंप की वापसी ने इस रणनीति के दमनकारी पहलू को फिर से ज़िंदा कर दिया है. अब टैरिफ का इस्तेमाल तीसरे देशों को ईरान के साथ आर्थिक संबंध बनाए रखने से रोकने के लिए किया जा रहा है. यह दृष्टिकोण वेनेजुएला के खिलाफ अमेरिका की पिछली रणनीति से मिलता-जुलता है. वेनेजुएला के तेल निर्यात को रोकने और एक तरह से रणनीतिक नाकाबंदी करने के लिए प्रतिबंधों और अन्य दंडों का इस्तेमाल किया गया था. ईरान के मामले में भी अमेरिका का मक़सद यही लग रहा है. ईरान के साझेदारों को दूर करना, आर्थिक जीवन रेखाओं को नष्ट करना और तेहरान को घेर लेना, जिससे सैन्य बल का सहारा लेने की संभावना बनी रहे.

भारत के लिए चाबहार बंदरगाह महत्वपूर्ण क्यों है?
भारत के लिए चाबहार सिर्फ एक व्यापारिक बंदरगाह परियोजना नहीं है बल्कि यह एक रणनीतिक धरोहर है जो ईरान के साथ सभ्यतागत संबंधों, क्षेत्रीय संपर्क और बढ़ते सुरक्षा हितों को आपस में जोड़ती है. चाबहार बंदरगाह भारत को अफ़ग़ानिस्तान, मध्य एशिया और आगे रूस तक पहुंचने का एक दुर्लभ स्थलीय और समुद्री मार्ग प्रदान करता है जबकि पाकिस्तान द्वारा भारत को आवागमन अधिकार देने से लंबे समय से इनकार करने के कारण इसके वैकल्पिक मार्ग बाधित हैं. ईरान पर लगे प्रतिबंधों और रूस-यूक्रेन युद्ध के बाद से पैदा हुई बाधाओं ने देशों के बीच संपर्क की परिकल्पना को नुकसान पहुंचाया है.

भारत ने मई 2024 में ईरान के साथ 10 साल का अनुबंध किया था जिसके तहत सरकारी स्वामित्व वाली इंडिया पोर्ट्स ग्लोबल लिमिटेड (आईपीजीएल) ने चाबहार स्थित शाहिद बेहेश्टी टर्मिनल के विकास के लिए लगभग 370 मिलियन डॉलर के निवेश की प्रतिबद्धता जताई थी. ईरान के बंदरगाह और समुद्री संगठन के साथ किए गए इस समझौते का उद्देश्य परिचालन स्थिरता प्रदान करना था. इसके साथ ही समझौते का मक़सद भू-राजनीतिक चुनौतियों के बावजूद भारत की भागीदारी जारी रखने की मंशा दिखाना था, लेकिन ट्रंप की घोषणा इसके विपरीत साबित हुई है.

चाबहार बंदरगाह भारत को अफ़ग़ानिस्तान, मध्य एशिया और आगे रूस तक पहुंचने का एक दुर्लभ स्थलीय और समुद्री मार्ग प्रदान करता है जबकि पाकिस्तान द्वारा भारत को आवागमन अधिकार देने से लंबे समय से इनकार करने के कारण इसके वैकल्पिक मार्ग बाधित हैं.

लेकिन नई दिल्ली के हालिया बयानों से संकेत मिलता है कि भारत अपने विकल्पों पर फिर से विचार कर रहा है. हालांकि, छह महीने की छूट को शुरू में एक एक्ज़िट रूट के रूप में देखा गया था, लेकिन अब लगता है कि भारत अपनी उपस्थिति बनाए रखने के तरीके तलाश कर रहा है. बंदरगाह निर्माण में शामिल लागतों और भारत की व्यापक समुद्री और हिंद-प्रशांत महत्वाकांक्षाओं के लिए चाबहार का रणनीतिक महत्व है. ईरान पर ट्रंप द्वारा लगाए गए टैरिफ के नतीजों का सामना करने वाला भारत अकेला देश नहीं है. चीन, यूएई, ब्राज़ील, तुर्किए और रूस जैसे देश भी इससे प्रभावित हो सकते हैं.

चाबहार को लेकर उत्पन्न हुई नई परिस्थितियों के व्यापक निहितार्थ द्विपक्षीय तनावों से कहीं अधिक हैं. ईरान होर्मुज जलडमरूमध्य पर स्थित है, जो वैश्विक ऊर्जा प्रवाह और हिंद-प्रशांत आपूर्ति श्रृंखलाओं के लिए एक महत्वपूर्ण मार्ग है. ईरान की अर्थव्यवस्था या सुरक्षा वातावरण में किसी भी प्रकार की अस्थिरता से इस मार्ग पर व्यापार बाधित हो सकता है, बीमा और माल ढुलाई की लागत बढ़ा सकते हैं और हिंद-प्रशांत क्षेत्र के लिए निवेश विश्वास को कमज़ोर कर सकते हैं. भारत मध्य पूर्व में कनेक्टिविटी बढ़ाने की कोशिश कर रहा है. ऐसे में चाबहार बंदरगाह का नुकसान या उसका दर्जा कम होना एक रणनीतिक झटका होगा.

चाबहार में भारत की जगह चीन लेगा?
इन सबका समय बेहद महत्वपूर्ण है. ईरान पहले से ही आंतरिक तनाव से जूझ रहा है. हाल ही में ईरान के विदेश मंत्री की भारत यात्रा रद्द हुई. इस दौरान चाबहार पर बात होनी थी, लेकिन दौरा रद्द होने से ये बातचीत नहीं हो सकी. वहीं, मध्य पूर्व में अस्थिरता बनी हुई है, जहां नाजुक युद्धविराम और अनसुलझे संघर्ष जारी हैं. ईरान के ख़िलाफ़ अमेरिका द्वारा आर्थिक या सैन्य दबाव की नई कार्रवाई इस क्षेत्र में अस्थिरता को बढ़ा सकता है.

भारत के लिए असमंजस की स्थिति बनी हुई. भारत एक तरफ अमेरिका के साथ व्यापार समझौते पर बातचीत कर रहा है, दूसरी तरफ वो अपनी पारंपरिक साझेदारियों और क्षेत्रीय स्वायत्तता को भी बनाए रखना चाहता है. चाबहार से भारत की वापसी से पैदा होने वाले रिक्त स्थान को भरने के लिए चीन तुरंत आगे आएगा. जैसे-जैसे ट्रंप ईरान पर दबाव बढ़ा रहे हैं, वैसे-वैसे बाहरी घटक भारत के फैसलों को और अधिक प्रभावित करेंगे. ऐसे में भारत को नाजुक संतुलन बनाकर चलना होगा. अमेरिका के साथ बातचीत के सकारात्मक परिणाम भी हासिल करने हैं और अपनी रणनीतिक स्वायत्तता भी बनाए रखनी है.

ये लेख मूल रूप में इकोनॉमिक टाइम्स में प्रकाशित हो चुका है.

भारत के लिए चाबहार सिर्फ एक व्यापारिक बंदरगाह परियोजना नहीं है बल्कि यह एक रणनीतिक धरोहर है जो ईरान के साथ सभ्यतागत संबंधों, क्षेत्रीय संपर्क और बढ़ते सुरक्षा हितों को आपस में जोड़ती है. चाबहार बंदरगाह भारत को अफ़ग़ानिस्तान, मध्य एशिया और आगे रूस तक पहुंचने का एक दुर्लभ स्थलीय और समुद्री मार्ग प्रदान करता है जबकि पाकिस्तान द्वारा भारत को आवागमन अधिकार देने से लंबे समय से इनकार करने के कारण इसके वैकल्पिक मार्ग बाधित हैं. ईरान पर लगे प्रतिबंधों और रूस-यूक्रेन युद्ध के बाद से पैदा हुई बाधाओं ने देशों के बीच संपर्क की परिकल्पना को नुकसान पहुंचाया है.

भारत ने मई 2024 में ईरान के साथ 10 साल का अनुबंध किया था जिसके तहत सरकारी स्वामित्व वाली इंडिया पोर्ट्स ग्लोबल लिमिटेड (आईपीजीएल) ने चाबहार स्थित शाहिद बेहेश्टी टर्मिनल के विकास के लिए लगभग 370 मिलियन डॉलर के निवेश की प्रतिबद्धता जताई थी. ईरान के बंदरगाह और समुद्री संगठन के साथ किए गए इस समझौते का उद्देश्य परिचालन स्थिरता प्रदान करना था. इसके साथ ही समझौते का मक़सद भू-राजनीतिक चुनौतियों के बावजूद भारत की भागीदारी जारी रखने की मंशा दिखाना था, लेकिन ट्रंप की घोषणा इसके विपरीत साबित हुई है.

चाबहार बंदरगाह भारत को अफ़ग़ानिस्तान, मध्य एशिया और आगे रूस तक पहुंचने का एक दुर्लभ स्थलीय और समुद्री मार्ग प्रदान करता है जबकि पाकिस्तान द्वारा भारत को आवागमन अधिकार देने से लंबे समय से इनकार करने के कारण इसके वैकल्पिक मार्ग बाधित हैं.

लेकिन नई दिल्ली के हालिया बयानों से संकेत मिलता है कि भारत अपने विकल्पों पर फिर से विचार कर रहा है. हालांकि, छह महीने की छूट को शुरू में एक एक्ज़िट रूट के रूप में देखा गया था, लेकिन अब लगता है कि भारत अपनी उपस्थिति बनाए रखने के तरीके तलाश कर रहा है. बंदरगाह निर्माण में शामिल लागतों और भारत की व्यापक समुद्री और हिंद-प्रशांत महत्वाकांक्षाओं के लिए चाबहार का रणनीतिक महत्व है. ईरान पर ट्रंप द्वारा लगाए गए टैरिफ के नतीजों का सामना करने वाला भारत अकेला देश नहीं है. चीन, यूएई, ब्राज़ील, तुर्किए और रूस जैसे देश भी इससे प्रभावित हो सकते हैं.

चाबहार को लेकर उत्पन्न हुई नई परिस्थितियों के व्यापक निहितार्थ द्विपक्षीय तनावों से कहीं अधिक हैं. ईरान होर्मुज जलडमरूमध्य पर स्थित है, जो वैश्विक ऊर्जा प्रवाह और हिंद-प्रशांत आपूर्ति श्रृंखलाओं के लिए एक महत्वपूर्ण मार्ग है. ईरान की अर्थव्यवस्था या सुरक्षा वातावरण में किसी भी प्रकार की अस्थिरता से इस मार्ग पर व्यापार बाधित हो सकता है, बीमा और माल ढुलाई की लागत बढ़ा सकते हैं और हिंद-प्रशांत क्षेत्र के लिए निवेश विश्वास को कमज़ोर कर सकते हैं. भारत मध्य पूर्व में कनेक्टिविटी बढ़ाने की कोशिश कर रहा है. ऐसे में चाबहार बंदरगाह का नुकसान या उसका दर्जा कम होना एक रणनीतिक झटका होगा.

चाबहार में भारत की जगह चीन लेगा?

इन सबका समय बेहद महत्वपूर्ण है. ईरान पहले से ही आंतरिक तनाव से जूझ रहा है. हाल ही में ईरान के विदेश मंत्री की भारत यात्रा रद्द हुई. इस दौरान चाबहार पर बात होनी थी, लेकिन दौरा रद्द होने से ये बातचीत नहीं हो सकी. वहीं, मध्य पूर्व में अस्थिरता बनी हुई है, जहां नाजुक युद्धविराम और अनसुलझे संघर्ष जारी हैं. ईरान के ख़िलाफ़ अमेरिका द्वारा आर्थिक या सैन्य दबाव की नई कार्रवाई इस क्षेत्र में अस्थिरता को बढ़ा सकता है.

भारत के लिए असमंजस की स्थिति बनी हुई. भारत एक तरफ अमेरिका के साथ व्यापार समझौते पर बातचीत कर रहा है, दूसरी तरफ वो अपनी पारंपरिक साझेदारियों और क्षेत्रीय स्वायत्तता को भी बनाए रखना चाहता है. चाबहार से भारत की वापसी से पैदा होने वाले रिक्त स्थान को भरने के लिए चीन तुरंत आगे आएगा.
जैसे-जैसे ट्रंप ईरान पर दबाव बढ़ा रहे हैं, वैसे-वैसे बाहरी घटक भारत के फैसलों को और अधिक प्रभावित करेंगे. ऐसे में भारत को नाजुक संतुलन बनाकर चलना होगा. अमेरिका के साथ बातचीत के सकारात्मक परिणाम भी हासिल करने हैं और अपनी रणनीतिक स्वायत्तता भी बनाए रखनी है.

साभार-  https://economictimes.indiatimes.com/ से