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अजित पवार को भावनात्मक भाजपाई भावांजली या सियासत का कोई संकेत?

सियासत में कोई भी काम यूं ही नहीं होता। यहां हर कदम अगले कदम की तैयारी होता है और हर पहल भविष्य की किसी संभावना का संकेत। राजनीति में घटनाओं को उनके सतही अर्थों से नहीं, बल्कि उनके निहितार्थों से पढ़ा जाता है। इसी परंपरा में राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी के नेता के निधन पर अजित पवार को दी गई बीजेपी की श्रद्धांजलि का त्वरित और प्रभावशाली विज्ञापन आज सियासी हलकों में गहन चर्चा का विषय है। राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी गहरे शोक में है। पार्टी के नेता और कार्यकर्ता अपने वरिष्ठ नेता के असामयिक निधन से गमगीन। यह स्वाभाविक है कि पार्टी अपने नेता को श्रद्धांजलि दे। यह भी स्वाभाविक है कि सरकार, जिसमें वह नेता शामिल रहे हैं, आधिकारिक तौर पर शोक प्रकट करे। लेकिन इस पूरे घटनाक्रम में जो बात असाधारण है, वह है, बीजेपी की महाराष्ट्र इकाई द्वारा प्रकाशित फ्रंट का फुल-पेज श्रद्धांजलि विज्ञापन। अजित पवार मौजूदा सरकार का हिस्सा थे। यह विज्ञापन अगर महाराष्ट्र सरकार की ओर से दिया जाता, तो इसे समूचे महाराष्ट्र की ओर से दी गई श्रद्धांजलि माना जाता। लेकिन यहां विज्ञापन सरकार का नहीं, बल्कि पार्टी का है, बीजेपी का है। वह भी कोई छोटा, औपचारिक शोक संदेश नहीं, बल्कि करोड़ों रुपये खर्च कर प्रमुख समाचार पत्रों के मुखपृष्ठों पर प्रकाशित प्रभावशाली विज्ञापन। यह तथ्य ही इस पूरे घटनाक्रम को सामान्य से अचानक असामान्य बना देता है।

 

भारतीय राजनीति में आम तौर पर शोक संदेशों की भी एक अलिखित मर्यादा और परंपरा रही है। विरोधी दल के नेता के निधन पर संवेदना व्यक्त की जाती है, ट्वीट होते हैं, बयान आते हैं, और विज्ञापन भी। लेकिन किसी अन्य दल के नेता के लिए इतने व्यापक, त्वरित और तात्कालिक तरीके से बेहद महंगे श्रद्धांजलि विज्ञापन, वह भी सीधे पार्टी की ओर से, यह दृश्य बेहद दुर्लभ है। अगर इतिहास में झांका जाए, तो ऐसे उदाहरण बहुत कम मिलते हैं। 2014 में आंध्र प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री एनटी रामाराव के परिवार या 2018 में अटल बिहारी वाजपेयी के निधन पर सभी दलों ने व्यापक श्रद्धांजलि दी थी, लेकिन तब वाजपेयी एक सर्वस्वीकृत राष्ट्रीय नेता थे और देश के प्रधानमंत्री भी रहे थे। वहां सरकार और पार्टी के बीच की रेखा लगभग मिट चुकी थी। इसी तरह, 2022 में मुलायम सिंह यादव के निधन पर भी उत्तर प्रदेश में कई दलों ने बड़े स्तर पर शोक प्रकट किया, लेकिन किसी एक पार्टी द्वारा दूसरे दल के नेता के लिए इतने त्वरित और खर्चीले मुखपृष्ठीय विज्ञापन देखने को नहीं मिले। यही कारण है कि इस श्रद्धांजलि की तात्कालिकता और व्यापकता को लेकर कांग्रेस, शिवसेना, राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी और स्वयं बीजेपी के भीतर भी सियासी मायने तलाशे जा रहे हैं। सवाल उठ रहे हैं कि क्या यह केवल संवेदना है, या इसके पीछे कोई सियासी संदेश छिपा है?

 

महाराष्ट्र की राजनीति वैसे भी गठबंधन, टूट-फूट और पुनर्संयोजन की प्रयोगशाला रही है। शिवसेना के टूटने से लेकर कांग्रेस के फूटने तक। एनसीपी के विभाजन, अजीत पवार का सत्ता में आने और शरद पवार का अलग खेमे में जाने की राजनीतिक घटनाओं के बीच बीजेपी की हर रणनीति को दीर्घकालिक चश्मे से देखा जाता है। ऐसे में यह श्रद्धांजलि विज्ञापन केवल शोक व्यक्त करने का माध्यम नहीं रह जाता, बल्कि संभावित सियासी संकेत का रूप ले लेता है। कुछ विश्लेषक इसे एनसीपी के अजित पवार गुट के प्रति बीजेपी की सार्वजनिक स्वीकृति और अपनत्व के प्रदर्शन के रूप में देख रहे हैं। कुछ इसे भविष्य के लिए रिश्तों को और मजबूत करने का संदेश मान रहे हैं। वहीं, कुछ का कहना है कि यह शरद पवार गुट को यह जताने का तरीका भी हो सकता है कि सत्ता, संसाधन और सियासत किसके साथ खड़े हैं।

 

वैसे भी, राजनीति में संवेदनाओं की सांसें और रणनीतियों के राज अक्सर एक-दूसरे में घुले होते हैं। माना कि अजीत पवार के प्रति यह श्रद्धांजलि सच्चे शोक की अभिव्यक्ति है, मगर इस बात से भी इनकार नहीं किया जा सकता कि यह सियासी गणित का एक सोचा-समझा नया अध्याय शुरू करने की कोशिश भी। इसीलिए महाराष्ट्र की सियासत में इस असामान्य श्रद्धांजलि को लंबे वक्त तक याद रखा जाएगा, लेकिन इसके वास्तविक मायने आने वाले कुछ ही दिनों में अधिक स्पष्ट हो जाएंगे, यह भी तय है। बीजेपी की राजनीति हमेशा रणनीतिक प्रतीकों, सुदीर्घ संकेतों और व्यापक संदेशों पर आधारित रही है। चाहे वह किसी कार्यक्रम में मंच साझा करने का तरीका हो या किसी नेता के प्रति सार्वजनिक सम्मान का प्रदर्शन। बीजेपी के हर कदम में अपनी टाइमिंग और अपने संदर्भ होते हैं। जिनको समझना, राजनीति के जानकारों के लिए भी आसान भले ही ना हो, लेकिन मुश्किल तो कतई नहीं है। इसी संदर्भ में अजीत पवार को यह श्रद्धांजलि विज्ञापन भले ही, भावनात्मक भाजपाई भावांजली हो, मगर रणनीतिक ज्यादा लगता है, यही सच है। और हां, अंत में एक बात यह भी कि राजनीति में बीजेपी वह सब कुछ कर जाती है, जो बाकी राजनीतिक पार्टियां सोच भी नहीं पाती। क्योंकि बीजेपी सियासत, सत्ता और सम्हले रहने के अलावा और कुछ नहीं सोचती। जो कि सही भी है, समयानुकूल भी और सत्ता में बने रहने के लिए सबसे जरूरी भी।

 

(लेखक राजनीतिक विश्लेषक हैं)

कम सामान, ज़्यादा आराम

(प्रोफेसर अच्युत सामंत पूरी दुनिया में एक ऐसे अनोखे  व्यक्तित्व हैं जिन्होंने अभावों, संघर्षों के बीच रहकर भी समाज को शिक्षा देने का संकल्प लिया और ओड़िशा के भुवनेश्वर में   उनके द्वारा स्थापित  ‘किस’ और ‘कीट’ यूनिवर्सिटी दुनिया में एक ऐसी मिसाल है, जिसकी कार्यप्रणाली देखने और समझने के लिए दुनिया भर से राष्ट्राध्यक्षों से लेकर शिक्षाविद और समाजशास्त्री आते हैं, और ये देखकर हैरान रह जाते हैं कि इस विश्वविद्यालय में 70 हजार निर्धन आदिवासी बच्चों के लिए निःशुल्क अध्ययन सुविधा तो है ही उनके रहने और उनको रोजगार से जोड़ने की भी अद्भुत व्यवस्था है।  जो काम सरकारें अपने लाखों कर्माचारियों और करोड़ों  के बजट में नहीं कर सकती वो  काम एक अकेला व्यक्ति कर रहा है।  एक व्यक्ति समाज में कितना बड़ा क्रांतिकारी बदलाव ला सकता है, अच्युत सामंत  उसके जीते जागते प्रमाण हैं) 

यह कैसा शाश्वत सत्य है कि जीवन में, हम सभी सफलता, शांति और खुशी के लिए प्रयास करते हैं। हम बाहरी और आंतरिक, दोनों तरह की स्थिरता और आराम प्राप्त करना चाहते हैं। लेकिन अक्सर हम इस मूलभूत सत्य को नज़रअंदाज़ कर देते हैं कि हम जितना कम सामान ढोते हैं, उतना ही ज़्यादा आराम का अनुभव करते हैं। यह सिर्फ़ भौतिक सामान की बात नहीं है। यह भावनात्मक, मानसिक, आध्यात्मिक और भौतिक सामान की बात है। हमारा बोझ जितना हल्का होगा, हमारी यात्रा उतनी ही सुगम होगी। यह सिद्धांत जीवन के हर क्षेत्र और पड़ाव पर लागू होता है। हमें बस थोड़ा रुककर विचार करने और यह समझने की ज़रूरत है कि कैसे अनावश्यक बोझ, चाहे वह शारीरिक हो या अपराधबोध, अहंकार, पछतावा या आसक्ति, हमें धीमा कर देता है, हमारी ऊर्जा को खत्म कर देता है और हमारी दृष्टि को धुंधला कर देता है।

आइए, सबसे पहले उस सबसे बुनियादी छवि से शुरुआत करें जो हम रोज़ देखते हैं- स्कूल जाने वाला बच्चा। जब एक छोटा बच्चा अपनी पढ़ाई का सफ़र शुरू करता है, तो वह जिज्ञासा, मासूमियत और खुशी से भरा होता है। लेकिन जल्द ही, स्कूल बैग का वज़न बढ़ जाता है, शारीरिक वज़न, उम्मीदें, दबाव और तुलनाएँ। नर्सरी का बच्चा सिर्फ़ ज़रूरी चीज़ें ही ढोता है, जैसे रंगीन किताबें, कहानियाँ, खेल-कूद की गतिविधियाँ। लेकिन जैसे-जैसे वे बड़ी कक्षाओं में पहुँचते हैं, उनका बैग भारी होता जाता है, जो इस बात का प्रतीक है कि ज़िंदगी उन पर ज़रूरत से ज़्यादा बोझ डालने लगती है। जब बच्चा कम सामान ढोता है, तो वह ज़्यादा आज़ाद महसूस करता है। वह तेज़ी से चलता है। वह ज़्यादा स्पष्टता से सोचता है। वह अपनी यात्रा का आनंद लेता है। लेकिन जब वह बोझ से दबा होता है, तो उसका उत्साह कम हो जाता है, उसकी पीठ में दर्द होने लगता है और उसकी खुशी फीकी पड़ जाती है। यही बात बड़ों, पेशेवरों, नेताओं और जीवन की राह पर चलने वाले हर व्यक्ति पर लागू होती है।

जब भी हम यात्रा करते हैं, हमें एहसास होता है कि कम सामान लेकर चलना कितना आसान होता है। ज़्यादा सामान, ज़्यादा दर्द। जो लोग हल्के सामान के साथ यात्रा करते हैं, वे तेज़ी से पहुँचते हैं, बेहतर ढंग से ढलते हैं, और इस बात की कम चिंता करते हैं कि वे क्या खो सकते हैं। इसी तरह, जीवन में, हम सभी एक जगह से दूसरी जगह, एक दौर से दूसरे दौर में जाने वाले यात्री हैं। कुछ घर बदलते हैं। कुछ नौकरी बदलते हैं। कुछ शहर बदलते हैं, और कुछ एक रिश्ते से दूसरे रिश्ते में बदलते हैं। हर बदलाव में, जो लोग कम भावनात्मक और मानसिक बोझ ढोते हैं, वे बेहतर ढंग से समायोजित होते हैं। जब हम पिछली गलतियों, टूटे रिश्तों, शिकायतों या अतीत के गौरव से चिपके रहते हैं, तो हम खुद को वर्तमान को अपनाने या भविष्य की तैयारी करने से रोकते हैं। जैसा कि दार्शनिक सेनेका ने एक बार कहा था, “जो सर्वत्र है, वह कहीं नहीं है।” अतीत के दुखों और भविष्य के डर के बीच बँटा हुआ व्यक्ति कभी भी वर्तमान में पूरी तरह से नहीं जी पाता। इसलिए, क्षमा दूसरों और खुद के प्रति सबसे बड़ा बोझ हटाने वाला बन जाता है। जब हम क्षमा करते हैं तो हम अनावश्यक को त्याग देते हैं। हम खुद को मुक्त करते हैं।

आध्यात्मिक और दार्शनिक दृष्टिकोण से, कम बोझ का विचार लगभग सभी धार्मिक परंपराओं का केंद्रबिंदु है। भगवद् गीता में, भगवान कृष्ण अर्जुन को आसक्ति रहित, अहंकार रहित और फल की आशा रहित कर्म करने के लिए कहते हैं। यही कम बोझ है। बौद्ध धर्म में, आत्मज्ञान के मार्ग के लिए इच्छाओं और आसक्तियों का त्याग आवश्यक है। यही कम बोझ है। जैन धर्म में, त्याग और अतिसूक्ष्मवाद आध्यात्मिक प्रगति के साधन हैं। फिर से, कम बोझ। इस्लाम में भी, पैगंबर मुहम्मद ने कहा, “दुनिया से अलग हो जाओ, और अल्लाह तुमसे प्रेम करेगा।” इस्लाम में आध्यात्मिक मार्ग, संपत्ति या पद के मोह की तुलना में सादगी (ज़ुहद), विनम्रता और ईश्वरीय विधान में विश्वास को महत्व देता है। फिर से, कम बोझ। ईसाई परंपरा में भी, रेगिस्तान के पादरियों और मनीषियों की शिक्षाएँ आंतरिक मौन, एकांत और सांसारिक विकर्षणों से वैराग्य पर ज़ोर देती हैं। फिर से, कम बोझ। प्रत्येक परंपरा में, आध्यात्मिक प्रगति के मार्ग के लिए हमें कुछ त्यागना होगा और अधिक संग्रह नहीं करना होगा। महात्मा गांधी ने इस दर्शन को अपने दैनिक जीवन में अपनाया। अपरिग्रह में उनका विश्वास केवल भौतिक वस्तुओं तक सीमित नहीं था। यह अहंकार, घमंड और लालच को त्यागने के बारे में था। उन्होंने एक प्रसिद्ध उक्ति कही थी, “दुनिया में हर किसी की ज़रूरत के लिए पर्याप्त है, लेकिन हर किसी के लालच के लिए पर्याप्त नहीं है।”

इस संदर्भ में जब हम बोझ की बात करते हैं तो हमारा क्या मतलब होता है?
• भावनात्मक: आक्रोश, क्रोध, अनसुलझा आघात
• मानसिक: अति-विचार, अपराधबोध, आत्म-संदेह
• भौतिक: संचय, अनावश्यक संपत्ति
• आध्यात्मिक अहंकार, अभिमान, निर्णय, धार्मिकता

जितना अधिक हम इन्हें ढोते हैं, उतना ही हम शांति से दूर होते जाते हैं। जो व्यक्ति छोड़ना सीख जाता है, वह हल्का, मुक्त और जीवन और उसकी अनिश्चितताओं के साथ अधिक सहज हो जाता है।

सच मानिए,मैंने संघर्ष, जिम्मेदारी और चुनौतियों से भरा जीवन अबतक जिया है। बचपन से लेकर जनसेवा के अपने सफर तक, मैंने घोर गरीबी और सफलता की ऊँचाइयों, दोनों को देखा है।सबसे अधिक तो मैंने ईष्या को देखा है,अनुभव किया है,झेला है लेकिन इन सबके बावजूद, मैंने कम ढोने, अधिक देने के सरल सिद्धांत को अपनाया है। आज भी, बड़े संस्थानों और संगठनों का नेतृत्व करने के बावजूद, मैं कम या बिल्कुल भी बोझ न रखकर अपने निजी जीवन को सरल रखने का प्रयास करता हूँ। मैं अनावश्यक भौतिकवाद से बचता हूँ, जल्दी माफ़ कर देता हूँ, और असफलताओं पर ज़्यादा देर तक विचार नहीं करने की कोशिश करता हूँ। यही मेरे लिए अधिक आराम का मार्ग है। यह मानसिक शांति के बारे में है। यह रात में चैन की नींद सोने और त्वचा में प्राकृतिक चमक बनाए रखने के बारे में है। यह निर्णय लेने में स्पष्टता के बारे में है। जब आपका हृदय क्रोध या ईर्ष्या से घिरा नहीं होता, और आपका मन संदेह या अति-विश्लेषण से भारी नहीं होता, तो आप बेहतर काम करते हैं, बेहतर जीवन जीते हैं और बेहतर जीवन जीते हैं।

आज की दुनिया में, सफलता को अक्सर धन, वैभव,पद- प्रतिष्ठा और यहाँ तक कि अनुयायियों के संचय के साथ जोड़ा जाता है। लेकिन सच्ची सफलता सरलीकरण में निहित है। हम जितना अधिक संचय करते हैं, उतना ही अधिक खोने का डर होता है। जितना अधिक हम डरते हैं, उतना ही अधिक चिंतित होते हैं। महामारी ने हमें यह सच्चाई कठोर लेकिन स्पष्ट रूप से सिखाई। जब सब कुछ बंद हो गया, तो हमें एहसास हुआ कि जीवित रहने के लिए हमें वास्तव में कितनी कम चीज़ों की आवश्यकता है। यह हमारी अलमारी, लग्ज़री कारें या टीवी स्क्रीन नहीं थीं जिन्होंने हमें शांति दी, बल्कि स्वास्थ्य, परिवार और आंतरिक शक्ति थी। नेतृत्व में भी, सबसे प्रभावी नेता वे होते हैं

जो दूसरों को दूसरों को सौंपते हैं, भरोसा करते हैं और अपने अहंकार पर नियंत्रण रखते हैं। वे सूक्ष्म प्रबंधन नहीं करते। वे हर बोझ अकेले नहीं उठाते। वे टीमें बनाते हैं, दूसरों को सशक्त बनाते हैं, और नियंत्रण छोड़ देते हैं। इससे बोझ कम होता है।

अंततः, जीवन की यात्रा जन्म और मृत्यु के बीच है। और बीच में सब कुछ गतिमान है – निरंतर, अप्रत्याशित और अस्थायी। हम इस दुनिया में खाली हाथ आते हैं। और हम वैसे ही चले जाते हैं। बीच में हम जो कुछ भी इकट्ठा करते हैं वह केवल अस्थायी बोझ है। जो बचता है वह यह है कि हमने कैसे जिया। क्या हमने खुशी से जिया? क्या हमने क्षमा किया? क्या हमने उन चीजों को छोड़ दिया जो अब हमारे काम की नहीं थीं? क्या हमने अपना बोझ हल्का किया? यदि हाँ, तो हमारी यात्रा आरामदायक थी। शांतिपूर्ण। आध्यात्मिक। आज, मैं प्रत्येक पाठक को प्रोत्साहित करता हूँ, नैतिक निर्देश के रूप में नहीं, बल्कि इन प्रश्नों की जाँच करने के लिए एक हार्दिक निमंत्रण के रूप में। आप पाएँगे कि रास्ता साफ़ हो गया है। और आपका हृदय अंततः सुकून महसूस करता है। यही शांति की कुंजी है, क्षमा का मूल है, और एक अच्छे जीवन का रहस्य है। आइए हम सब अपने-अपने तरीके से कम बोझ उठाने का प्रयास करें, ताकि हम अधिक जी सकें,प्रसन्नता के साथ जी सकें।

इस साल दिसंबर तक कुल 81 शुभ विवाह मुहुर्त

फरवरी 2026 से शुक्र के उदय होने के साथ ही शादियों का शुभ मुहूर्त (Vivah Shubh Muhurat 2026) शुरू हो गया है, जो 12 अक्टूबर 2026 तक जारी रहेगा। हिंदू पंचांग के अनुसार 2026 में कुल 81 विवाह के शुभ दिन हैं, जिसमें 5 फरवरी से विशेष मांगलिक अनुष्ठान की शुरुआत हो रही है।

शुभ मुहूर्त: फरवरी से जुलाई 2026 के बीच लगभग 63 दिनों के लिए विवाह योग्य हैं, इसके बाद नवंबर-दिसंबर में 18 दिन मिलेंगे।

12 दिसंबर 2025 की रात 2.10 बजे शुक्र तारा अस्त हुआ था, इसी कारण जनवरी में पूरे महीने तक विवाह पूरी तरह वर्जित रहे।

वैदिक ज्योतिष में, शुभ तिथि का चयन नक्षत्रों (चंद्र नक्षत्रों) से प्रभावित होता है जो जोड़े को आजीवन आनंद प्रदान करते हैं। रोहिणी, मघा, उत्तराफाल्गुनी, हस्त और स्वाति विवाह के लिए बहुत शुभ हैं। 2025 में, विवाह के लिए सबसे शुभ दिन इन नक्षत्रों के अंतर्गत आते हैं, जो एक समृद्ध और भाग्यशाली विवाह के लिए आदर्श समय प्रदान करने के लिए सटीक तिथियों (चंद्र दिनों) और ग्रहों की स्थिति के साथ मेल खाते हैं।

24 फरवरी से 3 मार्च तक होलाष्टक है। इसमें विवाह वर्जित है। 14 मार्च से 13 अप्रैल तक खरमास रहेगा। इस अवधि में सूर्य मीन राशि में गोचर करेंगे। सूर्य के मीन राशि में रहने पर गुरु का प्रभाव क्षीण होता है इसलिए मांगलिक कार्य वर्जित रहते हैं। 13 अप्रैल के बाद सूर्य मेष राशि में प्रवेश करेंगे जिसके बाद विवाह व मंगल कार्य शुरू होंगेे। पुरुषोतम मास या अधिकमास 17 से 15 जून तक होगा, इसमें भी विवाह वर्जित होते हैं।

गुरु को जीवन में स्थिरता और विवेक का कारक माना गया है, जबकि शुक्र प्रेम, दांपत्य और भौतिक सुखों का प्रतिनिधि ग्रह है। इन दोनों का उदय अवस्था में होना विवाह के लिए अनिवार्य होता है। विवाह तिथि का चयन केवल दिन देखकर नहीं, बल्कि वार, नक्षत्र, योग, लग्न और वर-वधू की कुंडली के आधार पर किया जाता है।

सर्वोच्च न्यायालय की वाट्सप और मेटा को फटकार

सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार (3 फरवरी 2026) को वाट्सऐप (WhatsApp) और मेटा (Meta) की प्राइवेसी पॉलिसी को लेकर बेहद सख्त रुख अपनाया है। कोर्ट ने साफ कह दिया कि भारत के लोगों के निजी डेटा के साथ खिलवाड़ बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। चीफ जस्टिस सूर्याकांत की अगुवाई वाली बेंच ने कंपनी से पूछा कि वह भारतीय ग्राहकों की जानकारी दूसरी कंपनियों के साथ कैसे और क्यों साझा कर रही है? कोर्ट ने तल्ख टिप्पणी करते हुए कहा कि आप देश के संविधान का मजाक उड़ा रहे हैं और डेटा चुराना आपका धंधा बन गया है।

सुनवाई के दौरान चीफ जस्टिस सूर्याकांत ने वाट्सऐप की प्राइवेसी पॉलिसी की भाषा पर गंभीर सवाल उठाए। उन्होंने कंपनी के वकीलों से पूछा, “क्या बिहार या तमिलनाडु के किसी दूर-दराज गाँव में रहने वाला व्यक्ति आपकी इस मुश्किल भाषा को समझ पाएगा? सड़क पर फल बेचने वाली एक गरीब महिला या घर में काम करने वाली बाई क्या आपकी शर्तों को समझ सकती है?”

CJI ने आगे कहा कि आपकी पॉलिसी की भाषा इतनी चालाकी से लिखी गई है कि हम में से कुछ लोग भी उसे नहीं समझ पाते। उन्होंने कहा कि पॉलिसी साधारण ग्राहकों के नजरिए से होनी चाहिए। कोर्ट ने सख्त लहजे में कहा, “आपने करोड़ों लोगों का डेटा ले लिया होगा। यह निजी जानकारी की चोरी करने का एक शालीन तरीका है। हम इसे इस्तेमाल करने की अनुमति नहीं देंगे।”

‘डेटा साझा करना या वाट्सऐप छोड़ना- ये कोई विकल्प नहीं, एकाधिकार है’

जब वाट्सऐप की ओर से कहा गया कि ग्राहकों के पास पॉलिसी से बाहर निकलने (Opt-out) का विकल्प है, तो CJI सूर्याकांत ने इसे ‘मजाक’ बताया। उन्होंने कहा, “मार्केट में आपका पूरा एकाधिकार (Monopoly) है और आप कह रहे हैं कि आप विकल्प दे रहे हैं? आपका विकल्प यह है कि या तो वाट्सऐप छोड़ दो या हम डेटा साझा करेंगे। लोग इस सिस्टम के आदी हो चुके हैं और वे मजबूर हैं।”

CJI ने टिप्पणी की कि आप देश की प्राइवेसी के अधिकार के साथ खिलवाड़ नहीं कर सकते। उन्होंने कहा, “आज फेसबुक ने आपको खरीदा है, कल फेसबुक को कोई और खरीद लेगा और आप डेटा ट्रांसफर कर देंगे। आप इस देश के संविधानवाद का मजाक बना रहे हैं।”

Behaviroual डेटा और विज्ञापन का खेल: CJI ने साझा किया अपना अनुभव

जस्टिस बागची ने इस बात पर जोर दिया कि कोर्ट यह देखना चाहता है कि लोगों के व्यवहार (Behaviour) और रुझानों का विश्लेषण करके डेटा को कैसे ‘किराए’ पर दिया जा रहा है। उन्होंने कहा कि डेटा के हर छोटे हिस्से की एक कीमत है और मेटा इसका इस्तेमाल ऑनलाइन विज्ञापनों में अपनी पकड़ मजबूत करने के लिए कर रहा है।

इस पर CJI सूर्यकांत ने अपना निजी अनुभव साझा करते हुए कहा, “अगर वाट्सऐप पर किसी डॉक्टर को मैसेज भेजा जाए कि तबीयत ठीक नहीं है और डॉक्टर कुछ दवाएँ लिख दे, तो तुरंत ही मुझे वैसे ही विज्ञापन आने लगते हैं। 5-10 मिनट के भीतर ईमेल और यूट्यूब पर उन दवाओं के मैसेज मिलने शुरू हो जाते हैं। यह कैसे हो रहा है?”

अदालत ने माँगा हलफनामा, मंत्रालय को बनाया पक्षकार

कंपनियों की दलीलों के बीच सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने भी कहा कि हमारा निजी डेटा न केवल बेचा जा रहा है, बल्कि उसका व्यावसायिक शोषण भी हो रहा है। कोर्ट ने अंततः मेटा और वाट्सऐप को अपना पक्ष रखते हुए हलफनामा दाखिल करने के लिए अगले सोमवार (9 फरवरी 2026) तक का समय दिया है। साथ ही, कोर्ट ने इस मामले में इलेक्ट्रॉनिक्स और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय को भी पक्षकार बनाया है।

अदालत ने स्पष्ट संदेश दिया कि कंपनियों के व्यावसायिक हित भारतीयों के मौलिक अधिकारों की कीमत पर नहीं हो सकते। यह पूरा मामला भारतीय प्रतिस्पर्धा आयोग (CCI) द्वारा लगाए गए 213.14 करोड़ रुपए के जुर्माने से जुड़ा है, जिसे CCI ने वाट्सऐप की दबंगई और प्राइवेसी पॉलिसी के दुरुपयोग के कारण लगाया था।

श्रीलंका में भगवान बुद्ध के पवित्र देवनिमोरि अवशेषों की प्रदर्शनी

पवित्र अवशेषों की प्रदर्शनी 04 से 11 फरवरी, 2026 तक गंगारामया मंदिर, कोलंबो में आयोजित की जाएगी

गुजरात के राज्यपाल श्री आचार्य देवव्रत और गुजरात के उपमुख्यमंत्री श्री हर्ष संघवी भारतीय प्रतिनिधिमंडल का नेतृत्व करेंगे

पीआईबी दिल्ली द्वारा 02 फरवरी 2026 को 5:50 पीएम पर जारी

प्रविष्टि तिथि: 02 FEB 2026 5:50PM by PIB Delhi

अप्रैल 2025 में भारत के प्रधानमंत्री की श्रीलंका यात्रा के दौरान व्यक्त किए गए दृष्टिकोण को आगे बढ़ाते हुए, भारत श्रीलंका में भगवान बुद्ध के पवित्र देवनिमोरि अवशेषों की प्रदर्शनी के माध्यम से आध्यात्मिक पहुंच और सांस्कृतिक कूटनीति की एक महत्वपूर्ण पहल करने जा रहे है।

वर्तमान में वडोदरा के महाराजा सयाजीराव विश्वविद्यालय में प्रतिष्ठित ये पवित्र अवशेष, 4 से 10 फरवरी 2026 तक सार्वजनिक दर्शन के लिए कोलंबो ले जाए जाएंगे, और 11 फरवरी 2026 को उनकी वापसी निर्धारित है।

यह पवित्र यात्रा बौद्ध धर्म की जन्मस्थली के रूप में भारत के स्थायी सभ्यतागत उत्तरदायित्व को रेखांकित करती है और भारत तथा श्रीलंका के बीच गहरे आध्यात्मिक, सांस्कृतिक और जन-जन के संबंधों की पुष्टि करती है।

 

इन पवित्र अवशेषों के साथ गुजरात के राज्यपाल श्री आचार्य देवव्रत और गुजरात के उपमुख्यमंत्री श्री हर्ष संघवी के नेतृत्व में एक उच्च स्तरीय भारतीय प्रतिनिधिमंडल जाएगा, जिसमें वरिष्ठ भिक्षु और अधिकारी भी शामिल होंगे।

निर्धारित प्रोटोकॉल और अवशेषों को दी जाने वाली पवित्रता के अनुरूप, वे भारतीय वायु सेना के एक विशेष विमान से पूर्ण राजकीय सम्मान के साथ यात्रा करेंगे। यह उस श्रद्धा को दर्शाता है जिसके साथ भारत अपनी पवित्र विरासत को संजोए हुए है।

यह प्रतिनिधिमंडल कोलंबो में औपचारिक, धार्मिक और आधिकारिक कार्यक्रमों में भाग लेगा। इनमें प्रदर्शनी का औपचारिक उद्घाटन और भारत की बौद्ध विरासत एवं समकालीन सांस्कृतिक जुड़ाव को उजागर करने वाली अन्य संबंधित प्रदर्शनियाँ शामिल होंगी।

 

पवित्र अवशेषों को कोलंबो के प्रतिष्ठित गंगारामया मंदिर में सार्वजनिक दर्शन के लिए स्थापित किया जाएगा, जो देश के सबसे प्रतिष्ठित और आध्यात्मिक रूप से महत्वपूर्ण बौद्ध संस्थानों में से एक है। उन्नीसवीं सदी के अंत में श्रद्धेय हिक्कादुवे श्री सुमंगला नायक थेरा द्वारा स्थापित यह मंदिर पूजा, शिक्षा और सांस्कृतिक आदान-प्रदान के एक प्रमुख केंद्र के रूप में विकसित हुआ है, जो इस प्रदर्शनी के लिए एक उपयुक्त और गरिमामय वातावरण प्रदान करता है।

एक ऐसा राष्ट्र जहाँ बौद्ध धर्म वहाँ के सांस्कृतिक लोकाचार, इतिहास और दैनिक जीवन को आकार देता है, वहां इस प्रदर्शनी के श्रीलंका के श्रद्धालुओं के बीच गहराई से गूंजने और दोनों देशों की साझा बौद्ध विरासत को और अधिक सुदृढ़ करने की उम्मीद है।

 

देवनिमोरि अवशेष गुजरात के अरावली जिले में शामलाजी के निकट स्थित देवनिमोरि पुरातात्विक स्थल से प्राप्त हुए हैं, जो अत्यधिक ऐतिहासिक और आध्यात्मिक महत्व का स्थान है। पहली बार 1957 में प्रख्यात पुरातत्वविद् प्रो. एस. एन. चौधरी द्वारा इस स्थल की खोज की गई थी।

उत्खनन (खुदाई) के दौरान यहाँ महत्वपूर्ण बौद्ध संरचनाएं और अवशेष मिले, जो साझा युग की शुरुआती शताब्दियों में पश्चिमी भारत में बौद्ध धर्म के फलने-फूलने के जीवंत प्रमाण हैं। ये अवशेष न केवल एक अमूल्य पुरातात्विक खजाना हैं, बल्कि भगवान बुद्ध की शाश्वत शिक्षाओं—शांति, करुणा और सद्भाव—के जीवंत प्रतीक भी हैं।

देवनिमोरि स्तूप के भीतर आधार से 24 फीट की ऊंचाई पर मिली यह अवशेष मंजूषा (relic casket) हरे रंग के शिस्ट पत्थर (green schist) से बनी है। इस पर ब्राह्मी लिपि और संस्कृत भाषा में शिलालेख अंकित है, जिस पर लिखा है: “दशबल शरीर निलय” — अर्थात भगवान बुद्ध के शारीरिक अवशेषों का निवास स्थान।

इस मंजूषा के भीतर एक तांबे का बक्सा है, जिसमें पवित्र भस्म (राख) के साथ जैविक पदार्थ, रेशमी कपड़ा और मनके रखे हुए हैं। यह मंजूषा तीन भागों से बनी है:

मुख्य भाग : आधार 6.8 इंच, ऊंचाई 2.9 इंच, और लेज का व्यास 4 इंच, ढक्कन : व्यास 6.7 इंच, मोटाई 1.05 इंच, और ऊंचाई 0.7 इंच।

नाब: गोलाकार शीर्ष के साथ, जिसकी ऊंचाई 0.66 इंच और व्यास 1.1 इंच है।

तांबे के उस बक्से का ऊपरी हिस्सा और आधार समतल था, जिसके किनारे पर एक स्लिप-ऑन ढक्कन लगा हुआ था। इस बक्से के भीतर रेशमी कपड़ा, चांदी-तांबे की सोने की परत वाली एक बोतल, पवित्र भस्म युक्त जैविक सामग्री और आवरण के रूप में उपयोग की गई काली मिट्टी मिली थी।

सुराही के आकार की वह छोटी सोने की परत वाली बोतल सैगर बेस, बेलनाकार शरीर और स्क्रू-टाइप ढक्कन वाली संकरी गर्दन से युक्त थी।

पवित्र अवशेषों को अब एक डेसिकेटर में रखा गया है। इसे एयरटाइट कांच के भीतर सील किया गया है ताकि अंदर रखी वस्तुओं को और अधिक खराब होने से बचाया जा सके। अवशेषों को सोने की परत वाली चांदी-तांबे की बोतल और रेशमी कपड़े के साथ काटन बेस पर रखा गया है, ताकि उनका बेहतर संरक्षण सुनिश्चित हो सके।

 

अपने आध्यात्मिक महत्व से परे, श्रीलंका में पवित्र देवनिमोरि अवशेषों की यह प्रदर्शनी भारत की सांस्कृतिक कूटनीति को आगे बढ़ाकर और उसकी जन-केंद्रित विदेश नीति को सुदृढ़ करके एक महत्वपूर्ण राजनयिक उद्देश्य को पूरा करती है। श्रीलंका के साथ अपनी सबसे पवित्र बौद्ध विरासत को साझा करके, भारत साझा विश्वास, इतिहास और मूल्यों पर टिके द्विपक्षीय संबंधों की सभ्यतागत नींव को रेखांकित करता है।

यह प्रदर्शनी ‘सॉफ्ट पावर’ के एक शक्तिशाली माध्यम के रूप में कार्य करती है, जो आपसी विश्वास को बढ़ाने, जन-जन के बीच गहरे संबंधों को बढ़ावा देने और औपचारिक राजनयिक प्रयासों को एक गहन सांस्कृतिक एवं भावनात्मक गरिमा प्रदान करने में सहायक है। यह वैश्विक बौद्ध विरासत के एक जिम्मेदार संरक्षक के रूप में भारत की भूमिका की पुष्टि करती है और हिंद महासागर के पड़ोसी देशों में क्षेत्रीय सद्भाव को मजबूत करती है। साथ ही, यह दक्षिण एशिया में शांति, स्थिरता और सहकारी सह-अस्तित्व के भारत के दृष्टिकोण में श्रीलंका के एक महत्वपूर्ण भागीदार होने के स्थान को भी सुदृढ़ करती है।

 

श्रीलंका में होने वाली यह आगामी प्रदर्शनी दुनिया के साथ अपनी बौद्ध विरासत साझा करने की भारत की पुरानी परंपरा को और आगे बढ़ाती है। हाल के वर्षों में, भगवान बुद्ध के पवित्र अवशेषों को थाईलैंड, मंगोलिया, वियतनाम, रूसी संघ और भूटान जैसे देशों में सफलतापूर्वक प्रदर्शित किया गया है, जिसने लाखों भक्तों को आकर्षित किया है और जन-जन के बीच संबंधों को मजबूत किया है।

श्रीलंका की यह प्रदर्शनी पवित्र पिपरहवा रत्न अवशेषों की हालिया और बहुचर्चित स्वदेश वापसी के बाद आयोजित हो रही है, जिसे प्रधानमंत्री ने एक अमूल्य राष्ट्रीय धरोहर की “घर वापसी” के रूप में सराहा था।

इस प्रदर्शनी के माध्यम से, भारत एक बार फिर बुद्ध धम्म के सार्वभौमिक संदेश—अहिंसा, करुणा और सह-अस्तित्व—को प्रसारित कर रहा है, और साथ ही सांस्कृतिक कूटनीति एवं वैश्विक सद्भाव के प्रति अपनी प्रतिबद्धता की पुष्टि कर रहा है।

श्रीलंका के लिए देवनिमोरि अवशेषों की यह यात्रा शांति के एक शक्तिशाली प्रतीक, साझा आध्यात्मिक विरासत के उत्सव और भारत एवं श्रीलंका के बीच उस विशेष तथा स्थायी मित्रता के प्रमाण के रूप में खड़ी है, जो सदियों पुराने सभ्यतागत संबंधों और आपसी सम्मान में निहित है।

संस्कृति मंत्रालय, इटली के वेनिस में 61वें अंतर्राष्ट्रीय कला प्रदर्शनी – ला बिएनाले डि वेनेज़िया में भारत का पवेलियन

यह पवेलियन भारत सरकार के संस्कृति मंत्रालय द्वारा नीता मुकेश अंबानी कल्चरल सेंटर (NMACC) और सेरेन्डिपिटी आर्ट्स फाउंडेशन के साथ साझेदारी में प्रस्तुत किया जाएगा

 

इंडिया पवेलियन ने ला बिएनाले डि वेनेज़िया के 61वें इंटरनेशनल आर्ट एग्ज़िबिशन में अपनी भागीदारी की डिटेल्स की घोषणा की है, जिसमें ग्रुप एग्ज़िबिशन, ‘जियोग्राफ़ीज़ ऑफ़ डिस्टेंस: रिमेंबरिंग होम’ शामिल है। संस्कृति मंत्रालय, भारत सरकार से प्रस्तुत और डॉ. अमीन जाफ़र की ओर से क्यूरेट किया गया यह एग्ज़िबिशन दुनिया के मंच पर एक महत्वपूर्ण क्षण में देश की सांस्कृतिक गहराई को दिखाएगा। इंडिया पविलियन 2019 के बाद पहली बार नीता मुकेश अंबानी कल्चरल सेंटर और सेरेन्डिपिटी आर्ट्स फ़ाउंडेशन, जो भारत के दो प्रमुख मल्टी-डिसिप्लिनरी सांस्कृतिक संस्थान हैं, के साथ साझेदारी में वेनिस लौट रहा है।

केंद्रीय संस्कृति और पर्यटन मंत्री श्री गजेंद्र सिंह शेखावत ने कहा कि ला बिएनाले डि वेनेज़िया में भारत की वापसी गर्व का क्षण है और सांस्कृतिक आत्मविश्वास का प्रतीक है। केंद्रीय मंत्री ने कहा कि हमारा राष्ट्रीय पवेलियन एक समकालीन भारत को दिखाएगा जो अपनी सभ्यतागत स्मृति में गहराई से जुड़ा हुआ है और साथ ही आज की दुनिया से पूरी तरह जुड़ा हुआ है। केंद्रीय मंत्री ने आगे कहा कि इस पविलियन के माध्यम से, भारत हमारी सांस्कृतिक विविधता की ताकत, हमारे रचनात्मक समुदायों की जीवंतता और वैश्विक मंच पर हमारे राष्ट्र को कैसे देखा और समझा जाता है, इसमें कला और संस्कृति की भूमिका की पुष्टि करता है।

संस्कृति मंत्रालय के सचिव श्री विवेक अग्रवाल ने कहा कि इंडिया पवेलियन ऐसे कलाकारों को एक साथ लाता है जिनकी कला समकालीन भारत की बदलती वास्तविकताओं को दिखाती है। श्री अग्रवाल ने कहा कि अलग-अलग क्षेत्रों और मटेरियल परंपराओं में काम करते हुए, ये कलाकार बहुत ही व्यक्तिगत और इनोवेटिव तरीकों से भारत की वैश्विक आवाज़ को सामने रखते हैं। उन्होंने आगे कहा कि उनका काम दिखाता है कि कैसे भारत की क्रिएटिव प्रतिभा बदलती दुनिया में यादों, जगह और बदलाव के सवालों से सार्थक रूप से जुड़ी हुई है।

श्रीमती ईशा अंबानी ने नीता मुकेश अंबानी कल्चरल सेंटर की ओर से कहा कि नीता मुकेश अंबानी कल्चरल सेंटर को संस्कृति मंत्रालय के साथ मिलकर बिएनेल में भारत के नेशनल पविलियन को पेश करते हुए खुशी हो रही है, जिसमें हमारे कुछ सबसे प्रभावशाली कलाकार शामिल हैं। उनके काम की समृद्धि और विविधता समकालीन भारत की जटिलताओं और रचनात्मक महत्वाकांक्षा को दर्शाती है, साथ ही हमारे देश की शाश्वत परंपराओं का जश्न मनाती है। यह प्रोजेक्ट कला और संस्कृति के लिए हमारे विजन को रेखांकित करता है ताकि एक वैश्विक संवाद को बढ़ावा दिया जा सके जो सीमाओं से परे हो, और भारत और दुनिया की सर्वश्रेष्ठ चीज़ों को एक साथ लाए।

सभी पाँच भाग लेने वाले भारतीय कलाकार – अलवर बालासुब्रमण्यम (बाला), सुमाक्षी सिंह, रंजनी शेट्टार, असीम वकीफ़ और स्कार्मा सोनम ताशी – उन मटेरियल कल्चर परंपराओं का इस्तेमाल करते हैं जो हज़ारों सालों से चली आ रही हैं, ताकि घर के विचार से एक भावनात्मक जुड़ाव पैदा किया जा सके। कलाकारों की अलग-अलग भौगोलिक पृष्ठभूमि, अनुभव और अभ्यास के बावजूद, वे सभी अपने काम को बनाने और पेश करने में भारत की पारंपरिक ऑर्गेनिक चीज़ों का इस्तेमाल करने में एकजुट हैं।

जियोग्राफ़ीज़ ऑफ़ डिस्टेंस: रिमेंबरिंग होम यह बताएगा कि कैसे, जिनकी ज़िंदगी बदलाव या दूरी से बनती है, उनके लिए घर एक तय जगह से ज़्यादा एक पोर्टेबल स्थिति बन जाता है: कुछ यादें, कुछ चीज़ें, कुछ रीति-रिवाज, कुछ पर्सनल माइथोलॉजी। यह प्रदर्शनी भारत में तेज़ी से हो रहे बदलाव के एक पल को दिखाती है, क्योंकि शहर हॉरिजॉन्टल और वर्टिकल दोनों तरह से बढ़ रहे हैं, जिससे आस-पड़ोस अभूतपूर्व गति से बदल रहे हैं। आज भारतीय पहले से कहीं ज़्यादा मोबाइल हैं, दोनों ही एक ऐसे देश में जो आर्थिक उछाल के दौर से गुज़र रहा है और एक दिखाई देने वाले और मुखर ग्लोबल डायस्पोरा के रूप में। दुनिया की आबादी का लगभग 20 प्रतिशत होने के बावजूद, भारतीय अपनी जड़ों और संस्कृति से गहराई से जुड़े हुए हैं। जैसे-जैसे कभी जानी-पहचानी भौतिक जगहें बदलती और नई होती हैं, हमें यह सोचने के लिए कहा जाता है कि क्या घर एक जगह है या भावनाओं और यादों की एक अभिव्यक्ति है।

पूरी प्रदर्शनी में, ‘घर’ के तत्व टूटे हुए, हवा में लटके हुए, मचान पर बने हुए, या कमज़ोर दिखाई देते हैं, क्योंकि कलाकार उस जगह के लिए लालसा और गहरे जुड़ाव की भावना को तलाशते हैं जिससे हम जुड़े हुए हैं। हर कलाकार भारत के बदलाव, गतिशीलता और ग्लोबल डायस्पोरा पर विचार करता है। प्रदर्शनी में शामिल कलाकार भारत में कला के क्षेत्र में सबसे आगे रहने वाले कई क्षेत्रों और पीढ़ियों के कलाकारों का प्रतिनिधित्व करते हैं:

  • अलवर बालासुब्रमण्यम (बाला) ग्रामीण तमिलनाडु में एक स्टूडियो से काम करते हैं, जिनका काम प्राकृतिक दुनिया और उनके घर के आसपास के लैंडस्केप के साथ एक करीबी बातचीत से उभरता है, जिसे वे उस इलाके की मिट्टी और चिकनी मिट्टी से बनाते हैं जहाँ वे रहते हैं।
  • सुमाक्षी सिंह नई दिल्ली की एक कलाकार हैं जो कढ़ाई वाले धागे से अलौकिक इंस्टॉलेशन बनाती हैं, जो यादों को ही एक आर्किटेक्चरल माध्यम में बदल देती हैं।

  • रंजनी शेट्टार मूर्तिकला के कामों के ज़रिए भारत की प्राचीन शिल्प परंपराओं को तलाशती हैं जो गुरुत्वाकर्षण को चुनौती देते हुए दिखाई देते हैं। कर्नाटक में काम करते हुए, वह प्राकृतिक सामग्रियों को पूरी तरह से हाथ से ऑर्गेनिक फूलों के रूपों में बदलती हैं, जो एक तैयार काम के धीरे-धीरे सामने आने और उसकी छिपी हुई संभावनाओं को दिखाता है।
  • आर्किटेक्ट के तौर पर ट्रेनिंग पाए असीम वक़ीफ़, अपनी मूर्तिकला इंस्टॉलेशन के लिए ऑर्गेनिक और फेंके हुए मटीरियल का इस्तेमाल करते हैं, और पब्लिक स्पेस में कंजम्पशन और सस्टेनेबिलिटी के मुद्दों को उठाते हैं। उनका काम दर्शकों को सिर्फ़ देखने के बजाय उनके स्ट्रक्चर में हिस्सा लेने और उन्हें एक्टिवेट करने के लिए इनवाइट करता है।
  • स्कार्मा सोनम ताशी अपने काम में अपने होमटाउन लद्दाख के लैंडस्केप और आर्किटेक्चर को दिखाते हैं, वे ऑर्गेनिक रीसायकल मटीरियल और पेपर माशे जैसी पारंपरिक तकनीकों का इस्तेमाल करके प्राकृतिक दुनिया की नाजुकता को दिखाते हैं, और इकोलॉजी और सांस्कृतिक संरक्षण के बारे में सवाल उठाते हैं।

इस प्रदर्शनी को डॉ. अमीन जाफ़र ने क्यूरेट किया है, जिन्होंने यह प्रोजेक्ट ला बिएनाले डि वेनेज़िया की थीम, इन माइनर कीज़ के जवाब में तैयार किया है, जिसे दिवंगत क्यूरेटर कोयो कौओह ने सोचा था।

भारत वेनिस में एक तमाशे के तौर पर नहीं, बल्कि आत्मविश्वास से भरी एक फुसफुसाहट के रूप में आता है। संगीत, मूवमेंट और फुसफुसाहट के ज़रिए, इंडिया पवेलियन ऐसे पल भर के दखल पैदा करता है जो शहर की रोज़ाना की लय में घुल जाते हैं – सुबह पुल पर दिखाई देते हैं, शाम को गूंजते हैं, दोपहर की रोशनी में साकार होते हैं। इंडिया पविलियन की एक मुख्य बात बिएनाले के दौरान संगीत, परफॉर्मेंस, कविता और बातचीत का एक क्यूरेटेड प्रोग्राम होगा।

सेरेंडिपिटी आर्ट्स के फाउंडर पैट्रन श्री सुनील कांत मुंजाल ने कहा: “सेरेंडिपिटी आर्ट्स जीने, साझा और गतिशील कलात्मक अभ्यास के लिए प्लेटफॉर्म बनाता है। ला बिएनाले डि वेनेज़िया में इंडिया पवेलियन इस फिलॉसफी को ग्लोबल स्टेज पर ले जाता है। विज़ुअल आर्ट्स प्रोग्राम के साथ-साथ, हमारी भागीदारी परफॉर्मेंस और पार्टिसिपेशन के ज़रिए पवेलियन को एक्टिव करेगी, और दर्शकों को यादों, जगह और अपनेपन के विचारों से कई रूपों में जुड़ने के लिए इनवाइट करेगी। यह कोलैबोरेशन सेरेंडिपिटी के इस विश्वास को दिखाता है कि भारत की सांस्कृतिक अभिव्यक्ति तब सबसे ज़्यादा पावरफुल होती है जब यह इंटरडिसिप्लिनरी हो और बातचीत के लिए खुली हो।”

अल थानी कलेक्शन के क्यूरेटर और डायरेक्टर डॉ. अमीन जाफ़र ने कहा: “61वीं इंटरनेशनल आर्ट एग्ज़िबिशन, जिसकी थीम ‘इन माइनर कीज़’ है, दूरी की बारीकियों और घर की यादों की स्थायी शक्ति को समझने का एक मार्मिक मौका देती है। इंडिया पवेलियन ऐसे कलाकारों को एक साथ लाता है जिनके काम लगातार बदलते दुनिया के अनुभव को दिखाते हैं। यह पवेलियन घर को एक तय फिजिकल जगह के तौर पर नहीं, बल्कि खुद के अंदर ले जाए जाने वाले एक इमोशनल स्पेस, संस्कृति, पर्सनल माइथोलॉजी और भावनाओं के भंडार के तौर पर देखता है। भारतीय सभ्यता से जुड़ी चीज़ों का इस्तेमाल करके, चुने हुए कलाकार घर की नाज़ुक प्रकृति पर एक अनोखा ध्यान लगाते हैं, जो पर्सनल और यूनिवर्सल दोनों है, शांत और पक्का है। इस काम के ज़रिए, हमारे कलाकार एक साथ मिलकर एक सामूहिक भारतीय आवाज़ बनाते हैं जो इस बिएनेल के लिए कोयो कुओह के विज़न से मेल खाती है।

हम भारतीयों को विदेशी गणित पढ़ाकर हमें हमारे सरल भारतीय गणित से दूर कर दिया गया

क्या आपको स्कूल में गणित कठिन लगता था? क्या आपके बच्चे को भी लगता है? यदि हाँ, तो इसका समाधान क्या है: शिक्षक बदलें या बच्चा बदलें? गणित की कठिनाइयों के लिए शिक्षक या बच्चे को दोष देना एक आम लेकिन गलत तर्क है। वास्तव में, शिक्षकों या छात्रों की समस्याएँ सभी विषयों को समान रूप से प्रभावित करती हैं, न कि केवल गणित को। सही समाधान गणित को बदलना है। यह असंभव लगता है। लोग भोलेपन से मानते हैं कि गणित सार्वभौमिक है। वास्तव में, आज माध्यमिक विद्यालय से आगे जो गणित पढ़ाया जाता है, उसे औपचारिक गणित कहा जाता है; इसकी शुरुआत केवल 20 वीं शताब्दी में डेविड हिल्बर्ट और बर्ट्रेंड रसेल के साथ हुई थी। यह उस सामान्य गणित से भिन्न है जिसे लोग हजारों वर्षों से दुनिया भर में करते आ रहे हैं और आज भी बालवाड़ी में करते हैं।

औपचारिक गणित गणित की कठिनाई को बहुत बढ़ा देता है, लेकिन इसके व्यावहारिक मूल्य में कोई वृद्धि नहीं करता। गणित का व्यावहारिक मूल्य सामान्य गणित में प्रयुक्त कुशल गणना तकनीकों से आता है, न कि जटिल औपचारिक प्रमाणों से। उदाहरण के लिए, 1+1=2 के प्रमाण के लिए व्हाइटहेड और रसेल को अपनी पुस्तक प्रिंसिपिया में 368 पृष्ठों के जटिल प्रतीकात्मकता का उपयोग करना पड़ा । वह प्रमाण किसी किराने की दुकान में बोझ बन जाता है। इसके विपरीत, सामान्य गणित आसान है। एक सेब और एक सेब मिलकर दो सेब होते हैं, जैसा कि ज्यादातर लोग बचपन में सीखते हैं। तो क्या हमें सभी स्तरों पर सामान्य गणित पर वापस लौट जाना चाहिए?

अब हमारे स्कूल की पाठ्यपुस्तकें औपचारिक गणित के शिक्षण को इस प्रकार उचित ठहराती हैं। एनसीईआरटी 1 (या विभिन्न राज्यों) की कक्षा 9 की गणित की पाठ्यपुस्तक में यूक्लिड नामक एक प्राचीन यूनानी विद्वान की कहानी बताई गई है, जिन्होंने निगमनात्मक तर्क का उपयोग करके सबसे पहले गणित को “व्यवस्थित” रूप से हल किया था। पाठ्यपुस्तक में आगे कहा गया है कि मिस्र, भारत, इराक, चीन और दक्षिण अमेरिका के अन्य सभी विद्वान ऐसा करने में असफल रहे। इसमें बच्चों को यूक्लिड की छवि एक श्वेत व्यक्ति के रूप में दिखाई गई है। इस कहानी के आधार पर, छात्रों को बताया जाता है कि हमें “यूक्लिड” का अनुकरण करके गणित करना चाहिए, जिन्हें “वास्तविक” गणित (अर्थात औपचारिक गणित) का जनक मानकर महिमामंडित किया जाता है।

यह कहानी सामान्य गणित को हीन बताती है। लेकिन औपचारिक गणित की कथित श्रेष्ठता को साबित करने के लिए कोई ठोस तर्क नहीं दिया गया है, बस एक कहानी है। क्या बच्चे इसकी जाँच करते हैं? नहीं; लेकिन कहानी झूठी है। इसकी असत्यता को उजागर करने के लिए, मैंने यूक्लिड के बारे में किसी भी ठोस (प्राथमिक) प्रमाण के लिए 2 लाख रुपये का पुरस्कार घोषित किया है। यह पुरस्कार कई वर्षों से अनुत्तरित है। क्यों? विशेषज्ञों को पता है कि ” यूक्लिड” के लिए कोई प्रमाण नहीं है और इसके विपरीत कई प्रमाण मौजूद हैं ।

हमारे अपने “विशेषज्ञ”—वे लोग जिन्होंने एनसीईआरटी की पाठ्यपुस्तकें लिखीं—चुनौती दिए जाने पर सबूत पेश करने में असमर्थ हैं। उन्हें या तो अपनी गलतियाँ स्वीकार करनी चाहिए, या सार्वजनिक रूप से अपने दावों का बचाव करना चाहिए, लेकिन वे दोनों में से कुछ भी नहीं करते। चूंकि हम पूरी तरह से ऐसे “विशेषज्ञों” पर निर्भर हैं, इसलिए हम गलत पाठ्यपुस्तकों से ही पढ़ते रहते हैं! हालांकि, इसमें शामिल निहित स्वार्थ केवल “विशेषज्ञों” के अहंकार या अपनी नौकरी बचाने की इच्छा से कहीं अधिक गहरे हैं। इसलिए, “यूक्लिड” की कहानी को सार्वजनिक रूप से चुनौती देने या औपचारिक गणित के संबंधित दर्शन को चुनौती देने के प्रयासों को अक्सर दबा दिया जाता है।

सेंसरशिप के एक उदाहरण के तौर पर, मैंने एक लेख लिखा, “गणित को उपनिवेशवाद से मुक्त करने के लिए, इसके झूठे इतिहास और गलत दर्शन का सामना करें”। यह लेख अक्टूबर 2016 में द कन्वर्सेशन (वैश्विक संस्करण) में प्रकाशित हुआ था। इस लेख ने हलचल मचा दी। यह वायरल हो गया और लगभग 17,000 हिट्स (60% अमेरिका और अफ्रीका में) दर्ज किए, इससे पहले कि दक्षिण अफ्रीका के संपादक ने इसे अचानक हटा दिया। अगर लेख में कुछ गलत था, तो द कन्वर्सेशन को सार्वजनिक रूप से सुधार प्रकाशित करना चाहिए था। कोई भी वास्तविक त्रुटि नहीं बता सका। इसलिए, इस लेख को हटाने का औचित्य निजी तौर पर इस कमजोर संपादकीय आधार पर दिया गया कि मैंने अपने ही काम, जैसे कि अपनी किताब, का हवाला दिया था। 3 भारत में भी, इस लेख को पहले द वायर और स्क्रॉल दोनों ने पुनः प्रकाशित किया और फिर हटा दिया , हालांकि द वायर ने माफी के साथ लेख को वापस प्रकाशित करके सराहनीय काम किया। वर्तमान में, वह सेंसर किया गया लेख मेरे ब्लॉग 4 , द वायर 5 और साइंस2.0 पर उपलब्ध है । 6 इसे हाल ही में एक अन्य सहकर्मी-समीक्षित जर्नल लेख के हिस्से के रूप में पूरी तरह से पुन: प्रस्तुत किया गया था, 7 इसलिए, फिर से, इसमें कुछ भी स्पष्ट रूप से गलत नहीं था।

तो, इसे प्रतिबंधित क्यों किया गया? गणित के शिक्षण में झूठे मिथक और प्रतिबंध इतने आवश्यक क्यों हैं?

इसका उत्तर तीन अप्रिय तथ्यों से जुड़ा है। पहला, गणित पढ़ाने का यह तरीका औपनिवेशिक शिक्षा के माध्यम से हम तक पहुंचा, जो 19 वीं शताब्दी में जब पहली बार भारत में आई तो पूरी तरह से चर्च आधारित शिक्षा थी : न केवल मिशन स्कूल, बल्कि ऑक्सफोर्ड और कैम्ब्रिज जैसे सभी प्रारंभिक पश्चिमी विश्वविद्यालय चर्च द्वारा स्थापित किए गए थे, और तब तक पूरी तरह से उसके नियंत्रण में रहे।

दूसरा, यूक्लिड की ज्यामिति करने की कथित तौर पर “श्रेष्ठ” विधि सदियों तक चर्च के पाठ्यक्रम का हिस्सा रही । क्यों? क्योंकि यह पाठ्यक्रम मिशनरियों को तैयार करने के लिए बनाया गया था। भावी मिशनरियों को दूसरों को समझाने की क्षमता सिखाई जाती थी: उन्हें ईसाई धर्मग्रंथों को अस्वीकार करने वालों को समझाने के लिए तर्क का उपयोग करना सिखाया जाता था। इसलिए, चर्च ने गणित का उपयोग तर्क सिखाने के लिए किया, न कि व्यावहारिक गणना सिखाने के लिए।

तीसरा और सबसे कम ज्ञात तथ्य यह है: “तर्क” शब्द में एक पेचीदा दोहरा अर्थ निहित है। यह तर्क करने के सामान्य तरीकों को संदर्भित नहीं करता, जैसा कि लोग आसानी से मान लेते हैं। बल्कि यह चर्च द्वारा विकसित तर्क के एक विशेष तरीके को संदर्भित करता है, जिसका उद्देश्य उसके “तर्क के धर्मशास्त्र” (जिसे उसने धर्मयुद्धों के दौरान अपनाया था) का समर्थन करना था। संक्षेप में, चर्च ने तर्क को अनुभवजन्य तथ्यों से अलग कर दिया । ऐसा करने का उसके पास ठोस कारण था। अनुभवजन्य तथ्य चर्च के सिद्धांतों के विपरीत हैं: ईश्वर, स्वर्ग, नरक, पुनरुत्थान, कुंवारी जन्म जैसी धारणाएँ सभी अनुभवजन्य तथ्यों के विपरीत हैं। अपने अनुभव-विरोधी सिद्धांतों का बचाव करने के लिए, चर्च ने अनुभवजन्य प्रमाणों को निम्नतर घोषित कर दिया। उसने घोषणा की कि तर्क पर आधारित, लेकिन तथ्यों से अलग, “शुद्ध निगमनात्मक प्रमाण” अचूक और “श्रेष्ठ” हैं। तर्क का यह चर्च सिद्धांत ठीक वही है जिसे हमारे स्कूली पाठ “यूक्लिड” और उसके “श्रेष्ठ” निगमनात्मक प्रमाणों की कहानी के माध्यम से बढ़ावा देते हैं। संयोगवश, वह कहानी चर्च के सिद्धांतों से संबंध को छिपाने का भी काम करती है।

चर्च ने ‘ एलिमेंट्स’ नामक पुस्तक को पाठ्यपुस्तक के रूप में इस्तेमाल किया, इसलिए इसके लेखक का धर्मशास्त्रीय रूप से सही होना आवश्यक था, और चर्च केवल प्रारंभिक यूनानियों को ही अपना “मित्र” मानता था। अतः, पुस्तक के लेखक को एक अज्ञात प्रारंभिक यूनानी घोषित किया गया। चर्च ने कभी किसी अश्वेत या महिला को पोप नियुक्त नहीं किया, और यदि वह ‘एलिमेंट्स’ की वास्तविक लेखिका को एक विधर्मी अश्वेत महिला के रूप में स्वीकार करता, जिसका बलात्कार कर चर्च में बेरहमी से हत्या कर दी गई थी, जैसा कि मैंने अपने प्रतिबंधित लेख में दावा किया था, तो चर्च की घोर बदनामी होती। साइंस 2.0 ने मेरे लेख का शीर्षक बदलकर “क्या यूक्लिड एक अश्वेत महिला थी?” कर दिया, लेकिन उसमें विधर्मी होने के कारण उसकी लिंचिंग का ज़िक्र नहीं जोड़ा।

चर्च ने मूल ग्रंथ ‘ एलिमेंट्स ‘ की घोर “पुनर्व्याख्या” करके उसका उपयोग किया। यह झूठा दावा किया गया कि इस ग्रंथ में विशुद्ध निगमनात्मक प्रमाण हैं, जो चर्च के उस धर्मशास्त्र के अनुरूप हैं जिसमें अनुभवजन्य तथ्यों से अलग तर्क का उपयोग किया जाता है। यह दावा, जिसे हमारे स्कूली पाठों में बार-बार दोहराया गया है, तथ्यों के घोर विपरीत है। वास्तविकता यह है कि ‘ एलिमेंट्स’ ग्रंथ में पहले प्रस्ताव से लेकर अंतिम प्रस्ताव तक एक भी ऐसा विशुद्ध निगमनात्मक प्रमाण नहीं है। विडंबना यह है कि यह स्वयं दर्शाता है कि निगमनात्मक प्रमाण कितने त्रुटिपूर्ण होते हैं—सदियों तक, अमान्य निगमनात्मक प्रमाणों को सभी पश्चिमी विद्वानों द्वारा गलत तरीके से मान्य मान लिया गया। जब 20 वीं शताब्दी की शुरुआत में इस सत्य को स्वीकार किया गया, तो पश्चिमी गौरव को उसके चरम पर होने के समय टूटने से बचाने के लिए एक त्वरित विकल्प का आविष्कार करना पड़ा।

20 वीं शताब्दी के आरंभ में पश्चिम द्वारा आविष्कृत “यूक्लिडियन” गणित का विकल्प हिल्बर्ट और रसेल का औपचारिक गणित था। रसेल का 1+1=2 का प्रमाण इतना जटिल इसलिए है क्योंकि इसमें यह सिद्ध करना संभव नहीं है कि एक सेब और एक सेब मिलकर दो सेब होते हैं। औपचारिक गणित धार्मिक सिद्धांतों का अनुकरण करता है; यह इस विश्वास पर आधारित है कि अनुभवजन्य प्रमाणों के उपयोग पर प्रतिबंध लगाने से सत्य का कोई “श्रेष्ठ” रूप प्राप्त होता है, इसलिए यह अनुभवजन्य प्रमाणों के उपयोग को प्रतिबंधित करता है।

यह धारणा सरासर बेबुनियाद है। वास्तव में, तथ्यों से अलग तर्क का इस्तेमाल किसी भी बेतुकी बात को साबित करने के लिए किया जा सकता है। इसे समझाने के लिए, मैंने अपने प्रतिबंधित लेख में सींग वाले खरगोश का उदाहरण दिया था। (1) सभी जानवरों के दो सींग होते हैं। (2) खरगोश एक जानवर है, इसलिए, (3) खरगोश के दो सींग होते हैं। बेशक, निष्कर्ष बेतुका है, और आधार वाक्य (1) भी। लेकिन हम यह केवल एक अनुभवजन्य तथ्य के रूप में जानते हैं; यदि अनुभवजन्य तथ्यों के सभी संदर्भों पर प्रतिबंध लगा दिया जाए, तो हमारे पास आधार वाक्य (1) की सत्यता या असत्यता जानने का कोई तरीका नहीं है। जैसा कि रसेल ने कहा था, औपचारिक गणित में हम “किसी भी परिकल्पना को लेते हैं जो मनोरंजक लगती है, और उसके परिणामों का अनुमान लगाते हैं”, 8 और मैं इस परिकल्पना से स्पष्ट रूप से मनोरंजक हूं कि सभी जानवरों के दो सींग होते हैं, और खरगोशों के लिए इसके अनुमानित परिणाम। यह विशुद्ध तर्क पर आधारित निष्कर्षों को दर्शाता है जिन्हें चर्च अचूक बताकर महिमामंडित करता है।

अन्य लोगों ने अनुभवजन्य प्रमाण के साथ-साथ तर्क का भी अलग-अलग तरीके से उपयोग किया। उदाहरण के लिए, भारत में दर्शनशास्त्र के सभी पारंपरिक स्कूलों ने अनुभवजन्य ( प्रत्यक्ष ) को प्रमाण के प्राथमिक साधन के रूप में स्वीकार किया। यह बात शूल्ब सूत्र ( धारा 9 ) के समय से ही पारंपरिक भारतीय गणित (सामान्य गणित) के लिए भी सत्य थी।

अब, रूढ़िवादी सोच वाले और उपनिवेशवादी मानसिकता वाले लोग अक्सर अनुभवजन्य प्रमाणों को तर्क के खंडन के साथ जोड़कर देखते हैं। लेकिन यह सच नहीं है: विज्ञान की तरह, भारतीय दर्शन की अधिकांश प्रणालियाँ और पारंपरिक भारतीय गणित, अनुभवजन्य प्रमाणों और तर्क दोनों को स्वीकार करते थे । एकमात्र अपवाद लोकायत या जन दार्शनिक थे, जिन्होंने अनुभवजन्य तथ्यों पर आधारित न होने वाले अनुमानों के प्रति आगाह किया था। भेड़िये के पंजों का उनका उदाहरण ऊपर दिए गए सींग वाले खरगोश के उदाहरण के समान है: भेड़िये के पदचिह्न देखकर, शहर के लोगों ने अनुमान लगाया कि आसपास कोई भेड़िया है। वास्तव में, ये पदचिह्न एक मनुष्य द्वारा ठोस अनुभवजन्य तथ्यों पर आधारित न होने वाले अनुमानों की मूर्खता को प्रदर्शित करने के लिए बनाए गए थे।

लेकिन यह मूर्खतापूर्ण धारणा कि अनुभवजन्य तथ्यों से बचने से सत्य का उच्चतर रूप प्राप्त होता है, आज भी हम सिखाते हैं। माध्यमिक विद्यालय की शुरुआत में ही बच्चों को औपचारिक गणित और अनुभवजन्य तथ्यों से बचने की शिक्षा इस प्रकार दी जाती है: एनसीईआरटी की कक्षा 6 की पाठ्यपुस्तक में कहा गया है कि एक ज्यामितीय बिंदु अदृश्य होता है। इसमें यह भी कहा गया है कि एक बिंदु किसी स्थान का निर्धारण करता है। हाल ही में आयोजित दो कार्यशालाओं में, मैंने कई स्कूली गणित शिक्षकों और छात्रों से पूछा कि वे कैसे जानते हैं कि एक बिंदु किस स्थान का निर्धारण करता है, जबकि बिंदु अदृश्य है। उनके पास कोई उत्तर नहीं था। लेकिन उन्होंने अपनी अज्ञानता को ईमानदारी से स्वीकार किया, उन उपनिवेशित बुद्धिजीवियों और “विशेषज्ञों” के विपरीत जो अदृश्य बिंदुओं के सिद्धांत का बचाव ठीक उसी तरह करते हैं जैसे दरबारी सम्राट के अदृश्य नए वस्त्रों का बचाव करते थे।

बहुत से लोग कहते हैं कि गणित कठिन है क्योंकि यह अमूर्त है। यह गलत है। ‘कुत्ता’ शब्द एक अमूर्त अवधारणा है, क्योंकि कुत्ते अलग-अलग आकार और आकृति के होते हैं। लेकिन बच्चों को ‘कुत्ता’ जैसी अमूर्त अवधारणा को समझने में कोई कठिनाई नहीं होती, क्योंकि वे आसानी से कुत्ते की ओर इशारा कर सकते हैं। इसी प्रकार, बच्चों को ‘बिंदु’ जैसी अमूर्त अवधारणा को समझने में कोई कठिनाई नहीं होती, हालांकि बिंदु विभिन्न आकारों, आकृतियों और रंगों में पाए जाते हैं। लेकिन एक अदृश्य बिंदु ऐसी अमूर्त अवधारणा नहीं है: क्योंकि किसी बिंदु की ओर इशारा नहीं किया जा सकता। न ही किसी अन्य घटना से अदृश्य बिंदुओं के अस्तित्व का अनुमान लगाया जा सकता है, जिस तरह से किसी बुलबुला कक्ष में इलेक्ट्रॉनों की पटरियों से या धुएं से आग का अनुमान लगाया जा सकता है। आज स्कूलों में जिस प्रकार से ज्यामितीय बिंदु पढ़ाया जाता है, वह विशुद्ध रूप से तत्वमीमांसा है; इसका कोई वास्तविक अस्तित्व नहीं है। लोग दुर्भाग्यवश अवास्तविक चीजों के बारे में चर्च की तत्वमीमांसा को अमूर्त अवधारणा के साथ मिला देते हैं।

इसके अलावा, एनसीईआरटी की छठी कक्षा की पाठ्यपुस्तक में रेखा को अदृश्य बताया गया है । इसलिए मैंने शिक्षकों और छात्रों से पूछा कि वे इस अभिधारणा को कैसे सिद्ध कर सकते हैं कि किन्हीं दो बिंदुओं से ठीक एक सीधी रेखा गुजरती है। उनके पास फिर से कोई उत्तर नहीं था। मैंने उन्हें यह भी दिखाया कि किन्हीं दो वास्तविक बिंदुओं को कई सीधी दिखने वाली रेखाओं से जोड़ा जा सकता है, इसलिए यह अभिधारणा अनुभव पर आधारित नहीं है, बल्कि पूरी तरह से पश्चिमी मान्यता पर आधारित है।

चर्च की वह रणनीति जिसमें छात्रों को काल्पनिक विषयों के बारे में पढ़ाया जाता है, उन्हें सामान्य ज्ञान त्यागने और पश्चिमी सिद्धांतों पर निर्भर रहने के लिए मजबूर करती है। अंततः, औपनिवेशिक शिक्षा द्वारा 1+1=2 के सिद्धांत का एकमात्र “कारण” यही दिया जाता है कि पियानो जैसे किसी पश्चिमी विद्वान ने इसे मान्यता दी थी! जो लोग इस शिक्षा का विरोध करते हैं और स्वयं समझने का प्रयास करते हैं, वे ही गणित को कठिन पाते हैं और उसे छोड़ देते हैं।

लेकिन पाठ यहीं पर रुकता नहीं है। अदृश्य बिंदुओं के इस बेतुके सिद्धांत को तीन साल तक बच्चे के दिमाग में बिठाने के बाद, एनसीईआरटी की कक्षा 9 की पाठ्यपुस्तक एक और बेतुकी बात जोड़ देती है। इसमें कहा गया है कि बिंदु को दूसरे शब्दों में भी परिभाषित नहीं किया जा सकता। (यही बात रेखा और समतल पर भी लागू होती है।) इसे इस प्रकार समझाया गया है: यदि कोई कहता है कि “बिंदु वह है जिसका कोई भाग नहीं होता”, तो उसे “भाग” को परिभाषित करना होगा, और इसी तरह यह सिलसिला चलता रहेगा।

कुत्ते या बिंदु के मामले में ऐसी अनंत प्रतिगमन प्रक्रिया उत्पन्न नहीं होती, क्योंकि बिंदुओं के कई उदाहरणों को इंगित करके प्रतिगमन प्रक्रिया को समाप्त किया जा सकता है। अनंत प्रतिगमन का कारण अनुभवजन्य तथ्यों से बचने के चर्च के सिद्धांत का प्रचार करने की इच्छा है। यह उद्देश्य छिपा हुआ है और एनसीईआरटी की पाठ्यपुस्तक में इसे कभी स्पष्ट नहीं किया गया है। यहां तक कि चर्च के सिद्धांत से सीधा संबंध भी “यूक्लिड” की झूठी कहानियों से अस्पष्ट कर दिया गया है।

यूक्लिड और अनुभवजन्य तथ्यों के बहिष्कार का मामला अपेक्षाकृत सरल है। लेकिन यदि उपनिवेशित दिमाग दो शताब्दियों में भी इन सरल युक्तियों को नहीं समझ पाए हैं, तो वे इसमें निहित अधिक जटिल युक्तियों को कभी नहीं समझ पाएंगे। चर्च ने “शिक्षा” के माध्यम से उन्हें हमेशा के लिए मूर्ख बना दिया होगा। इस प्रकार, एक बार जब छात्रों को गणित को विशुद्ध तत्वमीमांसा के रूप में देखने के लिए अभ्यस्त कर दिया जाता है, तो अनंतता की तत्वमीमांसा हर स्तर पर उभर आती है: एक रेखा में अनंत बिंदु, एक समतल में अनंत रेखाएँ इत्यादि। मैं दोहराता हूँ कि इस अनंतता की तत्वमीमांसा का कोई व्यावहारिक मूल्य नहीं है: एक कंप्यूटर अनंतता की किसी भी तत्वमीमांसा को नहीं संभाल सकता, लेकिन गणित के अधिकांश व्यावहारिक अनुप्रयोग, जैसे मंगल ग्रह पर रॉकेट भेजना, कंप्यूटर का उपयोग करके ही पूरे किए जाते हैं।

अनंत की एक अनूठी अवधारणा को मानना एक आम गलती है, लेकिन मैं यहाँ इस बात की विस्तृत व्याख्या नहीं करूँगा कि गणित (विशेषकर कैलकुलस) में अनंत की एक विशेष तत्वमीमांसा हमें शाश्वतता के चर्च सिद्धांतों को विज्ञान के भाग के रूप में स्वीकार करने के लिए कैसे विवश करती है। 10 इस प्रकार, यूरोपीय लोगों द्वारा भारतीय कैलकुलस में जोड़ी गई तत्वमीमांसा भौतिकी में समय को एक रेखा के समान बना देती है, जैसा कि मूल (निकेन काल के बाद के) चर्च सिद्धांत द्वारा प्रतिपादित किया गया है। यही वह जादू है जिसके द्वारा गणित में तत्वमीमांसा वैज्ञानिक “सत्य” का निर्धारण करती है। गणित से अनभिज्ञ लोगों को इसे समझाना कठिन है जो यह सोचकर भ्रमित हो जाते हैं कि “प्रकृति के नियमों” में विश्वास विज्ञान से संबंधित है, हालाँकि यह स्पष्ट रूप से एक चर्च सिद्धांत है जिसे एक्विनास ने सुम्मा थियोलॉजिका में प्रतिपादित किया है ।

हमें गणित पढ़ाने के तरीके में बदलाव लाना चाहिए और सामान्य गणित को केवल उसके व्यावहारिक महत्व के लिए पढ़ाना चाहिए। निश्चित रूप से हमें इसे स्कूली स्तर पर लागू करना चाहिए, ताकि लाखों छात्र जो पढ़ाई बीच में ही छोड़ देते हैं, उन्हें लाभ हो सके। उन्हें अदृश्य बिंदुओं और रेखाओं के सिद्धांत के बारे में जानने की कोई आवश्यकता नहीं है। औपनिवेशिक शिक्षा का उद्देश्य लोगों को पश्चिमी सत्ता के अधीन रहना सिखाना था, लेकिन मैं एक ऐसी नई पीढ़ी का सपना देखता हूँ जो उन बेड़ियों से मुक्त हो जो हमारे कई “शिक्षाविदों” के औपनिवेशिक मानसिकता को जकड़ कर रखती हैं।

लेकिन त्रासदी यह है कि व्यवस्था को बदला नहीं जा सकता। छात्र इसे बदल नहीं सकते। पाठ गलत होने पर भी, उन्हें असफल होने के डर से इसे सुनाने के लिए विवश किया जाता है। शिक्षक इसे बदल नहीं सकते, उन्हें पाठ से ही पढ़ाना पड़ता है अन्यथा उनकी नौकरी जाने का खतरा रहता है। सरकार—मंत्री और नौकरशाह—इसे बदलने का जोखिम नहीं उठाएंगे क्योंकि वे अज्ञानी हैं और कुछ गलत होने पर उपहास और सत्ता खोने से डरते हैं। “विशेषज्ञों” का इसमें स्वार्थ निहित है, इसलिए वे इसे नहीं बदलेंगे। वे सार्वजनिक रूप से इस विषय पर चर्चा करने से भी इनकार करते हैं।

गणित में मिथकों और रूढ़ियों को संरक्षित रखने के लिए सुरक्षा की एक अतिरिक्त परत मौजूद है। चर्च द्वारा अपनाई गई यह सेंसरशिप प्रणाली उन उपनिवेशित मानसिकता वाले लोगों (बुद्धिजीवियों, पत्रकारों आदि) के लिए स्वाभाविक है, जिन्हें व्यवस्था द्वारा ही विचारधारा से प्रभावित किया गया है। ठोस आलोचना के एक अंश का भी सामना करने में असमर्थ, वे इसका दुरुपयोग, उपहास, अस्वीकृति और सेंसरशिप करते हैं। यह सेंसरशिप वफादार पहरेदारों द्वारा की जाती है जो गणित के दर्शन और चर्च के धर्मशास्त्र दोनों से अनभिज्ञ हैं। अंधों के इस देश में, दो आँखों वाला व्यक्ति भी अंधा हो जाता है क्योंकि औपनिवेशिक रूप से शिक्षित बुद्धिजीवियों को ज्योतिष से कहीं अधिक खतरनाक कई सूक्ष्म अंधविश्वास सिखाए गए हैं।

चर्च इसी तरह जनमानस के व्यवहार को नियंत्रित करता है—सामूहिक अंधविश्वासों के माध्यम से—जिन्हें उसने गणित और विज्ञान में गुप्त रूप से शामिल कर लिया है ताकि वे अंधविश्वास विश्वसनीय बन सकें। सेंसरशिप इस रणनीति का समर्थन करती है। एकमात्र आशा यही है कि आज सोवेटो की झुग्गी-झोपड़ियों में रहने वाले लोग वह बात समझते हैं जो अन्य जगहों के उपनिवेशित बुद्धिजीवी नहीं समझते, कि औपनिवेशिक शिक्षा गणित और विज्ञान के अंश।

साभार- https://kafila.online/ से

ब्राह्मणों ने अपनी पहचान जाति से नहीं गौत्र से रखी है

ब्राह्मणों को जातिवाद के लपेटे में जबरन लिया जाता है। यदि जाति ब्राह्मण को पसंद होती तो स्वयं ब्राह्मणों के भीतर ही वैसी ही जातियाँ नहीं होतीं जैसी आरक्षितों में मिलती हैं?

ब्राह्मण जाति से नहीं गोत्र से चला। जाति और गोत्र में फर्क है। जाति सामाजिक ( social) है, गोत्र पैतृक( patrilineal)। भारद्वाज, कश्यप, अत्रि, विश्वामित्र, वशिष्ठ , गौतम, जमदग्नि सबके गोत्र हैं। गोत्र व्यवस्था सगोत्र विवाह का निषेध करती थी। जाति व्यवस्था अपनी जाति में विवाह को प्रोत्साहित करती है।

ब्राह्मणों की श्रेणियाँ अवश्य हैं। पर वे स्थानिकता के आधार पर हैं। कोंकणस्थ हैं, देशस्थ हैं, कान्यकुब्ज हैं, सरयूपारीण हैं, गौड़ हैं, कश्मीरी हैं, सारस्वत हैं, मैथिल हैं, उत्कल हैं, द्रविड़ हैं। जाति जैसी चीज उनके यहाँ नहीं है। ये सब एक ही वर्ण — ब्राह्मण — के अलग-अलग भौगोलिक समूह हैं। पर इनमें से कोई भी एक दूसरे की जाति नहीं है। मतलब, कोंकणस्थ और कान्यकुब्ज के बीच वह दीवार नहीं है जो दो अलग जातियों के बीच होती है। ये स्थानिक भेद हैं, जैसे कि एक देश में अलग-अलग क्षेत्रों के लोग होते हैं।और सबसे ज़रूरी बात — इनमें से कोई भी दूसरे को “नीचा” नहीं मानता। जाति व्यवस्था में ऊँचा-नीचा होता है। पर ब्राह्मणों के इन स्थानिक समूहों में वह पदानुक्रम (hierarchy) नहीं है जो जाति व्यवस्था बनाती है। वहाँ फर्क था भी तो वेद पाठ के आधार पर था। द्विवेदी थे, त्रिवेदी थे, चतुर्वेदी थे। दो तीन चार – जितने वेद पढ़े हों। फर्क का आधार ज्ञान था।

यह समझिये कि तब ‘ब्राह्मणों’ की बात करनी कुछ लोगों की मजबूरी क्यों हो जाती है।इसलिए कि ब्राह्मण एक जाति है ही नहीं, वह वर्ण है।

यानी ब्राह्मण इस बात के सर्वश्रेष्ठ उदाहरण हैं कि practice before you preach.
तब आरक्षित और अनुसूचित जातियां भी वैसी ही जातिमुक्तता क़ायम करें जैसी ब्राह्मण वर्ण ने करके दिखाई। खुद जाति के मोह में रहें, टोह में रहें और दूसरों पर दोषारोपण करते रहें- यह हमारा पाखंड है। पहले हम स्वयं खंड खंड में बँटे न रहें, फिर आगे बढ़ें।

कम ऑन, फ्रेंड्स लेट्’स डू इट। चैरिटी बिगिन्स एट होम।

साभार- https://www.facebook.com/share/1HYQK5EoCH/ से
(लेखक मध्य प्रदेश के चुनाव आयुक्त हैं और सेवानिवृ्त्त आईएएस अधिकारी हैं)

राजा दर्शन सिंह की शौर्य गाथा

अयोध्या के शाकद्वीपीय राजाओं ने कई स्थानों में भी अपना राज्य स्थापित कर लिये थे ।लगभग दो-ढाई सौ साल पहले तत्कालीन मुगल और नवाबी शासन प्रशासन की अनुमति से यह शाकद्वीपीय ब्राह्मण पाठक और मिश्र परिवार अपना विशिष्ट स्थान बना लिए थे । इस वंश के ज्ञात राजा के पूर्वज पिता पुत्र सदासुख पाठक और गोपाल राम पाठक का विवरण कम ही मिलता है। इनके अगले उत्तराधिकारी पुरन्दरराम पाठक से वंश का बिस्तार ही वर्तमान समय में अनेक रूप में दिखाई दे रहा है।

अयोध्या के पलिया में हुआ था इनका पहला पड़ाव :- गोपाल राम पाठक ने अपने बेटे पुरन्दरराम पाठक का विवाह अयोध्या जिले के पलिया गाँव के गङ्गाराम मिश्र की बेटी के साथ किया था और पलिया में आकर बस गये थे। इस समय तक ये कोई विशिष्ट जन ना होकर आमजन के रूप में जाने जाते रहे हैं । पलिया के पहुना पुरन्दर राम पाठक के पांच संताने हुई थीं । जिनका नाम 1.ओरी उर्फ बख्तावर सिंह, 2.शिवदीन सिंह, 3 .दर्शन सिंह, 4.इच्छा सिंह और 5.देवी प्रसाद सिंह है। इनमें से तीन ओरी सिंह दर्शन सिंह और इच्छा सिंह ने अपने पुरुषार्थ और हुक़्मरानों के हुकुम से अवध अंचल के विभिन्न क्षेत्रों के राजा बन अपने अपने राज्य का विस्तार कर लिए थे। शेष दो शिव दीन और देवी प्रसाद के बारे में कोई उल्लेख नहीं मिलता है। प्रतीत होता है कि ये किसी देवी करणों या अपने विस्तारवादी भाइयों की उपेक्षा का शिकार हो अपना अस्तित्व संभाल ना सके होंगे और इतिहास के पन्ने से सदा सदा के लिए गायब हो गए होंगे।

1798 ई.मे अयोध्या के शाकवंशीय राजवंश का उदय ओरी पाठक प्रथम शासक :-

अवध के नवाब शुजाउद्दौला के बेटे आसिफुद्दौला ने 1775 ई. में अपनी राजधानी वापस लखनऊ स्थानांतरित कर लिया था ।इसके बाद सआदत अली खां द्वितीय 1798 ई.में में नवाब हुआ। इन्हीं के शासनकाल में अयोध्या में शाक द्वीपीय ब्राह्मण राज वंश का उदय हुआ था। ओरी पाठक उर्फ राजा बख़तावर सिंह का समय 1780-1846 ई के आसपास का रहा। उन्होंने लगभग 1795 के आसपास 14 वर्ष की अवस्था में ईस्ट इंडिया कंपनी की सेना में प्रवेश किया था । फिर ईस्ट इंडिया कंपनी से सेवामुक्त कराकर नव्वाब साहब ने पहले ओरी को 8 सवारों का दफादार बनाकर अपनी अर्दली बनाया फिर नबाब की जान की सुरक्षा के परितोष में उन्हे पलिया की जागीर और सौ सवारों का अफसर बनाया। फिर अश्व सेनापति (रिसालेदार), फिर 1821 ई में राजा की उपाधि और बख्तावर सिंह टाइटिल दिया । उनकी खैरख्वाही के कारण दरबार में उनकी प्रतिष्ठा और उनका अधिकार बढ़ता गया और अपने अन्य भाइयों को भी शासन- प्रशासन में उचित प्रतिनिधित्व दिलवाया।इनकी मृत्यु 1846 ई में हुई थी।

इच्छासिंह :-

राजा दर्शनसिंह के भाई इच्छासिंह भी सुल्तानपूर, गोंडा और बहराइच के नाजिम= प्रबंधकर्ता ( सैन्य राज्यपाल)रहे। सरकारी

कोष का धन हडपने के जुर्म में उन्हें भी एक ही वर्ष निजामत नसीब रही। 1841 में वे हटा दिए गए थे।

मेहदौना की जागीर

राजा बख्तावर सिंह को जागीर पाने का सम्मान 1837 से 1842 के बीच प्राप्त हुआ था। जब बादशाह नसीरउद्दीन हैदर का देहान्त जुलाई 1837 में हुआ और मेजर लो रेजिडेण्ट मुहम्मद अली शाह 1837 से 1842 को तख्त पर बैठाने के लिये अपने साथ दरे-दौलत पर लाये, उस समय बादशाह बेगम और मुन्नाजान एक हज़ार हथियारबन्द सिपाहियों को लेकर महल में घुस आये। मुन्नाजान ने कहा कि सलतनत हमारी है। तख्त पर बैठ कर यह हुक्म दिया कि मुहम्मद अली शाह उसका बेटा अजमदअली शाह और उसके पोते वाजिदअली का बध कर दिया जाय। राजा बख़तावर सिंह ने बड़ी बुद्धिमानी से मुहम्मदअली शाह के परिवार को छिपाया था। इतने में मड़िआवँ की छावनी लखनऊ से सेना आ गई थी । मुन्नाजान और बादशाह बेगम पकड़ लिये गये और मुहम्मद अली शाह तख्त पर बैठाये गये। मुहम्मदअली शाह ने बड़ी कृतज्ञता प्रकट की और नानकार, गाँव माफ़ी और जागीर देकर उन्हें मेहदौना के राजा की पदवी दी। इसी समय बख़तावर सिंह को वह तलवार दी गई जिसे कि ईरान के बादशाह नादिरशाह ने दिल्ली के बादशाह मुहम्मदअली शाह को उपहार में दिया था और मुहम्मदशाह से नव्वाब सफ़दरजंग ने पाया था।

दोनों भाइयों ने 1500 गांवों की जमींदारी खरीदी :-

राजा बख्तावर सिंह ने राजा दर्शन सिंह दोनों भाई जब ऊंचे ऊंचे पद हासिल कर लिए तब उनकी इच्छा हुई कि अब जमींदारी बढ़ानी चाहिए। दोनों ने 1500 गांव मोल लेकर महादौना की जमींदारी विस्तारित कर इस क्षेत्र को ऐतिहासिक रूप से महत्वपूर्ण बना लिया। उन्होंने इस दौरान अपने कुशल प्रबंधन से प्रजा को खुश रखा था।

मेहदौना खास एक रियासत बनी :-
यह अयोध्या जिले में एक गाँव रहा है, जो ऐतिहासिक रूप से अवध के नवाबों और अयोध्या के शाकद्वीपी राजाओं से जुड़ा है, जहाँ राजा बख्तावर सिंह और राजा दर्शनसिंह जैसे शासकों ने इलाका खरीदा और बाद में महाराजा मानसिंह जैसे प्रमुख हस्तियां इस क्षेत्र से जुड़ी रहीं, जो फैजाबाद के इतिहास और अयोध्या राजपरिवार के संदर्भ को दर्शाते हैं।

यह फैजाबाद जिले के मिल्कीपुर ब्लॉक का एक छोटा सा गांव है। यह मेहदौना खास पंचायत में आते हैं। यह जिला मुख्यालय से 17 किमी दक्षिण और मिल्कीपुर से 16 किमी की दूरी अवस्थित है । वर्तमान समय में यह दो राजस्व गांव के रूप में जानी जाती है।

मेहदौना खास रियासत मेहदौना एक गांव भी है। यह बारुण बाजार, अयोध्या के पास एक स्थानीय बाजार है, मेहदौना मिल्कीपुर ब्लॉक के बारुन बाजार शाहगंज मार्ग पर स्थित है। यह क्षेत्र स्थानीय जन जीवन ,व्यापार, इतिहास और सांस्कृति का महत्वपूर्ण केन्द्र है।

मेहदौना बारुन बाजार, अयोध्या के पास एक स्थानीय बाजार या क्षेत्र है, यह बारुण बाजार शाहगंज मार्ग पर मिल्कीपुर ब्लॉक में पड़ता है। जो अयोध्या के विकास के साथ फैजाबाद के पुराने नाम से जुड़ा है; यह क्षेत्र स्थानीय जनजीवन और व्यापार का केंद्र है, जो ऐतिहासिक और सांस्कृतिक रूप से महत्वपूर्ण अयोध्या के निकट है।

शाहगंज में राजवंश की आवासीय हवेली बनी :-

शाहगंज में बनवाई गई हवेली राजा की शानो- शौकत और प्रशासनिक शक्ति का प्रतीक बनी। समय के साथ यह खंडहर में बदल गई, पर लोगों के मन में राजा की धरोहर आज भी जीवित है। हवेली की दीवारों पर उकेरे गए नक्काशी और चित्र, राजा के गौरव और वीरता की गवाही देते हैं। राजा दर्शनसिंह ने मेहदौना के अंतर्गत शाहगंज में सुदृढ़ कोट, बाजार और महल बनवाये हैं। यह खजुराहट रेलवे स्टेशन के पास स्थित है। शाहगंज मुकीमपुर उर्फ पहाड़ पर ग्राम पंचायत में आता है। यह जिला मुख्यालय से 30 किमी दक्षिण स्थित है।

हिंदू राजाओं के रियासत में अयोध्या के राजा मानसिंह की रियासत शाहगंज का इतिहास के पन्नों में अपनी एक खास जगह और पहचान रही है। अयोध्या के बारुन बाजार के पास शाहगंज में ‘राजा की हवेली’ एक प्रसिद्ध ऐतिहासिक स्थल है, जो कभी अयोध्या के राजाओं के वंशजों का निवास स्थान होता रहा। इस रियासत को शाहगंज के नाम से जाना जाता है । शाहगंज में पहले पलिया और बाद में महादौना के राजाओं द्वारा 70 बीघे में विशाल हवेली बनवाई थी जो अब जीर्ण – शीर्ण अवस्था में हो गया है। यहां इस बंश परम्परा से जुड़े लाल अम्बिका प्रताप सिंह और कई अन्य शाही परिवार आज भी अपनी परम्परा का प्रतिनिधित्व कर रहे हैं। ये मूलतः पाठक लोगों का गांव है। जबकि अयोध्या घराने में आरा से आए मिश्र परिवार इस वंश परम्परा की यश वृद्धि कर रहे हैं।

दर्शन सिंह सुल्तानपुर और बहराइच के क्षेत्र का प्रमुख बने :-
ओरी पाठक के छोटे भाई दरसन सिंह समय लगभग (1800-1844 के दशक) में था ।अपनी कुशल प्रशासनिक क्षमता और रसूख के बल पर राजा बख्तियार सिंह ने कुछ दिनों बाद अपने भाई दर्शन सिंह को भी अवध दरबार में प्रवेश दिलवाया। उन्हे सुल्तानपुर और बहराइच के क्षेत्र का प्रमुख नियुक्त किया गया और उन्हें “बहादुर ” के नाम से जाना जाने लगा। वे गोण्डा क्षेत्र के अधिकारी भी बन गए और राजा (राजा) की उपाधि प्राप्त कर ली । 1825 में वे बाराबंकी के नाज़िम भी रहे। उन्होंने अपने इलाके का बहुत अच्छा प्रबन्ध किया था उन्हें राजा की पदवी भी मिल गई थी।

शिवदीन डाकू का दमन :-
उन्हीं दिनों शिवदीन एक बड़ा डाकू था। वादशाह की आज्ञा से दर्शन सिंह ने उसका दमन किया गया और राजा को बहादुर का पद मिला। इसी तरह दोनों भाइयों की बादशाह नसीरुद्दीन के समय में उन्नति होती रही। उनकी वीरता, उनका दान, उनका न्याय और राज- विद्रोहियों (सर्कशों) का दमन संसार में प्रसिद्ध हुआ। इस अन्तिम काम के लिये उनको बादशाही से “सरकोबे सरकशां सलतनत बहादुर ” की उपाधि मिली थी।

वैसवाड़े के नाज़िम :-
राजा दर्शनसिंह की वीरता बखान में इतिहास का यह अंश बहुत बढ़ गया। वे 5 वर्ष तक वैसवाड़े के नाज़िम रहे । वैसवाड़े के तालुकदार क्या बड़े क्या छोटे सरकारी जमा देना जानते ही न थे। उनका बल बहुत बढ़ा हुआ था और उनकी गढ़ियों पर तोपें चढ़ी रहती थीं।दर्शन सिंह ने कुछ बड़े-बड़े ताल्लुकेदारों के नाम परवाने जारी किये जिनमें यह लिखा था कि अपनी भलाई चाहते हो तो तुरन्त उपस्थित होकर सरकारी जमा दाखिल करो। ताल्लुकदारों ने परवाने पाकर युद्ध करने का निश्चय कर दिया। राजा दर्शनसिंह ने जब पहिले धावा मारकर मुरारमऊ की गढ़ी तोड़ी तो गढ़ी के रक्षक एक पगडण्डी के रास्ते निकल भागे। इस गढ़ी के टूटने से और ताल्लुकदारों के छक्के छूट गये। सब दर्शन सिंह के नियंत्रण में आ गया। पांच वर्षों तक वैसवाड़े के नाज़िम रहते हुए, राजा दर्शन सिंह ने अपने साहस और प्रशासनिक कुशलता का लोहा मनवाया।

बलरामपूर को नियंत्रित किया:-
वैसवाड़े की सफलता मिलने के बाद एक दिन राजा ने अपने सेनापतियों से कहा, “बलरामपुर की गढ़ियों पर हमला की योजना बनाओ। हमें यह साबित करना होगा कि अयोध्या की शक्ति केवल नाम की नहीं, बल्कि वास्तविक है।” सेनापति ने डरते हुए उत्तर दिया, “साहब, वहां तीन हजार सिपाही हैं। यदि वे हमें घेर लें, तो…।”

राजा ने गंभीरता से देखा और कहा, “डर और संदेह की कोई जगह नहीं है। वीरता और बुद्धिमत्ता से हर मुश्किल का समाधान है। हमारे पास धर्म और न्याय का आशीर्वाद है।”

बलरामपुर की गढ़ी पर चढ़ाई के समय, राजा ने अपनी सेना को दिशा दी, एक-एक सिपाही की तरकीब और चालाकी से गढ़ी पर कब्ज़ा कर लिया। प्रतिद्वंदी भाग खड़े हुए या प्रशासनिक शक्ति से वश में कर लिए गए।

बलरामपुर के ताल्लुकेदार राजा दिग्विजय सिंह जी सरकारी जमा नहीं देते थे। राजा दर्शनसिंह ने सेना समेत बलरामपुर की गढ़ी पर चढ़ाई कर दी। वहां के राजा गोरखपूर को भाग गये । जो दूसरे साल नेपाल की तराई होकर अपने देश को लौटना चाहते थे कि राजा दर्शनसिंह ने समाचार पाकर एक लम्बी दौड़ लगाई और राजा के डेरे पर धावा मार दिया। राजा अपना प्राण बचा कर भागे। उस दिन आने जाने में 45 कोस की दौड़ हुई। नैपाल के हाकिम गोसाई जयकृष्ण पुरी ने सीमा पार करके नेपाल राज में प्रवेश करने के लिये दर्शनसिंह की शिकायत नैपाल- दरबार मे की। नैपाल के रेज़िडेण्ट ने लखनऊ के रेजीडेण्ट को दर्शन सिंह के इस कृत्य की शिकायत लिख भेजी। बादशाही दरबार से जवाब लिया गया और यह निर्णय हुआ कि लूट पाट में नेपाल की प्रजा की जो हानि हुई है वह राजा दर्शन सिंह से दिलवा दिया जाय। राजा साहब ने हानि का रुपया 1453/-तुरन्त अदा कर दिया और फिर अपने काम पर बहाल हो गये। बादशाह अमजद अली शाह के अली शाह (शासन : 1842-1847) अवध के पांचवें नवाब थे, जब तक नव्वाब मुनव्वरउद्दौला वज़ीर रहे सारी सलतनत का प्रबन्ध राजा दर्शनसिंह को सौंपा गया था।इस प्रकार 1842 में दर्शन सिंह बहुत प्रभाव शाली राजा हो गए थे। राजा साहब ने यहाँ तक इकरार नामा लिख दिया कि सरकारी जमा में जो कुछ बाक़ी रहेगा उसे हम दे देंगे।

अयोध्या-राज प्रासाद 1842 में :-
इसी समय में उनको कचहरी करने के लिये अयोध्या धाम का लालबाग़ क्षेत्र दे दिया गया जहाँ अयोध्या-राज का प्रासाद लगभग 20 एकड़ बिस्तार में अब तक विद्यमान है। इसी समय बीमार होकर वे अयोध्या चले आये और श्रावण सुदी सत्तमी को अयोध्यावास लिया था। धर्म नगरी अयोध्या में राजा दर्शन सिंह का आलिशान महल आज भी है। राजा बहादुर दर्शन सिंह का इंतकाल 1844 में हो गया।

1846 में बख्तावर सिंह का भी इंतकाल हो गया और सत्ता मानसिंह के हाथ में आ गई थी।

दर्शन सिंह के कुछ प्रमुख कार्य:-
उन्होंने हवेलियों, कुओं और सार्वजनिक बागानों घाटों और कुछ प्रमुख मन्दिरों का निर्माण और जीर्णोद्धार भी करवाया था।

दर्शनेश्वर नाथ महादेव का शिवाला:-
धर्म नगरी अयोध्या में राजा दर्शन सिंह का आलिशान महल आज भी है। श्री दर्शनेश्वर नाथ महादेव राजसदन अयोध्या में शिवाला मन्दिर का निर्माण कराया। मंदिर की भव्य मीनारें, नक्काशीदार दरवाजे, और शिलालेख राजा की दूरदर्शिता और धर्मपरायण दृष्टि के प्रतीक बने।

दर्शन नगर बाजार और चार प्रवेश द्वार वाला प्राचीर का निर्माण:-

दर्शन नगर बाजार में अयोध्या के राजा दर्शन सिंह ने चारों दिशाओं में लखौरी ईंटों द्वारा निर्मित चार गेट व किलानुमा बाउंड्रीवॉल बनवाई थी। राजा दर्शन सिंह के नाम पर ही इस बाजार का नाम दर्शन नगर पड़ा था।

दर्शननगर सूर्य कुंड व मंदिर का निर्माण:-दर्शननगर बाजार के पास राजा दर्शन सिंह का बनाया हुआ सूर्य भगवान का सुन्दर सरोवर और मंदिर दर्शनीय है। वर्तमान काल में अयोध्या के प्राचीन सूर्य कुंड मंदिर स्थान पर मेले की ब्यवस्था की देख भाल राजा दर्शन सिंह के बंशजों के द्वारा किया जाता है।

जबकि सूर्य मंदिर तथा सूर्य कुंड के रख रखाव की जिम्मेवारी अयोध्या के हनुमान गढ़ी के प्रबंधन के पास है। राज्य सरकार ने इसे भव्यता प्रदान कर रखी है।

सरयू नदी के तट पर चारों ओर सीमेंट घाट और नागेश्वर नाथ मन्दिर का जीर्णोद्धार

राजा दर्शन सिंह ने सरयू के तट वर्तमान में राम की पैड़ी वाले जगह पर के पुराने घाटों का निर्माण कराया था। नागेश्वर नाथ मंदिर का भी जीर्णोद्धार कराया था। इसके अलावा अपने क्षेत्र में अनेक प्राचीन मंदिरों तालाबों सरायों का निर्माण करा कर लोक उपकार के लिए अच्छा प्रयास किया था।

 

लेखक परिचय:-

(लेखक भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण, में सहायक पुस्तकालय एवं सूचनाधिकारी पद से सेवामुक्त हुए हैं। वर्तमान समय में उत्तर प्रदेश के बस्ती नगर में निवास करते हुए सम सामयिक विषयों,साहित्य, इतिहास, पुरातत्व, संस्कृति और अध्यात्म पर अपना विचार व्यक्त करते रहते हैं। वॉट्सप नं.+919412300183)

काव्य गोष्ठी में बही देशभक्ति की धारा

ओ सरहद के प्रहरी ओ खेतों के राजा,
अब भूल न जाना तुम, ये वतन तुम्हीं से है

कोटा। कोटा में शनिवार को श्री करनी नगर विकास समिति कर आश्रय भवन में शनिवार को मासिक काव्य गोष्ठी में देश भक्ति की धारा में श्रोताओं में गोते लगाए। गोष्ठी गणतंत्र दिवस और शहीद दिवस को समर्पित रही। मुख्य अतिथि भगवती प्रसाद गौतम ने ” ओ सरहद के प्रहरी ओ खेतों के राजा,अब भूल न जाना तुम, ये वतन तुम्हीं से है कविता से माहौल को देशभक्ति पूर्ण बना दिया।

संचालन करते हुए रामेश्वर शर्मा रामू भैया ने अपने काव्य पाठ मौन है गांधी में ” चल रही हैं आंधियां बेचैन गांधी मौन है, पूछता भी तो नहीं इसकी तह में कौन है, किसको फुर्सत है जो देखे, देश की बिगड़ी फिजा,सबके सर पर हावी, तेल लकड़ी नोन है” प्रस्तुत कर गांधी को याद किया।

महेश पंचोली की देशभक्ति के भावों से भरी राजस्थानी कविता “नमन करुं छूंँ वांनै जांनै आजादी दिलाई छै, आजादी के खातर जांने अपनी जान गवांई छै,छोड्या छै परिवार जांनै छोड्या बाप अर माई छै,देश के खातर जांनै भाया हँस कै फांसी खाई छै, झुक्या कोईने दुसमण सूं वांनै पाछी धूल चटाई छै, नमन करुं छूंँ वांनै जांनै आजादी दिलाई छै” पर श्रोता झूम उठे।

नंद किशोर ने शहीदों का बसंत कविता “रहती है दिल में भारत माँ सांसों में गंगा बहती है,जिनके स्वर में गर्जन होती सीने में ज्वाला होती है” से मन मोह लिया।

विष्णु शर्मा हरिहर ने सरस्वती वंदना के साथ “आज दिखता हूं झांकी अपने देश महान की” एवं “देश की खातिर मारने वाले जांबाजों को नमन करें,भारत माँ को नमन करें”
से सभी का दिल जीत लिया।

श्रीमती ओम राणावत की कविता” सीमा पर खड़े रह कर अपना घर नहीं देखा, माँ की ममता याद आई तो आसमान ताक दिया,,बहन की राखी याद आई तो फ़र्ज़ में बांध दिया” पर खूब दाद मिली।

विशिष्ठ अतिथि डॉ. प्रभात कुमार सिंघल में मखान लाल चतुर्वेदी की रचना पुष्प की अभिलाषा और हवामहल पर स्वरचित कविता सुनाई। संस्था प्रभारी प्रवीण भंडारी ने अपनी कविता प्रस्तुत कर कहा कि प्रयास हो इस गोष्ठी के माध्यम से अधिक से अधिक साहित्यकारों को अवसर मिले और स्वरचित काव्य पाठ हो। कुसुम लता जैन, दिनेश गुप्ता, तुलसीराम, आर. बी. गुप्ता, निरंजन महबूबानी एवं मोहन कोटवानी ने भी काव्यपाठ किया। गोष्ठी की अध्यक्षता चन्द्र सिंह ने की।