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रेल्वे की आमदनी बढ़ाएंगे, खर्च कम करेंगे

रेल मंत्री सुरेश प्रभु ने कहा है कि रेलवे को पटरी पर लाने के लिए न सिर्फ यात्री और मालभाड़े से होने वाली आमदनी को बढ़ाया जाएगा, बल्कि खर्च भी कम किए जाएंगे। उन्होंने राज्यों से भी कहा कि वह रेल परियोजनाओं पर तेजी से अमल में रेलवे का साथ दें। लोकसभा में रेलवे की अनुदान मांगों पर हुई चर्चा का जवाब देते हुए रेलमंत्री ने सदस्यों को आश्वासन दिया कि रेल बजट में किए सभी वादों को पूरा किया जाएगा। 

उन्होंने कहा कि रेलवे ने 5 साल का प्लान बनाया है। इसके तहत रेलवे अपने खर्चों में भी कटौती करेगा। उन्होंने रेल बजट को कॉमन मैन का बजट बताते हुए कहा कि बजट में घोषणाओं पर अमल के लिए मंगलवार को ही ई-समीक्षा सिस्टम लांच किया गया है, जिसके तहत घोषणाओं पर अमल की निगरानी की जाएगी। चर्चा के बाद लोकसभा ने 2015-16 की रेल अनुदान मांगों को अपनी मंजूरी दे दी। रेल के मामले में चीन से तुलना पर जवाब देते हुए रेलमंत्री ने कहा कि चीन में रेलवे में भारत से 7 गुणा ज्यादा निवेश है। उन्होंने सांसदों से भी अपील की कि रेल परियोजनाओं के लिए वह सांसद निधि राशि रेलवे में भी खर्च करें। 

कौन हैं जो मोदी को विफल करना चाहते हैं?

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क्या सच में नरेंद्र मोदी और उनकी सरकार का जादू टूट रहा है? अगर टूट रहा है तो वो कौन है जिसका जादू सिर चढ़कर बोल रहा है? वे कौन लोग हैं जो पूर्ण बहुमत से सत्ता में आई देश की पहली राष्ट्रवादी सरकार को मार्ग से भटकाना चाहते हैं? जाहिर तौर पर सवाल कई हैं पर उनके उत्तर नदारद हैं। क्या यथास्थितिवादी ताकतें इतनी प्रबल हैं कि वे जनमत का भी आदर नहीं करेंगी और केंद्र की सरकार को उन्हीं कठघरों में कैद करने में सफल हो जाएंगी, जैसी वो पिछले तमाम दशकों से कैद है? क्या भारतीय जनता के प्रबल आत्मविश्वास और भरोसे से उपजा नरेंद्र मोदी और भाजपा का प्रयोग भी एक सत्ता परिर्वतन की घटना भर बनकर रह जाएगा? भाजपा को प्यार करने वाले और नरेंद्र मोदी को एक परिवर्तनकामी नेता मानकर उन पर भरोसा जताने वाले लोग यही सोच रहे हैं। यहां सवाल यह भी उठता है कि अगर नरेंद्र मोदी विफल हो जाते हैं तो उससे किसका भला होगा?  
 
 
 एक राष्ट्रवादी दल और भारतीय जमीन से उपजे विचारों से शक्ति लेने के कारण भाजपा ने आम भारतीय जनमानस की उम्मीदों को बहुत बढ़ा दिया है। निश्चय ही जब एक राष्ट्रवादी दल सत्ता में आता है तो समाज को परिवर्तित करने की दिशा में उसके द्वारा प्रभावी कदमों की उम्मीद की ही जाती है। ऐसे समय में जब बहुत सावधानी से दोस्त और दुश्मन चुनने का समय होता है, सत्ता-संगठन के गलियारों में निरंतर उपस्थित रहने वाली और उनका उपभोग करने वाली यथास्थितिवादी ताकतें या दलाल चोला बदलकर तंत्र में पुनः शामिल होने का जतन करते हैं। भारतीय राजनीति और चुनावी तंत्र ऐसा बन गया है कि इन ताकतों को चुनाव पूर्व ही सत्ता संघर्ष में शामिल ताकतों के साथ रिश्ता बनाते देखा जा सकता है। ये सही मायने में पूरे तंत्र को बिगाड़ने, भ्रष्ट बनाने और कई बार भ्रम पैदा करने की कोशिशें करते हैं। उन्हें उनके संकल्प और पथ से विचलित करना चाहते हैं। क्या दिल्ली में ऐसी संगठित कोशिशें प्रारंभ नहीं हो गयी हैं? ऐसे कठिन समय में सत्ता में विराजी परिवर्तनकामी ताकतों को सर्तकता से इन सत्ता के दलालों को हाशिए लगाना होगा। इनकी शक्ति और इनकी प्रभावी उपस्थिति के बावजूद यह काम करना होगा, वरना इस सरकार की विफलता की पटकथा ये सब मिलकर लिख देगें।  
 
 
सत्ता में आते ही सत्य दूर रह जाता है। नई चमकीली चीजें आकर्षण का केंद्र बन जाती हैं। अपने कार्य के स्वरूप, अपने कामों की मीमांशा तब संभव नहीं रह जाती। साथ ही तब जब आप लोगों की सुनने को तैयार न हों और असहमति के लिए जगह भी सिकुडती जा रही हो, तो यह खतरा और बड़ा हो जाता है। ऐसे में सत्ता के दलालों की विरूदावली और भाटों का गायन हर शासक को प्रिय लगने लगता है। मोदी सरकार इन संकटों से दो-चार हो रही है।   
 
किसी भी तरह के परिर्वतन के लिए निष्ठा और ईमानदारी ही पूंजी होती है। सौभाग्य से देश के प्रधानमंत्री के पास ये दोनों गुण मौजूद हैं। इसलिए उन्हें संकल्प लेकर ऐसे बदलाव तेजी से करने चाहिए, जिनमें बदलाव जरूरी हैं। जो परिर्वतन अपरिहार्य हैं वो होने ही चाहिए क्योंकि इतिहास बार-बार मौके नहीं देता। जो स्थापित वर्ग हैं और जिनके हाथ में पहले से ही साधन और शक्ति है- सुविधाएं हैं, उनके बजाए सरकार की नजर उन लोगों की ओर जानी चाहिए जो सालों-साल से छले जा रहे हैं। जिनकी देश की इस चमकीली और बाजारू प्रगति में कोई हिस्सेदारी नहीं हैं। उन अनाम लोगों की आस्थाएं लोकतंत्र में बनी और बची रहें, इसके लिए सरकार को यत्न तेज करने होंगें।  
 
 
अपने वादों के प्रति ईमानदारी सिर्फ वाणी में ही नहीं, कर्म में भी दिखनी चाहिए। चतुराई के आधार पर मंचों या संसद में की जा रही व्याख्याओं और उनके पीछे छिपे मंतव्यों को लोग समझते हैं। इसलिए देहभाषा में सादगी और ईमानदारी दिखनी चाहिए न कि सिर्फ चपलता और चतुराई। चतुराई के आधार पर की जा रही व्याख्याओं का समय अब जा चुका है। यह बहुत अच्छी बात है कि हमारे प्रधानमंत्री राष्ट्रपिता महात्मा गांधी और सरदार पटेल को अपना आदर्श मानते हैं। उन्हें आदर्श मानते ही मोदी जी के सामने एक ही विकल्प है कि वे गांधी की ईमानदारी और पटेल की दृढ़ता को अपने राजकाज के संचालन में प्रकट करने का कोई अवसर न गवाएं।  
 
 
यह मान लेने में कोई संकोच नहीं होना चाहिए कि जो लोग प्रभुता संपन्न हैं सिर्फ उन्हें बढ़ाकर किसी देश की प्रगति संभव नहीं हैं। वह प्रगति आपकी जीडीपी तो बढ़ा सकती है पर देश में छिपे अंधेरे कायम रहेंगें। यह भी कटु सत्य है कि कोई भी व्यवसायी, व्यवसाय से समझौता नहीं कर सकता, उसके लिए उसके आर्थिक हित ही प्रधान हैं।
 
 
भारत भूमि पर व्यापार की सहूलियतें न मिलीं तो वे विदेश चले जाएंगें, सब कुछ नष्ट हो गया तो मंगल पर बस्तियां बसा लेगें, किंतु भूमि पुत्रों को तो यहीं रहना है। नरेंद्र मोदी की सरकार के सामने सबसे बड़ी चुनौती इस दोनों वर्गों के हितों का टकराव रोकने और सबसे जरूरतमंद पर सबसे ज्यादा ध्यान देने की है। भाजपा और उसके विचार परिवार के लिए सोचने और अपने गिरेबान में झांकने का समय है। गांधी अंतकरणः के आधार पर बोलते थे, इसलिए उन पर भरोसा करने का मन होता था।
 
 
आज चतुराई, भाषण कौशल से जंग जीतने की कोशिशें हो रही हैं, जबकि दिल्ली चुनाव में यह सारे चुनावी हथियार धरे रह गए। ये इस बात की गवाही है कि अंततः आपको लोगों के दिलों में उतरना होता है और उनमें अपनी कही जा रही बातों के प्रति भरोसा जगाना होता है। भरोसा न टूटे इसके लिए निरंतर यत्न करना होता है। जब 6 माह में ही दिल्ली प्रदेश का चुनाव भाजपा हार गयी, सवाल तभी से उठने शुरू हुए हैं। विरोधी एकजुट हो रहे हैं। ऐसे समय में भाजपा को यह बताना होगा कि आखिर अरविंद केजरीवाल ने दिल्ली में जो करिश्मा किया उससे उसने आखिर क्या सीखा है? भाजपा और उसके नेतृत्व को यह समझना होगा कि चाटुकारिता से कोई नेतृत्व स्वीकार्य नहीं बनता। संजय जोशी को बधाई देने वालों को लेकर जैसी खबरें मीडिया में आईं आखिर वह क्या साबित करती हैं?
 
 
पार्टी के दिग्गज नेताओं की उपेक्षा से लेकर तमाम ऐसे सवाल हैं जो सामने खड़े हैं। क्या दल अब सामाजिक संबंधों और मानवीय व्यवहारों को भी नियंत्रित करेगा, यह एक बड़ा सवाल है। एक जमाने में इंदिरा गांधी जी और उनकी कांग्रेस के बारे में मजाक चलता था कि “इंदिरा जी अगर किसी खंभे को खड़ा करें तो उसे भी वोट मिल जाएंगें।” किंतु इंदिरा जी अपने समस्त खंभों के साथ चुनाव हार गयीं। आज राजनीति और देश दोनों बहुत आगे बढ़ चुके हैं।
 
 
1977 में सत्ता में आई जनता पार्टी की सरकार के बारे में लोगों की राय बुरी नहीं थी और बताने वाले बताते हैं कि यूं लगा कि जैसे कांग्रेस कभी वापस नहीं आएगी। किंतु अनुशासनहीनता तथा नेताओं के आचरण के चलते जनता पार्टी इतिहास बन गयी और लोग उन्हीं इंदिरा जी को ले आए जिन्हें उन्होंने हटाया था।   यह स्वीकारने में हिचक नहीं होनी चाहिए कि भारत अमरीका नहीं है। इसलिए किसी भी सरकार को हमेशा गरीबों और मध्यवर्ग के साथ ही दिखना होगा। अमीरों के प्रति हमारी सदाशयता हो सकती है किंतु कोशिश यही होनी चाहिए हम उनके समर्थक के रूप में चिन्हित न हों।
 
 
यह हमारी राजनीति की विवशता और दिशाहीनता ही कही जाएगी कि हम गांव तो पहुंचे पर गांव के हो न सके। शायद इसीलिए भरोसे से खाली किसान अपनी जान देकर भी हमसे कुछ कहना चाहता है। हमारी राजनीति किसानों के प्रति वाचिक संवेदना से तो भरी है पर समाधानों से खाली है। ऐसे खालीपन को भरने और भारत से भारत का परिचय कराने के लिए यह सरकार लोगों ने बहुत भरोसे से लाई है। इस सरकार की विफलता किन्हें खुश करेगी कहने की जरूरत नहीं है, पर लोग एक बार फिर छले जाएंगें, इसमें संदेह नहीं। यह भरोसा बचा और बना रहे, मोदी की सरकार अपने सपने सच कर पाए, यही दरअसल भारत चाहता है। यह संभव हो इसकी सबसे ज्यादा जिम्मेदारी नरेंद्र मोदी और उनके सहयोगियों की है। उम्मीद है कि वे भारत की जनता और उसके भरोसे को नहीं यूं ही दरकने देंगें।
 
(लेखक राजनीतिक विश्लेषक हैं)

शिवराज सिंह ने गीता के श्लोक सुनाकर अफसरों को आईना दिखाया

 मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान नौकरशाहों के व्यवहार से खुश नही हैं। आईएएस और आईपीएस अफसरों को आइना दिखाते हुए मुख्यमंत्री ने उन्हें अहंकार त्यागने और सरकार को टेम्पररी और खुद को परमानेंट मानने की मानसिकता छोड़ने की सलाह दी। मुख्यमंत्री ने तो यहां तक कहा कि अहंकार में अफसर यह भूल जाते हैं कि वे 'सेवक' हैं। सिविल सर्विस डे के मौके पर उन्होंने बड़े सपाट शब्दों में आईएएस और आईपीएस अफसरों को यह अहसास कराया कि वह भी एक 'सामान्य आदमी' हैं। सिर्फ वे ही नहीं और भी लोग समाज के विकास के लिए बेहतर सोच रखते हैं। मुख्यमंत्री ने अफसरों को '… मैं तो साहब बन गया…' टाइटल वाला फिल्मी गाना भी सुनाया और कहा कि आप लोग अपने अन्दर से इस भाव को निकाल दीजिए। आपको अधिकार मिला है उसका सदुपयोग कीजिए। साथ ही वह यह कहना भी नहीं भूले कि जिसको अधिकार मिल जाता है, वह उसका प्रदर्शन करने से नहीं चूकता। साहब के कमरे के बाहर बैठा चपरासी भी उनसे मिलने आए व्यक्ति की पर्ची अंदर भेजते वक्त अपनी 'साहबी' का अहसास जरूर करवा देता है। ऐसा नहीं होना चाहिए।

शिवराज सिंह ने आईएएस और आपीएस अफसरों के बीच चलने वाली खींचतान का भी जिक्र किया। उन्होंने कहा कि अक्सर अफसरों को अहंकार हो जाता है। आईएएस अफसर समझते हैं कि हम से अच्छा कौन हैं, तो आईपीएस का मानना रहता है कि हम क्या किसी से कम हैं? एक-दो नम्बर के अन्तर से क्या फर्क पड़ता है। उन्होंने सभी तरह की सेवाओं के अफसरों को सलाह दी कि नौकरी में अहंकार को आड़े न आने दे। सभी को जनता की सेवा के लिए ही नियुक्त किया गया है। इस मौके पर उन्होंने सरकार की ओर से चलाई जा रही कन्यादान योजना का जिक्र किया। शिवराज ने कहा कि मुख्यमंत्री बनने के बाद जब मैनें यह आइडिया को अफसरों को दिया तो उन्होंने तत्काल खारिज कर दिया। अफसरों का कहना था कि सरकार का काम विवाह कराना नही है। ऐसी ही राय लाड़ली लक्ष्मी योजना के सम्बन्ध में भी थी। लेकिन आज ये दोनों योजनाएं न केवल प्रदेश में अच्छे से चल रही हैं, बल्कि अन्य राज्य इनका अनुसरण भी कर रहे हैं।

मुख्यमंत्री ने फाइलें रोकने की अफसरों की प्रवृत्ति पर भी निशाना साधा। उन्होंने कहा कि अक्सर फाइलें अफसरों की टेबल पर पड़ी रहती हैं। वे फाइलों पर दस्तखत करने से बचते हैं। उन्हें यह समझना चाहिए कि फाइल रोकना भी एक अपराध हैं। उन्होंने अफसरों को नसीहत देते हुए कहा कि अफसर सरकारी नौकरी से बाहर निकलें, रोते-गाते काम करने वाले अफसर प्रदेश पर बोझ हैं। आपको मौका मिला है तो इसे मिशन के रूप में लेकर प्रदेश हित में काम करें। आप लोगों के कंधो पर देश-प्रदेश के विकास की जिम्मेदारी है। अफसरों के मन में कई बार यह भी भाव आता है कि नेता तो आते-जाते हैं, हम तो परमानेंट हैं।

मुख्यमंत्री ने कहा कि सिविल सर्विस डे वर्ष 2006 से कर्मकांड के रूप में मनाया जाता रहा है। मैं प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को बधाई देना चाहता हूं, उन्होंने इस दिवस को नया कीर्तिमान और नई ऊंचाई देने का फैसला लिया है। उन्होंने कहा कि मुझे यह देखकर खुशी हो रही है कि आईएएस, आईपीएस और आईएफएस एक साथ बैठे हुए हैं।

 

इन तीनों कैडर में अक्सर अहं का टकराव देखने में आता है। अफसरों के मन में कई बार यह भी भाव आता है कि नेता तो आते जाते हैं, हम तो परमानेंट हैं। 60 के बाद ही रिटायर होंगे हमें कोई नहीं हटा सकता। मुख्यमंत्री ने अफसरों पर तंज कसते हुए फिल्मी गीत -'साला मैं तो साहब बन गया" का भी जिक्र किया और कहा कि ये भाव अपने अंदर न आने दें। आपको अधिकार मिला है तो सदुपयोग करें। अधिकार बड़ी बुरी चीज है, जिसे मिल जाए वह उसका प्रदर्शन करने से नहीं चूकता। अफसर के केबिन के बाहर बैठा भृत्य भी साहब को अंदर पर्ची भेजने में अपनी पूरी कला प्रदर्शन दिखा देता है। ऐसा नहीं होना चाहिए।

 

मुख्यमंत्री ने 35 मिनट के संबोधन में 25 मिनट तक अफसरों का ब्रेन वॉश करने का प्रयास किया। इस दौरान उन्होंने बीच-बीच में गीता श्लोक सुनाकर उन्हें देश-प्रदेश के विकास में सहयोग देने के लिए प्रेरित भी किया। मुख्यमंत्री ने कहा कि कई अफसर ईमानदारी का ढोल बजाकर काम को इतना पेंचीदा बना देते हैं कि उसे ऊपर वाले अधिकारी को सुलझाने में पसीने छूट जाते हैं। फिर सवाल खड़ा होता है कौन कलम फंसाए, भगवान बचाए।

 

मुख्यमंत्री ने अफसरों के साथ-साथ नेताओं में अहंकार की बात कही। उन्होंने कहा कि टोल नाके वाला यदि टैक्स मांग ले तो नेताओं का अहं जाग उठता है। उनके इतना कहते ही कार्यक्रम में मौजूद अफसर दबे स्वर पूर्व मंत्री तुकोजी राव पवार की घटना का जिक्र करने लगे।मुख्यमंत्री ने कहा सफलता को पाने के लिए जूनूनी होना जरूरी है। उन्‍होंने कहा कि बाघ विहीन हो चुके पन्‍ना नेशनल पार्क में फिर से बाघों को बसाने जैसे चुनौती का काम एक आईएफएस अफसर श्रीनिवास कृष्ण मूर्ति ने किया है। वह सच में पागल और जुनूनी अफसर हैं। उन्होंने दिन-रात एक कर आज पन्‍ना में 34 बाघ कर दिए।

पाँच पैसे रोज में मच्छरों से छुटकारा पाईये!

भारत में जन्मे ब्रिटिश डॉक्टर सर रॉनल्ड रॉस को 1902 में मच्छरों द्वारा फैलाए जाने वाले मलेरिया के परजीवी की खोज के लिए नोबेल पुरस्कार प्राप्त हुआ था। इससे मलेरिया से लड़ने का आधार तैयार हुआ। अब लगभग 113 साल बाद एक अन्य भारतीय इग्नेशियस ऑरविन नरोन्हा भारत को 2019 तक मलेरिया से मुक्त करने का सपना देख रहे हैं।

कॉमर्स ग्रेजुएट इग्नेशियस की यह ख्वाहिश बचपन में उनकी असहायता से उपजी है। वे बताते हैं, 'जब मैं 5 साल का था, तो मैंने अपनी मां से पूछा था कि उनका बायां पैर सूजा हुआ क्यों है। उन्होंने बताया कि यह फाइलेरिया के कारण है, जो कि मच्छरों से होने वाला रोग है। बड़ा होते हुए मेरे मन में हमेशा यही ख्याल रहा कि मैं अपनी मां के लिए कुछ नहीं कर सका। मैं चाहता था कि मैं मच्छर रूपी इस दुश्मन का खात्मा कर दूं।

उस घटना के 48 साल बाद मैंने एक मशीन डिजाइन की और उसका नाम रखा मॉजीक्विट।'मॉजीक्विट बाजार में प्रचलित मच्छर-रोधी उपायों की तरह नहीं है। इसमें न तो किसी प्रकार का रसायन इस्तेमाल होता है और न ही कोई तरल पदार्थ। इससे न धुआं होता है, न राख। इसे इस्तेमाल करने की लागत 5 पैसे प्रति दिन आती है। यह दरअसल मच्छरों को फांसने की मशीन है।

इसकी कार्यप्रणाली समझाते हुए इग्नेशियस कहते हैं, 'हमारे द्वारा सांस के माध्यम से उगली जाने वाली कार्बन डायऑक्साइड, हमारे खून के तापमान, पसीने आदि से मच्छर हमारी ओर आकर्षित होते हैं। हमारी मशीन में खास तरह का पावडर डला होता है, जिससे मच्छर को वहां मानव के होने का आभास होता है और वह उसकी ओर आकर्षित होता है। यह पावडर मनुष्यों के लिए नुकसानदायक नहीं होता क्योंकि यह फूड-ग्रेड होता है। जब भी मच्छर मॉजीक्विट के पास से गुजरता है, तो इससे आकर्षित होकर इसकी ओर जाने लगता है। कुछ पास जाने पर मशीन निर्वात के जरिये मच्छर को भीतर खींच लेती है। अंदर खिंचते ही वह तत्काल मार दिया जाता है।

बाहर निकाले जा सकने वाले एक कंटेनर में मरे हुए मच्छर इकट्ठा होते हैं।" इस उपकरण का उपयोग केवल घरों में ही नहीं होता, पशुओं को भी इससे लाभ हुआ है। बीदर स्थित कर्नाटक वेटरनरी, एनिमल एंड फिशरीज साइंस यूनिवर्सिटी द्वारा किए गए अध्ययन में सामने आया कि जिन गौशालाओं में इस उपकरण का उपयोग किया गया, वहां की गायें ज्यादा दूध देने लगीं तथा उनका वजन भी बढ़ा। पोल्ट्री फार्म में उपयोग करने पर वहां के पशुओं को भी लाभ हुआ।

इग्नेशियस को 12 साल तक प्रयोग करने के बाद यह सफलता मिली है। सन् 2002 में उनके द्वारा बनाया गया उपकरण 2 घंटे में 1 हजार मच्छर पकड़ रहा था लेकिन इसकी लागत बहुत ज्यादा आ रही थी। 2006 में वे लागत घटाने में सफल हो गए और 4 साल बाद पेटेंट के लिए आवेदन किया। इग्नेशियस का दावा है कि यदि उनकी मशीन का उचित तरीके से उपयोग किया गया, तो भारत अगले 3 से 5 साल में विश्व का पहला मलेरिया मुक्त देश बन सकता है।

54 वर्षीय इग्नेशियस ने अपना प्रोफेशनल जीवन बहरीन में कंस्ट्रक्शन उद्योग में शुरू किया था। फिर वे सऊदी अरब में मैन्युफैक्चरिंग बिजनेस करने लगे। 1994 में वे भारत लौट आए। उन्होंने कम लागत में सड़क बनाने की तकनीक भी विकसित की है। आज भी उनका दिमाग नए-नए आविष्कार करने की दिशा में सोचने में व्यस्त रहता है।

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मोदी जी के साथ पेरिस की वह यादगार शाम

विगत सप्ताह, मेरे लेटर बॉक्स में भारतीय दूतावास का एक आमंत्रण पत्र पड़ा मिला था. आमंत्रण था पेरिस में, भारतीय समुदाय के कार्यक्रम का, जिसमे हमारे प्रधान मंत्री, श्री नरेंद्र मोदी, शिरकत करने वाले थे। मैं सबके बारे में तो नहीं बता सकती, पर पिछले करीब ४ सालों से विदेश में रहते हुए, मैंने पाया है की अपने देश के प्रति मेरी भावनाएं और प्रगाढ़ हो गयी हैं। अंग्रेजी में कहावत है Distance makes the heart grow fonder , शायद मेरे साथ भी यही हुआ है। चतुर्दिक भिन्न संस्कृतियों, भिन्न भाषाओँ से घिरे रहने ने, मुझे शायद भारतीयता के मूल्य का बेहतर आभास करवाया है. विदेश में, अपने देश का कोई अनजान व्यक्ति, अपने देश का झंडा, या कोई भी छोटा सा चिन्ह दिख जाये तो मन पुलकित हो उठता है।  तो ऐसे में, अशोक स्तम्भ से सजा हुआ भारतीय दूतावास का पत्र तो अनूठा था। कागज़ के छोटे से टुकड़े ने ख़ुशी, गर्व, उत्साह, जैसी कई अनुभूतियों के द्वार खोल दिये। मैं बेहद उत्सुक थी देखने के लिए कि दूर देश में भारतियों का और भारतीयता का समागम कैसा होगा। फ्रांस में, कुछ घंटे के लिए भारत का एहसास कैसा होगा। 

कार्यक्रम का स्थल था, पेरिस का प्रसिद्ध Louvre संग्रहालय था। विशाल, ऐतिहासिक, आकर्षक, Louvre का नाम पेरिस के सबसे खूबसूरत नज़ारों में शुमार है। लिहाज़ा, मेरे अनुभव का आगाज़ बेहद शानदार हुआ. मैं वक़्त से कुछ पहले ही पहुँच गयी थी, इसलिए मैं सोच रही थी की मुझे अधिक भीड़ का सामना नहीं करना पड़ेगा. पर जब मैं समारोह स्थल पर पहुंचीं मैं अनायास ही हंस पड़ी। मेरी हंसी का कारण आश्चर्य भी था और ये भी था की मुझे Deja vu का एहसास हुआ क्यूंकि Louvre की Carousel Gallery , हिंदुस्तान के रंग में ओत प्रोत थी। 

कार्यक्रम शुरू होने में ३ घंटे शेष थे, पर यूरोप के हर कोने से आये हुए करीब ३ हज़ार लोग पहले ही कतार में खड़े थे. क्या बच्चे, क्या बूढे, क्या जवान.. ज्यादात्तर औरतों ने अपनी ठेठ हिंदुस्तानी पोशाकें पहन रखीं थीं, जैसे कोई त्यौहार हो…. और देखा जाये तो ऐसे मौके हम प्रवासी भारतीयों के लिए त्यौहार से कम भी नहीं होते। कइयों ने हाथ में भारत के झंडे पकड़ रखे थे, कुछ के सर पर पगड़ी बंधी हुई थी, और कुछ उत्साही, बीच बीच में भारत माता की जय के नारे लगा रहे थे। हिंदी, बांग्ला और अलग अलग भारतीय भाषाओँ के कुछ शब्द उड़ते उड़ते कानों तक आ रहे थे। समस्त वातावरण जीवंत था, त्वरित ऊर्जा से सराबोर। भारत और भारतीयों की जीवन्तता, उनका जोश उन्हें समस्त विश्व से पृथक पहचान देता है, और इस उमंग का सीधा प्रसारण अपने सामने पाकर, मैं मुस्कुराती हुई, कुछ क्षण बस निहारती रही।कतार में काफी देर खड़े रहना पड़ा, और इस प्रतीक्षा ने कई और सवाल, कई और विचार जागृत कर दिये।

समारोह भारत, उसकी संस्कृति, इतिहास और उसके विकास के सम्मान में आयोजित था, पर अपने पास खड़े ज़्यदातर लोगों के व्यवहार ने मुझे सोचने पर विवश कर दिया, की क्या हम वाकई अपनी सभ्यता और भारतीयता का सम्मान करते हैं ? क्या जो उत्साह मुझे दिख रहा था, क्या वह केवल सतही था ? 

क़तार में मेरे इर्द गिर्द खड़े सभी लोग, शिक्षित, सभ्य प्रवासी भारतीय प्रतिनिधि थे, ऐसे प्रतिनिधि जो शायद किसी स्तर पर राजदूतों और प्रधान मंत्री या विदेश मंत्रियों से भी अधिक महत्त्वपूर्ण होते हैं. कहीं न कहीं हम जैसे भारतीयों को देखकर ही संभावित पर्यटक और शायद कुछ हद तक भावी निवेशक भी, देश और उसके लोगों के विषय में अपनी राय बनाते हैं. तो ऐसे में, हम हिंदुस्तान की कैसी छवि प्रदर्शित करते हैं ? Slumdog Millionaire के बाद से वैसे भी अमूमन हर विदेशी धारावी को ही भारत की असल पहचान मानता है।

चलिए कतार में खड़े अधिकांश लोगों को हम अपना data sample समझते हैँ …। अपने छोटे से, साधारण अवलोकन पर मैंने पाया कि, ज़्यादातर लोग अपने बोलचाल की भाषा के तौर पर अंग्रेजी का प्रयोग करते दिखे। आपस में भी, और दुसरे भारतीयों से भी।  यह देखकर मुझे कुछ मायूसी हुई, और कुछ हद तक क्रोध की भी अनुभूति हुई । 

एक ऐसा देश, जो हज़ारों भाषाओँ का गढ़ है, उस देश के लोग एक ऐसी भाषा के प्रति झुकाव दिखाते हैं, जो एक तरह से ३०० वर्षों की दासता की भी प्रतिरूप है. अंग्रेजी आज की दुनिया में, अनिवार्य है, व्यवसाय के लिए, शिक्षा के लिए, परन्तु आपसी स्तर पर क्यों? क्यों हम अपनी भिन्न मातृभाषाओं का उसी तरह सम्मान नहीं करते जिस तरह फ़्रांसिसी आज भी करते हैं। मेरे data sample में जो हिंदुस्तानी आपस में French का प्रयोग कर रहे थे, उनसे मुझे शिकायत बेहद काम रही, क्यूंकि एक अरसा किसी देश और किसी भाषा के मध्य बिताने पर उसका आदतों में शुमार होना लाज़मी भी है, और यह भी दर्शाता है की हमने उस देश की भाषा का सम्मान किया है।मेरे क्रोध का, मेरी निराशा का कारण यह था, कि पश्चिमी सभ्यता के अंधानुकरण के कारण हम शायद कहीं न कहीं भारत की एक लचर छवि प्रदर्शित करते हैं। एक ऐसे देश की छवि, जो अपनी सभ्यता को तरज़ीह नहीं देता।  एक ऐसा देश जो अपनी संस्कृति से कहीं अधिक आस्था अमरीकी या बर्तानी सभ्यता पर रखता है। यदि हम इन्ही देशों के lifestyle को अपना लक्ष्य बना कर चलते हैं, तो क्या केवल खान- पान, या धार्मिक रीतियों का पालन भर कर लेने से ही क्या हम सच में अपने अंदर की भारतीयता को बचा रख सकते हैं ?

…और बात यहाँ केवल अंग्रेजी के व्यवहार तक सीमित नहीं थी। कतार में खड़े रहते हुए किसी भी प्रकार आगे जाने का अनुचित प्रयास करना, फ़्रांसिसी सुरक्षा कर्मियों पर आँखें तरेरना, असंयत होकर भीड़ को और भी विश्रृंखल रूप देना। देश से हज़ारों मीलों की दूरी होने के बावजूद अपनी पहचान पंजाबी, बंगाली, इत्यादि के साथ ज़ाहिर करना। क्या यह व्यवहार उचित था ? क्या केवल अंग्रेजी बोलने पर, ऐसी व्यवहारगत खामियां छुप जाएंगी ? ऐसे कई प्रश्न, कतार के १ घंटे की अवधि ने मेरे दिमाग में कुलबुलाते छोड़ दिए।
 
खैर, आखिरकार प्रतीक्षा के पश्चात कार्यक्रम आरम्भ हुआ. शुरुआत सांस्कृतिक कार्यक्रमों के साथ हुई. पेरिस के मध्य, कर्नाटक, राजस्थान, और बांग्ला लोक संगीत की गुंजन अद्भुत थी. वह रोमांच अद्भुत था, जब मैं अपनी कुर्सी पर बैठी हुई, मंच पर गा रहे गायकों के साथ, वन्दे मातरम और टैगोर के गीत गुनगुना रही थी। बेहद अभिमान वाला क्षण था, जब सभागार में उपस्थित देशी-विदेशी सारे श्रोता, राजस्थानी लोक गायकों के साथ गा रहे थे, झूम रहे थे, और once more की मांग कर रहे थे।

पर सबसे बेहतरीन और रोंगटे खड़े करने वाला लम्हा शायद वह था जब प्रधानमंत्री के आगमन पर, सबने खड़े होकर भारतीय राष्ट्रगीत को सम्मान दिया। प्रधानमंत्री मोदी का स्वागत सारी सभा ने नारों, तालियों और अतुल्य उत्साह के साथ किया। विदेशी भूमि पर, अपने देश के प्रतिनिधि के सम्मुख होना एक अलग ही आत्मीयता का भाव जगा रहा था।

हमेशा की तरह, मोदी जी का भाषण उत्साहवर्धक और करारा था। हर नयी बात पर तालियों से गड़गड़ाता हुआ अभिनन्दन मिलता था।  भाषण का सीधा प्रसारण शायद आप सबने भी देखा ही होगा। यह जानकर अच्छा लगता है कि भारत की छवि को दुनिया भर में पुख्ता करने का प्रयास जारी है। भाषण में मोदी जी ने उल्लेख किया की कैसे एक काल में जगदगुरु की उपाधि पाने वाला, शांति का दीपस्तंभ भारत, कैसे आज भी UN Security Council की सदस्यता के लिए जूझ रहा है, परन्तु पिछले कुछ वक़्त से भारत की वैश्विक छवि में परिवर्तन साफ नज़र आ रहा है. कूटनीति और राजनीति के गलियारों में भारतीय सिंह की गरज दोबारा जागने लगी है, और मोदी जी के कार्यक्रम और भाषण में इस जोश और भावना का पूरा अनुभव हुआ . एक देशवासी की हैसियत से यह अत्यन्य गर्व का विषय है. 
अंततः ११ अप्रैल की शाम बेहद यादगार थी, और सदा रहेगी ।
                     
( ये पत्र  अनन्या दीक्षित ने पेरिस से अपनी माँ श्रीमती पूनम दीक्षित को लिखा है  )              

साभार

 www.yuvasughosh.com  एवँ  hindimumbai@googlegroups.com  से 

भारत – भाषा प्रहरी बालेन्दु शर्मा दाधीच

‘वैश्विक हिंदी सम्मेलन’ द्वारा गोवा की राज्यपाल माननीय श्रीमती मृदुला सिन्हा के हाथों ‘सम्मान’
 वाणिज्य-व्यापार या ज्ञान-विज्ञान आदि के विभिन्न क्षेत्र, जहाँ से भारतीय भाषाओं का  आधार खिसक रहा है। वहाँ भी अक्सर यह देखने में आया है कि जब इन क्षेत्रों में  हिंदी  व भारतीय भाषाओं के प्रयोग की बात आती है तो भी अक्सर लोग कहानी-कविता और  हास्य, नृत्य संगीत का योजन कर अपने कर्तव्य की इतिश्री करते दिखाई देते हैं ।  लगता है जैसे कि कोई बिना खाद व सिंचाई के जड़ों के बजाए केवल पत्तों पर पानी की  कुछ बुंदें डालकर फसल की रक्षा का दिखावा कर रहा है। किसी भी देश में साहित्य,  नृत्य-संगीत क्षेत्र निश्चय ही महत्वपूर्ण हैं लेकिन जहाँ प्रश्न व्यवहार में भाषा के प्रयोग  के बढ़ाने के उपायों का हो तो वहाँ उन क्षेत्रों की आश्यकताओं के अनुसार ही कार्य की  अपेक्षा होती है।

      पिछले कुछ समय में विभिन्न क्षेत्रों के कार्य-व्यापार में जो एक बड़ा परिवर्तन आया  वह था सूचना-प्रौद्योगिकी का। हर बार हर मोर्चे पर आयातित सूचना-प्रोद्योगिकी के  अंग्रेजी में होने के चलते भारतीय भाषाएँ अंग्रेजी और रोमन लिपि के मुकाबले पिछड़ती  गईं। अब जबकि देश ई गवर्नेंस, पेपरलैस ऑफिस, डिजिटल इंडिया के दौर मे प्रवेश कर रहा है, लेकिन अभी भी भाषा के प्रयोग व प्रसार के लिए इस मामले में भाषाकर्मियों में प्राय: उदासीनता का माहौल दिखता है। यह बिल्कुल तय है कि भारतीय भाषाओं के लिए प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में निरंतर विश्व के साथ कंधे से कंधा मिलाकर चले बिना भारतीय भाषाओं का प्रयोग व प्रसार बढ़ाना संभव नहीं है। लेकिन इसी बीच एक अच्छी बात यह हुई है कि भारतीय भाषा–प्रेमियों के एक ऐसे वर्ग का उदय हुआ जो सूचना-प्रोद्योगिकी में दक्ष है और उसने अपनी भाषाओं के प्रति प्रेम के चलते संघ की राजभाषा हिंदी व अन्य भारतीय भाषाओं के प्रयोग के लिए न केवल जमीन तैयार की है। भाषा-प्रौद्योगिकी की तमाम आवश्यकताओं में प्रयोग के लिए आवश्यक उपाय करने के साथ-साथ उसकी जागरूकता बढ़ाने के लिए उसने महत्वपूर्ण कार्य किया है। आज के दौर में यदि भारतीय भाषाओं को अपने अस्तित्व की रक्षा करनी है और आगे बढ़ना है तो ई उपकरणों के सिवा कोई चारा नहीं है और इस क्षेत्र में जो लोग भारतीय भाषाओं के प्रहरी बन कर भारतीय भाषाओं को आगा बढ़ाने के कार्य में लगे हैं उनमें  प्रमुख नाम है – ‘ बालेन्दु शर्मा दाधीच ।Screenshot (19)

 

प्रमुख हिंदी वेब पोर्टल प्रभासाक्षी डॉट कॉम के समूह संपादक, तकनीकविद् और स्तंभकार बालेन्दु शर्मा दाधीचसूचना प्रौद्योगिकी और न्यू मीडिया के क्षेत्र में एक सुपरिचित नाम हैं। उनकी गणना हिंदी और तकनीक के बीच अनुकूलता विकसित करने में जुटे हिंदी सेवियों में होती है । 10 सितंबर 2014 को मुंबई में ‘वैश्विक हिंदी सम्मेलन’ द्वारा बालेन्दु शर्मा दाधीच को गोवा की राज्यपाल श्रीमती मृदुला सिन्हा द्वारा ‘भाषा प्रौद्योगिकी सम्मान’ प्रदान किया गया। और अभीकेंद्रीय हिंदी संस्थान के हिंदी सेवी सम्मानों के अंतर्गत आत्माराम पुरस्कार दिए जाने की घोषणा की गई है।

बालेन्दु शर्मा दाधीच द्वारा हिंदी व भारतीय भाषाओं के प्रयोग व प्रसार के क्षेत्र में किए गए कार्यों की लंबी फेहरिस्त है। उनकी चुनिंदा उपलब्धियाँ इस प्रकार हैं- (सभी वेब लिंक पूरी तरह सक्रिय हैं)

1.हिंदी वर्ड प्रोसेसर 'माध्यम'का निर्माण और निःशुल्क वितरण। एक लाख से अधिक प्रतियाँ डाउनलोड। यह सन् 1999 में जारी किया गया जब हिंदी में एक भी निःशुल्क वर्ड प्रोसेसर उपलब्ध नहीं था। डाउनलोड लिंक- http://www.balendu.com/madhyam

2.हिंदी के सर्वप्रथम तीन वेब पोर्टलों में से एकप्रभासाक्षी का निर्माण और संपादन (वर्ष 2000-2001)  यूआरएल- http://www.prabhasakshi.comScreenshot (22)

   -हिंदी में डायनेमिक फॉन्ट का सर्वप्रथम प्रयोग करने वाली चंद वेबसाइटों में से एक।

   -हिंदी का एकमात्र पोर्टल जिसमें हर आलेख ग्रामीण पाठकों की सुविधा के लिए यूनिकोड के साथ-साथ कृति फॉन्ट में भी स्वतः उपलब्ध होता है

3.  हिंदी टाइपिंग ट्यूटर 'स्पर्श'का निर्माण और मुफ्त वितरण। डाउनलोड लिंक-http://www.balendu.com/labs/sparsh

4. हिंदी ईमेल में जंक यूनिकोड की समस्या का समाधान करने के लिए 'संशोधक' नामक वेब सेवा का विकास (2003) लिंक- http://www.balendu

5. यूनिवर्सिटी ऑफ पेन्सिलवेनिया के हिंदी पाठ्यक्रम के वेब संस्करण के विकास में सहयोग। यूआरएलScreenshot (20)

     http://www.southasia.sas.upenn.edu/hindi/

6.  हिंदी में ई-बुक निर्माण की पहली परियोजना ई-प्रकाशक का विकास। अनेक हिंदी ई-बुक्स निर्मित।यूआरएल- http://www.eprakashak.com

7. आठवें विश्व हिंदी सम्मेलन (न्यूयॉर्क) की हिंदी-अंग्रेजी द्विभाषीय वेबसाइट का निर्माण और संचालन (2007)

8. आठवें विश्व हिंदी सम्मेलन (न्यूयॉर्क) में आयोजित हिंदी तकनीकी प्रदर्शनी का संयोजन। चित्रः न्यूयॉर्क में प्रदर्शनी का उद्घाटन – प्रेस को संबोधन।

9. हिंदी में यूनिकोड तकनीक के बारे में जागरूकता फैलाने के लिए निर्मित पहली द्विभाषीय वेबसाइट लोकलाइजेशनलैब्स का निर्माण और संचालन।

      यूआरएल- http://localisationlabs.balendu.com/

10. हिंदी में तकनीक पर पुस्तक'तकनीकी सुलझनें'। पहला संस्करण सिर्फ चार महीने में आउट ऑफ प्रिंट हुआ (2014)

11.हिंदी इंटरफेस के साथ निःशुल्क ज़िपिंग सॉफ्टवेयर'हिंदी ज़िप' का निर्माण। डाउनलोड लिंक-http://balendu.com/labs/hindizip/index.html 

12. हिंदी इंटरफेस के साथ निःशुल्क चित्र संपादन सॉफ्टवेयर 'झटफोटो' का विकास और निःशुल्क वितरण। डाउनलोड लिंक-

         http://balendu.com/labs/JhatPhoto/index.html

13. हिंदी वेबसाइटों पर ऑडियो सुविधा जोड़ने के लिए निःशुल्क टूल'तरंग' का विकास और निःशुल्क वितरण।

डाउनलोड लिंक- http://balendu.com/labs/Tarang/index.html

14. हिंदी में तकनीक पर पहले वीडियो कार्यक्रम साइबर शो का निर्माण। लिंक- https://www.youtube

15. ग्यारह हिंदी अखबारों और पत्रिकाओं में तकनीक पर हिंदी में निम्न नियमित स्तंभ लिखे हैं-

कादम्बिनी-आईटी नुक्कड़ (मासिक)
सहारा समय (साप्ताहिक पत्र)-वेब विनोद
संडे नई दुनिया-साइबर समाचार (साप्ताहिक)
नवभारत टाइम्स-टेक्नो ट्रिक्स (साप्ताहिक)
जागरण-तकनीक (साप्ताहिक युवा परिशिष्ट),
राजस्थान पत्रिका-महिला ब्लॉगर (साप्ताहिक महिला परिशिष्ट),
नंदन (मासिक)-टेक्नो अपडेट,
हिंदुस्तान-गैजेट्स (नई दिशाएँ, साप्ताहिक)और
राष्ट्रीय सहारा-टेक्नोवर्ल्ड(साप्ताहिक, जारी..)
प्रवासी संसार- हिंदी तकनीक (मासिक)
एनीमेशन टुडे (ग्राफ़िक्स पर मासिक)
 16. हिंदी के प्रारंभिक ब्लॉगरों में शामिल। सन् 2005 में हिंदी ब्लॉग वाह मीडिया का निर्माण। सन् 2008 से हिंदी ब्लॉग मतान्तर।

  17.  दो विश्व हिंदी सम्मेलनों में हिंदी तकनीक आधारित चर्चा सत्रों का संचालन। 1. न्यूयॉर्क और 2. जोहानीसबर्ग।

  18. गत 15 वर्षों में हिंदी में तकनीकी विषयों पर 1000 से ज्यादा लेख मुख्यधारा के मीडिया में।

  19. विश्व की सबसे बड़ी बड़ी सॉफ्टवेयर कंपनी माइक्रोसॉफ्ट द्वारा तीन साल (2007-2009) तक माइक्रोसॉफ्ट मोस्ट वेल्युएबल प्रोफेशनल अवार्ड से सम्मानित।

  20. विश्व की सबसे बड़ी इंटरनेट कंपनी गूगल द्वारा आयोजित प्रतियोगिता ‘है बातों में दम’ के विजेताओं में शामिल (2010)

   21. विंडोज एक्सपी लोकलाइजेशन तथा हेल्प परियोजना में योगदान। यह विंडोज़ एक्सपी के हिंदीकरण

   22. माइक्रोसॉफ्ट विज़ुअल स्टूडियो 2008 लोकलाइजेशन (क्लिप) के हिंदीकरण में योगदान आदि।

   23.दक्षिण अफ्रीका और मॉरीशस में अलग-अलग वर्षों में लगभग 1000 से अधिक हिंदी प्रेमियों को हिंदी कामकाज, हिंदी ब्लॉगिंग, मल्टीमीडिया, हिंदी वेब पत्रकारिता आदि में प्रशिक्षित किया।

  24.टेलीविजन और रेडियो पर दर्जनों तकनीक आधारित कार्यक्रमों में विशेषज्ञ के तौर पर हिस्सेदारी।- एनडीटीवी, दूरदर्शन, लोकसभा टीवी, राज्यसभा टीवी, सीएनईबी आदि टी.वी. चैनल।

25.देश-विदेश में आयोजित दो सौ से अधिक आयोजनों में सूचना तकनीक, न्यू मीडिया, वेब पत्रकारिता आदि विषयों पर व्याख्यान।

26.हिंदी विश्वकोश परियोजना में तकनीकी खंड के लिए आधिकारिक योगदान।

27. वर्तमान परियोजनाएँ- दृष्टि बाधितों के लिए हिंदी टाइपिंग सॉफ्टवेयर पर कार्य जारी।

28.नई पुस्तक- नित नूतन तकनीक (सर्वाधिक आधुनिक तकनीकों पर हिंदी में प्रामाणिक जानकारी) का शीघ्र प्रकाशन।

29.सीडैक (CDAC) की हिंदी परियोजनाओं से संबंधित तीन उच्च स्तरीय समीक्षा समितियों की सदस्यता। रिपोर्ट तैयार करने में प्रधान भूमिका।

30.ब्रिटेन के हिंदी लेखकों की पुस्तकों के बहुभाषीय (हिंदी, अंग्रेजी, पंजाबी, उर्दू) संकलन COLORS OF POETRY का प्रकाशन। सौजन्य- काव्य रंग, नॉटिंघम, यूके।

31. माखन लाल चतुर्वेदी पत्रकारिता विश्वविद्यालय, भोपाल, के शोध आधारित त्रैमासिक जर्नल ‘मीडिया मीमांसा’ के न्यू मीडिया विशेषांक (द्विभाषीय) का अतिथि संपादन।

32. हिंदी में कंप्यूटर पर माउस टाइपिंग के लिए स्क्रीन आधारित टाइपिंग प्रणाली ‘वर्चुअल हिंदी टाइपराइटर’ का विकास।

33. आठ देशों (अमेरिका, इंग्लैंड, मॉरीशस, रूस, दक्षिण अफ़्रीका, जापान, नेपाल और भारत) में हिंदी से संबंधित सम्मेलनों, कार्यशालाओं, गोष्ठियों, प्रशिक्षण कार्यक्रमों में प्रतिभागिता और संचालन।

34. एक दर्जन से अधिक राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय पुरस्कार और सम्मान। सरकारी तथा निजी दोनों श्रेणियों में।

35. उत्तराखंड विश्वविद्यालय, हल्द्वानी, के पाठ्यक्रम में न्यू मीडिया (वेब पत्रकारिता) पर दो आलेख शामिल।

क. न्यू मीडिया के लिए लेखन   ख.  न्यू मीडिया की सीमाएँ

तकनीकी शैक्षणिक योग्यता-

1, मास्टर ऑफ कंप्यूटर एप्लीकेशंस (MCA), 2. मास्टर ऑफ बिजनेस मैनेजमेंट (सिस्टम्स) (MBA)
3. माइक्रोसॉफ्ट सर्टिफाइड सिस्टम इंजीनियर (MCSE, MCP, MCSE +I), 4. मास्टर ऑफ साइंस (M.Sc.)

तकनीकी व्यावसायिक पृष्ठभूमि-

मोरारका समूह में मुख्य महाप्रबंधक (सूचना प्रौद्योगिकी) C G M(IT)के पद पर तकनीकी क्षेत्र में विशेषज्ञता- 1. वेब निर्माण 2. सॉफ्टवेयर निर्माण 3. तकनीक पर लेखन 4. मल्टीमीडिया (वीडियो, ऑडियो, प्रेजेन्टेशन), 5. आधुनिक प्रकाशन तकनीकें (पेजमेकिंग, डिज़ाइन), 6. बहुभाषीय प्रणालियाँ 7. स्थानीयकरण. 8. सोशल मीडिया

पेशेवराना पृष्ठभूमि

1.राजस्थान पत्रिका समाचार पत्र समूह 2. इंडियन एक्सप्रेस समाचार पत्र समूह 3. हिंदुस्तान टाइम्स समाचार पत्र समूह 4. सहारा समाचार पत्र समूह ।

इसके अतिरिक्त

 balendu.com  पर बड़ी मात्रा में आलेख, ऑडियो (व्याख्यान आदि), वीडियो, चित्र, डाउनलोड योग्य सॉफ़्टवेयर तथा अन्य सामग्री उपलब्ध है।

       इस युवावस्था में तमाम शैक्षणिक, तकनीकी योग्यताओं से लैस होकर एक पेशेवर विशेषज्ञ के रूप में भारतीय भाषाओं के लिए प्रौद्योगिकी का सुदृढ़ आधार प्रदान करते हुए ‘भारत-भाषा प्रहरी’ के रूप में बालेन्दु शर्मा दाधीच ने जिस प्रकार भारतीय भाषाओं के कार्य किया है वह न केवल उल्लेखनीय है बल्कि उससे हिंदी के प्रयोग व प्रसार की राह प्रशस्त हुई है । हम आशा करते हैं कि भारत -भाषा प्रहरी बालेन्दु शर्मा दाधीच से प्रेरणा पाकर और भी युवा भाषा –प्रौद्योगिकी की नवीनतम प्रविधियों के साथ उद्योग, ज्ञान-विज्ञान, वाणिज्य- व्यापार व शिक्षा  आदि विभिन्न क्षेत्रों में भविष्य में भारतीय  भाषाओं के प्रयोग की अभिवृद्धि के वाहक बनेंगे ।

डॉ. एम.एल. गुप्ता ‘आदित्य’

वैश्विक हिंदी सम्मेलन, मुंबई

वेबसाइट – www.vhindi.in

ई मेल पता- vaishwikhindisammelan@gmail.com

— 
वैश्विक हिंदी सम्मेलन की वैबसाइट -www.vhindi.in
'वैश्विक हिंदी सम्मेलन' फेसबुक समूह का पता-https://www.facebook.com/groups/mumbaihindisammelan/
संपर्क – vaishwikhindisammelan@gmail.com

अब मोबाईल में ही मिल जाएगा रेल का टिकट

रोजमर्रा की यात्रा करने वाले मुसाफिरों को अब टिकट के लिए लाइन में लगकर परेशान होने की जरूरत नहीं है। अब घर बैठे इन लोकल ट्रेनों का टिकट मुसाफिरों के मोबाइल पर होगा।
 
बस मंत्रालय की ओर से जारी किए जाने वाले एप को अपने मोबाइल पर डाउनलोड करना होगा। मोबाइल पर ही पैसा कटाइये और टिकट आपके मोबाइल में होगा।
 
सफर के दौरान या फिर रेलवे स्टेशन पर टीटी अगर आपसे टिकट के बारे में पूछे तो झट से अपना मोबाइल फोन ऑन कर टिकट को दिखा दें यानि की रोजाना की झंझट से मुक्ति।  खास बात यह है कि एप के जरिये मोबाइल पर टिकट तो मंगवाया जा सकेगा, लेकिन कोई हेराफेरी नहीं हो। इसके लिए यह टिकट आगे फॉरवर्ड नहीं होगा।
 
कहने का मतलब यह है कि मोबाइल वाला मुसाफिर ही अपने पास यह टिकट रख सकेगा। फिलहाल यह सुविधा उन्हीं मुसाफिरों को मिल सकेगी, जिनके पास स्मार्ट फोन है।
 
हालांकि मंत्रालय का दावा है कि जल्द ही यह सुविधा आम मोबाइल फोन पर भी उपलब्ध कराई जाएगी। इसके लिए अभी शोध कार्य चल रहा है।
 
सबसे पहले इस सुविधा को सब अरबन रेलवे में लागू किया जा रहा है। पायलट प्रोजेक्ट के तौर पर जल्द ही यह सुविधा चेन्नई से तांबरम के बीच चलने वाली सब अरबन रेल में शुरू की जाएगी।
 
सुविधा सफल होने पर चेन्नई, मुंबई, कोलकाता सब अरबन रेलवे के बाद इसे दिल्ली, सिकंदराबाद व अन्य स्थानों की लोकल सेवाओं में प्रयोग में लाया जाएगा।
 
इस एप को अगर सफलता मिली तो आम ट्रेनों का जनरल टिकट भी इस सुविधा के जरिये लिया जा सकेगा।
 
रेल मंत्रालय एप के जरिये देश में पहली बार इस तरह का प्रयोग करने जा रहा है, जिसमें घर बैठे मुसाफिर को बिना किसी कष्ट के टिकट मिल जाए।
 
मुंबई उपनगरीय रेलवे में भी एक एप शुरू किया गया है, लेकिन उस सुविधा में मोबाइल पर एक नंबर आएगा। रेलवे स्टेशन पर लगी वेंडिंग मशीन पर दिया गया नंबर दबाने पर यात्री के हाथ में टिकट आ जाता है।

मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री जी को खुला पत्र

प्रति,
श्री शिवराज सिंह चौहान
माननीय मुख्य मंत्री, म. प्र.  शासन,
मुख्यमंत्री कार्यालय,मंत्रालय, वल्लभ भवन,
भोपाल
 
विषय : मध्य प्रदेश राजभाषा नीति बनाये जाने हेतु निवेदन
 
आदरणीय मान्यवर, 
मैंने सबसे पहले यह पत्र आपको ईमेल एवं डाक से 1 नवम्बर 2012 को भेजा था जिसपर संस्कृति संचालनालय ने यह कहकर पल्ला झाड़ लिया कि राज्य में राजभाषा अधिनियम लागू है इसलिए किसी "राजभाषा नीति' की राज्य को आवश्यकता नहीं है  परन्तु सच्चाई यह है कि वह कानून 1956 का है जो वर्तमान समय में उतना उपयोगी नहीं रहा है, जिस तेज़ी से सरकारी अफसर अंग्रेजी में ऑनलाइन सेवाएँ शुरू कर रहे हैं और अंग्रेजी को बढ़ावा दे रहे हैं उससे ऐसा लगता है कि अन्य राज्यों की तरह आगामी एक दशक बाद मध्यप्रदेश में भी हिन्दी को बाहर का रास्ता दिखा दिया जाएगा. हिंदी के प्रति आपके प्रेम और समर्पण के लिए आपका जितना भी अभिनन्दन किया जाए कम है।  पर मप्र विश्व में हिंदी की पहचान बने इसके लिए बहुत कुछ किया जाना बाकी है।  अब मैं अपनी बात शुरू करता हूँ: 
 
विश्व का कोई भी ऐसा देश जिसे अपने समाज में परिवर्तन लाना है और प्रगति करनी है, विदेशी भाषा पर निर्भर नहीं रह सकता। विशेषकर ऐसा देश जो लोकतांत्रिक मूल्यों में विश्वास करता हो किसी भी दशा में शासन और ज्ञान की भाषा के लिए जनता की भाषा की जगह औपनिवेशिक भाषा का इस्तेमाल नहीं कर सकता। कोई भी ऐसा देश जिसे अपने आत्मसम्मान का खयाल है, विदेशी भाषा की गुलामी नहीं कर सकता।  
आप चीन, जापान, कोरिया के अलावा रूस, जर्मनी, फ्रांस, इटली, स्पेन की तो बात ही छोड़ें यूरोप का छोटे से छोटा देश फिर चाहे वह स्वीडन हो या ग्रीस या पोलैंड या लुथवानिया सब की राजभाषा उनकी अपनी मातृभाषा है, और उन देशों में सारा कामकाज उनकी अपनी भाषा में ही किया जाता है, इन देशों ने सूचना प्रौद्योगिकी के द्वारा अपनी भाषाओं का बहुत विकास किया है, इन छोटे-२ देशों की भाषाओं में दुनिया के ज़्यादातर सॉफ्टवेयर उपलब्ध हैं । विचार करने वाली बात है कि किसी भी यूरोपीय देश कीराजभाषा विदेशी भाषा नहीं है। किसी देश के विकास के लिए ६७ वर्ष का समय कम नहीं होता। अगर हमने जरा भी कोशिश की होती तो प्रशासन, ज्ञान व संपर्क भाषा के सवाल को कब का सुलझा लिया होता पर हमारे शासकों को इस प्रश्न को उलझाए रखना ही श्रेयस्कर लगा । अब भारत के शासन ने सूचना प्रौद्योगिकी के नाम पर हिंदी को काफी पीछे छोड़ दिया है. शर्म की बात तो ये है कि आईटी की विश्व की श्रेष्ठ कंपनियों में गिनी जाने वाली भारतीय कंपनियों ने भी कभी हिंदी के लिए कुछ नहीं किया, ना कभी करने के बारे में सोचा.
अंग्रेजी के तथाकथित अंतर्राष्ट्रीय और ज्ञान की भाषा होने का तर्क कितना बोथरा है इसका सबसे बड़ा जवाब यह है कि अगर अंग्रेजी इतनी ही आवश्यक है तो फिर छोटे से छोटे यूरोपीय देश में यह भाषा अनिवार्य क्यों नहीं है? फ्रांस, जर्मनी और रूस क्या हम से पिछड़े हैं – वैज्ञानिक या सामाजिक प्रगति में अथवा अन्य किसी दूसरे मामले में भी? इन देशों ने अपनी भाषा के दम पर ही विकास किया है। अंग्रेजी की महानता का गीत असल में मानसिक गुलामी का गीत होने के अलावा स्वार्थ का गीत भी है। अंग्रेजी का लगातार विस्तार कर और उसे सरकारी प्रश्रय देकर इस मिथक को मजबूत किया जा रहा है कि भारतीय भाषाएँ इस काबिल हैं ही नहीं कि वे ज्ञान-विज्ञान और प्रशासन की भाषा बन पाएँ 
 
विश्व के दूसरे देश अपनी भाषाओं के लिए क्या कर रहे हैं:
·       फ्रांस में ऐसे ४००० शब्दों की सूची बनाई गई है जो उनकी भाषा में जबर्दस्ती घुस गए थे। एक विधेयक पारित कर इन शब्दों के फ्रेंच में इस्तेमाल रोकने का आदेश दिया गया। फ्रांसवासियों में स्व-भाषा के प्रति ज़बरदस्त आदर है। वे अपनी भाषा को अंग्रेजी से बेहतर मानते हैं।
·       नीदरलैंड में अंग्रेजी हटाने के लिए एक आंदोलन हुआ क्योंकि उनके अनुसार डच भाषा व संस्कृति को इससे ख़तरा है।
·       चीन, जापान, कोरिया और वियतनाम में सरकारी फरमान या आदेश अंग्रेजी में आने पर जनता तीव्र विरोध प्रकट करती है। जापानी भाषा विश्व  की सबसे क्लिष्ट है। उसकी लिपि में ५००० से अधिक चिन्ह हैं, लेकिन उसके बावजूद वे हर कार्य अपनी भाषा में ही करना पसंद करते हैं।
·       अंग्रेजी के बिना ही जापान ने जबर्दस्त उन्नति की है। जापान इलैक्ट्रॉनिक सामान व उपकरण बनाने में विश्व में सर्वोच्च स्थान प्राप्त देश है जिसके माल की खपत हर जगह है।
·       अनेक देशों जिनमें लीबिया, इराक व बांग्लादेश शामिल है ने एक झटके में अंग्रेजी को निकाल बाहर कर दिया। बांग्लादेश ने ईसाई मिशनरी के संदर्भ में कहा कि इनकी अंग्रेजी से हमारी बंगाली भाषा को खतरा है।
·       माओत्से तुंग ने सत्ता पर काबिज होते ही पूरे चीन में एक ही चीनी भाषा लागू कर दी, जबकि पहले वहां भी ६-७ क्षेत्रीय भाषाएँ थी। एक चीनी भाषा होने के कारण भाषायी एकता होने से सभी चीनी स्वयं को एक सूत्र में जुड़े अनुभव करते हैं। आज से दस वर्ष पहले चीनी भाषा में अंक नहीं थे इसलिए वे लोग अंग्रेजी के अंकों को ही इस्तेमाल करते थे परन्तु उन्होंने चीनी में अंकों को विकसित किया जिनका इस्तेमाल चीनी भाषा के साथ अनिवार्य किया गया है जबकि हमारे देश में हिंदी के साथ देवनागरी अंकों के इस्तेमाल पर रोक लगा दी गयी है!!!
·       संयुक्त अरब अमीरात ने अप्रैल २०१२ में ‘अरबी भाषा नागरिक अधिकार-पत्र’ लागू किया है जिसमें सरकार ने ये संकल्प लिया है कि संयुक्त अरब अमीरात विश्व में अरबी भाषा का सबसे बड़ा गढ़ बनेगा और उनके देश में अरबी भाषा को सर्वश्रेष्ठ स्थान दिया जाएगा। सरकार हर स्तर पर पर अरबी भाषा को लागू करेगी और उसका विकास करेगी।
स्पष्ट है कि अंग्रेजी कोई सर्वसम्मत अंतर्राष्ट्रीय भाषा नहीं है, जैसा कि हम समझते हैं। यह भी सभी को ज्ञात है कि अंग्रेजी वैज्ञानिक भाषा भी नहीं है। ना ही अंग्रेजी तरक्की की भाषा है। विश्व के कई देशों ने बिना अंग्रेजी के अपना लोहा मनवाया है। विश्व  के सभी छोटे-बड़े देशों में शासन की भाषा, शिक्षा-दीक्षा की भाषा, अभियांत्रिकी और चिकित्सा विज्ञान की भाषा उनकी अपनी भाषा है। ये देश भारत के महानगरों से भी छोटे हैं फिर भी उन्होंने अपने देशों में अपनी भाषा को लागू किया है। सूचना –प्रौद्योगिकी का इस्तेमाल करके ये देश अपनी भाषाओं को मजबूत कर रहे हैं। भारत में उल्टा हो रहा है, सूचना प्रौद्योगिकी के नाम पर हिंदी और क्षेत्रीय भाषाओं को शासन-प्रशासन-शिक्षा आदि से बाहर किया जा रहा है। वाह रे अंग्रेजी की मानसिक गुलामी!
संयुक्त अरब अमीरात के ‘अरबी भाषा नागरिक अधिकार-पत्र’ को पढ़कर मुझे आपको यह पत्र लिखने की प्रेरणा मिली है। मैं विनम्र अनुरोध के साथ अपने सुझाव आपके सामने रख रहा हूँ। इन सुझावों के आधार पर मप्र शासन को मध्य प्रदेश राजभाषा नीति बनानी चाहिए और उसे लागू करना चाहिए। यदि ऐसी राजभाषा नीति लागू कर दी जाती है तो मैं दावे के साथ कह सकता हूँ कि मध्य प्रदेश राजभाषा नीति का कदम अन्य हिंदी भाषी राज्यों एवं केंद्र सरकार के लिए भी प्रेरणास्रोत का काम करेगा और हिंदी को विश्वभाषा बनाने की दिशा में मील का पत्थर साबित होगा, साथ ही जब भी कभी हिंदी की स्वर्णिम गाथा लिखी जाएगी उसमें मप्र की वर्तमान सरकार और उसके मुखिया का नाम स्वर्णाक्षरों में अंकित किया जाएगा। मेरे सुझावों में से बहुत सी बातें पहले से ही शासन के कानूनों में शामिल होंगी पर फिलहाल वे ठीक तरह से लागू नहीं हो रही हैं इसलिए उनके पुख्ता क्रियान्वयन हेतु कदम उठाए जाने चाहिए।
 मध्य प्रदेश राजभाषा नीति
अन्य बातों के साथ मध्य प्रदेश राजभाषा नीति में निम्न बिन्दुओं को शामिल किया जा सकता है:
 प्रस्तावना :
 मध्य प्रदेश राजभाषा नीति मध्यप्रदेश में हिंदी को सर्वश्रेष्ठ स्थान पर स्थापित करने और उसे विश्व भाषा बनाने की दिशा में महत्त्वपूर्ण पहल है जो हमारे राज्य में हिंदी के प्रयोग के अनिवार्य दिशा-निर्देशों को रेखांकित करती है। हिंदी मध्यप्रदेश की आधारशिला है, मप्र की पहचान का सबसे बड़ा प्रतीक है और यही भारत की राष्ट्रीय पहचान का मूलभूत चिन्ह भी है।  हिंदी हमारी समृद्ध संस्कृति, इतिहास एवं गौरवशाली परंपरा का आधारस्तंभ है।  चूँकि मप्र शासन हिंदी को शिक्षा, संस्कृति और संचार की भाषा के रूप में विकसित करने के लिए कटिबद्ध है, दृढ संकल्पित है इसी के साथ मप्र शासन हिंदी को विज्ञान, प्रौद्योगिकी एवं चिकित्सा क्षेत्र की भाषा के रूप में विकसित करने के हर संभव कदम उठाने व इस कार्य में संलग्न व्यक्तियों और संस्थानों को प्रोत्साहित करने के अपने लक्ष्यों को दुहराता है।  लोगों में अपनी भाषा के प्रति प्रेम और गर्व की स्थापना, उसकी स्थिति को मजबूत बनाना और उसका निरंतर विस्तार करना शासन की प्राथमिकता में शामिल है और चूँकि मप्र अपने नागरिकों को हिंदी में सर्वश्रेष्ठ शिक्षा प्रदान करने की दिशा में प्रयासरत है ताकि वे अपनी समृद्ध सांस्कृतिक परम्पराओं और धरोहर पर गर्व कर सकें और अपने पूर्वजों की भाषा में नयी-नयी इबारतें गढ़ सकें तथा ‘अपना मध्यप्रदेश’ का स्वप्न साकार हो जहाँ हर भाषा और संस्कृति के लोग सद्भाव और प्रेम के साथ हिलमिलकर रहें।
 
सूचना-प्रौद्योगिकी एवं सरकारी कामकाज
१)          मप्र शासन के सभी जालस्थल (वेबसाइटें)/मोबाइल अनुप्रयोग अनिवार्य रूप से पूर्ण रूप से हिंदी में तैयार किए जाएँगे, सभी वेबसाइटों के पते "देवनागरी लिपि" में पंजीकृत करवाए जाएँगे और सभी में हिंदी पूर्व निर्धारित भाषा होगी और जैसे ही कोई इन्टरनेट पर पता लिखेगा वेबसाइट हिन्दी में ही खुलेंगी, जहाँ आवश्यक होगा वहाँ अंग्रेजी वेबसाइट का विकल्प दिया जाएगा। जो भी निजी कम्पनियाँ सरकारी वेबसाइटें बनाने के लिए अनुबंधित की गयी हैं उन्हें मध्य प्रदेश राजभाषा नीति का ध्यान रखते हुए इंटरनेट पर हिंदी के प्रयोग के सभी विकल्प वेबसाइटों पर उपलब्ध करवाने होंगे।
२)          सभी सरकारी वेबसाइटों पर ‘हिंदी सीखें’ के विकल्प का लिंक दिया जाएगा ताकि हिंदी ना जानने वाले हिंदी सीखने के लिए तकनीक का इस्तेमाल कर सकें ।
३)          सरकारी कामकाज में हिंदी का प्रयोग अनिवार्य होगा, सरकार को जमा किए जाए वाले सभी करार-समझौते, फॉर्म, पत्र, दस्तावेज आदि हिंदी में ही जमा किए जाएँगे, ऐसे सभी दस्तावेज किसी अन्य में भाषा में होने पर उनके साथ उनका अधिकृत हिंदी अनुवाद जमा करना आवश्यक होगा। निजी कंपनियों और विदेशी सरकारों से होने वाले सभी द्विपक्षीय करार/समझौते अनिवार्य रूप से द्विभाषी (हिन्दी-अंग्रेजी) होंगे।
४)          सभी सरकारी विभागों/संस्थानों/प्रतिष्ठानों/कंपनियों के पत्र-शीर्ष(लैटर-हैड), सभी अधिकारियों/कर्मचारियों के  आगन्तुक-पत्र (विजिटिंग कार्ड) अथवा पहचान–पत्र, रबर की मोहरें, रसीदें, लिफ़ाफ़े, सभी प्रकार की लेखन सामग्री (स्टेशनरी), सरकारी कंपनियों की सार्व-मुद्रा (कॉमन सील), वार्षिक रिपोर्ट/ वार्षिक लेखे, विभागों –संस्थानों-कंपनियों के प्रतीक-चिन्ह आदि अनिवार्य रूप से हिंदी में बनाए जाएँगे। इनको द्विभाषी (हिंदी-अंग्रेजी) में बनाना है अथवा नहीं, इसका अधिकार विभाग प्रमुख के पास होगा। जिन सरकारी विभागों/संस्थानों/प्रतिष्ठानों/कंपनियों के प्रतीक-चिन्ह अभी अंग्रेजी में हैं, उनमें तुरंत सुधार किया जाएगा.
शिक्षा विभाग/ शिक्षण संस्थान
५)          सभी निजी विद्यालय/विश्वविद्यालय/महाविद्यालय/ शिक्षण संस्थान आदि में सभी दिशा-निर्देश/ सूचना पटल, पदाधिकारियों के नाम/ पदनाम की पट्टियाँ, विद्यालय वाहन (स्कूल बस) पर संस्थान का नाम अनिवार्य रूप से द्विभाषी (हिंदी-अंग्रेजी) रूप में लिखा जाएगा। SCHOOL BUS  शब्द के साथ-२ ‘विद्यालय वाहन’ लिखना अनिवार्य होगा।
६)          हिंदी में उच्च-शिक्षा (विज्ञान/अभियांत्रिकी/ चिकित्साशास्त्र/कंप्यूटर विज्ञान/ प्रबंधन शिक्षा) के लिए सरकार ठोस कदम उठाएगी एवं निजी क्षेत्र को हिंदी में उच्च शिक्षा प्रदान करने के लिए प्रेरित/प्रोत्साहित/पुरस्कृत किया जाएगा।
७)          मप्र शासन सरकारी विद्यालयों में कक्षा ५ वीं तक सभी पाठ्यपुस्तकों में हिंदी अंकों (१२३४५६७८९०) के इस्तेमाल को पुनः प्रारंभ करेगा  और हिंदी अंकों के इस्तेमाल पर पाबन्दी लगाने वाले पुराने आदेश को वापस लिया जाएगा । ५ वीं कक्षा तक के बच्चों को हिंदी अंक सिखाए और पढ़ाए जाएँगे।
८)          शिक्षा विभाग पहली से पांचवी तक के पाठ्यक्रम में ‘भाषा-प्रेम और संस्कृति-प्रेम’ से संबंधित पाठों को शामिल करने की दिशा में कदम उठाएगा ताकि आगामी पीढ़ी में बचपन से ही अपनी भाषा और संस्कृति के प्रति मजबूत लगाव पैदा हो और हमेशा बना रहे।
९)          मप्र शासन निजी विद्यालयों /शालाओं के प्रबंधन मंडलों से अनुरोध करेगा  कि बच्चों को कक्षा ५वीं तक हिंदी विषय के साथ-२ हिंदी अंक लिखना-पढ़ना सिखाएँ।
१०)    मप्र शासन प्रयास करेगा  कि राज्य में प्राथमिक शिक्षा हिंदी में दी जाए, अभिभावकों को अपने बच्चों को कक्षा ५वीं तक हिंदी माध्यम में पढ़ाने के लिए प्रोत्साहित किया जाएगा एवं निजी शिक्षण संस्थानों को भी हिंदी माध्यम से कक्षा ५वीं तक गुणवत्तापूर्ण शिक्षा की व्यवस्था करने और प्रोत्साहित करने के लिए प्रेरित किया जाएगा।

उद्योग, कारोबार एवं निजी व्यावसायिक प्रतिष्ठान
११)    सभी निजी व्यावसायिक कार्यालयों/होटलों/ रेस्तराँ/ भोजनालय/निजी दुकानों/कंपनियों /बैंकों, वकील / सीएस / सीए / वास्तुविद / चिकित्सक आदि के दफ्तरों में नाम/पते के नामपट एवं पत्रशीर्ष आदि में हिंदी का प्रयोग अनिवार्य होगा, अंग्रेजी के इस्तेमाल की छूट रहेगी लेकिन हिंदी को प्राथमिकता के आधार पर प्रयोग किया जाएगा, हिंदी के अक्षर अंग्रेजी के अक्षरों से छोटे नहीं होंगे और हिंदी के अक्षर हमेशा अंग्रेजी अक्षरों से ऊपर अथवा पहले प्रदर्शित किये जाएँगे। इस प्रावधान के सख्ती से पालन के लिए सभी नगर-निगमों / नगरपालिकाओं / नगर-पंचायतों / ग्राम –पंचायतों को निर्देशित किया जाएगा।
१२)    केंद्र सरकार के कानूनों को ध्यान में रखते हुए मप्र में स्थित तथा मप्र शासन से पंजीकृत/लाइसेंस प्राप्त सभी निजी निर्माण इकाइयों/कारखानों को अपने सभी उत्पादों पर उत्पाद का नाम, उत्पादन तिथि-अवसान तिथि, मूल्य, वजन, निर्माता/विनिर्माता का नाम-पता एवं ग्राहकों के लिए आवश्यक जानकारियां अनिवार्य रूप से हिंदी में छापने का क़ानूनी प्रावधान किया जाएगा। 
१३)    सभी होटलों/ रेस्तराँ/ भोजनालय आदि, जहाँ अभी भोज सूची (मेनू) केवल अंग्रेज में तैयार की जाती है, को अपनी भोज सूची (मेनू कार्ड) द्विभाषी रूप में तैयार करना अनिवार्य होगा।
परिवहन विभाग
१४)    मप्र में सभी वाहन पंजीयन एवं चालक अनुज्ञप्ति (स्मार्ट कार्ड) अनिवार्य रूप से द्विभाषी (हिंदी-अंग्रेजी) में बनाये जाएँगे। जिसमें व्यक्ति का नाम, पता, जन्मतिथि आदि विवरण देवनागरी लिपि में अंकित किया जाएगा। स्मार्ट कार्ड से पहले ये दोनों [वाहन पंजीयन/एवं चालक अनुज्ञप्ति] केवल हिंदी में बनाए जाते थे इसलिए हिंदी प्रदेश में हिंदी को उसका शीर्ष स्थान फिर से मिलना चाहिए।
१५)    सभी सरकारी वाहनों पर वाहनों के पंजीयन क्रमांक अंग्रेजी के साथ-२ हिंदी (देवनागरी लिपि एवं देवनागरी अंकों में) में लिखना अनिवार्य होगा, वर्तमान में केरल/कर्नाटक/महाराष्ट्र आदि में अंग्रेजी के साथ-२ उनकी अपनी राजभाषा में वाहन क्रमांक लिखने का अनिवार्य प्रावधान है और इन राज्यों में इस प्रावधानों का पालन ठीक तरह से किया जा रहा है।
१६)    मप्र में पंजीकृत सभी निजी व्यावसायिक एवं व्यक्तिगत वाहनों पर कम-से कम एक स्थान पर वाहनों के पंजीयन क्रमांक अंग्रेजी के साथ-२ हिंदी (देवनागरी लिपि एवं देवनागरी अंकों में) लिखना अनिवार्य होगा। सभी निजी व्यावसायिक वाहनों पर ALL INDIA PERMIT, TOURIST VEHICLE, NATIONAL PERMIT, TAXI, AUTO के साथ-२ हिंदी में “अखिल भारतीय परमिट (अनुज्ञा), पर्यटक वाहन, राष्ट्रीय अनुज्ञा, टैक्सी, ऑटो” आदि लिखना अनिवार्य होगा। इसके लिए आवश्यक क़ानूनी प्रावधान किया जाए।
भाषा और संस्कृति
१७)    मप्र शासन देश के सभी हिंदी भाषी राज्यों की राज्य सरकारों के साथ मिलकर प्रति वर्ष “वार्षिक हिंदी सम्मलेन” आयोजित करवाएगी जिसका उद्देश्य होगा- सूचना प्रौद्योगिकी की सहायता से हिंदी भाषी राज्यों में निजी कामकाज में हिंदी को बढ़ावा देना एवं १०० % सरकारी कामकाज में हिंदी को लागू करवाना। इसके साथ ही पहले से मौजूद हिंदी संस्थाओं को मजबूत किया जाएगा।
१८)    मप्र से प्रकाशित होने वाले समाचारपत्रों/पत्रिकाओं एवं समाचार वेबसाइटों / समाचार चैनलों को हिंदी के मूल स्वरूप से छेड़छाड़ किये बिना अंग्रेजी भाषा के शब्दों को अपरिहार्य होने पर ही इस्तेमाल करना चाहिए, जहाँ लोकप्रिय और प्रचलित हिंदी शब्द पहले से उपलब्ध हैं अथवा अन्य भारतीय भाषा के शब्द को लिया जा सकता है, उनके स्थान पर अंग्रेजी शब्दों के इस्तेमाल से बचना चाहिए ताकि भाषाई घुसपैठ को रोका जा सके।
 
आशा करता हूँ कि आप मेरे सुझावों पर विचार करेंगे और आगामी समय में मप्र के नागरिकों को ‘मप्र राजभाषा नीति’ मिलेगी जिससे सुप्त हो चुके भाषाप्रेमियों में नई ऊर्जा और प्रेरणा का संचार होगा।

आपके सकारात्मक उत्तर की प्रतीक्षा है।

भवदीय,
प्रवीण जैन 
103 ए, आदीश्वर सोसाइटी 
सेक्टर 9 ए, वाशी, नवी मुम्बई 
पिन: 400703

मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने कहा बाबासाहेब ने वंचितों को सक्षम बनाया

मुंबई। मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने कहा है कि वंचितों को सक्षम बनाने के मामले में डॉ. भीमराव अंबेडकर ने समस्त विश्व में सबसे बड़ा काम किया है। उन्होंने कहा कि संविधान के माध्यम से सभी को समान अवसर देने के मामले में बाबासाहेब विश्व भर में मार्टिन लूथर से भी आगे रहे। मुख्यमंत्री मंगलवार को रेसकोर्स में मुंबई मेघवाल पंचायत के सामूहिक विवाह सम्मेलन अवसर पर बोल रहे थे। इस अवसर पर बीजेपी के वरिष्ठ विधायक मंगल प्रभात लोढ़ा ने मुख्यमंत्री का अभिनंदन किया। मंच पर राज्यसभा सांसद महंत शंभुप्रसादजी महाराज, कई साधु – संतों एवं महंतों सहित विधायक सुनिल शिंदे आदि भी उपस्थित थे।

रेसकोर्स में आयोजित इस विशाल आयोजन स्थल पर स्थापित सवरा मंडप के सत्य की डोर से मुख्यमंत्री फडणवीस ने ध्वजारोहण किया। सुबह सुबह आयोजित इस कार्यक्रम में करीब 10 हजार से भी ज्यादा लोग उपस्थित थे। विधायक लोढ़ा ने अपने वक्तव्य में मुख्यमंत्री के प्रति आभार जताते हुए कहा कि सरकार के मुखिया के रूप में मुख्यमंत्री वंचित वर्ग को आगे लाने की हर कोशिश कर रहे हैं, यह हम सभी के लिए खुशी की बात है। इस अवसर पर मुख्यमंत्री ने अनुसूचित जाति जमाती के विकास के लिए वेबसाइट का विमोचन भी किया। सामाजिक समरसता मंच की इस वेबसाइट में सरकार की विभिन्न योजनाओं का व्यापक जानकारी है।

मुख्यमंत्री ने अनुसूचित समाज के लिए सरकार के हर संभव सहयोग का आश्वासन देते हुए जाति प्रमाणपत्र में आ रही दिक्कतों के लिए नियमों में आवश्यक संशोधन की बात कही। इन्होंने कहा कि हम सभी को संविधान के माध्यम से विकास के समान अवसर मिले है, यह बाबासाहेब की देन है। इस अवसर पर मुख्यमंत्री ने बाबासाहेब आंबेडकर के लंदन आवास को महाराष्ट्र सरकार द्वारा लेने की चर्चा करते हुए मुंबई में उनके स्मारक के लिए इंदुमिल की जमीन के मामले में केंद्र के सहयोग के प्रति आभार जताया। सामाजिक समरसता मंच के तत्वावधान में आयोजित इस विशाल आयोजन को अनुसूचित एवं पिछड़े वर्ग के विकास के नए द्वार के रूप में देख जा रहा है। इस अवसर पर सभा स्थल पर सुबह 9 बजे से समरसता यज्ञ शुरू हुआ, जिसमें हजारों लोगों ने आहुति दी। सभा स्थल पर लगे करीब 30 स्टॉल पर विभिन्न सरकारी योजनाओं की जानकारी लेने के लिए अनुसूचित जाति, जनजाति एवं इतर समाज को लोगों में काफी उत्साह देखा गया। इस अवसर पर महिलाओं के लिए लगाए गए विशेष हेल्थ चेकअप कैंप में बड़ी संख्या में महिलाओं ने डाक्टरी सलाह ली। मुंबई में अनुसूचित जाति जमाती के विकास के लिए अपनी तरह का यह पहला विशाल आयोजन था।

ऐसी चिठ्ठियाँ लिखते थे मनमोहन सिंह

प्रधानमंत्री रहते हुए मनमोहन सिंह ने निजी तौर पर जामा मस्जिद के शाही इमाम को पत्र लिखा था और उन्हें यह भरोसा दिया था कि मुगलकालीन मस्जिद को संरक्षित स्मारक का दर्जा नहीं दिया जाएगा। यह जानकारी आर्कियोलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया की ओर से दिल्ली हाई कोर्ट में दिए गए एक पत्र से सामने आई है। हाई कोर्ट पिछले एक दशक से ज्यादा वक्त से यह पता लगाने की कोशिश कर रहा है कि मनमोहन सिंह के नेतृत्व वाली यूपीए सरकार ने जामा मस्जिद को संरक्षित स्मारक घोषित करने से क्यों इनकार कर दिया था। 

20 अक्टूबर 2004 को लिखे गए पत्र में तत्कालीन पीएम ने इमाम को लिखा था कि उन्होंने संस्कृति मंत्रालय और एएसआई को निर्देश दे दिया है कि वे मरम्मत का काम पूरा 'तय वक्त में' पूरा कर दें। इस मरम्मत का अनुरोध इमाम ने 10 अगस्त 2004 के लेटर में किया था। पीएम ने उन्हें लेटर में यह भी बताया था कि मंत्रालय ने तय किया है कि जामा मस्जिद को संरक्षित स्मारक घोषित नहीं किया जाएगा। 

कोर्ट में 15 दिनों पहले दाखिल अपने जवाब में एएसआई ने कहा कि जामा मस्जिद को केंद्र सरकार के तहत संरक्षित स्मारक का दर्जा देने का मुद्दा उठा था, लेकिन पूर्व प्रधानमंत्री ने शाही इमाम को 'भरोसा' दिया था कि मस्जिद को संरक्षित स्मारक घोषित नहीं किया जाएगा। एएसआई ने अपने पत्र में लिखा है, 'जामा मस्जिद संरक्षित स्मारक नहीं है, फिर भी इसके ऐतिहासिक महत्व को देखते हुए एएसआई 1956 से ही समय-समय पर रखरखाव का काम अपने खर्च पर करता रहा है। इसका पैसा संस्कृति मंत्रालय देता रहा है, न कि शाही इमाम या वक्फ बोर्ड।' 

इस संबंध में ईटी के सवालों के जवाब मनमोहन सिंह ने नहीं दिए। बुखारी से टिप्पणी के लिए संपर्क नहीं हो सका। पिछले 11 वर्षों में दिल्ली हाई कोर्ट की कई पीठों ने जामा मस्जिद को संरक्षित स्मारक घोषित न करने के निर्णय से जुड़ी फाइल की कॉपी मांगी है। ऐसा एक निर्देश 27 अप्रैल 2005 को कोर्ट के तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश जस्टिस संजय किशन कौल की अध्यक्षता वाली डिवीजन बेंच ने दिया था। 

कोर्ट ने 2004 में दाखिल की गई एक पीआईएल के संबंध में कदम उठाए थे। पीआईएल में मांग की गई थी कि अथॉरिटीज को जामा मस्जिद को संरक्षित स्मारक घोषित करने और उसके अंदर और आसपास से अतिक्रमण हटाने का निर्देश दिया जाए। पिछले साल नवंबर में सुहैल अहमद खान ने अपने वकील देविंदर पाल सिंह के जरिये दाखिल एक पीआईएल में शाही इमाम के बेटे की दस्तारबंदी को चुनौती दी थी और मस्जिद के मैनेजमेंट की सीबीआई जांच की मांग की थी। 

दिल्ली वक्फ बोर्ड के वकील ने कहा था कि जामा मस्जिद वक्फ की प्रॉपर्टी है, लेकिन वह यह नहीं समझा सके कि मस्जिद की देखरेख में बोर्ड ने अपने अधिकार का कोई इस्तेमाल क्यों नहीं किया है। बोर्ड भी कोर्ट के इस सवाल का जवाब नहीं दे सका कि उसने मस्जिद के पूरे मैनेजमेंट का जिम्मा मौलाना सैयद अहमद बुखारी पर क्यों छोड़ दिया है। ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड के फाउंडर मेंबर कमाल फारूकी ने ईटी से कहा, 'जामा मस्जिद को अगर संरक्षित स्मारक घोषित किया जाता है तो इसमें क्या दिक्कत हो सकती है। हालांकि एएसआई को यह लिखित गारंटी देनी होगी कि मस्जिद में नमाज पढ़ने पर कभी कोई रोक नहीं लगेगी। साथ ही, उसे अपने तहत आने वाली 53 मस्जिदों में नमाज की इजाजत देनी चाहिए।'

साभार- इकॉनामिक टाईम्स से