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अब एँड्रायड के एप कंप्यूटर में भी काम करेंगे

फोन में एंड्रॉयड ऑपरेटिंग सिस्टम पर चलने वाली बेहतरीन एप अब कंप्यूटर पर भी इस्तेमाल हो सकेंगी। गूगल क्रोम के जरिए यूजर एंड्रॉयड एप का लुत्फ उठा सकेंगे।
 
इससे पहले क्रोमबुक इस्तेमाल करने वाले लोगों के लिए कंपनी ने ‘एंड्रॉयड रनटाइम फॉर क्रोम’ नाम से फीचर तैयार किया था जिसका मकसद क्रोमबुक यूजर को एंड्रॉयड एप के इस्तेमाल की सुविधा देना था।
 
इसी महीने कंपनी ने इसी प्रोग्राम का अपडेट जारी किया है जिससे यूजर कंप्यूटर पर एंड्रॉयड एप्स का लुत्फ ले सकेंगे। फिलहाल यह अपडेट एप डेवलपर्स के लिए दिया गया है।
 
गूगल प्ले स्टोर पर बड़ी संख्या में मौजूद बेहतरीन एप की वजह से एंड्रॉयड ऑपरेटिंग सिस्टम नंबर वन बना हुआ है। कंपनी अब इन एप की सुविधा को क्रोम  ब्राउजर इस्तेमाल करने वाले लोगों को देना चाहती है।
 
व्हाट्सएप ने भी हाल में ही अपना वेब वर्जन जारी किया है। अब गूगल के एआरसी (एंड्रॉयड रनटाइम फॉर क्रोम) प्रोग्राम के जरिए वीचैट, वाइबर जैसी मैसेजिंग एप भी कंप्यूटर पर उपयोग की जा सकेंगी।
 
पिछले साल शुरू किया था प्रोग्राम
 
कंपनी ने पिछले साल अक्टूबर में क्रोम ऑपरेटिंग सिस्टम पर एंड्रॉयड एप के इस्तेमाल के लिए इस प्रोग्राम को लॉन्च किया था। लेकिन यह सुविधा कुछ एप डेवलपर्स को ही दी गई थी। कंपनी ने अब इसे सभी एप डेवलपर्स के लिए जारी कर दिया है। एप डेवलपर्स जल्द ही इस सेवा से कंप्यूटर के लिए अपनी एप का वर्जन तैयार करेंगे।
 
आप भी कर सकते हैं प्रयोग
 
गूगल का यह प्रोग्राम फिलहाल बीटा वर्जन में है, यानी अभी इसका टेस्ट हो रहा है। एप डेवलपर्स अपनी एप को इसके जरिए कंप्यूटर के लिए टेस्ट कर सकते हैं। लेकिन आप भी किसी एप को कंप्यूटर पर इस्तेमाल कर देख सकते हैं। इसके लिए पहले गूगल प्ले से एप का एपीके वर्जन कंप्यूटर में डाउनलोड करना होगा।
 
ऐसे करें एप का इस्तेमाल
 
सबसे पहले क्रोम का लेटेस्ट वर्जन कंप्यूटर में डाउनलोड कर लें। इसे www.google.com/chrome/ से डाउनलोड कर सकते हैं। इसके बाद क्रोम के वेब स्टोर से arc welder एप को क्रोम में एड कर लें। फिर लॉन्च एप का विकल्प दिखाई देगा।
 
यहां क्लिक करने के बाद एपीके वर्जन की एप को चुनने का विकल्प आएगा। अगर एप डेवलपर ने एआरसी प्रोग्राम के तहत एप पर काम किया है तो यह डेस्कटॉप पर खुल जाएगी।
 
कैसे डाउनलोड करें एपीके वर्जन
 
गूगल प्ले स्टोर से एप का एपीके वर्जन कंप्यूटर पर डाउनलोड किया जा सकता है। इसके लिए apps.evozi.com/apk-downloader पर विजिट करें। यहां गूगल प्ले पर मौजूद एप का यूआरएल एड्रेस बॉक्स में सबमिट कर दें। इसके बाद डाउनलोड के विकल्प पर क्लिक कर कोई भी एप कंप्यूटर पर डाउनलोड की जा सकती है। याद रखें कि इस एप का इस्तेमाल एआरसी प्रोग्राम के तहत ही किया जा सकता है।
 
क्रोम बुक पर आया गूगल नाउ
 
गूगल ने अपनी ‘गूगल नाउ’ सुविधा को क्रोमबुक इस्तेमाल करने वाले लोगों के लिए लॉन्च कर दिया है। कंपनी ने नए क्रोम ओएस 42 के साथ इसे लॉन्च किया है। नए ओएस में गूगल नाउ होम स्क्रीन पर दिखाई देगा। यहां सिर्फ ‘ओके गूगल’ कहने के बाद कई काम बोलकर कर सकते हैं।
 
बोलकर कुछ भी सर्च कर सकते हैं। जीमेल, यूट्यूब और गूगल मैप जैसे प्रोडक्ट का नाम लेते ही ये खुल जाएंगे। गूगल नाउ पर यूजर अपने घर, ऑफिस और मौजूदा लोकेशन को डाल सकते हैं। रास्ते में मिलने वाले ट्रैफिक की जानकारी हो या फिर मौसम संबंधी जानकारी, यह सब गूगल नाउ  के जरिए फोन की होमस्क्रीन पर उपलब्ध होगी।
 
साभार- दैनिक हिन्दुस्तान से 

12 लाख की नौकरी छोड़ खेती मं दिखाया दम

उत्तम खेती मध्यम व्यापार, नौकरी चाकरी भीख निदान। एक जमाना था, जब खेती को उत्तम माना जाता था। पिछले कुछ अर्से से किसानों के बेटे खेती छोड़कर नौकरी की तरफ भाग रहे हैं। किसानों का मानना है कि खेती घाटे का सौदा बन गई है।

निराशा के इस माहौल में बिजनौर के हरेवली का युवा किसान दूसरे किसानों के लिए भी मिसाल बना है। इस किसान ने 12 लाख रुपये सालाना पैकेज की नौकरी छोड़कर आधुनिक खेती की ओर रुख किया और दस बीघा जमीन में पॉलीहाउस बनाकर उसमें फूल एवं सब्जी की खेती करने के अपने प्रोजेक्ट को अमली जामा पहना दिया है।

राष्ट्रीय उद्यान बोर्ड भी इस किसान को 50 प्रतिशत सब्सिडी देकर प्रोत्साहित कर रहा है। भागूवाला मंडावली क्षेत्र के गांव हरेवली निवासी 34 वर्षीय हिमांशु त्यागी ने वर्ष 2005 में बंगलूरू के एक विश्वविद्यालय से एमबीए किया और करीब नौ साल तक प्राइवेट जॉब की।

हिमांशु ने करीब पांच माह पूर्व नौकरी के साथ आधुनिक रूप से पॉलीहाउस में फूल एवं सब्जी की खेती करने का निर्णय लिया। शुरू में सोचा था कि नौकरी के साथ खेती भी चलती रहेगी, लेकिन खेती में बढ़ती व्यस्तता को देखते हुए तीन माह पहले उसने नौकरी छोड़कर पूरा समय खेती में लगाना शुरू कर दिया।

हिमांशु एक कंपनी में मार्केटिंग हेड के पद पर थे। इनका सालाना पैकेज बारह लाख रुपये था। नौकरी छोड़ने के बाद अब वह पॉलीहाउस बनवाने में लगे हुए हैं। वह अपने गांव में दस बीघा जमीन में पॉलीहाउस बनवा रहे हैं।

इस युवा किसान ने राष्ट्रीय हॉर्टिकल्चर बोर्ड को पॉलीहाउस में फूल एवं सब्जी की खेती करने का प्रोजेक्ट भेजा था, जिसे बोर्ड ने मंजूरी दे दी है। 10 बीघा जमीन में पॉलीहाउस बनाने व उसमें फसल उगाने में करीब 90 लाख से एक करोड़ रुपये के बीच खर्च आएगा, जिसमें बोर्ड हिमांशु को 50 प्रतिशत सब्सिडी दे रहा है। जनपद का यह सबसे बड़ा पॉलीहाउस होगा। बकौल हिमांशु उनके पास 250 बीघा जमीन है। अब तक वे सारी ट्रेडिश्नल फसलें उगा रहे थे। परंपरागत खेती में उतना मुनाफा नहीं रहा है। पॉलीहाउस में बेमौसमी फूल एवं सब्जी भी उगाई जा सकती हैं, जिनके दाम अच्छे मिलते हैं। प्राकृतिक आपदा का असर भी पॉलीहाउस में कम होता है।

जिला उद्यान निरीक्षक नरपाल मलिक के अनुसार किसान पॉलीहाउस की ओर रुझान कर रहे हैं। पॉलीहाउस में खेती से बड़ा मुनाफा है। हिमांशु दस बीघा जमीन में पॉलीहाउस बना रहा है, जिसे मंजूरी मिल चुकी है। इससे पहले कोतवाली देहात के राजीव सिंह भी दो बीघा जमीन में पॉलीहाउस बनाकर खेती शुरू कर चुके हैं।

जनपद में प्राकृतिक आपदा से तबाह हुई फसलों के सदमे में तीन किसान दम तोड़ चुके हैं। किसानों को गेहूं, दलहन, तिलहन की फसल में नुकसान होने से बड़ा झटका लगा है। भाकियू जिलाध्यक्ष रामअवतार सिंह ने किसानों से हिम्मत से काम लेने की अपील की है।

साभार अमर उजाला से 

मोबाईल पर बगैर इंटरनेट के टीवी दिखाएगी प्रसार भारती

प्रसार भारती स्मार्टफोन्स पर लोगों को टीवी चैनल्स दिखाने के एक पायलट प्रॉजेक्ट पर काम कर रहा है। खास बात यह है कि इसमें इंटरनेट या टेलीकॉम ब्रॉडबैंड का इस्तेमाल नहीं होगा। प्रसार भारती की योजना इसके जरिए दर्शकों की अभी तक की सबसे अधिक संख्या तक बिना इंटरनेट के टीवी चैनल्स स्मार्टफोन्स पर पहुंचाने की है। 
 
प्रसार भारती के सीईओ जवाहर सरकार ने ईटी से कहा, 'जब दुनिया टेरेस्टेरियल से सैटेलाइट की ओर जा रही है तो दूरदर्शन पीछे जा रहा था। अब आगे बढ़ने का एकमात्र रास्ता नई टेक्नॉलजी के साथ मौजूदा इन्फ्रास्ट्रक्चर इस्तेमाल करने का है।'
 
इसकी शुरुआत में प्रसार भारती की योजना लगभग 20 फ्री-टु-एयर चैनल्स का एक बुके तैयार करने की है। इसमें डीडी के टॉप चैनल्स के अलावा बड़े प्राइवेट ब्रॉडकास्टर्स के लोकप्रिय फ्री-टु-एयर चैनल्स भी शामिल होंगे।
 
इसका मकसद नए जमाने के व्यूअर्स के साथ जुड़ना है, जो अपना काफी समय स्मार्टफोन और टैबलेट पर बिताते हैं।
 
सरकार ने बताया कि प्रसार भारती को यह लक्ष्य हासिल करने के लिए केवल अपने मौजूदा इन्फ्रास्ट्रक्चर को अपग्रेड करना होगा। उन्होंने कहा कि इंस्टॉल्ड ट्रांसमिटर्स की एक बड़ी संख्या है, जिनका इस्तेमाल डिजिटल सिग्नल्स को सीधे एक्सटर्नल डोंगल या एक इनबिल्ट चिप के जरिए भेजने के लिए किया जा सकता है।
 
उन्होंने बताया, 'हर व्यूअर एक हैंड-हेल्ड डिवाइस से जुड़े डोंगल के जरिए कॉन्टेंट देख सकेगा, जिसे सैमसंग, ऐपल, माइक्रोसॉफ्ट और एचसीएल जैसे हार्डवेयर मैन्युफैक्चरर्स अपने सिस्टम में इनबिल्ट कर सकते हैं, जैसा प्राइवेट एफएम रेडियो चैनल्स के लिए किया गया था।'
 
प्रसार भारती ने यह योजना मिनिस्ट्री ऑफ इन्फर्मेशन ऐंड ब्रॉडकास्टिंग को भेजी है। अभी दिल्ली में इंपोर्टेड डोंगल्स के इस्तेमाल से इसे इन-हाउस टेस्ट किया जा रहा है।
 
योजना के मुताबिक, व्यूअर्स एक सिंगल ब्रॉडकास्ट सर्विस में लगभग 20 टीवी चैनल्स और 20 रेडियो चैनल्स हासिल कर सकेंगे। ये फ्री टु एयर और फ्री फॉर लाइफ होंगे। इसके लिए किसी डिश, इंटरनेट और सेट-टॉप बॉक्स की जरूरत नहीं होगी।
 
ये ब्रॉडकास्ट एक बड़े एरिया के लिए होंगे, जिसे ट्रांसमिटर्स कवर करेंगे। यह एरिया डीडी के मौजूदा टेरेस्टेरियल ट्रांसमिशंस की कवरेज से बड़ा होगा।
 
एक्सपर्ट्स का कहना है कि यह योजना बहुत महत्वकांक्षी है और इसकी अपनी सीमाएं हैं, लेकिन अगर यह कामयाब होती है तो इसके परिणाम अच्छे होंगे।
 
सीनियर मीडिया एक्सपर्ट और मुंबई की अडवाइजरी फर्म सफायर प्रोफेशनल सर्विसेज के मैनेजिंग डायरेक्टर टिम्मी कंधारी ने कहा, 'यह तभी काम कर सकती है, जब टेक्नॉलजी बहुत अच्छी और मौजूदा उपलब्ध टेक्नॉलजी से अलग हो।' हालांकि, इसके साथ हार्डवेयर से जुड़े मुद्दे हो सकते हैं क्योंकि आईफोन जैसे बहुत से फोन्स में डोंगल के इस्तेमाल का प्रोविजन नहीं होता और प्राइवेट ब्रॉडकास्टर्स पहले ही स्मार्टफोन्स के लिए अपने प्लेटफॉर्म्स तैयार कर रहे हैं।
 
साभार- इकॉनामिक टाईम्स से

दुःख ,सन्तोष श्रीवास्तवकी कहानियों का स्थाई भाव है

"दुःख सन्तोष श्रीवास्तव की कहानियों का स्थाई भाव है ।उन्होंने दुःख को जिया है और ज़िन्दगी के कई रंग इनकी कहानियों में शिद्दत के साथ महसूस किये जा सकते हैं ये बातें सूरज प्रकाश ने अपने अध्यक्षीय वक्तव्य में संतोष श्रीवास्तव के कहानी सन्ग्रह 'आसमानी आँखों का मौसम ' के लोकार्पण के अवसर पर कहीं ।यह कार्यक्रम मणि बेन नानावटी महिला महाविद्यालय में आयोजित किया गया ।
                     
लोकार्पण समारोह में दिल्ली से पधारे 'पाखी ' के सम्पादक प्रेम भारद्वाज ने सन्तोष की कहानियों में भाषा के सहज प्रवाह को रेखांकित करते हुए कहा कि किसी रचना को पढ़ते हुए यदि किसी बड़ी घटना का स्मरण हो आये तो वह सफल रचना मानी जाती है ।सन्ग्रह की कहानियों में सब तरफ आग है लगी हुई,अंकुश की बेटियां ,नेफ्र्टीटी की वापिसी ऐसी ही कहानियाँ है ।कहानियों के संग संग पत्रकार की समग्र दृष्टि भी उनके लेखन की ख़ासियत है ।विशेष अतिथि के रूप में 'दमखम ' के सम्पादक वरिष्ठ कथाकार मनहर चौहान ने लेखिका को उनके निखरते लेखन के लिए बधाई दी ।मॉरीशस के प्रख्यात साहित्यकार राज हीरामन ने अपना बधाई सन्देश भेजा जिसका वाचन किया गया ।
            
सुमिता केशवा ने सरस्वती वन्दना के साथ साथ सन्तोष श्रीवास्तव के व्यक्तित्व पर प्रकाश डाला । जहाँ एक ओर रायपुर से आई मधु सक्सेना ने कहा कि सन्तोष की कहानियां साक्षी भाव से नहीं पढ़ी जा सकती उसमे डूबना ही होता है ,वहीँ लेखिका ने यह स्वीकार किया कि वे कथ्य को पूरी सामर्थ्य,सहजता और संवेदनशीलता से कहानियों में ढालने की कोशिश में बार बार अपने लिखे में डूबती उतराती हैं ।
                     
 डा. रवीन्द्र कात्यायन द्वारा संचालित  इस कार्यक्रम में महानगर के लेखक धीरेन्द्र अस्थाना ,कमलेश बक्शी ,कैलाश सेंगर ,सिब्बन बैज़ी  ,मधु अरोड़ा हस्ती मल हस्ती ,उमाकांत बाजपेयी ,प्रेमजनमेजय तथा विश्व मैत्री मंच की सभी सदस्याएं ,सहित ,सम्पादक ,पत्रकार ,मिडिया के लोग उपस्थित थे ।

सरकारी योजनाओं से इन्दिरा और राजीव गाँधी के नाम हटेंगे

मोदी सरकार की ओर से हाल में उठाए गए एक कदम से विवाद पैदा हो सकता है। केंद्र ने कांग्रेस के पूर्व प्रधानमंत्रियों दिवंगत इंदिरा गांधी और राजीव गांधी के नाम पर गृह मंत्रालय की ओर से हिंदी दिवस पर दिए जाने वाले सालाना राजभाषा पुरस्कारों का नाम बदल दिया है। ये पुरस्कार सरकार में हिंदी के प्रगतिशील तरीके से उपयोग के लिए दिए जाते हैं।
 
ईटी के पास राजभाषा विभाग की ओर से जारी निर्देश की कॉपी है। 25 मार्च 2015 को जारी किए गए इस आदेश में दोनों पूर्व प्रधानमंत्रियों के नाम पर दिए जाने वाले पुरस्कारों को बदल दिया गया है। 1986 में शुरू किया गया 'इंदिरा गांधी राजभाषा पुरस्कार' अब राजभाषा कीर्ति पुरस्कार के नाम से जाना जाएगा, जबकि 'राजीव गांधी राष्ट्रीय ज्ञान-विज्ञान मौलिक पुस्तक लेखन पुरस्कार' को अब राजभाषा गौरव पुरस्कार योजना कहा जाएगा।
 
मंत्रालय की जॉइंट सेक्रेटरी पूनम जुनेजा की ओर से जारी आदेश में कहा गया है कि नई पुरस्कार योजनाएं 2015-16 से शुरू की गई हैं और ये 1986 और 2005 में जारी पुराने निर्देश की जगह लेंगी। गृह मंत्रालय की ओर से यह निर्देश सभी राज्यों, मंत्रियों, प्रधानमंत्री कार्यालय (पीएमओ), राष्ट्रपति सचिवालय, कैबिनेट सचिवालय और लोकसभा, राज्यसभा सचिवालयों को भेजा गया है। ये पुरस्कार राष्ट्रपति 14 सितंबर को हिंदी दिवस के मौके पर मंत्रालयों, पीएसयू, केंद्र सरकार के अधिकारियों और प्राइवेट सिटीजंस को देते हैं।
 
गृह मंत्रालय के एक वरिष्ठ अधिकारी ने ईटी से कहा कि यह फैसला मंत्रालयों और जनता के बीच मौजूदा पुरस्कार योजनाओं को लेकर भ्रम को समाप्त करने के लिए लिया गया है क्योंकि इनमें बहुत से कंपोनेंट हैं। उनका कहना था, 'पुराने पुरस्कारों को नए पुरस्कारों में मिला दिया गया है। इसमें किसी राजनीतिक विवाद का कोण शामिल नहीं है क्योंकि पुरस्कार बीजेपी के किसी वरिष्ठ नेता या किसी हिंदी कवि के नाम पर नहीं दिए जा रहे। हालांकि, इस बारे में कुछ सुझाव मिले थे। इस प्रक्रिया पर पिछले वर्ष से काम हो रहा है। नए पुरस्कारों के तहत वित्तीय प्रोत्साहन बढ़ाए गए हैं।'
 
ईटी के पास वह बुकलेट भी मौजूद है, जिसमें गृह मंत्रालय की '300 दिनों की उपलब्धियों' की जानकारी दी गई है। इसमें भी इस बदलाव की पुष्टि की गई है। हालांकि, इस बारे में मंत्रालय के प्रवक्ता ने टिप्पणी देने से मना कर दिया।
 
अभी तक इंदिरा गांधी राजभाषा पुरस्कार के तहत हिंदी का सबसे प्रगतिशील उपयोग करने वाले मंत्रालयों या सरकारी कंपनियों या बैंकों को पुरस्कार के तौर पर शील्ड दी जाती थी, जबकि हिंदी में सर्वश्रेष्ठ मौलिक पुस्तकें लिखने वाले केंद्र सरकार के कर्मचारियों को 40,000 रुपये से एक लाख रुपये तक के नकद पुरस्कार मिलते थे। राजीव गांधी राष्ट्रीय ज्ञान-विज्ञान मौलिक पुस्तक लेखन पुरस्कार के तहत विज्ञान आधारित विषयों पर हिंदी में किसी व्यक्ति की ओर से लिखी गई पुस्तकों को 10,000 रुपये से दो लाख रुपये तक के पुरस्कार दिए जाते थे।
 
अब राजभाषा कीर्ति पुरस्कार योजना के तहत मंत्रालयों, पीएसयू, ऑटोनॉमस बोर्ड्स और सरकारी बैंकों को 39 शील्ड्स दी जाएंगी। नई राजभाषा गौरव पुरस्कार योजना के तहत ज्ञान और विज्ञान विषयों पर क्वॉलिटी वाली पुस्तकें लिखने वाले नागरिकों को 10,000 रुपये से दो लाख रुपये (पहले के समान) 13 पुरस्कार दिए जाएंगे। लेकिन हिंदी में मौलिक पुस्तकें लिखने वाले केंद्र सरकार के कर्मचारियों को 30,000 रुपये से एक लाख रुपये के चार नकद पुरस्कार दिए जाएंगे, जो राजीव गांधी के नाम पर दिए जाने वाले पिछले पुरस्कार के मुकाबले दोगुनी से ज्यादा नकद रकम है।

 
साभार- इकॉनामिक टाईम्स से

भविष्य बनाने में पानी बचाने की अहम भूमिका

भारतीय मौसम विभाग के एक पूर्वानुमान के अनुसार, देश में इस वर्ष मॉनसून में सामान्य से कम वर्षा होगी और औसत तापमान भी ऊंचा बना रहेगा। जाहिर है, इस बार इसका असर कृषि और महंगाई के साथ-साथ पानी की उपलब्धता पर भी पड़ेगा। तेज गर्मी ने पहले ही दस्तक दे दी है और पानी की भारी किल्लत की संभावना अभी से सामने मुंह बाए खड़ी है। 

याद रहे कि भारत में सन् 1997 में जलस्तर 550 क्यूबिक किलोमीटर था। लेकिन एक अनुमान के मुताबिक, सन् 2020 तक भारत में यह जलस्तर गिरकर 360 क्यूबिक किलोमीटर रह जाएगा। इतना ही नहीं, सन् 2050 तक भारत में यह जलस्तर और गिरकर महज सौ क्यूबिक किलोमीटर से भी कम हो जाएगा। यदि हम अभी से नहीं संभले तो मामला हाथ से निकल जाएगा। वैसे भी पहले ही बहुत देर हो चुकी है। नदियों के पानी के बंटवारे को लेकर देश में कई राज्यों के बीच दशकों से विवाद चल ही रहा है। कहीं इस सदी के पूर्वाद्ध में ही देश में पानी के लिए गृहयुद्ध न छिड़ जाए!

प्रसिद्द पर्यावरणविद दीप जोशी बताते हैं कि नदियों के देश में पीने के पानी का संकट गहराता जा रहा है। भूजल का स्तर भी लगातार गिर रहा है। गिरते भूजल स्तर को रोकने के लिए तमाम उपाय किए जा रहे हैं। दरअसल जनसंख्या में लगातार वृद्धि बढ़ते शहरीकरण और उद्योगीकरण, कृषि उपज की बढ़ती मांग से, जल की मांग में बेतहाशा इजाफा हुआ है। इससे सतह और भूजल संसाधनों का बेतरह दोहन हो रहा है। नतीजे में भूजल स्तर में लगातार कमी हो रही है। शहरी क्षेत्रों में स्थिति और भी गंभीर है इसलिए न केवल जल संसाधनों के संरक्षण बल्कि विभिन्न प्रतिस्पर्द्धी क्षेत्रों से निरंतर बढ़ती जल की मांग की वजह से प्रभावी कार्यनीतियों और प्रबंधन के द्वारा उन्हें बढ़ाने की तत्काल आवश्यकता है।

धरती से जल के दोहन के बदले कितना जल वापस धरती में जाना चाहिए? इस संबंध में दुनिया भर के वैज्ञानिकों में आम राय यह है कि साल भर में होने वाली कुल बारिश का कम से कम 31 प्रतिशत पानी धरती के भीतर रिचार्ज के लिए जाना चाहिए, तभी बिना हिमनद वाली नदियों और जल स्रोतों से लगातार पानी मिल सकेगा। एक शोध के मुताबिक,कुल बारिश का औसतन 13 प्रतिशत पानी ही धरती के भीतर जमा हो रहा है। देश के पूरे हिमालयी क्षेत्र में भी कमोबेश यही स्थिति है। जब हिमालयी क्षेत्र में ऐसा है, तो मैदानों को कैसे पर्याप्त जल मिलेगा? धरती के भीतर पानी जमा न होने के कारण एक ओर नदियां व जलस्रोत सूख रहे हैं, तो दूसरी ओर, बरसात में मैदानी इलाकों में बाढ़ की समस्या विकट होती जा रही है। वर्ष 1982 में अमेरिकी वैज्ञानिकों ने पूर्वी अमेरिका के कुछ घने वनों में शोध करके यह निष्कर्ष निकाला कि साल भर में होने वाली कुल बारिश का कम से कम 31 प्रतिशत पानी धरती के भीतर जमा होना चाहिए, तभी संबंधित क्षेत्र की नदियों, जल स्रोतों आदि में पर्याप्त पानी रहेगा। 

वैज्ञानिक भाषा में भूमिगत जल के तल को बढ़ाना रिचार्ज कहा जाता है। रिचार्ज का स्तर 31 प्रतिशत से थोड़ा नीचे रहे, तो ज्यादा चिंता की बात नहीं, लेकिन पर्वतीय क्षेत्र के वनों में पानी के रिचार्ज के संबंध में कराए गए एक अध्ययन के जो परिणाम निकले हैं, वे अनुकूल नहीं हैं। 

कुमाऊं विश्वविद्यालय में भूगोल विभाग के प्रोफेसर व नेचुरल रिसोर्स डाटा मैनेजमेंट सिस्टम के प्रिंसिपल इंवेस्टीगेटर प्रो. जे.एस रावत ने छह साल तक पर्वतीय क्षेत्र पर केन्द्रित अपने एक अध्ययन में जो स्थिति पाई, वह वास्तव में चिंताजनक है। शोध में उन्होंने पाया कि बांज के वन क्षेत्र में बारिश के पानी का रिचार्ज 23 प्रतिशत, चीड़ के वन क्षेत्र में 16 प्रतिशत, कृषि भूमि में 18, बंजर भूमि में पांच तथा शहरी क्षेत्र में मात्र तीन प्रतिशत है। यदि औसत निकाला जाए, तो रिचार्ज का यह स्तर मात्र 13 प्रतिशत है, जो मानक से 18 प्रतिशत कम है। शहरी क्षेत्र में तो रिचार्ज की स्थिति और भी चिंताजनक है। सड़कें, भवन और अन्य निर्माण कार्यों के कारण शहरी इलाकों में बारिश का तीन प्रतिशत पानी ही धरती के भीतर जमा हो पाता है, जबकि शहरों में पानी की खपत गांवों की अपेक्षा कई गुना अधिक है। 

जल विज्ञान के चितेरे प्रो. रावत का कहना है कि बारिश से आने वाला पानी पर्याप्त मात्रा में धरती के भीतर जमा नहीं होगा, तो गरमी के दिनों में जलस्रोतों और गैर हिमनद नदियों का सूखना निश्चित है। उनका कहना है कि रिचार्ज का स्तर गिरने से ही पहाड़ में जल स्तर कम हो गया है, क्योंकि धरती के भीतर पानी जमा नहीं होगा, तो गरमी के मौसम में एक स्तर के बाद जल स्रोतों से पानी आना बंद हो जाएगा। वैज्ञानिकों के मुताबिक नदियों का जलस्तर भी इसी कारण कम हो जाता है। यही आज की स्थिति है। वैज्ञानिकों के अनुसार, आबादी तेजी से बढ़ने और वनों का क्षेत्रफल घटने से रिचार्ज का स्तर घट रहा है। भवनों, सड़कों तथा अन्य निर्माण कार्यों से अधिकांश भूमि कवर हो जाती है। ऐसे में बारिश का पानी धऱती के भीतर नहीं जा पाता। इसलिए नगरीय क्षेत्रों में जल स्रोतों का पानी तेजी से कम होता जा रहा है। 

दूसरी तरफ, सघन वनों में रिचार्ज का स्तर अधिक होता है, क्योंकि बारिश का पानी पत्तों से टकराकर धीरे-धीरे भूमि पर पहुंचता है और रिसकर भूमि के भीतर जमा हो जाता है। बर्फबारी से भी पानी का रिचार्ज बहुत अच्छा होता है। बर्फ की मोटी परत जमने के बाद पानी बहुत धीरे-धीरे पिघलता है और रिसकर धीरे-धीरे जमीन के भीतर चला जाता है। इसके अलावा चौड़ी पत्ती वाले वन क्षेत्रों में रिचार्ज का स्तर अधिक होता है, जबकि वृक्ष रहित स्थानों, आबादी क्षेत्रों में पानी तेजी से बहकर निकल जाता है। यह पानी नदियों के जरिये बहकर समुद्र में पहुंच जाता है। हिमालयी क्षेत्र में बारिश का अधिकांश पानी बह जाने से मैदानी इलाकों में बाढ़ की विकराल समस्या की वजह यही है। 

छत पर वर्षा जल को संचयन करने से क्या अभिप्राय है। आइये समझें। वर्षा जल के छत पर संग्रहण का अभिप्राय है –  शहरी क्षेत्र में दत पर प्राप्त वर्षा जल का संचयन व कृत्रिम पुनर्भरण द्वारा भूमि जल भण्डारण में वृद्धि क़रने के लिए इसका उपयोग। छत के निकासी पाइप को जोड़कर एकत्रित जल को मौजुदा कुंए / टयूबवैल / बोरवैल में अथवा विशेष तौर पर बनाए गये कुएं में डालना। शहरी आवासीय कम्पलैक्सों और संस्थागत भवनों अथवा रिहायशी भवनों के समूह, जिनकी छत का क्षेत्रफल अधिक हो, इस उद्देश्य के लिए प्रयोग में लाये जा सकते है। भूमि जल भण्डारण में वृद्धि और जल स्तर में गिरावट पर नियन्त्रण करने के लिए। इसकी आवश्यकता है – भूमि जल गुणवत्ता में सुधार के लिए। पानी के सतही बहाव, जो अन्यथा नालों में भरकर रूक जाता है, को कम करने के लिए। सड़कों पर पानी भरने से रोकने के लिए। पानी की उपलब्धता को बढ़ाने के लिए। भूमि जल के प्रदूषण को कम करने के लिए। भूमि जल की गुणवत्ता को बढ़ाने के लिए। मृदा कटाव को कम करने के लिए। 

पर्यावरण प्रदूषण आज एक ग्लोबल समस्या बन चुकी है। भारत भी इसका अपवाद नहीं है। इस क्रम में जल प्रदूषण को लेकर सबसे ज्यादा चिंता जताई जा रही है। आने वाले समय जहां स्वच्छ पेय जल की कमी को लेकर विश्वयुद्ध की संभावना जताई जा रही है, तो दूसरी ओर जो जल हमारे पास उपलब्ध है, उसे प्रदूषित किया जा रहा है। इस प्रदूषण से नदियों, कुंओं और तालाबों के जल के साथ ही भूमिगत जल स्त्रोत भी विषाक्त हो रहे हैं। ऐसे में जल संरक्षण, संवर्द्धन और प्रबंधन के लिए कई उपाय अपनाए जा रहे हैं। इन कारणों से जल प्रबंधन के क्षेत्र में युवाओं के लिए रोजगार के कई नए अवसर पैदा हुए हैं। यही नहीं, देशभर के विभिन्न संस्थानों में जल संरक्षण से संबंधित विभिन्न पाठ्यक्रमों को चलाया जा रहा है । इसमें वर्षा जल संरक्षण (वाटर हारवेस्टिंग), वाटरशेड मैनेजमेंट जैसे पाठ्यक्रम प्रमुख हैं। 

वर्षा जल-संचयन के लिए इंदिरा गांधी राष्ट्रीय मुक्त विश्वविद्यालय (इग्नू) ने पाठ्यक्रम शुरू किया है। इसका मुख्य मकसद शिक्षार्थियों को जल संसाधनों को बढ़ाने और उनके उचित उपयोग के लिए संवेदनशील बनाना, जल संचयन तकनीकों को समझने के लिए आवश्यक कौशल और निपुणता प्रदान करना और शिक्षार्थियों को घरेलू और सामुदायिक स्तर पर प्रशिक्षकों और संगठनकर्ताओं की तरह कार्य करने के लिए सक्षम बनाना है ताकि प्रभावी जल प्रबंधन और जल संरक्षण संभव हो सके।

इस सर्टिफिकेट कार्यक्रम में चार क्रेडिट के चार पाठ्यक्रम है इनमें से तीन सैद्धांतिक और एक प्रायोगिक पाठ्यक्रम हैं। इसके तहत जल संचयन का परिचय, जल विज्ञान की मौलिक अवधारणाएं, जल संचयन, संरक्षण व उपयोग और जल संचयन संस्था में प्रायोगिक प्रशिक्षण आते हैं। इस पाठ्यक्रम के लिए दसवीं पास या इग्नू से स्नातक प्रारंभिक कार्यक्रम (बीपीपी) होना जरूरी है। इसकी अवधि न्यूनतम छह महीने और अधिकतम दो साल है। अध्ययन का माध्यम अंग्रेजी और हिंदी है। 

इस प्रशिक्षण के बाद रोजगार के मौके भी मिलते हैं। सर्टिफिकेट धारक, जल संचयन परियोजनाओं में कार्य कर रहे विभिन्न सरकारी और गैरसरकारी संगठनों (एनजीओ, शहरी आवास बोर्ड, आदि), निर्माताओं, मृदा संरक्षण विभागों और भूजल बोर्ड में जल संचयन सहायक के रूप में कार्य करने के लिए पूर्णतया सक्षम होंगे।
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प्राध्यापक, शासकीय दिग्विजय स्नातकोत्तर 
स्वशासी महाविद्यालय, राजनांदगांव 
मो.9301054300 

किराया देने के पैसे नहीं थे इसलिए पत्रकारिता छोड़ी, मगर अब….

मीडिया के क्षेत्र में  ऐसे अजीबोगरीब दास्तानें सामने आ सकती हैं, जब किसी को पत्रकारिता जगत का नोबेल पुरस्कार तब मिले, जब वो पैसे की तंगी या कम तनख्वाह के चलते मीडिया की दुनिया को  ही अलविदा कह चुका हो। कैलीफोर्निया के टोरेंस के एक छोटे से अखबार दे डेली ब्रीज के संवाददाता रॉब कुज्नियां को खोजी पत्रकारिता के लिए   जब पुलित्जर पुरस्कार की घोषणा हुई तो उनके अखबार का ऑफिस ही नहीं पूरा शहर ही हैरत में पड़ गया।

हैरत में पड़ने वाली बात भी थी, जिस अखबार में रॉब काम करते थे द डेली ब्रीज, उसके बस 63,000 ही ग्राहक थे और कुल सात संवाददाताओं के सहारे वो पूरा अखबार काम चलाता था, ऐसे में काम तो ज्यादा था ही, और तनख्वाह उतनी भी नहीं मिलती थी, जिससे रोज का खर्चा भी चल सके। हालात तो तब मुश्किल हो गए, जब उनको घर का किराया देना भी मुश्किल हो गया।

ऐसे में रॉब ने अपना पेशा ही बदलना बेहतर समझा और जैसा कि कई मीडिया वाले करते आए हैं, वो पीआर यानी जनसंपर्क  की एक कंपनी में नौकरी करने लगे। लेकिन उनकी एक खोजी रिपोर्ट  को पुलित्जर पुरस्कारों के लिए भेजा गया था, छोटे से शहर के छोटे से अखबार के एक कम वेतन पाने वाले रिपोर्टर को वो अवॉर्ड मिलने की उम्मीद होती तो वो पेशा ही क्यों बदलता? 

दो लोगों ने उस अखबार में रहते हुए हाईस्कूल  के खिलाफ भ्रष्टाचार की रिपोर्ट की पूरी  सीरीज चलाई थी. जिसमें बाद में इसकी वजह से सरकार को कानून बदलना पड़ा था।  अब जाकर पुलित्जर अवॉर्ड्स में उनका नाम आया  तो  रॉब के ढूंढना शुरू किया तो पता चला कि वो मीडिया को अलविदा कह चुके हैं। लेकिन अब लगता है मीडिया उनको फिर से बुला रही है।

साभार- समाचार4मीडिया से 

महिलाओं के इशारे पर भी चल रही है भारतीय रेलें

कभी घर की चौखट से बाहर नहीं निकलने वाली महिलाएं अब भारतीय रेल का चक्का दौड़ाने में बढ़चढ़ कर हिस्सा ले रही हैं। फौलादी रेल पटरियों की मरम्मत, टिकट चेकिंग, मालगाड़ी का गार्ड, स्टेशन मास्टर और गेटमैन जैसे जो कार्य पहले रेलवे में सिर्फ पुरुषों के ही बस के माने जाते थे, अब महिलाएं भी इन कठिन श्रमसाध्य कार्यों को सफलतापूर्वक कर रही हैं।

लखनऊ मंडल में तैनात ट्रैकमैन (महिला) कैलाशा हों, मालगाड़ी चलाने वाली राधारानी हों, चल टिकट परीक्षक प्रतिभा सिंह हों या फिर गेटमैन (महिला) कुमारी मिर्जा सलमा बेग हों, सबने अपने हौसलों से साबित कर दिया है कि अगर हिम्मत और लगन से किया जाए तो कोई कार्य मुश्किल नहीं।

उत्तर रेलवे के मंडल रेल प्रबंधक (लखनऊ) अनिल कुमार लहोटी ने भाषा से कहा, पारंपरिक रूप से रेलवे में जो कार्य पुरुषों के ही बस के समझे जाते थे, उक्त महिलाओं ने ऐसे कार्यों को सफलतापूर्वक अंजाम देकर साबित कर दिया है कि वे किसी भी मामले में पुरुषों से पीछे नहीं हैं। उन्होंने कहा, कभी सुना ही नहीं होगा कि टिकट चेकिंग कोई महिला कर रही है। ट्रेनों में किस किस तरह के यात्रियों से सामना होता है, आप भली भांति जानते हैं लेकिन वाराणसी में तैनात प्रतिभा सिंह ने 2014-15 में उत्कष्ट कार्य किया और बिना टिकट यात्रियों से 27 लाख रूपये से अधिक की आय रेलवे के राजस्व में जोड़ी और एक आदर्श प्रस्तुत किया।

लहोटी ने बताया कि सलमा बेग लखनऊ के निकट मल्हौर में गेटमैन (महिला) के पद पर तैनात हैं। महिला कर्मचारी होने के बावजूद वह दिन और रात की पाली में मालगाड़ियां एवं सवारी गाड़ियां पास करती हैं। महिला कर्मचारी होने के बावजूद अकेले ही गेट की ड्यूटी सफलतापूर्वक निर्वाह कर दूसरे कर्मचारियों के लिए मिसाल पेश करती हैं।

जैतीपुर में बतौर ट्रैकमैन (महिला) तैनात कैलाशा रेल पटरियों को दुरूस्त करने का कार्य करती हैं। इनमें रेल लाइन पर पड़ी गिटिटयों को ठीक से लगाना, स्लीपर को दुरूस्त करना शामिल है। ये अत्यंत शारीरिक श्रम वाले कार्य हैं लेकिन कैलाशा इन्हें बखूबी अंजाम देती हैं।

कुमारी सरिता शुक्ला आलमबाग में आलमनगर स्टेशन पर सहायक स्टेशन मास्टर पद पर तैनात हैं। महिला कर्मचारी होने के बावजूद वह दिन और रात की पाली में कार्य करते हुए औसतन 55 गाडियों की पासिंग एक पाली में करती हैं। आलमनगर स्टेशन लखनऊ मंडल का महत्वपूर्ण इंटरचेंज प्वाइंट है, जहां कार्य करते हुए सरिता बिना किसी दबाव के क्रू गार्ड मामले का प्रबंधन भी आसानी से करती हैं। इसके अलावा दैनिक यात्रियों के मुद्दे, सफाई व्यवस्था, पीआरएस-बुकिंग भी देखती हैं।

इन महिलाओं का मानना है कि हौसला हो तो कोई भी कार्य किया जा सकता है। अब ये जरूरी नहीं कि जिन क्षेत्रों मे केवल पुरुषों का वर्चस्व हुआ करता था, महिलाएं उनमें आगे नहीं आ सकतीं। रेलवे भी एक ऐसा क्षेत्र है, जहां महिलाओं ने कठिन और दु:साध्य समझे जाने वाले तकनीकी कार्य, कड़े श्रम से जुडे कार्य, यात्रियों को संभालने से लेकर गाडिम्यों के गार्ड और स्टेशन मास्टर तक की जिम्मेदारियों को सहजता से निभाया है।

लहोटी ने बताया कि नर्सिंग और रेलवे सुरक्षा बल (आरपीएफ) में भी महिलाओं की भूमिका काफी सशक्त है। अभी लखनऊ मंडल में आरपीएफ में 30 कांस्टेबल और दो महिला सब इंस्पेक्टर हैं, जिन्हें विशेष तौर पर महिला सुरक्षा के लिए तैनात किया गया है।

साभार- दैनिक हिन्दुस्तान से 

भोपाल में राष्ट्रीय जनसंपर्क दिवस पर गोष्ठी का आयोजन

राष्ट्रीय जनसंपर्क दिवस के अवसर पर पब्लिक रिलेशन सोसायटी भोपाल द्वारा ‘सबका साथ सबका विकास’ विषय पर एक दिवसीय गोष्ठी का आयोजन किया। जिसका शुभारंभ वरिष्ठ समाजसेवी श्री सुरेश चौकसे द्वारा किया गया। इस अवसर पर माखनलाल पत्रकारिता वि.वि. के पत्रकारिता विभाग के प्रमुख पुष्पेन्द्र पाल सिंह ने सी.एस.आर. मॉडल की सफलता हेतु जनसंपर्क रणनीति को आगे ब़ाने पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि कारर्पोट जगत को वंचित वर्ग से सीध्ो जो़कर समाज का विकास सुनिश्चित करना होगा। जनसम्पर्क विभाग के पूर्व अपरसंचालक प्रकाश साकल्ले ने समाज के सबसे कमजोर वर्ग को ध्यान में रखकर शासकीय योजनाओं के क्रिन्यान्वयन पर फोकस किया।
 
पब्लिक रिलेशन सोसायटी के सचिव डॉ. संजीव गुप्ता ने कहा कि हमारी भारतीय संस्कृति, वेदों तथा प्रकृति में भी सबको साथ लेकर ही विकास की कल्पना साकार की गई है। विज्ञान में इको सिस्टम भी इसी अवधारणा पर कार्य करता है। दीनदयाल उपाध्याय जी की अंतयोदय की अवधारणा भी समाज के अंतिम छोर के वंचित व्यक्ति के कल्याण एवं सहयोग के साथ ही संपूर्ण समाज के विकास को देखता है। अध्यक्ष संजय सीठा ने नेशनल चेप्टर की भावना अनुरूप ‘प्रभावी सी.एस.आर. के लिए बेहतर जनसंपर्क’ की रणनीति को सम्पूर्ण समाज के विकास के लिए आवश्यक बताया एवं कहा कि सी.एस.आर. के निमित्त पन्द्रह हजार करो़ की राशि का सही उपयोग समाज विकास में होना चाहिए।
 
चेप्टर के कोषाध्यक्ष मनोज द्विवेदी ने कहा कि कार्पोरेट सोशल रिस्पोंस्बिलिटी को सिर्फ मंदिर एवं ट्रस्ट तक सीमित न रखकर समाज के सभी वर्गों तक पहुंचना होगा। पत्रकारिता वि.वि. के प्रबंधन विभाग के अध्यक्ष डॉ.अविनाश बाजपेयी ने कहा कि कार्पोट क्षेत्र आजकल सामाजिक उत्तरदायित्वों के प्रति लगातार संवेदनशीलता का प्रदर्शन कर रहा है। डॉ. पवित्र श्रीवास्तव ने कहा कि सबका साथ लेकर ही सम्पूर्ण समाज का विकास एवं जागरूकता के लिए बेहतर जनसंपर्क किया जा सकता है। नेशनल चेप्टर के वरिष्ठ प्रतिनिधि विष्णु खन्ना ने सी.एस.आर. मॉडल को देश के हित में सही तरीके से लागू करने पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि कार्पोरेट जगत अगर ठान लें तो समाज का वंचित वर्ग, समाज विकास में महती भूमिका का निर्वहन कर सकता है। इस अवसर पर महेन्द्र सिंह पवार, शिव हर्ष सुहालका, राकेश शर्मा, विशेष सोनी, विनोद मंडलोई सहित गणमान्य लोग उपस्थित थे।

भारतीय सैनिकों ने 15 देशों के 170 नागरिकों को भी बचाया

विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता विकास स्वरूप ने ट्वीट किया, 'दोस्त संकट में है। भारत ने वाणिज्यिक व भारतीय वायु सेना के विमानों से 15 देशों को 170 नागरिकों को बाहर निकाला है।'
 
भारत ने स्पेन के अलावा, पोलैंड के 33, चेक गणराज्य के 20, अमेरिका के 10, जर्मनी के आठ, यूक्रेन के पांच, फ्रांस के एक, ब्राजील के चार तथा तंजानिया के एक नागरिक को बाहर निकाला है।
 
 
अमेरिका ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर संकट प्रबंधन द्वारा वैश्विक नेतृत्व के लिए भारत की मंगलवार को तारीफ की। भारत में अमेरिकी राजदूत रिचर्ड वर्मा ने कहा, 'भारत ने हाल के कुछ हफ्तों में पहले यमन और फिर नेपाल में अपने वैश्विक नेतृत्व को दर्शाया है। हम इसके लिए आभारी, प्रभावित और प्रेरित हैं।'