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इस ग्रामीण बुजुर्ग से कुछ सीखेंगे देश के नेता?

मन में कुछ कर दिखाने की चाहत हो तो मुश्किल काम भी आसान हो जाते हैं। दमोह जिले के मड़ियादो के समीप मदनटोर गांव के एक बुर्जुग ने ऐसी ही एक मिसाल पेश की है।

जीवन के अंतिम पड़ाव में कुछ हटकर कर दिखाने की चाहत और आत्म विश्वास से भरे इस बुजुर्ग ने गांव के समीप एक बंजर पहाड़ी को हरा-भरा करने चट्टानों को चीरकर पहाड़ी पर अकेले ही सौ फीट गहरा कुआं खोद दिया है।

 

काम को अंजाम तक पहुंचाने में भले ही उसे सात साल लग गए, लेकिन अब कुएं में निकले पानी से पहाड़ी पर लगभग सौ फलदार पौधे लग चुके हैं। एकाध साल में उनमें फल भी आने लगेंगे। बंजारा जाति के बुर्जुग परसा बंजारा 65 ने बिना किसी की मदद के अकेले ही पहाड़ी पर सौ फीट गहरा कुआं खोद दिया हैं। पिछले सात सालों से अपने परिवार से दूर रहकर उसने पहाड़ी पर ही अपना डेरा जमा रखा है। पहाड़ी पर मंदिर भी बनाया है।

मंदिर के चढ़ावे से जीवन-यापन

आस-पास के लोग यहां मंदिर में जो चढ़ावा या प्रसाद चढ़ाने आते हैं उसी से उसका जीवन-यापन होता है। उसका परिवार भी है, लेकिन जिस दिन उसने इस कार्य की शुरूआत की उसे लगा कि परिवार के साथ रहकर वह अपने मकसद को पूरा नहीं कर सकता इसलिए उसने घर छोड़ दिया। हालांकि उसके परिवार के लोग भी कभी-कभी उसे भोजन की व्यवस्था कर देते हैं। परिवार के सभी लोग मजदूरी करते हैं।

 

परसा बंजारा ने बताया कि उसे लगा कि पूरा जीवन ऐसे ही निकला जा रहा है, अब कुछ करना चाहिए। उसने तय किया कि गांव के समीप पहाड़ी बंजर है यदि इसे हराभरा कर दिया जाए तो अच्छा होगा। उसने बताया कि सात साल पहले जब उसने पहाड़ी पर पौधे रोपना शुरू किया तो पानी की कमी के कारण कई पौधे मुरझा जाते थे।

सात साल में सौ फीट गहरा कुंआ

उसे पहाड़ी के नीचे लगभग आधा किमी दूर एक जंगली नाले से पानी लाना पड़ता था। एक दिन उसने सोचा कि यदि पहाड़ी पर ही कुआं खोद दिया जाए तो ये समस्या खत्म हो जाएगी। उसे पता था कि इस कार्य के लिए कोई मदद नहीं करेगा, इसलिए उसने खुद ही कुआं खोदना शुरू कर दियां उसके पास एक लोहे की राड जिसे सब्बल कहते हैं और कुछ अन्य औजार थे। उसने पहाड़ी की चट्टानों को काटना शुरू किया और सात साल में लगभग सौ फीट गहरा कुआं खुद गया। आज कुएं में पर्याप्त पानी है और अब पौधों की सिंचाई के लिए उसे पानी की परेशानी नहीं होती है।

साभार: http://naidunia.jagran.com से 

‘बड़ों’की दुनिया में बेखौफ क्यों नहीं हैं बच्चे ?

यहाँ हर शख्स हर पल हादसा होने से डरता है ,
खिलौना है वो मिट्टी का फ़ना होने से। 
मेरे दिल के किसी कोने में है मासूम सा बच्चा,
बड़ों की देखकर दुनिया बड़ा होने से डरता है। 

भारत में बच्चों की गुमशुदगी की घटनाओं में लगातार बढ़ोत्तरी हो रही है। आज स्थिति यह है कि देश में हर छह मिनट में कहीं न कहीं से एक बच्चे को गायब कर दिया जाता है। सरकारी आँकड़ों के मुताबिक वर्ष 2009 में 68227, वर्ष 2010 में 77133, तथा 2011 में 90654 बच्चे गायब हुये। इनमें से लगभग 40 फीसदी का कोई अता-पता नहीं चल पाया। यही हाल बाद के वर्षों में भी रहा। अगर बच्चे देश के भविष्य हैं, तो फिर सोचना ही होगा कि बच्चे आगरा गुम होते रहे तो देश का वह आने वाला कल भी क्या अंधेरी गलियों में गुम नहीं हो सकता ? गुम हो रहे बच्चों के ग़म से सरोकार और बचपन बचाने की जरूरत पर संजीदगी से विचार, वक्त की बहुत बड़ी मांग है। इसे नज़रअंदाज़ किया जाता रहा तो कहना न होगा कि बड़ों की दुनिया से बच्चों का भरोसा उठ जाएगा। 

मुट्ठी में तकदीर नहीं !
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विडम्बना देखिये कि इतने जघन्य अपराध की रोक-थाम के लिये देश में न ही कोई कारगर कानून बना है और न ही देश की संसद में एक बार भी इस गम्भीर मुद्दे पर चिन्ता दिखाते हुये कोई चर्चा करायी गयी। गाहे-बगाहे, इक्के-दुक्के  सवाल पूछ भी लिए गए तो उसी अन्दाज़ में सरकारी महकमों के मुंशियों  द्वारा तैयार किया गया घिसा-पिटा जवाब पढ़कर सुना दिया जाता है। दरअसल बच्चों के मामले में बचकानी सोच के तंग दायरे अभी तक बदस्तूर बने हुए हैं। शायद हमें यही लगता है कि इतनी विशाल आबादी में से मुट्ठी भर बच्चों के खो जाने से क्या फर्क पड़ता है ? लेकिन,याद रहे कि इन्हीं बच्चों के लिए नन्हे मुन्ने बच्चे तेरी मुट्ठी में क्या है जैसे तराने भी इसी धरती पर गूंजे हैं। अब आप ही बताइये कि खो जाने वाले या गुम कर दिए जाने वाले गुमसुम बच्चे आखिर कैसे कहेंगे – मुट्ठी में है तक़दीर हमारी। बेबस बच्चे भला अपनी किस्मत को बस में करने का ऐलान कैसे कर सकते हैं ?

पाठकों को स्मरण होगा कि बच्चों के गायब होने के सम्बन्ध में कुछ साल पहले ही देश में एक गम्भीर काण्ड का खुलासा हुआ था जिसने पूरी मानव सभ्यता के सिर को शर्म से झुका दिया था। दिल्ली से सटे निठारी गाँव जो अब नोएडा उप नगर का एक भाग बन चुका है, में जब एक दिन सफाई कर्मचारियों को गटर में बच्चों के जिस्मों के टुकड़े मिले तो पूरा मुल्क सन्नाटे में आ गया था। लेकिन इससे पहले जब-जब भी गुमशुदा बच्चों के माता-पिता अपनी गुहार लेकर स्थानीय पुलिस थाने पहुँचे तो उनको निराश और अपमानित होकर ही लौटना पड़ा। बाद में पता चला कि इंसानी शक्ल के नरभक्षी दरिन्दे उन मासूम बच्चों का खून निकालकर पीते थे और टुकड़े-टुकड़े करके माँस खा जाते थे। इससे ज्यादा शर्मनाक बात और क्या होगी कि इतने नृशंस व हृदय विदारक घटना के बाद भी न तो हमारी सरकार चेती और न उमड़ी समाज की संवेदना ज्यादा दिनों तक टिकी रह सकी।

गुमशुदगी एक अपराध 
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शान्ति के नोबेल पुरस्कार से सम्मानित बचपन बचाओ अभियान के शिल्पकार कैलाश सत्यार्थी का कहना बेहद माकूल मालूम  है कि बच्चों की गुमशुदगी, बच्चों और उनके माता-पिता व परिजनों के साथ ऐसा घिनौना और यातनामय अपराध है जिसे किसी भी सभ्य समाज में बर्दाश्त नहीं किया जाना चाहिये। गुमशुदा बच्चों में ज्यादातर झुग्गी-बस्तियों, विस्थापितों, रोजगार की तलाश में दूर-दराज के गाँवों से शहरों में आ बसे परिवारों, छोटे कस्बों और गरीब व कमजोर तबकों के बच्चे होते हैं। चूँकि ऐसे लोगों की कोई ऊँची पहुँच, जान-पहचान या आवाज नहीं होती इसलिये पुलिस, मीडिया और यहाँ तक कि पड़ोसी भी उनको कोई तवज्जो नहीं देते हैं।

बच्चे बचाएँ, बचपन संवारें 
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माता-पिता भी ज्यादातर अशिक्षित तथा डरे-सहमे होते हैं। जानकारी के अभाव में पुलिस में रिपोर्ट दर्ज कराने के बजाय वे लोग अपने बच्चे के गुमशुदा होने के कई घण्टों अथवा एक-दो दिन बाद तक स्वयं ही खोज-बीन में लगे रहते हैं। अगर समाज और पुलिस की मुश्तैदी से बच्चों का चुराया जाना रोका जा सके तो ऐसे अनेक अपराधों पर अंकुश लगाया जा सकता है। विडम्बना इतनी ही नहीं है के बच्चे गुम हो रहे हैं,त्रासदी यह भी है कि अनगिन ऐसे बच्चे भी हैं जिनका बचपन ही गुम हो गया है। ये काम पर जाने वाले बच्चे हैं। लिहाज़ा, बच्चों की गुमशुदगी के साथ-साथ बचपन की नामौजूदगी दोहरी चुनौती हमारी व्यवस्था के सामने है। इस चुनौती से मुंह फेरना एक ऐसे इतिहास में खुद को दर्ज़ करने की तैयारी है जो हमें कभी माफ़ नहीं करेगा। हम याद रखें कि बच्चे बचेंगे तो देश बचेगा और बचपन बचेगा तो देश संवरेगा। 
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लेखक,शासकीय दिग्विजय पीजी 
कालेज, राजनांदगांव के प्रध्यापक हैं। 
मो.9301054300 

विज्ञान के अध्यापक वरुण कुमार का आँखे खोलने वाला एक पत्र

अंग्रेजी माध्यम के विद्यार्थी, विद्यालयों के  संचालक, शिक्षक, अंग्रेजीदां अफसर व नेता आदि अवश्य पढ़ने का कष्ट करें।
 
मैं लुधियाना के एक सरकारी स्कूल में बच्चों को भौतिक विज्ञान पढ़ाता हूँ और अपने कोचिंग सेंटर में एम.एस.सी. गणित के बच्चों को पढाता हूँ। मेरे पास जो बच्चे पढ़ रहे हैं वे सरकारी स्कूलों से ही आए होते हैं और अंग्रेजी कम आने की वजह से अपने आप को नालायक समझने लग जाते थे।

मैने आपका लेक्चर कुछ साल पहले पखोवाल गाँव के स्कूल पहुँच कर लगाया था और उस दिन से मेरा पढ़ाने का तरीका बदल गया। मैं बच्चों को बताता हूँ कि अंग्रेजी कोईविद्वान होने का अकेला साधन नहीं, बल्कि इस के बिना भी दुनिया के हर विज्ञान को सीखा जा सकता है। मेरे बच्चे पंजाबी में भौतिक विज्ञान के किसी भी विषय पर बहुत कुछ बता सकते हैं और मुझे ख़ुशी है कि मैं बढ़िया विज्ञानी और बढ़िया डाक्टर बना रहा हूँ। अंग्रेजी की दौड़ में लगे हुए इंसान नहीं होंगे मेरे विद्यार्थी !

मैं टोपोलोजी और फील्ड थ्योरी भी पंजाबी में पढाता हूँ और आपको जानकर ख़ुशी होगी कि मेरे ही एम.एस.सी. के विद्यार्थी २०१२, २०१३ और २०१४ में लगातार,  पंजाब यूनिवर्सिटी के टॉपर रहे हैं,  क्योंकि टोपोलोजी को पंजाबी में पढने वाले बच्चे ही इसे समझ पाते हैं। जोगा जी, मैंने  कान्वेंट के बच्चों को भी भौतिक विज्ञान पढ़ाया है। सच, एसा बुरा हाल मैंने कभी नहीं देखा बच्चों का। उन्हें भौतिक विज्ञान तो क्या आना।

अंग्रेजी माध्यम वालों को अंग्रेजी भी हम से अच्छी नहीं आती, जब कि मैं खुद दसवीं तक पंजाबी माध्यम में ही पढ़ा था। मैं आपकी इस लड़ाई में आप का सच्चा साथी बनूँगा। मैं अपनी जिन्दगी पंजाबी में हर एक विज्ञान को पढ़ाने और समझाने के लिए  ही लगाऊँगा ।

छोटे-छोटे बच्चों को जब अंग्रेजी माध्यम स्कूल की बस में जाता देखता हूँ तो मेरी आत्मा कांपने  लगती है। मुझे यह तो एहसास था कि कुछ गलत हो रहा है पर मुझे सही दिशा आप के उस लेक्चर से  मिली थी जब मैंने पखोवाल गाँव के एक स्कूल में आप को सुना था। उस दिन को मैं कभी नहीं भूल सकता। उसी दिन मेरे अध्यापन को एक नई दिशा और एक नया मकसद मिला था। आप अपने मकसद में जरूर कामयाब होंगे जोगा जी, क्योंकि आप मनुष्य को मनुष्य होना सिखा रहे हो। उसे उसकी मात्री भाषा देकर उसे अनाथ की तरह जीने से बचा रहे हो ।यह कान्वेंट और अंग्रेजी माध्यम स्कूलों के बच्चों के साथ भीमेरी भावनाएं जुड़ी है जोगा जी, कि इन बच्चों को बचा लें हम ।
 
 
 
 
प्रस्तुतिः जोगा सिंह
ਜੋਗਾ ਸਿੰਘ, ਐਮ.ਏ., ਐਮ.ਫਿਲ., ਪੀ-ਐਚ.ਡੀ. (ਯੌਰਕ, ਯੂ.ਕੇ.)
ਕਾਮਨਵੈਲਥ ਵਜੀਫਾ ਪ੍ਰਾਪਤ (1990-93)
ਪ੍ਰੋਫੈਸਰ ਅਤੇ ਸਾਬਕਾ ਮੁਖੀ, ਭਾਸ਼ਾ ਵਿਗਿਆਨ ਅਤੇ ਪੰਜਾਬੀ ਕੋਸ਼ਕਾਰੀ ਵਿਭਾਗ
ਸਾਬਕਾ ਡਾਇਰੈਕਟਰ, ਸੈਂਟਰ ਫਾਰ ਡਾਇਸਪੋਰਾ ਸਟੱਡੀਜ਼
ਪੰਜਾਬੀ ਯੂਨੀਵਰਸਿਟੀ, ਪਟਿਆਲਾ – 147 002 (ਪੰਜਾਬ) – ਭਾਰਤ।
ਜੇਬੀ: +91-9915709582 ਦਫ: +91-175-304-6241
Joga Singh, M.A., M.Phil., Ph.D. (York, U.K.)
Commonwealth Scholarship Awardee (1990-93)
Professor & Former Head, Department of Linguistics & Punjabi Lexicography
Former Director, Centre for Diaspora Studies
Punjabi University, Patiala – 147 002 (Punjab) – INDIA.
Mobile: +91-9915709582   Office: +91-175-304-6241
E-mail: jogasinghvirk@yahoo.co.in  virkjoga5@gmail.com
Web: http://punjabiuniversity.academia.edu/JogaSingh

प्रो. पुष्पिता अवस्थी ‘वैश्विक हिंदी सम्मेलन’, मुंबई की मानद समन्वय प्रभारी

प्रो. पुष्पिता अवस्थी भारतीय दूतावास एवं भारतीय सांस्कृतिक केंद्र, पारामारिबो, सूरीनाम में पूर्व प्रथम सचिव एवं हिंदी प्रोफेसर रही हैं। वे सुप्रसिद्ध साहित्यकार, संपादक, अनुवादक,

संगठनकर्ता हैं। इसके पूर्व वे जे कृष्णमूर्ति फाउन्डेशन के बसंत कॉलेज फॉर विमैन की हिंदी विभागाध्यक्ष भी रही हैं। उन्हीं के संयोजन में वर्ष 2003 में सूरीनाम में सातवाँ विश्व हिंदी

सम्मलेन संपन्न हुआ था। वर्ष 2006 से वे नीदरलैंड स्थित 'हिंदी यूनिवर्स फाउन्डेशन' की निदेशक हैं और वे वर्ष 2010 में गठित अंतर्राष्ट्रीय भारतवंशी सांस्कृतिक परिषद की महासचिव हैं।

उन्होंने ‘वैश्विक हिंदी सम्मेलन’, मुंबई की कैरिबियाई, यूरोपीय तथा भारतवंशी बहुल देशों की मानद समन्वय प्रभारी के रूप में कार्य के लिए अपनी सहमति प्रदान की है।

 

प्रो. पुष्पिता अवस्थी के संपर्क सूत्र :
नवीनतम काव्य रचना के लिए ब्लॉग स्पॉट
http://pushpitaawasthi.blogspot.nl (Hindi)
http://poetpushpita.blogspot.in (English)

Professor Dr. Pushpita Awasthi
Director Hindi Universe Foundation
Postbus 1080, 1810 KB Alkmaar,  Netherlands
0031 72 540 2005,  0031 6 30 41 0778
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मोदी ने तारीफ की , जनरल सिंह की और खिल्ली उड़ाई मीडिया की

फांस, जर्मनी और कनाडा के 9 दिवसीय दौरे से लौटने के बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने रविवार को जनरल वी.के. सिंह की जमकर तारीफ की और सरकार के अच्छे कार्यों की अनदेखी करने के लिए मीडिया की आलोचना की। गौरतलब है कि पीएम की विदेशी यात्रा के दौरान केंद्रीय मंत्री जनरल वी.के.सिंह मीडिया को ‘प्रेस्टीट्यूट’ बताने वाले अपने बयान के लिए मीडिया के एक हिस्से के निशाने पर रहे थे।
 
मोदी ने कहा, ‘मैं जनरल (सेवानिवृत्त) वी.के. सिंह को सलाम करता हूं। ‘उन्होंने यमन से भारतीयों को निकालने के लिए मंत्री के नेतृत्व में ‘अभूतपूर्व’ राहत मिशन की सराहना की। 
 
मोदी ने ऐसे समय में सिंह के कार्यों की अनदेखी के लिए मीडिया की आलोचना की, जब पूरी दुनिया के समाचार पत्र भारतीय बचाव मिशन को प्रमुखता दे रहे थे।
 
उन्होंने कहा, यमन में 24 घंटे बमबारी चल रही हो, लोग मरने-मारने पर लोग तुले हुए थे। हम वहां दो घंटे बमबारी रोकवा कर, जितने भारतीय हैं उनको खोज कर निकाला। यह छोटी घटना नहीं है। दुनिया के टीवी देख लीजिए, सब हमारे ऑपरेशन को कवर कर रहे हैं। लेकिन भारत के अखबारों में आखिरी में इसकी चर्चा हुई वह भी दूसरे कारणों से। 
 
प्रधानमंत्री ने कहा, ‘मेरा मानना है कि यह दुनिया में पहली बार हुआ है कि एक सरकारी मंत्री इस कार्य को करने के लिए युद्धक्षेत्र में एक सैनिक की तरह खड़ा रहा मैं जनरल वी.के. सिंह को सलाम करता हूं।’ 
 
उन्होंने मीडिया पर कटाक्ष करते हुए कहा कि कुछ लोग अपने हिसाब से खबरें बना कर चलाते हैं लेकिन ऐसी खबरों से उनका सरोकार नहीं होता है।

2014 का पद्मभूषण डॉ. मोटूरि सत्यनारायण पुरस्कार डॉ. सुधा ओम ढींगरा को

2014 का पद्मभूषण डॉ. मोटूरि सत्यनारायण पुरस्कार डॉ. सुधा ओम ढींगरा को दिया जाएगा, इसकी घोषणा दिनांक 24 अप्रैल, 2015 (शुक्रवार) को भारतीय प्रेस क्लब, नई दिल्ली में केंद्रीय हिंदी शिक्षण मंडल के माननीय उपाध्यक्ष डॉ.कमल किशोर गोयनका की अध्यक्षता में  में संस्थान के निदेशक प्रो. मोहन द्वारा हिन्दी सेवी सम्मान के विद्वानों के नामों की जारी की गई सूची में की गई है। 

पुरस्कृत विद्वानों को संस्थान की ओर से एक लाख रुपए, शॉल तथा प्रशस्ति-पत्र, भारत के राष्ट्रपति के हाथों प्रदान कर सम्मानित किया जाता है। यह सम्‍मान विदेशों में हिन्‍दी के प्रचार प्रसार के लिए बहुत उल्‍लेखनीय कार्य करने हेतु दिया जाता है। डॉ. सुधा ओम ढींगरा कैनेडा से प्रकाशित होने वाली हिन्‍दी की महत्‍त्‍वपूर्ण साहित्यिक पत्रिका हिन्‍दी चेतना की संपादक हैं। कथाकारा तथा कवयित्री डॉ. सुधा ओम ढींगरा के अभी तक चार कहानी संग्रह प्रकाशित हो चुके हैं कमरा नंबर 103, कौन सी ज़मीन अपनी, वसूली तथा दस प्रतिनिधि कहानियां। साथ ही चार कविता संग्रह सरकती परछाइयां, धूप से रूठी चांदनी, सफ़र यादों का तथा तलाश पहचान की भी प्रकाशित हो चुके हैं। उनके संपादन में राष्‍ट्रीय पुस्‍तक न्‍यास से प्रवासी महिला कथाकारों की कहानियों का संकलन इतर अभी प्रकाशित हुआ है। डॉ. सुधा ओम ढींगरा को उत्‍तर प्रदेश हिन्‍दी संस्‍थान द्वारा वर्ष 2013 का विदेश प्रसार सम्‍मान तथा वर्ष 2013 हेतु ही स्‍पंदन प्रवासी सम्‍मान भी प्रदान किया जा चुका है।

पूरा जीवन खपा कर अरविंद कुमार ने हिन्दी वालों को गुलामी से मुक्ति दी!

कब तक हमारी पीढ़ियाँ विदेशी दृष्टिकोण से बने इंग्लिश कोशोँ का इस्तेमाल करने के लिए विवश होती रहेँगी?
क्रांतिकारी कोशकार अरविंद कुमार की अजब कहानी

बयालीस साल पहले लगी चिंगारी से भड़की ज्वाला अभी तक शांत नहीँ हुई है

समांतर कोश की रचना से भारतीय कोशकारिता मेँ क्रांति लाने वाले अरविंद कुमार का जन्म 17 जनवरी 1930 को मेरठ शहर मेँ वहाँ के प्रख्यात वंश लालावालोँ मेँ हुआ था। उन के पिता लक्ष्मण स्वरूप स्वाधीनता आंदोलनोँ मेँ सक्रिय रहते थे, और माँ रामकली चौथी पास गृहिणी थीँ। अरविंद की आठवीं कक्षा तक की शिक्षादीक्षा मेरठ की म्यूनिस्पल प्राइमरी पाठशाला और वैश्य तथा देवनागरी हाई स्कूलोँ मेँ हुई। काम की तलाश मेँ पिताजी सपरिवार दिल्ली आ गए। तेरह वर्षीय अरविंद का दाख़िला करोलबाग़ मेँ नए खुले श्री गुरुतेग़ बहादुर ख़ालसा हाई स्कूल मेँ मैट्रिक तक पढ़े। पाँच भाई बहनोँ वाले परिवार की कठिन आर्थिक अवस्था मेँ योगदान करने के लिए अप्रैल 1945 मेँ पंदरह-वर्षीय अरविंद नई दिल्ली के प्रसिद्ध दिल्ली प्रैस मेँ छापेख़ाने का काम सीखने के इरादे से बालश्रमिक के तौर पर दाख़िल हुए। धीरे धीरे तरक़्क़ी करते वह डिस्ट्रीब्यूटर से कंपोज़ीटर, कैशियर, टाइपिस्ट, प्रूफ़ रीडर और उपसंपादक बने। लिखने का शौक़ उन्हेँ बचपन से ही था। उन के आरंभिक लेख 1948-49 मेँ दैनिक पत्रोँ मेँ छपे थे। 1963 तक सायंकालीन शिक्षा संस्थानोँ मेँ पढ़ कर वह इंग्लिश साहित्य मेँ ऐमए कर चुके थे और दिल्ली प्रैस से प्रकाशित होने वाली हिंदी सरिता, इंग्लिश कैरेवान तथा अन्य सभी पत्रिकाओँ के प्रभारी संपादक बन गए थे। हिंदी से इंग्लिश मेँ अनुवाद करने मेँ और इंग्लिश लेखोँ का संपादन करते उन्हेँ अकसर बेहतर शब्दोँ की ज़रूरत पड़ती थी। तब उन्हेँ रोजट का इंग्लिश थिसारस मिला – एक के बदले कई शब्द सुझाने वाला अनोखा कोश। अरविंद सोचते कि जल्दी ही कोई विद्वान हिंदी को भी वैसा अनोखा शब्दोँ का ख़ज़ाना देगा।

1963 मेँ टाइम्स आफ़ इंडिया समूह के संचालकोँ ने अरविंद को संपादक का पद देने की पेशकश की – मुंबई से फ़िल्मफ़ेअर जैसी हिंदी माधुरी आरंभ करना। उस के द्वारा अरविंद ने पहली बार किसी फ़िल्म पत्रिका को सामाजिक उद्देश्य दिया और नए उभरते हिंदी कला सिनेमा आंदोलन की मुखपत्रिका भी बना दिया। उस आंदोलन को भारतीय नाम समांतर सिनेमा अरविंद ने ही दिया।
1973 तक वह पत्रकारिता और अपनेआप से ऊब चुके थे। बार मन छटपटाता – मैँ कुछ और करने के लिए पैदा हुआ हूँ। तब 26-27 दिसंबर की रात अरविंद की अंतरात्मा ने पुकारा – वह जो तेरी हिंदी थिसारस की चाह थी, वह तो अभी तक पूरी नहीँ हुई। वह बना और जीवन सकारथ कर! यह थी क्रांति लाने वाली चिंगारी। इससे जो ज्वाला जागी जो अभी तक शांत नहीँ हुई है।
अगली सुबह हैंगिंग गार्डन मेँ सैर पर अरविंद और (पत्नी) कुसुम ने तय कर लिया कि वे अपना भावी जीवन इसी को समर्पित कर देँगे। तय हुआ कि माधुरी छोड़ने और तब दिल्ली वापस जाने का सही समय मार्च-अप्रैल 1978 के आसपास होगा। तब तक काफ़ी बचत हो चुकी होगी पर बच्चोँ की पढ़ाई पर भी बुरा असर नहीँ पड़ेगा।
ऐतिहासिक काम की औपचारिक ढंग से शुरूआत हुई 19 अप्रैल 1976 को नासिक के गोदावरी तट पर। शुरू मेँ स्वयं अरविंद और कुसुम इस काम मेँ लगे, बाद मेँ बड़े होने पर बेटा सुमीत और बेटी मीता भी इस शब्दयज्ञ मेँ सहभागी हो गए, और यह एक गृह उद्यम बन गया। तमाम आपदाओँ के बावजूद अरविंद परिवार की लगन कम नहीँ हुई। कुछ आपदाएँ प्राकृतिक थीँ – जैसे घर मेँ बाढ़ आ जाना (उनके शब्दोँ वाले कार्ड इससे बच निकले), अनेक शारीरिक संकट जैसे दिल का भारी दौरा (सौभाग्य से यह बेटे सुमीत कुमार के अस्पताल मेँ पड़ा और अरविंद को तत्काल सहायता मिल गई), अरविंद को ही पीलिए का प्रकोप (इन दोनोँ के कारण कई मास तक काम नहीँ हो सका). स्थान परिवर्तन की समस्या (माडल टाउन वाला मकान बिक जाने के बाद गाज़ियाबाद की नवविकसित कालोनी मेँ मकान बनवाना), आर्थिक संकट (इससे जूझने के लिए अरविंद ने पाँच साल तक रीडर्स डाइजेस्ट के हिंदी संस्करण सर्वोत्तम का प्रारंभ और संपादन स्वीकार कर लिया – सुबह शाम घर पर थिसारस का काम करते रहे)।

छपाई की उलझनेँ भी कम नहीँ थीँ – साठ हज़ार कार्डों पर भिन्न शब्दकोटियोँ के अनुसार लिखी दो लाख साठ हज़ार अभिव्यक्तियाँ छपेँगी कैसे! छप गईँ तो उन का इंडैक्स बनवाने संसाधन कहाँ से आएँगे? एकमात्र हल सुझाया बेटे डाक्टर सुमीत कुमार ने – सूचना प्रौद्योगिकी – यानी कंप्यूटर। दो लाख साठ हज़ार शब्दोँ को डाटाबेस मेँ टंकित करने मेँ ग्यारह महीने लगे। जितना काम चौदह सालोँ मेँ हुआ था – यानी लगभग इतने ही और शब्द संकलित करना – अब वह कुल तीन साल मेँ पूरा हो गया।
डाटा का मैनिपुलेशन करके आदेश देने पर कंप्यूटर ने डाटा मेँ से चयनित 1,68,000 शब्दोँ का आउटपुट करके समांतर कोश के संदर्भ खंड और अनुक्रम खंड तैयार कर दिए। कुल मिला कर अठारह सौ पेज। प्रकाशक के सामने न कंपोज़िंग की इल्लत, न प्रूफ़ रीडिंग का झंझट! कैमरा वर्क कराओ… और छाप दो। 24-25 सितंबर 1996 को दोनोँ खंडों के प्रिंटआउट नेशनल बुक ट्रस्ट के हवाले किए थे। 13 दिसंबर 1996 की पूर्वाह्न मेँ तत्कालीन राष्ट्रपति डाक्टर शंकरदयाल शर्मा के करकमलों मेँ दोनोँ खंड प्रस्तुत कर दिए गए!

अब एक और सपना जागा – हिंदी शब्दोँ वाले डाटा मेँ इंग्लिश शामिल की जाए, ताकि भारत को अपनी दृष्टि से बने थिसारस शैली के इंग्लिश हिंदी कोश मिल सकेँ। इस के लिए इंग्लिश कोश को ए से ज़ैड तक खँगालने और डाटाबेस मेँ अनेक अभारतीय कोटियोँ को सम्यक् स्थान पर सम्मिलित करने का काम छः सात साल चला।

और सितंबर 2007 में – अरविंद कुमार ने दिया विश्व में रिकार्ड क़ायम करने वाला ग्रंथ द पेंगुइन इंग्लिश-हिंदी/हिंदी-इंग्लिश थिसारस ऐंड डिक्शनरी। तीन विशाल खंडों वाला इस कोश ने पहली बार संसार की संस्कृतियों को बड़े कुशल ढंग हमारी संस्कृति से जोड़ दिया। यह न केवल यह दोनों भाषाओं के शब्दकोशों का काम देता है, बल्कि वैश्विक संस्कृतियोँ के बीच सेतु भी बन गया। इतने बड़े कैनवस वाला कोई द्विभाषी थिसारस इससे पहले पूरे संसार मेँ नहीं बना था। यह विश्वास करना कठिन हो जाता है कि विश्व में रिकार्ड बनाने वाला ऐसा समृद्ध थिसारस किसी भारतीय ने बनाया है।

अरविंद कुमार का आठवाँ कोश है — Arvind Word Power: English-Hindi जो छपते ही सुपरहिट हो गया। यह कोश न केवल शब्दोँ के अर्थ देता है, बल्कि ज़रूरत पड़ने पर परिभाषाएँ भी, और एक ही शब्द के लिए कई इंग्लिश और हिंदी के पर्याय भी, जिस से किसी शब्द को उसके सही संदर्भों मेँ देखा और समझा जा सकता है. 1360 पेजोँ वाला यह कोश छोटीमोटी ऐनसाइक्लोपीड़िया है और भारतीयता का दर्पण। विख्यात कवि-निबंधकार-समीक्षक श्री अशोक वाजपेयी ने लिखा है कि अरविंद कुमार ने यह कोश बना कर हिंदी समाज को कृतज्ञ कर दिया है. कोश के प्रकाशक हैँ अरविंद लिंग्विस्टिक्स प्रा. लि, ई-28 प्रथम तल, कालिंदी कालोनी. नई दिल्ली 110065. मूल्य – रु 595.00. संपर्क सुश्री मीता लाल – 09810016568.)

अरविंद कुमार सवाल उठाते हैँ—
कब तक हमारी पीढ़ियाँ विदेशी दृष्टिकोण से बने इंग्लिश कोशोँ का इस्तेमाल करने के लिए विवश होती रहेँगी?
-मीता लाल,
ईमेल- lallmeeta@gmail.com

गए थे रिपोर्टिंग को, करने लगे ऑपरेशन

सीएनएन के पत्रकार डॉक्टर संजय गुप्ता ने नेपाल में रिपोर्टिंग के दौरान एक किशोरी की ब्रेन सर्जरी कर मानवता की एक मिसाल पेश की । न्यूरोसर्जन डॉ. गुप्ता सीएनएन की ओर से नेपाल में आए भीषण भूकंप को कवर करने गए थे, लेकिन वहां उन्होंने 15 साल की एक बच्ची संध्या चेलिस का ऑपरेशन किया। संध्या पर उसके घर की दीवार गिर गई थी। 

संध्या नेपाल के ग्रामीण इलाके में रहती है। वह भूकंप के दो दिन बाद ही काठमांडू के बीर हॉस्पिटल में पहुंच सकी। सीएनएन की खबर के मुताबिक उसके मस्तिष्क में खून जमा हो गया था। 

डॉक्टर गुप्ता ने सीएनएन को फोन पर बताया कि अस्पताल के अन्य डॉक्टरों ने उनसे यह ऑपरेशन करने को कहा। मुझे लगता है कि उन्हें वाकई बहुत मदद की जरूरत थी क्योंकि वहां वाकई डॉक्टरों की बहुत आवश्यकता है। 

गुप्ता ने बताया कि ऑपरेशन के दौरान उन्हें बुनियादी उपकरणों से ही काम चलाना पड़ा। इलेक्ट्रिक ड्रिल की जगह आरी और जीवाणु रहित पानी और आयोडीन को बोतल से लेना पड़ा, बजाय कि उचित स्क्रब सिंक के। 

गुप्ता ने बताया कि संध्या की हालत में ऑपरेशन के बाद सुधार है, लेकिन कुल मिलाकर वहां के हालात बहुत अच्छे नहीं हैं। 

सर्जरी के बाद एक आठ साल की बच्ची को भी अस्पताल लाया गया जिसे इसी तरह के ऑपरेशन की जरूरत थी। 

नेपाल में आए भूकंप में 4 हजार से ज्यादा लोग मारे गए हैं, लेकिन नेपाली अधिकारियों का अनुमान है 7.9 की तीव्रता वाले इस भूकंप में कम से कम 10 हजार से ज्यादा लोग मारे गए हैं। इस प्राकृतिक आपदा में 6 हजार से ज्यादा लोग घायल हुए हैं और अस्पतालों में ईलाज करवा रहे हैं। इतने अधिक घायलों को चिकित्सीय सुविधाएं मुहैया कराना भी बड़ी चुनौती है। 

 

सीएनएन में बतौर मुख्य स्वास्थ्य संवाददाता काम करने के साथ-साथ, डॉक्टर गुप्ता अंटलांटा के एमोरी हेल्थकेयर में न्यूरोसर्जन भी हैं। ऐसा पहली बार नहीं है कि तीन बच्चों के पिता, 45 वर्षीय डॉक्टर गुप्ता ने रिपोर्टिंग जॉब के दौरान सर्जरी की हो। 

2003 में ईराक में रिपोर्टिंग के दौरान भी उन्होंने ईराकी नागरिकों और अमेरिकी सैनिकों की इमरजेंसी सर्जरी की थी। 2010 में हैती में आए भूकंप में भी गुप्ता और अन्य डॉक्टरों ने 12 साल की एक बच्ची की खोपड़ी से कंक्रीट का एक टुकड़ा निकाला था। 

साभार- टाईम्स ऑफ इंडिया से

जलप्रलय और मनुष्य की उत्पत्ति की पौराणिक गाथा

भारतीय जल-प्रलय की कथाएँ शतपथ ब्राह्मण, महाभारत और पुराणों में मिलती हैं। प्राचीनतम कथा 800 ई.पू. में शतपथ ब्राह्मण में प्रस्तुत की गयी। यों इसके घटित होने का समय निश्चय ही इससे बहुत पुरातन है।

प्रातःकालीन आचमन करते मनु के हाथ में जल के साथ एक छोटी-सी मछली आ गयी। मछली बोली – ‘‘देखो! मुझे फेंको नहीं। मेरी रक्षा करो। जो विपत्ति आने वाली है, उससे मैं तुम्हारी रक्षा करूँगी। जल-प्रलय होने वाली है। उसमें सब प्राणी नष्ट हो जाएँगे, पर मैं तुम्हें बचाऊँगी। तुम मुझे घड़े में डालो। मैं जब आकार में बढ़ जाऊँ, तो सरोवर में डाल देना। मैं फिर आकार में बढ़ जाऊँगी, तब मुझे सागर में डालना। जब प्रलय आ जाए, तब मुझे याद करना। मैं तब आकर तुम्हारी रक्षा करूँगी।’’

सात दिन बाद जलप्लावन हुआ। आकाश से धारासार जल गिरने लगा। पृथ्वी नष्ट हो चली। मनु मछली के कहे अनुसार करते गये। मछली का आकार बढ़ता गया और वह सागर में पहुँच गयी। मछली ने मनु से एक नाव बनाने के लिए कहा था। मनु ने नाव बना ली थी। जब जलप्लावन बढ़ता ही गया, तो मनु ने जीवों के जोड़े इकट्ठे किये और नाव में आ गये। जब जल बढ़ता ही गया, तो मनु ने मछली का स्मरण किया। स्मरण करते ही विशालकाय मछली सहसा तैरती आ पहुँची।

मछली बोली – ‘‘जलयान को एक रस्सी से मेरे सींग से बाँध दो!’’

मनु ने ऐसा ही किया। मछली जलयान को लेकर जल का सन्तरण कर चली। अन्त में वह जलयान को लेकर उत्तरवर्ती पर्वत से जा लगी। वहाँ पहुँचकर मछली बोली – ‘‘जलयान को गिरिशिखर के तरु से बाँध दो। जल के घटने की प्रतीक्षा करो। जल छीज जाने पर सूखी धरती पर यज्ञ का अनुष्ठान करो!’’

जब जल छीज गया, तो मनु ने सूखी धरती पर यज्ञ का अनुष्ठान किया। मनु ने अनुष्ठान क्रिया सम्पन्न करने के लिए किलात और आकुली नाम के असुर ब्राह्मणों को आमन्त्रित किया। उस यज्ञ से श्रद्धा का जन्म हुआ। और तब मनु और श्रद्धा के संयोग से नयी सृष्टि का आविर्भाव हुआ।

भागवत पुराण की कथा 8, 24 के सातवें श्लोक से शुरू होती है और शतपथ ब्राह्मण की कथा को महाभारत की कथा के संयोग से ऋद्ध कर अपना विस्तार प्राप्त करती है।

कहते हैं कि ब्रह्मा निद्रा में मग्न थे, तभी सहसा जल-प्रलय हुई और दैत्य हयग्रीव ने वेदों को चुरा लिया। वेदों की रक्षा के लिए हरि (विष्णु) ने मछली का रूप धारण किया। यह छोटी-सी मछली बाद में बढ़कर लाखों योजन की हो जाती है। हरि (शृंगी मछली) ने अपना भेद जल पर ही रहने वाले तथा जल का ही आहार करने वाले राजा सत्यव्रत को बता दिया। एक निर्मित सन्दूक राजा सत्यव्रत के पास स्वयं ही तिरता हुआ आ गया। राजा ने ब्राह्मणों के साथ उसमें प्रवेश किया। उसमें बैठकर राजा और ब्राह्मण हरि की स्तुति में ऋचाओं का पाठ करते रहे। अन्त में हरि ने हयग्रीव का वध करके वेदों का उद्धार किया। फिर विष्णु ने सत्यव्रत को दैवी और मानवी ज्ञान में दक्ष किया और उसे सातवाँ मनु घोषित किया। तब एक नया मन्वन्तर बना और नयी सृष्टि ने जन्म लिया।

(स्व. डॉ. भगवतशरण उपाध्याय संस्कृत, प्राचीन इतिहास के प्रकांड विद्वान थे, उन्होंने ही दुनिया के पहले विज्ञापन की खोज की थी, ये विज्ञापन म.प्र. के मंंदसौर में एक पत्तर पर लिखा पाया गया था जिस पर मंदसौर में बिकने वाली साडी के बारे में कहा गया था कि ये साड़ी पहनने के बाद महिलाएँ कितनी सुंदर दिखाई देती है। वे मॉरीशस में भारत के उच्चायुक्त भी रहे। )

साभार-http://www.hindisamay.com/ से 

नेपाल में भूकंप पर मन की आवाज … और आज हमारी बारी

पहाड़ों से आकर करते; जो हमारी, हर दिन पहरेदारी,
मुश्किल में है उनका आंगन, और आज हमारी बारी ।।
 
घर-बार छोड़कर; मन मसोसकर, आते करके तैयारी,
 कैसे भी हालात; इन्होंने, हिम्मत कभी न हारी।
आपदा झेल रहे हैं, हमको आशा से देख रहे हैं,
मुश्किल में है उनका आंगन, और आज हमारी बारी ।।
 
आया भूचाल; हिला नेपाल, ठनका भारत का भाल,
तत्काल प्रधानमंत्री मोदी ने, उनसे पूछा उनका हाल।
बिना जरा भी वक्त गंवाए भेजी, हर मदद सरकारी,
मुश्किल में है उनका आंगन, और आज हमारी बारी ।।
 
सरहद भले अलग है, पर दिल तो अलग नहीं है।
लगता हैं सब अपने जैसा, कुछ भी तो अलग नहीं है।
देश का बच्चा-बच्चा, उनकी समझ रहा लाचारी,
मुश्किल में है उनका आंगन, और आज हमारी बारी ।।
 
भारत में बैठा नेपाली, घर की सोच घबराया है,
न जाने कौन चला गया, कौन-कौन बच पाया है।
अपने घर पर ही टिकी हैं , उसकी नजरें सारी,
मुश्किल में है उनका आंगन, और आज हमारी बारी ।।
 
पर्वत-पुत्रों के इस संकट में, पूरा भारत उनके साथ है,
कोई कसर नहीं छोड़ेंगे, हमने बढ़ाया मदद का हाथ है ।
हजारों राहतकर्मियों-स्वयंसेवकों का, वहाँ पहुंचना जारी,
मुश्किल में है उनका आंगन, और आज हमारी बारी ।।