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रचनात्मक कला और प्रतिष्ठित व्यवसाय : जन संपर्क

जन संपर्क एक कला तो है ही, आज एक महत्वपूर्ण व्यवसाय और भारत जैसे विशाल लोकतंत्र की तो बड़ी ज़रुरत भी बन गया है। उत्पादों व संस्थाओं को बाजार में उतारने व कायम रहने की चुनौतियों ने जनसंपर्क की उपयोगिता बढ़ा दी । 

मोबाइल, इंटरनेट द्वारा नवनिर्मित सूचना समाज में जनसंपर्क सरकार व बाजार से लेकर बॉलीवुड तक फैल गया है। एक वह जमाना था जब जनसंपर्क अधिकारी का कार्य मात्र मीडिया को सैर कराने व अतिथियों के लिए होटल बुक करने तक ही सीमित समझा जाता रहा था लेकिन यह स्थिति आज हालात पूरी तरह बदल गए हैं और अब जनसंपर्क एक प्रतिष्ठित पेशे और व्यवसाय के रूप में  दुनियाभर मे स्थापित हो चुका है। आज व्हाइट हाउस और पीएमओ से लेकर प्रॉक्टर एंड गैंबल, प्रजापति बह्माकुमारी मुख्यालय व कलेक्टोरेट कार्यालय सभी जगह जनसंपर्क विंग विद्यमान हैं। यह क्षेत्र बहुत तेजी से विकास कर रहा है। कंपनियां अब जनसंपर्क सलाहकारों की सेवाएं ले रही हैं। इन बातों को देखते हुए कैरियर के लिए यह क्षेत्र कारगर सिद्ध हो सकता है।

पाठ्यक्रम और योग्यता – पब्लिक रिलेशन में कैरियर बनाने के लिए अभ्यर्थी का ग्रेजुएट होना जरूरी है। कुछ संस्थानों में ग्रेजुएशन के अंकों के आधार पर प्रवेश मिलता है जबकि कई संस्थान एंट्रेंस टेस्ट को एडमिशन का आधार बनाते हैं। संबंधित कोर्स एक या दो साल के हो सकते हैं। पाठ्यक्रमों के अंतर्गत मीडिया प्लानिंग, एडिटिंग एंड राइटिंग, कारपोरेट पब्लिक रिलेशन, प्रोडक्ट टेक्नीक आदि बातों की जानकारी दी जाती है।वेतनमानजनसम्पर्क प्रशिक्षणार्थी का प्रारंभ में वेतन 15000 रुपए से 20000 रुपए के बीच प्रति माह होता है। वेतन किसी संगठन के स्वरूप पर निर्भर करता है। वरिष्ठ व्यवसायी 20000 रुपए से 25000 हजार रुपए के बीच कहीं भी किसी भी संगठन में वेतन पा सकता है। सार्वजनिक क्षेत्र में जनसंपर्क अधिकारी का वेतन संगठन के वेतन की संरचना या विशिष्ट स्तर पर अधिकारी के लिए निर्धारित सरकारी वेतनमान से निर्धारित किया जाता है।

कार्य का स्वरूपजन – संपर्क कार्यालय व्यस्त स्थल होता है। कार्य का समय अनियमित होता है तथा बार-बार व्यवधान आता है। कनिष्ठ कर्मचारी को प्रेस तथा आम जनता द्वारा मांगी गई सूचना का जवाब फोन पर देना पड़ता है। निमंत्रण सूची से संबंधित कार्य करना होता है। प्रेस सम्मेलन के विस्तृत ब्यौरे तैयार करने पड़ते हैं। आगंतुकों तथा ग्राहकों के साथ-साथ चलना पड़ता है। शोध कार्य में सहायता करनी पड़ती है और विवरणिका लिखनी होती है। वह संपादन कार्यालय में प्रेस विज्ञप्ति पहुंचाता है तथा मीडिया की वितरण सूची संकलित करता है। इसके अतिरिक्त वह भावी बैठक के संबंध में प्रबंधन को संक्षिप्त जानकारी देता है।

विस्तार – ऐसोचैम के अनुसार भारत में 1200-1500 जनसंपर्क एजेंसियां हैं, जहां पर 30000 से 40000 पेशेवर कार्य कर रहे हैं। जनसंपर्क एक बहुत ही रचनात्मक कार्य है। एक अनुमान के अनुसार भारत में लगभग 2 लाख लोग जनसंपर्क के विभिन्न आयामों में सेवारत हैं। जिस तरह इस व्यवसाय के विकास का अनुमान  लगाया जा रहा है उससे लगता है कि यह क्षेत्र कैरियर का बहुत बड़ा क्षेत्र बनकर उभरेगा। भारत में इस समय सभी विश्वविद्यालयों में जनसंपर्क पढ़ाया जा रहा है। एक अनुमान के अनुसार देश में 100 से अधिक संस्थाएं पीआर पर शिक्षा दे रही हैं। अब भारत में एमबीए पीआर भी उपलब्ध हो गया है। आवश्यक गुणदबाव के समय विश्लेषणात्मक ढंग से सोचने की क्षमता, आवश्यक सूचना हासिल करने तथा व्यावहारिक एवं प्रभावी हल निकालने की दक्ष हो।वर्तमान समस्याओं को सुलझाने की कल्पनाशक्ति तथा भावी समस्याओं के लिए पूर्वानुमान कौशल, लोगों तथा समूह के साथ आमने-सामने संपर्क स्थापित करने के लिए लेखन क्षमता, आत्मविश्वास, संप्रेषण कौशल, कूटनीति और दूसरों के स्थान पर स्वयं होने की कल्पना करने की सामान्य से अधिक क्षमता होनी चाहिए। 

रोजगार के अवसर – जनसंपर्क की दुनिया में स्थान बनाने के लिए आप संगठन के जनसंपर्क विभाग या पेशेवर फर्म के जनसंपर्क विभाग में शामिल हो सकते हैं जो ग्राहकों को जनसंपर्क सेवाएं प्रदान करता है। ऐसी एजेंसियां संविदात्मक आधार पर कार्य करती हैं। प्रारंभिक स्तर पर व्यक्ति को प्रशिक्षणार्थी के रूप में रखा जाता है। प्रारंभ में जनसम्पर्क के क्षेत्र में संगठन में से ही प्रशिक्षणार्थी की भर्ती की जाती है। अन्य विकल्प स्वयं परामर्श सेवा प्रदान करना है बशर्ते व्यक्ति निस्संकोची और साहसी हो तथा मीडिया के साथ उसके संपर्क हों। कैरियर की दृष्टि से सरकारी नौकरी सुरक्षित रहती है, लेकिन जनसंपर्क से जुड़ी वास्तविक चुनौती गैर सरकारी क्षेत्र में है।

जागरूकता से जुड़ाव – जनसंपर्क एक बहुत ही रचनात्मक कार्य है, जिससे सभी को फायदा होता है। जनसंपर्क में बहुत शक्तियां हैं। जनसंपर्क की ताकतों का इस्तेमाल कर सामाजिक बुराइयों को दूर किया जा सकता है। वर्तमान समय की चुनौतियां जैसे जलवायु परिवर्तन, एड्स, गरीबी और अशिक्षा के प्रति लोगों को जागरूक करने तथा इसके बारे में व्यापक जनमत तैयार करने में जनसंपर्क बड़ी भूमिका निभा सकता है। खेल के अंतरराष्ट्रीय एवं राष्ट्रीय आयोजनों को सफल और उस आयोजन के प्रति एक व्यापक जनसमर्थन जुटाने में जनसंपर्क की भूमिका महत्त्वपूर्ण बनती जा रही है।

प्रमुख शिक्षण संस्थान – हिमाचल प्रदेश यूनिवर्सिटी, शिमला(हिमाचल प्रदेश)हिमाचल प्रदेश सेंट्रल यूनिवर्सिटी,शाहपुर,इंदिरा गांधी राष्ट्रीय मुक्त विश्वविद्यालय, नई दिल्ली,इंडियन इंस्टीच्यूट ऑफ  मास कम्युनिकेशंस, नई दिल्ली,पंजाबी यूनिवर्सिटी, पटियालाअलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी, अलीगढ़,वाईएमसीए इंस्टीट्यूट ऑफ मीडिया स्टडीज, नई दिल्ली,बनारस हिंदू विश्वविद्यालय, वाराणसी,यूनिवर्सिटी ऑफ हैदराबाद, हैदराबाद,जामिया मिलिया इस्लामिया, नई दिल्ली आदि। 
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प्राध्यापक, शासकीय दिग्विजय 
महाविद्यालय, राजनांदगांव। 
मो.9301054300 

प्रो.चन्द्रकुमार जैन आरटीआई केस स्टडी पैनल में शामिल

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राजनांदगांव। सूचना के अधिकार पर सतत रचनात्मक और सकारात्मक लेखन और मार्गदर्शन कर रहे आरटीआई स्टेट रिसोर्स पर्सन और सामान्य प्रशासन विभाग द्वारा छत्तीसगढ़ राज्य अलंकरण से सम्मानित दिग्विजय कालेज के प्रोफ़ेसर डॉ.चन्द्रकुमार जैन आरटीआई केस स्टडी पैनल में शामिल किये गए हैं। केन्द्रीय कार्मिक,जन शिकायत निवारण तथा पेंशन मंत्रालय के मार्गदर्शन में सूचना का अधिकार अधिनियम पर ऑन लाइन ओसीसी प्रमाण पत्र प्राप्त डॉ.जैन आरटीआई ट्रेनिंग प्रोग्राम और प्रचार-प्रसार कार्यक्रमों से सघन रूप से जुड़े रहकर अधिनियम की महत्ता व उपयोगिता को जन-मन तक पहुँचाने में अहम भूमिका का निर्वहन करते रहे हैं। बहरहाल, राष्ट्रीय  स्तर के स्वयंसेवी सर्वेक्षण में डॉ.जैन व्यक्तिगत ज़मीनी अध्ययन के आधार पर आरटीआई की पहुँच और प्रभाव की जानकारी के साथ-साथ अपने सुझाव भी साझा करेंगे। पैनल में शामिल डॉ.जैन प्रदेश के एकमात्र रिसोर्स पर्सन हैं। इष्ट मित्रों ने उन्हें इस चयन और योगदान के लिए बधाई दी है। 
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कश्मीर में गद्दारों के हौसले क्यों बुलंद हैं

अपना भरोसा था कि चूहे बिल में घूसेंगे। दिल्ली में 56 इंची छाती वाले नरेंद्र मोदी की सत्ता से कश्मीर घाटी के अलगाववादियों के हौसले पस्त होंगे। मगर उलटे हिम्मत खुली है। अपने को ऐसी कोई पुरानी तस्वीर ध्यान नहीं पड़ती है जिसमें लोग राजधानी श्रीनगर के मैदान में इकट्ठे हो और पाकिस्तानी झंडे व नारे के साथ भारत को खुलेआम गालियां दें। यही नहीं नरेंद्र मोदी के खिलाफ जहर उगला जाए और उसका सीमा के इस और उस पार दोनों तरफ रेडियो प्रसारण हो! अलगाववादी हुर्रियत नेता सैयद अली शाह गिलानी दिल्ली में पहले भी ईलाज करा कर घाटी लौटते रहे हैं। लेकिन इस बार वे लौटे तो जलसा हुआ। पाकिस्तान जिंदाबाद के नारे लगे और तिरंगे की जगह पाकिस्तानी झंडे दिखलाई दिए। गिलानी ने भाषण देते हुए सुनने वालों से कहा- नरेंद्र मोदी के हाथ मुसलमानों के खून से सने हुए हैं। फिर मुख्यमंत्री मुफ्ती मोहम्मद को चेताते हुए कहा यथास्थिति बरकरार रखी तो बरदाश्त नहीं करेंगे। इस जलसे में मसरत आलम की अगले गिलानी याकि उनके उत्तराधिकारी के रूप में वाहवाही हुई। सो लगता है कि बूढ़े गिलानी की जगह उनके उत्तराधिकारी के रूप में पाकिस्तानपरस्त मसरत आलम नेता बन गया है।
 
मुफ्ती की सरकार का योगदान है कि सौ दिन नहीं हुए और मसरत आलम और आयशा आंद्रबी नाम की दो ऐसी नई शख्सियत पैदा कर दी है जो खुलेआम पाकिस्तान में विलय की बातें कर रहे हैं। जलसे करा रहे हैं। भारत राष्ट्र-राज्य की सार्वभौमता, एकता-अखंडता को चुनौती देते हुए ललकार रहे हैं कि हिम्मत हो तो हमें जेल में डालो। मुफ्ती सरकार से पहले न मसरत आलम का कोई मतलब था और न आय़शा आंद्रबी का नाम सुना था और न ही बूढ़े-बीमार गिलानी के घाटी में पाकिस्तानी झंडों के बीच जलसे होते थे। मतलब उनके लिए जलसे हों, ताकत का प्रदर्शन हो यह दुर्लभ बात थी। लेकिन आज पंडितों की अलग बस्ती की बात हो तो घाटी में बंद का आह्वान होगा और हल्ला गुला होगा। इसी तरह गिलानी दिल्ली से श्रीनगर लौटे तो उनका जहरीला भाषण होगा तो उसका प्रसारण भी होगा। शर्मनाक बात है कि शाम को गिलानी और जलसे का बचाव करते हुए सत्तारूढ़ पीडीपी के प्रवक्ता इस दलील से बचाव करते मिले कि इन बातों को संवेदनशीलता से हैंडल करना चाहिए। लोगों की भावनाएं जाहिर होने देनी चाहिए। यदि इन्होंने कुछ किया है तो कानून अपना काम करेगा। कानून तोड़ा है तो कार्रवाई होगी और कानूनन कोई उल्लंघन नहीं है तो कुछ नहीं हो सकता।
 
अब कहने को कह सकते हैं कि भारत की एकता-अखंडता और राष्ट्र-राज्य की ताकत को ठेंगा बताते हुए यदि कोई आजादी की, पाकिस्तान में शामिल होने की बात करे तो यह अधिकार लोकतंत्र में उपलब्ध है। मगर संविधान में मिले हक की बात करते हैं लेकिन उस संविधान को मानते नहीं। कश्मीर घाटी की दिक्कत यह है कि भारत राष्ट्र-राज्य ने उसे धारा 370 में अलग दर्जा दिया हुआ है। इस दर्जे ने ही हुर्रियत नेताओं में यह दलील बनवाई है कि वे अपने को अलग बताते हुए आजादी की बात करते हैं। अपनी इच्छा से पाकिस्तान में विलय का नारा लगाते हैं। संदेह नहीं कि इस हिम्मत को पीडीपी के साथ भाजपा के सरकार बनाने से पंख लगे हैं। कश्मीर घाटी के अलगाववादियों को यह देख हैरानी हुई है, और इसी से शायद उनमें हिमाकत बनी है कि भाजपा ने सत्ता के लिए धारा 370 छोड़ दी। भाजपा ने यदि धारा 370 को बतौर मजबूरी मान लिया है तो इससे देश-दुनिया को मैसेज गया है कि अब कोई माई का लाल धारा-370 को नहीं हटा सकता। तभी घाटी के मुस्लिम अलगाववादियों का हौसला बढ़ा है। इनमें यह सोच है कि ये कथित हिंदू राष्ट्रवादी नरेंद्र मोदी-अमित शाह को पानी पिलवा देंगे। गिलानी ने जलसे के अपने भाषण में नरेंद्र मोदी के खून से रंगे हाथों का जो डायलाग बोला है उसके बाद भारत के प्रधानमंत्री का रेडियो प्रसारण सुनने वालों पर क्या असर रहा होगा, इसे बूझा जा सकता है।
 
समझने वाली बात गिलानी, मसरत आलम, आयशा आंद्रबी, यासीन मलिक एंड पार्टी के बढ़े हुए हौसले की है। संदेह नहीं है कि पीडीपी और उसके मुख्यमंत्री मुफ्ती मोहम्मद सईद ने घाटी में ऐसा माहौल बनवा दिया है जिसमें अलगाववादी अनिवार्यतः बेखौफ बनते जाएंगे। मुफ्ती सोचते हैं कि अलगाववादियों के प्रति उदार बन उन्हें मुख्यधारा में लाया जा सकता है। मगर अलगाववादी, चरमपंथी व उग्रवादी को निपटने का दुनिया में एक ही तरीका है और वह सख्ती का है। सख्ती, लगातार सख्ती से ही थका कर उन्हें मुख्यधारा में शामिल होने के लिए मजबूर किया जा सकता है। इनकी हिम्मत को तो कतई खुलने नहीं देना चाहिए। फिर कश्मीर के इन अलगाववादियों के साथ तो आजाद भारत के तमाम नेताओं ने तमाम प्रयोग कर डाले है और 67 साल का अनुभव है कि इनकी टेढ़ी दुम सीधी नहीं हो सकती। सो नरेंद्र मोदी, केंद्र सरकार मुगालते में न रहे। मुफ्ती की सरकार से सत्यानाश होगा। पाकिस्तानी झंडों का रैला, घटनाएं बढ़ेगी। इसलिए भाजपा को तुंरत सरकार का मोह छोड़ना चाहिए। इस सरकार से भाजपा जम्मू-लद्दाख के हिंदुओं का भला नहीं करेगी उलटे घाटी में फिर खौफनाक अलगाववादी आंदोलन का दौर शुरू होगा। एक मसरत आलम की रिहाई से कैसी हिम्मत बढ़ी है, यह बुधवार के तमाशे से जग-जाहिर हुआ है तो इससे आगे के क्या संकेत है इसे भी समझ लेना चाहिए।
 
साभार- http://www.nayaindia.com/

‘तिनका तिनका तिहाड़’ लिम्का बुक में

वर्तिका नन्दा और विमला मेहरा की किताब ‘तिनका तिनका तिहाड़’ को लिम्का बुक ऑफ रिकॉर्ड्स में शामिल किया गया है। 2013 में राजकमल प्रकाशन से हिंदी और अंग्रेजी में छपी यह किताब शुरू से ही चर्चा में रही है। यह दुनिया में एक अनूठा प्रयास रहा जिसमें तिहाड़ जेल की महिला कारागार नंबर 6 में कैद महिला कैदियों को कविता लेखन के लिए प्रेरित किया गया और बाद में चार महिला कैदियों ( रमा चौहान, सीमा रघुवंशी, रिया शर्मा और आरती) की कविताओं का संकलन छापा गया। इस किताब में छपी प्राय सभी रंगीन तस्वीरें कैदियों ने खुद ली हैं। एक विशेष अनुमति के बाद उन्हें कुछ घंटों के लिए एक कैमरा दिया गया था, जिससे वे अपनी जिंदगी की तस्वीरें खुद लें। इस किताब को छापा भी अलग ढंग से गया है। किताब को खोलने पर शब्द नहीं, सिर्फ तस्वीरें दिखाई देती हैं मानो यह तस्वीरों की किताब है। दरअसल सारे पन्ने एक-दूसरे के साथ जोड़े गए हैं। उन्हें अलग करने पर ही मिलती है –कविता। इस किताब और गाने के साथ लगातार कई प्रयोग किए गए हैं। वर्तिका नन्दा और विमला मेहरा ने पत्रकारिता और जनसंचार के विविध माध्यमों से अपराध की तरफ ध्यान दिलाने की कोशिश की है। उनका और विमला मेहरा का लिखा गाना –‘तिनका तिनका तिहाड़…’ तिहाड़ जेल का पहचान बन चुका है। 

लिम्का बुक ऑफ रिकॉर्ड्स में अपनी पुस्तक ‘तिनका तिनका तिहाड़’ शामिल होने पर खुशी जाहिर करते हुए डॉ. वर्तिका नंदा कहती है, ‘औरत की छुट्टी और आँसू को हल्के में नहीं लेना चाहिए। संभव है सामाजिक दृष्टि से यह तिनका ही नज़र आए लेकिन ध्यान रहे इन तिनकों को भी बहुत कुछ कहना होता है। इस संदर्भ को ध्यान में रखकर तिहाड़ में बंद महिलाओं पर हमने सफल प्रयोग किए। इस तरह के प्रयोग आगे भी जारी रहेंगे।‘

वहीं दूसरी तरफ विमला मेहरा ने भी अपनी खुशी जाहिर करते हुए कहा कि, ‘तिहाड़ जेल में हमलोगों ने महिला सशक्तिकरण की दृष्टि से एक अनोखा प्रयोग किया था। इस प्रयोग से जेल में बंद महिलाओं की सृजनशीलता को बाहर लाने में सफल रहे। इससे उनका आत्मबल बढ़ा, उनकी प्रतिभा को नई पहचान मिली। इस तरह के प्रयोग होते रहने चाहिए।’

इस उपलब्धि पर राजकमल प्रकाशन समूह के प्रबंध निदेशक अशोक महेश्वरी ने पुस्तक के दोनों संपादकों को शुभकाना देते हुए कहा कि, ‘इस तरह के नवप्रयोगों को हमारा प्रकाशन समूह हमेशा से स्थान देता रहा है और आगे भी देता रहेगा। इस किताब में जिन चार महिला कैदियों ने अपनी सृजनात्मक क्षमताओं को उड़ान दी है, उसे हम बढावा देना चाहते थे। अब समाज को सोचना है कि कैद में रह रही इन सृजनशील महिलाओं की मदद कैसे की जा सकती है।’

 

http://www.limcabookofrecords.in/recordDetail.aspx?rid=587
https://www.youtube.com/watch?v=_00Rn9S1-jY

संपर्क 
आशुतोष कुमार सिंह

साहित्य प्रचार अधिकारी

राजकमल प्रकाशन समूह

9311196024, 9891228151

हिंदी समाज को अरविंद कुमार का कृतज्ञ होना चाहिए कि उन्होँ ने ऐसा अद्भुत कोश बनाया

बरसोँ से हम हिंदी लेखक फ़ादर कामिल बुल्के के अँगरेजी-हिंदी कोश को ही प्रामाणिक मान कर उस की सहायता लेते रहे हैँ. कई बार उस मेँ सटीक पर्याय नहीँ भी मिलते, पर कुल मिला कर वह बड़ा मददगार कोश रहा है. इधर अरविंद लिंग्विस्टिक्स प्रा. लि. द्वारा अरविंद वर्ड पावर: इंग्लिश-हिंदी डिक्शनरी नाम से 1360 पृष्ठोँ का हाथ लगा, जिसे कोश निर्माण मेँ दशकों से लगे पचासी-वर्षीय लेखक संपादक कोशकार अरविंद कुमार ने बिना किसी संस्था की मदद से विशुद्ध स्वाध्याय और श्रद्धानुराग से बनाया है. इस कोश मेँ (वह निश्चय ही अपने ढंग का एक क्लासिक है) 6,70,000 से अधिक शब्द हैँ. पर्यायवाची और विपर्यायवाची शब्द भी दोनोँ भाषाओँ में साथ साथ दिए गए हैँ. लगभग पचास हज़ार समान और ग्यारह हज़ार प्रतिकूल अवधारणाएँ भी दी गई हैँ. कोश भारतीय सामाजिक और सांस्कृतिक जीवन और अवधारणाओँ को यथास्थान शामिल कर बनाया गया है. और इस अर्थ मेँ भारत-केंद्रित है. यह समावेशिता, वह भी कोश मेँ, मेरे जाने अभूतपूर्व है. योँ तो गहरे और लंबे इतिहासबोध से संपन्न नामवर सिंह हर वर्ष पाँच सात पुस्तकोँ पत्रिकाओँ को ऐतिहासिक क़रार देते हैँ. पर मेरी राय मेँ, अरविंद कुमार का यह सुशोभित-सुरचित कोश निश्चय ही हमारी भाषा के लिए एक ऐतिहासिक घटना है. हिंदी समाज को अरविंद कुमार का कृतज्ञ होना चाहिए कि उन्होँ ने ऐसा अद्भुत कोश बनाया है.

इस कोश का एक उल्लेखनीय पक्ष यह है कि इस मेँ बोलचाल मेँ प्रचलित बोलियोँ से आए शब्दोँ को भी जगह दी गई है. ऐसे शब्द भी काफ़ी हैँ, जो उर्दू फ़ारसी अऱबी, अँगरेजी आदि से आ कर हिंदी मेँ ज़ज्ब हुए हैँ. ऐसे किसी भी कोश को एक स्तर पर हिँदी की अद्भुत समावेशिता का संकलन होना चाहिए – यह कोश ऐसा है. उस से यह भी बख़ूबी प्रकट होता है कि हिंदी का चौगान और हृदय कितना चौड़ा है और कहाँ कहाँ तक फैला है. हिंदी का राजभाषा रूप उसे संकीर्ण और दुर्बोध बनाता रहा है: यह कोश एक तरह से इस का प्रतिरोध करता है. हिंदी के अपने उदार स्वभाव को तथ्य और शब्द-पुष्ट करता है.

हीरोइक पोएट्री के समानार्थी हिंदी शब्द योँ दिए गए हैँ – आल्हा, कड़खा, कीर्तिगाथा, पँवाड़ा, विरुदावली, वीरगाथ, शूरश्लोक, संघर्षकथा. संदर्भ शब्द – महाकाव्य और युद्धगीत भी.

गॉड शब्द के समानार्थी शब्द हैँ – अंतर्यामी, अखिलेश, अल्लाह, अहुरमज्द, ऊपरवाला,. ख़ुदा, गॉड ,जगदीश, जिहोवा, त्रिलोकीनाथ, पतितपावन, परब्रह्म, परमपिता, परमब्रह्म, परमात्मा, परमेश्वर, प्रभु, भगवान, मालिक, रब, विधाता, साहब, स्रष्टा, स्वामी, हक़ताला. हो सकता है कि कहीँ कभी आप को कोश से असंतोष हो, पर यह उस की उपलब्धि और महत्व को, उस की उपयोगिता को क़तई घटाता नहीँ है, 1360 पृष्ठोँ के इस कोश का मूल्य सिर्फ़ 595 रुपए है.

पुस्तक नाम: Arvind Word Power: English-Hindi
पेज:1360
प्रकाशक:अरविंद लिंग्विस्टिक्स प्रा. लि., ई-28 (प्रथम तल), कालिंदी कालोनी, नई दिल्ली 110065
मूल्य: 595.00 – स्वागत मूल्य 15% कटौती के बाद 505.00 (कूरियर चार्ज 150.00)
भुगतान – http://arvindlexicon.com/books/word-power-eng-hnd पर क्रैडिट कार्ड द्वारा. – किसी अन्य विधि से भुगतान के लिए  ईमेल द्वारा  मीता लाल से संपर्ककरेँ:lallmeeta@gmail.com– mobile +91 9810016568

“पत्रकारिता कोश” के 15वें अंक का विमोचन 4 मई को

मुंबई : आफताब आलम द्वारा संपादित भारत की प्रथम मीडिया डायरेक्टरी "पत्रकारिता कोश" के 15वें अंक का विमोचन आशीर्वाद संस्था द्वारा अजंता पार्टी हॉल, गोरेगांव (पश्चिम) में सोमवार, दिनांक 4 मई, 2015 को सायं 6 बजे होगा। संस्था के चेअरमैन बृजमोहन अग्रवाल के अनुसार लिम्का बुक ऑफ रिकॉर्ड में दर्ज, इस अखिल भारतीय कोश के विमोचन समारोह में प्रमुख अतिथि के रूप में कुंदन व्यास (संपादक, जन्मभूमि), विश्वनाथ सचदेव (संपादक, नवनीत), अश्विनी कुमार मिश्र (संपादक, निर्भय पथिक), बृजमोहन पांडेय (शहर संपादक, नवभारत), श्रीनारायण तिवारी (संपादक, दबंग दुनिया), संदीप शुक्ला(संपादक-महाराष्ट्र, न्यूज एक्सप्रेस चैनल) तथा अभिजीत राणे (समूह संपादक, मुंबई मित्र/वृत्त मित्र) उपस्थित रहेंगे। समारोह की अध्यक्षता दोपहर का सामना के कार्यकारी संपादक प्रेम शुक्ल करेंगे।
 
समारोह में सम्माननीय अतिथि के रूप में  मोहिनी भड़कमकर (संयुक्त निदेशक, मध्य प्रदेश सूचना केंद्र), अरुण श्रीवास्तव (उप महाप्रबंधक, यूनियन बैंक ऑफ इंडिया), शरद सावंत (चेअरमैन, ग्लोबल इंस्टीटय़ाझट ऑफ मैनेजमेंट स्टडीज), सैयद सलमान (मुख्य कार्यकारी संपादक, लेमन न्यूज चैनल), डॉ. हनीफ अंसारी (संपादक, कौमी पैगाम), शकील रशीद (फीचर संपादक, उर्दू टाइम्स),  देवेंद्र (बाला) आंबेरकर (विरोधी पक्ष नेता, मुंबई महानगरपालिका), ए.के. सिंह (जनसंपर्क अधिकारी, मध्य रेलवे), सुरेशचंद्र जैन (साहित्यकार व पूर्व राजभाषा अधिकारी, नीटी), चंद्रशेखर शुक्ला (अध्यक्ष, लोकाधिकार सेवा समिति), आदि सहित अनेक गणमान्य व्यक्ति उपस्थित रहेंगे। इस अवसर पर पत्रकारिता कोश की सूचनाओं को एकत्र करने में महत्वपूर्ण योगदान देने के लिए हिमांशु विश्वकर्मा तथा सलाम शेख को श्रेष्ठ सूचना ब्यूरो का सम्मान प्रदान किया जाएगा।
 
कार्यक्रम की प्रस्तावना और स्वागत भाषण आशीर्वाद के निदेशक डॉ. उमाकांत बाजपेयी देंगे जबकि  संचालन संस्था के सचिव डॉ. अनंत श्रीमाली करेंगे। आभार ज्ञापन कोश के सहायक संपादक राजेश विक्रांत करेंगे। कोश के सहायक संपादक अखिलेश मिश्र के अनुसार पत्रकारिता कोश का यह अंक मैगजीन आकार में प्रकाशित किया गया है जो 608 पृष्ठों पर आधारित है। इसमें देशभर के लेखक, पत्रकारों, संपादकों और मीडिया व साहित्य से जुड़ी विविध सूचनाओं को सम्मिलित किया गया है। यह कोश मीडिया व साहित्य से जुड़े लोगों के साथ-साथ सरकारी व निजी संस्थानों, उपक्रमों, संगठनों के लिए बेहद उपयोगी है।
 

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With Regards,

AFTAB ALAM
Editor – Patrakarita Kosh 
(India's Ist Media Directory)
Limca Book Record Holder

Mumbai, Maharashtra
Mob. 09224169416

Email: aaftaby2k@gmail.com

अल जजीरा पर सरकार ने पाबंदी लगाई

सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय की एक अंतर मंत्रालयी समिति ने चैनल को प्रोग्राम कोड के उल्लंघन के तहत अल-जजीरा चैनल को दोषी पाया है। दरअसल चैनल ने कई अवसरों पर भारत के नक्शे को गलत तरह से दिखाया है। समिति ने इसके चलते चैनल को पांच दिनों के ऑफ-एयर कर दिया है। चैनल ने 2013 और 2014 में अपने प्रसारण में कई बार भारत का गलत नक्शा दिखाया था, जिसके बाद प्रसारण मंत्रालय ने यह मामला भारत के सर्वेयर जनरल (SGI) को भेजा था। और उनसे रिपोर्ट मिलने के बाद यह नोटिस जारी किया गया।
 
 10 अप्रैल को जारी किए गए सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय के आदेश में कहा गया है कि चैनल द्वारा दिखाए गए नक्शे गलत थे। कुछ में भारतीय क्षेत्र के एक हिस्से को नक्शे में भारत का हिस्सा नहीं दिखाया गया था। भारत की क्षेत्रीय सीमा को भी एक नक्शे में स्पष्ट रूप से और उचित आकार के साथ नहीं दिखाया गया था। उन्होंने कहा कि चैनल ने कुछ नक्शो में लक्षद्वीप और अंडमान द्वीप समूह को भी नहीं दिखाया था।
 
विदेश मंत्रालय ने भी 2 जुलाई 2014 को चैनल द्वारा दिखाए जा रहे इसी तरह के एक गलत नक्शे की जानकारी प्रसारण मंत्रालय को दी थी।इससे पहले 21 अगस्त 2014 को सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय ने ऐसे ही उल्लंघन के लिए चैनल को एक कारण बताओ नोटिस जारी किया था।

किसी ने बर्तन मांजे तो किसी ने सब्जी बेची, मगर परीक्षा में अव्वल आए

राजधानी में कई ऐसे मेधावी छात्र हैं, जिन्हें केवल पढ़ाई की चिंता नहीं, रोटी की भी है। स्कूल में पढ़ाई करने के बाद ये छात्र काम भी करते हैं, दो पैसे कमाते भी हैं इसके बावजूद ये अच्छे नंबर लेकर पास हुए हैं। नईदुनिया ने पड़ताल की तो पाया कि शहर के इन मेधावी छात्रों को घर में भरपूर पढ़ने का समय भी नहीं मिल पाता है, फिर भी वे दूसरे टॉपर्स से कम प्रतिभाशाली नहीं हैं।

बर्तन तक मांजती थी फिर भी लाई 91 फीसदी रिजल्ट

गुढ़ियारी के अशोक नगर की रहने वाली और सर्वोदय हायर सेकंडरी स्कूल गुढ़ियारी की छात्रा हेमलता सेन ने 91 फीसदी अंक लाकर अपने परिवार को गौरवान्वित किया है। एक विषय में उसने 99 अंक भी हासिल किए हैं।

उसने बताया कि उसके पिता की एक छोटी सी सेलून दुकान है। वह घर में बर्तन मांजना, पोंछा लगाने तक का काम करती थी। इसके बाद जब समय मिलता था तब वह गणित, फिजिक्स और केमिस्ट्री नियमित पढ़ती थी। पिता टीकाराम और मां देवकुमारी ने अपनी बिटिया की इस सफलता का श्रेय स्कूल प्रबंधन को श्रेय दिया है। स्कूल के प्रिंसिपल ने कहा था कि यदि वह टॉपटेन सूची में शामिल होगी तो उसे 1 लाख रुपए तक इनाम में दिया जाएगा। तीन फीसदी अंक से चूकने के बाद उसकी आंखों में इसका मलाल साफ झलक रहा है।

घर की सारी जिम्मेदारी, फिर भी 92 फीसदी रिजल्ट

पिता एक प्राइवेट कंपनी में कर्मचारी हैं। खुद का घर भी नहीं है। दो कमरे के किराए के घर में रहना पड़ता है। सब्जी दवाई आदि लाने के साथ मां का हाथ बंटाता है। उस कमरे में पढ़ाई करता है, जहां एक छोटा भाई और बहन शोर मचाते हैं जिससे बार-बार एकाग्रता भंग होती है। फिर भी वह दो फीसदी अंक कम पाने से टॉपटेन सूची से चूक गया है।

हम बात कर रहे हैं राजधानी के अम्बेडकर नगर गुढ़ियारी में रहने वाले छात्र कृष्णकांत मिश्रा की। जिसने सर्वोदय हिन्दी माध्यम स्कूल गुढ़ियारी से गणित संकाय में पढ़ाई कर 92 प्रतिशत अंक हासिल किया है। उसे मलाल इसी बात का है कि उसे और सुख-सुविधा मिलती तो शायद टॉपटेन में पहला नाम उसी का होता। उसकी मां राजकली और पिता विजय शंकर मिश्रा अपने बेटे की इस कामयाबी से फूले नहीं समा रहे हैं। उसने अपनी दादी सीता देवी से वादा किया था कि 90 फीसदी से अधिक अंक लाएगा। पालक बेटे को आईआईटी में पढ़ाना चाहते हैं, लेकिन घर की माली हालत ठीक नहीं है, इसलिए गुमसुम हो गए हैं।

पेपर बांटने और पंचर बनाने के बाद दिखी प्रतिभा

पहाड़ी चौक निवासी सर्वोदय स्कूल गुढ़ियारी के ही छात्र कृष्णा साहू पेपर बांटने और पंचर बनाने का काम करता है, फिर भी उसने 85 फीसदी अंक हासिल किया है। उनके पिता संतोष भी साइकिल का पंचर बनाने का काम करते हैं। मां गृहिणी हैं। स्कूल के प्रिंसिपल केजी चक्रधारी ने बताया कि बच्चा पढ़ने में बहुत अच्छा है, लेकिन गरीबी की वजह से इन्हें भरपूर पढ़ने का समय नहीं मिलता है। घर चलाने की जिम्मेदारी इन कंधों पर अभी से आ गई है।

मजदूर की बिटिया निकली मेधावी

पहाड़ी चौक निवासी रोमा वर्मा मजदूर परिवार की है। वह कभी-कभार पिता के काम में हाथ बंटाती है। उसने 85 फीसदी अंक हासिल किया है। उनके पिता देवराज और मां सरोज अपनी बिटिया की सफलता से काफी खुश हैं। स्कूल में अब उसे साइकिल देकर सम्मानित किया जाएगा।

साभार-http://naidunia.jagran.com/ से 

परम्परागत मीडिया के एकाधिकार को चुनौती देगा सोशल मीडिया

प्राचीन काल से ही सूचनाओं के आदान-प्रदान के लिए कई अनेक रोचक एवं अनोखे तरीके अपनाए जाते रहे हैं। आज वह एक कहानी की तरह लगती है। बीते दशकों में संचार टेक्नोलॉजी में आए चमत्कारिक परिवर्तन का सर्वाधिक फायदा सूचना जगत को हुआ है और मीडिया की इस पर निर्भरता बढ़ गई है। स्कॉटलैण्ड के अलेक्जेंडर ग्राहम बेल ने 1876 मे ‘टेलीफ़ोन’ का आविष्कार किया तो इसे मानव के प्रगतिशील विकास की राह में यह एक क्रांतिकारी कदम माना गया। तकनीकी विकास के कारण आज दुनिया मुट्ठी में समा गई है। चीन और अमेरिका के बाद भारत दुनिया का सबसे बड़ा इंटरनेट यूजर्स देश है। प्रत्येक पांचवी ऊंगली इंटरनेट के बटन पर है। जाहिर तौर पर आज पत्रकारिता पूरी तरह सूचना तकनीकी पर आश्रित है। ई-कम्यूनिकेशन का दौर शुरू हो चुका है। अब वेबसाइट, ई-मेल, यूट्यूब, सोशल साइट, ट्विटर, ब्लॉग जैसे ई-कम्युनिकेशन माध्यम पारंपरिक मीडिया को चुनौती देते दिखाई दे रहे हैं। आज के दौर में पत्रकारिता सूचना और मनोरंजन के मुख्य स्त्रोत बन गए हैं। लोग अखबार इंटरनेट और मोबाइल पर पढ़ रहे हैं। सोशल साइट का प्रयोग दिनों दिन बढ़ रहा है। वर्तमान में 2.7 बिलियन  से ज्यादा वेबपेज रोजाना सर्च हो रहे हैं। अमेरिका का युवा कागज पर छपा अखबार नहीं पढ़ रहा बल्कि वह अखबार की जगह नेट पर गूगल समाचार में एक ही जगह तमाम अखबारों की सुर्खियां देख ले रहा है। आज गूगल समाचार के कारण यूरोप और अमेरिका में अखबारो की संख्या और राजस्व दोनों गिर रहे हैं।

तेजी से बदलती तकनीकी ने पत्रकारिता का पारंपरिक चेहरा बदल दिया  है। आधुनिकता और प्रतिस्पर्धा के इस दौर में जहां पहले से खबरों की स्रोतों के इतने सारे माध्यम मौजूद थे, वहाँ ‘सोशल मीडिया’ ने सबको पछाड़ते हुए अपनी ‘अद्वितीय-पहचान’ बना ली है। ‘सोशल मीडिया’ लोगों की पहली पसंद बन गया है। इसका सीधा मतलब  है ‘जनता की अपनी आवाज़’। वो आवाज़ जो उसके अपने लोगों से ही निकाल कर उसे सुनाई जाती है। न कोई चैनल…….न कोई अखबार….. सिर्फ आप की खुद की आवाज़, आपकी खबरों के ज्ञान का भंडार। जो सूचनायें परंपरागत मीडिया का हिस्सा नहीं बन पाती, वह आज सोशल मीडिया की सुर्खियां बन'वायरस' फैला रही हैं। इंटरनेट की दुनिया में लोगों के पास असंख्य सोशल मीडिया प्लेटफ़ार्म उपलब्ध हैं, जहां लोग एक-दूसरे से आसानी से संपर्क बना सकते है। अपनी सूचनाओं एवं खबरों को सरलता से आपस में साझा कर सकते हैं। उनमें से सबसे प्रचलित फेसबुक और ट्विटर हैं। फेसबुक से पहले गूगल परिवार का ‘ऑर्कुट’ सोशल प्लेटफ़ार्म का सबसे बड़ा नाम था पर ‘एफ़बी’ के करिश्माई प्रभाव ने इस साल उसके अस्तित्व को ही खत्म कर दिया। गूगल ने ऑर्कुट की सेवाएं एकदम से समाप्त कर दी। आज फेसबुक लोगों की (विशेष तौर पर ज़्यादातर भारतीयों की) पहली पसंद है। दूसरा नंबर आता है ट्विटर का जिसे ‘सेलेब्रिटियों का अड्डा’ भी कहा जाता है। नेता से लेकर अभिनेता एवं जानी-मानी हस्तियाँ सब आपको ‘ट्विटर’ पर मिलेंगे वो भी ‘ओरिजिनल’! हाल में दावोस में संपन्न हुए वर्ल्ड इकोनामिक फोरम में गूगल के प्रमुख एरिक स्मिथ ने यह कह कर दुनिया को और उत्साहित कर दिया कि बहुत जल्द इंटरनेट जिन्दगी के हर पहलू में इतना रच बस चुका होगा कि यह ब्रॉडबैंड में गुम हो जायेगा। आपके इर्द-गिर्द इतने सारे सेंसर और डिवाइस होंगी कि आपके लिए उन्हें पता लगाना तक मुश्किल हो जायेगा।

यह सवाल परेशान कर सकता है कि मीडिया के इतने साधनों के बाद भी ‘सोशल मीडिया’ अस्तित्व मे क्यों आया ? क्या पहले से मौजूद मीडिया के स्रोत निरर्थक और असक्षम हो गए थे जो सोशल मीडिया का जन्म हुआ ?  असल मे आत्म-चिंतन और अवलोकन तो प्रिंट और टीवी मीडिया वालों को करना चाहिए जिनकी निष्पक्षता और स्वतंत्रता पर बार-बार दाग लगे हैं। शायद उसी ‘दाग’ को साफ करने के लिए ‘सोशल मीडिया’ ने जन्म लिया। लोकतंत्र के महत्वपूर्ण अंग की नीलामी को रोकने के लिए ही ‘सोशल मीडिया’ अस्तित्व मे आयी दिखती है।

एक रिपोर्ट के अनुसार, केवल भारत में फेसबुक और ट्विटर पर सक्रिय सदस्यों की संख्या 33 मिलियन से अधिक हैं। ये आंकड़ें अचंभित करने वाले हैं। सोचिए, इतने सारे लोगो के बीच सूचनाओँ के आदान-प्रदान की सीमा क्या होगी ? भारतीय दृष्टिकोण के अनुसार पिछले कुछ वर्षो मे ‘सोशल मीडिया’ ने भारत मे ‘गेम-चेंजर’ की तरह काम किया है। राजनीति, व्यापार, शिक्षा और मनोरंजन की क्षेत्र मे ‘सोशल मीडिया’ ने अपनी अद्भुत्त शक्ति दिखाई है। 

लोकसभा चुनाव से ठीक पहले कांग्रेस के एक अधिवेशन में राहुल गांधी ने सोशल मीडिया की अहमियत का उल्लेख किया। बाद में तत्कालीन सरकार ने इसके लिए बजटीय प्रावधान भी किया। नरेंद्र मोदी और भारतीय जनता पार्टी की लोकसभा चुनावों मे अप्रत्याशित जीत मे वेब (सोशल) मीडिया की भूमिका महत्वपूर्ण थी। प्रधानमंत्री मोदी ने भी सोशल मीडिया के महत्व की कई मंचों पर स्वीकृति दी है। जिस ‘मोदी लहर’ की मीडिया वाले आए-दिन अपनी ‘न्यूज़-डिबेट’ मे चर्चा करते है, उस लहर को आक्रामक बनाने मे ‘सोशल मीडिया’ की अहम भूमिका रही है। 

‘अबकी बार, मोदी सरकार’  ‘हर हर मोदी…घर घर मोदी’ जैसे विवादास्पद नारे भी सोसल मीडिया के ही हिस्से थे। लोकसभा चुनावों में सोशल मीडिया के प्रभाव को अध्ययन करने पर कई चौंकानें वाले तथ्य एवं आंकड़े सामने आए है। लोकसभा चुनाव की घोषणा के बाद केवल फेसबुक पर 29 मिलियन लोगों ने 227 मिलियन बार चुनाव से संबन्धित पारस्परिक क्रियाएं (जैसे पोस्ट लाइक, कमेंट, शेयर इत्यादि) की। इसके अतिरिक्त 13 मिलियन लोगों ने 75 मिलियन बार केवल नरेंद्र मोदी के बारे में बातचीत की। इससे अंदाज़ा लगाया जा सकता है कि 814 मिलियन योग्य मतदाताओं वाले देश (भारत) में सोशल मीडिया का प्रचार का पैमाना लोकसभा चुनावों के दौरान व्यापक था। 

अन्ना हज़ारे और आम आदमी पार्टी के संस्थापक अरविंद केजरीवाल को ब्रांण्ड बनाने में सोशल मीडिया का अहम योगदान रहा है। देश –दुनिया में जुनून पैदा करने वाले अन्ना हजारे के भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन की सफलता में सोशल मीडिया की महत्वपूर्ण भूमिका थी। यह सोशल मीडिया का ही करिश्मा था कि छोटी सी चिंगारी को उसने जनाक्रोश में तब्दील कर दिया था। तत्कालीन यूपीए सरकार दबाव में आ गयी थी। सरकार ने भी सोशल मीडिया की शक्ति को स्वीकारा था। सोशल मीडिया सामाजिक बुराइयों के खिलाफ लड़ाई मे एक ‘मेसेंजर’ के तौर पर उतरा है। लोगों की आवाज़ को सरकार तक पहुंचाने मे सोशल मीडिया सक्रिय रहा है। सोशल मीडिया ने सामाजिक कुरुतियों को उजागर करने और जागरूकता फैलाने में भी अहम भूमिका निभाई है। सोशल मीडिया सरकार पर दबाव बनाने का प्रभावकारी जरिया बन गया है। ‘आरुषि-हेमराज’ हत्याकांड, ‘दामिनी बलात्कार कांड’, गीतिका-गोपाल कांड़ा’ जैसे अनेक मामलों में सोशल मीडिया ने इंसाफ की जंग लड़ी है। 

दिल्ली का दिल दहला देने वाले दामिनी बलात्कार कांड को लेकर सबसे ज्यादा आक्रोश सोशल मीडिया पर ही दिखा। यह सोशल मीडिया का ही प्रभाव था कि तत्कालीन सरकार ने आनन-फानन मे उक्त घटना के बाद कुछ महत्वपूर्ण कदम उठाए। पूरा देश और सोशल मीडिया दामिनी के साथ खड़ा था। देश-विदेश से ऐसी घटनाओं के खिलाफ माहौल बनाने का पूरा श्रेय भी इसी माध्यम को जाता है। सोशल मीडिया को जिस तरह से स्वीकृति मिल रही है उससे कहा जा सकता है कि भूतकाल कीर्तिमय था, वर्तमान समृद्ध है, भविष्य उज्ज्वल और यशस्वी होगा। जिस तरह से आज समाज के हर वर्ग ने सोशल मीडिया को अपनी स्वीकृति दी है, उससे इसकी ‘स्वीकार्यता’ और ‘उपयोगिता’ जाहिर तौर पर अन्य मीडिया माध्यमों के लिए एक गंभीर चुनौती के तौर पर उभरी है। इसके बढ़ते प्रभाव के मद्देनजर मीडिया हाउसों के रणनीतिकार अपनी व्यापारिक और पेशेवर रणनीतियों में बदलाव को मजबूर हुए हैं। 

उधर, परंपरागत मीडिया के प्रभावी माध्यम माने जाने वाले टेलीविजन को आम जनता देखती है। उसे कोसती भी है। क्या इसे हम टीवी चैनलों की विश्वसनीयता पर संकट कहें ? टीवी चैनलों के आने के बाद जो कुछ गलत हो रहा था, उसे लोगों के बीच में लाने का काम शुरू हुआ। आने वाले समय में सोशल मीडिया एक प्रभावकारी और भरोसेमंद तथा त्वरित पत्रकारिता का स्थान लेगी। पश्चिमी देशों में ऐसा होने लगा है। सोशल और यहां तक कि टीवी पत्रकारिता ने बहुत बड़ी क्रांति ला दी है। इसने अभिजात्य संस्कृति को ध्वस्त किया है। सामंतवादी सोच को बदला है और जमीनी स्तर तक लोकतंत्र को फैलाया है।

वेबसाईट, ईमेल, ब्लॉग, सोशल नेटवर्किंग वेबसाइटस, जैसे माइ स्पेस, आरकुट,फेसबुक आदि, माइक्रो ब्लागिंग साइट टि्वटर, ब्लाग्स, फॉरम, चैट वैकल्पिक मीडिया का हिस्सा हैं। 

साभार- पीाईबी से 

बौद्धिक विमर्शों से नाता तोड़ चुके हैं हिंदी के अखबार

हिंदी पत्रकारिता को यह गौरव प्राप्त है कि वह न सिर्फ इस देश की आजादी की लड़ाई का मूल स्वर रही, बल्कि हिंदी को एक भाषा के रूप में रचने, बनाने और अनुशासनों में बांधने का काम भी उसने किया है। हिंदी भारतीय उपमहाद्वीप की एक ऐसी भाषा बनी, जिसकी पत्रकारिता और साहित्य के बीच अंतसंर्वाद बहुत गहरा था। लेखक-संपादकों की एक बड़ी परंपरा इसीलिए हमारे लिए गौरव का विषय रही है। हिंदी आज सूचना के साथ ज्ञान-विज्ञान के हर अनुशासन को व्यक्त करने वाली भाषा बनी है तो इसमें उसकी पत्रकारिता के योगदान को नकारा नहीं जा सकता है। हिंदी पत्रकारिता ने इस देश की धड़कनों को व्यक्त किया है, आंदोलनों की वाणी बनी है और लोकमत निर्माण से लेकर लोकजागरण का काम भी बखूबी किया है।   
 
आज की हिंदी पत्रकारिता पर आरोप लग रहे हैं कि वह अपने समय के सवालों से कट रही है। उन पर बौद्धिक विमर्श छेड़ना तो दूर वह उन मुद्दों की वास्तविक तस्वीर सूचनात्मक ढंग से भी रखने में विफल पा रही है तो यह सवाल भी उठने लगा है कि आखिर ऐसा क्यों है। 1990 के बाद के उदारीकरण के सालों में अखबारों का सुदर्शन कलेवर, उनकी शानदार प्रिटिंग और प्रस्तुति सारा कुछ बदला है। वे अब पढ़े जाने के साथ-साथ देखे जाने लायक भी बने हैं। किंतु क्या कारण है उनकी पठनीयता बहुत प्रभावित हो रही है। वे अब पढ़े जाने के बजाए पलटे ज्यादा जा रहे हैं। पाठक एक स्टेट्स सिंबल के चलते घरों में अखबार तो बुलाने लगा है किंतु वह इन अखबारों पर वक्त नहीं दे रहा है। क्या कारण है कि ज्वलंत सवालों पर बौद्धिकता और विमर्शों का सारा काम अब अंग्रेजी अखबारों के भरोसे छोड़ दिया गया है? हिंदी अखबारों में अंग्रेजी के जो लेखक अनूदित होकर छप रहे हैं वह भी सेलिब्रेटीज ज्यादा हैं, बौद्धिक दुनिया के लोग कम । हिंदी की इतनी बड़ी दुनिया के पास आज भी ‘द हिंदू’ या ‘इंडियन एक्सप्रेस’ जैसा एक भी अखबार क्यों नहीं है, यह बात चिंता में डालने वाली है। कम पाठक, सीमित स्वीकार्यता के बजाए अंग्रेजी के अखबारों में हमारी कलाओं, किताबों, फिल्मों और शेष दुनिया की हलचलों पर बात करने का वक्त है तो हिंदी के अखबार इनसे मुंह क्यों चुरा रहे हैं।    
 
हिंदी के एक बड़े लेखक अशोक वाजपेयी अगर यह कह रहे हैं कि-“पत्रकारिता में विचार अक्षमता बढ़ती जा रही है, जबकि उसमें यह स्वाभाविक रूप से होना चाहिए। हिंदी में यह क्षरण हर स्तर पर देखा जा सकता है। हिंदी के अधिकांश अखबार और समाचार-पत्रिकाओं का भाषा बोध बहुत शिथिल और गैरजिम्मेदार हो चुका है। जो माध्यम अपनी भाषा की प्रामणिकता आदि के प्रति सजग नहीं हैं, उनमें गहरा विचार भी संभव नहीं है। हमारी अधिकांश पत्रकारिता, जिसकी व्याप्ति अभूतपूर्व हो चली है, यह बात भूल ही गयी है कि बिना साफ-सुथरी भाषा के साफ-सुथरा चिंतन भी संभव नहीं है।” (जनसत्ता,26 अप्रैल,2015) जाहिर तौर पर श्री वाजपेयी का चिंताएं हिंदी समाज की साझा चिंताएं हैं। हिंदी के पाठकों, लेखकों, संपादकों और समाचारपत्र संचालकों को मिलकर अपनी भाषा और उसकी पत्रकारिता के सामने आ रहे संकटों पर बात करनी ही चाहिए। यह देखना रोचक है कि हिंदी की पत्रकारिता के सामने आर्थिक संकट उस तरह से नहीं हैं जैसा कि भाषायी या बौद्धिक संकट। हमारे समाचारपत्र अगर समाज में चल रही हलचलों, आंदोलनों और झंझावातों की अभिव्यक्ति करने में विफल हैं और वे बौद्धिक दुनिया में चल रहे विमर्शों का छींटा भी अपने पाठकों पर नहीं पड़ने दे रहे हैं तो हमें सोचना होगा कि आखिर हमारी एक बड़ी जिम्मेदारी अपने पाठकों का रूचि परिष्कार भी रही है। साथ ही हमारा काम अपने पाठक का उसकी भाषा और समाज के साथ एक रिश्ता बनाना भी है। कई बार ऐसा लगता है कि हिंदी के अखबार टीवी न्यूज चैनलों से होड़ कर रहे हैं। यह होड़ अखबार के सौंदर्यबोध उसकी सुंदर प्रस्तुति तक सीमित हो तो ठीक, किंतु यह कटेंट के स्तर पर जाएगी तो खतरा बड़ा होगा। एक एफएम रेडियो पर बोलती या बोलते हुए किसी रेडियो जाकी और अखबार की भाषा में अंतर सिर्फ माध्यमों का अंतर नहीं है, बल्कि इस माध्यम की जरूरत भी है। इसलिए टीवी और रेडियो की भाषा से होड़ में हम अपनी मौलिकता को नष्ट न करें। हिंदी के अखबारों के संपादकों का आत्मविश्वास शायद इस बाजारू हवा में हिल गया लगता है। वे हिंदी के प्रचारक और रखवाले जरूर हैं किंतु इन सबने मिलकर जिस तरह आमफहम भाषा के नाम पर अंग्रेजी के शब्दों को स्वीकृति और घुसपैठ की अनुमति दी है, वह आपराधिक है। यह स्वीकार्यता अब होड़ में बदल गयी है। हिंदी पत्रकारिता में आई यह उदारता भाषा के मूल चरित्र को ही भ्रष्ट कर रही है।   
 
यह चिंता भाषा की नहीं है बल्कि उस पीढ़ी की भी है, जिसे हमने बौद्धिक रूप से विकलांग बनाने की ठान रखी है। आखिर हमारे हिंदी अखबारों के पाठक को क्यों नहीं पता होना चाहिए कि उसके आसपास के परिवेश में क्या घट रहा है। हमारे पाठक के पास चीजों के होने और घटने की प्रक्रिया के सामाजिक, आर्थिक, सांस्कृतिक पहलुओं पर विश्लेषण क्यों नहीं होने चाहिए? क्यों वह गंभीर विमर्शों के लिए अंग्रेजी या अन्य भाषाओं पर निर्भर हो? हिंदी क्या सिर्फ सूचना और मनोरंजन की भाषा बनकर रह जाएगी?  अपने बौद्धिक विश्लेषणों, सार्थक विमर्शों के आधार पर नहीं, सिर्फ चमकदार कागज पर शानदार प्रस्तुति के कारण ही कोई पत्रकारिता लोकस्वीकृति पा सकती है? आज का पाठक समझदार, जागरूक और विविध दूसरे माध्यमों से सूचना और विश्वेषण पाने की क्षमता से लैस है। ऐसे में हिंदी के अखबारों को यह सोचना होगा कि वे कब तक अपनी छाप-छपाई और प्रस्तुति के आधार पर लोगों की जरूरत बने रहेंगें।   
 
एक समय में अखबार सूचना पाने के एक प्रमुख साधन थे, किंतु अब सूचनाओं के लिए लोग अखबारों पर निर्भर नहीं है। लगभग हर सूचना पाठक को अन्य माध्यमों से मिल जाती है। इसलिए लोग सूचना के लिए अखबार पढ़ते रहेंगें यह सोचना ठीक नहीं है। अतः अखबारों को अंततः कटेंट पर लौटना होगा। गंभीर विश्लेषण और खबरों के पीछे छपे अर्थ की तलाश करनी होगी। हिंदी अखबारों को अब सूचना और मनोरंजन के डोज या ओवरडोज के बजाए नए विकल्प देखने होगें। उन विषयों पर फोकस करना होगा जिससे पाठक को घटना का परिप्रेक्ष्य पता चले, इसके लिए हमें सूचनाओं से आगे होना होगा। हिंदी अखबारों को यह मान लेना चाहिए कि वे अब सूचनाओं के प्रथम प्रस्तोता नहीं हैं बल्कि उनकी भूमिका सूचना पहुंच जाने के बाद की है।
 
इसलिए घटना की सर्वांगीण और विशिष्ट प्रस्तुति ही उनकी पहचान बना सकती है। आज सारे अखबार एक सरीखे दिखने लगे हैं, उनमें भी विविधता की जरूरत है। हिंदी के अखबारों ने अपनी साप्ताहिक पत्रिकाओं को विविध विषयों पर केंद्रित कर एक बड़ा पाठक वर्ग खड़ा किया है। उन्हें अब साहित्य, बौद्धिक विमर्शों, संवादों, दुनिया में घट रहे परिवर्तनों पर नजर रखते हुए ज्यादा सुरूचिपूर्ण बनाना होगा। भारतीय भाषाओं खासकर मराठी, बंगला और गुजराती में ऐसे प्रयोग हो रहे हैं, जहां सूचना के अलावा अन्य संदर्भ भी बराबरी से जगह पा रहे हैं। एक बड़ी भाषा होने के नाते हिंदी से ज्यादा गंभीर प्रस्तुति और ठहराव की उम्मीद की जाती है। उसकी तुलना अंग्रेजी के अखबारों होगी और होती रहेगी क्योंकि वह अंग्रेजी के बौद्धिक आतंक को चुनौती देने की संभावना से हिंदी भरी-पूरी है। हिंदी के पास ज्यादा बड़ा फलक और जमीनी अनुभव हैं। अगर वह अपने लोक की पहचान कर, भारत की पहचान कर, अपने देश की वाणी को स्वर दे सके तो भारत का भारत से परिचय तो होगा ही,यह देश अपने संकटों के समाधान भी अपनी ही भाषा में पा सकेगा। क्या हिंदी की पत्रकारिता, उसके अखबार, संपादक और प्रबंधक इसके लिए तैयार हैं? 
(लेखक माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय, भोपाल में जनसंचार विभाग के अध्यक्ष हैं)