Home Blog Page 1931

कश्मीरी पंडितों की वापसी से कौन डरता है ?

कश्मीर घाटी में कश्मीरी पंडितों को वापस बसाने को लेकर अलगाववादी संगठनों की जैसी प्रतिक्रियाएं हुयी हैं, वे बहुत स्वाभाविक हैं। यह बात साबित करती है कि कश्मीर घाटी में जो कुछ हुआ, उसमें इन अलगाववादियों की भूमिका और समर्थन रहा है। कश्मीर पंडितों की कालोनी बनाने की बात पर उन्हें ‘यहूदी’ शब्द से संबोधित करना कितना खतरनाक है। यह वहां पल रही घातक मानसिकता और विचारधारा दोनों का प्रगटीकरण है। कश्मीरी पंडित एक पीड़ित पक्ष हैं, जबकि इजराइल के यहूदी एक ताकतवर समूह हैं। उनसे कश्मीरी पंडितों की तुलना अन्याय ही है। इतने अत्याचार और दमन के बावजूद पंडितों ने अब तक अपनी लड़ाई कानूनी और अहिंसक तरीके से ही लड़ी है। वे हथियार उठाने और कत्लेआम करने वाले लोग नहीं है। पाकप्रेरित अलगाववादी संगठन घाटी को हिंदुमुक्त करने के नापाक इरादे में कामयाब हुए तो उन्हें यह लगा कि कश्मीर अब अलग हो जाएगा। किंतु हिंदुस्तान के लोग, कश्मीर के लोग इस हिस्से को भारत का मुकुट मानते हैं। उनके सुख-दुख में साथ खड़े होते हैं, समान संवेदना का अनुभव करते हैं। कुछ मुट्ठी भर लोग इस सांझी विरासत से भरोसा उठाना चाहते हैं।उन्हें बार-बार विफलता हाथ लगी है और आगे भी लगेगी। क्या कश्मीरी अलगाववादी यह कहना चाहते हैं कि जहां मुसलमान बहुसंख्यक होंगे वहां दूसरे पंथ के लोग नहीं रह सकते?

पाकिस्तान के द्विराष्ट्रवाद पर तमाचाः
    कश्मीर दरअसल पाकिस्तान के द्विराष्ट्रवाद के सिद्धांत पर एक तमाचा है। किसी राज्य में बहुसंख्यक मुस्लिम जनता और भारत का शासन यह पाकिस्तान से बर्दाश्त नहीं होता। हम साथ मिलकर रह रहे हैं, रह सकते हैं, यही पाकिस्तान की पीड़ा है। कश्मीर भारत का सांस्कृतिक परंपरा का अविछिन्न अंग है। हमारे तीर्थ, पर्व, मंदिर, देवस्थल सब यहां हैं। अमरनाथ और वैष्णो देवी से लेकर शंकराचार्य के मंदिर यही कथा कहते हैं। यह क्षेत्र ऋषियों-मुनियों की तपस्यास्थली रहा है। लेकिन अलगाववादियों के अपने तर्क हैं। उन्होंने बंदूकों, अपहरणों, दुराचारों, लूट और आतंक के आधार पर इस इलाके को नरक बनाने की कोशिशें कीं। किंतु हाथ क्या लगा? आज भी वहां एक चुनी हुयी सरकार है, जिसमें भारत का एक राष्ट्रवादी दल हिस्सेदार है। यह साधारण नहीं है कि घाटी में भाजपा को वोट नहीं मिले, यह गहरे विभाजन का संकेत है। यह बात बताती है कि एक खास इलाके में किस तरह से लोगों को राष्ट्र की मुख्यधारा से काटकर देश के खिलाफ खड़ा कर दिया गया है। इस मानसिकता को पालने-पोसने और विकसित करने के जतन निरंतर हो रहे हैं। भारत के खिलाफ आतंकी गतिविधियां चलाने वालों को समर्थन देने वाले तत्व आज भी घाटी में मौजूद हैं। भारतीय सेना पर पत्थर फेंकना इसी मानसिकता का परिचायक है। ऐसे असुरक्षित वातावरण में जहां पुलिस और सेना के लोग पत्थर खा रहे हों, मार दिए जाते हैं वहां मुट्ठी भर कश्मीरी पंडित किस भरोसे और विश्वास पर बसेंगें ? निश्चय ही यह अलगाववादियों की पीड़ा है कि उन्होंने कितने जतन और षडयंत्रों से कश्मीरी पंडितों को यहां से भगाया और वे फिर यहां बस जाएंगें। ये वही लोग हैं जो भारत से आजादी चाहते हैं और पाकिस्तानी हुक्मरानों के तलवे चाटते हैं।

 अब शुरू कीजिए पाक अधिकृत कश्मीर की मांगः
  कश्मीर की आजादी का सवाल उठाने वाले लोग अब यह अच्छी तरह समझ चुके हैं कि उनकी हसरत पूरी नहीं हो सकती। भारत के लोग कभी यह होने नहीं देंगे। राजनीतिक पहलकदमी से परे हिंसक आंदोलन चलाने वाली ये ताकतें भारत के खिलाफ कश्मीरी मानस में जहर भरने का काम निरंतर कर रही हैं। भारत सरकार भी इनके प्रति नरम रवैया अख्तियार करती रही है। जाने किस कूटनीति के चलते भारत ने पाक अधिकृत कश्मीर के बारे में बात करनी बंद कर रखी है। जबकि भारत की सरकार को प्रखरता से आजाद कश्मीर (पाक अधिकृत कश्मीर) के बारे में बात करनी चाहिए। कश्मीर घाटी ही नहीं हमें पूरा कश्मीर चाहिए यही इस संकट का वास्तविक समाधान है। राजा हरि सिंह के साथ विलय पत्र पर हस्ताक्षर के बाद हुयी राजनीतिक गफलतों ने ही कश्मीर के हालात बिगाड़े हैं। 

घाटी की हिंदू-सिख आबादी के साथ जो कुछ हुआ उसके भी दोषियों को दंडित करने और उन पर मुकदमे चलाने की जरूरत है। कश्मीरी पंडितों पर जो अत्याचार हुआ, उसके दोषी आज भी मजे से घूम रहे हैं। 2012 के दंगों पर एक गुजरात की सरकार के पीछे पड़े लोग, क्या कश्मीरियों पर होने वाले अत्याचार के खिलाफ बोलेगें? गुजरात दंगों पर तो सैंकड़ों को जेल और सजा हो चुकी है। क्या कश्मीर घाटी के गुनहगारों पर भी हमारी सरकारों की नजर जाएगी? अपराध-अपराध है उसे चयनित आधार पर नहीं देखा जाना चाहिए। मलियाना के गुनहगारों के लिए सारे मीडिया में स्यापा है। लेकिन कश्मीर में जो हुआ उसे पूरी इंसानियत शर्मिंदा है। सरकार को चाहिए कि ऐसे मानवता विरोधी आतंकियों की पड़ताल कर उनके खिलाफ,उनके मददगारों के खिलाफ मामले खोले और नए सिरे से कार्रवाई प्रारंभ करे। जिन कश्मीरी पंडितों के घरों पर कब्जे करके लोग बैठे हैं, उनके कब्जे हटाए जाएं। भारत की आजादी के बाद शायद ये सबसे बड़ा विस्थापन था, जिसमें 65 हजार कश्मीरी पंडितों को अपना घर छोड़ना पड़ा। भारत औऱ राज्य की सरकार की यह जिम्मेदारी है वे गुनहगारों को कतई माफ न करें।

यहां सिर्फ सेना ही है भारत के साथः
        आज चारो तरफ से एक ही आवाज आती है कि घाटी से सेना से हटाओ। सवाल यह उठता है कि क्या सेना को हटाने से कश्मीर में आया अमन-चैन रह पाएगा? क्या इस हिस्से में पुनः आतंकी शक्तियां हावी नहीं हो जाएगीं? लोकतंत्र के मायने मनमानी नहीं होती। किंतु कश्मीरी अलगाववादियों ने इस राज्य को बहुत नुकसान पहुंचाया है। अहमद शाह गिलानी की लंबी हड़तालों, प्रदर्शनों ने राज्य की अर्थव्यवस्था को तो चौपट किया ही है लोगों को जान-माल के खतरे भी दिए। ऐसे नेताओं से लोग अब ऊब चुके हैं। गिलानी भी अब बूढ़े हो चुके हैं और कश्मीर को भारत से अलग करने का उनका सपना अब तो पूरा होने से रहा। एक चुनी हुयी सरकार अब कश्मीर में है। जरूरत इस बात की है कश्मीर को विकास के मोर्चे पर आगे लाकर खड़ा किया जाए। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी निरंतर कश्मीर के सवाल को अपनी प्राथमिकता में रखा है। तमाम आलोचनाओं और राजनीतिक मजबूरियों के बावजूद इस राज्य में मुफ्ती सरकार के साथ गठजोड़ किया। 

यह संकेत बताते हैं कि भारत सरकार इस राज्य के विकास में रोड़े अटकाना नहीं चाहती। किंतु इस पूरे खेल में सिर्फ लेना ही नहीं चलेगा। यह संभव नहीं कि भारत की सरकार आपके हर दर्द में साथ खड़ी हो और आप पाकिस्तान के झंडे लहराएं। कश्मीर के अलगाववादी तत्वों के साफ संदेश देने की जरूरत है कि वे आतंक, हिंसा, खून-खराबे, पत्थर फेंकने जैसे सारे हथियार आजमा चुके हैं अब उन्हें चाहिए कि वे लोकतंत्र की खुली हवा में लोगों को सांस लेने दें। ऐसे हालात बनाएं कि सेना बैरकों में जा सके। इसके पहले उन्हें यह भरोसा देना होगा कि घाटी में सेना के अलावा अब तथाकथित अलगाववादी भी भारत के प्रति प्रेम रखते हैं। हालात यह हैं कि घाटी में आज भी भारत विरोधी और पाक समर्थक आवाजें गूंज रही हैं। ऐसे समय. में कश्मीरी पंडितों की वापसी का विरोध करके अलगाववादियों ने अपना असली चेहरा दिखा दिया है। हालांकि श्राइन बोर्ड के जमीन देने के सवाल पर ऐसे ही प्रपंची स्वर सामने आ चुके थे। यह समझना मुश्किल नहीं है कश्मीर का असल संकट घाटी के मुट्ठी पर अलगाववादी हैं, जो पाकिस्तान में बैठे अपने आकाओं के इशारे पर नाचते रहते हैं। उन्हें यह समझ लेना चाहिए कि ये अलगाववादी कश्मीर की आवाज नहीं हैं। कश्मीर की जनता ने फैसला कर दिया है, एक लोकप्रिय सरकार वहां बनी है, उसे काम करने दें। अगर शौक है तो अगले चुनाव में उतरकर अपनी हैसियत आजमा लें। लोकतंत्र में यही एकमात्र विकल्प है। बंदूकों के साए में आजादी-आजादी की रट लगाने से क्या हासिल है इसे वे अच्छी तरह जानते हैं।

मन है अर्जुन और विवेक चेतना श्री कृष्ण

पानी का अपना कोई आकार नहीं होता। उसे जिस पात्र में भी डालते हैं, वह उसी का आकार ले लेता है। इसी तरह चित्त का भी अपना कोई आकार नहीं होता। उसको जिस ख्याल में आप रखेंगे, उसी के मुताबिक हो जाएगा। चिंतन का अर्थ होता है, मन का किसी एक विचार में बार-बार रमण करना। जैसे धन के विषय में चित्त जब बार-बार चिंतन करता है, तो लोभ पैदा होता है, अपने संबंधियों का चिंतन करने से मोह पैदा होता है, बीमारी के विषय में चिंतन करने से बीमारी बढ़ती है और स्वास्थ्य के विषय में चिंतन करने से स्वास्थ्य बेहतर होता है। ठीक इसी तरह परमात्मा के विषय में बार-बार चिंतन करने से चित्त में परमात्मभाव पैदा होता है, जो मुक्ति की ओर ले जाने मददगार है।

जब आपके बाल उलझते हैं,तो आप कंघी लेकर बड़े प्यार से उनको सुलझा लेते हैं। जब पतंग की डोर उलझ जाती है, तो बच्चे बड़े धीरज से डोर का एक सिरा पकड़ कर उसको धीरे-धीरे सुलझा लेते हैं। उलझी हुई चीज को प्यार और धीरज से सुलझाना पड़ता है। ठीक इसी तरह मन की उलझन के साथ भी ऐसा ही करना चाहिए। जब मन में कई बुरे ख्याल इकट्ठा हो जाते हैं, तब वह उलझ जाता है। बुरे ख्याल नकारात्मकता पैदा करते हैं और नकारात्मकता उलझन बढ़ाती है। मन कभी अच्छे ख्यालो से नहीं उलझता। अच्छे विचार मन को सुलझाने के लिए होते हैं। 

उलझन अक्सर तब होती है, जब निश्चित काम वक्त पर ना हो, एक साथ अनेक कार्यों में चित्त बंटा हुआ हो। किसी बात को लेकर डर हो, मन की बात पूरी ना हो रही हो, अहंकार को ठेस लगी हो, नुकसान हो गया हो वगैरह-वगैरह। इन हालातों से मन बुरे ख्यालों से उलझ जाता है। लेकिन, स्मरण रहे कि मन को सुलझाना हो, तो उलझन को समझना सीखिए। इसके लिए उलझे हुए एक-एक ख्याल को प्रेम और धीरज से सुलझाने की कोशिश करनी होगी। अपने अधूरे काम को पूरा करते जाइए। जो हो गया है, उसके बारे में सोचकर परेशान मत होइए। आपको सृजन की नई शक्ति मिलेगी और मन की उलझी हुई डोर सुलझती जाएगी।

यह तो आपके ऊपर है कि आप अपने मन में कौन-सी बात संजोते हैं। मन की सफाई हमें वैसे ही करनी चाहिए जैसे घर की सफाई की जाती है। जैसे घर को सजाने में ध्यान देते हैं, मन को सजाने में भी दें। अक्सर घर तो सजे रहते हैं, लेकिन मन की खबर न लेने से कारण मन बुरे विचारों और नकारात्मकता से भरा जाता है। अपने मन को घर का स्टोर या कूड़ेदान न बनने दें। उसे ज्ञान-ध्यान और जीवन निर्माण लगाएं। इससे मन में ताजा और सकारात्मक विचारों के लिए जगह बनेगी। जब भी कोई नकारात्मक विचार आए, उसे मन में घर न करने दें, क्योंकि वह एक बुरा विचार पूरे मन पर हावी होकर आपको दुखी कर देगा।

सच है कि हमारा मन जाकर बार-बार अटक जाता है, मन को कुछ खोने का डर और मिलने की आस लगी रहती है, जो हमें सुखी-दुखी, मान-अपमान, लाभ-हानि, जय-पराजय देती है, वही हमारी माया है। कहा गया है कि जब तक मन माया के जाल में फंसा रहता है, मुक्ति मुमकिन नहीं। माया से ऊपर उठना मुक्ति है। संसार जितना दिखाई देता है, वह और कुछ नहीं, बल्कि माया का जाल है। इसीलिए कहा गया है मन ही मनुष्य के बंधन और मुक्ति का कारण है। आप अगर चाहें तो मन को मना सकते हैं और नहीं तो आप मन की मनमानी को रोक नहीं पाएंगे। 

बात ऎसी है कि महाभारत का युद्ध कहीं बाहर नहीं, हमारे मन में ही चलता है। मन में अच्छे और बुरे विचारों की लड़ाई ही महाभारत है। यहां हमारा मन अर्जुन है और विवेक रूपी चेतना कृष्ण।

युद्ध के दौरान जब अर्जुन ने अपने सभी सगे-संबंधियों, गुरुओं आदि को सामने देखते हैं, तो उनके मन में मोह पैदा हो जाता है। उन्हें लगता है कि ये सब तो मेरे अपने है, मैं इनको कैसे मार सकता हूं! इससे तो अच्छा है कि मैं युद्ध ही न करूं। ऐसी बातें सोच कर दुखी अर्जुन भगवान कृष्ण की शरण में बैठ गए। तब भगवान कृष्ण ने अर्जुन को गीता का उपदेश दिया। कहा – अर्जुन, जड़ मत बनो। यह तुम्हारे चरित्र के अनुरूप नहीं है। हृदय की तुच्छ दुर्बलता को त्यागकर युद्ध के लिए खड़े हो जाओ।

कई बार व्यक्ति को किसी काम को करने से उसका दुर्बल मन डराता है। इस वजह से वह आगे नहीं बढ़ पाता। लेकिन याद रखना चाहिए कि जीवन में तरक्की दुर्बलता से नहीं, बल्कि मजबूत इरादों से मिलती है। दिनचर्या के हर काम को युद्ध की तरह समझना चाहिए और उसको उत्साह के साथ पूरा करना चाहिए। मन को कभी कमजोर नहीं पड़ने देना चाहिए। मन डराएगा, लेकिन हमें डरना नहीं है। जीवन आगे बढ़ने के लिए है, डर कर या निराश होकर बैठ जाने के लिए नहीं। जीवन में हार के साथ जीत, नुकसान के साथ फायदा और सुख के साथ दुख ऐसे जुड़े हैं, जैसे सिक्के के दो पहलू।

इंसान होने का हक़ अदा करने का सबसे अच्छा तरीका यही है कि हमें जो भी, जैसा भी मिला है उसे लेकर खुश रहें। लेकिन खुशी के लिए केवल सोचने भर से काम नहीं चलता। उसके लिए मन को समझने और उसको अपने काबू में करने की जरूरत है। कभी खुशी का माहौल भी होगा तो भी मन कुछ समय के लिए खुश करके, फिर से परेशान कर देगा। मन को खुश रखना हमारी कोशिश पर निर्भर है। खुशी की हर कोशिश को अंजाम देना ज़िंदगी की सबसे बड़ी कामयाबी है।
 याद रखिए –
सफर ही हद है वहां तक कि कुछ निशान रहे 
चले चलो कि जहाँ तक ये आसमान रहे। 
———————————————-

संपर्क

डॉ.चन्द्रकुमार जैन 
दुर्गा चौक,दिग्विजय पथ 
राजनांदगांव,छत्तीसगढ़ 
मो.9301054300 

सामाजिक संदेश, रंग-बिरंगे परिधानों की धूम..

    पेटा ने दिया नो लैदर का संदेश!

नई दिल्ली।; राजधानी में शुक्रवार की शाम को फैशन के रंग में रंगने की सौगात देते हुए भव्य उद्घाटन के साथ ही इण्डिया रनवे वीक ने दिल्लीवासियों एवम् तमाम फैशनिस्टाज़ को अपना कायल बना रखा है। 

जेन्जुम गादी के माय बेस्ट फ्रेंड, मासूमी मेवावाला के मिक्स फैशनेबल परिधानों, मनीष पटेल के इटालियन स्टाईल से इन्सपायर कलैक्शन, विशाला श्री के हवायन बीन, मेघा व जिगर के व्हाइट समर कलैक्शन, वरीजा बजाज के अद्भुत ‘ये दिल्ली है मेरी जान’ सहित अनविता देव, रोणिी गुगनानी, मुक्ति तिबरेवाल व मनीष गुप्ता के कलैक्शन ने फैशनिस्टाज़ को अपना दिवाना बनाया। मनीष गुप्ता के शो में पेटा ने ‘नो लेदर’ का संदेश भी दिया। 

इण्डिया रनवे वीक के दूसरे दिन की शुरूआत इस वर्ष के एक आकर्षण स्टूडेंट्स शो बाय फैशनिस्टा स्कूल आॅफ फैशन टेक्नालाॅजी, जो कि इण्डिया रनवे वीक के नाॅलेज पार्टनर भी हैं के बच्चों के शो के साथ हुई, जहां युवा डिजाइनरों ने पारम्परिक व आधुनिक अंदाज युक्त फैशन संग्रह प्रस्तुत किया।

छत्तरपुर स्थित होटल ओपुलेंट में आयोजित किये जा रहे इण्डिया रनवे वीक के दूसरे दिन के अन्य शो में फरजाना रहमान, जिगर व पनेरी गोसर, रिफाली चन्द्रा, सान्या गर्ग, सुरभि जैन, कायशा स्टूडियो बाय शालिनी गुप्ता, सागर तेनाली, दिक्षा शर्मा, अशफाक अहमद और राजदीप रनावत भी अपने कलैक्शन प्रस्तुत करेंगे। 

डिजाइनर शालिनी गुप्ता के शो में फिल्म बेबी से चर्चा में आई अभिनेत्री मुधरिमा तुली बतौर शो स्टाॅपर वाॅक करेंगी।

अपने विद्यार्थियों द्वारा प्रस्तुत कलैक्शन के विषय में बताते हुए फैशनिस्टा स्कूल की नीतू पवन मनिकतालिया ने कहा कि, ‘हम सभी ने इस शो के लिए पूर दिल से मेहनत की थी और शो की सफलता ने हमारी मेहनत को सफल किया है। शो से पूर्व डिजाइनर अब्दुल हल्दर से मिली टिप्स ने भी बच्चों को प्रोत्साहित किया।

आईएफएफडी के निदेशक अविनाश पठानिया ने कहा कि अभी तक काफी अच्छा रिस्पान्स मिल रहा है हमें और उम्मीद है कि शाम तक और रविवार के चलते फैशनिस्टाज़ का और अच्छा व सकारात्मक रूझान हमें मिलेगा। 

संपर्क
Shailesh 9716549754, Bhupesh – 9871963343, Khyati – 
Shilpi – 9560489873, Nidhi – 8802680662

आखिरी दिन आकर्षण का केन्द्र रहा युवा फैशन और नवीन अंदाज़

नई दिल्ली। दो दिन से नये अंदाज और ताज़गी का अहसास करा रहे इण्डिया रनवे वीक के तीसरे व अंतिम दिन की शुरूआत आज वानिका छाबड़ा, गोविंद राजू, नेहा यादव, स्वाति केडि़या एवम् राहुल कपूर के शो के साथ हुई।

जहां स्वाति केडिया ने ‘यनिफाॅर्मस – नो द रूल, ब्रेक द रूल’ थीम पर आधारित अपना कलैक्शन प्रस्तुत किया। वहीं नेक्सट जेन कैटेगरी डिजाइनर राहुल कपूर ने रिडिफायनिंग राॅयाल्टी शीर्षक से अपना कलैक्शन प्रस्तुत किया। उनके अतिरिक्त वानिका छाबड़ा, गोविन्द राजू, नेहा यादव ने भी दिन के पहले शो में अपना कलैक्शन प्रस्तुत किया।

युवा फैशन, शानदार रोशनी और जबरदस्त संगीत का अद्भुत तालमेल सभी फैशनिस्टाज़ को आकर्षित कर रहा है। साथ ही इन युवा डिजाइनरों का कलैक्शन भी जमकर वाह-वाही लूट रहा है। ब्राइडल, समकालीन, राॅयल, ओल्ड इज़ गोल्ड थीम का नया अंदाज प्रमुख आकर्षण रहे हैं।

इंडियन फेडरेशन फॉर फैशन डेवलपमेंट (आई.एफ.एफ.डी) द्वारा होटल ओपुलेंट, छत्तरपुर, नई दिल्ली में आयोजित तीन दिवसीय युवा फैशन मूवमेंट इण्डिया रनवे वीक ने एक बार फिर अपने मोटो को सही साबित करते हुए कदम आगे बढ़ाये हैं। 

रनवे वीक का समापन आज शाम एम्ब्रीन खान व तानिया खनूजा के शो से होगा। उनसे पहले समयुक्ता वेंकटचलम, अनूप बिसानी, सुवागत साहा, बानी खुराना, आकाश के. अग्रवाल, मोएत बरार व रजनी के सेठी और समीर जुनैदी के कलैक्शन फैशन के दौर का आगे ले जायेंगे और सभी को अपनी प्रतिभा का लोहा मनवायेंगे। 

मोएत बरार व रजनी के सेठी के शो में पूर्व मिस इण्डिया कोयल राणा बतौर शो स्टाॅपर वाॅक करेंगी। जिसके बाद समीर जुनैदी के कलैक्शन में अभिनेत्री तापसी पन्नु शो स्टाॅपर रहीं और बिग बाॅस फेम एजाज़ खान ने समीर के शो का लुत्फ उठाया।

आई.एफ.एफ.डी. की फैशन निदेशक किरण खेवा ने बताया कि अच्छा लग रहा है जिस तरह की प्रतिक्रिया हमें मिल रही है। युवा फैशन इवेंट के चलते सबसे बड़ी चुनौति यही है कि फैशनिस्टाज़ को आकर्षित करना उनको नयी प्रतिभाओं से समकक्ष कराना। कुल मिलाकर अच्छी प्रतिक्रिया हमें प्रोत्साहित कर रही है।

संपर्क
Shilpi – 9560489873, Nidhi – 8802680662
Khyati – 852713948, Shailesh – 9716549754, 
Bhupesh – 9871962243

बायोमास गैसिफिकेशन में 2025 तक लाख 9 लाख जॉब्स !

प्रसिद्ध पर्यावरणविद् सुंदरलाल बहुगुणा मानते हैं कि अगर दुनिया को बचाना है तो हिमालय को पूरी तरह पेड़ों से ढकना होगा।पर्यावरण के खतरों पर विश्व में चिंता तो बढ़ी है और कुछ पहल भी शुरू हुई है, लेकिन भारत की स्थिति इन देशों से अलग है। विकसित देशों में जमीन ज्यादा है और आबादी कम। इस कारण वहां जंगल लगाए जा रहे हैं, जबकि हमारे यहां आबादी बसाने और बांध बनाने के लिए जंगल काटे जा रहे हैं। इतना ही नहीं, खेती की जमीन को रासायनिक खादों के जरिए नशेबाज बनाया जा रहा है। पेड़ हैं नहीं सो मिट्टी बह रही है। स्थिति यह है कि जमीन का पानी समाप्त हो रहा है। इसलिए हम अब भी न चेते तो कुछ समय बाद न तो जमीन बचेगी और न हमें पानी मिलेगा। वे कहते हैं कि भारत में वृक्षों की पूजा के पीछे अंधविश्वास नहीं है। ऑस्ट्रेलिया के न्यू साउथ वेल्स विश्वविद्यालय के शिक्षक लुई फाउलर स्मिथ अपने शोधकार्य के सिलसिले में पांच वर्षो तक पूरे भारत के जंगलों में घूमे। उन्होंने हिंदुओं की वृक्ष पूजा की परंपरा का वैज्ञानिक आधार बताया है। हमारी संस्कृति ही अरण्य संस्कृति थी। हमारे गुरुकुल वनों में थे। 

लिहाज़ा, विशेषज्ञों की ये बात भी पते की है कि आईटी के बाद ग्रीन जॉब्स यानी हरियाली से जुड़े जॉब में होगा खुशहाल आने वाला कल। आखिर क्या हैं ग्रीन जॉब्स? एक सर्वे के अनुसार, ज्यादातर एमबीए आवेदक ऐसे जॉब चाहते हैं, जिसमें न केवल खूब कमाई हो, बल्कि उनके स्किल का प्रयोग पर्यावरण को हरा-भरा रखने में भी हो। इसे आप एक पंथ दो काज या आम और गुठलियों के दाम की तरह भी देख सकते हैं। यूनाइटेड नेशंस एन्वॉयरनमेंट प्रोग्राम, इंटरनेशनल लेबर ऑर्गेनाइजेशन और इंटरनेशनल ट्रेड यूनियन कॉन्फेडरेशन और इंटरनेशनल एम्प्लॉयर्स ऑर्गेनाइजेशन ने मिलकर लॉन्च किया ग्रीन जॉब्स इनिशिएटिव। एनर्जी एफिशिएंसी और एन्वॉयरनमेंटल फ्रेंडली फील्ड, जैसे-एनर्जी, युटिलिटी, कंस्ट्रक्शन और मैन्यूफैक्चरिंग आदि को ग्रीन जॉब्स में रखा गया है।

क्या है ग्रीन जॉब ?
=================
उत्पादन और खपत  का ऐसा काम जो ईको फ्रेंडली यानी पर्यावरण हितैषी हो, ग्रीन जॉब कहलाता है। इसे हम कुछ उदाहरण से समझ सकते हैं। यदि कोई आर्किटेक्ट सौर ऊर्जा का प्रयोग करने वाले बिल्डिंग की डिजाइन तैयार कर रहा हो या अनाज उपजाने के काम में लगी ग्रामीण महिला या फिर वाटर री-साइक्लिंग सिस्टम से जुडा हुआ प्लंबर-ये सभी काम ग्रीन जॉब्स के अंतर्गत आते हैं। एग्रिकल्चर, रिसर्च ऐंड डेवलॅपमेंट, मैनूफैक्चरिंग, सर्विस और एडमिनिस्ट्रेटिव सेक्टर, जो एन्वॉयरनमेंट को सुरक्षित रखने और ईकोसिस्टम को बैलेंस रखने का काम करते हैं ग्रीन जॉब कहते हैं।

इसी तरह वानिकी एक ऐसा रोचक अध्ययन क्षेत्र है जो उन सब सिद्धांतों तथा व्यवहारों से मिलकर बना है जिनमें वनों के सृजन, संरक्षण तथा वैज्ञानिक प्रबंधन और उनके संसाधनों का उपयोग शामिल है। भारत में वैज्ञानिक वानिकी की शुरुआत सबसे पहले 1864 में वन प्रबंधन के लिए वानिकी व्यावसायिकों को प्रशिक्षित करने के वास्ते हुई थी। देश में विश्वविद्यालय स्तर पर वानिकी शिक्षा वर्ष 1985 में उस समय आरंभ हुई जब राज्य कृषि विश्वविद्यालयों-वाईएसपी यूएचएफ, सोलन तथा पीडीकेवी, अकोला में चार वर्ष के डिग्री कार्यक्रम के रूप में बीएससी वानिकी पाठ्यक्रम शुरु किया गया। बाद में यह कार्यक्रम 1986 में जीबीपीयूएटी, पन्त नगर तथा टीएनएयू, कोयम्बत्तूर में तथा इसके बाद 1987 में ओयूएटी, भुवनेश्वर तथा जेएनकेवीवी, जबलपुर में शुरु किया गया। अब यह कार्यक्रम बहुत से राज्य कृषि विश्वविद्यालयों में संचालित किया जा रहा है। इसके अलावा कुछ कृषि विश्वविद्यालयों में वानिकी से संबंधित विशेष विषय में विशेषज्ञता के साथ वानिकी/कृषि-वानिकी में मास्टर और डॉक्टरल डिग्री पाठ्यक्रम संचालित किए जाते हैं। हाल के दिनों में कुछ परंपरागत विश्वविद्यालयों ने भी वानिकी शिक्षा की शुरुआत की है। 

ताजा अनुमानों से यह सिद्ध होता है कि सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) में वानिकी क्षेत्र का उल्लेखनीय योगदान और महत्व है। विपरीत वन्य स्थिति से निपटने के लिए कुशल मानवशक्ति की आवश्यकता होती है ताकि शोध कार्यों और निर्देशक सिद्धांतों के आधार पर उपर्युक्त कार्य योजनाएं तैयार की जा सकें। इस प्रकार नीति और अनुप्रयोग की दृष्टि से वानिकी/कृषि वानिकी प्रबंधन से जुड़े पाठ्यक्रमों का बहुत महत्व है। वर्ष 2007 में भारत में कृषि (वानिकी सहित) शिक्षा पर बनाई गई भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद की चौथी डीन कमेटी की सिफ़ारिशों पर स्नातकपूर्व-स्तर पर वानिकी कार्यक्रम हेतु समय की मांग के अनुरूप पाठ्यक्रम और निर्देशन व्यवस्था में संशोधन किए गए हैं। सामान्यतः वानिकी शिक्षा, अनुसंधान, प्रशिक्षण और विस्तार पर्यावरण और वन मंत्रालय, भारत सरकार के पर्यवेक्षणाधीन है। 

पर्यावरण और वन मंत्रालय के अधीन सर्वोच्च संस्था के रूप में कार्यरत भारतीय वानिकी अनुसंधान एवं शिक्षा परिषद (आईसी एफआरई) वानिकी अनुसंधान, प्रशिक्षण, विस्तार और शिक्षा में सक्रियता के साथ जुड़ा हुआ है। मंत्रालय के अधीन विभिन्न आठ वन संस्थान कार्यरत हैं। ये हैं ईसीएफआरई, देहरादून,इंदिरा गांधी राष्ट्रीय वन अकादमी, हेदरादून, जो सर्वोच्च वन प्रशासक (आईएफएस) तैयार करती है, वन शिक्षा निदेशालय, जिसके अधीन चार राज्य वन सेवा महाविद्यालय (राज्य स्तर के) हैं, भारतीय वन्यजीव संस्थान, देहरादून, भारतीय प्लाइवुड उद्योग अनुसंधान और प्रशिक्षण संस्थान, बंगलौर तथा वन और पर्यावरण मंत्रालय से संबद्ध जीबी पंत हिमालयन पर्यावरण और विकास संस्थान। स्नातकपूर्व कार्यक्रम स्तर पर वानिकी शिक्षा वर्तमान में वानिकी में स्नातकपूर्व, स्नातकोत्तर और डॉक्टरल कार्यक्रम विभिन्न राज्य कृषि विश्वविद्यालयों तथा कुछ अन्य परंपरागत विश्वविद्यालयों/संस्थानों में संचालित किए जाते हैं। 

ज्यादातर राज्य कृषि विश्वविद्यालयों में चार वर्षीय व्यावसायिक डिग्री कार्यक्रम बीएससी वानिकी संचालित किए जा रहे हैं तथा शेष संस्थान भी यह कार्यक्रम बहुत जल्दी ही शुरू करने की योजना बना रहे हैं। वानिकी स्नातक तकनीकी रूप से योग्य, कुशल तथा पर्यावरण और जीवन की सुरक्षा से जुड़े वानिकी क्षेत्र की उभरती चुनौतियों तथा मुद्दों से निपटने के लिए तैयार होते हैं। वानिकी स्नातकों को तैयार करने का मूल उद्देश्य वानिकी क्षेत्र के विकास तथा इसकी उद्यमशीलता हेतु वर्तमान स्थितियों तथा अपेक्षाओं के अनुरूप मानव शक्ति तैयार करना तथा दूसरी तरफ वानिकी स्नातकों को पर्यावरण सुरक्षा, वानिकी उत्पादों के मूल्य संवर्द्धन और वानिकी किसानों को वैश्विक रूप से प्रतिस्पर्धी बनाने के वास्ते सुयोग्य प्रबंधक माना जाता है। बीएससी वानिकी के छात्रों को वानिकी के सभी क्षेत्रों से संबंधित विभागवार पाठ्यक्रमों का अध्ययन कराया जाता है तथा वे सही अर्थों में वनपाल बनकर उभरते हैं। 

शोध उपाधि कार्यक्रम 
==================
चार राज्य कृषि विश्वविद्यालयों दो डीम्ड विश्वविद्यालयों तथा तीन परंपरागत विश्वविद्यालयों द्वारा वानिकी/कृषि वानिकी में पी.एचडी. के रूप में न्यूनतम तीन वर्षीय डॉक्टरल कार्यक्रम भी संचालित किए जाते हैं। पी.एचडी. स्तर पर किया जाने वाला शोध कार्य वानिकी और संबद्ध क्षेत्रों के विशेषीकृत विषयों के बारे में होता है। राज्य कृषि विश्वविद्यालयों और अन्य संस्थानों/विश्वविद्यालयों में वानिकी कार्यक्रमों में प्रवेश/चयन प्रक्रिया : बी.एससी. वानिकी (चार वर्षीय डिग्री) में प्रवेश/चयन प्रक्रिया के लिए पीसीबी/पीसीएम/पीसीएमबी/कृषि समूह के छात्र १०(+)२ के बाद आवेदन कर सकते हैं। इसमें प्रवेश विश्वविद्यालय/संस्थान द्वारा आयोजित प्रवेश-परीक्षा के आधार पर प्रदान किया जाता है। कुछ विश्वविद्यालयों में प्रवेश उम्मीदवारों की मैरिट तथा सीटों की उपलब्धता के आधार पर प्रदान किया जाता है। 

भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद की अखिल भारतीय प्रवेश परीक्षा उत्तीर्ण करने वाले राज्य के बाहरी उम्मीदवारों के लिए विशेष कोटे की व्यवस्था होती है। यह परीक्षा वानिकी में बैचलर डिग्री तथा अन्य कृषि विज्ञानों में बैचलर डिग्री हेतु राज्य कृषि विश्वविद्यालयों में कुल सीटों की संख्या का 15% भरने के लिए आयोजित की जाती है। बी.एससी. वानिकी पूरी करने के उपरांत उम्मीदवार वानिकी में मास्टर डिग्री संचालित करने वाले राज्य कृषि विश्वविद्यालयों या अन्य संस्थानों/विश्वविद्यालयों में एम. एससी. वानिकी/कृषि-वानिकी के लिए आवेदन कर सकते हैं। 

मास्टर डिग्री में चयन या तो प्रवेश-परीक्षा में सफल होने पर अथवा विश्वविद्यालय/संस्थान की मैरिट के आधार पर होता है। भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद द्वारा वानिकी सहित कृषि एवं संबद्ध विज्ञानों के क्षेत्र में आईसीएआर की कनिष्ठ अनुसंधान अध्येतावृत्ति (जेआरएफ) तथा सभी राज्य कृषि विश्वविद्यालयों में मास्टर डिग्री कार्यक्रमों की 25% सीटों में प्रवेश हेतु एक अखिल भारतीय प्रवेश परीक्षा का आयोजन किया जाता है। इसी प्रकार पी.एचडी. वानिकी कार्यक्रम में राज्य कृषि विश्वविद्यालयों या अन्य विश्वविद्यालयों/संस्थानों में प्रवेश सीधे संस्थान/ विश्वविद्यालयों के नियमों के अनुरूप या प्रवेश-परीक्षा उत्तीर्ण करने के आधार पर प्राप्त किया जा सकता है। वानिकी में राष्ट्रीय पात्रता परीक्षा (नेट) भी लेक्चररशिप के लिए एक महत्वपूर्ण प्रमाण-पत्र है जिसे कृषि वैज्ञानिक भर्ती बोर्ड, भा.कृ.अ.प., पूसा, नई दिल्ली द्वारा हर वर्ष आयोजित परीक्षा के जरिए उत्तीर्ण किया जा सकता है।

छात्रवृत्तियां 
================
वानिकी में स्नातक तथा स्नातकोत्तर अध्ययन के लिए छात्रवृत्ति भी उपलब्ध है। भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद द्वारा वानिकी सहित कई कृषि विषयों में आयोजित अखिल भारतीय प्रवेश परीक्षा में उत्कृष्ट स्थान प्राप्त करने वाले उम्मीदवारों को भा.कृ.अप./रु. 1200 प्रति माह की दर से स्नातकपूर्व पाठ्यक्रम के अध्ययन हेतु राष्ट्रीय प्रतिभा छात्रवृत्ति प्रदान करती है, बशर्ते कि उम्मीदवार ने अपने गृह राज्य के बाहर किसी संस्थान में प्रवेश लिया हो। स्नातकोत्तर स्तर पर संबंधित संबंधित राज्य सरकारें तथा भा.कृ.अ.प. कई तरह की छात्रवृत्तियां प्रदान करती है। भा.कृ.अप.वानिकी सहित कृषि विज्ञानों के क्षेत्र में कनिष्ठ अनुसंधान अध्येतावृत्ति (जेआरएफ) प्रदान करने के लिए अखिल भारतीय प्रवेश परीक्षा का आयोजन करती है। वर्तमान में भा.कृ.अ.प. अध्येतावृत्ति एमएससी छात्रों के लिए दो वर्ष की अवधि हेतु / रु. 5760 प्रतिमाह है तथा 6000 रु. वार्षिक आकस्मिक खर्च अनुदान के रूप में प्रदान किए जाते हैं। इसी प्रकार पी.एचडी छात्रों के लिए अध्येतावृत्ति वर्तमान में / रु. 7000 प्रतिमाह, तीन वर्ष की अवधि के लिए है तथा साथ में 10000 रु. वार्षिक आकस्मिक खर्च अनुदान के रूप में दिए जाते हैं। इसके अलावा वैज्ञानिक तथा औद्योगिक अनुसंधान परिषद (सीएसआईआर) द्वारा भी पादप विज्ञानों में स्नातकोत्तर और डॉक्टरेट छात्रों को छात्रवृत्तियां प्रदान की जाती हैं।

कुछ ख़ास बातें 
=================
बायोमास गैसिफिकेशन में 2025 तक भारत में लाख 9 लाख जॉब्स होंगे।आईटी के बाद भारत में नया रिवॉल्यूशन ग्रीन जॉब्स लाएगा।व्हाइट हाउस काउंसिल ऑन एन्वॉयरन्मेंटल क्वालिटी (सीईक्यू) में अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा ने ग्रीन जॉब्स, एंटरप्राइज और इनोवेशन के लिए वेन जॉन्स को स्पेशल एडवाइजर नियुक्त किया।

============================
प्राध्यापक, शासकीय दिग्विजय पीजी 
ऑटोनॉमस कालेज, राजनांदगांव 
मो.9301054300 

बांग्लादेश के साथ हुए करार को बदलेगी सरकार

बीजेपी की चुनावी महत्वाकांक्षा के कारण मोदी सरकार को एक बड़े कूटनीतिक कदम में बदलाव करना पड़ सकता है। बीजेपी के नेताओं को लग रहा है कि असम में अगले साल होने वाले विधानसभा चुनाव में पार्टी की जीत हो सकती है और इसी चुनावी गणित के कारण असम को बांग्लादेश के साथ भूमि सीमा समझौता (एलबीए) से अलग किया जा सकता है। इस मसले पर पीएमओ को भेजे गए सवालों के जवाब नहीं मिले।
 
भारत-बांग्लादेश एलबीए में भारत की ओर से असम, बंगाल, त्रिपुरा और मेघालय शामिल हैं। यूपीए-2 के दौरान इससे जुड़ी बातचीत शुरू होने के बाद अब तक दोनों देशों में जो सहमति बनी है, उसके मुताबिक असम को करीब 268 एकड़ जमीन से हाथ धोना पड़ेगा। असम यह जमीन विभाजन के वक्त से ही बांग्लादेश के साथ सटी 6.1 किमी लंबी पट्टी का विवाद सुलझाने के लिए छोड़ रहा है।
 
बीजेपी की असम यूनिट ने जमीन छोड़े जाने का हमेशा विरोध किया है। यूपीए-2 ने सीमा मुद्दे पर जब बांग्लादेश से समझौता किया था, तो बीजेपी इसे मुद्दा बनाकर सड़कों पर उतर गई थी। 2014 के लोकसभा चुनाव में असम की 14 लोकसभा सीटों में से 7 पर बीजेपी ने कब्जा किया था। कांग्रेस को तीन सीटें ही मिल सकी थीं। बीजेपी ने स्थानीय निकाय चुनाव में भी शानदार प्रदर्शन किया था और उसे उम्मीद है कि वह पिछले तीन विधानसभा चुनाव जीत चुकी कांग्रेस को अगले साल पस्त कर देगी।
 
सरकारी अधिकारियों ने बताया कि सरकार असम को एलबीए से फिलहाल अलग करने के साथ बांग्लादेश सीमा पर पश्चिम बंगाल और मेघालय वाले हिस्सों के साथ कदम बढ़ाने पर विचार कर रही है।
 
ईटी को पता चला है कि मोदी सरकार ने सीमा समझौते से असम को अलग रखने का मुद्दा बांग्लादेश के सामने रखा है। बांग्लादेश का कहना है कि अगर मोदी सरकार को डील करने का यही एकमात्र रास्ता दिख रहा हो तो वह इस पर विचार करने के लिए तैयार है। एलबीए पर 2011 में पूर्व पीएम मनमोहन सिंह ने दस्तखत किए थे, लेकिन अभी इस पर संसद की मुहर नहीं लगी है।
 
बीजेपी की असम इकाई के अध्यक्ष सिद्धार्थ भट्टाचार्य ने ईटी से कहा, 'सीमा विवाद का कोई भी समाधान घुसपैठ और आतंकवाद के मुद्दों से निपटने में मददगार ही होगा, लेकिन जमीन का मामला हमेशा ही भावनात्मक रहा है।' एलबीए के बारे में पूछे जाने पर उन्होंने कहा, 'मुझे इसकी जानकारी नहीं है, लेकिन जो भी फैसला होगा, हमें स्वीकार करना होगा।'
 
साभार- इकॉनामिक टाईम्स से 

अनुपम खेर बोले, स्मार्ट सिटी बने पंडितों के लिए

अबिनेता अनुपम खेर ने जम्मू-कश्मीर को स्पेशल स्टेटस देने वाले भारतीय संविधान के आर्टिकल 370 को हटाने और कश्मीरी पंडितों के लिए स्मार्ट सिटी बनाने की मांग की है। उन्होंने जम्मू-कश्मीर की राजनीतिक पार्टियों और अलगाववादियों पर कश्मीरी पंडितों की वापसी को लेकर झूठ फैलाने का आरोप लगाते हुए कहा कि कश्मीरी पंडित खुद तय करेंगे कि उन्हें कहां और कैसे रहना है।
 
रविवार को 'रूट्स इन कश्मीर' के कार्यक्रम में मीडिया से बात करते हुए खेर ने कहा, 'मुझे व्यक्तिगत तौर पर लगता है कि आर्टिकल 370 को खत्म कर दिया जाना चाहिए।' गौरतलब है कि अनुपम खेर भी मूल रूप से कश्मीरी पंडित हैं।
 
खेर ने कहा कि कश्मीरी पंडित जिन बस्तियों में रहते थे, वे वहां नहीं लौट पाएंगे। उनका कहना था कि ज्यादा संपत्तियां जला दी गई हैं और बाकी में कब्जा कर लिया गया है। उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से अपील की कि पंडितों के लिए नई स्मार्ट सिटी बनाई जाए। खेर ने कहा, 'जब कश्मीरी पंडित घाटी लौटें, तो बेहद जरूरी है कि वे सुरक्षित महसूस करें। ऐसा तभी हो पाएगा, जब वे एक ही टाउनशिप में एकजुट होकर रहेंगे।'
 
श्री खेर ने कहा, 'मैं सरकार से गुजारिश करता हूं कि वहां स्मार्ट सिटी बनाई जाए। देश के बेस्ट डॉक्टर्स, एजुकेशनिस्ट और आईटी प्रफेशनल पंडित कम्यूनिटी से ही आते हैं। अगर टाउनशिप को स्मार्ट सिटी के तौर पर बसाया जाएगा, तो पूरी कश्मीर घाटी को फायदा होगा।'
 
उन्होंने अलगाववादियों और कश्मीर की राजनीतिक पार्टियों की आलोचना करते हुए कहा कि वे कश्मीरी पंडितों की वापसी को लेकर झूठ फैला रहे हैं। उन्होंने कहा, 'कश्मीरी पंडित भारत के आजाद नागरिक हैं और उन्हें यह अधिकार है कि वे कहां और कैसे रहेंगे। किसी और को शर्तें थोपने का अधिकार नहीं है। कम से कम उन अलगाववादियों और आतंकियों को तो बिल्कुल नहीं, जो हमें बाहर निकालने के लिए जिम्मेदार हैं।'

वीके सिंह ने फिर औकात दिखाई बिकाउ मीडिया वालों को

मीडिया पर आपत्तिजनक टिप्पणी करके खबरों में रहे विदेश राज्यमंत्री वी.के. सिंह ने एक बार फिर विवादास्पद ट्वीट किया  है। कुछ दिन पहले मीडिया को 'प्रेस्टिट्यूट' कहने वाले सिंह ने इस बार नया जुमला उछाला है- 'सुपारी जर्नलिज़म।'
 
सोमवार सुबह 7 बजकर 58 मिनट पर किए गए ट्वीट में श्री सिंह ने लिखा, 'ताकतवर शब्द 'सुपारी जर्नलिज़म' सुझाने के लिए शुक्रिया।' इसके आगे उन्होंने राजदीप सरदेसाई का नाम लिखते हुए कहा, अब लोग इन जैसे कई लोगों को पहचान सकेंगे।
 
श्री सिंह ने अपनी बात को 'प्रचारित' करने के लिए तेजिंदर पाल बग्गा का सहारा लिया है। उन्होंने ट्वीट के आखिर तेजिंदर बग्गा को लिखा है, 'प्लीज इसे लोकप्रिय बनाओ।'
 
तेजिंदर बग्गा वही शख्स है, जिसने आम आदमी पार्टी के सदस्य प्रशांत भूषण की पिटाई कर दी थी। इसके अलावा भी वह कई मौकों पर विवादों में रहा है।

मोदीजी का गाँव बन गया लोकप्रिय पर्यटन केंद्र

मोदीजी का गाँव  वडनगर अब लोकप्रिय पर्यटन केंद्र के रूप में उभर रहा है।  छह सौ रुपए में आप एक दिन के टूर पैकेज पर मोदी के घर, स्कूल, रेलवे स्टेशन और उस नदी को देख सकते हैं जहां मोदी ने कभी मगरमच्छ पकड़ा था।
 
इस टूर के तहत जनवरी में होने वाले प्रवासी भारतीय सम्मेलन में आ रहे अप्रवासियों को मोदी के गांव की सैर कराई गई और ये टूर बेहद कामयाब रहा। अक्षर ट्रेवल टूर कंपनी द्वारा बनाए गए इस टूर प्लान का नाम 'द राइज फ्राम द मोदीज विलेज' रखा गया है और गुजरात सरकार इसे प्रमोट भी कर रही है। कंपनी अब रोज इस टूर को संचालित कर रही है और ये काफी कामयाब भी है।
 
अक्षर ट्रेवल्स के निदेशक  श्री मनीष शर्मा ने कहा है कि वडनगर का ये इलाका तब चर्चा में आया जब मोदी प्रधानमंत्री बने और लोगों की दिलचस्पी उनके अतीत को जानने में जगी। उनका कहना है कि गुजरात सरकार को उनका टूर पैकेज पसंद आया और सरकार ने इस प्रमोट करने पर सहमति दी।
 
फोटो में जिस स्कूल की तस्वीर दिखाई गई है, ये दरअसल वही स्कूल है जहां मोदी ने प्राइमरी की पढ़ाई की थी। इसी स्कूल के एक टीचर के अनुसार नरेन्द्र मोदी एक औसत दर्ज़े के छात्र थे जिनका पढ़ाई में कम ही मन लगता थ। हालांकि टीचर ने मोदी की तारीफ करते हुए कहा कि मोदी की वाद-विवाद और नाटक प्रतियोगिताओं में बेहद रुचि थी और उनकी वाक क्षमता गजब की थी।
 
मोदी क्लास की पढ़ाई मे कम ही रुचि रखते थे लेकिन‌ स्कूल के हर जलसे में होने वाली भाषण प्रतियोगिता में जरूर भाग लेते थे। टूर के दौरान टूर कंपनी पर्यटकों को मोदी के कुछ सहपाठियों से भी मिलवाएगी जो मोदी के बचपन की यादें ताजा करेंगे।
 
मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद जनता के बीच जब उनके बचपन की वीरता के किस्से चले थे तभी नदी से मगरमच्छ पकड़ लाने की बात चर्चा में आई थी। वडनगर से बहकर निकलती शमिष्ठा नदी के बारे में ही ये बात कही जाती है कि मोदी ने बचपन में यहां से मगरमच्छ पकड़ लिया था। मोदी ने इंटरव्यू के दौरान भी बात कही थी वो इसनदी से एक बार मगरमच्छ का बच्चा पकड़ लाए थे लेकिन मां के मना करने पर उसे वापस उस नदी में छोड़ आए।
 
वो किस्सा कितना सच है ये तो मोदी ही जानें लेकिन वडनगर आने वाले पर्यटकों को ये नदी अपने किस्से कहानियों के चलते खूब रिझा सकती है।
 
बचपन में गरीबी के चलते स्टेशन पर चाय बेचने वाला एक बड़े देश का प्रधानमंत्री बन सकता है, विदेशियों के लिए ये एक कौतुहल की बात है। वडनगर का वो रेलवे स्टेशन जहां प्रधानमंत्री मोदी ने गरीबी के चलते चाय बेची थी वो भी पर्यटकों के लिए एक खास जगह बनेगा।
 
टूर कंपनी पर्यटकों को इस स्टेशन के दर्शन कराएगी। हालांकि स्टेशन पहले जैसी हालत में है लेकिन पर्यटकों के लिए ये जानना कि कभी यहां देश का प्रधानमंत्री चाय बेचता था, रोमांचक होगा। कंपनी का कहना है कि ये रेलवे स्टेशन दिखने में आम लगता है लेकिन इसकी खासियत इसे लोकप्रिय और इसे विश्व प्रसिद्ध बनाएगी।
 
यूं भी मोदी के अलावा भी वडनगर का इतिहास काफी महत्वपूर्ण है। महाभारत में इसे अनार्तपुर के नाम से इसका उल्लेख है। बताया जाता है कि इतिहास में इस बात का उल्लेख है कि कभी वडनगर गुजरात की राजधानी था और काफी संपन्न था।
 
वडनगर की एक और खासियत ये है कि यहां भारी संख्या में बौद्ध स्मारक हैं और बौद्ध इतिहास से संबंधित काफी दस्तावेज भी रखे गए हैं। कहा जा रहा है कि गुजरात सरकार वडनगर तक के लिए एक स्पेशल ट्रेन शुरू करने पर विचार कर रही है ताकि पर्यटकों को यहां आने में आसानी हो।

सागरिका सिंह की ट्विटर पर भारी फजीहत

सोशल मीडिया पर भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के सूट के बाद अब उनकी शॉल पर हंगामा हो गया। दरअसल इसकी वजह रहे कांग्रेस नेता पवन खेड़ा और उसके बाद वरिष्ठ पत्रकार राजदीप सरदेसाई की पत्नी और पत्रकार सागरिका घोष।
 
10 अप्रैल को अपने ट्वीट में खेड़ा ने कहा, 'लुई वितां की शॉल ओढ़ कर श्रीमान मोदी फ्रांस में अपने 'मेक इन इंडिया' अभियान का जोरदार प्रचार कर रहे हैं।’
 
इसके बाद टीवी पत्रकार सागरिका घोष ने अपने ट्वीट में लिखा, 'प्रधानमंत्री ने पेरिस में लुई वितां की शॉल ओढ़ी, मेरी राय में भारतीय हैंडलूम ज्यादा बेहतर होता!'
 
लेकिन इस चर्चा में दिलचस्प मोड़ तब आया जब @Rakesh_lv नाम के हैंडल वाले एक व्यक्ति ने लुई वितां को मोदी की तस्वीर ट्वीट कर के ये पूछा कि वो ऐसी शॉल खरीदना चाहते हैं, क्या लुई वितां ऐसी शॉल बनाती है?
 
कंपनी ने जैसे ही सवाल का जवाब दिया कि वह ऐसी शॉल नहीं बनाती है, तो एक बाद एक ट्वीट्स आने लगे। लोग मीडिया को निशाने पर लेने लगे और विदेश राज्य मंत्री जनरल वीके सिंह द्वारा इस्तेमाल किया गया शब्द 'प्रेस्टीट्यूट' एक बार फिर ट्विटर पर छा गया। लोग हैशटैग 'प्रेस्टीट्यूट' से ट्वीट्स करने लगे। विवाद इतना बढ़ा कि अंत में सागरिका को माफी मांगनी पड़ी।
 
सागरिका ने लिखा, 'लुई वितां ट्वीट के लिए माफी चाहती हूं। प्रधानमंत्री की शॉल लुई वितां शॉल नहीं थी! होती भी तो कुछ गलत नहीं था!'