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गाय पशु ही नहीं किसानों और कृषि भूमि के लिए वरदान भी है

वर्ष 1990 से पहले तक नेपाल में गो-हत्या को मनुष्य की हत्या के समकक्ष माना जाता था। मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराजसिंह चौहान और हरियाणा के मुख्यमंत्री मनोहरलाल खट्टर ने भारत में भी ऐसी ही नियम-प्रणाली अपनाए जाने की बात कही है। गृह मंत्री राजनाथ सिंह ने भी वादा किया है कि जल्द ही संपूर्ण भारत में गोहत्या पर प्रतिबंध लगा दिया जाएगा, अलबत्ता तब उन्हें कांग्रेस नेता दिग्विजय सिंह का समर्थन करना पड़ सकता है, जिन्होंने वर्ष 2003 में ही इस तरह के प्रतिबंध की मांग कर दी थी।
 
गो-संरक्षण का मामला हमेशा से ही राजनीतिक रूप से संवेदनशील रहा है। अधिकतर राजनीतिक दल इस मामले में लिबरल्स का साथ देने से कतराते हैं, क्योंकि लिबरल्स सोचते हैं कि गोवध पर प्रतिबंध व्यक्तिगत स्वतंत्रता का हनन और लोगों की खानपान की आजादी को नियंत्रित करने का प्रयास है। गो-संरक्षण के मसले पर सबसे उल्लेखनीय राजनीतिक आंदोलन वर्ष 1966 में हुआ था। गोवध पर प्रतिबंध की मांग को लेकर आक्रोशित भीड़ द्वारा संसद का घेराव किया गया था, जिसके परिणामस्वरूप राजधानी में 48 घंटों का कर्फ्यू लगाने की नौबत आ गई थी। तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने तब तो गोवध प्रतिबंध की मांग को खारिज कर दिया, लेकिन वर्ष 1982 तक वे इसका समर्थन करने लग गई थीं।
 
देश में कई ऐसे शहरी मांसाहारी हैं, जो बड़े मजे से मांस भक्षण कर सकते हैं, लेकिन जहां बात बीफ (गोमांस) खाने की आती है तो भले ही गायों को उन्होंने केवल कचरे के ढेर पर मंडराते हुए ही देखा हो, वे इससे बिदकते हैं। नेपाल में आज भी गोहत्या पर 12 साल के कारावास की सजा दी जाती है, लेकिन भैंसों को वहां बिना किसी हिचक के हलाक किया जाता है। पिछले साल गढ़ीमाई उत्सव के दौरान ही कोई पांच हजार भैंसों की बलि दी गई थी। गैरभारतीय लोग कभी इस बात को समझ नहीं पाते कि अगर भैंस और बकरी का मांस खाने में कोई बुराई नहीं है तो फिर गोमांस से इतनी हिचक क्यों? उन्हें अंदाजा नहीं कि भारतीय संस्कृति में गोवंश का क्या स्थान रहा है। गोमाता की छवि हिंदुओं के अवचेतन में गहरे तक पैठी हुई है।
 
इतिहासकार इस पर कई और दशकों तक बहस कर सकते हैं कि आखिर भारत में गोपूजा की परंपरा कब से शुरू हुई। लेकिन इतना तो तय है कि गोहत्या पर एक किस्म के धार्मिक-सांस्कृतिक प्रतिबंध के कारण ही भारत की कृषि-अर्थव्यवस्था की दुर्गति नहीं हुई। पश्चिम में गायों को केवल दूध और मांस के लिए पाला जाता है, लेकिन भारत में गाय के गोबर का भी बड़ा महत्व रहा है। वह कृषि में उर्वरक का काम करता है, उससे उपले-कंडे बनाए जाते हैं, जो गांवों में ईंधन का बड़ा स्रोत है, ग्रामीण घरों की लिपाई-पुताई गोबर से की जाती है। भारत में गायें कभी भी महज एक मवेशी नहीं रहीं। यहां तक कि सूखे और भुखमरी की स्थिति में भी लोग कभी अपनी गायों को मारकर नहीं खाते थे। हजारों सालों से गायें और बैल भारत की कृषि-आर्थिकी का अभिन्न् अंग रहे हैं।
 
लिहाजा, अगर धार्मिक भावनाओं और राजनीतिक तकाजों की बात न भी करें, तो क्या कृषि-आर्थिकी के दृष्टिकोण से भी गोहत्या को बढ़ावा दिया जाना चाहिए? आज हमारी कृषि-अर्थव्यवस्था अनेक तरह की समस्याओं का सामना कर रही है, मृदा का क्षरण हो रहा है, उपज घट रही है, एक तरफ उर्वरकों पर भारी सबसिडी दी जा रही है और दूसरी तरफ किसान लगातार आत्महत्या कर रहे हैं। ऐसा लग रहा है कि जैसे-जैसे हमारी ग्राम-अर्थव्यवस्था में गायों की भूमिका कम होती जा रही है, वैसे-वैसे ये तमाम समस्याएं भी बढ़ती जा रही हैं।
 
आधुनिक कृषि की सोच यह है कि गोवंश-केंद्रित कृषि के बजाय मशीनों, सिंथेटिक उर्वरकों और कोयला-पेट्रोलियम संबंधी ईंधनों का उपयोग किया जाए। वर्ष 1906 में तमिलनाडु के रानीपेट में पहली उर्वरक फैक्टरी खुली थी। तब रबींद्रनाथ टैगोर जैसे अनेक प्रभावी व्यक्तित्व कृषि में आधुनिक प्रयोगों, आयातित बीजों, उर्वरकों के प्रयोग की हिमायत कर रहे थे। 1940 के दशक में भारत में पहली बार ट्रैक्टर्स आयात किए गए। इन तमाम प्रयासों की परिणति 1960 के दशक में हरित क्रांति के रूप में हुई।
 
कृषि-कार्यों में गोवंश की भूमिका घटी तो अब उनका उपयोग केवल दुग्ध-उत्पादन के लिए किया जाने लगा। लिहाजा, संकर नस्ल की गायों की मांग बढ़ गई, जो ज्यादा से ज्यादा दूध का उत्पादन कर सकती थीं। इससे यह धारणा बनी कि भारत में गायों की तादाद जरूरत से ज्यादा बढ़ गई है और उनके लिए चारे की भी किल्लत होने लगी है। देशी गायों की उपेक्षा शुरू हुई तो श्रेष्ठ नस्ल के गोवंश की भी कमी होने लगी। वास्तव में, जैसे भारत के लोग अमेरिका जाकर बेहतर प्रदर्शन करते हैं, वैसे ही भारत द्वारा अमेरिका को निर्यात की गई गायों ने भी वहां पर बेहतर उत्पादन किया है!
 
आश्चर्य की बात है कि कृषि-वैज्ञानिकों ने कभी इस पर विचार ही नहीं किया कि गोबर के स्थान पर सिंथेटिक उर्वरकों का उपयोग करने से खेतों की मिट्टी पर क्या असर पड़ सकता है। हजारों सालों से भारतीय किसान अपने खेतों में गाय के गोबर का ही इस्तेमाल उर्वरक की तरह करते आ रहे थे। क्यों? क्योंकि शायद वे इस बात को कृषि-वैज्ञानिकों से बेहतर तरीके से समझते थे कि भारत की जैसी ऊष्णकटिबंधीय जलवायु है, उसके मद्देनजर हमारी मृदा का पारिस्थितिकी-तंत्र अन्य देशों से भिन्न् है और हमारी मिट्टी बहुत जल्द अपनी उर्वरता गंवा बैठती है। उर्वर मिट्टी के लिए जो जैविक तत्व आवश्यक होते हैं, वे हमारे यहां बहुत तेजी से क्षीण होते हैं। गायों का गोबर हजारों सालों से हमारे खेतों की जमीन को जैविक तत्व और उर्वरता प्रदान करता आ रहा था।
 
लेकिन चंद ही दशकों में हमने उस उर्वरता को गंवा दिया। सिंथेटिक उर्वरक मिट्टी को तीन प्रमुख पोषक तत्व तो प्रदान करता है, लेकिन वह उसे जैविक-कॉर्बन और माइक्रो-न्यूट्रिएंट्स नहीं प्रदान कर सकता। समय के साथ हमारे खेतों की मिट्टी की नमी धारण करने की क्षमता कम हुई है, उनके सूक्ष्म जैविक-तंत्र को क्षति पहुंची है और हमारे खेतों की मिट्टी मरती जा रही है। अब जब फिर से इसके लिए गोवंश की जरूरत महसूस की जाने लगी है तो हम पाते हैं कि देश में पर्याप्त मात्रा में गोवंश ही नहीं है। इसके लिए सरकार की नीतियों को भी जिम्मेदार ठहराया जा सकता है, जिनके चलते किसानों को गोवंश के पालन के लिए हतोत्साहित किया गया। जबकि गायों-बैलों को पालने का खर्चा कभी भी बहुत ज्यादा नहीं था और चारे-भूसे पर उनकी गुजर हो जाती थी। लेकिन अब चरनोई भूमि भी घटती जा रही है और गोवंश के पोषण का सवाल खड़ा हो गया है।
 
हो सकता है गोमांस पर प्रस्तावित प्रतिबंध के बावजूद हमारी ग्राम-अर्थव्यवस्था में गायों का वह स्थान पुन: कायम नहीं किया जा सके, जो कभी हुआ करता था, बशर्ते सरकार इस दिशा में नीतिगत तत्परता दिखाए। कृषि पर बड़े पैमाने पर दी जाने वाली सबसिडी का कुछ हिस्सा अगर गोवंश-पालन पर भी दिया जाए तो इससे खासी मदद मिल सकती है। स्थानीय परिस्थितियों के मद्देनजर गायों के साथ ही भैंसों के मांस पर प्रतिबंध लगाना भी मददगार साबित हो सकता है। विभिन्न राज्यों की भिन्न् परिस्थितियों के मद्देनजर यह राज्य सरकारों का ही जिम्मा है कि वे अपने यहां गोवंश-संरक्षण संबंधी कानून लागू करें।
 
(लेखिका पत्रकार हैं। ये उनके निजी विचार हैं)
 
साभार- दैनिक नईदुनिया से 

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रेल के डिब्बे से झाँकती मुस्कान विश्व फोटोग्राफी प्रतियोगिता में छा गई

भारतीय मुस्कान ने दुनिया की सबसे बड़ी फोटोग्राफी प्रतियोगिता में स्थान पाया है। ‘सोनी वर्ल्ड फोटोग्राफी अवार्डस 2015’ के विजेताओं की घोषणा मंगलवार को कर दी गई। तीन श्रेणियों में घोषित पुरस्कारों में खुली प्रतियोगिता श्रेणी में 10 विजेता घोषित किए गए, जबकि तीन युवा और मोबाइल फोटो श्रेणी में दो उप विजेताओं सहित एक विजेता घोषित किया गया। इनकी तस्वीरों की प्रदर्शन लंदन के सोमरसेट हाउस में 24 अप्रैल से 10 मई के बीच किया जाएगा। अब खुली प्रतियोगिता और युवा प्रतियोगिता के बीच से ओपन फोटोग्राफर ऑफ द ईयर और यूथ फोटोग्राफर ऑफ द ईयर चुना जाएगा।

– 96 हजार प्रविष्ठियां दुनियाभर से प्रतियोगिता के लिए आईं
– 23 अप्रैल 2015 को लंदन में घोषित होगा सर्वश्रेष्ठ फोटोग्राफर का नाम
– 13 श्रेणियों के विजेताओं में से चुना जाएगा सर्वश्रेष्ठ फोटोग्राफर
– 05 हजार डॉलर बतौर पुरस्कार मिलेंगे विजेता को 
– 24 अप्रैल से लंदन में प्रदर्शित की जाएंगी विजेता तस्वीरें
– 14 साल की ब्रिटिश बच्ची स्टेफनी एन्यो की तस्वीर भी बनी विजेता

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जलवायु परिवर्तन के व्यापक प्रभावों पर दुनिया की नज़र

आईपीसीसी के दूसरे कार्यसमूह की ताजा रिपोर्ट में पाया गया है कि जलवायु परिवर्तन का प्रभाव व्यापक और परिणामी है। साथ ही इसका प्रभाव सभी महाद्वीपों और महासागरों पर पड़ने वाला है। सात साल पहले जारी की गई आईपीसीसी रिपोर्ट के लिहाज से इस रिपोर्ट पर बात की जाए तो यह बेहद अहम घटना है क्योंकि इसमें कहा गया है जलवायु परिवर्तन का प्रभाव स्पष्ट तौर पर सामने आ रहा है।

चिंताजनक बात यह है कि ताजा रिपोर्ट में इसकी पुष्टि की गई है कि जलवायु परिवर्तन केवल आने वाली पीढ़ी के लिए ही समस्या नहीं है बल्कि यह इस समय भी हम सभी को प्रभावित कर रही है। खासकर चीन में, जलवायु परिवर्तन के चलते खाद्य सुरक्षा और कृषि से संबंधित अनेक समस्याओं में इजाफा होगा। मसलन, मक्के की पैदावार में कमी आ सकती है। साथ ही, सूखे और पानी से संबंधित अनेक संकटों के चलते आम लोगों और कारोबार पर अहम आर्थिक प्रभाव पड़ेगा।

और प्रमुख शहर, जैसे गांघजू, शंघाई और तियानजिन तटीय इलाकों में आने वाले बाढ़ से बुरी तरह प्रभावित होंगे क्योंकि वैश्विक समुद्री स्तर में 0.5 फीसदी का इजाफा होगा। रिपोर्ट ने यह स्पष्ट कर दिया है कि अब भी हमारे पास अपने भविष्य को चुनने का अवसर है। इसमें कहा गया है कि तापमान में तेजी से बढ़ोतरी के चलते नुकसान बढ़ा है और इस संकट की स्थिति में सुधार के लिए अनुकूलन के साथ-साथ शमन रणनीति लागू करनी होगी जिससे वैश्विक उत्सर्जन में तत्काल और तेजी से कमी आएगी।

चीन के नेताओं ने भी स्वीकार किया है कि जलवायु परिवर्तन का खतरा बढ़ रहा है और उत्सर्जन में कमी लाने के लिए कदम उठाये जा रहे हैं। इसमें कार्बन-तीव्रता लक्ष्य तय करने, स्वच्छ ऊर्जा में भारी निवेश करने और उत्सर्जन-कारोबार संबंधी पायलट कार्यक्रम शुरू करना शामिल है।

साथ ही कई प्रमुख शहरों के चारों तरफ कोयले के उत्पादन को सीमित करना भी शामिल है। इस रिपोर्ट की एक अहम बात यह भी है कि इसमें कहा गया है कि जलवायु परिवर्तन की मुख्य वजह लोग खुद ही हैं। और आज हम जो भी फैसला लेते हैं, उस पर बहुत कुछ निर्भर है कि आने वाले वक्त में हम जलवायु के खतरनाक प्रभावों को रोक सकते हैं या नहीं। अच्छी खबर यह है कि हमारे पास अब भी इसके समाधान का मौका है।

वांग चुंगफेंग, क्लाइमेट चेंज ऑफिस, चीन स्टेट फॉरेस्ट्री एडमिनिस्ट्रेशन के मुताबिक़ इस रिपोर्ट ने एक बार फिर पुष्टि की है कि जलवायु परिवर्तन का असर बढ़ रहा है।अब सबसे बड़ी बहस इसके एक आरोप पर है- यह अब भी अनिश्चित है कि क्या कई घटनाओं को जलवायु परिवर्तन के लिए पूरी तरह से दोषी ठहराया जा सकता है। पर, कुल मिलाकर जो रुझान है, वह खतरनाक है और इसे गंभीरता से लेने की जरूरत है।ऐसे अनेक शोध हो चुके हैं जिनमें यह बात सामने आई है कि चीन में जलवायु परिवर्तन का प्रभाव बहुत गंभीर है। उदाहरण के लिए दक्षिण-पश्चिम औरउत्तर-पश्चिम चीन में खराब मौसम और कुदरती आपदाओं का सामना करना पड़ा है।

मूल्यांकन की प्रक्रिया के दौरान, चीनी विशेषज्ञ निम्नलिखित बातें सामने लाए। मसलन, जलवायु परिवर्तन का चीन की कृषि पर कई तरह से प्रभाव पड़ रहा है। वानिकी के क्षेत्र में यह प्रभाव मिश्रित है। जंगली इलाकों में इसका तेजी से विस्तार हो रहा है और यह उत्तर की ओर बढ़ रहा है। आपदा और बीमारियों में काफी तेजी आ रही है। ग्लेशियरों के पिघलने का मतलब है कि चीन के दो प्रमुख नदी बेसिन में कम अवधि के दौरान ज्यादा पानी आएगा लेकिन लंबी अवधि के हिसाब से इसे देखें तो पाएंगे कि उत्तर-पश्चिम में जल आपूर्ति के लिहाज से नकारात्मक स्थितियां बनेंगी। रिपोर्ट का संदेश यह है कि चीन को अपने अनुकूलन को हर हाल में मजबूत करना होगा जो कि अब तक कमजोर रही है।पहले ही,चीन ने जलवायु परिवर्तन के संकट से निपटने के लिए एक राष्ट्रीय रणनीति तैयार की थी लेकिन अब भी कई व्यावहारिक मुद्दों को हल करने की जरूरत है।विभिन्न क्षेत्रों में समन्वय की जरूरत है लेकिन चीन के मौजूदा प्रणाली और विभागीय बंटवारे की वजह से ऐसा नहीं हो पाया है। बड़े स्तर पर सुधार के हालिया प्रस्ताव और शक्तिशाली मंत्रालयों से उम्मीद है कि वे इस प्रक्रिया में मदद करेंगे।

शीन वे एन और लिज गालाघर के अनुसार इस रिपोर्ट ने चीन के नए शहरीकरण की प्रक्रिया के सामने भी चुनौतियां प्रस्तुत की हैं। चीन की सरकार का लक्ष्य 2020 तक शहरी निवासियों की संख्या को 10 करोड़ तक बढ़ाने की है। साथ ही 2030 तक इसमें 40 से 50 करोड़ तक इजाफा करने का लक्ष्य है।

शहरीकरण आर्थिक विकास का एक प्रमुख संवाहक है। लेकिन शहरों की क्षमताएं सीमित हैं और वे अपने अस्तित्व के लिए वैश्विक लोक जरूरतों (पानी, भोजन) और ऊर्जा पर निर्भर हैं। जलवायु संबंधी खतरों से निपटने के लिए शहरों की अपनी कोई योजना नहीं है, यह काम राष्ट्रीय सरकारों का है। इस तरह खुद को बदलने के अलावा शहरों के पास कोई विकल्प नहीं है।

जलवायु संबंधी खतरों से निपटने के लिहाज से अपने को तैयार करने के लिए शानदार योजना और उसे लागू करने की जरूरत है जिसमें अच्छे संसाधनों वाला निर्माण कार्य शामिल हैं। ये सब पूरे चीन में शहरीकरण की प्रक्रिया के लिए बेहद अहम हैं।शहरी इलाकों के विस्तार में चलताऊ, सस्ते और काल्पनिक दृष्टिकोण से वातावरण में कार्बन की मात्रा में इजाफा होगा और जलवायु परिवर्तन से जुड़े संकट बढ़ेंगे जो खुशहाल शहरों की नींव हिला देंगे।प्रत्येक देश की तरह एक सम्पन्न और सौहार्दपूर्ण समाज की आशा के लिए चीन महत्वाकांक्षी बहुपक्षीय कोशिशों पर निर्भर है। एक कठोर और महत्वाकांक्षी समझौते पर सहमत होने की जरूरत है जिससे उन सभी को स्पष्ट संकेत मिले जिनके पूंजी आवंटन से यह तय हो सके कि कार्बन में कटौती हमारे में बेहद अहम है। अन्यथा, वैकल्पिक रास्ता खतरनाक साबित होगा। अपर्याप्त प्रयासों की मामूली खुराक बदलाव की कोशिशों को असफल कर देगी। हमें जलवायु परिवर्तन के प्रभावों को कम करते हुए खुशहाली के लिए एक बेहतर भविष्य को सुरक्षित करना है।

ली सू, ग्रीनपीस की मानें तो चीन खासतौर पर जलवायु परिवर्तन के लिहाज से बेहद संवेदनशील है। हाल के औद्योगिकीकरण की प्रक्रिया के दौरान अभी तक इस देश की वैश्विक कार्बन डाई ऑक्साइड के उत्सर्जन में भारी-भरकम हिस्सेदारी है।चीन में कोयले का उपभोग विश्व के भविष्य की जलवायु को निर्धारित करने में अकेला सबसे अहम कारक साबित होगा। 2002 से 2012 के बीच चीन में कोयले के जलने से होने वाले कार्बन डाई ऑक्साइड के उत्सर्जन में 4.5 अरब टन का इजाफा हुआ है जो इस अवधि में वैश्विक कार्बन डाई ऑक्साइड उत्सर्जन का आधा है।

गौरतलब है कि चीन में कोयले के उपभोग में कमी लाने की जरूरत है। निश्चित रूप से यह एक चुनौतीपूर्ण काम है, पर अभी चीन के लिए इसे करना अनिवार्य है। वजह यह है कि न केवल चीन के नागरिक वायु प्रदूषण से बुरी तरह प्रभावित हैं बल्कि यह वैश्विक समुदाय के लिए अति संवेदनशील है जो कि पानी की कमी, समुद्री जल-स्तर में इजाफे और मौसम संबंधी अनेक आपदाओं से जूझ रही है और ये सब जलवायु परिवर्तन से जुड़ी हुई हैं।

इधर केसिलिया तोरताजादा, थर्ड वल् र्ड सेंटर फॉर वाटर मैनेजमेंट, मैक्सिको का कहना है कि ताजे पानी को लेकर आईपीसीसी की रिपोर्ट का मूल्यांकन मूलरूप से एक डरावने और नकारात्मक स्थिति की ओर इशारा करता है। कहा गया है कि जलवायु परिवर्तन की वजह से लाखों लोगों की जिंदगी पर खतरा मंडरा रहा है। ग्रीन हाउस गैसों के उत्सर्जन के साथ ताजे पानी से संबंधित खतरों में इजाफा होने की आशंका बनी हुई है। दोबारा उत्पन्न करने योग्य सतही जल और भूजल संसाधनों के ज्यादातर सूखे उपोष्ण कटिबंधीय क्षेत्रों में और उच्च अक्षांश वाले क्षेत्रों में नीचे जाने की आशंका बनी हुई है। साथ ही वैश्विक स्तर पर बाढ़ और सूखे के बढ़ने की आंशका है।

अब आइये यह समझने की कोशिश करें कि इस तरह के डरावने परिदृश्य के मद्देनजर जल-संसाधन के संबंधित नीतियों के क्या मायने हैं? दुर्भाग्य से, जलवायु परिवर्तन के संभावित खतरों से निपटने के लिए बनाई गई नीतियों की तरह .जल-संसाधन से जुड़ी नीतियां उतनी प्रभावी नहीं हैं। साथ ही जलीय, आर्थिक, सामाजिक और पर्यावरण संबंधी परिस्थितियां इतनी जटिल हैं कि इससे संबंधित कोई अनुमान इस समय बेहद अनिश्चित है। हमें बेहतर जानकारी और सटीक मॉडल की जरूरत है। सबसे अहम बात यह है कि जलवायु परिवर्तन और जल प्रबंधन की राजनीति बेहद चुनौतीपूर्ण होगी जिसे इस रिपोर्ट में मामूली ध्यान दिया गया है।

इस सिलसिले में चकमेरीजे ओकेरके, यूनिवर्सिटी ऑफ रीडिंग का विचार भी काबिलेगौर है कि कई विकासशील देशों के लिए आईपीसीसी की इस नई रिपोर्ट का सबसे अहम प्रभाव यह है कि अंतरराष्ट्रीय समुदाय के ऊपर विशेष जोर दिया गया है कि जलवायु परिवर्तन के खतरे को कम करना काफी कठिन है।

अनुकूलन को नजरअंदाज करके या कम महत्व देकर, वे विकासशील देशों के आर्थिक विकास को रोक रहे हैं और वर्चस्व व अन्याय की ऐतिहासिक प्रणालियों को दोबारा लागू कर रहे हैं। समानता और न्याय से संबंधित प्रभावशाली अंतरराष्ट्रीय सहयोग विकसित करने के रास्ते में कुछ बड़ी चुनौतियां हैं।�

श्रीनिवास कृष्णास्वामी, भारतीय एनजीओ वसुधा फाउंडेशन का अभिमत है कि भारत एक ऐसा देश है जिसका एक बड़ा हिस्सा पहले से ही भयंकर जल संकट से जूझ रहा है। स्थायी सूखे जैसी स्थिति और बाढ़ व बादल फटने जैसी घटनाओं में बढ़ोतरी हो रही है। यह सब इसलिए भी डरावना है क्योंकि यहां की तकरीबन 22 फीसदी जनता गरीबी रेखा से नीचे जीवन यापन करती है और खेती-किसानी जीविका का मुख्य साधन है। इस रिपोर्ट में स्पष्ट तौर पर संकेत है कि यह एक अति संवेदनशील देश है और अगर जलवायु परिवर्तन के संकट का हल नहीं निकाला गया तो यह और ज्यादा अति संवेदनशील है।

कैमिला टॉलमिन, इंटरनेशनल इंस्टीट्यूट फॉर एनवायरमेंट एंड डेवलपमेंट के अनुसार आईपीसीसी की रिपोर्ट में कहा गया है कि जलवायु परिवर्तन लोगों की शांति और सम्पन्नता के लिए खतरा है। इसमें बताया गया है कि विभिन्न देशों, समुदायों और कंपनियों को इस दिशा में अपने प्रयासों में अवश्य तेजी लानी चाहिए। पर, इस रिपोर्ट में यह भी बताया गया है कि अनुकूलन की अपनी सीमाएं भी हैं और यही ग्रीन हाउस गैस उत्सर्जन को कम करने के वैश्विक प्रयास आगे बढ़ाता है। अब अभूतपूर्व वैश्विक एकजुटता और सहयोग का समय आ गया है। अब नए नेताओं के चमकने का मौका है। विश्व के कुछ कम विकसित देश पहले ही इस दिशा में आगे बढ़ चुके हैं। इथोपिया कार्बन उदासीन विकास के लिए प्रतिबद्ध है।

बांग्लादेश ने जलवायु संबंधी गंभीर घटनाओं से अनुकूलन के लिए खुद से 10 अरब डॉलर निवेश किया है। नेपाल पहला देश है जो अनुकूलन योजना सामुदायिक स्तर पर शुरू करने जा रहा है। यह वक्त है कि सम्पन्न देश इस दिशा में अपनी पूरी ताकत लगाएं। अपने यहां और विदेश में निवेश करें ताकि उत्सर्जन को कम किया जा सके और लोगों व संपत्ति के खतरे को बचाया जा सके।

जलवायु हमें यह बताती है कि हम सब एक साथ हैं और केवल एक एकजुट अंतरराष्ट्रीय समुदाय के रूप में ही इस समस्या को हल कर सकते हैं।
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लेखक लायंस डिस्ट्रिक्ट एजुकेशन चेयरमैन और
शासकीय दिग्विजय पीजी ऑटोनॉमस कालेज,
राजनांदगांव में प्रोफ़ेसर हैं। मो.9301054300

साहित्यकार कैलाश वाजपेयी का निधन

जाने-माने स‌ाहित्यकार कैलाश वाजपेयी का हृदयगति रुकने के कारण निधन हो गया है। उन्हें साहित्य अकादमी सहित कई सम्‍मानों से नवाजा जा चुका है। वाजपेयी 81 वर्ष के थे। 

लखनऊ विश्वविद्यालय से पीएचडी करने के बाद उन्होंने अध्यापन से करियर आंरभ किया। दिल्‍ली विश्‍व‌विद्यालय समेत कई विदेशी संस्‍थानों में भी उन्हें अध्यापन किया। भारतीय संस्कृति के मर्मज्ञ और कवि के रूप में उनकी ख्य‌ाति अधिक थी। 

दिल्ली दूरदर्शन के लिए उन्होंने कबीर, हरिदास स्वामी, सूरदास, जे कृष्णामूर्ति, रामकृष्ण परमहंस और बुद्ध के जीवन-दर्शन पर फिल्में बनाईं। वह‌ दूरदर्शन की हिंदी सलाहकार समिति के सदस्य भी रहे। 

वाजपेयी की प्रमुख कृतियों में संक्रान्त, देहांत से हटकर, तीसरा अंधेरा, महास्वप्न का मध्यांतर, प्रतिनिधि कविताएं, सूफीनामा, भविष्य घट रहा है, हवा में हस्ताक्षर, शब्द संसार, अनहट शामिल हैं। विवेकानंद के जीवन पर आधारित नाटक 'युवा संन्यासी' और प्रबंध काव्य 'पृथ्वी का कृष्‍णपक्ष' भी उनकी महत्वपूर्ण रचनाएं हैं। 

उन्हें 1995 में हिंदी अकादमी सम्‍मान, 2002 में व्यास सम्‍मान दिया गया। 2009 में वे कविता संग्रह 'हवा में हस्ताक्षर' के लिए स‌ाहित्य अकदमी से सम्‍मानित किए गए। कैलाश वाजपेयी अमर उजाला के लिए कॉलम भी लिखते थे।

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अल्पसंख्यक हो जाएंगे हिन्दू, मुस्लिमों की आबादी बढ़ेगी

साल 2050 तक दुनिया की कुल आबादी में हिंदुओं की संख्या तीसरे नंबर पर होगी, जबकि भारत में मुस्लिमों की संख्या दुनिया में सबसे ज्यादा होगी। पीयू रिसर्च सेंटर की ओर से की गई स्टडी में इस बात का खुलासा किया गया है। स्टडी के मुताबिक, भारत मुस्लिम आबादी के मामले में इंडोनेशिया को भी पीछे छोड़कर मुस्लिम आबादी के मामले में दुनिया का सबसे बड़ा देश बन जाएगा। रिपोर्ट में बताया गया है कि वर्ष 2050 में भी भारत में सबसे ज्यादा आबादी हिंदुओं की होगी।

2050 तक 1.4 अरब होंगे हिंदू
पीयू रिसर्च सेंटर की स्टडी में कहा गया है कि 2050 तक हिंदुओं की जनसंख्या 34 फीसदी बढ़ कर करीब 1.4 अरब हो जाएगी। स्टडी के मुताबिक, दुनिया की कुल आबादी का 14.9 प्रतिशत हिंदू होंगे। इस तरह हिंदू उन लोगों को पीछे छोड़ देंगे, जिनका विश्वास किसी भी मजहब में नहीं है। 2050 तक दुनिया की 13.2 फीसदी आबादी नॉन बिलिवर्स की होगी जो हिंदुओं से कम होगी।

ईसाइयों और मुस्लिमों में ज्यादा फर्क नहीं होगा
रिपोर्ट के मुताबिक, ‘अगले चालीस सालों में ईसाइयों की संख्या दुनिया में सबसे ज्यादा होगी, लेकिन इसी लिहाज से मुसलमान उनसे ज्यादा पीछे नहीं होंगे। लेकिन इस्लाम किसी भी अन्य धर्म की तुलना में तेजी से बढ़ेगा। इसमें ये भी कहा गया है कि रिपोर्ट में अनुमान जताया गया है कि 2050 तक मुस्लिमों 2.8 अरब या आबादी का 30 फीसदी और ईसाइयों 2.9 अरब या 31 फीसदी के बीच आबादी के हिसाब से करीबी मुकाबला होगा।

क्या है पीयू रिसर्च सेंटर
‘पीयू रिसर्च सेंटर’ एक नॉन फ्रॉफिटेबल अमेरिकी थिंक टैंक है। वॉशिंगटन स्थित यह रिसर्च सेंटर उन राजनैतिक, सामाजिक और भौगोलिक मुद्दों पर शोध तथा सर्वेक्षण करता है, जिनका अमेरिका या दुनिया से संबंध होता है और जो भविष्य में उपयोगी साबित हो सकते हैं। पीयू चैरिटेबल ट्रस्ट इस रिसर्च सेंटर को आर्थिक मदद देता है

उत्तराखंड सरकार ला रही है देश का पहला संस्कृत चैनल

देश का पहला संस्कृत भाषा का चैनल जल्द ही उत्तराखंड में खुलेगा। इस सरकारी चैनल के लिए मुख्यमंत्री हरीश रावत ने हरी झंडी भी दे दी है।

खबरों के मुताबिक, मुख्यमंत्री ने विभागीय अधिकारियों को चैनल की डीपीआर तैयार करने के निर्देश दे दिए हैं। चैनल लॉन्च होने के साथ ही उत्तराखंड देश का पहला ऐसा राज्य होगा, जहां संस्कृत भाषा का अपना चैनल होगा।

संस्कृत अकादमी द्वारा संस्कृत चैनल को स्थापित करने और संचालित किए जाने संबंधी प्रस्ताव कार्य समिति में पारित किया गया। इसी प्रस्ताव में एफएम रेडियो व कम्युनिटी रेडियो शुरू करने का प्रस्ताव भी पारित किया गया।

शासन के माध्यम से भेजे गए तीनों प्रस्तावों को मुख्यमंत्री की तरफ से 25 मार्च को हरी झंडी मिल गई। मुख्यमंत्री संस्कृत अकादमी के अध्यक्ष भी हैं। संस्कृत चैनल खोले जाने के प्रस्ताव पर सहमति देते हुए मुख्यमंत्री ने विभागीय अधिकारियों को निर्देश दिए हैं कि चैनल खोले जाने के संबंध में डीपीआर तैयार कर परीक्षण के लिए सचिव समिति के सामने रखें।

सचिव समिति योजना के लिए नीति निर्धारण का काम करेगी। संस्कृत अकादमी के सचिव डॉ. सुरेश चरण बहुगुणा ने बताया कि देश ही नहीं विश्व के किसी कोने में संभवतया अब तक संस्कृत चैनल नहीं है।  

अकादमी के सचिव डॉ. बहुगुणा ने कहा कि अकादमी, विश्वविद्यालय और निकट भविष्य में खुलने वाले चैनल का उद्देश्य संस्कृत भाषा के प्रचार-प्रसार से जुड़ा है। संस्कृत का व्यापक असर हो और भाषा , प्राथमिक शिक्षा के स्तर से छात्रों को पढ़ाई जाए इसके लिए सरकार ने पूर्व में प्रत्येक विकासखंड में संस्कृत के पांच-पाच प्राथमिक विद्यालय खोलने और कई गांवों को संस्कृत गांव के नाम से घोषित करने का फैसला लिया है।

एक न्यूज वेबसाइट के मुताबिक, संस्कृत विश्वविद्यालय हरिद्वार इस चैनल का कंटेंट तैयार करने में मदद करेगा। इस चैनल से चारधामों की प्रातःकालीन और सांध्यकालीन पूजा और आरती का लाइव प्रसारण होगा। इसके अलावा तीर्थनगरी वाराणसी में गंगा की आरती और कुंभ के दौरान होने वाले आयोजनों का भी लाइव प्रसारण किया जाएगा।

साभार- http://www.samachar4media.com/ से 

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भारत का पहला खोजी टेबलॉयड `ब्लिट़्ज’ और पहला पत्रकार रूसी करंजिया

भारतीय पत्रकारिता में ब्लिट्ज़ अपने आप में मील का पत्थर था। ये देश का पहला ऐसा अखबार था, जिसे गाँव गाँव में शौक से पढ़ा जाता था। कई जगहों पर तो ब्लिट्ज़ बहुत कम संखया में पहुँच पाता था तो लोग एक दूसरे के घर या दुकान पर जाकर ब्लिट्ज़ पढ़ने की हसरत पूरी करते थे। आज  की टीवी पत्रकारिता के दौर में जहाँ कोई भी ब्रेकिंग न्यूज न तो सनसनी मचा पाती है न विश्वसनीयता पैदा कर पाती है, जबकि ब्लिट्ज़ का दौर ऐसा दौर था कि इसका एक एक शब्द विश्वसनीयता, प्रामाणिकता और खोजी पत्रकारिता का ऐसा मानक होता था कि ब्लिट्ज़ में छपी खबर सत्ता के शीर्ष, सिंहासन को भी हिला देती थी। ब्लिटज़ हिन्दी के बरसों तक संपादक रहे वरिष्ठ पत्रकार श्री नंदकिशोर नौटियाल  ब्लिट्ज़ के उस सुनहरे दौर की पत्रकारिता को याद कर रहे हैं। 

 

अंगरे़जी `ब्लिट़्ज' का प्रकाशन दूसरे विश्वयुद्ध के दौरान २ ़फरवरी १९४१ से शुरू हुआ था, जिस समय सोवियत रूस और ना़जी जर्मनी के बीच अनाक्रमण मैत्री-संधि थी। दुनिया के शीर्ष वूâटनीतिज्ञ और जासूस जब यह कल्पना भी नहीं कर सकते थे, उस समय सबसे पहले `ब्लिट़्ज' ने यह सनसनी़खे़ज भविष्यवाणी कर दी थी कि हिटलर ने अपने `पऩजर डिवी़जन' को रूस पर हमला करने की तैयारी करने का आदेश दे दिया है। इसी तरह सबसे पहले `ब्लिट़्ज' ने छापा कि `आ़जाद हिंद ़फौज' (इंडियन नेशनल आर्मी) की स्थापना हो गयी है और उसके कमांडर नेताजी सुभाषचंद्र बोस ने अंडमान द्वीप को ब्रिटिश ़गुलामी से आ़जाद कराके वहाँ तिरंगा झंडा लहरा दिया है।

 विश्वयुद्ध की समाप्ति के बाद नवंबर १९४७ में सबसे पहले `ब्लिट़्ज' ने छापा कि अमरीका-रूस के बीच `शीतयुद्ध' की शुरुआत हो गयी है। पाकिस्तान के निर्माता मोहम्मद अली जिन्ना की कराची में मौत की ़खबर जबकि वहाँ के हुक्मरान ने पाकिस्तान की जनता से छुपाकर रखी थी, `ब्लिट़्ज' ने उसे सबसे पहले छापकर सारी दुनिया के सामने उजागर कर दिया। यह भंडाफोड़ भी सबसे पहले सि़र्पâ `ब्लिट़्ज' ने किया था कि जम्मू-कश्मीर पर कबाइलियों के भेस में घुस आये हमलावर पाकिस्तानी सिपाहियों का तथाकथित पठान कमांडर जनरल तारी़क असल में ओ.एस.एस. (सी.आइ.ए. का पूर्व रूप) का अमेरिकन ब्रिगेडियर रसेल हेट था।

 जब जवाहरलाल नेहरू ने अपने गुरु गाँधीजी तथा खुद के वचन से फिरकर देश का विभाजन मं़जूर कर लिया तो कुपित करंजिया प्रधान मंत्री के द़फ्तर में जा धमके और गुस्से में बोले, छिन्नभिन्न देश में रहने से तो बेहतर होगा कि मैं कहीं बाहर चला जाऊँ! नेहरू ने कहा जाने से पहले कल सुबह नाश्ते पर आओ। नाश्ते पर एक और सज्जन मौजूद थे, वी.के. कृष्ण मेनन। करंजिया का रोष नाश्ते पर भी थम नहीं रहा था। अंत में नेहरू ने कहा, जाते ही हो तो अच्छा जाओ, बाहर से तुम हमारी मजबूरी को बेहतर समझ सकोगे और मेनन ने कुछ देशों की सूची और भारत के गैरसरकारी प्रतिनिधि की हैसियत से विदेश यात्रा-कार्यक्रम और अधिकारपत्र रूसी (रुस्तम खोरशीदजी) करंजिया को थमा दिया। यह था नेहरू की दूरदर्शिता और करंजिया की उपयोगिता का एक ज्वलंत उदाहरण जो बाहरी राष्ट्रों के साथ भारत के भावी संबंधों में महत्वपूर्ण मौ़कों पर अत्यंत सहायक सिद्ध हुआ।

   सन 'साठ के बरसों में देश में जगह-जगह से सैकड़ोेंं टैबलॉयड विभिन्न भाषाओं में `ब्लिट़्ज' की त़र्ज पर छप रहे थे, मगर वे `ब्लिट़्ज' नहीं थे। यह रूसी करंजिया की पत्रकारिता की लोकप्रियता का ही एक पैमाना था कि बड़े अ़खबारों की टक्कर में `ब्लिट़्ज' प्रतिरोध की एक समानांतर पत्रकारिता (काउंटर मीडिया) का नेता और आदर्श बन गया था। वह भारतीयता, धर्मनिरपेक्षता और नारी-सम्मान का प्रबल समर्थक था। यह सब करंजिया के पारसी संस्कारों के कारण था। युद्धकाल में वार-कॉरस्पोंडेट रहे करंजिया और `ब्लिट़्ज' ने बर्तानवी ़फौजी अ़फसरों की अय्याशी के लिए जो शर्मनाक `वीमेंस ऑग़्जीलियरी कोर (इंडिया)' गठित की गयी थी उसको बंद कराने के लिए ़जबर्दस्त मुहिम छेड़ी और तत्कालिक ब्रिटिश शासन को उसे बंद करने पर मजबूर कर दिया था।  
   करंजिया की पत्रकारिता का झुकाव समाजवाद की ओर था और गाँधीजी के शब्दों में समाज के सबसे निचले पायदान पर बैठे व्यक्ति की आवा़ज बनकर सामने आना तथा उसके सरोकारों को सबसे पहले स्वर देना। “प्रâी, प्रैंâक एंड फियरलेस'' (बेलौस, बेबाक और बे़खौ़फ) उसका नीति-वाक्य था। राष्ट्रीय घटनाक्रम हो या अंतरराष्ट्रीय, उसकी भनक रूसी करंजिया को पहले ही लग जाती थी। जनता की नब़्ज की सही पहचान करने की बेमिसाल क्षमता थी करंजिया में, जिसका श्रेय जाता है `ब्लिट़्ज' के सूचनातंत्र को, जो ़जमीनीस्तर से लेकर शीर्ष तक हर जगह मौजूद था। `ब्लिट़्ज' १९४२ के `अंगरे़जो, भारत छोड़ो' आंदोलन में `कांगरेस समाजवादी अंडरग्राउंड' का मुखपत्र बन गया था। जयप्रकाश नारायण, आचार्य नरेंद्रदेव, राममनोहर लोहिया, अरुणा, अशोक मेहता, पटवर्धन-बंधु, मीनू मसानी सभी समाजवादी नेता `ब्लिट़्ज' में `टीपू' छद्म नाम से लिखते और छपते रहे थे।

   `ब्लिट़्ज' के दिल्ली ब्यूरो के प्रमुख मशहरू पत्रकार जी.के. रेड्डी रहे और उनके बाद ए. (अत्ता) राघवन और जोगाराव की जोड़ी; और उस मलयाली कार्टूनिस्ट को `लाँच' करने का श्रेय भी करंजिया और `ब्लिट़्ज' को जाता है जिसका नाम विश्वस्तर पर महानों में शुमार हुआ – आर.के. लक्ष्मण! उस ़जमाने में देश में शासकीय घपलों के पर्दा़फाश का पहला सेहरा भी करंजिया और `ब्लिट़्ज' के सर बँधता रहा, जिनमें `जीप ़खरीदी कांड', `हरिदास मूँधड़ा-जीवन बीमा निगम कांड, `डॉ. तेजा-जयंती शिपिंग कांड', `मोरारजी-पर्मनेंट मैगनेट कांड', जैसे भंडाफोड़ थे जिन्होंने संसद और सरकार को हिला दिया था।

  कृष्णराज ठाकर्सी के व्यापारिक घोटालों का पर्दा़फाश करने पर उच्च न्यायालय ने करंजिया पर तीन लाख रुपये का जुर्माना ठोक दिया था। इसकी प्रतिक्रिया यह हुई कि जुर्माना भरने के लिए अब्बास, संतोष साहनी और बीसियों पाठक अपनी चेकबुवेंâ और चंदा लेकर `ब्लिट़्ज' कार्यालय पहुँच गये, जिसे स्वीकार करने से रूसी ने सधन्यवाद इंकार कर दिया, क्योंकि `ब्लिट़्ज' के स्टा़फ ने अपने बोनस, ग्रेचुइटी, एक माह का वेतन करंजिया के हवाले कर दिया, जो तीन लाख रुपये से कहीं ़ज्यादा होता था। आम पाठकों और ़खासकर वंâपनी के कर्मियों का ऐसा प्यार बिरले ही मालिक को प्राप्त होता है, लेकिन करंजिया ने अपने को कभी मालिक नहीं समझा।

  `ब्लिट़्ज' के निशाने से मीडिया भी नहीं बचा जब करंजिया ने डालमिया-जैन साम्राज्य के आर्थिक घोटालों की विवियन बोस जाँच रिपोर्ट को कई अंकों में छापा। उन्होंने दूसरे मीडिया मसीहा रामनाथ गोयनका की धाँधलियों को भी उजागर किया। करंजिया ने जब राजीव गाँधी के ़िखला़फ `हेरिटेज केसी प्लॉट' को बेऩकाब किया तो मीडिया और संसद दोनों हिल गये थे। न्याय और राष्ट्रहित में आंदोलन, जनजागरण और “स्वूâप'' रूसी करंजिया का जुनून था।

 
रूसी करंजिया की पत्रकारिता के प्रति जुनून
 
करंजिया इस हद तक जुनूनी पत्रकार रहे हैं कि भारत की समाजवाद की ओर प्रवृत्त नीतियों के कट्टर विरोधी सांसद आचार्य कृपालानी को “कृपालूनी'' शीर्षक से – `ब्लिट़्ज' के वकीलों की सलाह के विपरीत – पहले पन्ने पर छापकर संसद की अवमानना करने के दोषी पाये जाने की जो़िखम उठायी और उन्हें संसदीय प्रतारणा झेलनी पड़ी; जबकि वर्षों बाद उसी करंजिया कोे संसद के ऊपरी सदन `राज्यसभा' का सदस्य नियुक्त होने का भी गौरव प्राप्त हुआ। करंजिया की जुनूनी पत्रकारिता का निशाना न्यायपालिका भी बनी जब निचली अदालत ने उन्हें आ़िखरी पन्ने पर कथित “अश्लील चित्र'' (पिन-अप) छापने का दोषी ठहराया, मगर हाइ कोर्ट ने उस निर्णय को उलट दिया था, जिस पर करंजिया ने ऊपरी अदालत के ़पैâसले को आधार बनाकर निचली अदालत के जज की खिल्ली उड़ाते हुए बहुत ही कटु लेख (यह भी वकीलों की सलाह के ़िखला़फ) छाप दिया। इसे हाइ कोर्ट की नागपुर पीठ ने अदालत की अवमानना करार दिया और करंजिया को पंद्रह दिन की ़वैâद की स़जा सुना दी। जब उन्हें ट्रेन से नागपुर जेल ले जाया जा रहा था, बंबई से नागपुर तक हर स्टेशन पर जहाँ गाड़ी रुकती थी, ह़जारों की संख्या में `ब्लिट़्ज' के प्रशंसकों ने करंजिया को हीरो-जैसी विदायी दी और कोई एक ह़फ्ते बाद ही जेल से स़जा काटकर लौटते समय उससे बड़ी संख्या में उनका स्वागत किया। बॉम्बे वी.टी. (अब छत्रपति शवाजी स्टेशन) पर दसियों ह़जार छात्र-युवा-युवतियाँ, शहरी और कामगार और उनके नेतागण, प्रगतिशील मीडिया पूâलमालाएं लेकर पहुँचे और जलूस के साथ करंजिया को ब्लिट़्ज-द़फ्तर लाया गया।
   

केरल के कम्यूनिस्ट नेता गोपालन को एक राजनीतिक हत्या के आरोप में मौत की स़जा हो गयी थी, उन्हें फाँसी के पंâदे से बचाने के लिए `ब्लिट़्ज' ने राष्ट्रव्यापी हस्ताक्षर आंदोलन छेड़ा और गोपालन को बचाने में सफलता प्राप्त की। जम्मू-कश्मीर, जूनागढ़, हैदराबाद और ़खासकर गोआ को भारत में विलय करने की मीडिया-मुहिम की अगुवाई की। करंजिया के जुनून की अनगिनत मिसालें हैं। वह बुनियादी तौर पर एक जागरूक देशभक्त पत्रकार थे।

 `ब्लिट़्ज' के राजनीतिक प्रभाव और आकलन और सक्रिय जुनून की मिसाल बंबई में कोलाबा की सीट से बंबई के `बेताज के बादशाह', वेंâद्रीय मंत्री सादोबा पाटिल के ़िखला़फ समाजवादी म़जदूर नेता जॉर्ज फर्नांडिस को खड़ा करना और जितवा देना भी है, जबकि तथाकथित राष्ट्रीय मीडिया पाटिल का गुणगान और उनकी जीत की भविष्यवाणी कर रहा था, सट्टा लगा रहा था। `ब्लिट़्ज' ने जॉर्ज की जीत का समाचार “जॉइंट किलर जॉर्ज'' की हेडलाइन से छापा था। करंजिया की पत्रकारिता कांगरेस की धर्मनिरपेक्ष-समाजवादी और विकासनीति का समर्थन करती थी तो साथ ही वामपंथ की ़गरीब-म़जदूर हितैषी माँगों की प्रबल समर्थक थी।   

 अंतरराष्ट्रीय मंच पर रूसी करं़जिया नाटोसंधिवाले पश्चिमी पूँजीवादी देशों तथा वारसा संधिवाले सोवियत गुट के देशों की खेमेबंदी से अलग हटकर नेहरू, नासर और टीटो की त्रिमूर्ति के गुट-निरपेक्षता के सिद्धांत का समर्थक था। ़िजयोनि़ज्म (यहूदीवाद) का विरोध, अरब देशों के साथ दोस्ती और विकासशील देशों के निर्गुट संगठन की स्थापना `ब्लिट़्ज' के अंतरराष्ट्रीय दृष्टिकोण के आधार रहे हैं और करंजिया के अरब देशों के साथ संपर्कों का भारत सरकार को ़गैरसरकारी स्तर पर यथेष्ट वूâटनीतिक लाभ भी मिलता रहा है, जैसे बाँग्ला-युद्ध में भारत को शाह ईरान से करंजिया की मित्रता का फायदा पाकिस्तान के ़िखला़फ सक्रिय समर्थन मिलने में हुआ।

 
सिने ब्लिटज़ में  न्यूड तस्वीर
 
रूसी करंजिया ने जब `सिने ाqब्लट्ज' ('७४ में) निकाली तो उसके पहले अंक के मुखपृष्ठ पर एक मॉडल की न्यूड तस्वीर छापी थी।
न्यूड (नंगी, नग्न, नग्नता) के बारे में आम भारतीय धारणा सौंदर्यबोध और वासना में भेद नहीं कर पाती है। '७४ में `सिने ाqब्लट्ज' के पहले अंक के मुखपृष्ठ पर जो ़फोटोग्रा़फ छपा था वह एक फोटो-कलाकृति थी।

  करंजिया `ब्लिट़्ज' के लास्ट पेज पर ख्वाजा अहमद अब्बास के लोकप्रिय कॉलम के साथ एक `पिन-अप' हर ह़फ्ते छापते रहे हैं, जिनमें से कुछ चित्रों पर हो-हल्ला भी मचा है। अब्बास `पिन-अप' छापने के विरोधी रहे हैं। करंजिया का कहना था कि कलात्मक “नग्न (न्यूड) या अर्धनग्न तस्वीर'' पूरे अंक में छप रही बोझिल गद्यात्मक सामग्री से पाठक के दिलो-दिमा़ग को राहत दिलाती और उसके सौंदर्यबोध को विकसित करने का काम करती है।

 करंजिया के खिला़फ ऐसे ही एक पिन-अप पर मु़कद्दमा चला था, जिसे उच्च न्यायालय ने “सौंदर्यबोध'' करार दिया, मगर ऊपरी अदालत के ़पैâसले के अंशों को आधार बनाकर निचली अदालत की खिल्ली उड़ाने पर उन्हें पंद्रह दिन की स़जा हुई, जो करंजिया ने “अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के सेनानी'' की तरह भोगी। `सिने ाqब्लट़्ज' के पहले अंक के पहले पेज पर एक सिने अभिनेत्री की इसी अंक के लिए खींची गयी `निरवस्त्र' तस्वीर के छपने पर बड़ा हंगामा मचा, लेकिन अंततः उस तस्वीर को ़फोटोग्राफर की “कलाकृति'' माना गया। आज अंगरे़जी के सभी अ़खबारों के पेज तीन पर और ़खासतौर पर सिनेमा की पत्रिकाओं में ऐसी तस्वीरें, जिनमें कुछ पूâहड़ भी होती हैं, खुले आम छापी जा रही हैं। चैनल तो उनसे भी आगे निकल गये हैं। ऐसी पत्रकारिता को खजुराहो के मंदिरों के बाहर सुदर्शित कामशास्त्रीय भित्तिमूरतों के समकक्ष नहीं माना जा सकता, विंâतु अगर वे तुलनीय भी हों, तो भी हिंदी ब्लिट़्ज' ने उसे भाषायी पत्रकारिता से बाहर ही रखना बेहतर समझा, क्योंकि खजुराहो-युग और आज के १८वीं सदी से लेकर २१वीं सदी तक के काल-समय में एक साथ जी रहे बहुसंख्य भारतीय समाज के संस्कारों से यह मेल नहीं खातीं।

   जब यह सवाल `हिंदी ब्लिट़्ज' के सामने भी दरपेश हुआ, तो उसने अपने पाठकों के सामने यह सवाल रखा और उनमें विभाजित राय पायी। `हिंदी ब्लिट़्ज' के संपादक मंडल में भी विभाजित मत था, अतः हिंदी में आ़िखरी पेज पर एक सुंदर नारी के मुखचित्र के मनोभावों के अनुवूâल उसे किसी बड़े शायर या कवि के शे'र या कविता के साथ छापना शुरू किया, जिसकी बड़ी तारी़फ हुई और अनेक पाठकों ने तो उनकी कटिंगें जमा करना भी शुरू कर दांr। एक ऐसा ही चित्र एक तत्कालीन नामी फिल्म-हीरो तथा हीरोइन का छपा था और उसके नीचे छापे गये कैप्पशन र हीरोइन ने एतरा़ज जताया था। `ब्लिट़्ज' ने नायिका से तुरंत मा़फी माँग ली थी, मगर साथ में कैप्शन के शे'र का गूढ़अर्थ भी दिया और वह मुतमईन भी हुर्इं।      
 
ब्लिट़्ज का मुंबई की पत्रकारिता में योगदान
 
देश और आम जनता के हित में अ़खबार ने `ब्लिट़्ज नेशनल फोरम' की स्थापना की जिसके मंच से देश के सामने मुँह बाये खड़ी अनेक सामयिक समस्याओं और सरोकारों पर विभिन्न विधाओं के शीर्षस्थ विचारकों को प्रस्तुत किया जाता रहा।

 राष्ट्रीय/अंतरराष्ट्रीय मामलों के साथ-साथ मुंबई की पत्रकारिता में `ब्लिट़्ज' का योगदान महत्वपूर्ण रहा है। मुंबई के छात्रों और शहरियों की समस्याओं को स्वर देने के लिए यहाँ छपनेवाले दैनिक तथा अन्य नियतकालिक प्रकाशनों/ अ़खबारों में `ब्लिट़्ज' पहला साप्ताहिक बना जिसने मुंबई पर वेंâद्रित `बॉम्बे ब्लिट़्ज' नाम से सप्लीमेंट शुरू किये। मुंबई की कुल पत्रकारिता के बीच भाषाई पत्रकारिता में हिंदी, उर्दू और मराठी में `ब्लिट़्ज' प्रकाशन प्रारंभ किये। ब्लिट़्ज-संस्थान अंगरे़जी में मुंबई का प्रथम टैबलॉयड दैनिक अ़खबार `द डेली' लेकर आया। सिनेमा के क्षेत्र में `सिने ब्लिट़्ज' का प्रकाशन प्रारंभ किया, तो उसने अपने पहले ही अंक से हंगामा मचा दिया। उस अंक की प्रतियाँ `ब्लैक' में बिकीं!

 जब समानांतर पत्रकारिता के रूप में स्थापित हो चुके अंगरे़जी `ब्लिट़्ज' परिवार में हिंदी `ब्लिट़्ज' का शुमार हुआ तो यह हिंदी भाषा और भाषायी अभिव्यक्ति में परिवर्तनकारी योगदान करनेवाला साबित हुआ। हिंदी `ब्लिट़्ज' की “सरल, सुबोध और सही'' हिंदी ने उस समय के लगभग सभी हिंदी अ़खबारों और पत्र-पत्रिकाओं की “क्लिष्ट भाषा और उलझी हुई शैली'' को प्रभावित किया। हिंदी `ब्लिट़्ज' अंगरे़जी के अनूदित संस्करण की चाहरदीवारी तक सिमटा हुआ नहीं रहा। हिंदी में अपना एक स्वतंत्र व्यक्तित्व गढ़ने की ताब हिंदी संस्करण के प्रथम संपादक मुनीश नारायण सक्सेना और नंदकिशोर नौटियाल जैसी पत्रकार टीम की वजह से पैदा हुई, जिसका श्रेय रूसी करंजिया को भी देना होगा, क्योंकि उन्होंने हिंदी `ब्लिट़्ज' को पूर्ण संपादकीय स्वतंत्रता दे रखी थी।

इसी आ़जादी की वजह से हिंदी की अपनी अलग रिपोर्टिंग और अलग स्तंभ शुरू हुए। ़ख्वाजा अहमद अब्बास अंगरे़जी का `लास्ट पेज' लिखते थे, तो हिंदी में अंतिम पृष्ठ `आ़जाद ़कलम' के नाम से छपता था, जो बाद में उर्दू `ब्लिट़्ज' निकलने पर उसमें भी छपता रहा, लेकिन `आ़जाद ़कलम' अंगरे़जी के `लास्ट पेज' का अनुवाद कभी नहीं रहा। अब्बास साहब के देहांत के बाद अंगरे़जी का लास्ट पेज मशहूर पत्रकार पी. साईनाथ लिखने लगे। असल में खुद अब्बास साहब ने यह पेज साईनाथ को करंजिया को लिखे पत्र में एक तरह से वसीयत किया था।

हिंदी में यह स्तंभ मुंबई के जानेमाने कवि-साहित्यकार और लोकप्रिय नेता डॉ. राममनोहर त्रिपाठी लिखते रहे। हिंदी में ़िफल्म-नाटक और मनोरंजन स्तंभ `रँगारंग' उमेश माथुर करते थे तो `नयी गुलिस्ताँ' वैâ़फी आ़जमी रचते थे। हिंदी की ़िजले-़िजले में, यहाँ तक कि तालुका स्तर तक एक अलग ही टीम खड़ी हो गयी थी, जिसने ब्लिट़्ज-संस्थान की शक्ति कई गुना ब़ढ़ा दी थी। `ब्लिट़्ज' शुरू से ही प्रगतिशील, जुझारू और भंडाफोड़ करनेवाला अ़खबार था। जहाँं `ब्लिट़्ज' ने इंदिरा गाँंधी को `गरीबी हटाओ' कार्यक्रम में प्रबल समर्थन दिया वहीं आपातकाल की ़ज्यादतियों के खिला़फ इंदिरा गांधी के इर्दगिर्द जमा “चंडाल चौकड़ी'' (गैंग ऑफ फोर) का ़जबर्दस्त भंडाफोड़ भी किया। `ब्लिट़्ज' की दृष्टि और नीति का मापदंड एक ही होता था कि आम आदमी का हित किस बात से सधेगा और कौन-सी बात आम आदमी के हितों के विपरीत जायेगी।

 नंदकिशोर नौटियाल के संपादन में हिंदी `ब्लिट़्ज' को आम जनता और युवा-वर्ग ने इस हद तक अपना मददगार मान लिया था कि आपातकाल में जयपुर विश्वविद्यालय के छात्रों ने “नौटियाल ब्रिगेड'' की स्थापना कर डाली थी और वाइस चांसलर के ़िखला़फ अपनी माँगों को लेकर मुहिम छेड़ दी थी। नतीजा यह हुआ कि विद्वान वाइस चांसलर पं. गोबिंद चंद्र पाँडेजी ने संपादक नौटियाल को जयपुर आमंत्रित किया और छात्र संघर्ष को सुलझवाया। इसी प्रकार हिंदी `ब्लिट़्ज' में छपी एक रिपोर्ट को साक्ष्य मानते हुए अदालत ने सागर विश्वविद्यालय के छात्रों को एक आपराधिक मामले में बरी कर दिया था। जनहित की इस नीति पर चलते हुए हिंदी `ब्लिट़्ज' की प्रसार संख्या साढ़े तीन लाख प्रतियाँ हर ह़फ्ते तक पहँुच गयी थींr और यह रिकार्ड  नौटियाल के संपादकत्व में (१९७३ के बाद) स्थापित हुआ था। `ब्लिट़्ज' अकेला अ़खबार था जो अपने मुखपृष्ठ पर छापता था “अपना ब्लिट़्ज मिलबाँट कर पढ़ें!''
 
ब्लिट्ज़ अन्याय विरोधी समानांतर पत्र
 
`ब्लिट़्ज' को सत्ताविरोधी कहना ठीक नहीं रहेगा। वह बुराई के प्रतिरोध का अ़खबार था, बुराई पक्ष-विपक्ष जिस भी दिशा में हो, वह सत्ता के अंध-विरोधी नहीं था। वह अन्याय विरोधी समानांतर पत्र था। वह प्रतिक्रियावाद के ़िखला़फ प्रगतिशीलता का पक्षधर अ़खबार था। संक्षेप में `ब्लिट़्ज' प्रगतिशील और जुझारू अ़खबार था। वह विकास और आधुनिकता का समर्थक, पीछे की ओेर नहीं आगे की ओर देखनेवाला अ़खबार था। `ब्लिट़्ज' ने भाखड़ा-नंगल, नये विज्ञानवेंâद्रों, निजी और सार्वजनिक उद्यमों की स्थापना जैसे “भारत के नये मंदिरों'' का, ़जमींदारी-विनाश, प्रीवी पर्सों का ़खात्मा और बैंकों के राष्ट्रीयकरण आदि कार्यों का पुऱजोर समर्थन किया। राष्ट्रीय विकास के लिए “नदियों की माला'' तथा “भूमि सेना'' बनाने का करंजिया और `ब्लिट़्ज' अंत तक ़जबर्दस्त पैरवी करता रहा, जो इस देश के “जल'' और “जन'' संसाधन को ़जाया जाने से बचाने और देश को आर्थिक रूप से शक्तिशाली बनाने का अचूक मंत्र साबित हो सकता था। करंजिया के अरब  देशों के साथ संपर्कों का भारत सरकार को गैरसरकारी स्तर पर यथेष्ट वूâटनीतिक लाभ भी मिलता रहा है, जैसे बाँग्ला-युद्ध के दौरान भारत को शाह ईरान से करंजिया की मित्रता का ़फायदा पाकिस्तान के ़िखला़फ खुला समर्थन मिलने में पहुँचा। 
  
ब्लिट़्ज : पीत पत्रकारिता या खोजी पत्रकारिता
 
   `ब्लिट़्ज' पर कीचड़ उछालनेवालों को मुँहतोड़ जवाब देते हुए खुद करंजिया ने लिखा था, “ब्लिट़्ज को तमाम नकारात्मक रंगों में रँगा जा रहा है, यानी पीले, लाल, काले वगैरह; लीजिये हमने उनके जवाब में अपने अ़खबार को उन तमाम रंगों में प्रस्तुत करते हुए एक होर्डिंग लगा दी है और उस पर लिख दिया है: `जी हाँ, लोग हमें पढ़ते हैं !' अगर यह पूछना चाहते हैं कि हमारी समझ का दार्शनिक आधार क्या है, तो वह था, है और हमेशा रहेगा – नेहरूवाद – अर्थात लोकतांत्रिक, धर्मनिरपेक्ष, ़गरीबहितैषी, तटस्थता और दृढ़ता के साथ साम्राज्य-विरोध।''
   संक्षेप में `ब्लिट़्ज' प्रगतिशीलता और समानता के सरोकारों का जुझारू अ़खबार था। किसी भी अन्य समकालीन भारतीय पत्रकार का देशहित में, राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत के हित में करंजिया जितना योगदान शायद ही गिनाया जा सके; जिसे तथाकथित राष्ट्रीय मीडिया ने हिकारत के साथ “पीत पत्रकार'' कहकर भारत के पत्रकारिता के इतिहास से उसके सकारात्मक रोल के बावजूद `ब्लैक आउट' कर रखा है। `ब्लिट़्ज' की सनसनी़खे़ज भंडाफोड़ पत्रकारिता से जहाँ उल्टे-सीधे काम करनेवाले अ़फसर-नेता-पूँजीपति ़खौ़फ खाते थे, वहीं सेठसेक्टर और उनके पत्रकार घृणा के साथ उसे पीत पत्रकारिता (येलो जरनैलि़ज्म) कहा करते थे। उसका गला घोंटने में कोई कसर उठा नहीं रखते थे।

आज लगभग सभी मीडियावाले “स्वूâप'' के नाम पर एक अजीब दैह्यात्मिक/ऐंद्रिक आनंद का आभास करते हैं, जबकि  `ब्लिट़्ज' के “भंडाफोड़'' से होनेवाली आर्थिक धाँधलियों और सामाजिक दुराचारों के – जो आज विकराल रूप धारण कर चुके हैं – पर्दा़फाश पर करंजिया को पानी पी-पीकर कोसते रहते थे!  
 
हवा का रु़ख
 
सन १९९१-९२ के वर्ष की बात है करंजिया ने अपने वरिष्ठ संपादकीय सहयोगियों की बैठक बुलायी। `ब्लिट़्ज' में रूसी करंजिया नीतिगत निर्णय बैठक बुलाकर उनकी राय सुनने के बाद ही लिया करते थे। उन्होंने कहा कि मेरा आकलन है कि अब वेंâद्र में भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) सत्ता में पहुँचनेवाली है, इसलिए हमें उसका समर्थन करना चाहिये। आज के मशहूर जुझारू पत्रकार पी. साईनाथ ने इसके विपरीत तर्वâ दिये। होमी मिस्त्री, अल्मीडा, द' डेली के संपादक नायर, सभी की ऩजर में भाजपा अभी सत्ता से बहुत दूर थी। हिंदी के संपादक नौटियाल का कहना था कि भले भाजपा सत्ता के ़करीब पहुँच रही हो मगर हमें उसका विरोध करना चाहिये और उर्दू के संपादक हारून रशीद ने उनकी ताईद की थी। सबकी राय सुनने के बाद करंजिया ने भाजपा-समर्थन की नीति मं़जूर कर ली। क्या यह करंजिया का अवसरवाद था? नहीं। वह हवा के रु़ख भाँपने और उसके साथ चलनेवाला पत्रकार था और हवा कांगरेस के ़िखलाफ बहना शुरू हो गयी थी।

 (क्रमशः, हिंदी `ब्लिट़्ज', उर्दू `ब्लिट़्ज')

भारतीय पत्रकारिता में ब्लिट्ज़ अपने आप में मील का पत्थर था। ये देश का पहला ऐसा अखबार था, जिसे गाँव गाँव में शौक से पढ़ा जाता था। कई जगहों पर तो ब्लिट्ज़ बहुत कम संखया में पहुँच पाता था तो लोग एक दूसरे के घर या दुकान पर जाकर ब्लिट्ज़ पढ़ने की हसरत पूरी करते थे। आज  की टीवी पत्रकारिता के दौर में जहाँ कोई भी ब्रेकिंग न्यूज न तो सनसनी मचा पाती है न विश्वसनीयता पैदा कर पाती है, जबकि ब्लिट्ज़ का दौर ऐसा दौर था कि इसका एक एक शब्द विश्वसनीयता, प्रामाणिकता और खोजी पत्रकारिता का ऐसा मानक होता था कि ब्लिट्ज़ में छपी खबर सत्ता के शीर्ष, सिंहासन को भी हिला देती थी। ब्लिटज़ हिन्दी के बरसों तक संपादक रहे वरिष्ठ पत्रकार श्री नंदकिशोर नौटियाल  ब्लिट्ज़ के उस सुनहरे दौर की पत्रकारिता को याद कर रहे हैं। 

 

अंगरे़जी `ब्लिट़्ज' का प्रकाशन दूसरे विश्वयुद्ध के दौरान २ ़फरवरी १९४१ से शुरू हुआ था, जिस समय सोवियत रूस और ना़जी जर्मनी के बीच अनाक्रमण मैत्री-संधि थी। दुनिया के शीर्ष वूâटनीतिज्ञ और जासूस जब यह कल्पना भी नहीं कर सकते थे, उस समय सबसे पहले `ब्लिट़्ज' ने यह सनसनी़खे़ज भविष्यवाणी कर दी थी कि हिटलर ने अपने `पऩजर डिवी़जन' को रूस पर हमला करने की तैयारी करने का आदेश दे दिया है। इसी तरह सबसे पहले `ब्लिट़्ज' ने छापा कि `आ़जाद हिंद ़फौज' (इंडियन नेशनल आर्मी) की स्थापना हो गयी है और उसके कमांडर नेताजी सुभाषचंद्र बोस ने अंडमान द्वीप को ब्रिटिश ़गुलामी से आ़जाद कराके वहाँ तिरंगा झंडा लहरा दिया है।

 विश्वयुद्ध की समाप्ति के बाद नवंबर १९४७ में सबसे पहले `ब्लिट़्ज' ने छापा कि अमरीका-रूस के बीच `शीतयुद्ध' की शुरुआत हो गयी है। पाकिस्तान के निर्माता मोहम्मद अली जिन्ना की कराची में मौत की ़खबर जबकि वहाँ के हुक्मरान ने पाकिस्तान की जनता से छुपाकर रखी थी, `ब्लिट़्ज' ने उसे सबसे पहले छापकर सारी दुनिया के सामने उजागर कर दिया। यह भंडाफोड़ भी सबसे पहले सि़र्पâ `ब्लिट़्ज' ने किया था कि जम्मू-कश्मीर पर कबाइलियों के भेस में घुस आये हमलावर पाकिस्तानी सिपाहियों का तथाकथित पठान कमांडर जनरल तारी़क असल में ओ.एस.एस. (सी.आइ.ए. का पूर्व रूप) का अमेरिकन ब्रिगेडियर रसेल हेट था।

 जब जवाहरलाल नेहरू ने अपने गुरु गाँधीजी तथा खुद के वचन से फिरकर देश का विभाजन मं़जूर कर लिया तो कुपित करंजिया प्रधान मंत्री के द़फ्तर में जा धमके और गुस्से में बोले, छिन्नभिन्न देश में रहने से तो बेहतर होगा कि मैं कहीं बाहर चला जाऊँ! नेहरू ने कहा जाने से पहले कल सुबह नाश्ते पर आओ। नाश्ते पर एक और सज्जन मौजूद थे, वी.के. कृष्ण मेनन। करंजिया का रोष नाश्ते पर भी थम नहीं रहा था। अंत में नेहरू ने कहा, जाते ही हो तो अच्छा जाओ, बाहर से तुम हमारी मजबूरी को बेहतर समझ सकोगे और मेनन ने कुछ देशों की सूची और भारत के गैरसरकारी प्रतिनिधि की हैसियत से विदेश यात्रा-कार्यक्रम और अधिकारपत्र रूसी (रुस्तम खोरशीदजी) करंजिया को थमा दिया। यह था नेहरू की दूरदर्शिता और करंजिया की उपयोगिता का एक ज्वलंत उदाहरण जो बाहरी राष्ट्रों के साथ भारत के भावी संबंधों में महत्वपूर्ण मौ़कों पर अत्यंत सहायक सिद्ध हुआ।

   सन 'साठ के बरसों में देश में जगह-जगह से सैकड़ोेंं टैबलॉयड विभिन्न भाषाओं में `ब्लिट़्ज' की त़र्ज पर छप रहे थे, मगर वे `ब्लिट़्ज' नहीं थे। यह रूसी करंजिया की पत्रकारिता की लोकप्रियता का ही एक पैमाना था कि बड़े अ़खबारों की टक्कर में `ब्लिट़्ज' प्रतिरोध की एक समानांतर पत्रकारिता (काउंटर मीडिया) का नेता और आदर्श बन गया था। वह भारतीयता, धर्मनिरपेक्षता और नारी-सम्मान का प्रबल समर्थक था। यह सब करंजिया के पारसी संस्कारों के कारण था। युद्धकाल में वार-कॉरस्पोंडेट रहे करंजिया और `ब्लिट़्ज' ने बर्तानवी ़फौजी अ़फसरों की अय्याशी के लिए जो शर्मनाक `वीमेंस ऑग़्जीलियरी कोर (इंडिया)' गठित की गयी थी उसको बंद कराने के लिए ़जबर्दस्त मुहिम छेड़ी और तत्कालिक ब्रिटिश शासन को उसे बंद करने पर मजबूर कर दिया था।  
   करंजिया की पत्रकारिता का झुकाव समाजवाद की ओर था और गाँधीजी के शब्दों में समाज के सबसे निचले पायदान पर बैठे व्यक्ति की आवा़ज बनकर सामने आना तथा उसके सरोकारों को सबसे पहले स्वर देना। “प्रâी, प्रैंâक एंड फियरलेस'' (बेलौस, बेबाक और बे़खौ़फ) उसका नीति-वाक्य था। राष्ट्रीय घटनाक्रम हो या अंतरराष्ट्रीय, उसकी भनक रूसी करंजिया को पहले ही लग जाती थी। जनता की नब़्ज की सही पहचान करने की बेमिसाल क्षमता थी करंजिया में, जिसका श्रेय जाता है `ब्लिट़्ज' के सूचनातंत्र को, जो ़जमीनीस्तर से लेकर शीर्ष तक हर जगह मौजूद था। `ब्लिट़्ज' १९४२ के `अंगरे़जो, भारत छोड़ो' आंदोलन में `कांगरेस समाजवादी अंडरग्राउंड' का मुखपत्र बन गया था। जयप्रकाश नारायण, आचार्य नरेंद्रदेव, राममनोहर लोहिया, अरुणा, अशोक मेहता, पटवर्धन-बंधु, मीनू मसानी सभी समाजवादी नेता `ब्लिट़्ज' में `टीपू' छद्म नाम से लिखते और छपते रहे थे।

   `ब्लिट़्ज' के दिल्ली ब्यूरो के प्रमुख मशहरू पत्रकार जी.के. रेड्डी रहे और उनके बाद ए. (अत्ता) राघवन और जोगाराव की जोड़ी; और उस मलयाली कार्टूनिस्ट को `लाँच' करने का श्रेय भी करंजिया और `ब्लिट़्ज' को जाता है जिसका नाम विश्वस्तर पर महानों में शुमार हुआ – आर.के. लक्ष्मण! उस ़जमाने में देश में शासकीय घपलों के पर्दा़फाश का पहला सेहरा भी करंजिया और `ब्लिट़्ज' के सर बँधता रहा, जिनमें `जीप ़खरीदी कांड', `हरिदास मूँधड़ा-जीवन बीमा निगम कांड, `डॉ. तेजा-जयंती शिपिंग कांड', `मोरारजी-पर्मनेंट मैगनेट कांड', जैसे भंडाफोड़ थे जिन्होंने संसद और सरकार को हिला दिया था।

  कृष्णराज ठाकर्सी के व्यापारिक घोटालों का पर्दा़फाश करने पर उच्च न्यायालय ने करंजिया पर तीन लाख रुपये का जुर्माना ठोक दिया था। इसकी प्रतिक्रिया यह हुई कि जुर्माना भरने के लिए अब्बास, संतोष साहनी और बीसियों पाठक अपनी चेकबुवेंâ और चंदा लेकर `ब्लिट़्ज' कार्यालय पहुँच गये, जिसे स्वीकार करने से रूसी ने सधन्यवाद इंकार कर दिया, क्योंकि `ब्लिट़्ज' के स्टा़फ ने अपने बोनस, ग्रेचुइटी, एक माह का वेतन करंजिया के हवाले कर दिया, जो तीन लाख रुपये से कहीं ़ज्यादा होता था। आम पाठकों और ़खासकर वंâपनी के कर्मियों का ऐसा प्यार बिरले ही मालिक को प्राप्त होता है, लेकिन करंजिया ने अपने को कभी मालिक नहीं समझा।

  `ब्लिट़्ज' के निशाने से मीडिया भी नहीं बचा जब करंजिया ने डालमिया-जैन साम्राज्य के आर्थिक घोटालों की विवियन बोस जाँच रिपोर्ट को कई अंकों में छापा। उन्होंने दूसरे मीडिया मसीहा रामनाथ गोयनका की धाँधलियों को भी उजागर किया। करंजिया ने जब राजीव गाँधी के ़िखला़फ `हेरिटेज केसी प्लॉट' को बेऩकाब किया तो मीडिया और संसद दोनों हिल गये थे। न्याय और राष्ट्रहित में आंदोलन, जनजागरण और “स्वूâप'' रूसी करंजिया का जुनून था।

 
रूसी करंजिया की पत्रकारिता के प्रति जुनून
 
करंजिया इस हद तक जुनूनी पत्रकार रहे हैं कि भारत की समाजवाद की ओर प्रवृत्त नीतियों के कट्टर विरोधी सांसद आचार्य कृपालानी को “कृपालूनी'' शीर्षक से – `ब्लिट़्ज' के वकीलों की सलाह के विपरीत – पहले पन्ने पर छापकर संसद की अवमानना करने के दोषी पाये जाने की जो़िखम उठायी और उन्हें संसदीय प्रतारणा झेलनी पड़ी; जबकि वर्षों बाद उसी करंजिया कोे संसद के ऊपरी सदन `राज्यसभा' का सदस्य नियुक्त होने का भी गौरव प्राप्त हुआ। करंजिया की जुनूनी पत्रकारिता का निशाना न्यायपालिका भी बनी जब निचली अदालत ने उन्हें आ़िखरी पन्ने पर कथित “अश्लील चित्र'' (पिन-अप) छापने का दोषी ठहराया, मगर हाइ कोर्ट ने उस निर्णय को उलट दिया था, जिस पर करंजिया ने ऊपरी अदालत के ़पैâसले को आधार बनाकर निचली अदालत के जज की खिल्ली उड़ाते हुए बहुत ही कटु लेख (यह भी वकीलों की सलाह के ़िखला़फ) छाप दिया। इसे हाइ कोर्ट की नागपुर पीठ ने अदालत की अवमानना करार दिया और करंजिया को पंद्रह दिन की ़वैâद की स़जा सुना दी। जब उन्हें ट्रेन से नागपुर जेल ले जाया जा रहा था, बंबई से नागपुर तक हर स्टेशन पर जहाँ गाड़ी रुकती थी, ह़जारों की संख्या में `ब्लिट़्ज' के प्रशंसकों ने करंजिया को हीरो-जैसी विदायी दी और कोई एक ह़फ्ते बाद ही जेल से स़जा काटकर लौटते समय उससे बड़ी संख्या में उनका स्वागत किया। बॉम्बे वी.टी. (अब छत्रपति शवाजी स्टेशन) पर दसियों ह़जार छात्र-युवा-युवतियाँ, शहरी और कामगार और उनके नेतागण, प्रगतिशील मीडिया पूâलमालाएं लेकर पहुँचे और जलूस के साथ करंजिया को ब्लिट़्ज-द़फ्तर लाया गया।
   

केरल के कम्यूनिस्ट नेता गोपालन को एक राजनीतिक हत्या के आरोप में मौत की स़जा हो गयी थी, उन्हें फाँसी के पंâदे से बचाने के लिए `ब्लिट़्ज' ने राष्ट्रव्यापी हस्ताक्षर आंदोलन छेड़ा और गोपालन को बचाने में सफलता प्राप्त की। जम्मू-कश्मीर, जूनागढ़, हैदराबाद और ़खासकर गोआ को भारत में विलय करने की मीडिया-मुहिम की अगुवाई की। करंजिया के जुनून की अनगिनत मिसालें हैं। वह बुनियादी तौर पर एक जागरूक देशभक्त पत्रकार थे।

 `ब्लिट़्ज' के राजनीतिक प्रभाव और आकलन और सक्रिय जुनून की मिसाल बंबई में कोलाबा की सीट से बंबई के `बेताज के बादशाह', वेंâद्रीय मंत्री सादोबा पाटिल के ़िखला़फ समाजवादी म़जदूर नेता जॉर्ज फर्नांडिस को खड़ा करना और जितवा देना भी है, जबकि तथाकथित राष्ट्रीय मीडिया पाटिल का गुणगान और उनकी जीत की भविष्यवाणी कर रहा था, सट्टा लगा रहा था। `ब्लिट़्ज' ने जॉर्ज की जीत का समाचार “जॉइंट किलर जॉर्ज'' की हेडलाइन से छापा था। करंजिया की पत्रकारिता कांगरेस की धर्मनिरपेक्ष-समाजवादी और विकासनीति का समर्थन करती थी तो साथ ही वामपंथ की ़गरीब-म़जदूर हितैषी माँगों की प्रबल समर्थक थी।   

 अंतरराष्ट्रीय मंच पर रूसी करं़जिया नाटोसंधिवाले पश्चिमी पूँजीवादी देशों तथा वारसा संधिवाले सोवियत गुट के देशों की खेमेबंदी से अलग हटकर नेहरू, नासर और टीटो की त्रिमूर्ति के गुट-निरपेक्षता के सिद्धांत का समर्थक था। ़िजयोनि़ज्म (यहूदीवाद) का विरोध, अरब देशों के साथ दोस्ती और विकासशील देशों के निर्गुट संगठन की स्थापना `ब्लिट़्ज' के अंतरराष्ट्रीय दृष्टिकोण के आधार रहे हैं और करंजिया के अरब देशों के साथ संपर्कों का भारत सरकार को ़गैरसरकारी स्तर पर यथेष्ट वूâटनीतिक लाभ भी मिलता रहा है, जैसे बाँग्ला-युद्ध में भारत को शाह ईरान से करंजिया की मित्रता का फायदा पाकिस्तान के ़िखला़फ सक्रिय समर्थन मिलने में हुआ।

 
सिने ब्लिटज़ में  न्यूड तस्वीर
 
रूसी करंजिया ने जब `सिने ाqब्लट्ज' ('७४ में) निकाली तो उसके पहले अंक के मुखपृष्ठ पर एक मॉडल की न्यूड तस्वीर छापी थी।
न्यूड (नंगी, नग्न, नग्नता) के बारे में आम भारतीय धारणा सौंदर्यबोध और वासना में भेद नहीं कर पाती है। '७४ में `सिने ाqब्लट्ज' के पहले अंक के मुखपृष्ठ पर जो ़फोटोग्रा़फ छपा था वह एक फोटो-कलाकृति थी।

  करंजिया `ब्लिट़्ज' के लास्ट पेज पर ख्वाजा अहमद अब्बास के लोकप्रिय कॉलम के साथ एक `पिन-अप' हर ह़फ्ते छापते रहे हैं, जिनमें से कुछ चित्रों पर हो-हल्ला भी मचा है। अब्बास `पिन-अप' छापने के विरोधी रहे हैं। करंजिया का कहना था कि कलात्मक “नग्न (न्यूड) या अर्धनग्न तस्वीर'' पूरे अंक में छप रही बोझिल गद्यात्मक सामग्री से पाठक के दिलो-दिमा़ग को राहत दिलाती और उसके सौंदर्यबोध को विकसित करने का काम करती है।

 करंजिया के खिला़फ ऐसे ही एक पिन-अप पर मु़कद्दमा चला था, जिसे उच्च न्यायालय ने “सौंदर्यबोध'' करार दिया, मगर ऊपरी अदालत के ़पैâसले के अंशों को आधार बनाकर निचली अदालत की खिल्ली उड़ाने पर उन्हें पंद्रह दिन की स़जा हुई, जो करंजिया ने “अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के सेनानी'' की तरह भोगी। `सिने ाqब्लट़्ज' के पहले अंक के पहले पेज पर एक सिने अभिनेत्री की इसी अंक के लिए खींची गयी `निरवस्त्र' तस्वीर के छपने पर बड़ा हंगामा मचा, लेकिन अंततः उस तस्वीर को ़फोटोग्राफर की “कलाकृति'' माना गया। आज अंगरे़जी के सभी अ़खबारों के पेज तीन पर और ़खासतौर पर सिनेमा की पत्रिकाओं में ऐसी तस्वीरें, जिनमें कुछ पूâहड़ भी होती हैं, खुले आम छापी जा रही हैं। चैनल तो उनसे भी आगे निकल गये हैं। ऐसी पत्रकारिता को खजुराहो के मंदिरों के बाहर सुदर्शित कामशास्त्रीय भित्तिमूरतों के समकक्ष नहीं माना जा सकता, विंâतु अगर वे तुलनीय भी हों, तो भी हिंदी ब्लिट़्ज' ने उसे भाषायी पत्रकारिता से बाहर ही रखना बेहतर समझा, क्योंकि खजुराहो-युग और आज के १८वीं सदी से लेकर २१वीं सदी तक के काल-समय में एक साथ जी रहे बहुसंख्य भारतीय समाज के संस्कारों से यह मेल नहीं खातीं।

   जब यह सवाल `हिंदी ब्लिट़्ज' के सामने भी दरपेश हुआ, तो उसने अपने पाठकों के सामने यह सवाल रखा और उनमें विभाजित राय पायी। `हिंदी ब्लिट़्ज' के संपादक मंडल में भी विभाजित मत था, अतः हिंदी में आ़िखरी पेज पर एक सुंदर नारी के मुखचित्र के मनोभावों के अनुवूâल उसे किसी बड़े शायर या कवि के शे'र या कविता के साथ छापना शुरू किया, जिसकी बड़ी तारी़फ हुई और अनेक पाठकों ने तो उनकी कटिंगें जमा करना भी शुरू कर दांr। एक ऐसा ही चित्र एक तत्कालीन नामी फिल्म-हीरो तथा हीरोइन का छपा था और उसके नीचे छापे गये कैप्पशन र हीरोइन ने एतरा़ज जताया था। `ब्लिट़्ज' ने नायिका से तुरंत मा़फी माँग ली थी, मगर साथ में कैप्शन के शे'र का गूढ़अर्थ भी दिया और वह मुतमईन भी हुर्इं।      
 
ब्लिट़्ज का मुंबई की पत्रकारिता में योगदान
 
देश और आम जनता के हित में अ़खबार ने `ब्लिट़्ज नेशनल फोरम' की स्थापना की जिसके मंच से देश के सामने मुँह बाये खड़ी अनेक सामयिक समस्याओं और सरोकारों पर विभिन्न विधाओं के शीर्षस्थ विचारकों को प्रस्तुत किया जाता रहा।

 राष्ट्रीय/अंतरराष्ट्रीय मामलों के साथ-साथ मुंबई की पत्रकारिता में `ब्लिट़्ज' का योगदान महत्वपूर्ण रहा है। मुंबई के छात्रों और शहरियों की समस्याओं को स्वर देने के लिए यहाँ छपनेवाले दैनिक तथा अन्य नियतकालिक प्रकाशनों/ अ़खबारों में `ब्लिट़्ज' पहला साप्ताहिक बना जिसने मुंबई पर वेंâद्रित `बॉम्बे ब्लिट़्ज' नाम से सप्लीमेंट शुरू किये। मुंबई की कुल पत्रकारिता के बीच भाषाई पत्रकारिता में हिंदी, उर्दू और मराठी में `ब्लिट़्ज' प्रकाशन प्रारंभ किये। ब्लिट़्ज-संस्थान अंगरे़जी में मुंबई का प्रथम टैबलॉयड दैनिक अ़खबार `द डेली' लेकर आया। सिनेमा के क्षेत्र में `सिने ब्लिट़्ज' का प्रकाशन प्रारंभ किया, तो उसने अपने पहले ही अंक से हंगामा मचा दिया। उस अंक की प्रतियाँ `ब्लैक' में बिकीं!

 जब समानांतर पत्रकारिता के रूप में स्थापित हो चुके अंगरे़जी `ब्लिट़्ज' परिवार में हिंदी `ब्लिट़्ज' का शुमार हुआ तो यह हिंदी भाषा और भाषायी अभिव्यक्ति में परिवर्तनकारी योगदान करनेवाला साबित हुआ। हिंदी `ब्लिट़्ज' की “सरल, सुबोध और सही'' हिंदी ने उस समय के लगभग सभी हिंदी अ़खबारों और पत्र-पत्रिकाओं की “क्लिष्ट भाषा और उलझी हुई शैली'' को प्रभावित किया। हिंदी `ब्लिट़्ज' अंगरे़जी के अनूदित संस्करण की चाहरदीवारी तक सिमटा हुआ नहीं रहा। हिंदी में अपना एक स्वतंत्र व्यक्तित्व गढ़ने की ताब हिंदी संस्करण के प्रथम संपादक मुनीश नारायण सक्सेना और नंदकिशोर नौटियाल जैसी पत्रकार टीम की वजह से पैदा हुई, जिसका श्रेय रूसी करंजिया को भी देना होगा, क्योंकि उन्होंने हिंदी `ब्लिट़्ज' को पूर्ण संपादकीय स्वतंत्रता दे रखी थी।

इसी आ़जादी की वजह से हिंदी की अपनी अलग रिपोर्टिंग और अलग स्तंभ शुरू हुए। ़ख्वाजा अहमद अब्बास अंगरे़जी का `लास्ट पेज' लिखते थे, तो हिंदी में अंतिम पृष्ठ `आ़जाद ़कलम' के नाम से छपता था, जो बाद में उर्दू `ब्लिट़्ज' निकलने पर उसमें भी छपता रहा, लेकिन `आ़जाद ़कलम' अंगरे़जी के `लास्ट पेज' का अनुवाद कभी नहीं रहा। अब्बास साहब के देहांत के बाद अंगरे़जी का लास्ट पेज मशहूर पत्रकार पी. साईनाथ लिखने लगे। असल में खुद अब्बास साहब ने यह पेज साईनाथ को करंजिया को लिखे पत्र में एक तरह से वसीयत किया था।

हिंदी में यह स्तंभ मुंबई के जानेमाने कवि-साहित्यकार और लोकप्रिय नेता डॉ. राममनोहर त्रिपाठी लिखते रहे। हिंदी में ़िफल्म-नाटक और मनोरंजन स्तंभ `रँगारंग' उमेश माथुर करते थे तो `नयी गुलिस्ताँ' वैâ़फी आ़जमी रचते थे। हिंदी की ़िजले-़िजले में, यहाँ तक कि तालुका स्तर तक एक अलग ही टीम खड़ी हो गयी थी, जिसने ब्लिट़्ज-संस्थान की शक्ति कई गुना ब़ढ़ा दी थी। `ब्लिट़्ज' शुरू से ही प्रगतिशील, जुझारू और भंडाफोड़ करनेवाला अ़खबार था। जहाँं `ब्लिट़्ज' ने इंदिरा गाँंधी को `गरीबी हटाओ' कार्यक्रम में प्रबल समर्थन दिया वहीं आपातकाल की ़ज्यादतियों के खिला़फ इंदिरा गांधी के इर्दगिर्द जमा “चंडाल चौकड़ी'' (गैंग ऑफ फोर) का ़जबर्दस्त भंडाफोड़ भी किया। `ब्लिट़्ज' की दृष्टि और नीति का मापदंड एक ही होता था कि आम आदमी का हित किस बात से सधेगा और कौन-सी बात आम आदमी के हितों के विपरीत जायेगी।

 नंदकिशोर नौटियाल के संपादन में हिंदी `ब्लिट़्ज' को आम जनता और युवा-वर्ग ने इस हद तक अपना मददगार मान लिया था कि आपातकाल में जयपुर विश्वविद्यालय के छात्रों ने “नौटियाल ब्रिगेड'' की स्थापना कर डाली थी और वाइस चांसलर के ़िखला़फ अपनी माँगों को लेकर मुहिम छेड़ दी थी। नतीजा यह हुआ कि विद्वान वाइस चांसलर पं. गोबिंद चंद्र पाँडेजी ने संपादक नौटियाल को जयपुर आमंत्रित किया और छात्र संघर्ष को सुलझवाया। इसी प्रकार हिंदी `ब्लिट़्ज' में छपी एक रिपोर्ट को साक्ष्य मानते हुए अदालत ने सागर विश्वविद्यालय के छात्रों को एक आपराधिक मामले में बरी कर दिया था। जनहित की इस नीति पर चलते हुए हिंदी `ब्लिट़्ज' की प्रसार संख्या साढ़े तीन लाख प्रतियाँ हर ह़फ्ते तक पहँुच गयी थींr और यह रिकार्ड  नौटियाल के संपादकत्व में (१९७३ के बाद) स्थापित हुआ था। `ब्लिट़्ज' अकेला अ़खबार था जो अपने मुखपृष्ठ पर छापता था “अपना ब्लिट़्ज मिलबाँट कर पढ़ें!''
 
ब्लिट्ज़ अन्याय विरोधी समानांतर पत्र
 
`ब्लिट़्ज' को सत्ताविरोधी कहना ठीक नहीं रहेगा। वह बुराई के प्रतिरोध का अ़खबार था, बुराई पक्ष-विपक्ष जिस भी दिशा में हो, वह सत्ता के अंध-विरोधी नहीं था। वह अन्याय विरोधी समानांतर पत्र था। वह प्रतिक्रियावाद के ़िखला़फ प्रगतिशीलता का पक्षधर अ़खबार था। संक्षेप में `ब्लिट़्ज' प्रगतिशील और जुझारू अ़खबार था। वह विकास और आधुनिकता का समर्थक, पीछे की ओेर नहीं आगे की ओर देखनेवाला अ़खबार था। `ब्लिट़्ज' ने भाखड़ा-नंगल, नये विज्ञानवेंâद्रों, निजी और सार्वजनिक उद्यमों की स्थापना जैसे “भारत के नये मंदिरों'' का, ़जमींदारी-विनाश, प्रीवी पर्सों का ़खात्मा और बैंकों के राष्ट्रीयकरण आदि कार्यों का पुऱजोर समर्थन किया। राष्ट्रीय विकास के लिए “नदियों की माला'' तथा “भूमि सेना'' बनाने का करंजिया और `ब्लिट़्ज' अंत तक ़जबर्दस्त पैरवी करता रहा, जो इस देश के “जल'' और “जन'' संसाधन को ़जाया जाने से बचाने और देश को आर्थिक रूप से शक्तिशाली बनाने का अचूक मंत्र साबित हो सकता था। करंजिया के अरब  देशों के साथ संपर्कों का भारत सरकार को गैरसरकारी स्तर पर यथेष्ट वूâटनीतिक लाभ भी मिलता रहा है, जैसे बाँग्ला-युद्ध के दौरान भारत को शाह ईरान से करंजिया की मित्रता का ़फायदा पाकिस्तान के ़िखला़फ खुला समर्थन मिलने में पहुँचा। 
  
ब्लिट़्ज : पीत पत्रकारिता या खोजी पत्रकारिता
 
   `ब्लिट़्ज' पर कीचड़ उछालनेवालों को मुँहतोड़ जवाब देते हुए खुद करंजिया ने लिखा था, “ब्लिट़्ज को तमाम नकारात्मक रंगों में रँगा जा रहा है, यानी पीले, लाल, काले वगैरह; लीजिये हमने उनके जवाब में अपने अ़खबार को उन तमाम रंगों में प्रस्तुत करते हुए एक होर्डिंग लगा दी है और उस पर लिख दिया है: `जी हाँ, लोग हमें पढ़ते हैं !' अगर यह पूछना चाहते हैं कि हमारी समझ का दार्शनिक आधार क्या है, तो वह था, है और हमेशा रहेगा – नेहरूवाद – अर्थात लोकतांत्रिक, धर्मनिरपेक्ष, ़गरीबहितैषी, तटस्थता और दृढ़ता के साथ साम्राज्य-विरोध।''
   संक्षेप में `ब्लिट़्ज' प्रगतिशीलता और समानता के सरोकारों का जुझारू अ़खबार था। किसी भी अन्य समकालीन भारतीय पत्रकार का देशहित में, राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत के हित में करंजिया जितना योगदान शायद ही गिनाया जा सके; जिसे तथाकथित राष्ट्रीय मीडिया ने हिकारत के साथ “पीत पत्रकार'' कहकर भारत के पत्रकारिता के इतिहास से उसके सकारात्मक रोल के बावजूद `ब्लैक आउट' कर रखा है। `ब्लिट़्ज' की सनसनी़खे़ज भंडाफोड़ पत्रकारिता से जहाँ उल्टे-सीधे काम करनेवाले अ़फसर-नेता-पूँजीपति ़खौ़फ खाते थे, वहीं सेठसेक्टर और उनके पत्रकार घृणा के साथ उसे पीत पत्रकारिता (येलो जरनैलि़ज्म) कहा करते थे। उसका गला घोंटने में कोई कसर उठा नहीं रखते थे।

आज लगभग सभी मीडियावाले “स्वूâप'' के नाम पर एक अजीब दैह्यात्मिक/ऐंद्रिक आनंद का आभास करते हैं, जबकि  `ब्लिट़्ज' के “भंडाफोड़'' से होनेवाली आर्थिक धाँधलियों और सामाजिक दुराचारों के – जो आज विकराल रूप धारण कर चुके हैं – पर्दा़फाश पर करंजिया को पानी पी-पीकर कोसते रहते थे!  
 
हवा का रु़ख
 
सन १९९१-९२ के वर्ष की बात है करंजिया ने अपने वरिष्ठ संपादकीय सहयोगियों की बैठक बुलायी। `ब्लिट़्ज' में रूसी करंजिया नीतिगत निर्णय बैठक बुलाकर उनकी राय सुनने के बाद ही लिया करते थे। उन्होंने कहा कि मेरा आकलन है कि अब वेंâद्र में भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) सत्ता में पहुँचनेवाली है, इसलिए हमें उसका समर्थन करना चाहिये। आज के मशहूर जुझारू पत्रकार पी. साईनाथ ने इसके विपरीत तर्वâ दिये। होमी मिस्त्री, अल्मीडा, द' डेली के संपादक नायर, सभी की ऩजर में भाजपा अभी सत्ता से बहुत दूर थी। हिंदी के संपादक नौटियाल का कहना था कि भले भाजपा सत्ता के ़करीब पहुँच रही हो मगर हमें उसका विरोध करना चाहिये और उर्दू के संपादक हारून रशीद ने उनकी ताईद की थी। सबकी राय सुनने के बाद करंजिया ने भाजपा-समर्थन की नीति मं़जूर कर ली। क्या यह करंजिया का अवसरवाद था? नहीं। वह हवा के रु़ख भाँपने और उसके साथ चलनेवाला पत्रकार था और हवा कांगरेस के ़िखलाफ बहना शुरू हो गयी थी।

 (क्रमशः, हिंदी `ब्लिट़्ज', उर्दू `ब्लिट़्ज')

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गुलामी से मुक्त होना है तो दसवीं तक मातृभाषा में शिक्षा अनिवार्य करें

मानव संसाधन मंत्रालय ने सुझाव मांगे हैं कि उसकी भाषा-नीति क्या हो? मेरा सबसे पहला सुझाव यह है कि इस मंत्रालय का नाम बदलिए। इस मंत्रालय का नाम शिक्षा मंत्रालय से बदलकर मानव-संसाधन मंत्रालय किसने रखा था? क्या आपको कुछ याद पड़ता है? यह नाम बदला था, राजीव गांधी की सरकार ने! बेचारे राजीव से यह आशा करना कि वे इस फर्क को समझ पाए होंगे, यह उनके साथ ज्यादती ही होगी। वे खुद सिर्फ मैट्रिक पास थे और उन्होंने हमारे एक साथी पत्रकार को दी भेंट-वार्ता में खुद स्वीकार किया था कि मेट्रिक पास करने के बाद उन्होंने एक भी किताब कभी नहीं पढ़ी थी।

इस मत्रांलय का नाम भ्रष्ट करके इसका पहला मंत्री किसे बनाया गया था? पीवी नरसिंहराव को, जो सबसे ज्यादा पढ़े-लिखे मंत्री थे। जब उनसे पूछा कि आप इसका विरोध क्यों नहीं करते तो उन्होंने कहा यह हमारी (कांग्रेसी) संस्कृति के खिलाफ है। मनुष्य को साधन बनाने वाला मत्रांलय भारतीय तो हो ही नहीं सकता। भारत में तो मनुष्य साध्य है, साधन नहीं। नरेंद्र मोदी तो राष्ट्रवाद का झंडा उठाए हुए हैं। अगर वे इसका नाम बदलकर शिक्षा मंत्रालय नहीं रखेंगे तो कौन रखेगा? सिर्फ नाम बदलने से भारत की शिक्षा-नीति पटरी पर नहीं आएगी। उसके लिए जरुरी है कि नीति भी बदली जाए। भाषा-नीति सबसे पहले बदलें।

देश के सभी बच्चों को मातृभाषा 10 वीं कक्षा तक अनिवार्य रुप से पढ़ाई जाए। सभी विषयों की पढ़ाई का माध्यम भी मातृभाषाएं ही हों। जो स्कूल विदेशी भाषा के माध्यम से पढ़ाएं, उनकी मान्यता समाप्त की जाए और उन्हें कठोर सजा दी जाए। 10 वीं कक्षा तक देश के सभी बच्चों को राष्ट्रभाषा (हिंदी) भी अनिवार्य रुप से पढ़ाई जाए। जिनकी मातृभाषा हिंदी है, उन बच्चों को कोई भी एक अन्य भारतीय भाषा भी अनिवार्य रुप से पढ़ाई जाए। 10 वीं कक्षा तक किसी भी बच्चे पर कोई भी विदेशी भाषा थोपी नहीं जाए। यह हुआ द्विभाषा-सूत्र!

अब आता है, त्रिभाषा-सूत्र! 10 वीं के बाद छात्र-छात्राओं को विदेशी भाषाओं के पढ़ने की छूट होनी चाहिए। वे अपनी इच्छा से जो भी भाषा पढ़ना चाहें, पढ़ें। चीनी, रुसी, अंग्रेजी, जर्मन, फ्रांसीसी, हिस्पानी, जापानी आदि। कोई एक विदेशी भाषा को एक विषय के तौर पर पढ़ें। उसका पढ़ना भी अनिवार्य कतई नहीं होना चाहिए। जिसको जिस देश से व्यवहार करना हो, वह उसकी भाषा पढ़े। कोई एक विदेशी भाषा सभी छात्रों पर क्यों लादी जाए?

यह तभी संभव है जबकि भारत के राज-काज और घर-द्वार-बाजार से अंग्रेजी हटे। यदि इन स्थानों पर से आप अंग्रेजी नहीं हटाएंगे तो शिक्षा में वह लदी रहेगी, जैसे कि वह पिछले 68 साल से लदी हुई है। और तब शिक्षा मंत्रालय मानव संसाधन मंत्रालय ही बना रहेगा।

(ये लेखक के निजी विचार हैं)

साभार- नया इंडिया

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फेसबुक पर नया फीचर

सभी माता-पिता के लिए खुशखबरी है। अब आप अपने जान से भी प्यारे बच्चों या फिर 13 साल से कम उम्र के बच्चों की तस्वीरें फेसबुक के नए फीचर 'स्‍क्रैपबुक' की मदद से एक साथ एक ही जगह अपलोड कर सकते हैं।
 
13 साल से नीचे की उम्र के बच्चे फेसबुक में साइन-अप नहीं कर सकते है, इसलिए उन्हें टैग भी नहीं किया जा सकता, लेकिन फेसबुक ने इस परेशानी को समझा और मंगलवार को स्क्रैपबुक के रूप में एक नए फीचर की जानकारी दी, जो आईओएस, एंड्रायड और डेस्कटॉप के साथ प्राइवेट एल्बम के रूप में या फिर आपके निजी फेसबुक दोस्तों के साथ शेयर की जा सकती है।
 
फेसबुक ने बताया कि स्क्रैपबुक पैरेंट्स को 13 साल से नीचे के बच्चों की तस्वीरें इकट्ठा कर एक केन्द्रीय स्थान पर आर्गेनाइज करने की अनुमति देती है, इसमें आप अपने बच्चों के लिए एक खास टैग बना सकते हैं।
 
केवल जो पैरेंट्स फेसबुक के रिलेशनशिप सेक्शन से जुड़े होगें, बस वही फोटोज डाल सकते हैं या प्राइवेसी सेटिंग चेंज कर सकते हैं। दरअसल जब भी कोई अपने नवजात बच्चों की तस्वीरें फेसबुक पर अपलोड करता है, तो वो सब तरफ बिखर जाती है। उनके लिए एक अलग से एल्बम की खास जरुरत महसूस हो रही थी।
 
फेसबुक ऐसा तरीका निकालने की पूरी कोशिश कर रह है जिससे स्क्रैपबुक एक पूरे प्रोफाइल में बदल जाए। अधिकारी ने बताया कि हर कोई जो फेसबुक पर है, उसे खुद अपनी पहचान पर नियंत्रण रखना चाहिए।
 
वो चाहे तो स्क्रैपबुक को नि‍जी रख सकते हैं। यदि वे इसे हटाना चाहते हैं, तो हटा सकते हैं या चाहे तो और पब्लिक का ऑप्‍शन चुन सकते हैं। यानि पूरी तरह इस स्क्रैपबुक पर आपका खुद का नियंत्रण होगा।

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डिस्कवरी पर टॉरनेडो की खौफनाक कहानियाँ

डिस्कवरी साइंस अतीत में आए कुछ ऐसे टॉरनेडो की सबसे खतरनाक और हैरतअंगेज कहानियों को उजागर करेगा, जिसने लोगों की जिंदगियों पर बहुत बुरा असर डाला है। इस शो का नाम है ‘टॉरनेडो एलि’ और यह कार्यक्रम 30 मार्च से, सोमवार से शुक्रवार रात 10 बजे शुरू कर दिया गया है।

इस शो में जिंदगी को बदलने वाली आपदाओं के किस्से दिखाए जाएंगे, जिन्हें देखकर दर्शक हैरत में पड़ जाएंगे, क्योंकि हर साल पूरी दुनिया में दो हजार से ज्यादा टॉरनेडो आते हैं, इनमें से औसतन एक हजार से ज्यादा टॉरनेडो सिर्फ अमरीका पर हमला करते हैं। ये पलक झपकते ही ये घरों को उनकी नींव से उखाड़ देते हैं, चुटकी बजाते ही ये शहरों का सफाया कर देते हैं, ये ट्विस्टर जितने अप्रत्याशित हैं उतने ही खतरनाक भी होते हैं।

दर्शक इन विपदाओं की कैमरा और ऑडियो रिकॉर्डिंग देखने-सुनने के अलावा उन लोगों के इंटरव्यू भी देखेंगे जिन्होंने खुद इनका सामना किया। चाहे आरंभिक चेतावनियां हों या टॉरनेडो आने के बाद उसके विनाशकारी प्रभाव, जो लोग जिंदा बचे उन्होंने इन प्राकृतिक विपदाओं के हर डरावने पल को कैद किया।

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