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वाजपेयी के नाती की हत्या के आरोपी भी छूट गए

पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के नाती के हत्यारोपी को कोर्ट ने बरी कर दिया है। लगभग 11 साल पुराने मामले में मनीष मिश्रा को चलती ट्रेन से फेंक दिया गया था, जिसके चलते उनकी मौत हो गई। मनीष, अटल बिहारी वाजपेयी की बहन विमला मिश्रा के नाती हैं।
 
टाइम्स ऑफ इंडिया की रिपोर्ट के मुताबिक वारदात के दिन मनीष ने ट्रेन में लड़कियों से हो रही छेड़छाड़ को रोकने की कोशिश की थी। मनीष के मामले में सभी 34 चश्मदीद अपने पुराने बयानों से मुकर गए। इसलिए अपर सत्र न्यायधीश-9 रमेश चंद्र दिवाकर आरोपी रामजी वर्मा को संदेह का लाभ देते हुए बरी कर दिया।
 
अभियोजन पक्ष की ओर से मामले की पैरवी कर रहे सहायक शासकीय अधिवक्ता रविंद्र कुमार ने बताया उन्होंने 6 चश्मदीद गवाह और 28 पुलिस व अन्य गवाहों को न्यायालय में पेश किया था। गवाहों के मुकरने के चलते आरोपी को लाभ मिल गया मामले में अभियोजन पक्ष ने आदेश के अध्ययन के उच्च न्यायालय में अपील की बात कही है।
 
मनीष के मामले में अदालत का फैसला चौंकाने वाला माना जा रहा है। ये मुकदमा 11 सालों से चल रहा था, जिसमें मनीष के माता-पिता और दादी विमला मिश्रा अधिकांश रिश्तेदारों की मौत हो गई।
 
घटनाक्रम के मुताबिक, 24 जनवरी 2004 को मनीष मिश्रा अपने दोस्त राकेश के साथ मथुरा से कोसी छत्तीसगढ़ एक्सप्रेस से जा रहे थे। वृंदावन रोड और छाता के बीच ट्रेन में उनका कुछ लोगों से झगड़ा हो गया था। उस समय की रिपोर्ट्स के मुताबिक, वे लोग शराब पिए हुए थे और लड़कियों को छेड़ रहे थे। मनीष ने उनका विरोध किय तो, उनमें से कुछ लोगों ने उनके और राकेश के साथ मारपीट कर दी। उन्होंने मनीष को चलती ट्रेन से धक्का दे दिया, जिसके चलते उनकी मृत्यु हो गई।
 
मारपीट में दोस्त राकेश घायल हो गए थे। मामले में 8 फरवरी को बिलासपुर जीआरपी ने गजा पाइसा निवासी रामजी वर्मा को मनीष की हत्या के आरोप में गिरफ्तार किया और उसे मथुरा जीआरपी के हवाले कर दिया। आरोपी कोरबा छत्तीसगढ़ में काम करता है।

संघ के मंच पर आएँगे अजीम प्रेमजी और सुभाष घई

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के प्रमुख मोहन भागवत ने पिछले दिनों अपने बयान में मदर टरेसा के सेवा कार्यों को धर्मांतरण से जोड़ने की कोशिश की थी। इस बयान से इतर अपने सेवा कार्यों को समाज के सामने रखने के लिए संघ का आज से तीन दिनों का राष्ट्रीय सेवा संगम शुरू हो रहा है। दिल्ली के बाहरी इलाके में हो रहे इस कार्यक्रम में 800 से ज्यादा एनजीओ शामिल हो रहें हैं। इनमें से ज्यादातर संघ से जुड़े हुए हैं। खास बात यह है कि इसके उद्घाटन सत्र में देश के दिग्गज उद्योगपति अजीम प्रेमजी और जीएम राव के अलावा फिल्म निर्माता सुभाष घई के भी मुख्य अतिथि के तौर पर आने की संभावना है। 

इस कार्यक्रम के जरिए संघ अपना और हिन्दू संगठनों के सेवा कार्यों को समाज के सामने रखते हुए यह जताने की कोशिश करेगा कि भारत में सामाजिक कार्य विदेशी मिशनरियों की देन नहीं है बल्कि दूसरे संगठन भी इस क्षेत्र में बिना किसी लोभ के काफी अच्छा काम कर रहे हैं। कार्यक्रम की अध्यक्षता आध्यात्मिक गुरु माता अमृतानंदमयी और संघ प्रमुख मोहन भागवत करेंगे। संघ इस तरह का आयोजन चार साल बाद कर रहा है और इस बार यह कितने बड़े स्तर पर किया जा रहा है इसका अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि 836 संगठनों से जुड़े चार हजार प्रतिनिधि इसमें भाग ले रहे हैं। 

संघ के सह-सेवा प्रमुख अजीत प्रसाद महापात्रा ने कहा, 'यह कार्यक्रम यह संदेश देने के लिए किया जा रहा है कि समाज के लिए सेवा की भावना इस देश में शुरू से है। मिशनरियां क्या कर रही हैं, उससे हमें मतलब नहीं है। हम सेवा का काम हर भारतीय को स्वाभिमान के साथ आत्मनिर्भर बनाने के लिए कर रहे हैं।' तीन दिनों के इस आयोजन में संघ अपने स्वयंसेवक द्वारा स्वच्छ भारत, कश्मीर बाढ़ में किए राहत कार्यों और गायों के संरक्षण के लिए किए गए कामों को पेश कर सकता है। महापात्रा ने कहा कि सेवा का काम हम कर्तव्य मानकर करते हैं न कि किसी के प्रति दया का भाव रखकर। 

संघ गायों के संरक्षण पर बहुत जोर दे रहा है और इस कार्यक्रम के जरिए भी यह संदेश देने की कोशिश की जाएगी। महापात्रा ने कहा, 'हम अपने स्वयंसेवकों से अपील करेंगे कि किसानों और ग्रामीण के पास जाएं और उन्हें समझाएं कि अपनी बूढ़ी गायों को न बेचें। गाय जब दूध देना बंद कर देती है तो उसका इस्तेमाल यूरिन और गोबर के लिए किया जा सकता है, जिनकी अच्छी कीमत मिलती हैं। लोग यह बात नहीं जानते हैं और कसाइयों के चक्कर में फंस जाते हैं।' शनिवार को संघ के नेता प्रतिनिधियों को एकजुट होकर समाज का काम करने के महत्व के बारे में बताएंगे। 

संघ के संगठन सेवा भारती के उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड क्षेत्र के प्रमुख सतीश अग्रवाल इसे समझाते हुए बताते हैं, 'हजार से भी ज्यादा संगठन गायों को बचाने के लिए काम कर रहे हैं। लेकिन, क्या सब जानते हैं कि हमें देशी नस्ल की गायों को बचाने पर जोर देना है? हम एक-दूसरे के अनुभवों से सीखते हैं और इसलिए यह जरूरी हो जाता है कि मिलकर काम करें।' अग्रवाल कहते हैं कि लोग मिशनरियों के किए गए कामों का जिक्र बहुत उत्साह से करते हैं, संघ दशकों से सेवा कार्य कर रहा है लेकिन कभी इसका प्रचार नहीं किया। उन्होंने कहा कि संघ बिना हल्ला मचाए समाज के सबसे निचले तबके के लिए काम करने में विश्वास रखता है। 

राष्ट्रीय सेवा संगम में हॉस्पिटल, स्कूल, सांस्कृतिक केंद्र, वृद्धाश्रम, ब्लड बैंक, योग केंद्र, अनाथ आश्रम और कुष्ठ रोगियों के लिए केंद्र चलाने वाले एनजीओ भाग ले रहे हैं। संघ के सूत्रों ने बताया कि अपनी ताकत दिखाने के लिए संगठन अपने से जुड़े एनजीओ की नेटवर्किंग पर भी काम शुरू कर दिया है। उसके 400 में से 96 एनजीओ को एक-दूसरे से लिंक किया जा चुका है। 

साभार- इकॉनामिक टाईम्स से 

पायलट अच्छी हिन्दी बोलेंगे तो ईनाम मिलेगा

सरकारी विमानन कंपनी एयर इंडिया अपने पायलटों को हिंदी बोलने के लिए प्रेरित कर रही है। कंपनी ने पायलटों से कहा है कि उड़ान के दौरान अच्छी हिंदी में घोषणा करने पर उन्हें ईनाम दिया जाएगा।
 
एयर इंडिया और उड्डयन मंत्रालय के अधिकारियों के बीच हुई मिटिंग के मिनट्स को उद्धृत एक नोट के मुताबिक, पायलट या तो अंग्रेजी में घोषणा करते हैं या बिल्कुल नहीं करते। इसमें कहा गया है, 'हमें हिंदी में घोषणा करने के लिए स्वतः प्रेरित होना है। जो पायलट हिंदी में अच्छी उद्घोषणा करते हैं उन्हें इनाम दिया जाएगा।' हिंदी में ही उद्घोषणा  हो, यह तय करने के लिए एयर इंडिया ने दो फैसले किए। पहला कि पायलटों द्वारा की गई उद्घोषणा का ब्यौरा  फ्लाइट की रिपोर्टों में रिकॉर्ड किया जाना चाहिए और दूसरा यह कि फीडबैक फॉर्म के जरिए इन उद्घोषणाओं पर यात्रियों की राय ली जाए।

आरएसएस लोगों में छाएगा मोबाईल एप्स के जरिए

खाकी हाफ पैंट। हाथ में लाठी और सिर पर काली टोपी। यह सब अब तक राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के स्वयं सेवकों की पहचान रहा है। लेकिन परंपरागत पहचान से इतर आरएसएस तेजी से स्मार्ट होता जा रहा है।

शाखा में अब स्वयंसेवकों को शारीरिक कवायद के साथ-साथ मोबाइल एप्स की भी जानकारी दी जाती है। आरएसएस ने आधा दर्जन से अधिक मोबाइल एप्स लांच कर तेजी से लोगों तक पहुंच बनाने की कोशिश की है। इसमें आरएसएस मोबाइल, श्री गुरुजी, अमृत वचन, स्मरणीयम्‌, वंदना, प्रेरणा सुमन, अर्चना आदि प्रमुख हैं।

दरअसल, स्मार्ट फोन ने सूचना तकनीक के क्षेत्र में क्रांति ला दी है। इसको माध्यम बनाकर आरएसएस युवा वर्ग में मजबूत पकड़ बनाने और उन्हें राष्ट्रवाद की घुट्टी पिलाने के लिए मोबाइल एप्स का सहारा ले रहा है।

आरएसएस 2014 के लोकसभा चुनाव में देखा चुका है कि संचार तकनीक के जमाने में सोशल साइट की कितनी ताकत है? आरएसएस द्वारा लांच मोबाइल एप्स में शामिल प्रेरणा सुमन में देश के महान विभूतियों के जीवन का वर्णन हैं। इसमें आरएसएस के संस्थापक डॉ. केशवराव बलिराम हेडगेवार से लेकर संघ के तमाम सर संघ चालकों की बाबत पूरी जानकारी है।

इसके साथ-साथ देश के स्वतंत्रता सेनानियों और महापुरुषों की भी जीवनी दी गई है। श्री गुरुजी, संघ के द्वितीय सरसंघ चालक माधव सदाशिव राव गोलवलकर का जीवन प्रसंग है। इसी तरह आरएसएस मोबाइल, शाखाओं की लोकेशन बताता है। अमृत वचन हिंदुत्व की अवधारणा से भरा पड़ा है तो वंदना में मंत्र और उनका हिंदी अनुवाद है।

स्मरणीयम्‌ में दोहा, श्लोक आदि हैं, जबकि अर्चना में शाखा गीतों की श्रृखंला है। एप्स लांच होने के बाद युवाओं में काफी लोकप्रिय हुआ है। संघ के स्वयंसेवक एंड्रायड फोन पर डाउनलोड कर एप्स से लाभान्वित हो रहे हैं।

साभार- http://naidunia.jagran.com/ से 

रेल्वे को हर साल दस हजार करोड़ का चूना लगता है

सरकार की अँधी गलियों में ऐसे कई गलियारें हैं जहाँ करोड़ो के वारे न्यारे हो जाते हैं और किसी को कानों कान खबर तक नहीं होती, लेकिन अगर मंत्री ईमानदार हो तो ऐसे कई अंधेरे गलियारों की तह तक जाकर उसकी सच्चाई का पता लगाया जा सकता है।
 
दूरदृष्टा, ईमानदार, संकल्पवान और राजनीतिक शोशेबाजी से दूर रेल मंत्री सुरेश प्रभु ने देश की रेल को पटरी पर लाने के लिए जो प्रयोग शुरु किए उसके नतीजे सामने आने लगे हैं। श्री सुरेश प्रभु ने रेल मंत्री बनते ही लाखों-करोड़ों के टेंडर, खरीदी से अपने आपको दूर कर, मेट्रो मैन ई श्रीधरन के नेतृत्व में एक कमेटी बनाकर उन गुप्त तहखानों का पता लगाने का काम सौंपा, जिनके माध्यम से आम रेल यात्री के खून पसीने की कमाई का पैसा ऊपर तक बैठे अधिकारी हजम कर रहे थे।
 
इकानॉमिक टाईम्स में जोसी जोसफ की ये रिपोर्ट इसी सच्चाई का खुलासा करती है।
 
 
मेट्रो मैन के नाम से मशहूर ई श्रीधरन ने कहा है कि भारतीय रेलवे को सामानों की खरीदारी में हर साल कम से कम 10 हजार करोड़ रुपए का चूना लग रहा है । श्रीधरन की रिपोर्ट में कहा गया है कि खरीद अधिकारों को विकेंद्रित करने यानी निचले स्तर तक देने से इस लूट को रोका जा सकता है।
 
श्रीधरन ने रेलवे के जनरल मैनेजर्स को वित्तीय अधिकार देने और अधिकारों के विकेंद्रीकरण संबंधी अपनी फाइनल रिपोर्ट में कहा है कि इस समय खरीद अधिकार सीमित होने से रेलवे का बहुत ज्यादा पैसा महज कुछ हाथों में है। इससे भ्रष्टाचार को बढ़ावा मिलता है।
 
 
 
श्रीधरन की अध्यक्षता वाली इस कमिटी ने अपनी रिपोर्ट में रेलवे के कई वरिष्ठ अधिकारियों की भी राय ली है। मौजूदा खरीद प्रक्रिया का विश्लेषण कर कमिटी इस नतीजे पर पहुंची है कि जवाबदेही तय करने और अधिकारों को विकेंद्रित करने से रेलवे की सालाना आय में भारी अंतर आ जाएगा। इससे हर साल सामान की खरीद में करीब 5 हजार करोड़ रुपए और कामों के ठेके देने में भी इतने ही रुपयों की बचत होगी।
 
कमिटी ने अपनी फाइनल रिपोर्ट 15 मार्च को दाखिल की थी। इसमें कहा गया है कि बोर्ड को कोई भी वित्तीय फैसले नहीं लेने चाहिए। खुद अपनी जरूरत के सामान की खरीदारी भी उत्तरी रेलवे से करानी चाहिए। ये अधिकार जनरल मैनेजर और निचले स्तर के अधिकारियों को दिए जाने की भी सिफारिश की गई है।
 
आपको बता दें कि रेलवे देश में सबसे ज्यादा खरीदारी करने वाली दूसरी सबसे बड़ी एजेंसी है। इससे ज्यादा की खरीदारी सिर्फ डिफेंस के सामान की होती है। रेलवे हर साल खरीदारी पर करीब 1 लाख करोड़ रुपए खर्च करती है, जिसमें से करीब आधी रकम से रेलवे बोर्ड खरीदारी करता है।
 
पिछले साल नवंबर में श्रीधरन के प्रारंभिक रिपोर्ट देने के बाद से ही रेलवे ने अधिकारों के विकेंद्रीकरण का काम शुरू कर दिया है। अब श्रीधरन कमिटी ने कहा है कि रेलवे बोर्ड का गठन रेलवे की नीतियां, योजनाएं, नियम और सिद्धांतों को बनाने, इनकी जांच करने और रेलवे को दिशानिर्देश देने को हुआ था, लेकिन आज बोर्ड इनमें से कोई भी काम नहीं कर रहा है।
 
कमिटी ने विस्तार से विश्लेषण के लिए डीजल, कंक्रीट स्लीपर्स, 53-s सीमेंट जैसे सामनों की खरीद प्रक्रिया का भी अध्धयन किया। उनके मुताबिक, रेलवे देश में सबसे ज्यादा डीजल की खरीद करता है और पिछले 15 महीनों से इसका नया ठेका ही फाइनल नहीं हुआ है। कई चीजों के ठेके तो दशकों से फाइनल नहीं हुए हैं।
 
रिपोर्ट के मुताबिक, हालात इतने खराब हो गए हैं कि रेलवे के कामकाज की इस व्यवस्था को अच्छे से झकझोरने की जरूरत है, जिससे प्रभावी और बेहतर बिजनस के फैसले लिए जा सकें। इसमें कहा गया है कि बोर्ड को फील्ड में मौजूद अपने शीर्ष अधिकारियों यानी जनरल मैनेजर्स की बिजनस की क्षमता पर ही शक है।
 
इसके अलावा रिपोर्ट में रेलवे की ढुलाई और यात्रियों की संख्या (हवाई और सड़क के मुकाबले) कम होने पर भी चिंता जताई गई है। रिपोर्ट के मुताबिक 1960-61 के 82 फीसदी (टन के हिसाब से) के मुकाबले आज रेलवे से केवल 30 फीसदी ढुलाई होती है। श्रीधरन ने कहा है कि शायद ही रेलवे के मुकाबले किसी और भारतीय संस्था की इतनी ज्यादा समितियों ने समीक्षा की होगी, लेकिन विडंबना यह है कि सारी सिफारिशें आज भी धूल फांक रही हैं।
 
साभार- इकॉनामिक टाईम्स से 

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एप्पल के हीरो स्टीव जॉब की जीवनी को लेकर विवाद

मुझे स्टीव जॉब्स की नई जीवनी 'बिकमिंग स्टीव जॉब्स' पढऩे का अवसर नहीं मिल सका है लेकिन यह जरूर पता चल गया कि ऐपल कंपनी के शीर्ष नेतृत्व ने इस नई जीवनी की मदद से उनकी पहले आ चुकी अधिकृत जीवनी को खारिज करने का प्रयास किया है। ऐपल के मुख्य कार्याधिकारी टिम कुक पहले ही कह चुके हैं कि वाल्टर इसाकसन द्वारा लिखित स्टीव जॉब्स  की पुरानी जीवनी जो वर्ष 2011 में जॉब्स के निधन के कुछ अरसा बाद प्रकाशित की गई थी, में वह जॉब्स हैं ही नहीं जिन्हें वह जानते थे। उनके मुताबिक उक्त पुस्तक अवमाननापूर्ण थी। यहां तक कि ऐपल ने एक आधिकारिक वक्तव्य जारी करके कहा कि नई जीवनी स्टीव जॉब्स को बेहतर ढंग से हमारे समक्ष पेश करती है। नई पुस्तक कंपनी के पुराने बॉस की अपेक्षाकृत दयालु और उदार तस्वीर पेश करती है। 

इसाकसन की लिखी जीवनी की जिन बातों ने कुक और उनके साथियों को आहत किया होगा उनमें जॉब्स का अत्यधिक नियंत्रण चाहने वाले व्यक्ति के रूप में चित्रण शामिल है। उक्त पुस्तक में जॉब्स को एक ऐसा व्यक्ति बताया गया है जो हर जगह अपनी बात मनवाना चाहता है, तब भी जब मौत उसके दरवाजे पर दस्तक दे रही हो। वर्ष 2009 में यकृत प्रत्यारोपण के बाद जॉब्स ने परिचारिकाओं पर इस बात के लिए दबाव बनाने की कोशिश की कि वे उनके पास कई ऑक्सीजन मास्क लेकर आएं जिनमें से वह अपनी पसंदीदा डिजाइन वाले मास्क का चयन करना चाहते थे। परिचारिका तभी उनको मास्क पहना सकी जब वह दवाओं के असर से अचेतन हो गए। चूंकि ऐपल समेत किसी ने इसाकसन पर यह आरोप नहीं लगाया कि वह झूठ लिख रहे हैं, इसलिए यह माना जा सकता है कि यह सच्ची घटना है।

लेकिन टिम और उनके साथी यह भूल रहे हैं कि इसाकसन की पुस्तक जॉब्स द्वारा उन्हें दिए गए 40 से अधिक साक्षात्कारों तथा कुछ अन्य लोगों के साक्षात्कारों पर आधारित थी। ये वे लोग थे जिनसे जॉब्स ने कहा था कि वे पुस्तक लेखन में सहयोग करें। इसमें उनके परिजन शामिल थे। लेकिन इसके बावजूद यह पुस्तक जॉब्स को एक ऐसे व्यक्ति के रूप में दिखाती है जो अत्यधिक नियंत्रण रखना चाहते थे। लेकिन इसमें गलत क्या है? वास्तव में देखा जाए तो इसाकसन ने जॉब्स के व्यक्तित्व को पाठकों के समक्ष जस का तस रख दिया। पाठकों को जॉब्स के व्यक्तित्व की कहीं अधिक वास्तविक तस्वीर देखने को मिली। जॉब्स ने भी उनके साथ पूरा सहयोग किया। इस बात पर कोई नियंत्रण नहीं चाहा कि उनके बारे में क्या कुछ लिखा जा रहा है। उन्होंने अपने आसपास के लोगों को भी ईमानदारी से अपनी राय रखने को कहा।

निर्भय नेतृत्व ऐसा ही होता है। इसाकसन ने दिखाया है कि जहां जॉब्स रुखापन दिखाने में सक्षम थे वहीं उन्होंने यह सीख लिया था कि कैसे एक शानदार नीतिकार और प्रबंधक बनना है। वह जो अधीरता दिखाते थे वह दरअसल उनकी पेशेवर और दक्षता हासिल करने संबंधी कार्यशैली का हिस्सा था। सबसे अहम बात यह है कि वह वह उन लोगों के साथ बढिय़ा पेशेवर रिश्ते कायम करने में कामयाब रहे जिनकी वह इज्जत करते थे। वह संगीत बैंड बीटल्स की अवधारणा में यकीन करते थे जहां बैंड का हर सदस्य बेहद प्रतिभाशाली था और वे मिलकर एक दूसरे की कमी पूरी करते थे।

ऐपल कंपनी का शीर्ष नेतृत्व यह कहने में गलती कर बैठा कि इसाकसन जॉब्स के व्यक्तित्व के इस पहलू का उल्लेख नहीं कर सका। उदाहरण के लिए हार्वर्ड बिजनेस रिव्यू में प्रकाशित इसाकसन का साक्षात्कार देखते हैं- लोगों के साथ रुखाई से पेश आने की अपनी छवि में बारे में सवाल पूछने पर जॉब्स ने इससे इनकार नहीं किया बल्कि कहा, 'मैं जिनके साथ काम करता हूं वे सभी चतुर लोग हैं अगर उनमें से किसी को भी लगता है कि यहां उसके साथ गलत व्यवहार हो रहा है तो वह बहुत आसानी से दूसरी जगह पर शीर्ष काम पा सकता है। लेकिन वे ऐसा नहीं करते।' जब जॉब्स अपनी बीमारी से आखिरी बड़ी लड़ाई लड़ रहे थे तब उनके आसपास परिजनों के अलावा वफादार सहयोगियों की फौज थी। ये वे लोग थे जो उनसे वर्षों तक प्रभावित रहे।

यह सच है कि जॉब्स केवल बेहतरीन लोगों को ही बरदाश्त कर पाते थे। ऐसा इसलिए था क्योंकि उनकी इच्छा थी कि वह केवल सर्वश्रेष्ठï लोगों के साथ काम करें। उनका मानना था कि अगर प्रबंधक बहुत विनम्र हों तो औसत लोग भी सहज महसूस करते हैं और उनके इर्दगिर्द बने रहते हैं। यह बात सराहनीय है कि जॉब्स की रुखाई और सख्ती के बीच उनके अंदर प्रेरक क्षमता से भरा व्यक्तित्व था। उन्होंने ऐपल के कर्मचारियों में यह धारणा भर दी कि वे असंभव को भी संभव बना सकते हैं। जॉब्स के ये सारे गुण इसाकसन की पुस्तक में अच्छी तरह दर्ज हैं।

ऐपल कंपनी के नेतृत्व को नई पुस्तक को बढ़ावा देने का पूरा अधिकार है लेकिन अगर वह उनकी पहली जीवनी को खारिज करना बंद नहीं करते हैं तो यह जॉब्स की स्मृतियों के साथ खिलवाड़ के समान होगा। इसाकसन ने एक व्यक्ति के रूप में जॉब्स की जटिल और सूक्ष्म छवि पेश की जिसमें उनके व्यक्तित्व के तमाम अच्छे-बुरे पहलू शामिल थे। लेकिन उन्होंने यह तथ्य भी नहीं छिपाया कि आज ऐपल जो कुछ भी है वह जॉब्स की नीतियों, उनके करिश्मे और काम करने की उनकी क्षमता की वजह से है।

साभार- बिज़नेस स्टैंडर्ड से 

गुलाबी गैंग की तर्ज पर अब काली गैंग

भोपाल। यूपी की 'गुलाबी गैंग' और इस पर बनी फिल्म 'गुलाब गैंग' के बारे में तो आपने सुना ही होगा। इसी तर्ज पर अब मप्र में महिलाओं की एक 'काली गैंग' काम करने लगी है। यह गैंग भी शराब माफियाओं से लेकर शिक्षा, महिला अत्याचार जैसे सामाजिक मुद्दों पर आवाज उठा रही है। चैत्र नवरात्र पर इसका गठन हुआ।

काली गैंग की सदस्य मधु रायकवार बताती हैं, 'गैंग की ज्यादातर सदस्य पति की शराब की लत, भ्रष्टाचार या अन्य किसी तरह के अत्याचार से पीड़ित हैं। इसीलिए सभी ने इकट्ठे होकर अत्याचार के खिलाफ आवाज उठाने का फैसला लिया और यह गैंग तैयार की। हमने गुलाब गैंग के बारे में सुन रखा था, उसी से प्रेरित होकर काली गैंग बनाई। अब तक इस गैंग से 100 महिलाएं जुड़ चुकी हैं।'

काली माता के नाम पर रखा गैंग का नाम
मधु बताती हैं, 'इस गैंग का नाम काली माता से प्रेरित होकर रखा गया है। जैसे मां काली दुष्टों का संहार करती हैं, वैसे ही इस काली गैंग का काम भ्रष्टाचारियों और दुष्टों के खिलाफ कार्रवाई करना होगा। जब भी कोई अन्याय की सूचना मिलती है तो सदस्य महिलाओं को फोन कर इकट्ठा किया जाता है। '

सत्याग्रह से लेकर उग्र आंदोलन है हथियार
मधु रायकवार के मुताबिक, यह गैंग गुलाबी गैंग की तरह किसी को मारेगी-पीटेगी तो नहीं, लेकिन सत्याग्रह और उग्र आंदोलन इसके हथियार होंगे। पहले सत्याग्रह और धरना-प्रदर्शन के लिए जरिये वे अत्याचार के खिलाफ आवाज उठाएंगी। यदि फिर भी न्याय नहीं मिला तो उग्र प्रदर्शन करेंगी।
तीन बच्चियों को दिलवा चुकी हैं न्याय
पिछले दिनों एक निजी स्कूल ने तीन छात्राओं को फीस जमा नहीं करने के कारण उन्हें परीक्षा में नहीं बैठने दिया गया था। इसकी जानकारी मिलते ही काली गैंग की महिलाओं ने जिला शिक्षा अधिकारियों के दफ्तर में धरना दिया और आखिरकार छात्राओं को न्याय दिलाया। साल बर्बाद होने के कारण निजी स्कूल ने छात्राओं को अब नि:शुल्क पढ़ाई करवाने का वादा किया है। इसी तरह एक सिनेमा घर में लगे अश्लील पोस्टरों के खिलाफ प्रदर्शन कर उसे हटवाया।
 
साभार- दैनिक भास्कर से 

म.प्र. सरकार की शानदार पहल अब ईलाज के खर्च की जानकारी वेब साईट पर

अगर आप खुद का अथवा अपने किसी परिचित का इलाज कराने के लिए निजी अस्पताल जा रहे हैं, तो अब घर बैठे ही स्वास्थ्य विभाग की वेबसाइट पर संबंधित अस्पताल के इलाज खर्च की पूरी रेट-लिस्ट पता कर सकते हैं।

राज्य सरकार बुधवार से प्रदेश के सभी अस्पतालों के इलाज के पैकेज और वहां मौजूद चिकित्सा सेवाओं की जानकारी स्वास्थ्य विभाग के पोर्टल www.health.mp.gov.in पर अपलोड कर रही है।
इसी पोर्टल पर नर्सिंग होम और क्लीनिक्स के रजिस्ट्रेशन ऑनलाइन जारी किए जाएंगे। इससे एक ओर नर्सिंग होम और क्लीनिक संचालकों को रजिस्ट्रेशन सर्टिफिकेट एक महीने में मिल जाएंगे, वहीं मरीजों को पैथोलॉजी जांच, सर्जरी और हॉस्पिटल की फीस के बारे में जानकारी मिलने लगेगी।

स्वास्थ्य संचालक (अस्पताल प्रशासन) डॉ. केके ठस्सू ने बताया कि नई व्यवस्था के तहत नर्सिंग होम अौर क्लीनिक संचालकों को अपने यहां इलाज और जांच की पूरी रेट-लिस्ट नोटिस बोर्ड पर चस्पा करने के साथ ही अब पोर्टल पर भी अपलोड करना होगी।

विवाद की स्थिति से बचेंगे
नई व्यवस्था का सीधा फायदा निजी अस्पतालों में इलाज कराने वाले मरीजों को होगा। साथ ही नई व्यवस्था से इलाज के बिल को लेकर मरीजों के परिजन और डॉक्टरों के बीच होने वाले झगड़ों में कमी आएगी। इसके अलावा सरकार नर्सिंग होम्स के इलाज के पैकेज की निगरानी सीधे कर सकेगी।
डॉ. ठस्सू ने बताया कि रजिस्ट्रेशन साइट पर मरीजों को इलाज के पैकेज की जानकारी देने के लिए पेशेंट-अटेंडर काॅर्नर बनाया गया है, जिसमें सभी हॉस्पिटल्स की स्पेशिएलिटी के आधार पर प्रत्येक जांच का फीस चार्ट अपलोड किया गया है।
बिना रजिस्ट्रेशन चल रही क्लीनिक होंगी बंद 
डॉ. ठस्सू ने बताया कि ऑनलाइन रजिस्ट्रेशन व्यवस्था शुरू होने से सीएमएचओ औचक निरीक्षण के दौरान बिना रजिस्ट्रेशन चल रही क्लीनिक को सील कर सकेंगे। साथ ही नर्सिंग होम संचालक द्वारा रजिस्ट्रेशन सर्टिफिकेट के लिए आवेदन करने की जानकारी देने पर, उसका स्टेटस भी जांचा जा सकेगा।
ऑनलाइन रजिस्ट्रेशन सर्टिफिकेट 
नर्सिंग होम संचालकों को रजिस्ट्रेशन सर्टिफिकेट ऑनलाइन दिए जाएंगे। इसके लिए डॉक्टर्स को एमपी ऑनलाइन के पोर्टल से रजिस्ट्रेशन के लिए आवेदन करना होगा। इन आवेदनों की जांच कर सीएमएचओ नर्सिंग होम और क्लीनिक्स का निरीक्षण डॉक्टरों की कमेटी से कराएंगे। कमेटी की रिपोर्ट पर ही रजिस्ट्रेशन सर्टिफिकेट जारी होगा।

साभार – दैनिक भास्कर से 

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नाम बदलकर परदे पर छा गए फिल्मी सितारे, लोग असली नाम भूल गए

हमारे सिनेमा के संसार में तो क्या अं दर और क्या बाहर- शायद ही कोई जानता हो कि भारतीय सिनेमा के शिखर पर विराजमान देश के सबसे सम्मानित अभिनेता, अमिताभ बच्चन का असली नाम इंकलाब है। दरअसल, ‘बच्चन‘ न तो कोई नाम है और न ही कोई जाति-उपजाति। यह तो बस, हरिवं श राय श्रीवास्तव का साहित्यिक नाम ‘बच्चन‘ था, जिसे उन्होंने अपने परिवारजनों के नाम कर दिया। लेकिन बहुत कम लोग जानते हैं कि हरिवंश राय श्रीवास्तव ने अपने ज्येष्ठ पुत्र का नाम ‘इंकलाब‘ रखा था, जिन्हें आज पूरी दुनिया अमिताभ बच्चन के नाम से जानती है। इंकलाब नाम हरिवंश राय श्रीवास्तव को उनके मित्र कवि सुमित्रानंदन पंत ने सुझाया था, जो रख भी लिया गया था। लेकिन बाद में जब स्कूल में भर्ती कराने की बारी आई, तो पिता हरिवंश राय श्रीवास्तव ने स्कूल प्रवेश के फार्म में इंकलाब का नाम बदल कर अमिताभ श्रीवास्तव लिखवाया। इसके बहुत बाद में अमिताभ ने अपना सरनेम श्रीवास्तव भी त्याग दिया और पिता के साहित्यिक नाम बच्चन को अपनाकर अपने बाबूजी हरिवंश राय श्रीवास्तव ‘बच्चन’ की साहित्यिक वंशावली को विकसित किया।

नाम की महिमा अपार खैर, वै से भले ही हमारी फिल्मों के गीतों की भाषा में कहें, तो ‘नाम-वाम में क्या रखा है..’, लेकिन वास्तव में नाम की महिमा अपरंपार है। अगर न होती तो हमारे सिनेमा के संसार के सारे सितारे ही नहीं दुनिया भर के लोग नाम के लिए ही हमेशा रोते-बिलखते रहते हैं। कोई किसी सिनेमा के पोस्टर में अपने नाम को कम महत्व दिए जाने का रोना रोता दिखता है, तो कोई हीरोइन के नाम के बाद अपने नाम को लिखे जाने की शिकायत करता है। लेकिन सबसे बड़ा सवाल यह है कि महिमा कुल मिलाकर जब नाम की ही है, तो फिर हमारे सिने मा के सितारे अपना नाम क्यों बदलते हैं। इसे जानने के लिए थोड़ा गहराई तक जाना पड़ेगा। मगर फिलहाल तो बात उन सितारों की है, जो सिनेमा के संसार में आने से पहले किसी और नाम से जाने जाते थे और बाद में किसी और नाम से मशहूर हो गए। किसी को अपने मुसलमान नाम होने से आ रही दिक्कत की वजह से नाम बदलना पड़ा, तो किसी को बहुत लंबा और अटपटा होने की वजह से किसी और नाम का सहारा लेना पड़ा। मगर, जब वह नाम चल निकला, तो फिर किसी को किसी से कोई शिकायत नहीं रही। वैसे भी सफलता जब हर किस्म के कलंकों की कठोर कालिख तक को धमाके के साथ धो डालती है, तो फिर नाम किस खेत की मूली है। वह तो व्यक्ति अपनी मर्जी से रखता है और मर्जी से छोड़ भी सकता है।

भूल गये असली नाम जाने माने हास्य अभिनेता जॉनी वाकर के बारे में तो यह घोषित सत्य है कि उनका असली नाम तो उनके रिश्तेदार भी भूल गए थे। सभी को यही पता था कि उनका असली नाम जॉनी वाकर ही है। लेकिन असल बात यह है कि जॉनी वाकर का असली नाम बहरुद्दीन जमालुद्दीन काजी था। भारतीय सिनेमा के अब तक के सर्वश्रेष्ठ खलनायक प्राण का वास्तविक नाम प्राण किशन सकिंद था। अपने जमाने के बेहतरीन कलाकार संजीव कुमार का असली नाम हरीभाई जरीवाला था। हम सारे लोग जिस सितारे को दिलीप कुमार के नाम से जानते हैं, वे असल में पाकिस्तान में जन्मे यूसुफ खान हैं। जब फिल्मों में आए, तो उन्होंने नाम बदलकर दिलीप कुमार रख लिया। बॉलीवुड फिल्मों में काम करने वाली हीरोइनें के लिए इमीटेशन जूलरी सप्लाई करने वाले एक खूबसूरत लड़के रवि कपूर को जब वी शांताराम ने अपनी फिल्म ‘गीत गाया पत्थरों ने’ हीरो के रूप में काम दिया, तो वह युवक रवि कपूर से जीतेंद्र बनकर दुनिया के दिलों पर छा गया। एक तमिल अयंगार परिवार में जन्मे सुपर स्टार कमल हासन का असली नाम पार्थसारथी है, लेकिन कोई नहीं जानता। मलयाली पिता और पारसी मां की संतान जॉन अब्राहम का वास्तविक नाम फरहान है। अब तो खैर, फाइट मास्टर वीरू देवगन भी अजय देवगन के बारे में इस तथ्य को भूल गए होंगे कि उन्होंने कभी अपने इस बेटे का नाम विशाल देवगन था। असल में अजय ‘फूल और कांटे‘

फिल्म की कास्टिंग होने तक विशाल ही थे, लेकिन इस फिल्म में काम करने से पहले जब उन्हें अजय देवगन का बिल्ला मिला, तो वे हिट हो गए, तब से वे इसी नाम से जाने जाते हैं।

संतानों को दिया हिट नाम बैंकॉक के एक होटल में नौकरी करते करते राजीव हरी ओम भाटिया की किस्मत ने जब पलटा खाई, तो वे हमारे सिनेमा में अक्षय कुमार के नाम से चमकने लगे। अपने जमाने के मशहूर स्टार शम्मी कपूर इतने हिट रहे कि देश में हजारों लोगों ने उनके नाम पर अपनी संतानों के नाम रख लिए। लेकिन किसी को पता तक नहीं था कि वे जिसके नाम पर अपने बच्चों के नाम रख रहे हैं, उस हीरो का असली नाम तो शमशेर राज कपूर है। दक्षिण के सुपरस्टार रजनीकांत का वास्तविक नाम शिवाजी राव गायकवाड़ है। दो दशक तक फिल्म अभिनेत्री अमृता सिंह के पति रहे विख्यात सितारे सैफ अली खान का नाम उनके पिता मंसूर अली खान पटौदी ने साजिद अली खान पटौदी रखा था, लेकिन वे फिल्मी दुनिया में सैफ अली खान के नाम से जाने जाते हैं। हालांकि उनके पासपोर्ट में आज भी उनका नाम साजिद अली खान पटौदी ही लिखा हुआ है और इन दिनों वे करीना कपूर के पति के रूप में भी इसी नाम से सरकारी कागजों में दर्ज हैं। सलमान खान का पूरा नाम अब्दुल रशीद सलीम सलमान खान है। गोविंदा का वास्तविक नाम गोविंद अरुण आहूजा है। धम्रेद्र के छोटे बेटे विजय सिंह देओल को कोई नहीं जानता। लेकिन अगर उसी बेटे को बॉबी के नाम से पुकारा जाए तो पूरी दुनिया दौड़ी चली आती है। विजय सिंह देओल ने जब फिल्मों में कदम रखा, तो उन्हें अपना घरेलू नाम ‘बॉबी‘ ही अच्छा लगा और ग्लैमर की दुनिया में वे ‘बरसात’ के जरिए बॉबी देओल के रूप में आए, और वही बनकर रह गए। कौन जानता था कि ज्ञान प्रकाश राव जमाला नाम का बस कंडक्टर एक दिन फिल्मों में नाम कमाने के बाद जॉनी लीवर के रूप में जाना जाएगा।

भारतीय सिनेमा में अब तक की सर्वाधिक सौन्दर्य शाली अभिनेत्री मधुबाला, मधुबाला न होकर मुमताज जहां बेगम देहलवी थी। हमारे सिनेमा की चिर युवा अभिनेत्री रेखा अपने छोटे से नाम के बावजूद बहुत बड़ी कलाकार बन गईं, जबकि उनका असली नाम भानुरेखा गणोशन है। हरियाणा से आकर अच्छे अच्छों के छक्के छुड़ानेवाली मल्लिका शेरावत के बारे में कौन जानता है कि उनका असली नाम रीमा लाम्बा है। लाम्बा मल्लिका के पिता का सरनेम है, लेकिन पिता के खिलाफ बगावती तेवर रखने वाली मल्लिका ने लाम्बा सरनेम से छुटकारा पाकर रीमा से मल्लिका बनकर अपनी मां का उपनाम लेकर शेरावत बन गईं हैं। इंटरनेट पर अपने अद्भुत आकर्षक अवतार और शाश्वत किस्म की काम मुद्राओं के जरिए दुनिया भर में अपने निहायत निजी जीवन के अंतरंग पलों को विस्तार देकर मशहूर हुई सनी लियोनी का नाम करनजीत कौर वोहरा है। इसी तरह प्रीति जिंटा का मूल नाम प्रीतम जिंटा सिंह है।

कैटरीना कैफ का जन्म हांगकांग के कैटरीना र्टकोट शहर में हुआ था। सो उनका नाम कैटरीना र्टकोट था, लेकिन जैकी श्रॉफ की पत्नी आएशा श्रॉफ के कहने पर उन्होंने अपना उपनाम र्टकोट छोड़कर कैफ रख लिया। अपनी पहली फिल्म ‘परदेस’ में काम करने से पहले महिमा चौधरी का नाम रितु चौधरी था। लेकिन उस वक्त में लोग मानते थे कि सुभाष घई की फिल्मों की सुपर हीरोइनों माधुरी दीक्षित और मनीषा कोइराला आदि के नाम का पहला अक्षर ‘म’ से है, सो उसे ही अपने लिए भी लकी मानते हुए रितु का नाम महिमा कर दिया था, और तब से ही वे इसी नाम से जानी जाती हैं। शिल्पा राज कुंद्रा का असली नाम अश्विनी शेट्टी है। इसी तरह अजीत सिनेमा में आने से पहले हमीद खान थे और अशोक कुमार का नाम काशी गांगुली। उनके भाई किशोर कुमार का असली नाम आभास कुमार गांगुली था। अन्नू कपूर को तो सारे जानते हैं, लेकिन उनके मूल नाम अनिल कपूर को कोई नहीं जानता। इसी तरह से गीतकार अनजान असल में लालजी पाण्डेय थे, भगवान का पूरा नाम भगवान आभाजी पालव और चित्रगुप्त का चित्रगुप्त श्रीवास्तव नाम था। हमारे सिनेमा के सबसे बड़े नाम दादा साहब फाल्के का यह नाम भी कोई असली नहीं है। वे असल में धुंडीराज गोविंद फाल्के थे और फिल्मकार गुलजार वास्तव में संपूर्ण सिंह हैं। पता नहीं कोई जानता भी है कि नहीं कि गुलशन बावरा असल में गुलशन कुमार मेहता और इंदीवर असल में श्याम लाल बाबू राय हुआ करते थे। इन नामों को बदलने के पीछे का कोई एक खास वजह नहीं है लेकिन जिस नाम ने पहचान दी बस वही नाम आगे जाकर कलाकारों की पहचान बन जाती है। कभी ये बदलाव अपनी पहचान को आसान बनाने के लिए किया गया तो कभी खुद को लकी बनाने के लिए। और एक बार नाम चल गया तो बस वही पहचान और वजूद की शक्ल ले लेता है।

धम्रेद्र के छोटे बेटे विजय सिंह देओ ल को कोई नहीं जानता। लेकिन अगर उसी बेटे को बॉबी के नाम से पुकारा जाए तो दुनिया दौड़ी चली आती है

(साभार: राष्ट्रीय सहारा)

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कंपनियाँ ग्राहकों को जानकारी हिन्दी मेंं दें

प्रति 
प्रबंधक .
ग्राहक सेवा,
गाला कंपनी।
विषय- भारत में पौंछा लगाने के लिए भी अंग्रेजी क्यों आनी चाहिए.?
To-  customercare@fhp-ww.com

महोदय,
कल मैं दुकान पर ऐसा पौंछा खरीदने गया जिससे  बिना झुके सफाई की जा सके । दुकानदार ने आपकी कंपनी का स्पिनवाला पौंछा दिखाया। मैं डिब्बे पर पढ़ने लगा तो कुछ समझ नहीं आया क्योंकि सब कुछ अंग्रेजी में लिखा था। मैंने दुकानदार से पूछा तुम्हें अंग्रेजी आती है तो उसने कहा – थोड़ी बहुत । और जो ग्राहक आते हैं उन्हें ? ' पता नहीं साहब , अग्रेजी में तो कोई पूछता नहीं, ज्यादातर तो हिंदी में या कोई -कोई मराठी -गुजराती नें पूछते हैं ।  हम उन्हें हिंदी में और थोड़ा बहुत उनकी भाषा में बताते हैं । जब दुकानदार और ग्राहक कोई अंग्रेज नहीं , घर की महिलाएं और कामवाली भी अंग्रेजीवाली  नहीं तो इस पर सिर्फ अंग्रेजी में क्यों लिखा है? यह तो वैसे भी गांव में भेजने के लिए है।     'साहब इतनी अकल तो उन्हें खुद भी होनी चाहिए कि वे अपना माल विलायत में नहीं बेच रहे। कंपनीवाले  और उनके कर्मचारी भी तो हिंदुस्तानी ही होंगे।' 
            मेरा कंपनी से सवाल है कि  आप पौंछा और दूसरा सफाई का सामान बेच रहे हो या अंग्रेजी बेच रहे हो। जब आपको अपने ग्राहक तक की परवाह नहीं , अंग्रेजी में बता कर जानकारी छिपा रहे हो तो तुम्हारे माल का भी क्या भरोसा। ग्राहक की भाषा में जानकारी न देकर आप ग्राहक का भाी अपमान कर रहे हैं। क्या आप दूसरे जेशों की तरह अपने सामान पर देश की भाषा में जानकारी नहीं दे सकते।भारत में पौंछा लगाने के लिए भी अंग्रेजी क्यों आनी चाहिए.?
            उम्मीद  है आप ग्राहकों की जरूरत और भावना समझेंगे और अंग्रेजी से बहुत मुहब्बत है तब भी उसके साथ तो  हमारी भाषा में जानकारी  देंगे।  जवाब की उम्मीद है।

आपका ग्राहक

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कंपनी का उत्तर
<Prakash.Thakur@fhp-ww.com>:
Dear Consumer,
 
Thank you for your e-mail and for considering Gala products. We are glad you came back to us with your feedback on improving Gala's communication to consumers. We are always open for improvement and hope to get better continuously.
 
As part of our efforts to effectively communicate product benefits to consumers, we always try to use illustrations or pictures wherever possible to highlight to product use. We make these simple and clear so that our valued consumer all over India are able to understand without any language barrier since many do not understand Hindi / English. This is also the case with Spin Mop, the product you are referring to. However, we will re-evaluate this in light of your feedback.
 
In case of the spin mop, if you would like more information on the use, please visit the following youtube link  which has a Hindi language video explaining the product use clearly. 
https://www.youtube.com/watch?v=BEtftLo6NKQ 
Thank you.

संपर्क – vaishwikhindisammelan@gmail.com 
 hindimumbai@googlegroups.com

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