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बुढ़ौती में तीरथ

कहते हैं कि अंग्रेजों ने जब रेलवे लाइनें बिछा कर उस पर ट्रेनें चलाई तो देश के लोग उसमें चढ़ने से यह सोच कर डरते थे कि मशीनी चीज का क्या भरोसा, कुछ दूर चले और  भहरा कर गिर पड़े। मेरे गांव में एेसे कई बुजुर्ग थे जिनके बारे में कहा जाता था कि उन्होंने जीवन में कभी ट्रेन में पैर नहीं रखा। नाती – पोते उन्हें यह कर चिढ़ाते थे कि फलां के यहां शादी पड़ी है। इस बार तो आपको ट्रेन में बैठना ही पड़ेगा। इस पर बेचारे बुजुर्ग रोने लगते। दलीलें देते कि अब तक यह गांव – कस्बा ही हमारी दुनिया थी… अब बुढ़ापे में यह फजीहत क्यों करा रहे हो…। 

 हां यह और बात है कि उन बुजुर्गों का जब संसार को अलविदा कहने का समय आया तो उनकी संतानों ने किसी तरह लाद – फांद कर उन्हें कुछेक तीर्थ करा देने की भरसक कोशिश की। अपने देश की प्रतिभाओं का भी यही हाल है। राजनीति , क्रिकेट और फिल्म जगत को छोड़ दें तो दूसरे क्षेत्रों की असाधारण  प्रतिभाएं इसी बुढ़ौती में तीरथ करने की विडंबना से ग्रस्त नजर आती है।  बेचारे की जब तक हुनर सिर पर लेकर चलने की कुवत होती है, कोई पूछता नहीं। यहां तक कि कदम – कदम पर फजीहत और जिल्लतें झेलनी पड़ती है।  लेकिन जब पता चले कि बेचारा काफी बुरी हालत में है… व्हील चेयर तक पहुंच चुका है  या अाइसीयू में भर्ती है  और दुनिया से बस जाने ही  वाला है तो तुरत – फुरत में कुछ सम्मान वगैरह पकड़ा देने की समाज – सरकार में होड़ मच जाती है। राष्ट्रीय स्तर पर किसी बड़े पुरस्कार की घोषणा होते ही नजर के सामने आता है … एक बेहद  निस्तेज थका हुआ चेहरा…। सहज ही मन में सवाल उठता है … यह पहले क्यों नहीं हुआ। क्या अच्छा नहीं होता यह पुरस्कार उन्हें तब मिलता जब तक वे इसकी महत्ता को समझ – महसूस कर पाने में सक्षम थे। 

एक प्रख्यात गायक की जीवन संध्या में बैंक बैलेंस को लेकर अपने भतीजे के साथ विवाद हुआ। मामला अदालत तक गया। मसले का हल निकालने के लिए उस गायक ने किस – किस के पास मिन्नतें नहीं की। लेकिन कोई फायदा नहीं हुआ। हां यह और बात है कि दिल पर भारी बोझ लिए उस शख्सियत ने जब दुनिया को अलविदा कहा तो उनकी शवयात्रा को शानदार बनाने में समाज ने कोई कसर बाकी नहीं रहने दी। एक और मुर्धन्य गायक को जब जीवन संध्या पर सरकार द्वारा पुरस्कार की घोषणा का पता चला तो वे बेहद उदास हो गए और हताशा में कहने लगे… क्यों करती है सरकार यह सब…मेरी दो तिहाई जिंदगी तो दो पैसे कमाने की कोशिश में बीत गई… अब इन पुरस्कारों का क्या मतलब। बुढ़ौती में तीरथ की विडंबना सिर्फ उच्च स्तर की प्रतिभाओं के मामले में ही नहीं है। छोटे शहरों या कस्बों में भी देखा जाता है कि आजीवन कड़ा संघर्ष करने वाली  प्रतिभाएं सामान्यतः उपेक्षित ही रहती है। समाज उनकी सुध तभी लेता है जब वे अंतिम पड़ाव पर होती है। वह भी तब जब उनकी सुध लेने या सहायता की कहीं से पहल हो। मदद का हाथ बढ़ाने  वालों को लगे कि इसमें उनका फायदा है। अन्यथा असंख्य समर्पित प्रतिभाओं को तो जीवन – संघ्या पर भी वह उचित सम्मान नहीं मिल पाता, जिसके वे हकदार होते हैं। 

लेखक पश्चिम बंगाल के खड़गपुर में रहते हैं और दैनिक जागरण से जुड़े हैं। 
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तारकेश कुमार ओझा, भगवानपुर, जनता विद्यालय के पास वार्ड नंबरः09 (नया) खड़गपुर ( पश्चिम बंगाल) पिन ः721301 जिला पश्चिम मेदिनीपुर संपर्कः 09434453934 

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केजरीवाल के आदेश पर दिल्ली सचिवालय के बाहर मज़दूरों पर बर्बर लाठी चार्ज

​25 मार्च को दिल्ली में मज़दूरों पर जो लाठी चार्ज हुआ वह दिल्ली में पिछले दो दशक में विरोध प्रदर्शनों पर पुलिस के हमले की शायद सबसे बर्बर घटनाओं में से एक था। ध्यान देने की बात यह है कि इस लाठी चार्ज का आदेश सीधे अरविंद केजरीवाल की ओर से आया था, जैसा कि मेरे पुलिस हिरासत में रहने के दौरान कुछ पुलिसकर्मियों ने बातचीत में जिक्र किया था। कुछ लोगों को इससे हैरानी हो सकती है क्योंकि औपचारिक रूप से दिल्ली पुलिस केंद्र सरकार के मातहत है। लेकिन जब मैंने पुलिस वालों से इस बाबत पूछा तो उन्हों ने बताया कि रोज-ब-रोज की कानून व्यवस्था बनाए रखने के लिए दिल्ली पुलिस को दिल्ली के मुख्यमंत्री के निर्देशों का पालन करना होता है, जबतक कि यह केन्द्र सरकार के किसी निर्देश/आदेश के विपरीत नहीं हो। ‘आप’ सरकार अब मुसीबत में पड़ चुकी है क्योंकि वह दिल्ली के मजदूरों से चुनाव में किए वायदे पूरा नहीं कर सकती। और दिल्ली के मजदूर ‘आप’ और अरविन्द केजरीवाल द्वारा उनसे किए गए वायदे को भूलने से इनकार कर रहे हैं। मालूम हो कि बीती 17 फरवरी को, दिल्ली यूनिवर्सिटी के स्कूल ऑफ लर्निंग के छात्रों ने खासी तादाद में वहां पहुंचकर मुख्यमंत्री को ज्ञापन दिया। इसके बाद, 3 मार्च को डीएमआरसी के सैकड़ों ठेका कर्मचारी केजरीवाल सरकार को अपना ज्ञापन देने गए थे और वहां उन पर भी लाठीचार्ज किया गया।

इस महीने की शुरुआत से ही विभिन्न मजदूर संगठन, यूनियनें, महिला संगठन, छात्र एवं युवा संगठन दिल्ली में 'वादा न तोड़ो अभियान' चला रहे हैं, जिसका मकसद है केजरीवाल सरकार को दिल्ली के गरीब मजदूरों के साथ किए गए उसके वायदों जैसे कि नियमित प्रकृति के काम में ठेका प्रथा को खत्म करना, बारहवीं तक मुफ्त शिक्षा, दिल्ली सरकार में पचपन हजार खाली पदों को भरना, सत्रह हजार नये शिक्षकों की भर्ती करना, सभी घरेलू कामगारों और संविदा शिक्षकों को स्थायी करना, इत्यादि की याद दिलाना और इसके बाद सरकार को ऐसा करने के लिए बाध्य करना। 25 मार्च के प्रदर्शन की सूचना केजरीवाल सरकार और पुलिस प्रशासन को पहले से ही दे दी गयी थी और पुलिस ने पहले से कोई निषेधाज्ञा लागू नही की थी। लेकिन 25 मार्च को जो हुआ वह भयानक था और क्योंकि मैं उन कार्यकर्ताओं में से एक था जिन पर पुलिस ने हमला किया, धमकी दी और गिरफ्तार किया, मैं बताना चाहूंगा कि 25 मार्च को हुआ क्या था, क्यों हजारों मजदूर, महिलाएं और छात्र दिल्ली सचिवालय गए, उनके साथ कैसा व्यवहार हुआ और किस तरह मुख्य धारा के मीडिया चैनलों और अखबारों ने मजदूरों, महिलाओं और छात्रों पर हुए बर्बर दमन को बहुत आसानी से ब्लैक आउट कर दिया?
25 मार्च को हजारों मजदूर, महिलाएं और छात्र दिल्ली सचिवालय क्यों गए?

​जैसा पहले बताया जा चुका है, कई मजदूर संगठन अरविन्द केजरीवाल को उन वायदों की याद दिलाने के लिए पिछले एक महीने से दिल्ली में 'वादा न तोड़ो अभियान' चला रहे हैं जो उनकी पार्टी ने दिल्ली के मजदूरों से किए थे। इन वायदों में शामिल हैं नियमित प्रकृति के काम में ठेका प्रथा खत्म करना; दिल्ली सरकार में पचपन हजार खाली पदों को भरना; सत्रह हजार नये शिक्षकों की भर्ती करना और संविदा शिक्षकों को स्थायी करना; सभी संविदा सफाई कर्मचारियों को स्थायी करना; बारहवीं कक्षा तक स्कूली शिक्षा मुफ्त करना; ये वे वायदे हैं जो तत्काल पूरे किए जा सकते हैं। हम जानते हैं कि सभी झुग्गीवासियों के लिए मकान बनाने में समय लगेगा; फिर भी, दिल्ली की जनता के सामने एक रोडमैप प्रस्तुत किया जाना चाहिए। इसी तरह, हम जानते हैं कि बीस नये कॉलेज उपलब्ध कराने में समय लगेगा; हालांकि केजरीवाल मीडिया से कह चुके हैं कि कुछ व्यक्तियों ने दो कॉलेजों के लिए जमीन दी है और उन्हें यह जरूर बताना चाहिए कि वो जमीनें कहां हैं और राज्य सरकार इन कॉलेजों का निर्माण कब शुरू करने जा रही है। ऐसा नहीं है कि केजरीवाल ने अपने किसी वायदे को पूरा नहीं किया। उन्होंने दिल्ली के फैक्टरी मालिकों और दुकानदारों से किए वायदे तत्काल पूरे किए! और उन्होंने ठेका मजदूरों के लिए क्या किया? कुछ भी नहीं, सिवाय केवल सरकारी विभागों के ठेका मजदूरों के बारे में एक दिखावटी अन्तरिम आदेश जारी करने के, जो कहता है कि सरकारी विभागों/निगमों में काम करने वाले किसी ठेका कर्मचारी को अगली सूचना तक बर्खास्त नहीं किया जाएगा। हालांकि, कुछ दिनों बाद ही अखबारों में खबर आयी कि इस दिखावटी अन्तरिम आदेश के मात्र कुछ दिनों बाद ही दर्जनों होमगार्डों को बर्खास्त कर दिया गया! इसका साधारण सा मतलब है कि अन्तरिम आदेश सरकारी विभागों में ठेका मजदूरों और दिल्ली की जनता को बेवकूफ बनाने का दिखावा मात्र था। इन कारकों ने दिल्ली के मजदूरों के बीच संदेह पैदा किया और इसके परिणामस्वरूप विभिन्न ट्रेड यूनियनों, महिला संगठनों, छात्र संगठनों ने केजरीवाल को दिल्ली की आम मजदूर आबादी से किए गए अपने वायदों की याद दिलाने के लिए अभियान चलाने के बारे में सोचना शुरू किया।

इसलिए, 3 मार्च को डीएमआरसी के ठेका मजदूरों के प्रदर्शन के साथ वादा न तोडो अभियान की शुरुआत की गयी। उसी दिन, केजरीवाल सरकार को 25 मार्च के प्रदर्शन के बारे में औपचारिक रूप से सूचना दे दी गयी थी और बाद में पुलिस प्रशासन को इस बारे में आधिकारिक तौर पर सूचना दी गयी। पुलिस ने प्रदर्शन से पहले संगठनकर्ताओं को किसी भी प्रकार की निषेधाज्ञा नोटिस जारी नहीं की। लेकिन, जैसे ही प्रदर्शनकारी किसान घाट पहुंचे, उन्हें मनमाने तरीके से वहां से चले जाने को कहा गया! पुलिस ने उन्हें सरकार को अपना ज्ञापन और मांगपत्रक सौंपने से रोक दिया, जोकि उनका मूलभूत संवैधानिक अधिकार है, जैसेकि, उन्हें सुने जाने का अधिकार, शान्तिपूर्ण एकत्र होने और अभिव्यक्ति का अधिकार।

25 मार्च को वास्तव में क्या हुआ?
दोपहर करीब 1:30 बजे, लगभग 3500 लोग किसान घाट पर जमा हुए। आरएएफ और सीआरपीएफ को वहां सुबह से ही तैनात किया गया था। इसके बाद, मजदूर जुलूस की शक्ल में शान्तिपूर्ण तरीके से दिल्ली सचिवालय की ओर रवाना हुए। उन्हें पहले बैरिकेड पर रोक दिया गया और पुलिस ने उनसे वहां से चले जाने को कहा। प्रदर्शनकरियों ने सरकार के किसी प्रतिनिधि से मिलने और उन्हें अपना ज्ञापन देने की बात कही। प्रदर्शनकारियों ने दिल्ली सचिवालय की ओर बढ़ने की कोशिश की। तभी पुलिस ने बिना कोई चेतावनी दिए बर्बर तरीके से लाठीचार्ज शुरू कर दिया और प्रदर्शनकारियों को खदेड़ना शुरू कर दिया। पहले चक्र के लाठीचार्ज में कुछ महिला मजदूर और कार्यकर्ता गंभीर रूप से घायल हो गयीं और सैकड़ों मजदूरों को पुलिस ने दौड़ा लिया। 

हालांकि, बड़ी संख्या में मजदूर वहां बैरिकेड पर रुके रहे और अपना 'मजदूर सत्याग्रह' शुरू कर दिया। यद्यपि पुलिस ने कई मजदूरों को वहां से खदेड़ कर भगा दिया, फिर भी, लगभग 1300 मजदूर वहां जमे हुए थे और उन्होंने अपना सत्याग्रह जारी रखा था। लगभग 700 संविदा शिक्षक सचिवालय के दूसरी ओर थे, जो प्रदर्शन में शामिल होने आए थे, लेकिन पुलिस ने उन्हें प्रदर्शन स्थल तक जाने नहीं दिया। इसलिए उन्होंने सचिवालय के दूसरी तरफ अपना विरोध प्रदर्शन जारी रखा। मजदूर संगठनकर्ता बार-बार पुलिस से आग्रह कर रहे थे कि उन्हें सचिवालय जाने और अपना ज्ञापन देने दिया जाए। पुलिस ने इससे सीधे इनकार कर दिया। तब संगठनकर्ताओं ने पुलिस को याद दिलाया कि सरकार को ज्ञापन देना उनका संवैधानिक अधिकार है और सरकार इसे स्वीकार करने के लिए बाध्य है। इसके बाद भी, पुलिस ने प्रदर्शनकारियों को सचिवालय जाने और अपना ज्ञापन सौंपने नहीं दिया। तकरीबन डेढ़ घंटे इंतजार करने के बाद मजदूरों ने पुलिस को अल्टीमेटम दिया कि यदि आधे घंटे में उन्हें जाने नहीं दिया गया तो वे सचिवालय की ओर बढ़ेंगे। जब आधे घंटे के बाद पुलिस ने उन्हें सचिवालय जाने और अपना ज्ञापन सौंपने नहीं दिया, इसके बाद पुलिस ने फिर से लाठीचार्ज किया। इस बार लाठीचार्ज ज्यादा बर्बर तरीके से हुआ।

​मैं पिछले 16 वर्ष से दिल्ली के छात्र आंदोलन और मज़दूर आंदोलन में सक्रिय रहा हूं और मैं कह सकता हूं कि मैंने दिल्ली में किसी प्रदर्शन के विरुद्ध पुलिस की ऐसी क्रूरता नहीं देखी है। महिला मज़दूरों और कार्यकर्ताओं को और मज़दूरों के नेताओं को खासतौर पर निशाना बनाया गया। पुरुष पुलिसकर्मियों ने निर्ममता के साथ स्त्रियों की पिटाई की, उन्हें बाल पकड़कर सड़कों पर घसीटा, कपड़े फाड़े, नोच-खसोट की और अपमानित किया। किसी के लिए भी यह विश्वास करना मुश्किल होता कि किस तरह अनेक पुलिसकर्मी स्त्री मज़दूरों और कार्यकर्ताओं को पकड़कर पीट रहे थे। कुछ स्त्री कार्यकर्ताओं को तब तक पीटा गया जब तक लाठियां टूट गयीं या स्त्रियां बेहोश हो गयीं। मज़दूरों पर नजदीक से आंसू गैस छोड़ी गयी।

सैकड़ों मज़दूर इसके विरोध में शांतिपूर्ण सत्याग्रह के लिए ज़मीन पर लेट गये, फिर भी पुलिसवाले उन्हें पीटते रहे। आखिरकार मज़दूरों ने वहां से हटकर राजघाट पर विरोध जारी रखने की कोशिश की लेकिन पुलिस और रैपिड एक्शमन फोर्स ने वहां भी उनका पीछा किया और फिर से पिटाई की। पुलिस ने 17 कार्यकर्ताओं और मज़दूरों को गिरफ्तार किया जिनमें से एक मैं भी था। मेरे एक साथी, युवा कार्यकर्ता अनन्त को हिरासत में लेने के बाद भी मेरे सामने पीटा जाता रहा। पुलिस ने उसे भद्दी-भद्दी गालियां दीं। हिरासत में अन्य कार्यकर्ताओं और मज़दूरों के साथ भी ऐसा ही बर्ताव जारी रहा। लगभग सभी गिरफ्तार व्यक्ति घायल थे और उनमें से कुछ को गंभीर चोटें आयी थीं।

चार स्त्री कार्यकर्ता शिवानी, वर्षा, वारुणी और वृशाली को हिरासत में लिया गया था और पिटायी में भी उन्हें खासतौर से निशाना बनाया गया था। वृशाली की उंगलियों में फ्रैक्चिर है, वर्षा के पैरों पर बुरी तरह लाठियां मारी गयीं, शिवानी की पीठ पर कई पुलिस वालों ने बार-बार चोट की और उनके सिर में भी चोट आयी और वारुणी को भी बुरी तरह पीटा गया। चोटों का अनुमान इस बात से लगाया जा सकता है कि वारुणी और वर्षा को जमानत पर छूटने के बाद 27 मार्च को फिर से अरुणा आसफअली अस्पाताल में भर्ती कराना पड़ा। स्त्री कार्यकर्ताओं को पुलिस वाले लगातार गालियां देते रहें। पुलिसकर्मियों ने स्त्री कार्यकर्ता को जैसी अश्लील गालियां और अपमानजनक टिप्परणियों का निशाना बनाया जिसे यहां लिखा नहीं जा सकता। कार्यकर्ताओं और विरोध प्रदर्शन करने वालों के सम्मान को कुचलने की पुरानी पुलिसिया रणनीति का ही यह हिस्सा था।

गिरफ्तार किये गये 13 पुरुष कार्यकर्ता भी घायल थे और उनमें से 5 को गंभीर चोटें आयी थीं। लेकिन उन्हें चिकित्सा उपचार के लिए 8 घंटे से ज्यादा इंतजार कराया गया जबकि उनमें से दो के सिर की चोट से खून बह रहा था। आईपी स्टेंट पुलिस थाने में रहने के दौरान कई पुलिस वालों ने हमें बार-बार बताया कि लाठी चार्ज का आदेश सीधे मुख्यपमंत्री कार्यालय से दिया गया था। साथ ही, पुलिस की मंशा शुरू से साफ थी : वे विरोध प्रदर्शनकारियों की बर्बर पिटाई करना चाहते थे। उन्होंने हमसे कहा कि इसका मकसद सबक सिखाना था।

अगले दिन 4 स्त्री साथियों को जमानत मिल गयी और 13 पुरुष कार्यकर्ताओं को दो दिन के लिए सशर्त जमानत दी गयी। आई पी स्टेट पुलिस थाने को जमानतदारों और गिरफ्तार लोगों के पते सत्यापित करने के लिए कहा गया। पुलिस गिरफ्तार कार्यकर्ताओं को 14 दिन की पुलिस हिरासत में लेने की मांग कर रही थी। प्रशासन की मंशा साफ है : एक बार फिर कार्यकर्ताओं की पिटाई और यंत्रणा। पुलिस लगातार हमें फिर से गिरफ्तार करने और हम पर झूठे आरोप मढ़ने की कोशिश में है। जैसा कि अब पुलिस प्रशासन की रिवायत बन गयी है, जो कोई भी व्यवस्था के अन्याय का विरोध करता है उसे 'माओवादी'', ''नक्सलवादी'', ''आतंकवादी'' आदि बता दिया जाता है। इस मामले में भी पुलिस की मंशा साफ है। इससे यही पता चलता है कि भारत का पूंजीवादी लोकतंत्र कैसे काम करता है। खासतौर पर राजनीति और आर्थिक संकट के समय में, यह व्यंवस्था की नग्न बर्बरता के विरुद्ध मेहनतकश अवाम के किसी भी तरह के प्रतिरोध का गला घोंटकर ही टिका रह सकता है। 25 मार्च की घटनायें इस तथ्य की गवाह हैं।

आगे क्या होना है?
शासक हमेशा ही यह मानने की ग़लती करते रहे हैं कि संघर्षरत स्त्रियों, मज़दूरों और छात्रों-युवाओं को बर्बरता का शिकार बनाकर वे विरोध की आवाज़ों को चुप करा देंगे। वे बार-बार ऐसी ग़लती करते हैं। यहां भी उन्होंने वही ग़लती दोहरायी है। 25 मार्च की पुलिस बर्बरता केजरीवाल सरकार द्वारा दिल्ली के मेहनतकश ग़रीबों को एक सन्देश देने की कोशिश थी और सन्देश यही था कि अगर दिल्ली के ग़रीबों के साथ केजरीवाल सरकार के विश्वासघात के विरुद्ध तुमने आवाज़ उठायी तो तुमसे ऐसे ही क्रूरता के साथ निपटा जायेगा। हमारे घाव अभी ताजा हैं, हममें से कई की टांगें सूजी हैं, उंगलियां टूटी हैं, सिर फटे हुए हैं और शरीर की हर हरकत में हमें दर्द महसूस होता है। लेकिन, इस अन्याय के विरुद्ध लड़ने और अरविंद केजरीवाल और उसकी 'आप' पार्टी की घृणित धोखाधड़ी का पर्दाफाश करने का हमारा संकल्प और भी मज़बूत हो गया है।

ट्रेडयूनियनों, स्त्री संगठनों और छात्र संगठनों तथा हज़ारों मज़दूरों ने हार मानने से इंकार कर दिया है। उन्होंने घुटने टेकने से इंकार कर दिया है। हालांकि उनके बहुत से कार्यकर्ता अब भी चोटिल हैं और हममें से कुछ ठीक से चल भी नहीं सकते,फिर भी उन्होंने दिल्ली भर में भंडाफोड़ अभियान शुरू कर दिये हैं। केजरीवाल सरकार ने दिल्ली की मज़दूर आबादी के साथ घिनौना विश्वासघात किया है जिन्हों ने 'आप' पर बहुत अधिक भरोसा किया था। दिल्ली की मेहनतकश आबादी आम आदमी पार्टी की धोखाधड़ी के लिए उसे माफ नहीं करेगी। मेरे ख्याल से आम आदमी पार्टी का फासीवाद, कम से कम थोड़े समय के लिए, भाजपा जैसी मुख्‍य धारा की फासिस्ट पार्टी से भी ज्यादा खतरनाक है, और मैंने 25 मार्च को खुद इसे महसूस किया। और इसका कारण साफ है। जिस तरह कम से कम तात्कालिक तौर पर छोटी पूंजी बड़ी पूंजी के मुकाबले अधिक शोषक और उत्पीड़क होती है, उसी तरह छोटी पूंजी का शासन, कम से कम थोड़े समय के लिए बड़ी पूंजी के शासन की तुलना में कहीं अधिक उत्पीड़क होता है और आप की सरकार छोटी पूंजी की दक्षिणपंथी पापुलिस्टस तानाशाही का प्रतिनिधित्व करती है, और बेशक उसमें अंधराष्ट्रवादी फासीवाद का पुट भी है। 25 मार्च की घटनाओं ने इस तथ्य को साफ जाहिर कर दिया है।

जाहिर है कि केजरीवाल घबराया हुआ है और उसे कुछ सूझ नहीं रहा। और इसीलिए उसकी सरकार इस तरह के कदम उठा रही है जो उसे और उसकी पार्टी को पूरी तरह नंगा कर रहे हैं। वह जानता है कि दिल्ली की ग़रीब मेहनतकश आबादी से किये गये वादे वह पूरा नहीं कर सकता है, खासकर स्था‍यी प्रकृति के कामों में ठेका प्रथा खत्मा करना, क्योंकि अगर उसने ऐसा करने की कोशिश भी कि, तो वह दिल्लीं के व्यापारियों, कारखाना मालिकों, ठेकेदारों और छोटे बिचौलियों के बीच अपना सामाजिक और आर्थिक आधार खो बैठेगा। 'आप' के एजेंडा की यही खासियत है : यह भानुमती के पिटारे जैसा एजेंडा है (साफ तौर पर वर्ग संश्रयवादी एजेंडा) जो छोटे व्यापारियों, धनी दुकानदारों, बिचौलियों और प्रोफेशनल्स/स्‍वरोजगार वाले निम्न बुर्जुआ वर्ग के अन्य हिस्सों के साथ ही झुग्गीवासियों, मज़दूरों आदि की मांगों को भी शामिल करता है। यह अपने एजेंडा की सभी मांगों को पूरा कर ही नहीं सकता, क्यों कि इन अलग-अलग सामाजिक समूहों की मांगें एक-दूसरे के बिल्कुल विपरीत हैं। आप की असली पक्षधरता दिल्लीं के निम्न बुर्जुआ वर्ग के साथ है जो कि आप के दो महीने के शासन में साफ जाहिर हो चुका है। 'आप' वास्तव में और राजनीतिक रूप से इन्हीं परजीवी नवधनाढ्य वर्गों की पार्टी है। 'आम आदमी' की जुमलेबाजी सिर्फ कांग्रेस और भाजपा से लोगों के पूर्ण मोहभंग से पैदा हुए अवसर का लाभ उठाने के लिए थी। चुनावों होने तक यह जुमलेबाजी उपयोगी थी। जैसे ही लोगों ने 'आप' के पक्ष में वोट दिया, किसी विकल्प के अभाव में, अरविंद केजरीवाल का असली कुरूप फासिस्ट चेहरा सामने आ गया।

आंतरिक तौर पर भी, केजरीवाल धड़े और यादव-भूषण धड़े के बीच जारी सत्ता संघर्ष के चलते 'आप' की राजनीति नंगी हो गयी है। इसका यह मतलब नहीं कि अगर यादव धड़े का वर्चस्व होता, तो दिल्ली के मेहनतकशों के लिए हालात कुछ अलग होते। यह गंदी आंतरिक लड़ाई 'आप' के असली चरित्र को ही उजागर करती है और बहुत से लोगों को यह समझने में मदद करती है कि 'आप' कोई विकल्प़ नहीं है और यह कांग्रेस, भाजपा, सपा, बसपा, सीपीएम जैसी पार्टियों से कतई अलग नहीं है। खासतौर पर, दिल्ली के मज़दूर इस सच्चाई को समझ रहे हैं। यही वजह है कि 25 मार्च को ही पुलिस बर्बरता और केजरीवाल सरकार के विरुद्ध दिल्ली के हेडगेवार अस्पताल के कर्मचारियों ने स्वत:स्फू्र्त हड़ताल कर दी थी। दिल्ली मेट्रो रेल कारपोरेशन के मज़दूरों, अन्य अस्पतालों के ठेका मज़दूरों, ठेके पर काम करने वाले शिक्षकों, झुग्गीवासियों और दिल्ली के ग़रीब विद्यार्थियों और बेरोजगार नौजवानों में गुस्सा सुलग रहा है। दिल्ली का मज़दूर वर्ग अपने अधिकार हासिल करने और केजरीवाल सरकार को उसके वादे पूरे करने के लिए बाध्य करने के लिए संगठित होने की शुरुआत कर चुका है। मज़दूरों को कुचलने की केजरीवाल सरकार की बौखलाहट भरी कोशिशें निश्चित तौर पर उसे भारी पड़ेंगी।

मज़दूर, छात्र और स्त्री संगठनों ने दिल्ली के विभिन्न मेहनतकश और ग़रीब इलाकों में अपना भंडाफोड़ अभियान शुरू कर दिया है। अगर 'आप' सरकार दिल्ली के ग़रीब मेहनतकशों से किये गये अपने वादे पूरे करने में नाकाम रहती है और हजारों स्त्रियों, मज़दूरों और छात्रों पर किये गये घृणित और बर्बर हमले के लिए माफी नहीं मांगती है तो उसे दिल्ली के मेहनतकश अवाम के बहिष्कार का सामना करना होगा। 25 मार्च को हम पर, दिल्ली के मज़दूरों, स्त्रियों और युवाओं पर की गयी हरेक चोट इस सरकार की एक घातक भूल साबित होगी।

इस बर्बर लाठीचार्ज से जुड़ी अन्‍य फोटो, वीडियो व न्‍युज कवरेज को देखने के लिए इस लिंक पर जायें – http://www.mazdoorbigul.net/archives/7076

(लेखक  मज़दूर बिगुल के संपादक है और मज़दूर दस्ता और इतिहास विभाग, दिल्ली वि‍श्वविद्यालय में शोध छात्र हैं) 

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‘भारतीय भाषाओं की रक्षा और राष्ट्रभाषा की प्रतिष्ठा के लिए संघर्ष करना होगा’

हैदराबाद। उच्च शिक्षा और शोध संस्थान की स्वर्ण जयंती वर्ष के अवसर पर केंद्रीय हिंदी निदेशालय और स्टेट बैंक ऑफ़ हैदराबाद के सहयोग से आयोजित त्रिदिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी “मुक्तिबोध की कविता 'अंधेरे में' : अर्धशती समारोह” का उद्घाटन करते हुए प्रख्यात साहित्यकार, वर्तमान सांसद और उत्तराखंड के पूर्व मुख्यमंत्री डॉ. रमेश पोखरियाल 'निशंक' ने कहा कि भाषा और साहित्य के माध्यम से विचारों को श्स्स्वत जीवन प्राप्त होता है इसलिए किसी जीवित समाज की पहचान उसकी राष्ट्रभाषा और जातीय साहित्य से होती है. उन्होंने आगे कहा कि यदि विचारों को खत्म कर दिया जाय तो सब कुछ अपने आप खत्म हो जाएगा. विचारशून्यता के कारण ही आज देश भर में अराजकता फ़ैल रही है. उन्होंने खेदपूर्वक कहा कि इस देश में भाषा के नाम पर अराजकता फैलाई जा रही है. डॉ. रमेश पोखरियाल ‘निशंक’ ने जोर देकर कहा कि हिंदी देश की आत्मा है, एकता का सूत्र है. उन्होंने यह भी कहा कि कुछ स्वार्थी लोग देश की आत्मा पर पत्थर रखकर बैठे हुए हैं. अंग्रेज तो इस देश को छोड़कर जा चुके हैं, लेकिन अंग्रेजी भक्ति के रूप में वे अपनी मानसिकता यहीं छोड़ गए. आज हम सब उसी मानसिकता से लड़ रहे हैं. हमें पहचानना होगा कि भारतीय भाषाएँ हिंदी की ताकत हैं. हिंदी में संवेदना है, लालित्य है, अपनत्व है. उन्होंने सबसे अपील की कि भारतीय भाषाओं को बचाएँ, संस्कृति को बचाएँ और देश को बचाएँ तथा संविधान की भावना के अनुरूप हिंदी को व्यवहारिक अर्थ में भारत की राष्ट्रभाषा के रूप में प्रतिष्ठा दिलाने के संघर्ष और आंदोलन चलाएँ क्योंकि राष्ट्रभाषा से हमारी राष्ट्रीय पहचान जुड़ी है.

‘मुक्तिबोध की कविता ‘अंधेरे में’ के अर्धशती समारोह का बीजभाषण देते हुए प्रो. देवराज (आचार्य एवं अध्यक्ष, अनुवाद विभाग, महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय, वर्धा) ने कहा कि किसी भी कवि को दरवाजा खोलकर जनता के बीच आकर खड़ा होना चाहिए और पाठक को भी कविता में जो अनेक पाठ छिपे हुए हैं उण पर ध्यान देना चाहिए. 'अंधेरे में' कविता में अनेक पाठ हैं. इसमें अपनी निजी भाषा की खोज है, जनता के व्यक्तित्व की खोज है. जनता अपने आपको आत्मीयता, निजीपन और निजता के साथ अभिव्यक्त करना चाहती है. 'अंधेरे में' का एक पाठ संभावना का पाठ भी है और साथ ही संकल्प का दर्शन भी. उन्होंने आक्रोशपूर्वक कहा कि यथास्थितिवादी व्यवस्थाओं ने पिछले दशकों में बंदूक के सामने बंदूक खड़ी कर दी जिससे सामाजिक, सांस्कृतिक परिवेश अंधेरे से ग्रस्त हो गया; अतः आज व्यवस्था पर पुनर्विचार आवश्यक है. अपनी सांस्कृतिक संपत्ति को पहचानने की आवश्यकता है. आज हमारे सामने सांस्कृतिकता को खोजने और पहचानने का संकट है. थोपे गए सभ्यता संघर्ष में हमें मानवीय सभ्यता और संस्कृति को बचाना होगा. उन्होंने कहा कि ये सभी बातें 'अंधेरे में' अंतर्निहित हैं जो उसकी प्रासंगिकता और पुनर्पाठ का आधार हैं.

उल्लेखनीय है कि मुक्तिबोध की कविता ‘अंधेरे में’ 50 वर्ष पूर्व अर्थात 1964 में हैदराबाद से निकलने वाली साहित्यिक पत्रिका ‘कल्पना’ में प्रकाशित हुई थी और तब से अब तक यह कविता समीक्षकों के बीच निरंतर चर्चा का विषय बनी रही है. 

उद्घाटन समारोह की अध्यक्षता करते हुए प्रख्यात साहित्यकार, वरिष्ठ शिक्षाविद एवं गढ़वाल विश्वविद्यालय, उत्तराखंड के पूर्व प्राचार्य डॉ. योगेंद्रनाथ शर्मा ‘अरुण’ ने अत्यंत भावभीने स्वर में अपील की कि हिंदी को अपनाएँ और सभी भारतीय भाषाओं का आदर करें क्योंकि यह हमारे देश की संप्रेषणीयता का प्रतीक है. डॉ. अरुण ने अपना गीत ‘मौत ने मुझसे कहा मैं तुमको लेने आ रही हूँ’ सुनाकर समाँ बाँध दिया.

बतौर सम्मान्य अतिथि विश्वविख्यात कला संग्राहक एवं कला समीक्षक पद्मश्री जगदीश मित्तल, विशेष अतिथि डॉ. विष्णु भगवान शर्मा [सहायक महाप्रबंधक राजभाषा, स्टेट बैंक ऑफ हैदराबाद], दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा के सह-सचिव के. वेंकटेश्वर राव, संगोष्ठी संयोजक सी. एस. होसगौडर और संगोष्ठी निदेशक प्रो. ऋषभदेव शर्मा मंचासीन थे. इन सभी ने ‘एक’ कविता पर केंद्रित इस त्रिदिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी के महत्व पर प्रकाश डालते हुए हिंदी के राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय संदर्भ पर चर्चा की.

चिरक इंटरनेश्नल के बाल कलाकारों ने इस अवसर पर 'अंधेरे में' का मंचन किया जिसका नाट्य निर्देशन डॉ. मंजु शर्मा और जयश्री जाजू ने किया. दर्शकों ने बाल कलाकारों की प्रस्तुति की मुक्त कंठ से प्रशंसा की. 

इस अवसर पर दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा की मासिक पत्रिका ‘स्रवंति’ के संगोष्ठी विशेषांक का लोकार्पण भी किया गया. इस अंक में हरिशंकर परसाई, शमशेर बहादुर सिंह, विश्वनाथ त्रिपाठी, अशोक वाजपेयी, गजानन माधव मुक्तिबोध, नामवर सिंह, रामविलास शर्मा, रामस्वरूप चतुर्वेदी, देवीशंकर अवस्थी और विष्णु खरे के दस्तावेजी आलेखों को सम्मिलित किया गया जो ‘अंधेरे में’ के पुनर्पाठ में सहायक हैं.

‘मुक्तिबोध : व्यक्ति और रचनाकार” विषयक पहले विचार सत्र की अध्यक्षता 'भास्वर भारत' के संपादक डॉ. राधेश्याम शुक्ल ने की तथा मुख्य अतिथि के रूप में बी. जे. आर. डिग्री कॉलेज के हिंदी विभागाध्यक्ष डॉ. घनश्याम उपस्थित रहे. डॉ. साहिराबानू बी. बोरगल ने मुक्तिबोध के जीवन और व्यक्तिव पर प्रकाश डाला तो डॉ. गोरखनाथ तिवारी ने उनके साहित्यिक प्रदेय पर समीक्षात्मक चर्चा की.  

 “अंधेर में : पुनर्पाठ” शीर्षक दूसरे विचार सत्र की अध्यक्षता प्रो. देवराज ने की तथा मुख्य अतिथि के रूप में प्रो. एम. वेंकटेश्वर उपस्थित रहे. इस सत्र में डॉ. बलविंदर कौर ने “अंधेरे में : कथ्य विश्लेषण”, डॉ. मृत्युंजय सिंह ने “अंधेरे में का वैशिष्ट्य : स्थापत्य का विशेष संदर्भ” और डॉ. बी. बालाजी ने “मुक्तिबोध और अंधेरे में : वाया नया ज्ञानोदय” विषयक तीन विचारोत्तेजक शोधपत्र प्रस्तुत किए.

इस समारोह का दूसरा दिन अत्यंत विचारोत्तेजक और मौलिक सूझ से परिपूर्ण रहा. यह एक विस्मयकारी अनुभव था कि इस अवसर के लिए अलग-अलग अनुवादकों ने मुक्तिबोध की कविता ‘अंधेरे में’ का 12 अलग-अलग भारतीय भाषाओं में अनुवाद किया है. इन समस्त अनुवादों का लोकार्पण पहले दिन डॉ. रमेश पोखरियाल ‘निशंक’ ने किया तथा दूसरे दिन अनुवादकों ने अपन्रे अनुवाद अनुभव पर चर्चा की जिस पर खुला परिसंवाद चला. उल्लेखनीय है कि ‘अंधेरे में’ का अनुवाद तेलुगु में डॉ. भागवतुल हेमलता ने, कन्नड में साहेबहुसैन जहागीरदार और डॉ. एस. टी. मेरावाडे ने, तमिल में डॉ. जी. नीरजा ने, मलयालम में डॉ. श्याम प्रसाद ने, मराठी में मेघा आचार्य ने, राजस्थानी में डॉ. मंजु शर्मा ने, उर्दू में डॉ. सैयद मासूम रज़ा ने, बांग्ला में प्रो. देवराज ने, ओडिया और ब्रजभाषा में विजेंद्र प्रताप सिंह ने, मणिपुरी में डॉ. ई. विजयलक्ष्मी ने तथा कॉकबरक में डॉ. मिलन जमातिया ने किया है.

समारोह के तीसरे दिन दो समांतर सत्रों में 60 से अधिक शोधार्थियों ने शोधपत्र प्रस्तुत किए. इन सत्रों की अध्यक्षता तेलंगाना विश्वविद्यालय से संबद्ध डॉ. प्रवीणा राज और मौलाना आजाद राष्ट्रीय उर्दू विश्वविद्यालय से संबद्ध डॉ. करन सिंह ऊटवाल ने की तथा प्रो. एम. वेंकटेश्वर और डॉ. विजेंद्र प्रताप सिंह विशेषज्ञ के रूप में उपस्थित रहे.

उल्लेखनीय है कि इस राष्ट्रीय संगोष्ठी के निदेशक प्रो. ऋषभदेव शर्मा को उनकी सुदीर्घ हिंदी सेवा और साहित्य सृजन के लिए हैदराबाद स्थित प्रतिभा प्रकाशन की ओर से ‘सुगुणा साहित्य पुरस्कार 2015’ से सम्मानित भी किया गया. इस अवसर पर पुरस्कार-संयोजक डॉ. एम. रंगैय्या ने पुरस्कृत साहित्यकार के व्यक्तित्व और कृतित्व का परिचय दिया.

इस संगोष्ठी में भाग लेने के लिए हैदराबाद के अतिरिक्त तेलंगाना तथा आंध्रप्रदेश के दूरदराज इलाकों से आए 200 से अधिक साहित्य प्रेमी, पत्रकार, विभिन्न विश्वविद्यालयों के प्राध्यापक, शोधार्थी एवं छात्र उपस्थित रहे।

प्रस्तुति : डॉ. गुर्रमकोंडा नीरजा
प्राध्यापक
उच्च शिक्षा और शोध संस्थान
दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा
खैरताबाद, हैदराबाद – 500 004
मोबाइल – 0984998634

 

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http://hyderabadse.blogspot.in

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म.प्र. के मालवा के मूल निवासी थे पं. मालवीय

मरणोपरांत भारत रत्न पाने वाले मदन मोहन मालवीय के परिवार की जड़ें मध्‍यप्रदेश के मालवा से जुड़ी हैं। उनके परदादा प्रेमधर मालवीय मालवा की मिट्टी में ही पले और बढ़े। 1819 में मुस्लिमों के शासनकाल में श्री गौड़ ब्राम्हण परिवार के साथ शासक अन्याय करने लगे थे। इससे तंग आकर प्रेमधर यूपी में बस गए, लेकिन परिवार का मालवा से लगाव था, इसलिए सरनेम मालवीय ही रखा।

यह बात महामना की पड़पोती वसुंधरा ओहरी ने बताई। वे इंदौर की बहू हैं और बीते 25 सालों से मनोरमागंज में रहती हैं। वे कहती हैं मालवीय जी को भारत रत्न मिलने की खुशी पूरे परिवार को है। यह बात ज्यादा मायने नहीं रखती कि यह सम्मान देने का फैसला देरी से हुआ, गर्व इस बात का है कि उनकी देशभक्ति को सराहा गया।

वसुंधरा बताती हैं बचपन में हमें माता-पिता मालवीय जी के किस्से सुनाते थे। बनारस हिंदू विश्वविद्यालय की स्थापना के लिए वे खुद को सबसे बड़ा भिखारी बोलते थे। पैसा एकत्र करने के लिए उनके आत्मसम्मान को कई बार ठेस भी पहुंची, लेकिन उन्होंने कभी बुरा नहीं माना। उनका रहन-सहन सादा था, लेकिन विचार उच्च रहते थे।

पेशे से वकील थे, लेकिन देश की खातिर उन्होंने वकालत छोड़ दी। वसुंधरा कहती हैं महामना से प्रेरित होकर मेरी मां चिंता उपाध्याय आजादी के आंदोलन से जुड़ी और जेल भी गई। मां हमसे हमेशा कहती थी कि काम ऐसा करो कि जमाना हमारी मिसाल दे। खुद के लिए जीना जिंदगी नहीं है।

 

साभार- दैनिक नईदुनिया से 

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विदेश मंत्रालय के कांसुलर, पारपत्र एवं वीज़ा प्रभाग द्वारा राजभाषा सम्बन्धी प्रावधानों के निरन्तर उल्लंघन की शिकायत

सेवा में,
श्रीमती सुषमा स्वराज
माननीय विदेश मंत्री, भारत सरकार
नई दिल्ली
 
विषय: विदेश मंत्रालय के कांसुलर, पारपत्र एवं वीज़ा प्रभाग द्वारा राजभाषा सम्बन्धी प्रावधानों के निरन्तर उल्लंघन की शिकायत 
 
महोदया,
इस सम्बन्ध में कई लोग पिछले चार साल से लगातार लिख रहे हैं, सूचना के अधिकार कानून के तहत पूछ रहे हैं परन्तु इस प्रभाग में बैठे अधिकारियों ने जैसे कसम खा रखी है कि हिन्दी में काम नहीं करेंगे तो नहीं करेंगे. हमारी एवं राजभाषा विभाग की चिट्ठियों के उत्तर भी ये लोग देना आवश्यक नहीं समझते हैं. जबसे आपने मंत्रालय का कार्यभार आपने संभाला है तब से मेरी आशा बंधी है कि हिन्दी को विदेश मंत्रालय एवं प्रवासी भारतीय कार्य मंत्रालय में उचित स्थान मिलेगा और जो लोग अंग्रेजी नहीं जानते उन लोगों की बात भी ये दोनों मंत्रालय सुनेंगे. 
 
मेरी शिकायत के मुख्य बिंदु हैं:
(क).             पासपोर्ट सेवा का प्रतीक-चिह्न केवल अंग्रेजी में है जबकि नियम द्विभाषी प्रतीक- चिह्न बनाने का है. पिछले चार साल से लोग इसमें सुधार के लिए लिख रहे हैं पर अधिकारी सुनने को तैयार नहीं हैं. वैसे पासपोर्ट के लिए हमारे यहाँ एक श्रेष्ठ शब्द 'पारपत्र' है पर हम हर अंग्रेजी की गुलामी में इतने अंधे हैं कि हर बात में नक़ल करने के आदी हो गए हैं इसलिए "पारपत्र" शायद दकियानूसी लगता है तभी "पारपत्र सेवा" के बदले "पासपोर्ट सेवा" उधार ले लिया। 
(ख).             प्रभाग से सारी जन सूचनाएँ, परिपत्र, प्रेस विज्ञप्तियाँ केवल अंग्रेजी में जारी की जाती हैं, प्रभाग की हिन्दी वेबसाइट पर पीडीएफ में सभी फाइलें केवल अंग्रेजी वाली ही हैं. हिन्दी वेबसाइट के मीडिया कोने में सभी विज्ञप्तियाँ केवल अंग्रेजी में हैं. पासपोर्ट अधिनियम, नियम एवं पासपोर्ट सेवा के वीडियो भी पूरी तरह से अंग्रेजी में हैं. यह राजभाषा अधिनियम 1963 की धारा 3 (3) एवं राष्ट्रपति जी के अलग-२ समय पर जारी हुए आदेशों का उल्लंघन है। 
(ग).               प्रभाग की अंग्रेजी वेबसाइट को प्राथमिकता मिली हुई है. यहाँ छोटी-२ ऑनलाइन सुविधाएँ भी अंग्रेजी में हैं जैसे शुल्क गणक, पासपोर्ट सेवा केंद्र की जानकारी, मुलाक़ात की उपलब्धता की स्थिति, अपना पुलिस थाना पता करें, कॉमन सेंटर की जानकारी आदि-आदि. अभी भी वेबसाइट पर कई पृष्ठ केवल अंग्रेजी में हैं . वेबसाइट का मुखपृष्ठ पूर्णतः द्विभाषी बनवाएँ ताकि नागरिक हिन्दी के प्रति आकर्षित हों और ऑनलाइन सेवाएं द्विभाषी रूप में प्रयोग करना शुरू करें। डिफ़ॉल्ट अंग्रेजी वेबसाइट होने से लोग उसी का अधिक इस्तेमाल करते हैं और ऐसा होने पर अधिकारी कहते हैं कोई हिन्दी वेबसाइट खोलता नहीं है, उस पर ट्रैफिक कम है तो हम किसलिए हिन्दी में सेवाएं दें इसलिए यह बहुत ज़रूरी है कि वेबसाइट द्विभाषी हो और ताकि नागरिकों को राजभाषा हिन्दी के प्रयोग के लिए प्रेरित किया का सके. वेबसाइट द्विभाषी होने से एक लाभ यह होगा कि वह समस्या मिट जाएगी, जैसा अभी होता कि हिन्दी वेबसाइट पर अंग्रेजी फाइलें जोड़ दी जाती हैं, अथवा हिन्दी वेबसाइट को महीनों तक अद्यतित नहीं किया जाता।
(घ).               एम-पासपोर्ट नामक मोबाइल अनुप्रयोग (एप्प) में राजभाषा हिन्दी को कोई स्थान नहीं दिया गया. यह हिन्दी का अपमान है. इसमें अविलम्ब हिन्दी को शामिल करवाया जाए.
(ङ).              आवेदनों और शपथ आदि के प्रारूप एकसाथ द्विभाषी ना होकर अलग-२ बनाए गए हैं इसलिए प्रचलन में केवल अंग्रेजी वाले प्रपत्र हैं यदि नियमानुसार ये सभी एकसाथ दायें-बायें हिन्दी-अंग्रेजी में तैयार किए जाएँ, छपवाए जाएँ तो हिन्दी का प्रयोग बढ़ेगा.
(च).              2 जुलाई 2008 को संसदीय राजभाषा समिति की आठवीं रिपोर्ट की सिफारिश 73 पर भारत के राष्ट्रपति जी ने आदेश जारी किया था कि विदेश मंत्रालय पासपोर्ट की सभी प्रविष्ठियाँ द्विभाषी रूप में मुद्रित करने की व्यवस्था करे. आज पूरे 6 वर्ष बाद भी विदेश मंत्रालय ने अब तक एक भी पासपोर्ट द्विभाषी प्रविष्टियों के साथ जारी नहीं किया है. कृपया निदेश जारी करें कि प्रभाग अपने वेबसाइट हिन्दी-अंग्रेजी में अलग-२ ना बनाकर उसे १००% द्विभाषी बनाए ताकि लोग हिन्दी के इस्तेमाल के लिए प्रेरित हों और सभी ऑनलाइन फॉर्म द्विभाषी बनाए जाएं जैसा चुनाव आयोग ने किया है, वहाँ ऑनलाइन फॉर्म में हिन्दी में नाम आदि भरने की सुविधा है  (इन्हें देखिए http://electoralsearch.in/ एवं  http://nvsp.in/forms/form6.html). ऐसा करने से पारपत्र को द्विभाषी रूप में जारी करने में कोई परेशानी नहीं होगी पर प्रभाग के अधिकारी ऐसा करना ही नहीं चाहते हैं और राष्ट्रपति जी के आदेश की पिछले सात साल अवमानना कर रहे हैं और तकनीकी परेशानी का झूठा बहाना बना रहे हैं, अन्य अनेक देशों में पासपोर्ट 100 % द्विभाषी/त्रिभाषी रूप में कई वर्षों से जारी किए जा रहे हैं. इसी प्रकार पासपोर्ट कार्यालयों में प्रयोग किये जा रहे सभी सॉफ्टवेयर राजभाषा कानून के नियमानुसार द्विभाषी ना होकर केवल अंग्रेजी में हैं और आवेदकों को इन कार्यालयों से सभी प्रकार की रसीद आदि केवल अंग्रेजी में जारी की जाती है उनमें हिन्दी को कोई स्थान नहीं दिया गया है, इन कार्यालयों में प्रयोग होने वाली सभी स्टेशनरी/फीडबैक फॉर्म इत्यादि भी केवल अंग्रेजी में छपी होती है जैसे #हिन्दी एक अछूत भाषा हो. पासपोर्ट सेवा की प्रीमियम एसएमएस सेवा भी केवल अंग्रेजी में है जबकि इस सेवा के लिए आवेदकों से पैंतीस रुपये वसूल किए जा रहे हैं.  कांपावी (कांसुलर, पारपत्र एवं वीज़ा) प्रभाग ने राजभाषा #हिन्दी में एसएमएस एवं ईमेल सूचना भेजे जाने की कोई सुविधा नागरिकों नहीं दी है और नागरिकों पर जबरन अंग्रेजी थोप दी है. गूगल/फेसबुक /ट्विटर जैसी विदेशी कंपनियां उपयोगकर्ताओं को #हिन्दी में एसएमएस, हिन्दी में ओटीपी सन्देश एवं ईमेल सूचना भेजते हैं पर यह बड़े दुःख/शर्म की बात है भारत सरकार के अधिकारी अपने नागरिकों पर बहाना बनाकर अंग्रेजी थोप रहे हैं एवं हिन्दी में सुविधाएँ देना तो दूर की बात है, उस पर विचार करने को भी तैयार नहीं हैं.

आपसे शीघ्र और सकारात्मक तथा कारगर कार्यवाही की अपेक्षा है.

 
शीघ्र कार्यवाही की अपेक्षा के साथ

भवदीय 
दुलारेश कुमार
कार्यालय क्र. ५४, अनेक्स मॉल, ब्रॉडवे,
पश्चिमी द्रुतगति मार्ग, बोरीवली पूर्व, मुम्बई – ४०००६६
 
प्रतिलिपि:
1. राजभाषा विभाग

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इस देश के बेशर्म नेता, मंत्री और अफसर इस नन्हीं बच्ची से कुछ सीखेंगे?

नरसिंहपुर(ब्यूरो)। पिछले तीन-चार महीनों से स्कूल में अंधेरा था। न किसी अधिकारी के कानों में जू रेंगी और न किसी नेता का दिल पसीजा। शहर की एक बेटी से रहा न गया तो वो अपने भाई-बहनों की खातिर छात्रवृत्ति और गुल्लक में जमा इकठ्ठे पैसों को ले बिजली विभाग के दफ्तर जा पहुंची।

कहा- ये पैसों ले लो और कनेक्शन जोड़ दो। मामला यहां स्थित ब्रांच प्राथमिक स्कूल का है। बिजली बिल न चुकाने के चलते इस स्कूल का कनेक्शन काट दिया गया था और पिछले 3-4 महीनों से अंधेरा था। इधर, गर्मी बढ़ी तो दिक्कते भी बढ़ गईं। छात्र हलाकान और शिक्षक परेशान हो रहे थे।

बात कुछ यूं है कि इस प्राथमिक स्कूल में लगे आधार कार्ड कैंप और चुनाव के वक्त भरपूर बिजली का उपयोग हुआ, लेकिन बिल शिक्षकों के भरोसे छोड़ दिया। बिल इकठ्ठा होकर 8 हजार रुपए हो गया। शिक्षक-शिक्षिकाएं जब बिल अदा करने में नाकाम रहे तो बिजली विभाग ने कनेक्शन ही काट दिया। नईदुनिया ने बार-बार ध्यान आकर्षण कराया पर कोई आगे नहीं आया। स्कूल के 158 बच्चे अंधेरे में पढ़ने को मजबूर रहे।

मेरे भाई-बहनों को दिक्कत होगी, कनेक्शन जुड़वा दीजिए

रविवार 29 मार्च को नगर की एक बिटिया मेमूना खान जो केन्द्रीय विद्यालय में कक्षा 9वीं की छात्रा है ने अपनी गुल्लक और छात्रवृत्ति के जमा पैसों को निकाल 3 हजार रुपए जुटाए और सहायक यंत्री के नाम एक आवेदन लिख डाला।

कहा कि 8 हजार रुपए के बिल को किस्तों में कर दें, मैं अपनी छात्रवृत्ति और गुल्लक के पैसे 3 हजार रुपए जमा कर रही हूं। क्योंकि बिजली नहीं होने से वहां पढ़ने वाले मेरे छोटे भाई-बहनों को शुरू होने वाली परीक्षा में दिक्कत होगी। मैं अभी 3 हजार जमा कर रही हूं, शेष पैसा किस्तों में जमा कर दूंगी बस बिजली कनेक्शन जुड़वा दीजिए।

मुख्यमंत्री को लिखा था पत्र, बनी थी रोड

केन्द्रीय विद्यालय की इस छात्रा ने अपने विद्यालय की रोड बनाने मुख्यमंत्री को पत्र लिखा था। जिस पर विद्यालय तक सीसी रोड भी बनाई गई थी।

मामा कर रहे करोड़ों खर्च और विभाग 8 हजार नहीं

एक तरफ मामा शिवराज सिंह मुख्यमंत्री शिक्षा के नाम पर करोड़ों खर्च कर रहे हैं, तो दूसरी तरफ शिक्षा विभाग और जिला प्रशासन बकाया बिल का 8 हजार जमा नहीं कर सका। मैंने खबर पड़ी थी तो मुझे लगा कि मेरे छोटे भाई-बहन नजदीक आ रही परीक्षा के वक्त परेशान होंगे, इसलिए मैंने अपनी गुल्लक के जमा पैसे और छात्रवृत्ति से मिले पैसे इकठ्ठे किए और बिजली दफ्तर पहुंचकर आवेदन देकर पैसे जमा कर दिए। कहा की कनेक्शन जोड़ दो। मैं अपने छोटे भाई के साथ आवेदन देने दफ्तर गई। मेमुना खान, छात्रा केन्द्रीय विद्यालय

छात्रा ने मुझे आवेदन दिया है। ब्रांच स्कूल का बिजली कनेक्शन जोड़ दिया जाए और बकाया बिल को किस्त में विभाजित कर अदा करने की अनुमति दी जाए। उसने अभी 8 हजार 10 रुपए में से 3 हजार जमा किए हैं। मैं सोमवार को स्कूल का बिजली कनेक्शन जुड़वा दूंगा। एमएस मनकोटिया, सहायक यंत्री मप्रपूक्षेविविकंलि नरसिंहपुर

स्कूल में कई माह आधार कार्ड बनाने का कैंप लगा रहा। इसमें भरपूर बिजली का उपयोग किया गया, लेकिन बिल जमा नहीं किया। आधार कार्ड बनाने वाली कंपनी के अधिकारी कहते रहे कि बिल जमा कर दिया है, पर जब बिल आया तब पता चला कि इतना अधिक बिल हो गया है। स्कूल के पास ऐसा कोई फंड नहीं होता जिससे इतनी अधिक राशि जमा कराई जा सके। इस संबंध में सभी संबंधित अधिकारियों को अवगत करा दिया गया है। दयावती तिरकाम, प्रधानपाठिका

साभार-  http://naidunia.jagran.com/ से 

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चलो फिर अहिंसा के बिरवे उगाएँ

प्रसंगवश भगवान महावीर की जयन्ती पर अणुव्रत अनुशास्ता आचार्य तुलसी के विचार मननीय प्रतीत हुए कि सभी व्यक्ति अहिंसा की शीतल छाया में विश्राम पाने के लिए उत्सुक रहते हैं, सत्य का साक्षात्कार करना चाहते हैं. अहिंसा का क्षेत्र व्यापक है. यह सूर्य के प्रकाश की भांति मानव मात्र और उससे भी आगे प्राणी मात्र के लिए अपेक्षित है. इसके बिना शांतिपूर्ण सहअस्तित्व की बात केवल कल्पना बनकर रह जाती है. अहिंसा का आलोक जीवन की अक्षय संपदा है. यह संपदा जिन्हें उपलब्ध हो जाती है, वे नए इतिहास का सृजन करते हैं. वे उन बंधी-बंधाई परंपराओं से दूर हट जाते हैं, जिनकी सीमाएं हिंसा से स्पृष्ट होती हैं. परिस्थितिवाद का बहाना बनाकर वे हिंसा को प्रश्रय नहीं दे सकते.

अहिंसा की चेतना विकसित होने के अनंतर ही व्यक्ति की मनोभूमिका विशद बन जाती है. वह किसी को कष्ट नहीं पहुंचा सकता. इसके विपरीत हिंसक व्यक्ति अपने हितों को विश्व-हित से अधिक मूल्य देता है. किंतु ऐसा व्यक्ति भी किसी को सताते समय स्वयं संतप्त हो जाता है. किसी को स्वायत्त बनाते समय उसकी अपनी स्वतंत्रता अपहृत हो जाती है.

किसी पर अनुशासन थोपते समय वह स्वयं अपनी स्वाधीनता खो देता है. इसीलिए हिंसक व्यक्ति किसी भी परिस्थिति में संतुष्ट और समाहित नहीं रह सकता. उसकी हर प्रवृत्ति मं एक खिंचाव-सा रहता है. वह जिन क्षणों में हिंसा से गुजरता है, एक प्रकार के आवेश से बेभान हो जाता है. आवेश का उपशम होते ही वह पछताता है, रोता है और संताप से भर जाता है.

हिंसक व्यक्ति जिस क्षण अहिंसा के अनुभाव से परिचित होता है, वह उसकी ठंडी छांह पाने के लिए मचल उठता है. उसका मन बेचैन हो जाता है. फिर भी पूर्वोपात्त संस्कारों का अस्तित्व उसे बार-बार हिंसा की ओर धकेलता है. ये संस्कार जब सर्वथा क्षीण हो जाते हैं तब ही व्यक्ति अहिंसा के अनुत्तर पथ में पदन्यास करता है और स्वयं उससे संरक्षित होता हुआ अहिंसा का संरक्षक बन जाता है.अहिंसा के संरक्षक इस संसार के पथ-दर्शक बनते हैं और हिंसा, भय, संत्रास, अनिश्चय, संदेह तथा असंतोष की अरण्यानी में भटके हुए प्राणियों का उद्धार करते हैं.

इसी तरह डॉ.जगदीश व्योम की ये पंक्तियाँ भी हमें अहिंँसा को जीवन मूल्य के रूप में अपनाने की सीख दे रही हैं – 

चलो फिर अहिंसा के बिरवे उगाएँ !
बहुत लहलही आज हिंसा की फसलें
प्रदूषित हुई हैं धरा की हवाएँ।
चलो फिर अहिंसा के बिरवे उगाएँ।।

बहुत वक़्त बीता कि जब इस चमन में
अहिंसा के बिरवे उगाए गए थे
थे सोये हुए भाव जन-मन में गहरे
पवन सत्य द्वारा जगाये गये थे,
बने वृक्ष, वट-वृक्ष , छाया घनेरी
धरा जिसको महसूसती आज तक है
उठीं वक़्त की आँधियां कुछ विषैली
नियति जिसको महसूसती आज तक है,
नहीं रख सके हम सुरक्षित धरोहर
अभी वक़्त है, हम अभी चेत जाएँ।
चलो फिर अहिंसा के बिरवे उगाएँ।।

नहीं काम हिंसा से चलता है भाई
सदा अंत इसका रहा दु:खदाई
महावीर, गाँधी ने अनुभव किया, फिर
अहिंसा की सीधी डगर थी बताई
रहे शुद्ध-मन, शुद्ध-तन, शुद्ध-चिंतन
अहिंसा के पथ की यही है कसौटी
दुखद अन्त हिंसा का होता हमेशा
सुखद खूब होती अहिंसा की रोटी
नई इस सदी में, सघन त्रासदी में
नई रोशनी के दिये फिर जलाएँ।
चलो फिर अहिंसा के बिरवे उगाएँ।
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प्राध्यापक, हिन्दी विभाग, शासकीय 
दिग्विजय महाविद्यालय,राजनांदगांव।
मो.9301054300  

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4 अप्रैल को हनुमान जयंती पर चंद्र ग्रहण

हनुमान जयंती के दिन इस बार पूर्णिमा तिथि पड़ रही है। वर्षों बाद इसी दिन चंद्रग्रहण भी पड़ रहा है।  4 अप्रैल को दोपहर 3.46 बजे ग्रहण का सूतक लग जाएगा।  5.28 को मध्यकाल, 5.33 को अंत तथा 7.15 बजे ग्रहण का मोक्ष होगा। अर्थात 3.46 से 7.15 बजे तक चंद्रग्रहण का असर रहेगा। हनुमानजी के दर्शन मोक्ष होने के बाद रात 7.15 बजे के बाद ही किए जा सकेंगे।   सूतक काल में मंदिरों के पट भी बंद रहेंगे। इसी दिन शाम 6.15 बजे चंद्रोदय होगा। पूर्वोत्तर राज्यों में जल्द सूर्योदय होता है और असर भी जल्द हो जाता है। इसलिए मोघालय में चंद्रग्रहण अच्छे से दिखाई देगा।

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पत्रकार सलमा जैदी का निधन

बीबीसी से लंबे समय तक जुड़ी रहीं वरिष्ठ पत्रकार सलमा जैदी का रविवार को लंदन में निधन हो गया। वह कुछ समय से बीमार थीं और वहीं उनका इलाज चल रहा था।

वह बीबीसी हिंदी रेडियो पर एक जानी-मानी आवाज थीं और हिंदी भाषा में डिजिटल दुनिया में काम कर रही चंद महिलाओं में शुमार थीं। उन्होंने बीबीसी में अपनी पारी की शुरुआत बीबीसी हिंदी रेडियो से की थी। बाद में वह बीबीसी हिंदी ऑनलाइन की प्रमुख बनीं। बीबीसी में उन्होंने महिलाओं, अल्पसंख्यकों और बच्चों से जुड़े विषयों पर विशेष काम किया।

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इ मेल मार्केटिंग को भारत में एक नया आयाम दिया है कल्पित जैन ने

ई-मेल मार्केटिंग बाजार की नई शैली है। दुनिया भर में 2.5 अरब ईमेल यूजर्स हैं और इसके जरिए कमर्शियल मेसेज भेजना एक लोकप्रिय ट्रेंड है। नेटकोर ( Netcore)  के सीओओ कल्पित जैन का मानना है कि आने वाले समय में यह नया बाजार खड़ा करेगा। पेश हैं कल्पित से एक बातचीत-

नेटकोर  ने कुछ साल पहले ई-मेल मार्केटिंग की शुरुआत की थी। तब से अब तक प्रचार और उपभोक्ताओं की आदतों में क्या बदलाव हुए हैं?

हमने पांच साल पहले इसकी शुरुआत की थी और अब हमारा रिटर्न ऑन इनवेस्टमेंट अच्छा है। देश में इंटरनेट उपभोक्ता बढ़े हैं और ईमेल्स भी। 

आपके ऑपरेशंस का स्केल क्या है?

हम हर महीने 300 से 350 करोड़ ईमेल भेजते हैं यानी हर मिनट करीब 1 लाख ईमेल। हम भारत के 1000 से 2000 ब्रैंड्स के साथ काम कर रहे हैं और ई-मेल मार्केटिंग के नंबर वन प्लेयर हैं।

भारत में ई-मेल मार्केटिंग का क्या सीन है?

हमारे देश में ई-मेल मार्केटिंग का कुल बाजार 125-150 करोड़ रुपए का है। पांच साल पहले यह 20-25 करोड़ रुपए का था। इस समय देश के कुल डिजिटल रेवेन्यू में ई-मेल मार्केटिंग की हिस्सेदारी 25-30 पर्सेंट है। हर साल ईमेल मार्केटिंग में 75 से 80 पर्सेंट की बढ़ोतरी हो सकती है। इसका सबसे बड़ा कारण ई-कॉमर्स और BFSI हैं।

ई-मेल मार्केटिंग का अगला चरण क्या है?

अगला चरण मार्केटिंग ऑटोमेशन है। बहुत सी ई-कॉमर्स कंपनियां इस तरफ बढ़ रही हैं। इसलिए हम मार्केटिंग ऑटोमेशन जैसी क्षमता विकसित करने की दिशा में काम कर रहे है।

मोबाइल डिवाइस के बढ़ने से ग्राहकों के लिए ई-मेल देखना आसान हुआ है और मार्केटिंग कैंपेन्स पर भी असर हुआ है। आप क्या कहना चाहेंगे?

दो साल पहले सिर्फ 15 से 20 प्रतिशत लोग ही मोबाइल पर ई-मेल्स चेक करते थे। आज 35 से 40  प्रतिशत लोग ऐसा करते हैं। ईमेल सबसे ज्यादा  प्रयोग किया जाने वाला ऐप है और इसका इस्तेमाल लगातार बढ़ रहा है। ई-मेल कैपेन्स दूसरी ऐप्लीकेशंस, एसएमएस से भी जोड़े जा रहे हैं। इस प्रक्रिया को डीपलिंकिंग कहा जाता है। इसमें हम मल्टी चैनल कम्युनिकेशन करते हैं। इसके अलावा हमारा एक प्लेटफॉर्म है MARtech  जिसमें एक प्लेटफॉर्म पर इन सभी माध्यमों को जोड़ा जाता है। एक क्लाइंट अपनी मैसेजिंग के एक हिस्से को sms से तो दूसरे हिस्से को ई-मेल के जरिए भेज सकता है। यह ईमेल मार्केटिंग का अगला चरण है।

नेटकोर के लिहाज से, ई-मेल मार्केटिंग आने वाले सालों में आपके लिए कितनी महत्वपूर्ण होगी?

अगले दो से तीन सालों में ई-मेल मार्केटिंग से हमें 50 से 55 प्रतिशत राजस्व मिलेगा।

आपके अनुसार, दूसरे माध्यमों की तुलना में ई-मेल कितना लाभकारी माध्यम है?

देखिए ऐसी रिपोर्ट्स हैं जो कहती हैं कि हर ई-मेल, जिस पर आप 1 डॉलर खर्च करते हैं, आपको 40 डॉलर का रिटर्न मिलता है। ई-मेल दूसरी डिजिटल मार्केटिंग के मुकाबले एक पुश नोटिफिकेशन है। इसीलिए बहुत सी ई-कॉमर्स कंपनियां इसे चुनती हैं। हमारे कुल ई-मेल रेवेन्यू का 20 से 25 पर्सेंट हिस्सा ई-कॉमर्स सेक्टर से आता है। हमने यह भी सुना है कि ई-मेल्स न जाने के कारण कुछ क्लाइंट्स के बिजनेस में 40 से 45 पर्सेंट का घाटा भी हुआ है।

ऑटोमेशन और मल्टी चैनल कम्युनिकेशन के अलावा ई-मेल मार्केटिंग में नए डिजिटल ट्रेंड, जैसे विडियो मार्केटिंग कैसे फिट हो रहे हैं?  

कई कंपनियां ई-मेल में विडियो भी जोड़ रही हैं। दूसरी अवधारणा है- Dynamic Content, यह एक लाइव टिकर है। जितनी बार ई-मेल खोली जाती है, इस पर कंटेंट अपने आप बदल जाता है। पर्सनलाइजेशन और रेलेवेंसी भी एक ट्रेंड है। रेलेवेंसी यानी प्रासंगिकता बहुत महत्वपूर्ण है। Gmail जैसा सर्विस प्रोवाइडर इस बात के लिए बहुत सख्त है कि आपका कंटेंट कितना रेलेवेंट है वरना आपकी ई-मेल को spam फोल्डर में डाल दिया जाता है।

मेल्स को प्रमोशंस और प्राइमरी फोल्डर्स में बांटने से क्या फायदा या नुकसान हुआ है, जैसा कि जी मेल  पर किया जाता है?

शुरुआत में तो ऐडवर्टाइजर्स को लगा था कि इससे उनका विज्ञापन दिखेगा ही नहीं, लेकिन इसका नुकसान देखने को नहीं मिला। भले ही यूजर को ई-मेल दिखाई न दे लेकिन जब भी उसे समय मिलेगा, वह प्रमोशन फोल्डर में जाएगा जरूर। इसके लिए हमें कस्टमर से साथ एंगेज होना पड़ेगा।

जी मेल से आपको कुल कितना ट्रैफिक मिलता है?

भारत में, 60 से 70 प्रतिशत।

साभार- समााचार4मीडिया से 

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