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आपके डिजिल तालों की चाभी चोरों के हाथ में

कभी ताले तोड़कर घरों और दुकानों में चोरी की जाती थी, लेकिन टेक्नोलॉजी के दौर में अब चोरी भी हाइटेक हो गई है। आज घरों में एसी से लेकर दरवाजों तक हर कहीं स्मार्ट गैजेट आपके एक क्लिक पर कंट्रोल किए जा रहे हैं। हैकर्स के कारण अब यही स्मार्ट होम बिल्कुल भी सिक्योर नहीं है। कहीं से भी आपके पूरे घर को हैकर आसानी से कंट्रोल कर सकते हैं। ये हैकर्स इंटरनेट के जरिए आपके हर स्मार्ट डिवाइस को हैक कर रहे हैं। सिमेंटेक एंटीवायरस द्वारा हाल ही में देशभर के कई शहरों में स्मॉर्ट होम कंसेप्ट का सर्वे किया गया है। अधिकतर घरों में इंटरनेट और डिवाइस में कमजोर पासवर्ड होने के कारण हैकर इसे आसानी से निशाना बना रहे हैं।

 

रिपोर्ट के अनुसार कई स्मार्ट होम में बुनियादी सुरक्षा की कमी देखने को मिल रही है। इसमें 20 प्रतिशत से ज्यादा मोबाइल एप्लीकेशन के डेटा 'एन्क्रिप्ट' ही नहीं है। इसमें कुछ गैजेट को हैक कर आसानी से घर को अनलॉक किया जा सकता है। सभी स्मॉर्ट होम में 10 प्रतिशत से ज्यादा वेब कंट्रोलिंग की कमियां देखने को मिली हैं। एक्सपर्ट्स के अनुसार इंदौर और भोपाल जैसे शहरों में अब स्मार्ट होम सिस्टम का क्रेज बढ़ता जा रहा है। कई टाउनशिप और घरों में स्मार्ट सिक्योरिटी सिस्टम का नया ट्रेंड देखने को मिल रहा है। इंटरनेट से स्मार्ट टीवी, लॉक, एसी, सर्विलेंस सिस्टम और सीसीटीवी भी कनेक्ट होते हैं। हर गैजेट को हैक कर हैकर्स इसका इस्तेमाल अपने फायदे के लिए कर रहे हैं।

 

स्मार्ट होम को क्लाउड सर्विस के जरिए रिमोट कंट्रोल किया जा रहा है। इसमें कमजोर पासवर्ड का ज्यादा इस्तेमाल होने के कारण इसे आसानी से हैक किया जा रहा है। इसमें चार नंबर के पिन कोड का आसानी से क्रेक किया जा रहा है। इसमें स्मार्ट लाइट तक को हैकर आसानी से बंद चालू कर सकते है। किसी भी घर के दरवाजों को कहीं से भी बैठकर खोला या बंद किया जा सकता है।

 

एक्सपर्ट इमरोज खान कहते हैं कि वाई-फाई डिवाइस से कनेक्ट हर गैजेट में सिक्योरिटी का इश्यू हमेशा बना रहता है।कई घरों में स्मार्ट होम सिक्योरिटी सिस्टम या सीसीटीवी भी वाईफाई नेटवर्क से कनेक्ट रहते है। यूजर एक बार वाई-फाई इंटरनेट में पासवर्ड देने के बाद उसे बदलते नहीं है। इससे आसानी से कोई भी हैक कर सकता है। इसके लिए जरूरी है कि वाईफाई में पासवर्ड को बेहतर रखें। सभी गैजेट की मॉनिटरिंग समय की जाना चाहिए।

 

 

– लाइट बल्ब

-स्मोक डिटेक्टर

-एनर्जी मैनेजमेंट डिवाइस

-स्मार्ट हब

-सिक्योरिटी अलार्म

– सर्विलेंस आईपी कैमरा

-स्मार्ट टीवी एंड सेटअप बॉक्स

-ब्रांडबैंड राउटर

-नेटवर्क अटैच स्टोरेज

हैकिंग से ये खतरा

-प्राइवेसी की दिक्कत

-स्मार्ट होम पर कंट्रोल नहीं

-सभी तरह की सर्विस बंद हो सकती है

-एसी से लेकर दरवाजों तक का कंट्रोल हैकर कर सकते हैं

 

क्या ध्यान रखना जरूरी

-यूनिक कोड और नंबर पासवर्ड में जरूरी हो

-डिफाल्ट पासवर्ड को जरूर बदलें

-वाई-फाई नेटवर्क इन्क्राफिशन सेटिंग का इस्तेमाल करें।

-वायर इंटरनेट कनेक्शन का इस्तेमाल ज्यादा से ज्यादा करें

-डिवाइस की सिक्योरिटी को एक बार सर्वे जरूर कराएं।

-लेटेस्ट ऑपरेटिंग सिस्टम और बेहतर एंटीवायरस का इस्तेमाल करें।

 

साभार- http://naidunia.jagran.com/ से

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जल्दी ही लाल बत्ती गुल हो जाएगी कई मंत्रियों और नेताओं की

केंद्रीय सड़क परिवहन मंत्री नितिन गडकरी के प्रस्ताव को मंजूरी मिल गई तो केंद्र और राज्य सरकारों के मंत्री भी अपनी गाड़ियों पर लाल बत्ती नहीं लगा सकेंगे। केंद्र में 5 पदों और राज्य में 4 पदों पर आसीन लोगों के लिए ही लाल बत्ती के इस्तेमाल को मंजूरी देने के प्रस्ताव पर विचार चल रहा है। इस बारे में अंतिम प्रस्ताव पेश करने से पहले गडकरी ने महत्वपूर्ण केंद्रीय मंत्रालयों से उनकी राय मांगी है।

 

नितिन गडकरी चाहते हैं कि केंद्र में राष्ट्रपति, उप-राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री, लोकसभा स्पीकर और देश के चीफ जस्टिस को ही यह विशेषाधिकार मिले। इसी प्रकार वह राज्यों में राज्यपाल, मुख्यमंत्री, विधानसभा स्पीकर और हाई कोर्ट के चीफ जस्टिस के लिए लाल बत्ती वाली कार की सुविधा चाहते हैं।

 

सूत्रों ने बताया कि गडकरी ने इस मसले पर कैबिनेट के अपने सहयोगियों गृह मंत्री राजनाथ सिंह, वित्त मंत्री अरुण जेटली और विदेश मंत्री सुषमा स्वराज से राय मांगी है। सितबंर 2013 में ही सुप्रीम कोर्ट ने अपने एक फैसले में लाल बत्ती के सीमित इस्तेमाल की पैरवी की थी। गडकरी ने उस समय के बाद से चल रही प्रक्रिया, विभिन्न मंत्रालयों के साथ हुए पत्राचार, कानूनी राय और अब तक मिले सुझावों का ब्योरा भी मंत्रियों को भेजा है।

 

एक सरकारी सूत्र ने बताया, 'इन मंत्रियों के विचार आने के बाद सरकार के सामने औपचारिक प्रस्ताव लाया जाएगा। इसमें कुछ समय लग सकता है, लेकिन एक बात साफ है कि लाल बत्ती का इस्तेमाल करने वालों की संख्या काफी सीमित की जाएगी। एक बार यह हो जाता है तो इसे लागू कराने के लिए कड़े नियम और जुर्माने का प्रावधान किया जाएगा।

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सोनिया गाँधी से लेकर मनमोहन सिंह और स्मृति ईरानी सब मुफ्तखोरी की सूची में

कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी, पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह, एच डी देवेगौड़ा, केंद्रीय मंत्री स्मृति ईरानी, नजमा हेपतुल्ला और राम विलास पासवान उन 300 से अधिक सांसदों में शामिल हैं, जो बिजली पानी के बिल बकाया रहने को लेकर नई दिल्ली नगरपालिका परिषद (एनडीएमसी) के उल्लंघनकर्ताओं की सूची में शामिल हैं।

 

परिषद ने बिजली एवं पानी के बिल बकाया रहने को लेकर उल्लंघनकर्ताओं की सूची जारी की है जिसमें पूर्व मंत्री जयनारायण प्रसाद निषाद, लालकृष्ण आडवाणी, दिग्विजय सिंह और जगदीश टाईटलर के नाम भी हैं। इस सूची में दिसंबर 2014 तक बिल का भुगतान नहीं करने वालों के नाम हैं जिनमें लोकसभा के 166 और राज्यसभा के 151 सदस्य शामिल हैं। निशाद, देवेगौड़ा और तेलंगाना के मुख्यमंत्री के चंद्रशेखर राव इस सूची में शीर्ष पर हैं, जिन पर लाखों रुपये का बिल बकाया है। निशाद पर एनडीएमसी का 18.47 लाख रुपये, देवेगौड़ा पर 1.49 लाख रुपये और राव पर 1.27 लाख रुपये बकाया है।

 

पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह पर 22,934 रुपये बकाया है, जबकि सोनिया गांधी और जयराम रमेश पर क्रमश: 193.68 और 206 रुपये बकाया है। दिग्विजय सिंह को 25,484 रुपये, जगदंबिका पाल को 30,953 रुपये, पासवान को 49,464 रुपये, शशि थरूर को 7,374 रुपये और आडवाणी को अब 3,311 रुपये का भुगतान करना है। केंद्रीय मंत्री स्मृति ईरानी एवं नजमा हेपतुल्ला पर क्रमश: 12,934 रुपये और 1,637 रुपये बकाया है। अमर सिंह, मोतीलाल वोहरा, राजपाल सिंह सैनी, पलवई गोवर्धन रेड्डी और बिरेंदर सिंह पर एनडीएमसी का क्रमश: 1.47 लाख रुपये, 1.31 लाख रुपये, 76 हजार 934 और 68 हजार 134 रुपये बकाया हैं।

 

एनडीएमसी के एक वरिष्ठ अधिकारी ने कहा, एनडीएमसी ने लोकसभा और राज्यसभा के सदस्यों के बकाये के भुगतान के लिए केंद्रीय लोकनिर्माण विभाग और आवास समितियों को लिखा है। संवैधानिक पदों पर आसीन व्यक्ति का बिजली पानी बिल सीपीडब्ल्यूडी भरता है जबकि सांसदों के निवासों का पानी एवं बिजली बिल उनकी तनख्वाह से काटा जाता है। उन्होंने कहा, हमने बकाये की याद दिलाते हुए पहले भी नोटिस भेजे हैं। हालांकि अधिकारी ने इस पर कोई टिप्पणी करने से इनकार कर दिया कि यदि बकाये का भुगतान नहीं किया जाता है तो क्या, उल्लंघनकर्ताओं के बिजली एवं पानी के कनेक्शटन काट दिए जाने जैसी कार्रवाई पर परिषद विचार कर रही है।

 

एनडीएमसी ने लोकसभा के 859 पूर्व सदस्यों की भी सूची जारी की है जिन पर अब भी पानी-बिजली के बिल बकाया है।  इस सूची में शीर्ष पर कांग्रेस नेता जगदीश टाईटलर हैं, जिन पर 16.97 लाख रुपये बकाया हैं। बी जी जलवाली, शिवप्रताप मिश्रा और हाजी गुलाम मोहम्मद खान पर क्रमश: 7.67 लाख रुपये, 6.27 लाख रुपये और 5.40 लाख रुपये बकाया है।

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विज्ञापनों से 2 हजार करोड़ जुटाएगी रेल्वे

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वित्‍तीय संकट से निपटने के लिए रेल मंत्रालय अपनी खाली जमीनों, ट्रेन और स्‍टेशनों समेत सभी रेल परिसं‍पत्तियों पर विज्ञापन के जरिये 2,000 करोड़ रुपये जुटाने की एक योजना पर विचार कर रहा है। मंत्रालय के एक सीनियर अफसर ने बताया कि डीके मित्‍तल समिति की सिफारिश के अनुसार बड़े पैमान पर ट्रनों और स्‍टेशनों पर विज्ञापनों से राजस्‍व जुटाने की एक नीति तैया की जाएगी।

रेलवे से अतिरि‍क्‍त राजस्‍व जुटाने के लिए साधन और तरीका सुझाने के लिए गठित उच्‍च स्‍तरीय समिति ने पिछले महीने अपनी रिपोर्ट रेल मंत्री को सौंप दी थी।

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क्या मोदीजी का सूट सूरत के विकास की नई कहानी लिखेगा?

पिछले महीने सूरत हीरा उद्योग ने एक नीलामी में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का विवादास्पद महीन धारियों वाला सूट 4.31 करोड़ रुपये की भारी-भरकम राशि में खरीदा था, जो उसका एक रणनीतिक निवेश माना जाना चाहिए। इसका फायदा उसे भविष्य में कारोबारी मामलों में केंद्र के समर्थन के रूप में मिल सकता है। विशेष रूप से ऐसे समय में जब हीरे का कारोबारी केंद्र मुंबई के स्थान पर सूरत को बनाने को लेकर गहमागहमी बढ़ रही है।

देश से तराशे हीरों का जितना निर्यात होता है, उसमें मुंबई का योगदान करीब 90 फीसदी होता है। सूरत में हीरों के कारोबार के लिए एक्सचेंज बन रहा है, जिससे मुंबई का ज्यादातर कारोबार सूरत में जाने की संभावना है। स्थानीय उद्योग की मांग है कि देश में इस तरह का माहौल बने कि तराशकारों को भारत में ही कच्चे हीरे मिल जाएं। अभी उन्हें कच्चे हीरे खरीदने के लिए बेल्जियम, रूस और पश्चिम एशिया जाना पड़ता है।

हीरा तराशकार इस संबंध में पहले ही केंद्र से मदद की गुहार लगा चुके हैं। रत्नाभूषण निर्यात संवर्धन परिषद (जीजेईपीसी) के आंकड़ों के मुताबिक चालू वित्त वर्ष में अप्रैल 2014 से जनवरी 2015 के बीच कटे एïवं तराशे हीरों का कुल निर्यात पिछले वित्त वर्ष की इसी अवधि के मुकाबले 5 फीसदी घटकर 1.16 लाख करोड़ रुपये रहा है। ऐसी स्थिति में उद्योग की मांग पर विचार करना जरूरी है। सूरत के हीरा उद्योग के मोदी का सूट खरीदने के फैसले में परोपकार के साथ ही खुद का हित भी जुड़ा था।

साउथ गुजरात यूनिवर्सिटी में सामाजिक अध्ययन केंद्र के पूर्व निदेशक और समाजशास्त्री विद्युत जोशी के मुताबिक, 'हीरा कटाई करने वाले लोगों की पहली पीढ़ी 1970 के दशक में अकाल प्रभावित सौराष्ट्र आई थी और उन्होंने सूरत में जैन कारोबारियों के यहां काम करना शुरू किया था। उनमें से कुछ को उन दिनों हर महीने 10,000 रुपये तक वेतन मिलता था और इन नए अमीरों की कई तरह से प्रशंसा की गई।'

सूरत में हीरा कारोबारियों की वर्तमान पीढ़ी उन सौराष्ट्रवासियों की तीसरी पीढ़ी है और उन्होंने शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाओं के लिए न केवल अपने गांवों को धन मुहैया कराया, बल्कि आज के सूरत को बनाने में अहम भूमिका निभाई है। सूरत पुराने समय में बंदरगाह वाले शहर के रूप में फला-फूला और आज यह भारत में हीरा कारोबार का गढ़ है। यह गुजरात के स्वच्छ शहरों में से एक है। कंक्रीट से बनी चौड़ी-चौड़ी सड़कें साफ एवं स्वच्छ हैं। लोगों का कहना है कि सूरतवासियों ने 1994 में प्लेग के बाद स्वच्छता की अहमियत समझी है।

शहर के व्यापारी मुक्त-हस्त से दान कर रहे हैं, जिसकी बदौलत ही रियायती अस्पतालों समेत ये सामाजिक पहल हुई हैं। सूरत के अतिरिक्त कलेक्टर पी एन मकवाना कहते हैं, 'जब हमने बाढ़ प्रभावित कश्मीरी लोगों के लिए खाद्य पैकेट जुटाने का फैसला लिया तो सुबह योजना बनने के बाद दोपहर तक हवाई अड्डे से दो उड़ानें खाद्य पैकेट लेकर रवाना हो गई थीं।' नीलामी में प्रधानमंत्री का पिनस्ट्रीप सूट खरीदने वाले लालजीभाई पटेल की आंखों में हर कोई गर्व की चमक देख सकता है। वह कहते हैं कि मोदी ने प्रधानमंत्री बनने के बाद सूरत के सीसीटीवी मॉडल के अध्ययन के लिए एक पुलिस टीम भेजी थी। पटेल ने कहा, 'हम पहले ही सभी ट्रैफिक सिग्नलों पर 600 कैमरे लगवा चुके हैं, जिस पर महज 30 करोड़ रुपये खर्च हुए हैं। इससे एक साल के भीतर शहर में अपराध 27 फीसदी कम हो गए हैं।' पटेल अपने मोबाइल फोन में एक वीडियो दिखाते हैं, जिसमें वे प्रधानमंत्री के साथ सहज रूप से बातचीत कर रहे हैं।

खुद पटेल पहली पीढ़ी के कारोबारी हैं। उन्होंने 35 साल पहले एक हीरा तराशकार का काम शुरू किया था और आज उनका कारोबारी साम्राज्य 6,000 करोड़ रुपये का है। वह सौराष्ट्र में पाटीदार समुदाय से ताल्लुक रखते हैं। इस समुदाय ने एक-दूसरे को मुख्यधारा में लाने के लिए बहुत मदद की है और हीरे की तराशी के कारोबार को सामुदायिक कारोबार बना दिया है। इस समुदाय की न केवल सूरत को बनाने में अहम भूमिका रही है, बल्कि उनका गुजरात की राजनीति में तगड़ा दबदबा रहा है। गुजरात का मुख्यमंत्री बनने के बाद खुद मोदी सूरत के विभिन्न हीरा कारोबारियों से मिलने उनके घर गए थे। इन कारोबारियों में से एक लालजीभाई का दावा है कि वह प्रधानमंत्री को 12 वर्षों से जानते हैं।

उस समय नए मुख्यमंत्री मोदी के लिए समुदाय से मजबूत रिश्ते रखना जरूरी था, जिन्होंने दिग्गज नेता केशुभाई पटेल की जगह ली थी। माना जाता है कि इस समुदाय ने बहुत से राजनेताओं को चुनाव लडऩे में वित्तीय मदद दी है। इस जुड़ाव के चलते सूरत में हुई नीलामी में मोदी के बहुप्रचारित बंदगला के लिए 4.31 करोड़ रुपये कीमत लगने पर आश्चर्य नहीं होना चाहिए। पटेल ने धर्मनंदन डायमंड्स के कॉरपोरेट कार्यालय के प्रवेश द्वार के दाहिनी ओर एक पुतले को यह सूट पहनाया हुआ है, जहां आगंतुक पुतले के साथ सेल्फी लेने में व्यस्त दिखाई देते हैं। इस सूट पर कई बार नरेंद्र दामोदरदास मोदी लिखा हुआ है। पटेल के लिए 4.31 करोड़ रुपये की राशि ज्यादा नहीं है, जिन्होंने सौराष्ट्र में अपने पैकृत गांव उगामेडी में पिछले साल जल परियोजना के लिए 12 करोड़ रुपये खर्च किए थे।

 

जिलाधीश के कार्यालय से जुड़े सूत्रों के मुताबिक वर्ष 2014 में पिछली नीलामी में मोदी के उपहार 2.18 करोड़ रुपये में बिके थे। उसमें 900 वस्तुओं की नीलामी की गई थी। शहर के दो छोटे हीरा कारोबारियों ने दावा किया कि इसी वजह से प्रधानमंत्री ने दिल्ली के बजाय सूरत को नीलामी के लिए चुना। एक कारोबारी ने कहा, 'वह जानते थे कि यहां के कारोबारियों से ज्यादा फंड जुटा सकेंगे। उन्होंने भविष्य में मोदी सरकार का समर्थन सुनिश्चित करने के लिए रणनीति निवेश किया है।' उद्योग को कई महत्त्वपूर्ण मसलों से निपटना होगा।

एसडीए के सचिव गणेश एन घेवरिया कहते हैं, 'अगर यहीं विक्रेता आ सकते हैं तो कच्चे हीरों के लिए बेल्जियम जाने की क्या जरूरत है? सरकार को केवल यह सुनिश्चित करना है कि देश से बिना बिके हीरों को बाहर ले जाने पर दो फीसदी सीमा शुल्क नहीं लगे।' पटेल इस बात को लेकर विश्वस्त हैं कि ये नियम जल्द बन जाएंगे और हीरा तराशकारों को कच्चा माल खरीदने के लिए रूस और बेल्जियम नहीं जाना होगा। शुरुआती झटकों के बाद प्रस्तावित सूरत डायमंड बुअर्स पटरी पर है। इसके लिए राज्य सरकार ने जमीन आवंटित कर दी है और इस महीने के प्रारंभ में शिलान्यास कर दिया गया है।   सूरत के हीरा कारोबारियों के लिए मार्जिन बढऩा जरूरी है, जो इस समय 3-4 फीसदी है। सूरत स्थित हीरा तराशकार और कारोबारी कीर्ति शाह ने कहा कि डॉलर में उतार-चढ़ाव और वैश्विक मंदी का उद्योग पर वर्ष 2008 से बुरा असर पड़ रहा है। उन्होंने कहा, 'सूरत में 6,000 इकाइयों में से करीब 70 फीसदी लघु इकाइयां हैं, जिनका सालाना कारोबार 2 से 15 करोड़ रुपये तक है। बहुत से कम क्षमता पर परिचालन कर रहे हैं, क्योंकि कच्चे माल में निवेश के लिए उनके पास पूंजी नहीं है।'

एसडीए के अध्यक्ष दिनेश नवादिया का दावा है कि कारोबारी उधार में कच्चा माल नहीं ले सकते हैं और अमेरिका से तराशे हीरे लाने के लिए प्रमाणपत्र लेने में 150 दिन लगते हैं। उन्होंने कहा, 'इसलिए तराशकारों के पास बैंकों से ऋण लेने के अलावा कोई विकल्प नहीं होता है।' हीरा कारोबार का केंद्र सूरत को बनाने का 1.85 लाख करोड़ रुपये के इस उद्योग के बहुत से कारोबारियों को फायदा मिलेगा।

 

साभार- बिज़नेस स्टैंडर्ड से

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आभूषण और पोशाक कश्मीर के गर्व

अपनी नैसर्गिक और अगाध खूबसूरती के लिए कश्मीर की वादियों का कवियों और गायकों ने भरपूर चित्रण किया है जिन्होंने इसे विभिन्न रस्मों, संस्कृतियों और जीने के तरीके का एक खुशनुमा स्थान बताया है। यहां की जमीन और लोगों की आत्मसात करने वाली प्रवृत्तियों ने जीवन का एक अनूठा दर्शन पैदा किया है जिसमें हर धर्म के बुनियादों को न केवल उचित जगह मिली है बल्कि पर्याप्त महत्व भी मिला है। कश्मीर को न केवल "धरती पर स्वर्ग" के रूप में जाना जाता है बल्कि अलग-अलग मजहबों और मूल्यों का पालन करने के बावजूद दुनिया भर में मानव मूल्यों के एक स्वर्ग के रूप में भी यह अपनी एक विशिष्ट पहचान रखता है। कश्मीर के मूल तत्व की पहचान इसकी समृद्ध संस्कृति और गर्मजोशी से भरे लोगों से होती है। यह अपने शानदार आभूषणों और पोशाकों के लिए भी विख्यात है। घाटी में आभूषण न केवल उनके आतंरिक मूल्य और खूबसूरती के लिए पहने जाते हैं बल्कि उनके धार्मिक कारण भी होते हैं। इसका एक महत्वपूर्ण उदाहरण कश्मीरी पंडितों की विवाहिता महिलाओं द्वारा पहना जाने वाला खूबसूरत सोने का आभूषण देज-होर है।    

 

 

आभूषण

कश्मीर में आभूषण सोने के होते हैं लेकिन कभी-कभी खूबसूरती बढ़ाने के लिए उनकी बनावट और डिजाइन में दूधिये पत्थर, रक्तमणि, नीलमणि, फिरोजा और सुलेमानी पत्थर भी जड़ दिए जाते हैं। हालांकि इनमें से अधिकांश रत्न क्षेत्र के बाहर से लाए जाते हैं लेकिन पन्ना, नीलमणि, सुलेमानी पत्थर और बिल्लौरी स्वदेशी हैं और जम्मू-कश्मीर राज्य के भीतर ही पाए जाते हैं।  

कश्मीरी संगतराश अपने फन में बहुत माहिर होते हैं और उनकी कारीगरी की जटिलता और महीनी के लिए उन्हें प्रशंसित किया जाना चाहिए। कश्मीर की मनमोहक खूबसूरती इसकी सभी कलाओं और शिल्पों में अभिव्यक्त होती है। गहनों के डिजाइन विशिष्ट होते हैं और दुनिया के किसी भी हिस्से में इनकी आसानी से पहचान की जा सकती है। प्रकृति इसके लघु चित्र कला रूप की डिजाइन में दिखती है। बादाम, चिनार के पत्ते और मैना और बुलबुल जैसे पक्षी महत्वपूर्ण हैं।

 

कश्मीर में सुनार अपने काम को बेहद पसंद करता है और एक खूबसूरत चीज बनाने के लिए देर रात तक काम करता है। दिलचस्प बात यह है कि पंडितों और मुस्लिम महिलाओं द्वारा पहने जाने वाले ज्यादातर गहनों के रूप और आकार में काफी समानता होती है। कश्मीरी महिलाओं द्वारा पहने जाने वाले कुछ प्रमुख आभूषण इस प्रकार हैं-

जिगनी और टीका ललाट पर पहने जाते हैं और आमतौर पर ये आकार में त्रिकोणीय, अर्द्ध-वक्राकार और वक्राकार होते हैं। ये सोने और चांदी से बने होते हैं और इनकी किनारी पर मोती और सोने की पत्तियां लटकती रहती हैं।

कान के गहनों के नाम अट्टा-हूर, कन-दूर, झुमका, देज-होर और कन-वजी होते हैं जिनमें फिरोजा जड़ा होता है और किनारी पर बॉल और सोने की पत्तियां लटकती रहती हैं। कन-वजी भी कान का एक गहना है जिनकी किनारी पर छोटे मोतियों के साथ विभिन्न रंगों के पत्थर जड़ें होते हैं। झुमका गेंद की आकार का कान में पहने जाने वाला एक गहना है।

जैसा कि पहले बताया जा चुका है, देज-होर विवाहिता कश्मीरी पंडित महिलाओं के लिए एक अपरिहार्य गहना है जो इसे शादी अर्थात 'सुहाग' की एक निशानी के रूप में हमेशा पहने रहती हैं। अट्टा-होर विवाहिता कश्मीरी पंडित महिलाओं के सर के दोनों तरफ कान में लटका रहता है और सर के ऊपर से जाने वाले सोने की चेन के साथ जुड़ा रहता है। कन-दूर कान में पहने जाने वाला एक अन्य गहना है जिसे ज्यादातर लड़कियां पहनती हैं। ये गहने सोने और चांदी के बने होते हैं इनमें लाल और हरे रत्न या मोती जड़े होते हैं।

 

कश्मीर की पारंपरिक पोशाक

कश्मीर की पारंपरिक पोशाक अपनी कशीदाकारी और पेचदार डिजाइनों के लिए जानी जाती है जो राज्य की संस्कृति और प्राकृतिक दृश्यों की समृद्धि को परिलक्षित करती है। कश्मीर के पोशाकों की समानता अरब, ईरान और तुर्किस्तान में देखी जाती है। ऐसा विश्वास है कि सुलतान सिकंदर के शासनकाल में सैय्यद अली हमदानी ने इसे प्रचलित किया। कश्मीर घाटी के कश्मीरी पंडितों ने भी इसे अपना लिया। इसमें शरीर का निचला हिस्सा फारसी मूल के 'सलवार' नामक चौड़े पैजामे से ढका रहता था जबकि ऊपरी हिस्से में पूरे बांह की कमीज पहनी जाती थी। इसके ऊपर एक छोटा अंगरखा कोट होता था जिसे सदरी कहते थे। बाहरी लबादे को चोगा कहते थे जो नीचे टखनों तक आता था इसकी एक लंबी, ढीली आस्तीन होती थी और एक कमरबंद होता था। सर की पोशाक एक छोटे कपड़े से ढका छोटी चुस्त टोपी से बनी होती थी। इसी से पगड़ी बनती थी। त्यौहार के मौके पर सिल्क पहना जाता था। धनी और समाज के समृद्ध वर्गों के बीच पोशाक का ऐसा ही प्रचलन व्याप्त था।

गरीब वर्गों के लिए पोशाक में मध्य युग के बाद से कोई परिवर्तन नहीं आया है। पुरुष अपने मुंडे हुए सरों पर एक खोपड़ी नुमा टोपी पहनते थे पर पगड़ी नहीं बांधते थे। वे अपने शरीर को फेरन नामक एक लंबे ढीले ऊनी वस्त्र से ढकते थे जो गर्दन से लेकर कमर तक खुला होता था, कमर के पास वे एक पेटी बांधते थे और यह टखनों तक जाता था। जूते पूलहरु नामक घास से बने होते थे। कुछ लोग खड़ांउ नामक लकड़ी के चप्पल पहनते थे। महिलाओं की पोशाके भी पुरुषों जैसे होती थी फर्क इतना ही था कि उनके सिरों पर बांधने का एक फीता होता था और उसके ऊपर एक दुपट्टा होता था जो सिर से कंधों तक फैला होता था। कश्मीरी महिलाओं के सिर की पोशाक को कासबा बोलते थे। कश्मीरी पंडित महिलाएं भी कासबा का उपयोग करती थी लेकिन वे इसे तरंगा बोलती थीं जो स्त्रियों के पहनने की टोपी होती थी और यह पीछे से एड़ी तक फैली होती थी।

 

आज के जमाने की पोशाके

वर्तमान में कश्मीर में पोशाकों में बहुत परिवर्तन आया है। अन्य कई संस्कृतियों और समाजों की तरह कश्मीर ने भी जीने की आधुनिक पश्चिमी शैली अपना ली है। इस घुसपैठ के बावजूद समाज के सभी वर्गों द्वारा खासकर जाड़ों और राज्य के विषम मौसम में ठंड से मुक्ति पाने के लिए फेरन अवश्य पहना जाता है। एक कश्मीरी आमतौर पर जाड़ों के दौरान एक मौटे ऊनी कपड़े से बने फेरन तथा गर्मियों के दौरान सूती कपड़ों से बने फेरन को पहनकर प्रसन्न और गौरवान्वित महसूस करता है। अब यह पोशाक दूसरे राज्यों में भी लोकप्रिय हो गया है। फेरन को यहां आने वाले यात्रियों के बीच बेशुमार लोकप्रियता मिल रही है जिसे हमारे फिल्म उद्योग की हाल की कई बॉलीवुड फिल्मों में जगह मिली है।

एक कश्मीरी अपनी जमीन की अनूठी विरासत और पहचान से जुड़कर बहुत गर्व का अनुभव करता है। कश्मीर से बाहर देश के अन्य क्षेत्रों में रहने वाले कश्मीरी पंडितों की    बहुसंख्यक आबादी अभी भी अपनी पारंपरिक पोशाक का उपयोग करना नहीं भूली है। उनमें से अधिकांश अभी भी खूबसूरत कश्मीरी आभूषण पहनते हैं। यहां यह अवश्य याद रखा जाना चाहिए कि सांस्कृतिक पहचान और पारंपरिक मूल्य शायद ही कभी मरते हैं। यह बात सभी पर लागू होती है।

 

* श्री सुनील कौल,  पीआईबी जम्मू में मीडिया एवं सूचना अधिकारी हैं।

 

 

फोटोग्राफ स्रोत : आर.ई. शॉर्टर द्वारा खिंची गई तथा एच.ए. नेवेल द्वारा 1921 में लिखे एक यात्रा विवरण में एक कश्मीरी पंडित महिला की छवि।

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एक कुआं, एक मंदिर और एक श्मशान भूमि से संघ हिन्दुओं को जोड़ेगा

पिछले साल दशहरे के मौके पर संघ प्रमुख मोहन भागवत ने देश में हजारों साल से चली आ रही एक बड़ी बीमारी को खत्म करने की दिशा में कदम उठाने का इशारा किया था, ये बीमारी थी जाति प्रथा की, छुआछूत की। इस बार नागपुर में प्रतिनिधि सभा की बैठक में इस पर चर्चा हुई और एक ठोस रणनीति तैयार की गई। संघ का मकसद अगले तीन साल में देश से छूआछूत खत्म करने का है। इसके लिए संघ ने नारा दिया है एक कुआं, एक मंदिर और एक श्मशान का। संघ का ये मिशन वीएचपी के साथ मिलकर पूरा किया जाएगा। ये रणनीति वीएचपी के विजन डाक्यूमेंट 2025 का हिस्सा भी है।

राष्ट्रीय स्वंय सेवक संघ या आरएसएस जिसे दुनिया का सबसे बड़ा संगठन कहा जाता है। जिसके कार्यकर्ताओं की संख्या कभी सामने नहीं आती, लेकिन उसके नेटवर्क को मात देना लगभग नामुमकिन है, वो संगठन जो खामोश रहकर भी सरकार और बीजेपी में अपनी धमक दिखाता है, अक्सर दशा-दिशा तय करता है। वो संघ इस देश को खासकर हिंदुओं को जाति प्रथा से मुक्त करवाना चाहता है।

हिंदुओं को एकजुट करने के लिए संघ ने एक ब्रह्मवाक्य तैयार किया है, एक कुआं, एक मंदिर और एक श्मशान भूमि। इस ब्रहास्त्र को चलाकर संघ का इरादा जाति व्यवस्था को खत्म करने का है। हिंदू धर्म में आस्था रखने वालों को एकजुट करने का है। यही नहीं, इसके जरिए संघ फिर से उन लोगों को हिंदू धर्म में लाना चाहता है जिन्होंने कोई और धर्म स्वीकार कर लिया है।

जाहिर है मनु ने भी समाज को जिन वर्गों में बांटा था, वो वर्ग भले ही अपने कर्मों के हिसाब से बंटे लेकिन जाति व्यवस्था की गहरी नींव ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र डाल गए। और सदियों से ही हिंदू धर्म की जाति व्यवस्था से तंग होकर लोग सामाजिक सम्मान की खातिर दूसरे धर्म अपनाते रहे हैं। संघ नहीं चाहता कि अब ऐसा हो, वो नहीं चाहता कि हिंदू धर्म लोग सिर्फ इस आधार पर त्याग दें कि इस धर्म में छूआछात, निचली-अगणी जाति और जातियों की व्यवस्था है। भारत की हकीकत यही है कि आज भी तमाम इलाकों में कुछ इंसान हर कुएं से पानी नहीं पी सकते, मंदिर में प्रवेश नहीं कर सकते और हर श्मशान भूमि में अंतिम संस्कार भी नहीं करवा सकते, सिर्फ इसलिए क्योंकि वो ऊंची जाति के नहीं हैं, आज भी इस मुल्क में अगणी जाति के लोग निचली जातियों पर हुक्म चलाना अपना बुनियादी अधिकार समझते हैं। इसीलिए संघ का मकसद है कि गांव-गली, मोहल्लों में हिंदुओं के पानी पीने का एक ही ठिकाना हो, एक ही कुआं हो जहां से सब पानी भरें, एक ही मंदिर हो जहां देव को सब पूजें, और एक ही जगह सबकी अंतिम विदाई हो।

दरअसल संघ के इस ब्रह्मास्त्र का इशारा पिछले साल दशहरे के मौके पर संघ प्रमुख मोहन भागवत ने सबसे पहले किया था। एक ऐसे हिंदू समाज की कल्पना जिसमें जातियों का भेदभाव मिट जाए, जहां जातियों के चलते गांवों में अलग-अलग कुएं, अलग अलग मंदिर और अलग-अलग श्मशान ना हों।
हिंदुत्व को मजबूत करने के इस एजेंडे पर मोहन भागवत का इशारा मिलते ही संघ के कार्यकर्ता और प्रचारक होम वर्क में जुट गए थे। पांच महीने बाद जब नागपुर में अखिल भारतीय प्रतिनिधि सभा की बैठक हुई तो कार्यकर्ताओं ने अपनी रिपोर्ट पेश की। आंध्र प्रदेश और झारखंड के प्रचारकों ने अपने इलाके के सर्वे के बारे में बताया कि सर्वे में पाया गया कि जाति के आधार पर समाज बंटने के कई और भी कारण हैं। इसके बाद कार्यकर्ताओं को कहा गया कि इससे निपटने का तरीका भी बताएं। चर्चा के बाद तय हुआ कि जनजागरण समितियां बनाकर प्रचारकों को गांव-गांव तक पहुंचने का निर्देश दिया जाए। यही नहीं, देश के उत्तर पूर्वी हिस्से और दक्षिण भारत को प्राथमिकता की लिस्ट में डाला गया।

संघ ने पिछले महीने ही एक कार्यक्रम में संतों और मठों के प्रमुखों को बुलाकर जातिगत भेदभाव पर चर्चा की थी। संगठन ने उत्तराखंड के प्रवासी जनजातीय समुदाय के लोगों को भी जोड़ने के लिए अभियान चलाया था जो महाराणा प्रताप को आराध्य मानते थे लेकिन हाल के सालों में हिंदू परंपरा से हट गए थे।
दरअसल संघ जानता है कि अगर विस्तार करना है तो गांवों और दूर दराज के इलाकों में पैठ बनानी होगी। संघ जानता है कि सालों तक पसीना बहाने के बाद केंद्र में पूर्ण बहुमत हासिल हुआ है और अगर संघ का विस्तार तमाम जातियों में थमा तो आगे मुश्किल हो सकती है। यानि ये योजना न सिर्फ संघ के विस्तार की है बल्कि योजना सफल रही तो बीजेपी को आगे भी पूर्ण बहुमत लाने में मुश्किल नहीं आएगी। इतना ही नहीं घर वापसी पर मचे घमासान के बीच संघ ये जानता है कि भारत में सामाजिक सम्मान की खातिर धर्म बदलने की पुरानी परंपरा रही है। ये सम्मान सीधे सीधे जाति व्यवस्था से जुड़ता है, सो अगर जाति व्यवस्था मिट सकेगी तो असम्मान भी मिट सकेगा।

हिंदू समाज में जाति मिटाने की लड़ाई लंबी और मुश्किल है क्योंकि लड़ाई ऐसी समाजिक व्यवस्था से है जो सदियों से चली आ रही है। और जाति व्यवस्था सिर्फ सतह पर ही नहीं है बल्कि दिमाग में गहरे तक उतरी हुई है, सामाजिक संस्कारों में परिभाषित हो चुकी है, एक दौर था जब इसी समाज में सरनेम न लिखने का आंदोलन भी चला था, वो आंदोलन भी जाति व्यवस्था को नकारने का ही था, लेकिन वो सिर्फ समाज के एक हिस्से में ही अक्स छोड़ पाया। क्या संघ ऐसा कोई आंदोलन खड़ा कर सकेगा, क्या हमारी सोच औऱ जड़ता को खौल पाएगा?

 साभार- http://khabar.ibnlive.in.com/ से 

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पंचमढ़ी में बनेगा देश का सबसे बड़ा प्राकृतिक स्वास्थ्य केंद्र

भागमभाग के जीवन और अत्यधिक तनाव से परेशान लोगों के लिए अच्छी खबर है। अब उन्हें मध्यप्रदेश के कश्मीर कहे जाने वाले पचमढ़ी के आसपास नेचर केयर सेंटर की सौगात मिलने वाली है। यहां देश का सबसे बड़ा नेचर केयर सेंटर बनाया जाएगा। यह सेंटर लगभग डेढ़ सौ एकड़ जमीन पर होगा। इसके लिए जमीन की तलाश जारी है। जमीन के मिलते ही सेंटर निर्माण कार्य शुरू हो जाएगा।

देश में इस समय 100 से अधिक नेचर केयर सेंटर हैं जहां नेचर तरीकों से तनाव और शारीरिक बीमारियों का इलाज किया जाता है। अब मध्यप्रदेश के पचमढ़ी के आसपास देश का सबसे बड़ा और अनेक थैरेपी प्रदाय करने वाला नेचर केयर सेंटर स्थापित जाएगा। सेंटर में सभी थैरेपी दी जाएंगी। अनेक शोधों के मुताबिक अधिकांश बीमारियों का कारण अत्याधिक तनाव है। इस तनाव को कम और दूर करने के लिए नेचर के नजदीक रहना सर्वत्ताम उपाय है।

इस सेंटर की खासियत यह होगी कि क्रीमीलेयर से लेकर लोअरलेयर तक के लोग इसका लाभ ले सकेंगे। मसलन हर वर्ग की पहुंच में यह सेंटर होगा। यहां इन वर्गो के लिए अलग-अलग सेक्शन बनाए जाएंगे, जहां शुल्क के मुताबिक थैरेपी और सुविधाएं दी जाएंगी। हालांकि स्वास्थ्य के अनुसार सभी को एक जैसी ही थैरेपी मुहैया होगी।

 

 

प्राकृतिक चिकित्सा में सर्वाधिक भूमिका वातावरण की है। जितना अच्छा वातावरण होगा उतनी जल्द ही स्वास्थ्य बेहतर होगा। पचमढ़ी की लोकेशन इसके लिए सबसे अच्छी है। यहां प्रकृति अपने खूबसूरत रूप में है। इसी प्राकृतिक खूबसूरती का सेंटर अपने यहां आने वाले लोगों को लाभ देगा।

 

अभियंगा हरबल मसाज, बेक एवं स्पाइन मसाज, हरबल कोलन थैरेपी, फुलमड बाथ, क्रोमो थैरेपी, हरबल स्टीम थैरेपी, रीफेलेक्सोलॉजी थैरेपी, डिटॉक्स थैरेपी, बॉडी स्कर्ब थैरेपी, म्यूजिक थैरेपी, अल्ट्रासाउंड थैरेपी, बैक्स थैरेपी सहित योगा, अंडरवाटर मसाज और अनेक मसाज और थैरेपी सेंटर में उपलब्ध होगी।

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दिग्विजय सिंह के बेटे की शादी बिहार के राजघराने में

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मध्‍य प्रदेश के पूर्व मुख्‍यमंत्री दिग्विजय सिंह के बेटे जयवर्धन सिंह की शादी बिहार के डुमरिया के पूर्व राजघराने के शत्रुंजय शाही की बेटी से तय हुई है। शत्रुंजय के पिता रणविजय शाही राजद के विधायक भी रह चुके हैं। जयवर्धन सिंह कांग्रेस के दिग्‍गज नेता और मध्‍य प्रदेश के पूर्व मुख्‍यमंत्री दिग्विजय सिंह के बेटे हैं। लड़की के पिता शत्रुंजय ने भी दिग्विजय सिंह के परिवार से रिश्ते की कोई औपचारिक पुष्टि की है।  

 

जयवर्धन का तिलक राघोगढ़ में ही होगा। जबकि शादी दिल्ली में होने की संभावना है। स्वागत समारोह भोपाल में होगा। 15 अप्रैल को तिलक समारोह और 21 अप्रैल को शादी होने की संभावना है। दिग्विजय सिंह के पुत्र जयवर्धन सिंह भी कांग्रेस के विधायक हैं। वे अपने पिता की परंपरागत सीट राघोगढ़ से ही चुनाव जीता है। दिग्विजय सिंह का ननिहाल बिहार में ही है।

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उज्जैन सिंहस्थ में आने वाले विदेशी पर्यटक घरों में ठहरेंगे

सिंहस्थ के दौरान उज्जैन आने वाले विदेशी सैलानियों को भारतीय संस्कृति, भारतीय परिवार और रहन-सहन से परिचित कराया जाएगा। इसके लिए मप्र पर्यटन विकास निगम विदेशी सैलानियों के ठहरने की सुविधा के लिए 'होम स्टे योजना शुरू कर रहा है। इसके तहत पर्यटकों को होटल, मोटल से अलग घरों में रहने की सुविधा प्रदान की जाएगी। पर्यटन विभाग योजना के लिए 10 से लेकर 100 घरों का चुनाव करेगा। इन घरों में पर्यटकों को उस परिवार के साथ वक्त गुजारने का मौका मिलेगा। उन्हें परिवार के साथ ही भोजन की व्यवस्था की जाएगी।

असल में, सिंहस्थ के दौरान देश-विदेश से पांच करोड़ श्रद्धालुओं के आने की संभावना है। इनमें कई लाख विदेशी पर्यटक शामिल होंगे। उज्जैन में चूंकि होटल और मोटल की कमी है। एेसे में मप्र पर्यटन विकास निगम ने पर्यटकों ठहराने के लिए नई योजना तैयार की है। इसके तहत पर्यटकों को लोगों के घरों में ठहरने की सुविधा दी जाएगी।

उज्जैन में होटलों की कमी को पूरा करने के लिए पर्यटकों को पारिवारिक संस्कार और भारतीय संस्कृति से परिचित कराया जाएगा। इसके लिए उन्हें लोगों के घरों में ठहराएंगे। पर्यटक परिवार के साथ रहकर यहां के रहन-सहन, खान-पान, संयुक्त परिवार के मूल्यों के बारे में जान सकेंगे। इससे होटल की कमी को पूरा करने के साथ ही भारतीय संस्कृति का प्रचार-प्रसार भी कर सकेंगे। यहां के धार्मिक और सांस्कृतिक विरासत से परिचित कराया जाएगा। उन्हें सिंहस्थ के महत्व के बारे में विस्तार से बताया जाएगा। यहां की पूजा-अर्चना और सामाजिक व्यवस्थाओं के बारे में जान सकेंगे।

होम स्टे से विदेशी पर्यटकों को सिंहस्थ के दौरान उज्जैन में ज्यादा दिन रोक पाएंगे। साथ ही होटलों की कमी को पूरा किया जा सकेगा। इसके लिए हम 10 से 100 घरों को चुनेंगे। इन घरों में ठहरने के लिए सैलानियों को पूरी सुविधा दी जाएगी। उनके खानपान का इंतजाम भी परिवार के साथ किया जाएगा। इस योजना केलिए परिवारों से मिलेंगे और उन्हें राजी किया जाएगा। परिवारों को इसके लिए पर्यटन विभाग की तरफ से भुगतान भी किया जाएगा।

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