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देश का पत्रकारिता का पूरा कुनबा बिका हुआ है

अगर इस तरह के उपहार देना या अहसान जता कर पत्रकार को खरीदा जा सकता है तो वे अपने उस इंडियन एक्सप्रेस अखबार के बारे में क्या कहना चाहेंगी  जो कि सरकार द्वारा ‘उपकृत’ करते हुए दी गई जमीन पर बने दफ्तर से चल रहा है? क्या केंद्र सरकार ने बहादुर शाह जफर मार्ग की अरबों रुपए की यह जमीन कौड़ियों के भाव अखबारों को देकर उन्हें खरीद लिया था? यह कहना है हिंदी अखबार 'नया इंडिया' के कॉलमनिस्ट 'विनम्र' का। हम आपके साथ विनम्र का कॉलम ज्यों का त्यों शेयर कर रहे हैं… 

खुद पत्रकार होने के बावजूद अपना मानना है कि इस बिरादरी से ज्यादा पाखंडी कोई और हो ही नहीं सकता है। ऐसा लगता है कि पत्रकार यह मानकर चलते हैं कि समाज ने उन्हें खुद तमाम गलत काम करने, नियम तोड़ने, बिना बारी के काम करवाने की छूट देने के साथ ही यह अधिकार भी दिया हुआ है कि वे इन्हीं सब के लिए किसी को भी कटघरे में खड़े करने के लिए स्वतंत्र है।

दशकों से यह सब देखता आया हूं पर अब लगता है कि पानी सिर से गुजरने लगा है। हाल ही में खोजी अखबार इंडियन एक्सप्रेस ने एक बड़ा खुलासा किया कि किस तरह से एस्सार कंपनी नेताओं, पत्रकारों को गिफ्ट में मंहगे सेलफोन बांटती थीं। उन्हें जरुरत पड़ने पर टैक्सी उपलब्ध करवाती थी। उनके सेलफोन के बिल अदा करती थी। उन्हें अपने खर्च पर सैर करवाती थी। इसे बहुत बड़ा खुलासा मानते हुए कुछ चैनलों ने तो इसे लेकर अपनी स्टोरीज चला दी।

इस खबर के बाद दो पत्रकारों ने इस्तीफे दे दिए और तीसरे को उसके संगठन की ओर से कारण बताओं नोटिस जारी कर दिया गया। यह सब देखकर मेरी समझ में नहीं आया कि इस पाखंड पर तरस खाते हुए हंसा जाए या आंसू बहाए जाए। आम पाठक को यह सब भले ही नया लग रहा हो पर जो भी व्यक्ति इस व्यवसाय में है वह इस खुलासे पर अपना सिर पीट लेगा।

अपना अनुभव है कि दशकों से पत्रकारों को उपहार मिलते आ रहे हैं। उन्हें निजी कंपनियां ही नहीं सरकार तक उपकृत करती आयी हैं। प्रेस कान्फ्रेंस में मंहगे उपहार मिलते हैं। सरकारी क्षेत्र की कंपनियां उन्हें अपने प्लांट की विजिट करवाती हैं। पांच सितारा होटलों में ठहराती हैं। रात को दारु के साथ बढ़िया भोज करवाती हैं। चलते समय मंहगे उपहार देती हैं। उन्हें हवाई जहाज से लाया ले जाया जाता है। इसमें नया क्या है?

इंडियन एक्सप्रेस सबसे ज्यादा खुलासे करता है। रितु सरीन, देश की जानी मानी खोजी पत्रकार मानी जाती है। उन्हें भी पता है कि चौंकाने वाली रिपोर्ट कहां से व कैसे आती है। अगर इस तरह के उपहार देना या अहसान जता कर पत्रकार को खरीदा जा सकता है तो वे अपने उस इंडियन एक्सप्रेस अखबार के बारे में क्या कहना चाहेंगी  जो कि सरकार द्वारा ‘उपकृत’ करते हुए दी गई जमीन पर बने दफ्तर से चल रहा है? क्या केंद्र सरकार ने बहादुर शाह जफर मार्ग की अरबों रुपए की यह जमीन कौड़ियों के भाव अखबारों को देकर उन्हें खरीद लिया था?

क्या बदले में इंडियन एक्सप्रेस अखबार सरकार की चाकरी कर चरण वंदना करने लगा था? आपातकाल के दौरान तो इंडियन एक्सप्रेस को सबसे पहले निशाना बनाया गया था। मुझे तो लगता है कि यह सब लिखकर इस अखबार ने अपने पूर्व संपादक शेखर गुप्ता को ही निशाना बनाया है जो कि एनडीटीवी व इंडियन एक्सप्रेस में ‘वॉक द टॉक’ साक्षात्कार करते थे। वे इस स्तंभ में कमोबेश तमाम राजनेताओं व उद्योगपतियों से बेहद सहज होकर बात करते हैं उनसे जनसंपर्क करते हुए नजर आते थे। वे उन्हें कभी बेचैन करने वाले सवाल नहीं पूछते थे। पूरा मामला ही अपने को जनसंपर्क का ही हिस्सा लगता हैं।

जिस इंडियन एक्सप्रेस ने कभी सरकारें उखाड़ दीं। इंदिरा गांधी से लेकर राजीव गांधी को नहीं बख्शा, उसी एक्सप्रेस में ‘पोंटी चड्ढ़ा’ का यह इंटरव्यू छपता है कि अब वे शराब के व्यापार से इतर शिक्षा के क्षेत्र में कुछ करके दिखाना चाहते हैं। पोंटी के बारे में इतनी सकारात्मक जानकारी दी गई थीं मानो कि वे भावी अन्ना हजारे हों। इंडियन एक्सप्रेस जैसे अखबार में पोटीं सरीखी शख्सियत के साक्षात्कार छपने को क्या कहा जाएं? इसमें एक भी सवाल या जानकारी ऐसी नहीं थी जो कि उनके व्यक्तित्व या व्यवसाय के असली दो नबंरी पक्ष को उजागर करती हो।

एस्सार कंपनी द्वारा पत्रकारों व नेताओं को ‘रिश्वत’ देने के खुलासे वाली इस खबर को पढ़ने के बाद तो यही लगता है कि जैसे पोंटी ने उस इंटरव्यू के बदले अपने माल में कोई बड़ा शोरुम रिपोर्टर को उपहार में दे दिया हो। खुद रितू भी संडे व इंडियन एक्सप्रेस में रहते हुए सरकारी मंत्रालयों व निजी कंपनियों के प्रायोजित दौरों पर जा चुकी हैं, क्या उन्हें कभी यह लगा कि उन्होंने उन पर हुए खर्च का अहसान कैसे चुकाया? क्या अपने दिल पर हाथ रखकर वे यह कह सकती हैं कि उन्होंने खुद कभी कोई उपहार नहीं लिया? पत्रकार को मिलने वाली सुविधाओं का लाभ नहीं उठाया?

अगर उनके मापदंड से चला जाए तो पत्रकारों से ज्यादा भ्रष्ट तो कोई हो ही नहीं सकता है। वे सरकार से रहने के लिए मकान लेते हैं। सीजीएचएस के जरिए स्वास्थ सेवाएं लेते हैं। अच्छे स्कूलों में अपने प्रभाव का इस्तेमाल कर बच्चों का दाखिला करवाते हैं। एक समय था जब कि टेलीफोन के लिए मारा-मारी होती थी, तब उन्हें बिना बारी के फोन भी मिलता था। रितू सरीन ने भी जरुर लिया होगा। रेलवे व विमान में बिना बारी के टिकट भी आरक्षित करवाया होगा। कैंलेडर, डायरियां भी ली होंगी। इस अहसान का बदला उन्होंने कैसे चुकाया? आज वे तमाम पत्रकारों को हमाम में खड़ा करने की कोशिश कर रही हैं, खुद भी क्या उसमें नहीं खडी होगी?

इस संबंध में एक घटना याद आ जाती है। श्याम खोसला जाने माने पत्रकारों में गिने जाते थे। वे ट्रिब्यून के दिल्ली स्थित ब्यूरो के चीफ थे। हरियाणा, पंजाब, हिमाचल, जम्मू-कश्मीर सरीखे राज्यों में उनकी तूती बोलती थी। उनकी एक आदत थी कि वे भी रितू सरीन की तरह सामने वाले को आइना दिखाने की कोशिश में लगे रहते थे। प्रेस कान्फ्रेंस में मिले सजावटी कागज में लिपटे अपने गिफ्ट का तो कवर फाड़कर उसे कार में रख लेते पर अगर दफ्तर में कोई डायरी या कैंलेडर लेकर आता दिख जाता तो तपाक से कहते कि यह किसने दिया? फिर रिपोर्टर द्वारा भेजी जाने वाली खबर को ध्यान से पढ़ते कि कहीं उसने उपहार देने वाले को उपकृत तो नहीं किया है।

एक बार ओम प्रकाश चौटाला की प्रेस कान्फ्रेंस में उन्होंने सवाल किया कि अगर आपकी सरकार बन गई तो आप पत्रकारों के लिए क्या करेंगे? इस पर चौटाला ने उनकी ओर हिकारत से देखते हुए कहा कि खोसलाजी, आप तो वरिष्ठ पत्रकार हैं। दशकों से हरियाणा कवर कर रहे हैं। आपको इस तरह के सवाल पूछने शोभा नहीं देता है। आपको तो इन युवा पत्रकारों को बताना चाहिए कि सरकारें आपके लिए क्या करती आयी हैं। पता चला कि खोसला ने अपनी दोनों बेटियों को सरकारी अनुकंपा से भविष्य बना लिया था। सीएम कोटे से एक का आर्कीटेक्चर में व दूसरी का मेडिकल या इंजीनियरिंग में दाखिला करवा लिया था।

यह सब लिखने का यह अर्थ नहीं है कि मैं इसका समर्थक हूं कि पत्रकारों या नेताओं को उपकृत करना सही है। क्या हम लोग जब परिवार समेत शिमला या गोवा घूमने जाते हैं तो वहां सरकारी अतिथिगृह बुक करवाने की कोशिश नहीं करते हैं? क्या एक्सप्रेस समूह ने कभी ऐसी किसी सुविधा का लाभ नहीं उठाया? क्या आम नेता किसी कंपनी के अतिथिगृह, हवाई जहाज या वाहन का इस्तेमाल नहीं करता है? अगर गडकरी भी परिवार सहित कहीं ठहर गए तो इसमें इतना हंगामा क्यों? खबर तो यह होनी चाहिए थी कि इस अहसान का उन्होंने बदला कैसे चुकाया? मंत्री बनने के बाद एस्सार की उन्होने क्या मदद की, तब तो खबर होती।

इस रिपोर्ट में जो नैतिकता का पाठ पढ़ाया गया है, उसे पढ़कर सारिका में कभी छपी एक लघु कथा याद आ जाती है। दशहरा का दिन था। भीड़ रावण को आग लगाने के लिए आगे बढ़ी। तभी रावण चिल्लाया, खबरदार! मुझे वही आग लगाए जिसने दूसरों की मां-बहन को बुरी नजर से न देखा हो। भीड़, ठिठक कर रुक गई। लगा कि आज तो रावण बिना जले ही रह जाएगा। अचानक एक आदमी आगे बढ़ा, और उसने रावण को आग लगा दी। वह जन्मजात अंधा था।

(लेखक एक वरिष्ठ पत्रकार हैं। विनम्र उनका लेखन नाम है।)

साभार- नया इंडिया से 

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रचनात्मकता ही हमें आगे बढ़ाती है : प्रो माधव हाड़ा

दिल्ली। वट का बीज़ इतना छोटा और अदृश्य सरीखा होता है कि उसके आकार को देखकर कोइ अनुमान नहीं कर सकता कि इसके भीतर इतना बड़ा पेड़ छिपा है। रचनात्मकता को बढावा देने में साहित्यिक पत्रिकाओं की भूमिका इसी तरह की होती है। वरिष्ठ कथाकार एव बिहार राष्ट्रभाषा परिषद के पूर्व निदेशक प्रो रामधारी सिंह दिवाकर ने हिन्दू कालेज में एक आयोजन में कहा कि महाविद्यालयों – विश्वविद्यालयों के हिन्दी विभाग साहित्य प्रेम की नर्सरी बनें इससे अधिक सुन्दर बात कुछ हो नहीं सकती। प्रो दिवाकर हिन्दी साहित्य सभा द्वारा प्रकाशित दीवार पत्रिका 'अभिव्यक्ति' के नये अंक का लोकार्पण कर रहे थे। उन्होंने इस अवसर पर अपअने अध्यपकीय जीवन के संस्मरण भी सुनाए। 

आयोजन की अध्यक्षता कर रहे वरिष्ठ आलोचक और साहित्य अकादेमी की हिन्दी समिति के सदस्य प्रो माधव हाड़ा ने एक अन्य पत्रिका 'लहर' का लोकार्पण करते हुए कहा कि मशीनी दौर में युवा विद्यार्थियों में हाथ से लिखने के प्रति गैर जिम्मेदारी का भाव बना हुआ है लेकिन हमें भूलना नहीं चाहिये कि परीक्षा लिखने की ही होती है। उन्होने युवा विद्यार्थियों को सम्बोधित करते हुए कहा कि रचनात्मकता जीवन में बहुत उपयोगी मूल्य है, शिक्षा में भी रटने वाले भले अधिक अंक पा जाएं लेकिन आगे वही बढ्ते हैं जिनमें रचनात्मकता के गुण होते हैं। प्रो हाड़ा ने इस सम्बन्ध में हिन्दी साहित्य सभा की गतिविधियों की सराहना करते हुए कहा कि इनसे हिन्दी साहित्य को नये और गम्भीर पाठक मिलेंगे। 

इससे पहले विभाग के प्रभारी डा पल्लव ने दोनों अतिथियों का स्वागत करते हुए कहा कि साहित्य के विद्यार्थियों को रचनात्मकता के ऐसे अवसर उपलब्ध करवाने के पीछे उद्देश्य यही है कि इनका व्यक्तित्व वास्तव में बहुआयामी बन सके। पत्रिकाओं की सम्पादक डा नीलम सिंह ने अतिथियों का आभार माना। विभाग की तरफ़ से मिहिर पंड्या और कुमारी अन्तिमा ने दोनों मेहमानों को पुस्तकें भेंट कीं। डा अरविन्द कुमार सम्बल ने लेखकों का परिचय दिया। आयोजन में विभाग के प्राध्यापकों सहित बड़ी संख्या में शोधार्थी और विद्यार्थी उपस्थित थे। 

संपर्क 
नीलम सिंह 
संपादक, लहर 
हिन्दी विभाग, हिन्दू कालेज

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प्रधान मंत्री का कोई ई मेल आईडी ही नहीं

भारत के लोगों को डिजिटल इंडिया का सपना दिखाने वाले और सोशल साइट्स पर सबसे सक्रिय राजनेताओं में शुमार प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के पास अपनी ई-मेल आईडी नहीं है । छत्तीसगढ़ के एक कारोबारी ने प्रधानमंत्री कार्यालय (पीएमओ) से सूचना का अधिकार (आरटीआई) के जरिए यह चौंकाने वाली जानकारी हासिल की है। छत्तीसगढ़ की सीएसआर कंपनी के फाउंडर रुसेन कुमार ने आरटीआई ऐक्ट के तहत पीएमओ में पत्र लिखकर उनका प्रयोग में आने वाला ई-मेल अड्रेस मांगा था।
 
इसके जवाब में पीएमओ की ओर से 17 फरवरी को एक पत्र (क्रमांक 10335/2014) भेजा गया, जिसमें बताया गया कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के पास कोई निजी मेल आईडी नहीं है। पत्र में यह भी लिखा गया कि किसी भी विषय में जानकारी, फीडबैक, सुझाव या शिकायत के लिए वह प्रधानमंत्री की आधिकारिक वेबसाइट http://pmindia.gov.in/en/interact-with-pm/ के जरिए संपर्क किया जा सकता है।
 
पीएमओ का जवाब मिलने के बाद रुसेन ने रायगढ़ में कहा कि यह आश्चर्य की बात है कि दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र के प्रधानमंत्री के पास एक अदद ई-मेल आईडी नहीं है। मोदी सरकार भारत को डिजिटल इंडिया बनाने की ओर अग्रसर है। मोदी के प्रधानमंत्री बनने में सबसे बड़ा योगदान सोशल मीडिया का रहा है, ऐसे में इंफर्मेशन टेक्नॉलजी और ई-गवर्नेंस को बढ़ावा देने वाली सरकार के प्रधानमंत्री के पास ई-मेल आईडी का न होना कई सवाल उठाता है।
 
रुसेन ने दावा किया कि पत्र में दिए यूआरएल के जरिए पीएम तक अपनी बात पहुंचाने के लिए एक लंबी प्रक्रिया से गुजरना पड़ता है। प्रधानमंत्री से जुड़ने के लिए यूजर को वहां एक नया अकाउंट बनाना पड़ता है। साथ ही इस वेबसाइट को एकतरफा कम्युनिकेशन के लिए तैयार किया गया है। रिक्वेस्ट/ फीडबैक/सुझाव भेजने के बाद वह प्रधानमंत्री तक पहुंचा कि नहीं इसकी जानकारी निकालने का कोई तरीका नहीं है। रुसेन का कहना है कि प्रधानमंत्री तक अपनी बात पहुंचाने के लिए आम आदमी को ऐसा कोई मंच नहीं दिया गया है जो आसान, सस्ता और त्वरित हो।

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हिन्दू कालेज में ‘हस्ताक्षर’ का लोकार्पण

दिल्ली। हिन्दी की लघु पत्रिकाएं जुगनू की तरह हैं जो रोशनी भले न दे सके लेकिन उसका रोमांस बड़ी दिशा में प्रेरित करता है। युवाओं के बीच ऐसी पत्रिकाएं सृजनात्मक ऊर्जा को बढ़ाने और साहित्य में नई चीज़ों को ईजाद करने में सहायक होती हैं। विख्यात उपन्यासकार राजू शर्मा ने हिन्दू कालेज में हुए एक आयोजन में कहा कि हमारे समय के बड़े रचनाकारों के साथ युवाओं का ऐसा सीधा जुड़ाव काम ही दिखाई देता है और 'हस्ताक्षर' ऐसा कर बड़ा काम कर रही है। शर्मा हिन्दी साहित्य सभा द्वारा प्रकाशित की जा रही हस्तलिखित पत्रिका 'हस्ताक्षर' के पंद्रह अंकों की यात्रा पूरी होने के अवसर पर बोल रहे थे। उन्होंने इस अवसर पर पत्रिका के नए अंक का लोकार्पण भी किया। पत्रिका की संपादक डॉ रचना सिंह ने 'हस्ताक्षर' के आगामी अंकों की योजनाओं के बारे में बताते हुए कहा कि पत्रिका के सारे काम हाथ से करने के पीछे उद्देश्य नयी पीढ़ी में श्रम के प्रति आस्था पैदा करना और समकालीन लेखन के प्रतिनिधि लेखकों से सीधा जुड़ाव महसूस करने का था। 'हस्ताक्षर' के प्रत्येक अंक में किसी लेखक की हस्तलिपि में उनकी प्रतिनिधि रचनाएँ प्रकाशित की जाती हैं। 

उन्होंने बताया कि नए अंक में चंद्रकांत देवताले और मृदुला गर्ग की रचनाओं के साथ वीरेन डंगवाल से हस्ताक्षर के पाठकों की एक आत्मीय बातचीत भी दी गई है। इससे पहले स्वागत करते हुए विभाग के आचार्य रामेश्वर राय ने 'हस्ताक्षर' के इतिहास को साझा किया। उन्होंने कहा कि यह एक झरोखा है जिसके माध्यम से विभाग की रचनात्मक संभावनाओं को देखा जा सकता है। अध्यक्षता कर रही महादियालय की प्राचार्या डॉ अंजू श्रीवास्तव ने कहा कि 'हस्ताक्षर' जैसी पत्रिकाएं आज के मशीनी समय में दुर्लभ हैं और केवल प्रस्तुति के कारण ही नहीं अपितु अंतर्वस्तु से भी इसकी पहचान व्यापक पाठक वर्ग में बनी है। विभाग के प्रभारी डॉ पल्लव ने बताया कि व्यापक पाठक वर्ग तक पत्रिका की पहुँच बनाने के लिए वेब जैसे आधुनिक माध्यमों पर भी इसे उपलब्ध करवाया जा रहा है। उन्होंने कहा कि 'हस्ताक्षर' के माध्यम से युवा समुदाय को अपने समय के असली सवालों को पहचानने की कोशिश विभाग कर रहा है। आयोजन में विभाग के प्राध्यापक डॉ अभय रंजन, डॉ हरीन्द्र कुमार, डॉ अरविन्द सम्बल,डॉ नीलम सिंह, डॉ राजीव कुमार, डॉ मिहिर पंड्या, डॉ प्रवीण कुमार सहित बड़ी संख्या में शोधार्थी और विद्यार्थी उपस्थित थे। 

 

संपर्क
रचना सिंह 
संपादक, हस्ताक्षर 
हिन्दी विभाग, हिन्दू कालेज, दिल्ली 

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गूगल के डूडल में महिला शक्ति की रंग-बिरंगी अभिव्यक्ति

गूगल ने अपने चिर-परिचित अंदाज में इस बार भी महिला दिवस पर डूडल बनाकर बधाई दी है. गूगल ने अपने इस डूडल में महिलाओं को बड़ी उपलब्धियों के साथ एस्ट्रोनॉट, वैज्ञानिक, एथलीट, टीचर्स, म्यूजिशियन, शेफ और लेखिका की अलग-अलग भूमिकाओं में दिखाया गया है. गूगल कायह डूडल संदेश दे रहा है कि कभी इन सभी भूमिकाओं को सिर्फ पुरिषों के लिए ही माना जाता था लेकिन अब महिलाएं इन सभी क्षेत्रों में आगे हैं और बढ़-चढ़कर अपनी भूमिका निभा रही हैं। 

 
इस डूडल में एक कहानी पिरोई गई है जिसमें इस बात पर प्रकाश डाला गया है कि आखिर 1911 में शुरु होने के यानी एक सदी बाद भी महिला दिवस इतना महत्वपूर्ण क्यों है.कहना न होगा इस डूडल के माध्यम से तकनीक के इस्तेमाल के साथ-साथ गूगल ने अपनी समसामयिक जिम्मेेदारी के निर्वहन की नायाब मिसाल एक बार फिर पेश की है। महिला सशक्तिकरण पर सोच के नए आयाम, समझ की नई दिशा के साथ प्रस्तुति की रचनात्मकता के संगम के रूप में इस डूडल को देखा जा सकता है। 
गूगल ने इस डूडल को अंग्रेजी कैप्शन दिया है- हैप्पी इंटरनेशनल वूमेंस डे। दुनिया भर में महिलाओं के अधिकारों और उन्हें बढ़ावा देने के लिए यह दिन खास महिलाओं के लिए 8 मार्च को मनाया जाता रहा है। 

जब बात महिला शक्ति की चली है तो लीजिये 'आखिर क्यों ?' का यह मशहूर गीत गुनगुना लीजिये –

कोमल है तू कमजोर नहीं तू, शक्ति का नाम ही नारी है
जग को जीवन देने वाली, मौत भी तुझसे हारी है

सतियों के नाम पे तुझे जलाया, 
मीरा के नाम पे जहर पिलाया, 

सीता जैसे अग्नि परीक्षा जग में अब तक जारी है
कोमल है कमजोर नहीं तू शक्ति का नाम नारी है

इल्म हुनर में …. दिल दिमाग में
किसी बात में कम तो नहीं
पुरुषो वाले … सारे ही अधिकारों की अधिकारी है, 

कोमल है कमजोर नहीं तू शक्ति का नाम नारी है
जग को जीवन देने वाली मौत भी तुझसे हारी है… 

बहुत हो चुका ….. अब मत ना सहना
तुझे इतिहास बदलना है 
नारी को कोई कह ना पाए … अबला है, बेचारी है

कोमल है कमजोर नहीं तू शक्ति का नाम नारी है
जग को जीवन देने वाली, मौत भी तुझसे हारी है, 
कोमल है तू कमजोर नहीं तू शक्ति का नाम ही नारी है
जग को जीवन देने वाली मौत भी तुझसे हारी है

और प्रसंगवश  ये रहे आपकी डायरी के लिए महिला जगत और महिला अधिकारों के संघर्ष के कुछ बेहद अहम आंकड़े –

१६९१ : अमरीका। मेसेच्यूसेट्स राज्य में महिलाओं को वोट देने का अधिकार मिला, लेकिन १७८० में यह छीन लिया गया।
१७८८ : फ्रांस। फ्रांसीसी राजनीतिज्ञ काँडसेंट ने महिलाओं की शिक्षा, राजनीति और नौकरी के अधिकार की माँग की।
१७९२ : ब्रिटेन। मेरी बुलस्टोनक्राफ्ट की पुस्तक 'ए विंडिकेशन आफ राइट्स आफ वीमेन' प्रकाशित हुई, जो नारी अधिकारों पर पहली पुस्तक थीं।
१८४० : अमरीका। लुक्रीशियाने ईक्वल राइट एसोसिएशन की स्थापना करके नीग्रो और स्त्रियों के लिए समान अधिकारों की माँग की।
१८५७ : अमरीका। ८ मार्च को न्यूयार्क की सिलाई-उद्योग और वस्त्र उद्योग की मज़दूरिनों ने पुरुषों के समान वेतन की माँग करते हुए १० घंटों के कार्य दिवस के लिए हड़ताल की।
१८५९ : रूस। सेंट पीटर्सबर्ग में नारी मुक्ति आंदोलन का सूत्रपात हुआ।
१८६२ : स्वीडन। महिलाओं को म्युनिस्पल चुनावों में वोट देने का अधिकार मिला।
१८६५ : जर्मनी। लुइसी ओटटो ने जर्मन महिलाओं के महासंघ की स्थापना की।
१८६६ : ब्रिटेन। प्रसिद्ध अर्थशास्त्री जान स्टुअर्ट मिल ने माँग की कि महिलाओं को भी मताधिकार दिया जाए।
१८६८ : ब्रिटेन। 'नेशनल वीमेंस सफेजट सोसायटी' की स्थापना हुई।
१८६९ : अमरीका। 'नेशनल वीमेंस सफरेज एसोसिएशन' (राष्ट्रीय महिला मताधिकार संगठन) की स्थापना हुई।
१८७० : स्वीडन, फ्रांस। महिलाओं को चिकित्साशास्त्र के अध्ययन की स्वतंत्रता मिली।
१८७४ : जापान। महिलाओं के लिए पहला अध्यापिका प्रशिक्षण विद्यालय खुला।
१८७८ : रूस। सेंट पीटर्सबर्ग में प्रथम महिला विश्वविद्यालय की स्थापना हुई।
१८८२ : फ्रांस। प्रसिद्ध लेखक विक्टर ह्यूगो के संरक्षण में महिला अधिकार संगठन की स्थापना हुई।
१८९३ : न्यूजीलैंड। महिलाओं को मताधिकार मिला।
१९०१ : नार्वे। महिलाओं ने पहली बार म्युनिसपिल चुनावों में मतदान किया।
१९०४ : अमरीका। 'इंटरनेशनल वीमेन सफरेंज एलायन्स' (अंतर्राष्ट्रीय महिला मताधिकार समिति) की स्थापना की गई।
१९०५ : ब्रिटेन। मैनचेस्टर में नारी आंदोलनकारियों की एक सभा हुई। जिसमें एनी कैनी और क्रिस्टाबेल पैकहर्स्ट' को गिरफ्तार किया गया।
१९०६ : फिनलैंड। महिलाओं को मताधिकार मिला।
१९०८ : ब्रिटेन। 'वीमेंस फ्रीडम लीग' की स्थापना हुई और प्रदर्शन के सिलसिले में क्रिस्टाबेल पैकहर्स्ट और ड्रूमांड को गिरफ्तार कर लिया गया।
१९१० : डेनमार्क। कोपेनहेगन में द्वितीय अंतर्राष्ट्रीय महिला कांग्रेस की सभा में क्लारा जेटकिन ने प्रस्ताव रखा कि न्यूयार्क की मजदूरिनों की हड़ताल (८ मार्च १८५७) की याद में ८ मार्च को महिला-दिवस के रूप में मनाया जाए।
१९११ : जापान। महिला मुक्ति आंदोलन का सूत्रपात हुआ।
१९१२ : चीन। नानकिंग में देश के कई महिला आंदोलन के संगठनों की बैठक हुई जिसमें महिलाओं के मताधिकार की माँग की गई।
१९१३ : नार्वे। महिलाओं को मतदान का अधिकार मिला। आस्ट्रिया, स्विट्जरलैंड, डेनमार्क में ८ मार्च को महिला दिवस मनाया गया और मतदान के अधिकार की माँग की गई।
१९३६ : फ्रांस। श्रीमती क्यूरी (नोबल पुरस्कार प्राप्त) सहित तीन महिलाएँ मंत्री बनीं, लेकिन सामान्य महिलाओं को मताधिकार नहीं मिला।
१९४५ : फ्रांस, इटली। महिलाओं को मतदान का अधिकार मिला।
१९५१ : अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन ने समान श्रम के लिए समान वेतन का नियम पास किया।
१९५२ : राष्ट्रसंघ की महासभा ने भारी बहुमत से राजनैतिक अधिकारों का नियम पास किया।
१९५७ : ट्यूनीशिया। स्त्री-पुरुष समानता का कानून बना।
१९५९ : श्रीलंका। श्रीमती सिरीमाओ भंडारनायक विश्व की प्रथम महिला प्रधानमंत्री बनी।
१९६४ : पाकिस्तान। विश्व में पहली बार कुमारी फातिमा जिन्ना ने राष्ट्रपति पद के लिए चुनाव लड़ा।
१९६७ : ईरान। पत्नी को बिना पति की आज्ञा के नौकरी करने का अधिकार मिला।
१९७५ : अंतर्राष्ट्रीय महिला वर्ष मनाया गया, जिसे महिला दशक के रूप में विस्तृत कर दिया गया।

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लेखक राष्ट्रपति सम्मानित प्रखर वक्ता और शासकीय दिग्विजय पीजी स्वशासी महाविद्यालय, राजनांदगांव ( छत्तीसगढ़ ) के हिन्दी विभाग में प्राध्यापक हैं। 

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हिन्दू कालेज में प्रो पालीवाल को श्रद्धांजलि

नई दिल्ली।  विख्यात आलोचक और हिन्दू कालेज के हिन्दी विभाग के पूर्व आचार्य प्रो कृष्णदत्त पालीवाल के असामयिक निधन पर  शोक सभा का आयोजन कर उन्हें श्रद्धांजलि दी गई। 
 
विभाग के अध्यापक डा रामेश्वर राय ने  प्रो पालीवाल  स्मरण करते हुए कहा कि उनके अध्यापन में मंत्र का सम्मोहन था। वे विचारों की वायवीयता और सिद्धांतों की शुष्कता को जीवनानुभव की ऊष्मा में बदल देने वाले जादूगर की तरह थे। डॉ राय ने कहा कि उन्हें ईश्वर से स्मृति का उज्ज्वल वरदान मिला था। उन्होंने प्रो पालीवाल से जुड़े कुछ संस्मरण भी सुनाए।प्रो पालीवाल के शोध छात्र और शिष्य रहे डॉ हरीन्द्र कुमार ने कहा कि प्रो पालीवाल का शिष्य होना प्रत्येक विद्यार्थी को गर्व का अनुभव करवाता है।  उनमें हिन्दी के अनेक कोशों का वास था और केवल कुशल अध्यापक ही नहीं वे बेहतर मनुष्य भी थे।

 
डॉ हरीन्द्र ने उनके साथ व्यतीत समय को याद करते हुए कहा कि वे हमारी स्मृति में सदैव बने रहेंगे। विभाग के अध्यापक डॉ पल्लव ने प्रो पालीवाल को अपनी पीढ़ी का सबसे परिश्रमी आलोचक बताते हुए कहा कि उनके जैसा अध्यवसायी आलोचक कभी कभार होता है। डॉ पल्लव ने कहा कि सस्ता साहित्य मंडल जैसी संस्था को फिर से सक्रिय बनाने के लिए भी हिन्दी संसार उनका ऋणी रहेगा। डॉ रचना सिंह ने उनसे हुई मुलाकातों को याद किया।  आयोजन में डॉ अभय रंजन, डॉ अरविन्द सम्बल और डॉ नीलम सिंह सहित अध्यापक और विद्यार्थी उपस्थित थे। अंत में दो मिनिट का मौन रखा गया। 

संपर्क 
अरविन्द कुमार सम्बल 
सहायक आचार्य 
हिन्दी विभाग 
हिन्दू कालेज, दिल्ली 

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जम्मू कश्मीर की मदद के लिए आगे आया म.प्र.

पहलीबार जम्मू-कश्मीर सरकार में शामिल भाजपा ने राज्य की खराब ऊर्जा व्यवस्था से निपटने के लिए मध्यप्रदेश से एक कोयला ब्लॉक जम्मू-कश्मीर सरकार को देने का निश्चय किया है। राज्य में पीडीपी और भाजपा के बीच जिस न्यूनतम साझा कार्यक्रम पर सहमति बनी है, उसमें यह बिंदु भी शामिल है। इसी के साथ राज्य में 56 नियमित गैस एजेंसियों के साथ ही 106 राजीव गांधी ग्रामीण एलपीजी वितरक योजना के तहत भी गैस एजेंसियां आवंटित की जाएंगी। सभी एजेंसियां समय पर खुल जाएं, इसके लिए पेट्रोलियम मंत्री धर्मेंद्र प्रधान स्वयं निगरानी कर रहे हैं।

विधानसभा का संयुक्त सत्र 18 को
जम्मू में मुख्यमंत्री मुफ्ती मोहम्मद सईद ने अपनी पहली कैबिनेट बैठक में 18 मार्च को विधानसभा का संयुक्त सत्र बुलाने की मंजूरी दी

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क्या गजब लोकतंत्र है हमारा!

दवा और डॉक्टर  पेशे के क्या मानक हों –यह खुद भारतीय चिकित्सा परिषद् करती  है  जिसके सदस्य डॉक्टर  हैं | और सरकारी डॉक्टरों के पास छोटे से ऑपरेशन के लिए जाएँ तो कहते हैं अनेस्थेसिया विशेषज्ञ  नहीं होने के कारण वे ऑपरेशन नहीं कर सकते किन्तु टारगेट प्राप्त करने के दबाव में वे परिवार नियोजन के ऑपरेशन बिना अनेस्थेसिया विशेषज्ञ के कर देते हैं|   वकीलों के पेशेवर मानक क्या हों , यह  बार कौंसिल तय करती है किसके सदस्य खुद  वकील होते हैं | कानून में क्या सुधार हों  यह  भारतीय विधि आयोग तय करता है  जिसके अधिसंख्य सदस्य वकील और न्यायाधीश होते हैं | मानवाधिकारों के उल्लंघन में न्यायाधीशों और पुलिस का स्थान  सर्वोपरि है किन्तु मानवाधिकार आयोगों में मानवाधिकारों के उल्लंघन की  जांच करने वाले अधिसंख्य सदस्य न्यायाधीश और  पुलिस वाले ही होते हैं|  कैसी फ़िल्में जनता को दिखाई जाएँ यह सेंसर बोर्ड तय करता है जिसके सदस्य फिल्म वाले होते हैं |  मीडिया के मानक क्या हो यह  प्रेस परिषद् तय करती है जिसके सदस्य भी मीडिया जगत के लोग होते हैं |

इस लोकतंत्र में जनता का भाग्य  उनके नुमायंदे नहीं बल्कि उस पेशे के लोग तय करते हैं जिनके अत्याचारों की  शिकार जनता होती है  | यानी तुम्ही मुंसिफ , तुम्हारा ही कानून और तुम्ही गवाह , निश्चित है गुनाहगार हम ही निकलेंगे | क्या यह दिखावटी लोकतंत्र नहीं जोकि औपनिवेशिक  परम्पराओं  का अनुसरण करता है ?
 
सही अर्थों में लोकतंत्र वही है जहां जनता के नुमायंदे मिलकर तय करें कि जनता की अपेक्षाएं क्या हों | आवश्यक हो तो अधिकतम एक तिहाई पेशेवर विशेषज्ञों की  सेवाएं ली जा सकती हैं |

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

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   विनय ना मानत जलधि जड़, गए तीन दिन बीती, बोले राम सकोप तब, भय बिन होई ना प्रीती. 

"I have never understood how people who want to pay peanuts; expect work from anyone other than monkeys". 
 इतने बदनाम हुए हम तो इस ज़माने में| तुमको लग जाएँगी सदियाँ हमें भुलाने में|| – गोपाल दास नीरज

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मयंक गाँधी ने केरजड़ीवाल पर फोड़ा ब्लॉग बम

आम आदमी पार्टी (आप) में पिछले दस दिनों से जारी आपसी कलह खत्म होने का नाम नहीं ले रही है। बुधवार को पार्टी की राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक में योगेंद्र यादव और प्रशांत भूषण को सबसे ताकतवर पॉलिटिकल अफेयर्स कमिटी (पीएसी) से निकाले जाने के बाद आप के नेता मयंक गांधी ने भी बागी तेवर दिखाए हैं। दोनों नेताओं को कमिटी से निकाले जाने के फैसले पर मयंक गांधी ने कई सवाल उठाए हैं। गुरुवार को मयंक ने ब्लॉग लिख कर न केवल बैठक की बातों को सार्वजनिक किया बल्कि केजरीवाल पर खुलकर निशाना साधा। उन्होंने आरोप लगाया कि केजरीवाल ने ही योगेंद्र-प्रशांत को पीएसी से निकलवाया। उन्होंने दावा कि पिछले दिनों एक बैठक के दौरान केजरीवाल ने स्पष्ट कर दिया था कि वह प्रशांत और योगेंद्र के साथ काम नहीं कर सकते। इस बीच मयंक गांधी के खुलासे पर पीएसी से हटाए गए योगेंद्र यादव ने कहा, ''मैं ज्यादा कुछ नहीं कहना चाहूंगा लेकिन सच को छिपाया नहीं जा सकता।''
 
'मैं पार्टी कार्यकर्ताओं को सच बताना चाहता हूं'
गुरुवार को लिखे अपने ब्लॉग में मयंक ने कहा, ''मैं इसके लिए पहले से ही माफी मांगता हूं कि मैं बुधवार को हुई राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बातों के बारे में सार्वजनिक रूप से बात कर रहा हूं। क्योंकि मैं हमेशा से ही एक अनुशासित कार्यकर्ता रहा हूं।'' मयंक ने कहा, ''2011 में जब लोकपाल ड्रॉफ्ट कमिटी की बैठकें होती थीं तो केजरीवाल बैठक से आने के बाद कहते थे कि कपिल सिब्बल ने बैठक की बातों को दुनिया के सामने नहीं लाने को कहा है। उस वक्त अरविंद कहते थे कि उनकी ड्यूटी है कि इस प्रक्रिया की जानकारी देश को दी जाए, क्योंकि हम जनता के प्रतिनिधि के रूप में जा रहे हैं। उसी तरह राष्ट्रीय कार्यकारिणी में मैं केवल वॉलंटियर्स के प्रतिनिधि के रूप में था। और मैं इस हालत में गैग ऑर्डर स्वीकार कर नहीं कर सकता। वॉलेंटियर्स को इससे दूर नहीं रखा जा सकता वे ही मुख्य स्त्रोत है। उन्हें किसी से लीक हुई जानकारी मिले उससे अच्छा है कि मैं उन्हें फैक्चुअल जानकारी दूं। इसलिए मैं ब्लॉग लिख रहा हूं।''
 
मेरे खिलाफ कार्रवाई करें, मुझे चिंता नहीं
मयंक गांधी ने कहा कि पिछली रात किसी ने मुझसे कहा कि बैठक की बातें सार्वजनिक करने पर मेरे खिलाफ कार्रवाई हो सकती है। लेकिन मुझे इसकी चिंता नहीं है। मुंबई में पार्टी का चेहरा माने जाने वाले मयंक गांधी ने यह भी मांग की है कि बुधवार को हुई राष्ट्रीय कार्यकारिणी (एनई) की बैठक की पल-पल की जानकारियां सार्वजनिक की जानी चाहिए।

दिल्ली चुनाव के दौरान प्रशांत भूषण ने दी थी प्रेस कॉन्फ्रेस की चेतावनी
मयंक गांधी ने अपने ब्लॉग में विस्तार से लिखा कि आखिर पार्टी में विवाद कब से और कैसे शुरू हुआ। उन्होंने लिखा है, ''दिल्ली चुनाव प्रचार के दौरान प्रशांत भूषण ने कई बार धमकी दी थी कि वह पार्टी के खिलाफ प्रेस कॉन्फ्रेंस करेंगे। उन्हें उम्मीदवारों की चयन प्रक्रिया पर कई बार सवाल उठाया था। हालांकि चुनाव खत्म होने तक मामला शांत रखा गया था। यह भी आरोप लगे कि योगेंद्र यादव ने केजरीवाल को पार्टी संयोजक पद से हटाने की साजिश की। पार्टी के संचालन को लेकर भी केजरीवाल, प्रशांत भूषण और योगेंद्र यादव के बीच मतभेद और विश्वास की कमी थी। ''
मयंक ने आगे लिखा, ''26 फरवरी की रात जब एनई की मुलाकात हुई थी तो अरविंद ने कहा था कि यदि ये दो (योगेंद्र-प्रशांत) कमिटी में रहेंगे तो वे संयोजक के तौर पर काम करने में असमर्थ होंगे। चार मार्च को एनई की बैठक रूप से इसी बैकग्राउंड पर हुई।''

क्या हुआ राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक में
मयंक गांधी ने आगे लिखा है कि योगेंद्र यह समझते थे कि अरविंद नहीं चाहते कि वे दोनों पीएसी की बैठक में रहें, क्योंकि वे उनके साथ काम नहीं करना चाहते थे। वे दोनों पीएसी से बाहर रह कर खुश हैं लेकिन उन्हें कॉर्नर नहीं किया जाना चाहिए। इस दौरान दो प्रस्ताव लाए गए।
पहला प्रस्तावः एनई की बैठक में पहला प्रस्ताव यह लाया गया कि पीएसी का फिर से गठन किया जाए। वोटिंग के जरिए नए पीएसी सदस्यों को शामिल किया जाए। इस दौरान योगेंद्र यादव और प्रशांत भूषण अपने उम्मीदवार नहीं खड़ा कर सकेंगे।
दूसरा प्रस्तावः पीएसी मौजूदा तरीके से ही आगे भी चलती रहेगी और योगेंद्र-प्रशांत इसकी बैठकों में हिस्सा नहीं लेंगे।
बैठक के दौरान कुछ देर के लिए मनीष और दिल्ली टीम के सदस्य (आशीष खेतान, आशुतोष, दिलीप पांडे और अन्य) चर्चा के लिए एक किनारे गए थे। फिर से बैठक शुरू होने के बाद मनीष ने प्रस्ताव रखा कि प्रशांत और योगेंद्र को पीएसी से बाहर हटाया जाए और इसका संजय सिंह ने समर्थन किया।

वोट न देने पर दी सफाई
मयंक ने ट्वीट के जरिए अफवाहों को खारिज किया कि उन्होंने किसी वोट दिया और किसे वोट नहीं दिया। मयंक ने कहा, मैं कुछ कारणों के चलते खुद को वोटिंग प्रक्रिया से दूर रखा। पहले कारण के रूप में उन्होंने कहा, '' चूंकि अरविंद पीएसी का कामकाज बिना विवाद के चलाने के पक्ष में थे। और मैं इससे सहमत था कि प्रशांत और योगेंद्र को कोई अन्य महत्वपूर्ण काम दिया जाए।'' दूसरा कारण यह था कि मैं सार्वजनिक रूप से इस तरह प्रस्ताव लाकर दोनों को हटाए जाने से स्तब्ध था। क्योंकि दोनों को इस तरह हटाए जाना दुनिया भर के कार्यकर्ताओं की भावनाओं के खिलाफ है।

मयंक ने अपने ब्लॉग के अंत में यह स्पष्ट करने की कोशिश की है कि बैठक की बातों को सामने लाकर उन्होंने कोई विद्रोह नहीं किया। उन्होंने कहा, ''मैं प्रेस में जाने की बजाए इसे अपने सभी कार्यकर्ताओं के लिए लिख है। इस पर मेरे खिलाफ कार्रवाई भी हो सकती है, अगर ऐसा होता है तो फिर होने दीजिए।''

पार्टी का आइडिया किसी व्यक्ति से बड़ा- योगेंद्र यादव
पीएसी कमिटी से निकाले गए योगेंद्र यादव ने कहा, ''पार्टी ने इस बात का फैसला लिया है कि कल की मीटिंग में क्या हुआ इसके बारे में मीडिया से कोई भी बात नहीं की जाएगी। मैंने मयंक गांधी का ब्लॉग पढ़ा है जिसे पढ़ने के बाद मैं कह सकता हूं कि इसमें काफी बातें सही लिखी हुई हैं। मैं पार्टी के फैसले से आहत नहीं हूं बल्कि इससे यह संदेश गया है कि पार्टी ने पारदर्शिता का रास्ता नहीं छोड़ा है। यह किसी एक आदमी की पार्टी नहीं बल्कि वालंटियर की खड़ी की हुई पार्टी है और वे लोग ही इसे चलाते हैं। पार्टी के गठन का आइडिया किसी भी व्यक्ति से बड़ा है। मैं और प्रशांत भूषण पार्टी की पार्लियामेंट्री कमिटी से बाहर हुए हैं और यह फैसला पार्टी में बहुमत से लिया गया है। इससे एक बार फिर आप में वालंटियर की भूमिका मजबूत हुई है।''

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ढींगरा फ़ाउण्डेशन-हिन्दी चेतना अंतर्राष्ट्रीय साहित्य सम्मानों की घोषणा

उषा प्रियंवदा (अमेरिका), चित्रा मुद्गल (नई दिल्‍ली) एवं पद्मश्री डॉ. ज्ञान चतुर्वेदी (भोपाल) को मोर्रिस्विल, अमेरिका में प्रदान किया जाएगा सम्मान 
संयुक्त राज्य अमेरिका / सीहोर । उत्तरी अमेरिका की प्रमुख त्रैमासिक साहित्यिक पत्रिका ‘हिन्दी चेतना’ के भारत समन्यवक तथा पत्रिका के सह सम्पादक पंकज सुबीर ने प्रेस विज्ञप्ति जारी कर जानकारी दी है कि  ‘ढींगरा फ़ाउण्डेशन-अमेरिका’  तथा ‘हिन्दी चेतना-कैनेडा’ द्वारा प्रारंभ किये गये सम्मानों के नाम चयन के लिए प्रबुद्ध विद्वानों की जो निर्णायक समिति बनाई गई थी, उस समिति के समन्‍वयक लेखक नीरज गोस्‍वामी द्वारा प्रस्‍तुत निर्णय के अनुसार समिति ने 2014 में प्रकाशित हिन्‍दी के उपन्यासों और कहानी संग्रहों पर विचार-विमर्श करके जिन साहित्यकारों को सम्मान हेतु चयनित किया है, वे हैं -‘ढींगरा फ़ाउण्डेशन-हिन्दी चेतना अंतर्राष्ट्रीय साहित्य सम्मान’ : (समग्र साहित्यिक अवदान हेतु) उषा प्रियंवदा (अमेरिका),  ‘ढींगरा फ़ाउण्डेशन-हिन्दी चेतना अंतर्राष्ट्रीय कथा सम्मान’ : कहानी संग्रह- ‘पेंटिंग अकेली है’-चित्रा मुद्गल (सामयिक प्रकाशन) भारत, उपन्यास-‘हम न मरब’-डॉ. ज्ञान चतुर्वेदी (राजकमल प्रकाशन) भारत। सम्मान समारोह 30 अगस्त 2015 रविवार को मोर्रिस्विल, नार्थ कैरोलाइना, अमेरिका में आयोजित किया जाएगा। पुरस्कार के अंतर्गत तीनों रचनाकारों को ‘ढींगरा फ़ाउण्डेशन-अमेरिका’ की ओर से शॉल, श्रीफल, सम्मान पत्र, स्मृति चिह्न, प्रत्येक को पाँच सौ डॉलर (लगभग 31 हज़ार रुपये) की सम्मान राशि, अमेरिका आने-जाने का हवाई टिकिट, वीसा शुल्क, एयरपोर्ट टैक्स प्रदान किया जाएगा एवं अमेरिका के कुछ प्रमुख पर्यटन स्थलों का भ्रमण भी करवाया जाएगा।  

यह जानकारी देते हुए श्री पंकज सुबीर ने बताया कि प्रेमचंद सम्मान तथा डॉ. मोटूरि सत्यनारायण पुरस्कार से सम्मानित प्रतिष्ठित कहानीकार, उपन्यासकार उषा प्रियंवदा प्रवासी हिंदी साहित्यकार हैं। उनकी प्रमुख कृतियों में कहानी संग्रह -फिर वसंत आया, जिन्दग़ी और गुलाब के फूल, एक कोई दूसरा, कितना बड़ा झूठ, शून्य, मेरी प्रिय कहानियाँ, संपूर्ण कहानियाँ, वनवास तथा उपन्यास -पचपन खंभे लाल दीवार, रुकोगी नहीं राधिका, शेष यात्रा,  अंतर्वंशी, भया कबीर उदास, नदी आदि हैं। समग्र साहित्यिक अवदान हेतु उन्हें सम्मान प्रदान किया जा रहा है। व्यास सम्मान, इंदु शर्मा कथा सम्मान, साहित्य भूषण, वीर सिंह देव सम्मान से सम्मानित हिन्दी की महत्त्वपूर्ण कहानीकार चित्रा मुद्गल के अभी तक तीन उपन्यास -एक जमीन अपनी, आवां, गिलिगडु, बारह कहानी संग्रह- भूख, जहर ठहरा हुआ, लाक्षागृह, अपनी वापसी, इस हमाम में, ग्यारह लंबी कहानियाँ, जिनावर, लपटें, जगदंबा बाबू गाँव आ रहे हैं, मामला आगे बढ़ेगा अभी, केंचुल, आदि-अनादि आ चुके हैं। सम्मानित कथा संग्रह ‘पेंटिंग अकेली है’ उनका नया कहानी संग्रह है जो सामयिक प्रकाशन से प्रकाशित हुआ है। पद्मश्री, राष्ट्रीय शरद जोशी सम्मान, कथा यूके सम्मान, यश भारती सम्मान, सहित अनेक प्रतिष्ठित पुरस्कार एवं सम्मान से सम्मानित- पद्मश्री डॉ. ज्ञान चतुर्वेदी भोपाल में ह्रदय विशेषज्ञ के रूप में कार्यरत हैं। अब तक प्रकाशित कृतियों में कहानी संग्रह -रामबाबू जी का बसंत, मूर्खता में ही होशियारी है, उपन्यास -नरक यात्रा, बारामासी, मरीचिका, हम न मरब, व्यंग्य संग्रह -जो घर फूँके, हिंदी में मनहूस रहने की परंपरा प्रकाशित हो चुके हैं। उन्हें उनके राजकमल प्रकाशन से प्रकाशित उपन्यास ‘हम न मरब’ के लिये यह सम्मान प्रदान किया जा रहा है। उल्लेखनीय है कि 2014 से प्रारंभ किये गए ढींगरा फ़ाउण्डेशन-हिन्दी चेतना अंतर्राष्ट्रीय साहित्य सम्मान पिछले वर्ष साहित्यकारों सर्वश्री महेश कटारे, सुदर्शन प्रियदर्शिनी तथा हरिशंकर आदेश को कैनेडा के टोरेण्टो में प्रदान किये गए थे।

 ‘ढींगरा फ़ाउण्डेशन-अमेरिका’ की स्थापना भाषा, शिक्षा, साहित्य और स्वास्थ के लिए प्रतिबद्ध संस्थाओं के साथ मिलकर कार्य करने हेतु की गई है ताकि इनके द्वारा युवा पीढ़ी और बच्चों को प्रोत्साहित कर सही मार्गदर्शन दिया जा सके। देश-विदेश की उत्तम हिन्दी साहित्यिक कृतियों एवं साहित्यकारों के साहित्यिक योगदान को अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर सम्मानित करना भी इसका उद्देश्य है। उत्तरी अमेरिका की त्रैमासिक साहित्यिक पत्रिका ‘हिन्दी चेतना’  को गत 16 वर्षों से हिन्दी प्रचारिणी सभा प्रकाशित कर रही है। हिन्दी प्रचारिणी सभा की स्थापना 1998 में हुई थी। हिन्दी प्रचारिणी सभा गत 16 वर्षों से विदेशों में हिन्दी भाषा के प्रचार-प्रसार में एक विशेष भूमिका निभा रही है । ‘हिन्दी चेतना’ के सम्पादकीय मंडल में श्याम त्रिपाठी संरक्षक, मुख्य संपादक तथा हिन्दी प्रचारिणी सभा के अध्यक्ष, डॉ. सुधा ओम ढींगरा सम्पादक एवं रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’, पंकज सुबीर और अभिनव शुक्ल सह सम्पादक हैं। 

संपर्क
पंकज सुबीर 
सह सम्पादक एवं भारत समन्यवक  हिन्दी चेतना
मोबाइल 09977855399
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