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शशि थरुर की पत्नी सुनंदा पुष्कर ने मोदी के समर्थन में आगे आई

जम्मू-कश्मीर की महिलाओं के राज्य के बाहर के पुरुषों से शादी करने पर उनके साथ भेदभाव होने के नरेंद्र मोदी के बयान पर जमकर राजनीति हो रही है। इस बीच उन्हें एक ऐसे शख्स से सपोर्ट मिला है, जिसकी उम्मीद उन्हें कतई नहीं रही होगी। केंद्रीय मंत्री शशि थरूर की पत्नी और मूल रूप से कश्मीर की रहने वालीं सुनंदा पुष्कर ने कहा कि 'बाहर' के शख्स से शादी करने पर राज्य में महिलाओं के साथ भेदभाव होता है और कोई कहता है कि ऐसा नहीं है तो वह झूठ बोल रहा है। इसके साथ ही उन्होंने कहा कि वह इस मसले पर किसी तरह की राजनीति में नहीं पड़ना चाहती हैं।

सुनंदा पुष्कर ने अपना अनुभव बताते हुए कहा, '2006-07 और 2010 में मैंने जम्मू में जमीन खरीदने की कोशिश की थी, लेकिन डीसी ऑफिस के अधिकारियों ने मुझे बताया कि बाहर के शख्स से शादी करने की वजह से मेरा 'स्टेट सब्जेक्ट' (नागरिकता) रिन्यू नहीं हुआ है, इसलिए मैं राज्य में जमीन नहीं खरीद सकती हूं। सुनंदा ने कहा, 'धारा 370 मौजूदा स्वरूप में काफी भेदभावपूर्ण है और इसकी समीक्षा की जरूरत है।'

सुनंदा के मुताबिक, सन् 1992 में उन्होंने एक मलयाली से शादी की थी और पति की मौत के बाद वह राज्य में जमीन खरीदने गई थीं। उन्होंने अधिकारियों से कहा कि उनके पति की मौत हो गई है और वह राज्य लौट आई हैं। लेकिन अधिकारियों ने उनकी बात को अनसुना कर दिया।

उन्होंने इस मसले को एक न्यूज़ चैनल से बातचीत में और अपने ट्विटर हैंडल के जरिए भी उठाया है। सुनंदा पुष्कर ने कहा कि इस मसले पर उन्होंने राज्य के मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला से बात की थी और उन्होंने इसमें मदद करने का भरोसा दिलाया। उन्होंने आगे कहा, 'हाई कोर्ट द्वारा महिला विरोधी कानून में सुधार लाए जाने के बावजूद जमीनी स्तर पर बदलाव नहीं आया है। उमर ने मुझे बताया कि आपको पता होगा कि कानून में बदलाव के बावजूद आपके बच्चे इन संपत्तियों को नहीं पा सकते हैं। यह मुझे बहुत अजीब लगा। मेरे कजिन ने महाराष्ट्र की लड़की से शादी की है और उनके दोनों बच्चे के नाम से राज्य में प्रॉपर्टी हैं।'

सुनंदा ने कहा, 'जमीन खरीदने की कोशिश मैं जम्मू में कर रही थी, जबकि घाटी में हमारी पुश्तैनी जमीन है। मेरे पिता ने मुझे कहा था कि तुम अब स्टेट सब्जेक्ट नहीं रह गई हो इसलिए अपने हिस्से की जमीन भाइयों के नाम कर दो।'

थरूर की पत्नी ने इस मसले पर बीजेपी पर राजनीति करने का आरोप लगाया और दबे स्वर में इसके लिए नेहरू का जिम्मेदार ठहराया। उन्होंने कहा कि बीजेपी जब सत्ता में थी तो इसके लिए कोई कदम नहीं उठाया। इसके बाद सुनंदा ने कहा कि हो सकता है कि मेरे जबाव से मेरे पति चिढ़ जाएं लेकिन मैं एक कश्मीरी और महिला भी हूं।

सुनंदा ने कहा कि अगर मेरी जानकारी गलत नहीं है तो अनुच्छेद-370 की धीरे-धीरे विदाई होनी थी, लेकिन मुझे नहीं पता कि यह कैसे होना था। उन्होंने कहा, 'जवाहर लाल नेहरू, शेख अब्दुल्ला और राजा हरि सिंह में हुए समझौते के मुताबिक यह सब हुआ। नेहरू ने कश्मीर का विभाग अपने पास रखा और सरदार पटेल गृह मंत्री होने के बावजूद कश्मीर से अलग रहे।'

 

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बुलेट राजा [हिंदी एक्शन कथा ]

दो टूक : कहते हैं जिंदगी हमेशा उस रास्ते जाती है जिस रास्ते के लिए हम उसके लिए बने ही नहीं होते ..पर कई बार जिंदगी लौटकर हमारे उस रास्ते पर भी चल पड़ती है जिसके बारे में उसने कभी नहीं सोचा होता ..लेकिन ऐसा होने पर हमें उसकी कड़वी सचाई पर भी एक नजर डालकर देख लेनी चाहिए कि कहीं ऐसा तो नहीं कि वो हमें गुंजल में फंसा रही हो . निर्देशक  तिग्मांशु धुलिया की सैफ अली खान, सोनाक्षी सिन्हा, विद्युत जामवल, जिमी शेरगिल, गुलशन ग्रोवर, राज बब्बर, रवि किशन, चंकी पांडे, माही गिल, विश्व जीत प्रधान  ,शरत  सक्सेना , विपिन शर्मा , दीप राज राणा और गौरव झा के अभिनय वाली उनकी नयी फ़िल्म बुलेट राजा भी एक ऐसी ही जिंदगी की कहानी कहती है . 

कहानी : फ़िल्म की कहानी उत्तर प्रदेश के लखनऊ में रहने वाले राजा मिश्रा (सैफ अली खान) की  है जो एक रात कुछ आवारा लड़कों से बचता हुआ एक शादी में शामिल होकर शहर के दबंग [शरत सक्सेना ]  के बेटे रूद्र (जिमी शेरगिल) के घर पहुँच  जाता है . उसी रात रूद्र का  चचेरा  भाई ललन [चंकी पांडे ] अपने कुछ लोगों के साथ रूद्र पर हमला करता है और राजा उसे बचा लेता है . दोनों में दोस्ती होती है लेकिन इनकी ये दोस्ती  बदल देती है . रूद्र और उसके पिता के दुश्मन राजा के भी दुश्मन  हो जाते  हैं . खुद को बचाने की लड़ाई मे राजा बुलेट राजा  बन जाता है . राजनीति के उस्ताद राम बाबू [राज बब्बर ] उसे सहारा देते हैं लेकिन राजनीति से और अपराध से जुड़े बजाज[गुलशबन ग्रोवर ] और सुमेर [रवि किशन ] के साथ अफीम माफिया का सरगना [ विश्वजीत प्रधान ] भी उसके दुश्मन ही नही हो जाते बल्कि पुलिस अरुण सिंह उर्फ़ मुन्ना [विद्युत् जामवाल ] भी उसके पीछे पड़ जाता है . बस खुद को बचाने और दूसरों को मात देते राजा बुलेट की इतनी सी कहानी है .जिसमे उसकी प्रेमिका बनी मिताली [सोनाक्षी सिन्हा ]भी शामिल है . 

 

गीत संगीत :  फ़िल्म में संदीप नाथ , कौसर मुनीर और रफ़्तार के गीत हैं और संगीत आरडीबी और निंदी कौर की तिकड़ी ने तैयार किया है . फ़िल्म में देसी टच और पुरबिया संगीत की ताजगी है और तमंचे पर डिस्को ,डोंट टच माय बॉडी के साथ जरा ज़रा सा सरकने लगा जैसे बोलों वाले गीत सुने जा सकते हैं . 

 

अभिनय :  फ़िल्म के केंद्र में सैफ हैं लेकिन उनके पात्र का असली आधार जिमी हैं जो उनके साथ नए तरीके से संयोजन बनाकर सामने आते हैं .  ठेठ देसी किरदार में सैफ खूब  जमते हैं  . जिमी शेरगिल जब तक परदे पर रहते हैं निराश नहीं करते बस उन्हें जरा जल्दी मार दिया  गया .गुलशन ग्रोवर और रवि किशन कुछ भी नया नहीं करते लेकिन  विद्युत् जामवाल को कुछ और निथारा जा सकता था . सोनाक्षी सिन्हा को कुछ नया करने का मौका नहीं मिला जबकि चंकी पांडे अब मसखरे ख़लनायक के तौर पर खीज पैदा करते हैं .  राज बब्बर की एक अलग शैली हैं काम करने और अपने पात्रों को जीने की तो उनके साथ राजीव गुप्ता , विश्व जीत प्रधान  ,शरत  सक्सेना , विपिन शर्मा , दीप राज राणा और गौरव झा भी  अपने छोटे छोटे चरित्रों में याद रहते हैं . 

 

निर्देशन : पहली बात .  यह पान सिंह तोमर और साहेब बीवी गैंगस्टर जैसी फ़िल्में बना चुके धुलिया की शैली की फ़िल्म नहीं है . एक तरह से देखा जाये तो इसे हम तिग्मांशु की पहली व्यवसायिक फ़िल्म कह सकते हैं लेकिन फिल्मी की कहानी में ऐसा कुछ नहीं है, जिसे नया कहा जा सके . पर उनका  प्रस्तुतिकरण और कलेवर में वो  यूपी के अपराध जगत को वो एक मंझे हुए निर्देशक की तरह सामने लाते हैं . वो  परिवेश और प्रस्तुति के साथ भाषा और पहनावे का भी पूरा ख्याल रखते हैं और हमेशा अपने पात्रों को आम जीवन से चुनते हैं जिन्हे वो  रूद्र, सुमेर यादव, बजाज, मुन्ना और जेल में कैद श्रीवास्तव के  साथ शुक्ला, यादव और अन्य जातियों के नामधारी के नेताओं में बदल देते हैं . हालां कि मध्यांतर के बाद फ़िल्म एक जानी पहचानी लीक पर चलती है और अंत में खुद ही बता देती है कि हमने कुछ नया नहीं देखा पर ये भी कि तिग्मांशु अपनी तरीके की अपनी फ़िल्म बनाते हैं जिसे जब चाहे देखा सकता है . 

 

फ़िल्म क्यों देखें : सैफ के लिए .

फ़िल्म क्यों न देखें :  अब भला सैफ के साथ बनी तिग्मांशु की फ़िल्म को छोड़ने को मैं क्यों  कहूंगा .

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अय्याश रईसजादों के क्लब के लिए धन जुटाया तरुण तेजपाल ने?

कई जुगलबंदियां लहर पैदा करती हैं और कई खबर बनाती हैं। ऐसी ही एक जुगलबंदी तहलका संस्‍थापक तरुण तेजपाल और शराब व्यापारी पोंटी चड्ढा के बीच बनी थी। तरुण तेजपाल पोंटी चड्ढा के साथ मिलकर शहरी भारतीयों के लिए एक प्राइवेट क्लब खोलना चाहते थे।

बेहतरीन संपन्न, उदार समुदाय लोगों का क्लब
तेजपाल के शब्दों में कहें तो वह कुछ चुनिंदा शहरी भारतीयों के साथ एक ऐसी ‌बृहद संस्कारिक दुनिया बनाना चाहते थे, जहां बेहतरीन संपन्न, उदार समुदाय के लोग आपस में एक जगह मिलजुल सकें। वो ऐसे लोग हों जो दुनिया को बनाते और सजाते हैं। तेजपाल ने इस क्लब का नाम 'प्रूफ्रॉक' दिया था।

तेजपाल ने अपने एक ईमेल में इन बातों का जिक्र किया है। यह ईमेल उन सदस्यों को भेजा गया था, जो इस क्लब के सदस्य बन सकते थे। इस ईमेल में तेजपाल ‌आगे लिखते हैं कि यह सब कुछ बेहतरीन ड्रिंक्स और शानदार खानों के साथ हमारे लिए नामचीन शेफ तैयार करेंगे।

चड्ढा की फ्लैगशिप कंपनी, वेब इंडस्ट्रीज के अधिकारियों ने कहा कि तेजपाल ने चड्ढा के समक्ष एक बिजनेस प्रेजेंटेशन रखा था, जिसके बाद उन्होंने 2012 की शुरुआत में ही इस विशेष प्राइवेट प्रूफ्रॉक क्लब में निवेश करने का मन बना लिया था।

अधिकारियों ने बताया कि पोंटी चड्ढा की हत्या के बाद मनप्रीत मोंटी चड्ढा ने अपने पिता के सभी बिजनेस वादों को पूरा करने का फैसला लिया है। पोंटी की हत्या, उनके अपने ही फॉर्म हाउस में नवंबर 2012 में हो गई थी।

चड्ढा की कंपनी ने 2 करोड़ रुपये लगाए
इसी साल जून में बनाई गई कंपनी थ्राइविंद आर्ट्स प्राइवेट लिमिटेड के अंदर प्रूफ्रॉक को रखा गया था। 10 जुलाई को कंपनी ने इसके दो शेयरधारकों को 10 रुपये प्रति शेयर के हिसाब से बांट दिए, जिसमें 72 फीसदी शेयर तेजपाल के पास बाकी के 28 फीसदी शेयर नीना तेजपाल को दे दिया गए।

26 अगस्त को चड्ढा होटल प्राइवेट लिमिटेड ने 2 करोड़ रुपये में 1800 रुपये प्रति शेयर के हिसाब से 11,111 शेयर खरीद लिए।

इंडियन एक्सप्रेस को दिए बयान में चड्ढा समूह के प्रवक्ता ने बताया कि हमने इसमें फायदा देखा और इसमें निवेश किया। हमारा इरादा था कि एक बार जब यह बिजनेस मॉडल चल निकले तो मुनाफा कमा कर हम निकल जाएं। हम इसके प्रतिदिन के काम में शामिल नहीं थे।

एक्सप्रेस ने जब नीना तेजपाल से ईमेल कर इस वेंचर के बारे में जानना चाहा तो उन्होंने इसके बार में कोई जवाब नहीं दिया।

दक्षिण दिल्ली के पॉश इलाके, एम ब्लॉक में प्रूफॉक का काम अब भी चल रहा है। क्लब तहलका के ऑफिस के कुछ बिल्डिंग आगे की बिल्डिंग में है। वहां काम कर रहे लोगों ने बताया कि इसका काम जुलाई में शुरू हुआ था और अगले तीन महीनों में यह पूरा बनकर तैयार हो जाएगा। रियल एस्टेट एजेंटों का कहना है कि इस जगह का किराया सालाना 6.5 करोड़ रुपये के आसपास होगा।

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अमूल के संस्थापक स्व. वर्गीज़ कुरियनअमर चित्र कथा में

बच्चों की ग्राफिक कॉमिक्स के जाने-माने प्रकाशक अमर चित्र कथा (एसीके) स्पोर्ट्स के लीजेंड्स ध्यान चंद और के डी जाधव के ऊपर सीरीज का प्रकाशन करने के बाद अब भारत के मिल्कमैन डॉ. वर्गिस कुरियन पर कॉमिक्स लॉन्च की है।�� श्वेतक्रांति के जनक डॉ. वर्गिस कुरियन की मंगलवार को 92वीं जयंती मनाई गई। इस मौके पर कॉमिक्स के रूप में कुरियन की ग्राफिक जीवनी का लोकार्पण किया गया। इसका नाम है ‘वर्गिस कुरियन द मैन विथ द बिलियन लीटर आइडिया’।

इसके 32 पेज में कुरियन -अमूल और दुग्ध क्रांति ((ऑपरेशन फ्लड)) तथा इसके प्रभाव को समेटा गया है। इसमें कुरियन के पहली बार आणंद पहुंचने से लेकर यहीं पंचतत्व में विलीन होने तक की घटनाएं हैं। इस मौके पर अमर चित्रकथा की संपादक रीना पुरी भी मौजूद थीं। अभी इस सीरीज की 30 हजार कॉपियों का ही प्रकाशन किया जा रहा है।� �

अमर चित्र कथा का प्रकाशन 1967 में शुरू हुआ था। 'भारत के महापुरुष', 'वीर महिलाएँ', 'प्रख्यात वैज्ञानिक', 'स्वतंत्रता सेनानी' और 'पौराणिक पात्र' जैसी अनेक श्रृंखलाओं के माध्यम से उन्होंने न सिर्फ ज्ञान बढ़ाया बल्कि बच्चों को प्रेरित भी किया।� �

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प्रियंका चोपड़ा की माँ ने उनके लिए खोजी भाभी

प्रियंका चोपड़ा की पिता की मौत के बाद चोपड़ा के परिवार में पहली बार बड़ी खुशी का मौका आने वाला है। प्रियंका की भाभी की तलाश पूरी हो गई है। वो भी प्रियंका की तरह बरेली की होंगी। नाम है-कनिका माथुर। कैंट में रहती हैं। प्रियंका की मां डॉ. मधु ने उन्हें चुना है।

शहर में अपने नजदीकी काशीनाथ शर्मा के परिवार में शादी समारोह में शामिल होने आईं अभिनेत्री प्रियंका चोपड़ा की मां मधु चोपड़ा ने अपनी होने वाली बहू के बाबत खुलासा किया। उन्होंने बताया कि बेटा सिद्धार्थ पुणे में रेस्टोरेंट व्यवसाय शुरू करने जा रहा है। काम शुरू होने के बाद ही उसकी शादी की जाएगी। शादी समारोह दिल्ली में ही किया जाएगा।

उन्होंने बताया कि फाइनेंस में ग्रेजुएट उनकी बहू बरेली कैंट की ही रहने वाली हैं। बोली, शहर के डा. बीबी माथुर की पोती और अभय माथुर की बेटी कनिका माथुर को उन्होंने ही चोपड़ा परिवार की बहू चुना है। बीते दिनों पहली नवरात्र में ही बहू की रोक की रस्म पूरी कर दी गई है। फिलहाल पहले बेटा अपना करियर बनाने में जुटा है। अगले दो साल के अंदर बेटे की शादी का शुभ लग्न निकाला जाएगा। प्रियंका की शादी के बारे में बोली, वह अपनी शादी के बारे में खुद ही सोच लेंगी।

 

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गुत्थी की गुत्थी सुलझाएंगे राजू श्रीवास्तव

गुत्थी उर्फ सुनील ग्रोवर के कॉमेडी नाइट्स विद कपिल से विदाई लेने के बाद ये तय हो गया था कि कपिल गुत्थी की जगह भरने की तैयारी कर रहे हैं। खबर आ रही है कि राजू श्रीवास्तव कपिल के शो के गुत्थी सुलझा सकते हैं।

राजू श्रीवास्तव को गुत्ती की भूमिका निभाने का न्यौता भी मिला है। हालांकि उनकी ओर से अब तक किसी बात की पुष्टि नहीं हुई है। कुछ दिनों पहले राजू ने वायाकॉम 18 की ओर से गुत्थी का अनुकरण न किए जाने पर जारी नोटिस की निंदा की थी। उन्होंने कहा था कि गुत्थी को कहीं भी गुदगुदाने का हक है। उन्हें लोगों को हंसाने से कोई रोक नहीं सकता है। ये पूरी तरह से गुत्थी का अधिकार है। ऐसे में चैनल की ओर से जारी नोटिस बिल्कुल गलत है। सुनील ग्रोवर ने कॉमेडी नाइट्स विद

 

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माधुरी की गुलाबी गैंग पूरी तरहसे तैयार

माधुरी दीक्षित की फिल्म गुलाब गैंग का पोस्टर जारी हो गया है। फिल्म के पोस्टर में अभिनेत्री माधुरी दीक्षित मां दुर्गा के अवतार में दिख रही हैं। लाल-पीले बैकग्राउंड में सजे माधुरी के इस आक्रामक रूप ने लोगों के अंदर इस फिल्म को लेकर और उत्सुकता पैदा कर दी है। इससे पहले भी इस फिल्म को दो पोस्टर जारी हो चुके हैं, उन दोनों पोस्टर में भी माधुरी का उग्र रूप दिखा था।

अनुभव सिन्हा निर्मित इस फिल्म में जूही चावला भी महत्वपूर्ण भूमिका में शामिल हैं। अनुभव सिन्हा की भी बतौर निर्माता यह पहली फिल्म है। फिल्म के निर्देशक सौमिक सेन है। कहा जा रहा है कि अनुभव सिन्हा की फिल्म गुलाब गैंग की कहानी यूपी के बुलंदशहर के गुलाबी गैंग की है, जो कि महिलाओं के अधिकार के लिए जाना जाता है, जिसकी अध्यक्ष संपत पाल है। फिल्म में जूही चावला एक नेता के रोल में है, वह पहली बार पर्दे पर निगेटिव कैरेक्टर प्ले कर रही हैं। माधुरी दीक्षित की इस पारी को बॉलीवुड की तीसरी पारी कहा जा रहा है। माधुरी ने साल 2007 में यश चोपड़ा की फिल्म आज नच ले से वापसी की थी।

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मूवीज नाउ पर हैरी पॉटर सीरिज के 7 शानदार ब्लॉकबस्टर्स का प्रसारण

 संपूर्ण रोमांचक सीरिज 6 दिसंबर 2013 से रात 9 बजे से देखिए

मुंबई।  मूवीज नाउ इस महीने अपने प्रशंसकों के लिए जादुई आश्चर्य के साथ ऐक्शन का अद्भुत संयोजन लेकर आया है! हैरी पॉटर के दीवाने अब प्रत्येक शुक्रवार रात 9 बजे बहादुर करामाती की भयंकर एवं बेहद बुरे जादूगर के खिलाफ तलाश में शामिल हो सकते हैं!

फिर चाहे हैरी पहली बार हॉगवर्ट्ज में कदम रखता हो या फिर वॉल्देमार्ट के नाश के लिए हॉरक्रूक्सेस को ढूंढ़कर उसे नष्ट कर देने की कोशिशए मूवीज नाउ हैरी पॉटर-द कम्प्लीट एडवेंचर में इन सभी रोमांच का प्रसारण करेगा। हैरी की यात्रा के प्रत्येक अध्याय यानी रॉन और हरमियोन से पहली मुलाकात से लेकर कभी न हारने वाली टीम बनने के साक्षी बनिए जो सबसे खतरनाक जादूगर से लड़ने के लिए विभिन्न प्रयास करती है।

इन सभी ऐक्शन के लिए 6 दिसंबर से हैरी पॉटर एंड द फिलॉस्फर्स स्टोन, हैरी पॉटर एंड द चैंबर ऑफ सिक्रेट्स, हैरी पॉटर एंड द प्रिजनर ऑफ एज्काबेन, हैरी पॉटर एंड द गोबलेट ऑफ फायर, हैरी पॉटर एंड द ऑर्डर ऑफ द फीनिक्स, हैरी पॉटर एंड द हाफ ब्लड प्रिंस और हैरी पॉटर एंड द डेथली हैलोज पार्ट 1 देखिए।

विशेष प्रभावों, बेहतरीन सेट और अपनी पटकथा से दुनिया भर में धूम मचाने वाली फिल्म सिरीज ने 20 अरब डॉलर से अधिक की कमाई की और यह अब तक की सबसे लोकप्रिय फ्रैंचाइज में से एक है। मूवीज नाउ पर हैरी पॉटर सीरिज की 7 बेहतरीन ब्लॉकबस्टर्स देखना न भूलें।

खतरनाक जादूगर के खिलाफ 6 दिसंबर से शुरू हो रही हैरी पॉटर की रोमांचक यात्रा में शामिल होने के लिए देखिए मूवीज नाउ!

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नया कानून बनेगा-बहुसंख्यक वर्ग अपराधी और अल्पसंख्यक पीड़ित की श्रेणी में

संसद का शीतकालीन सत्र आज से शुरू हो चुका है। इसके साथ ही प्रस्तावित सांप्रदायिक हिंसा निरोधक विधेयक पर बहस गर्मा गई है। इस विवादित विधेयक के अनुसार महज बहुसंख्यक होने के नाते किसी भी व्यक्ति को अपराधी और महज अल्पसंख्यक होने के नाते किसी भी व्यक्ति को पीड़ित माना जा सकता है! इसकी रूपरेखा सोनिया गांधी की अध्यक्षता वाली राष्ट्रीय सलाहकार परिषद (एनएसी) द्वारा तैयार की गईहै, जो कि हर लिहाज से एक संविधानेतर संस्था है और उसके सदस्य सोनिया गांधी द्वारा चुने जाते हैं।

प्रस्तावित विधेयक का जाहिर मकसद तो यह है कि देश में सांप्रदायिक हिंसा की घटनाओं पर लगाम लगे। निश्चित ही यह एक नेक खयाल है। लेकिन विधेयक के प्रावधानों को गौर से पढ़ने के बाद हम इस नतीजे पर पहुंचते हैं कि यदि यह पारित हो गया तो पहले ही सांप्रदायिक विद्वेष का सामना कर रहे समाज में ध्रुवीकरण की प्रक्रिया और तीव्र हो जाएगी। निश्चित ही इस विधेयक को पारित करने के पीछे कांग्रेस का मकसद तुष्टीकरण की नीति को बढ़ावा देते हुए वोटबैंक की राजनीति करना है।

प्रस्तावित विधेयक के अनुसार सांप्रदायिक हिंसा का मुजरिम कौन है, इसका निर्धारण दंगों में किसी व्यक्ति द्वारा निभाई गई भूमिका से नहीं, बल्कि इस बात से होगा कि वह बहुसंख्यक है या अल्पसंख्यक। यह प्रावधान तो इस नियम के पूरी तरह उलट है कि : "अपराधी का कोई मजहब नहीं होता।" प्रस्तावित विधेयक के अनुसार सांप्रदायिक तनाव या हिंसा या नफरत फैलाने वाली बातों के लिए अल्पसंख्यक तबके का कोई व्यक्ति जिम्मेदार नहीं होता। न तो कानून और न ही तथ्य इस बात को सही ठहरा सकते हैं। अब जब देश का मिजाज धीरे-धीरे सांप्रदायिक सौहार्द की ओर बढ़ रहा है, मसौदा विधेयक का यह कहना निश्चित ही पक्षपातपूर्णव विभेदकारी है कि सांप्रदायिक तनाव की स्थिति केवल बहुसंख्यक समुदाय द्वारा निर्मित की जाती है व इसके लिए उन्हें ही सजा मिलना चाहिए!

विधेयक के अनुसार यदि दंगों के दौरान किसी मुस्लिम महिला के साथ दुराचार होता है तो इसे अपराध माना जाएगा, लेकिन यदि किसी हिंदू महिला के साथ ऐसा होता है तो इसे अपराध नहीं माना जाएगा! यह बात तो पूरी तरह बेतुकी है, क्योंकि दंगों की स्थिति में कोई भी हिंसा या दुराचार का शिकार हो सकता है। इस विधेयक के जरिए जिस समुदाय का संरक्षण होगा, उसे केवल "समूह" कहकर पुकारा गया है। इस "समूह" से वास्ता रखने वाले अल्पसंख्यक समुदायों को अजा-अजजा की श्रेणी के साथ रखा गया है। इस तरह के कदमों से हिंदू समाज बंटेगा और सामाजिक असंतोष फैलेगा। शिया-सुन्नी संघर्षों से पूरी दुनिया वाकिफ है, लेकिन इस तरह के संघर्षों को विधेयक में सांप्रदायिक हिंसा की श्रेणी में नहीं रखा गया है! यह सीधे-सीधे वोटबैंक की राजनीति है। याद रखा जाना चाहिए कि जब यहूदियों, पारसियों और सीरियाई ईसाइयों पर उनके देशों में जुल्म हुए तो उन्हें भारत के हिंदुओं द्वारा आश्रय दिया गया। इस सहिष्णु समुदाय को दोषी साबित करने की कोशिशें देश के हित में नहीं होंगी।

प्रस्तावित विधेयक आपराधिक न्याय के मानकों को भी उलटने की कोशिश करता है। विधेयक के अनुसार जो व्यक्ति नफरत फैलाने की कोशिशों में लिप्त पाया जाता है, उसे निर्दोष साबित होने तक दोषी माना जाएगा। जबकि भारतीय संविधान का तो यह कहना है कि जब तक किसी व्यक्ति का दोषसिद्ध न हो, तब तक उसे निर्दोष माना जाए। यदि यह विधेयक कानून बन गया, तो किसी व्यक्ति को जेल की सलाखों के पीछे भेजने के लिए उसके खिलाफ कोईआरोप लगाना ही काफी होगा। आरोप को ही उसके खिलाफ साक्ष्य माना जाएगा।ऐसे में आरोपी के लिए अपनी बेगुनाही साबित करना नामुमकिन हो जाएगा। सीआरपीसी के अनुभाग १६१ के तहत कोई बयान नहीं दर्ज किए जा सकेंगे, जबकि पीड़ित के बयान सिर्फ अनुभाग १६४ के तहत अदालत के समक्ष लिए जा सकेंगे। इस कानून के तहत सरकार को संदेशों के आदान-प्रदान को रोकने या दूरसंचार को बाधित करने के भी अधिकार होंगे।

प्रस्तावित विधेयक के मुताबिक मुकदमे की कार्यवाही संचालित करने वाला विशेष लोक अभियोजक "पीड़ित के हित में" कार्य करेगा। पीड़ित शिकायतकर्ता के नाम और पहचान को गुप्त रखा जाएगा। यहां तक कि न्यायिक गतिविधियों पर भी नजर रखी जाएगी। साथ ही यदि किसी संगठन विशेष के व्यक्ति पर आरोप लगाए जाते हैं तो उस संगठन के प्रमुख को भी जिम्मेदार माना जाएगा। इस प्रावधान का गुप्त एजेंडा यह है कि इसकी मदद से हिंदू संगठनों और उनके प्रमुखों पर शिकंजा कसा जाए!

यदि यह बिल पारित हो जाता हैतो केंद्र सरकार बड़ी आसानी से राज्य सरकार के अधिकारों में अतिक्रमण कर सकती है। कानून-व्यवस्था की जिम्मेदारी राज्य सरकार के हाथ में होती है, लेकिन यह कानून बनने के बाद ऐसा नहीं रह जाएगा।

विधेयक में एक सात सदस्यीय समिति का प्रावधान किया गया है, जो सांप्रदायिक हिंसा से संबंधित मामलों की जांच करेगी और फैसले लेगी। सात सदस्यीय समिति में अध्यक्ष और उपाध्यक्ष के साथ चार सदस्य अल्पसंख्यक समुदाय से होंगे। यह तो संविधान की प्रस्तावना के ही प्रतिकूल होगा। जरा सोचिए, यदि सर्वोच्च अदालत, उच्च न्यायालय, चुनाव आयोग सहित अन्य संस्थाओं का गठन इस प्रकार के अल्पसंख्यक-बहुसंख्यक प्रतिनिधित्व के आधार पर किया जाए, तो क्या होगा? अल्पसंख्यकों की बहुसंख्या वाली उपरोक्त समिति को असीमित अधिकार दिए गए हैं। समिति न केवल पुलिस और सशस्त्र बलों को आदेशित कर सकती है, बल्कि उसके समक्ष दिए गए किसी भी कथन या साक्ष्य को न्यायालय के समक्ष दिए गए कथन या साक्ष्य के समकक्ष समझा जाएगा। विधेयक प्रशासनिक अधिकारियों पर भी इस तरह के दबाव निर्मित करता है कि वे हर परिस्थिति में अल्पसंख्यकों का साथ देने को विवश हो जाएंगे।

 

साभार-देनिक नईदुनिया से

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टाईम पत्रिका के सर्वे में मोदी को मात देने के लिए फर्जीवाड़ा !

राजनेताओं द्वारा सोशल मीडिया में और ऑनलाइन प्रचार के लिए पब्लिक रिलेशन कंपनियों का इस्तेमाल कोई नई बात नहीं है और यह भी अक्सर सुनने में आता है कि कई कंपनियाँ अपने ग्राहक को अधिक लोकप्रिय दिखने के लिए फ़र्ज़ी तौर-तरीक़े अपनाती हैं. कोबरा पोस्ट के खुलासे के बाद ऐसी चर्चाओं को अब ठोस आधार भी मिल गया है. नई तकनीक के आने के पहले नेताओं की लोकप्रियता का पैमाना या तो चुनाव हुआ करता था या कुछ पत्रिकाएँ/चैनल सर्वेक्षण द्वारा बताते थे कि कौन कितने पानी में है. सोशल मीडिया और ऑनलाइन के कारण अब यह हर दिन का मामला बन गया है. संयोग से, कोबरा पोस्ट का यह ‘खुलासा’ उसी समय आया है जब दुनिया की सबसे प्रतिष्ठित पत्रिका टाइम अपने चर्चित ‘वर्ष का व्यक्ति’ चुनने की प्रक्रिया में है. अंतिम चयन तो पत्रिका के सम्पादकों द्वारा ही किया जाता है और उस प्रक्रिया में ऑनलाइन मतदान का कोई मतलब नहीं होता है लेकिन 1998 से शुरू इस मत-प्रक्रिया ने एक ख़ास मुक़ाम बना लिया है और हर बार मत-प्रक्रिया के दौरान के उतार-चढ़ाव और अंत में सबसे अधिक मत पाये हुए लोगों को लेकर चर्चा होती रहती है. हमारे समय की हर चर्चा की तरह इसमें भी विवादों का बड़ा हिस्सा होता है और वे अक्सर आधारहीन भी नहीं होती हैं.

नरेंद्र मोदी
टाइम के इस चुनाव-प्रक्रिया में जो अंतिम नाम चुने गए हैं, उनमें गुजरात के मुख्यमंत्री और भाजपा की ओर से 2014 में होने वाले चुनाव में प्रधानमंत्री पद के उमीदवार भी हैं. मोदी का नाम आने से इस मत-प्रक्रिया में भारतीय मीडिया की दिलचस्पी स्वाभाविक भी है. इसी पत्रिका द्वारा निकाले जाने वाली वार्षिक सूची विश्व के 100 सर्वाधिक प्रभावशाली व्यक्ति की 2012 की सूची में नरेंद्र मोदी का नाम शामिल हुआ था किन्तु उसके ऑनलाइन मतदान में लम्बे समय तक पहले स्थान पर बने रहने के बावज़ूद कंप्यूटर हैकर-कार्यकर्ताओं के अंतरार्ष्ट्रीय समूह एनॉनमस ने आख़िरी कुछ घंटों में तेज़ी से बढ़त बनाते हुए भारी अंतर से पहला स्थान हथिया लिया था. तब कॉंग्रेस पार्टी ने यह आरोप लगाया था कि मोदी के समर्थन में बड़े सुनियोजित और प्रायोजित ढंग से मतदान कराया जा रहा है. उधर मोदी के पिछड़ने के बाद उनके समर्थकों ने टाइम पत्रिका से चेंज डॉट ऑर्ग पर जारी ऑनलाइन याचिका के तहत यह मांग की थी कि एनॉनमस की बढ़त को खारिज़ कर दिया जाये क्योंकि उस समूह ने इस प्रक्रिया में तकनीकी घपला किया था जो अनैतिक है. उस याचिका में यह भी कहा गया था कि मोदी के विरोध में मत देने की घृणापूर्ण अपील भी की गई थी. याचिका की एक मज़ेदार बात यह थी जिसमें याचिकाकर्ता ने कहा था कि नरेंद्र मोदी जैसे महान प्रशासक और राजनेता के लिए ऐसे ऑनलाइन मतदानों का कोई महत्व नहीं है लेकिन ‘ईमानदारी और आदर्शों’ के लिए इनमें शुचिता सुनिश्चित करना ज़रूरी है. यह भी मज़ेदार बात है कि नरेंद्र मोदी को जहाँ उस मतदान में ढाई लाख से अधिक मत मिले थे, वहीं किशोर त्रिवेदी नामक व्यक्ति द्वारा जारी इस याचिका में सिर्फ़ 470 लोगों का समर्थन ही मिल सका था. ख़ुद को मोदी-समर्थक कहने वाले एक व्यक्ति ने इंटरनेट से जुड़े मसलों की लोकप्रिय साइट मैशेबल पर दिए बयान में भी एनॉनमस पर घपले का आरोप लगाया था. इस व्यक्ति ने अपनी असली पहचान नहीं बताई थी और वह ट्विटर पर सत्यभाषणम् के नाम से सक्रिय है और उसके परिचय में दिए गए वेबसाइट पर इस्लाम-विरोधी दुष्प्रचार होता है. एनॉनमस ने अपने ऊपर लगे आरोपों को ख़ारिज़ कर दिया था. 2012

2009पिछले साल के इस टाइम 100 के बाद और कोबरा पोस्ट के ‘खुलासे’ से पहले भी नरेंद्र मोदी को लेकर ऐसा एक विवाद सामने आया था. अंग्रेज़ी अखबार द हिन्दू के एक लेख में इस साल अक्टूबर में माहिम प्रताप सिंह ने यह बताया था कि ट्विटर पर नरेंद्र मोदी के अनुयायियों की बड़ी सख्या फ़र्ज़ी है. बहरहाल, हम वापस लौटते है टाइम के ‘वर्ष का व्यक्ति’ चुनाव पर. अगर सच में नरेंद्र मोदी का प्रचार-तंत्र उन्हें इस प्रतियोगिता में शीर्ष पर पहुँचाने की क़वायद में लगा है तो उसे पिछले साल के अनुभव के कारण बार-बार एक ख़ास नाम डरा रहा होगा. मज़े की बात यह है कि यह डर सिर्फ़ मोदी-प्रचार-तंत्र को ही नहीं, बल्कि टाइम के तकनीकी टीम को भी डरा रहा होगा. इंटरनेट और सोशल मीडिया के इतिहास में चर्चित नाम तो कई हैं लेकिन इनकी किंवदंतियों के नायकों की संख्या बहुत थोड़ी है. क्रिस्टोफर पूल उन्हीं गिने-चुने लोगों में हैं. इंटरनेट की तरंगों में उनका छद्म नाम मूट गूंजता है. मोदी समर्थकों और विरोधियों के आलावा जिस किसी को भी इस पत्रिका के इस वार्षिक चुनाव में रूचि है, उसे मूट के बारे में ज़रूर जानना चाहिए. 6 दिसंबर को प्रकाशित होने वाले ऑनलाइन मतदान के परिणाम पर मूट की कोई भूमिका हो या न हो, लेकिन हर बार की तरह फिर उनका नाम ज़रूर आएगा. इंटरनेट और सोशल मीडिया और उसके पब्लिक स्फेयर में जिनकी दिलचस्पी है, उन्हें तो पूल उर्फ़ मूट को ज़रूर जानना चाहिए. मूट को जानना हमारे लिए इसलिए भी ज़रूरी है कि जहाँ इंटरनेट और सोशल मीडिया का इस्तेमाल ख़तरनाक इरादों, बेईमानी और स्वार्थ-सिद्धि के लिए किया जा रहा है, वहीं मूट जैसे नौजवान इसका इस्तेमाल बड़ी ताक़तों के विरुद्ध और इंटरनेट की व्यापक स्वतंत्रता के लिए कर रहे हैं. जब थोड़ा सा तकनीक का ज्ञान लेकर कुछ युवा बाज़ार में पैसे की हवस बुझाने के लिए खड़े हैं, वहीं पूल जैसे निपुण और मेधावी युवा अपने ज्ञान का इस्तेमाल बहुजन हिताय करने का संकल्प लेकर खड़े हैं.

क्रिस्टोफर पूल
न्यूयॉर्क निवासी क्रिस्टोफर पूल ने अपने सोने के कमरे में बैठकर 2003 में किशोरों के लिए एक वेबसाइट 4चान डॉट ऑर्ग शुरू की थी जिस पर बिना किसी पंजीकरण के और पहचान बताये तस्वीरें, चुटकुले, टिप्पणियाँ आदि का आदान-प्रदान किया जा सकता था. तब पूल की उम्र सिर्फ 15 साल थी और ऑनलाइन की दुनिया में उसे मूट के नाम से जाना जाता था. ऐसा माना जाता है कि अकेली कामकाजी माँ के साथ रहते हुए पूल ने कुछ कमाई के इरादे से यह साइट शुरू की थी. देखते-देखते यह साइट बहुत लोकप्रिय हो गया. एक और जहाँ यह साइट आम किशोरों के मनोरंजन का अड्डा बना, वहीं हैकरों और प्रयोगधर्मी किशोरों ने इसे कर्मस्थली भी बनाया जिसके निशाने पर बड़े-बड़े साइट आए. ऐसा माना जाता है कि एनॉनमस की शुरूआती प्रयोगशाला यहीं बनी और विरोधियों, बैंकों, सरकारों आदि के साइट हैक कर 4चान के उपयोगकर्ताओं ने विकिलीक्स तथा दुनिया के विभिन्न हिस्सों में चलने वाले आन्दोलनों को भी बहुत समर्थन दिया. वाशिंगटन पोस्ट की एक रिपोर्ट के अनुसार इंटरनेट के इतिहास के सबसे बड़े और चर्चित ऑनलाइन हमलों में से कई इसी साइट के उपयोगकर्ताओं ने अंजाम दिए. गार्डियन अखबार ने एक दफ़ा इनको ‘पागल, बचकाना, प्रतिभाशाली, बेतुका और ख़तरनाक’ कहा था. इस साइट के प्रभाव का अनुमान इस बात से लगाया जा सकता है कि 2008 में ब्राज़ील के एक बड़े पत्रकार लियोपोल्दो गोदोय  ने इसे पाश्चात्य वेब संस्कृति का नाभि-केंद्र कहा था. आज इंटरनेट पर इस्तेमाल होनेवाले बहुत से शब्द, चित्र-भंगिमाएँ, स्टाईल आदि की शुरुआत इसी साइट के विभिन्न पन्नों से हुई थी. तबतक इसके कर्ता-धर्ता मूट की असली पहचान किसी को नहीं मालूम था. 9 जुलाई 2008 को वाशिंगटन पोस्ट और टाइम ने अलग-अलग रिपोर्टों में पहली बार मूट के असली नाम क्रिस्टोफर पूल के नाम से लोगों का परिचय कराया. 

अगले साल यानि 2009 के शुरू में टाइम ने विश्व के सर्वाधिक प्रभावशाली लोगों की वार्षिक सूची ‘टाइम 100′ में पूल की ऑनलाइन पहचान ‘मूट’ को शामिल किया. यहाँ से मूट, और 4चान के साथ टाइम के इन दो वार्षिक सूचियों का विवादस्पद सम्बन्ध शुरू होता है जो आजतक जारी है. 4चान के उपयोगकर्ताओं ने आपस में यह निर्णय लिया और देखते-देखते मूट उस सूची में भारी मतों के अंतर से पहले स्थान पर जा पहुँचा. इतना ही नहीं, इनलोगों ने सामूहिक कारवाई करते हुए अगले बीस स्थान भी अपनी मर्जी से निर्धारित कर दिए. इसी तरह 2012 के ‘टाइम 100′ के मतदान में नरेंद्र मोदी की लगातार बढ़त को लांघते हुए एनॉनमस ने भारी अंतर से पहला स्थान ले लिया था. यह करामात बस चंद घंटों में कर दिखाया गया था. 2012 के ‘वर्ष का व्यक्ति’ के मतदान में हैकरों ने मज़ा लेते हुए उत्तर कोरियाई तानाशाह किम जोंग उन को पहले स्थान पर ला दिया और साथ ही अगले 13 स्थान भी अपने हिसाब से निर्धारित कर दिया. कुछ रिपोर्टों में इस साल के अभी चल रहे मतदान में मिली साइरस की बढ़त के पीछे भी इनका हाथ माना जा रहा है लेकिन हमें यह भी याद रखना चाहिए कि साइरस पूरे साल भर चर्चा में रही हैं जिसका लाभ उन्हें मिल सकता है. 

इन पंक्तियों के लिखे जाने तक तुर्की के प्रधानमंत्री एर्दोआं दूसरे और मिस्र के फ़ौज़ी कौंसिल के मुखिया फ़तह अल-सिसी तीसरे स्थान पर हैं. नरेंद्र मोदी पहले स्थान से लुढ़कते-लुढ़कते तीन दिन में चौथे स्थान पर आ गए हैं. जैसा कि पहले कहा जा चुका है कि अंतिम चुनाव पत्रिका के सम्पादकों द्वारा होता है और उसमें इस मतदान प्रक्रिया का कोई मतलब नहीं होता. लेकिन अगर इसमें मोदी पहले स्थान पर आ जाते हैं तो आगामी चुनावों को देखते हुए प्रचार महिमा से आक्रांत मोदी-समर्थकों के लिए बड़ी बात होगी. वैसे सम्पादकों द्वारा मोदी को चुने जाने की सम्भावना न के बराबर है. मेरे हिसाब से ईरान के नए राष्ट्रपति हसन रूहानी के ‘वर्ष का व्यक्ति’ चुने जाने की प्रबल सम्भावना है.

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