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पीर पराई नेताओं का जीवनसूत्र क्यों नहीं बनता?

हमारी राजनीति एक त्रासदी बनती जा रही है। राजनेता सत्ता के लिये सब कुछ करने लगा और इसी होड़ में राजनीति के आदर्श ही भूल गया, यही कारण है देश की फिजाओं में विषमताओं और विसंगतियों का जहर घुला हुआ है और कहीं से रोशनी की उम्मीद दिखाई नहीं देती। ऐसा लगता है कि आदमी केवल मृत्यु से ही नहीं, जीवन से भी डरने लगा है, भयभीत होने लगा है। ठीक उसी प्रकार भय केवल गरीबी में ही नहीं, अमीरी में भी है। यह भय है राजनीतिक भ्रष्टाचारियों से, अपराध को मंडित करने वालों से, सत्ता का दुरुपयोग करने वालों से।

देश दुख, दर्द और संवेदनहीनता के जटिल दौर से रूबरू है, समस्याएं नये-नये मुखौटे ओढ़कर डराती है, भयभीत करती है। समाज में बहुत कुछ बदला है, मूल्य, विचार, जीवन-शैली, वास्तुशिल्प सब में परिवर्तन है। ये बदलाव ऐसे हैं, जिनके भीतर से नई तरह की जिन्दगी की चकाचैंध तो है, पर धड़कन सुनाई नहीं दे रही है, मुश्किलें, अड़चने, तनाव-ठहराव की स्थितियों के बीच हर व्यक्ति अपनी जड़ों से दूर होता जा रहा है। चुनाव प्रक्रिया बहुत खर्चीली होती जा रही है।

 ईमानदार होना आज अवगुण है। अपराध के खिलाफ कदम उठाना पाप हो गया है। धर्म और अध्यात्म में रुचि लेना साम्प्रदायिक माना जाने लगा है। किसी अनियमितता का पर्दाफाश करना पूर्वाग्रह माना जाता है। सत्य बोलना अहम् पालने की श्रेणी में आता है। साफगोही अव्यावहारिक है। भ्रष्टाचार को प्रश्रय नहीं देना समय को नहीं पहचानना है। चुनाव के परिप्रेक्ष्य में इन और ऐसे बुनियादी सवालों पर चर्चा होना जरूरी है। आखिर कब तक राजनीतिक स्वार्थों के नाम पर नयी गढ़ी जा रही ये परिभाषाएं समाज और राष्ट्र को वीभत्स दिशाओं में धकेलती रहेगी? विकासवाद की तेज आंधी के नाम पर हमारा देश, हमारा समाज कब तक भुलावे में रहेगा? चुनाव के इस महायज्ञ में सुधार की, नैतिकता की बात कहीं सुनाई नहीं दे रही है? दूर-दूर तक कहीं रोशनी नहीं दिख रही है। बड़ी अंधेरी और घनेरी रात है। न आत्मबल है, न नैतिक बल।

महान भारत के निर्माण के लिए आयोज्य यह चुनावरूपी महायज्ञ आज ‘महाभारत’ बनता जा रहा है, मूल्यों और मानकों की स्थापना का यह उपक्रम किस तरह लोकतंत्र को खोखला करने का माध्यम बनता जा रहा है, यह गहन चिन्ता और चिन्तन का विषय है। विशेषतः आर्थिक विसंगतियों एवं विषमताओं को प्रश्रय देने का चुनावों में नंगा नाच होने लगा है और हर दल इसमें अपनी शक्ति का बढ़-चढ़कर प्रदर्शन कर रहे है।

जरा याद कीजिए जब संसद में यह मांग उठी थी कि गैर सरकारी संगठनों को मिली 50 हजार करोड़ रुपए से अधिक की रकम का लेखा-जोखा कराया जाना चाहिए तो इसके क्या मायने हो सकते थे? यह मांग लोकसभा में किसी और ने नहीं बल्कि विपक्ष के दिग्गज नेता श्री लालकृष्ण अडवानी ने उठाई थी मगर यह बात आई-गई हो गई।

बात केवल गैर सरकारी संगठनों को मिली इस राशि की ही नहीं बल्कि विदेशों से मिलने वाले चंदों की भी है। आज सवाल बहुत बड़ा है और वह है भारत की राजनीति को प्रत्यक्ष विदेशी प्रभाव से बचाना। आम आदमी पार्टी ने जिन कथित अनिवासी भारतीयों से चंदा इकट्ठा करके भारत की राजनीतिक व्यवस्था में ‘हवाला कारोबार’ का दरवाजा खोला है वह हमारी समूची चुनाव प्रणाली के लिए आने वाले समय में चुनौती बन सकता है।

जिस तरह वर्तमान सरकार ने विदेशी कंपनियों के लिये दरवाजे खोले हैं उसका भारत की अर्थव्यवस्था पर तो असर पड़ ही रहा है साथ ही साथ इसका असर राजनीति पर पड़े बिना किसी सूरत में नहीं रह सकता है और ये सब उसी के प्रारंभिक लक्षण हैं। बात वेदांता समूह की कंपनी स्टरलाइट इंडिया की हो या डाऊ कैमिकल्स के स्वामित्व वाली यूनियन कार्बाइड कंपनी की -विदेशी कंपनियां भारत में अपनी सहायक कंपनियां स्थापित करती हैं और अपने उत्पादों से भारत के बाजारों को लाद कर भारी मुनाफा कमाती हैं। निश्चित रूप से ये कंपनियां भारत की व्यापार प्रणाली को अपने पक्ष में रखने के लिए राजनीति को प्रभावित करने की कोशिश करेंगी और चुनाव का समय उनके लिये सबसे उपयुक्त हैं।

क्या कभी सत्तापक्ष या विपक्ष से जुडे़ लोगों ने या नये उभरने वाले राजनीतिक दावेदारों ने, और आदर्श की बातें करने वाले लोगों ने, अपनी करनी से ऐसा कोई अहसास दिया है कि उन्हें सीमित निहित स्वार्थों से ऊपर उठा हुआ राजनेता समझा जाए? यहां नेताओं के नाम उतने महत्वपूर्ण नहीं हैं न ही राजनीतिक दल महत्वपूर्ण है, महत्वपूर्ण है यह तथ्य कि इस तरह का कूपमण्डूकी नेतृत्व कुल मिलाकर देश की राजनीति को छिछला ही बना रहा है। सकारात्मक राजनीति के लिए जिस तरह की नैतिक निष्ठा की आवश्यकता होती है, और इसके लिए राजनेताओं में जिस तरह की परिपक्वता की अपेक्षा होती है, उसका अभाव एक पीड़ादायक स्थिति का ही निर्माण कर रहा है। और हम हैं कि ऐसे नेताओं के निर्माण में लगे हैं!

चुनावों से लोकतांत्रिक प्रक्रिया की शुरूआत मानी जाती है, पर आज चुनाव लोकतंत्र का मखौल बन चुके हैं। चुनावों में वे तरीके अपनाएं जाते हैं जो लोकतंत्र के मूलभूत आदर्शों के प्रतिकूल पड़ते हैं। इन स्थितियों से गुरजते हुए, विश्व का अव्वल दर्जे का कहलाने वाला भारतीय लोकतंत्र आज अराजकता के चैराहे पर है। जहां से जाने वाला कोई भी रास्ता निष्कंटक नहीं दिखाई देता। इसे चैराहे पर खडे़ करने का दोष जितना जनता का है उससे कई गुना अधिक राजनैतिक दलों व नेताओं का है जिन्होंने निजी व दलों के स्वार्थों की पूर्ति को माध्यम बनाकर इसे बहुत कमजोर कर दिया है। आज ये दल, ये लोग इसे दलदल से निकालने की क्षमता खो बैठे हैं।

महाभारत की लड़ाई में सिर्फ कौरव-पांडव ही प्रभावित नहीं हुए थे। उस युद्ध की चिंगारियां दूर-दूर तक पहुंची थीं। साफ दिख रहा है कि इस महाभारत में भी कथित अराजक राजनीतिक एवं आर्थिक ताकतें अपना असर दिखाने की कोशिश कर रही है,जिसके दूरगामी परिणाम होंगे। इन स्थितियों में अब ऐसी कोशिश जरूरी है जिसमें ‘महान भारत’ के नाम पर ‘महाभारत’ की नई कथा लिखने वालों के मंतव्यों और मनसूबों को पहचाना जाए। अर्जुन की एकाग्रता वाले नेता चाहिए भारत को, जरूरी होने पर गलत आचरण के लिए सर्वोच्च नेतृत्व पर वार करना भी गलत नहीं है।

बात चाहे फिर सोनियाजी की हो या आडवाणीजी की, यहां बात चाहे मुलायम-माया की हो या केजरीवाल की। यह सही है कि आज देश में ऐसे दलों की भी कमी नहीं है, जो नीति नहीं, व्यक्ति की महत्वाकांक्षा के आधार पर बने हैं, लेकिन नीतियों की बात ऐसे दल भी करते हैं। जनतांत्रिक व्यवस्था के लिए  कथनी और करनी की असमानता चिंता का विषय होना चाहिए। हालांकि पिछली आधी सदी में हमारे राजनीतिक दलों ने नीतियों-आदर्शों के ऐसे उदाहरण प्रस्तुत नहीं किए हैं, जो जनतांत्रिक व्यवस्था के मजबूत और स्वस्थ होने का संकेत देते हों, फिर भी यह अपेक्षा तो हमेशा रही है कि नीतियां और नैतिकता कहीं-न-कहीं हमारी राजनीति की दिशा तय करने में कोई भूमिका निभाएंगी। भले ही यह खुशफहमी थी, पर थी। अब तो ऐसी खुशफहमी पालने का मौका भी नहीं दिख रहा। लेकिन यह सवाल पूछने का मौका आज है कि नीतियां हमारी राजनीति का आधार कब बनेंगी? सवाल यह भी पूछा जाना जरूरी है कि अवसरवादिता को राजनीति में अपराध कब माना जाएगा?

यह अपने आप में एक विडम्बना ही है कि सिद्धांतों और नीतियों पर आधारित राजनीति की बात करना आज एक अजूबा लगता है। हमारी राजनीति के पिछले कुछ दशकों का इतिहास लगातार होते पतन की कथा है। यह सही है कि व्यक्ति के विचार कभी बदल भी सकते हैं, पर रोज कपड़ों की तरह विचार बदलने को किस आधार पर सही कहा जा सकता है? सच तो यह है कि आज हमारी राजनीति में सही और गलत की परिभाषा ही बदल गई है- वह सब सही हो जाता है जिससे राजनीतिक स्वार्थों की पूर्ति होती हो और वह सब गलत हो जाता है जो आम आदमी के हितों से जुड़ा होता है, यह कैसा लोकतंत्र बन रहा है, जिसमें ‘लोक’ ही लुप्त होता जा रहा है?

जब एक अकेले व्यक्ति का जीवन भी मूल्यों के बिना नहीं बन सकता, तब एक राष्ट्र मूल्यहीनता में कैसे शक्तिशाली बन सकता है? अनुशासन के बिना एक परिवार एक दिन भी व्यवस्थित और संगठित नहीं रह सकता तब संगठित देश की कल्पना अनुशासन के बिना कैसे की जा सकती है? इन चुनावों का संदेश सरकार और कर्णधारों के लिये होना चाहिए कि शासन संचालन में एक रात में ‘ओवर नाईट’ ही बहुत कुछ किया जा सकता है। अन्यथा ‘जैसा चलता है–चलने दो’ की नेताओं की मानसिकता और कमजोर नीति ने जनता की तकलीफें ही बढ़ाई हैं। ऐसे सोच वाले सत्तालोलुपों को पीडि़त व्यक्ति का दर्द नहीं दिखता, भला उन्हें खोखला होता राष्ट्र कैसे दिखेगा?

नरसी मेहता रचित भजन ‘‘वैष्णव जन तो तेने कहिए, जे पीर पराई जाने रे’’ गांधीजी के जीवन का सूत्र बन गया था, लेकिन यह आज के नेताओं का जीवनसूत्र क्यों नहीं बनता? क्यों नहीं आज के राजनेता पराये दर्द को, पराये दुःख को अपना मानते? क्यों नहीं जन-जन की वेदना और संवेदनाओं से अपने तार जोड़ते? बर्फ की शिला खुद तो पिघल जाती है पर नदी के प्रवाह को रोक देती है, बाढ़ और विनाश का कारण बन जाती है। देश की प्रगति में आज ऐसे ही तथाकथित  राजनीतिक बाधक तत्व उपस्थित हैं, जो जनजीवन में आतंक एवं संशय पैदा कर उसे अंधेरी राहों में, निराशा और भय की लम्बी काली रात के साये में धकेल रहे हैं। कोई भी व्यक्ति, प्रसंग, अवसर अगर राष्ट्र को एक दिन के लिए ही आशावान बना देते हैं तो वह महत्वपूर्ण होते हैं। पर यहां एक दिन की अजागरूकता पांच साल यानी अठारह सौ पचीस दिनों को अंधेरों के हवाले करने की तैयारी होती है।

यह कैसी जिम्मेदारी निभा रहे हैं हम वोटर होकर और कैसा राजनीतिक नेतृत्व निर्मित हो रहा है? चारों ओर अंधेरा ही अंधेरा व्याप्त है। हमारा राष्ट्र नैतिक, आर्थिक, धार्मिक, राजनैतिक और सामाजिक सभी क्षेत्रों में मनोबल के दिवालिएपन के कगार पर खड़ा है। और हमारा नेतृत्व गौरवशाली परम्परा, विकास और हर खतरों से मुकाबला करने के लिए तैयार है, का नारा देकर अपनी नेकनीयत का बखान करते रहते हैं। पर उनकी नेकनीयती की वास्तविकता किसी से भी छिपी नहीं है।

प्रेषक:
(ललित गर्ग)
ई-253, सरस्वती कुंज अपार्टमेंट
25, आई0पी0 एक्सटेंशन, पटपड़गंज, दिल्ली-92 फोन: 22727486, मो. 09811051133

 

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जेनरिक लाइए पैसा बचाइएः आशुतोष

मुम्बई। यदि आपको अपने स्वास्थ्य बजट को कम करना है तो जेनरिक दवाइयों का उपभोग करें। जेनरिक दवाइयों ब्रांड के नाम पर बिकने वाली दवाइयों से बहुत सस्ती होती है। उक्त बाते मुम्बई के लोखंडवाला एरिया में जेनरिक मेडिसिन अवैरनेस कार्यक्रम में आशुतोष कुमार सिंह ने कही। लायंस क्लब लोखंडवाला व वुमेंस फॉर गुड गवर्नेंस के संयुक्त तत्वाधान में यह कार्यक्रम रखा गया था।

जेनरिक लाएं पैसा बचाएं कैंपेन चला रही संस्था प्रतिभा-जननी सेवा संस्थान के राष्ट्रीय संयोजक आशुतोष कुमार सिंह पूरे देश को सस्ती दवाइयां उपलब्ध करवाना चाहते हैं। स्वस्थ भारत विकसित भारत का सपना देखने वाले श्री आशुतोष ने बताया कि जेनरिक व ब्रांडेड दवाइयों में कोई अंतर नहीं है। भारत जैसे बड़े जनसंख्या वाले देश में सस्ती दवाइयों की सुलभता पर बल देते हुए उन्होंने कहा कि लोगों को अपने डॉक्टर से जेनरिक दवा लिखने के लिए कहना चाहिए। डॉक्टर से किसी भी तरह से डरने की जरूरत नहीं है। डॉक्टर व मरीज के बीच में जितनी सहज चर्चा होगी, मरीज के ईलाज के लिए फायेदमंद होगा। दो घंटे तक चले अपने प्रेजेन्टेशन में श्री आशुतोष ने जेनरिक दवाइयों से जुड़ी हुई तमाम भ्रमों को दूर किया। इस मौके पर कई डॉक्टरों ने भी इस मुद्दे पर श्री आशुतोष से खुलकर बात किया और जेनरिक व ब्रांडेड दवाइयों की गुत्थि को समझने व समझाने में बाकी श्रोताओं की मदद की।

मुम्बई के लोखंडवाला स्थित तनिष्क सभागार में आयोजित इस कार्यक्रम में प्रतिभा जननी सेवा संस्थान, लायंस क्लब, लोखंडवाला व वुमेंश फॉर गुड गवर्नेंस के वरिष्ठ पदाधिकारी उपस्थित रहे।    

 

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रश्मि देसाई ने पति का उपनाम संधू हटाया

कलर्स के शो 'उतरन' में तपस्या की भूमिका निभा रहीं रश्मि देसाई ने अपने पति नंदीश संधु का उपनाम अपने नाम के आगे से हटा दिया है। नंदीश संधु और रश्मि ने फरवरी 2011 में शादी की थी, लेकिन एक साल बाद ही इन दोनों के रिश्ते में खटास पड़ने की खबरें आने लगी थीं।

और माइक्रो ब्लॉगिंग साइट से अपना सरनेम नहीं हटाया है। गौरतलब है, ये दोनों शो 'उतरन' में एक साथ थे। इनके मनमुटाव की खबरें काफी समय से आ रही हैं।

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सिद्धार्थ मल्होत्रा ने असल में वरुणा धवन को मुक्का मारा था!

-ए.डी. के दिनों से लेकर अगले जेनेक्सट स्टार तक की पूरी जानकारी सिद्धार्थ  बयां करेंगे-

माई नेम इज खान में डायरेक्टर करण जौहर के सहायक बनने के बाद उनकी ही फिल्म में स्टार बनने तक सिद्धार्थ का सफर रोमांच से जरूर भरा है! पर अब आप उन्हें जूम पर जेनेक्सट-द फ्यूचर अॉफ बॉलीवुड के अगले शो में इस सफर की दास्तां को बयां करते देख सकते हैं।

अपनी पहली ही फिल्म के पात्र के विपरीत इस युवा सनसनी का पढ़ाई से अधिक ध्यान फिटनेस में था। बास्केटबाल, टैनिस से लेकर रग्बी तक हर खेल खेलने वाले सिद्धार्थ क्लास में बैकबेंचर ही रहे हैं और अपने कॉलेज के दिनों में स्टूडेंट ऑफ द ईयर बनने से कोसों दूर ही रहे हैं।

दिल्ली में एक पार्टी के दौरान अचानक ही एक मॉडलिंग एजेंसी ने उन्हें साइन कर लिया और बड़े ही स्टाइल से रैम्प पर चलते चलते वे मुंबई के लिए निकल गए और उनका एक्टिंग कैरिअर का दौड़ शुरू हुआ। देखिए उन्हें जूम पर अपने संघर्ष के दिनों का किस्सा सुनाते हुए जब हर मकान मालिक उन्हें नकार देता था क्योंकि वे बॉलीवुड में अपनी जगह बनाना चाहते थे।

एक ए.डी. के तौर पर माया नगरी में प्रवश करते हुए इस स्टार ने बेहतरीन लोगों से सीखा। देखना ना चूके सिद्धार्थ को बताते हुए कैसे उन्होंने शाहरुख खान को दिल जीत लिया और उनसे अपना अब तक का सबसे यादगार तोहफा हासिल किया। देखिए मनीष मल्होत्रा, काजोल, करण मल्होत्रा और वरुण को इस युवा लड़के के बारे में अपने अनुभवों को बयां करते हुए, इसी सोमवार को।

एक तरफ जहां ए.डी. टीम सिद्धार्थ के बिना एक पत्ता भी नहीं हिला पाती थी, दूसरी और जब सिद्धार्थ एक्टर बने तो उन्होंने उसी सिद्धार्थ से अपने रोल को बड़ी गंभीरता से लिया। आलिया को किस करने के बाद हुए फाइट सीन के दौरान सिद्धार्थ ने असल में ही वरूण को काफी जोर से मार दिया था, जिससे उनकी नाक भी टूट गई थी और शूटिंग को भी रोकना पड़ा था। देखिए, उन्हें सभी राज खोलते हुए सिर्फ जूम पर 25 नवंबर, 2013 को रात 8.0 बजे।

 

देखिए, जेनेक्सट, फ्यूचर अॉफ बॉलीवुड, सोमवार 25 नवंबर, 2013, रात 8 बजे, सिर्फ जूम पर-भारत का नंबर 1 बॉलीवुड चैनल!

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भारतीय रेल भी क्षेत्रीय सौतेलेपन की राह पर

भारतीय रेल, जो मात्र दो दशक पूर्व तक केवल राजधानी एक्सप्रेस की गति व रखरखाव तथा इसमें यात्रियों को दी जाने वाली सुविधाओं को लेकर स्वयं को गौरवान्वित महसूस करती थी वही भारतीय रेल अब उससे कहीं आगे बढ़ते हुए दुरंतो,संपर्क क्रांति,शताब्दी तथा स्वर्ण शताब्दी जैसी तीव्रगति एवं सुविधा संपन्न रेल गाडिय़ों का संचालन कर अपनी विशिष्ट पहचान बना चुकी है। इतना ही नहीं बल्कि भारतीय रेल ने अब देश में बुलेट ट्रेन जैसी तीव्रगति से चलने वाली रेलगाडिय़ों के संचालन की दिशा में भी अपने कदम आगे बढ़ा दिए हैं। निश्चित रूप से भारतीय रेल की यह सभी योजनाएं सकारात्मक तथा विकासोन्मुख हैं।
 
सवाल यह है कि भारत जैसे विशाल देश में केंद्र सरकार द्वारा संचालित किया जाने वाला रेल विभाग क्या पूरे देश को एक ही नज़र से देखते हुए देश के समस्त राज्यों व समस्त रेल ज़ोन में दौडऩे वाली यात्री गाडिय़ों को समान सुविधाएं व सुरक्षा प्रदान करता है? क्या देश के सभी क्षेत्रों में चलने वाली रेलगाडिय़ों में जहां एक ओर समान रूप से किराया वसूल किया जाता है वहीं इन यात्रियों को पूरे देश में समान सुविधाएं भी मुहैया कराई जाती हैं? यदि हम दिल्ली से एक बार मुंबई मार्ग की यात्रा करें तथा उसी श्रेणी में हम दिल्ली से बिहार के किसी भी क्षेत्र की यात्रा करें तो हमें साफतौर पर यह देखने को मिलेगा कि निश्चित रूप से भारतीय रेल विभाग भी क्षेत्रीय आधार पर अपने यात्रियों के साथ सौतेलेपन जैसा व्यवहार करता है जबकि पूरे देश में यात्रियों से समान श्रेणी के समान किराए वसूल किए जाते हैं।
               
उदाहरण के तौर पर कुछ समय पूर्व मुझे मुंबई के बांद्रा टर्मिनल से दिल्ली होते हुए पंजाब की यात्रा करने का अवसर मिला। वातानुकूलित श्रेणी में की गई इस यात्रा के दौरान ए सी कोच के रख-रखाव, उसके भीतर व बाहर की बार-बार की जाने वाली सफाई, पूरे कोच में लगे साफ-सुथरे पर्दे, प्रत्येक शौचालय में पानी व पंखों का समुचित प्रबंध, गैर ज़रूरी व गैर वातानुकूलित टिकटधारियों का एसी कोच में प्रवेश निषेध, केवल सरकारी मान्यता प्राप्त वेंडर्स द्वारा कोच में अपना सामान बेचने हेतु प्रवेश करना, जगह-जगह वर्दीधारी सफाईकर्मी द्वारा कोच में झाड़ू लगाना यहां तक कि कुछ स्थानों पर सुगंध फैलाने हेतु कोच में सुगंधित स्प्रे का छिड़काव करना जैसी व्यवस्था ने मुझे भारतीय रेल विभाग की पीठ थपथपाने पर मजबूर कर दिया।
 
इस रूट पर चलने वाले स्वदेशी व विदेशी यात्री ऐसी व्यवस्था देखकर निश्चित रूप से संतुष्ट होते होंगे। ऐसी व्यवस्था देश के रेल विभाग की छवि को भी बेहतर बनाने में सहायक सिद्ध होती है। अपनी इस पूरी यात्रा के दौरान पूरे एसी कोच के यात्रियों ने स्वयं को अपने सामानों के साथ सुरक्षित महसूस करते हुए अपनी-अपनी यात्रा पूरी की तथा इसी सुव्यवस्था की वजह से कोच में किसी प्रकार की चोरी अथवा अन्य अराजकतापूर्ण घटना नहीं घटी।
               
और अब आईए आपको पंजाब से दिल्ली से होते हुए बिहार के दरभंगा-जयनगर क्षेत्र की ओर जाने वाली एक ऐसी ही सुपरफास्ट एक्सप्रेस ट्रेन के एसी कोच के रख-रखाव तथा पूरे रास्ते में इस कोच के यात्रियों के समक्ष पेश आने वाली परेशानियों से आपका परिचय कराते हैं। यहां एक बार फिर यह याद  दिलाना ज़रूरी है कि चाहे आप दिल्ली से मुंबई की यात्रा करें या बिहार अथवा देश के किसी अन्य क्षेत्र की, आपको समान श्रेणी में समान दूरी का समान किराया ही भरना पड़ता है। परंतु व्यवस्था तथा सुविधाएं समान हैं या नहीं इस का निर्णय आप स्वयं कर सकते हैं।
 
बिहार की ओर जाने वाली 14650 सुपरफास्ट एक्सप्रेस में जाते समय मेरी बर्थ पर जो पर्दा लटका हुआ था उसमें एक ही पर्दे में सात अलग-अलग प्रकार के रिंग डाले गए थे। कुछ अलग-अलग डिज़ाईन के प्लास्टिक के रिंग कुछ स्टील के तो कई रिंग लोहे के बारीक तार को मोड़कर जुगाड़ के रूप में पर्दे में फंसाए गए थे। आपको यह जानकर आश्चर्य होगा कि चलती ट्रेन में जब पर्दें पर लगे रिंग की ऐसी दुर्दशा देखकर इस रंग-बिरंगे रिंग समेत पर्दे की फोटो फेसबुक पर अपलोड कर दी गई उसके बाद वापसी के समय 14649 ट्रेन के एसी कोच में तो पर्दे ही नदारद थे। पूछने पर पता चला कि पर्दे धुलने के लिए उतार लिए गए हैं। इसका सीधा सा अर्थ है कि भारतीय रेल  ए सी कोच में पर्दों का एक ही सेट रखती है। पर्दा न लगे होने जैसी इस दुव्र्यवस्था से यात्रियों की प्राईवेसी प्रभावित होती है।
               
 
इसके अतिरिक्त लगभग 1400 किलोमीटर के इस लंबे मार्ग में पूरे रास्ते में एक भी सफाईकर्मी कोच में झाड़ू देने के लिए नहीं आया। परिणामस्वरूप भिखारी लोग फर्श झाडऩे की आड़ में डिब्बों में बेरोक-टोक प्रवेश करते ज़रूर देखे गए हैं। नतीजतन ऐस अवैध लोगों के कोच में प्रवेश करने से किसी यात्री का कपड़ों भरा बैग चोरी हो गया तो कोई चोर-उचक्का किसी यात्री का नया जूता व चप्पल ही सफाई के बहाने चुपके से उठाकर चलता बना। इतना ही नहीं इस मार्ग पर अनाधिकृत वैंडर धड़ल्ले से कोच में प्रवेश करते व अपना सामान अधिक मूल्यों पर बेचते बेधड़क पूरे रास्ते आते-जाते रहे। यहां तक कि भिखारियों व हिजड़ों का भी ए सी कोच में आना-जाना लगा रहा। अफसोस की बात तो यह है कि ए सी कोच के साथ लगता गैर वातानुकूलित स्लीपर कोच के बीच का शटर भी पूरे छत्तीस घंटे की यात्रा के दौरान खुला रहा। जब कोई यात्री सुरक्षा के दृष्टिगत उस शटर को बंद कर आता तो सवयं टिकट निरीक्षक उस शटर को जाकर खोल देते।
 
जब एक टिकट निरीक्षक से इस शटर को बार-बार खोलने के बारे में पूछा गया तो उसने एक कोच से दूसरे कोच तक चलती गाड़ी में पहुंचने के लिए अपनी विभागीय सुविधा का हवाला देते हुए एक लंबा भाषण दे डाला। और इसी शटर के मार्ग से अर्थात् वातानुकूलित व गैर वातानुकूलित कोच के जोड़ के रास्ते अवैध यात्री, अवैध वैंडर तथा भिखारी व झाड़ू-सफाई के नाम पर यात्रियों के सामान उठा ले जाने वाले चोर-उचक्के 24 घंटे ए सी कोच में प्रवेश करते रहे। इस पूरे प्रकरण में सबसे दुर्भाग्यपूर्ण यह है कि इस विषय पर इस रूट के टिकट निरीक्षकों का रवैया यात्रियों के साथ सहयोगपूर्ण होने के बजाए ए सी यात्रियों को कष्ट पहुंचाने वाला रहा।
 
               
जैसा कि मैंने जि़क्र किया कि मुंबई-दिल्ली रूट पर कई जगहों पर बाहर व भीतर से शीशों की सफाई की जाती रही। बिहार के इस रूट पर भी गोरखपुर स्टेशन पर ऐसी व्यवस्था है। परंतु इस बार की यात्रा में तो शीशे की सफाई होना तो दूर बल्कि कोच में ऐसे शीशे लगे हुए देखे गए जो दोनों तरफ से टूटे हुए थे तथा कागज़ का स्टीकर लगाकर उन्हें बाहरी हवा के प्रवेश से बचाने की कोशिश की गई थी। शौचालय में पंखा नदारद था। शौचालय का दरवाज़ा बंद करने वाली सिटकनी उपयुक्त तरीके से काम नहीं कर रही थी। किसी भी एसी कोच में बिहार रूट पर लिक्विड सोप कभी भी देखने को नहीं मिला।
 
एसी कोच के मुख्य प्रवेश  द्वार में टूटा हुआ दरवाज़ा लगा देखा गया जो बार-बार खुलने पर इतनी ज़ोर की आवाज़ करता था कि यात्रियों की आंखें खुल जाएं। कोच में अवैध यात्रियों के प्रवेश करने के परिणामस्वरूप रास्ता चलने वाली गैलरी में स्लीपर क्लास के यात्री बेरोक-टोक सफर करते देखे गए। और यह यात्री तथा साथ लगते स्लीपर क्लास के यात्री भी कोच का ज्वाईंट शटर खुला होने के कारण ए सी कोच का शौचालय प्रयोग करते पाए गए। परिणामस्वरूप ए सी के यात्रियों को रास्ता चलने में तथा शौचालय का प्रयोग करने में बेहद परेशानी का सामना करना पड़ा। इसके अतिरिक्त सीनाज़ोरी दिखाने वाले सैकेड़ों यात्री बिहार से लेकर पूरे रूट तक ए सी कोच में बिना टिकट यात्रा करते तथा खाली बर्थ देखकर उसपर कब्ज़ा जमाते देखे गए। ऐसे यात्रियों से टिकट निरीक्षक भी टिकट पूछने की हि मत शायद नहीं जुटा पाते।
               
कुल मिलाकर मेरे व्यक्तिगत अनुभव ने मुझे इस निष्कर्ष पर पहुंचने के लिए मजबूर कर दिया कि भारतीय रेल विभाग भी क्षेत्र तथा राज्य व ज़ोन आदि के दृष्टिगत ही अपने यात्रियों को सुविधाएं देता अथवा नहीं देता है। जबकि सभी यात्रियों से समान किराया ज़रूर वसूल किया जाता है। क्या एक ही देश में अलग-अलग क्षेत्रों के यात्रियों को अलग-अलग नज़रों से देखना तथा उनके साथ क्षेत्रीय आधार पर सौतेलेपन जैसा व्यवहार करना उचित है? भारतीय रेल विभाग को गंभीरता से इस विषय पर सोचना चाहिए तथा पूरे देश में समान श्रेणी के यात्रियों को समान सुविधाएं मुहैया करानी चाहिए। जब पूरे देश के यात्री भारतीय रेल विभाग द्वारा निर्धारित किराया अदा करते हैं तो सभी यात्रियों को उस श्रेणी में उपलब्ध सभी सुविधाओं के उपयोग का भी अधिकार है। इस प्रकार का सौतेलापन जनता में आक्रोश पैदा करता है और ऐसी स्थिति ही क्षेत्रवाद तथा क्षेत्रीय सौतेलेपन जैसी सोच को बढ़ावा देती है। किसी भी सरकारी केंद्रीय संस्थान द्वारा इस प्रकार का सौतेली व्यवस्था देशहित में क़तई उचित नहीं है।                                                                 
 
 निर्मल रानी
1618, महावीर नगर
अंबाला शहर,हरियाणा।
फोन-0171-2535628
 

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रणबीर को निर्देशक इम्तियाज अली ने नकार दिया!

निर्देशक इम्तियाज अली ने रणबीर कोएक रॉकस्टार जरूर बनाया लेकिन वे अपने क्रिएटिव विजन के रास्ते में अपनी दोस्ती को नहीं आने दे रहे! जूम ने पता लगाया है कि इम्तियाज हालांकि रणबीर को काफी पसंद करते हैं पर उन्होंने रणबीर की हाइवे में शामिल करने की मांग को पूरा करने से इंकार कर दिया है!

सूत्रों ने जूम को बताया है कि रणबीर इम्तियाज की अगली फिलम हाइवे, के कुछ हिस्से को देखकर ही इतने रोमांचित हो गए कि वे अपने रोमांच को अधिक देर तक अपने तक सीमित नहीं रख पाए। इतना ही नहीं!! रणबीर ने फिल्म में एक ऐसी भूमिका भी मांग ली जो कि सिर्फ उनके लिए ही लिखी जाए, फिर चाहे वो एक कैमियो या मेहमान उपस्थिति ही क्यों ना हो। रणबीर को इस बात से भी कोई फर्क नहीं पड़ता था कि वह रोल चाहे छोटा सा ही क्यों ना हो, पर वे किसी भी तरह से इस फिल्म का हिस्सा बन जाएं। तो आखिर अली ने उस सफल स्टार को मना कर दिया जिसे वो अपनी सबसे बड़ी प्रेरणा मानते हैं?

फिल्मी दुनिया में मेहमान उपस्थिति एक नया चलन बन गया है और हर छोटी-बड़ी फिल्म में इसे आजमाया जा रहा है, पर इम्तिायज इस तरह की किसी सुविधा से दूर ही रहना चाहते हैं। क्या अली को लगता है कि रणबीर को फिल्म में शामिल होने से वे फिल्म की प्रमुख जोड़ी आलिया भटट और रणदीप हुडडा पर भारी ना पड़ जाएं या वे महसूस करते हैं कि रणबीर की लव लाइफ को लेकर मीडिया की दिलचस्पी फिल्म की प्रमोशन के दौरान पूरा ध्यान ही खींच कर ना ले जाए? बॉलीवुड की इसी तरह की ताजा और बड़ी खबरों के लिए देखते रहें प्लेनेट बॉलीवुड न्यूज, हर दिन रात 7 बजे सिर्फ जूम पर-भारत का नंबर वन बॉलीवुड चैनल।

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श्री सुभाष चंद्रा को मानद डॉक्‍टरेट की उपाधि

यूनिवर्सिटी ऑफ ईस्‍ट लंदन (यूईएल) ने एस्‍सेल ग्रुप के चेयरमैन श्री सुभाष चंद्रा को मानद डॉक्‍टरेट की उपाधि से सम्‍मानित किया।

रॉयल डॉक बिजनेस स्कूल के स्नातकों के एक समारोह में डॉक्‍टरेट की उपाधि से उन्‍हें सम्मानित किया गया। यूनिवर्सिटी ऑफ ईस्‍ट लंदन के चांसलर लॉर्ड गुलाम नून ने श्री सुभाष चंद्रा को डॉक्‍टरेट की मानद उपाधि प्रदान की।

सम्‍मान ग्रहण करने के बाद समारोह में श्री सुभाष चंद्रा ने ज़ी के नए ग्‍लोबल कॉरपोरेट फिलोसिफी "दी वर्ल्‍ड इज माय फैमिली" को लेकर अपनी दृष्टि और विचार रखे। उन्‍होंने कार्यक्रम को संबोधित करते हुए कहा कि मुझे अवार्ड तो कई मिले हैं, पर यह सम्‍मान मेरे लिए बहुत खास है। उन्‍होंने यह भी कहा, ' यदि आप ऑर्ट ऑफ लिविंग सीखना चाहते हैं तो वर्तमान में जीवन जीएं। यही ऑर्ट ऑफ लिविंग है।

श्री सुभाष चंद्रा के अलावा डा. एजाजुद्दीन और लॉर्ड रिक्‍स भी यूईएल की ओर से मानद डॉक्‍टरेट की उपाधि से आज सम्‍मानित किए गए।

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मांस पर सबसिडी मगर कपास पर टैक्स

मध्य प्रदेश के  खंडवा में  नरेंद्र मोदी चुनावी सभा को संबोधित करते हुए कहा कि काँग्रेस एक तरफ तो वह गरीब हितैषी होने की बात कहती है दूसरी ओर महंगाई के लिए गरीब को ही जिम्मेदार ठहराती है। गरीब को रोटी चाहिए लेकिन केन्द्र सरकार खाने के लिए गेहूं देने के बजाय शराब के लिए गेहूं देती है। खेती को बढ़ावा देने के बजाय मीट को प्राथमिकता देती है।

कपास पर टैक्स और मटन पर सब्सिडी
मोदी ने केन्द्र सरकार की नीतियों पर हमला बोलते हुए कहाकि सरकार कपास के निर्यात पर टैक्स लगाती है। जबकि मटन के निर्यात को बढ़ावा देती है। पशुधन को बढ़ाने के बजाय उन्हें काटने को प्रोत्साहित करती है। केन्द्र सरकार देश में पिंक रिवॉल्यूशन लाना चाहती है, जिससे गाय, भैंस जैसे जानवरों को काटा जाए। वे कपास पर टैक्स लगाकर किसानों की जेब पर हमला बोलती है वहीं मटन एक्सपोर्ट पर सब्सिडी देती है। गेहूं को गरीबों को बांटने के बजाय शराब कंपनियों को सस्ती दर पर बेचती है। गरीब भूखा मरता रहे लेकिन शराब उत्पादन पर कोई फर्क नहीं पड़े।

 

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आम आदमी पार्टी ने जारी किया घोषणा पत्र

आम आदमी पार्टी ने दिल्ली विधानसभा चुनाव के लिए अपना घोषणापत्र जारी करते हुए सरकार बनने पर 15 दिन के भीतर दिल्ली जनलोकपाल विधेयक पारित करने, बिजली की दरों में 50 प्रतिशत की कमी करने, स्थानीय मुद्दों का फैसला मोहल्ला सभा को सौंपने और दिल्ली पुलिस और दिल्ली नगर निगमों को केन्द्र सरकार के दायरे से मुक्त कराने जैसे वादे किए हैं। ��

आप की तरफ से चार दिसम्बर को होने वाले दिल्ली विधानसभा के लिए जारी घोषणा पत्र में दिल्ली जनलोकपाल के दायरे में मुख्यमंत्री, मंत्री, विधायक और सभी सरकारी एवं सार्वजनिक कर्मचारियों को जांच के दायरे में लाने का भी वायदा किया है। �
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700 लीटर पानी मिलेगा मुफ्त
पार्टी ने 700 लीटर तक रोजाना पानी मुफ्त उपलव्ध कराने, भ्रष्टाचार के आरोपों की जांच समय सीमा के अंदर करने और दोषी पाये जाने पर दंडित किए जाने, दो लाख सार्वजनिक शौचालय बनाने, विशेष सुरक्षा दलों का गठन करने, बलात्कारियों को जल्द और सख्त सजा दिलाने, पुनर्वास होने तक झुग्गियों को नहीं तोड़ने का भी भरोसा दिया गया है।�
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नए सरकारी स्कूल
आप के राष्ट्रीय संयोजक अरविंद केजरीवाल के साथ योगेन्द्र यादव, प्रशांत भूषण, संजय सिंह, कुमार विश्वास और मनीष सिसौदिया ने घोषणा पत्र जारी किया। पार्टी ने सत्ता में आने पर बहुब्रांड खुदरा कारोबार में विदेशी प्रत्यक्ष निवेश (एफडीआई) की अनुमति नहीं देने, 500 नए सरकारी स्कूल खोलने, नये सरकारी अस्पताल खोलने और महिलाओं, बुजुर्गों और बच्चों को सुरक्षा प्रदान करने के लिए दिल्ली में एक विशेष सुरक्षा दल बनाने का भी वादा किया है।

देश बदलने का मौका
आप नेताओं ने घोषणापत्र जारी करते हुए कहा कि चुनाव हर पांच साल बाद आते हैं। देश बदलने का मौका रोज-रोज नहीं आता। चार दिसम्बर को होने वाला विधानसभा चुनाव ऐसा ही एक अनूठा मौका है। यह अवसर दिल्ली की सरकार बदलने का नहीं है, यह देश की राजनीति बदलने का मौका है। स्वराज के सपने को सच करने का मौका दिल्ली के दरवाजे पर दस्तक दे रहा है।�
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स्वराज कानून होगा पास
पार्टी ने सरकार बनने के तीन माह के भीतर 'स्वराज कानून' पास करने, इस कानून के जरिये अपने मोहल्ले के बारे में निर्णय लेने के अधिकार सीधे जनता को देने का वादा किया है। पार्टी का कहना है कि इससे स्थानीय स्तर पर किए जाने वाले कार्यों में भ्रष्टाचार पर रोक लगेगी।�
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मोहल्ला वार्ड
घोषणा पत्र में इलाके के बारे में निर्णय लेने की ताकत सीधे जनता को देने का वादा करते हुए 272 नगर निगम वार्डों को छोटे-छोटे मोहल्ला वार्ड में बांटा जायेगा। एक वार्ड में दस से पन्द्रह मोहल्ले हो सकते है, जिसमें 500 से 1000 परिवार होंगे। ऐसे एक मोहल्ले में रहने वाले वोटरों की आम सभा को मोहल्ला सभा कहा जायेगा।�
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बिजली कंपनियों का ऑडिट
बिजली कंपनियों का ऑडिट कराने का वादा करते हुए घोषणा पत्र में कहा गया है कि जब तक ऑडिट नहीं हो जाता, बिजली के दाम नहीं बढाये जायेंगे। बिजली के मीटरों की निष्पक्ष एजेंसी से जांच कराने के साथ कंपनियों के बीच प्रतिस्पर्धा का माहौल बनाया जायेगा। �
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टैंकर माफिया पर रोक
दिल्ली जल बोर्ड का पुनर्गठन, टैंकर माफिया पर रोक लगाने, पानी प्रबंधन को पारदर्शी, सीवेज प्रणाली को नये सिरे से दुरुस्त करने, शिक्षकों के खाली पदों को भरने, निजी स्कूलों और कॉलेजों की फीस नियंत्रित करने के लिए दाखिले के समय अनुदान की प्रणाली बंद करने के लिए कानून बनाया जायेगा। �
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नये सरकारी अस्पताल
आप ने नये सरकारी अस्पताल खोलने, अधूरे अस्पतालों को पूरा करने, नई अदालतें खोलने, जरूरत पड़ने पर दो पाली में अदालत चलाने और लंबित मामलों को एक साल में निपटाने के लिए विशेष अदालतों का गठन किया जायेगा। �
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अनाधिकृत कॉलोनियां होंगी नियमित
गांव की जमीन को अनावश्यक पाबंदियों से मुक्त कराने की दिशामें कदम उठाये जायेंगे। प्राकृतिक आपदा में अन्य राज्यों के किसानों की तरह दिल्ली के किसानों को सुविधा दिलाने, एक साल के भीतर अनाधिकृत कॉलोनियों को नियमित करने, कालाबाजारियों को जेल भेजने का वादा किया गया है।�
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वैट का सरलीकरण
व्यापारियों को आकर्षित करने के लिए आप के घोषणापत्र में मूल्यवर्धित कर प्रणाली (वैट) व्यवस्था का सरलीकरण करने, उद्योग लाइसेंसिंग प्रक्रिया को आसान बनाने का आश्वासन दिया गया है। आवश्यक सेवाओं में ठेकेदारी प्रथा समाप्त करने, रेहडी पटरी वालों को लाइसेंस देने, बस सेवा का बड़े स्तर पर विस्तार करने का वायदा किया गया है।�
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ऑटो रिक्शा
आप ने अपने वोट बैंक को ध्यान में रखते हुए ऑटो रिक्शा चालकों के लिए भी कई घोषणाएं की है। इनमें हजारों ऑटो स्टैंड बनाने, बिना इंतजार बिना ब्लैक के ऑटो लोन, ट्रांसपोर्ट विभाग में रिश्वतखोरी खत्म करने, ऑटो का किराया एक निश्चित फॉर्मूले के तहत साल में दो बार तय करने की बात कही है।�
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दिल्ली वक्फ बोर्ड
यमुना की सफाई के लिए सीवेज को इसमें गिरने से रोकने, दिल्ली वक्फ बोर्ड को सरकारी दलालों के चंगुल से मुक्त कराने और इसका प्रबंधन समाज के ईमानदार प्रतिनिधियों को सौंपने का वादा किया गया है।�
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1984 के सिख दंगा पीड़ितों को न्याय�
दिल्ली के 1984 के सिख दंगा पीड़ितों को न्याय दिलाने, इससे जुड़े मामलों को गलत तरीके से बंद करने की समीक्षा कराने और शारीरिक अथवा मानसिक रूप से अक्षम नागरिकों के लिए देशभर के लिए एक मॉडल बनाने का प्रयास किया जायेगा।�
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संकल्प पत्र
आप ने कहा है कि मुख्यमंत्री के कार्यालय में एक विशेष प्रकोष्ठ बनाया जायेगा। यह प्रकोष्ठ इसी संकल्प पत्र पर ही नहीं, बल्कि पार्टी के दिल्ली की प्रत्येक विधानसभा के लिए जारी प्रत्येक संकल्प पत्र लागू कराने के काम पर निगरानी रखेगा। मुख्यमंत्री हर साल एक बार जनता के सामने संकल्प पत्र को लागूकरने पर रिपोर्ट कार्ड प्रस्तुत करेंगे। प्रत्येक विधायक भी हर साल अपने क्षेत्र की जनता के सामने अपने विधानसभा के संकल्प पत्र की रिपोर्ट पेश करेगा।

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कोलिन फैरेल अभिनित फिल्म का भारत में विशेष और प्रथम प्रसारण, देखिए मुवीज नाऊ पर

23 नवंबर, 2013 को रात 9 बजे देखिए डेड मैन डाऊन
आप उन्हें फोन बुथ, द रिक्रुट, डेरडेविल, टोटल रिकॉल जैसी फिल्मों में देख चुके हैं; �और अब अपने इस चहिते कलाकार का एक नया आविष्कार आप के लिए प्रस्तुत कियाजा रहा है। अनगिनत दिलों पर राज करनेवाले आयरिश अभिनेता कोलिन फैरेल अपने आज तक के सबसे अच्छे काम की एक और झलक आपके लिए लेकर आ रहे हैं। कोलिन ने अब तक एक सी.आई.ए. एजंट से लेकर सनकी जुआरी तक कई किरदार बखुबी निभाएं हैं और एक प्रतिभाशाली कलाकार के तौर पर अपनी पहचान बनाई है। इस कुशल अभिनेता को देखिए डेड मैन डाऊन में, जिसका विशेष प्रसारण किया जाएगा मुवीज नाऊ पर।

डेड मैन डाऊन एक क्राईम थ्रिलर है। जैसे ही फिल्म की कहानी आगे बढेगी, दर्शक इस कहानी में पूरी तरह खो जाएंगे। य्ाहां तक कि आगे क्या होगा यह जानने की उत्सुकता में अपने नाखुन कुतरते हुए दर्शक एक ही जगह पर जैसे चिपक कर बैठे रहते हैं। दुनिया की सारी चीजों को छोडकर इंसान अगर अपनी बदले की भावना के पीछे भागेगा तो क्या होगा? यही विषय लेकर बनाए गए इस चलचित्र में कोलिन को खून का बदला खून कहकर अपना किरदार निभाते हुए जरूर देखिए। कोलिन द्वारा अभिनित आज तक का यह सबसे अधिक दुष्ट किरदार है।

निया नायर शैली में बनाए गए इस चलचित्र में विक्टर नामक एक इंसान की कहानी दिखाई गयी है, जो अपने सबसे खतरनाक शत्र् को मानसिक स्तर पर पीडा देने की योजना बनाता है। कोलिन की बदले की भावना उसे पराजित करेगी या अंत में उसकी ही जीत होगी? इस सवाल का जवाब जानने के लिए देखिए डेड मैन डाऊन का विशेष प्रसारण, मुवीज नाऊ पर, 23 नवंबर, 2013 रात 9 बजे।

इसका का मार्केटिंग भी ऐसे अनोखे ढंग से किया गया था कि, जिसे कुछ लोग देखते ही रह गया और कई लोगों की तो चीखें भी निकल गई थी थी। न्यू यॉर्क शहर के एलेवेटर्स में एक खून का नाटक रचा गया था। असली घटना का आभास करानेवाले इस नाटक को देखकर लोगों ने जो स्वाभाविक प्रतिक्रिया दी, उसका चित्रण किया गया; और चलचित्र प्रदर्शित होने से पहले इस विडिओ ने ऐसी धूम मचाई कि डेड मैन डाऊन उस वर्ष का बहुप्रतिक्षित चलचित्र बन गया। अपनी ब्लॉकबस्टर फिल्म द गर्ल विथ द ड्रैगन टैटु के लिए पहचाने जानेवाले निर्देशक नील्स आर्डेन ओप्लेव ने डेड मैन डाऊन के माध्यम से अमरिकी चलचित्र की दुनिया में अपने निर्देशन का पहला आविष्कार प्रस्तुत किया।

अपनी हक की लड़ाई लड़नेवाले कोलिन को जरूर देखिए मुवीज नाऊ पर, 23 नवंबर, 2013 को रात 9 बजे!

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