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किसान के बेटे ने बनाया नायाब उपकरण

कहावत है, दीवारों के भी कान होते हैं। एक किसान के बेटे ने वाकई यह 'कान' बना दिया। सौ मीटर के दायरे में मोबाइल फोन पर या आपस में कनबतिया हो रही हैं, तो यह 'कान' सुन लेगा। इसके निर्माण पर लागत आई है मात्र पांच हजार रुपये और नाम रखा गया है मल्टीटॉस्किंग मशीन।

ये कमाल किया है मथुरा के बाजना क्षेत्र के सदीकपुर गांव के निवासी अमित चौधरी ने। बाबा साहब अम्बेडकर पॉलीटेक्निक से मैकेनिकल में डिप्लोमा कर रहे अमित के पिता ब्रह्मजीत सिंह साधारण किसान हैं। विज्ञान के नए आविष्कार करने का शौक अमित को कुछ साल पूर्व लगा। उसने गांव में ही मोबाइल रिपेयरिंग की दुकान खोली, तो मोबाइल उपकरणों को आपस में जोड़ते समय उसके दिमाग में नए विषयों पर काम करने की सोच पनपी। उसे लगा कि इनके उपयोग से वह नए आविष्कार कर सकता है। इसी के साथ प्रयास शुरू किया। काम में वक्त न दे पाने के कारण उसकी दुकान बंद हो गई।इसी बीच उसने मोबाइल की तर्ज पर बिना किसी खर्च के आवाज सुनने को उपकरण बनाने का प्रयास जारी रखा। उसकी मेहनत 5000 रुपये के खर्च के साथ लगभग एक साल में सफल हुई।

अमित ने ऑडियो फ्रीक्वेंसी, आइसी, मोबाइल लीड के वायर, लैपटॉप की बैटरी, मोबाइल की बैटरी, एक स्पीकर और वायरलेस हेडफोन की मदद से 100 मीटर के दायरे में आवाज सुनाने वाला उपकरण आखिर तैयार कर ही लिया। उसने अपने इस उपकरण को मल्टीटास्किंग मशीन का नाम दिया है। उसका यह उपकरण किसी की भी जासूसी कर सकता है।

तीन हिस्सों में बंटा है उपकरण

अमित का यह उपकरण तीन हिस्सों में बंटा हुआ है। इसका एक हिस्सा बल्ब के रूप में है। इसमें माइक लगाया गया है। जासूसी करने वाली जगह पर यह टांगा जा सकता है। इसके बल्ब के साथ लगे होने के कारण इस पर किसी को शक भी नहीं होगा। वहीं दूसरे हिस्से में एक आइसी और मशीन है। इसे भी बल्ब से 100 मीटर की दूरी तक कहीं भी छिपाकर आसानी से रखा जा सकता है। तीसरा हिस्सा वायरलेस हेडफोन है। इसे चालू करने से बल्ब के पास हो रही बातचीत को सुना जा सकता है।

बड़े काम की मशीन

मथुरा। अमित की मल्टीटास्किंग मशीन बड़े ही काम की है। इसमें सिम लगाकर फोन की तरह बात भी कर सकते हैं। वहीं इससे टैबलेट और मोबाइल को चार्ज भी कर सकते हैं। यही नहीं, इसे टीवी या मोबाइल से कनेक्ट कर गाने भी सुने जा सकते हैं।

क्रैश हो गया था सिंगल सीटर हेलीकॉप्टर

अमित इस समय 18 फुट लंबा सिंगल सीटर हेलीकॉप्टर तैयार करने में जुटे हैं। उन्होंने जून में 40,000 रुपये की व्यवस्था कर इसे तैयार भी कर लिया था। मगर टेस्टिंग के दौरान यह क्रैश हो गया। दोबारा पैसे जुटाकर वे इसे बनाने की तैयारी में हैं। उनके मुताबिक वे इसे स्कूटर के इंजन, फाइबर की बॉडी, बाइक की गिरारी और घर के पंखों की मदद से तैयार कर रहे हैं।

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दल से पहले देश राजनीति का लक्ष्य हो

<p><span style="line-height:1.6em">महर्षि व्यक्ति पराक्रम करते हैं और अपने पराक्रम से शत्रुओं पर विजय प्राप्त करते हैं। एक साधु के लिए अपेक्षा है कि वह विजयी बनें। वह प्रतिकूलताओं को भी सहन करे और अनुकूलताओं को भी सहन करे। अनुकूलता और प्रतिकूलता में समताभाव रह सके, मानसिक संतुलन रह सके, ऐसी साधना साधु में होनी चाहिए। साधु में तो होनी ही चाहिए, पर मैं राजनीति पर ध्यान दूं तो मेरा ऐसा सोचना है कि कुछ अंशों में यह समता की साधना राजनीति के क्षेत्र में काम करने वाले व्यक्तियों में भी होनी चाहिए, तभी राजनीति स्वच्छ रह सकती है।</span></p>

<p><span style="line-height:1.6em">हम साधु लोग राजनीति से असंपृक्त हैं और भी बहुत से लोग हैं, जो राजनीति से दूरी बनाए रखते हैं। न किसी राजनीतिक पार्टी का प्रचार करते हैं, न किसी व्यक्ति या पार्टी विशेष को वोट देने का परामर्श देते हैं। हां, इतना जरूर है कि साधु-संन्यासी राजनीतिक क्षेत्र के लोगों को मार्गदर्शन देने वाले हो सकते हैं। ऐसा प्राचीनकाल में भी होता रहा है। मेरा मानना है कि राजनीति पर नैतिकता का अंकुश या धर्म का अंकुश रहता है तो राजनीति सम्यक्तया संचालित हो सकती है। जहां राजनीति पर धर्म का, नैतिकता का अंकुश न हो, केवल सत्ता प्राप्ति का ही लक्ष्य हो तो उसे राजनीति का दुर्भाग्य मानना चाहिए।</span></p>

<p><span style="line-height:1.6em">मेरा मंतव्य है कि गृहस्थों के लिए राजनीति कोई अस्पृश्य चीज नहीं है। राजनीति सेवा का एक अच्छा माध्यम हो सकती है। अपेक्षा यह है कि राजनीतिक क्षेत्र के लोग नैतिकता के संकल्प से संकल्पित हों। अणुव्रत इसमें बहुत सहायक सिद्ध हो सकता है। एक घटना-प्रसंग मैं अपनी शैली में प्रस्तुत कर रहा हूं। बहुत पहले की बात है, परमपूज्य आचार्य तुलसी के पास एक मंत्रीजी आए। बातचीत के प्रसंग में मंत्रीजी बोले- &lsquo;&lsquo;आचार्यश्री! मेरे मन में धर्म के प्रति रुचि है और मैं धर्म करना भी चाहता हूं किन्तु समस्या यह है कि व्यस्तता के कारण मैं इसके लिए समय नहीं निकाल पाता।&rsquo;&rsquo;</span></p>

<p><span style="line-height:1.6em">कार्याधिक्य और गुरुतर दायित्व के कारण कुछ लोगों के सामने समय का अभाव हो सकता है। लेकिन मेरा तो चिंतन है कि व्यस्त होना एक बात है और अस्त-व्यस्त होना दूसरी बात है। व्यस्त होना कोई बुरी बात नहीं। ज्यादा काम हो तो व्यक्ति व्यस्त भी हो सकता है, पर उसका मस्तिष्क शांत रहना चाहिए। अशांति की स्थिति आदमी को अस्त-व्यस्त कर देती है।</span></p>

<p><span style="line-height:1.6em">गुरुदेवश्री ने कहा- &lsquo;&lsquo;मंत्रीजी, आप व्यस्त हैं, धर्म के लिए आपको समय नहीं मिल पाता तो मैं ऐसे धर्म में आपको प्रवृत्त नहीं करना चाहता जो आपकी व्यस्तता को और ज्यादा बढ़ा दे। आपकी व्यस्तता को देखते हुए आपको ऐसा धर्म बताता हूं, जिसके लिए आपको अलग से समय निकालने की जरूरत नहीं पड़ेगी।&rsquo;&rsquo;</span></p>

<p>मंत्रीजी ने ऐसे धर्म के बारे में आतुर भाव से जिज्ञासा की तो आचार्य ने कहा- &lsquo;&lsquo;वह धर्म है नैतिकता। आपके पास अपने विभाग से संबंधित फाइलें तो आती ही होंगी, आप उनके कार्य संपादन में प्रामाणिकता रखें। अपने दैनंदिन जीवन में नैतिक और प्रामाणिक बने रहें, यह नैतिकता का संकल्प ही आपके लिए धर्म हो जाएगा। धर्म करने के लिए आपको किसी धर्मस्थान में जाने की जरूरत नहीं रह जाएगी।</p>

<p><span style="line-height:1.6em">अणुव्रत का संदेश है-आप किसी की भी उपासना करो, आप राम को मानो या महावीर को, बुद्ध, नानक, मुहम्मद, ईसा-किसी को भी मानो या न भी मानो, आपकी इच्छा पर है, अणुव्रत का इससे कोई लेना-देना नहीं है। अणुव्रत का मात्रा इतना ही कहना है कि आप जो भी कार्य करें, उसमें नैतिकता और प्रामाणिकता रहे। मैं तो यहां तक भी कहता हूं कि कोई व्यक्ति नास्तिक विचारधारा का हो, परलोक, पुनर्जन्म-पूर्वजन्म और आत्मा को नहीं मानता हो तो ऐसा नास्तिक आदमी भी अणुव्रतों को स्वीकार कर सकता है। परलोक को भले ही कोई न माने, वर्तमान की दुनिया या इहलोक को तो मानता ही होगा, क्योंकि वह तो आंखों के सामने है। व्यक्ति कम से कम इस जीवन को शांतिपूर्ण बनाने के लिए तो नैतिकता के रास्ते पर चले।</span></p>

<p><span style="line-height:1.6em">राजनीति का क्षेत्र भी सेवा का एक माध्यम है, जिसकी बड़ी आवश्यकता होती है। राजनीति के बिना दुनिया का काम भी कैसे चलेगा? व्यवस्था चलाने के लिए कोई प्रमुख, कोई मार्गदर्शक, कोई नियंता न हो और सामान्य लोग राग-द्वेष से जुड़े हुए हों तो मेरा मानना है कि वह समाज के लिए दुर्भाग्य की बात है। ऐसी स्थिति में समाज और राष्ट्र का संचालन होगा भी तो कैसे? इसलिए राजनीति आवश्यक है। शर्त यही है कि राजनीति में काम करने वाले व्यक्ति योग्य और ईमानदार होने चाहिए।</span></p>

<p><span style="line-height:1.6em">भारत लोकतांत्रिक शासन प्रणाली वाला राष्ट्र है। लोकतंत्र में भी प्रशिक्षण की आवश्यकता होती है। जनता को भी प्रशिक्षण मिलना चाहिए और देश का संचालन करने वाले कर्णधार भी प्रशिक्षित होने चाहिए। अगर लोकतंत्र में कर्तव्यनिष्ठा न हो, चुनाव में भय, प्रलोभन, प्रभाव से वोट लिए और दिए जाते हों तो मुझे लगता है कि यह लोकतंत्र के लिए शुभ शकुन नहीं होता है, प्रशस्त तरीका नहीं होता है। लोकतंत्र में वोट देने वाले और लेने वाले प्रशिक्षित हों तो यह विशिष्ट बात होती है। सत्ता के आसन पर बैठने वाले लोग योग्यता संपन्न होने चाहिए, राष्ट्र हित को प्रमुखता देने वाले होने चाहिए। भारत में अनेक राजनीतिक दल हैं, उनका अपना महत्व भी है। वास्तव में देखा जाए तो राजनीतिक पार्टियां भी देश की सेवा के लिए हैं। एक ओर राष्ट्र और दूसरी पार्टी हो तो राष्ट्र का पहला स्थान मिलना चाहिए। दल से राष्ट्र बड़ा है। नीतिशास्त्र में कहा गया है-</span></p>

<p>त्यजेदेकं कुलस्यार्थे ग्रामस्यार्थे कुलं त्यजेत्।</p>

<p>ग्रामं जनपदस्यार्थे आत्मार्थ सकलं त्यजेत्।।</p>

<p><span style="line-height:1.6em">एक ओर कुल परिवार की बात हो और दूसरी ओर एक व्यक्ति की तो वहां कुल को महत्व देते हुए उसे प्राथमिकता मिलनी चाहिए। एक ओर परिवार का प्रश्न हो और दूसरी ओर गांव का तो गांव के हित को प्राथमिकता मिलनी चाहिए। अध्यात्म की दृष्टि से जहां आत्मा के हित की बात है, उसके लिए सब कुछ छोड़कर साधना के पथ पर आगे बढ़ जाना अभीष्ट है।</span></p>

<p><span style="line-height:1.6em">सन् 2002 में आचार्य श्री महाप्रज्ञ अहमदाबाद के पास प्रेक्षा विश्वभारती में चातुर्मासिक प्रवास कर रहे थे। मेरी स्मृति के अनुसार एक दिन उन्हें सूचना मिली कि कुछ ही समय बाद राष्ट्रपति अब्दुल कलाम आपके दर्शनार्थ पहुंच रहे हैं। राष्ट्रपतिजी आए। बातचीत के क्रम में आचार्यश्री ने जो कहा, उसका भाव लगभग इसी प्रकार रहा होगा- &lsquo;&lsquo;हमारे गुरु आचार्य तुलसी कहा करते थे कि धर्म का स्थान पहला है, सम्प्रदाय का स्थान उसके बाद का है। मैं इसी बात को इस रूप में कहना चाहता हूं-राष्ट्र का स्थान पहला है, पार्टी का स्थान दूसरे नम्बर पर होना चाहिए।&rsquo;&rsquo; राष्ट्रपतिजी ने आचार्यश्री के इस कथन पर अत्यंत प्रसन्नता व्यक्त करते हुए कहा- &lsquo;&lsquo;यह बहुत बढ़िया है। अब आपके पास जो भी राजनेता आए, आप उनसे कहें कि राष्ट्र का स्थान हमेशा नम्बर एक पर और दल का स्थान नम्बर दो पर होना चाहिए।&rsquo;&rsquo;</span></p>

<p><span style="line-height:1.6em">पार्टी तो अपनी-अपनी होती है, किन्तु राष्ट्र तो किसी एक का नहीं, सबका है। इसलिए राष्ट्रहित को वरीयता मिलनी चाहिए। राजनीति के लोगों के लिए मेरा परामर्श है कि पार्टी के बारे में वे सोचते हैं, इसमें कोई दिक्कत की बात नहीं, किन्तु राष्ट्र को सामने रखकर सोचें कि हमारा पहला दायित्व किसके प्रति है? राष्ट्र के परिप्रेक्ष्य में ही वे पार्टी के बारे में सोचें, राष्ट्रहित को कहीं आंच नहीं आनी चाहिए। अगर राजनेताओं में राष्ट्र के प्रति निष्ठा हो और सत्ता-सुख की आकांक्षा से उपरत होकर सेवा कार्य करें तो राजनीति में नैतिकता की संभावना रह सकती है। राजनीति में आने वाला व्यक्ति सेवा का लक्ष्य न रखे, जनता की भलाई न करे तो राजनीति में आने की उसकी सार्थकता क्या है?</span></p>

<p><span style="line-height:1.6em">सन् 2004 में आचार्य श्री महाप्रज्ञ महाराष्ट्र की यात्रा कर रहे थे। वहां जलगांव में मर्यादा महत्सव का आयोजन था। उन दिनों एक बार महाराष्ट्र के एक राजनेता आचार्यश्री के पास में खड़े थे। उनके समक्ष आचार्यवर ने एक संस्कृत श्लोक फरमाया-</span></p>

<p>अधिकारपदं प्राप्य नोपकारं करोति यः।</p>

<p>अकारो लोपमात्रेण ककारो द्विततां व्रजेत्।।</p>

<p>अधिकार मिलता है उपकार करने के लिए। राजनीति में आकर कोई अधिकार का पद प्राप्त कर ले, किन्तु उसे प्राप्त करने के बाद उपकार न करे तो अधिकार शब्द में से प्रथम अक्षर &lsquo;अ&rsquo; को निकाल देने और &lsquo;का&rsquo; से पहले &lsquo;क्&rsquo; लगाने के बाद जो शब्द बनता है, वह उसका अधिकारी है। अधिकार मिला है तो किसी लालच में न आकर निष्ठा और निष्काम भाव से सेवा की भावना काम्य होती है। जिस राजनेता में गलत तरीके से अर्थार्जन की भावना न हो और सेवा की भावना प्रशस्त हो, वह राजनीति में नैतिक मूल्यों को अक्षुण्ण रख सकता है। एक संस्कृत के श्लोक में कहा गया है-</p>

<p>राज्याधिकारं संप्राप्य यः प्रजां नैव रंजति।</p>

<p>अजागलस्तनस्येव तस्य जन्मनिरर्थकम्।।</p>

<p>राज्याधिकार यानी राजसत्ता को प्राप्त करके जो व्यक्ति प्रजा को संतुष्ट न करे यानी प्रजा की सेवा न करे, राजनेता का जन्म उसी तरह व्यर्थ, जैसे बकरी के गले का स्तन।</p>

<p>राजा या शासक का प्रथम कर्तव्य है प्रजा का पालन करना, सज्जन लोगों की रक्षा करना। उसका दूसरा कर्तव्य है दुर्जन और असामाजिक तत्वों पर नियंत्रण करना। तीसरा कर्तव्य है-भले-बुरे जो भी लोग हैं, उनकी उदरपूर्ति करना। जनता की न्यूनतम जरूरतें पूरी करना राजा का कर्तव्य है। प्रजा को भरपेट भोजन मिलता है या नहीं, शिक्षा, चिकित्सा और सुरक्षा की समुचित व्यवस्था है या नहीं, यह देखना भी शासक का दायित्व है।</p>

<p><span style="line-height:1.6em">राजा की नीति ही तो राजनीति होती है। राजनीति को कभी-कभी लोग अपकर्ष में ले जाते हैं। &lsquo;यह व्यक्ति राजनीति करता है&rsquo;-इस कथन में राजनीति के प्रति एक प्रकार का हेयभाव ध्वनित होता है। कहने का तात्पर्य यह है कि राजनीति को कुछ लोग तुच्छ और गर्हित रूप में लेते हैं। सबकी अपनी-अपनी दृष्टि है। मेरी दृष्टि में तो राजनीति हेय नहीं, बहुत काम की और उपयोगी चीज है, सेवा का एक अच्छा माध्यम है, किन्तु कब? जब राजनीति पर नैतिकता और धर्म का अंकुश रहे। ऐसी नैतिकतापूर्ण राजनीति जहां होती है, वह राष्ट्र सद्भाग्यशाली होता है।</span></p>

<p><span style="line-height:1.6em">भारत ऐसा देश है, जहां कितनी-कितनी त्याग-तपस्या हुई है और आज भी कुछ अंशों में हो रही है। अध्यात्म विद्या के साथ-साथ यह देश ज्ञान के विशाल भंडार से कितना समृद्ध रहा है। हम संस्कृत, प्राकृत भाषा के प्राचीन ग्रंथों को देखें, उनमें कितना ज्ञान-विज्ञान का भंडार भरा पड़ा है। यह भी राष्ट्र के लिए मेरी दृष्टि में गौरव की बात है। इस संपदा का समुचित मूल्यांकन होता रहे, यह अपेक्षा है। यह ऋषि-मुनियों की भूमि है, जिन्होंने त्याग-तपस्या और साधना की है।</span></p>

<p><span style="line-height:1.6em">आज भी कितने-कितने संत अपने-अपने ढंग से साधना करते हुए जनता का पथदर्शन कर रहे हैं। मेरा तो मानना है कि राष्ट्र के धार्मिक-आध्यात्मिक और नैतिक-चारित्रिक विकास में संतों का बड़ा योगदान है। आज भी भारत की जनता में संतों के प्रति आस्था का भाव है। आम आदमी की बात पर कोई ध्यान दे, न दे, लेकिन आमतौर पर संतों की बात के प्रति सम्मान की भावना देखने को मिलती है।</span></p>

<p><span style="line-height:1.6em">हमारा चिंतन है कि राजनीति कोई खराब चीज नहीं, अस्पृश्य नहीं, बस, राजनीति में मूल्यवत्ता रहनी चाहिए। वह धर्म और नैतिकता से प्रभावित होनी होनी चाहिए। अगर ऐसा होता है तो राजनीति और नैतिकता दोनों का एक प्रकार से संगम हो जाता है और ऐसा होना राष्ट्र के लिए भी सौभाग्य का सूचक बन सकता है।</span></p>

<p>प्रस्तुतिः</p>

<p>ललित गर्ग</p>

<p>ई-253, सरस्वती कुँज अपार्टमेंट</p>

<p>25 आई॰ पी॰ एक्सटेंशन, पटपड़गंज, दिल्ली-92</p>

<p>फोनः 22727486, 9811051133</p>
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संजय को प्रवक्ता सम्मान

भोपाल। देश की महत्वपूर्ण वेबसाइट प्रवक्ता डाट काम (http://www.pravakta.com/) के पांच साल पूरे होने पर कांस्टीट्यूशन क्लब, दिल्ली के स्पीकर हाल में आयोजित समारोह में माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय, भोपाल के जनसंचार विभाग के अध्यक्ष संजय द्विवेदी को ‘प्रवक्ता सम्मान-2013’ से सम्मानित किया गया। यह सम्मान उन्हें न्यू मीडिया के क्षेत्र में विशिष्ठ योगदान के लिए दिया गया है। प्रख्यात पत्रकार श्री राहुल देव ने संजय द्विवेदी को शॉल एवं प्रतीक चिन्‍ह भेंटकर सम्‍मानित किया।

इस अवसर वरिष्ठ पत्रकार एनके सिंह, जगदीश उपासने, जयदीप कार्णिक सहित अनेक महत्वपूर्ण पत्रकार, साहित्यकार एवं बुद्धिजीवी मौजूद थे। संजय द्विवेदी पिछले 20 वर्षों में पत्रकारिता, लेखन, संपादन और सामाजिक कार्यों से जुड़े हुए है। वे ‘मीडिया विमर्श’ पत्रिका के कार्यकारी संपादक भी हैं।

-संजय द्विवेदी कॉ ब्लॉग एवं वेब साईट
http://sanjayubach.blogspot.com/
http://sanjaydwivedi.com/

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संवेदनहीन पुलिस के दिए जख्मों पर न्यायालय की मानवीय मरहम

<p><span style="line-height:1.6em">यह शर्मिला शर्मा के बच्चों का दुर्भाग्य था या पंचकुला पुलिस की घोर लापरवाही कि अक्टूबर 2012 में एक सडक दुर्घटना में शर्मिला के पति की मृत्यु हो गयी थी| हरियाणा सरकार ने कहने को तो ऐसे मामलों में मुआवजा देने की घोषणा कर रखी है किन्तु पीड़ितों को अभी तक कोई मुआवजा नहीं दिया गया| शर्मिला अपने बच्चों का येन केन प्रकारेण पालन पोषण कर रही थी और अपने पति की मृत्यु के लिए मुआवजे हेतु संघर्ष कर रही थी कि 6 माह बाद दिनांक 07.05.13 को उसके परिवार पर दुखों का एक और पहाड़ टूट पडा| चंडीगढ़ के सेक्टर 10 में चंडीगढ़ परिवहन उपक्रम की एक बस उसे कुचलते हुए निकल गयी| शर्मिला के सिर में गहरी चोट आयी थी| जिस स्थान पर यह दुर्घटना हुई वहां से मल्टी स्पेसीलिटी अस्पताल मात्र 100 मीटर की दूरी पर ही है| किन्तु लापरवाह और अमानवीय पुलिस अधिकारी वहां 2 घंटे बाद पहुंचे जिससे शर्मिला को बचाया नहीं जा सका| सेक्टर 3 पुलिस थाने के प्रभारी श्री प्रकाश जब 2 घंटे बाद घटना स्थल पर पहुंचे तो शर्मिला सडक पर खून के तालाब के बीच पड़ी थी यद्यपि अधीनस्थ पुलिस उस स्थान पर पहले से ही उसकी प्रतीक्षा करते रहे| इस घटना से शर्मिला के दो किशोर वय बच्चे पूरी तरह से अनाथ हो गये| यह भी ध्यान देने योग्य है कि शहरी क्षेत्र में परिवहन के लिए अधिकतम 10 मीटर तक लम्बाई की बसें ही उपयुक्त हैं जबकि 13.5 मीटर तक लम्बी असुरक्षित बसों को प्रयोग किया जा रहा है| &nbsp;&nbsp;</span></p>

<p><span style="line-height:1.6em">उक्त तथ्य पंजाब हरियाणा उच्च न्यायालय के ध्यान में आने पर दिनांक 10.05.13 को स्व-प्रेरणा से संज्ञान लिया गया और अग्रिम कार्यवाही की गयी| उच्च न्यायालय ने अपने आदेश दिनांक 25.09.13 में कहा और आदेश दिया है कि पुलिस के संवेदनहीन आचरण से दो बच्चे अनाथ हो गये| किसी सामाजिक सुरक्षा की योजना के अभाव में इन दुखान्तिकाओं से नाबालिग बच्चे और अधिक पीड़ित हैं| न्यायालय ने मानवीय दृष्टिकोण अपनाते हुए आदेश दिया कि हरियाणा सरकार की योजनानुसार 15 दिन के भीतर एक लाख रुपये की राशि भुगतान की जाए| न्यायालय की टिप्पणी थी कि संघ राज्य क्षेत्र चंडीगढ़ की संवेदनहीन पुलिस पीड़ित को मदद करने की बजाय क्षेत्राधिकार के मुद्दे को उलझाने में अधिक रुचिबद्ध रही है| न्यायालय के हस्तक्षेप से पहले दोषी अधिकारियों का अनुचित बचाव किया जाता रहा| सुनवाई के दौरान यह बताया गया है कि अब कई अधिकारियों के विरुद्ध अनुशासनिक कार्यवाही प्रारंभ की गयी है जिसका अभी तक निष्कर्ष नहीं निकला है किन्तु इससे अवयस्क अनाथ बच्चों को कोई सांत्वना प्राप्त नहीं होती है| कम से कम, बच्चों को आर्थिक मदद तो दी ही जा सकती है| अत: चंडीगढ़ प्रशासन को आदिष्ट किया जाता है कि दोनों बच्चों के नाम से 1- 1 लाख रूपये की राशि अंतरिम राहत के तौर पर 15 दिन के भीतर जमा करवाए| सत्यापन के बाद बच्चों को प्रतिमाह शिक्षा व पालन पोषण खर्चे के लिए 14200 रूपये भुगतान किये जाएँ| यह राशि सितम्बर माह से प्रारंभ होगी जोकि 7 अक्तूबर या इससे पूर्व देय होगी| न्यायमित्र की सहायता से तदनुसार आवेदन का निपटान किया गया|</span></p>

<p>फिर भी चंडीगढ़ प्रशासन और पंजाब सरकार से हरियाणा की तर्ज पर ऐसे मामलों में एक सम्यक नीति बनाने की अपेक्षा की गयी| इस प्रकार की घटनाओं को टालने के उपाय करने और दोषी पुलिस अधिकारियों पर अधिकतम एक माह की अवधि में कार्यवाही करने की रिपोर्ट के लिए मामले को पुन: दिनांक 19.11.13 को सूचीबद्ध करने के आदेश दिए गए और आदेश की दस्ती प्रति पक्षकारों को दी गयी| &nbsp; &nbsp;</p>

<p>( लेखक वरिष्ठ अधिवक्ता हैं और जन समान्य से जुड़े न्यायालयीन विषयों पर प्रमुखता से लिखते हैं)&nbsp;</p>
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लक्ष्मण झूला पर लंगूर ने अमिताभ को मारा था थप्पड़

<p><span style="line-height:1.6em">लक्ष्मणझूला और स्वर्गाश्रम आने वाले देश-विदेश के पर्यटकों को यहां के लंगूर अपने व्यवहार के कारण अक्सर याद रहते हैं। ऐसे में सदी के महानायक अमिताभ बच्चन भला इन लंगूरों को कैसे भूल सकते हैं। 1978 में लक्ष्मणझूला में ही एक लंगूर ने बिग बी को थप्पड़ जड़ा था। यह बात बिग बी ने फेसबुक पर अपने प्रशंसकों के साथ साझा की है।</span></p>

<p>सदी के महानायक अमिताभ बच्चन ने एक ब्लैक एंड व्हाइट फोटो के साथ यह संस्मरण शेयर किया है। घटना तब की है जब सदी के महानायक अपने करियर के शुरुआती दौर में थे। अमिताभ बच्चन 1978 में फिल्म &#39;गंगा की सौगंध&#39; की शूटिंग के सिलसिले में ऋषिकेश आए थे। यहां उनके साथ फिल्म के अन्य साथी कलाकार भी थे। इसी दौरान का एक किस्सा उन्होंने अपने फेसबुक से शेयर किया है। महानायक ने लिखा है कि ..</p>

<p>हम तीर्थनगरी में &#39;गंगा की सौगंध&#39; की शूटिंग कर रहे थे। हमने पहले गंगा के ऊपर बने लक्ष्मणझूला पुल पर घुड़सवारी का सीन शूट किया। उस दिन की शूटिंग खत्म करने के बाद हम हरिद्वार स्थित गेस्ट हाउस के लिए लौट रहे थे। लक्ष्मणझूला में अचानक हमारी कार के सामने एक लंगूर आ गया। लंबी पूंछ, सफेद मुंह और ग्रे सी स्कीन वाला वह लंगूर कुछ खाने को तलाश रहा था। इस पर मैं कार से उतरा और उसके पास उसे कुछ चने और केले खिलाने के लिए पहुंचा। यह सब जैसे किसी फिल्म की स्क्रिप्ट जैसा ही था। यह सब पास ही खड़े दो-तीन लंगूर भी देख रहे थे। इसके बाद वह भी वहां आ गए, लेकिन उनमें से एक लंगूर ने मुझे देखा और मुझे एक जोरदार थप्पड़ मारा। मानों जैसे वो कह रहा हो कि मुझे भी कुछ खाने को दें। मुझे याद नहीं है पर वो शायद फीमेल लंगूर थी। इस पूरी घटना के साक्षी मेरे मेकअप मैन दीपक सावंत भी बने। सावंत मेरे साथ 35 वर्ष से काम कर रहे हैं।</p>

<p>फेसबुक पर अमिताभ बच्चन का यह संस्मरण तीर्थनगरी में उनके प्रशंसकों के लिए हैरान करने वाला है। इस संस्मरण के साथ ही फिल्म &#39;गंगा की सौगंध&#39; की शूटिंग के वह लम्हे भी ताजा हो गए जब लक्ष्मणझूला, गंगा के तट, ढालवाला के जंगल और चंद्रभागा नदी में अमिताभ बच्चन, अभिनेत्री रेखा, अमजद खान, बिंदू आदि पर इस फिल्म के दृश्य फिल्माए गए थे।</p>

<p>साभार &ndash;दैनिक जागरण से</p>
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बाबा रामदेव ने कहा, मैं नार्को टेस्ट के लिए तैयार

योगगुरु बाबा रामदेव ने कहा है कि अपने गुरू बाबा शंकरदेव के लापता होने के मामले में वह नारको टेस्ट के लिए तैयार हैं। बाबा रामदेव ने एक निजी टीवी चैनल से बातचीत के दौरान कहा कि केंद्रीय जांच ब्यूरो (सीबीआई) ने बाबा शंकरदेव के लापता होने के बारे में उनसे लगभग एक घंटे तक पूछताछ की है और उन्हें पूछताछ के लिए फिर बुलाया गया है।

बाबा रामदेव ने चैनल से बातचीत के दौरान कहा कि कांग्रेस पार्टी उन्‍हें बलात्‍कार, हत्‍या और ड्रग्‍स तस्‍करी के मामले में फंसाना चाहती है। उन्‍होंने कहा कि उन पर कई बार दवाब बनाया गया कि वह कांग्रेस के ऊपर घोटालों, भ्रष्‍टाचार और काले धन के मुद्दे पर हमला न बोलें। अगर वह ऐसा करते रहेंगे तो उन्‍हें भी उनके खिलाफ कुछ करना होगा। इस बातचीत के दौरान उन्‍होंने कहा कि यह सब कुछ कांग्रेस के शीर्ष नेतृत्‍व पर किया जा रहा है।

सीबीआई ने स्वामी रामदेव से उनके गुरु स्वामी शंकर देव का कथित रूप से अपहरण किये जाने के मामले की अपनी जांच के सिलसिले में पूछताछ की है। शंकर देव छह साल पहले हरिद्वार में सुबह की सैर पर निकलने के बाद लापता हो गये थे। जांच एजेंसी ने बाबा रामदेव से पिछले हफ्ते सीबीआई मुख्यालय में पूछताछ की गयी। सूत्रों ने बताया कि उनसे फिर पूछताछ की जा सकती है।

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पूनम पाँडे लापता, ढूँढ रही है दो राज्यों की पुलिस

कन्नड़ फिल्म के जरिए डेब्यू करने वाली विवादित मॉडल पूनम पांडे दो राज्यों की पुलिस के साथ लुकाछिपी का खेल खेल रही है। मुंबई और बेंगलूरू पुलिस एक मामले में पूनम पांडे को नोटिस थमाना चाहती है लेकिन वह मिल नहीं रही है।   बेंगलूरू की एक कोर्ट में निजी शिकायत की गई थी। इस मामले पर 31 अक्टूबर को सुनवाई है। एस उमेश ने कोर्ट में शिकायत की थी कि भगवान विष्णु के चित्र के साथ पूनम पांडे ने सेमी न्यूड फोटो खिंचवाया था। इससे हिंदुओं की धार्मिक भावनाएं आहत हुई है।

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2012 में पूनम पांडे के सेमी न्यूड वाला विज्ञापन छपा था।   शिकायत के बाद पुलिस ने पूनम पांडे के खिलाफ आईपीसी की धारा 295 ए के तहत केस दर्ज किया था। कोर्ट ने 7 नवंबर 2012 और 26 फरवरी 2013 को पूनम पांडे के खिलाफ समन जारी किया। पूनम को अपनी सफाई देने के लिए कोर्ट में पेश होने को कहा गया। दोनों बार वह कोर्ट में पेश नहीं हुई।  पुलिस का कहना है कि पूनम पांडे लापता है,इसलिए वह उसे समन नहीं दे पाई है। इसी साल जून में भी पूनम के खिलाफ समन जारी किया गया। इस बार समन मुंबई के पुलिस कमिश्नर के जरिए देने को कहा गया लेकिन इस बार भी पूनम पांडे को समन नहीं मिला क्योंकि एक आईटम सॉन्ग की शूटिंग के लिए वह बेंगलूरू में है।

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नरेंद्र मोदी ने अमरीका को बताई गुजरात के विकास की कहानी

भाजपा के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार व गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी ने इमर्जिंग मार्केट फोरम के जरिये सोमवार को अमेरिका को बताया कि भारत को महज एक बाजार समझना भूल होगी। उन्होंने भारत जैसे मानव संसाधन से परिपूर्ण देशों को उभरते हुए विकास केंद्र कहा। साथ ही गुजरात के विकास की कहानी भी सुनाई। मोदी ने बताया कि पानी व बिजली के संकट से जूझ रहे गुजरात को उन्होंने कैसे एनर्जी सरप्लस व पानीदार गुजरात बनाया। उन्होंने समरसता व सुशासन को लोकतंत्र की आत्मा बताया।

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गांधीनगर स्थित मुख्यमंत्री आवास से मोदी ने वीडियो कांफ्रेंसिंग के जरिये सोमवार की शाम वाशिंगटन में "इमर्जिंग मार्केट फोरम" को संबोधित किया। "लोकतंत्र में प्रभावी शासन" विषय पर मोदी ने कहा कि जनता की सरकार के रूप में लोकतंत्र श्रेष्ठ शासन प्रणाली है। भारत जैसे विविधता भरे देश में लोकतंत्र से बेहतर दूसरी कोई शासन व्यवस्था नहीं हो सकती। परोक्ष रूप से केंद्र सरकार को नसीहत देते हुए मोदी ने कहा कि जनभागीदारी व जनविश्वास से ही इस व्यवस्था में कोई सरकार कायम रह सकती है। चुनाव जीतने के बाद सरकारों को यह नहीं मान लेना चाहिए कि उसे पांच साल का ठेका मिल गया है बल्कि उसे खुद को जनता का रखवाला व प्राकृतिक संसाधनों का ट्रस्टी समझना चाहिए। इन मुद्दों के जरिये मोदी ने केंद्र सरकार के घोटालों की ओर इशारा करने का प्रयास किया।�

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मोदी ने गुजरात विकास की कहानी बताते हुए कहा कि गति, कौशल व एक पैमाना तय करके चलने से ही बेहतर शासन दिया जा सकता है। उन्होंने सत्ता में आते ही स्मार्ट सिटी, पोर्ट सिटी व सेटेलाइट कम्युनिकेशन पर बल दिया। जनता के विश्वास व जनभागीदारी के साथ काम करते हुए उन्होंने प्राकृतिक संसाधनों का बेहतर उपयोग किया।

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बकरीद पर गायों की कुर्बानी न करें मुसलमान, देवबंद के मुफ्ती की अपील

विश्र्व प्रसिद्ध इस्लामी इदारे दारुल उलूम देवबंद के मोहतमिम (कुलपति) मुफ्ती अबुल कासिम नोमानी ने हिंदू समाज की धार्मिक भावनाओं का ख्याल रखते हुए ईद-उल-जुहा पर गाय की कुर्बानी न करने की अपील मुसलमानों से की है। 

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मोहतमिम मौलाना अबुल कासिम नोमानी ने सोमवार को जारी बयान में कहा है कि त्योहारों पर सभी लोगों को एक-दूसरे की धार्मिक भावनाओं का सम्मान करना चाहिए। ईद-उल-जुहा पर मुस्लिम समाज के लोगों को चाहिए कि वे हिंदुओं के मजहबी जज्बातों का ख्याल रखें। उन्होंने कहा कि जिन राज्यों में गाय काटने पर प्रतिबंध है, वहां के बाशिंदे कानून और संप्रदाय विशेष की आस्था व धार्मिक भावनाओं को ध्यान में रखते हुए गाय की कुर्बानी बिल्कुल न करें। 

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साथ ही उन्होंने यह भी अपील की कि ईद-उल-जुहा पर कोई भी मुसलमान ऐसा कार्य न करे, जिससे किसी अन्य धर्म के लोगों की भावनाएं आहत हों। बता दें कि इससे पूर्व दारुल उलूम देवबंद द्वारा गाय की कुर्बानी न करने के संबंध में फतवा भी जारी किया जा चुका है।

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राईट टू रिजेक्ट फैसलाः भारतीय लोकतंत्र का स्वर्णीम दिन

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<p><strong>Right to Reject</strong></p>

<p>देश की सर्वच्च न्यायालय ने एक ऐतिहासिक फैसला देकर भारतीय लोकतंत्र में नए प्राण फूंक दिए हैं।</p>

<p>पीपुल्स यूनियन फ़ॉर सिविल लिबर्टी (पीयूसीएल) की याचिका पर सुनवाई करते फैसला दिया कि राईट टू रिजेक्ट एक आम मतदाता का संवैधानिक अधिकार है।&nbsp; पीयूसीएल ने यह याचिका 2004 में दायर की थी।<br />
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फ़ैसला सुनाते हुए उन्होंने कहा कि एक जीवंत लोकतंत्र में मतदाताओं को &#39;इनमें से कोई नहीं&#39; का विकल्प चुनने का अधिकार जरूर दिया जाना चाहिए।&nbsp; इस फ़ैसले का लाभ इस साल दिसंबर में दिल्ली, मध्य प्रदेश, राजस्थान, छत्तीसगढ़ और मिजोरम में होने वाले विधानसभा चुनाव में मतदाताओं को मिलेगा।&nbsp; चुनाव में अब तक उम्मीदवारों को नकारने वाले वोटों को गिनने की कोई व्यवस्था नहीं है। इससे इसका चुनाव परिणाम पर असर भी नहीं पड़ता। सामाजिक कार्यकर्ताओं की मांग थी कि अगर किसी निर्वाचन क्षेत्र में हुए मतदान में पचास फ़ीसद से अधिक मतदाता &#39;राइट टू रिजेक्ट&#39; का इस्तेमाल करते हैं तो, वहाँ दुबारा मतदान कराया जाना चाहिए।<br />
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&nbsp;मुख्तार अब्बास नकवी नकवी का कहना है कि चुनाव सुधार समय की जरूरत है। पीयूसीएल ने अपनी याचिका में मतदाताओं को सभी उम्मीदवारों को खारिज करने का अधिकार देने की मांग की थी। चुनाव आयोग भी इस मांग का समर्थन किया था। लेकिन क्लिक करें केंद्र सरकार इसके पक्ष में नहीं थी। उसका कहना था कि चुनाव का मतलब चुनाव करना होता है, खारिज करना नहीं।<br />
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सभी उम्मीदवारों को नकारने की वर्तमान व्यवस्था में मतदाता मतदान केंद्र पर जाकर पीठासीन अधिकारी से 49 ओ नाम के एक फ़ार्म की मांग करता है और उसे भर कर वापस कर देता है। लेकिन इस तरह के फार्म की गणना नहीं होती है।&nbsp; इस फ़ैसले के बाद भाजपा नेता मुख्तार अब्बास नकवी ने एक टीवी चैनल से कहा कि चुनाव सुधार समय की जरूरत है। इसलिए सरकार की ओर इसकी ओर तत्काल ध्यान देना चाहिए।<br />
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&#39;राइट टू रिजेक्ट&#39; और &#39; राइट टू रिकॉल&#39; यानी कि जनप्रतिनिधियों को वापस बुलाने की मांग को लेकर अभियान चलाने वाले और आम आदमी पार्टी के संयोजक अरविंद केजरीवाल ने सुप्रीम कोर्ट के इस फ़ैसले का स्वागत किया। इसके साथ ही उन्होंने यह भी कहा कि इससे लोगों को बहुत अधिक उम्मीद नहीं करनी चाहिए।&nbsp; उन्होंने कहा कि यह सही मायने में तभी सार्थक होगा जब इसके आधार पर चुनाव परिणाम तय हो।सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को दिए अहम फैसले में मतदाता को राइट टू रिजेक्ट का अधिकार देने पर अपनी मुहर लगा दी। साथ ही सुप्रीम कोर्ट ने इसके तहत चुनाव आयोग को वोटिंग मशीन में इसकी व्यवस्था करने के निर्देश दिए हैं।<br />
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इस फैसले के तहत अगर चुनाव में मतदाता को कोई भी उम्मीदवार पसंद नहीं आता तो उसे वोटिंग मशीन (ईवीएम) में &#39;नन ऑफ द एबव&#39; यानी &#39;उपरोक्त में कोई नहीं&#39; के विकल्प पर मुहर लगा सकता है। मुख्य न्यायाधीश पी। सतशिवम की अध्यक्षता वाली पीठ गैर सरकारी संगठन पीयूसीएल की ओर से दाखिल लोकहित याचिका पर फैसला सुनाते हुए कहा कि यदि एक व्यक्ति को संविधान वोट डालने का अधिकार और उसको खारिज करने का अधिकार भी उसकी अभिव्यक्ति को दर्शाता है।<br />
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यह याचिका पिछले नौ सालों से सुप्रीम कोर्ट में लंबित थी और गत 29 अगस्त को कोर्ट ने सभी पक्षों की बहस सुनकर फैसला सुरक्षित रख लिया था। उम्मीदवार को नकारने के हक पर आए इस फैसले के बेहद दूरगामी परिणाम होंगे। याचिका में मांग की गई है कि वोटिंग मशीन ईवीएम में एक बटन उपलब्ध कराया जाए जिसमें कि मतदाता के पास &#39;उपरोक्त में कोई नहीं&#39; पर मुहर लगाने का अधिकार हो। अगर मतदाता को चुनाव में खड़े उम्मीदवारों में कोई भी पसंद नहीं आता तो उसके पास उन्हें नकारने और उपरोक्त में कोई नहीं चुनने का अधिकार होना चाहिए।<br />
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चुनाव आयोग ने याचिका का समर्थन किया था जबकि सरकार ने विरोध किया था। अभी मौजूदा व्यवस्था में ऐसी कोई बटन ईवीएम में नहीं है। अगर किसी मतदाता को चुनाव में खड़ा कोई भी उम्मीवार पसंद नहीं आता है और वह बिना वोट डाले वापस जाना चाहता है तो उसे यह बात निर्वाचन अधिकारी के पास रखे रजिस्टर में दर्ज करानी पड़ती है।<br />
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याचिकाकर्ता का कहना था कि रजिस्टर में दर्ज करने से बात गोपनीय नहीं रहती। मतदान को गोपनीय रखने का नियम है। ईवीएम में बटन उपलब्ध कराने से मतदाता द्वारा अभिव्यक्त की गई राय गोपनीय रहेगी।<br />
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गौरतलब है कि मतदाताओं को राइट टू रिजेक्ट दिए जाने की मांग अन्ना हजारे और अरविंद केजरीवाल करते रहे हैं। दो साल पहले अन्ना ने अनशन के दौरान भी यह मांग तेजी से रखी थी। उनका कहना था कि राइट टू रिकॉल और राइट टू रिजेक्ट जैसे अधिकारों से जनप्रतिनिधियों को सीधे तौर पर नियंत्रित किया जा सकता है।<br />
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गुजरात के मुख्यमंत्री और भाजपा की ओर से पीएम पद के उम्मीनदवार नरेंद्र मोदी भी राइट टू रिजेक्ट का समर्थन कर चुके हैं। उन्होंने हाल ही में गांधीनगर में यंग इंडिया कॉनक्लेव में कहा था कि मतदाताओं को नेताओं को खारिज करने के लिए राइट टू रिजेक्ट का अधिकार मिलना चाहिए। उन्होंने साफ कहा कि इस अधिकार के मिलने के बाद गंदी हो चुकी राजनीति में सुधार संभव है।<br />
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केंद्र सरकार भी इस प्रावधान के पक्ष में दिखती है। कानून मंत्री के तौर पर कुछ साल पहले सलमान खुर्शीद ने चुनाव सुधार के लिहाज से राइट टू रिजेक्ट दिए जाने को सही कदम बताया था। हालांकि, उन्होंने यह भी कहा था कि यह व्यवस्था पूरी तरह समस्या का समाधान नहीं कर सकती।<br />
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चुनाव आयोग भी देश की चुनाव प्रणाली से अपराधी प्रवृत्ति वाले उम्मीदवारों को दूर करने के लिए राइट टू रिजेक्ट के पक्ष में है। निर्वाचन आयुक्त एच।एस। ब्रह्मा ने हाल ही में कहा था, चुनाव आयोग राइट टू रिजेक्ट पहल का स्वागत करता है लेकिन राइट टू रिकॉल का नहीं, क्योंकि यह राजनीतिक अस्थिरता पैदा करने के साथ ही विकास की गतिविधियों को प्रभावित करेगा। उन्होंने कहा कि आयोग ने दिसम्बर 2001 में सरकार से इलेक्ट्रानिक वोटिंग मशीन (ईवीएम) में इनमें से कोई नहीं विकल्प शामिल करने का प्रस्ताव दिया था ताकि मतदाता इसका इस्तेमाल कर सकें।</p>
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