Home Blog Page 20

भारत की चिकित्सा विरासत की पड़ताल

ताड़ के पत्तों से शोध ग्रंथ तक: सीसीआरएएस-सीएसयू की पहल से दुर्लभ आयुर्वेदिक पांडुलिपियों को अनुसंधान के लिए तैयार किया गया

भारत की शास्त्रीय चिकित्सा विरासत के संरक्षण और संवर्धन की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम उठाते हुए, भारत सरकार के आयुष मंत्रालय के तहत केंद्रीय आयुर्वेदिक विज्ञान अनुसंधान परिषद (सीसीआरएएस) ने नई दिल्ली स्थित केंद्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय (सीएसयू) के सहयोग से 12 से 25 जनवरी, 2026 तक केरल के त्रिशूर स्थित सीएसयू पुरनट्टुकरा (गुरुवायूर) परिसर में आयुर्वेदिक पांडुलिपियों पर 15 दिवसीय लिप्यंतरण क्षमता निर्माण कार्यशाला का सफलतापूर्वक आयोजन किया।

दो सप्ताह के आवासीय कार्यक्रम में आयुर्वेद के 18 और संस्कृत के 15 अध्‍येताओं सहित 33 अध्‍येता एक साथ आए, जिससे पांडुलिपि अध्ययन के लिए एक अंतःविषय दृष्टिकोण को बढ़ावा मिला।

सीसीआरएएस और सीएसयू के बीच हुए समझौता ज्ञापन के तहत आयोजित यह कार्यशाला, शास्त्रीय आयुर्वेदिक पांडुलिपियों के दस्तावेजीकरण, डिजिटलीकरण और शोध-आधारित इस्‍तेमाल के लिए सीसीआरएएस की राष्ट्रीय पहल का हिस्सा थी। दो सप्ताह के इस आवासीय कार्यक्रम में आयुर्वेद के 18 और संस्कृत के 15 अध्‍येताओं सहित 33 अध्‍येताओं ने भाग लिया, जिससे पांडुलिपि के अध्ययन के लिए एक अंतःविषयक दृष्टिकोण को बढ़ावा मिला।

इस प्रशिक्षण कार्यक्रम में पांडुलिपि विज्ञान, पुरालेख विज्ञान, आयुर्वेद की तकनीकी शब्दावली और लिपि ज्ञान जैसे प्रमुख क्षेत्रों को शामिल किया गया, साथ ही ग्रंथा और वट्टेझुथु लिपियों पर विशेष लिपि परिचय सत्र भी आयोजित किए गए। ग्रंथा, मध्यकालीन मलयालम और वट्टेझुथु लिपियों में व्यावहारिक लिप्यंतरण प्रशिक्षण पर विशेष बल दिया गया, जिससे प्रतिभागियों को मूल ताड़ के पत्तों की पांडुलिपियों पर सीधे काम करने और कम समय में सत्यापन योग्य विद्वतापूर्ण परिणाम तैयार करने में मदद मिली।

कार्यशाला के एक महत्वपूर्ण विद्वतापूर्ण परिणाम के रूप में, आयुर्वेद की पांच दुर्लभ और अप्रकाशित पांडुलिपियों का सफलतापूर्वक लिप्यंतरण किया गया है और अब ये उन्नत शोध के लिए उपलब्ध हैं। इनमें 146 ताड़ के पत्तों पर लिखी धन्वंतरि (वैद्य) चिंतामणि शामिल है, जिसका ग्रंथा से संस्कृत में लिप्यंतरण किया गया है; 110 पृष्ठों की ग्रंथा पांडुलिपि द्रव्यशुद्धि, जिसका संस्कृत में लिप्यंतरण किया गया है; 59 पृष्ठों की मध्यकालीन मलयालम पांडुलिपि वैद्यम, जिसका मलयालम में लिप्यंतरण किया गया है; 75 पृष्ठों की रोग निर्णय, भाग-I, जिसका मध्यकालीन मलयालम से मलयालम में लिप्यंतरण किया गया है; और 78 ताड़ के पत्तों पर लिखी वट्टेझुथु पांडुलिपि विविधारोगंगल, जिसका मलयालम और संस्कृत दोनों में लिप्यंतरण किया गया है।

कार्यशाला के समापन समारोह को संबोधित करते हुए, सीसीआरएएस के महानिदेशक प्रोफेसर वैद्य रबीनारायण आचार्य ने कहा कि यह कार्यशाला सीसीआरएएस की आयुर्वेद पांडुलिपि के शोध की पहल के अंतर्गत केंद्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय के साथ दूसरा सहयोगात्मक कार्यक्रम था। उन्होंने बताया कि ओडिशा के सीएसयू पुरी परिसर में आयोजित पहली कार्यशाला में 14 आयुर्वेदिक पांडुलिपियों का लिप्यंतरण किया गया था, जो इस राष्ट्रीय प्रयास की निरंतरता और विस्तार को दर्शाता है।

सीएसयू गुरुवायूर परिसर के निदेशक प्रोफेसर के.के. शाइन ने प्रोफेसर के. विश्वनाथन के साथ मिलकर सीसीआरएएस के साथ भविष्य में सहयोग करने की विश्वविद्यालय की प्रतिबद्धता को दोहराया, विशेष रूप से मलयालम आयुर्वेदिक पांडुलिपियों के व्यवस्थित संरक्षण, विद्वतापूर्ण प्रसंस्करण और पुनरुद्धार के लिए, जो भारत की क्षेत्रीय चिकित्सा विरासत का एक महत्वपूर्ण घटक हैं।

कार्यक्रम का समन्वय सीएसयू के प्रोफेसर के. विश्वनाथन और सीसीआरएएस की डॉ. पार्वती जी. नायर ने किया। समापन सत्र में सीसीआरएएस-राष्ट्रीय आयुर्वेद पंचकर्म अनुसंधान संस्थान (एनएआरआईपी) के प्रभारी डॉ. वी सी दीप, वरिष्ठ अधिकारियों, शिक्षाविदों और विषय विशेषज्ञों के साथ उपस्थित थे।

इस कार्यशाला की व्यापक रूप से सराहना की गई, क्योंकि इसमें आयुर्वेद और संस्कृत के विद्वानों को शामिल करते हुए एक एकीकृत दृष्टिकोण अपनाया गया था और सीमित समय में शोध के ठोस परिणाम प्राप्त हुए थे। सीसीआरएएस ने कहा कि इस तरह की पहल से साक्ष्य-आधारित आयुर्वेद को मजबूती मिलेगी, क्षेत्रीय चिकित्सा परंपराओं का संरक्षण होगा और भारत के शास्त्रीय चिकित्सा ज्ञान के दीर्घकालिक संरक्षण में सहायता मिलेगी।

20 लाख किताबों के संग्रहकर्ता अंके गौड़ा को पद्मश्री अलंकरण

कर्नाटक के हरलहल्ली जैसे छोटे से गाँव में एक ऐसा व्यक्तित्व निवास करता है, जिसने अपने जीवन का संकल्प सिद्ध कर दिखाया है। उम्र के 75वें पड़ाव पर खड़े अंके गौड़ा ने लगभग 20 लाख किताबों का एक विलक्षण पुस्तकालय स्थापित किया है। एक बस कंडक्टर के रूप में अपने करियर की शुरुआत करने वाले अंके गौड़ा को बचपन से ही पढ़ने का गहरा अनुराग था। सीमित आय के बावजूद, उन्होंने अपनी छोटी-छोटी बचतों से पुस्तकें खरीदने का नियम बनाया, और आज वही शौक एक ऐतिहासिक उपलब्धि का रूप ले चुका है।

उन्होंने यह संग्रह केवल निजी शौक के लिए नहीं किया, बल्कि इसके द्वार समाज के प्रत्येक व्यक्ति के लिए सदैव खुले रखे हैं। यहाँ न कोई प्रवेश शुल्क है और न ही सदस्यता की अनिवार्यता—बस ज्ञान की जिज्ञासा रखने वाला कोई भी व्यक्ति यहाँ आ सकता है। आज इस पुस्तकालय की ख्याति इतनी है कि शोधकर्ता, विद्यार्थी और प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करने वाले युवाओं के साथ-साथ विदेशी विद्वान भी संदर्भ (Reference) के लिए यहाँ पहुँचते हैं।

अंके गौड़ा ने अपने जीवन के तीन दशक एक चीनी मिल में कार्य करते हुए व्यतीत किए। अपनी कमाई के एक-एक अंश को उन्होंने पुस्तकों में निवेश किया और इसे ही अपनी असली पूँजी माना। इतना ही नहीं, पुस्तकालय के निर्माण हेतु उन्होंने मुख्य मार्ग (Main Road) पर स्थित अपनी निजी भूमि तक बेच दी। उनके इस महायज्ञ में उनकी पत्नी विजया लक्ष्मी और पुत्र सागर ने भी पूर्ण सहयोग दिया। बाधाओं के बीच साकार हुआ यह स्वप्न, वास्तव में उनके अडिग संकल्प का प्रमाण है।

यह पुस्तकालय किसी अजूबे से कम नहीं है। यहाँ विभिन्न विषयों की दुर्लभ पुस्तकें, प्राचीन ग्रंथ, जर्नल और 9 लाख से अधिक शब्दकोश उपलब्ध हैं। एक छोटे से गाँव में इतनी विशाल और विविध पुस्तक-संपदा का होना चकित कर देने वाला और गौरवपूर्ण है।

साभार- https://www.facebook.com/hindipatrikamanch से

छेड़छाड़ की साजिश रचने वाली शिमाजिता मुस्तफा के मोबाईल से कई वीडियो मिले

केरल सुसाइड केस में नया मोड़, शिमजिता मुस्तफा ने रिकॉर्ड किए थे 7 वीडियो: पहले ने ही ले ली दीपक की जान… केरल में यू दीपक के आत्महत्या मामले में पुलिस ने कुन्नमंगलम कोर्ट को बताया है कि वडकारा की रहने वाली शिमजिता मुस्तफा ने निजी बस यात्रा के दौरान गोविंदापुरम निवासी दीपक के 7 वीडियो रिकॉर्ड किए थे। पुलिस के अनुसार, बाद में यही वीडियो दीपक की मौत तक पहुँचने वाली घटनाओं में अहम वजह बने। आरोपित शिमजिता मुस्तफा मुस्लिम लीग से जुड़ी हुई है।

पुलिस द्वारा दाखिल रिमांड रिपोर्ट में कहा गया है कि शिमजिता मुस्तफा को आत्महत्या के लिए उकसाने के आरोप में बुधवार (21 जनवरी 2026) को गिरफ्तार किया गया था। रिपोर्ट के मुताबिक, सोशल मीडिया पर वीडियो वायरल होने के बाद दीपक भारी मानसिक दबाव में आ गया था। पुलिस ने बताया कि वीडियो के बार-बार शेयर होने से दीपक गहरे तनाव में चले गए क्योंकि उन्हें डर था कि लोग उन्हें अपराधी के रूप में देखने लगेंगे। इसी मानसिक पीड़ा के चलते उन्होंने आत्महत्या कर ली। दीपक की मौत से पहले शिमजिता ने एक वीडियो सोशल मीडिया पर पोस्ट किया था, जिसमें उसने दावा किया था कि बस में दीपक ने उसके साथ ‘गलत व्यवहार’ किया।

पुलिस ने उस निजी बस के सीसीटीवी फुटेज की भी जाँच की जिसमें वीडियो रिकॉर्ड किए गए थे। फुटेज में साफ दिखा कि दीपक और शिमजिता अलग-अलग बस में चढ़े और यात्रा के दौरान कोई असामान्य घटना नहीं हुई। वीडियो में यह भी देखा गया कि दोनों शांतिपूर्वक बस से उतर गए। बस के चालक और कंडक्टर ने भी बताया कि यात्रा के दौरान उन्होंने किसी तरह की यौन उत्पीड़न की घटना नहीं देखी और दोनों यात्रियों के उतरने के समय भी कोई समस्या नहीं हुई।

रिमांड रिपोर्ट में यह भी बताया गया कि बस में कथित रूप से परेशान करने वाले अनुभव का दावा करने के बावजूद शिमजिता ने न तो वडकारा और न ही पय्यन्नूर पुलिस स्टेशन में कोई शिकायत दर्ज कराई। पुलिस ने कहा कि उसके मोबाइल फोन की विस्तृत फॉरेंसिक जाँच की जानी है, जिससे उसके डिलीट किए गए इंस्टाग्राम और फेसबुक अकाउंट्स को रिकवर करने में मदद मिल सकती है। जाँच एजेंसियों ने अभी तक उस समय बस में मौजूद अन्य यात्रियों के बयान दर्ज नहीं किए हैं। बस का नाम ‘अल अमीन’ बताया गया है। पुलिस का कहना है कि इन यात्रियों के बयान जाँच के लिए बेहद अहम होंगे। अरीकोड पंचायत की सदस्य रह चुकी है

शिमजिता… रिपोर्ट में यह भी उल्लेख किया गया है कि शिमजिता मुस्तफा एजुकेटेड है, उसके पास पोस्टग्रेजुएट डिग्री है और वह पहले अरीकोड पंचायत की सदस्य भी रह चुकी है। पुलिस के अनुसार, वह पूरी तरह जानती थी कि इस तरह के वीडियो सार्वजनिक करने से किसी व्यक्ति को गंभीर मानसिक नुकसान हो सकता है और वह कोई बड़ा कदम उठा सकता है। सोशल मीडिया पर साझा किया गया वीडियो तेजी से वायरल हुआ और दो दिनों के भीतर ही उसे 20 लाख से ज्यादा व्यूज मिल गए। दीपक की मौत के बाद उसकी माँ के कन्याका ने जिला पुलिस प्रमुख से शिकायत दर्ज कराई, जिसमें कहा गया कि उनके बेटे की मौत उसके खिलाफ लगाए गए झूठे आरोपों से पैदा हुई मानसिक पीड़ा के कारण हुई। पुलिस ने बताया कि पूछताछ के लिए संपर्क करने पर शिमजिता छिप गई थी और बाद में उसे एक रिश्तेदार के घर से गिरफ्तार किया गया। मामले की जाँच अभी जारी है। हालांकि मेरा मानना ये है कि दीपक को आत्महत्या नहीं करनी चाहिए थी, बल्कि उन्हें भी पुलिस कंप्लेन करनी चाहिए थी। इस तरह हारना पुरुष हो या स्त्री गलत है, यदि आपके साथ गलत हुआ है तो आपको आवाज उठाना चाहिए। उत्पीड़न शारीरिक हो या मानसिक, पुरुष के साथ हो या स्त्री के साथ, इस तरह चुप बैठ कर आत्महत्या करना कोई सॉल्यूशन नहीं।

साभार- https://x.com/Vinay__pandit_/status/2015777177158234158 से

मुम्बई में हिंदी साहित्य,सामूहिक लोकार्पण,एक अनूठी पहल!

मुझे 40 वर्ष हो गए मुंबई में रहते हुए। इन चार दशकों में मुंबई साहित्य के विभिन्न कार्यक्रमों में शिरकत की पर मन में कई बातें खटकती रही । मुख्यतः धन्नासेठों के प्रयोजन वाले बैनर! पूंजीवाद के खिलाफ़ झंडा उठाए इंकलाबी साहित्यकारों के कार्यक्रमों, लोकार्पण,सम्मान,ईनाम आदि में धन्नासेठों का झंडा क्यों लगा रहता है? फ़िर मन उचट गया और विगत 10- 15 वर्षों से किसी साहित्यिक कार्यक्रम में शिकरत नहीं की !

फ़िर इक़लाबी शायर राकेश शर्मा का फ़ोन आया और मेरी प्रकाशित किताबों का कवर फ़ोटो मांगा और कहा कि इस वर्ष प्रकाशित पुस्तकों के सामूहिक लोकार्पण का कार्यक्रम बना है आप आएं अपनी पुस्तकों के साथ । सभी साहित्यकार अपनी प्रकाशित कृतियों के साथ सहभागी हो रहे हैं। मैंने तुरंत हां कर दी ।

25 जनवरी,2026 की शाम को हिंदी साहित्य के अपने दम पर खड़े होने का सूर्योदय हुआ हालांकि कार्यक्रम शाम को था । और इस सूर्योदय के शिल्पकार हैं ‘ स्वर संगम फाउंडेशन ‘ के साथी हृदयेश मयंक,रमन मिश्रा,राकेश शर्मा जिन्होंने मीरा रोड में, विरुंगला सांस्कृतिक केंद्र के हॉल को साहित्य सृजन प्रेरणा स्थल बना दिया है।

19 साहित्यकारों की कृतियों का सामूहिक लोकार्पण हुआ । सभी ने अपनी बात रखी । लगभग चार घंटे कार्यक्रम चला और 100 के आसपास साहित्य प्रेमियों ने धैर्यपूर्वक सभी रचनाकारों को सुना ।

कार्यक्रम बिना किसी धन्नासेठ के झंडे बिना हुआ । हिंदी साहित्य को अपने पैरों पर खड़ा होते देख मन गदगद हो गया ।

साहित्यकार की रचना को पुस्तक बनाता है प्रकाशक ! इस लोकार्पण में विभिन्न प्रकाशकों द्वारा प्रकाशित पुस्तकों का लोकार्पण हुआ पर सबसे ज़्यादा पुस्तकों का प्रकाशन किया था न्यू वर्ल्ड पब्लिकेशन ने ।

सभी ने प्रकाशक की ईमानदारी,समयबद्धता की सराहना की । किसी प्रकाशक की ऐसी प्रशंसा और कर्त्तव्यपरायणता के बारे में मैंने पहले नहीं सुना था ।

न्यू वर्ल्ड प्रकाशन की संपादक आरिफ़ा एविस ने तीन साल पहले मुझे स्वयं फ़ोन करके पांडुलिपि मंगवाई । बिना पैसे लिए पुस्तक छापी हैं वो भी तीन तीन पुस्तक , दिए हुए समय पर !

न्यू वर्ल्ड प्रकाशन के मुखिया मुकेश चंद्र बहुत विनयशील और सक्षम सृजनशील प्रबंधक हैं। मुकेश चंद्र,आरिफ़ा और उनकी टीम ने विगत 4 – 5 वर्षों में सैंकड़ों पुस्तक प्रकाशित कर साहित्यकारों में हौंसला जगा प्रकाशकों के एकाधिकार को तोड़ा है। इस साहित्य साधना में उन्होंने किया पैसा कमाया पता नहीं पर शोहरत बहुत कमाई है!

इस ईमानदार छवि, कर्त्तव्यपरायणता के लिए न्यू वर्ल्ड प्रकाशन को बहुत बहुत बधाई और शुभकामनाएं!

स्वर संगम फाउंडेशन की इस अनूठी पहल ने मुंबई में हिंदी साहित्य सृजन का इतिहास रच दिया । इस इतिहास रचने के साक्षी रहे धीरेन्द्र अस्थाना,असगर वज़ाहत,प्रेम जनमेजय, गंगाराम राजी, रमन मिश्र और सभी रचनाकार और साहित्य प्रेमी !

बिहार में औपनिवेशिक शोषण का दस्तावेज है देहाती दुनिया

हिन्दू कालेज में देहाती दुनिया की शताब्दी पर संगोष्ठी का आयोजन

 

नयी दिल्ली। हिंदी नवजारण के अग्रदूत आचार्य शिवपूजन सहाय के उपन्यास देहाती दुनिया के प्रकाशन के सौ साल पर आयोजित गोष्ठी में आलोचकों और वक्ताओं ने कहा कि यह उपन्यास बिहार में औपनिवेशिक ग़रीबी जमींदारी उत्पीड़न और पुलिसिया दमन का दस्तावेज है जिसके सहारे वहाँ के समाजशास्त्रीय इतिहास को जाना जा सकता है।

 

दिल्ली विश्वविद्यालय के प्रसिद्ध हिन्दू कालेज में आयोजित इस संगोष्ठी में साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित कवयित्री अनामिका, प्रो रामेश्वर राय, रंग आलोचक रवींद्र त्रिपाठी, आलोचक ज्योतिष जोशी और शिवपूजन सहाय के परिवारी आर्किटेक्ट विजय नारायण ने उपन्यास के महत्त्व और प्रासंगकिता पर विचार व्यक्त किये। समारोह के प्रारम्भ में देशबंधु के वरिष्ठ पत्रकार अतुल सिन्हा की शिववपूजन सहाय पर बनी लघु फिल्म दिखाई गई औऱ देहाती दुनिया की शताब्दी पर एक ब्रोशर का लोकार्पण भी किया गया।

 

हिन्दू कालेज के हिंदी विभाग और स्त्री दर्पण के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित इस गोष्ठी के प्रारभ्भ में आलोचक प्रोफेसर रामेश्वर राय ने बीसवीं सदी के दूसरे एवं तीसरे दशक में भारत की चर्चा करते हुए कहा कि एक भारत नेहरू का था जिसे उन्होंने खोजा था डिस्कवरी ऑफ इंडिया में एक भारत गांधी का था जिसे उन्होंने आजादी के संघर्ष में देखा था जबकि प्रेमचन्द और शिवपूजन सहाय का भारत उनके उपन्यासों में चित्रित गांवों में था। इन सबके भारत को मिलाकर ही उस दौर के समाज को जाना जा सकता है। प्रो राय ने कहा कि मैथिली शरण गुप्त प्रसाद और दिनकर ने अपनी कविताओं में जिस भारत का चित्रण किया है उससे अलग प्रेमचन्द और शिवपूजन सहाय ने किया। देहाती दुनिया मे कुछ भी नेपथ्य में नहीं है सबकुछ प्रत्यक्ष है। उपन्यास में कुछ अनकहा भी रह जाता है पर यह उपन्यास उपन्यास के उस ढांचे में नहीं है।

 

प्रसिद्ध आलोचक रवींद्र त्रिपाठी ने कहा कि यह उपन्यास औपनिवेशिक गरीबी, जाति व्यवस्था, जमींदारी उत्पीड़न और पुलिसिया दमन का चित्रण करता है जबकि रेणु का मैला आँचल जो करीब तीस साल बाद लिखा गया वह आज़ाद भारत के गाँव की राजनीति और समाज का चित्रण करता है। त्रिपाठी ने कहा कि यह गरीबी औपनिवेशिक शोषण से उत्पन्न हुई थी जिसे शिवपूजन सहाय ने खुद देखा और भोगा था। इसके नैरेटर भी वही है। प्रेमचन्द के उपन्यास अवध के किसानों के विद्रोह के बाद लिखे गए थे जबकि देहाती दुनिया भोजपुर के किसानों की जिंदगी को आधार बनाकर लिखे गए। इसमें कई लोक कथाएं भी हैं जो मिश्रित संस्कृति और यथार्थ से जुड़ कर निर्मित हुई हैं।

 

जाने माने आलोचक ज्योतिष जोशी ने कहा कि देहाती दुनिया मे जो समस्याएं दिखाई गई हैं वे आजतक बनी हुई हैं। जमींदारी प्रथा भले ही खत्म हो गयी हो पर नवधनाढ्य वर्ग उसी तरह वर्चस्व बनाये हुए है। देहाती दुनिया का ब्रह्मपिशाच अभी भी है और जाति व्यवस्था अभी भी है। आज गाँव भले ऊपर से बदल गया हो पर सौ साल पहले गाँव की मूल समस्याएं सुलझी नहीं हैं।

 

वरिष्ठ कवयित्री अनामिका ने अध्यक्षीय उद्बोधन में गोष्ठी का समाहार करते हुए कहा कि यह उपन्यास एक अलग नैरेटिव रचता है और आज थॉमस हार्डी के उपन्यासों के वितान और हेमिंग्वे की सहज-सरल भाषा की याद दिलाता है। अनामिका ने कहा कि इसमें स्त्रियों के दमन, उत्पीड़न और प्रतिकार की भी कहांनी है। स्त्री दृष्टि से भी इस उपन्यास का अध्ययन किया जा सकता है। सुगिया और बुधिया जैसी लड़कियां इसमें हैं जो बाल विवाह और पुलिस दमन का शिकार बनती हैं।

 

आर्किटेक्ट और आचार्य सहाय के परिवारी विजय नारायण ने कहा कि वह कोई आलोचक नहीं हैं बल्कि पाठक हैं पर यह बताना चाहूँगा कि प्रेमचन्द की रंगभूमि और देहाती दुनिया दोनों की पांडुलिपियां लखनऊ के दंगे में खो गयी थी। रंगभूमि तो मिल गयी बाद में पर देहाती दुनिया नहीं मिली। इसलिए शिवपूजन सहाय ने इसे दोबारा स्मृति से लिखा जो मूल पांडुलिपि का आधा है। उन्होंने कहा कि शिवपूजन सहाय साहित्य के गांधी थे वे उसी तरह साहित्य और गाँव को देखते थे।

 

इससे पहले हिंदी विभाग के प्रभारी प्रो विमलेंदु तीर्थंकर ने स्वागत उद्बोधन दिया। विभाग के प्रो रचना सिंह, डॉ नीलम सिंह ने अतिथियों का स्वागत किया। आयोजन से पहले विभाग की भित्ति पत्रिका अभिव्यक्ति के नये अंक का विमोचन डॉ नौशाद अली के संयोजन में अतिथियों ने किया। समारोह में स्त्री दर्पण के संयोजक विमल कुमार और चौपाल के सम्पादक डॉ कामेश्वर प्रसाद सिंह सहित बड़ी संख्या में विद्यार्थी और शोधार्थी उपस्थित रहे। संयोजन हिंदी साहित्य सभा के कैलाश सिंह राजपुरोहित, दिया किल्ला और ऋतुराज ने किया। अंत में विभाग के सह आचार्य डॉ पल्लव ने आभार प्रदर्शित करते हुए कहा कि एक महान कृति की शताब्दी प्रसंग में सम्मिलित होना हम सबके लिए गौरव का क्षण है।

 

फोटो एवं रिपोर्ट

हिन्दी साहित्य सभा

हिन्दू महाविद्यालय

दिल्ली – 110007 Mob – 9868968425

hindisahityasabhahc@gmail.com,

भारत में एक नए उत्तरदायी राष्ट्र सूचकांक का निर्माण हुआ है

हिंदू सनातन संस्कृति के संस्कारों में समाज के प्रति अपने उत्तरदायित्व के निर्वहन के लिए नागरिकों को जागरूक किए जाने का प्रयास लगातार किया जाता रहा है और पश्चिमी सभ्यता के आधार पर केवल अधिकार के भाव को बढ़ावा नहीं दिया जाता है। हिंदू वेदों एवं पुराणों के अनुसार प्रत्येक राजा का यह प्रथम कर्तव्य है कि वह अपने राज्य में निवास कर रहे नागरिकों की समस्याओं को दूर करने का भरसक प्रयास करे ताकि उसके राज्य में नागरिक सुख शांति से प्रसन्नता पूर्वक निवास कर सकें। पंडित दीनदयाल उपाध्याय जी ने “एकात्म मानववाद” के सिद्धांत को विकसित किया था।

यह एक ऐसा सिद्धांत है जो व्यक्ति एवं समाज के बीच एक संतुलित सम्बंध स्थापित करने पर जोर देता है। एकात्म मानववाद का उद्देश्य प्रत्येक मानव को गरिमापूर्ण जीवन प्रदान करना है एवं अंत्योदय अर्थात समाज के निचले स्तर पर स्थित व्यक्ति के जीवन में सुधार करना है। विशेष रूप से भारत में आज के परिप्रेक्ष्य में इस सिद्धांत का आश्य यह भी है कि सरकारी योजनाओं का लाभ समाज में अंतिम छोर पर खड़े व्यक्ति तक पहुंचाने का लक्ष्य प्रत्येक राजनीतिक दल का होना चाहिए। परंतु, आज की पश्चिमी सभ्यता, जो पूंजीवाद पर आधारित नीतियों पर चलती हुई दिखाई देती है, के अनुसरण में मानव केवल अपने हितों का ध्यान रखता हुआ दिखाई देता हैं एवं अपना केवल भौतिक (आर्थिक) विकास करने हेतु प्रयासरत रहता है और उसमें अपने परिवार एवं समाज के प्रति जिम्मेदारी के भाव का पूर्णत: अभाव दिखाई देता है। अतः विश्व के समस्त देशों द्वारा अपने नागरिकों एवं समाज के प्रति उत्तरदायित्व के निर्वहन को आंकने के उद्देश्य से भारत में उत्तरदायी राष्ट्र सूचकांक का निर्माण किया गया है।

नई दिल्ली में दिनांक 20 जनवरी 2026 को उत्तरदायी राष्ट्र सूचकांक (Responsible Nations Index) का लोकार्पण किया गया। यह पहल देशों का मूल्यांकन केवल शक्ति अथवा समृद्धि से नहीं, बल्कि नागरिकों, पर्यावरण एवं वैश्विक समुदाय के प्रति उनके उत्तरदायित्व के निर्वहन के आधार पर करने का एक महत्वपूर्ण प्रयास है। 21वीं सदी के लिए यह विमर्श समयोचित और आवश्यक है।

उत्तरदायी राष्ट्र सूचकांक को पूर्व राष्ट्रपति श्री रामनाथ कोविंद ने डॉक्टर अम्बेडकर अंतरराष्ट्रीय केंद्र, नई दिल्ली में आयोजित एक भव्य कार्यक्रम में राष्ट्र को समर्पित किया। वैश्विक स्तर पर इस प्रकार का सूचकांक पहली बार बनाया गया है और इसे बनाने में भारत के ही विभिन्न संस्थानों ने अपना योगदान दिया है। इस सूचकांक के माध्यम से यह आंकने का प्रयास किया गया है कि विभिन्न देशों द्वारा अपने नागरिकों के हित में अपने अधिकारों का उत्तरदायित्वपूर्ण प्रयोग किस प्रकार किया जा रहा है (आंतरिक उत्तरदायित्व का निर्वहन), वैश्विक समुदाय के प्रति अपने उत्तरदायित्व का निर्वहन किस प्रकार किया जा रहा है (बाह्य उत्तरदायित्व का निर्वहन) एवं पर्यावरण को बचाने के लिए अपने उत्तरदायित्व का निर्वहन किस प्रकार किया जा रहा है (पर्यावरण उत्तरदायित्व का निर्वहन)। उत्तरदायी राष्ट्र सूचकांक 7 आयाम, 15 दृष्टिकोण एवं 58 संकेतकों को शामिल करते हुए निर्मित किया गया है। विश्व के 154 देशों का इस सूचकांक के आधार पर मूल्यांकन किया गया है।

सिंगापुर को इस सूचकांक की रैकिंग में प्रथम स्थान प्राप्त हुआ है, इसके बाद स्विजरलैंड द्वितीय स्थान पर, डेनमार्क तृतीय स्थान पर, साइप्रस चौथे स्थान पर रहे हैं। भारत को 16वां स्थान प्राप्त हुआ है। विश्व के शक्तिशाली देशों का स्थान उत्तरदायी राष्ट्र सूचकांक की सूची में बहुत निचले स्तर पर पाया गया है। अमेरिका 66वें स्थान पर रहा है, जो लिबिया से भी एक पायदान नीचे है। जापान 38वें स्थान पर रहा है। पाकिस्तान 90वें स्थान पर, चीन 68वें स्थान पर एवं अफगानिस्तान 145वें स्थान पर रहा है।

उत्तरदायी राष्ट्र सूचकांक का निर्माण मुख्य रूप से भारतीय प्रबंधन संस्थान (IIM), मुंबई एवं जवाहरलाल नेहरु विश्वविद्यालय, दिल्ली ने मिलकर किया है। इस सूचकांक के निर्माण में 3 वर्षों तक लगातार कार्य किया गया है एवं उत्तरदायी राष्ट्र सूचकांक के निर्माण में विश्व बुद्धिजीवी प्रतिष्ठान का भी सहयोग लिया गया है। उक्त सूचकांक के निर्माण के लिए कुल 154 देशों से विभिन्न मापदंडों पर आधारित वर्ष 2023 तक के सम्बंधित आंकडें इक्ट्ठे किये गए है एवं इन आंकड़ों एवं जानकारी का विश्लेषण करने के उपरांत इस सूचकांक का निर्माण किया गया है। यह आंकड़े एवं जानकारी विश्व बैंक, संयुक्त राष्ट्र संघ, अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष, विश्व स्वास्थ्य संगठन एवं खाद्य एवं कृषि संस्थान जैसे अंतरराष्ट्रीय संस्थानों से लिए गए है।

आज पूरे विश्व में विभिन्न देशों की आर्थिक प्रगति को सकल घरेलू उत्पाद में वृद्धि दर से आंका जाता है, यह मॉडल पूंजीवाद पर आधारित है एवं इस मॉडल के अनुसार देश में कृषि, उद्योग एवं सेवा क्षेत्रों में हुए उत्पादन को जोड़कर सकल घरेलू उत्पाद का आंकलन किया जाता है। इस मॉडल में कई प्रकार की कमियां पाई जा रही है। किसी भी देश में पनप रही आर्थिक असमानता, गरीबी रेखा से नीचे जीवन जी रहे नागरिकों की आर्थिक प्रगति, मुद्रा स्फीति, बेरोजगारी एवं वित्तीय समावेशन जैसे विषयों पर उक्त मॉडल के अंतर्गत विचार ही नहीं किया जाता है। अमेरिका सहित विश्व के कई देशों में अब यह मांग की जा रही है कि आर्थिक प्रगति को आंकने के लिए सकल घरेलू उत्पाद में वृद्धि सम्बंधी मॉडल के स्थान पर एक नए मॉडल का निर्माण किया जाना चाहिए।

भारतीय सनातन संस्कृति के अनुसार, किसी भी राष्ट्र में आर्थिक प्रगति तभी सफल मानी जाएगी जब पंक्ति में अंतिम पायदान पर खड़े नागरिक को भी समाज हित में बनाई जा रही आर्थिक नीतियों का लाभ पहुंचे। वर्तमान में, सकल घरेलू उत्पाद के अनुसार आर्थिक प्रगति आंकने के मॉडल में इस प्रकार की व्यवस्था नहीं है इसीलिए कई देशों में गरीब और अधिक गरीब हो रहे है तथा अमीर और अधिक अमीर हो रहे है। नए विकसित किए गए उत्तरदायी राष्ट्र सूचकांक में यह आंकने का प्रयास किया गया है कि शासन प्रणाली किस प्रकार से नैतिक धारणाओं को ध्यान में रखकर अपनी आर्थिक नीतियों का निर्माण कर रही है, राष्ट्र में समावेशी विकास हो रहा है अथवा नहीं एवं राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपने दायित्वों के निर्वहन के संदर्भ में सरकार द्वारा किस प्रकार की नीतियां बनाई जा रही हैं। साथ ही, धर्म आधारित सदाचार सम्बंधी भारतीय सभ्यता एवं वैश्विक सुख शांति स्थापित करने के सम्बंध में किस प्रकार देश की नीतियां निर्धारित की जा रही हैं, इस विषय को भी उत्तरदायी राष्ट्र सूचकांक के निर्माण में स्थान दिया गया है।

पश्चिमी देशों की अर्थव्यवस्थाएं आर्थिक प्रगति तो तेज गति से करती दिखाई देती हैं और कई पश्चिमी देश आज विकसित देशों की श्रेणी में शामिल भी हो गए हैं। परंतु, इन देशों में मानवतावादी दृष्टिकोण का पूर्णत: अभाव है। पूंजीवाद पर आधारित अर्थव्यवस्थाओं में केवल “मैं” के भाव को स्थान प्राप्त है। “मैं” किस प्रकार आर्थिक प्रगति करुं, इस “मैं” के भाव में परिवार एवं समाज कहीं पीछे छूट जाता है। इससे पश्चिमी देशों में सामाजिक तानाबाना पूर्णत: छिन्न भिन्न हो रहा है। युवा वर्ग अपने माना पिता की देखभाल करने के लिए तैयार ही नहीं हैं। आज अमेरिका में लगभग 6 लाख बुजुर्ग खुले आसमान के नीचे अपना जीवन यापन करने को मजबूर हैं क्योंकि उनके बच्चे उन्हें अकेला छोड़कर केवल अपना आर्थिक विकास करने में संलग्न हैं। इसी प्रकार की कई सामाजिक कुरीतियों ने पश्चिमी देशों में अपने पैर पसार लिए हैं। पश्चिमी सभ्यता के ठीक विपरीत, भारतीय संस्कृति में “मैं” के स्थान पर “हम” के भाव को प्रभावशाली स्थान प्राप्त है। भारतीय सनातन संस्कृति पर आधारित संस्कारों को ध्यान में रखकर ही विभिन्न देशों द्वारा अपने नागरिकों के प्रति उनके उत्तरदायित्व को आंकने का प्रयास उत्तरदायी राष्ट्र सूचकांक के माध्यम से किया गया है।

संक्षेप में एक बार पुनः यह बात दोहराई जा सकती है कि उत्तरदायी राष्ट्र सूचकांक विविध देशों का आंकलन पारम्परिक शक्ति अथवा सकल घरेलू उत्पाद केंद्रित मानकों के बजाय उत्तरदायी शासन के आधार पर करता है। यह सूचकांक तीन मूल आयामों पर आधारित है – (1) आंतरिक उत्तरदायित्व अर्थात गरिमा, न्याय और नागरिक कल्याण का आंकलन करता है। (2) पर्यावरणीय उत्तरदायित्व अर्थात प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण और जलवायु कार्यवाही का मूल्यांकन करता है। (3) बाह्य अत्तरदायित्व अर्थात शांति, बहुपक्षीय सहयोग और वैश्विक स्थिरता में किसी देश के योगदान को मापता है। यह सूचकांक वैश्विक आंकलन को आर्थिक एवं सैन्य शक्ति के पारम्परिक मानकों से पृथक कर नैतिक शासन, सामाजिक कल्याण, पर्यावरणीय संरक्षण और अंतरराष्ट्रीय उत्तरदायित्व पर केंद्रित करता है। यह सूचकांक मूल्य आधारित और मानव केंद्रित ढांचे को बढ़ावा देता है, जो नैतिक नेतृत्व, सतत विकास और वैश्विक शासन में सुधार सम्बंधी भारत की दृष्टि के अनुरूप है। इस प्रकार भारत ने वैश्विक स्तर पर संभवत: प्रथम सूचकांक जारी किया है। यदि वैश्विक स्तर पर कई देश इस सूचकांक के आधार पर अपने देश के नागरिकों के प्रति अपने उत्तरदायित्व के निर्वहन के आंकलन पर ध्यान देने का प्रयास करेंगे तो निश्चित ही उत्तरदायी राष्ट्र सूचकांक पूरे विश्व में एक क्रांतिकारी सूचकांक के रूप में स्थापित होगा।

 

प्रहलाद सबनानी
सेवानिवृत्त उपमहाप्रबंधक,
भारतीय स्टेट बैंक
के-8, चेतकपुरी कालोनी,
झांसी रोड, लश्कर,
ग्वालियर – 474 009
मोबाइल क्रमांक – 9987949940
ई-मेल – prahlad.sabnani@gmail.com

पत्रकार मार्क टुली में बसती थी भारतीय आत्मा

भारत की समकालीन इतिहास-यात्रा में कुछ व्यक्तित्व ऐसे होते हैं जो केवल घटनाओं का वृत्तांत नहीं लिखते, बल्कि समय की चेतना में घुल-मिलकर स्वयं इतिहास का हिस्सा बन जाते हैं। सर विलियम मार्क टुली, जिन्हें दुनिया भर में स्नेह और सम्मान से ‘मार्क टुली’ कहा गया, ऐसे ही विरल पत्रकार थे। उनका निधन केवल एक वरिष्ठ पत्रकार का जाना नहीं है, बल्कि उस पत्रकारिता-दृष्टि का अवसान है, जिसमें सत्य सनसनी से ऊपर और संवेदना आंकड़ों से अधिक महत्त्वपूर्ण होती थी। बीबीसी रेडियो की वह गूंजती हुई पंक्ति-‘दिस इज मार्क टुली रिपोर्टिंग फ्रॉम दिल्ली’, दशकों तक भारतीय उपमहाद्वीप में भरोसे, प्रामाणिकता और संतुलन का पर्याय बनी रही। मार्क टुली एक विदेशी पत्रकार भर नहीं थे, वे भारत की आत्मा के स्थायी प्रवासी थे, जिनमें भारतीयता रची-बसी थी। उनका भारत से रिश्ता किसी वीजा, नियुक्ति या करियर-रणनीति का परिणाम नहीं था, बल्कि वह रक्त और मिट्टी का संबंध था।

24 अक्टूबर 1935 को कोलकाता के टॉलीगंज में जन्मे टुली ने ब्रिटिश राज के अंतिम दौर का भारत देखा, जिया और महसूस किया। एक समृद्ध ब्रिटिश परिवार में जन्म लेने के बावजूद दार्जिलिंग के बोर्डिंग स्कूलों और भारतीय जनजीवन की विविध छवियों ने उनके भीतर एक ऐसी आत्मीयता एवं संस्कार बो दिया, जो जीवन भर पुष्पित-पल्लवित होती रही। नौ वर्ष की आयु में जब वे इंग्लैंड गए, तब भी भारत उनके भीतर जीवित रहा-स्मृतियों में, संवेदनाओं में और दृष्टि में।

कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय में धर्मशास्त्र का अध्ययन करते समय उन्होंने पादरी बनने का विचार किया था। यह तथ्य अपने-आप में बहुत कुछ कहता है, क्योंकि सत्य की खोज, नैतिक विवेक और मानवीय करुणा उनके व्यक्तित्व की मूल धुरी थीं। किंतु नियति ने उन्हें चर्च की सीमित दीवारों से बाहर निकालकर एक ऐसे मंच पर खड़ा कर दिया, जहां वे पूरी मानवता से संवाद कर सकते थे। पत्रकारिता उनके लिए पेशा नहीं, बल्कि एक नैतिक दायित्व थी। जब वे बीबीसी के संवाददाता के रूप में भारत लौटे, तो उन्होंने इसे एक असाइनमेंट नहीं बल्कि अपने घर लौटने जैसा अनुभव किया। मार्क टुली की पत्रकारिता की सबसे बड़ी विशेषता यह थी कि वे भारत को पश्चिमी चश्मे से नहीं देखते थे। वे सत्ता के गलियारों से अधिक गांव की चौपाल, मंदिर-मस्जिद के आंगन, खेतों की मेड़ और आम आदमी की चिंता को महत्त्व देते थे। आपातकाल हो या इंदिरा गांधी की राजनीति, सिख विरोधी दंगे हों या बाबरी मस्जिद विध्वंस, पंजाब का उग्रवाद हो या कश्मीर की पीड़ा-मार्क टुली ने हर विषय को संतुलन, गहराई और मानवीय संवेदना के साथ दुनिया के सामने रखा। वे घटनाओं के पीछे छिपी सामाजिक और सांस्कृतिक परतों को समझने की कोशिश करते थे, इसीलिए उनकी रिपोर्टिंग तत्कालीन शोर-शराबे से ऊपर उठकर स्थायी संदर्भ बन गई।

आज के आपाधापी और टीआरपी-केंद्रित इलेक्ट्रॉनिक मीडिया दौर में, जहाँ खबर से ज्यादा शोर और तथ्य से ज्यादा त्वरित प्रतिक्रिया को महत्व दिया जाता है, मार्क टली की पत्रकारिता एक उजली कसौटी बनकर सामने आती है। टीवी स्टूडियो की तीखी बहसों, चीखती हेडलाइनों और सतही विश्लेषण के उलट, मार्क टली ने यह सिद्ध किया कि शांत, संयमित और तथ्यपरक संवाद भी उतना ही प्रभावशाली होता है बल्कि अधिक विश्वसनीय होता है। उनकी पत्रकारिता दिल्ली के सत्ता-केंद्र तक सीमित नहीं थी, बल्कि वह भारत की आत्मा-गाँव, कस्बे, आम जन और उनकी पीड़ा से जुड़ी हुई थी। आज जब इलेक्ट्रॉनिक मीडिया अक्सर सत्ता, बाज़ार और सनसनी के दबाव में अपनी विश्वसनीयता खोता दिख रहा है, तब मार्क टली की शैली यह सिखाती है कि पत्रकारिता का असली धर्म प्रश्न पूछना, सच को धैर्य से समझना और उसे बिना शोर के, पूरे संदर्भ के साथ प्रस्तुत करना है। उनका जीवन आज के टीवी मीडिया के लिए एक मौन लेकिन सशक्त संदेश है कि भरोसे की आवाज़ ऊँची नहीं, सच्ची होती है।

मार्क टुली की सबसे बड़ी देन यह थी कि उन्होंने भारत की विविधता को उसकी कमजोरी नहीं बल्कि उसकी सबसे बड़ी शक्ति के रूप में प्रस्तुत किया। वे मानते थे कि भारत किसी एक विचार, एक भाषा या एक संस्कृति से नहीं बनता, बल्कि यहां की बहुलता ही इसकी आत्मा है। हिंदू, मुस्लिम, सिख, ईसाई-ग्रामीण-शहरी, गरीब-अमीर, इन सबके बीच बहता हुआ संवाद ही भारत की असली पहचान है। जब दुनिया के कई हिस्से भारत को केवल गरीबी, अव्यवस्था या अराजकता के चश्मे से देखते थे, तब मार्क टुली ने भारत की सहिष्णुता, आध्यात्मिकता और जीवटता को रेखांकित किया। उन्होंने यह दिखाया कि यह देश विरोधाभासों के बावजूद नहीं, बल्कि उन्हीं के साथ जीना जानता है। मार्क टुली की आवाज रेडियो के माध्यम से करोड़ों लोगों के घरों तक पहुंचती थी। वह दौर ऐसा था, जब समाचार सुनने के लिए लोग घड़ी देखकर रेडियो ऑन करते थे। उनकी रिपोर्टिंग में नाटकीयता नहीं, बल्कि सजीवता-ठहराव था। वे कहते थे कि भारत को समझने के लिए अपनी घड़ी उतारकर रखनी पड़ती है। यह कथन केवल समय-संस्कृति की बात नहीं करता, बल्कि उस धैर्य और विनम्रता की ओर संकेत करता है, जिसके बिना भारत जैसे देश को समझा नहीं जा सकता। यही धैर्य उनकी पत्रकारिता में झलकता था।

एक विदेशी होकर भी उन्होंने भारतीयता पर गर्व करना सिखाया, वह भी उस समय, जब हम स्वयं अपनी जड़ों को लेकर संशय में थे। उनकी पुस्तकों और कार्यक्रमों में भारत केवल खबर नहीं, बल्कि एक जीवंत सभ्यता के रूप में उपस्थित रहता है। ‘नो फुल स्टॉप्स इन इंडिया’ जैसी कृतियां भारत की निरंतर चलती कहानी को सामने लाती हैं, जहां कोई अंतिम विराम नहीं, केवल प्रवाह है। उन्होंने भारतीय लोकतंत्र की अव्यवस्थाओं की आलोचना भी की, लेकिन वह आलोचना स्नेह और चिंता से भरी होती थी, उपेक्षा या उपहास से नहीं। ब्रिटिश सरकार द्वारा नाइटहुड और भारत सरकार द्वारा पद्म भूषण से सम्मानित किया जाना उनके योगदान की औपचारिक स्वीकृति है, लेकिन उनकी असली विरासत वह विश्वास है, जो भारतीय जनता ने उन पर किया। लोग उनकी बात इसलिए मानते थे, क्योंकि उन्हें लगता था कि यह व्यक्ति भारत को समझता है, उसे चाहता है और उसके साथ ईमानदार है।

आज के दौर में, जब पत्रकारिता तेजी से बदल रही है, प्रतिस्पर्धा की अंधी दौड में, नई तकनीक के दबाव में हांफ रही है, तब मार्क टुली की कमी और अधिक महसूस होती है। उनका जाना उस युग का अंत है, जहां शब्दों की गरिमा थी और तथ्य पवित्र माने जाते थे। वे हमें यह सिखाकर गए कि पत्रकारिता सूचना का व्यापार नहीं, बल्कि मानवता की सेवा है। भारत की मिट्टी में जन्मा, विदेशी धरती पर शिक्षित और अंततः भारत की ही गोद में समा जाने वाला यह व्यक्तित्व सदैव स्मृतियों में जीवित रहेगा। वे ऐसे विदेशी साक्षी थे, जिन्होंने भारत को केवल दुनिया की नजरों में ही नहीं, बल्कि भारतीयों की अपनी नजरों में भी नई गरिमा दी। मार्क टुली का जीवन इस बात का प्रमाण है कि सीमाएं नागरिकता तय कर सकती हैं, संवेदनाएं नहीं। उनकी आवाज भले ही अब रेडियो पर न गूंजे, लेकिन भारत की आत्मा में उनकी प्रतिध्वनि लंबे समय तक सुनाई देती रहेगी।

प्रेषकः


(ललित गर्ग)
लेखक, पत्रकार, स्तंभकार
ई-253, सरस्वती कंुज अपार्टमेंट
25 आई. पी. एक्सटेंशन, पटपड़गंज, दिल्ली-92
फोनः 22727486, 9811051133

भारतीय नौसेना का पहला प्रशिक्षण दस्ता थाईलैंड के फुकेट डीप सी पोर्ट पर पहुंचा

भारतीय नौसेना के प्रथम प्रशिक्षण स्क्वाड्रन (1टीएस) के जहाज आईएनएस तीर, आईएनएस शार्दुल, आईएनएस सुजाता और भारतीय तटरक्षक पोत आईसीजीएस सारथी, दक्षिण-पूर्व एशिया में जारी प्रशिक्षण अभियान के तहत 25 जनवरी, 2026 को थाईलैंड के फुकेत डीप सी पोर्ट पर पहुंचे। इन जहाजों का रॉयल थाई नौसेना (आरटीएन) द्वारा आरटीएन बैंड की औपचारिक धुनों के साथ गर्मजोशी व सम्मानपूर्वक स्वागत किया गया।

यह यात्रा भारत और थाईलैंड के बीच सुदृढ़ होती समुद्री साझेदारी का प्रतीक है, जो क्षेत्रीय सुरक्षा, स्थिरता एवं आपसी विश्वास तथा समझ को सशक्त करने की साझा प्रतिबद्धता पर आधारित है। इस संदर्भ में जहाजों का बंदरगाह आगमन विशेष महत्व रखता है, क्योंकि वर्ष 2026 को आसियान–भारत समुद्री सहयोग वर्ष के रूप में मनाया जा रहा है।

बंदरगाह पर प्रवास के दौरान भारतीय नौसेना और रॉयल थाई नौसेना (आरटीएन) के कर्मी आपसी सहयोग व परिचालन तालमेल को सुदृढ़ करने के उद्देश्य से विभिन्न पेशेवर एवं प्रशिक्षण गतिविधियों में भाग लेंगे। योजनाबद्ध कार्यक्रमों में आरटीएन के वरिष्ठ नेतृत्व के साथ संवाद, कार्यात्मक आदान-प्रदान, योग सत्र, मैत्रीपूर्ण खेल प्रतियोगिताएं और पैसेज अभ्यास (पासेक्स) शामिल हैं।

भारतीय नौसेना और रॉयल थाई नौसेना के बीच घनिष्ठ, मैत्रीपूर्ण एवं निरंतर विकसित होते द्विपक्षीय संबंध हैं, जिन्हें नियमित सहयोग व संयुक्त अभ्यासों के माध्यम से निरंतर सुदृढ़ किया जा रहा है। अभ्यास-अयुत्थाया और भारत–थाईलैंड समन्वित गश्ती (कॉर्पैट) जैसी द्विपक्षीय गतिविधियां साझा समुद्री क्षेत्रों में परिचालन समन्वय को निरंतर मजबूत कर रही हैं। इसके अतिरिक्त, गत वर्ष आयोजित त्रिपक्षीय समुद्री अभ्यास सिटमैक्स ने क्षेत्रीय नौसेनाओं के बीच बढ़ी हुई आपसी सहभागिता और व्यावसायिक तालमेल को प्रदर्शित किया गया, जिसमें रॉयल थाई नौसेना भी शामिल है। भारतीय नौसेना, फरवरी 2026 में थाईलैंड से हिंद महासागर नौसेना संगोष्ठी (आईओएनएस) की अध्यक्षता ग्रहण करने के उपरांत, रॉयल थाई नौसेना द्वारा अनुकरणीय रूप से आयोजित इस मंच की समृद्ध विरासत को आगे बढ़ाने के लिए उत्सुक है।

प्रथम प्रशिक्षण स्क्वाड्रन की थाईलैंड यात्रा भारत सरकार के महासागर (क्षेत्रों में सुरक्षा एवं विकास के लिए पारस्परिक और समग्र उन्नति) दृष्टिकोण के अनुरूप है। यह क्षेत्रीय भागीदारों के साथ रचनात्मक और सार्थक जुड़ाव के प्रति भारतीय नौसेना की वचनबद्धता को रेखांकित करती है। यह तैनाती एक जिम्मेदार समुद्री भागीदार के रूप में भारत की भूमिका को पुनः स्थापित करती है और हिंद महासागर क्षेत्र में समुद्री सुरक्षा, स्थिरता एवं सहयोग को सुदृढ़ करने हेतु उसके निरंतर प्रयासों को उजागर करती है।

लाल किले में भारत पर्व के दौरान झारखंड की प्रामाणिक खुशबू का अनुभव लें

झारखंड पर्यटन के अंतर्गत आईएचएम रांची के स्टॉल में स्वदेशी और मोटे अनाज के व्यंजनों की प्रस्तुति

लाल किले में आयोजित 25 वें भारत पर्व के अवसर पर आगंतुकों को झारखंड पर्यटन के तत्वावधान में इंस्टीट्यूट ऑफ होटल मैनेजमेंट (आईएचएम) रांची के स्टॉल पर झारखंड के प्रतिष्ठित, प्रामाणिक और सदियों पुराने व्यंजनों का स्वाद चखने के लिए आमंत्रित किया गया है। आईएचएम रांची की ओर से कुशलतापूर्वक तैयार किया गया यह स्टॉल आदिवासी परंपराओं, ग्रामीण रीति-रिवाजों और टिकाऊ मोटे अनाजों के व्यंजनों में निहित भोज्य पदार्थों की राज्य की समृद्ध विरासत की पाक कला की शानदार यात्रा प्रस्तुत करता है।

प्रामाणिकता और सादगी को दर्शाने के ख्याल से डिज़ाइन किए गए इस स्टॉल में देहाती ब्लैकबोर्ड शैली में भोज्य पदार्थों की सूची प्रस्तुत की गई है जो झारखंड में भोजन की संस्कृति की जड़ों का प्रतीक है। यह दृष्टिकोण खाद्य पदार्थों की सूची के उस दर्शन से जुड़ा हुआ है—जो स्थानीय सामग्रियों, खाना पकाने की पारंपरिक विधियों और प्रत्येक व्यंजन के पीछे की सांस्कृतिक कहानियों की सराहनीय जानकारी प्रस्तुत करता है।

खाद्य पदार्थों की सूची में पूरे झारखंड में रोज़मर्रा की खान-पान की परंपराओं को दर्शाने वाले विभिन्न प्रकार के पारंपरिक और उत्सवों के लिए पकाए जाने वाले व्यंजन शामिल हैं। इनमें एक खास व्यंजन, आलू चना की सब्जी के साथ धुस्का, कुरकुरी खमीर वाली दाल-चावल रोटी है जिसे पौष्टिक आलू और छोले की करी के साथ परोसा जाता है। यह पूरे राज्य में लोकप्रिय व्यंजन है। चावल के आटे और गुड़ से बनी पारंपरिक मिठाइयां जैसे अर्शा पीठा, सदियों पुरानी उत्सवों की रेसिपी को प्रदर्शित करती हैं जबकि डंबू जैसे अल्पज्ञात स्थानीय नाश्ते के सामान आगंतुकों को झारखंड की अनूठी पाक कला का अनुभव लेने के लिए आमंत्रित करते हैं।

आईएचएम रांची के स्टॉल का मुख्य आकर्षण मोटे अनाज के व्यंजन हैं जो पोषण, दीर्घकालिक आवश्यकताओं और जलवायु-अनुकूल कृषि को बढ़ावा देने वाली राष्ट्रीय पहलों के अनुरूप हैं। रागी सेव और रागी समोसा जैसे अभिनव व्यंजन पोषक तत्वों से भरपूर रागी का उपयोग करके नाश्ते की लोकप्रिय सामग्री को नया रूप देते हैं। सब्जी के साथ चावल छिलका और सब्जी के साथ मडुआ छिलका जैसे पौष्टिक भोजन के विकल्प पारंपरिक अनाज आधारित आहार को दर्शाते हैं, जिन्हें मौसमी सब्जियों के साथ मिलाकर संतुलित और पोषणपूर्ण भोजन प्रदान किया जाता है।

वहीं, पेय पदार्थों में चावल की चाय शामिल है, जो चावल से बनी एक विशिष्ट चाय है और पारंपरिक चाय का हल्का और सुकून देने वाला विकल्प है। यह स्थानीय सामग्रियों के उपयोग और परंपरा में निहित पाक कला के नवाचार को और भी उजागर करती है। मड़ुआ कुकीज़ और मड़ुआ लड्डू जैसे आकर्षक पैकेजिंग वाले आइटम उपहार देने और ले जाने के लिए पारंपरिक स्वादों को आधुनिक सुविधा के साथ पेश करते हैं। मड़ुआ रागी रैप जैसे समकालीन उत्पाद आधुनिक रूप में स्वदेशी अनाजों को परिचित प्रारूपों के साथ मिलाकर विविध ग्राहकों को आकर्षित करते हैं।

भारत पर्व में आईएचएम रांची का यह स्टॉल सोच-समझकर तैयार किए गए मेनू के माध्यम से न केवल झारखंड की पाक कला विरासत को शानदार तरीके से प्रस्तुत करता है, बल्कि लंबे समय से चले आ रहे खान-पान के तौर-तरीकों, पोषण संबंधी जागरूकता और सांस्कृतिक गौरव को भी बढ़ावा देता है जिससे आगंतुकों को राज्य की समृद्ध और विविध खाद्य परंपराओं का प्रामाणिक स्वाद मिलता है।

कोटा पब्लिक लाइब्रेरी में गणतंत्र दिवस पर ‘न्याय, स्वतंत्रता और समानता’ विषय पर व्याख्यान

वंदे मातरम’ पुस्तक प्रदर्शनी एवं सफल प्रतियोगी युवाओं का सम्मान

कोटा। राजकीय सार्वजनिक मण्डल पुस्तकालय कोटा मे 77 वे गणतंत्र दिवस कार्यक्रम समारोहपूर्वक मनाया गया जिसमे संस्था प्रधान संभागीय पुस्तकालय अध्यक्ष डॉ दीपक कुमार श्रीवास्तव ने ध्वजारोहण किया | इस कार्यक्रम मे आमंत्रित की–नोट स्पीकर माननीय श्री धर्मराज मीना “भारत” अपर एवं सत्र न्यायाधीश कोटा ने “ न्याय , स्वतन्त्रता और समानता : संवैधानिक आदर्श ( Justice , Liberty and Equality : Constitutional Ideals ) पर व्याख्यान प्रदान किया |

 

इस कार्यक्रम मे मुख्य अतिथि डॉ आर .के.स्वामी , अध्यक्षता जे सी शर्मा रिटायर्ड प्रिंसिपल स्कूली शिक्षा, विशिष्ट अतिथि हेमराज ” हेम” वरिष्ठ साहित्यकार , तंवर सिंह ” तारज” वरिष्ठ साहित्यकार, बिगुल कुमार जैन साहब पूर्व उप मुख्य अभियंता तापीय परियोजना कोटा , नरेंद्र शर्मा अधिवक्ता, गेस्ट ऑफ ऑनर राजेंद्र कुमार जैन पूर्व डिप्टी रजिस्ट्रार राजस्थान टेक्निकल युनिवर्सिटी कोटा एवं उद्घोषक के. बी. दीक्षित साहब रहे | इस अवसर पर 2026 में ‘वंदे मातरम’ के 150 वर्ष पूरे होने के उपलक्ष्य में, पुस्तकालय की संदर्भ विभाग द्वारा द्वारा एक विशेष ‘वंदे मातरम’ पवेलियन पुस्तक प्रदर्शनी का आयोजित किया गया। यह प्रदर्शनी राष्ट्रीय गीत के गौरवशाली इतिहास, स्वतंत्रता संग्राम में इसकी भूमिका, बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय के साहित्य और देशभक्ति की भावना के मध्यानजर रखते हुये प्रदर्शित की गई | इस अवसर पर पुस्तकालय मे अध्ययन के जरिये विभिन्न प्रतियोगी परीक्षाओ मे चयनित सफल प्रतिभाओ को सम्मानित किया गया |