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भारत निम्न मध्यम आय श्रेणी से उच्च मध्यम आय श्रेणी में परिवर्तित होने की ओर अग्रसर

भारत को निम्न आय श्रेणी में से वर्ष 2007 में निम्न मध्यम आय श्रेणी में परिवर्तित होने में 60 वर्ष का समय लगा था। भारत में प्रति व्यक्ति सकल राष्ट्रीय आय (GNI) वर्ष 1962 में 90 अमेरिकी डॉलर थी जो मिश्रित वार्षिक 5.3 प्रतिशत की वृद्धि दर के साथ वर्ष 2007 में बढ़कर 910 अमेरिकी डॉलर हो गई। इसी प्रकार, भारत के सकल घरेलू उत्पाद के वर्ष 2007 में एक लाख करोड़ अमेरिकी डॉलर के स्तर को प्राप्त करने में 60 वर्ष लग गए थे। आगामी 7 वर्षों में अर्थात वर्ष 2014 में भारत में सकल घरेलू उत्पाद का आकार 2 लाख करोड़ अमेरिकी डॉलर का हो गया था। पुनः आगामी 7 वर्षों में अर्थत वर्ष 2021 में भारत में सकल घरेलू उत्पाद का आकार 3 लाख करोड़ अमेरिकी डॉलर का हो गया था। परंतु, आगामी केवल 4 वर्षों में अर्थत वर्ष 2025 में भारत में सकल घरेलू उत्पाद का आकार 4 लाख करोड़ अमेरिकी डॉलर के स्तर को पार कर गया है। एक अनुमान के अनुसार, आगामी केवल 2/3 वर्षों में भारत के सकल घरेलू उत्पाद का आकार 5 लाख करोड़ अमेरिकी डॉलर के स्तर को पार कर जाएगा।

वर्ष 2009 में भारत को प्रति व्यक्ति आय 1,000 अमेरिकी डॉलर के स्तर को प्राप्त करने में 62 वर्षों का समय लगा था। परंतु, आगामी केवल 10 वर्षों में, अर्थात वर्ष 2019 में प्रति व्यक्ति आय बढ़कर 2,000 अमेरिकी डॉलर हो गई। अब आगामी 7 वर्षों में अर्थात वर्ष 2026 में भारत में प्रति व्यक्ति आय के 3,000 अमेरिकी डॉलर के स्तर को पार करने की सम्भावना व्यक्त की जा रही है। इसके भी आगे जाकर, केवल 4 वर्ष पश्चात अर्थात वर्ष 2030 में भारत में प्रति व्यक्ति आय 4,000 अमेरिकी डॉलर हो जाने का अनुमान लगाया जा रहा है। इसी के चलते वर्ष 2030 तक भारत के निम्न मध्यम आय श्रेणी से उच्च मध्यम आय श्रेणी में परिवर्तित होने की सम्भावना व्यक्त की जा रही है। इस श्रेणी में आज चीन एवं इंडोनेशिया जैसे देश शामिल हो चुके हैं।

किसी भी देश को उच्च आय की श्रेणी में शामिल होने के लिए उस देश में प्रति व्यक्ति सकल राष्ट्रीय आय 13,926 अमेरिकी डॉलर (आज की परिभाषा के अनुसार) के स्तर पर पहुंच जानी चाहिए। इसके बाद उस देश को विकसित राष्ट्र की श्रेणी में भी शामिल कर लिया जाता है। इस दृष्टि से भारत को यदि वर्ष 2047 तक विकसित राष्ट्र बनाना है तो भारत में सकल घरेलू उत्पाद में संयुक्त रूप से 7.5 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज होना चाहिए, यह वृद्धि दर हासिल करने योग्य है क्योंकि भारत के सकल घरेलू उत्पाद में औसत संयुक्त वृद्धि दर पिछले 23 वर्षों के दौरान (वर्ष 2001 से वर्ष 2024 के बीच) 8.3 प्रतिशत प्रतिवर्ष रही है। इससे स्पष्ट है कि भारत आगामी कुछ वर्षों में ही प्रति व्यक्ति औसत आय 4,500 अमेरिकी डॉलर के स्तर को पार करते हुए उच्च मध्यम आय श्रेणी के क्लब में शामिल हो जाएगा। इसके बाद भारत को वर्ष 2047 में उच्च आय श्रेणी के क्लब में शामिल होने के लिए प्रति व्यक्ति आय को 18,000 अमेरिकी डॉलर (उस समय की परिभाषा के अनुसार) के स्तर को पार करना होगा, इसके लिए आगामी 23 वर्षों में भारत में प्रति व्यक्ति आय के स्तर में संयुक्त रूप से 8.9 प्रतिशत की वृद्धि दर की आवश्यकता होगी। यह लक्ष्य भी बहुत कठिन नहीं हैं, यदि इस संदर्भ में केंद्र एवं राज्य सरकारों द्वारा मिलकर इस प्रकार की आर्थिक नीतियां बनाई जाती हैं जिससे गरीब से गरीब नागरिक तक इन आर्थिक नीतियों के लाभ को पहुंचाया जा सकता हो ताकि इस वर्ग के नागरिकों का आर्थिक विकास भी सम्भव हो सके।

वैश्विक स्तर पर कुल 139 विकासशील एवं उभरती हुई अर्थव्यवस्थाओं में से केवल 6 देशों की अर्थव्यवस्थाएं भारत की तुलना में तेज गति से आर्थिक विकास करने में सक्षम हुई हैं। परंतु, विश्व की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्थाओं के बीच भारत की आर्थिक विकास दर आज भी सबसे अधिक बनी हुई है। दरअसल, छोटे देशों के सकल घरेलू उत्पाद का आकार तुलनात्मक रूप से बहुत छोटा होता है अतः प्रतिशत के आकलन में यह देश भारत की आर्थिक विकास की दर से कुछ आगे निकल जाते हैं परंतु जैसे जैसे सकल घरेलू उत्पाद का आकार बढ़ता जाता है वैसे वैसे इन देशों के सकल घरेलू उत्पाद में वृद्धि दर कुछ कम दिखाई देने लगती है।

विश्व बैंक द्वारा समय समय पर विश्व के समस्त देशों को इन देशों में प्रति व्यक्ति सकल राष्ट्रीय आय के स्तर के आधार पर निम्न आय, निम्न मध्यम आय, उच्च मध्यम आय एवं उच्च आय के श्रेणी में विभाजित किया जाता है। वर्ष 1990 में पूरे विश्व में प्रति व्यक्ति निम्न आय की श्रेणी में 51 देश शामिल किए गए थे, जबकि प्रति व्यक्ति निम्न मध्यम आय की श्रेणी में 56 देश शामिल थे, प्रति व्यक्ति उच्च मध्यम आय की श्रेणी में 29 देश शामिल थे एवं प्रति व्यक्ति उच्च आय की श्रेणी में 39 देश शामिल थे। विश्व बैंक द्वारा ही वर्ष 2024 में किए गए एक आंकलन के अनुसार पूरे विश्व में प्रति व्यक्ति निम्न आय की श्रेणी में देशों की संख्या घटकर 26 हो गई एवं प्रति व्यक्ति निम्न मध्यम आय की श्रेणी में देशों की संख्या में भी गिरावट दृष्टिगोचर हुई है और इस श्रेणी में देशों की संख्या घटकर 50 हो गई है। जबकि प्रति व्यक्ति उच्च मध्यम आय की श्रेणी में शामिल देशों की संख्या बढ़कर 54 हो गई है। परंतु प्रति व्यक्ति उच्च आय की श्रेणी में तो देशों की संख्या और भी तेज गति से बढ़कर 87 के स्तर पर पहुंच गई है। इस संदर्भ में 2 उदाहरण दिये जा सकते हैं कि किस प्रकार प्रति व्यक्ति उच्च आय की श्रेणी में शामिल होने वाले देशों की संख्या तेजी से बढ़ी है।

चीन, वर्ष 1990 में 330 अमेरिकी डॉलर की प्रति व्यक्ति आय के साथ निम्न आय श्रेणी के देशों में शामिल था, परंतु वर्ष 1999 में चीन में प्रति व्यक्ति आय बढ़कर 860 अमेरिकी डॉलर हो गई एवं चीन निम्न मध्यम आय श्रेणी में शामिल हो गया। आगे चलकर वर्ष 2010 में, चीन के नागरिकों की प्रति व्यक्ति आय बढ़कर 4,410 अमेरिकी डॉलर हो गई और इस प्रकार चीन उच्च मध्यम आय श्रेणी में शामिल हो गया। वर्ष 2007 में चीन में प्रति व्यक्ति आय 2,555 अमेरिकी डॉलर की रही थी, जबकि भारत में प्रति व्यक्ति आय वर्ष 2023 में 2580 अमेरिकी डॉलर के स्तर पर पहुंच सकी है। दरअसल, भारत में आर्थिक विकास की लगातार तेज गति वास्तविक रूप में वर्ष 2014 से ही प्रारम्भ हुई है। इसी प्रकार, गयाना जैसे छोटे राष्ट्र में वर्ष 1997 में प्रति व्यक्ति आय 390 अमेरिकी डॉलर की थी और गयाना निम्न आय श्रेणी में शामिल था, वर्ष 2015 में गयाना में प्रति व्यक्ति आय बढ़कर 5,530 अमेरिकी डॉलर के स्तर पर पहुंच गई और गयाना उच्च मध्यम आय की श्रेणी में शामिल हो गया। परंतु इसमें बाद वर्ष 2022 में तो गयाना में प्रति व्यक्ति आय बढ़कर 20,140 के स्तर पर पहुंच गई और आज गयाना उच्च आय श्रेमी में शामिल हो चुका है। अतः भारत को उच्च आय श्रेणी में शामिल होने के लिए अपनी आर्थिक विकास दर को और अधिक गति देनी होगी।

जैसा कि ऊपर के पैरा में वर्णन किया गया है कि स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात भारत के आर्थिक विकास पर विशेष ध्यान दिया ही नहीं गया था। सकल घरेलू उत्पाद के स्तर की दृष्टि से वर्ष 1990 में पूरे विश्व में भारत का 14वां स्थान था, जबकि वर्ष 2025 में भारत पूरे विश्व में चौथी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बन चुका है एवं शीघ्र ही आने वाले 2/3 वर्षों भारत विश्व की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बन जाएगा। इसी प्रकार भारत के सकल घरेलू उत्पाद का आकार भी वर्ष 2027/28 तक 5 लाख करोड़ अमेरिकी डॉलर के स्तर को पार कर जाएगा तथा वर्ष 2035/36 तक भारत की अर्थव्यवस्था का आकार 10 लाख करोड़ अमेरिकी डॉलर के स्तर को पार करने की सम्भावना व्यक्त की जा रही है। भारतीय नागरिकों को इस संदर्भ में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ द्वारा समाज को दिए गए पंच परिवर्तन कार्यक्रम में अपनी भागीदारी सुनिश्चित करनी होगी। पंच परिवर्तन कार्यक्रम में जिन 5 बिंदुओं को शामिल किया गया है, वह निम्नप्रकार हैं – प्रत्येक नागरिक को अपने कर्तव्यों का अनुपालन करते हुए अनुशासन में रहना, ताकि पुरे विश्व में भारत की साख को बढ़ाया जा सके।

भारत को प्रत्येक क्षेत्र में आत्म निर्भर बनाने की दृष्टि से स्वदेशी के उपयोग को बढ़ावा देना एवं अपने आप में “स्व” के भाव को विकसित करना। समाज के समस्त वर्गों को आपस में भाईचारा स्थापित करना ताकि वे भारत के विकास में शांतिपूर्वक अपना प्रबल योगदान दे सकें। भारत में पर्यावरण के क्षेत्र में कार्य करने की महती आवश्यकता है, प्रकृति का शोषण नहीं करते हुए प्रकृति का पोषण करना भी सीखें। पूरे विश्व में केवल भारत में ही बहुत बड़े स्तर पर संयुक्त परिवार व्यवस्था पाई जाती है और यह व्यवस्था केवल भारत को ही ईश्वर का वरदान माना जाता है। इस व्यवस्था को अक्षुण बनाए रखने के लिए कुटुम्ब प्रबोधन की गतिविधियों को समस्त परिवारों में बढ़ावा देना होगा। कुल मिलाकर, भारतीय समाज यदि एकजुट होकर देश को प्रत्येक क्षेत्र में आत्म निर्भर बनाना चाहता है तो यह कार्य कोई मुश्किल भी नहीं है। संघ द्वारा दिए गए उक्त वर्णित पंच परिवर्तन के कार्यक्रम को लागू कर मां भारती को पुनः विश्व गुरु के रूप में स्थापित किया जा सकता है।

प्रहलाद सबनानी
सेवानिवृत्त उपमहाप्रबंधक,
भारतीय स्टेट बैंक
के-8, चेतकपुरी कालोनी,
झांसी रोड, लश्कर,
ग्वालियर – 474 009
मोबाइल क्रमांक – 9987949940

ई-मेल – prahlad.sabnani@gmail.com

वक्फ संपत्ति को लेकर सर्वोच्च न्यायालय का बड़ा फैसला, वक्फ के कहने से संपत्ति उसकी नहीं हो जाती

सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार (28 जनवरी 2026) को वक्फ अधिनियम, 1995 के तहत सिविल कोर्ट और वक्फ ट्रिब्यूनल के अधिकार क्षेत्र को लेकर एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाया। कोर्ट ने साफ किया कि धारा 85 के बावजूद सिविल कोर्ट का अधिकार पूरी तरह और हर परिस्थिति में समाप्त नहीं होता। कोर्ट ने कहा कि वक्फ ट्रिब्यूनल का अधिकार क्षेत्र केवल उन्हीं मामलों तक सीमित है, जो कानून में स्पष्ट रूप से उसे सौंपे गए हैं।

यह फैसला जस्टिस संजय कुमार और जस्टिस के विनोद चंद्रन की पीठ ने सुनाया। कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि किसी संपत्ति के वक्फ होने या न होने का विवाद ट्रिब्यूनल केवल तभी तय कर सकता है, जब वह संपत्ति अधिनियम के तहत प्रकाशित ‘लिस्ट ऑफ औकाफ’ में शामिल हो।

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि धारा 85 में सिविल कोर्ट के अधिकार क्षेत्र पर रोक की बात जरूर कही गई है लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि हर मामले में सिविल कोर्ट स्वतः ही अधिकारहीन हो जाती है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि वक्फ अधिनियम के तहत भी सिविल कोर्ट का अधिकार पूरी तरह समाप्त नहीं किया जा सकता।

पीठ ने सीपीसी 1908 की धारा 9 का हवाला देते हुए कहा कि यदि किसी ट्रिब्यूनल को अंतिम निर्णय देने का अधिकार दिया भी गया हो, तब भी कोर्ट को यह देखना होगा कि क्या ट्रिब्यूनल वैसी राहत दे सकता है, जैसी सामान्यतः सिविल कोर्ट देती है। यदि ट्रिब्यूनल के पास वह राहत देने की शक्ति नहीं है, तो सिविल कोर्ट के अधिकार क्षेत्र को बाहर मानने का कोई आधार नहीं बनता।

धारा 83 केवल ट्रिब्यूनल गठन की व्यवस्था, व्यापक अधिकार नहीं

कोर्ट ने वक्फ अधिनियम की धारा 83 की व्याख्या करते हुए कहा कि यह कोई सर्वव्यापी अधिकार देने वाली धारा नहीं है। धारा 83 ट्रिब्यूनल को सभी वक्फ विवादों पर सामान्य अधिकार नहीं देती। यह केवल ट्रिब्यूनल के गठन की एक सक्षम व्यवस्था है।

सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि इसे इस तरह नहीं पढ़ा जा सकता कि ट्रिब्यूनल हर प्रकार के वक्फ संपत्ति विवाद, किराएदारी विवाद या कब्जा हटाने के मामलों पर स्वतः अधिकार रखता है। कोर्ट ने कहा कि किसी संपत्ति के वक्फ होने या न होने का विवाद ट्रिब्यूनल केवल उन्हीं संपत्तियों के संबंध में तय कर सकता है, जो ‘लिस्ट ऑफ औकाफ’ में दर्ज हों।

कोर्ट ने यह भी कहा कि वक्फ की परिभाषा और अधिनियम का सभी औकाफ पर लागू होना अपने आप ट्रिब्यूनल को अधिकार नहीं देता। यह विवाद एक भूमि मालिक (अपीलकर्ता) और मोहम्मद अहमद (प्रतिवादी) के बीच था। अपीलकर्ता ने बिल्डर के साथ विकास समझौते के तहत एक अपार्टमेंट कॉम्प्लेक्स बनाया था।

प्रतिवादी का दावा था कि ग्राउंड फ्लोर पर एक स्थान को मस्जिद के रूप में घेरा गया, जिसमें मालिक की भी भूमिका थी। उन्होंने कहा कि 2008 से वहाँ नमाज अदा की जा रही थी, लेकिन 2021 में प्रवेश रोका गया। प्रतिवादी ने वक्फ ट्रिब्यूनल में मुकदमा दायर कर माँग की कि मुस्लिमों को नमाज पढ़ने से न रोका जाए।

अपीलकर्ता ने तर्क दिया कि वहाँ कोई वैध मस्जिद नहीं है, स्वीकृत नक्शे में मस्जिद का कोई उल्लेख नहीं है और सबसे अहम बात यह कि संपत्ति न तो ‘लिस्ट ऑफ औकाफ’ में दर्ज है और न ही वक्फ बोर्ड में पंजीकृत, इसलिए ट्रिब्यूनल को इस मामले में अधिकार नहीं है।

शिक्षा खौफनाक नहीं, बल्कि स्नेह एवं हौसलों का माध्यम बने

जीवन को दिशा देने वाली शिक्षा यदि भय, हिंसा और दमन का पर्याय बन जाए तो वह सभ्यता की सबसे बड़ी विडंबना कही जाएगी। हाल के वर्षों में पढ़ाई के नाम पर बच्चों पर बढ़ते दबाव, घर और स्कूल में हिंसक व्यवहार तथा प्रतिस्पर्धा की अंधी दौड़ ने शिक्षा की आत्मा पर गहरा आघात किया है। फरीदाबाद की उस हृदयविदारक घटना ने, जिसमें महज गिनती न सीख पाने के कारण एक मासूम बच्ची को पिता की क्रूरता ने मौत के मुंह में धकेल दिया, पूरे समाज को कठघरे में खड़ा कर दिया है। इस तरह खौफनाक होती पढ़ाई अब केवल एक परिवार की त्रासदी नहीं, बल्कि जन-जन से जुड़ी विडम्बना बनती जा रही है। इस तथाकथित शिक्षा की विकृत मानसिकता का भयानक परिणाम है कि आज भी यह माना जाता है कि डर और मार से बच्चों को बेहतर बनाया जा सकता है। ज्ञान की इस सदी में यह सोचना ही शर्मनाक है कि पढ़ाई के नाम पर किसी बच्चे से उसका जीवन, उसका बचपन, उसका आत्मविश्वास छीना जा सकता है।

आज शिक्षा धीरे-धीरे मानवीय संवेदनाओं से कटती जा रही है। परीक्षा परिणाम, रैंक, अंक तालिका और प्रतिस्पर्धा के आंकड़े शिक्षा का चेहरा बनते जा रहे हैं। अभिभावक अपने अधूरे सपनों का बोझ बच्चों के नाजुक कंधों पर लाद देते हैं और स्कूल उन्हें प्रदर्शन की मशीन मानकर आंकने लगते हैं। परिणाम यह होता है कि बच्चा पढ़ाई को उत्सव या खोज की प्रक्रिया नहीं, बल्कि एक खौफनाक दायित्व के रूप में देखने लगता है। घर, जो सबसे सुरक्षित और स्नेहपूर्ण स्थान होना चाहिए, वहीं डर का अड्डा बन जाता है।

स्कूल, जो जिज्ञासा और रचनात्मकता को पंख देने का माध्यम होना चाहिए, वह दंड और अपमान का स्थल बन जाता है। ऐसे में मासूम मन कहां जाए, किससे अपने भय और असहायता को साझा करे। मनोविज्ञान और शिक्षा शास्त्र के तमाम अध्ययन यह स्पष्ट कर चुके हैं कि हिंसा, डांट, डर और अपमान बच्चों की सीखने की क्षमता को नष्ट करते हैं। डर के माहौल में बच्चा न तो प्रश्न पूछ पाता है, न प्रयोग कर पाता है और न ही अपनी गलतियों से सीख पाता है। उसकी स्मरण शक्ति, एकाग्रता और निर्णय क्षमता पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है। धीरे-धीरे वह हीनभावना का शिकार हो जाता है और स्वयं को अयोग्य समझने लगता है। यह कुंठा केवल बचपन तक सीमित नहीं रहती, बल्कि पूरे जीवन उसके व्यक्तित्व पर छाया की तरह मंडराती रहती है। ऐसे बच्चे बड़े होकर भी जोखिम लेने से डरते हैं, अपनी बात रखने में संकोच करते हैं और जीवन की प्रतिस्पर्धा में आत्मविश्वास के अभाव में पिछड़ जाते हैं। यह शिक्षा नहीं, बल्कि एक तरह का मानसिक शोषण है।

हमारी सबसे बड़ी भूल यह है कि हम हर बच्चे को एक ही मापदंड से आंकना चाहते हैं। जबकि सच्चाई यह है कि हर बच्चा अपने आप में विशिष्ट है। किसी की रुचि गणित में है तो किसी की कला में, कोई खेल में खिलता है तो कोई संगीत या साहित्य में। प्रकृति ने हर बच्चे को किसी न किसी विशेष क्षमता के साथ भेजा है, लेकिन हम उसे पहचानने की बजाय एक तयशुदा पाठ्यक्रम और अपेक्षाओं की बेड़ियों में जकड़ देते हैं। नई शिक्षा नीति 2020 ने बहुआयामी शिक्षा, रुचि आधारित सीख और मूल्यपरक दृष्टि की बात जरूर की है, लेकिन जमीनी स्तर पर अभी भी अंक और रैंक की मानसिकता हावी है।

कोचिंग संस्कृति, बोर्ड परीक्षाओं का भय और प्रवेश परीक्षाओं की दौड़ ने शिक्षा को और भी संकीर्ण बना दिया है। इसके साथ ही यह भी एक कटु सत्य है कि कई बच्चे जन्मजात, आनुवंशिक या परिस्थितिजन्य कारणों से सीखने में कठिनाई महसूस करते हैं। दृष्टि दोष, श्रवण समस्या, डिस्लेक्सिया, मानसिक तनाव या पारिवारिक अस्थिरता जैसी स्थितियां उनके शैक्षणिक प्रदर्शन को प्रभावित कर सकती हैं। ऐसे बच्चों को सबसे अधिक समझ, धैर्य और सहारे की आवश्यकता होती है, लेकिन दुर्भाग्य से वही बच्चे सबसे पहले डांट और दंड का शिकार बनते हैं। शिक्षक और अभिभावक उनकी समस्या को समझने की बजाय उन्हें आलसी या अयोग्य ठहरा देते हैं। यह रवैया न केवल अमानवीय है, बल्कि भविष्य की पीढ़ी के साथ अन्याय भी है।

शिक्षा का मूल उद्देश्य केवल सूचना देना नहीं, बल्कि चरित्र निर्माण करना है। यदि शिक्षा अहिंसा, करुणा, सहानुभूति और आत्मसम्मान का पाठ नहीं पढ़ाती, तो वह अधूरी है। बच्चों को सिखाने का सबसे प्रभावी माध्यम उदाहरण होता है। जब वे घर और स्कूल में संवाद, धैर्य और प्रेम देखते हैं, तभी वे भी वही मूल्य आत्मसात करते हैं। भय के वातावरण में पले बच्चे या तो दब्बू बन जाते हैं या फिर हिंसा को ही समाधान मानने लगते हैं। समाज में बढ़ती असहिष्णुता और आक्रामकता के पीछे कहीं न कहीं वही शिक्षा व्यवस्था जिम्मेदार है जो संवेदनशील मनुष्यों के बजाय केवल प्रतिस्पर्धी उपभोक्ता तैयार कर रही है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी द्वारा बार-बार परीक्षा के तनाव को कम करने और शिक्षा को जीवन से जोड़ने की अपील इस बात का संकेत है कि समस्या गंभीर है। लेकिन केवल भाषणों और नीतियों से बदलाव नहीं आएगा। असली परिवर्तन तब होगा जब अभिभावक यह समझेंगे कि उनका बच्चा उनकी प्रतिष्ठा का साधन नहीं, बल्कि एक स्वतंत्र व्यक्तित्व है। जब शिक्षक यह मानेंगे कि उनका दायित्व केवल पाठ्यक्रम पूरा करना नहीं, बल्कि बच्चों में सीखने की ललक जगाना है। जब स्कूल प्रशासन दंड की संस्कृति छोड़कर सहयोग और परामर्श की व्यवस्था विकसित करेगा। और जब समाज यह स्वीकार करेगा कि असफलता भी सीखने की प्रक्रिया का हिस्सा है, कोई अपराध नहीं।

आज जरूरत है शिक्षा को फिर से मानवीय बनाने की। ऐसी शिक्षा की, जिसमें स्नेह अनुशासन का आधार हो, संवाद दंड का विकल्प बने और विश्वास भय की जगह ले। बच्चों को यह एहसास कराया जाए कि वे जैसे हैं, वैसे ही स्वीकार्य हैं और उनकी प्रगति का रास्ता उनकी अपनी गति से तय होगा। शिक्षा को अहिंसक दृष्टि से देखना केवल नैतिक आग्रह नहीं, बल्कि व्यावहारिक आवश्यकता भी है। क्योंकि जिस समाज की शिक्षा बच्चों को तोड़ती है, वह समाज कभी मजबूत नहीं हो सकता। मासूमों को डर नहीं, हौसले का संबल चाहिए; डांट नहीं, दिशा चाहिए; और हिंसा नहीं, विश्वास चाहिए। तभी शिक्षा सचमुच जीवन देने वाली बन सकेगी, जीवन लेने वाली नहीं।

नेशनल प्रोग्रेसिव स्कूल्स कॉन्फ्रेंस (एनपीएससी) भारत के 250 से ज्यादा प्रमुख प्राइवेट सीनियर सेकेंडरी स्कूलों का एक प्रमुख एसोसिएशन है, शिक्षा की क्वालिटी को बेहतर बनाने के लिए एनसीईआरटी और एनआईईपीए जैसे सरकारी निकायों के साथ मिलकर काम करता है, जिसमें पॉलिसी सुधार, पढ़ाने-सीखने के तरीकों और सर्वांगीण विकास पर ध्यान दिया जाता है। जिसका उद्देश्य शैक्षिक पहलों, टेक्नोलॉजी के इंटीग्रेशन और मूल्य-आधारित शिक्षा के माध्यम से शिक्षा को बेहतर बनाना। इसी से जुड़ी डॉ. उषा राम भारतीय स्कूल शिक्षा क्षेत्र में एक अनुभवी शिक्षिका और लीडर हैं, इसी तरह श्रीनिवासन श्रीराम द मान स्कूल, दिल्ली के प्रिंसिपल हैं, जिनके पास रेजिडेंशियल पब्लिक स्कूल शिक्षा और आईटी एडमिनिस्ट्रेशन में 30 से ज्यादा सालों का अनुभव है। मेयो कॉलेज में कंप्यूटर साइंस के पूर्व हेड होने के नाते, वे आईसीटी इंटीग्रेशन और इक्कीसवीं सदी की लर्निंग में एक्सपर्ट हैं।

इन दोनों शिक्षाशास्त्रियों से कल ही प्लेटीनम वैली इन्टरनेशनल स्कूल में नई शिक्षा नीति-2020 को लेकर सार्थक चर्चा हुईं। सर्वसम्मति यही सामने आयी कि आज सबसे बड़ा और चिंताजनक प्रश्न यह है कि जो शिक्षा जीवन निर्माण, चरित्र गठन और मानवीय मूल्यों के संवर्धन का माध्यम होनी चाहिए थी, वही शिक्षा धीरे-धीरे विध्वंस का कारक क्यों बनती जा रही है। जब शिक्षा सही दिशा में आगे नहीं बढ़ती, जब वह अहिंसा, करुणा, सह-अस्तित्व और नैतिक विवेक से संपन्न नागरिकों का निर्माण करने में विफल रहती है, तब उससे निकलने वाली पीढ़ियां केवल व्यक्तिगत स्तर पर ही नहीं, बल्कि सामाजिक, राष्ट्रीय और वैश्विक स्तर पर भी संकट का कारण बनती हैं।

(ललित गर्ग)
ई-253, सरस्वती कंुज अपार्टमेंट
25 आई॰ पी॰ एक्सटेंशन, पटपड़गंज, दिल्ली-110092
मो. 9811051133

सुप्रीम कोर्ट ने यूजीसी के नए नियमों पर रोक लगाई, केंद्र सरकार की फजीहत

सुप्रीम कोर्ट में गुरुवार (29 जनवरी 2026) को UGC के नए नियमों के खिलाफ दायर याचिका पर सुनवाई हुई। इस दौरान सुप्रीम कोर्ट ने UGC के नए नियमों पर रोक लगा दी है। CJI सूर्यकांत ने कहा कि नए नियमों के गलत इस्तेमाल की आशंका है।

सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार से इस मामले पर जवाब माँगा है और समिति का गठन करने को कहा है। साथ ही, UGC को भी सुप्रीम कोर्ट ने नोटिस भेजा है। SC ने 19 मार्च तक जवाब देने को कहा है।

मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्य बागची की बेंच इस मामले की सुनवाई कर रही थी। बार ऐंड बेंच की रिपोर्ट के मुताबिक, कोर्ट ने कहा, “अगर हम दखल नहीं देंगे तो इसके खतरनाक नतीजे होंगे, समाज बँट जाएगा और इसका गंभीर असर होगा।”

कोर्ट ने कहा कि इन रेगुलेशंस की जाँच एक एक्सपर्ट कमेटी द्वारा की जानी चाहिए। कोर्ट ने कहा, “पहली नजर में हम कहते हैं कि रेगुलेशन की भाषा अस्पष्ट है और एक्सपर्ट्स को इसकी भाषा को देखने की जरूरत है ताकि इसका गलत इस्तेमाल न हो।”

कोर्ट ने यूजीसी और केंद्र सरकार को नोटिस जारी किया और आदेश दिया कि रेगुलेशंस को रोक दिया जाए।

माननीय न्यायालय ने कहा, “इस मामले में नोटिस जारी किया जाता है, जिसकी अगली सुनवाई 19 मार्च को होगी। सॉलिसिटर जनरल (SG) ने नोटिस स्वीकार कर लिया है। क्योंकि 2019 में दाखिल याचिका में उठाए गए मुद्दे भी इस मामले में संविधानिक वैधता की जाँच पर असर डालेंगे, इसलिए इन याचिकाओं को उसी मामले के साथ जोड़ा जाए। फिलहाल, यूजीसी नियम 2026 को अस्थाई रूप से लागू नहीं किया जाएगा।”

यूजीसी के नए नियमों को चुनौती देने वाली याचिकाकर्ताओं ने दलील दी कि नए नियम कुछ समूहों को अलग-थलग करने वाले हैं. थोड़ी देर चली सुनवाई के बाद अदालत ने कहा कि इस मुद्दे से जुड़े कुछ संवैधानिक और क़ानूनी सवालों की जांच की जानी बाकी है.

मुख्य न्यायाधीश जस्टिस सूर्यकांत ने कहा कि नए नियमों में “अस्पष्टता” है और उनका दुरुपयोग हो सकता है.

उन्होंने भारत के सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता से कहा कि वह अदालत को एक विशेषज्ञों की समिति का सुझाव दें, जो इस मुद्दे की जांच कर सके. प्रधान न्यायाधीश ने यह भी कहा कि यूजीसी को इन याचिकाओं पर अपना जवाब दाख़िल करना चाहिए.

राष्ट्रीय विज्ञान संग्रहालय परिषद ने विज्ञान प्रदर्शनी के माध्यम से दर्शकों को मंत्रमुग्ध किया

राष्ट्रीय विज्ञान संग्रहालय परिषद (एनसीएसएम) की इकाई, दिल्ली स्थित राष्ट्रीय विज्ञान केंद्र, पर्यटन मंत्रालय द्वारा 26 से 31 जनवरी, 2026 तक आयोजित गणतंत्र दिवस समारोह के हिस्से के रूप में लाल किले के मैदान में आयोजित भारत पर्व 2026 में संवादात्‍मक विज्ञान प्रदर्शनी के माध्‍यम से दर्शकों को मंत्रमुग्ध कर रहा है।
केंद्रीय मंत्रालयों के स्टॉल संख्या 9 पर आयोजित एनएससीएम प्रदर्शनी का उद्देश्य रोचक और व्यावहारिक अनुभवों के माध्यम से आम जनता के बीच विज्ञान को लोकप्रिय बनाना और वैज्ञानिक सोच को बढ़ावा देना है। आगंतुक विभिन्न प्रकार के पोर्टेबल प्रदर्शनों का अवलोकन कर रहे हैं जो आकर्षक वैज्ञानिक सिद्धांतों जैसे द्रव गतिकी, भंवर निर्माण, गुरुत्वाकर्षण केंद्र की घटनाएँ और पाइथागोरस प्रमेय का दृश्य प्रमाण प्रदर्शित करते हैं, जिससे जटिल अवधारणाएं सुलभ और मनोरंजक बन जाती हैं।

इस प्रदर्शनी में विज्ञान और आधुनिक तकनीक के मेल को दर्शाते हुए, वर्चुअल साइकिलिंग, ज़ूम टेबल और एक डिजिटल ऑर्केस्ट्रा शामिल हैं, जहाँ मोशन सेंसर की मदद से प्रतिभागी बिना किसी वाद्य यंत्र के संगीत का संचालन कर सकते हैं। इस प्रदर्शनी का प्रमुख आकर्षण एआई-संचालित डिजिटल मॉर्फिंग बूथ है, जो दर्शकों को लोकप्रिय फिल्मी किरदारों या प्रतिष्ठित वेशभूषा में बदल देता है, जिससे रोमांच और यादगार तस्वीरें लेने के अवसर मिलते हैं।

इसके अतिरिक्त, विशेषज्ञों द्वारा आयोजित लाइव विज्ञान प्रदर्शन व्याख्यान बर्नौली के सिद्धांत, जड़त्व आघूर्ण, कोणीय संवेग के संरक्षण और द्रव यांत्रिकी सहित मुख्य वैज्ञानिक अवधारणाओं को सरल बनाते हैं, जिससे आगंतुकों को अमूर्त सिद्धांतों को वास्तविक दुनिया के अनुप्रयोगों के साथ जोड़ने में मदद मिलती है।

संस्कृति मंत्रालय के अधीन कार्यरत, एनसीएसएम, देशभर में अपने 25 विज्ञान केंद्रों के नेटवर्क के साथ, इस तरह की पहुंच पहलों के माध्यम से दर्शकों के बीच जिज्ञासा, नवाचार और वैज्ञानिक जागरूकता को बढ़ावा देने की अपनी प्रतिबद्धता की पुष्टि करता है।

कवि नीरज : स्मृतियों में बसा एक उजला व्यक्तित्व

मुम्बई की सांस्कृतिक संस्था ‘बतरस’ ने हिंदी काव्य मंच के सबसे लोकप्रिय कवियों में एक गोपालदास सक्सेना नीरज पर शनिवार 10 जनवरी, 2026 को ‘शताब्दी स्मरण’ कार्यक्रम का आयोजन किया। नीरज की रचनात्मकता को जानने-समझने और फिल्म गीतकार के रूप में उनकी उपलब्धियों के आकलन के लिहाज से यह अंतस को समृद्ध कर देने वाला एक महत्वपूर्ण आयोजन रहा॰॰॰। नीरज को याद करना केवल एक कवि को याद करना नहीं, बल्कि उस युग को स्मरण करना है, जिसमें कविता जीवन का उत्सव और संघर्ष का स्वर बन जाती है।

प्रमुख वक्ता के रूप में लेखक और व्यंग्यकार वागीश सारस्वत ने कहा कि कवि नीरज को पढ़ते हुए उनके शब्दों में स्मृतियों की गरमाहट उतर आती है। उनके लिए कविता एक साधना थी। कवि-सम्मेलनों से कई बार उनका मोह-भंग हुआ, क्योंकि वे तालियों के नहीं, चेतना के कवि थे। उनका व्यक्तित्व मंच की सीमाओं से कहीं बड़ा था। बहुत कम लोग जानते हैं कि वे एक स्वतंत्रता सेनानी भी थे और अंग्रेज़ों के विरुद्ध आंदोलन करते हुए कई बार जेल भी गये थे। नीरजजी ने आंदोलन पर केवल लिखा ही नहीं, बल्कि उन्हें जीया भी। नीरज की कविताओं में श्रृंगार की मधुरता के साथ विरह की गहरी छाया भी है। शायद इसी कारण जीवन भर उनका मन कहीं न कहीं अतृप्त रहा। वे प्रेम के कवि थे, पर उनका प्रेम केवल सौंदर्य नहीं, पीड़ा और प्रतीक्षा से भी भरा था। वागीशजी के अनुसार यह एक अजीब संयोग ही था कि अलीगढ़ में सिर्फ़ चार गलियों के फ़ासले पर घर होने के बावजूद उनसे कभी मेरी भेंट न हो सकी। उन्होंने ‘धर्म समाज कॉलेज में पढ़ाया’, जहां मेरा विद्यार्थी जीवन बीता है। नीरज जी उस पीढ़ी के शिखर पुरुष थे। सातवीं कक्षा में पढ़ते हुए मामाजी के माध्यम से ‘कुरुक्षेत्र’ में उनसे मेरी भेंट हुई, तो उन्होंने मुझे गले लगा लिया, जो मुझ बालक को किसी महापुरुष द्वारा हृदय से लगा लेना लगा था। वह क्षण आज भी मेरी स्मृति में जीवंत है। नीरज जी केवल कवि नहीं थे, अपने संघर्ष, स्वाभिमान व सादगी में वे सृजन के एक जीवित मूल्य थे। उनकी स्मृति शब्दों के माध्यम से हमारे बीच जीवित है और रहेगी।

शायरा दीप्ति मिश्र ने बताया कि उनके पिता लखीमपुर में एग्जीक्यूटिव ऑफिसर के पद पर कार्यरत थे। वहां प्रतिवर्ष दशहरे के अवसर पर लगने वाले भव्य मेले में कवि-सम्मेलन भी होता था, जिसकी पूरी जिम्मेदारी पिताजी पर ही होती थी। वीरेंद्र अवस्थी, काका हाथरसी, गोपालदास नीरज जैसे बड़े कवि वहाँ आते थे। उस समय बहुत छोटी होने पर भी उन कवियों की उपस्थिति और उनके गीत अनायास ही मन को आकर्षित कर लेते थे। विशेष रूप से नीरजजी की रचनाएँ स्मृति में बस गई हैं। 1965 में आई फ़िल्म ‘नई उमर की नई फसल’ का गीत ‘कारवाँ गुजर गया’ ने मन पर गहरा प्रभाव डाला। फिर बाद के वर्षों में कई कार्यक्रमों में नीरज जी के साथ मंच साझा करते हुए लगता – जैसे किताबों से निकलकर कवि साक्षात सामने आ खड़े हुए हों। मंच पर उन्हें देखकर पहली बार यह अनुभव हुआ कि कवियों का व्यक्तित्व और कृतित्व कितना विशाल होता है। लेकिन जब उन्हें और निकट से देखा, तो कुछ भ्रांतियाँ भी टूटीं, कुछ आदर्श चरमराए, कुछ धारणाएँ बिखरीं। नीरज जी के साथ मंच साझा करना उनके लिए गर्व की बात थी, किंतु जिस आत्मीयता की अपेक्षा थी, वह नहीं बन पाई। उनसे बहुत कुछ सीखना चाहती थी, पर इसके लिए पूरा अवसर न मिल सका। उन दिनों को याद करते हुए यह प्रश्न बार-बार मन में उठता है – क्या किसी रचनाकार का व्यक्तित्व और कृतित्व कैसा होना चाहिए? निष्कर्ष स्पष्ट नहीं। कवयित्री ने नीरज की प्रसिद्ध कविता ‘कारवाँ गुजर गया’ प्रस्तुत भी की।

वरिष्ठ शायर राकेश शर्मा ने बीती यादों को खंगालते हुए बताया कि अपने आरंभिक दिनों में मथुरा के अनेक कवि-सम्मेलनों में नीरज जी को सुना था। उनकी उपस्थिति ही आयोजन की गरिमा बढ़ा देती थी। राकेशजी को यह एक विचित्र संयोग और अपना दुर्भाग्य लगता है कि उनके मुंबई आने के ठीक पहले नीरज जी मुंबई छोड़ चुके थे, जिससे वे उन्हें निकट से सुनने और समझने का अवसर खो बैठे। नीरज की भाषा और काव्य-शैली ने उन्हें गहरे प्रभावित किया। उनके लेखे नीरजजी की भाषा में शुद्ध हिंदी और गंगा-जमुनी तहज़ीब जो अद्भुत समन्वय था, जो विरले ही देखने को मिलता है। तभी तो राकेशजी अपनी ग़ज़लों पर नीरजजी के गहरे प्रभाव को खुले मन से स्वीकारते हैं।

क़वि एवं प्रकाशक रमन मिश्र ने बताया कि बचपन में ही ‘घरेलू लाइब्रेरी योजना’ के सदस्य बन गये थे, जहां नीरज जी की लगभग सभी पुस्तकें उपलब्ध थीं। तभी तो वे दसवीं कक्षा में पढ़ने तक ही नीरज जी को लगभग पूरा पढ़ चुके थे। नीरजजी को पढ़ना उनके लिए असाधारण अनुभव रहा। उनकी कविताएँ रमनजी को भीतर तक झकझोर देती थीं – “मैं विद्रोही हूँ, जग में विद्रोह कराने आया हूँ, क्रांति, क्रांति का सरल सुनहरा राग सुनाने आया हूँ” जैसी पंक्तियाँ मन में बस गई थीं, जिन्हें सुनाकर उन्होंने काव्य-पाठ की प्रतियोगिताओं में कई पुरस्कार भी जीते। रमनजी के अनुसार नीरजजी की भाषा सरल है, लेकिन उसमें गहराई बहुत है। वह लोक से जुड़ी है, फिर भी बौद्धिक गरिमा से भरपूर है। उसमें वही हिंदुस्तानी गंगा-जमुनी तहज़ीब दिखाई देती है, जिसकी कल्पना महात्मा गांधी और जवाहरलाल नेहरू ने की थी। नीरजजी के फिल्मी गीत केवल प्रेम तक सीमित नहीं रहे, बल्कि उनमें जीवन-मृत्यु, समय-नियति और मनुष्य की विवशता का गहरा दर्शन मिलता है। यही कारण है कि उनके गीत आज भी केवल सुने नहीं जाते, बल्कि महसूस किये जाते हैं। इसी सब से नीरजजी को मिश्रजी केवल कवि नहीं, संवेदनशील विचारक मानते हैं, जो शब्दों के माध्यम से मनुष्य के भीतर उतर जाते हैं।

नीरजजी को याद करते हुए शायर एवं निर्देशक कमर हाजीपुरी ने कहा – मैं नीरज जी से मिला हूँ। यह वाक्य आज भी मन में एक गहरी भावुकता भर देता है। उस दिन मैंने केवल एक कवि को नहीं जाना, बल्कि गोपालदास ‘नीरज’ नाम के मनुष्य को भी समझा। वे बहुत कम बोलने वाले, दिखावे से कोसों दूर और आत्मसंयमी व्यक्ति थे। उनके व्यक्तित्व की सादगी मन को छू गई। नीरजजी के व्यक्तित्व को समझने के लिए उनकी ये पंक्तियाँ ही पर्याप्त हैं- “ज़िंदगी की आँख में आँसू देखता रहा, हमनवा था बेवफ़ा, वह प्यार देखता रहा॰॰॰इसीलिए खड़ा-खड़ा गुबार देखता रहा।” वे केवल कवि नहीं थे, एक युग थे, जो आज भी शब्दों के माध्यम से जीवित है।

‘बतरस’ के संस्थापक प्रो. सत्यदेव त्रिपाठी ने नीरज की पंक्ति ‘जहाँ प्यार का चर्चा होगा, मेरा नाम लिया जाएगा’ की जानिब से उन्हें प्यार का अनोखा गीतकार बताते हुए उनकी लोकप्रियता की बावत कहा कि उन्होंने जनता की रुचि की कविता नहीं लिखी, बल्कि जनता को अपनी रुचि में ढाल लिया। त्रिपाठी जी ने कवि के फ़िल्म में जाने को वरदान भी बताया और अभिशाप भी, जिसके चलते वे अच्छा कवि होते हुए भी बड़ा कवि नहीं बन पाये। प्यार के सिवा नीरज जी तीसरे विश्व युद्ध से सावधान होने के साथ ही गणतंत्र के विरोधाभासों पर गहरे तंज भी किये – ‘अद्भुत इस गणतंत्र के अद्भुत हैं षडयंत्र। संत पड़े हैं जेल में, डाकू फिरें स्वतंत्र’। वक्ता ने खेद व्यक्त करते हुए कहा कि फ़िल्मों में जाना जहाँ उनकी ख्याति का सबब बना, वहीं उसने उन्हें साहित्य की मुख्य धारा से किनारे भी कर दिया!! ११वीं-१२वीं में एक कविता रख देने के सिवा शिक्षा जगत ने भी उन्हें कोई तवज्जो न दी। कवि अनिल गौड़ का आलेख प्रस्तुत किया डॉ जया दयाल ने।

गौड़जी के अनुसार नीरज जी ‘कारवां गुज़र गया’ की स्वरलहरी के साथ सामने आये। बच्चन जी की वैविध्य पूर्ण गीत रचना का उनपर गहरा प्रभाव था। उदाहरण के तौर पर बच्चन की ‘जो बीत गयी सो बात गयी’ कविता की छाया में ‘छुप छुप अश्रु बहाने वालों, मोती व्यर्थ लुटाने वालों’ गीत की रासायनिक प्रक्रिया को विश्लेषित किया जा सकता है। उनके फिल्मी गीत सहज स्वाभाविक कवि अभिव्यक्ति की अपेक्षा पात्रों और चरित्रों की काल्पनिक और संभावित अभिव्यक्ति-कौशल के प्रदर्शन हैं। ऐसे में धनार्जन की भयंकर प्रतियोगिता से बचकर कुछ ही वर्षों में नीरज जी पुनः हिंदी मंचों पर एक वरिष्ठ गीतकार के रूप में प्रतिष्ठित हो गये। हिंदी में किशोर भावुक भावनाओं को मंच पर स्वरित किया। उनकी गायन शैली विशिष्ट थी। उस शैली की एकतानता पंजाब की हीर गायन शैली के शोक व गाम्भीर्य और महाराष्ट्र की तरंगित लावनी शैली से मेल खाती है। उनके समकालीन कवियों रमानाथ अवस्थी, भारतभूषण अग्रवाल और किशन सरोज आदि का गीत-वैभव अधिक प्रफुल्ल है, लेकिन गेयता के चलते जो सफलता नीरजजी को मिली, वह अन्य के हिस्से में नहीं आई। नीरज जी ने अनेक ग़ज़लें भी लिखी हैं, जो उतनी ही अच्छी साबित हुई जैसे उनके गीत। उन्होंने दोहे भी लिखे और उनका एक प्रसिद्ध दोहा कवियों के कुंठित अहम को मरहम लगाने के कारण बहुत चर्चित हुआ – ‘आत्मा के सौंदर्य का, शब्द रूप है काव्य। मानव जीवन भाग्य है, कवि होना सौभाग्य’।।

वरिष्ठ कवि एवं मंच संचालक देवमणि पाण्डेय ने कहा कि ‘ नीरज’ की आवाज़ में जादू था। अंदाज़ में आकर्षण था। गीतों में कशिश थी। व्यक्तित्व सुदर्शन था जिन सबसे वे मंच पर छा जाते। उनकी लोकप्रियता की ख़ुशबू बॉलीवुड तक पहुंच गई और नीरजजी को अपनी गीतों का हुनर दिखाने का आमंत्रण मिला, तो नीरज यहां भी छा गये। फ़िल्म ‘नई उमर की नई फ़सल’ में उनके गीत ‘कारवाँ गुज़र गया, ग़ुबार देखते रहे’ ने धूम मचा दी। फ़िल्म ‘चंदा और बिजली’ के गीत ‘काल का पहिया घूमे भैया’ के लिए गीतकार नीरज को ‘फ़िल्म फेयर’ सम्मान से विभूषित किया गया। ‘प्रेम पुजारी’ और ‘मेरा नाम जोकर’ जैसी फ़िल्मों में कालजयी गीत लिखने वाले नीरज ने सिर्फ़ बारह साल में सिने जगत को अलविदा कह दिया।

एक मुलाक़ात में मैंने उनसे घर वापसी के बारे में पूछा, तो बोले – ‘मुंबई की ज़िंदगी में जो भागदौड़ है, वह मुझे पसंद नहीं आई। मुझे अधिक पैसा कमाने की चाह भी नहीं है। मेरा मन यायावर प्रवृत्ति का है। मैं किसी एक जगह पर अधिक दिन तक टिक नहीं सकता”। नीरजजी ने स्वयं कहा है -‘मैं अपनी कविता द्वारा मनुष्य बनकर मनुष्य तक पहुँचना चाहता हूँ। रास्ते पर कहीं मेरी कविता भटक न जाये, इसलिए उसके हाथ में मैंने प्रेम का दीपक दे दिया है। प्रेम एक ऐसी हृदय-साधना है जो निरंतर हमारी विकृतियों का शमन करती हुई हमें मनुष्यता के निकट ले जाती है – ‘नीरज से बढ़के धनी और कौन है यहाँ, उसके हृदय में पीर है सारे जहान की’।

देवमणिजी ने कहा कि नीरज के काव्य में मिलन के मधुर क्षण कम हैं, विरह की टीस और जुदाई की तड़प ज्य़ादा है। दुख और उदासी की ऐसी मार्मिक स्थितियों की अभिव्यक्ति के लिए वह जो प्रतीक चुनते हैं, वे हमेशा लौकिक जगत के ख़ूबसूरत एहसास से ताल्लुक़ रखते हैं। बच्चन की परंपरा में नीरज एकमात्र ऐसे कवि हैं, जिसमें साहित्यिक गुणवत्ता और मंचीय कौशल एक साथ मौजूद हैं। लगातार सात दशकों तक हिंदी काव्य मंच पर कामयाब पारी खेलने का कीर्तिमान सिर्फ़ नीरज के पास है। उन्होंने कहा था – ‘नासमझ आदमी की ताली कविता को बरबाद कर देती है’ और हिंदी काव्य मंच के साथ भी यही हुआ। कवि सम्मेलन घटियापन के शिकार हो गये। लेकिन अपने चाहने वालों के लिए नीरज को घटिया मंचों पर भी जाना पड़ा। मगर कभी उन्होंने घटियापन का साथ नहीं दिया। उन्होंने हमेशा अपना स्तर बनाए रखा। यह सच है कि कवि सम्मेलनों का कवि प्रसाद और निराला नहीं बन सकता, क्योंकि कवि सम्मेलनों में ‘कामायनी’ नहीं; ‘मधुशाला’ सुनी जाती है।

जिस तरह साहिर और शैलेंद्र के योगदान को महज़ फ़िल्मी गीत कहकर नकारा नहीं जा सकता, उसी तरह मंचीयता के बावजूद नीरजजी के साहित्यिक अवदान को अनदेखा नहीं किया जा सकता। इनके साहित्य में मीरा का दर्द है, सूर की प्यास है, तुलसी की विन्रमता है और कबीर का फक्कड़न भी है। नीरज ने बौद्धिकता का मायाजाल न रचकर भावनाओं की उदात्त धारा प्रवाहित की, जिसने लोगों के मन को पवित्रता, शीतलता और ताज़गी से भर दिया। डॉ॰ मधुबाला शुक्ल ने – ‘लिखि लिखि भेजत पाती’ पुस्तक से कुछ चुनिंदा पत्र पढ़े। बहुत कम लोगों को मालूम है कि किसी अनजान महिला ने नीरज जी को बड़े भावपूर्ण पत्र लिखे थे, जिन्हें क़वि ने संकलन रूप में छपा दिया है।

गायक दीपक खेर ने ‘प्रेम पुजारी’ फ़िल्म का गीत – ‘फूलों के रंग से दिल की कलम से’ एवं जया दयाल ने भी इसी फ़िल्म से ‘रंगीला रे तेरे रंग में यूं रंगी मैं’ को उसी सलीके से गाया। कवि नीरज नीर ने सुनायी – नीरजजी की गज़ल – ‘जितना कम सामान रहेगा, उतना सफर आसान रहेगा’ प्रस्तुत की।

इस कार्यक्रम का आयोजन किया था – हिंदी के सुपरिचित कवि-गीतकार रासबिहारी पांडेय ने और उन्होंने ही नीरज से संबंधित अनेक रोचक प्रसंग सुनाते-सुनाते और कवि व उसकी कविताई की कई-कई विरल ख़ासियतें बताते-बताते कार्यक्रम का मानीखेज संचालन भी किया। इस अवसर पर विशेष रूप से डॉ राजेंद्र रावत; रंगकर्मी विजय कुमार, अभिनेता प्रमोद सचान, अंबिका झा व विजय पंडित आदि साहित्य-संस्कृति कर्मी उपस्थित थे। कार्यकम का समापन राष्ट्रगान के साथ हुआ।

(लेखिका हिंदी की प्राध्यापक हैं और मुंबई की साहित्यिक गतिविधियों पर निरंतर लेखन करती है)

माखनलाल जी ने देखा था पत्रकारिता विश्वविद्यालय का सपना

पुण्यतिथि (30 जनवरी) पर विशेष

जनसंचार और पत्रकारिता की शिक्षा आज एक विशिष्ट अनुशासन बन चुकी है। देश में पत्रकारिता और जनसंचार शिक्षा पर केंद्रित चार विश्वविद्यालय कार्यरत हैं, लेकिन हमें यह जानना चाहिए कि पं. माखनलाल चतुर्वेदी ने ही सबसे पहले पत्रकारिता विद्यापीठ (विश्वविद्यालय) का सपना देखा था। उन्होंने भरतपुर(राजस्थान) में 1927 में आयोजित संपादक सम्मेलन में कहा था-“हिंदी समाचार पत्रों में कार्यालय में योग्य व्यक्तियों के प्रवेश कराने के लिए, एक पाठशाला आजकल के नए नामों की बाढ़ में से कोई शब्द चुनिए तो कहिए कि एक संपादन कला के विद्यापीठ की आवश्यक्ता है। ऐसी विद्यापीठ किसी योग्य स्थान पर बुद्धिमान, परिश्रमी, अनुभवी, संपादक-शिक्षकों द्वारा संचालित होना चाहिए। उक्त पीठ में अन्यान्य विषयों का एक प्रकांड ग्रंथ संग्रहालय होना चाहिए।” यह संयोग ही है कि उनके इस स्वप्न को 1990 में मध्यप्रदेश सरकार ने साकार करते हुए उनके नाम पर ही भोपाल में पत्रकारिता विश्वविद्यालय की स्थापना की। बाद के दिनों में रायपुर में कुशाभाऊ ठाकरे पत्रकारिता एवं जनसंचार विश्वविद्यालय और जयपुर में हरिदेव जोशी पत्रकारिता विश्वविद्यालय की स्थापना हुई। इसके साथ ही दो साल पूर्व भारतीय जन संचार संस्थान (आईआईएमसी) को भी डीम्ड यूनिवर्सिटी का दर्जा मिल चुका है। यह बात बताती है कि हमारे पुरखे किस तरह अपनी विधा को अकादमिक रुप से स्थापित होते देखना चाहते थे।

माखनलाल जी का व्यक्तित्व बहुआयामी था। वे कवि, लेखक, पत्रकार, संपादक, स्वतंत्रता सेनानी अनेक भूमिकाओं में सामने आते हैं। वे अप्रतिम वक्ता भी थे। इसलिए राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने उनके बारे में कहा-“हम सब लोग तो बात करते हैं, बोलना (भाषण) तो माखनलाल जी ही जानते हैं।” इतना ही नहीं राष्ट्रपिता ने कहा- “मैं बाबई जैसे छोटे स्थान पर इसलिए जा रहा हूं क्योंकि वह माखनलालजी का जन्मस्थान है। जिस भूमि ने माखनलालजी को जन्म दिया, उसी भूमि को मैं सम्मान देना चाहता हूं।” यह संयोग ही है कि राष्ट्रपिता महात्मा गांधी और माखनलाल जी पुण्यतिथि एक ही दिन 30 जनवरी को मनाई जाती है। चर्चित शायर श्री फिराक गोरखपुरी भी माखनलाल जी कलम के प्रशंसक थे। उनका कहना था कि-“उनके लेखों को पढ़ने से ऐसा मालूम होता था कि आदि-शक्ति शब्दों के रूप में अवतरित हो रही है या गंगा स्वर्ग से उतर रही है। यह शैली हिंदी में ही नहीं, भारत की दूसरी भाषाओं में भी विरले ही लोगों को नसीब हुई है। मुझ जैसे हजारों लोंगो ने अपनी भाषा और लिखने की कला माखनलाल जी से ही सीखी।”

पं.माखनलाल चतुर्वेदी के संपादन में निकला ‘कर्मवीर’ एक ऐसा पत्र है, जिसकी धमक हम आज भी महसूस करते हैं। हिंदी पत्रकारिता के क्षेत्र में ‘कर्मवीर’ एक ऐसा नाम है, जिसे छोड़कर भारतीय पत्रकारिता का समग्र मूल्यांकन नहीं किया जा सकता। इसी तरह उसके संपादक पं. माखनलाल चतुर्वेदी और उनकी संपूर्ण जीवनयात्रा, आत्मसमर्पण के खिलाफ लड़ने वाले संपादक की यात्रा है। वस्तुतः वे एक साथ कई मोर्चों पर लड़ रहे थे और कोई मोर्चा ऐसा न था, जहां उन्होंने अपनी छाप न छोड़ी हो। सही मायने में ‘कर्मवीर’ के संपादक ने अपने पत्र के नाम को सार्थक किया और माखनलाल जी स्वयं कर्मवीर बन गए। 4 अप्रैल, 1889 को होशंगाबाद(मप्र) के बाबई जिले में जन्में माखनलालजी ने जब पत्रकारिता शुरू की तो सारे देश में राष्ट्रीय आंदोलन का प्रभाव देखा जा रहा था। राष्ट्रीयता एवं समाज सुधार की चर्चाएं और फिरंगियों को देश बदर करने की भावनाएं बलवती थीं। इसी के साथ महात्मा गांधी जैसी तेजस्वी विभूति के आगमन ने सारे आंदोलन को एक नई ऊर्जा से भर दिया। दादा माखनलाल जी भी उन्हीं गांधी भक्तों की टोली में शामिल हो गए। गांधी के जीवन दर्शन से अनुप्राणित दादा ने रचना और कर्म के स्तर पर जिस तेजी के साथ राष्ट्रीय आंदोलन को ऊर्जा एवं गति दी वह महत्व का विषय है।

इस दौर की पत्रकारिता भी कमोबेश गांधी के विचारों से खासी प्रभावित थी। हिंदी पत्रकारिता का वह जमाना ही अजीब था। आम कहावत थी – “जब तोप मुकाबिल हो तो अखबार निकालो।” और सच में अखबार की ताकत का अहसास आजादी के दीवानों को हो गया था। इसी के चलते स्वतंत्रता आंदोलन से जुड़े नेताओं ने अपने पत्र निकाले। जिनके माध्यम से ऐसी जनचेतना पैदा की कि भारत आजादी की सांस ले सका। वस्तुतः इस दौर में अखबारों का इस्तेमाल एक अस्त्र के रूप में हो रहा था।

माखनलाल जी ने 1913 में ‘प्रभा’ नाम की एक उच्चकोटि की पत्रिका के माध्यम से साहित्यिक पत्रकारिता में भी सार्थक हस्तक्षेप किया। लोगों को झकझोरने एवं जगानेवाली रचनाओं के प्रकाशन के माध्यम से ‘प्रभा’ हिंदी जगत का एक जरूरी नाम बन गयी। दादा की 56 सालों की ओजपूर्ण पत्रकारिता की यात्रा में प्रताप, प्रभा व कर्मवीर उनके विभिन्न पड़ाव रहे। साथ ही उनकी राजनीतिक वरीयता भी बहुत उंची थी। वे बड़े कवि थे, पत्रकार थे पर उनके इन रूपों पर राजनीति कभी हावी न हो पायी। इतना ही नहीं जब प्राथमिकताओं की बात आयी तो मप्र कांग्रेस का वरिष्टतम नेता होने के बावजूद उन्होंने सत्ता में पद लेने के बजाए मां सरस्वती की साधना को ही प्राथमिकता दी। आजादी के बाद 30 अप्रैल, 1968 तक वे जीवित रहे पर सत्ता का लोभ उन्हें स्पर्श भी नहीं कर पाया। इतना ही नहीं 1967 में भारतीय संसद द्वारा राजभाषा विधेयक पारित होने के बाद उन्होंने राष्ट्रपति को वह पद्मभूषण का अलंकरण भी लौटा दिया जो उन्हें 1963 में दिया गया था। वे समझौतों के खिलाफ लोगों में चेतना जगाते रहे। उन्होंने लिखा है-
अमर राष्ट्र, उदंड राष्ट्र, उन्मुक्त राष्ट्र, यह मेरी बोली
यह सुधार-समझौतों वाली मुझको भाती नहीं ठिठोली।

‘कर्मवीर’ के संपादक कैसे संपादक थे, इसे बताने के लिए उन्होंने कहा कि – “हम फक्कड़ सपनों के स्वर्गों को लुटाने निकले हैं। किसी की फरमाइश पर जूते बनानेवाले चर्मकार नहीं हैं हम ।” यह निर्भीकता ही उनकी पत्रकारिता की भावभूमि का निर्माण करती थी। स्वाधीनता आंदोलन की आँच को तेज करने में उनका कर्मवीर अग्रणी बना। कम ही लोग जानते होंगें कि दादा को इसकी कितनी बड़ी कीमत चुकानी पड़ी। उनके संपादकीय कार्यालय यानी घर पर तिरसठ बार छापे पड़े, तलाशियां हुयीं। 12 बार वे जेल गए। कर्मवीर को अर्थाभाव में कई बार बंद होना पड़ा। लेखक से लेकर प्रूफ रीडर तक सबका कार्य वे स्वयं कर लेते थे। पत्रकारिता उनके लिए राष्ट्रसेवा और समाज के जागरण का ही एक माध्यम थी। भरतपुर के संपादक सम्मेलन में वे पत्रकारिता जगत का आह्वान करते हुए कहते हैं-“यदि समाचार पत्र संसार की एक बड़ी ताकत है तो उसके सिर जोखिम भी कम नहीं है। पर्वत की जो शिखरें हिम से चमकती हैं और राष्ट्रीय रक्षा की महान दीवार बनती हैं, उन्हें ऊंची होना पड़ता है। जगत में समाचार पत्र यदि बड़प्पन पाए हुए हैं, तो उनकी जिम्मेदारी भी भारी है।बिना जिम्मेदारी के बड़प्पन का मूल्य ही क्या है? ”

(लेखक माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय, भोपाल में जनसंचार विभाग के अध्यक्ष हैं।)

उज्जैन के प्रख्यात आध्यात्मिक गुरु श्री प्रमोद कुमार शर्मा को डी.लिट प्रदान की

पुणे। पुणे के अजिंक्य डी. वाय. पाटिल विश्वविद्यालय के दसवें दीक्षांत समारोह के अवसर पर उज्जैन के प्रख्यात आध्यात्मिक मार्गदर्शक गुरुजी श्री प्रमोद कुमार शर्मा को प्रतिष्ठित डॉक्टरेट ऑफ लिटरेचर (डी.लिट.) – डी.लिट. (ऑनोरिस कॉज़ा) से सम्मानित किया गया। यह सम्मान उन्हें उनकी आध्यात्मिक साधना, मार्गदर्शन और निःस्वार्थ सेवाओं के लिए प्रदान किया गया, जो वे अपनी दृष्टि-शक्ति और दिव्य अंतर्दृष्टि के माध्यम से निरंतर देते आ रहे हैं। उनके मार्गदर्शन से अनेक वैज्ञानिकों, चिकित्सा विशेषज्ञों और शोधकर्ताओं को अपने-अपने क्षेत्रों में श्रेष्ठ मार्ग चुनने और बेहतर परिणाम प्राप्त करने में सहायता मिली है। वे जरूरतमंद और वंचित वर्गों की समय पर आर्थिक व अन्य प्रकार की सहायता के लिए भी व्यापक रूप से जाने जाते हैं।

दीक्षांत समारोह के दौरान जीवन के विभिन्न क्षेत्रों में उत्कृष्ट योगदान, उपलब्धियों और समाजसेवा के लिए अन्य विशिष्ट व्यक्तित्वों को भी मानद उपाधियों से सम्मानित किया गया।

अन्य सम्मानित व्यक्तित्वों में शामिल थे: श्रीमती पंकजा गोपीनाथ मुंडे, प्रसिद्ध जननेता, भारत सरकार की पूर्व कैबिनेट मंत्री एवं महाराष्ट्र की पूर्व उपमुख्यमंत्री, जिन्हें कृषि एवं पशुपालन के क्षेत्र में उनके योगदान के लिए सम्मानित किया गया। अपने धन्यवाद भाषण में उन्होंने विद्यार्थियों को जोखिम लेने और असफलताओं से न डरने की प्रेरणा दी, यह कहते हुए कि सफलता और असफलता जीवन के अभिन्न अंग हैं और दोनों को समान भाव से स्वीकार करना चाहिए।

श्री रोहित शर्मा, विश्व कप विजेता भारतीय क्रिकेट टीम के कप्तान, जिन्हें क्रिकेट के क्षेत्र में उनके योगदान के लिए सम्मानित किया गया। उन्होंने विद्यार्थियों को अनुशासित और परिश्रमी बनने का संदेश दिया, यह बताते हुए कि ये दोनों सिद्धांत शिक्षा और खेल, दोनों में समान रूप से लागू होते हैं।

श्री मनोज पोचाट, गोल्डियम इंटरनेशनल लिमिटेड के एग्जीक्यूटिव चेयरमैन, जो देश में बड़े पैमाने पर रोजगार सृजन के मिशन पर कार्य कर रहे हैं।

श्री सुधेश अग्रवाल, गुरुग्राम में 5 अरब रुपये के निवेश से विकसित हो रहे सनातन धर्म सिटी के संस्थापक।

डॉ. निशिकांत ओझा, भारत सरकार के एकीकृत रक्षा स्टाफ के चीफ एडवाइज़र–स्ट्रैटेजिक अफेयर्स एवं स्टडी ग्रुप के चेयरमैन। अपने प्रभावशाली संबोधन में उन्होंने विद्यार्थियों को चेतावनी दी कि डिग्री को यात्रा का अंत न मानें, बल्कि इसे उस कठोर प्रतिस्पर्धात्मक दुनिया में प्रवेश का नया चरण समझें, जहां यदि आप चूक गए तो कोई और अवसर छीन लेगा।
श्री रशीस भंडारी, हीरा निर्यात के प्रतिष्ठित व्यवसायी और नवीन तकनीक से मानव-निर्मित हीरों की निर्माण इकाई स्थापित करने वाले अग्रणी उद्यमी।

समारोह के मुख्य अतिथि गुयाना सहकारी गणराज्य के उच्चायुक्त महामहिम धीरजकुमार सीरज थे। कार्यक्रम की अध्यक्षता विश्वविद्यालय के चांसलर डॉ. अजींक्य डी. वाय. पाटिल ने की तथा मंच पर श्रीमती पूजा ए. पाटिल की गरिमामयी उपस्थिति रही।

सभी सम्मानित अतिथियों ने चांसलर और अजिंक्य डी. वाय. पाटिल विश्वविद्यालय की टीम को ऐसी संस्था स्थापित करने के लिए धन्यवाद दिया, जिसका उद्देश्य छात्रों को प्रतिस्पर्धात्मक दुनिया का सामना करने योग्य बनाना है। उन्होंने विद्यार्थियों को नवोन्मेषी और परिश्रमी बनने के साथ-साथ मानवता की सेवा के लिए भी सदैव तत्पर रहने की प्रेरणा दी।

मुख्य अतिथि महामहिम श्री सीरज ने अपने संबोधन में अपने देश गुयाना की विशेषताओं पर प्रकाश डाला और भारतीयों को निवेश एवं पर्यटन दोनों उद्देश्यों से वहां आने का आमंत्रण दिया।
चांसलर डॉ. अजींक्य डी. वाय. पाटिल ने अपने वक्तव्य में विश्वविद्यालय की उस दूरदृष्टि को पुनः रेखांकित किया, जिसके अंतर्गत छात्रों को यह समझाया जाता है कि डिग्री प्राप्त करने के साथ-साथ उन्हें देश को एक वैश्विक शक्ति बनाने में भी योगदान देना है। उन्होंने बताया कि विश्वविद्यालय व्यावहारिक शिक्षा के लिए नवीनतम तकनीकों और उपकरणों को लाने की व्यापक योजना बना रहा है।

कुलपति डॉ. राकेश कुमार जैन ने कहा कि नवाचार विश्वविद्यालय की पहचान का अभिन्न हिस्सा है और यहां छात्रों को स्वतंत्र रूप से सोचने तथा नए विचार सृजित करने के लिए प्रोत्साहित किया जाता है।

इस भव्य दीक्षांत समारोह का संचालन प्रसिद्ध अभिनेत्री सुश्री विद्या मालवड़े, जो फिल्म चक दे इंडिया में अपनी भूमिका के लिए जानी जाती हैं, द्वारा किया गया।

हाथ में सत्ता है राजन ! पूर्व को पश्चिम बताओ !

सूर्य पर चादर चढ़ाओ, जुगनुओं के गीत गाओ
हाथ में सत्ता है राजन ! पूर्व को पश्चिम बताओ !
मदमस्त हाथी अंकुशों से क्या कभी डरता मिला है ?
धृतराष्ट्र के चौपट महल में न्याय का पंखा झिला है ?
सागरों पर बाँध डालो, रेत के टीले बनाओ
हाथ में सत्ता है राजन ! पूर्व को पश्चिम बताओ !
प्रत्येक सुंदर पुष्प को अपराध का युगबोध देना
आरक्षितों की आड़ में संरक्षितो के प्राण लेना
नागफनी से घर सजाओ, तुलसियों को काट खाओ
हाथ में सत्ता है राजन ! पूर्व को पश्चिम बताओ !
न्यायसंगत है नहीं प्रस्ताव लेकिन क्या करें हम
आपके होकर जिए हैं, इसलिए पहले मरे हम ?
वोट इनके कम पड़े थे ? जाओ अब इनको रिझाओ!
हाथ में सत्ता है राजन ! पूर्व को पश्चिम बताओ !

साभार- https://www.facebook.com/share/18dKKriQWC/  से

सोनू त्यागी ने कहा, “सफलता कई बार लक बाय चांस होती है”

मुंबई: सोनू त्यागी हैश ब्राउन कन्वर्सेशन्स में पॉडकास्ट होस्ट निहारिका पांडे के साथ अपनी 56 मिनट की बेबाक बातचीत को लेकर चर्चा में हैं। यह पूरा एपिसोड अब लाइव हो चुका है और इसे वर्ष 2026 की अब तक की सबसे ईमानदार, निडर और सच्चाई सामने रखने वाली इंडस्ट्री बातचीत माना जा रहा है।

अवॉर्ड प्राप्त लेखक, निर्देशक, निर्माता और एप्रोच एंटरटेनमेंट ग्रुप तथा गो स्पिरिचुअल के संस्थापक सोनू त्यागी ने इस संवाद में बॉलीवुड, एंटरटेनमेंट कारोबार, विज्ञापन, जनसंपर्क, मीडिया, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और अध्यात्म जैसे विषयों पर खुलकर और साफ शब्दों में अपनी बात रखी है।

https://www.youtube.com/watch?v=V5-n1TmnEMc

 

बातचीत की शुरुआत में ही सोनू त्यागी एक कड़वी लेकिन सच्ची हकीकत सामने रखते हैं। वे कहते हैं,
“यह लक बाय चांस है। पूरी फिल्म इंडस्ट्री केवल टैलेंट पर नहीं चलती। ज़्यादातर मामलों में सफलता किस्मत और मौके पर निर्भर करती है। कई बार ऐसे लोग भी आगे बढ़ जाते हैं जिनमें खास प्रतिभा नहीं होती।”
उनका यह बयान फिल्म इंडस्ट्री में सफलता को लेकर बनी आम धारणाओं को चुनौती देता है।

इस बातचीत में सोनू त्यागी बताते हैं कि केवल मेहनत और प्रतिभा से ही हमेशा सफलता नहीं मिलती। उनके अनुसार इंडस्ट्री में सही समय, सही संपर्क और सही मौका कई बार टैलेंट से ज़्यादा अहम हो जाता है, जबकि सच्चे और मेहनती कलाकार वर्षों तक संघर्ष करते रहते हैं। वे मानते हैं कि इस सच्चाई को समझना नए कलाकारों के लिए ज़रूरी है, ताकि वे भ्रम में न रहें और मानसिक रूप से मजबूत बन सकें।

विज्ञापन, जनसंपर्क और मीडिया इंडस्ट्री पर बात करते हुए सोनू त्यागी मौजूदा व्यवस्था की खामियों पर भी रोशनी डालते हैं। वे कहते हैं कि पेड खबरें, फर्जी प्रचार और दिखावटी ब्रांडिंग ने मीडिया की विश्वसनीयता को गंभीर नुकसान पहुँचाया है। उनका मानना है कि ईमानदारी केवल एक नैतिक गुण नहीं, बल्कि लंबे समय तक टिके रहने की सबसे मजबूत नींव है।

सोनू त्यागी के शब्दों में,
“ईमानदारी जीवन में बहुत मूल्यवान है। अगर हम मानवता और अध्यात्म की बात करें और केवल पैसा कमाने के लिए कुछ भी करने लगें, तो वह सही नहीं है।”

वे एजेंसियों और ब्रांड्स को यह सलाह भी देते हैं कि दिखावे और शॉर्टकट की जगह सच्चे मीडिया संबंधों, भरोसेमंद पहचान और वास्तविक डिजिटल रणनीतियों पर ध्यान देना चाहिए, खासकर युवा पीढ़ी के लिए, जो सच्चाई और पारदर्शिता को ज्यादा महत्व देती है।

आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस पर चर्चा करते हुए सोनू त्यागी भविष्य की एक गंभीर तस्वीर पेश करते हैं। उनका मानना है कि आने वाले पाँच से दस वर्षों में यह तकनीक संगीत निर्माण, आवाज़ रिकॉर्डिंग, कलाकार चयन, पटकथा में सहायता, विज्ञापन की रचनात्मक प्रक्रिया और प्रोडक्शन के कई हिस्सों को अपने हाथ में ले लेगी। वे कहते हैं कि इससे रचनात्मक क्षेत्र में नौकरियां कम हो सकती हैं, हालांकि इंसानी संवेदनशीलता और सोच की भूमिका पूरी तरह खत्म नहीं होगी।

इस पूरी बातचीत का सबसे भावनात्मक और गहरा पहलू अध्यात्म है। सोनू त्यागी मानते हैं कि आज के अत्यधिक तनाव और प्रतिस्पर्धा वाले दौर में अध्यात्म ही इंसान को संतुलन और शांति देता है। वे कहते हैं,
“अगर आप आध्यात्मिक हैं, तो आप सच्चे इंसान हैं। अगर आपमें मानवता है, तो आप आध्यात्मिक हैं। अध्यात्म और मानवता एक ही सिक्के के दो पहलू हैं।”

वे बताते हैं कि धर्म, करुणा, अहिंसा और नैतिक जीवन जैसे मूल्य उनके निजी और पेशेवर जीवन की दिशा तय करते हैं।

सोनू त्यागी इस पॉडकास्ट में गो स्पिरिचुअल की शुरुआत की कहानी भी साझा करते हैं। वे बताते हैं कि वर्ष 2010 में इस विचार की नींव रखी गई थी और 2017 में इसे औपचारिक रूप से शुरू किया गया। गो स्पिरिचुअल का उद्देश्य भारतीय अध्यात्म और सार्वभौमिक मानवीय मूल्यों को केवल बातों तक सीमित न रखकर व्यवहार में उतारना है।

आने वाले समय में गो स्पिरिचुअल न्यूज़ मैगज़ीन और ऐप के माध्यम से सकारात्मक, सच्ची और मूल्य आधारित पत्रकारिता को बढ़ावा दिया जाएगा, जबकि गो स्पिरिचुअल वेब टीवी और ओटीटी मंच प्रेरणादायक और जीवन को बेहतर बनाने वाले कार्यक्रमों पर केंद्रित होगा।

कामकाज की बात करें तो सोनू त्यागी इस समय आध्यात्मिक वेब सीरीज़ ‘टू ग्रेट मास्टर्स’ के सह-निर्माता हैं, युवा पीढ़ी को ध्यान में रखकर बनी फिल्म ‘लिबरेशन’ से जुड़े हैं और व्यंग्यात्मक हास्य फिल्म ‘कैंप डिसेंट’ में रचनात्मक निर्माता की भूमिका निभा रहे हैं, जिसमें बृजेंद्र काला, राजपाल यादव, सारा खान और हेमंत पांडे जैसे कलाकार नजर आएंगे।

यह एपिसोड खास तौर पर फिल्म निर्माताओं, विज्ञापन और जनसंपर्क पेशेवरों, मीडिया और ब्रांड रणनीतिकारों, डिजिटल क्षेत्र से जुड़े लोगों और युवाओं के लिए बेहद महत्वपूर्ण है, जो आज के दौर में सफलता, नैतिकता, मानसिक स्वास्थ्य और जीवन के उद्देश्य के बीच संतुलन तलाश रहे हैं।

सोनू त्यागी ने मनोविज्ञान में स्नातक और पत्रकारिता, विज्ञापन प्रबंधन तथा फिल्म निर्माण में स्नातकोत्तर शिक्षा प्राप्त की है। उन्होंने प्रमुख विज्ञापन एजेंसियों और मीडिया संस्थानों में काम करने के बाद मात्र 24 वर्ष की उम्र में अपने उद्यमों की शुरुआत की। वे अब तक 40 से अधिक बॉलीवुड फिल्मों में निर्माण, प्रचार, लेखन, निर्देशन और रचनात्मक सलाहकार के रूप में जुड़े रहे हैं।

एप्रोच एंटरटेनमेंट ग्रुप को द बिज़ इंडिया अवॉर्ड, सेवा उत्कृष्टता पुरस्कार, वर्ष की सर्वश्रेष्ठ जनसंपर्क एजेंसी और युवा रत्न सम्मान जैसे कई प्रतिष्ठित पुरस्कार मिल चुके हैं।

एप्रोच एंटरटेनमेंट ग्रुप एक पुरस्कार प्राप्त पूर्ण सेवा एंटरटेनमेंट कंपनी है, जो सेलिब्रिटी प्रबंधन, फिल्म और वेब सीरीज़ निर्माण, विज्ञापन और कॉरपोरेट फिल्में, फिल्म प्रचार और आयोजनों के क्षेत्र में सक्रिय है। इसकी जनसंपर्क इकाई एप्रोच कम्युनिकेशंस एक प्रतिष्ठित इंटीग्रेटेड कम्युनिकेशन एजेंसी है, जबकि एप्रोच बॉलीवुड समूह का समर्पित बॉलीवुड और एंटरटेनमेंट समाचार पोर्टल और ऐप है।

गो स्पिरिचुअल एक आध्यात्मिक और वेलनेस संगठन है, जो आध्यात्मिक जागरूकता, मानसिक स्वास्थ्य, नैतिक जीवन, परोपकार, आध्यात्मिक पर्यटन, गो वेज अभियान, राहत कार्य और समाज में समग्र संतुलन को बढ़ावा देने के लिए लगातार कार्य कर रहा है।