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शुद्ध पानी, हवा और आहार पर ‘प्रकृति संवाद’

प्रकृति-केंद्रित विकास मंच का दो दिवसीय आयोजन 27 जनवरी से मुंबई में

 

मुंबई। मौजूदा विकास मॉडल प्रकृति के विरुद्ध खड़ा दिखाई देता है और इसका प्रत्यक्ष नुकसान मानव जीवन को उठाना पड़ रहा है। सम्पन्नता की इस दौड़ में आज शुद्ध पानी, स्वच्छ हवा और सुरक्षित आहार दुर्लभ होते जा रहे हैं। परिणामस्वरूप अनेक बीमारियाँ बढ़ रही हैं और असमय मृत्यु की घटनाएँ लगातार सामने आ रही हैं। यदि इस प्रवृत्ति पर समय रहते रोक नहीं लगी, तो एक बड़ी आबादी का भविष्य अनिश्चित हो जाएगा। आज समाज अनजाने में ही प्रकृति-विरोधी खेमे में खड़ा हो गया है।

इसी स्थिति से बचने, समाज को सचेत करने और प्रकृति-केंद्रित विकास की दिशा में संवाद स्थापित करने के उद्देश्य से चिंतक एवं पर्यावरणविद के. एन. गोविंदाचार्य द्वारा देशव्यापी जन-आंदोलन प्रारंभ किया गया है। दिल्ली, पटना, इंदौर और बेंगलुरु जैसे प्रमुख शहरों के बाद अब इसी कड़ी में मुंबई में ‘प्रकृति संवाद’ का आयोजन किया जा रहा है, जिसमें देश भर से अनेक पर्यावरण विशेषज्ञ, शिक्षाविद, नीति-निर्माता और सामाजिक कार्यकर्ता सहभागी होंगे।

यह दो दिवसीय आयोजन 27 जनवरी से प्रारंभ होगा। कार्यक्रम का शुभारम्भ महाराष्ट्र शासन के उच्च एवं तकनीकी शिक्षा मंत्री श्री चंद्रकांत पाटिल करेंगे। पहले चरण में सौ से अधिक विद्यालयों के लगभग तीन हजार छात्र-छात्राएँ संवाद प्रक्रिया में भाग लेंगे। संवाद के माध्यम से वे प्रकृति से जुड़े आवश्यक बिंदुओं को समझेंगे और उन्हें अपने जीवन में आत्मसात करने की दिशा में प्रेरित होंगे।

इसके बाद 29 जनवरी को विश्वविद्यालय स्तर के विद्यार्थी वरिष्ठ पर्यावरणविदों के साथ वर्तमान स्थिति, समस्याओं और उनके संभावित समाधान पर गहन चर्चा करेंगे तथा ठोस निष्कर्ष तक पहुँचने का प्रयास करेंगे।

आयोजन स्थल
* 27 जनवरी, सुबह 10 बजे से — सम्मुखानंद चंद्रशेखर सरस्वती सभागार (षणमुखानंद हॉल), मुंबई: उद्घाटन एवं स्कूली विद्यार्थियों का संवाद सत्र।
* 29 जनवरी, सुबह 10 बजे से — डॉ. होमी भाभा स्टेट यूनिवर्सिटी, मुंबई: विश्वविद्यालय विद्यार्थियों एवं विशेषज्ञों का संवाद।

प्रमुख सहभागी
इस दौरान के. एन. गोविंदाचार्य की अध्यक्षता में कई प्रमुख वक्ता उपस्थित रहेंगे, जिनमें शामिल हैं श्री सुरेश भैयाजी जोशी, प्रो. रजनीश कामत, श्रीमती तेजस्विनी अनंत कुमार, श्री पोपटराव बागुजी पवार, श्री दिलीप कुलकर्णी, श्री सुरेश खानापुरकर, श्री राम बहादुर राय, प्रो. शिरीष बी. केदारे, प्रो. मिलिंद सुधाकर मराठे, श्री पी. नरहरि, डॉ. नंदकिशोर गर्ग तथा डॉ. विनय सहस्रबुद्धे।

संपर्क
अजीत तिवारी
राष्ट्रीय महामंत्री
प्रकृति केंद्रित विकास मंच
मोबाइल- 9319563849

प्राचीन शाहाबाद (आधुनिक बक्सर) का शाकद्वीपीय मझवारी रियासत

तत्कालीन मुर्शिदाबाद के हाकिम नवाब क़ासिम अलीखाँ (1760- 64) ने मालगुज़ारी की वसूली के नियम अधिक कठोर बना दिए थे और राज्य की आय लगभग दूनी कर दी थी । उसने अपनी फ़ौज को का भी संगठन कियाऔर कलकत्ता के अनुचित हस्तक्षेप से अपने को दूर रखने के लिए राजधानी मुर्शिदाबाद से उठाकर मुंगेर ले गया। अंग्रेज़ी फ़ौज जब उसकी राजधानी मुंगेर के निकट पहुँची तो कासिम अली खां पटना भाग गया। वहाँ उसने समस्त अंग्रेज़ बन्दियों को मार डाला तथा जगत सेठ जैसे उसके जो भी पूर्व विरोधी हाथ पड़े, उन्हें भी मौत के घाट उतार दिया। बाद में वह अवध भाग गया और वहाँ उसने नवाब शुजाउद्दौला तथा भगोड़े बादशाह शाहआलम द्वितीय (1760-1806 ) से कम्पनी के विरुद्ध गठबन्धन कर लिया।

 

कथकौली मैदान पर भयंकर युद्ध :-

बक्सर के कथकौली मैदान में 1764 में हुआ यह युद्ध बेहद महत्वपूर्ण माना गया है। कहा जाता है कि इस युद्ध ने भारतीय भूगोल को बदल दिया।इस हार के बाद भारतीय राजाओं को भी समझ आ गया था, कि एकता में कितनी शक्ति है। इसके बाद अवध के नवाब शुजा- उद- दौला, बंगाल के नवाब मीर कासिम तथा मुगल सम्राट शाहआलम ने अंग्रेजी हुकूमत को हराने के लिए हाथ मिला लिया था। मुगल तोपें, अवध की अश्व शक्ति और बंगाल सेना मिल गईं। तीनों राज्यों को मिलाकर 40 हजार सैनिक, 140 तोपें, 1600 हाथी और घोड़ों की शक्ति एकजुट हुई थी। दूसरी तरफ लार्ड क्लाइव का सबसे तेज तर्रार सेना नायक मेजर हेक्टर मुनरो इन भारतीय राजाओ को रोकने के लिए 7 हजार 720 सेना और 30 तोपों के साथ तेजी से बढ़ते हुए बिहार में बक्सर जिले के कथकौली मैदान पहुंच गये थे।

 

 

इधर तीनों राजाओ की सेना मुगल सेनापति मिर्जा नजीब खां बलूच के नेतृत्व में बक्सर पहुंच गईं और 22 अक्टूबर 1764 के दिन कथकौली के मैदान में भीषण युद्ध आरम्भ हो गया। अंग्रेज़ों ने तीनों को हरा दिया। अंग्रेजी हुकूमत का अब कोई विरोध करने वाला नहीं रहा। ऐसे में ये कहा जा सकता है कि बक्सर के कथकौली में मिली हार के बाद हिंदुस्तान ने गुलामी की तरफ कदम बढ़ा दिए थे।

 

भारतीय नवाब शुजाउद्दौला जान बचाकर रूहेलखण्ड भाग गया। बादशाह शाह आलम द्वितीय अंग्रेज़ों की शरण में आ गया और मीर क़ासिम दर-दर की ख़ाक़ छानता हुआ कई साल तक भारी मुफ़लिसी में 8 मई, 1777 ई. को दिल्ली में मर गया था।

 

नवाब क़ासिम अली खाँ ने शाहाबाद (आधुनिक बक्सर) के आस पास का क्षेत्र के ज़िले को अपने शासन में कर लिया था। 1760-1764 के दौरान दिल्ली पर मुगल बादशाह शाह आलम द्वितीय का प्रतीक रूप में शासन था। 1765 की इलाहाबाद की संधि के बाद मराठों और अफगानों का प्रभाव बढ़ गया था। उधर ईस्ट इंडिया कंपनी

भी अपनी शक्ति बढ़ा रही थी।

 

मझवारी की शाकद्वीपी रियासत भी खत्म हो चुकी थी :-

क़ासिम अलीखाँ के अत्याचार से मझवारी (सिमरी बक्सर) बिहार की ज़िमीदारी नष्ट हो गई थी। मझवारी रियासत बिहार के शाहाबाद (अब भोजपुर) जिले में स्थित एक महत्वपूर्ण जमींदारी थी, जिसका इतिहास मुगल काल से शुरू होकर ब्रिटिश काल तक फैला था । यह शाकद्वीपीय भूमिहार ब्राह्मण परिवारों द्वारा शासित थी, जो क्षेत्र में सामंती प्रभुत्व रखते थे। यहां के शासक, मुख्य रूप से भूमिहार ब्राह्मण समुदाय से थे। उन्होंने अपनी जागीर में सामाजिक और आर्थिक व्यवस्था बनाए रखी थी वे स्थानीय स्तर पर शक्ति के केंद्र बने हुए थे।

 

वर्तमान समय में यह गांव बक्सर जिले के सिमरी ब्लॉक में आता है। 2011ई. में यहां कुल 643 परिवार रह रहे थे और इनकी जनसंख्या 3,880 थी। यहां वर्तमान समय में विशाल पशु मेला भी लगता है। इस क्षेत्र में औरंगाबाद का देवगांव या तरारी सूर्य मंदिर सूर्य भगवान का प्रसिद्ध मंदिर है जो चौदहवी शताब्दी या उससे पूर्व का बताया जाता है। इस सूर्य मंदिर से शाकद्वीपीय मग ब्राह्मण परम्परा की पुष्टि होती है।

 

बिनसैया /बिलासी गाँव का पण्डित दिल्ली दरबार में पहुंचा :-

बिनसैया (बिलासू गाँव) गाजीपुर जिले के जमनिया तहसील के आस-पास के क्षेत्र हैं। यह गाजीपुर शहर के करीब हैं और तहसील जमनिया के अंतर्गत आता है। बिलासू गाँव गङ्गा तट पर अब तक बसा हुआ है जिसे राजा धृष्टकेतु द्वारा दान में मिला हुआ है । राजा धृष्टकेतु चेदि वंश के एक प्रमुख राजा थे, जो महाभारत काल में शिशुपाल के पुत्र और पांडवों के सहयोगी थे। इन्हें कुष्ठ रोग हो गया था। शाक द्वीपीय ब्राह्मण के प्रभाव से रोग का निदान होने की खुशी में राजा ने बिलासू गांव को दान में दिया था। यहाँ गर्ग गोत्र के बिलसिया ब्राह्मण रहते हैं और उनसे बिरादरी का आना जाना अब तक चला आता है। इसी कारण महाराजा साहेब का गर्ग गोत्र विलासियाँपुर और द्वादश आदित्य शाखा है।

 

मधुसूदन /टिकमन पाठक को मझवारी गाँव के साथ 99 गाँव की भी जमींदारी वापस मिली :-

बिलासी गाँव के कोई बड़े प्रसिद्ध पण्डित दिल्ली दरबार पहुंचा था। तत्कालीन भारत के बादशाह अकबर द्वितीय ने उनको मझवारी गाँव की जिमींदारी वापस सौंप दी थी । (कोई सन्दर्भ औरंगजेब का उल्लेख करता है जो सत्य प्रतीत नहीं होता है)। बादशाह ने यह गाँव अकबर द्वितीय बादशाह के समय तक उनके पास रहा। अकबर के मरने पर मझवारी के पुराने जिमीदारों ने डाका डाल नर संहार कर मझवारी के सारे पाठकों को मार डाला था।

 

दूलापूर में शरण :-

मझवारी नर संहार में केवल एक ब्राह्मणी गर्भिणी स्त्री भाग कर एक चमार के घर में जा छिपी थी । एक नेक दिल चमार जाति का इंसान उसे दूलापूर के रियासत में ले गया। दोनों महिलाओं का मायका एक ही जगह होने के कारण उसने इस ब्राह्मणी की रक्षा की थी।

 

दूलापुर गाजीपुर जिले का एक प्रसिद्ध कस्बा और रेलवे स्टेशन है,और यह जखनियां तहसील के अंतर्गत आता है।यह अपनी ऐतिहासिक और सांस्कृतिक विरासत के लिए जाना जाता है; यह क्षेत्र कभी गाजीपुर रियासत का हिस्सा था, जो ऐतिहासिक रूप से महत्वपूर्ण रहा है और गंगा नदी के किनारे बसा एक महत्वपूर्ण स्थान है, जिसे अपनी ‘गुलाब जल’ और ऐतिहासिक स्थलों (जैसे लॉर्ड कॉर्नवालिस का मकबरा) के लिए भी पहचान मिली है।

 

मधुसूदन और टिकमन पाठक का ननिहाल में जन्म :-

दूलापूर के जमींदार की स्त्री का मायका उसी गाँव में था जहाँ की वह मझवारी की ब्राह्मणी का मायका था । इस कारण जमींदार की पत्नी संकट की घड़ी में अपने मायके दूलापुर के जमीदारनी के सहयोग से पहुँचा दी गई थी। मायके में ब्राह्मणी के जोड़िया लड़के पैदा हुये। एक का नाम मधुसूदन पाठक और दूसरे का टिकमन पाठक रखा गया था। जब दोनों भाई सयाने हुये तो अपनी पुरानी जमींदारी लेने की उनको चिन्ता हुई और दूलापूर आये। दूलापूर के जमींदार ने उनसे सारा ब्यौरा कहा और रात को उन्हें मझवारी ले जाकर उनका पुराना सारा गाँव दिखाया। यहाँ उनको वह चमार भी मिला जिसके घर में उनकी माता ने शरण ली थी। तब दोनों भाई दिल्ली पहुंचे और बादशाह से अपनी फरयाद की। बादशाह ने उन्हें मझवारी गाँव के अतिरिक्त 99 अन्य गाँव भी दिये और उनको चौधरी की उपाधि देकर उनके देश को लौटा दिया।

 

दिल्ली सल्तनत’ द्वारा ‘चौधरी’ ख़िताब की शुरुवात हुई थी। बाद में, इस परम्परा को, मुगलों और अंग्रेजो ने आगे बढाया। चौधरी” संस्कृत के ‘चतुर्धारी’ (चारों ओर की जिम्मेदारी उठाने वाला) से बना है और इसका मतलब प्रमुख व्यक्ति, मुखिया या जमींदार होता है। यह किसी भी ब्राह्मण क्षत्रिय वैश्य या शूद्र को उनकी बीरता और कर वसूली के एवज में दी जाती थी।

 

 

शाक द्वीपीय ब्राह्मण वंश में यह प्रथम चौधरी उपाधिधारी ब्राह्मण कौन था यह स्पष्ट नहीं हो पाता है। ननिहाल में जन्म लेने और पलने वाले दो कुमार मधुसूदन पाठक या टिकमन पाठक में से किसे चौधरी की उपाधि मिली? इसका कोई स्पष्ट उल्लेख नहीं मिलता है। साथ ही अयोध्या के शाकद्वीपीय राजा मानसिंह के प्रपितामह सदासुख पाठक को मझवारी का प्रथम चौधरी का उल्लेख भी कहीं- कहीं मिलता है। इसके अलावा इसी कुल के प्रथम महाराजा ओरी पाठक उर्फ बख्तियार सिंह को भी यह सम्मान दिए जाने का उल्लेख मिलता है।

 

लेखक परिचय:-


(लेखक भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण, में सहायक पुस्तकालय एवं सूचनाधिकारी पद से सेवामुक्त हुए हैं। वर्तमान समय में उत्तर प्रदेश के बस्ती नगर में निवास करते हुए सम सामयिक विषयों,साहित्य, इतिहास, पुरातत्व, संस्कृति और अध्यात्म पर अपना विचार व्यक्त करते रहते हैं। वॉट्सप नं.+919412300183)

प्रख्यात क्रांतिकारी, लेखक तथा संपादक – पंडित वचनेश त्रिपाठी

वर्ष 1920 में उत्तर प्रदेश के जनपद हरदोई के संडीला मे जन्मे वचनेश त्रिपाठी न केवल एक महान क्रांतिकारी थे अपितु एक लेखक व संपादक भी थे। वचनेश जी ने अपने लेखन व संपादन के माध्यम से क्रांतिकारियों के विषय में जो ठोस जानकारी उपलब्ध कराई है।ऐतिहासिक काकोरी घटनाक्रम पर उनके द्वारा सम्पादित पुस्तक “काकोरी कांड के दिलजले“में काकोरी कांड से संबद्ध सर्वश्री पंडित रामप्रसाद बिस्मिल, अश्फाक उल्ला खां, राजेंद्र नाथ लाहिड़ी, ठाकुर रोशन सिंह, यतीन्द्रनाथ दास, चंद्रशेखर आजाद, शचींद्र नाथ सान्याल, योगेशचद्र चटर्जी, गोविंद चरणकर, शचीन्द्रनाथ बख्शी, मुकुन्दी लाल गुप्त, मन्मनथ गुप्त, सुरेशचद्र भट्टाचार्य, विष्णु शरण दुब्लिश, रामकृष्ण खत्री, राजकुमार सिन्हा , भूपेन्द्र नाथ सान्याल, प्रेमकृष्ण खन्ना , रामदुलारे त्रिवेदी तथा रामनाथ पांडेय सरीखे 20 क्रांतिवीरो का जीवन परिचय है।

पंडित जी मात्र 15 वर्ष की आयु में ही मैनपुरी केस में फरार क्रांतिकारी देवनारायण भारतीय के संपर्क में आए और स्वाधीनता संग्राम में सक्रिय होने का संकल्प लिया। रामप्रसाद बिस्मिल के साथ काम करते हुए उन्होंने चिंगारी नामक समाचार पत्र निकाला। बालामऊ जंक्शन पुलिस चौकी लूटने के आरोप में उन्हें जेल भ्रेजा गया और यहाँ से उनका जेल जाने का सिलसिला आरंभ हो गया।

वचनेश जी को आजादी के महासमर में कूदने की प्रेरणा उन्हें एक बालिका के बलिदान की कथा से मिली। वो आजादी की एक मासूम सिपाही थी जिसे अंग्रेजों ने जलाकर मार डाला था।यह बालिका मैना थी जिसके पिता नानासाहेब धुंधूपंत अंग्रेजों से टक्कर ले रहे थे।वचनेश जी ने मैना के बलिदान पर उपन्यास लिखने की योजना बनाई। जब उपन्यास “विद्रोही की कन्या“ प्रकाशित होकर बाजार में आया तो उसकी धूम मच गई। बाद में उनकी लिखी वे आजाद थे, शहीद मुक्त प्राण, अग्निपथ के राही, सुकरात का प्याला, गोदावरी की खोज, सूरज के बेटे, जरा याद करो कुर्बानी ,इतिहास के झरोखे से , यह पुण्य प्रवाह हमारा आदि श्रृंखला की पुस्तकें बहुत लोकप्रिय हुईं। उन्होंने बच्चों के लिए प्रेरक अनमोल कहानियां भी लिखीं ।

क्रांतिकारी इतिहास के अध्येता वचनेश त्रिपाठी भाषण कला में भी अत्यंत निपुण थे। उनके भाषण का विषय में क्रांतिकारी भगत सिंह आजाद बिस्मिल और सुभाष के उदहारण आ ही जाते थे । स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात जब अटल बिहारी बाजपेयी संघ विस्तारक होकर संडीला पहुंचे तब वह वचनेश जी के घर पर ही रहे और दोनो की प्रगाढ़ मित्रता हो गई।

लखनऊ से जब मासिक राष्ट्रधर्म, साप्ताहिक पांचजन्य और दैनिक स्वदेश का प्रकाशन प्रारम्भ हुआ तो अटल जी ने वचनेश जी की लेखन प्रतिभा के कारण उन्हें लखनऊ बुला लिया। 1960 में वे तरूण भारत के संपादक बने ।1967 से 73 तथा 1975 से 84 तक वे राष्ट्र धर्म के तथा 1973 से 75 तक वे पांचजन्य के संपादक रहे।क्रांतिकारी इतिहास में अत्यधिक रुचि होने के कारण वे जिस पत्र में रहे उसके कई क्रांतिकारी विशेषांक निकाले जो अत्यंत लोकप्रिय हुए ।

वचनेश जी ने कहानी, कविता, संस्मरण, उपन्यास, इतिहास, निबंध, वैचारिक लेख जैसी लेखन की सभी विधाओं में प्रचुर कार्य किया। 1984 में संपादन कार्य से विरत होने के बाद भी वे लगातार लिखते रहे। पांचजन्य, राष्ट्रधर्म आदि में उनके लेख अनवरत प्रकाशित होते रहे। वह विचार आते ही उसे लिख डालने के लिए इतने तत्पर रहते थे कि साथ में पुस्तक न होने पर किसी भी उपलब्ध वस्तु पर जिस पर कलम चल जाए लिख कर रख लेते थे । पत्रकारिता व साहित्य लेखन में उनके अमूल्य योगदान के लिए उन्हें 2001 में पद्मश्री से सम्मानित किया गया।

शिक्षा रोजगार का टिकट नहीं, जीवन का दर्शन बने

विश्व शिक्षा दिवसः 24 जनवरी 2026

विश्व शिक्षा दिवस कोरा उत्सव नहीं, बल्कि आत्ममंथन का अवसर है, यह सोचने का क्षण कि शिक्षा क्या है, किसके लिए है और किस दिशा में समाज को ले जा रही है। भारत इस संदर्भ में केवल एक देश नहीं, बल्कि एक जीवित सभ्यता है, जिसने शिक्षा को कभी भी मात्र रोजगार या सूचना का साधन नहीं माना, बल्कि जीवन-निर्माण, चरित्र-गठन और आत्मबोध की प्रक्रिया के रूप में जिया है। आज जब दुनिया ज्ञान, तकनीक और कृत्रिम बुद्धिमत्ता के अभूतपूर्व दौर में खड़ी है, तब भारत की प्राचीन गुरुकुल परंपरा और उसके शैक्षिक सूत्र वैश्विक नेतृत्व का आधार बन सकते हैं। इस वर्ष की थीम ‘शिक्षा के सह-निर्माण में युवाओं की शक्ति’ है, जो शांति और विकास के लिए शिक्षा के महत्व पर केंद्रित है, यह दिन शिक्षा को एक मौलिक अधिकार और भविष्य की पूंजी के रूप में रेखांकित करने के लिए मनाया जाता है, ताकि गरीबी मिटाई जा सके, लैंगिक समानता लाई जा सके और सभी के लिए गुणवत्तापूर्ण शिक्षा सुनिश्चित की जा सके। जिसकी आवश्यकता इसलिए भी है क्योंकि लाखों बच्चे एवं युवा शिक्षा से वंचित हैं और यह दिन युवाओं की भूमिका को महत्वपूर्ण बनाता है।

संयुक्त राष्ट्र द्वारा घोषित यह दिवस, शांति और विकास के लिए शिक्षा की भूमिका का जश्न मनाता है। यह शिक्षा को एक मौलिक मानवाधिकार, सार्वजनिक हित और जिम्मेदारी के रूप में स्थापित करता है। यह दिन गरीबी के चक्र को तोड़ने और लैंगिक समानता प्राप्त करने के लिए शिक्षा की आवश्यकता पर जोर देता है। यह दिन शिक्षा को भविष्य की सबसे बड़ी पूंजी मानता है, जो समाज को अंधकार से बाहर निकाल सकती है और भविष्य के निर्माताओं को तैयार कर सकती है। भारत की प्राचीन शिक्षा परंपरा का मूल मंत्र था-“सा विद्या या विमुक्तये”, अर्थात् वही विद्या है जो मुक्त करे। गुरुकुलों में शिक्षा केवल पुस्तकीय ज्ञान तक सीमित नहीं थी; वह आचरण, अनुशासन, प्रकृति के साथ सामंजस्य, गुरु-शिष्य संवाद और जीवनोपयोगी कौशल का समन्वय थी। गुरु केवल विषय का अध्यापक नहीं, बल्कि जीवन-दृष्टा होता था और शिष्य केवल परीक्षा-उत्तीर्ण करने वाला विद्यार्थी नहीं, बल्कि समाज के प्रति उत्तरदायी नागरिक। आश्रम-व्यवस्था में रहकर विद्यार्थी सेवा, श्रम, ध्यान, तर्क और प्रयोग-इन सबके माध्यम से समग्र व्यक्तित्व का विकास करता था। यह शिक्षा आत्मनिर्भरता सिखाती थी, प्रतिस्पर्धा नहीं बल्कि सह-अस्तित्व का बोध कराती थी और ज्ञान को जीवन से जोड़ती थी।

औपनिवेशिक काल में यह समग्र शिक्षा व्यवस्था व्यवस्थित रूप से ध्वस्त की गई। लॉर्ड मैकाले की शिक्षा पद्धति का उद्देश्य भारतीयों को शिक्षित बनाना नहीं, बल्कि प्रशासन के लिए “क्लर्क” तैयार करना था-ऐसे लोग जो सोच में अंग्रेज़ हों, रंग में भारतीय। इस पद्धति ने शिक्षा को जीवन से अलग कर दिया, भाषा को जड़ों से काट दिया और ज्ञान को रटंत, अंक-केंद्रित और नौकरी-उन्मुख बना दिया। आज़ादी के बाद भी दुर्भाग्यवश, भारत लंबे समय तक उसी ढांचे में फंसा रहा। विद्यालय और विश्वविद्यालय बढ़े, लेकिन शिक्षा की आत्मा कमजोर होती चली गई। डिग्रियों की संख्या बढ़ी, पर कौशल, नैतिकता और नवाचार का संकट गहराता गया। स्वतंत्र भारत की शिक्षा प्रणाली ने कुछ सकारात्मक प्रयास अवश्य किए-सार्वजनिक विश्वविद्यालय, वैज्ञानिक संस्थान, तकनीकी शिक्षा लेकिन व्यापक स्तर पर शिक्षा समाज की आवश्यकताओं से कटती गई।

पाठ्यक्रम बोझिल होते गए, परीक्षाएं स्मृति-आधारित बनती गईं और शिक्षक-छात्र संवाद औपचारिकता में सिमट गया। शिक्षा रोजगार का टिकट बन गई, जीवन का दर्शन नहीं। यही कारण है कि आज शिक्षित युवा भी दिशाहीनता, बेरोजगारी और मानसिक तनाव से जूझ रहा है। इसी पृष्ठभूमि में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में लाई गई राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 एक निर्णायक मोड़ के रूप में सामने आती है। यह नीति केवल संरचनात्मक सुधार नहीं, बल्कि वैचारिक बदलाव का संकेत देती है। इसमें भारतीय भाषाओं को शिक्षा का माध्यम बनाने, बहु-विषयक अध्ययन, रटंत विद्या से मुक्ति, कौशल विकास, अनुसंधान, नवाचार और नैतिक शिक्षा पर बल दिया गया है। यह नीति स्पष्ट रूप से मैकाले की शिक्षा पद्धति से बाहर निकलने की दिशा में कदम है-जहां शिक्षा का उद्देश्य केवल नौकरी नहीं, बल्कि सक्षम, सृजनशील और संवेदनशील मानव का निर्माण है।

नई शिक्षा नीति में कौशल विकास, अनुभवात्मक अधिगम, खेल, कला और व्यावसायिक शिक्षा को महत्व देना, उच्च शिक्षा में विषयों की कठोर सीमाओं को तोड़ना-ये सभी कदम गुरुकुल परंपरा की आधुनिक पुनर्व्याख्या जैसे हैं। मातृभाषा में शिक्षा का आग्रह न केवल संज्ञानात्मक विकास को सुदृढ़ करता है, बल्कि सांस्कृतिक आत्मविश्वास भी लौटाता है। यह नीति भारतीय ज्ञान परंपरा-योग, आयुर्वेद, दर्शन, गणित, खगोल को वैश्विक संदर्भ में पुनर्स्थापित करने का अवसर देती है। फिर भी, यह स्वीकार करना होगा कि नीति और क्रियान्वयन के बीच की दूरी अभी भी बड़ी चुनौती है। व्यापक परिवर्तन की अपेक्षाएं अभी अधूरी हैं। शिक्षा को वास्तव में कौशल विकास का केंद्र बनाना होगाकृजहां विद्यार्थी केवल पढ़े नहीं, बल्कि कर सके, सोच सके, समस्या सुलझा सके। पाठ्यपुस्तकों और रटंत विद्या से हटकर शिक्षा को जीवन-विकास का आधार बनाना होगा। शिक्षक को फिर से “गुरु” की भूमिका में लाना होगा-मार्गदर्शक, प्रेरक और सहयात्री के रूप में।

तकनीकी विकास, नवाचार और एआई के युग में भारतीय शिक्षा पद्धति के सामने दोहरी चुनौती है। एक ओर, उसे वैश्विक प्रतिस्पर्धा में सक्षम बनना है-डिजिटल साक्षरता, डेटा, विज्ञान और तकनीक में अग्रणी होना है। दूसरी ओर, उसे मानवीय मूल्यों, करुणा, नैतिकता और सामाजिक उत्तरदायित्व को भी सुरक्षित रखना है। यदि शिक्षा केवल तकनीक सिखाएगी और विवेक नहीं, तो वह विनाश का उपकरण बन सकती है। भारत की शक्ति यही है कि वह विज्ञान और अध्यात्म, तकनीक और तत्त्वज्ञान, नवाचार और नैतिकता-इन सबका संतुलन सिखा सकता है। भारतीय शिक्षा पद्धति में वह सामर्थ्य है कि वह दुनिया को एक नया दर्शन और नया शिक्षा-सूत्र दे सके, जहां शिक्षा उपभोग नहीं, साधना हो; जहां ज्ञान सत्ता नहीं, सेवा बने; जहां प्रतिस्पर्धा के साथ सह-अस्तित्व भी हो। “वसुधैव कुटुम्बकम्” की भावना आज वैश्विक शिक्षा का सबसे प्रासंगिक मंत्र बन सकती है।

इक्कीसवीं सदी का मानव और मानव समाज केवल तकनीकी दक्षता या आर्थिक प्रगति से पूर्ण नहीं हो सकता। उसकी संरचना तब तक अधूरी रहेगी, जब तक शिक्षा परिपक्व, समग्र और मूल्यनिष्ठ न हो। आज दुनिया को ऐसे अभिनव मानव की आवश्यकता है जो आध्यात्मिक चेतना से संपन्न हो और वैज्ञानिक दृष्टि से सक्षम भी। शिक्षा का स्वरूप ऐसा हो, जिसमें ज्ञान केवल सूचना न बने, बल्कि विवेक, संवेदना और उत्तरदायित्व का विस्तार करे। मूल्यप्रवाहित शिक्षा व्यक्ति को मानवीय बनाती है और योग शिक्षा उसे आत्म-संयम, संतुलन तथा अंतर्दृष्टि प्रदान करती है। इन दोनों का समन्वय ही ऐसी शिक्षा को जन्म दे सकता है, जो व्यक्ति को आत्मकेंद्रित नहीं, बल्कि विश्वकल्याण की दिशा में उन्मुख करे। भारत के अनेक आध्यात्मिक संत महापुरुषों ने शिक्षा को समग्रता देने के लिये इस विषय पर गंभीर चिन्तन-मंथन किया।

महान् दार्शनिक संत आचार्य श्री महाप्रज्ञ ने जीवन विज्ञान के रूप में एक समग्र चिन्तन एवं योजना शिक्षा को परिपूर्णता देने के लिये प्रस्तुत की है। उनके अनुसार मानवता का भविष्य श्रम, अर्थ और संयम-इन तीनों के सामंजस्यपूर्ण विकास पर निर्भर है। श्रम और अर्थ जीवन के मौलिक एवं व्यावहारिक पक्ष हैं, जो समाज की गतिशीलता और आत्मनिर्भरता को सुनिश्चित करते हैं; वहीं संयम जीवन का आध्यात्मिक पक्ष है, जो भोग की अंधी दौड़ को रोककर संतुलन और शांति की स्थापना करता है। यदि शिक्षा अथवा प्रशिक्षण इन तीनों आधारों पर निर्मित नहीं होता, तो जीवन की समग्रता केवल एक कल्पना बनकर रह जाती है।

अतः शिक्षा का उद्देश्य केवल रोजगार सृजन नहीं, बल्कि ऐसे मनुष्य का निर्माण होना चाहिए जो श्रमशील हो, अर्थसचेत हो और संयमशील भी-यही समग्र शिक्षा, समग्र मानव और समग्र समाज की आधारशिला है। जरूरत है यदि भारत अपनी प्राचीन गुरुकुल परंपरा की आत्मा को आधुनिक संदर्भ में पुनर्जीवित कर सके, नई शिक्षा नीति को जमीनी सच्चाई में बदल सके और शिक्षा को जीवन, समाज और प्रकृति से जोड़ सके, तो वह निश्चय ही विश्व का मार्गदर्शन करने में सक्षम होगा। यह केवल भारत की आवश्यकता नहीं, बल्कि मानवता की आवश्यकता है। विश्व शिक्षा दिवस पर भारत का आह्वान यही हो सकता है कि शिक्षा मनुष्य को मशीन नहीं, मानव बनाए; उसे केवल कुशल नहीं, संवेदनशील बनाए; और उसे केवल वर्तमान के लिए नहीं, भविष्य के लिए तैयार करे।

प्रेषकः

(ललित गर्ग)
लेखक, पत्रकार, स्तंभकार
ई-253, सरस्वती कंुज अपार्टमेंट
25 आई. पी. एक्सटेंशन, पटपड़गंज, दिल्ली-92
फोनः 22727486, 9811051133

वरिष्ठ पत्रकार आर कृष्णा दास छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री विष्णु देव साय का सलाहकार बने

रायपुर। वरिष्ठ पत्रकार आर कृष्णा दास को मुख्यमंत्री विष्णु देव साय का सलाहकार नियुक्त किया गया है। सलाहकार के रूप में वे मुख्यमंत्री को मीडिया एवं अन्य विषयों पर परामर्श देंगे। सामान्य प्रशासन विभाग की ओर से जारी आदेश में बताया गया कि सलाहकार के पद पर कार्यभार ग्रहण करने के साथ ही उन्हें कैबिनेट मंत्री का दर्जा दिया जाएगा।

सामान्य प्रशासन विभाग की ओर से जारी आदेश में बताया गया कि सलाहकार के पद पर कार्यभार ग्रहण करने के साथ ही उन्हें कैबिनेट मंत्री का दर्जा प्राप्त होगा। इसके साथ उन्हें राज्य शासन के विशेष सचिव के समकक्ष अन्य सुविधाएं प्राप्त होगी।

जारी आदेश के अनुसार आर. कृष्णा दास मुख्यमंत्री को मीडिया एवं अन्य विषयों पर परामर्श देंगे। उन्हें सलाहकार के रूप में प्रतिमाह 1 लाख 50 हजार रुपये मानदेय प्रदान किया जाएगा। साथ ही अन्य सुविधाएं राज्य शासन के विशेष सचिव के समकक्ष होंगी।

हाड़ोती महिला रचनाकार सम्मेलन की तैयारियां जोरों पर

कोटा । कोटा में एक फरवरी को आयोजित होने वाले हाड़ोती महिला रचनाकार सम्मेलन की तैयारियां जोरों पर चल रही हैं। कई स्तर पर बैठकें आयोजित की जा चुकी हैं। रंगीतिका संस्था द्वारा राजस्थान साहित्य अकादमी उदयपुर के सहयोग से सम्मेलन रंगबाड़ी रोग स्थित मदर टेरेसा स्कूल के सभागार में होगा।

महिला रचनाकारों द्वारा विभिन्न विषयों पर प्रस्तुत किए जाने वाले पत्रों की तैयारियां की जा रही है। संस्था के संरक्षक जितेंद्र निर्मोही ने बताया कि प्रातः 9 बजे से सांय 4.00 बजे तक चार सत्र प्रस्तावित हैं। संस्थापक अध्यक्ष स्नेहलता शर्मा कार्यकारी अध्यक्ष,रीता गुप्ता और सचिव महेश पंचोली ने रूप रेखा तैयार की है।

प्रथम सत्र उद्घाटन सत्र होगा। दूसरा सत्र” हाड़ौती अंचल का महिला पद्य साहित्य” विषय पर रखा गया है। इस सत्र में श्वेता शर्मा हाड़ौती अंचल का महिला समकालीन काव्य और गरिमा राकेश गर्विता हाड़ौती अंचल का महिला गीति काव्य विषय पर अपने पत्र प्रस्तुत करेंगी। तीसरा सत्र हाड़ौती अंचल का महिला गद्य साहित्य विषय पर रखा गया है। इसमें डा. वैदेही गौतम हाडौती अंचल का महिला कथा साहित्य और बूंदी की सुमनलता शर्मा हाड़ौती अंचल का महिला कथेत्तर साहित्य विषयों पर अपने पत्र प्रस्तुत करेंगी। चौथा समापन सत्र होगा।
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डॉ.प्रभात कुमार सिंघल
पत्रकार

टाटा क्लासएज ने ‘एडटेक एक्सपीरियंस सेंटर्स’ लॉन्च करने के लिए इटोम वर्क्स लिमिटेड के साथ मिलाया हाथ

मुंबई। भारत भर के स्कूलों के लिए भविष्योन्मुख अकादमिक पारिस्थितिकी तंत्र (ecosystem) बनाने में एक विश्वसनीय भागीदार, टाटा क्लासएज लिमिटेड (TCE) ने आज इटोम वर्क्स लिमिटेड (Etome) के साथ एक रणनीतिक साझेदारी की घोषणा की। इटोम एक ऐसा संगठन है जो शैक्षिक प्रौद्योगिकी (EdTech) के प्रभावी एकीकरण को बड़े पैमाने पर सक्षम करने के लिए अनुभव-आधारित प्रौद्योगिकी स्थान (experience-led technology spaces) बनाने में विशेषज्ञता रखता है। इस सहयोग के हिस्से के रूप में TCE Etome में एक रणनीतिक इक्विटी हिस्सेदारी (strategic equity stake) लेगा जो डिजिटल लर्निंग समाधानों और कक्षा के अभ्यास (classroom practice) में उनके प्रभावी एकीकरण के बीच के अंतर को कम करने की साझी प्रतिबद्धता को दर्शाता है।

जैसे-जैसे शिक्षा क्षेत्र में डिजिटल परिवर्तन (digital transformation) तेज हो रहा है, संस्थान अपनी आवश्यकताओं के लिए सबसे उपयुक्त समाधानों को खोजने और उनका मूल्यांकन करने के लिए विश्वसनीय माध्यम तलाश रहे हैं। इस साझेदारी का उद्देश्य ‘एडटेक एक्सपीरियंस सेंटर्स’ (EdTech Experience Centres) को भौतिक हब (physical hubs) के रूप में स्थापित करके उस मांग को पूरा करना है। यह स्कूल के नेताओं को प्रत्यक्ष रूप से समाधानों का पता लगाने और सार्थक प्रौद्योगिकी एकीकरण के लिए तैयारी करने में सक्षम बनाएगा। ये केंद्र शिक्षण प्रभावशीलता को बढ़ाने और स्कूलों में निर्बाध डिजिटलीकरण का समर्थन करने के लिए संरचित प्रशिक्षण और कौशल प्रदान करके शिक्षक क्षमता निर्माण (teacher capacity building) में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगे।

 

इस गठबंधन के रणनीतिक इरादे पर बोलते हुए टाटा इंडस्ट्रीज लिमिटेड (TIL) के कार्यकारी निदेशक और TCE के चेयरमैन श्री के.आर.एस. जमवाल ने कहा, “मुझे प्री-के (pre-K) से के-12 (K-12) पारिस्थितिकी तंत्र के सभी प्रमुख तत्वों में अपना योगदान करने और भाग लेने के अपने लक्ष्य की ओर टाटा क्लासएज की प्रगति देखकर खुशी हो रही है। यह सहयोग इस पारिस्थितिकी तंत्र में ‘फिजीटल एक्सपीरियंस सेंटर्स’ (phygital experience centres) के प्रमुख तत्व को जोड़ता है। चूंकि एडटेक (EdTech) K-12 शिक्षा के विकास का नेतृत्व कर रहा है, इसलिए ऐसे केंद्र देश भर के स्कूलों और शिक्षकों के लिए सर्वोत्तम प्रथाओं, उपकरणों, तकनीकों और डिवाइस को प्रदर्शित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगे।”

 

एडटेक डिस्कवरी (EdTech Discovery) की नई कल्पना

जहाँ स्कूलों में डिजिटल अपनाने की प्रक्रिया बढ़ रही है, वहीं टेक्नोलॉजी हार्डवेयर और सॉफ्टवेयर कंटेंट समाधानों के साथ भौतिक रूप से बातचीत (physically interact) करने की क्षमता बाजार में एक कमी बनी हुई है। यह जुड़ाव ‘एक्सपीरियंस सेंटर्स’ का एक राष्ट्रव्यापी नेटवर्क लॉन्च करके उस जरूरत को पूरा करता है। ये ऐसे समर्पित स्थान होंगे जहाँ स्कूल व्यावहारिक वातावरण (hands-on environment) में एडटेक समाधानों में खोज, अनुभव और मूल्यांकन कर सकेंगे।

 

इस जुड़ाव पर अपने विचार साझा करते हुए, इटोम के निदेशक श्री जोसन थॉमस ने कहा, “टाटा क्लासएज के साथ साझेदारी करना हमारे लिए एक निर्णायक क्षण है। ये अनुभव केंद्र केवल उत्पादों को प्रदर्शित करने के बारे में नहीं होंगे; वे जुड़ाव के लिए जीवंत स्थान होंगे। TCE के समर्थन के साथ हम एक विश्वसनीय वितरण नेटवर्क बनाने की अपनी क्षमता को लेकर आश्वस्त हैं जो देश भर के संस्थानों में सर्वश्रेष्ठ एडटेक लाएगा।”

डिजिटल परिवर्तन के लिए स्कूलों को आगे बढ़ाना

कक्षाओं को नया रूप देने वाले डिजिटल परिवर्तन के साथ स्कूलों को केवल तकनीक तक पहुंच से अधिक की आवश्यकता है, उन्हें मार्गदर्शन, एक्सपोज़र और संरचित समर्थन की आवश्यकता है।

 

एक साथ मिलकर यह पहल इस गठबंधन को स्कूलों द्वारा तकनीक को खोजने और अपनाने के तरीके को ऊपर उठाने के लिए प्रेरित करती है। आगे जोड़ते हुए, TCE के सीईओ, श्री तरुण भोजवानी ने कहा, “आज स्कूल तेजी से विस्तारित हो रहे एडटेक परिदृश्य (EdTech landscape) को नेविगेट कर रहे हैं। हमारे केंद्र उन्हें अनुभव करने और समाधानों का मूल्यांकन करने के लिए एक विश्वसनीय, अकादमिक रूप से निर्देशित वातावरण प्रदान करके अनिश्चितता से सूचित निर्णय लेने (informed decision-making) की ओर बढ़ने में मदद करेंगे। हमारा लक्ष्य यह सुनिश्चित करना है कि हर स्कूल उस तकनीक को अपनाए जो वास्तव में उसकी शिक्षण और सीखने की जरूरतों को पूरा करती है।”

 

इस दिशा के स्थापित होने के साथ, नेतृत्व टीम ने अपना दृष्टिकोण साझा किया कि यह पहल स्कूलों के लिए क्या सक्षम करेगी:

एडटेक एक्सपीरियंस सेंटर्स (EdTech Experience Centres): अनुभव केंद्र स्थापित करना जो अकादमिक खोज क्षेत्र (academic discovery zones) के रूप में काम करेंगे जहाँ शिक्षक शिक्षण-संचालित (pedagogy-driven) कक्षा समाधानों के साथ सार्थक रूप से जुड़ सकते हैं, उन्हें समझ सकते हैं और उनका मूल्यांकन कर सकते हैं।

शिक्षक क्षमता निर्माण (Teacher Capacity Building): उच्च गुणवत्ता वाले शिक्षक प्रशिक्षण, कौशल-निर्माण सत्र और शैक्षणिक कार्यशालाओं (pedagogical workshops) का संचालन करने के लिए इन केंद्रों का लाभ उठाना जो प्रौद्योगिकी एकीकरण और भविष्य के अनुकूल कक्षा प्रथाओं को मजबूत करते हैं।

क्यूरेटेड लर्निंग सॉल्यूशंस इकोसिस्टम: एक सोच-समझकर तैयार किया गया, मल्टी-ब्रांड नेटवर्क विकसित करना जो यह सुनिश्चित करता है कि स्कूलों के पास सीखने के परिणामों (learning outcomes) के अनुरूप विश्वसनीय और उच्च गुणवत्ता वाली शैक्षिक तकनीकों तक पहुंच हो।

सलाहकार और कार्यान्वयन उत्कृष्टता: यह सुनिश्चित करना कि अनुभव केंद्र मजबूत मार्गदर्शन, संस्थान की तैयारी में सहायता और स्कूलों को सुसंगत गुणवत्ता के साथ जमीनी कार्यान्वयन (on-ground implementation) प्रदान करें।

 

परिचालन दृष्टि पर टिप्पणी करते हुए, इटोम की प्रबंध निदेशक, नेहा जोसन ने कहा, “हमारा ध्यान एक ऐसा वातावरण बनाने पर है जहाँ तकनीक सुलभ और मददगार लगे न कि भारी। हम इन केंद्रों में शिक्षकों का स्वागत करने और उनकी कक्षाओं को बेहतर बनाने के लिए सही उपकरण खोजने में उनकी मदद करने के लिए उत्सुक हैं।”

 

संगठनों के बारे में

टाटा क्लासएज लिमिटेड (TCE), टाटा इंडस्ट्रीज लिमिटेड की एक सहायक कंपनी है, जो नवीन डिजिटल और अकादमिक समाधानों के माध्यम से K–12 शिक्षा को बदलने के लिए समर्पित है। कंपनी अपने अकादमिक समाधानों के निर्बाध अनुकूलन को सुनिश्चित करती है, जिससे स्कूलों के लिए डिजिटल शिक्षण और सीखने का संक्रमण आसान हो जाता है। शिक्षा के प्रति टाटा समूह की स्थायी प्रतिबद्धता द्वारा समर्थित, शिक्षाशास्त्र (pedagogy), प्रौद्योगिकी और सामग्री में कंपनी के नवाचार देश भर के छात्रों के लिए आकर्षक, सार्थक और प्रभावशाली सीखने के अनुभव प्रदान करते हैं।
Etome Works Limited: Etome Works Ltd, जिसे पहले Resolute के नाम से जाना जाता था, एडटेक और डिजिटलीकरण में एक दशक से अधिक के अनुभव के साथ एक अग्रणी एडटेक कंपनी है। Etomosphere के माध्यम से, जो भारत का पहला एडटेक एक्सपीरियंस सेंटर और मल्टी-ब्रांड मार्केटप्लेस है, कंपनी शैक्षणिक संस्थानों और संगठनों को सही समाधान खोजने और अपनाने में मदद करती है। Etome Works शिक्षा-केंद्रित तकनीकों को भी पेश करता है जैसे कि Etome eNote (परिसरों में कागज का डिजिटल विकल्प), eBoard (स्वस्थ कक्षाओं के लिए डिज़ाइन किया गया आंखों के अनुकूल डिस्प्ले) और कई अन्य नवीन प्रौद्योगिकियां।

जनगणना 2027 में नागरिकों से पूछे जाएँगे 33 सवाल, सरकार ने जारी की गजट अधिसूचना

केंद्र सरकार ने गुरुवार (22 जनवरी 2026) को जनगणना 2027 के पहले चरण में पूछे जाने वाले 33 सवालों की सूची जारी की। जनगणना का पहला चरण हाउस-लिस्टिंग और हाउसिंग जनगणना होगा, जो अप्रैल से सितंबर के बीच कराया जाएगा। इस चरण के लिए हर राज्य और केंद्र शासित प्रदेश 1 अप्रैल से 30 सितंबर के बीच किसी भी 30 दिनों की अवधि का चयन करेगा।

भारत के रजिस्ट्रार जनरल मृत्युंजय कुमार नारायण ने एक राजपत्र अधिसूचना में इन सवालों की जानकारी दी। इसमें मकान की बनावट, बुनियादी सुविधाएँ, घर में रहने वाले विवाहित जोड़ों की संख्या और परिवार के मुखिया के लिंग जैसी जानकारियाँ शामिल हैं।

अधिसूचना में कहा गया है, “केंद्र सरकार निर्देश देती है कि सभी जनगणना अधिकारी, अपने-अपने निर्धारित स्थानीय क्षेत्रों में, भारत की जनगणना 2027 के तहत हाउसहोल्ड लिस्टिंग और हाउसिंग जनगणना अनुसूची के माध्यम से नीचे सूचीबद्ध सभी बिंदुओं पर सभी व्यक्तियों से प्रश्न पूछकर जानकारी एकत्र करेंगे।”

किन सवालों से होगी शुरुआत?

जाँच की शुरुआत भवन संख्या (नगरपालिका/स्थानीय प्राधिकरण या जनगणना संख्या), जनगणना मकान संख्या, मकान के फर्श की प्रमुख सामग्री, दीवार की प्रमुख सामग्री, छत की प्रमुख सामग्री, मकान का उपयोग, मकान की स्थिति और घरेलू संख्या की जानकारी लेने से होगी।

इसके बाद घर में सामान्य रूप से रहने वाले कुल व्यक्तियों की संख्या, परिवार के मुखिया का नाम, परिवार के मुखिया का लिंग, क्या मुखिया अनुसूचित जाति/अनुसूचित जनजाति/अन्य से संबंधित है, मकान का स्वामित्व, परिवार के पास विशेष रूप से उपलब्ध कमरों की संख्या और घर में रहने वाले विवाहित जोड़ों की संख्या से जुड़े विवरण पूछे जाएँगे।

इसके बाद बुनियादी सुविधाओं जैसे पीने के पानी का मुख्य स्रोत, पीने के पानी की उपलब्धता, रोशनी का मुख्य स्रोत, शौचालय की उपलब्धता, शौचालय का प्रकार, गंदे पानी की निकासी, रेडियो/ट्रांजिस्टर, स्नान की सुविधा, रसोई की उपलब्धता और एलपीजी/पीएनजी कनेक्शन तथा खाना पकाने के लिए उपयोग होने वाला मुख्य ईंधन से जुड़ी जानकारी ली जाएगी।

अंत में टेलीविजन, इंटरनेट की सुविधा, लैपटॉप या कंप्यूटर, टेलीफोन/मोबाइल फोन/स्मार्टफोन, साइकिल/स्कूटर/मोटरसाइकिल/मोपेड, कार/जीप/वैन, साथ ही घर में खाया जाने वाला मुख्य अनाज और जनगणना से संबंधित संपर्क के लिए मोबाइल नंबर की जानकारियाँ दर्ज की जाएँगी।

पूछे जाने वाले सवालों की पूरी सूची

भवन संख्या (नगरपालिका/स्थानीय प्राधिकरण/जनगणना संख्या)
जनगणना मकान संख्या
मकान के फर्श की प्रमुख सामग्री
मकान की दीवार की प्रमुख सामग्री
मकान की छत की प्रमुख सामग्री
मकान का उपयोग
मकान की स्थिति
घरेलू संख्या
घर में सामान्य रूप से रहने वाले कुल व्यक्तियों की संख्या
परिवार के मुखिया का नाम
परिवार के मुखिया का लिंग
क्या मुखिया अनुसूचित जाति/अनुसूचित जनजाति/अन्य से संबंधित है
मकान का स्वामित्व
परिवार के पास उपलब्ध कमरों की संख्या
घर में रहने वाले विवाहित जोड़ों की संख्या
पीने के पानी का मुख्य स्रोत
पीने के पानी की उपलब्धता
रोशनी का मुख्य स्रोत
शौचालय की सुविधा
शौचालय का प्रकार
गंदे पानी की निकासी
स्नान की सुविधा
रसोई और एलपीजी/पीएनजी कनेक्शन की उपलब्धता
खाना पकाने के लिए मुख्य ईंधन
रेडियो/ट्रांजिस्टर
टेलीविजन
इंटरनेट की सुविधा
लैपटॉप/कंप्यूटर
टेलीफोन/मोबाइल फोन/स्मार्टफोन
साइकिल/स्कूटर/मोटरसाइकिल/मोपेड
कार/जीप/वैन
घर में खाया जाने वाला मुख्य अनाज
मोबाइल नंबर (केवल जनगणना से संबंधित संपर्क के लिए)

करीब 11,718 करोड़ रुपए की लागत से होने वाली यह विशाल जनगणना दो चरणों में कराई जाएगी। पहला चरण अप्रैल से सितंबर के बीच हाउस-लिस्टिंग और हाउसिंग जनगणना का होगा, जबकि दूसरा चरण फरवरी 2027 में जनसंख्या गणना के रूप में पूरा किया जाएगा।

वैदिक सूर्य पूजा और खगोलीय ज्ञान की जीवंत परंपरा, गुजरात के मोढेरा सूर्य मंदिर में ‘उत्तरार्ध महोत्सव’ का आयोजन

गुजरात के मोढेरा सूर्य मंदिर में 17-18 जनवरी 2026 को उत्तरार्ध महोत्सव, सूर्य पूजा, गुरु-शिष्य परंपरा, ओडिसी, भरतनाट्यम, कथक, खगोल विज्ञान और वैदिक संस्कृति का समागम हुआ।

गुजरात के ऐतिहासिक मोढेरा सूर्य मंदिर में 17 और 18 जनवरी 2026 को दो दिवसीय ‘उत्तरार्ध महोत्सव’ का आयोजन किया गया। यह उत्सव सूर्य पूजा और गुरु-शिष्य परंपरा को समर्पित है, जिसमें ओडिसी, भरतनाट्यम, कथक, मणिपुरी, कुचिपुड़ी, कथकली और सतरिया जैसे प्रमुख शास्त्रीय नृत्यों की प्रस्तुतियाँ हुई।

यह आयोजन केवल सांस्कृतिक कार्यक्रम तक सीमित नहीं है। मोढेरा का सूर्य मंदिर भारतीय परंपरा का जीवंत प्रतीक है, जहाँ धर्म, विज्ञान, खगोल विज्ञान, समय की गणना और कला एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं।

उत्तरार्ध्द महोत्सव जैसे आयोजनों के माध्यम से मोढेरा केवल पर्यटन स्थल नहीं रहता, बल्कि सूर्य उपासना और ऋतु चक्रों पर आधारित उस भारतीय संस्कृति को आधुनिक रूप में प्रस्तुत करता है, जिसकी जड़ें वैदिक काल तक जाती हैं।

उत्तरार्ध्द महोत्सव क्या है?

मोढेरा में आयोजित यह उत्सव भारत की उस प्राचीन परंपरा की याद दिलाता है, जिसमें सूर्य को जीवन, समय और ऋतुओं के चक्र का आधार माना गया है। इस आयोजन में भले ही शास्त्रीय नृत्य प्रस्तुतियाँ हों, लेकिन इसका असली महत्व सूर्य और समय की भारतीय समझ से जुड़ा हुआ है।

दरअसल, ‘ उत्तरार्ध्द ’ शब्द संस्कृत से लिया गया है। उत्तर का अर्थ है उत्तर दिशा और अर्ध का मतलब है आधा या मध्य भाग। उत्तरार्ध महोत्सव उत्तरायण के बाद, सूर्य के उत्तर दिशा में बढ़ते मार्ग के मध्य चरण में मनाया जाता है। यह समय शीत ऋतु के अंत का होता है, जब दिन धीरे-धीरे लंबे होने लगते हैं।

उत्तरायण के बाद सूर्य धनु राशि से मकर राशि में प्रवेश करता है और उत्तर की ओर अपनी यात्रा शुरू करता है। जब यह यात्रा अपने मध्य या आधे हिस्से में पहुँचती है, उसी काल को उत्तरार्ध कहा जाता है। यह वह समय है जब ठंड कम होने लगती है, प्रकृति में नई ऊर्जा का संचार होता है और जीवन के नए अंकुर दिखाई देने लगते हैं।

भारतीय परंपरा में समय को हमेशा सूर्य की गति से जोड़ा गया है। दिन-रात, ऋतुएँ, महीने और वर्ष सब कुछ सूर्य की यात्रा पर आधारित रहा है। इसी कारण भारत के अधिकांश त्योहार, जैसे मकर संक्रांति और ऋतु परिवर्तन से जुड़े पर्व, सूर्य से जुड़े हुए हैं।

यह समझना जरूरी है कि ‘उत्तरार्ध महोत्सव’ किसी एक धार्मिक ग्रंथ में दर्ज विशेष पर्व नहीं है, बल्कि यह समय के उस शाश्वत चक्र का प्रतीक है, जिसमें सूर्य को ‘समय का स्वामी’ माना गया है। मोढेरा सूर्य मंदिर में आयोजित यह महोत्सव भी इसी सूर्य उपासना और काल-चक्र की भारतीय परंपरा को समर्पित है।

‘अयन’ क्या है? उत्तरायण-दक्षिणायन की परिभाषा

भारतीय पंचांग और धार्मिक परंपरा में सूर्य की गति को दो मुख्य भागों में समझा गया है, उत्तरायण और दक्षिणायन। सरल भाषा में कहें तो वर्ष के एक हिस्से में सूर्य उत्तर दिशा की ओर और दूसरे हिस्से में दक्षिण दिशा की ओर चलता है। इसी वजह से भारतीय परंपरा में उत्तरायण को बदलाव और शुभ शुरुआत का समय माना जाता है।

उत्तरायण का आध्यात्मिक महत्व महाभारत में भी दिखाई देता है। भीष्म पर्व के अनुसार, भीष्म पितामह ने अपनी इच्छा से उत्तरायण आने तक देह त्यागने की प्रतीक्षा की थी। यह कथा बताती है कि उस समय को आत्मिक दृष्टि से विशेष और पवित्र माना जाता था।

यह मान्यता दर्शाती है कि भारतीय संस्कृति में समय को केवल तिथियों या कैलेंडर के रूप में नहीं देखा गया, बल्कि सूर्य की गति के साथ जुड़े उसके आध्यात्मिक अर्थ को भी गहराई से समझा गया है।

वैदिक काल से ही सूर्य पूजा का प्रचलन रहा है

सूर्य पूजा भारत में केवल एक आस्था नहीं, बल्कि वैदिक जीवन-पद्धति की एक मजबूत आधारशिला रही है। ऋग्वेद (ऋग्वेद 1.50.4) में सूर्य को प्रत्यक्ष देवता माना गया है, जो प्रकाश देता है, जीवन को चलायमान रखता है और सही मार्ग दिखाता है। वैदिक दृष्टि में सूर्य केवल भौतिक रोशनी का स्रोत नहीं है, बल्कि ब्रह्मांडीय व्यवस्था, सत्य और अनुशासन का प्रतीक भी है।

इसी कारण भारत में सूर्य का स्मरण केवल पूजा तक सीमित नहीं रहा। यह एक अनुशासित जीवनशैली का हिस्सा बना, जिसमें दैनिक दिनचर्या, ऋतुओं के अनुसार जीवन, धर्म और कर्म का संतुलन शामिल है। उपनिषदों में भी सूर्य को प्रकाश, जीवन और चेतना का प्रतीक माना गया है। यह निरंतर परंपरा बताती है कि भारतीय संस्कृति में धर्म का अर्थ केवल पूजा-पाठ नहीं, बल्कि प्रकृति और जीवन के साथ सामंजस्य है।

पुराणों में सूर्य को आदित्य कहा गया है और नौ ग्रहों में इसे सबसे प्रमुख माना गया है। सूर्य को सिर्फ ऊष्मा या ऊर्जा का स्रोत नहीं, बल्कि धर्म का साक्षी, प्रत्यक्ष देवता और प्रकाश का आधार माना गया। इसी विश्वास के कारण भारत के अलग-अलग हिस्सों में सूर्य पूजा की परंपराएँ अलग रूपों में विकसित हुईं, कहीं अर्घ्य देने की परंपरा, कहीं उपवास, कहीं विशेष पूजा और कहीं सूर्य मंदिरों का निर्माण।

इसी सूर्य उपासना की परंपरा से मोढेरा में आयोजित होने वाला उत्तरार्ध महोत्सव भी जुड़ा है। उत्तरायण के बाद जब सूर्य उत्तर दिशा की ओर बढ़ते हुए शीत ऋतु के अंत का संकेत देता है और दिन लंबे होने लगते हैं, तब मोढेरा सूर्य मंदिर में यह उत्सव मनाया जाता है। इसका नाम किसी नई कल्पना से नहीं, बल्कि सूर्य की गति और ऋतु परिवर्तन के गहरे सांस्कृतिक अर्थ से प्रेरित है।

मोढेरा सूर्य मंदिर: धर्म और विज्ञान का संगम

मोढेरा का सूर्य मंदिर भारत की उस परंपरा का जीवंत उदाहरण है, जहाँ मंदिर केवल पूजा का स्थान नहीं थे, बल्कि खगोल विज्ञान और उत्कृष्ट स्थापत्य ज्ञान के केंद्र भी हुआ करते थे। ऐसे मंदिरों में दिशा, सूर्य का प्रकाश, समय और ऋतुओं का विशेष ध्यान रखा जाता था।

इससे यह स्पष्ट होता है कि भारतीय सनातन परंपरा में आस्था और विज्ञान के बीच कोई टकराव नहीं था, बल्कि दोनों एक-दूसरे के पूरक थे। यही कारण है कि मोढेरा जैसे मंदिर आज भी केवल पत्थर की इमारत नहीं, बल्कि पूरी सभ्यता का संदेश देते हैं।

वैदिक काल और रामायण-महाभारत में मोढेरा का उल्लेख अन्य नामों से मिलता है, लेकिन वर्तमान सूर्य मंदिर का निर्माण 11वीं शताब्दी में हुआ माना जाता है। यह मंदिर सोलंकी वंश के राजा भीमदेव प्रथम के शासनकाल में बना था।

राजा भीमदेव स्वयं को सूर्यवंशी मानते थे और यह पहचान केवल शासन तक सीमित नहीं थी, बल्कि मंदिर की वास्तुकला और धार्मिक भाव में भी साफ दिखाई देती है। मंदिर की दीवारों पर बारह आदित्यों की सुंदर नक्काशी की गई है, जो वैदिक परंपरा में सूर्य के बारह रूपों का प्रतीक हैं।

मंदिर की वास्तुकला का सबसे खास पहलू इसका खगोलीय संरेखण है। वसंत विषुव के दिन, जब दिन और रात बराबर होते हैं, सूर्य की पहली किरणें सीधे मंदिर के गर्भगृह में प्रवेश करती हैं और भगवान सूर्य के मुकुट पर पड़ती हैं।

इससे पूरा मंदिर प्रकाश से भर उठता है। यह उस समय के वैदिक खगोल विज्ञान और वैज्ञानिक समझ का अद्भुत उदाहरण है। मंदिर की दिशा, संरचना और सूर्य की गति के बीच यह सामंजस्य दिखाता है कि प्राचीन भारत में धर्म, विज्ञान और वास्तुकला को एक साथ जोड़ा गया था।

आज मोढेरा में आयोजित होने वाला उत्तरार्ध महोत्सव इसी परंपरा को आधुनिक समय से जोड़ता है। यह उत्सव सूर्य पूजा, जीवन चक्र और समय की भारतीय समझ को नए संदर्भ में प्रस्तुत करता है।

यह संदेश देता है कि भारतीय सभ्यता में समय केवल कैलेंडर तक सीमित नहीं, बल्कि संस्कृति का अहम हिस्सा है। मोढेरा सूर्य मंदिर और यहाँ होने वाला उत्तरार्ध महोत्सव इस जीवंत परंपरा की निरंतरता का प्रतीक हैं, जहाँ सूर्य उपासना, भारतीय कालगणना और शास्त्रीय कला एक साथ दिखाई देती हैं।

यह मंदिर गुजरात, में मोढेरा गाँव में स्थित है, जो महेसाणा से 25 कि॰मी॰ और अहमदाबाद से 106 कि॰मी॰ दूर पर स्थित है।

(यह रिपोर्ट मूल रूप से गुजराती में भार्गव राज्यगुरु ने लिखी है, मूल रिपोर्ट पढ़ने के लिए इस लिंक  https://gujarati.opindia.com/explainer/what-is-uttarardha-mahotsav-celebrated-at-modhera-sun-temple/  पर क्लिक करें।)
 
साभार –https://hindi.opindia.com/ से 

बसंत पंचमी पर हिंदू सुबह-शाम करेंगे पूजा, मुस्लिम दोपहर में पढ़ेंगे जुमे की नमाज

भोजशाला विवाद पर सुप्रीम कोर्ट का फैसला, धार में 8000+ सुरक्षाकर्मी तैनात

मध्य प्रदेश के धार की ऐतिहासिक भोजशाला में कल बसंत पंचमी और जुमे की नमाज एक साथ होने के कारण छिड़ा विवाद अब शांत हो गया है। सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार (22 जनवरी 2026) को एक बड़ा फैसला सुनाते हुए साफ किया है कि कल वहाँ पूजा और नमाज दोनों होगी।

कोर्ट के आदेश के मुताबिक, दोपहर 1 बजे तक हिंदू पक्ष पूजा कर सकेगा, जिसके बाद 1 से 3 बजे के बीच मुस्लिम पक्ष को नमाज अदा करने का समय दिया गया है। 3 बजे के बाद हिंदू पक्ष फिर से अपनी पूजा जारी रख सकेगा। कोर्ट ने प्रशासन को निर्देश दिए हैं कि दोनों पक्षों के लिए अलग-अलग जगह और विशेष पास की व्यवस्था की जाए।

हिंदू पक्ष की ओर से वकील विष्णु शंकर जैन ने माँग की थी कि बसंत पंचमी के दिन पूरे समय सिर्फ पूजा की इजाजत दी जाए और नमाज को रोका जाए। उनका कहना था कि पूजा सूर्योदय से सूर्यास्त तक चलती है।

वहीं, मुस्लिम पक्ष की तरफ से सलमान खुर्शीद ने पैरवी की। दोनों पक्षों को सुनने के बाद चीफ जस्टिस सूर्यकांत की बेंच ने कहा कि दोनों समुदाय प्रार्थना कर सकते हैं, बस प्रशासन को सुरक्षा और व्यवस्था का ध्यान रखना होगा। मध्य प्रदेश सरकार ने भी कोर्ट को भरोसा दिलाया है कि कानून-व्यवस्था की कोई समस्या नहीं होने दी जाएगी।

इस संवेदनशील मामले को देखते हुए धार जिले में सुरक्षा के बेहद कड़े इंतजाम किए गए हैं। पूरे शहर में 8000 से ज्यादा पुलिसकर्मी और सुरक्षा बल तैनात हैं। चप्पे-चप्पे पर सीसीटीवी से नजर रखी जा रही है। प्रशासन ने पहले ही भोजशाला के 300 मीटर के दायरे को ‘नो-फ्लाइंग जोन’ बना दिया है, यानी वहां ड्रोन या कोई भी उड़ने वाली चीज ले जाना सख्त मना है।

भोजशाला को हिंदू पक्ष माँ सरस्वती का मंदिर (वाग्देवी) मानता है, जबकि मुस्लिम पक्ष इसे कमाल मौला की मस्जिद कहता है। साल 2003 से यहाँ की व्यवस्था यह थी कि मंगलवार को हिंदू पूजा करते थे और शुक्रवार को नमाज होती थी। लेकिन इस बार 23 जनवरी को बसंत पंचमी और शुक्रवार एक ही दिन पड़ गए, जिससे यह मामला गरमा गया। फिलहाल, एएसआई (ASI) के सर्वे की रिपोर्ट भी कोर्ट में लंबित है।

किसी भी तरह के तनाव से बचने के लिए प्रशासन ने सड़कों पर टायर, मलबा या निर्माण सामग्री रखने पर भी रोक लगा दी है। उल्लंघन करने वालों पर सख्त कार्रवाई की चेतावनी दी गई है। स्थानीय लोगों और श्रद्धालुओं से शांति बनाए रखने की अपील की गई है ताकि कोर्ट के आदेश का पालन करते हुए दोनों पक्षों के धार्मिक आयोजन शांतिपूर्ण ढंग से संपन्न हो सकें।