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गीता प्रेस गोरखपुर ने हमारी धार्मिक, सांस्कृतिक व अध्यात्मिक धारा को नया जीवन दियाःश्री अमित शाह

केन्द्रीय गृह एवं सहकारिता मंत्री श्री अमित शाह ने आज उत्तराखंड के ऋषिकेश में गीता प्रेस द्वारा प्रकाशित मासिक पत्र ‘कल्याण’ के शताब्दी अंक विमोचन समारोह को संबोधित किया

केन्द्रीय गृह एवं सहकारिता मंत्री श्री अमित शाह ने उत्तराखंड के ऋषिकेश में गीता प्रेस द्वारा प्रकाशित मासिक पत्र ‘कल्याण’ के शताब्दी अंक के विमोचन समारोह को संबोधित किया। केन्द्रीय गृह मंत्री ने लक्ष्मीनारायण मंदिर एवं मां गंगा के दर्शन और पूजन भी किया। इस अवसर पर उत्तराखंड के मुख्यमंत्री श्री पुष्कर सिंह धामी सहित अनेक गणमान्य व्यक्ति उपस्थित थे।

केन्द्रीय गृह एवं सहकारिता मंत्री श्री अमित शाह ने कहा कि सनातन धर्म से आकांक्षा रखने वाला, दुनिया की समस्याओं के समाधान लिए भारतीय संस्कृति की ओर देख रहा है और इस भूमि से प्रेम करने वाला भारत और दुनिया का कोई भी व्यक्ति गीता प्रेस से अनजान नहीं हो सकता। उन्होंने कहा कि पूज्य भाई जी हनुमान प्रसाद पोद्दार जी ने गीता प्रेस के माध्यम से लगभग 103 वर्षो से सनातन धर्म की लौ को ताकत देने का काम किया है। उन्होंने करोडों लोगों को भक्ति के माध्यम से आध्यात्म की ओर प्रेरित किया और इस रास्ते पर चलते हुए मोक्ष तक का रास्ता प्रशस्त किया। श्री शाह ने कहा कि पोद्दार जी ने सब कुछ छोड़कर अपना पूरा जीवन गीता प्रेस को समर्पित किया। पोद्दार जी ने गीता प्रेस के माध्यम से हर व्यक्ति और परिवार के हृदय में भारतीय संस्कृति के प्रति अटूट श्रद्धा निर्मित करने का काम किया है।

श्री अमित शाह ने कहा कि गीता प्रेस मुनाफे के लिए नहीं बल्कि पीढ़ियों का निर्माण करने के लिए चलती है। स्वावलंबी तरीके से सद्साहित्य को करोड़ों लोगों तक पहुंचाने का काम गीता प्रेस ने किया है। उन्होंने कहा कि कल्याण एक प्रकार से ज्ञान की सनातन ज्योति को हर वाचक तक पहुंचाने का प्रयास कर रहा है। श्री शाह ने कहा कि आज सनातन चेतना का उत्सव देश में दिखाई दे रहा है और कल्याण ने हर संकट में भारतीय संस्कृति के दीप को जलाए रखने का काम किया है। उन्होंने कहा कि कल्याण एक पत्रिका मात्र नहीं है बल्कि भारतीयों के लिए आध्यात्मिक जगत का पथप्रदर्शक है। भारत की संस्कृति को अमर करने के लिए बहुत सारे महत्वपूर्ण प्रयासों में से सबसे मज़बूत प्रयास का नाम कल्याण पत्रिका है। उन्होंने कहा कि कल्याण ने अपने 100 साल में सनातन धर्म के अनुयायियों की सज्जनशक्ति को संगठित करने का काम किया है। उन्होंने कहा कि जो भारत को जानते हैं वो गीता प्रेस के अतुलनीय योगदान का मूल्यांकन नहीं कर सकते।

केन्द्रीय गृह मंत्री ने कहा कि कल्याण जैसी पत्रिका का 100 वर्ष पूरा करना एक बहुत बड़ी उपलब्धि है। अपनी शुरूआत से लेकर आज तक निरंतर कल्याण का एक एक शब्द, वाक्य और अंक, सनातन धर्म और भारतीय संस्कृति को समर्पित रहा है। उन्होंने कहा कि गीता प्रेस ने आदि शंकराचार्य जी के उपनिषदों की मीमांसा को लोगों तक पहुंचाकर एक बहुत बड़ा काम किया है। श्री शाह ने कहा कि गीता प्रेस ने चार पीढ़ियों से निरंतर हर पीढ़ी के लिए वही साहित्य बिना किसी प्रकार से डाइल्यूट किए लोकभोग्य बनाने का काम किया है।

श्री अमित शाह ने कहा कि कल्याण ने अब तक सनातन समर्पित 100 विशेषांक प्रकाशित किए हैं। उन्होंने कहा कि 1932 के अंक में श्री कृष्ण को श्रद्धा की दृष्टि से, राजनीतिज्ञ, तत्वज्ञानी और सभी दुष्टों का दमन करने वाले महापुरुष के रूप में एक ही अंक में कल्याण ने लोगों के सामने रखने का काम किया है। उन्होंने कहा कि कल्याण ने योग अंक 1936 में प्रकाशित किया था, जिसमें योग की व्याख्या, स्वरूप और प्रणालियों पर विस्तार से प्रकाश डालने का काम किया गया था। स्वतंत्रता के बाद कल्याण का पहला प्रकाशित होने वाला अंक नारी अंक था। उन्होंने कहा कि कल्याण का हिंदू संस्कृति अंक उस समय आया जब 1950 में पाश्चात्य असर से हमारे देश की नीतियां गढ़ी जा रही थीं। श्री शाह ने कहा कि इस अंक के पीछे विचार रहा होगा कि जब देश आज़ाद होकर अपनी नीतियां बना रहा है तब उनके मूल में हमारी भारतीय संस्कृति के विचार समाहित होने चाहिए न कि विदेशी विचार होने चाहिए। उन्होंने कहा कि आज कल्याण के शताब्दी वर्ष में प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी जी के नेतृत्व में सांस्कृतिक मूल्यों को नीतियों के मूल में समाहित कर, नीतियों को गढ़ा जा रहा है।

केन्द्रीय गृह एवं सहकारिता मंत्री ने कहा कि जब अंग्रेज़ों का शासन था उस वक्त धर्म को अंधविश्वास कहना एक प्रकार से फैशन बन चुका था, उस वक्त भाई जी ने किसी प्रकार की आक्रामक भाषा का उपयोग किए बिना, कल्याण नाम का ज्ञान का एक दीपक जलाने का काम किया। इसका उद्देश्य लोगों का मंगल और जगत का कल्याण ही था। उन्होंने कहा कि पूरे विश्व के कल्याण की भावना को कल्याण में समाहित किया गया है। श्री शाह ने कहा कि तर्क, शास्त्र और शांति के माध्यम से जितना विरोध हमारे मूल विचारों का होता था, पोद्दार जी ने उसका उत्तर दिया। उन्होंने कहा कि सनातन की रक्षा शोर से नहीं बल्कि शास्त्र और तर्क से ही हो सकती है। श्री शाह ने कहा कि गीता प्रेस ने कभी अपने प्रचार और धन एकत्रित करने के लिए कुछ नही किया क्योंकि इसका उद्देश्य व्यक्ति-केन्द्रित नहीं बल्कि विचार-केन्द्रित था। गृह मंत्री ने कहा कि कल्याण ने हमें बताया कि सभ्यताएं तलवार से नहीं बल्कि शब्दों और ज्ञान से ही खड़ी होती हैं और शब्द तभी प्रभावी होते हैं जब वो सत्य और सत्व के प्रकाश से चमकते हों।

श्री अमित शाह ने कहा कि जब कल्याण शुरू हुआ तब महात्मा गांधी ने कहा था कि कल्याण में कभी विज्ञापन मत छापना और आज तक कल्याण ने एक भी विज्ञापन नहीं छापा है। उन्होंने कहा कि आध्यात्मिक ग्रथों और पत्रिकाओं को बाज़ार के दबाव से मुक्त रहना चाहिए। श्री शाह ने कहा कि गीता प्रेस का उद्देश्य चरित्र और राष्ट्र निर्माण है। गीता प्रेस ने अनेक प्रकार के साहित्यों की रचना की है और जिससे राष्ट्र में एक चेतना की जागृति हुई है। गीता प्रेस ने करोड़ों संतों के अहर्निश प्रयास को रेखांकित कर लोगों को पढ़ने के लिए उपलब्ध कराया है। इसके कारण हम एक बार फिर से सनातन धर्म के प्रति आकर्षण, आशा और भारतीय संस्कृति में विश्वास दृढ़ होता देख रहे हैं।

केन्द्रीय गृह मंत्री ने कहा कि प्रधानमंत्री मोदी जी के 11 साल के कार्यकाल में हमारे युवाओं में एक बहुत बड़ा गुणात्मक परिवर्तन आया है। उन्होंने कहा कि 550 साल बाद रामलला का एक गगनचुंबी मंदिर अयोध्या में बन चुका है। औरंगजेब द्वारा तोड़ा गया काशी विश्वनाथ कॉरीडोर पूरी दुनिया को संदेश देता है कि तोड़ने वालों से श्रद्धा की ताकत बहुत बड़ी होती है। हाल ही में सोमनाथ मंदिर को तोड़े हुए 1000 साल हुए हैं औऱ भारत सरकार पूरा वर्ष सोमनाथ स्वाभिमान वर्ष के रूप में मनाने जा रही है। सोमनाथ को 16 बार तोड़ा गया और इसे 16 बार फिर से बनाया गया है और इसे तोड़ने वाले गज़नी, खिलजी आदि सब कहीं गुम हो गए लेकिन सोमनाथ की सनातन की ध्वजा आज भी लहरा रही है। श्री शाह ने कहा कि कश्मीर से धारा 370 हट गई, महाकालेश्वर का कॉरिडोर बना, केदारनाथ का पुनर्रूद्धार किया गया, बद्रीधाम का स्ट्रेच पूरा हो चुका है। देशभर में 35 से अधिक तीर्थों की पुनर्जागृति और महिमामंडन पर विचार हो रहा है। उन्होंने कहा कि मातृभाषा में शिक्षा का अब कोई विरोध नहीं हो रहा है। श्री शाह ने कहा कि प्रधानमंत्री मोदी जी विश्व में हर जगह हिंदी में बोलते हैं तो पूरे देश का सीना गर्व से चौड़ा हो जाता है। उन्होंने कहा कि भारत से चुराकर पूरी दुनिया में गई 642 से अधिक मूर्तियों को वापिस लाकर उनके पहले के स्थान पर पुनर्स्थापित करने का भी काम हुआ है। श्री शाह ने कहा कि करोड़ों संतों ने विकट समय में धर्म, सत्व और संस्कृति के संरक्षण, संवर्धन और गीता प्रेस और कल्याण जैसी पत्रिकाओं ने सनातन की लौ को हमेशा बचाकर रखा है।

वंदे मातरम के 150 वर्ष पूर्ण होने का उत्सव

भारत अपने राष्ट्रीय गीत ‘वंदे मातरम’ के 150 वर्ष पूर्ण होने का उत्‍सव देश भर के प्रमुख सार्वजनिक स्थलों पर सामूहिक गायन, सांस्कृतिक कार्यक्रमों और मिलिट्री बैंड प्रदर्शन के माध्यम से मना रहा है। इस उत्सव का उद्देश्य राष्ट्रीय गौरव और एकता को बढ़ावा देना है।

इन समारोहों के एक अंग के रूप में भारतीय वायु सेना (आईएएफ) के 31 संगीतकारों से युक्‍त बैंड ने 21 जनवरी 2026 को नई दिल्ली के राजीव चौक स्थित एम्फीथिएटर में प्रदर्शन किया। 45 मिनट की इस प्रस्तुति में ब्रास, बांसुरी, स्ट्रिंग और इलेक्ट्रॉनिक वाद्ययंत्रों से ग्यारह मनमोहक धुनें प्रस्तुत की गईं। इस प्रस्‍तुति में ‘वंदे मातरम’ और ‘सिंदूर’ गीत, जिन्‍हें ऑपरेशन सिंदूर के दौरान भारतीय सशस्त्र बलों की वीरता को याद करने के लिए तैयार किया गया था, प्रस्तुति के मुख्य आकर्षण रहे।

संगीत सदियों से भारतीय संस्कृति का एक अनमोल रत्न रहा है। यह भारत की समृद्ध सैन्य विरासत का भी अभिन्न अंग है, जो एकता को सुदृढ़ करता है और वीरता की प्रेरणा देता है। 1944 में अपनी स्थापना के बाद से भारतीय वायु सेना बैंड, भारतीय और पश्चिमी संगीत की विविधतापूर्ण प्रस्तुतियों के साथ, देश की सैन्य परंपरा का एक महत्वपूर्ण स्तंभ रहा है। भारतीय वायु सेना बैंड का उद्देश्य अपने मनमोहक प्रदर्शनों के माध्यम से देशभक्ति की भावना को प्रेरित करना और एकता का प्रसार करना है।

संस्कृति मंत्रालय 2026 के गणतंत्र दिवस पर ‘वंदे मातरम् के 150 वर्ष’ विषय पर झांकी प्रस्तुत करेगा

संस्कृति मंत्रालय 2026 की गणतंत्र दिवस परेड में ‘वंदे मातरम् के 150 वर्ष’ विषय पर एक झांकी प्रस्तुत करेगा, जिसमें राष्ट्रीय गीत को भारत की सभ्यतागत स्मृति, सामूहिक चेतना और सांस्कृतिक निरंतरता की एक जीवंत अभिव्यक्ति के रूप में दिखाया जाएगा।

इस विषय(थीम) की जानकारी देते हुए संस्कृति मंत्रालय के सचिव श्री विवेक अग्रवाल ने कहा कि भारत की गणतंत्र दिवस झांकियां सिर्फ औपचारिक प्रदर्शन नहीं होतीं, बल्कि वे राष्ट्र की सभ्यतागत स्मृति के चलते-फिरते अभिलेख होती हैं। हर वर्ष, ये झांकियां विचारों, मूल्यों और ऐतिहासिक अनुभवों को एक साझा दृश्य भाषा में रूपांतरित करती हैं और यह पुनः स्थापित करती हैं कि संस्कृति गणराज्य का सिर्फ एक अलंकरण मात्र नहीं है, बल्कि उसकी जीवंत आत्मा है। इसी निरंतर परंपरा में वंदे मातरम् का स्थान विशिष्ट और शाश्वत है।

उन्होंने कहा कि एक समय क्रांतिकारियों के ओठों पर गूंजने वाला और कारागारों, सभाओं तथा जुलूसों में गाया जाने वाला वंदे मातरम् सिर्फ एक गीत नहीं है। श्री अरबिंदो ने इसमें ऐसी आध्यात्मिक शक्ति देखी थी जो सामूहिक चेतना को जगाने में सक्षम थी—एक ऐसा विजन जिसे इतिहास ने सच साबित किया है। वर्ष 1875 में बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय द्वारा रचित इस गीत ने राष्ट्र को ‘माता’ के रूप में कल्पित किया गया—सुजलाम्, सुफलाम्—जो प्रकृति, पालन-पोषण और आंतरिक शक्ति से परिपूर्ण है। औपनिवेशिक काल में इसने आत्मसम्मान और आत्मविश्वास को पुनर्स्थापित किया, भक्ति को साहस में, कविता को संकल्प में बदला और भारतवासियों को क्षेत्र, भाषा और धर्म से परे एक साझा स्वतंत्रता की आकांक्षा में एकजुट किया।

संस्कृति मंत्रालय की 2026 की गणतंत्र दिवस झांकी इस लंबी और बहुआयामी यात्रा को एक सशक्त दृश्य रूप प्रदान करती है। झांकी में चलते हुए ट्रैक्टर पर वंदे मातरम् की मूल पांडुलिपि प्रदर्शित की गई है, जिसके पीछे भारत के चारों दिशाओं से आए लोक कलाकार हैं, जो देश की सांस्कृतिक विविधता को दिखा रहे हैं। झांकी के केंद्र में वर्तमान पीढ़ी को ‘जेन-जी’ के रूप में दर्शाया गया है, जो विष्णुपंत पगनिस की ऐतिहासिक प्रस्तुति से प्रेरित होकर वंदे मातरम् गा रही है। राग सारंग में उनके द्वारा रिकॉर्ड किया गया यह संस्करण, जिसमें औपनिवेशिक सेंसरशिप से बचने के लिए पदों के क्रम में परिवर्तन किया गया था, स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान कलात्मक प्रतिरोध का एक महत्वपूर्ण उदाहरण बन गया।

वर्ष 2021 से इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र(आईजीएनसीए) को संस्कृति मंत्रालय की गणतंत्र दिवस झांकी की परिकल्पना और क्रियान्वयन की जिम्मेदारी सौंपी गई है। इन वर्षों में आईजीएनसीए ने भारत की दार्शनिक, ऐतिहासिक और सांस्कृतिक नींव पर आधारित थीम तैयार किया है और उन्हें एक ऐसे दृश्य माध्यम से पेश किया है जो सभी पीढ़ियों को पसंद आते हैं और उनके बीच संवाद स्थापित करते हैं। वर्ष 2026 की झांकी भी इसी विजन को आगे बढ़ाती है और वंदे मातरम् को सिर्फ एक ऐतिहासिक रचना नहीं, बल्कि नैतिक, सांस्कृतिक और भावनात्मक प्रेरणा के सतत स्रोत के रूप में स्थापित करती है।

इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र(आईजीएनसीए) के सदस्य सचिव डॉ. सच्चिदानंद जोशी ने कहा कि संस्कृति मंत्रालय की झांकी किसी एक मंत्रालय या विभाग का प्रतिनिधित्व ही नहीं करती, बल्कि देश की सामूहिक भावनाओं, इतिहास और राष्ट्रीय चेतना को अभिव्यक्त करती है। उन्होंने बताया कि गणतंत्र दिवस परेड के लिए संस्कृति मंत्रालय की झांकी का विषय(थीम) ‘वंदे मातरम् के 150 वर्ष’ तय किया गया है, जो कलात्मक अभिव्यक्ति के जरिए राष्ट्रीय गीत की प्रेरणादायक ऐतिहासिक और सांस्कृतिक यात्रा को दिखाएगी।

डॉ. जोशी ने यह भी बताया कि पिछले छह वर्षों से आईजीएनसीए संस्कृति मंत्रालय की गणतंत्र दिवस झांकी को परिकल्पित करने और उसे बनाने की ज़िम्मेदारी संभाल रहा है। जबकि अधिकांश मंत्रालय और राज्य अपनी विशिष्ट उपलब्धियों या कार्यक्रमों को प्रदर्शित करते हैं, वहीं संस्कृति मंत्रालय एक अलग तरीका अपनाते हुए विविध सांस्कृतिक आयामों को एक साथ समाहित करता है—-और यही विजन वर्ष 2026 के लिए ‘वंदे मातरम् के 150 वर्ष’ विषय(थीम) में परिलक्षित होता है।

जब भारत गणतंत्र दिवस 2026 का उत्सव मनाएगा, तब वंदे मातरम् देश से सिर्फ आजादी को स्मरण करने का ही नहीं, बल्कि उसके योग्य बने रहने का भी आह्वान करेगा। इस प्रस्तुति के माध्यम से संस्कृति मंत्रालय राष्ट्रीय गीत को भारत की एकता, सांस्कृतिक गहराई और शाश्वत चेतना के प्रतीक के रूप में पुनः स्थापित करना चाहता है—जो स्वतंत्रता संग्राम की स्मृतियों को वर्तमान की जिम्मेदारियों और भविष्य की आकांक्षाओं से जोड़ता है।

भारतीय डाक विभाग करेगा 55वीं यूनिवर्सल पोस्टल यूनियन अंतरराष्ट्रीय पत्र लेखन प्रतियोगिता का आयोजन

पत्र लेखन की कला को बढ़ावा देने हेतु यूनिवर्सल पोस्टल यूनियन की वैश्विक पहल, ‘डिजिटल दुनिया में मानवीय जुड़ाव’ पर 9 से 15 साल तक के बच्चे लिखेंगे पत्र

 

भारतीय डाक विभाग द्वारा पत्र लेखन विधा को प्रोत्साहित करने के लिए प्रति वर्ष ‘यूनिवर्सल पोस्टल यूनियन अंतरराष्ट्रीय पत्र लेखन प्रतियोगिता’ का आयोजन 9 से 15 साल तक के बच्चों के लिए किया जाता है। इस संबंध में जानकारी देते हुए उत्तर गुजरात परिक्षेत्र, अहमदाबाद के पोस्टमास्टर जनरल श्री कृष्ण कुमार यादव ने बताया कि भारतीय डाक विभाग स्कूली छात्रों के बीच रचनात्मकता, आलोचनात्मक सोच और पत्र लेखन की कला को बढ़ावा देने के लिए यूनिवर्सल पोस्टल यूनियन (यूपीयू) की एक वार्षिक वैश्विक पहल के तहत युवाओं के लिए 55वीं यूपीयू अंतरराष्ट्रीय पत्र लेखन प्रतियोगिता-2026 का आयोजन करने जा रहा है। पत्र-लेखन का विषय है: “डिजिटल दुनिया में मानवीय जुड़ाव क्यों मायने रखता है, इस बारे में अपने किसी मित्र को पत्र लिखें।” पत्र हिंदी, अंग्रेजी या संविधान की आठवीं सूची में निर्दिष्ट किसी भी भाषा में 800 शब्दों की सीमा में लिखना होगा।

 

पोस्टमास्टर जनरल श्री कृष्ण कुमार यादव ने बताया कि प्रतियोगिता हेतु प्रविष्टियाँ भेजने की अन्तिम तिथि 13 मार्च, 2026 है। इच्छुक विद्यार्थी अपने विद्यालय के माध्यम से (जन्मतिथि सत्यापित करवाते हुए) निर्धारित आवेदन-पत्र (दो प्रतियों में) पासपोर्ट आकार की तीन नवीनतम फोटो साथ लगाकर संबंधित डाक अधीक्षक/प्रवर अधीक्षक को भेज सकते हैं। प्रतियोगिता हेतु आवेदन करने का प्रारूप सम्बन्धित प्रवर अधीक्षक/अधीक्षक कार्यालय से प्राप्त किया जा सकता है, हालांकि सभी मण्डलीय अधीक्षकों को व्यापक प्रचार व विभिन्न स्कूलों को प्रारूप उपलब्ध कराने के निर्देश दिये गये हैं। यदि विभिन्न स्कूलों-कालेजों के प्रधानाचार्य चाहें तो उक्त प्रतियोगिता डाक विभाग से मिलकर अपने स्तर पर भी स्वतंत्र रूप से करा सकते हैं। डाक विभाग प्रतियोगी प्रविष्टियों को उनसे एकत्र कर परिमंडलीय कार्यालय, गुजरात को भेजेगा।

 

पोस्टमास्टर जनरल श्री कृष्ण कुमार यादव ने बताया कि पत्र लेखन प्रतियोगिता का मूल्यांकन परिमण्डलीय स्तर पर गुजरात में किया जायेगा तथा श्रेष्ठ तीन पत्र लेखन को राष्ट्रीय स्तर पर सम्मिलित करने हेतु डाक निदेशालय, नई दिल्ली भेजा जायेगा। इसमें राज्य या परिमंडल स्तर पर चयनित शीर्ष तीन प्रतिभागियों को क्रमशः प्रथम, द्वितीय एवं तृतीय पुरस्कार के रूप में ₹25,000, ₹10,000 एवं ₹5,000 की पुरस्कार राशि प्रमाणपत्र सहित प्रदान की जाएगी। वहीं, राष्ट्रीय स्तर पर प्रथम, द्वितीय एवं तृतीय पुरस्कार के रूप में ₹50,000, ₹25,000 एवं ₹10,000 की पुरस्कार राशि प्रमाणपत्र सहित प्रदान की जाएगी। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर यूनिवर्सल पोस्टल यूनियन (यूपीयू) द्वारा प्रथम, द्वितीय एवं तृतीय पुरस्कार के रूप में स्वर्ण, रजत एवं कांस्य पदक, प्रमाणपत्र तथा अन्य आकर्षक पुरस्कार प्रदान किए जाएंगे। इसके अतिरिक्त, स्वर्ण पदक विजेता को यूपीयू मुख्यालय, बर्न (स्विट्ज़रलैंड) की यात्रा का अवसर अथवा यूपीयू द्वारा निर्धारित कोई अन्य विशेष पुरस्कार भी प्रदान किया जायेगा ।

 

पोस्टमास्टर जनरल श्री कृष्ण कुमार यादव ने बताया कि डिजिटल क्रांति के इस युग में, जहाँ संदेश क्षण भर में एक स्थान से दूसरे स्थान तक पहुँच जाते हैं, वहाँ पत्र लेखन का महत्व आज भी बना हुआ है। पत्र लिखना हमें ठहरकर सोचने और अपने विचारों को संयम एवं संवेदनशीलता के साथ व्यक्त करने का अवसर प्रदान करता है। हाथ से लिखा गया पत्र भावनाओं को संजोकर प्रस्तुत करने की एक सजीव कला है। इसमें केवल शब्द नहीं, बल्कि लेखक की अनुभूतियाँ और संवेदनाएँ भी समाहित होती हैं। यही कारण है कि हस्तलिखित पत्र शब्दों से कहीं अधिक, दिल की सच्ची आवाज़ होता है।

आधुनिक भारत के स्वप्नदृष्टा थे नेताजी सुभाष चंद्र बोस आजादी के लिए अपनी चिठ्ठी में पूछा-“मां, हम कब तक सोते रहेंगे?”

जयंती प्रसंग (23 जनवरी)

ये 1912 का साल था, उन्होंने अपनी मां को जो चिठ्ठी लिखी थी, वो चिट्ठी इस बात की गवाह है कि नेताजी सुभाष चंद्र बोस के मन में गुलाम भारत की स्थिति को लेकर कितनी वेदना थी। उस समय उनकी उम्र सिर्फ 15 साल थी। सैंकड़ों वर्षों की गुलामी ने देश का जो हाल कर दिया था, उसकी पीड़ा उन्‍होंने अपनी मां से पत्र के द्वारा साझा की थी। उन्‍होंने अपनी मां से पत्र में सवाल पूछा था कि, “मां, क्‍या हमारा देश दिनों-दिन और अधिक पतन में गिरता जाएगा? क्‍या ये दुखिया भारत माता का कोई एक भी पुत्र ऐसा नहीं है, जो पूरी तरह अपने स्‍वार्थ को तिलांजलि देकर, अपना संपूर्ण जीवन भारत मां की सेवा में समर्पित कर दे? बोलो मां, हम कब तक सोते रहेंगे?” इस पत्र में उन्‍होंने अपनी मां से पूछे गए सवालों का उत्तर भी दिया था। उन्‍होंने अपनी मां को स्‍पष्‍ट कर दिया था कि अब और प्रतीक्षा नहीं की जा सकती, अब और सोने का समय नहीं है, हमको अपनी जड़ता से जागना ही होगा, आलस्‍य त्‍यागना ही होगा और कर्म में जुट जाना होगा। अपने भीतर की इस तीव्र उत्‍कंठा ने उस किशोर सुभाष चंद्र को नेताजी सुभाष चंद्र बोस बनाया।

सफल जीवन के चार सूत्र कहे जाते हैं – जिज्ञासा, धैर्य, नेतृत्व की क्षमता और एकाग्रता। जिज्ञासा का मतलब है जानने की इच्छा। धैर्य का मतलब विषम परिस्थितियों में खुद को संभाले रखना। नेतृत्व की क्षमता यानी जनसमूह को अपने कार्यों से आकर्षित करना। और एकाग्रता का अर्थ है एक ही चीज पर ध्यान केंद्रित करना। अगर भारत के संदर्भ में हम देखें, तो किसी व्यक्ति के जीवन में ये चारों सूत्र चरितार्थ होते हैं, तो वो सिर्फ नेताजी सुभाष चंद्र बोस हैं। नेताजी ने एक ऐसी सरकार के विरुद्ध लोगों को एकजुट किया, जिसका सूरज कभी अस्‍त नहीं होता था। दुनिया के एक बड़े हिस्‍से में जिसका शासन था। अगर नेताजी की खुद की लेखनी पढ़ें, तो हमें पता चलता है कि वीरता के शीर्ष पर पहुंचने की नींव कैसे उनके बचपन में ही पड़ गई‍ थी।

नेताजी कहा करते थे कि, “सफलता हमेशा असफलता के स्तंभ पर खड़ी होती है। इसलिए किसी को असफलता से घबराना नहीं चाहिए।” इस छोटी सी पंक्ति के माध्यम से नेताजी ने असफल और निराश लोगों के लिए सफलता के नए द्वारा खोल दिए। यही सरलता और सहजता ही उनकी संचार कला का अभिन्न अंग थी। नेताजी सुभाष चंद्र बोस ने स्वाधीनता संग्राम में भाग लेने के साथ-साथ पत्रकारिता भी की थी और उसके माध्यम से पूर्ण स्वराज के अपने स्वप्न और विचारों को शब्दबद्ध किया था।

नेताजी ने 5 अगस्त, 1939 को अंग्रेजी में राजनीतिक साप्ताहिक समाचार पत्र ‘फॉरवर्ड ब्लॉक’ निकाला और 1 जून, 1940 तक उसका संपादन किया। इस अखबार के एक अंक की कीमत थी, एक आना। नेताजी ने अपनी पत्रकारिता का उद्देश्य पूर्ण स्वाधीनता के लक्ष्य से जोड़ रखा था। नेताजी सुभाष चंद्र बोस की पत्रकारिता में यह विवेक था कि सही बात का अभिनंदन और गलत का विरोध करना चाहिए।

नेताजी अंग्रेजी शासन के धुर विरोधी थे, लेकिन ब्रिटेन के जिन अखबारों ने भारतीय स्वाधीनता संग्राम का समर्थन किया, उसकी प्रशंसा करते हुए उन अखबारों के मत को नेताजी ने अपने अखबार में पुनर्प्रस्तुत किया। नेताजी ने स्वाधीनता की लक्ष्यपूर्ति के लिए अखबार निकाला, तो रेडियो के माध्यम का भी उपयोग किया। 1941 में ‘रेडियो जर्मनी’ से नेताजी सुभाष चंद्र बोस ने भारतीयों के नाम संदेश में कहा था, “तुम मुझे खून दो, मैं तुम्हें आजादी दूंगा।” उसके बाद 1942 में ‘आजाद हिंद रेडियो’ की स्थापना हुई, जो पहले जर्मनी से और फिर सिंगापुर और रंगून से भारतीयों के लिए समाचार प्रसारित करता रहा। 6 जुलाई, 1944 को ‘आजाद हिंद रेडियो’ से नेताजी सुभाष चंद्र बोस ने पहली बार महात्मा गांधी के लिए ‘राष्ट्रपिता’ संबोधन का प्रयोग किया था।

आजाद हिंद सरकार की स्थापना के समय नेताजी ने शपथ लेते हुए एक ऐसा भारत बनाने का वादा किया था, जहां सभी के पास समान अधिकार हों, सभी के पास समान अवसर हों। आज स्‍वतंत्रता के इतने वर्षों बाद भारत अनेक कदम आगे बढ़ा है, लेकिन अभी नई ऊंचाइयों पर पहुंचना बाकी है। इसी लक्ष्‍य को पाने के लिए आज भारत के सवा सौ करोड़ लोग नए भारत के संकल्‍प के साथ आगे बढ़ रहे हैं। एक ऐसा नया भारत, जिसकी कल्‍पना नेताजी सुभाष चंद्र बोस ने की थी। समाज के प्रत्‍येक स्‍तर पर देश का संतुलित विकास, प्रत्‍येक व्‍यक्ति को राष्‍ट्र निर्माण का अवसर और राष्ट्र की प्रगति में उसकी भूमिका, नेताजी के विजन का एक अहम हिस्‍सा था। नेताजी ने कहा था, “हथियारों की ताकत और खून की कीमत से तुम्‍हें आजादी प्राप्‍त करनी है। फिर जब भारत आजाद होगा, तो देश के लिए तुम्‍हें स्‍थाई सेना बनानी होगी, जिसका काम होगा हमारी आजादी को हमेशा बनाए रखना।” आज भारत एक ऐसी सेना के निर्माण की तरफ बढ़ रहा है, जिसका सपना नेताजी सुभाष चंद्र बोस ने देखा था। जोश, जुनून और जज्‍बा, हमारी सैन्‍य परम्‍परा का हिस्‍सा रहा है। अब तकनीक और आधुनिक हथियारी शक्ति भी उसके साथ जोड़ी जा रही है। सशस्‍त्र सेना में महिलाओं की बराबर की भागीदारी हो, इसकी नींव नेताजी सुभाष चंद्र बोस ने ही रखी थी। देश की पहली सशस्‍त्र महिला रेजिमेंट, जिसे रानी झांसी रेजिमेंट के नाम से जाना जाता है, भारत की समृद्ध परम्‍पराओं के प्रति सुभाष बाबू के आगाध विश्‍वास का परिणाम था।

नेताजी जैसे महान व्यक्तित्वों के जीवन से हम सबको और खासकर युवाओं को बहुत कुछ सीखने को मिलता है। लेकिन एक और बात जो सबसे ज्यादा प्रभावित करती है, वो है अपने लक्ष्य के लिए अनवरत प्रयास। अपने संकल्पों को सिद्धि तक ले जाने की उनकी क्षमता अद्वितीय थी। अगर वो किसी काम के लिए एक बार आश्वस्त हो जाते थे, तो उसे पूरा करने के लिए किसी भी सीमा तक प्रयास करते थे। उन्होंने हमें ये बात सिखाई कि, अगर कोई विचार बहुत सरल नहीं है, साधारण नहीं है, अगर इसमें कठिनाइयां भी हैं, तो भी कुछ नया करने से डरना नहीं चाहिए। अगर हमें नेताजी को याद रखना है, तो संपूर्ण दुनिया में अपने प्रत्येक विचार, सिद्धांत, व्यवहार को किसी जन समूह के अंतिम व्यक्ति तक पहुंचाने वाले संचारक के रूप में याद रखना चाहिए। आज भारत में जनसंचार के विभिन्न माध्यम हैं। आजादी के पूर्व सीमित संचार के साधनों के बाद भी नेताजी लोकप्रिय हुए। वे तब लोकप्रिय हुए, जब जन संचार की कोई अधोसंरचना उपलब्ध नहीं थी। भारत जैसी विविधता वाले देश में एक राष्ट्र की अवधारणा को बढ़ावा देने का कार्य एक कुशल संचारक ही कर सकता था और यह कार्य नेताजी ने किया। नेताजी ने अपने व्यक्तित्व के प्रयास से स्त्री, पुरुष, शिक्षित, अशिक्षित, किसान, मजदूर, पूंजीपति, सभी को प्रभावित किया और देश की स्वतंत्रता के लिए सबको एक साथ पिरोने का कार्य किया।

आज जिस मॉर्डन इंडिया को हम देख पा रहे हैं, उसका सपना नेताजी ने बहुत पहले देखा था। भारत के लिए उनका जो विजन था, वो अपने समय से बहुत आगे का था। नेताजी कहा करते थे कि अगर हमें वाकई में भारत को सशक्त बनाना है, तो हमें सही दृष्टिकोण अपनाने की जरुरत है और इस कार्य में युवाओं की महत्वपूर्ण भूमिका है। एकता, अखंडता और आत्‍मविश्‍वास की हमारी ये यात्रा नेताजी सुभाष चंद्र बोस के आशीर्वाद से निरंतर आगे बढ़ रही है।

(लेखक भारतीय जन संचार संस्थान (आईआईएमसी), नई दिल्ली के पूर्व महानिदेशक हैं और संप्रति माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय, भोपाल में जनसंचार विभाग के अध्यक्ष हैं।)

केरल में माघ महोत्सव के साथ जी उठी 270 वर्ष पुरानी परंपरा

हरिद्वार और प्रयागराज के कुंभ मेले की तरह केरल में भी एक भव्य धार्मिक आयोजन होता है, जिसे महामघ महोत्सवम कहा जाता है. इसे केरल कुंभ के नाम से भी जाना जाता है. साल 2026 में थिरुनावाया में पवित्र भरतपुझा नदी के तट पर इस ऐतिहासिक महोत्सव की शुरुआत ने एक बार फिर लोगों का ध्यान केरल की प्राचीन आध्यात्मिक परंपराओं और सांस्कृतिक विरासत की ओर खींच लिया है.
माघ महोत्सव (जिसे महामघ महोत्सव या Maha Magha Mahotsavam कहा जाता है) केरल के धार्मिक और सांस्कृतिक परंपरा से जुड़ा एक प्रमुख आयोजन है। यह त्योहार हिन्दू धर्म में माघ महीने के दौरान पुण्य स्नान, अनुष्ठानों और सांस्कृतिक मेलों के रूप में मनाया जाता है। इस आयोजन को अक्सर उत्तर भारत के कुंभ मेले के समान माना जाता है और केरल में यह दक्षिण का एक बड़ा धार्मिक संगम अनुभव प्रदान करता है।

केरल का माघ महोत्सव सिर्फ धार्मिक अनुष्ठानों का आयोजन नहीं है, बल्कि यह संस्कृति, परंपरा, आस्था और समाज के भीतर एकता का प्रतीक भी है। अपने पुराने इतिहास को पुनर्जीवित करते हुए यह महोत्सव आज के समय में भी लोगों को धर्म, आध्यात्म और सांस्कृतिक गौरव के साथ जोड़ता है।

मान्यता है कि भगवान परशुराम ने ब्रह्मा से केरल की खुशहाली के लिए यहां यज्ञ करने का अनुरोध किया था. ऐसा माना जाता है कि माघ महीने के दौरान ब्रह्मा, विष्णु और शिव की मौजूदगी और सात पवित्र नदियों का संगम नीला में डुबकी लगाने को बहुत पवित्र बनाता है।केरल के इस महोत्सव में स्नान की तिथि माह पारंपरिक पंचांग के अनुसार तय होती है, जिसमे स्नान को अधिक शुभ समय पर प्रातः किया जाता है।

ऐतिहासिक रूप से, थिरुनावाया में आखिरी बार बड़े पैमाने पर माघ महोत्सव वर्ष 1755 में मनाया गया था. जबकि 2016 से छोटे पैमाने पर रस्मी स्नान हुए हैं. 2026 का त्योहार एक बड़े दक्षिण भारतीय तीर्थयात्रा के रूप में इसकी वापसी का प्रतीक है।

ऐसा माना जाता है कि इसे बंद कराने के पीछे अंग्रेजों का यह डर था कि अगर इतनी भीड़ एक जगह एकत्र हो गई तो ये अंग्रेज सरकार के लिए खतरे की घंटी हो सकती है।

भरतपुझा के किनारे थिरुनावाया महा माघ महोत्सव का शुभारंभ राज्यपाल श्री राजेंद्र अर्लेकर ने सोमवार 19 जनवरी को नवमुकुंद मंदिर के पास हुए एक समारोह में किया। सोमवार से 3 फरवरी तक चलने वाले इस महोत्सव में हिस्सा लेने के लिए अलग-अलग जगहों से भक्त पहुंचने लगे हैं. महा माघ महोत्सव को केरल का कुंभ मेला भी कहा जाता है. लगभग 270 साल बाद बड़े जोश के साथ फिर से शुरू हो रहा है.

कार्यक्रम का उद्घाटन करते हुए, गवर्नर राजेंद्र अर्लेकर ने केरल में कुंभ मेले जैसा आयोजन देखकर खुशी जताई. उन्होंने कहा- “धर्म ध्वज सनातन धर्म का प्रतीक है. हमें अपनी परंपराओं और संस्कृति पर गर्व होना चाहिए. यह महोत्सव हमारी विरासत की रक्षा करने और भारत को विश्वगुरु बनाने में मदद करने के लिए एक सालाना परंपरा बन जाना चाहिए.” होर रोज लगभग 50,000 लोगों के आने की उम्मीद है. KSRTC ने लगभग 100 स्पेशल बसें चलाई हैं.

250 साल पुरानी परंपरा:
माघ महोत्सव की परंपरा लगभग 250 साल पुरानी है। यह आयोजन पहले महा मखन उत्सव के रूप में प्रचलित था और केरल की सांस्कृतिक पहचान का हिस्सा रहा करता था। धीरे-धीरे यह आयोजन लुप्त हो गया, लेकिन हाल ही में इसे पुनर्जीवित किया गया है।

कुंभ की तर्ज पर पुनरुद्धार:
2026 में थिरुनावया (Thirunavaya) के भरतपुझा नदी के तट पर इस महोत्सव को दक्षिण भारत का पहला कुंभ जैसा आयोजन बताते हुए पुनः शुरू किया गया। इसे उत्तर भारत के कुंभ मेले के समान धार्मिक महत्त्व और श्रद्धा के साथ मनाया जा रहा है।

धार्मिक और सांस्कृतिक धरोहर:
यह पर्व स्थानीय हिन्दू परंपरा और संस्कृति के पुनरुद्धार का प्रतीक है। परंपरागत रूप से यह आयोजन पवित्र नदी के किनारे श्रद्धालुओं के पुण्य स्नान, योग-ध्यान और धार्मिक अनुष्ठानों के लिए किया जाता रहा है।

आयोजन का समय और स्थान

तिथि:
महोत्सव का आयोजन आम तौर पर माघ माह में किया जाता है — जो भारतीय पंचांग के अनुसार जनवरी-फरवरी के बीच आता है।
2026 केरल महामघ महोत्सव 19 जनवरी से प्रारंभ होकर 3 फरवरी तक आयोजित होगा।
यह प्रमुख रूप से मलप्पुरम जिला के थिरुनावया (Thirunavaya) के भरतपुझा नदी के तट पर होता है। भरतपुझा को दक्षिण की गंगा भी कहा जाता है।

पवित्र स्नान (Magha Snan):
मुख्य आकर्षण है नदी में पुण्य स्नान करना। हिंदू धर्म में माघ मास में नदी में स्नान करने को अत्यंत पवित्र माना जाता है — ऐसा विश्वास है कि इससे पापों का नाश होता है और मोक्ष की प्राप्ति आसान होती है।विभिन्न राज्यों से संत, साधु और महात्मा इस आयोजन में शामिल होते हैं और धार्मिक संवाद, ध्यान और अनुष्ठान करते हैं। कई स्थानीय परंपराएँ, संगीत-नृत्य कार्यक्रम, भजन-कीर्तन और सांस्कृतिक आयोजन भी इस दौरान होते हैं, जो धर्म और संस्कृति को जोड़ते हैं।

आयोजन की मुख्य विशेषताएँ

ध्वजारोहण (Inauguration)
उद्घाटन समारोह आम तौर पर पवित्र झंडा फहराने और परंपरागत स्वागत कार्यक्रम के साथ होता है।
19 जनवरी 2026 को सुबह 11 बजे केरल के राज्यपाल द्वारा धर्म ध्वजा (सांस्कृतिक ध्वजा) फहराकर महोत्सव का औपचारिक उद्घाटन किया गया।
शरीर और मन की शुद्धि के लिए श्रद्धालु दिन-भर नदी में स्नान करते हैं। इसे जीवन के पापों से मुक्ति पाने वाला माना जाता है।
संतों, योगियों और महात्माओं का यह आयोजन ज्ञान-विचार, ध्यान और साधना के लिए भी एक मंच होता है।
संगीत, भजन-कीर्तन, और धार्मिक उपदेश का आयोजन लोगों को आध्यात्मिक ऊर्जा से जोड़ता है।
यह आयोजन केरल की सांस्कृतिक परंपरा को बचाने और उदात्त धार्मिक धरोहर को आगे बढ़ाने का कार्य करता है।

मंदिरों और प्रमुख स्थानों की जानकारी
नवकुंडा मंदिर थिरुनवया-यह मुख्य मंदिर है जहाँ से महोत्सव का आयोजन केंद्रित होता है। यह मंदिर मल्प्पुरम जिला भरतपूजा नदी के किनारे पर है। श्रद्धालु इसी नदी के पास स्नान और पूजा-पाठ के लिए आते हैं।

(पवित्र संगम) तिरुमति संगम घाटः नदी का वह घाट जहाँ से स्नान और मुख्य अनुष्ठान कार्यक्रम आयोजित होते हैं। यहां प्रतिदिन सुबह स्नान और वैदिक पूजा होती है।

इस महोत्सव के दौरान पास-पास स्थित कुछ स्थानीय मंदिरों में भी पूजा-संस्कार चलते हैं जैसे स्थानीय शिव, देवी या अन्य देवताओं के मंदिर, जिनमें श्रद्धालु स्नान के बाद दर्शन करते हैं।
(ये मुख्य रूप से स्थानीय परंपरा और आयोजकों के अनुसार तय होते हैं।)

ग़ज़ल विधा में शमा फिरोज़ ने बनाई पहचान

साहित्य की ग़ज़ल विधा में अपना स्थान बनाने वाली की सायरा और ग़ज़लकार श्रीमती शमा फ़िरोज़ का जन्म 13 जुलाई 1962 को कोटा, राजस्थान में हुआ। इन्होंने विवाह के उपरांत गृहस्थ संघर्ष के बीच हिंदी विषय में एमए, बीएड तथा उर्दू की शिक्षा प्राप्त की। अपने वर्ष 1978 से लेखन शुरू किया और ग़ज़ल लेखन को जीवन का ध्येय बना लिया है। इतिहासविद् और लेखक हमसफर फ़िरोज अहमद जो स्वयं भी बेहतरीन गजल लिखते हैं और इनकी प्रेरणा बन कर क्रदम-क़दम पर इनका साथ दे कर निरंतर प्रेरित करते है।

यह एक ऐसी ग़जलकार हैं जिन्होंने हिंदी और उर्दू भाषाओं में लिखकर साहित्य की इस विधा में तेजी से अपनी पहचान बनाई है और आज नामचीन ग़ज़लकारों में इनका नाम लिया जाता है। आपकी ग़ज़लें और अन्य रचनाएं राष्ट्रीय पत्र-पत्रिकाओं सहित सोशल मीडिया के राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय मंचों से नियमित प्रकाशित होती हैं। साझा संकलनों में भी नियमित प्रकाशन के लिए अपनी रचनाएं भेजती हैं। कोटा आकाशवाणी से भी वार्ताओं का प्रसारण हुआ है।

ग़ज़ल के साथ-साथ आप गीत और मुक्तक लिखने में प्रवीण हैं। प्रेम, विरह, श्रृंगार रस और वर्तमान परिदृश्य गजलों के प्रमुख विषय हैं। श्रृंगार रस की ग़ज़लों में नारी चित्रण और सौंदर्य बोध मुख्य रूप से मुखर है जो प्रेम भावनाओं को परिलक्षित करता है। वर्तमान परिवेश की ग़ज़लें राजनीतिक, सांस्कृतिक और सामाजिक समस्याओं और कुरीतियों पर प्रहार करते हुए जीवन का सही मार्गदर्शन करती हैं। कुछ गीत बाल मन के लिए भी लिखें हैं। हर रंग में रंगी इनकी ग़ज़लों में त्योहारों का वर्णन भी बड़ी खूबसूरती से देखने को मिलता है वहीं समाज और देश दुनिया पर भी निगाह रखते हुए सामाजिक विद्रूपताओं पर अपने शब्दों से प्रहार भी साफ दिखाई देता है और राष्ट्र प्रेम भी रचनाओं में साफ दिखाई देता है। समाज में अमीर और गरीब के असंतुलन पर भी अपनी कलम चला कर व्यंग्य किया है ।

इनकी ग़ज़लों में देश प्रेम और सौहार्द की भावनाएँ भी शिद्दत से रेखांकित हैं। आपकी लिखी गई करीब 350 ग़ज़लें और रचनाएं जहां भावनाओं को उद्वेलित करती हैं, कोई न कोई संदेश देती हैं वहीं मनोरंजन कर दिल को सुकून भी देती हैं।

इनका ग़ज़ल संग्रह ‘शम अ- ए- फ़रोज़ाँ’ गुफ्तगू प्रकाशन प्रयागराज (इलाहाबाद) से वर्ष 2023 में प्रकाशित हुआ है। इसमें लिखी 111 ग़ज़लें इन्हीं विषयों पर आधारित हैं। सदी के मशहूर ग़ज़लकार” नामक पुस्तक में भी 2021 में इनकी ग़ज़लें प्रकाशित हुई हैं।

आपको गुफ़्तगू द्वारा “अकबर इलाहाबादी” सम्मान और “फ़िराक़ गोरखपुरी” सम्मान से सम्मानित किया गया है। वर्तमान अंकुर नोएडा से महिला दिवस पर “वर्तमान अंकुर काव्य श्रेष्ठ महिला” सम्मान, प्रिन्स वेलफेयर ट्रस्ट द्वारा “प्रिंसेज़ शायरा 2023” से सम्मानित, “श्री कर्मयोगी साहित्य गौरव सम्मान” तथा अनेक पत्र-पत्रिकाओं तथा ऑन लाइन मंचों में ग़ज़लें प्रकाशित होने पर अनेक संस्थाओं द्वारा सम्मानित किया जा चुका है।

संपर्क : 88 अमन कॉलोनी विज्ञान नगर कोटा, राज. मो :9829746185

डॉ. प्रभात कुमार सिंघल

डॉ.प्रभात कुमार सिंघल
लेखक एवं पत्रकार, कोटा

नवलकिशोर स्मृति आलोचना सम्मान के लिए प्रविष्टियाँ आमंत्रित

दिल्ली। हिन्दी साहित्य और संस्कृति की पत्रिका बनास जन ने विख्यात आलोचक प्रो नवलकिशोर की स्मृति में आलोचना सम्मान के लिए प्रविष्टियाँ आमंत्रित की हैं। बनास जन द्वारा जारी विज्ञप्ति में बताया गया कि यह सम्मान प्रतिवर्ष गद्य साहित्य पर आलोचना अथवा वैचारिक आलोचना के लिए दिया जाएगा। इस सम्मान में प्रविष्टि के लिए आलोचक को लगभग 40000 अक्षरे चालीस हजार शब्दों का एतद विषयक आलेख भेजना होगा। आलेख मौलिक और अप्रकाशित अप्रसारित होना चाहिए। प्रविष्टि भेज रहे आवेदक की कोई मौलिक पुस्तक प्रकाशित नहीं होनी चाहिए, लेख और समीक्षाएं भले ही प्रकाशित हो चुके हों। आवेदक की आयु सीमा 40 वर्ष से अधिक नहीं होनी चाहिए। बनास जन द्वारा उक्त आलेख का स्वतंत्र अंक के रूप में प्रकाशन किया जाएगा तथा सम्मान राशि भी भेंट की जाएगी।  इस साल के लिए 30 मार्च 2026 तक प्रविष्टियां भेजी जा सकेंगी। प्रविष्टियां वर्ड फाइल में banaasjan@gmail.com पर यूनिकोड अथवा कृतिदेव 10 में टंकित कर भिजवाएं।

वर्ष 2024 के लिए उक्त सम्मान काशी हिन्दू विश्वविद्यालय की शोध छात्रा निवेदिता प्रसाद  और 2025 में दिल्ली विश्वविद्यालय के असीम अग्रवाल को उनके आलोचना विनिबंध के लिए दिया गया था और इसे स्वतंत्र अंक के रूप में प्रकाशित किया गया था।

बनास जन द्वारा जारी  विज्ञप्ति में बताया गया कि आलोचना के क्षेत्र में अपने अविस्मरणीय योगदान के लिए प्रो नवलकिशोर को जाना जाता है। मानवावद और साहित्य जैसी कालजयी आलोचना कृति के रचयिता प्रो नवलकिशोर उदयपुर के मोहनलाल सुखाड़िया विश्वविद्यालय में आचार्य एवं अध्यक्ष रहे। उनकी स्मृति को स्थाई रखने के लिए इस सम्मान को प्रारम्भ किया गया है जिससे युवा अध्येताओं को भी नया मंच मिल सकेगा।

पल्लव
सम्पादक
Banaas Jan
393, Kanishka Appartment C & D Block
Shalimar Bagh
Delhi- 110088
Whats Up  – 08130072004

वीडब्ल्यूओ और एबी टेस्टी ने डिजिटल एक्सपीरियंस ऑप्टिमाइज़ेशन के भविष्य को पुनः परिभाषित करने के लिए मिलाया हाथ

पेरिस, फ्रांस

ऑप्टिमाइज़ेशन क्षेत्र की दो अग्रणी कंपनियों, VWO और AB Tasty ने एक होने (combine) के लिए समझौता किया है, जो प्रथागत समापन शर्तों के अधीन है। यह संयोजन उद्योग का अग्रणी डिजिटल एक्सपीरियंस ऑप्टिमाइज़ेशन प्लेटफॉर्म बनाएगा जो AI-आधारित प्रयोग (experimentation), रियल-टाइम एडाप्टिव पर्सनलाइजेशन, बिहेवियरल इनसाइट्स और एनालिटिक्स को पेश करेगा।
संयुक्त इकाई (combined entity) का पैमाना सार्थक होगा, जो वैश्विक स्तर पर 4,000 से अधिक ग्राहकों से वार्षिक राजस्व में $100 मिलियन को पार कर जाएगा। संयुक्त राज्य अमेरिका और यूरोप के अपने दो सबसे बड़े क्षेत्रों में इसकी प्रमुख उपस्थिति होगी, जो इसके राजस्व का लगभग 90% है। 11 कार्यालयों और उत्तरी अमेरिका, LATAM, यूरोप और APAC में वितरित टीमों के साथ, यह संयोजन स्थानीय निष्पादन के साथ वैश्विक पहुंच को अनलॉक करता है। इसका लक्ष्य इन-मार्केट विशेषज्ञता के माध्यम से ग्राहकों के साथ गहरी साझेदारी बनाना और AI-नेटिव क्षमताओं की पेशकश करने वाले ‘फुल स्टैक टेक प्लेटफॉर्म’ में महत्वपूर्ण निवेश करना है।
VWO के सह-संस्थापक व CEO, Sparsh Gupta ने कहा, “VWO की स्थापना इस विश्वास पर की गई थी कि महान उत्पाद, मजबूत बुनियादी ढांचे और दीर्घकालिक सोच स्थायी कंपनियों का निर्माण करते हैं। AB Tasty में हमें एक ऐसी टीम मिली जो इस दर्शन को साझा करती है और उत्पाद व संगठन की क्षमताओं में हमें मजबूती से पूरा करती है, जबकि संस्कृति, दृष्टि और मिशन में भी गहरा तालमेल है। साथ में हम एक ग्लोबल लीडर बनाने का अवसर देखते हैं जो ग्राहकों को अधिक पैमाना, गहराई और स्थिरता प्रदान करता है, जबकि उस मूल उद्देश्य के लिए प्रतिबद्ध रहना है जिसने दोनों कंपनियों को सफल बनाया है।”
विलय किए गए व्यवसाय का नेतृत्व दोनों संगठनों की एक मजबूत सह-संस्थापक कार्यकारी टीम द्वारा किया जाएगा। VWO के को-फाउंडर और CEO, Sparsh Gupta संयुक्त इकाई के Chief Executive Officer के रूप में कार्य करेंगे। Ankit Jain Chief Product and Technology Officer के रूप में कदम रखेंगे। AB Tasty के को-फाउंडर और को-CEO, Rémi Aubert Chief Customer and Strategy Officer बनेंगे, जबकि AB Tasty की दूसरी को-फाउंडर और को-CEO, Alix de Sagazan Chief Revenue Officer बनेंगी। ये लीडर्स संयुक्त कंपनी में पर्याप्त व्यक्तिगत स्वामित्व (substantial individual ownerships) के साथ महत्वपूर्ण रूप से निवेशित रहकर मजबूत विश्वास और उत्साह प्रदर्शित कर रहे हैं।
AB Tasty की को-CEO, Alix de Sagazan ने कहा, “हमारी महत्वाकांक्षा हमेशा से एक्सपेरिमेंटेशन और एक्सपीरियंस ऑप्टिमाइज़ेशन में एक ग्लोबल लीडर बनाने की रही है जो ग्राहकों को ठोस, मापनीय मूल्य प्रदान करे। पिछले कुछ वर्षों में, जब हमने AB Tasty के अगले अध्याय पर विचार किया, तो यह स्पष्ट हो गया कि सही रास्ता महत्वाकांक्षा, संस्कृति, उत्पाद और भूगोल के बीच तालमेल (alignment) का था। VWO के साथ यह तालमेल शुरू से ही स्पष्ट था: साझी महत्वाकांक्षा, साझा मूल्य, पूरक ताकत और ग्राहकों के प्रति एक समान प्रतिबद्धता। यह संयोजन हमें उसी महत्वाकांक्षा को आगे बढ़ाने का अवसर देता है जो हमारे पास हमेशा से थी, लेकिन अब हम यह बहुत बड़े पैमाने पर और काफी विस्तारित संसाधनों के साथ कर सकेंगे।”
इस प्रक्रिया का नेतृत्व सिंगापुर मुख्यालय वाली Everstone Capital द्वारा किया जा रहा है, जो Everstone Group की प्राइवेट इक्विटी शाखा है। यह टेक्नोलॉजी सेक्टर पर मजबूत फोकस के साथ मिड-मार्केट स्पेस में नियंत्रण निवेश (control investments) पर केंद्रित है। Everstone Capital, VWO में बहुसंख्यक शेयरधारक (majority shareholder) है और संयुक्त इकाई में सबसे बड़ा संस्थागत शेयरधारक बने रहने के लिए महत्वपूर्ण अतिरिक्त पूंजी का निवेश कर रहा है।
Everstone Capital के मैनेजिंग डायरेक्टर, Sandeep Singh ने कहा, “यह निवेश एक मार्केट लीडर बनाने के लिए क्रॉस-जियोग्राफी परिप्रेक्ष्य के साथ गहरी डोमेन विशेषज्ञता को जोड़ने की Everstone की रणनीति का विस्तार है। इस मामले में यह एक ग्लोबल, श्रेणी में सर्वश्रेष्ठ डिजिटल एक्सपीरियंस ऑप्टिमाइज़ेशन प्लेटफॉर्म है। साथ में, VWO और AB Tasty के पास श्रेणी में सबसे व्यापक उत्पाद पेशकश होगी और कई प्रमुख क्षेत्रों में अग्रणी बाजार हिस्सेदारी के साथ एक संतुलित भौगोलिक पदचिह्न होगा। Everstone कंपनी को एक एडवाइजरी बोर्ड के साथ भी समर्थन देगा जिसमें कुछ प्रमुख उद्योग विशेषज्ञ और संचालक शामिल होंगे।”
एक बार प्रथागत समापन शर्तें पूरी होने और लेनदेन समाप्त होने के बाद VWO और AB Tasty उचित समय पर अधिक जानकारी प्रदान करेंगे।
VWO के बारे में
2010 में स्थापित, VWO एक एकीकृत एक्सपीरियंस-ऑप्टिमाइज़ेशन प्लेटफॉर्म है जिसका उपयोग उत्पाद, विपणन, विकास और इंजीनियरिंग टीमें ग्राहक यात्रा (customer journeys) को बेहतर बनाने और डिजिटल प्रदर्शन में तेजी लाने के लिए करती हैं। एक्सपेरिमेंटेशन, एनालिटिक्स, पर्सनलाइजेशन और फीचर-डिलीवरी टूल के एक कनेक्टेड सूट के साथ, VWO संगठनों को बड़े पैमाने पर डेटा-संचालित निर्णय लेने में सक्षम बनाता है। ई-कॉमर्स, SaaS, यात्रा और मीडिया में Forbes, Walt Disney, Amway, Hilton Vacations, TAP Portugal, Cigna जैसे 3,000 से अधिक ब्रांडों द्वारा भरोसा किया जाने वाला, VWO टीमों को अनुभव, रूपांतरण और राजस्व में लगातार, मापनीय सुधार लाने में मदद करता है। वेबसाइट: vwo.com.
AB Tasty के बारे में
2014 में पेरिस में स्थापित, AB Tasty एक अग्रणी एक्सपेरिमेंटेशन और पर्सनलाइजेशन प्लेटफॉर्म है जो वैश्विक ब्रांडों को A/B टेस्टिंग, फीचर मैनेजमेंट और AI-संचालित पर्सनलाइजेशन के माध्यम से डिजिटल अनुभवों को अनुकूलित करने में सक्षम बनाता है। इसका उपयोग दुनिया भर में 1000 से अधिक अग्रणी वैश्विक ब्रांडों द्वारा किया जाता है, जिनमें L’Oreal, Samsonite, USA Today, और Ganni शामिल हैं, और यह यात्रा, रिटेल, बैंकिंग और बीमा सहित कई उद्योगों में उपयोग किया जाता है। वेबसाइट: abtasty.com.
Everstone Capital के बारे में
Everstone Capital, Everstone Group की प्राइवेट इक्विटी शाखा, सिंगापुर मुख्यालय वाली एक निवेश फर्म है जिसके पास $3.5 बिलियन की संपत्ति प्रबंधन (AUM) के तहत है और सात वैश्विक कार्यालयों में उपस्थिति है। हम टेक्नोलॉजी सर्विसेज, हेल्थकेयर और फार्मा, कंज्यूमर, फाइनेंशियल सर्विसेज और इंडस्ट्रियल्स सहित उच्च-विकास वाले क्षेत्रों में नियंत्रण-उन्मुख, मिड-मार्केट निवेश पर ध्यान केंद्रित करते हैं। हमारा प्लेटफॉर्म-बिल्डिंग दृष्टिकोण स्थायी मूल्य को अनलॉक करने और दीर्घकालिक विकास को चलाने के लिए रणनीतिक पूंजी के साथ परिचालन विशेषज्ञता को जोड़ता है।
~100 अनुभवी पेशेवरों की एक टीम के साथ, हम हर साझेदारी में गहरी डोमेन जानकारी, स्थानीय अंतर्दृष्टि और ऑन-ग्राउंड निष्पादन में बढ़त लाते हैं। हमारा सक्रिय स्वामित्व मॉडल और अनुशासित निष्पादन हमें व्यवसायों को स्केल करने, परिवर्तन में तेजी लाने और हमारे निवेशकों के लिए लगातार मजबूत जोखिम-समायोजित रिटर्न देने में सक्षम बनाता है। वेबसाइट: everstonecapital.com.

 

मीडिया पूछताछ के लिए, कृपया लिखें: paresh.mandhyan@vwo.com (Wingify और AB Tasty के लिए) corpcomm@everstonegroup.com (Everstone Capital के लिए)

Muskan Thakur
Executive – Media Relations
+91 9877297918

रक्तदान से बड़ा दान कुछ नहीं – प्रो अंजू श्रीवास्तव हिन्दू कालेज में रक्तदान शिविर

दिल्ली। मनुष्य जीवन सर्वोपरि है और मनुष्य जीवन के लिए रक्त सबसे अधिक आवश्यक है। यदि हमारे देश में सभी स्वस्थ नागरिक रक्तदान के लिए स्वैच्छिक भागीदारी करें तो बहुत बड़ी संख्या में बीमार लोगों के जीवन की रक्षा हो सकेगी। हिन्दू कालेज में राष्ट्रीय सेवा योजना द्वारा ओम चेरिटेबल ब्लड सेंटर के सहयोग से आयोजित रक्तदान शिविर में प्राचार्या प्रो अंजू श्रीवास्तव ने कहा कि युवा पीढ़ी को रक्तदान जैसी गतिविधियों में बढ़ चढ़कर भाग लेना चाहिए ताकि हम अपने बीमार और जरूरतमंद मरीजों की प्राण रक्षा कर सकें। प्रो श्रीवास्तव ने कहा कि राष्ट्रीय सेवा योजना के इस शिविर में युवाओं की उत्साहपूर्ण भागीदारी बताती है कि हमारे देश के युवा प्रत्येक सेवा कार्य में आगे हैं।

आयोजन में महाविद्यालय की उप प्राचार्या प्रो रीना जैन ने रक्तदान करने वाले युवाओं की प्रशंसा की और उन्हें बधाई देते हुए कहा कि उनके द्वारा दिया गया दान किसी भी दान से बहुत बड़ा है।

इससे पहले ओम चेरिटेबल ब्लड सेंटर के निदशक अनुराग आनंद ने प्राचार्य प्रो श्रीवास्तव और उप प्राचार्य प्रो जैन का स्वागत करते हुए अपने सेंटर की गतिविधियों की जानकारी दी। उन्होंने कहा कि उनका सेंटर प्रतिवर्ष विभिन्न शिक्षण संस्थानों में शिविरों का आयोजन कर निस्वार्थ भावना से रक्तदान के लिए तत्पर रहता है।

राष्ट्रीय सेवा योजना के कार्यक्रम अधिकारी डॉ पल्लव ने बताया कि दिन भर चले इस विशेष शिविर में 62 यूनिट रक्तदान हुआ है जिसमें विद्यार्थियों और शिक्षकों की भी भागीदारी रही है। उन्होंने कहा कि राष्ट्रीय सेवा योजना के स्वयं सेवकों के साथ साथ बड़ी संख्या में छात्राओं का रक्तदान के लिए आगे आना नए और संकल्पवान भारत का प्रतीक है जो निस्वार्थ भावना से सेवा के कार्यों को अपना रहा है। शिविर के दौरान हिंदी विभाग के प्रो रचना सिंह और प्रो बिमलेन्दु तीर्थंकर ने भी रक्तदाताओं का मनोबल बढ़ाया। सभी रक्तदाताओं को प्रशंसा पत्र और स्मृति चिह्न प्रदान किये गए।

राष्ट्रीय सेवा योजना के विद्यार्थी अध्यक्ष निशांत सिंह ने शिविर के प्रारम्भ में सभी का स्वागत किया। अंत में राष्ट्रीय सेवा योजना की विद्यार्थी उपाध्यक्ष नेहा यादव ने सभी का आभार व्यक्त किया।

अर्चिता द्विवेदी
जन संपर्क प्रमुख
राष्ट्रीय सेवा योजना
हिन्दू महाविद्यालय, दिल्ली
मो -9452536877