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वैश्विक पहचान रखने वाला भारत का एक महान संगीतकारः इलैया राजा

भारत के अधिकांश लोग शायद ही  भारत के इस महान संगीतकार के बारे मे विस्तार से  जानते हों। हमारी मीडिया एआर रहमान को ही महान बताती है। मीडिया के महान संगीतकार ने अजहर सिंड्रोम खेल दिया। आइये आपको आज मिलवाता हूँ ऐसे संगीतकार से जिन्होंने 1523 फिल्मों में संगीत दिया, 20 हजार स्टेज शो किये.8600 गीत कंपोज किये दुनिया के 9वें सबसे बेहतरीन महान संगीतकार इलैया राजा ।

इलैयाराजा का जन्म 2 जून 1943 को तमिलनाडु में एक दलित ईसाई फैमिली में हुआ था। उनका नामकरण का किस्सा भी बेहद दिलचस्प है। इलैया राजा का नाम उनके पिता ने रजईया रखा था पर गांव के लोग उन्हें रासयया बुलाते थे। जिसके बाद वो संगीत की शिक्षा लेने के लिए #धनराज_मास्टर के पास पहुंचे जहां मास्टर ने उनका नाम राजा रख दिया। इसके बाद उन्होंने अपने करियर की पहली फिल्म अन्नकिली मिली। इस फिल्म में उन्हें प्रोड्यूसर पंचू अरुणाचलम के साथ काम करने का मौका मिला और यहीं पंचू ने उनके नाम राजा के आगे इलैया जोड़ दिया। दरअसल तमिल में इलैया का मतलब छोटा होता है और राजा नाम से फिल्म इंडस्ट्री में एक और म्यूजिक डायरेक्टर ए.एम. राजा मौजूद थे। जिसके चलते राजा का नाम इलैया राजा पड़ गया।

इलैया राजा गांव में पले बड़े थे इसलिए उन्हें गांव के वातावरण और म्यूजिक का बखूबी ज्ञान था। बचपन से ही उनकी संगीत में बहुत रुचि रहती थी। लिहाजा उन्होंने बचपन में ही संगीत की शिक्षा ली थी। मात्र 14 साल की उम्र में ही इलैया राजा ने रुरल फोक संगीत को एक्सपोज करना शुरू कर दिया था।उन्होंने पवलर ब्रदर्स ग्रुप ज्वाइन कर लिया था जो एक ट्रेवलिंग म्यूजिकल ग्रुप था
इलैया राजा ने लंदन के ट्रिनिटी कॉलेज से म्यूजिक का कोर्स किया है। जहां पढ़ाई पूरी होने के बाद उन्हें उनकी बेहतरीन इंस्ट्रूमेंटल परफॉर्मेंस के लिए #गोल्ड_मेडल से नवाजा गया था। उन्होंने टी.वी.गोपाल से कर्नाटक म्यूजिक की भी शिक्षा ली।
इलैयाराजा ने गिटारिस्ट के तौर पर करियर की शुरुआत की थी। लंदन से लौटने के बाद उन्होंने एक बैंड के साथ सेशन गिटारिस्ट के तौर पर काम करना शुरू कर दिया था। ये बैंड म्यूजिक कंपोजर और डायरेक्टर साहिल चौधरी का था। यहीं पर #साहिल_चौधरी ने इलैया राजा को कह दिया था कि आने वाले समय में वो बेस्ट म्यूजिक कंपोजर बनने वाले हैं।इलैया राजा अबतक अच्छे म्यूजिशियन माने जाने लगे थे। उन्होंने इसके बाद कंपोजर जी.के.वैंकटेश के पास असिसटेंट म्यूजिक कंपोजर को तौर पर काम करना शुरू कर दिया। दोनों की जोड़ी ने लगभग 200 कन्नड़ फिल्मों में साथ में काम किया। ऐसे में इलैया को जब भी समय मिलता वो सेशन म्यूजिक के साथ भी म्यूजिक कंपोज करने लगे। जी.के वैंकटेश के साथ इलैया राजा ने म्यूजिक कंपोजिशन के बारे में बहुत कुछ सीखा।
इलैया राजा को 1975 में फिल्म प्रोड्यूसर पंजू अरुणाचलम ने अपनी फिल्म अन्नाकली के लिए म्यूजिक कंपोज करने के लिए दिया। इस फिल्म में इलैया ने मॉडर्न और तमिल फोक म्यूजिक को मिलाकर बेहतरीन म्यूजिक बनाया। जिसे लोगों का खूब प्यार मिला और इलैया को बेहतरीन म्यूजिक कंपोजर के रुप में पहचान।
इलैयाराजा ने 1980 के दौर में तमिल कवियों के साथ मिलकर उनकी कविता के लिए म्यूजिक तैयार करना शुरू कर दिया था और फिल्मकारों को उनके कंपोजिशन बेहद पसंद भी आते थे। उन्होंने गुलजार, आर. बाल्की, मणि रत्नम, फाजिल, शंकर नाग के साथ भी कई फिल्मों में काम किया है।

इलैया राजा पहले भारतीय हैं जिन्होंने कंप्यूटर से गाने रिकॉर्ड करना शुरू किया था। 1986 में उन्होंने फिल्म विक्रम के लिए म्यूजिक कंपोज किया था। साथ ही इलैया राजा वेस्टर्न क्लॉसिक म्यूजिक हार्मोनी को भारतीय कंपोजिशन में यूज करने वाले पहले भारतीय थे।

उन्होंने फिल्म नायकन (1987) का साउंडट्रैक तैयार किया, जो एक भारतीय फिल्म है जिसे टाइम पत्रिका ने सर्वकालिक 100 सर्वश्रेष्ठ फिल्मों में स्थान दिया है।
निर्देशक आर.के. सेल्वमनी की फिल्म चेम्बरुथी (1992) के लिए इलैयाराजा ने मात्र 45 मिनट में 9 गाने तैयार किए, जो एक रिकॉर्ड है। अभिनेता रजनीकांत ने कहा कि इलैयाराजा बिना सोए एक ही दिन में तीन फिल्मों की री-रिकॉर्डिंग पूरी कर लेते थे , जबकि आज की पीढ़ी के संगीतकार एक फिल्म के लिए 30 दिन लेते हैं।
भारतीय सिनेमा के 100 साल पूरे होने पर CNN-IBN द्वारा किए गए सर्वे के अनुसार इलैया राजा को ऑल टाइम ग्रेटेस्ट म्यूजिक डायरेक्टर के लिए सबसे ज्यादा वोट दिए गए थे। वहीं इलैया को अमेरिकी वर्ल्ड सिनेमा पोर्टल ‘टेस्ट ऑफ सिनेमा’ ने दुनिया के 25 सबसे बेहतरीन म्यूजिक कंपोजर में 9वें नंबर पर जगह दी है। इस लिस्ट में शामिल होने वाले इलैया राजा पहले भारतीय म्यूजिक कंपोजर हैं।
इलैया राजा को 3 बेस्ट म्यूजिक डायरेक्शन और 2 बेस्ट बैकग्राउंड म्यूजिक के लिए 5 बार नेशनल अवॉर्ड से सम्मानित किया जा चुका है। वहीं इंटरटेनमेंट जगत में उनके योगदान के लिए भारत सरकार ने 2010 में पद्म भूषण और 2018 में पद्म विभूषण से सम्मानित किया है
2012 में उन्हें संगीत नाटक अकादमी  अवॉर्ड से भी सम्मानित किये जा चुके हैं। वे जुलाई 2022 से भारतीय संसद के उच्च सदन राज्यसभा में मनोनीत सांसद हैं। 2025 में, वे लंदन में एक पूर्ण पश्चिमी शास्त्रीय सिम्फनी की रचना, रिकॉर्डिंग और लाइव प्रस्तुति करने वाले पहले एशियाई और भारतीय फिल्म संगीतकार बने।
अजंता-एलोरा अंतर्राष्ट्रीय फिल्म फेस्टिवल (AIFF)जो सिनेमा की दुनिया का एक बड़ा जश्न है, अपने 11वें संस्करण के साथ लौट रहा है। यह फेस्टिवल 28 जनवरी से 1 फरवरी, 2026 तक छत्रपति संभाजीनगर, महाराष्ट्र में होगा। इस बार प्रतिष्ठित पद्मपाणि पुरस्कार महान संगीतकार श्री इलैयाराजा जी को मिलने वाला है।
उन्हें “(संगीत ऋषि) उपनाम से जाना जाता है और अक्सर उन्हें ” मास्ट्रो ” कहा जाता है, यह उपाधि उन्हें लंदन के रॉयल फिलहारमोनिक ऑर्केस्ट्रा
द्वारा प्रदान की गई थी ।
इंडियन परफॉर्मिंग राइट सोसाइटी के बोर्ड सदस्य अचिले फोरलर ने 2017 में कहा, “इलैयाराजा ने पिछले 40 वर्षों में जिस तरह का उत्कृष्ट काम किया है, उसे देखते हुए उन्हें दुनिया के शीर्ष 10 सबसे अमीर संगीतकारों में एंड्रयू लॉयड वेबर (1.2 बिलियन डॉलर) और मिक जैगर (300 मिलियन डॉलर से अधिक) के बीच कहीं स्थान मिलना चाहिए था।”
ब्रिटिश संगीतकार #एंडी_वोटेल ने एक निबंध में इलैयाराजा का वर्णन इस प्रकार किया, “संगीत की आप चाहे जिस भी शैली को पसंद करें/प्यार करें/प्रचारित करें/संरक्षित करें/राजनीतिकरण करें/अति-बौद्धिकरण करें/घृणा करें/बचाव करें या आनंद लेने का दिखावा करें, इलैयाराजा ने वह सब किया है।
कर्नाटक गायक टीएम कृष्णा ने कहा कि किसी अन्य फिल्म संगीतकार ने इलैयाराजा की तरह संगीत की व्यापक समझ का प्रदर्शन नहीं किया है, और जिस तरह से वे खुद को ढालते हैं और संगीत की रचना करते हैं। वह “अथाह” है, जो उन्हें “पूर्ण उस्ताद” बनाता है।
1991 में आई फिल्म थलपति के लिए इलैयाराजा द्वारा रचित संगीत को द गार्जियन की ” मरने से पहले सुनने लायक 100 एल्बम” सूची में शामिल किया गया था ।
2003 में BBC द्वारा 165 देशों के आधे मिलियन से अधिक लोगों के बीच किए गए एक अंतरराष्ट्रीय सर्वेक्षण के अनुसार , थलपति फिल्म का उनका गीत ” रक्कम्मा कैया थट्टू ” सर्वकालिक 10 सबसे लोकप्रिय गीतों में चौथे स्थान पर रहा। छायाकार संतोष सिवन ने बताया कि इलैयाराजा ने फिल्म थलपति के पूरे संगीत की रचना “आधे दिन” से भी कम समय में पूरी कर ली थी। मुंबई में आर.डी. बर्मन के ऑर्केस्ट्रा के साथ फिल्म थलपति के गीत “सुंदरी” की रिकॉर्डिंग के दौरान , जब इलैयाराजा ने सुर दिए, तो सभी संगीतकार इतने भावुक हो गए कि उन्होंने श्रद्धापूर्वक हाथ जोड़कर उन्हें सम्मान के प्रतीक के रूप में स्टैंडिंग ओवेशन दिया था।
उन्होंने अनगिनत रिकॉर्ड बनाए हैं, जिनकी गिनती ही नहीं है।ईसाई धर्म में जन्म और पालन-पोषण होने के बावजूद इलैयाराजा ने हिंदू धर्म अपना लिया है,और तमिल हिंदू संत रमण महर्षि को अपना आध्यात्मिक गुरु मानते हैं। 2018 में, अमेरिका में एक टॉक शो के दौरान, इलैयाराजा ने ईसा मसीह के पुनरुत्थान में ईसाई विश्वास की विश्वसनीयता पर संदेह व्यक्त किया और दावा किया कि पुनरुत्थान केवल हिंदू संत रमण महर्षि के मामले में हुआ था । उन्होंने कथित तौर पर कहा, “मैं नियमित रूप से यूट्यूब पर वृत्तचित्र देखता हूं। उनमें कहा जाता है कि ईसा मसीह का पुनरुत्थान नहीं हुआ था।” विरोध में, एक ईसाई समूह ने तिरुचि के पुलिस आयुक्त के पास शिकायत दर्ज कराई और इलैयाराजा के खिलाफ पुलिस कार्रवाई या उनसे माफी मांगने की मांग की, क्योंकि उन्होंने “ईसाइयों के परम विश्वास” पर संदेह जताया था।

फ़िर भी इलैया राजा जी ने माफ़ी नहीं मांगी अडिग रहे। एक तरफ़ है दिलीप कुमार से अल्लारक्खा बने । AR रहमान जिनको भारत के सर्व समाज ने इतना प्यार सम्मान दिया की इन्हें अपच हो गयी। दूसरी तरफ हैं दूसरे संगीतकार जो ईसाई से हिंदू बन गए, विश्व के टॉप 9 महान संगीतकार बन गए ऐसे ऐसे अवार्ड जीते सम्मान मिले रिकॉर्ड पर रिकॉर्ड बना दिए।

वैश्विक दक्षिण में भारत का नेतृत्व !

वैश्विक दक्षिण जिसे “तीसरी दुनिया” के नाम से जाना जाता है। विकासशील नवोदित राष्ट्र- राज्यों का समूह है जो वित्त,  तकनीकी, विशेषज्ञता ,तकनीकी शोध, नवाचार एवं  नवोन्मेष में पिछड़े हुए हैं। मौलिक स्तर पर ये राष्ट्र – राज्य गरीबी, बीमारी, आतंकवाद और उग्रवाद से पीड़ित हैं। विकसित राष्ट्र राज्यों के द्वारा जलवायु न्याय के लिए अत्याचार, वैश्विक स्तर के साम्यवादी  दादाओं (रूस एवं चीन) और वैश्विक दरोगा (संयुक्त राज्य अमेरिका) के भितरघाती राजनीति व नव  उपनिवेशवादी राजनीति ग्रसित राष्ट्र – राज्यों से ‘ आर्थिक सहायता ‘ की आवश्यकता है।
  हर वैश्विक मंच पर ‘ ग्लोबल साउथ’ के हितों को पूरी मजबूती से उठा रहा है। भारत का यह सदप्रयास है कि जो भी नवाचार करें उसे संपूर्ण ‘ ग्लोबल साउथ’  एवं ‘ कॉमनवेल्थ   देशों ‘ को फायदा हों। भारत वैश्विक मंचों पर विकासशील एवं अल्प- विकसित देशों के मुद्दों को मजबूती से उठा रहा है। भारत सभी लोकतांत्रिक देशों  के विकास में निरंतर सहयोग कर रहा है। लोकतांत्रिक संस्थाएं और प्रक्रियाएं वर्तमान में लोकतंत्र को स्थिरता, गति एवं व्यापकता प्रदान  कर रही है। भारत वैश्विक स्तर का तेजी से उभरता प्रमुख अर्थव्यवस्था है जिसका विकास दर 7%  के रफ्तार से उदीयमान अर्थव्यवस्था बना हुआ है। भारत के जन- केंद्रित नीतियों और कल्याणकारी योजनाओं एवं  लोकसम्मत  विधियों से लोकतंत्र एवं लोकतांत्रिक संस्कृति में उन्नयन हो रहा है।
समकालीन वैश्विक परिदृश्य में भारत के दूरदर्शी और राजनय में  कौशल केंद्रित नेतृत्व इन विकासशील राष्ट्र- राज्यों को नेतृत्व दिया है। भारत सुरक्षा और संरक्षण में  दक्षिण एशिया में” बड़े भाई” की भूमिका में नेतृत्व कर रहा है तो विकासशील राष्ट्र – राज्यों को औषधि के क्षेत्र में सहयोगी राज्य प्रत्यय की भूमिका का निर्वहन कर रहा है। भारत वैश्विक उत्तर और वैश्विक दक्षिण के’ खाई’ को  मिटाने का सफलतम और दूरदर्शी प्रयास कर रहा है। भारत इन राष्ट्र- राज्यों के लिए संरक्षक की भूमिका में  भय और हताशा को मिटाने का प्रयास कर रहा है जिससे जलवायु परिवर्तन, ऊर्जा सुरक्षा और सतत विकास पर एकीकृत और सांगठनिक दृष्टिकोण का उन्नयन किया जा  सकें।भारत अपने नेतृत्व और उभरते व्यक्तित्व के द्वारा लोकतांत्रिक शासन( वैश्विक स्तर पर तानाशाही की समाप्ति), मानवाधिकार( प्रत्येक राष्ट्र- राज्य अपने घरेलू संवैधानिक व्यवस्था में मानवाधिकार को सुरक्षा और लिपिबद्ध करें) एवं मानवाधिकार की सुरक्षा में अपना  यथोचित प्रयास करें।
बुनियादी ढांचे और औद्योगिक संरचना में निवेश को प्रोत्साहित करना है। भारत का विचार है कि अंतरराष्ट्रीय संगठनों को स्थानीय चुनौतियों का सामना एवं समाधान करने के लिए सबल करना है। वैश्विक दक्षिण की जटिल सामूहिक चुनौतियों के लिए लोकतंत्र, अर्थव्यवस्था, प्रौद्योगिकी, ऊर्जा ,जलवायु और बहुपक्षीय शासन को संबोधित करने के लिए बहुआयामी दृष्टिकोण की सामयिक  परिवेश में आवश्यकता है। वैश्विक दक्षिण के समूह, राष्ट्र- राज्यों में नवीकरणीय ऊर्जा, विकास क्षेत्र, टिकाऊ कृषि ,वानिकी प्रथाओं, पारिस्थितिक पर्यटन संरक्षण प्रयास, जलवायु लचीलापन और अनुकूलन पहल और हरित बुनियादी ढांचा विकास में सराहनीय पहल किया है। इन देशों ने डिजिटल तकनीकी, नवाचार  केंद्रों के उन्नयन, आईटी, सॉफ्टवेयर उद्योग, डिजिटल भुगतान और वित्तीय समावेशन ,ई-कॉमर्स, ऑनलाइन बाजार, जैव प्रौद्योगिकी और स्वास्थ्य सेवा में अग्रतर उन्नति की है। इन सभी परिस्थितियों में वैश्विक दक्षिण के राष्ट्र – राज्यों के लिए भारत का नेतृत्व समकालीन में आशा की किरण प्रतीत हुआ है जो अन्य राष्ट्र- राज्यों के लिए समान सहयोग और सतत विकास के लिए अनथक प्रयास कर रहा है।
गुटनिरपेक्ष आंदोलन( नाम) का नेतृत्व करने के अपने गरिमामई और उज्जवल इतिहास के साथ- साथ उभरता भारत समकालीन में वैश्विक भू- राजनीति में एक गतिशील एवं ऊर्जावान भूमिका निभाने के लिए अपने सामाजिक आर्थिक, सामरिक और भू – राजनीतिक और शक्ति संरचना को उन्नयन कर रहा है। वैश्विक स्तर पर महा शक्तियों के बीच प्रतिस्पर्धा  बढ़ाने में सहयोग की संकल्पना दुर्लभ प्रत्यय हो चुका है। कोविड महामारी, रूस- यूक्रेन युद्ध, इजरायल ईरान संकट, वेनेजुएला संकट और वैश्विक स्तर पर गुटिकरण की राजनीति, एकाधिकार प्रभुत्व राजनीति, एकध्रवीय वैश्विक व्यवस्था बनाने की राजनीति, आर्थिक एवं राजनीतिक संगठनों ने ‘ वैश्विक दक्षिण ‘ की संकल्पना को प्रसांगिक बना दिया है। भारत  वैश्विक दक्षिण के लिए प्रमुख ‘ राज्यकारक ‘ के रूप में उभर रहा है जो वैश्विक दक्षिण के राष्ट्र – राज्यों के राष्ट्रीय हितों और भू – राजनीति के मुद्दों को वैश्विक मंच पर जोरदार ढंग से उठा रहा है। वैश्विक स्तर पर सामाजिक आर्थिक असमानता, भुखमरी, आतंकवाद ,हथियारबंद अंतरराज्यीय  समस्याएं  बढ़ी हैं।
भारत ने वर्ष 2023 में  जी- 20की अध्यक्षीय मंच से वैश्विक दक्षिण की आवाज को मजबूती से उठाया था, ब्रिक्स के मंच से भी वैश्विक दक्षिण की आवाज को, वैश्विक अध्यक्षीय सम्मेलन के मंच एवं संयुक्त राष्ट्र के मंच से भी  ‘ वैश्विक दक्षिण’ की आवाज को बढ़ाया है। वैश्विक संबंधों में यह क्रांतिकारी अवसर संस्थाओं को “समावेशी विश्व व्यवस्था” बनाने में महत्वपूर्ण और प्रेरक भूमिका निभा रहा है। भारत वैश्विक दक्षिण राष्ट्रों में ‘ अग्रणी ‘ की भूमिका में नेतृत्व कर रहा है, जिसने वैश्विक स्तर के मंचों के भीतर एवं उनमें एक मजबूत समर्थन नेटवर्क बनाने के लिए अपने ‘ राज्यकारक ‘ नेतृत्व में राजनीतिक कारक की भूमिका बना रहा है।
(लेखक  अखिल भारतीय इतिहास संकलन योजना केशवकुंज,  झंडेवालान  नई दिल्ली के राष्ट्रीय संगठन सचिव हैं) 

टैरिफ के बावजूद वर्ष 2026 में भारत की आर्थिक विकास दर शिखर पर

दिनांक 1 फरवरी 2026 को वित्तीय वर्ष 2026-27 के लिए केंद्र सरकार द्वारा भारतीय संसद में प्रस्तुत किए जाने वाले बजट के पूर्व वित्तीय वर्ष 2025-26 में भारत के आर्थिक विकास से सबंधित प्रथम अग्रिम अनुमान के आंकड़े 7 जनवरी 2026 को जारी किए गए है। इस अनुमान के अनुसार वित्तीय वर्ष 2024-25 में सकल घरेलू उत्पाद में 6.5 प्रतिशत की वृद्धि दर हासिल हुई थी जो वित्तीय वर्ष 2025-26 में बढ़कर 7.4 प्रतिशत रहने की सम्भावना व्यक्त की गई है। सकल घरेलू उत्पाद से सम्बंधित प्रथम अग्रिम अनुमान के आंकड़ों के आधार पर ही वर्ष 2026-27 के बजट को अंतिम रूप दिया जा रहा है। आर्थिक विकास से सम्बंधित द्वितीय अग्रिम अनुमान 27 फरवरी 2026 को जारी किए जाने हैं। भारत के सकल घरेलू उत्पाद में भारतीय रिजर्व बैंक का अनुमान भी 7.3 प्रतिशत की वृद्धि का ही है परंतु भारतीय स्टेट बैंक के आर्थिक अनुसंधान विभाग का अनुमान 7.5 प्रतिशत अथवा इससे अधिक का है। भारत की आर्थिक विकास दर विश्व के सबसे बड़ी अर्थव्यवस्थाओं के बीच सबसे अधिक रहने की सम्भावना विश्व बैंक, अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष, एशियन विकास बैंक (7.2 प्रतिशत), फिच नामक रेटिंग संस्थान (7.4 प्रतिशत) आदि संस्थानों ने भी व्यक्त की है।

भारत के सकल घरेलू उत्पाद में वित्तीय वर्ष 2024-25 में हासिल की गई 6.5 प्रतिशत की वृद्धि से आगे बढ़कर वित्तीय वर्ष 2025-26 में 7.4 प्रतिशत की वृद्धि दर हासिल करने के कुछ मुख्य कारणों में शामिल हैं – (1) केंद्र सरकार के स्थिर उपभोग खर्च (Govt Fixed Consumption Expenditure) में वृद्धि दर जो वित्तीय वर्ष 2024-25 में 2.3 प्रतिशत की रही थी, वह बढ़कर वित्तीय वर्ष 2025-26 में 5.2 प्रतिशत रहने की सम्भावना है; (2) विनिर्माण के क्षेत्र में वृद्धि दर वित्तीय वर्ष 2024-25 में 4.5 प्रतिशत की रही थी जो वित्तीय वर्ष 2025-26 में बढ़कर 7.0 प्रतिशत रहने की सम्भावना है; (3) सकल मान योग (Gross Value Addition) में वृद्धि दर का 6.4 प्रतिशत से बढ़कर 7.3 प्रतिशत रहने का अनुमान है; (4) सकल स्थिर पूंजी निर्माण (Gross Fixed Capital Formation) में वृद्धि दर 7.1 प्रतिशत से बढ़कर 7.8 प्रतिशत रहने की सम्भावना व्यक्त की गई है; (5) सेवा एवं कृषि क्षेत्र में क्रमश: 9.1 प्रतिशत एवं 3.1 प्रतिशत की सम्भावना व्यक्त की गई है; (6) भारत से विभिन्न उत्पादों के निर्यात में वृद्धि दर का 6.3 प्रतिशत से बढ़कर 6.4 प्रतिशत रहने की सम्भावना होना भी शामिल है।

अप्रेल 2025 से नवम्बर 2025 के खंडकाल में राजकोषीय घाटा 9.8 लाख करोड़ का रहा है जो वित्तीय वर्ष 2025-26 के कुल अनुमान का 62.3 प्रतिशत है, अतः बजटीय घाटा भी अभी तक नियंत्रण में ही रहा है। वित्तीय वर्ष 2025-26 में राजकोषीय घाटा 15.69 लाख करोड़ रहने का अनुमान लगाया गया था, जो सकल घरेलू उत्पाद का 4.4 प्रतिशत होगा। इस प्रकार केंद्र सरकार की आय एवं व्यय से सबंधित स्थिति भी पूर्णत: नियंत्रण में है।

वित्तीय वर्ष 2025-26 में भारत के सकल घरेलू उत्पाद में वृद्धि दर के 7.4 प्रतिशत के अनुमान को उत्साहवर्धक माना जाना चाहिए क्योंकि यह वृद्धि दर ट्रम्प द्वारा भारत से अमेरिका को होने वाले विभिन्न वस्तुओं के निर्यात पर लगाए गए 50 प्रतिशत टैरिफ के बावजूद रहने वाली है। दरअसल ट्रम्प द्वारा भारत से अमेरिका को होने वाले निर्यात पर लगाए गए टैरिफ को वित्तीय बाजार में बहुत गम्भीरता से लिया जाकर इसके भारतीय अर्थव्यवस्था पर होने वाले प्रभाव को बहुत बढ़ा चढ़ाकर पेश किया गया है। परंतु, वास्तव में भारत के आर्थिक विकास दर पर इसका प्रभाव लगभग नहीं के बराबर रहा है। इसके पीछे मुख्य कारण अमेरिका को भारत से होने वाले निर्यात की कम मात्रा भी है। वित्तीय वर्ष 2024-25 में भारत से अमेरिका को 7,900 करोड़ अमेरिकी डॉलर के विभिन्न वस्तुओं के निर्यात हुए थे, जबकि भारत का सकल घरेलू उत्पाद 4.29 लाख करोड़ अमेरिकी डॉलर का रहा था। अतः भारत से अमेरिका को होने वाले निर्यात भारत के सकल घरेलू उत्पाद का मात्र 1.85 प्रतिशत ही रहे हैं।

वैसे भी भारत की अर्थव्यवस्था निर्यात आधारित है ही नहीं (चीन की अर्थव्यवस्था निर्यात आधारित है, इसीलिए चीन पर अमेरिकी टैरिफ का प्रभाव अधिक हो सकता है), भारतीय अर्थव्यवस्था मुख्यतः आंतरिक उपभोग पर आधारित है। यदि भारत के नागरिक स्वदेशी उत्पादों का अधिक से अधिक सेवन करते हैं तो ट्रम्प द्वारा भारत से अमेरिका को होने वाले निर्यात पर लगाए गए टैरिफ के भारतीय अर्थव्यवस्था पर होने वाले प्रभाव को शून्य भी किया जा सकता है।

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ द्वारा भी भारतीय समाज को लगातार प्रेरणा दी जा रही है कि वे भारत में निर्मित उत्पादों का ही उपयोग करें ताकि भारत को प्रत्येक क्षेत्र में आत्मनिर्भर बनाया जा सके। संघ ने पंच परिवर्तन  नामक एक कार्यक्रम को प्रारम्भ किया है, जिसमें पांच बिंदु शामिल किए गए हैं – स्वदेशी का उपयोग, नागरिक कर्तव्य, सामाजिक समरसता, पर्यावरण, कुटुंब प्रबोधन। भारत में समस्त नागरिकों का यह कर्तव्य है कि वे सनातन हिंदू संस्कृति के संस्कारों का अनुपालन सुनिश्चित करें। इन संस्कारों में भारत के नागरिकों में “देश प्रथम” के भाव का जागरण भी शामिल है। लोकतंत्र की सफलता और स्थिरता नागरिकों की भागीदारी और कर्तव्यों के प्रति सजगता पर निर्भर करती हैं। जब नागरिक अपने कर्तव्यों के प्रति संवेदनशील होते हैं और उनका ईमानदारी से पालन करते हैं तो समाज में सकारात्मक बदलाव आते हैं और देश की प्रगति होती हैं। समाज की प्रगति, सुरक्षा और समृद्धि के लिए नागरिकों की अपने कर्तव्यों के प्रति संवेदनशीलता तथा कटिबद्धत्ता आवश्यक है। करों का समय पर और सही राशि का भुगतान करना नागरिकों का कर्तव्य है। देश की आर्थिक प्रगति के लिए करों का उचित प्रबंधन आवश्यक है। प्रत्येक नागरिक का यह भी कर्तव्य है कि वह समाज की भलाई के लिए स्वच्छता अभियान, पर्यावरण संरक्षण और सामुदायिक विकास जैसी सामाजिक सेवाओं में भाग लें।

किसी भी देश के नागरिक यदि स्वदेशी उत्पादों को अपनाना प्रारम्भ करते हैं तो इससे देश में उद्योगों को बढ़ावा मिलता है, अन्य देशों में उत्पादित वस्तुओं का आयात कम होता है और देश में ही रोजगार के नए अवसर निर्मित होते हैं। स्वदेशी का मतलब विदेशी सामान इस्तेमाल नहीं करना है परंतु यह कार्य इतना आसान नहीं है क्योंकि आज विश्व के समस्त देश एक वैश्विक गांव में परिवर्तित हो गए हैं, जिसके चलते उत्पादों का एक देश से दूसरे देश में आयात एवं निर्यात बहुत आसान बन पड़ा है। आचार्य श्री विनोबा भावे जी कहते हैं स्वदेशी का अर्थ है आत्मनिर्भरता और अहिंसा। संघ ने इसमें एक बिंदु जोड़ दिया: आत्मनिर्भरता, अहिंसा और सादगी। प्रत्येक भारतीय नागरिक से अपेक्षा की जाती है कि वह मितव्ययिता से जिए ताकि संसाधनों के दुरुपयोग को रोका जा सके। परंतु, इसका आश्य  कंजूसी करना कदापि नहीं है।

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ जैसे सामाजिक संगठनों के साथ ही केंद्र सरकार ने भी आर्थिक क्षेत्र में कई प्रयास किए हैं जिसके चलते हाल ही के समय में भारत की आर्थिक विकास दर में वृद्धि दर में लगातार सुधार दिखाई दिया है। विशेष रूप से ट्रम्प प्रशासन द्वारा भारत से अमेरिका को होने वाले विभिन्न उत्पादों के निर्यात पर लगाए गए 50 प्रतिशत के टैरिफ के प्रभाव को लगभग शून्य करने के उद्देश्य से भारत ने विभिन्न देशों के साथ द्विपक्षीय मुक्त व्यापार समझौते सम्पन्न किए हैं, इनमे विशेष रूप से शामिल हैं यूनाइटेड किंगडम, ओमान, आस्ट्रेलिया, न्यूजीलैंड, आदि। यूरोपीयन देशों के साथ भी मुक्त व्यापार समझौता शीघ्र ही सम्पन्न होने जा रहा है। सम्भवत 27 जनवरी 2026 को इस मुक्त व्यापार समझौते पर यूरोपीयन यूनियन एवं भारत द्वारा हस्ताक्षर किए जाएंगे। साथ ही, अमेरिका द्वारा भारतीय उत्पादों के आयात पर लगाए गए 50 प्रतिशत के टैरिफ से प्रभावित होने वाले उत्पादों के लिए भारत ने अन्य देशों के रूप में बाजार तलाश लिए हैं एवं इन देशों को विभिन्न उत्पादों का निर्यात प्रारम्भ हो चुका है जिससे नवम्बर 2025 एवं दिसम्बर 2025 माह में भारत से विभिन्न उत्पादों के निर्यात में वृद्धि दर हासिल की जा सकी है।

वैसे, भारत और अमेरिका के बीच भी मुक्त व्यापार समझौते को लगभग अंतिम रूप दिया जा चुका है एवं शीघ्र ही इसकी घोषणा की जा सकती है। इसके बाद तो भारतीय उत्पादों के अमेरिका को होने वाले निर्यात पर लगाए गए 50 प्रतिशत को भी कम अथवा समाप्त किया जा सकता है, इससे अन्य देशों के साथ साथ अमेरिका को भी भारत से होने वाले विभिन्न उत्पादों के निर्यात में और अधिक वृद्धि हासिल की जा सकेगी।

प्रहलाद सबनानी
सेवानिवृत्त उपमहाप्रबंधक,
भारतीय स्टेट बैंक
के-8, चेतकपुरी कालोनी,
झांसी रोड, लश्कर,
ग्वालियर – 474 009
मोबाइल क्रमांक – 9987949940

ई-मेल – prahlad.sabnani@gmail.com

शाकद्वीपीय मग ब्राह्मणों का शास्त्रीय विवेचन

शाकद्वीप के राजा प्रियव्रत के पुत्र ‘मेघातिथी’ थे। उन्होंने शाकद्वीप में एक विशाल सूर्य नारायण मंदिर का निर्माण करवाया था। उसमें स्वर्ण निर्मित सूर्य प्रतिमा स्थापित की गई थी। उस समय शाकद्वीप में सूर्य भगवान की शास्त्र विधि से पूजा करने वाला कोई ब्राह्मण नहीं था

भगवान सूर्य ने तदुपरान्त मेघातिथी की प्रार्थना पर अपने तेज से अष्ट ब्राह्मण उत्पन्न किये। इन ब्राह्मणों ने सूर्य भगवान की आज्ञा शिरोधार्य कर मंदिर में सूर्य मुर्ति की प्राण प्रतिष्ठा की तथा सूर्य भगवान की विधि-विधान से नियमित पूजा-अर्चना करने लग गये। तभी से इन ब्राह्मणों को शाकद्वीपी ब्राह्मण के नाम से पुकारा जाने लगा।

द्वापर में जम्बूद्वीप में आगमन
शाकद्वीपीय ब्राह्मणों का जम्बूद्वीप में आगमन पुराणों के अनुसार द्वापर में हुआ । भगवान कृष्ण के पुत्र साम्ब को ऋषि दुर्वासा ने ही कुष्ठ रोग का श्राप दिया था, क्योंकि उन्होंने ऋषि का उपहास किया था । उनके रूप को लेकर मजाक उड़ाया था। साम्ब ने द्वारका आए ऋषि दुर्वासा का उनकी कृशता और कुरूपता पर उपहास किया, जिससे क्रोधित होकर ऋषि ने उन्हें कुष्ठ रोग का श्राप दिया था। एक अन्य कथा में नारद जी के बहकावे में आकर

राजकुमार सांब ने श्रीकृष्ण की कनिष्ठ पत्नी नंदिनी के साथ अनुचित व्यवहार किया था, जिससे क्रोधित होकर श्रीकृष्ण ने उन्हें कुष्ठ रोग का श्राप दिया था। बाद में भगवान कृष्ण अपने पुत्र साम्ब के कुष्ठ रोग से अत्यन्त चिंतित भी हुए। उन्हें एक विप्र जाति के संबंध में जानकारी हुई जो शाकद्वीप में रहती थी।जो अपने सूर्यमंत्र और चिकित्सा के लिए प्रख्यात थी। भगवान नें शाक द्वीप के अट्ठारह परिवारों को जम्बू द्वीप में सम्मान पूर्वक बुलवाया। शाकद्वीपीय चिकित्सको ने साम्ब के कुष्ठ रोग को अपने आध्यात्मिक चिकित्सा से समाप्त कर दिया।

राजा धृष्टकेतु के कुष्ठ का भी इलाज :-
उन ब्राह्मणों को द्वारका में ज्यादा समय व्यतीत करना अच्छा न लगा और गरुड़ पर सवार हो कर शाकद्वीप की ओर जा रहे थे। जब वे मगध-देश के ऊपर पहुंचे तो वहाँ रोना-पीटना सुनाई पड़ा। ब्राह्मण लोग बड़े व्यग्र थे। उनके पूछने पर गरुड़ ने कहा कि मगध-देश के राजा धृष्टकेतु को कोढ़ हो गया है इसी कारण उसने मरने की ठान ली है और चिता के लिये लकड़ियों का ढेर लगा है। राजा बड़ा धर्मात्मा है और उसके राज में सब सुखी हैं। इसी से उसकी सब प्रजा उसके लिये रो रही है। ब्राह्मणों को दया आई और उन्होंने गरुड़ से कहा कि ‘क्या इस देश में ऐसा तपस्वी नहीं है जो राजा को इस रोग से मुक्त करे? गरुड़ ने उत्तर दिया यहाँ ऐसा कोई होता तो शाम्ब आप लोगों को क्यों बुलाते। ब्राह्मणों ने गरुड़ से कहा कि पृथ्वी पर उतरो। राजा उनके दर्शनों से कृतकृत्य हो गया। मिहरांशु ने उसे अपना चरणोदक पिलाया और राजा का कोढ़ अच्छा हो गया।

राजा धृष्टकेतु ने मगध में शाक द्वीपियों को बसाया
जब ब्राह्मणों ने राजा धृतकेतु को निरोग करने के बाद गरुड़ से कहा कि हमें शाकद्वीप पहुँचा दो। तब गरुड़ ने कहा कि आप से प्रतिज्ञा करा चुका हूँ अब आप यहीं रहिये। कृतज्ञ राजा ने ब्राह्मणों को अपने देश में आदर से रक्खा और गङ्गा-तट पर कई गाँव दिये। ब्राह्मणों से चार अर्थात् श्रुतिकीर्ति, श्रुतायु, सुधर्म्मा, और सुमति ने सन्यास ले लिया और तपस्या करने को बदरिकाश्रम चले गये। शेष 14 मगध में रहे और वसु ने अपनी बेटियाँ उनको विवाह दी। उन्हीं की सन्तान आज-कल मगध देश में बसी है। मगध नरेश की आग्रह पर भगवान ने शाकद्वीपीय चिकित्सको के बहत्तर परिवारों को मगध के विभिन्न पुरों में बसा दिया।

त्रेता युग में राजा प्रतर्दन द्वारा शाकद्वीपी राजवंश का विस्तार :-

काशी के राजा प्रतर्दन त्रेतायुग में हुए थे।  वे काशी के प्रसिद्ध राजा दिवोदास के पुत्र थे।

इनके अन्य नाम ‘द्युमान’, ‘शत्रुजित’, ‘वत्स’, ‘ऋतध्वज’ और ‘कुवलयाश्व’ भी मिलते हैं।

उनके पिता दिवोदास ने काशी में शासन किया था और वे त्रेतायुग के अंतिम चरण या द्वापर युग के शुरुआती दौर से पूर्व का समय मानते हैं, क्योंकि वे राम के पूर्वज के समकालीन संदर्भों में एक शक्तिशाली क्षत्रिय शासक के रूप में वर्णित किया गया है। वे अत्यंत तपस्वी और दूरदर्शी थे। उनके कठिन तप को देखकर सूर्य भगवान् स्वयं प्रसन्न हुए और उन्होंने सात ब्राह्मणों को आशीर्वाद दिया। उन ब्राह्मणों की संतानों ने पृथ्वी पर धर्म और न्याय का प्रचार किया।”

समय के साथ शाकद्वीपी राजवंश का विस्तार हुआ। मिहरांशु, शुभांशु, सुधर्मा, सुमति और अन्य ब्राह्मणों की संतानों ने विभिन्न क्षेत्रों में शाखाएँ बनाई। प्रत्येक शाखा ने अपने-अपने क्षेत्र में धर्म और ज्ञान का प्रचार किया।

गोत्र और शाखाएं
मिहरांशु, भारद्वाज, कौण्डिन्य, कश्यप, गर्ग की सन्तान बढ़ी और प्रसिद्ध हुई। इसी कारण शाकद्वीपियों के छः घर बन गये और प्रत्येक घर के मूल-पुरुष का नाम गोत्र कहलाया। आज-कल शाकद्वीपियों के 72 घर गिने जाते हैं, अर्थात् उर के 24 आदित्य के 12, मण्डल के 12 और अर्क 7 घर या पुर अस्तित्व में आए। शेष इन्हीं की शाखायें हैं।

मिहरांशु की प्रतिष्ठित शाखा रही:-

मिहरांशु की सन्तान ने बड़े – बड़े काम किये थे इसलिये उनकी शाखा अधिक प्रतिष्ठित मानी जाती है। जो शाखा जिस गाँव में बसी उसी गाँव के नाम से प्रसिद्ध हुई।

मगध चेदि नरेश ने शाकद्वीपीय ब्राह्मणों को मगध में बसाया :-
शाकद्वीपीय ब्राह्मणों की दो मुख्य शाखा ‘मग ब्राह्मण’ तथा ‘भोजक’ ब्राह्मण’ माने जाते हैं । मग ब्राह्मण मूलतः मगध (गया, बिहार) के निवासी बताये जाते हैं। शकद्वीपीय ब्राह्मण मुख्यतः मगध के थे, अतः उनको मग भी कहा गया है। मग के दो ब्राह्मण विक्रमादित्य काल में जेरूसलेम गये थे जो उस समय रोम के अधीन था। रोमन राज्य तथा विक्रमादित्य राज्य के बीच कोई अन्य राज्य नहीं था। इन लोगों ने ही ईसा के महापुरुष होने की भविष्यवाणी की थी। किन्हीं ग्रन्थों में द्वारका शाकद्वीप में स्थित कही गई है। वेद तथा पुराणों में इनका उल्लेख ब्राह्मणों की एक सर्वोत्तम जाति के रूप में है जिनका जन्म सूर्यदेव के अंश से हुआ था।

चेदि के राजा धृष्टकेतु के कुष्ठ का इलाज
चेदि राज्य का राजा और शिशुपाल का सबसे बड़ा पुत्र धृष्टकेतु है। धृष्ट का अर्थ है “साहसी,” “प्रवंचित,” या “साहसी” और केतु का अर्थ – “झंडा,” “पट्टिका,” या “प्रतीक” होता है । धृष्टकेतु शिशुपाल के पुत्र हैं , जो अपनी मातृ पक्ष से यदु के वंशज दशार्ह वंश से संबंधित हैं। धृष्टकेतु यह नाम धृष्टद्युम्न के पुत्र सहित कई अन्य व्यक्तियों के साथ साझा करते हैं । वह

एक महान धनुर्धर और महारथ थे । धृष्टकेतु को युधिष्ठिर की सेना के सात सेनापतियों में से एक नियुक्त किया गया था। युद्ध के दौरान, धृष्टकेतु ने कई दुर्जेय योद्धाओं से युद्ध किया था। वह पांडवों का वफादार सहयोगी है और कुरुक्षेत्र युद्ध में एक प्रमुख भूमिका निभाता है , जहाँ उसने उनकी सेना के सात सेनापतियों में से एक के रूप में कार्य किया है। कुरुक्षेत्र के युद्ध में उसने बहुत से योद्धाओं से युद्ध किया और वृहदवाहन का वध किया। उस सहित उसके तीनों भाइयों – पुरूजीत, धृष्टकेतु और वृहद्क्षत्र का वध चौदहवें दिन के युद्ध में द्रोणाचार्य के हाथों हुआ था। धृष्टकेतु ने अपनी मृत्यु के बाद स्वर्ग में ‘विश्वदेव’ का दर्जा प्राप्त किया था।

मगध चेदि नरेश जरासंघ के इस पूर्वज धृष्टकेतु को कुष्ठ हो गया था। जिनके उपचार के लिए शाकद्वीपीय ब्राह्मणों को मगध में लाया तथा कुष्ठ से त्राण पाकर उपहार स्वरूप उन्हें अठारह पुर (ग्राम) दिये तथा प्रत्येक के चार चार पुत्र उत्पन्न हुआ और वे सब पृथक पृथक 72 पुरों (ग्रामों) में निवास करने लगे । मगध- चेदि नरेश ने शाकद्वीपीय ब्राह्मणों के बहत्तर परिवारों को मगध के विभिन्न पुरों में बसा दिया गया । वहां से ये लोग भारत के विभिन्न भागों में फ़ैल गए । जैसे बिहार और उत्तरी भारत के अन्य भागों में एक प्रसिद्ध समुदाय है। इनकी दो उपशाखाएँ हैं- भोजक और मग। इनके गाँवों में अधिकांश सकलद्वीपी ब्राह्मणों के पास कृषि भूमि होती है, जिस पर भूमिहीन मजदूर खेती करते हैं। प्रत्येक शाक=सकलद्वीपी परिवार का अपना देवता होता है और वे पूर्वजों की पूजा करते हैं। उनके धार्मिक विशेषज्ञ भी उनके समुदाय से ही होते हैं। पुजारी और ज्योतिषी होने के नाते, सकलद्वीपी ब्राह्मणों का अन्य समुदायों के साथ संरक्षक-ग्राहक संबंध होता है।

पुराणों में उल्लेखित विवरण के पहले छठी पांचवी शताब्दी ई. पू. में शाकद्वीप से भारत आये उपयुक्त सभी साक्ष्यों से सवर्धा समर्थित हैं सूर्योपासक पुरोहितों को मग एवं भोजक इन दोनों श्रेणियों में विभाजित किया गया है । पुराणों के आन्तरिक साक्ष्य के आधार पर कहा जा सकता है कि मग और भोजक एक थे अन्तर मात्र इतना था कि –

(1) सूर्य का जो ध्यान करे उसे मग कहा जाता है । मग म अक्षर की पूजा करते थे म= मंत्र ग = गुरू मंत्रों के गुरू मग मे सूर्य गायन्तीति मगा:
(2) भोजक- धूप, दीप, माला से पूजन एवं विभिन्न उपहारों से सूर्य को भोग लगाते हैं उन्हे भोजक कहा जाता है ।

धूपमाल्यैर्मतश्चापि उपहारैस्तथैव च ।
भोजयन्ति सहस्रांशुं तेन ते भोजका: स्मृता: ।
यह भी सम्भव है कि भोजक भारतीय परम्परा के पुरोहित रहे हों। दोनों ही सूर्य के सकल एवं निष्कल रूप से उपासक थे ।

कालान्तर में भारत के कई प्रान्तों के रजवाड़ों द्वारा पूजा पाठ , रोग निवारण के लिए अपने अपने राज्यों में ले गये, जिनमें 72 पुरों में से 16 पुर के लोग पश्चिम में गये जो वहां गोत्र (खाप) से जाने गये।

लेखक परिचय:-

(लेखक भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण, में सहायक पुस्तकालय एवं सूचनाधिकारी पद से सेवामुक्त हुए हैं। वर्तमान समय में उत्तर प्रदेश के बस्ती नगर में निवास करते हुए सम सामयिक विषयों,साहित्य, इतिहास, पुरातत्व, संस्कृति और अध्यात्म पर अपना विचार व्यक्त करते रहते हैं। वॉट्सप नं.+919412300183)

उपराष्ट्रपति श्री सी. पी. राधाकृष्णन ने आत्मकथा ‘पालनिवेलु गट्स’ के हिंदी संस्करण का विमोचन किया

पुस्तक विमोचन पर उपराष्ट्रपति ने कहा, भारत एक रहा है और हमेशा एक रहेगा

अच्छा समाज बनाने के लिए व्यक्तिगत प्रयासों को पहचानना ज़रूरी है: उपराष्ट्रपति

प्रत्‍येक व्यक्ति का समाज को कुछ लौटाने का कर्तव्य है: उपराष्ट्रपति

प्रविष्टि तिथि: 19 JAN 2026 8:22PM by PIB Delhi

उपराष्ट्रपति, श्री सी. पी. राधाकृष्णन ने जाने-माने सर्जन डॉ. सी. पलानीवेलु की आत्मकथा ‘पलानीवेलु गट्ज़’ के हिंदी संस्‍करण का विमोचन किया और इस किताब को साहस, लगन और मेडिसिन के क्षेत्र में नैतिक नवोन्‍मेष का एक प्रेरणादायक उदाहरण बताया।

इस मौके पर, उपराष्ट्रपति ने डॉ. पलानीवेलु के लेप्रोस्कोपिक और रोबोटिक सर्जरी में अग्रणी योगदान को उजागर किया, और कहा कि उनके काम ने भारत में सर्जिकल तरीकों को बदल दिया है और उन्हें दुनिया भर में पहचान दिलाई है। उन्होंने कहा कि ऐसे समय में जब देश में मिनिमली इनवेसिव सर्जरी अभी शुरुआती दौर में थी, डॉ. पलानीवेलु ने मरीज़ों की देखभाल में नवोन्‍मेष को गले लगाकर असाधारण दूरदर्शिता और साहस दिखाया।

भारत में लेप्रोस्कोपिक सर्जरी के शुरुआती दिनों को याद करते हुए, उपराष्ट्रपति ने कहा कि 1990 के दशक की शुरुआत में डॉ. पलानीवेलु उन शुरूआती लोगों में से थे जिन्होंने इसकी क्षमता को पहचाना, तब भी जब इस तकनीक पर संदेह किया जा रहा था। उन्होंने कहा कि डॉ. पलानीवेलु ने 1991 में कोयंबटूर में लेप्रोस्‍कोपिक सर्जरी शुरू की, और दक्षिण भारत में ऐसा पहला केन्‍द्र स्थापित किया।

किताब के शीर्षक, पालनिवेलु गट्स का ज़िक्र करते हुए, उपराष्ट्रपति ने कहा कि यह आत्मकथा सिर्फ़ एक सफल सर्जन की कहानी नहीं है, बल्कि एक ऐसे युवा की यात्रा है जिसने साधारण शुरुआत से लेकर अनुशासन, कड़ी मेहनत और नैतिक विश्वास के ज़रिए मुश्किलों और असफलताओं का मुकाबला किया। उन्होंने आगे कहा कि जब तक व्यक्तियों के ईमानदार प्रयासों और अनुकरणीय योगदान को पहचाना और सराहा नहीं जाता, तब तक एक अच्छा समाज नहीं बनाया जा सकता।

भारत की विविधता पर विचार करते हुए, उपराष्ट्रपति ने टिप्पणी की कि इतनी विविधताओं के बावजूद, भारत एक रहा है और साझा मूल्यों और सामूहिक आकांक्षाओं से बंधा हुआ हमेशा एक रहेगा। उन्होंने इस बात पर ज़ोर दिया कि हिंदी संस्करण का विमोचन विशेष रूप से महत्वपूर्ण है, क्योंकि यह समाज के एक बड़े वर्ग, विशेष रूप से हिंदी पढ़ने वालों को, इस उल्लेखनीय जीवन यात्रा तक पहुँचने और उससे प्रेरणा लेने में सक्षम बनाएगा।

डॉ. पलानीवेलु के अपने शिक्षकों और गुरुओं के प्रति गहरे सम्मान की सराहना करते हुए, उपराष्ट्रपति ने कहा कि उनके नाम पर पुरस्कार शुरू करने की उनकी प्रथा भारत की “गुरुओं” के प्रति श्रद्धा की सदियों पुरानी परंपरा को दर्शाती है और उत्कृष्टता की खोज में विनम्रता और कृतज्ञता के महत्व को रेखांकित करती है।

उपराष्ट्रपति ने कहा कि समाज हर व्यक्ति को आकार देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है और समाज को वापस देना हर व्यक्ति का कर्तव्य है। दूरदराज के इलाकों में सर्जनों को प्रशिक्षित करने और लागत प्रभावी सर्जिकल तकनीकों को विकसित करने के डॉ. पलानीवेलु के प्रयासों की सराहना करते हुए, उन्होंने कहा कि इन पहलों ने सामाजिक-आर्थिक समूहों में उन्नत चिकित्सा देखभाल तक पहुंच का काफी विस्तार किया है।

उन्होंने विश्वास व्यक्त किया कि पलानीवेलु गट्स पीढ़ियों को बड़े सपने देखने, ईमानदारी से काम करने और निस्वार्थ भाव से समाज की सेवा करने के लिए प्रेरित करेगा।

इस कार्यक्रम में रेल राज्य मंत्री, श्री रवनीत सिंह; नेशनल मेडिकल कमीशन के चेयरमैन, डॉ. अभिजात सेठ; इंटर-यूनिवर्सिटी सेंटर फॉर टीचर एजुकेशन के बोर्ड ऑफ गवर्नर्स के चेयरमैन, प्रो. डॉ. जे. एस. राजपूत; और जीईएम हॉस्पिटल ग्रुप के सीनियर प्रतिनिधियों सहित कई लोग शामिल हुए।

शिखा अग्रवाल को अंग्रेजी कविता में डिप्लोमा प्रमाणपत्र

कोटा / लेखिका शिखा अग्रवाल को अंग्रेजी कविता में ऑन लाइन पोईट्स नेस्ट इंटरनेशनल प्लैटफॉर्म द्वारा डिप्लोमा प्रमाण पत्र जारी किया गया है। नवंबर 25 से  जनवरी 26 सत्र के लिए अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर कई अंग्रेजी कवयित्रियों ने इसमें भाग लिया था। इसमें भारत से भीलवाड़ा की श्रीमती शिखा के साथ-साथ श्रीमती सीमा दीवान और ग्रीस की अन्ना मावरूफी को डिप्लोमा प्रमाण पत्र दिया गया है।
शिखा ने बताया कि उन्होंने सभी लक्ष्य पूरे करते हुए अंग्रेजी की 10 कविताएं और 3 निबंध भेजे थे। अंग्रेजी निबंध द रोमांटिक एंड विक्टोरियन पोईट्स , पोइट्री एंड मी एवं
सिगनीफिकेन्स आफ फिगर आफ स्पीच इन इंग्लिश पोईट्री विषयों पर भेजे गए थे।
 उल्लेखनीय है कि इससे पूर्व भी अन्तर्राष्ट्रीय ऑन लाइन अंग्रेजी कविता प्रतियोगिता में शिखा को द्वितीय स्थान प्राप्त हुआ था।
 शिखा अंग्रेजी और हिंदी दोनों भाषाओं में कविताएँ लिखती हैं। इन्होंने अंग्रेजी में शृंगार विषय पर फैशन-एन इनस्टिक्ट , उदयपुर-वर्ल्ड फेमस टूरिस्ट डेस्टिनेशन एवं सह लेखकों के साथ वर्ल्ड हेरिटेज ग्लोबल टू लोकल-लिस्टेड विथ यूनेस्को बुक्स लिखी हैं। दो पुस्तकों ए विदेश प्रवास हिंदी सेवा  संस्मरण / मेमोरीज एवं  वॉयस ऑफ नेचर ( चिल्ड्रन स्टोरीज ) का अंग्रेजी अनुवाद भी किया है।
हिंदी में  राजस्थान साहित्य अकादमी के आर्थिक सहयोग से ” मन दर्पण के प्रतिबिंब” काव्य संग्रह के साथ – साथ हेल्थ केयर,  टेक्सटाइल सिटी भीलवाड़ा , अतुल्य अजमेर, सह लेखक , ये है हमारी रंग बिरंगी बूँदी, सह लेखक  के साथ लिखी है। शृंगार एक स्वाभाविक वृति का संपादन भी किया है। बाल कविताओं की कृति प्रकाशनाधीन है।
इनको लेखन के लिए 30 से अधिक प्रशस्ति पत्रों के साथ प्रमुख रूप से वैश्विक समरस संस्थान साहित्य सृजन भारत, गांधीनगर, गुजरात द्वारा  समरस श्री साहित्य , साहित्य मंडल श्रीनाथद्वारा द्वारा काव्य कुमुद, श्री भारतेंदु समिति कोटा द्वारा साहित्य श्री , अणुव्रत समिति भीलवाड़ा द्वारा अणुव्रत काव्यधारा और लघु उद्योग भारती भीलवाड़ा द्वारा विदुषी नारी रत्न सम्मान से सम्मानित किया गया।

बाल साहित्योदय: बच्चों को मोबाइल से दूर रह कर बाल साहित्य पढ़ने और लिखने का संदेश

कोटा । संस्कृति साहित्य  मिडिया फोरम एवं   न्यू किड्स वर्ल्ड स्कूल विज्ञान नगर के तत्वावधान में विद्यालय प्रांगण में शनिवार को आयोजित बाल साहित्योदय कार्यक्रम में साहित्यकारों ने कविताओं के माध्यम से बच्चों को साहित्य से जुड़ने का संदेश दिया। बच्चों ने सूर्य वंदना, स्वरचित कविता पाठ एवं सांस्कृतिक कार्यक्रम प्रस्तुत किए। विभिन्न साहित्यिक प्रतियोगिताओं में विजेता रहे बच्चों को पुरस्कृत किया गया।
मुख्य अतिथि जितेंद्र निर्मोही और अध्यक्ष रामेश्वर शर्मा रामू भैया ने बच्चों को मोबाइल से दूर रहने बाल कविता, कहानी की पुस्तकें पढ़ने तथा लिखने के प्रयास के लिए प्रेरित किया। उन्होंने बताया मिशन बाल मन तक के अंतर्गत 36 हजार बच्चों को साहित्य से जोड़ने की दिशा में हाड़ोती में बड़ा काम हुआ है। विद्यालय निदेशक आर. के. शर्मा ने सभी का स्वागत कर ऐसे कार्यक्रमों को भावी पीढ़ी के लिए सकारात्मक पहल बताया।
मीडिया फोरम की ओर से साहित्यिक सेवाओं एवं  बाल साहित्य कार्यक्रमों में योगदान के लिए साहित्यकार श्यामा शर्मा, महेश पंचोली, पल्लवी दरक न्याति, योगीराज योगी एवं शमा फिरोज़ को प्रशस्ति पत्र और प्रतीक चिन्ह दे कर सम्मानित किया गया। इनके साथ विशिष्ठ अतिथि डॉ. कृष्णा कुमारी ने काव्य पाठ किया। साहित्यकारों ने बच्चों के लिए अपनी बाल पुस्तकें विद्यालय को भेंट की।
 फोरम के संयोजक डॉ. प्रभात कुमार सिंघल ने बताया कि बच्चों में साहित्य सृजन क्षमता विकसित करने के लिए इस वर्ष बाल रचना प्रशिक्षण शिविर लगाए जाएंगे। फोरम का विस्तार कर बाल साहित्य गतिविधियों से जुड़ने वाले साहित्यकारों को सदस्य बनाया जाएगा।
अतिथियों ने मां शारदे की तस्वीर के सम्मुख दीप प्रज्वलित कर कार्यक्रम का शुभारंभ किया। कार्यक्रम का निर्देश प्राचार्य पलक विजयवर्गीय ने तथा संयोजन एवं संचालन निधि शर्मा ने किया। कार्यकम में इतिहासविद फिरोज़ अहमद और 200 से अधिक बच्चें उपस्थिति रहे।

चंडीगढ़ यूनिवर्सिटी में 33 देशों के कलाकारों ने नृत्य व कला की दी प्रस्तुति

चंडीगढ़। चंडीगढ़ यूनिवर्सिटी में दो दिवसीय 11वें इंडिया इंटरनेशनल डांस एंड म्यूजिक फेस्टिवल-2026 की धूम-धाम के साथ शुरुआत हो गई है। यह इंडियन काउंसल फॉर कल्चरल रिलेशंस (आईसीसीआर) के सहयोग से चंडीगढ़ यूनिवर्सिटी में करवाए जा रहे फेस्टिवल का थीम ’एक दुनिया अनेक सांस्कृतियां’ पर आधारित है। इसमें 33 देशों के 350 से ज्यादा कलाकार हिस्सा ले रहे हैं। जोकि अपने देशों के डांस, संगीत व कला की प्रस्तुतियां दे रहे हैं। यह समागम वैश्विक एकता और सांस्कृतिक विविधता का संदेश दे रहा है।

समारोह के पहले दिन चंडीगढ़ यूनिवर्सिटी के चांसलर और सांसद (राज्य सभा) सतनाम सिंह संधू ने मुख्य अतिथि के रुप में शिरकत की। इस अंतर्राष्ट्रीय सांस्कृतिक आदाान प्रदान कार्यक्रम में दुनिया भर से प्रतिभा और रचनात्मकता देखने को मिल रही है।

 

इस मौके चंडीगढ़ यूनिवर्सिटी के चांसलर व सांसद (राज्य सभा) सतनाम सिंह संधू ने कहा कि “पीएम मोदी के सराहनीय प्रयास के कारण आज भारत विदेशी सैलानियों के लिए ग्लोबल हब बन कर उभरा है। वर्ष 2014 के बाद हमारे देश में सैलानियों की आमद में भारी इजाफा हुआ है। यह ही नहीं अब विदेशी स्टूडेंट्स भारत को शिक्षा के हब के रुप में देखते हैं। इसकी सबसे बड़ी उदाहरण मौजूदा समय चंडीगढ़ यूनिवर्सिटी में 65 देशों से पढ़ रहे 3000 विदेशी स्टूडेंट्स से मिलती है। चंडीगढ़ यूनिवर्सिटी हमेशा इस बात पर यकीन रखती है कि भारत विश्व शक्ति बने और हमारे देश की तरक्की विकास में संस्कृति और कला से ज्यादा कुछ भी नहीं हो सकता है। कला ऐसी क्रिया है, जिसे सभी लोग समझते हैं। कला और संस्कृति भारत को पूरी दुनिया से जुड़ने और बढ़िया रिश्ते बनाने में अहम भूमिका अदा करते हैं। इसके कारण हमारे देश के अलग-अलग देशों के साथ अच्छे रिश्ते बन रहे है।”

 

फेस्टिवल के पहले दिन की पहली परफॉर्मेंस में, डॉ. एल. सुब्रमण्यम और कविता कृष्णमूर्ति सुब्रमण्यम द्वारा पेश किए गए 80 सदस्यों वाले लक्ष्मीनारायण ग्लोबल म्यूजिक फेस्टिवल ग्रुप ने स्टेज पर अस्ताना फिलहारमोनिक सिम्फनी ऑर्केस्ट्रा, अक्टोबे रीजनल फिलहारमोनिक के चैंबर क्वायर और कजाकिस्तान के डांस ग्रुप श्गक्कूश् के साथ परफॉर्मेंस दी। गक्कू ग्रुप, जो अपनी तेज-तर्रार परफॉर्मेंस और पारंपरिक बैले स्टाइल के लिए जाना जाता है, ने अपने डांस के जरिए कजाकिस्तान का इतिहास, उसके घुड़सवारों की बहादुरी और विशाल खुले नजारों को दिखाया। दूसरी प्रस्तुति में ओश रीजनल फिलहारमोनिक के तहत किर्गिसतान के लोक-कथा दल आलम और नृत्य समूह अदेमी ने अपनी ऊर्जावान और पारंपरिक नृत्य शैलियों से किर्गिज संस्कृति की खूबसूरती को दर्शाया। तीसरी प्रस्तुति में मलेशिया की सूत्र फाउंडेशन के 17 मैंबरी टीम, राधे-राधे द स्वीट सरेंडर पर प्रस्तुति दी। यह प्रस्तुति भारतीय भक्ति परंपराओं से प्रेरित थी, जिसमें भगवान कृष्ण और राधा से जुड़े शाश्वत प्रेम और भक्ति का जश्न मनाया। इसके अलावा, पंजाब के पारंपरिक और लोक नृत्य लूडी से हुई, जिसमे चंडीगढ़ यूनिवर्सिटी के स्टूडेंट्स ने प्रस्तुति दी। इसके अलावा नेपाल, भूटान, बांग्लादेश, सूडान, तंजानिया, आइवरी कोस्ट, लाइबेरिया, लेसोथो, म्यांमार, यमन, श्रीलंका, अंगोला, मलावी, कैमरून, सीरिया, जिम्बाब्वे, दक्षिण सूडान, कांगो, थाईलैंड, युगांडा, माली, नामीबिया, केन्या, सोमालिया, घाना और मेडागास्कर के कलाकारों ने भी अपने शानदार परफॉर्मेंस से सभी को मंत्रमुग्ध कर दिया।

 

चंडीगढ़ यूनिवर्सिटी के बारे में

चंडीगढ़ यूनिवर्सिटी एक NAAC A+ ग्रेड और क्यूएस वर्ल्ड (QS World) रैंक धारक यूनिवर्सिटी है। यूजीसी द्वारा मान्य यह स्वायत्त शैक्षणिक संस्थान पंजाब राज्य में चंडीगढ़ के पास स्थित है। चंडीगढ़ यूनिवर्सिटी भारत की सबसे यंगेस्ट तथा पंजाब की एकमात्र प्राइवेट यूनिवर्सिटी है, जिसे NAAC (राष्ट्रीय मूल्यांकन और प्रत्यायन परिषद) द्वारा  A+ ग्रेड से सम्मानित किया गया है। यूनिवर्सिटी विभिन्न क्षेत्रों में 109 से अधिक अंडर ग्रेजुएट और पोस्ट ग्रेजुएट प्रोग्राम प्रदान करती है, जिनमें इंजीनियरिंग, मैनेजमेंट, फार्मेसी, लॉ, आर्किटेक्चर, जर्नालिज्म, एनीमेशन, होटल मैनेजमेंट, और कॉमर्स शामिल हैं। चंडीगढ़ यूनिवर्सिटी ने सर्वश्रेष्ठ प्लेसमेंट रिकॉर्ड बना कर वर्ल्ड कंसल्टिंग एंड रिसर्च कारपोरेशन (डब्ल्यूसीआरसी) द्वारा पुरस्कारित ”यूनिवर्सिटी विद बेस्ट प्लेसमेंट” अवार्ड को भी अपने नाम किया है।

 

Website: www.cuchd.in

Swati Behal
Specialist – Media Relations +91 8708162229

लघु पत्रिकाओं में भारतीय संस्कृति का पक्ष : प्रो आशुतोष मोहन विश्व पुस्तक मेले में बनास जन का लोकार्पण

दिल्ली। लघु पत्रिका आंदोलन साहित्य की प्रतिबद्धता और जनाकांक्षाओं का प्रतीक है जिसका संकल्प साहित्य और संस्कृति के पक्ष में काम करना है। बनास जन जैसी लघु पत्रिका डेढ़ दशक से भी अधिक समय से लगातार इस संकल्प को पूरा करने में जुटी हुई है। दलित लेखक संघ के राष्ट्रीय अध्यक्ष प्रो नामदेव ने बनास जन के सद्य प्रकाशित अंक का लोकार्पण करते हुए कहा कि अपने चरित्र में समावेशिता और उदारता से बनास जन ने साहित्य की विभिन्न धाराओं और विमर्शों को भी जगह दी है। उन्होंने कहा कि पुस्तक विरोधी समय में किसी लघु पत्रिका के पचासी अंक पूरे हो जाना एक उपलब्धि ही माना जाएगा। प्रो नामदेव ने लघु पत्रिका आंदोलन में पहल, वसुधा, तद्भव जैसी पत्रिकाओं के साथ बनास जन को भी रेखांकित करने योग्य बताया।

आयोजन के मुख्य अतिथि इंद्रप्रस्थ विश्वविद्यालय में अंग्रेजी साहित्य के आचार्य प्रो आशुतोष मोहन ने कहा कि वे बनास जन के पहले अंक से ही लगातार इस यात्रा को देख रहे हैं जिसमें सच्चे मन से सामान्य पाठकों तक साहित्य को पहुँचाने का इरादा है। प्रो मोहन ने कहा कि भूमंडलीकरण के भयानक सांस्कृतिक हमले में भारतीय संस्कृति का पक्ष साहित्य ही रख सकता है और बनास जन जैसी लघु पत्रिकाएँ इस पक्ष को मजबूती से रख रही हैं। सुपरिचित आलोचक और राजकीय महाविद्यालय रानीवाड़ा के प्राचार्य प्रो हिमांशु पंड्या ने बनास जन के विभिन्न विशेषांकों की चर्चा करते हुए कहा कि गंभीर साहित्य को जन सामान्य तक पहुँचाने में प्रेमचंद और परसाई जैसे लेखकों ने अपने ढंग से प्रयास किये थे आज के दौर में जब मीडिया के पास साहित्य के लिए कोई स्थान नहीं बचा है तब लघु पत्रिकाएँ ही इस काम को कर रही हैं। उन्होंने बनास जन के फणीश्वरनाथ रेणु, भीष्म साहनी, त्रिलोचन और अमरकांत विशेषांकों को हिंदी अकादमिकी के लिए भी महत्त्वपूर्ण बताया।

लक्ष्मीबाई कालेज में हिंदी की आचार्य और दलित लेखिका डॉ नीलम ने बनास जन के ओमप्रकाश वाल्मीकि, दलित स्त्री आत्मकथा अंकों को यादगार बताया। उन्होंने कहा कि प्रत्येक विमर्श मनुष्यधर्मी ही है और इन विमर्शों का मानवीय पक्ष साहित्य से ही प्रकट होता है। उन्होंने इस कार्य में बनास जन के योगदान को प्रशंसनीय बताया।

इससे पहले बनास जन के सम्पादक पल्लव ने बताया कि वर्ष 2008  से शुरू हुई यह यात्रा यदि हिंदी भाषा और साहित्य के पाठकों के लिए उपयोगी हुई है तो उनका प्रयास सार्थक है। अपने कार्य में सहयोग करने वाले लेखकों, पाठकों और सहयोगियों का आभार प्रकट करते हुए पल्लव ने कहा कि हिंदी क्षेत्र बहुत बड़ा है और हमारे प्रयास बेहद मामूली हैं। नयी पीढ़ी को साहित्य का पाठक बनाना आज भी कठिन चुनौती है। युवा शोधार्थी निधि सिंह ने अंक 86 में प्राकशित सामग्री की चर्चा करते हुए बताया कि शताब्दी के अवसर पर कृष्णा सोबती और रंगभूमि पर विशेष सामग्री इस अंक में दी गई है साथ ही भारतीय भक्ति साहित्य पर माधव हाड़ा, विनोद शाही, तृप्ति श्रीवास्तव, उज्ज्वल कुमार और देवीलाल गोदारा के आलेख अंक को उल्लेखनीय बनाते हैं।

आयोजन में प्रकाशक मीरा जौहरी, स्त्रीवादी कार्यकर्ता प्रज्ञा जोशी सहित अनेक लेखक और पाठक उपस्थित थे। अंत में हिन्दी आलोचक राजेंद्र कुमार और वीरेंद्र यादव के आकस्मिक निधन पर दो मिनट का मौन रख कर श्रद्धांजलि दी गई। लोकार्पण समारोह का संयोजन अभिनन्दन ने किया।

अभिनन्दन

शोधार्थी, हिंदी विभाग

दिल्ली विश्वविद्यालय

दिल्ली

महाराष्ट्र में भाजपा के विकास एवं विश्वास की निर्णायक जीत

महाराष्ट्र में हाल ही में संपन्न शहरी निकाय चुनाव राज्य की राजनीति की दिशा, प्रवृत्ति और भविष्य का संकेत देने वाला एक बड़ा जनादेश बनकर सामने आए हैं। भारतीय जनता पार्टी के नेतृत्व में महायुति गठबंधन की ऐतिहासिक सफलता ने यह स्पष्ट कर दिया है कि महाराष्ट्र की राजनीति अब एक निर्णायक मोड़ पर खड़ी है। यह बदलाव केवल सत्ता के हस्तांतरण तक सीमित नहीं है, बल्कि राजनीतिक सोच, जन अपेक्षाओं और लोकतांत्रिक व्यवहार में गहरे परिवर्तन का द्योतक है। इन चुनावों ने जहां भगवा राजनीति की वैचारिक और संगठनात्मक शक्ति को नए सिरे से रेखांकित किया है, वही प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की सकारात्मक सोच एवं विकास की राजनीति को आगे बढ़ाया है।
यह सफलता ऐसे समय में मिली है जब विधानसभा चुनावों में विपक्ष को करारी शिकस्त दिए जाने को अभी एक वर्ष भी पूरा नहीं हुआ था। इसके बावजूद राज्यव्यापी स्थानीय निकाय चुनावों में भाजपा नीत महायुति गठबंधन का दबदबा यह दर्शाता है कि यह जीत क्षणिक नहीं, बल्कि एक सुदृढ़ राजनीतिक प्रवाह का परिणाम है। इन परिणामों ने राष्ट्र का ध्यान इसलिए अपनी ओर खींचा, क्योंकि इन चुनावों को मिनी विधानसभा चुनावों की संज्ञा दी गई थी। दशकों तक शिवसेना के वर्चस्व का प्रतीक रहे बृहन्मुंबई नगर निगम, यानी बीएमसी में शिवसेना का दशकों पुराना किला ढ़ह गया, बीएमसी एवं राज्यभर के शहरी निकाय चुनाव में भाजपा का सबसे बड़ी पार्टी के रूप में उभरना एवं उसका दबदबा कायम होना, एक बड़े राजनीतिक बदलाव का सबसे सशक्त प्रमाण है।
मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस की राजनीतिक सोच और कार्यशैली इस पूरे परिदृश्य में एक निर्णायक कारक के रूप में उभरकर सामने आई है। फडणवीस ने महाराष्ट्र की राजनीति को केवल सत्ता संतुलन की सीमाओं में नहीं बांधा, बल्कि उसे दीर्घकालिक विकास दृष्टि से जोड़ा है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में चल रहे व्यापक राष्ट्रीय विकास कार्यक्रमों जैसे बुनियादी ढांचे का विस्तार, डिजिटल गवर्नेंस, पारदर्शिता, निवेश अनुकूल वातावरण और सुशासन को उन्होंने राज्य की आवश्यकताओं के अनुरूप जमीन पर उतारने का प्रयास किया है। उनकी राजनीति भावनात्मक उत्तेजना या तात्कालिक लोकप्रियता पर नहीं, बल्कि योजनाबद्ध विकास, प्रशासनिक दक्षता और भविष्य की तैयारी पर आधारित रही है।
मुंबई से लेकर विदर्भ और मराठवाड़ा तक विकास की समान अवधारणा, शहरी-ग्रामीण संतुलन और रोजगार सृजन पर जोर उनकी सोच को प्रतिबिंबित करता है। इस महाविजय के पीछे फडणवीस की रणनीति के चार प्रमुख स्तंभ रहे हैं- हिंदुत्व और विकास का संतुलन, लोकल मुद्दों पर फोकस, विपक्ष पर प्रभावी जवाब और जनता के साथ जुडाव। यही कारण है कि स्थानीय निकाय चुनावों में जनता ने उन्हें केवल एक प्रशासक के रूप में नहीं, बल्कि एक दूरदृष्टा नेतृत्वकर्ता के रूप में स्वीकार किया है। नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में ‘सबका साथ, सबका विकास, सबका विश्वास’ की जो राष्ट्रीय अवधारणा गढ़ी गई, देवेंद्र फडणवीस ने उसे महाराष्ट्र की राजनीतिक और प्रशासनिक संस्कृति का हिस्सा बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है, और यही दृष्टि महायुति की सफलता की वैचारिक रीढ़ बनती दिखाई देती है।
बीएमसी का महत्व केवल राजनीतिक प्रतीकात्मकता तक सीमित नहीं है। यह देश का सबसे धनी नगर निगम है, जिसका 2025-26 का बजट 74,427 करोड़ रुपये का है, जो कई छोटे राज्यों के बजट से भी अधिक है। इसीलिये बीएमसी शिवसेना का आर्थिक संबल थी, क्योंकि भ्रष्ट तौर-तरीकों के कारण नगर निकाय का पैसा उसके नेताओं के पास पहुंचता था। बीएमसी के इसी भ्रष्टाचार के कारण मुंबई अंतरराष्ट्रीय शहर के रूप में विकसित नहीं हो पा रही थी। ऐसे में बीएमसी पर नियंत्रण का अर्थ है नीतिगत प्राथमिकताओं, शहरी विकास की दिशा और संसाधनों के उपयोग पर निर्णायक प्रभाव। भाजपा नेतृत्व वाली महायुति की सफलता यह संकेत देती है कि आने वाले वर्षों में मुंबई का प्रशासनिक और विकासात्मक स्वरूप नए सिरे से गढ़ा जाएगा। मुंबई को खराब सडकों, ट्रैफिक जाम और प्रदूषण से त्रस्त शहर की छवि से मुक्त करना भाजपा की पहली प्राथमिकता बननी चाहिए।
इन चुनावों का एक और महत्वपूर्ण पहलू यह रहा कि दो दशक बाद ठाकरे परिवार से जुड़ी पार्टियां एकजुट होकर मैदान में उतरीं, फिर भी वे महायुति की लहर को रोकने में असफल रहीं। उद्धव ठाकरे की शिवसेना और राज ठाकरे की महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना की प्रतीकात्मक एकता मतदाताओं को प्रभावित नहीं कर सकी। इसी तरह शरद पवार और अजीत पवार के नेतृत्व वाले राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी के गुटों का पूणे में गठबंधन भी बुरी तरह विफल रहा। यह पराजय उन राजनीतिक परिवारों के लिए एक चेतावनी है, जिन्होंने लंबे समय तक राज्य की राजनीति में वर्चस्व बनाए रखा था।
इन परिणामों से यह स्पष्ट है कि महाराष्ट्र की जनता ने क्षेत्रीय संकीर्णता और पुराने नारों की बजाय विकास, स्थिरता और विश्वास की राजनीति को प्राथमिकता दी है। ‘मराठी मानुष’ जैसे भावनात्मक मुद्दे इस बार ज्यादा प्रभाव नहीं डाल सके। मतदाताओं ने यह संकेत दिया है कि वे अपनी आकांक्षाओं को केवल पहचान की राजनीति में सीमित नहीं रखना चाहते, बल्कि वे बेहतर बुनियादी ढांचे, पारदर्शी प्रशासन और भविष्य की स्पष्ट दृष्टि चाहते हैं। इन स्थानीय निकाय चुनावों में कांग्रेस की हाशिये पर मौजूदगी भी एक महत्वपूर्ण संकेत है। यह स्थिति कांग्रेस के लिए आत्ममंथन का अवसर है। महाराष्ट्र जैसे बड़े और राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण राज्य में उसकी कमजोर होती पकड़ यह सवाल उठाती है कि क्या पार्टी बदलते राजनीतिक परिदृश्य को समझने और उसके अनुरूप रणनीति बनाने में विफल हो रही है। महा विकास अघाड़ी गठबंधन के भविष्य पर भी इन परिणामों ने प्रश्नचिह्न लगा दिया है। इसके घटक दल पहले ही प्रासंगिक बने रहने के लिए संघर्ष कर रहे हैं और यह पराजय उस संघर्ष को और कठिन बना देती है।
राजनीतिक विश्लेषक मानते हैं कि ठाकरे और पवार जैसे परिवारों को अब अपनी राजनीति का पुनर्मूल्यांकन करना होगा। केवल विरासत और अतीत की उपलब्धियों के सहारे राजनीति नहीं चलाई जा सकती। जनता अब जवाबदेही, परिणाम और स्पष्ट दिशा चाहती है। इसके विपरीत भाजपा ने यह सिद्ध कर दिया है कि वह चुनाव जीतने का गणित अच्छी तरह समझ चुकी है। मजबूत बूथ मैनेजमेंट, कैडर आधारित संगठन और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का वैचारिक व सांगठनिक संबल उसकी सफलता की आधारशिला बने हैं। यही कारण है कि भाजपा न केवल अपने प्रतिद्वंद्वियों से आगे निकली, बल्कि कई स्थानों पर अपने सहयोगियों पर भी भारी पड़ी। इन चुनावों का व्यापक अर्थ केवल महाराष्ट्र तक सीमित नहीं है। यह परिणाम राष्ट्रीय राजनीति के लिए भी एक संकेत हैं कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में विश्वास, विकास और आश्वासन की राजनीति को जनता लगातार समर्थन दे रही है। यह राजनीति केवल घोषणाओं तक सीमित नहीं, बल्कि जमीन पर बदलाव की अनुभूति कराती है। अंधेरों के बीच रोशनी की किरण की तरह यह राजनीति आम नागरिक को यह विश्वास दिलाती है कि उसका भविष्य सुरक्षित हाथों में है। इससे राजनीतिक परिभाषाएं ही नहीं बदलीं, बल्कि इंसान की सोच में भी परिवर्तन आया है। मतदाता अब भावनात्मक उकसावे से अधिक ठोस उपलब्धियों और संभावनाओं को महत्व देने लगा है।
महाराष्ट्र के स्थानीय निकाय चुनाव इस बदलाव का सशक्त उदाहरण हैं। बड़े-बड़े दावे करने वालों के बोल ध्वस्त हुए हैं और विकास की राजनीति आगे बढ़ी है। जनता देश को एक नई दिशा, एक नए लोकतांत्रिक परिवेश और एक नई राजनीतिक संस्कृति में देखना चाहती है। यह संस्कृति केवल सत्ता परिवर्तन की नहीं, बल्कि शासन के तौर-तरीकों में बदलाव की मांग करती है। पारदर्शिता, जवाबदेही और परिणामोन्मुखी प्रशासन अब केवल नारे नहीं, बल्कि जन अपेक्षा बन चुके हैं। बीएमसी जैसे शक्तिशाली संस्थान में भाजपा का वर्चस्व न केवल मुंबई की सत्ता संरचना को बदलेगा, बल्कि महाराष्ट्र की राजनीति की धुरी को भी नए सिरे से परिभाषित करेगा। यह जीत बताती है कि लोकतंत्र में वही राजनीतिक ताकत टिकाऊ होती है, जो समय के साथ खुद को बदलने, जनता की नब्ज पहचानने और विकास को केंद्र में रखने का साहस रखती है। महाराष्ट्र के स्थानीय निकाय चुनावों ने इसी सच्चाई को एक बार फिर उजागर किया है।
प्रेषकः
(ललित गर्ग)
लेखक, पत्रकार, स्तंभकार
ई-253, सरस्वती कंुज अपार्टमेंट
25 आई. पी. एक्सटेंशन, पटपड़गंज, दिल्ली-92
फोनः 22727486, 9811051133